SAB KUCH JAYAZ HAI... - Page 4 - SexBaba
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SAB KUCH JAYAZ HAI...

भाई लोग 13 अपडेट दे चूका हु. उसके बाद जब वीकली अपडेट देने को बोलै तो कुछ नई रीडर्स कुछ न कुछ बोलने के liye....:fuck1:

यारा 13 अपडेट के पहले इनका कही पता नहीं था. अब क्या साबित करने आये हैं ये की मैंने गलत kiya.?:hehe:

भय बुरा मत मन्ना मगर इस तरह में गुस्सा आता है. मैं डेली अपडेट देता हु तो कुछ तो कमेंट करके सपोर्ट करो. मेरे उन यारो की वात क्यों लगा रहे हो जो कमेंट करते hain....:cry2:
 
भय मैं सब समझता हु. लोग सिर्फ चुदाई वाली कहानी पढ़ते हैं. कहानी कैसी है इससे उनको कोई लेना देना नहीं है. बस दे दाना दान चुदाई ho....:sex::sex::sex:

यारा इन्सेस्ट स्टोरी है तो इन्सेस्ट भी मिलेगा इसमें. मगर थोड़ा वेट तो करो. अभी तो हीरो फ्लैशबैक बता रहा है और ये भी की उसने कैसे घर छोड़ा tha....:doodh:
 
सब कुछ जायज़ है....

अपडेट = 14

फ्लैशबैक रनिंग....


रात में रचना के बारे में सोचते सोचते कब मेरी आँख लग गयी थी मुझे पता hi नहीं चला था. सुबह अलार्म क्लॉक के बजने से hi मेरी आँख खुली. मैं जग तो गया था मगर उठा नहीं. अलार्म क्लॉक बंद करने के बाद दीदी ने मेरी तरफ देखा तो मुझे आँख बंद किये लेता हुआ पाया.

दीदी मुझे कुछ देर देखती रही. उसके बाद मुझे बीएड पर कुछ हलचल महसूस हुयी. मैं समझ गया की दीदी अब कमरे से जा रही हैं. इसके पहले किसी दिन भी ऐसा नहीं हुआ था की अलार्म क्लॉक के बजने पर मैं दीदी के साथ hi उठ न गया हो. मगर आज पता नहीं क्या हुआ था मुझे की मैंने जग जाने के बाद भी अपनी आँखे न खोली थी बल्कि चुप चाप पड़ा hi रह गया था. मैं अपने आप पर हैरान था और सोचे जा रहा था की अब दीदी क्या करेगी.?

अभी मैं सोच hi रहा था की तभी मुझे मेरे राइट चिक पर बहुत hi सॉफ्ट चीज़ महसूस हुयी और महकती गर्म गर्म हवा भी. मुझे पहले तो कुछ समझ न आया मगर जल्द hi पता चल गया.

"गुड मॉर्निंग मेरे प्यारे भाई. मुझे पता है की तू जग गया है. मगर ये नहीं समझ आया की जागने के बाद भी तू अपनी दीदी का सुबह सुबह चेहरा नहीं देख रहा." दीदी ने मेरे गाल को हलके से चूमने के बाद ऐसा कहा तो मैंने फैट से अपनी आँखे खोल दी और फिर अपने चेहरे के एक डैम करीब उनके चेहरे की तरफ देख कर मुस्कुराया.

"अगर मैं भी आपकी तरह जग जाता और बीएड पर उठ कर बैठ जाता तो मुझे ये कैसे पता चल पता की आज की सुबह इतनी खूबसूरत भी होगी." मैंने मुस्कुराते हुए ऐसा कहा तो दीदी मुस्कुरा उठी मगर उनके चेहरे के भाव से लगा जैसे उन्हें मेरी ये बात समझ न आयी हो.

"क्या मतलब है तेरा.?" दीदी ने मेरी आँखों में देखते हुए कहा तो मैंने कहा.

"सुबह तो आज से पहले भी खूबसूरत होती थी दीदी मगर अब पता चला की उन सुबहो में और आज की सुबह में काफी चेंज था." मैंने कहा तो दीदी हैरानी से मुझे देखने लगी.

"ये तू क्या कह रहा है मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा. साफ़ साफ़ कह न की क्या कह रहा है तू.?" दीदी ने कहा तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा.

"ारी बड़ी सिंपल सी बात है दीदी. आज से पहले वाली सुबह सुखी टाइप की होती थी मगर आज वाली सुबह सुखी नहीं मीठी थी और बहुत महाकि हुयी भी. आज आप ने जब गुड मॉर्निंग कहा तो आप ने मेरे गाल पर चूमा भी. इस लिए कह रहा हु की आज की सुबह पहले वाली हर सुबह से खूबसूरत थी." मैंने डिटेल में उन्हें बताया तो वो मुस्कुरा कर सीढ़ी बैठ गयी.

"अच्छा aisa...wo तो मैंने ऐसे hi तेरे गाल पर चूम लिया था. तुझे आँखे बंद करके लेता हुआ देखा तो मुझे तुझ पर और तेरी मासूमियत पर प्यार आ गया था. अपने भाई के गाल को चुम लिया तो इससे सुबह कैसे खूबसूरत हो गयी.?" दीदी ने मुस्कुराते हुए कहा तो मैंने कहा.

"बस हो गयी क्यों की मुझे ऐसा hi महसूस हो रहा है. दुनिया की सबसे सुन्दर और सबसे मासूम मेरी दीदी ने मेरे गाल को चुम कर मुझे गुड मॉर्निंग बोलै तो मेरे लिए आज की सुबह सबसे ज़्यादा खूबसूरत हो गयी." मैंने कहा तो दीदी मुझे बड़े ध्यान से देखने लगी.

"तू और तेरी baate...kabhi कभी मेरे पल्ले hi नहीं पड़ती. पता नहीं क्या क्या बोल देता है. अच्छा चल अब मैं जा रही हु. माँ के उठने से पहले मुझे उनके कमरे में चाय ले कर पहुंचना भी है." दीदी ने कहा तो मैंने हाँ में सर हिला दिया. उसके बाद दीदी कमरे से चली गयी.

उनके जाने के बाद मैं मुस्कुराते हुए उनके hi बारे में सोचने लगा. मेरी दीदी सच में बहुत सुन्दर थी. वो मुझसे आगे में बड़ी थी. उनके चेहरे पर हर वक्त मासूमियत और गंभीरता रहती थी. उनकी वौइस् कोयल की तरह थी. वो बहुत तेज़ नहीं बोलती thi...magar जब भी वो कोई बात बोलती तो लगता की कानो में शहद घुल गया हो. मेरी नज़र में मेरी दीदी से अच्छी दुनिया की कोई लड़की नहीं थी और शायद वो भी मेरे बारे में यही समझती थी की मेरे जैसा कोई लड़का न होगा.

दीदी को कमरे से गए 5 मिनट hi हुआ था की तभी मेरे मोबाइल पर मैसेज टोन बजी. मेरा मोबाइल बीएड के सिरहाने पर hi रखा था. मैसेज टोन सुन कर मैंने सोचा इतनी सुबह किसका मैसेज हो सकता है. क्या कंपनी वालो के लिए भी सुबह हो गयी है. ये सोचते हुए मैंने मोबाइल उठा कर देखा तो अननोन no का एक मैसेज शो हो रहा था स्क्रीन पर.

मैंने मोबाइल अनलॉक करके मैसेज बॉक्स को ओपन किया तो उसमे मुझे एक मैसेज लिखा दिखा जो एक शायरी में था. अननोन no से मैसेज देख कर मेरे दिमाग में बस एक hi नाम आया. ये no रचना का hi था शायद. उसी ने सुबह सुबह मैसेज भेजा था शायरी वाला.

चांदनी रात अलविदा कह रही है,

एक ठंडी सी हवा दस्तक दे रही है,

उठ कर देखो दोस्त ज़रा नज़रो को,

एक प्यारी सी सुबह आपको,

“गुड मॉर्निंग” कह रही है.

मैंने रचना के इस शायरी वाले मैसेज को तीन चार बार पढ़ा. उसने शायरी में गुड मॉर्निंग मैसेज के साथ साथ मुझे दोस्त भी कहा था. मतलब वो मुझे दोस्त मानती है. मुझे समझ न आया की मैं उसके इस मैसेज का क्या जवाब दू. मैंने कुछ देर सोचा और फिर बिना कोई जवाब दिए मैंने मोबाइल को एक तरफ रख दिया.

मैं रचना पर भरोसा नहीं कर सकता था. क्यों की मैंने उसके भाई को मारा था और उसी की वजह से पंचायत हुयी थी जिसमे उसके बाप को लाइफ में पहली बार हार का मुँह देखना पड़ा था. भरे गांव के सामने पंचायत ने मेरे पक्ष में फैसला सुनाया था. गांव के इतर कास्ट के लोगो ने उसके सामने पहली बार बोलने की हिम्मत की थी. ये सब बाते ऐसी थी जिससे मुझे लगता था की अपने बाप और भाई की तरह रचना की सोच भी उनकी तरह hi होगी और वो मुझसे दोस्ती कर के कोई काण्ड करना चाहती होगी.

यही सब सोचते हुए मैं नीचे आया और बाथरूम में घुस गया. फ्रेश होने के बाद मैं फिर से अपने कमरे में आ गया और बीएड पर लेट कर दीदी के आने का वेट करने लगा. थोड़ी देर बाद दीदी ट्रे में चाय ले कर आयी तो हम दोनों ने hi साथ बैठ कर चाय पि. मैं उनके सामने खुश hi दिख रहा था. जब दीदी चली गयी तो मैंने दिवार पर बने ाले से एक बुक लिया और उसे पढ़ने लगा.

सुबह के बाद से रचना का न कोई फ़ोन आया और न hi कोई मैसेज. मैं दिन भर पिता जी के साथ खेतो पर रहा और फिर शाम को घर आ गया. ऐसे hi दो दिन गुज़र गए. इन दो दिनों में रचना ने मुझे कोई फ़ोन नहीं किया था. हाँ उसका मैसेज ज़रूर आता था. गुड मॉर्निंग और गुड नाईट वाले मगर मैंने उसके मैसेज का कोई रिप्लाई नहीं दिया था.

तीसरे दिन सुबह दीदी के जाने के बाद रचना का फिर से गुड मॉर्निंग का मैसेज आया. उसके ये दोनों टाइम वाले मेस्सगेस शायरी में hi होते थे. आज भी उसने शायरी में hi मैसेज भेजा था जिसे मैं पढ़ रहा था.

ताज़ी हवा में फूलो की महक हो,

पहली किरण में चिडियो की चहक हो,

जब भी खोलो तुम अपनी पलके ए दोस्त,

उन पलकों में बस खुशियों की झलक हो.

मुझे समझ न आया की मैं रचना के इस मैसेज का क्या जवाब दू. मैं कुछ देर सोचता रहा इसके बाद मोबाइल को रख कर नीचे आया और बाथरूम में घुस गया.

सारा दिन ऐसे hi गुज़रा मगर जब शाम होती और मैं पिता जी के साथ घर की तरफ चल देता तो मुझे दर सा सताने लगता की कही पिता जी के सामने hi रचना का कॉल न आ जाये. वैसे तो मैंने उससे सोचने के लिए टाइम लिया था मगर तीन दिन गुज़र गए थे और मैंने उसके मेस्सगेस तक का कोई जवाब नहीं दिया था. सो मुझे लगता था की कही वो कॉल hi न कर दे. मैं पिता जी के सामने तीसरी बार उसके कॉल को अफोर्ड नहीं कर सकता था. जाने पिता जी क्या सोचे मेरे बारे में की मेरा फ़ोन उसी वक्त क्यों बजता है जब वो साथ में होते हैं.?

मैंने अपने मोबाइल को वाइब्रेशन में रखा हुआ था. जिससे अगर कॉल ए भी तो मेरे शिव किसी को पता न चले. आज भी रास्ते में सामने से आते हुए कोई मिल गया था पिता जी को जिससे वो बाते करने लगे और मुझे घर जाने को कह दिया था. मैं घर की तरफ चला तो थोड़ी hi देर में मेरे पेंट की पॉकेट में वाइब्रेशन होने लगा. मैंने आस पास देखा और फिर मोबाइल निकल कर देखा तो रचना का hi कॉल था.

रचना का कॉल देख कर मैं टेंशन में आ गया. मैं सोचने लगा की अब इसे क्या जवाब दुगा मैं.? कॉल तो उठाना hi था सो उठाया तो रचना एक डैम से शुरू हो गयी.

"बड़े अजीब आदमी हो तुम. मेरे एक भी मैसेज का जवाब नहीं दिया. अगर रिप्लाई में तुम भी गम या गण कह देते तो क्या हो जाता.? मैं hi पागल हु जो तुमसे दोस्ती करना चाहती हु. सोचा था की एक अच्छे इंसान से दोस्ती हो जाएगी तो उससे कुछ अच्छा अच्छा सीखने को मिलेगा. मगर मेरी तो किस्मत hi ख़राब है न." रचना ने नॉन स्टॉप ये सब कहा तो मैंने कहा.

"वो मुझे समझ hi नहीं आया की मैं तुम्हारे मैसेज का क्या जवाब दू.?" मैंने धीरे से ये कहा तो रचना ने कहा.

"हाय हाय समझ hi नहीं आया. इसमें समझना क्या था विक्की.? गम या गण मैसेज का जवाब तो कोई अनपढ़ भी दे सकता है. तुम ये क्यों नहीं कहते की तुम कोई जवाब देना hi नहीं चाहते थे मुझे. हे भगवन कोई ऐसा भी करता क्या अपनी मासूम सी दोस्त के साथ.?" रचना ने ऐसा कहा तो मुझे जाने क्यों अंदर hi अंदर हसी आयी मगर मैं हँसा नहीं.

"छोडो जाने दो. ये बताओ की क्या सोचा है तुमने दोस्ती के लिए.? आज ये तीसरा दिन भी ख़तम हो गया. क्या पूरी ज़िन्दगी सोचने में लगाओगे.?"

"नहीं ऐसी बात नहीं है." मैंने ये कहा तो रचना ने कहा.

"फिर कैसी बात है विक्की.? तुम न सोचते hi बहुत हो. इतना मत सोचो विक्की. तुम मुझ पर पूरा भरोसा कर सकते हो. अगर तुम ये सोच कर मुझसे दोस्ती के लिए हाँ नहीं कर रहे की मैं तुमसे दोस्ती की आड़ में अपने भाई की मार का बदला लगी तो तुम गलत सोचते हो विक्की. मेरे मन में तुम्हारे लिए ऐसी कोई बुरी नियत नहीं है. सारा गांव जनता है की तुम और तुम्हारे परिवार के सब लोग बहुत अच्छे हैं. तो जो सच है उसे क्या मैं नहीं मानूगी.?" रचना ने ये सब कहा तो मैं हैरान रह गया. मेरे मन में जिस बात का अंदेसा था रचना उसी की बात कर रही थी.

"अच्छा एक काम करो. तुम मुझसे दोस्ती के लिए हाँ कहो. तुम्हे जब भी ऐसा लगे की मैं तुम्हारे साथ दोस्ती की आड़ में कुछ बुरा करना चाहती हु तो तुम उसी वक्त मुझसे दोस्ती ख़तम कर देना और मेरा फ़ोन no भी ब्लॉक कर देना. अब इससे ज़्यादा मैं क्या कह सकती हु विक्की.? मैं तुम्हे भरोसा दिलाने के लिए किसी की भी कसम खा सकती हु और क्या कर सक्तु हु तुम खुद बताओ.?" रचना ने ऐसा कहा तो मैं सोच में पद गया. बात तो वो सच hi कह रही थी.

इंसान भरोसा दिलाने के लिए यही सब तो कर सकता है और इंसान को भरोसा करना hi पड़ता है. मैंने भी सोचा की अगर ये रिष्की भी है तो ये रिष्क ले hi लेता हु. मैंने रचना से दोस्ती करने के लिए हाँ कह देने का फैसला ले लिया. मैं भी अब देखना चाहता था की रचना मुझसे दोस्ती कर के क्या करती है.?

"ठीक है मैंने सोच लिया है." मैंने ये कहा तो रचना ने कहा.

"क्या सोच लिया है.?" रचना ने कहा तो मैंने कहा.

"ये की मैं तुमसे दोस्ती करुगा मगर मैं इस दोस्ती में किसी भी तरह की बंदिश नहीं चाहता." मैंने ऐसा कहा तो रचना ने ख़ुशी से कहा.

"ये हुयी न बात. तुम्हारी इस रज़ामंदी से मैं बहुत खुश हो गयी हु विक्की. एक अच्छे नेचर का इंसान मेरा दोस्त बन गया है. मैं पूरी कोशिश करुँगी की मेरी वजह से मेरे दोस्त का दिल न दुखे और न hi किसी तरह की कोई प्रॉब्लम हो." रचना ने ये कहा तो मुझे भी अंदर से एक ख़ुशी का अहसास हुआ. मगर मैंने उस ख़ुशी को रचना पर उजागर नहीं किया.

"मेरी भी यही कोशिश रहेगी की मेरी वजह से तुम पर कभी कोई बात न आये." मैंने ऐसा कहा तो रचना ने कहा.

"तुम्हे ये कहने की ज़रूरत नहीं है विक्की. मुझे पता है की तुम बहुत अच्छे नेचर के हो और किसी के भी बारे में बुरा नहीं सोच सकते. तुम्हारी इसी अच्छाई की वजह से तो मैं तुमसे दोस्ती करना चाहती थी." रचना ने ये कहा तो मैं कुछ न बोलै.

"अच्छा chhodo....ye बताओ अभी क्या कर रहे हो तुम. वैसे हमारी दोस्ती की शुरुआत के लिए तुम कुछ नहीं करोगे.?" रचना ने ऐसा कहा तो मैं हैरान हुआ. मुझे समझ न आया की उसके ये कहने का क्या मतलब था.

"क्या matlab...kya करू मैं.?" मैंने पूछा तो रचना ने हस्ते हुए कहा.

"कुछ ऐसा जिससे लगे की हाँ अब हम दोस्त बन गए हैं." रचना ने कहा तो मैंने कहा.

"ओह्ह मगर अभी हम पूरी तरह से दोस्त नहीं बने." मैंने ऐसा कहा तो रचना बोल पड़ी.

"ये क्या कह रहे हो तुम. दोस्त नहीं बने हैं तो फिर ये क्या है.?" रचना को शायद समझ नहीं आया था इस लिए उसने जब ऐसा कहा तो मैंने कहा.

"मेरा मतलब है की अभी तो हम एक दूसरे को अच्छी तरह से जानते भी नहीं हैं. जब अच्छे से जान लेंगे तब ये कहा जायेगा की अब हम पक्के दोस्त बन गए हैं." मैंने ऐसा कहा तो रचना फिर हसी और बोली.

"ओह्ह ऐसा kya....magar मैं तो तुम्हारे बारे में जानती हु की तुम कितने अच्छे हो. क्या तुम नहीं जानते मेरे बारे में.?" रचना ने ऐसा कहा तो मैंने कहा.

"मैं बस इतना hi जनता हु की तुम सरपंच काका की बेटी हो बस. उससे ज़्यादा मुझे तुम्हारे बारे में कुछ नहीं पता." मैंने ऐसा कहा तो रचना ने कहा.

"अच्छा ठीक hai...tum मुझसे मेरे बारे में जो चाहो पूछ लो. मैं सब कुछ बता दूगी. उसके बाद तुम भी मेरे बारे में जान्ने लगोगे और फिर हम पक्के वाले दोस्त बन जायेगे." रचना ने इतने इजी तरीके से कहा जैसे ये कोई आसान बात हो.

मैं समझ नहीं प् रहा था की गांव की एक आम सी लड़की किसी अजनबी लड़के से इतना इजी फील करते हुए कैसे बेबाकी से बात कर सकती है.? मैं एक लड़का था मगर मुझे किसी भी लड़की से बात करने में बहुत ज़्यादा झिझक लगती है.

"तो बोलो vicky....kya जानना चाहते हो मेरे बारे में. तुम्हे जो भी पूछना हो तुम पूछो. मैं तुम्हे सच सच बता दूगी." रचना ने मुझसे ये कहा तो मुझे समझ न आया की मैं उससे क्या पुछु.?

"मुझे खुद नहीं पता की मैं तुमसे क्या पुछु. तुम्हे जो कुछ बताना हो तुम खुद hi बता दो." मैंने कहा तो रचना फिर से खिलखिला कर हसने लगी फिर बोली.

"तुम सच में अजीब हो मगर फिर भी बहुत अच्छे हो. तुम मुझसे मेरे बारे में पूछने में हिचकिचा रहे हो. तभी तो ऐसा कह रहे हो. वर्ण तुम्हे बेझिझक पूछना चाहिए था मुझसे. अब तो हम दोस्त बन गए हैं इस लिए अब किसी बात के लिए झिझकने का क्या मतलब.?" रचना ने ये सब कहा तो मैं सोचने लगा की ये लड़की तो सच में बहुत ज़्यादा ओपन माइंडेड है.

"अच्छा अब मैं फ़ोन रखता हु. अभी खेत से आया था और अब घर पहुंच गया हु." मैंने ये कहा तो रचना बोली.

"तुम खेत में क्या करते हो विक्की. तुम तो पढ़े लिखे हो तो कही शहर में कोई अच्छी सी नौकरी क्यों नहीं करते. यहाँ खेतो में सभी अनपढ़ो की तरह काम क्यों करते हो.?" रचना ने ऐसा कहा तो मैंने कहा.

"क्या पढ़े लिखे लोगो को खेतो में काम नहीं करना चाहिए.? शायद तुम्हे पता न हो मगर पढ़े लिखे लोग भी कृषि का काम बहुत अच्छे से करते हैं. मुझे अच्छा लगता है अपने पिता जी के साथ काम में उनका हाथ बताना. शहर में नौकरी करके अपनी फॅमिली से दूर नहीं जाना चाहता. मेरे पिता जी मुझसे ये नहीं कहते की तुम खेतो में काम करो मगर मैं खुद hi करता रहता हु." मैंने ये सब कहा तो रचना ने कहा.

"अच्छी बात है विक्की. अपने परिवार के साथ मिल जल के रहना और उनके कामो में उनकी मदद करना अच्छी बात है. मगर जो लोग पढ़ाई लिखाई करते हैं वो खुद और उनके घर वालो के दिल में ये अरमान तो रहता hi होगा की पढ़ लिख कर हमें कोई अच्छी सी नौकरी करनी चाहिए. जिससे घर परिवार का नाम रोशन हो सके." रचना के मुँह से इतनी बड़ी बात सुन कर मैं हैरान रह गया. लग hi नहीं रहा था की वो इतना एडवांस हो सकती है.

"हाँ ये तो है. मगर मैंने अभी इस बारे में कुछ नहीं सोचा है. बाद में देखूगा की क्या करना है. अच्छा अब मैं रखता हु फ़ोन. मैं घर के सामने आ गया हु." मैंने ये कहा तो रचना ने कहा.

"ठीक है रख do...magar ये तो बताओ की अब फिर से कब बात होगी हमारी.? क्या मैं तुम्हे किसी भी वक्त फ़ोन लगा सकती हु.?" रचना ने पूछा तो मैंने कहा.

"दिन भर तो मैं पिता जी के साथ खेतो पर रहता हु. उसके बाद घर में. इस लिए मैं तुम्हे ये नहीं कह सकता की तुम कभी भी फ़ोन कर सकती हो. अगर किसी को पता चल गया तो पन्गा हो जायेगा." मैंने कहा तो रचना ने कहा.

"तो तुम hi बताओ किस वक्त मैं तुमसे बात कर सकती हु. बाकी टाइम तो मेरे पास मेरी दीदी या मेरी छोटी बहने hi रहती हैं. वैसे भी घर में रहते हुए मैं बात नहीं कर सकता." मैंने उसे बताया तो रचना ने कहा.

"अच्छा ये बताओ की तुम्हारे पास कौन सा मोबाइल है. टच स्क्रीन वाला है या बटन वाला.?" रचना ने पूछा तो मैंने उसे बता दिया की मेरे पास कीपैड वाला नार्मल मोबाइल hi है. उसने कहा की उसके पास टच स्क्रीन वाला है जो उसकी दीदी के दिए पैसो से उसने ख़रीदा है.

रचना ने मुझसे कहा की मैं भी एक टच स्क्रीन मोबाइल ले लू. मगर मैंने ये कह कर इसके लिए इंकार कर दिया की मैं घर वालो से क्या बोलूगा की मुझे किस लिए टच स्क्रीन मोबाइल लेना है. मेरे पास तो आलरेडी एक मोबाइल है. उसके बाद मैंने रचना को फ़ोन रखने का कह कर फ़ोन रख दिया और घर के अंदर आ गया.

मेरे दिमाग में रचना से हुयी बाते चल रही थी. मैं सोच सोच कर हैरान था की रचना कितनी बेबाकी से मुझसे बाते कर रही थी. उसे जो भी बोलना होता था वो पुरे कॉन्फिडेंस के साथ बोलती थी और मेरा कॉन्फिडेंस एक डैम से hi जीरो पर था.

रात में खाना पीना करके मैं अपने कमरे में आ गया था. रात 11:30 बजे दीदी आयी तो हम दोनों ने कुछ देर इधर उधर की बाते की उसके बाद दीदी गण बोल कर सो गयी. मगर मैं जगता रहा. मुझे नींद नहीं आ रही थी. मेरा ध्यान बार बार रचना की तरफ जा रहा था. मैंने मोबाइल उठा कर देखा तो उसमे रचना का गण मैसेज पड़ा था जो शायरी में hi था.

यही कभी सपनो से दिल लगाया करो,

किसी के ख्वाबो में आया जाया करो,

जब भी दिल करे की कोई तुम्हे भी

सुबह जगाये,

बस हमें याद करके पहले सो तो

जाया करो…

गुड नाईट....

मैंने रचना के इस मैसेज को पढ़ा और फिर सोचने लगा. मैं सोच रहा था की मुझे उसके इस मैसेज का रिप्लाई देना चाहिए या नहीं. उसने मुझसे शिकायत भी की थी की मैंने उसके मेस्सगेस का कोई रिप्लाई नहीं दिया था. सो मैंने सोचा की कुछ तो रिप्लाई देना hi चाहिए वर्ण वो फिर मुझसे इस बात की शिकायत करेगी.

मैंने रचना के मैसेज का रिप्लाई गुड नाईट का मैसेज करके दिया. रात आधे से ज़्यादा गुज़र चुकी थी. रचना को मैसेज करने के बाद मैंने मोबाइल को सिरहाने रख दिया था. मगर मेरी उम्मीद के विपरीत मेरे मोबाइल पर फिर से मैसेज टोन के लिए वाइब्रेशन हुआ. मैंने मोबाइल उठा कर देखा तो उसमे रचना का मैसेज आया हुआ था. उसने थैंक्स माय स्वीट फ्रेंड लिख कर भेजा था.

मैं हैरान था की रचना इस टाइम भी जग रही थी. वो इस टाइम क्यों जग रही थी इस बारे में मुझे कुछ भी समझ न आया. वैसे मैंने सोचा तो की शायद वो मेरे रिप्लाई का वेट करती रही होगी. सोचते सोचते hi मेरे दिमाग में एक और बात आयी. ये भी तो हो सकता है की रचना मेरे मैसेज के लिए नहीं बल्कि किसी और वजह से इतने टाइम जग रही हो. वो वजह ये भी हो सकती की उसका किसी दूसरे लड़के से चक्कर हो और वो देर रात तक उससे मेस्सगेस में बाते करती हो या कॉल पर भी बाते करती हो.

रचना का बिंदास और कॉन्फिडेंस से भरा करैक्टर देख कर मुझे यही रीज़न समझ में आ रहा था और मुझे ये सच भी लग रहा था. उसके बाद मुझे कब नींद आ गयी थी मुझे पता hi नहीं चला.

सुबह अलार्म क्लॉक के बजने से hi नींद खुली. दीदी ने मुझे गम कहा उसके बाद वो चली गयी. ऐसे hi 15 दिन गुज़र गए. मेरी सुबह दीदी के साथ होती और रात भी. दिन भर पिता जी के साथ खेतो पर काम और उसके बाद घर. रचना मुझे डेली फ़ोन करती थी. वो तभी फ़ोन करती थी जब मैं खेतो पर रहता था. उसका फ़ोन फिक्स टाइम पर hi आता था. मैं भी उस फिक्स टाइम पर खेतो में सबसे अलग हो जाता था जिससे किसी को पता न चल सके की मैं किसी से फ़ोन पर बात कर रहा हु.

इन 15 दिनों में मैं काफी खुल चूका था रचना से. पहले मुझे उससे बात करने में झिझक होती थी मगर अब ऐसा नहीं था. अब मैं भी उससे थोड़ा कॉन्फिडेंस के साथ hi बात करने लगा था. वो मुझसे खूब है है कर बात करती थी और कभी कभी मज़ाक में मुझे छेड़ती भी थी. मैं एक लिमिट तक hi उससे बात करता था. वो हर बार मुझसे यही कहती की ज़िन्दगी में इतना डाब के और इतना कमज़ोर बन के नहीं रहना चाहिए. चार दिन की ज़िन्दगी को हसी ख़ुशी और बिंदास हो कर जीना चाहिए.

मैं रचना की इन बातो का बस हाँ या न में जवाब दे देता था. एक दिन उसने मुझसे मिलने के लिए कहा तो मैंने साफ़ मन कर दिया. मेरे मन कर देने पर वो मुझसे कहने लगी की मिलने में क्या प्रॉब्लम है. हम दोस्त हैं तो कभी न कभी तो मिलना भी चाहिए हमें एक दूसरे से. उसकी इस बात से मैंने उसे बताया की ये पॉसिबल नहीं है क्यों की मैं दिन भर पिता जी के साथ खेतो पर hi रहता हु.

रचना ने कहा की अगर मुझे गांव में मिलने से कोई प्रॉब्लम है तो हम शहर में मिल सकते हैं. उसकी शहर में मिलने की बात से मैं हैरान रह गया था. उसने खुद hi बताया की वो हप्ते में संडे के दिन हमेशा शहर जाती है बस से. कभी अकेली तो कभी किसी सहेली के साथ वो शहर ज़रूर जाती है. उसके घर वालो को भी पता है. वो अपने बाप की लाड़ली बेटी है इस लिए उसका बाप उसके कही आने जाने पर कोई पाबंदी नहीं लगता.

रचना ने मुझसे कहा की इस बार जब वो संडे को शहर जाएगी तो मैं भी उस दिन शहर चालू. वो बस से जाएगी और मैं अपनी मोटर सिक्ले पर. शहर पहुंच कर हम एक दूसरे से मिलेंगे. रचना ने पूरा प्लान बता दिया था मुझे और मुझे चलने के लिए फाॅर्स भी किया. मैं मन करता रह गया मगर वो न मानी थी. सो फाइनल यही हुआ की दो दिन बाद संडे को मुझे शहर जाना hi पड़ेगा.

फ़ोन पर बाते करना या मैसेज में बाते करना तक तो ठीक था मगर मिलने मिलाने वाली बात से मैं कम्फर्टेबले फील नहीं कर रहा था. मगर रचना की रिक्वेस्ट पर और उसके समझने पर मुझे उससे मिलने शहर जाना hi पद रहा था. मेरा दिल और दिमाग दोनों hi इसके लिए रेडी नहीं थे. बार बार ऐसा लग रहा था जैसे इससे कुछ गड़बड़ हो जाएगी.

सैटरडे की रात मुझे नींद नहीं आ रही थी. कल संडे था और मुझे रचना से मिलने शहर जाना था. मुझे समझ नहीं आ रहा था की शहर जाने से कैसे बच्चू. रचना ने साफ़ कह दिया था की कोई बहाना नहीं चलेगा. अगर मैंने ऐसा किया तो वो मुझसे नाराज़ हो जाएगी. मैंने भी सोचा था की मिलने में क्या जाता है. एक बार मिल कर देख लेने में क्या है. आखिर पता तो चले की मिलने से क्या होता है.

कुसुम दीदी को मैंने रचना के बारे में अभी कुछ भी नहीं बताया था. मुझे गिल्ट फील हो रही थी की मैंने दीदी से इस बात को अब तक छुपा कर रखा हुआ है. जबकि मैं उनसे अपनी कोई भी बात नहीं छुपता था. उनके सामने मेरी ज़िन्दगी की किताब का हर पेज ओपन था. मैंने इस बारे में दीदी से इस लिए भी नहीं बताया था की पता नहीं वो मेरे बारे में क्या सोचेंगी. उनको ये बात पसंद आएगी की नहीं की मैंने उस सरपंच की बेटी से दोस्ती का रिश्ता बना रखा है जिसके बेटे को मैंने उस टाइम मारा था.

सैटरडे की रात बड़ी मुश्किल से गुज़री थी. मैंने सैटरडे को hi माँ से बता दिया था की मुझे कल शहर जाना है किसी काम से. माँ ने शहर जाने की इजाजत दे दी थी. रात में शायद उन्होंने पिता जी को भी बता दिया था. सुबह जब मैं जाने के लिए रेडी हुआ तो पिता जी ने मुझे कुछ पैसे दिए थे खर्चे के लिए. उन्होंने मुझसे एक बार भी नहीं पूछा था की मैं शहर किस लिए जा रहा हु. शायद वो मुझ पर हद से ज़्यादा भरोसा करते थे और जानते थे की मैं बेवजह शहर नहीं जा रहा हु.

भाई लोग....

आज के लिए इतना hi....

रीड एन्जॉय & गिव योर फीडबैक....

कीप सपोर्टिंग & स्टे विथ....

:थैंक्यू:
 
:hello: भय....

यारा मैं चाहता था की मैं इस स्टोरी को कम्पलीट करू मगर लोगो का ऐसा रिस्पांस देख कर दिल टूट गया है. सो मेरी रिक्वेस्ट है की आप इस स्टोरी को क्लोज कर do....🙇

आज मुझे भी पता चल गया की क्यों कोई राइटर अपनी स्टोरी को बीच में छोड़ कर चला जाता hai.:declare:

थैंक्स भाई लोग बहुत अच्छा रिस्पांस दिया sabne...:applause:

:थैंक्यू:
 
सब कुछ जायज़ है....

अपडेट = 15

फ्लैशबैक रनिंग....


गांव का सरपंच मणि शंकर घर से काफी मजबूत इंसान था. उसके पास काफी ज़मीने थी. 15 सालो से वही सरपंची का चुनाव जीत रहा था. सर्कार का जो भी पैसा गांव के विकाश के लिए आता था वो सब पैसा वो खुद hi निगल जाता था. थोड़ा बहुत विकाश के नाम पर लगा कर वो खाना पूर्ति कर देता था. उसके पास 4 आदमी ऐसे थे जो उसके कहने पर किसी के भी साथ कुछ भी कर सकते थे. उसका खानदान भी काफी बड़ा था और सब लोग एक जुट रहते थे. यही वजह थी की गांव का दूसरा कोई उनके खिलाफ जाने की हिम्मत नहीं करता था.

मणि शंकर रंग मिजाज़ आदमी था और अपने मतलब के लिए वो कुछ भी कर डालता था. गांव की बहु बेटियों से ले कर आस पास के गावो की बहु बेटियों का भी वो शिकार करवा लेता था. कभी पैसो के लालच पर तो कभी अपनी ताकत पर. किसी की ज़मीन पर नाजायज़ अधिकार करना भी उसका काम था. इसके लिए वो तहसीलदार पटवारी यहाँ तक की बड़े बड़े विधायक और मंत्री तक से अपना काम करवा लेता था. बदले में वो उनके सामने गांव की कच्ची कलियों को परोस देता था.

मणि शंकर ने शहर में एक बड़ा सा घर बनवा रखा था जहा पर वो बड़े बड़े लोगो की इच्छा पूरी करता था और एक घर उसने गांव में अपने खेतो में बनवा रखा था. जहा पर वो खुद अपने लेवल के आदमियों के साथ मज़े करता था. उसके बारे में ये सब कोई जनता था मगर कोई कुछ कर नहीं सकता था.

इस वक्त मणि शंकर अपने खेत पर बने बड़े से पक्के घर में hi चार आदमियों के साथ बैठा था और किसी इम्पोर्टेन्ट सब्जेक्ट पर बात चीत कर रहा था. मणि शंकर का ये घर खेतो पर बना हुआ था. इसके दो तरफ बड़े बड़े ामो का बाग़ था और दो तरफ कुछ ऐसे पेड़ पौधे लगे हुए थे जिनकी कास्ट एंड वैल्यू काफी ज़्यादा थी.

"तो तुम ये कह रहे हो की अगर मुझे अपनी उस हार और अपमान का बदला लेना है तो महेश के उस छोकरे को इस काम के लिए लगा लेना चाहिए.?" मणि शंकर ने कहा तो नारायण ने कहा.

"ये सबसे बढ़िया और सबसे अचूक तरीका है मणि. वो छोकरा तुम्हारे साथ हमेशा रहेगा और हर वक्त गुलामो की तरह तुम्हारा हर हुकुम भी मानेगा. तुम जैसे चाहोगे और जो चाहोगे उसे हर काम करना पड़ेगा. मगर उससे पहले तुम्हे महेश को ये भरोसा दिलाना पड़ेगा की तुम ये सब उसके बेटे की भलाई के लिए करना चाहते हो और तुम्हारे दिल में कोई बदले जैसी बात नहीं है." नारायण ने कहा तो एक दूसरा आदमी बोल पड़ा.

"Bilkul....tum महेश को बताओगे की इस गांव में उसका बीटा hi ऐसा है जो बाकी लड़को से ज़्यादा पढ़ा लिखा है. इस लिए तुम उसे अपने कामो के लिए अपने साथ रखना चाहते हो. तुम्हारे साथ रहने से वो बड़े बड़े लोगो से मिलेगा तो जान पहचान होगी. अच्छी खासी कमाई भी करेगा और सबसे बड़ी बात वो अपने माँ बाप से दूर भी नहीं रहेगा. मतलब यही रह कर वो अच्छा खासा कमायेगा." उस आदमी ने ऐसा कहा तो मणि शंकर ने कहा.

"ये सब तो ठीक है मगर मैं अच्छी तरह जनता हु की महेश इस बात के लिए कभी हाँ नहीं कहेगा. वो यही समझेगा की मैं उसके बेटे से बदला लेने के लिए hi ऐसा कुछ कर रहा हु." मणि शंकर ने ये कहा तो नारायण फिर बोलै.

"उसे समझना hi पड़ेगा मणि. तुम खुद उसके घर जाओगे ये सब कहने के लिए. उसके परिवार के सामने तुम्हे महेश से ये सब बाते करनी हैं और ये भी समझाना है की तुम सिर्फ नेक इरादे से hi ऐसा कर रहे हो." नारायण ने कहा तो मणि शंकर ने कहा.

"और अगर महेश इसके बाद भी राज़ी न हुआ तो.?" मणि शंकर ने ये कहा तो तीसरे आदमी ने कहा.

"राज़ी तो करना hi पड़ेगा मणि. अब ये तुम पर है की तुम कैसे महेश को इसके लिए राज़ी करते हो. बस ये ध्यान रखना की उससे बात करते वक्त अपने गुस्से पर कण्ट्रोल रखना. मीठी मीठी बातो में बड़ी ताकत होती है यार और ऐसी मेरठी बाते असर भी करती हैं. मुझे पूरा भरोसा है की महेश समझेगा. हर बाप चाहता है की उसका बीटा खूब तरक्की करे जिससे उसके कुल का नाम रोशन हो. उसका बीटा तुम्हारे साथ तुम्हारे कामो के लिए रहेगा तो उसका भविष्य रोशन hi बनेगा." उस आदमी ने मुस्कुराते हुए कहा तो बाकी सब भी उसका मतलब समझ कर मुस्कुरा पड़े थे.

"बस एक बार वो साला महेश राज़ी हो जाये फिर तो मज़ा hi आ जायेगा दिनेश. उसके शरीफ बेटे का ऐसा कायकलाप करुगा की सारा गांव दांग रह जायेगा और साथ में उसका खुद का बाप भी." मणि शंकर ने ये कहा तो तीनो मुस्कुरा उठे.

"ये तो होना hi है मणि. मगर ज़रा सम्हाल कर क्यों की जल्दबाज़ी में काम बिगड़ जाता है. शुरुआत में महेश को भरोसा दिलाने के लिए तुम्हे उसके बेटे के लिए नेक काम hi करना पड़ेगा. कुछ ऐसा करना पड़ेगा जिससे महेश का बीटा खुद hi अपने बाप को बताये की तुम कितने अच्छे हो और कितना उसकी भलाई कर रहे हो. बेटे की बात से hi महेश को तुम पर भरोसा होगा और जब उसे भरोसा हो जायेगा तब वो तुम्हारे बारे में गलत नहीं सोचेगा. भरोसा होने के बाद तुम फिर अपना असल काम करना." दिनेश ने कहा तो सबने उसकी इस बात पर हाँ कहा.

"वैसे महेश को भरोसा दिलाने के लिए मेरे पास एक और धांसू तरीका है." नारायण ने ये कहा तो मणि शंकर बोल पड़ा.

"ारी तो बता न भाई. सेल कब बताएगा.?" मणि शंकर ने कहा तो बाकी सब हसने लगे.

"महेश की बड़ी बेटी की शादी करवा दो." नारायण ने कहा तो सब उसे हैरानी से देखने लगे.

"ये कैसा तरीका है नारायण.? महेश की बेटी की शादी करवा देने से क्या होगा.?" मणि शंकर ने पूछा तो नारायण ने कहा.

"बहुत कुछ होगा मणि. तुम खुद सोचो की आज के समय में महेश के लिए सबसे बड़ी समस्या क्या है. यही न की वो अपनी बेटी की शादी नहीं कर प् रहा. उसे भले hi ये पता हो की हमारी वजह से उसकी बेटी का रिश्ता टूट जाता है मगर जब हमारी वजह से hi उसकी बेटी की शादी होगी तो उसका भरोसा हम पर होने लगेगा." नारायण ने कहा तो दिनेश बोलै.

"बात में डैम तो है नारायण. ये सही तरीका साबित होगा महेश को भरोसा दिलाने के लिए. एक काम करते हैं mani...ham पहले खुद hi कोई अच्छा सा रिश्ता ढूढ़ते हैं महेश की बेटी के लिए. उसके बाद हम महेश के पास चलेंगे और उसे उस रिश्ते के बारे में बतायेगे. मुझे पूरा भरोसा है की महेश इस बात से खुश हो जायेगा. हम सब बड़ी धूम धाम से उसकी बेटी का ब्याह करवाएंगे." दिनेश ने ये सब कहा तो मणि शंकर ने कहा.

"कहते तो तुम ठीक hi हो दिनेश मगर मैंने कुछ और hi सोचा हुआ उसकी बेटी के लिए." मणि शंकर ने कहा तो नारायण ने कहा.

"क्या सोचा है तुमने.?" नारायण ने पूछा तो मणि शंकर ने कहा.

"उसी रंडी की वजह से उस दिन उसके भाई ने मेरे बेटे को इतनी बुरी तरह से मारा था. मैंने सोच लिया है की महेश की उस रंडी बेटी को अपने बेटे से छुड़वा कर hi डैम लूँगा. हाँ narayan...tum लोग महेश की बेटी के ब्याह की बात कर रहे हो जब की मैंने यही सोचा हुआ है और ये मेरा अटल फैसला है. उस हरामज़ादी को अपने बेटे के नीचे लेताऊगा मैं. मेरा बीटा उसके जिसम के मज़े लूटेगा. जब तक ये नहीं होगा मेरे बेटे के मन को शान्ति नहीं मिलेगी और न hi मुझे." मणि शंकर ने ये कहा तो बाकी तीनो चुप रह गए.

"अगर तुम ऐसा करोगे तो बात बहुत बिगड़ जाएगी मणि." दिनेश ने कहा तो चौथा आदमी बोलै.

"और ये भी हो सकता है की इसके लिए तुम्हे बहुत बुरा परिणाम भुगतना पड़े. अब तो तुम्हे भी पता चल गया है की महेश के भी बड़े लोगो से रिलेशन हैं. उस घटना के बाद से इस बात का अंदाज़ा तो हर कोई लगा रहा होगा की तुम अपनी हार का बदला लेने के लिए महेश के परिवार के साथ कुछ न कुछ तो गलत करोगे. तो ये पॉसिबल है की महेश को भी इस बात का अंदेसा होगा और उसने इसके लिए कोई न कोई इंतजाम भी किया hi होगा. अब अगर तुम उसके साथ या उसके बेटे के साथ कुछ उल्टा सीधा करोगे या फिर उसके साथ किसी के भी द्वारा ऐसा कुछ हुआ तो सीधा इलज़ाम तुम पर hi आएगा. इस लिए अच्छा यही होगा की तुम ऐसा करने का सोचो भी मत." चौथे आदमी ने ये सब कहा तो नारायण और दिनेश ने भी उसकी बात पर समर्थन दिया.

"ारी तो मैंने ये कब कहा की मैं इसी वक्त महेश की उस छोकरी को अपने बेटे के नीचे लेताऊगा. इतना तो मुझे भी पता है की मामले को गुज़रे गए भले hi आज महीना भर हो गया है मगर उस बात को भूल तो नहीं गया होगा वो. इस लिए मैंने यही सोचा है की कुछ महीने बाद किसी ऐसे तरीके से महेश की बेटी को गायब करुगा की महेश को अगर पता भी चले तो वो मुझ पर शक न करे." मणि शंकर ने ऐसा कहा तो तीनो हैरानी से उसे देखने लगे.

"ऐसा कौन सा तरीका हो सकता है जिससे महेश तुम पर शक hi नहीं करेगा.?" नारायण ने पूछा तो मणि शंकर मुस्कुराया और फिर बोलै.

"बस इंतज़ार करो नारायण. अभी वो तरीका बता दुगा तो तुम्हे यकीन नहीं आएगा और न hi इससे मुझे मज़ा आएगा. इस लिए वक्त का इंतज़ार करो. मैं उन दोनों भाई बहन की ज़िन्दगी बर्बाद कर दुगा. यही मेरा लक्ष्य है." मणि शंकर ने फुल कॉन्फिडेंस से ऐसा कहा तो तीनो देखते रह गए उसे.

"ये साला कुत्ते की दम है मनोहर. इसे कितना भी समझा लो ये मानेगा नहीं. इसे अंदाज़ा भी नहीं है की इसके ऐसा करने से क्या हो सकता है." नारायण ने मनोहर नाम के आदमी से ऐसा कहा तो वो बस मुस्कुरा कर रह गया.

"तू सेल इतना डरता क्यों है बे.? वो साला उन चार आदमियों के बल पर उस दिन बड़ा उछाल रहा था. आज उसे लगता होगा की उनकी वजह से मैं उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाउगा. मगर वो साला रंडी का पूत ये भूल गया होगा की मैं क्या चीज़ हु." मणि शंकर ने गुस्से में ऐसा बोलै तो बाकी तीनो कुछ न बोले. कुछ देर तक कोई कुछ न बोलै. मणि शंकर जाने क्या सोचने लगा था.

"चल chhod...ye तो बाद की बात है नारायण. पहले तो हमें उसके बेटे को अपने पास काम पर रखना है और इसके लिए महेश को राज़ी भी करना है." मणि शंकर ने नार्मल हो के कहा तो नारायण ने कहा.

"महेश के पास तुम्हे अकेले hi जाना चाहिए मणि. हम लोग तेरे साथ में जायेगे तो वो सोचेगा की ये सब हमने hi प्लान बना के कर रहे हैं और इसके लिए उसके पास आये हैं. इस लिए तुम अकेले hi उसके घर जाओ और नार्मल तरीके से hi बात करो. शुरू शुरू में तुम उस सबके लिए महेश से अपने बेटे की तरफ से माफ़ी भी मांग लेना. इससे ये होगा की उसके मन में कोई बात नहीं रह जाएगी." नारायण ने कहा तो मणि शंकर ने हाँ में सर हिलाया.

"महेश सुबह खाना पीना करके अपने खेतो पर चला जाता है. उसके बाद वो शाम को hi घर आता है. पता चला है की आज कल वो अपनी ज़मीन का वो हिस्सा साफ़ करवा रहा है जिस हिस्से पर खेती नहीं होती थी. उस हिस्से को साफ़ करवा कर वो ामो का एक बड़ा सा बगीचा बनाना चाहता है. तुम्हे उसके घर सुबह के वक्त hi जाना पड़ेगा. उस वक्त उसकी बीवी भी होगी." दिनेश ने कहा तो मणि शंकर ने कहा.

"हाँ उस हिस्से की ज़मीन उसने कुछ साल पहले फाल्गुनी कॉल से इस लिए खरीदी थी क्यों की वो ज़मीन उसकी ज़मीनो से लगी हुयी थी." मणि शंकर ने बताया तो बाकी सब चुप hi रहे.

"अब ये सब छोडो यार. कुछ गरमा गरम का जुगाड़ हो तो हो जाये जल्दी. अब बर्दास्त नहीं हो रहा. काफी दिन हो गए किसी गांव की औरत का मज़ा नहीं लिया." मनोहर ने कहा तो दिनेश है दिया फिर बोलै.

"ये मणि भाई का अड्डा है मनोहर. ऐसा हो hi नहीं सकता की हम लोग यहाँ पर आये और बिना कोई मज़ा लिए चले जाये. क्यों नारायण सही कहा न मैंने.?" दिनेश ने ये कहा तो नारायण मणि शंकर की तरफ देखते हुए मुस्कुराया.

"आज तो इसका कोई इंतजाम नहीं है भाइयो. असल में आज उस हिसाब से हम यहाँ आये hi नहीं थे इस लिए पहले से ऐसा कोई इंतजाम भी नहीं किया." मणि शंकर ने ये कहा तो मनोहर और दिनेश के चेहरे लटक गए.

"क्या यार सारा मूड ख़राब कर दिया." मनोहर ने कहा तो मणि शंकर बोलै.

"तेरे मूड की माँ की छूट सेल. मुझे क्या दलाल समझ रखा है जो हमेशा मैं hi औरत का इंतजाम करू.?" मणि शंकर ने ऐसा कहा तो सब ज़ोर ज़ोर से हसने लगे.

"चल भाई अब मुँह न खुलवा मेरा नहीं तो सच में तेरी गांड में मिर्ची लग जनि है." मनोहर ने कहा तो मणि शंकर बोलै.

"बोल दे बोल de...kyo कलेजा जला रहा है अपना. यही कहना चाहता है न की मैं दलाल hi तो हु. तभी तो सबको औरत का इंतजाम करता रहता हु. चाहे कोई पुलिस वाला हो या मंत्री विधायक." मणि शंकर ने कहा तो मनोहर है पड़ा.

"अच्छा chhod...main ये कह रहा हु की कल तुम महेश से बात कर लो और उसे इस बात के लिए राज़ी कर लो की उसका बीटा तुम्हारे साथ तुम्हारा काम काज देखेगा. वैसे ऊपर से पता चला है की अगले महीने सचिव का चुनाव है. उसके लिए गांव में कंडीडेट तो और भी हैं मगर तुम चाहो तो महेश के बेटे को सचिव बनवा सकते हो. उससे एक ख़ास वजह भी हो जाएगी उसके बेटे को साथ रखने की." मनोहर ने ये कहा तो मणि शंकर की आँखों में चमक आ गयी.

"हाँ यार ये तो मैं भूल hi गया था. ये तो सच में बढ़िया आईडिया है उसको राज़ी करने का. महेश इसके लिए इंकार नहीं करेगा. सचिव के रूप में उसके बेटे को नौकरी भी मिल जाएगी और वो उसके पास भी रहेगा. ये सही तरीका है भाई. अब इसी बात को आधार बना कर उसके पास कल जाउगा मैं." मणि शंकर ने कहा तो बाकी सबने भी हाँ कहा.

कुछ देर बाद सब अपने अपने घरो को चले गए. किसी औरत का इंतजाम था hi नहीं वर्ण वो लोग यहाँ ज़रूर मौज मस्ती करते. मणि शंकर काफी खुश लग रहा था. पता नहीं क्या सोचे हुए था वो.

इधर मैं शहर जाने के लिए घर से निकल चूका था. सरे रास्ते मैं यही सोचता रहा था की शहर में रचना से मिल कर मैं उससे क्या बाते करुगा. रचना मुझसे मिलने के लिए इतना ज़ोर क्यों दे रही थी. आखिर मुझसे मिलने के बाद वो मुझसे क्या बाते करेगी.? सबसे बड़ा सवाल ये की शहर में हम दोनों अकेले hi होंगे या हमारे साथ कोई और भी होगा. कोई और से मेरा मतलब रचना की सहेली से था. उसने बताया था की वो अपनी सहेली के साथ भी कभी कभी शहर जाया करती है. तो क्या उसकी सहेली भी आज उसके साथ होगी.?

सहेली की बात दिमाग में आते hi मैं सोचने लगा की क्या रचना ने अपनी सहेली को मेरे बारे में बताया होगा.? अगर ऐसा है तो उसकी सहेली मेरे बारे में जानती होगी. मैंने उसकी सहेली को देखा नहीं था और न hi जनता था की वो कौन है.?

मेरे दिल और दिमाग में बहुत सी बाते चल रही थी. मैं जैसे जैसे शहर के करीब पहुंच रहा था मेरा दिल उसी स्पीड में धड़कने भी लगा था और अंदर घबराहट भी बढ़ती जा रही थी. मैं एक लड़का होते हुए भी ऐसी सिचुएशन से घबराये जा रहा था जब के मुझे पूरा यकीन था की रचना के अंदर ऐसी कोई बात नहीं होगी. वो एक अजीब hi करैक्टर की थी. मैं इतने दिनों से उससे फ़ोन पर बाते कर रहा था मगर मैंने किसी दिन भी ये महसूस नहीं किया था की उसे मुझसे बात करने में कोई झिझक या घबराहट हुयी है.

रचना ने मुझे फ़ोन करके बताया था की वो मुझे बस स्टैंड के आगे करीब 5 कम दूर एक संकटमोचन नाम का मंदिर है वही मिलेगी. मैं बस स्टैंड पहुंच चूका था. मैंने फिल्मो में देखा था की जब भी कोई लड़का किसी लड़की से मिलता है तो उसके लिए कोई गिफ्ट या फूल ले कर जाता है. मुझे समझ न आया की मैं रचना के लिए कोई गिफ्ट या कोई फूल लू या नहीं. अगर मैंने ऐसी कोई चीज़ उसे दी तो वो क्या सोचेगी मेरे बारे में.? कही वो ये न समझे की मैं उसे अपनी गर्ल फ्रेंड समझ कर ऐसी कोई चीज़ दे रहा हु.

सच तो ये था की मैं रचना को गफ समझता hi नहीं था. मैं तो उसे दोस्त भी नहीं समझना चाहता था मगर अब मेरे सामने मज़बूरी सी हो गयी थी. मैंने बहुत सोचा की उसके लिए कुछ लू या नहीं. ये भी हो सकता था की अगर मैं उसके लिए कुछ न ले जाउगा तो वो मुझसे इस बारे में शिकायत करे. दोस्ती के रिश्ते से hi सही मगर मुझे उसके लिए कुछ ले कर आना hi चाहिए था ऐसा वो बोल सकती है.

मेरे दिमाग में ये भी आया की शायद वो भी मेरे लिए ऐसा hi कुछ लायी होगी. बहुत सोच विचार के बाद मैंने फैसला किया की मुझे उसके लिए कोई गिफ्ट न सही मगर एक फूल तो ले hi जाना चाहिए. फूल से मुझे याद आया की फूलो में गुलाब का फूल तो लव की निशानी होती है. सो अगर मैं उसे रोज दुगा तो कही वो ये न समझे की मैं उसे लव वाली फीलिंग से रोज दे रहा हु.

मेरा दिमाग काम नहीं कर रहा था. मैं जितना सोचता उतना hi उलझता जा रहा था. हार कर मैंने एक दूकान से रोज का एक फूल लिया और मोटर सिक्ले को स्टार्ट कर संकटमोचन मंदिर की तरफ चल दिया. मेरा दिल फिर ज़ोर ज़ोर से धड़कने लगा था. दिमाग में तरह तरह के ख़याल आ रहे थे और मुझे बेचैन करते जा रहे थे.

स्कूल लाइफ में मैं एक लड़की को बहुत पसंद करता था और वो भी मुझे पसंद करती थी. 12तह क्लास के बाद जब मैं स्कूल से जाने लगा था तो उस लड़की ने मुझसे अपने प्यार का इज़हार कर दिया था. मैंने भी उससे अपने प्यार का इज़हार किया था मगर सिचुएशन ऐसी थी की हम दोनों की शादी नहीं हो सकती थी इस लिए हमने फैसला किया था की हमारे दिलो में एक दूसरे के लिए हमेशा प्यार रहेगा. हमारा मिलान नहीं होगा तो ये भी सह लगे.

वो प्यार भी अजीब hi था क्यों की एक hi दिन में दो चीज़े हो गयी थी. पहले हमने एक दूसरे से अपने प्यार का इज़हार किया उसके बाद उसी टाइम ये फैसला भी ले लिया था. दिल में दर्द तो हुआ था मगर वो दर्द इतना ज़्यादा नहीं था क्यों की रियल दर्द तो तब होता है जब हम प्यार में कुछ आगे तक बढ़ चुके होते.

उस लड़की के बाद रचना दूसरी लड़की थी जो मेरी लाइफ में इस वक्त एक दोस्त वाले रिश्ते से एंटर हुयी थी. रचना उस आदमी की बेटी थी जिसके बेटे को मैंने एक महीना पहले इस लिए बुरी तरह पीटा था क्यों की उसने मेरी दीदी के साथ बदतमीची से बात की थी. उसका बाप गांव का सरपंच था और उस घटना के बाद से वो हमें अपना सबसे बड़ा दुश्मन समझने लगा था. रचना से ताल्लुक रखने का मतलब यही था की मैंने जान बुझ कर अपने और अपने परिवार वालो के लिए एक खतरनाक मुसीबत को पीछे लगा लिया था. क्यों की अगर इस बात का पता सरपंच को लग गया तो वो कुछ भी कर सकता था. वो ये बर्दास्त नहीं कर पायेगा की जिसने उसके बेटे को मारा और पुरे गांव के सामने उसको नीचे दिखाया वो उसकी बेटी के साथ कोई रिश्ता बनाये. गावो में तो इस बात को लोग अच्छी नज़र से भी नहीं देखते थे.

बस स्टैंड से 5कम दूर था संकटमोचन मंदिर. मैं रोड से लेफ्ट साइड की तरफ एक रास्ता जाता था. वो रास्ता कच्चा तो नहीं था मगर पक्का भी नहीं था. बाजड़ी वाला रास्ता था. मैं रोड से करीब 2कम की दूरी पर बना था संकटमोचन मंदिर. इस मंदिर में लोगो का आना जाना बना hi रहता था. काफी लम्बे चौड़े एरिया में बना हुआ ये मंदिर काफी पुराण था. पहले यहाँ ज़्यादा रौनक नहीं होती थी मगर अब तो यहाँ पर काफी अच्छा लगता था. मंदिर के दो तरफ जंगल और पहाड़ थे. जंगल के बीच hi एक खूबसूरत झरना था. मंदिर के दूसरे तरफ खुला हरा भरा मैदान था. जिस तरफ से मंदिर की तरफ आना होता था उसी तरफ सड़क के दोनों तरफ दुकाने थी. जहा पर पूजा की सामग्री मिलती थी. एक तरफ दो छोटे छोटे ढाबे थे. जिसमे खाने पिने की चीज़े मिलती थी. मैदान के एक तरफ पार्किंग था जहा पर लोग अपने वाहन खड़ा करते थे. पार्किंग में वाहनों की देख रेख और सुरक्षा के लिए दो तीन आदमी रहते थे. वो लोग पर्ची देते थे और टाइम के हिसाब से पैसा चार्ज करते थे.

मैंने पार्किंग में अपनी मोटर सिक्ले को कड़ी किया. एक आदमी आया उसने मोटर सिक्ले का no लिख कर मुझे पर्ची पकड़ाई तो मैं पर्ची को पेंट की पॉकेट में दाल कर पार्किंग से बाहर आ गया.

मुझे ज़्यादा सजने सवारने का शौक नहीं था. मुझे और मेरे घर वालो को भगवन ने पहले से hi इतना सुन्दर बना कर भेजा था की हमें ज़्यादा सजने सवारने की ज़रूरत hi नहीं होती थी. मैंने इस वक्त एक नीले रंग का जींस का पेंट और हलके रेड कलर की शर्ट पहन रखा था. मेरी दीदी ने पूछा था की शहर में ऐसा कौन सा काम है मेरा जिसके लिए मैं आज शेव वगैरा करके जा रहा हु.? मैंने दीदी के पूछने पर बस यही कहा था की लौट कर बताउगा. फिर मैंने ऐसे hi मज़ाक में मुस्कुराते हुए उनसे पूछा था की कैसा लग रहा हु मैं तो उन्होंने मेरे चेहरे को प्यार से सहलाते हुए कहा था की वैसा hi जैसा एक लड़की अपने लिए चाहती है. दीदी के इस जवाब पर मैं कुछ देर के लिए हैरान रह गया था. मुझे लगा कही ऐसा तो नहीं की दीदी को पता चल गया हो रचना और मेरे बारे में. आखिर मेरे पूछने पर उन्होंने ऐसा जवाब क्यों दिया था.?

पार्किंग से निकल कर मैंने रचना को कॉल किया और बताया की मैं मंदिर पहुंच गया हु. मेरे बताने पर रचना ने कहा की झरने की तरफ आ जाओ. झरने की तरफ आने का बोल कर रचना ने फ़ोन काट दिया तो मुझे अजीब लगा. मैंने सोचा रचना मुझे झरने की तरफ क्यों बुला रही है.? उस तरफ तो ज़्यादातर वही लोग जाते हैं जो प्रेमी टाइप के लोग होते हैं. तो क्या रचना मुझे इसी लिए उस तरफ बुला रही थी.?
 
सब कुछ जायज़ है....

अपडेट = 16

फ्लैशबैक रनिंग....


अब तक अपने पढ़ा......

पार्किंग से निकल कर मैंने रचना को कॉल किया और बताया की मैं मंदिर पहुंच गया हु. मेरे बताने पर रचना ने कहा की झरने की तरफ आ जाओ. झरने की तरफ आने का बोल कर रचना ने फ़ोन काट दिया तो मुझे अजीब लगा. मैंने सोचा रचना मुझे झरने की तरफ क्यों बुला रही है.? उस तरफ तो ज़्यादातर वही लोग जाते हैं जो प्रेमी टाइप के लोग होते हैं. तो क्या रचना मुझे इसी लिए उस तरफ बुला रही थी.?

अब इसके आगे.......

मेरे अंदर एक डैम से हलचल सी मच गयी थी. पता नहीं क्या क्या सोचते हुए मैं मंदिर के सामने पंहुचा. संकटमोचन श्री हनुमान जी के सामने हाथ जोड़ कर मैंने उन्हें नमस्कार किया और उनसे दुआ भी की के हे संकटमोचन वीर हनुमान जी मुझे और मेरे परिवार पर ऐसा कोई भी संकट न आये जिसकी वजह से मैं और मेरा परिवार टूट कर बिखर जाये.

संकटमोचन वीर हनुमान जी से आशीर्वाद ले कर मैं उस तरफ चल दिया जिस तरफ जंगल और पहाड़ थे. उसी जंगल के बीच वो झरना भी था जहा पर रचना ने मुझे बुलाया था. यहाँ पर चारो तरफ कोई न कोई मौजूद hi था. जब मैं झरने की तरफ बढ़ता हुआ आगे आया तो मुझे आस पास कई प्रेमी जोड़े दिखाई दिए. मैंने सोचा ऐसी जगहों पर भी ये लोग आशिकी करने आ जाते हैं.

कुछ hi देर में मैं इधर उधर देखते हुए झरने के पास पहुंच गया. इस तरफ और भी ज़्यादा प्रेमी जोड़े दिखने लगे थे मुझे. वैसे जंगल के अंदर का नज़ारा बहुत सुन्दर लग रहा था. हर तरफ हरे भरे पेड़ पौधे. नीचे हरे सूखे पत्ते. जगह जगह पर काली काली पत्थर की बड़ी बड़ी चट्टानें. प्रेमी जोड़ो में कोई चट्टानों के पीछे बैठा था तो कोई मोठे पढ़ो के नीचे. इन लोगो को दुसरो से कोई मतलब नहीं था. इन्हे देख कर मेरे मन में एक मज़ेदार बात आयी की काश यहाँ पर योगी की सर्कार हो जाये तो इन साले आशिक़ो की आशिकी इनके पिछवाड़े से निकल जाएगी.

इधर उधर देखते हुए मेरी नज़र एक डैम से रचना पर पड़ी. वो झरने के उस पार बड़ी सी चट्टान पर कड़ी हाथ हिला रही थी. पीले रंग के सलवार शूट में थी वो. उसका पीले रंग का दुपट्टा हवा के हलके झोको से लहरा रहा था. मैं उसे देख कर उस तरफ hi बढ़ता चला गया. जिस तरफ वो कड़ी थी उस तरफ उचाई थी. मैं पत्थरो और चट्टानों को पार करते हुए कुछ देर में उसके करीब पहुंच गया. मैं बता नहीं सकता की इस वक्त मेरी क्या हालत थी. मेरा दिल जो पहले ज़ोर ज़ोर से धड़क रहा था अब वो थम सा गया था.

पीले कपड़ो में रचना बाला की खूबसूरत लग रही थी. वैसे तो मैं उसे पंचायत वाले दिन देख चूका था मगर आज इस तरीके से उससे मेरी पहली मुलाकात थी. वो दिखने में हर तरह से परफेक्ट थी. कोई भी लड़का उसे इस वक्त देखता तो उस पर लट्टू hi हो जाता. मेरा खुद का हाल भी वही था. वो ऊपर चट्टान पर कड़ी थी और मैं नीचे से उसे सर उठाये देखे जा रहा था. मुझे पता hi नहीं चला की मैं उसे एकटक कब तक देखता रहा. मेरा ध्यान उसकी आवाज़ से hi भांग हुआ था.

"ऐसे क्या देख रहे हो vicky...kya कभी कोई खूबसूरत लड़की नहीं देखि तुमने.?" रचना ने मुस्कुराते हुए ये कहा तो मेरी हालत पतली सी हो गयी. बड़ी शर्म सी आयी मुझे और फिर मुझे समझ न आया की मैं क्या जवाब दू उसे.? मुझे अपने आप पर गुस्सा आया की मैं उसे इस तरह क्यों देख रहा था. वो क्या सोची होगी मेरे बारे में.?

"ारी अब ऐसे मुँह मत लटकाओ विक्की. मुझे पता है की ये नार्मल बात है. वैसे तुम मुझे एकटक देखते रह गए तो मुझे ख़ुशी hi हुयी है. क्यों की इससे पता चलता है की मुझमे वो बात तो है जिससे शरीफ से शरीफ लड़का भी मुझे देखता रह जाये. हर लड़की को अपनी तारीफ सुन्ना अच्छा लगता है. तुमने भी तारीफ की तो अच्छा लगा मुझे." रचना ने ये सब कहा तो मैं हैरान रह गया. मैं सोचने लगा की मैंने इसकी कब तारीफ की.?

"पर मैंने तो तुम्हारी कोई तारीफ नहीं ki..fir तुम ये कैसे कह रही हो की मैंने तारीफ की और तुम्हे उससे अच्छा भी लगा.?" मैंने हैरै से ऐसा कहा तो रचना मुस्कुरा पड़ी.

"पहले ऊपर तो आ जाओ हुज़ूर. क्या साडी बाते नीचे खड़े हो कर hi करने का इरादा है.?" रचना ने कहा तो मैं बगल से घूम कर ऊपर रचना के पास उसी चट्टान पर आ गया जिसमे वो कड़ी थी.

मैंने देखा की रचना ने अपने बाल खोल रखे थे जो हलकी हवा के झोको से लहरा उठते थे. उसके बालो की कोई कोई लत उसके चेहरे को धक् लेती और फिर दूसरी तरफ उड़ जाती थी. गोर चेहरे पर गजब की कशिश थी. सुर्ख होठो पर मुस्कान. मेरी नज़र बार बार उसके चेहरे पर टिक जाती थी. मैं हैरान था की ये मुझे क्या हो रहा था. क्यों मैं उसकी तरफ इतना आकर्षित हो रहा था.?

"तुम्हे ऐसा लगता है की तुमने मेरी तारीफ नहीं की जब के तुमने तो सच में मेरी ऐसी तारीफ की है की मैं बहुत ज़्यादा खुश हो गयी हु." रचना ने मेरी उस बात का ऐसा जवाब दिया तो मैं उलझ कर रह गया. मुझे इस तरह उलझा हुआ देख वो है पड़ी फिर बोली.

"ारी बुद्धू राम तुम मुझे एकटक देख रहे थे na...wahi तो तारीफ थी तुम्हारी. तुमने अपने मुँह से कुछ नहीं कहा मगर एकटक देखती तुम्हारी नज़रो ने मुझे बता दिया की मैं बहुत खूबसूरत हु. बस हो गयी तारीफ." रचना ने इस तरह कहा तो मैं और भी ज़्यादा हैरान रह गया.

मैं सोचने लगा की शायद कोई लड़की फ़ोन पर बेझिझक बात कर hi लेती होगी मगर सामने पर वही लड़की बात करने में झिझकेगी. मगर यहाँ तो ऐसी कोई बात hi नहीं थी. रचना तो सामने आने पर फ़ोन में बात करने से ज़्यादा बेझिझक बात कर रही थी और मेरी पहले से ज़्यादा हालत ख़राब थी.

"अच्छा छोडो ये बताओ क्या लाये हो मेरे लिए.?" मुझे कही गम देख कर रचना ने जब अचानक ये कहा तो मैं एकदम से बौखला गया.

"क्या लाया हु मतलब.?" मैं हैरान था की उसने मुझसे ये एक्सपेक्ट किया था की मैं उसके लिए कुछ न कुछ ज़रूर लाऊगा. तभी तो वो इतने भरोसे से पूछ रही थी. मगर मैं अंदर से घबरा गया था. मुझे समझ नहीं आ रहा था की क्या बोलू.

मैं रचना को देने के लिए गुलाब का एक फूल लाया तो था मगर मैं उसे देने में झिझक रहा था. मुझे लगता था की वो उस फूल को देख कर कही ये न सोच बैठे की मैं उसे एक प्रेमी के नज़रिये से ये फूल दे रहा हु. ये जगह भी ऐसी थी की यहाँ पर प्रेमी जोड़ो का hi जमावड़ा होता था हर तरफ.

"तुम न बहुत सोचते हो विक्की. अगर बात करने में इतना हिचकिचाओगे तो कैसे चलेगा.? पता नहीं क्या सोच रहे हो इतना. ारी यार हम एक दूसरे के दोस्त हैं. क्या एक लड़का एक लड़की दोस्त नहीं हो सकते.? कही तुम यहाँ आस पास दिख रहे प्रेमी जोड़ो की वजह से तो नहीं झिझक रहे.? हे भगवन शायद तुम सोच रहे होंगे की मैंने तुम्हे ऐसी जगह क्यों बुलाया हो सकता है.?" रचना ने ये सब कहा तो मैं बोल पड़ा.

"नहीं नहीं ऐसी कोई बात नहीं है. वो क्या है की मैं पहले कभी इस तरह किसी लड़की से मिलने नहीं आया था. इस लिए मुझे ये सब थोड़ा अजीब लग रहा है. बाकी ऐसी कोई बात नहीं है." मैंने ऐसा कहा तो रचना फिर मुस्कुरायी फिर बोली.

"अच्छा ठीक है अब बताओ क्या लाये हो अपनी इस दोस्त के लिए. मुझे यकीन है की तुम खली हाथ नहीं आये होंगे. अपनी खूबसूरत सी दोस्त के लिए कुछ तो ऐसा लाये hi होंगे जो उसकी खूबसूरती पर फिट हो सके." रचना ने मुस्कुराते हुए ऐसा कहा तो मैंने उसकी तरफ देखा.

"हाँ लाया तो हु मगर मैं तुम्हे उसे देने में थोड़ा झिझक रहा हु." मैंने ऐसा कहा तो रचना ख़ुशी से उछलने लगी फिर बोली.

"ओह्ह मतलब मैंने जो सोचा था वो सही साबित हुआ. सच्ची में विक्की मुझे यकीन था की तुम मेरे लिए कुछ न कुछ लाओगे. अब चलो जल्दी से वो चीज़ दो मुझे. मैं भी तो देखु की मेरा दोस्त क्या लाया है मेरे लिए."

रचना के चेहरे पर इस वक्त ख़ुशी की चमक थी. वो इस वक्त छोटी सी बच्ची की तरह ख़ुशी से उछाल रही थी. मैं सोच रहा था की ये कैसी लड़की है. कभी इसकी बातो से लगता है की ये सबकी नानी है और अब बच्चियों जैसे उछाल रही है. वो बार बार मुझसे वो चीज़ देने को बोले जा रही थी और मैं ये सोच कर झिझक रहा था की उस चीज़ को देखने के बाद वो क्या सोचेगी.?

आखिर उसके ज़ोर देने पर मैंने पेंट की पिछली पॉकेट से गलाब का वो फूल निकला और झिझकते हुए उसके सामने कर दिया. मेरे हाथ में ताजे खिले गुलाब के उस फूल को देख कर रचना एक पल को रुकी और फिर ख़ुशी से उछालते हुए hi उसने झट से मेरे हाथ से उस फूल को ले लिया.

"थैंक यू vicky...thank यू. तुम मेरे लिए गुलाब का फूल लेके आये हो. सच में ये फूल मेरी खूबसूरती पर फिट बैठता है. तुम्हे पता है मैंने भी यही सोचा था की तुम मुझे गुलाब का फूल hi ले कर आओगे. देख लो मेरा अंदाज़ा कितना सही निकला." रचना ने ख़ुशी से ये कहा तो मैं बस मुस्कुरा कर रह गया. उसका रिएक्शन देख कर मुझे लगा hi नहीं की उसने फूल को देख कर मेरे बारे में कुछ और सोचा है.

मैं उसके ऐसे रिएक्शन से नार्मल महसूस करने लगा. रचना गुलाब के उस फूल को लिए कभी उसे देख के खुश होती तो कभी उसे अपने गालो पर घिसने लगती. मैं रचना के एकदम पास hi बैठा था. खिली हलकी सी धुप में उसका रूप रंग और भी ज़्यादा चमक रहा था. जब वो मेरी तरफ न देखती तो मैं उसके चेहरे की तरफ देखने लगता और जब मुझे लगता की अब वो मुझे देखने वाली है तो मैं दूसरी तरफ देखने लगता. मैं नहीं चाहता था की रचना ये देखे की मैं बार बार उसकी खूबसूरती में खो जाता हु.

"अच्छा ये बताओ vicky..kya तुम इसके पहले इस जगह पर आये थे.?" रचना ने अचानक ये पूछा तो मैंने न में सर हिला दिया.

"नहीं इसके पहले तो मैं कभी यहाँ नहीं आया. मैं इस शहर में रह कर पढ़ा हु और इस जगह के बारे में सुना भी था मगर कभी आया नहीं." मैंने ये सब बताया तो रचना ने मुस्कुरा कर कहा.

"सुना था तो आये क्यों नहीं कभी.?" रचना ने पूछा तो मैंने कहा.

"कभी इच्छा hi नहीं हुयी यहाँ आने की. मैं ज़्यादातर अपनी पढ़ाई में hi लगा रहता था. मुझे घूमने फिरने में कोई दिलचस्पी नहीं थी. मेरा मन्ना था की मेरे माँ बाप ने मुझे शहर पढ़ने के लिए भेजा है तो मुझे सच्चे मन से पढ़ाई hi करनी चाहिए. बस यही करता था. सोल्लगे में मेरे जो एक दो दोस्त थे वो भी मेरी जैसे hi थे. सोल्लगे में hi मैंने कुछ लोगो से सुना था की संकटमोचन बहुत अच्छी जगह है. ख़ास कर प्रेमी जोड़ो के लिए. मैं सोचा करता था की कैसे लोग हैं की ऐसी जगहों पर भी ये सब करते हैं." मैंने ये कहा तो रचना है पड़ी.

"ये सब करते हैं का क्या मतलब है तुम्हारा.? मतलब क्या करते हैं लोग यहाँ पर.?" रचना ने ये पूछा तो मैं कुछ बोल न पाया. रचना मेरे जवाब के इंतज़ार में मुझे hi देख रही थी तो मुझे बोलना hi पड़ा.

"मेरा मतलब है की ये लोग यहाँ प्रेम लीला करते हैं जो ऐसी जगह पर अच्छा नहीं लगता. उसके लिए उन्हें ऐसी जगहों पर जाना चाहिए जहा पर किसी देवी देवता का मंदिर न हो." मैंने ऐसा कहा तो रचना ने कहा.

"देवी देवता तो हर कद में मौजूद हैं विक्की. हम जो कुछ भी करते हैं उसे ऊपर वाला अपनी हज़ारो आँखों से देखता है. उससे कुछ भी नहीं छुपता. वैसे भी ये लोग कौन सा पाप करते हैं.? प्रेम hi तो करते हैं और प्रेम तो भगवन ने भी किया था न. श्री कृष्ण जी का प्रेम तो जग जाहिर था. राधा कृष्ण के बारे में तो सब कोई जनता था. प्रेम तो भगवन को पाने का सबसे पहला मार्ग है. प्रेम तो हमेशा पवित्र होता है. हर प्रेमी जोड़े में राधा कृष्ण बास्ते हैं. फिर तुम किस आधार पर कह रहे हो की इन लोगो को ऐसी जगह पर ये सब नहीं करना चाहिए.?" रचना ने ये सब कहा तो मैं कुछ कह न सका. सच hi तो कहा था उसने. प्रेम तो पवित्र hi होता है और प्रेम को भगवन भी मानते हैं. मगर आज के युग में प्रेम की परिभाषा को जिन्होंने बदल कर रख दिया है उसका क्या.?

"मैं मंटा हु की प्रेम पवित्र होता है मगर प्रेम करने वाला भी क्या पवित्र होता है.? आज कल लोग किस तरह का प्रेम करते हैं इस बात को क्या लोग नहीं जानते.? मैं उसी आधार पर कह रहा हु की इन लोगो को ये सब यहाँ पर नहीं करना चाहिए." मैंने ऐसा कहा तो रचना मुझे देखती रही.

"हाँ ये भी सही कहा तुमने. छोडो इस बात को जिन्हे जो अच्छा लगता है वो करते hi हैं. अच्छा क्या तुम मुझसे नहीं पूछोगे की मैं तुम्हारे लिए क्या लायी हु.?" रचना ने ये कहा तो मैंने उसकी तरफ देखा. वो मुस्कुराते हुए मुझे hi देख रही थी.

"इसमें पूछना क्या है. जैसे तुम्हे भरोसा था की मैं तुम्हारे लिए कुछ लाऊगा वैसे hi मुझे भी यकीन था की तुम मेरे लिए कुछ लाओगी." मैंने मुस्कुराते हुए कहा तो रचना हसने लगी. उसके मोतियों जैसे दांत चमक उठे थे.

"अच्छा जी बड़ा यकीन था तुम्हे." रचना ने एक ऐडा से कहा तो मुझे उसकी ये ऐडा बहुत अच्छी लगी. मैं उसके कहने पर कुछ नहीं बोलै बस मुस्कुरा कर रह गया था.

"अच्छा मुझे तो पता hi था की तुम मेरे लिए गुलाब का फूल hi लाओगे मगर अब तुम बताओ की तुम्हे क्या पता है की मैं क्या लायी हु तुम्हारे लिए.?" रचना ने पूछा तो मुझे समझ न आया की मैं उसे क्या जवाब दू. मुझे सच में कोई आईडिया नहीं था की वो मेरे लिए क्या लायी होगी.

"इस मामले में मेरा यकीन तुम्हारे यकीन से बहुत कमजोर है. मुझे कोई आईडिया नहीं है की तुम मेरे लिए क्या लायी होगी." मैंने ये कहा तो रचना के चेहरे पर मायूसी दिखी मगर फिर नार्मल हो कर बोली.

"फिर भी कुछ तो सोचे hi रहे होंगे. तो वही बताओ मुझे." रचना ने कहा तो मैं सोच में पद गया. फिर मेरे दिमाग में ये ख़याल आया की हो सकता है रचना भी मेरे लिए गुलाब का फूल hi लायी हो जैसे मैं लाया हु उसके लिए. आखिर दोस्ती और प्यार दोनों के लिए गुलाब का फूल hi तो हो सकता है. सो मैंने रचना से गुलाब के फूल का hi कहा. मेरे ऐसा कहने पर रचना है पड़ी.

"सही कहा तुमने... तुम्हारा यकीन मेरे यकीन से बहुत कमज़ोर है." रचना ने ये कहा तो मेरा दिमाग चक्र कर रह गया.

"इसका मतलब तुम कोई दूसरी चीज़ लायी हो मेरे लिए.?" मैंने कहा तो रचना ने हाँ में सर हिलाया और फिर अपने छोटे से हैंड बैग में हाथ डाला और जो चीज़ निकली वो एक बहुत hi खूबसूरत पेन था. उसने उस पेन को मेरी तरफ बढ़ाया फिर कहा.

"पढ़े लिखे दोस्त के लिए पढ़ाई वाली चीज़. मुझे लगता है की तुम पर ये पेन hi फिट हो सकती है." रचना ने ये कहा तो मैं उसकी समझ का कायल हो गया. उसके हिसाब से बात सच hi थी. जैसे उसकी खूबसूरती में वो गुलाब का फूल hi फिट बैठता था वैसे hi उसकी नज़र में मुझ पर ये पेन फिट बैठता है.

"इतस amazing...mujhe सच में इसका कोई आईडिया नहीं था. बहुत hi खूबसूरत है ये पेन मगर नार्मल पेन नहीं लगता ये. इसकी कीमत बाकी pen's से ज़्यादा की लगती है." मैंने पेन को उलट पलट कर देखते हुए कहा तो रचना ने हस्ते हुए कहा.

"कीमत से क्या फर्क पड़ता है विक्की.? मेरी नज़र में यही पेन तुम पर फिट बैठता था इस लिए इसी को ख़रीदा. मैं चाहती हु की तुम इस पेन से कोई बहुत बड़ा काम करो." रचना ने कहा तो मैं मुस्कुरा उठा.

"कह तो ऐसे रही हो जैसे मैं कोई मंत्री मिनिस्टर हु जो बहुत बड़ा काम करुगा इस पेन से." मैंने ऐसा कहा तो रचना ने कहा.

"मंत्री मिनिस्टर के अलावा भी ऐसे बहुत से लोग होते हैं जो बड़ा बड़ा काम करते हैं. तुम्हे भी वही करना है. अब ये कैसे करोगे ये तुम जानो." रचना ने कहा तो मैं है पड़ा.

"अच्छा चलो ठीक है देखता हु क्या हो सकता है." मैंने कहा तो रचना ने कहा.

"अच्छा एक बात puchu...sach सच बताओगे न.?" रचना ने ये कहा तो मैंने कहा.

"हाँ मैं ज़्यादातर सच hi बोलता हु. पूछो क्या पूछना है तुम्हे.?" मैंने कहा तो रचना ने कहा.

"क्या सच में इसके पहले तुम किसी लड़की से नहीं मिले.?" रचना ने ये कहा तो मैं हैरानी से उसकी तरफ देखने लगा.

"क्या मतलब.?" मैंने पूछा तो उसने कहा.

"इतने दिनों से तुमसे बात कर रही हु इस लिए इतना तो मुझे समझ आ चूका है की तुम वैसे नहीं हो जैसे आज कल के दूसरे लड़के होते हैं. मगर फिर सोचती हु की ऐसा कैसे हो सकता है.? तुम इतने अच्छे हो और देखने सुनने में भी काफी हैंडसम हो तो ऐसा कैसे हो सकता है की कोई लड़की तुम्हारी ज़िन्दगी में इसके पहले आयी न होगी.? शहरो में तो सब चलता है. शहर की लड़किया गांव की लड़कियों से ज़्यादा स्मार्ट होती हैं. तो ये कैसे हो सकता है की कोई लड़की तुम्हारी तरफ आकर्षित न हुयी हो या तुम्हे कोई लड़की पसंद न आयी हो.?" रचना ने ये सब कहा तो मुझे समझ न आया की मैं उसे क्या जवाब दू. मैं तो इसी बात से हैरान था की उसने ऐसा सवाल किया hi क्यों. आखिर ऐसा बोलने के पीछे उसका क्या मतलब है.?

"वैसे तो मैं तुम्हे बता hi चूका हु सब कुछ. फिर भी अगर तुम्हे मुझ पर यकीन hi नहीं है तो फिर मेरे कुछ और बोलने पर यकीन भी नहीं होगा. मेरे पास इस बात का कोई सबूत नहीं है मगर मैं ये भी कह सकता हु की किसी और के पास भी इस बात का कोई सबूत नहीं होगा की मेरी ज़िन्दगी में कोई लड़की कभी आयी थी." मैंने गंभीरता से कहा तो रचना मुझे देखती रही फिर बोली.

"हाँ मुझे पता है. मुझे यकीन है विक्की की तुम सच कह रहे हो. मैं तो बस अपनी तसल्ली के लिए तुमसे पूछ रही थी. वैसे अचरज की बात तो है hi की इतने हैंडसम लड़के की ज़िन्दगी में कभी कोई लड़की नहीं आयी और जो आयी भी तो दोस्त बन कर." लास्ट में हस्ते हुए रचना ने ये कहा तो मैं भी मुस्कुरा पड़ा.

"अच्छा ये बताओ विक्की की क्या कभी तुम्हारा दिल नहीं किया की तुम्हारा भी किसी ऐसी लड़की से कोई प्रेम का चक्कर होता जिससे तुम प्यार की ढेर साडी बाते करते.?" रचना ने ये कहा तो मैंने फिर हैरानी से उसकी तरफ देखा.

"मुझे ये सब पसंद hi नहीं है तो दिल करने का सवाल hi नहीं उठता. ये प्रेम वर्म सब फालतू की बाते हैं. मैंने सुना है की प्रेम में लोगो को अक्सर धोखा hi मिलता है और फिर वो धोखे से मिले दर्द को ले कर रात दिन तड़पते रहते हैं. ऐसे प्रेम का क्या फायदा जो किसी अच्छे खासे आदमी को दुखी बना दे.?" मैंने ये कहा तो रचना ने कहा.

"हाँ ये तो सच कहा तुमने. मगर सब कुछ जानते हुए भी लोग प्यार तो करते hi हैं. उनके बारे में क्या कहोगे तुम.?" रचना ने ये कहा तो मैंने कहा.

"सबकी अपनी अपनी सोच है और अपनी अपनी पसंद है. जिन्हे ये सब अच्छा लगता है वो करते हैं और जिन्हे अच्छा नहीं लगता वो मेरी तरह इस सबसे दूर रहते हैं." मैंने कहा तो रचना कुछ न बोली.

हम दोनों के बीच ऐसी hi बहुत साडी बाते होती रही. रचना जो भी पूछती मैं उसे जवाब देता. मैं जो पूछता उसका जवाब रचना देती. ऐसे hi दो घंटे गुज़र गए. उसके बाद रचना के hi कहने पर हम दोनों उस जगह के खूबसूरत नज़रो का नज़ारा करने लगे थे. रचना के पास एंड्राइड फ़ोन था जिससे वो पिछ लेने को कहती तो मैं उसकी पिछ लेता. फिर वो मेरी पिछ लेने को कहती तो मैं ये कह कर मन कर देता की मुझे पिछ खिचवाना पसंद नहीं है. रचना ने बहुत ज़ोर दिया मगर मैं न मन. मेरे इंकार पर रचना मुझसे नाराज़ भी हुयी मगर मैंने उसे साफ़ शब्दों में समझाया की मैं कभी भी पिछ नहीं खिचवाता हु और न hi मुझे खिचवाना पसंद है.

चट्टानों में चढ़ चढ़ के हम इधर उधर घूम रहे थे. हमारी नज़र उन लोगो पर भी पड़ती जो प्रेमी जोड़े थे. उन पर नज़र पड़ते hi रचना मुस्कुरा देती जब के मैं इधर उधर देखने लगता. मुझे रचना के साथ उन लोगो को देखने में अजीब सा लगता था. मैं हैरान था की इस बात से रचना को कोई प्रॉब्लम नहीं होती थी. वो तो उन्हें देख कर कभी मुस्कुरा देती तो कभी हसने लगती.

एक जगह जिस प्रेमी जोड़े पर हमारी नज़र पड़ी तो मैं और रचना दोनों hi भौचक्के से रह गए थे. वो प्रेमी जोड़ा एक दूसरे के होठ चूम चाट रहा था. हम दोनों उन्हें देख कर खड़े के खड़े रह गए थे. उधर वो दोनों अपने में hi मगन थे. उन्हें हमारी मौजूदगी का कोई अहसास hi नहीं था. होठ चूमने तक तो ठीक था मगर वो लड़का अपने एक हाथ से उस लड़की का राइट बूब भी दबा रहा था. हम दोनों उन्हें बहुत अच्छे से देख सकते थे. वो लड़का धीरे धीरे वाइल्ड होता जा रहा था. अपनी गफ का लेफ्ट बूब वो ज़ोर ज़ोर से मसलने लगा था.

मैंने खुद को सम्हाला और जल्दी से उस तरफ से नज़र हटा कर रचना का हाथ पकड़ा और उसे एक तरफ को खींचा. मैंने रचना का हाथ जान बुझ कर नहीं पकड़ा था. जाने कैसे ये अपने आप hi हो गया था. उधर जैसे hi मैंने रचना का हाथ पकड़ कर खींचा तो रचना एकदम से दर गयी. उसने पलट कर मेरी तरफ देखा तो मैं दूसरी तरफ मुदा उसे चलने के लिए खींच रहा था.

रचना को एकदम से सिचुएशन का अहसास हुआ. वो कुछ न बोली, बस मेरे खींचने पर चुप चाप मेरे पीछे पीछे चल दी थी. दो चार कदम चलने के बाद मुझे ख़याल आया की मैंने रचना का हाथ पकड़ा हुआ है. ये ख़याल आते hi मैंने रचना का हाथ छोड़ दिया और उससे हाथ पकड़ने के लिए माफ़ी भी मांगी. मेरे माफ़ी मांगने पर उसने कुछ नहीं कहा. वो कही खोयी हुयी लग रही थी. शायद उस प्रेमी जोड़े के बारे में सोच रही थी. चेहरे पर घबराहट और शर्मिंदगी थी उसके.

हम दोनों कही भी नहीं रुके बल्कि चलते हुए सीधा मंदिर के पास आ गए थे. रास्ते में कही भी हमने आपस में कोई बात नहीं की थी. मेरी आँखों के सामने भी वही मंज़र बार बार आ रहा था. मंदिर के एक तरफ दो ढाबे थे. उस तरफ देख कर मैंने रचना से कुछ खाने पिने का पूछा तो उसने पहले ढाबे की तरफ देखा फिर हाँ में सर हिला दिया.

मैं और रचना चुप चाप ढाबे पर आ कर आमने सामने कुर्सियों पर बैठ गए. मुझे अब रचना की तरफ देखने में शर्म सी महसूस हो रही थी और यही हाल रचना का भी था. मगर सिचुएशन को नार्मल बनाने के लिए कुछ तो करना hi था. सो मैंने रचना से पूछा की उसे क्या खाना है तो उसने सर उठा कर मेरी तरफ देखा और फिर से नीचे की तरफ देखते हुए उसने धीमी आवाज़ में सिर्फ चाय के लिए कहा तो मैंने ढाबे वाले से दो कप चाय लेन को कहा.

चाय पिटे वक्त भी हम दोनों के बीच कोई बात नहीं हुयी. मैं सोच रहा था की ये सब क्या हो गया है. मैं तो बहुत देर से कह रहा था रचना को की अब चलना चाहिए मगर वो hi इधर उधर जा जा कर पिछ खींचने को कह रही थी. कहा इसके पहले वो मुझसे कितना है है कर बोल रही थी और अब उस मंज़र को देखने के बाद जैसे हर बात पर फुल स्टॉप लग गया था.

चाय पिने के बाद मैंने उससे पूछा की वो यहाँ से कैसे जाएगी तो उसने कहा की वो रिक्शा से बस स्टैंड जाएगी. फिर बस स्टैंड से गांव के लिए बस पकड़ेगी. मैंने सोचा की जब मेरे पास मोटर सिक्ले है तो मैं hi बस स्टैंड तक उसे छोड़ देता हु. ये सोच कर मैंने उससे कहा की अगर उसे ठीक लगे तो वो मेरे साथ मोटर सिक्ले में बस स्टैंड तक जा सकती है.

मेरी इस बात से रचना ने सर उठा कर मेरी तरफ देखा और फिर से हाँ में सर हिला दिया. वो कुछ बोल नहीं रही थी बस हाँ या न में जवाब देने के लिए अपना सर हिला देती थी. मैंने सोचा देखो तो कैसे उस मंज़र ने इसे भीगी बिल्ली बना दिया है.

मैं कुर्सी से उठा और ढाबे वाले को चाय के पैसे दिए और फिर रचना को ले कर पार्किंग एरिया के पास आ गया. पार्किंग वाले को पर्ची दिया और पैसे भी. उसने पर्ची में लिखे no के बेस पर मेरी मोटर सिक्ले को चेक किया और सब कुछ क्लियर होने के बाद उसने मुझे जाने का इशारा किया तो मैंने मोटर सिक्ले को ले कर पार्किंग से बाहर आ गया. पार्किंग के बाहर रचना कड़ी थी. मैंने मोटर सिक्ले उसके पास ला कर रोकी तो वो एक तरफ को अपनी दोनों टाँगे करके मेरे पीछे मोटर सिक्ले पर बैठ गयी.

रचना मेरे पीछे कुछ फैसले पर hi बैठी थी और पीछे साइड मोटर सिक्ले के उठे हुए हिस्से को एक हाथ से पकड़ लिया था. मैंने उससे चलने को कहा तो उसने धीरे से हाँ कहा. उसकी हाँ सुनते hi मैंने मोटर सिक्ले को आगे बढ़ा दिया.

"घर से अकेले hi आयी थी क्या तुम.?" मैंने रास्ते में उससे पूछा तो उसने फिर से धीमी आवाज़ में हाँ कहा. असल में मैं चाहता था की वो नार्मल हो जाये. मुझे ये उम्मीद नहीं थी की इतनी बेबाक लड़की उस मंज़र को देख कर इस तरह चुप हो जाएगी. मुझे भी बहुत अजीब लग रहा था मगर मैं कही न कही ये सोच रहा था की अब जो हो गया उसका क्या कर सकते हैं. बस भूल जाओ उस बात को और किस्सा ख़तम करो.

"भूल जाओ उस सब को. तुम जितना उसके बारे में सोचोगी उतना hi तुम्हे बुरा फील होगा. इस लिए उस सबको भूल जाओ. ये समझो की हमने कुछ देखा hi नहीं है. वैसे मैं हैरान हु की जिस बात के लिए मैं तुम्हे समझा रहा हु उस बात के लिए तो तुम्हे समझाना चाहिए था मुझे. मुझे यकीन नहीं होता की मेरी दोस्त जो इतना बेबाकी से बाते कर लेती है वो इतनी सी बात पर चुप क्यों हो गयी है.?" मैंने ऐसा कहा तो रचना ने कहा तो कुछ नहीं मगर हलके से मेरी पीठ पर घुसा मार दिया.

"अब ये क्या बात हुयी यार.? मैंने क्या गलत कह दिया जो तुमने मुझे इतनी ज़ोर से मारा की मुझे दिन में भी तारे नज़र आने लगे हैं.?" मैंने मुस्कुराते हुए ऐसा कहा तो पीछे रचना खिलखिला कर हसने लगी मगर जल्द hi फिर से चुप भी हो गयी.

"क्यों अपनी हसी पर इतना ज़ुलम करती हो रचना. अगर हसी आये तो उसे दबाना नहीं चाहिए बल्कि और भी ज़्यादा ज़ोर ज़ोर से हसना चाहिए. ऐसा मेरे नेहरू नाना ने कहा था." मैंने ऐसा कहा तो रचना फिर से खिलखिला कर है पड़ी फिर बोली.

"अब चुप भी करो vicky...aur ये नेहरू तुम्हारे नाना कैसे हो गए.? उन्हें तो सब कोई चाचा कहते थे न.?" रचना ने हस्ते हुए ये कहा तो मैंने कहा.

"हाँ लेकिन वो मेरे नाना इस लिए हुए क्यों की मेरी माँ उन्हें बापू कहती थी." मैंने ये कहा तो रचना ने दो तीन बार जल्दी जल्दी मेरी पीठ पर घुसा मारा फिर कहने लगी की ज़्यादा फेंको मत और चुप चाप गाडी चलाओ. उसकी इस बात पर मैंने जो हुकुम कहा और फिर चुप हो गया.

रचना नार्मल हो चुकी थी. इसी लिए तो मैं ऐसी बाते कर रहा था उससे. कुछ hi टाइम में हम बस स्टैंड पहुंचने लगे तो रचना ने मुझसे कहा की मैं उसे बस स्टैंड के पहले hi उतार दू. क्यों की बस स्टैंड पर गांव का कोई ऐसा आदमी भी हो सकता था जो हमें साथ में देख सकता था और फिर हमारे घर वालो को बता सकता था. मुझे रचना की बात जायज़ लगी. इस लिए मैंने मोटर सिक्ले को सड़क के किनारे रोक दिया.

रचना जब उतर गयी तो मैंने उससे कहा की अगर वो चाहे तो मेरे साथ गांव तक भी चल सकती है. बस पहुंचने के टाइम पर वो गांव के बस स्टैंड पहुंच जाएगी. उसके बाद वो अपने घर चली जाएगी. मेरी इस बात से रचना ने कुछ देर सोचा फिर बोली की रिस्क लेना सही नहीं होगा. उसे मेरे साथ गांव तक चलने में कोई प्रॉब्लम नहीं है मगर इत्तेफाक से अगर कोई गांव का आदमीं रास्ते में कही मिल गया और हमें पहचान लिया तो मुसीबत हो जाएगी. मुझे रचना की ये बात ठीक लगी. इस लिए मैंने उसे ज़ोर नहीं दिया.

रचना मुझे bye बोल कर एक तरफ को चली गयी. एक दो बार उसने पलट कर मुझे देखा और मुस्कुरायी भी. जब वो आँखों से ओझल हो गयी तो मैंने भी मोटर सिक्ले को स्टार्ट किया और गांव की तरफ निकलने hi वाला था की मुझे कुछ याद आया....

भाई लोग....

मैंने दो अपडेट लिख रखे थे सो मैंने उन दोनों को यहाँ पोस्ट कर दिया है....

भाई लोग अब से इस स्टोरी पर कोई अपडेट नहीं आएगा. सब का रिस्पांस देख कर मैंने स्टोरी हमेशा के लिए बंद कर दिया है....

:थैंक्यू:
 
सिराज भय अपडेट तो डेली hi देता था मैं. अभी लास्ट के अपडेट लेट दिया क्यों की लोगो का रिस्पांस ढीला पद गया था. अगर सब कोई जल्दी जल्दी कमेंट करते तो मैं भी जल्दी से नेक्स्ट अपडेट देता....

यारा आपका कमेंट भी तो लेट हुआ. अभी भी देख लो अपने मेरे लास्ट के 3 अपडेट पर कोई कमेंट नहीं किया और न hi अपडेट को इंडेक्स में ऐड किया. याद करो भय आप वो फर्स्ट पर्सन हो जिसने मेरा सपोर्ट किया और मुझे बहुत अच्छा भी लगा. सो जब आपका कमेंट लेट होगा तो कैसा लगेगा मुझे. कामदेव भय का सपोर्ट भी बरोबर रहता है मगर वो हर अपडेट में कमेंट नहीं करते. चलो मान लिया ये उनकी मर्ज़ी की बात है. मगर सपोर्ट मिलता रहे तो अच्छा लगता है....

भय मैं आपके और कामदेव भय के कमेंट का वेट करता हु. एक परफेक्ट भय और एक विक्रांत भय. आप चारो के कमेंट देख कर ख़ुशी होती है और तब मैं पुरे मन से नेक्स्ट अपडेट लिख के पोस्ट करने की सोचता हु....

सो भय कीप सपोर्ट & स्टे विथ में....

नेक्स्ट अपडेट आज hi दुगा भय. मैंने आज दुवली के दिन को दो अपडेट देने का सोचा है. सो ी विल तरय....
 
diwali-gif-with-best-wishes-in-hindi.gif


हैप्पी दिवाली तो आल FRIENDS....:flowers2:
 
सब कुछ जायज़ है....

अपडेट = 17

प्रेजेंट स्टार्ट....


पास्ट की याद में खोया हुआ जाने कब मेरी आँख लग गयी थी. सुबह जब मेरी आँख खुली तो देखा की मैं बीएड पर अकेला hi पड़ा हुआ था. दक्षिणा बीएड पर नहीं थी. मैंने सामने दिवार पर लगी क्लॉक पर टाइम देखा तो 9 बज रहे थे. ये देख कर मैं हैरान रह गया की मैं इतनी देर तक सोता रहा था. जब के इसके पहले ऐसा कभी न हुआ था. मैं सुबह जल्दी hi उठ जाया करता था. क्यों की मुझे चांदनी चौक दुकान पर जाना होता था.

मैंने सोचा की दक्षिणा ने मुझे उठाया क्यों नहीं. कुछ देर इसी बारे में सोचता रहा फिर मैं बाथरूम में फ्रेश होने के लिए चला गया. 20 मिनट बाद मैं फुल रेडी हो कर डाइनिंग हॉल में आ गया ब्रेकफास्ट के लिए.

मैंने देखा की हर दिन की तरह दक्षिणा और वो माइड किचन में hi थी. मुझे आया देख दक्षिणा थाली ले कर आयी और मेरे सामने टेबल पर रख दिया. उसके होठो पर मुस्कान थी. थाली मेरे सामने रख कर वो भी मेरे सामने वाली कुर्सी पर बैठ गयी. माइड किचन में hi थी तो उसने मुझे फ्लाइंग किश करते हुए धीरे से गुड मॉर्निंग कहा. मैं गुड मॉर्निंग का जवाब दिया और फिर धीरे से hi पूछा की उसने मुझे सुबह जगाया क्यों नहीं तो उसने कहा की मैं गहरी नींद में था इस लिए नहीं जगाया.

ब्रेकफास्ट करने के बाद मैंने मिनी सूटकेस उठाया और बाहर निकल गया. रास्ते में मैंने वर्कर्स को फ़ोन कर दिया था की मुझे आने में थोड़ा लेट हो जायेगा इस लिए वो वही पर मेरा वेट करेंगे. जब मैं दुकान पर पंहुचा तो डेली टाइम से आधा घंटा लेट था.

दोपहर को मैंने घर से लाया हुआ खाना खाया और फिर से काउंटर पर आ कर बैठ गया. वैसे तो सारा दिन दूकान में कोई न कोई कस्टमर बना hi रहता था. मगर किसी किसी टाइम ऐसा भी होता था जब 15 या 20 मिनट के लिए खली टाइम मिल जाता था. मैं उसी खली टाइम में मोबाइल पर फेसबुक या व्हाट्सप्प उसे करता था.

इस वक्त दुकान पर कोई कस्टमर नहीं था तो मैं मोबाइल पर फेसबुक ओपन किये बैठा था. मैं फेसबुक पर न्यूज़ एंड वीडियो देख रहा था की तभी मुझे कुसुम दीदी के नाम वाली उस लड़की का ध्यान आया तो मैंने जल्दी से इनबॉक्स की तरफ देखा. ऊपर साइड इनबॉक्स में रेड कलर में बहुत से मेस्सगेस शो कर रहे थे. ये देख कर मेरा दिल धड़कने लगा और मन में उत्सुकता उठी की किसके मेस्सगेस हो सकते हैं इतने सरे.? क्या कोई मैसेज कुसुम पांडेय नाम से भी आया होगा.?

मैंने जल्दी से इनबॉक्स पर टच किया तो वो ओपन हो गया. मैंने बड़े ध्यान से आये हुए मेस्सगेस को देखने लगा. ऊपर दूसरे लोगो के मेस्सगेस थे जिन्हे मैं ऊपर hi करता जा रहा था. ऊपर करते करते एकदम से मैं रुक गया. मेरी नज़र कुसुम पांडेय नाम से आये हुए मैसेज पर पड़ी. ये देख कर मेरा दिल जैसे थम सा गया. बिना ओपन किये की उसमे दिख रहा था की उसमे दो मैसेज आये हुए हैं.

मैं कुछ देर तक बिना पालक झपकाए उस मैसेज को देखता रहा. मुझे समझ नहीं आ रहा था की मैं उस मैसेज को ओपन करू या न करू. क्या लिखा होगा उन दो मेस्सगेस में.? इतना तो मैं समझ गया था की ये ईद मेरी कुसुम दीदी की hi है. इस नाम की कोई दूसरी लड़की मुझे दो दो मैसेज क्यों भेजेगी.?

मेरा दिल ज़ोर ज़ोर से धड़क रहा था. मेरे हाथ कांपने लगे थे. दिल और दिमाग में बहुत से ख़याल हलचल किये हुए थे. मैंने बड़ी हिम्मत करके उस नाम को टच किया तो वो बड़ी स्पीड से ओपन हुआ और फिर मेरी आँखों के सामने वो दोनों मैसेज डिटेल में ओपन हो गए.

लास्ट वाला मैसेज छोटा सा hi था जिसमे लिखा था हम सब तेरी HI आस पर ज़िंदा हैं विक्की. हो सके तो हमारी खबर लेने के लिए आ जाना.

मैंने लास्ट के इस मैसेज को पढ़ा तो मेरा दिमाग हैंग सा हो गया. मुझे समझ न आया की दीदी ने ऐसा क्यों कहा था. कुछ देर सोचने के बाद मैंने पहले वाले मैसेज पर नज़र डाली जो काफी बड़ा दिख रहा था. मैंने उसे पढ़ना शुरू किया. जैसे जैसे मैं उस मैसेज को पढता जा रहा था मेरा दिल धड़कना भूलता जा रहा था. मेरे दिल में बहुत तेज दर्द होने लगा था. मैसेज को बड़ी मुश्किल से मैंने एन्ड तक पढ़ा. मेरी आँखों से आँशु बहने लगे. मेरा दिल कर रहा था की मैं दहाड़े मार मार कर रोने लग जाओ.

मेरी आँखों के सामने साडी दुनिया घूमे लगी थी. चारो तरफ इंसान तो दिखाई दे रहे थे मगर मुझे उनकी आवाज़े नहीं सुनाई दे रही थी. मेरे सर पर जैसे एकदम से सारा आसमान आ कर गिर पड़ा था. मैं उस मैसेज पर आँखे गड़ाए बैठा था. मुझे याद hi नहीं रह गया था की मैं उस वक्त कहा पर हु और मेरे आस पास क्या है.

मैं एकदम से दुःख दर्द की दुनिया से बाहर तब आया जब मेरे एक वर्कर ने मुझे थोड़ा ज़ोर से हिलाते हुए आवाज़ दी थी. मैंने उसकी तरफ पलट कर देखा तो वो मुझे अजीब तरह से देख रहा था.

"क्या बात है.?" मैंने उस वर्कर को देखते हुए ऐसा कहा तो उसने कहा की शेठ जी अभी आप कहा खो गए थे. हम सब आपको आवाज़े लगा रहे थे मगर आप सुन hi नहीं रागे थे.

उस वर्कर की इस बात से मैंने बाकी वर्कर्स की तरफ देखा तो सब मेरे आस पास hi खड़े मुझे देख रहे थे. सामने काउंटर पर कुछ लोग खड़े थे जो की कस्टमर्स hi थे. ये सब देख कर मैं हैरान रह गया था. फिर मैंने खुद को बड़ी मुश्किल से सम्हाला और आये हुए उन कस्टमर्स से बात करने लगा.

मैंने उन कस्टमर्स को उनका सामान दिलवाया और जल्दी से उनको रफा दफा किया. मेरे दिमाग में मैसेज की बाते घूम रही थी. मेरा मन अंदर से बहुत दुखी हो गया था. मुझे लग रहा था की मैं अब जल्दी से यहाँ से चला जाओ. कुसुम दीदी के मैसेज ने मेरे वजूद को हिला कर रख दिया था. मैंने सभी वर्कर्स से कहा की वो लोग दूकान बंद करे.

दुकान बंद करने की बात से वर्कर्स हैरान हुए मगर मैंने उन्हें समझा दिया और ये भी कहा की अब ये दूकान कुछ टाइम तक बंद hi रहेगी. जब फिर से खोलना होगा तो मैं उन्हें एक दिन पहले फ़ोन करके बता दुगा. मेरी इस बात से सभी वर्कर्स मुझसे पूछने लगे की क्या हुआ है सेठ जी तो मैंने उन्हें बताया की घर में कुछ बात हो गयी है.

मैंने जाते जाते वर्कर्स से कहा की जितने दिन दुकान बंद रहेगी उतने दिन की उनकी पगार में कोई कटौती नहीं होगी. वो आराम से घर में बैठे. मेरी इस बात से सभी वर्कर्स चुप hi रहे. वो सब मुझे बहुत चाहते थे और मेरी बहुत इज्जत भी करते थे.

दुकान बंद करके मैं कार से घर की तरफ चल दिया. मेरा मन बहुत दुखी हो चूका था. मैं जल्द से जल्द अपने गांव अपने घर जाना चाहता था. मेरी फॅमिली इस वक्त बड़े दुःख में थी. उनको मेरे सहारे की ज़रूरत थी. सरे रास्ते मैं अपनी फॅमिली के बारे में सोचते हुए दुखी होता रहा.

घर के मैं गेट के पास खड़े हो कर मैं बेल्ल बजायी तो कुछ hi देर में माइड ने दरवाजा खोला तो मैं चुप चाप दरवाजे के अंदर आ गया. माइड मुझे इस वक्त आया देख हैरान हुयी मगर बोली कुछ नहीं. मैं सीधा अपने कमरे में आया और सूटकेस को एक टेबल के ऊपर रख कर बीएड पर गिर पड़ा.

मेरा मन कर रहा था की मैं दीदी से बात करू मगर बात करने का मेरे पास कोई जरिया नहीं था. दीदी ने मैसेज में अपना या घर का कोई नंबर नहीं लिख भेजा था. मैंने मोबाइल निकल कर फिर से फेसबुक पर इनबॉक्स को ओपन किया और दीदी के मैसेज को देखने लगा. मैं मैसेज की टाइमिंग देख रहा था की दीदी ने मुझे ये मैसेज किस टाइम भेजा था.

मैसेज आने का टाइम आज सुबह का hi था. 7:14ऍम का टाइम था उसमे. मैंने एक बार फिर से उन दोनों मेस्सगेस को पढ़ा और ये भी देखा की शायद कही दीदी ने कोई फ़ोन नंबर भी लिखा हो मगर फ़ोन नंबर कही नहीं लिखा था. मैंने कंपते हाथो से मैसेज का रिप्लाई किया. रिप्लाई में मैंने लिखा की आप अपना या घर का कोई फ़ोन नंबर भेजिए या मेरे इस नंबर पर फ़ोन कीजिये. मैंने अपना मोबाइल नंबर लिख कर मैसेज सेंड कर दिया.

अब मुझे दीदी के मैसेज या उनके फ़ोन आने का इंतज़ार था. मुझे बहुत ज़्यादा बेचैनी हो रही थी. मैं दीदी से hi नहीं बल्कि अपनी फॅमिली के हर पर्सन से बात करना चाहता था. दीदी ने मैसेज में साफ़ साफ़ लिखा था की हो सके तो हमारी खबर लेने के लिए आ जाना. मतलब उन्होंने मुझे घर आने के लिए कहा था.

अभी मैं ये सब सोच hi रहा था की तभी मेरे कमरे में दक्षिणा आ गयी. उसने मुझे इस हाल में देखा तो हैरान हुयी और फिर मेरे पास आ कर मुझसे पूछने लगी की क्या हुआ है मैं दूकान से इतना जल्दी कैसे आ गया हु. उसके पूछने पर मैंने उसे सब कुछ बता दिया और मोबाइल में आये दीदी के मैसेज को भी दिखा दिया. मेस्सगेस पढ़ कर दक्षिणा भी परेशां और दुखी हो गयी.

"तुम कुसुम के मैसेज आने का इंतज़ार न करो विकाश. मैं तो कहती हु की तुम्हे अभी इसी वक्त घर के लिए निकल जाना चाहिए. उन सबको तुम्हारी बहुत ज़्यादा ज़रूरत है." दक्षिणा ने ऐसा कहा तो मैंने उसकी तरफ ध्यान से देखा.

"मेरी फ़िक्र न करो जान. जब तक तुम नहीं आओगे तब तक मैं माइड को अपने साथ रहने को बोल दूगी. वो इसके लिए इंकार नहीं करेगी. तुम्हारा अपनी फॅमिली के पास जाना बहुत ज़रूरी है. उन सबकी आखिरी उम्मीद तुम hi हो. इस लिए तुम आज hi निकल जाओ यहाँ से. पैसे दाम की भी फ़िक्र न करना. जहा भी और जितना भी पैसा लगे तुम पैसा लगाना. चाहे तो तुम मेरा कार्ड ले जाओ या फिर मैं तुम्हारे अकाउंट में पैसे ट्रांसफर करवा देती हु." दक्षिणा ने ये सब कहा तो मैं देखता रह गया उसे.

मैं देख रहा था की आज दक्षिणा मेरे और मेरे परिवार के हिट के लिए ये सब कह रही थी. उसके कहने में कही भी ऐसा नहीं लगा की उसने अपने लिए कुछ ऐसा वैसा सोचा हो. ये तो मैं बहुत अच्छे से जनता था की दक्षिणा मेरे लिए कुछ भी कर सकती थी. उसने पहले भी कहा था की उसका सब कुछ मेरा hi है. वो तो बस मुझे अपने पास चाहती है. उसका सब कुछ तो सिर्फ मैं hi हु.

दक्षिणा के ज़ोर देने पर मैं आज hi अपने गांव जाने के लिए रेडी हो गया. मैंने अपने एक ख़ास पहचान वाले को फ़ोन करके ट्रैन की टिकट बनवाने को कह दिया. अभी बहुत टाइम था मेरे पास. ट्रैन रात में 9 बजे की थी जो दिल्ली के हज़रात निजाम्मुद्दीन रेलवे स्टेशन से चलती थी.

मैंने दक्षिणा का कार्ड लेने से मन कर दिया था ये कह कर की उसे भी तो उसकी ज़रूरत पद सकती है. मेरी इस बात से दक्षिणा ने ये कहा की फिर वो मेरे अकाउंट में पैसा ट्रांसफर करेगी. ये बोल कर दक्षिणा कार ले कर कही चली गयी थी.

मैं देख रहा था की जब से दक्षिणा को मेरे घर की सिचुएशन के बारे में पता चला था तब से वो मेरे और मेरे घर वालो के लिए चिंतित और परेशां थी. मुझे बार बार खुद को सम्हालने के लिए कह रही थी. ये सब देख कर मुझे दक्षिणा पर बहुत प्यार आ रहा था और बहुत अच्छा भी लग रहा था. मैं जनता था की वो मेरा हर तरह से ख़याल रखती है किसी बीवी की तरह. उसका स्वार्थ सिर्फ इतना hi था की वो मुझे अपने पास हमेशा के लिए चाहती थी. इसके लिए वो अपना सब कुछ मुझे देने को तैयार थी. मुझे ये भी पता था की अगर मैं उसे धोखा दे कर और उसे छोड़ कर चला जाओ तो शायद वो मेरे बिना जी न पाए. मैं कभी कभी सोचा करता था की ये कैसी मोहब्बत है. एक 27 साल की बेटी की माँ जो खुद 47 साल की है वो अपनी आगे के इस पड़ाव पर कैसे किसी लड़के से इतनी अटूट मोहब्बत कर सकती है.?

ये मोहब्बत hi थी. दक्षिणा को अपने लिए एक सहारे की ज़रूरत थी जो उसके अकेलेपन को दूर करे और उसे हर तरह से प्यार करे. मोहब्बत उम्र नहीं देखती. जब से मैं यहाँ आया था तब से उसने मुझे देखा था. मैंने उसके लिए और उसकी बेटी के लिए यहाँ तक की उसके बुसिनेस के लिए बहुत कुछ किया था. मेरी अच्छाइया देख कर और मेरी काबिलियत देख कर अगर उसे मुझसे इस तरह मोहब्बत हो गयी थी तो इसमें उसकी क्या गलती थी.?

करीब एक घंटे बाद दक्षिणा घर वापस आयी और फिर मेरे कमरे में आयी. उसने बताया की उसने मेरे अकाउंट में पैसा ट्रांसफर कर दिया है. मैंने उससे पूछा की कितना तो उसने टोटल अमाउंट नहीं बताया बस यही कहा की काम नहीं पड़ेगे किसी चीज़ के लिए. उसकी बात से मैं समझ गया की उसने मेरी उम्मीद से ज़्यादा hi मेरे अकाउंट में पैसा दाल दिया होगा. उसे पता था की ज़्यादा पैसो के बारे में जान कर मैं उसे मन करुगा इसी लिए उसने मुझे टोटल अमाउंट नहीं बताया था.

घर में माइड थी इस लिए वो ज़्यादा देर तक मेरे कमरे में नहीं रुकी और चली गयी. जाते टाइम मैंने देखा था की उसके चेहरे पर बेचैनी थी. उसे पता था की आज रात मैं यहाँ नहीं रहुगा इस लिए वो मेरे साथ कुछ टाइम बिताना चाहती थी मगर माइड के रहते ये पॉसिबल नहीं था.

मैं बीएड पर पड़ा अपने घर वालो के बारे में सोच रहा था. कुसुम दीदी ने मैसेज में ऐसी बाते कही थी जिससे मैं बहुत ज़्यादा परेशां हो गया था. शाम को मेरे मोबाइल पर एक मैसेज आया. मैंने देखा की मैंने जिस आदमी को टिकट के लिए कहा था उसने मेरी टिकट बनवा दी थी. उसी का मैसेज आया था मुझे. व्हाट्सप्प में टिकट की पिछ भेजा था उसने.

मुझे याद आया की मैंने कुसुम दीदी को भी इनबॉक्स में मैसेज भेजा था और अपना मोबाइल नंबर भी. मैंने फिर से फेसबुक में इनबॉक्स को ओपन किया मगर उसमे अभी कुसुम दीदी का कोई मैसेज नहीं आया था. मैंने सोचा की दीदी का रिप्लाई आने में इतना लेट क्यों.? ऐसी सिचुएशन में तो उनका जल्द hi रिप्लाई आना चाहिए था.

कुछ देर बाद दक्षिणा फिर से मेरे कमरे में आयी और सीधा मेरे बीएड पर मेरे बगल से hi लेट गयी. मैं इस वक्त उसके इस तरह अपने करीब लेट जाने पर हैरान हुआ और उसकी तरफ सवालिया नज़र से देखा तो उसने मुझे बताया की उसने माइड को घर भेज दिया है और उसे ये भी कहा है की वो अपने घर में बता आये की अब से वो कुछ दिनों के लिए यही रहेगी. दक्षिणा ने माइड से कहा की वो रात 8 बजे तक घर आ जाये.

"मैं जानती हु जान की इस वक्त ये सही टाइम नहीं है मगर तुम तो जानते हो की मैं तुम्हे कितना प्यार करती हु. आज तुम यहाँ से जाने कितने दिनों के लिए चले जाओगे तो मैं यहाँ किस हाल में रहूगी इसका मुझे खुद अंदाज़ा नहीं है. इस लिए मैं चाहती हु की तुम्हारे जाने से पहले मैं तुम्हे खूब प्यार करू और तुम भी मुझे खूब प्यार करो. मुझे इतना तृप्त कर दो की तुम्हारी कमी का उतना अहसास न हो पाए जितना उस सिचुएशन में होता." दक्षिणा ने ये सब कहा तो मैंने उसकी तरफ अजीब तरह से देखा.

मैं समझ गया था की दक्षिणा मुझसे किस प्यार की बात कर रही थी. मगर मैं इस वक्त उस प्यार के मूड में नहीं था. मेरा दिल घर पर था और वह की सीटुएशन्स पर लगा हुआ था. मुझे कुछ न बोलता देख दक्षिणा ने मेरे सीने से अपना सर उठाया और मेरी आँखों में बड़ी मासूमियत से देखने लगी.

"अगर तुम्हारा दिल नहीं कर रहा तो कोई बात नहीं जान. मैं तुम्हे मजबूर नहीं करुँगी. बस तुम खुश रहो." दक्षिणा ने कहा और फिर से उसने मेरे सीने में अपना सर रख लिया. मैं दक्षिणा की इन बातो से उसकी फीलिंग्स का अहसास करने लगा. मैं समझ सकता था की दक्षिणा इस वक्त किस हालत से गुज़र रही होगी. वो अंदर hi अंदर इस बात से हतास हो रही थी की मैं आज उसके पास से चला जाउगा. फिर कब लौट के उसके पास औ इसका कुछ पता नहीं था और यही वजह थी की दक्षिणा इस वक्त चाहती थी की वो मुझसे खूब प्यार करे या मैं उसे पलंग तोड़ प्यार करू.

मैंने देखा की दक्षिणा मेरे सीने में सर रखे चुप चाप पड़ी थी. मुझे उस पर तरस सा आया और फिर मैंने उसको प्यार करने का या उसे खुश करने का सोच लिया.

मैंने दक्षिणा के सर को एक हाथ से सहलाया और फिर उसकी पीठ पर हाथ फेरने लगा. इस वक्त उसके जिसम में साडी और ब्लॉउज था. बैकलेस ब्लॉउज से झांकती उसकी गोरी चिकनी पीठ को मैं सहला रहा था. फिर मैंने अपना दूसरा हाथ उठाया और उसके नरम नरम होठो पर फेरने लगा.

"इतना प्यार क्यों करती हो मुझसे.? क्यों मुझे इस प्यार के बंधन में बाँध देना चाहती हो दक्षिणा.? ये प्यार बहुत hi ख़राब रोग होता है. जिसे लग जाता है न वो आदमी किसी काम का नहीं रह जाता." मैंने ऐसा कहा तो दक्षिणा ने सर उठा कर मेरी तरफ देखा फिर बोली.

"गलत बात जान. ये रोग भले hi मुझे लग चूका है मगर मैं अब भी काम की हु. भरोसा न हो तो आजमा लो, जिस काम के लिए कहोगे वो काम कर जाओगी मैं." दक्षिणा ने मेरी आँखों में देखते हुए ऐसा कहा तो मैं मुस्कुरा उठा.

मैं जनता था की दक्षिणा सच कह रही थी. वो मेरे कहने पर कुछ भी कर सकती थी. इस वक्त उसकी आँखों में मैं अपने लिए बेपनाह मोहब्बत देख रहा था. उसकी बेपनाह मोहब्बत की मैं ताब नहीं ले सकता था और न hi ये मेरे बस में था.

दक्षिणा की बात का जब मुझे कोई जवाब न सुझा तो मैंने उसके चेहरे को खींच कर अपने और पास किया और फिर उसके रसीले होठो को अपने होठो में दबा कर मज़े से चूमने चूसने लगा. उसने ज़रा भी बिरोध नहीं किया बल्कि उसने खुद को मुझे सौंप दिया. जैसे कहना चाहती हो की कर लो जो भी करना हो. दक्षिणा में यही एक क्वालिटी थी की वो खुद को मुझ पर पहले hi समर्पित कर चुकी थी. फिर चाहे इसे उसकी कॉमजोरी कहो या उसकी बेपनाह मोहब्बत.

"मुझे टूट कर प्यार करो जान. जितना भी टाइम बचा है उतने में मुझे इतना प्यार करो की मुझे तुम्हारी जुदाई या तुम्हारी कमी का ज़्यादा अहसास न हो." दक्षिणा ने अपने होठो को मुझसे अलग करके जब ऐसा कहा तो मुझे उस पर सच में बहुत प्यार आया. लग hi नहीं रहा था की वो 47 साल की एक विधवा औरत है और वो 27 साल की एक बेटी की माँ भी है. उसका जिसम hi ऐसा कैसा हुआ था की वो 47 की आगे की होते हुए भी 30 की आगे से ज़्यादा नहीं लगती थी.

मैंने उसके चेहरे को फिर से खींचा और उसके रसीले होठो को चूसने लगा. इस बार वो भी ऐसा hi करने लगी थी. काफी देर तक हम दोनों एक दूसरे के होठो को चूमते चूसते रहे. जब हमारी साँसे भरी हो गयी तो हम अलग हो गए. दक्षिणा बुरी तरह हाफने लगी थी उसकी आँखों में प्यार हवाद सब कुछ दिखने लगा था.

वो मुझे देख कर मुस्कुरायी और फिर उठ कर अपने कपड़ो को जल्दी जल्दी उतरने लगी. 2 मिनट भी नहीं लगे उसको कपडे उतरने में. अब वो सिर्फ रेड कलर की ब्रा पैंटी में थी. दूध जैसे गोर जिसम में रेड कलर क़यामत ध रहा था. उसके जिसम में कही भी ऐसा नहीं था की कोई एक्स्ट्रा चर्बी कही दिख रही हो. सब कुछ जैसे परफेक्ट था. मैं हमेशा से hi उसके इस क़यामत धने वाले जिसम का कायल था और दीवाना भी.

अपने कपडे उतार कर उसने उसी स्पीड में मेरे कपडे भी दो मिनट के अंदर hi उतार दिए. मैं भी अब सिर्फ कच्चे में था. कपडे उतारने के बाद उसने कुछ देर मुझे और मेरे बलिस्त जिसम को देखा और फिर वो एकदम से पलटी और कमरे से बाहर चली गयी. मुझे समझ में न आया की वो कमरे से बाहर क्यों चली गयी है.

कुछ hi देर में जब वो वापस कमरे में आयी तो उसके हाथ में आइस क्रीम से भरी एक कांच की कटोरी थी. ये देख कर मैं हैरान भी हुआ और मुस्कुराया भी. दक्षिणा आइस क्रीम की कटोरी लिए आयी और बीएड पर चढ़ गयी. कटोरी को उसने बीएड के पास hi रखे एक छोटे से स्टूल में रखा और मेरी तरफ देखा.

"ये सब क्या है डिअर.?" मैंने सब कुछ जानते हुए भी उससे जब ये पूछा तो उसने कहा.

"बस देखते जाओ जान. वैसे ये पहली बार तो नहीं है जब मैं आइस क्रीम ले कर तुम्हारे पास इस तरह आयी हु. याद करो शुरू शुरू में मैं कुछ ऐसा hi तो किया करती थी." उसने ऐसा कहा तो मैं बस मुस्कुरा कर रह गया.

दक्षिणा मेरे करीब आयी और फिर से वो मेरे होठो पर झुक गयी. इस बार वो मेरे ऊपर hi लेट गयी थी. उसकी बड़ी बड़ी छतिया जो ब्रा में कैद थी वो मेरे सीने में धस गयी. मेरे जिसम में करंट सा दौड़ गया. हम दोनों एक दूसरे के होठो को बुरी तरीके से चूम चाट रहे थे. मैंने एक हाथ बढ़ा कर दक्षिणा की एक छाती को पकड़ लिया और ब्रा के ऊपर से hi उसे कास कास के दबाने लगा. जिससे दक्षिणा की सिसकी मेरे मुँह में hi डाब गयी. उसकी छतिया इस आगे में भी टाइट थी.

कुछ देर होठो की चुसाई के बाद हम दोनों अलग हुए. दक्षिणा ने पीछे खिसक कर आइस क्रीम वाली कटोरी को उठाया और उससे थोड़ा सा आइस क्रीम ले कर मेरे मुँह में और चेहरे में लगा दिया. ठंडी ठंडी आइस क्रीम के लगते hi मुझे मेरे चेहरे पर ठण्ड का अहसास हुआ. मगर मैंने कहा कुछ नहीं उसे. दक्षिणा ने आइस क्रीम लगाने के बाद कटोरी को बीएड पर hi एक तरफ रखा और फिर मेरे चेहरे पर झुक गयी.

वो बड़े मज़े से मेरे चेहरे पर लगी आइस क्रीम को चाट चाट कर खाने लगी. उसके बाद वो मेरे होठो पर लगी आइस क्रीम को चाटने लगी और फिर एकदम से उसने मेरे होठो को अपने मुँह में भर लिया. मुझे बहुत मज़ा आ रहा था. मेरा चेहरा आइस क्रीम से और उसके चाटने से पूरी तरह गीला हो गया था.

आइस क्रीम चाटने के बाद दक्षिणा फिर अलग हुयी और उस कटोरी को फिर से लिया और इस बार उस आइस क्रीम को उसने मेरे सीने पर थोड़ा थोड़ा लगते होते मेरे पेट और नाभि पर लगा दिया. मुझे आइस क्रीम की ठंडक से बेहद गुदगुदी और करंट सा लग रहा था मगर मैं दक्षिणा की ख़ुशी के लिए ये सब सही जा रहा था. वैसे मज़ा तो मुझे भी आ hi रहा था. मैं सब कुछ भूल चूका था. अब बस हम दोनों का ये खेल hi था.

आइस क्रीम मेरे जिसम में इस तरह लगाने के बाद दक्षिणा फिर झुकी और इस बार जहा जहा उसने आइस क्रीम लगाया था उन जगहों पर से वो बड़े तरीके से आइस क्रीम को चाटने लगी लगी. नाभि के पास लगी आइस क्रीम को चाटने के बाद वो मेरी नाभि में अपनी जीभ दाल दाल कर चाट रही थी. मैं मज़े से बुरी तरह मचले जा रहा था. मेरा लुंड तो कब का तन कर खड़ा हो चूका था जो कच्चे में साफ़ साफ़ खड़ा हुआ दिख रहा था.

नाभि से अपना चेहरा उठाने के बाद दक्षिणा ने मेरे कच्चे की तरफ देखा और मेरे खड़े हुए लुंड को देख कर वो मुस्कुरायी. फिर मेरी तरफ देखते हुए उसने मेरे कच्चे को धीरे धीरे करके पूरा उतार दिया. कच्चे के उतारते hi मेरा लुंड उछाल कर लहराया और फिर सीधा खड़ा हो गया. दक्षिणा ने उसे एक हाथ से पकड़ कर पहले सहलाया और फिर दूसरे हाथ से आइस क्रीम की कटोरी को उठाया. मैं समझ गया की अब वो क्या करने वाली है.

मेरे देखते hi देखते दक्षिणा ने कटोरी से ढेर साडी आइस क्रीम निकली और मेरे लुंड पर पूरी तरह लगा दिया. आइस क्रीम की ठंडक से मैं एकदम से सिहर उठा. मेरा सारा जिसम झनझना कर रह गया. मेरे खड़े हुए लुंड ने भी ठंडक के अहसास से चार पांच बार हिल कर बताया की उसे बहुत ज़्यादा ठण्ड लग रही है.

मेरे लुंड की बात को समझते हुए दक्षिणा मुस्कुरायी और फिर मेरे लुंड पर झुक गयी. जीभ निकाल कर वो बड़े आराम से और बड़े तरीके से धीरे धीरे लुंड पर लगी उसे क्रीम को चाट चाट कर खाने लगी. मैं बता नहीं सकता की मुझे इस वक्त कितना मज़ा आ रहा था. मेरी हालत ऐसी हो गयी थी की मुझसे अब बर्दास्त नहीं हो रहा था. मुझे लग रहा था की मैं जल्दी से उठ जाओ और दक्षिणा को धार दबोचु.

लुंड के चारो तरफ की आइस क्रीम को दक्षिणा ने साफ़ कर दिया था. अब बस मेरे लुंड के टोपा वाले भाग पर hi आइस क्रीम लगी थी जो लुंड की गर्मी से पिघल पिघल कर मेरे अंडकोषों की तरफ बहने लगी थी. दक्षिणा ने ये देख कर अपना पूरा मुँह खोला और मेरे लुंड के टोपे को अपने मुँह में भर लिया. दक्षिणा के मुँह की गर्मी का अहसास ठंडी आइस क्रीम पर हुआ तो मुझे बहुत राहत सी महसूस हुयी और अजीब सा मज़ा भी आया.

दक्षिणा मेरे लुंड को मुँह में भरे ऊपर नीचे अपने सर को करने लगी. उसके ऐसा करने से लुंड पर लगी आइस क्रीम पिघल कर तेज़ी से नीचे की तरफ बहने लगी. दक्षिणा ने लुंड को मुँह से निकला और उस बहती हुयी आइस क्रीम को जीभ से चाट चाट कर लुंड को साफ़ करने लगी. मैं मज़े से आँखे बंद किये लेता हुआ था. मुझे लग रहा था जैसे मैं आसमान में उड़ रहा हु.

लुंड के चारो तरफ अच्छे से साफ़ करने के बाद दक्षिणा ने एक हाथ से लुंड को पकड़ा और फिर से उसे अपने मुँह में भर कर चूसने लगी. कुछ hi देर में मुझे ऐसा लगने लगा की मेरे जिसम का खून मेरे अंडकोषों की तरफ तेज़ी से दौड़ते हुए आने लगा है. मेरा जिसम हिलने लगा था. दक्षिणा को भी पता चल गया की मैं अब झड़ने वाला हु इस लिए उसने अपने मुँह से मेरे लुंड को निकाल दिया.

जैसे hi दक्षिणा ने मेरे लुंड को मुँह से निकला तो मैं जैसे होश में आया और आँखे खोल कर उसकी तरफ देखा. मेरी साँसे बहुत तेज़ी से चल रही थी. दक्षिणा ने मेरी तरफ देखा और मुस्कुरायी. उसका चेहरा भी इस साडी क्रिया में गीला हो गया था.

"कैसा लगा जान.?" उसने मेरी तरफ देखते हुए ये कहा तो मैंने कहा.

"ी can't एक्सप्लेन डिअर. मैं बस फील कर सकता हु बता नहीं सकता." मैंने ऐसा कहा तो दक्षिणा मुस्कुरायी और फिर एक तरफ पड़े अपने ब्लॉउज से उसने अपने चेहरे को पोछा और फिर मेरे करीब आ गयी.

"नाउ योर turn...agar तुमको अच्छा लगे तो." दक्षिणा ने ऐसा कहा तो मैं मुस्कुराते हुए उठ गया. मेरे उठते hi दक्षिणा मेरी जगह सीढ़ी लेट गयी. अब मैं भी वैसा hi उसके साथ करने वाला था जो अभी उसने मेरे साथ किया था.

"अच्छा क्यों नहीं लगेगा डिअर.? तुमने इतने प्यार से ये सब किया तो क्या मैं नहीं कर सकता.? ज़रूर karuga...haan ये हो सकता है की शायद तुमसे बेटर न कर पाउ. बूत ी विल तरय." मैंने ऐसा कहा तो दक्षिणा ने पालक झपका कर बताया की ठीक है.

मैंने सबसे पहले दक्षिणा के रसीले होठो को कुछ देर चूमा फिर उठ कर उसकी रेड कलर की ब्रा को उसके जिसम से अलग किया. ब्रा के अलग होते hi उसकी खूबसूरत बड़ी बड़ी छतिया उछाल कर मेरे सामने आ गयी. खूबसूरत छतियो में पिंक कलर के निप्पल बड़े hi खूबसूरत लग रहे थे. दक्षिणा की छतिया ऊपर की तरफ तानी हुयी थी. मैं हमेशा सोचा करता था की दक्षिणा सच में एक अद्भुत औरत है जो इस आगे में भी उसकी बड़ी बड़ी छतिया इतनी टाइट थी और ऊपर को उठी हुयी थी.

मैंने पास hi राखी आइस क्रीम की कटोरी को उठाया और उससे आइस क्रीम ले कर उसी तरह दक्षिणा के होठ और चेहरे पर लगाया जैसे उसने मुझे लगाया था. आइस क्रीम की ठंडक का अहसास होते hi दक्षिणा का जिसम हिल कर रह गया. आइस क्रीम लगाने के बाद मैंने कटोरी को एक तरफ रखा और फिर झुक कर वैसे hi चाटने लगा जैसे दक्षिणा ने छाता था. कुछ hi देर में मैंने उसके चेहरे को चाट कर साफ़ कर दिया.

दक्षिणा का भी मज़े से बुरा हाल होने लगा था. मैंने फिर से आइस क्रीम की कटोरी को उठाया और इस बार आइस क्रीम को उसकी बड़ी बड़ी छतियो पर लेप सा कर दिया. उसके निप्पल वाली जगह पर मैंने ढेर साडी आइस क्रीम लगा दी थी. दक्षिणा आइस क्रीम की वजह से बुरी तरह हिल रही थी और सिसकिया भर रही थी. अपने जज़्बातो को काबू करने के लिए उसने दोनों हाथो से बीएड शीट को कास कर मुट्ठी में पकड़ लिया था.

मैंने दक्षिणा की दोनों छतियो को आइस क्रीम से धक् दिया था. लेप लगाने के बाद मैं झुका और बड़े आराम से मज़े ले ले कर चाटने लगा. पहले मैंने दक्षिणा के लेफ्ट चुकी के चारो तरफ की आइस क्रीम को चाट कर साफ़ किया उसके बाद राइट चुकी को. अब सिर्फ दोनों छतियो के निप्पल्स पर आइस क्रीम बची थी. दक्षिणा अभी भी हिले जा रही थी.

"अह्ह्ह्हह जान जल्दी से इस आइस क्रीम को मेरे निप्पल्स से हटाओ. ऐसा लग रहा है जैसे ये आइस क्रीम मेरे निप्पल्स को मेरी छतियो से अलग कर देगी." दक्षिणा ने सिसकी लेते होते ऐसा कहा तो मैं मुस्कुराया और फिर उसकी राइट छाती पर झुक गया.

मैंने दक्षिणा के राइट निप्पल वाले उस भाग को पूरा hi अपने मुँह में भर लिया और बुरी तरह से चूसने लगा. मुझे आज ये निप्पल बहुत ज़्यादा मीठे लग रहे थे. लग रहा था की इन्हे खा hi जाओ और मैं सच में ऐसा कर भी रहा था. मैं बीच बीच में दक्षिणा के निप्पल को हलके से काट भी लेता था. जिससे दक्षिणा ज़ोर से सिसकी लेती थी. कुछ देर राइट निप्पल को चुस्त रहा उसके बाद लेफ्ट निप्पल की तरफ बढ़ा और उसे भी वैसे hi मुँह में भर लिया.

दक्षिणा की बड़ी बड़ी छतिया गीली हो चुकी थी. उसका राइट निप्पल वाला पूरा भाग लाल सुर्ख पद गया था और निप्पल बड़े बड़े दिखने लगे थे. मैं उसकी राइट छाती को एक हाथ से मुट्ठी में भर कर ज़ोर ज़ोर से मसल रहा था जिससे दक्षिणा मज़े में सिसकारियां भर रही थी. कुछ देर बाद मैं उठा और फिर से आइस क्रीम की कटोरी उठाया और फिर उससे आइस क्रीम ले कर मैंने दक्षिणा के पेट और उसकी नाभि पर ढेर सारा लगा दिया. मेरे ऐसा करते hi दक्षिणा सिसक उठी. उसकी कमर ऊपर की तरफ उठ गयी. मैं झुक कर बड़े मज़े से उस आइस क्रीम को चाटने लगा.

दक्षिणा का मज़े से बुरा हाल था. वो अपनी दोनों टाँगे बीएड पर पटक रही थी और सर को इधर से उधर कर रही थी. पेट और नाभि पर लगी आइस क्रीम को चाटने के बाद मैं नीचे आया तो देखा उसकी रेड कलर की पैंटी पूरी गीली हो चुकी थी. ऐसा लग रहा था जैसे दक्षिणा का पेशाब निकल गया हो. मैंने मुस्कुराते हुए उसकी छूट पर पैंटी के ऊपर से hi हाथ लगाया तो दक्षिणा को झटका सा लगा और उसने जल्दी से अपनी टांगो को सिकोड़ लिया. मेरे हाथ की दो उंगलिया दक्षिणा के छूट पर लगे उसके पानी से चिपचिपाने लगी थी....

भाई लोग....

आज के लिए इतना hi. मैंने कहा था की आज दो अपडेट दुगा. मगर काम की वजह से दूसरा अपडेट पूरा नहीं कर पाया मगर आज रात कम्पलीट कर के कल पोस्ट कर दुगा पक्का....

रीड एन्जॉय & गिव योर फीडबैक....

:थैंक्यू:
 
सब कुछ जायज़ है....

अपडेट = 18

प्रेजेंट रनिंग....


मैंने दक्षिणा की पैंटी को पकड़ कर उतारा और उसके जिसम से अलग कर दिया. मैंने देखा की दक्षिणा की क्लीन शवेद छूट जो एक डैम पिंक कलर की hi थी वो बुरी तरह छूट रास से गीली हुयी पड़ी थी. छूट रास की खुशबु मेरी नाक में सामने लगी थी जो गजब की थी और मुझे मदहोश करने लगी थी.

मैंने दक्षिणा की छूट का स्वाद भी चखा था. वैसे छूट पर मुँह लगाने वाला काम मैं बहुत काम hi करता था और दक्षिणा भी मुझे कभी नहीं कहती थी की मैं उसकी छूट को मुँह लगाओ. अगर मेरा दिल किया तभी मैं ऐसा करता था. जब के दक्षिणा हमेशा मेरे लुंड को मुँह में भर कर चूसती थी. मैंने भी उसे कभी नहीं कहा की वो मेरे लुंड को अपने मुँह में ले. ये वो खुद hi करती थी.

आज की बात अलग थी. आज मुझे अपने गांव जाना था मगर उससे पहले दक्षिणा को इतना प्यार देना था की वो मेरे जाने के बाद खुश रह सके. मैंने दक्षिणा की दोनों टांगो को पकड़ कर फैला दिया और फिर उसकी पिंक छूट की तरफ झुकता चला गया. उसके छूट रास की खुशबु मुझे पागल किये दे रही थी. बुरी तरह से गीली छूट पर मैंने मुँह लगा दिया. मैंने जीभ निकाल कर उस बहती हुयी छूट को नीचे से ऊपर की तरफ छठा तो दक्षिणा ने फिर से अपनी टांगो को सिकोड़ लिया. ऐसा उसने मज़े की वजह से किया था. उसके ऐसा करते hi मेरा सर उसकी टांगो के बीच फास गया. मैंने अपने दोनों हाथो को ऊपर उठा कर उसकी दोनों टांगो को ज़ोर दे कर फैलाया और फिर आराम से दक्षिणा के छूट रास का पान करने लगा.

"आअह्ह्ह्हह jaaaaan.....mat करो plzzzz..sshhsshsshhs....hayeee माआईएनन माररररर जाउगीयी इस माज़ी से.." दक्षिणा ने मज़े के सातवे आसमान में पहुंचते हुए ऐसा कहा तो मैं रुका नहीं बल्कि और भी ज़ोर ज़ोर से उसकी छूट को चाटने लगा.

मुझे दक्षिणा के छूट का स्वाद बहुत अच्छा लग रहा था. पता नहीं मेरे मन में क्या आया की मैंने दक्षिणा की छूट को मुँह खोल कर पूरा मुँह में भर लिया और बुरी तरीके से उसको चूसने लगा. मेरे ऐसा करते hi दक्षिणा बुरी तरह हिलने लगी. उसने फिर से अपनी दोनों टांगो को सिकोड़ कर मेरे सर में फसा लिया. उसके दोनों हाथ बीएड शीट को छोड़ कर आये और मेरे सर के पिछले भाग में जैम गए. वो अपने हाथो से मेरे सर को अपनी छूट की तरफ दबाने लगी.

मैं अजीब सी जगह पर फास गया था. मगर इस बार मैंने दक्षिणा की टांगो को अपने सर से नहीं हटाया. मैं उसकी छूट को मुँह में भरे बुरी तरह चाट रहा था. मुझे ऐसा लग रहा था की मैं दक्षिणा की इस छूट को मिर्च मशाला लगा कर खा hi जाओ. मैंने अपनी पूरी जीभ को दक्षिणा की छूट के छेड़ में घुसेड़ दिया और फिर अंदर बाहर करने लगा. दक्षिणा बुरी तरह हिले जा रही थी. उसके जिसम में अब झटके से लग रहे थे.

"आअह्हह्ह्ह्हह jaaaaaan.....ye कैसा जाऔद्दूउउउउ hai.....main पागल हो जाओगी vikaaaaash.....aisa मज़ा पहली क्यों नाहीईई आआअह्हह्ह आया था.?" दक्षिणा मज़े से ये सब बोलती जा रही थी. पुरे कमरे में उसकी ाही और सिसकारियां गूंजने लगी थी.

थोड़ी hi देर में दक्षिणा के जिसम को तेज़ तेज़ झटके लगने लगे. मेरे मुँह में गरम लावे की बाढ़ सी आ गयी. वो लावा मुझे बहुत मीठा लग रहा जिसे मैं बिना एक पल गवाए पिता जा रहा था. दक्षिणा को ये झटके कुछ देर तक लगते रागे और फिर वो बेजान सी हो गयी. कमरे में अब कोई सिसकी और ाही नहीं गूँज रही थी बस लम्बी लम्बी सांस लेने की आवाज़े सुनाई दे रही थी.

दक्षिणा झाड़ चुकी थी और बुरी तरह झड़ी थी वो. उसकी छूट से निकले अमृत को पिने के बाद मैंने अपने हाथो से दक्षिणा की टांगो को अपने सर से हटाया और फिर आ कर दक्षिणा के बगल से लेट गया. दक्षिणा आँखे बंद किये लम्बी लम्बी साँसे ले रही थी. उसके चेहरे पर ख़ुशी और तृप्ति से भरी मुस्कान थी. कुछ देर बाद जब दक्षिणा की साँसे बहाल हुयी तो उसने आँखे खोल कर मेरी तरफ देखा और फिर जाने क्या सोच कर शरमाते हुए अपना चेहरा मेरे सीने में छुपा लिया.

"क्या हुआ dear....aaj ये शर्म हाय क्यों.?" मैंने पूछा तो दक्षिणा ने कोई जवाब नहीं दिया. मैंने फिर पूछा तो उसने कहा.

"मुझे नहीं पता jaan....bas शर्म सी आ रही है." दक्षिणा ने कहा तो मैंने कहा.

"अच्छा चलो ठीक hai...waise आज जो अमृत का पान मैंने किया वो सच में लाजवाब था. अगर मुझे पता होता की वो अमृत इतना मीठा होता है तो मैं डेली उसका पान करता." मैंने जब ऐसा कहा तो दक्षिणा एकदम से सिकुड़ गयी. उसने अपने चेहरे को और भी ज़्यादा मेरे सीने में छुपा लिया.

"ये क्या कह रहे हो जान. प्ल्ज़ ऐसा मत कहो. मुझे पता नहीं क्यों अब बहुत शर्म आ रही है." दक्षिणा ने ये कहा तो मैं भी हैरान हो गया.

"शर्म तो औरत का गहना है डिअर. वैसे भी औरत में थोड़ी बहुत शर्म तो होनी hi चाहिए. औरत की इस शर्म में भी एक अलग बात होती है." मैंने कहा तो दक्षिणा ने कहा.

"अच्छा जी बड़ा पता है तुम्हे औरत के बारे में." दक्षिणा ने धीरे से सर उठा कर ऐसा कहा तो मैंने कहा.

"तुम्हारे साथ रहते रहते इतना तो पता चल hi गया है अब. खेर chhodo....chalo अब आगे का प्रोग्राम शुरू करे. तुम्हे तो पता hi है की हमारे पास ज़्यादा टाइम नहीं बचा है." मैंने ऐसा कहा तो दक्षिणा कुछ पल के लिए उदास सी नज़र आयी फिर बोली.

"हाँ ये तो hai...waise jaan...gaav से कब तक में वापस आओगे.?" दक्षिणा ने पूछा तो मैंने कहा.

"कुछ कह नहीं सकता. वह जा कर hi पता चलेगा की सिचुएशन कैसी है. मगर तुम फ़िक्र मत करो dear...main फ़ोन पर बात तो करुगा hi तुमसे." मैंने ये कहा तो दक्षिणा ने कहा.

"ठीक है jaan...phone ज़रूर करते रहना. क्यों की तुम्हारे जाने के बाद मेरा वक्त कैसे guzrega...main कैसे jiyugi...yahi सोच सोच कर दिल बैठा जा रहा है." दक्षिणा की आवाज़ भरी हो गयी तो मैंने कहा.

"अपने आपको सम्हालो dear...tum भी जानती हो की लाइफ में हर टाइम खुशिया नहीं बानी रहती और न hi हर टाइम किसी का साथ बना रहता है. हर आदमी के नसीब में कभी न कभी जुदाई और दर्द भी आता है. मगर हमें उससे दुखी नहीं होना चाहिए बल्कि उसका सामना करना चाहिए." मैंने ऐसा कहा तो दक्षिणा ने कहा.

"सही कहा jaan...magar क्या करे मन नहीं मंटा न. खेर छोडो इस बात को. इस वक्त मैं ऐसी बातो से अपने मन को दुखी नहीं करना चाहती. मैं तो बस तुम्हारे साथ जी भर के प्यार करना चाहती हु. मुझे प्यार करो न जान. तुम्हे पता है आज जब मैंने माइड को घर जाने को कहा तो वो मुझे अजीब तरह से देखने लगी थी. लगता है उसे शक है हम पर. वैसे तो हमने आज तक उसके यहाँ रहने पर कभी कुछ ऐसा नहीं किया जिससे उसे हम पर शक हो मगर शायद वो इस लिए शक करती होगी क्यों की हम दोनों इस घर में अकेले hi रहते हैं. वो सोचती होगी की इतने बड़े घर में मेरे साथ साथ एक जवान लड़का भी रहता है. इस वजह से शायद हमारे बीच ऐसा कुछ हो भी सकता है. जब वो मुझे अजीब तरह से देखने लगी तो मैंने उसे बताया की तुम आज अपने घर जा रहे हो छुट्टी पर. इस लिए जब तक तुम वापस नहीं आ जाते तब तक उसे मेरे साथ hi उस घर में रहना होगा और इसी लिए मैं उसे घर भेज रही हु की वो ये बात अपने घर जा कर अपने पति को बता आये और अपने कुछ कपडे ले कर रात 8 बजे तक यहाँ आ जाये. मेरी इस बात से hi उसके चेहरे का शक वाला भाव मिटा था. उसके जाने के बाद मैंने बाहर वाला गेट बंद किया और फिर तुम्हारे पास आ गयी. मैं चाहती थी की मैं तुम्हारे साथ कुछ देर अच्छे से टाइम बिता लू. फिर तो तुम चले hi जाओगे." दक्षिणा ने ये सब कहा तो मैंने कहा.

"अब उसके शक करने से भी क्या होगा डिअर.? हम तो वैसे भी नया घर ले चुके हैं. नयी जगह पर हम कोई दूसरी माइड रख लगे." मैंने ये कहा तो दक्षिणा ने कहा.

"वो तो ठीक है मगर जब तक हम यहाँ हैं तब तक तो किसी को पता न hi चले हमारे बारे में तो बेहतर है न जान. वर्ण बाद में लोग हमारे बारे में गलत hi सोचा करेंगे. कभी अगर इस तरफ आना हुआ और यहाँ के जान पहचान वाले लोगो से मुलाकात हुयी तो वो हमसे इस बारे में पूछ भी सकते हैं. इस लिए मैं चाहती हु की हमारे बारे में बाद में भी लोग गलत न सोचे." दक्षिणा ने ये कहा तो मैंने कहा.

"हाँ ये भी ठीक कहा तुमने." मैंने ऐसा कहा तो दक्षिणा ने ऊपर खिसक कर मेरे होठो पर अपने होठ रख दिए और बड़े आराम से चूमने चूसने लगी.

मैं समझ गया की अब बातो वाला काम पूरा हो चूका है और अब प्यार वाला काम फिर से शुरू हो गया है. हम दोनों पूरी तरह नंगे hi थे. दक्षिणा की बड़ी बड़ी ठोस छतिया मेरे नंगे जिसम पर बुरी तरह चुभ रही थी. मैंने एक हाथ से उसकी एक छाती को मुट्ठी में पकड़ कर मसलना शुरू कर दिया. दूसरे हाथ से मैं उसकी फूली हुयी मस्त गांड को कास कास के मसलने लगा. दक्षिणा की सिसकिया निकलने लगी.

कुछ hi देर में माहौल गरम हो गया. दक्षिणा मेरे सेमि ेररेक्ट लुंड को एक हाथ से पकड़ कर सहलाने लगी. कुछ देर हमने एक दूसरे के होठो को चूमा उसके बाद दक्षिणा नीचे की तरफ चली गयी और मेरे लुंड को पकड़ कर ऊपर नीचे करते हुए उसे मुँह में ले लिया. उसके मुँह की गर्मी का अहसास पते hi मेरे लुंड में करंट सा दौड़ गया और वो कुछ hi पालो में अपनी पूरी औकात पर आ गया.

मेरा लुंड मेरी तरह hi गोरा था. शुरू शुरू में दक्षिणा ने इसे देख कर कहा था की ये तो इंग्लिश ब्लू फिमो की तरह गोरा है. उसे मेरा गोरा लुंड बहुत पसंद आया था. मेरा लुंड मेरी पर्सनल्टी के हिसाब से बड़ा hi था और मोटा भी. दक्षिणा ने काफी देर तक उसे अपने मुँह में ले कर उसे चूसा फिर उसे मुँह से निकाल दिया. मैं तो मज़े के सातवे आसमान में था.

दक्षिणा ने उठ कर अपनी दोनों टांगो को मेरे दोनों तरफ किया और मेरी तरफ मुँह करते हुए उसने एक हाथ से मेरे खड़े लुंड को पकड़ा और उसे अपनी छूट में सेट करके लुंड पर बैठती चली गयी. मेरा लुंड दक्षिणा की गरमा गरम छूट में अंदर तक समां गया. दक्षिणा की छूट के अंदर जैसे कोई भट्ठी सी जल रही थी. लुंड के पूरा अंदर जाने के बाद दक्षिणा कुछ देर रुकी और फिर उसने अपने दोनों हाथो को मेरे सीने पर जमा लिया. उसके बाद उसने अपनी कमर को पहले धीरे धीरे ऊपर नीचे किया उसके बाद उसकी स्पीड बढ़ने लगी.

कुछ hi देर में दक्षिणा एक रिदम में अपनी छूट को ज़ोर ज़ोर से मेरे लुंड पर पटकने लगी. उसकी बड़ी बड़ी छतिया हिले जा रही थी. उसके खुले हुए बाल आगे की तरफ आ गए थे. मैं मज़े से आँखे बंद किये लेता था. उधर दक्षिणा नॉन स्टॉप अपनी गांड को पटके जा रही थी. उसके मुँह से तेज़ तेज़ ाहः और सिसकिया निकलने लगी थी. पूरा कमरा उसकी चीखो में गूंजने लगा. काफी देर तक दक्षिणा बिना रुके अपनी गांड को मेरे लुंड पर पटकती रही. जब वो थक गयी तो मेरे ऊपर hi लेट गयी और लम्बी लम्बी साँसे लेने लगी.

कुछ देर बाद मैंने उसे नीचे लेटाया और उसकी दोनों टांगो को अपने कंधे पर रख कर उसकी गीली छूट में अपने लुंड को एक झटके से अंदर तक दाल दिया. मेरे ऐसा करते hi दक्षिणा की ाःह निकल गयी. उसने अपने दोनों हाथो से अपनी दोनों छतियो को पकड़ कर मसलने लगी. उसका गोरा चेरा लाल सुर्ख पद गया था.

दक्षिणा की छूट में अंदर तक लुंड उतारने के बाद मैं ज़ोर ज़ोर से अपनी कमर हिलने लगा. मेरे हर धक्के से थाप थाप की आवाज़ आने लगी. मेरे तेज़ तेज़ धक्को से दक्षिणा की आवाज़े मज़े से और तेज़ हो गयी. वो ज़ोर ज़ोर से मुझे तेज़ धक्के लगाने को बोलने लगी और ये भी की आह्ह्ह्ह जान बहुत मज़ा आ रहा hai....aise hi ज़ोर ज़ोर से छोड़ो mujhe....faad डालो मेरी छूट को.

कुछ देर बाद मैंने अपने कंधे से उसकी टांगो को अलग कर दोनों तरफ फैला दिया और फिर झुक कर दक्षिणा की एक छाती के निप्पल को मुँह में भर लिया और दूसरी को एक हाथ से बुरी तरह मसलने लगा. दक्षिणा मेरे सर के बालो को पकड़ कर अपनी छाती पर दबाने लगी. उसके मुख से मज़े में डूबी आहे निकल रही थी और जाने क्या क्या बड़बड़ाये जा रही थी.

कुछ देर इसी पोजीशन में धक्के लगाने के बाद मैंने दक्षिणा की छूट से अपना लुंड निकाल लिया और दक्षिणा को कुटिया बनने को कहा. मेरे बोलते hi दक्षिणा जल्दी से उठ कर कुटिया बन गयी. उसके कुटिया बनते hi मैंने लुंड को पकड़ कर उसकी छूट पर सेट करके एक hi बार में पूरा अंदर तक दाल दिया जिससे दक्षिणा की कराह निकल गयी. मैंने दक्षिणा की कमर को दोनों हाथ से पकड़ा और तेज़ तेज़ धक्के लगाने लगा.

कुछ देर बाद मैं थोड़ा झुका और दक्षिणा की दोनों छतियो को पकड़ कर मसलते हुए धक्के लगाने लगा. दक्षिणा खुद भी मेरे लुंड पर अपनी गांड को पीछे की तरफ तेल रही थी. कुछ देर बाद मैंने उसकी छतियो को छोड़ा और लुंड को उसकी छूट से निकाल कर उसकी गांड के छेड़ में सेट किया और उसकी गांड के छेड़ पर लुंड का दबाव बनाते हुए थोड़े hi वक्त में उसकी गांड में अपना लुंड उतार दिया. लुंड तो छूट रास से गीला hi था इस लिए आराम से उसकी गांड में उतर गया था. बस फर्क ये था की छूट के मुकाबले गांड में तिघटनेस थोड़ा ज़्यादा थी.

मैंने दक्षिणा का सर बीएड में टिका दिया था और उसकी गांड को थोड़ा ऊपर की तरफ उठा दिया. इस पोजीशन में अच्छे से मेरा लुंड उसकी गांड में अंदर बाहर हो रहा था. दक्षिणा की गांड में लुंड उतारने के बाद मैं तेज़ तेज़ धक्के लगाने लगा जिससे दक्षिणा की ाही अब चीखो में बदल गयी थी. ये चीखे दर्द वाली नहीं थी बल्कि वो मज़े से चीख रही थी. दक्षिणा में एक यही बात थी की वो सेक्स करते वक्त आवाज़ बहुत निकलती थी और जाने क्या क्या बोलती रहती थी. उसके बोलने से मुझे जोश आता था और मैंने और भी तेज़ तेज़ धक्के लगाने लगता था. मैं सेक्स करते वक्त बोलता नहीं था. बोलता तभी था जब सेक्स करते वक्त दक्षिणा मुझसे कोई बात पूछती थी वर्ण मैं चुप चाप धक्के लगाने में hi बिजी रहता था.

मैं पूरी ताकत से धक्के लगा रहा था. मेरा लुंड पहले तो थोड़ा टाइट जा रहा था मगर अब आराम से जा रहा था. बीएड पर औंधे मुँह पड़ी दक्षिणा अपने एक हाथ से अपनी छूट को बुरी तरह मसाले जा रही थी.

कुछ देर बाद मैंने पोजीशन चेंज करने का सोचा और अपने लुंड को दक्षिणा की छूट से निकाल कर उसे सीधा लेता कर मैं भी उसके बगल से लेट गया. बगल से लेटने के बाद मैंने दक्षिणा की एक टांग को पकड़ कर ऊपर उठाया और पीछे से अपने लुंड को पकड़ कर उसकी गांड में ठूस दिया और फर ज़ोर ज़ोर से कमर को हिलने लगा. थोड़ी hi देर में पोजीशन अपने आप hi थोड़ा सा चेंज हुयी. यानी दक्षिणा ने थोड़ा सा करवट ले लिया था. मैं उसके पीछे hi लेता उसकी गांड मार रहा था. दक्षिणा ने अपने चेहरे को पीछे मेरी तरफ किया तो मैंने उसके होठो को चूमना शुरू कर दिया.

कुछ देर इसी पोजीशन में दक्षिणा को छोड़ने के बाद मैंने लुंड को उसकी गांड से निकला और सीधा लेट कर दक्षिणा को अपनी तरफ मुँह करके लुंड पर बैठने को कहा तो दक्षिणा ने वैसा hi किया. जब वो मेरे लुंड पर मेरी तरफ मुँह करके बैठ गयी तो मैं नीचे से कमर को ऊपर की तरफ ज़ोर ज़ोर से उछलने लगा. मेरे ऐसा करते hi दक्षिणा जो बिना सहारा लिए मेरे लुंड पर बैठी थी वो एकदम से मेरे ऊपर गिरने hi वाली थी की उसने जल्दी से मेरे सीने में अपने दोनों हाथ रख लिए.

मैं अपनी कमर को तेज़ तेज़ ऊपर नीचे कर रहा था. मेरा लुंड सटासट दक्षिणा की छूट में अंदर बाहर हो रहा था. दक्षिणा पूरी मस्ती में चीखे जा रही थी. मैंने दक्षिणा को अपने ऊपर झुका लिया और उसकी पीठ को दोनों हाथो से कास कर और तेज़ कमर को उछालने लगा. मैंने महसूस किया की मेरी रंगो में दौड़ता खून बड़ी तेज़ी से मेरे अंडकोषों की तरफ भागते हुए आने लगा है. दक्षिणा की चीखे भी तेज़ हो गयी थी.

"आअह्हह्ह्ह्ह मैंनं गयी jaan....uffff मैं उड़ रही हु मेरे राजा. मुझे और तेज़ chodo.....aaahhh ssshshshhssh.....main आ रही हूउउ jaannn.....aur रेज़ और रेज़ छोड़ो mujhe.....aaahhhhh फाड़ डालो इस छूट को. ये मुझे बहुत तड़पती है jaaaann...uffff मैं gayiiiiiiiiiiii जाआनंनं...." दक्षिणा के जिसम को तेज़ तेज़ झटके लगने लगे. वो ज़ोर ज़ोर से चीखने लगी थी.

काम तो मेरा भी तमाम होने वाला था. मैं भी आसमानो में hi उड़ रहा था. मैं पूरी ताकत से धक्के लगा रहा था. दक्षिणा झाड़ चुकी थी और अब वो बेजान सी मेरे ऊपर गिरी हुयी थी. मेरी स्पीड से उसे पता चल रहा था शायद की मैं भी झड़ने वाला हु. उसमे जान तो नहीं थी मगर उसने मेरे कान के पास पूरी ताकत लगा कर कहा.

"Jaaaan....mujhe भी tumhara.....amrit पीना hai....plz...jaan....mujhe भी पीना है." दक्षिणा की ये बात जैसे hi मुझे कानो में सुनाई दी मैं एकदम से रुक गया. मैं अपने एन्ड पर hi था. मैंने बड़ी मुश्किल से खुद को रोका था. वर्ण इस वक्त जिस मज़े की इन्तहा में मैं था वह रुकना बहुत hi मुश्किल था. मगर दक्षिणा की बात ने मुझ पर असर किया था.

मैंने जल्दी से उसकी छूट से अपना लुंड निकला और अपने ऊपर से दक्षिणा को ताकत लगा कर हटाया. दक्षिणा बीएड पर सीढ़ी लेट गयी थी. उसकी आँखे बंद थी. वो अभी भी झड़ने वाले मज़े में डूबी थी.

"उठो dear....agar अमृत पीना है तो उठ कर बैठ जाओ. मैं रुक नहीं सकता अब." मैंने तेज़ आवाज़ में कहा तो दक्षिणा ने आँखे खोल कर मेरी तरफ देखा. मैंने फिर से अपनी बात दोहराई तो दक्षिणा को जैसे होश आया. उसने जल्दी से उठने की कोशिश की मगर जल्दी उठ न पायी. वो बुरी तरह थकी हुयी लग रही थी.

"जान मुझसे उठा नहीं जा raha...plz ऐसे hi पीला दो मुझे अपना अमृत." दक्षिणा ने कहा तो मैं उसकी छाती पर आ गया. मैंने दक्षिणा का हाथ अपने लुंड पर रखा और कहा की वो मुट्ठ लगाए. दक्षिणा ने ऐसा hi किया. उसमे अब थोड़ी थोड़ी जान आ गयी थी. उसने मेरे तन्नाए हुए लुंड को अपनी नाज़ुक सी मुट्ठी में लिया और उसे ऊपर नीचे करने लगी. मगर मुझे मज़ा नहीं आया तो मैंने उसका हाथ हटा कर खुद hi अपने लुंड को पकड़ा और ज़ोर ज़ोर से मुट्ठ लगाने लगा.

थोड़ी hi देर में मुझे लगने लगा की अब मैं झड़ने वाला हु. मैंने दक्षिणा को मुँह खोलने के लिए कहा तो दक्षिणा ने जल्दी से मुँह खोल लिया. वो मुझे hi देख रही थी. मुझे ये अजीब तो लगा मगर मैं उस वक्त ज़्यादा सोचना नहीं चाहता था. तभी मुझे एकदम से ऐसा लगा जैसे मैं मज़े के सातवे आसमान में पहुंच गया हु और फिर मेरे मुँह से सिसकी निकल गयी. मेरे जिसम को बड़ा तेज़ झटका लगा और फर झटके लगते hi चले गए.

मुझे लगा मेरी जान hi निकल गयी है. मेरे लुंड से जैसे hi पिचकारी छूटने वाली हुयी तो मैंने लुंड को दक्षिणा के मुँह में दाल दिया था और फिर मुझे याद नहीं की मेरा लुंड दक्षिणा के मुँह में कूटना अंदर तक चला गया था. जब मेरी साडी जान निकल गयी तो मैं एक तरफ को लुढ़क गया. मेरा लुंड दक्षिणा के मुँह से निकल गया था. मुझे ये देखने का होश नहीं था की दक्षिणा के मुँह में मेरा अमृत कैसा दिख रहा था.

काफी देर तक मैं आँखे बंद किये हफ्ता पड़ा रहा फिर जब मुझे कुछ राहत महसूस हुयी तो मैंने आँखे खोल कर दक्षिणा की तरफ देखा तो वो मुझे hi देख रही थी. उसके होठो पर मुस्कान थी.

"थैंक्स jaan....aaj सच में मुझे बहुत अच्छा लगा. ख़ास कर तुम्हारा अमृत पि कर. मैं बता नहीं सकती की मुझे तुम्हारा अमृत कितना मीठा लगा. इसके पहले जो जान निकल गयी थी अब अमृत पिने के बाद ऐसा लग रहा है जैसे एक नयी जान आ गयी है मुझ में." दक्षिणा ने ऐसा कहा तो मैं बस मुस्कुरा कर रहा गया.

"आज सच में तुम्हारा इतना गहरा प्यार प् कर मैं तृप्त महसूस कर रही हु. शायद ये तृप्ति तुम्हारे आने तक यु hi बने रहे." दक्षिणा ने कहा तो मैंने कहा.

"चलो अच्छी बात है मैं भी थोड़ा बेफिक्र रहुगा." मैंने मुस्कुराते हुए कहा तो दक्षिणा भी मुस्कुरायी.

"आज बहुत थक गयी हु जान. आज तो आगे पीछे दोनों जगह प्यार की बरसात हुयी है." दक्षिणा ने मुस्कुराते हुए ये कहा तो मैं कुछ न बोलै.

"तुम खुश तो हो न जान.? कही तुम्हे ऐसा तो नहीं लग रहा की मैंने तुम्हे इसके लिए मजबूर किया है.?" दक्षिणा ने बड़ी मासूमियत से ये कहा तो मैंने न में सर हिला दिया और उसके होठो को चूम लिया. उसके बाद हमारे बीच थोड़ी देर बाते हुयी. फिर हम दोनों hi फ्रेश होने चले गए.

मैंने दक्षिणा को मेरी पैकिंग करने के लिए कह दिया था. फ्रेश होने के बाद दक्षिणा ने मेरी पैकिंग की. उसने पैकिंग में दो दो बड़े बैग सजाये थे. जब मैंने देखा तो हैरान रह गया. मैंने पूछा दो bag's में क्या क्या भर दिया है तो उसने बताया ज़्यादा कुछ नहीं है बस ज़रूरी सामान hi है. मैंने कहा मैं ये सब कुछ नहीं ले जाउगा. मैं बस अपने एक दो जोड़ी कपडे ले जाउगा और कुछ नहीं.

मेरी इस बात से दक्षिणा ने मुझे घूर कर देखा और फिर साफ़ साफ़ हुकुम सा दे दिया मुझे की मैं ये दोनों बैग साथ ले कर hi जाउगा ये उसका हुकुम है. मैंने बहुत कहा मगर दक्षिणा न मानी. हार कर मुझे hi उसकी बात माननी पड़ी.

शाम हो चुकी थी और शाम के 7 बज चुके थे. हज़रात निजामुद्दीन से मेरी ट्रैन 9 बजे की थी. दक्षिणा ने कहा की वो मुझे स्टेशन तक छोड़ने जाएगी मगर मैंने साफ़ मन कर दिया. मैं नहीं चाहता था की रात में वापस आते वक्त वो अकेली रहे. दिल्ली शहर में क्राइम बहुत होता है. किसी का कोई भरोसा नहीं था. मैंने समझाया तो इस बार मेरी बात दक्षिणा को भी माननी पड़ी. मैंने उससे कह दिया की मैं टैक्सी में चला जाउगा.

मैंने एक कैब को बुक भी कर दिया था जो कुछ देर में आने वाला था. जैसे जैसे मेरे जाने का टाइम हो रहा था दक्षिणा के चेहरे की चमक बुझती जा रही थी. वो अपने आपको बहुत सम्हाल रही थी मगर वो अपने दिल को समझा नहीं प् रही थी. उसका खूबसूरत चेहरा एकदम से मुरझाया हुआ दिखने लगा था. मुझे उसको देख कर तरस और प्यार दोनों आ रहा था. मैं जनता था की दक्षिणा मेरे प्यार में बहुत आगे तक बढ़ चुकी है. अब अगर मैं उसके इतने गहरे प्यार का सम्मान भी न करू तो मुझसे बेगैरत इंसान शायद hi दुनिया में कोई होगा.

माइड को आठ बजे आना था. इस वक्त मैं और दक्षिणा मेरे कमरे में hi बीएड पर बैठे थे. वो कुछ बोल नहीं रही थी. उसके चेहरे से लग रहा था की वो अपनी रुलाई को बड़ी मुश्किल से दबाये हुए है. मैं उसकी हालत को अच्छी तरह समझ सकता था मगर मैं तो बस उसे हिम्मत hi बढ़ा सकता था. उसके लिए इस वक्त यहाँ रुक नहीं सकता था ये बात वो भी जानती थी और उसने मुझे रुकने के लिए बोलै भी नहीं था. उसे भी पता था की मेरा जाना बहुत ज़रूरी है.

"ऐसे मुँह लटका के मत बैठो डिअर. तुम्हे इस तरह उदास या दुखी करके मैं कही नहीं जा सकता. मैं चाहता हु की जब मैं यहाँ से जाओ तो तुम्हारे चेहरे पर ख़ुशी की चमक हो और तुम्हारे इन खूबसूरत होठो पर मन को मुग्ध कर देने वाली मुस्कान." मैंने ऐसा कहा तो दक्षिणा की आँखे छलक पड़ी. उसने आँशु भरी आँखों से मेरी तरफ देखा.

दक्षिणा एकदम से मुझसे लिपट गयी और फिर बुरी तरह मुझसे लिपट कर रोने लगी. मैंने उसे अपने सीने से लगा लिया. मुझे उसके लिए दुःख हो रहा था. वो सच में किसी प्रेमिका की तरह बर्ताव कर रही थी और रो रही थी.

"ये क्या है यार.? अगर तुम ऐसे रोगी तो मैं कैसे यहाँ से जा पाउगा.?" मैंने ऐसा कहा तो दक्षिणा ने रट हुए कहा.

"मैं क्या करू जान.? मैंने बहुत कोशिश की के मैं इस तरह तुम्हारे जाने से न रौ मगर मैं खुद को नहीं सम्हाल प् रही. मैं तुम्हे रुकने के लिए नहीं कह सकती क्यों की मैं अच्छी तरह जानती हु की तुम्हारा जाना बहुत ज़रूरी है. मैं बस ये कहना चाहती हु की तुम ख़ुशी ख़ुशी अपने घर जाओ मगर वापस लौट के ज़रूर आना. मुझे इस दुनिया में ाजेले न छोड़ देना मेरे राजा वर्ण मैं एक पल के लिए भी जी नहीं पाओगी. तुम्हारी ये प्रेम की दीवानी तुम्हारे बिना मर जाएगी." दक्षिणा बुरी तरह ये सब कहते हुए रो रही थी. मुझे अहसास था की वो मुझे कितना प्यार करती है मगर मैं भला क्या कर सकता था इस वक्त.?

मैंने बड़ी मुश्किल से उसे सम्हाला और समझाया भी. मैंने उससे प्रॉमिस किया की मैं उसे इस दुनिया में अकेला नहीं छोड़ूगा. मैं डेली उसे फ़ोन करुगा और उसका हाल चाल पूछुंगा. जब मेरे घर की सिचुएशन ठीक हो जाएगी तो मैं वापस उसके पास आ जाउगा. ये सब समझा कर मैंने दक्षिणा को शांत किया.

तभी मेरे मोबाइल पर कैब वाले का कॉल आया की वो घर के बाहर आ गया है. मैंने मोबाइल रख कर दक्षिणा को बताया की कैब आ गयी है और अब मुझे जाना होगा. मेरी इस बात से दक्षिणा ने मुझे नाम आँखों से देखा और फिर मेरे होठो पर झुक गयी. उसने बहुत प्यार से मेरे होठो को चूमा छठा और चूसा भी. जब उसका मन भर गया तो वो मुझसे अलग हो गयी.

हम दोनों hi बीएड से नीचे उतरे. वो मुझे hi देख रही थी. इस वक्त वो 47 साल की औरत नहीं बल्कि एक छोटी सी और मासूम सी बच्ची लग रही थी. उसे इस तरह देख कर मेरा कलेजा हिल सा गया. मैंने आगे बढ़ कर उसे अपने सीने से लगा लिया. मुझे पहली बार ऐसा लगा जैसे उसके लिए मेरे दिल में भी कुछ है. कुछ देर उसे सीने से लगाए रखा और फिर उसे अलग करके मैंने उसकी आँखों में देखा. उसकी आँखों में अब भी आँशु थे. मैंने उसका चेहरा पकड़ कर उसके माथे पर हलके से chuma...fir उसकी उन आँशु भरी आँखों को और फिर उसके थरथरा रहे सुर्ख होठो को.

मेरा मन भी बहुत भरी भरी सा लगने लगा था. मैं कमरे से बाहर आया और ड्रिंग रूम में रखे अपने दोनों bag's को उठा कर बाहर की तरफ चला गया. मैं गेट खोल कर बाहर आया तो देखा बाहर hi सड़क पर कैब कड़ी थी. मुझे देखते hi कैब का ड्राइवर कैब का ड्राइविंग दूर खोल कर मेरे पास आया और मेरे हाथ से दोनों बैग ले कर कैब के पास गया और कैब की पिछली शीट पर उसने उन दोनों बैग को रख कर गेट बंद कर दिया.

"भाई बस पांच मिनट रुको मैं अभी आया." मैंने कैब वाले से कहा और पलट कर घर के अंदर आ गया. मैं जैसे hi अंदर की तरफ आया तो देखा दक्षिणा बाहर की तरफ hi आ रही थी मगर जब मुझ पर उसकी नज़र पड़ी तो वो वही रुक गयी.

"अपना ख्याल रखना डिअर. अकेले कही भी बाहर मत जाना. किसी चीज़ की ज़रूरत हो तो माइड से मंगवा लेना. मैं कोशिश करुगा की जल्द hi वापस आ जाओ और अगर जल्द वापस न आ पाउ तो फ़िक्र मत करना. मुझ पर भरोसा rakhna...main वापस ज़रूर आउगा. और हाँ उस एजेंट को फ़ोन करके बता देना की नए घर के पैसो का लें दें वाला मामला कुछ टाइम के लिए स्टे कर दे. अब चलो मुझे अपनी मन मोहक मुस्कान दिखा कर विदा करो. जिससे मेरे मन में कोई टेंशन न रह जाये." मैंने ऐसा कहा तो दक्षिणा एक बार फिर मुझसे कास के लिपट गयी.

"तुम भी अपना ख़याल रखना जान और अपनी फॅमिली का भी." दक्षिणा ने मुझसे अलग हो कर कहा तो मैंने झुक कर उसके होठो को हलके से चूम लिया. मेरे ऐसा करने पर वो मुस्कुरा उठी. सच में उसकी मुस्कान बहुत प्यारी लगी मुझे. मेरा मन खुश हो गया और फिर मैं पलट कर बाहर आ गया. मेरे पीछे पीछे दक्षिणा भी आ गयी थी.

जब मैं बाहर आया तो देखा कैब वाले ने कैब को वापस मोड़ लिया था. मैं जा कर कैब में ड्राइवर के बगल वाली शीट पर बैठ गया और शीट बेल्ट लगा लिया. उसके बाद मैंने घर के दरवाजे की तरफ देखा तो मुझे दरवाजे पर दक्षिणा कड़ी हुयी दिखी. वो नाम आँखों से मुझे देख रही थी. मैंने उसे हाथ हिला कर bye किया तो उसने भी फीकी मुस्कान के साथ bye किया.

मेरे कहने पर कैब वाले ने कैब को स्टार्ट करके आगे बढ़ा दिया. इस घर में मैं पांच साल से रह रहा था और आज पांच साल बाद यहाँ से अपने गांव के लिए निकल रहा था. इस घर से एक लगाव सा हो गया था जो मुझे अब महसूस हो रहा था. दक्षिणा और उसकी बेटी किरण मेरी लाइफ में शामिल थी. इन दोनों माँ बेटी ने मुझे अपना सब कुछ ख़ुशी ख़ुशी दे दिया था. दक्षिणा तो मुझे अपना सब कुछ मानती थी. मैं उसकी जैसे ज़िन्दगी बन गया था. उसकी हर ख़ुशी मुझसे थी. उसका जीना मरना मुझसे था.

सरे रास्ते मैं दक्षिणा के बारे में सोचता रहा. मैं समझ नहीं पाया की दक्षिणा हकीकत में क्या चीज़ थी. मैंने सुना था की औरत का रहस्य कोई नहीं समझ सकता यहाँ तक की भगवन भी नहीं. औरत तो वो है जो चाहे तो महानता की हर सीमा पार कर जाये और चाहे तो इतना गिर भी जाये जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते. मैं सोच रहा था की दक्षिणा में कौन सी बात थी.? क्या वो महानता की हर सीमा से बाहर जा चुकी थी या फिर वो इतना गिर चुकी थी जिसका मैं अंदाज़ा भी नहीं लगा प् रहा था.? मगर मेरा दिल मेरी आत्मा चीख चीख कर कह रही थी की दक्षिणा गिरी नहीं थी बल्कि उसने तो महानता की हर सीमा को पार कर लिया था.

हज़रात निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन पहुंचते पहुंचते 8:45पं हो गए थे. कैब से मैं उतरा तो कैब के ड्राइवर ने मेरा सामान पिछली शीट से बाहर निकल कर रखा. मैंने कैब वाले को उसके पैसे दिए तो उसने पैसे गईं कर उन्हें अपनी पॉकेट में डाला और फिर कैब में बैठ कर वह से चला गया. उसके जाने के बाद मैंने अपने दोनों bag's उठाये और प्लेटफार्म की तरफ जाने के लिए चल दिया.

थोड़ी hi दूर में ऊपर जाने के लिए सीढिया दिखी तो मैं दोनों हाथो में बैग लिए सीढिया चढ़ने लगा. हज़रात निजामुद्दीन में काफी भीड़ होती थी. ऊपर आया तो देखा सामान चेक करने की मशीन राखी थी और उसके आस पास पुलिस वाले भी खड़े थे. मैंने अपने दोनों बैग उस मशीन में रख दिया. फिर पोल्ल से आगे पढ़ा तो एक पुलिस वाले ने मुझे मशीन लगा कर चेक किया. चेकिंग से निपट कर मैंने अपने दोनों बैग लिए और फिर ऊपर से hi चलता हुआ प्लेटफार्म नंबर पांच की तरफ जाने के लिए सीढ़ियों से नीचे उतर गया.

कुछ hi देर में मैं प्लेटफॉर्म में पहुंच गया. ट्रैन ट्रैक पर hi कड़ी हुयी थी. मैं जल्दी से अपने कोच की तरफ बढ़ा और फिर डिब्बे में चढ़ कर अपनी शीट के पास आ गया. दोनों बैग को शीट के नीचे ठिकाने लगाने के बाद मैं आराम से शीट पर बैठ गया. मैंने टाइम देखा तो पता चला की बस दो मिनट बाद ट्रैन चलने hi वाली थी. मैं सही टाइम पर आ गया था.

दो मिनट बाद ट्रैन चल पड़ी तो एक बार के लिए मेरा दिल धक् से रह गया. मुझे ख़याल आया की दक्षिणा को फ़ोन करके बता दू की मैं ट्रैन में बैठ चूका हु और ट्रैन स्टेशन से चल पड़ी है. ये ख़याल आते hi मैंने मोबाइल निकला और दक्षिणा को कॉल लगा दिया. तीसरी रिंग पर दक्षिणा ने कॉल पिक किया तो मैंने उसे बताया की मैं ट्रैन में अपनी शीट पर बैठा हु. मेरी बात सुनते hi दक्षिणा नार्मल तरीके से बोली ठीक है अपना ख़याल रखना.

शायद माइड आ चुकी थी इस लिए दक्षिणा ने मुझसे ऐसे बात की थी. दो मिनट बात करने के बाद मैंने कॉल डिसकनेक्ट की और आराम से शीट पर बैठ गया. मेरी आँखों के सामने बार बार दक्षिणा का वो मासूम चेहरा आ रहा था. उसके चेहरे की वो उदासी और उसकी वो नाम आँखे. उसका रट हुए वो सब कहना मुझे सब कुछ जैसे कानो में सुनाई दे रहा था अभी भी.

दक्षिणा से दूर आ कर मुझे अहसास हुआ की मुझे दक्षिणा से कही न कही लगाव हो गया था या फिर मुझे उसकी आदत हो गयी थी. मैं उससे प्यार नहीं करता था ये मुझे अच्छी तरह पता था. क्यों की प्यार वाली फीलिंग्स से मैं अनजान नहीं था. अगर मुझे दक्षिणा से प्यार होता तो मुझे वो महसूस ज़रूर होता. दक्षिणा का नेचर मुझे अच्छा लगता tha...uska मेरी केयर करना अच्छा लगता था. वो अकेले में मेरी बीवी जैसा बेहवे करती थी वो भी मुझे अच्छा लगता था. उसकी खूबसूरती उसका रंग रूप सब कुछ अच्छा लगता था. मगर इस सब के बावजूद मुझे उससे वैसा प्यार नहीं था जैसा प्यार दक्षिणा मुझसे करती थी.

इधर के 3 सालो से मैं दक्षिणा के बहुत करीब आ गया था. इन 3 सालो में इतना करीब रहने के बाद भी मुझे दक्षिणा से मोहब्बत न हुयी थी. दक्षिणा में कोई भी कमी नहीं थी. बस उसकी आगे का फाल्ट था जो मेरी माँ की उम्र से भी ज़्यादा थी. मैं सोचा करता था की जितनी मोहब्बत दक्षिणा मुझसे करती है उसका असर तो अब तक मुझ पर हो hi जाना चाहिए था जिससे मुझे भी उससे मोहब्बत हो जाती. मगर ऐसा नहीं हुआ tha...iski वजह ये थी की मेरे दिल में पहले से hi कोई समाया हुआ था जिसे मैं बेपनाह मोहब्बत करता था.

ट्रैन अपनी स्पीड से ट्रैक पर दौड़ रही थी और मेरा मन भी उसी स्पीड में दौड़ रहा था. मैं बहुत देर तक दक्षिणा के बारे में सोचता रहा. फिर एकदम से मेरा ध्यान मेरी फॅमिली की तरफ चला गया. मेरी आँखों के सामने मेरी फॅमिली के हर पर्सन का चेहरा एक एक कर के चमक उठा. कुसुम दीदी का चेहरा दिखा तो मेरे अंदर एक हलचल सी मच गयी. मुझे याद आया की मैंने उन्हें मैसेज भेजा था. ये याद आते hi मैंने अपनी पॉकेट से मोबाइल निकला और फेसबुक के इनबॉक्स को ओपन किया. मगर उसमे कुसुम दीदी का अब तक कोई मैसेज नहीं आया था. ये देख कर मैं मायूस हो गया.

मेरे मन में बार बार ये बात आ रही थी की इतनी गंभीर सिचुएशन में भी दीदी ने रिप्लाई क्यों नहीं किया.? उन्होंने मेरे मैसेज को क्यों नहीं देखा.? क्या घर में वो इतना बिजी थी की मोबाइल में फेसबुक देखने का भी उन्हें टाइम नहीं मिल रहा था या फिर कोई दूसरी बात थी.? मुझे समझ नहीं आ रहा था की आखिर दीदी के मैसेज न देखने की वजह क्या थी.

ट्रैन में अपनी शीट पर बैठा मैं फिर से अपनी पांच साल पहले की ज़िन्दगी के बारे में सोचने लगा था. पांच साल पहले की घटनाओ का एक एक सन मेरी आँखों के सामने घूमने लगा था और मैं उस एक एक सन में डूबता चला जा रहा था.....

भाई लोग....

आज के लिए इतना hi....

रीड एन्जॉय & गिव योर फीडबैक....

कीप सपोर्टिंग & स्टे विथ....

:थैंक्यू:
 
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