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सब कुछ जायज़ है....
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अपने कमरे में बीएड पर लेता मैं आज के सरे दिन के बारे में सोच रहा था. रेखा चची काफी हसमुख स्वभाव की थी और मस्त मालदार औरत भी थी. उनका जिसम मस्त कैसा हुआ था. मुझे सबसे ज़्यादा उनकी बड़ी बड़ी चूचिया अच्छी लगी थी. जब वो मेरे पास hi बैठ गयी थी तो मेरी नज़र बार बार ब्लॉउज को फाड़ कर बाहर निकलने को आतुर उनकी छाहतियो पर पद जाती थी. चची ने ज़रूर महसूस किया होगा की मैं उनकी छतियो को देख लेता था.
रात काफी हो गयी मगर आज प्रिय पूजा मेरे कमरे में सोने के लिए नहीं आयी. मैं समझ गया की वो दोनों आज शाम को हुए इंसिडेंट से मेरे सामने आने से कटरा रही हैं. मैं उन दोनों से कल सुबह बात करने का सोचते हुए सो गया.
अब आगे पढ़िए....
सुबह मैं अपने टाइम पर उठा और नीचे बाथरूम में फ्रेश होने के लिए चला गया. फ्रेश हो कर वापस आया तो मेरी नज़र रसोई की तरफ गयी तो देखा वह लाइट जल रही थी. मैं समझ गया की दीदी रसोई में चाय बना रही हैं. मैं रसोई की तरफ बढ़ गया. थोड़ी hi देर में मैं रसोई के दरवाजे पर पहुंच गया. मेरे आने की आहात से दीदी ने पलट कर मेरी तरफ देखा.
"तुम यहाँ क्या कर रहे हो विक्की.?" दीदी ने ये कहा तो मुझे अजीब सा लगा. फिर मैंने कहा.
"ये कैसा सवाल है दीदी.? क्या मैं यहाँ नहीं आ सकता.?" मैंने थोड़ा दुखी हो के ये कहा तो दीदी ने कहा.
"हाँ आ सकते ho...magar." दीदी ने ये कहा तो मैंने कहा.
"फ़िक्र मत कीजिये दीदी. अगर आपको मेरे आने से किसी तरह की तकलीफ होती है तो आज के बाद अब कभी नहीं आउगा और ये मेरा वडा है आपसे. मैंने जब देखा की रसोई में आप चाय बना रही हैं तो बस चाय के लिए hi आ गया था यहाँ. मगर कोई बात नहीं." मैंने बड़ी मुश्किल से इतना कहा और पलट कर वापस चल दिया अपने कमरे की तरफ. मेरा दिल बुरी तरह दुःख गया था. मुझे रोना आने लगा था. मैंने दीदी का कोई जवाब सुने बिना hi अपने कमरे की तरफ चला आया था.
कमरे में आ कर मैं बीएड पर लेट गया. मुझे बहुत तेज़ रोना आ रहा था मगर मैं रोना नहीं चाहता था. इस लिए अपने आपको मजबूती से सम्हाला और आँखे बंद किये लेता रहा. थोड़ी hi देर में कमरे का दरवाजा खुला तो मैंने आँखे खोल कर देखा तो दीदी हाथ में ट्रे लिए दरवाजे के पास कड़ी थी. उनकी आँखों में आँशु साफ़ दिख रहे थे. वो कमरे के अंदर नहीं आयी बस दरवाजे पर hi ट्रे लिए कड़ी रही. मैं भी बीएड से नहीं उठा और फिर से अपनी आँखे बंद कर ली.
तभी मैंने दीदी के कदमो की आहात सुनी. शायद वो कमरे के अंदर आ गयी थी. मगर मैं आँखे बंद किये चुप चाप लेता रहा. तभी मेरे कानो में दीदी की आवाज़ पड़ी. वो मुझसे कह रही थी की विक्की चाय पि लो. उनके ऐसा कहने पर भी मैंने आँखे नहीं खोली और न hi कुछ बोलै. थोड़ी देर बाद मुझे दीदी के सिसकने की आवाज़ सुनाई दी तो मैंने आँखे खोल कर देखा.
कुसुम दीदी पास में hi रखे स्टूल पर बैठी सिसक रही थी. उनका सर नीचे झुका हुआ था और चाय का ट्रे कमरे के फारस पर रखा था. उन्हें इस तरह रट देख मुझे तकलीफ तो बहुत हुयी मगर मैं कुछ न बोलै बल्कि बीएड से नीचे उतरा और फारस पर रखे ट्रे से चाय का कप उठा लिया और फिर बीएड पर आ कर बैठ गया. उधर दीदी वैसी hi पोजीशन में सिसकती रही.
"मैंने तो अपनी तरफ से बहुत चाहा की आपके हर दुःख तकलीफ को अपने सीने से लगा लू और आपको दुनिया की हर ख़ुशी दू मगर आपने कभी ये चाहा hi नहीं की इन दुखो से आपको छुटकारा मिले. सच तो ये है की आप चाहती hi ये हैं की आप घुट घुट कर जिए. खेर chhodiye...jaiye didi..maine चाय का कप ले लिया है. अब jaiye...aur जो दिल करे वो कीजिये." मैंने ये सब कहा तो दीदी ने सर उठा कर मेरी तरफ देखा.
दीदी का चेहरा आंशुओ से भीगा हुआ था. ये देख कर मेरी रूह तक तड़प उठी मगर मैं चाह कर भी कुछ नहीं कर सकता था. ये सब उन्होंने खुद चुना था तो अब ये दुःख तकलीफ तो उन्हें साहनी hi पड़ेगी.
"तुझे क्या लगता hai...main ये दुःख ये तकलीफ ख़ुशी से सह रही हु.? मेरा भी मन करता है की मैं सबकी तरह खुश राहु और सब की तरह हसी मज़ाक करू मगर ये मेरी किस्मत में है hi नहीं." दीदी ने रट हुए ये कहा तो मैंने कहा.
"किस्मत को इस तरह दोष नहीं दिया जाता दीदी. किस्मत पहले से लिखी हुयी नहीं होती है बल्कि उसे बनाना पड़ता है. हम अपने कर्मो से अपना भाग्य बनाते हैं. आप चाहती hi नहीं हैं की आपका भाग्य ख़ुशी से भरा हो. बेवजह किस्मत को दोष दे रही हैं आप." मैंने ये कहा तो दीदी ने कहा.
"कहने में और करने में फर्क होता है विक्की मगर छोड़ जाने दे. तू मेरी मजबूरियों को नहीं समझेगा." दीदी ने ये कहा और स्टूल से उठ कर कड़ी हो गयी. फर्श पर रखा ट्रे भी उठा लिया था उन्होंने.
"आप जिन मजबूरियों की बात कर रही हैं न दीदी उन मजबूरियों को मैं बहुत पहले समझ चूका था और ये भी जनता हु की उन बजबूरियो को साथ में ले के चलने का कोई मतलब नहीं है और न hi उससे किसी का भला होगा. ज़िन्दगी में खुश रहना है तो वही करो जो दिल कहे." मैंने ये कहा तो दीदी ने कहा.
"मैंने कहा न की कहने और करने में बहुत फर्क होता है. खेर chhod...tu खुश रह यही मेरी कामना है बस." दीदी ने ये कहा और कमरे से बाहर चली गयी.
मैं सब समझ रहा था. वो अपने आप से भाग रही थी. वो हकीकत से भाग रही थी और हकीकत से दर भी रही थी. उनके जाने के बाद मैं काफी देर तक उनके बारे में सोचता रहा. उस वक्त मेरा मन दुखी हुआ था जिसकी वजह से मैंने उनसे वडा कर लिया था मगर अब लग रहा था की मुझे वडा नहीं करना चाहिए था. मगर अब तो कुछ नहीं हो सकता था. मैंने भी फ्यूचर पर छोड़ दिया सब कुछ.
जब सुबह के 6 बजे तो मैं उठा और प्रिय पूजा के कमरे की तरफ बढ़ गया. उनके कमरे के दरवाजे को मैंने हलके से अंदर की तरफ धकेला तो वो खुल गया. वैसे मुझे इस तरह उनके कमरे में बिना आवाज़ लगाए जाना तो नहीं चाहिए था क्यों की वो जाने किस हालत में पड़ी सो रही हो. मगर मुझे ये भी पता था की वो उस हालत में तो नहीं सो रही होंगी जिस हालत में कल शाम को मैंने उन्हें देखा था.
कमरे के अंदर आया तो देखा दोनों गहरी नींद में सोई हुयी थी. दोनों एक दूसरे की तरफ पीठ किये लेती होती थी और दोनों ने पुरे कपडे पहने हुए थे. मैं बीएड के पास पंहुचा और दोनों को ध्यान से देखा. दोनों hi सोते हुए छोटी बच्ची की तरह मासूम लग रही थी. मुझे दोनों पर बहुत ज़्यादा प्यार आया तो मैं बीएड के किनारे पर बैठ गया. प्रिय इस तरफ hi थी जिस तरफ मैं बैठा था जबकि पूजा उसके दूसरी तरफ थी. मैंने झुक कर प्रिय के कोमल गाल पर हलके से चूमा और फिर उठ कर मैं घूमते हुए पूजा की तरफ गया और उसके गाल पर भी चूमा. उसके बाद मैंने थोड़ा ुचि आवाज़ में गुड मॉर्निंग माय एंगेल्स कहा तो दोनों hi थोड़ा हिली मगर उनकी नींद न टूटी.
मैं दोनों को देख रहा था और तभी मेरी आँखों के सामने कल शाम वाला वो मंज़र घूम गया. उफ्फ्फ्फ़ एक पल में मेरा दिमाग खराब हो गया. मैंने अपने दिमाग को ज़ोर से झटक दिया और इस बार मैंने दोनों को हिलाते हुए उन्हें जगाने की कोशिश की तो थोड़ी hi देर में दोनों अंगड़ाई लेते हुए जाग गयी. मगर जैसे hi दोनों ने मुझे देखा तो दोनों की हालत अजीब सी हो गयी. शायद तभी उन्हें याद आ गया था की कल शाम मैंने दोनों को नंगी हालत में देख लिया था. ये याद आते hi दोनों बुरी तरह शरमाते हुए सिकुड़ गयी. मैं समझ गया की ये दोनों अभी नार्मल नहीं हो सकती मगर मुझे दोनों को नार्मल करना था.
"क्या hua....meri दोनों परिया इस तरह सिकुड़ क्यों गयी.? चलो utho....maine तो तुम दोनों को गुड मॉर्निंग भी किया और तुम दोनों के गालो पर किश भी किया और अब तुम दोनों भी गुड मॉर्निंग करो. उसके बाद मुझे गरमा गरम अपने हाथ की बानी चाय भी पिलाओ." मैंने ये सब कहा तो दोनों ने एक दूसरे को देखा. उनके चेहरे पर देख कर ऐसा लगा जैसे वो अपने आपको नार्मल करने की कोशिश कर रही हैं.
"और हाँ ये बताओ की कल रात तुम दोनों मेरे कमरे में आयी क्यों नहीं.? कितना इंतज़ार किया मैंने तुम दोनों ka...fir पता नहीं कब मैं सो गया था. खेर छोडो और जल्दी से गुड मॉर्निंग करो." मैंने मुस्कुराते हुए ये कहा तो दोनों के चहरो पर चमक आयी और फिर दोनों थोड़ा सा मुस्कुरायी.
मैं चाहता था की दोनों नार्मल हो जाये और उनके दिमाग से कल शाम वाला किस्सा हैट जाये. मैं दोनों के पास hi बीएड के किनारे पर बैठा हुआ था और दोनों के गुड मॉर्निंग करने का इंतज़ार कर रहा था. कुछ hi देर में वो दोनों उठी और फिर मेरे पास खिसक कर आयी. दोनों के चेहरे पर शर्म की लाली अभी भी मैं साफ़ देख सकता था. मेरे करीब आ कर दोनों मेरे चेहरे पर झुकी और फिर दोनों ने मेरे गालो पर एक साथ किश किया और फिर गुड मॉर्निंग कहा.
"ये हुयी न बात. अब जा कर मुझे अच्छा लगा है. तुमको पता है कल रात अकेले मुझे बीएड पर बिलकुल भी अच्छा नहीं लग रहा था. तुम दोनों की आदत हो गयी है मुझे." मैंने ये कहा तो दोनों मुस्क़ुआई फिर पूजा ने कहा.
"भाई वो हम कल शाम को जो हुआ उसकी वजह से नहीं आये थे. हमारी हिम्मत hi नहीं हो रही थी तुम्हारे सामने आने की." पूजा ने ये कहा hi था उसके बाद प्रिय भी बोल पड़ी.
"भाई उसके लिए हम बहुत ज़्यादा शर्मिंदा हैं. उसके बाद तो हमें ऐसा लग रहा था जैसे की शर्म से कही डूब के मर जाये." प्रिय ने नज़रे झुका के ये कहा तो मैंने कहा.
"खबरदार मरने की बात की तो. देखो जो कुछ भी हुआ उसे भूल जाओ. उसमे किसी की कोई गलती नहीं थी. जो कुछ भी हुआ वो अनजाने में हुआ. अब वो सब भूल जाओ और जैसे पहले मेरे साथ हस्ते बोलते थे वैसे hi हसो बोलो. अब चलो जल्दी से फ्रेश हो लो और फिर मुझे चाय पिलाओ. मैं अपने कमरे में जा रहा हु. चाय ले कर वही आ जाना ठीक है.?" मैंने दोनों की तरफ बारी बारी से देखते हुए ये कहा तो दोनों ने हाँ में सर हिलाया और फिर ख़ुशी ख़ुशी बीएड से उतर कर कमरे से बाहर चली गयी. उनके जाने के बाद मैंने भी राहत की सांस ली और अपने कमरे में आ गया.
अपने कमरे में बीएड पर लेता मैं आज के दिन के बारे में सोच रहा था. आज रचना मेरे घर आने वाली है और माँ उससे जाने क्या क्या बात करेगी. फिर मुझे रेखा चची का ख़याल आया. आज दोपहर को सरपंच काका रेखा चची के घर जायेगे और उनकी गांड छोड़ेगे. ये ख़याल आते hi मेरे जिसम में झुरझुरी सी हुयी. मेरे मन में ये ख़याल आया की आज सरपंच को भी थोड़ा झटका देना चाहिए मगर सवाल था की कैसे.?
दोपहर को मैं कमरे से नीचे आया और बाहर की तरफ जाने hi लगा था की पीछे से माँ ने मुझे आवाज़ दी तो मैं रुक गया और पलट कर उनकी तरफ देखा. मेरे करीब आ कर माँ ने मुझसे पूछा की कहा जा रहा हु मैं तो मैंने उन्हें बताया की ज़रूरी काम से जा रहा हु. मेरी बात सुन कर माँ ने कहा की रचना आने वाली है और वो चाहती हैं की जब रचना से उनकी बात हो तो मैं भी उनके पास राहु.
मुझे माँ की इस बात ने परेशानी में दाल दिया. मैं तो रेखा चची के घर की तरफ जा रहा था. मैं चाहता था की जब सरपंच वह पहुंचे तो उसका मुझसे टकराव हो मगर यहाँ तो माँ मुझसे रुकने का कह रही थी. मैंने माँ से कहा की उन्हें रचना से जो भी बात करना हो वो कर ले. मेरा काम से बाहर जाना ज़रूरी है. मेरी इस बात से माँ ने मुझे कुछ देर तक देखा और फिर कहा ठीक है जाओ.
माँ की इजाज़त मिलते hi मैं अंदर से खुश हुआ और फिर घर से बाहर आ गया. बाहर आ कर जैसे hi मैं सड़क पर आया तो मुझे सामने से आती हुयी रचना दिखी. उसे देख कर मैं थोड़ा रुका और फिर आगे बढ़ने लगा. मैंने देखा की रचना कुछ सोचते हुए आ रही थी. उसका ध्यान कही और था. उसने मुझे देखा नहीं था जबकि मैं उसे hi देख रहा था. वो दूध की तरह गोरी थी. चेहरा आज भी बहुत सुन्दर था उसका जिसमे संसार भर की मासूमियत थी. उसकी गर्दन से नीचे का हिस्सा मोटा हो गया था. जो थोड़ा अजीब सा लगता था.
मैं जैसे hi उसके थोड़ा पास पंहुचा तो एकदम से उसकी नज़र मुझ पर पड़ी तो वो पहले सकपकायी फिर शायद उसने अपने आपको सम्हाला था. उसके गुलाबी होठो पर हलकी सी मुस्कान उभरी. मुझे समझ न आया की मैं उसकी उस मुस्कान पर कैसे रियेक्ट करू.? मगर मुझे इस बात का अहसास था की ये वो लड़की है जिसने मेरे लिए कितना बड़ा त्याग किया है और मेरे न रहने पर मेरे परिवार की रक्षा की है. मुझ में उसका निरादर करने की हिम्मत न हुयी बल्कि उसके लिए सम्मान जगा मेरे मन में.
जब वो मेरे बिलकुल करीब आ गयी तो उसने hi मुझसे पूछा कैसे हो विक्की तो मैंने धीरे से थोड़ा मुस्कुराते हुए जवाब दिया ठीक हु. उसके बाद मैं आगे बढ़ गया. सड़क पर रुक कर उससे बात करना ठीक नहीं था. उसे भी ये बात पता थी इस लिए उसने भी मुझसे रुकने को नहीं कहा और मेरे घर के दरवाजे की तरफ बढ़ गयी.
रचना के बारे में सोचते हुए मैं थोड़ी hi देर में रेखा चची के घर के पास पहुंच गया. उनके घर के बाहर बने मिटटी के चबूतरे पर आज वो बच्चा नहीं था जिसका नाम बबलू था. आस पास के घरो के बाहर भी कोई नहीं दिखा. मैं समझ गया की सरपंच के आने का टाइम सही है. इस वक्त आस पास के घरो के बाहर कोई था नहीं जिससे सरपंच को रेखा चची के घर के अंदर जाने में कोई प्रॉब्लम नहीं होनी थी.
मैंने सोचा रघुवीर काका तो खेतो पर होंगे इस वक्त. क्यों की अगर वो घर पर होते तो रेखा चची सरपंच को आने से मन कर देती. मतलब साफ़ था की रघुवीर काका खाना पीना करके खेत जा चुके थे. मुझे समझ न आया की अब मैं क्या करू. मैं चची के घर के अंदर जाओ या बाहर hi सरपंच के आने का इंतज़ार करू. घर के बाहर खड़े रहना भी ठीक नहीं था इस लिए मैं आगे की तरफ धीरे धीरे चल दिया. रघुवीर काका के घर के बगल से उनके बड़े भाई तेजवीर काका का घर था. रघुवीर काका दो भाई थे और दोनों hi खेती बाड़ी करते थे. मैंने अंदाज़ा लगाया की तेजवीर काका भी शायद खेतो पर hi होंगे. उनके घर के थोड़ा आगे एक बरगद का बड़ा सा पेड़ था जो सड़क के किनारे पर था और उसके नीचे पक्का चबूतरा बना हुआ था लोगो के बैठने के लिए. मगर इस वक्त वह पर कोई नहीं था.
मैं उस चबूतरे तक गया और आस पास के घरो की तरफ देखने के बाद वापस मुद आया. मुद कर जैसे hi मैं तेजवीर काका के घर के सामने आया तो मेरी नज़र उनके घर के दरवाजे पर पड़ी. उनके घर का दरवाजा उसी वक्त खुला था और दरवाजे से रेखा चची और उनका छोटा सा बीटा बबलू निकला था. रेखा चची अपनी जेठानी के घर आयी थी. ये देख कर मुझे कल की बात याद आयी की उन्होंने अपनी जेठानी को भी सरपंच से छुड़वाने के लिए तैयार कर लिया था. इसका मतलब कही ऐसा तो नहीं की आज उनकी जेठानी सरपंच से छोड़ने के लिए आने वाली है रेखा चची के घर में. मुझे मेरा ये ख़याल सही तो लगा मगर उनकी जेठानी तो बाहर निकली नहीं. शायद बाद में आये वो.
रेखा चची की नज़र जब मुझ पर पड़ी तो पहले तो वो चौंकी फिर मुस्कुराते हुए मेरे पास आयी और बोली कहा जा रहे हो विक्की.? उनके पूछने पर मैंने उन्हें झूठ मुठ का बताया की मैं आज अपने खेतो की तरफ गया था और अभी वही से आ रहा हु और अब घर जा रहा हु. मेरी ये बात सुन कर चची ने मुस्कुराते हुए कहा की खेती बाड़ी के काम में बहुत म्हणत लगती है विक्की और ये तुम्हारे बस का नहीं है. उनकी इस बात से मैंने कहा की हाँ ये मैं जनता हु और इसी लिए सोच रहा हु की दो चार मजदूर लगा लू जिससे काम आसानी से हो सके.
मैं उनसे बाते करते हुए hi चलते हुए उनके घर के सामने आया. जब मैं उनके घर के सामने आया तो मैं चाह रहा था की चची मुझसे अपने घर आने को कहे मगर ऐसा न हुआ. मैं समझ गया की वो मुझसे ऐसा कह भी नहीं सकती थी क्यों की आज सरपंच या तो उनकी गांड का उद्घाटन करने आने वाला है या फिर उनकी जेठानी की छूट मरने. जब मुझे लगा की चची मुझे आने को नहीं कहेगी तो मैंने hi कहा की चची बड़ी प्यास लगी है. मेरी ये बात सुन कर चची ने मुस्कुराते हुए कहा की आ जाओ मैं तुम्हे पानी पिलाती हु.
रेखा चची की इस बात से मैं मन hi मन खुश हो गया और फिर उनके साथ उनके घर के दरवाजे की तरफ चल पड़ा. मेरी नज़र उनके बेटे पर पड़ी जो मुझे hi देखे जा रहा था. मैं समझ गया की वो मुझे क्यों देखे जा रहा था. उसे पता था की मैं आज भी उसे पैसे दुगा और वो उन पैसो से गुड़ नमकीन दूकान से खरीद कर लाएगा और फिर खायेगा. मुझे मन hi मन उसकी मासूमियत पर और उसकी इस आस पर प्यार आया.
थोड़ी hi देर में मैं चची के साथ उनके घर के अंदर आया और फिर चची मुझे बैठक में बिठा कर अंदर पानी लेने चली गयी. उनके जाते hi बबलू ने मुझसे कहा की भैया मैंने माँ को नहीं बताया की कल तुमने मुझे पैसा दिया था. मैंने उसकी ये बात सुनी तो मुस्कुराते हुए उससे कहा की अच्छा किया जो नहीं बताया. मेरी इस बात से वो खुश हो गया और फिर बोलै की आज भी मुझे पैसा डोज तो मैंने अपनी पॉकेट से निकल कर उसे दस रूपया दिया और कहा की इसे छुपा कर रखे और बाद में जो खाना हो खरीद के खा लेना. बबलू ने मेरे हाथ से पैसा ले कर जल्दी से अपने हाफ पेंट की छोटी सी पॉकेट में छुपा लिया. उसका चेहरा ख़ुशी से चमकने लगा था.
तभी रेखा चची लोटा गिलास में पानी ले कर आयी और मुझे गिलास थमा दिया. मैंने पानी से भरा गिलास देखा और फिर रेखा चची की तरफ देखते हुए मुस्कुरा कर कहा क्या चची सिर्फ पानी पिलाएगी आप मुझे.? रघुवीर काका होते तो मुझे बिना खाना खाये न जाने देते. इससे ये साफ़ हो गया की काका मुझे ज़्यादा मानते हैं और आप काम. मेरी इस बात से चची हड़बड़ा गयी मगर फिर जल्दी hi खुद को सम्हाल भी लिया और फिर मुस्कुराते हुए बोली. नहीं विक्की ऐसी तो कोई बात नहीं hai...wo तुमने सिर्फ पानी पिने को कहा तो मैं पानी ले कर आ गयी. उनकी इस बात से मैंने मुस्कुराते हुए कहा की अपने से तो कोई भी ये नहीं कहता चची की मुझे खाना खिला दो. ज़्यादातर लोग पानी के लिए hi कहते हैं. अब ये तो सामने वाले की सोच पर निर्भर करता है की वो उसे सिर्फ पानी पिलाता है या और भी कुछ खिलता पिलाता है.
मेरी इस बात से चची मुस्कुराते हुए बोली अच्छा बाबा माफ़ करो मुझे. गलती हो gayi...chalo मैं तुम्हे खाना खिलाती हु. उनकी इस बात पर मैंने कहा अब रहने दीजिये चची. ये तो आपको पहले सोचना चाहिए tha...jab मैंने कहा तब आपने कहा तो क्या मतलब रह गया. चलिए कोई बात नहीं रघुवीर काका जब मिलेंगे मुझे तो उनसे कहुगा मैं की आप नहीं थे तो चची ने मुझे सिर्फ पानी पीला कर hi भेज दिया था.
मेरी इस बात से चची ने मुस्कुराते हुए कहा तुम भी कमाल करते हो विक्की. अब माफ़ भी कर दो न अपनी इस मासूम सी चची को. मैं कह तो रही हु न की चलो मैं तुम्हे खाना खिलाती हु. उनकी इस बात पर मैंने हस्ते हुए kaha...na अब तो मैं काका से ऐसा कह कर hi रहुगा. मैं उनसे कहुगा की आप तो मुझसे प्यार करते हैं मगर चची नहीं करती हैं. उन्होंने मुझे सिर्फ पानी पीला कर घर से भगा दिया है आज.
मेरी इस बात से चची मुझे हैरानी से देखती रह गयी जबकि मैं उनकी तरफ मुस्कुराते हुए देखता रहा. चची कुछ देर तक मुझे मुस्कुराते हुए देखती रही फिर कुछ कहने hi वाली थी की तभी घर का दरवाजा बाहर से खटखटाया गया. खटखटाने की आवाज़ सुनते hi चची के चेहरे का रंग उड़ता नज़र आया मुझे. उनके चेहरे पर घबराहट दिखी मुझे तो मैं समझ गया की बाहर शायद सरपंच आ पंहुचा है और वही दरवाजे को खटखटा रहा है. मगर मेरे रहते हुए चची दरवाजा खोल कर उसे अंदर कैसे आने दे सकती थी.?
रेखा चची हैरान परेशां सी कड़ी रह गयी तो मैंने चची से कहा की देखिये तो कौन आया hai...shayad काका होंगे. मेरी इस बात से चची हड़बड़ा गयी और मुझे अजीब तरह से देखने लगी तो मैंने कहा क्या हुआ chachi....aap मुझे इस तरह क्यों देख रही hain...ja कर दरवाजा खोलिये न. मैंने ये कहा hi था की दरवाजा फिर से खटखटाया गया. मैंने देखा की चची की हालत खराब होने लगी थी. उनके चेहरे का रंग उड़ गया था. मगर दरवाजा तो खोलना hi पड़ेगा उन्हें ये बात उन्हें भी पता थी. इस लिए जैसे hi वो बाहर की तरफ जाने लगी तो तभी बैठक में चची की जेठानी आती दिखी और उनके साथ बबलू भी. मैं समझ गया की दरवाजा बबलू ने खोल दिया था जबकि मैं और चची ने उसकी तरफ ध्यान hi नहीं दिया था की वो कब दरवाजा खोलने चला गया था.
अपनी जेठानी पर नज़र पड़ते hi चची के चेहरे पर राहत दिखी और फिर उनकी हालत भी ठीक हो गयी. मगर मैं मन hi मन ये सोच कर हसे जा रहा था की कुछ देर पहले इनकी हालत ये सोच कर खराब हो गयी थी की बाहर शायद सरपंच आ गया था. इधर चची की जेठानी के आने से मैं ये समझ गया की आज सरपंच इनकी जेठानी की चुदाई करेगा. उधर चची की जेठानी बैठक में आयी और फिर जब उनकी नज़र मुझ पर पड़ी तो वो हैरानी से कभी मुझे देखती तो कभी रेखा चची को. शायद उन्हें उम्मीद नहीं थी की यहाँ मैं मौजूद होगा.
रेखा चची की जेठानी का नाम उर्मिला था. उनका रूप रंग रेखा चची से थोड़ा साफ़ था और दिखने में भी मस्त पटाखा लग रही थी. उनकी उम्र यही कोई 35 या 38 साल की रही होगी. मुझे देख कर वो हैरान तो हुयी थी मगर जल्दी hi खुद को सम्हाल भी लिया था. उसके बाद मुस्कुराते हुए मुझसे boli...kya बात है विक्की आज हमारे घर में.? उनके ऐसा कहने पर मैंने मुस्कुराते हुए कहा की क्या मैं यहाँ नहीं आ सकता चची.? मेरे ऐसा कहने पर उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा की बिलकुल आ सकते हो ये भी तो तुम्हारा hi घर है. उसके बाद मैंने उन्हें बताया की कैसे मैं यहाँ आया और कैसे रेखा चची मुझे सिर्फ पानी पीला कर यहाँ से तर्क देना चाहती थी. मेरी ये बात सुन कर दोनों चची मुझे हैरानी से देखने लगी. रेखा चची ने कहा की तुम भी न vicky...kyo मुझे तंग कर रहे हो.? मैं कह तो रही हु चलो मैं तुम्हे खाना खिला देती हु.
मैंने भी सोचा की अगर मुझे यहाँ रुकना है तो थोड़ा बहुत खाना खाने का नाटक करना hi पड़ेगा. मैं चाहता था की जब सरपंच की यहाँ एंट्री हो तो उसका सामना मुझसे ज़रूर हो. मैं देखना चाहता था की जब वो मुझे यहाँ देखेगा तो उसकी हालत क्या होती है.?
मैंने रेखा चची से कहा की ठीक है अब जब कह hi दिया है तो ले आइये कुछ खाने को क्यों की मुझे भूख भी लगी है. आखिर खेतो की तरफ से आया हु. मैंने ये कहा तो दोनों चाचियों के चेहरे पर परेशानी दिखने लगी. मगर वो मुझे यहाँ से जाने का कह भी नहीं सकती थी. मैं उनकी बहुत बड़ी आफत बन कर आ गया था यहाँ और वो दोनों अब बेबस सी हो गयी थी. खेर मेरे कहने पर रेखा चची को अंदर जाना hi पड़ा खाने के लिए कुछ लेन के लिए. उन्होंने सोचा था की मैं बस ऐसे hi कह रहा था. उन्हें क्या पता था की मैं सच में खाना खाने के लिए उनसे खाना मगाऊगा.
रेखा चची अंदर गयी तो उनके पीछे उर्मिला चची भी चली गयी. मैं समझ गया की अब दोनों अंदर कोई सलाह वगैरा करेगी. मगर मुझे इससे kya..main तो यहाँ सरपंच के आने का इंतज़ार hi करने वाला था. दोनों की हालत देख कर मुझे मज़ा भी बहुत आ रहा था. आखिर उनके लिए कबाब में हड्डी जो बन गया था मैं.
मुझे इंतज़ार करते हुए पांच मिनट से ज़्यादा हो गए थे मगर दोनों चचिया अंदर से नहीं आयी थी. मैं समझ सकता था उनकी हालत को मगर मैं उनको राहत देने का काम करने वाला नहीं था अभी. मैं ये सोच hi रहा था की तभी बाहर का दरवाजा एक बार फिर से खटखटाया गया और इस बार मैं पक्का सूरे हो गया की सरपंच ने दरवाजा खटखटाया था. ये सोचते hi मैं बहुत खुश हो गया मगर मेरा दिल भी ज़ोरो से धड़कने लग गया था.
उधर दरवाजा खटखटाने की आवाज़ शायद अंदर तक भी पहुंच गयी थी. तभी तो रेखा चची भागते हुए आयी थी. उनके चेहरे पर इस बार बारह बजे हुए थे और चेहरे का रंग एक बार से उदा हुआ दिखा मुझे. बैठक में आते hi उन्होंने मुझे देखा तो मैंने जल्दी से कहा क्या हुआ चची खाना नहीं ले आयी आप.? मेरी इस बात पर चची से कुछ कहते न बना. उधर दरवाजा फिर से खटखटाया गया तो इस बार मैंने चची से कहा की रुकिए मैं दरवाजा खोलता हु आप खाना ले कर आइये. मेरी इस बात से चची बुरी तरह घबरा गयी और फिर जल्दी से boli...nahi विक्की रुको. मैं जा के देखती हु कौन hai...tum बैठो यही. उनकी इस बात पर मैंने उनकी घबराहट को और बढ़ने के लिए pucha...kya बात है चची आप इतना घबराई हुयी क्यों लग रही हैं.? कोई परेशानी है क्या.?
मेरी इस बात से चची बुरी तरह हड़बड़ा गयी और फिर हकलाते हुए boli....nahi तो. मैं कहा घबराई हुयी हु vicky...tumhe ऐसे hi लग रहा है. तुम बैठो yahi...main दरवाजा खोल कर देखती हु की कौन आया है बाहर. चची ने ये कहा तो मैंने कहा ठीक है. मेरे ऐसा कहने पर चची बैठक से बाहर की तरफ बढ़ गयी तो मैं भी अंदर की तरफ एक बार नज़र दाल कर उनके पीछे चुपके से दबे पाँव बैठक से बाहर की तरफ चल दिया.
उधर रेखा चची दरवाजे के पास पहुंच चुकी थी और फिर उन्होंने कांपते हाथो से दरवाजा खोला. मैं दिवार के पीछे hi छिप गया था और मैं यहाँ से दरवाजे की तरफ साफ़ देख सकता था. जैसे hi दरवाजा खुला तो बाहर सरपंच खड़ा दिखा मुझे. सरपंच को देखते hi रेखा चची की हालत खराब हो गयी.
"क्या बात है मेरी rani....itni देर क्यों लगा दी दरवाजा खोलने में.?" दरवाजा खुलते hi सरपंच ने चची को देख कर धीरे से ये कहा तो चची बुरी तरह घबरा गयी और फिर जल्दी से पीछे पलट कर एक बार देखा और फिर सरपंच से बोली.
"तुम यहाँ से चले जाओ अभी. इस वक्त तुम्हारा यहाँ आना बहुत बड़ी मुसीबत खड़ा कर देगा." चची ने ये कहा तो सरपंच ने हैरानी से पहले चची को देखा फिर थोड़ा नाराज़गी से बोलै.
"तुम मुझे ऐसे कैसे यहाँ से जाने का बोल सकती ho...aur तुम कौन सी मुसीबत के खड़ा होने की बात कर रही हो.? तुम्हे शायद पता नहीं है की मैं खुद इस गांव के लोगो के लिए एक बहुत बड़ी मुसीबत हु. यहाँ कोई भी मेरे लिए मुसीबत नहीं बन सकता. अब हटो दरवाजे से और मुझे अंदर आने दो. मेरा दिमाग ख़राब हो गया तो तुम सोच भी नहीं सकती हो की मैं क्या कर सकता हु तुम्हारे और तुम्हारे पति के साथ." सरपंच ने रेखा चची को जैसे धमकी देते हुए ये कहा तो रेखा चची बुरी तरह दर गयी मगर वो भला कैसे सरपंच को अंदर आने दे सकती थी.?
"तुम समझ नहीं रहे हो मेरे राजा. इस वक्त तुम अंदर नहीं आ सकते." रेखा चची ने घबराते हुए ये कहा तो सरपंच ने इस बार कुछ सोचते हुए कहा.
"क्या बात hai...koi परेशानी है क्या.? कही तुम्हारा पति तो घर के अंदर नहीं है मगर वो तो इस वक्त खेतो पर होता है न.?" सरपंच ने ये कहा तो रेखा चची ने बेबसी से अभी कुछ कहना hi चाहा था की तभी मैं दिवार के पीछे से निकल कर उनके पीछे आ गया. असल में मैंने सोचा की ये सही टाइम है सरपंच को और चची दोनों को झटका देने का. यही सोच कर मैं एकदम से चची के पीछे आ कर खड़ा हो गया था और फिर इस तरह बोल पड़ा जैसे मुझे कुछ पता hi न हो.
"क्या हुआ chachi...kaun आया है बाहर.? कितनी देर लगा दी आपने.? मैं यहाँ खाने के इंतज़ार में बैठा हु और आप यहाँ किस्से बाते कर रही हैं.?" मैंने अनजान बनते हुए जैसे hi ये सब कहा तो दोनों के देवता कुछ कर गए. रेखा चची की हालत तो बदतर हुयी hi मगर मुझे देखते hi सरपंच की भी जैसे नानी मर गयी.
दरवाजे के दोनों पल्लो को पकडे खड़ा सरपंच मुझे देखते hi एकदम हड़बड़ा गया था. उसके पैरो के नीचे से जैसे ज़मीन खिसक गयी थी. उसके चेहरे पर बुरी तरह घबरा जाने के निशाँ दिखे. फिर जैसे उसको होश आया तो वो एकदम से पीछे हैट गया और फिर अपने आपको बड़ी मुश्किल से सम्हाला उसने. मुझे देखते हुए वो मुस्कुरा कर बोलै.
"ारी विक्की बीटा तुम यहाँ.?" सरपंच इससे ज़्यादा कुछ बोल न पाया मगर मैं उसकी इस बात पर इस तरह मुस्कुराया जैसे वो मेरे सामने कोई बच्चा हो और उसने कोई बेवकूफाना हरकत कर दी हो. मेरे इस तरह मुस्कुराने पर सरपंच के माथे पर पसीना उभर आया.
"हाँ kaka...wo मैं खेतो की तरफ से आ रहा था तो चची मुझे यही पर मिल गयी. फिर मैंने इनसे पानी मांगा तो इन्होने सिर्फ मुझे पानी पकड़ा दिया. मैंने इनसे कहा की अगर काका होते तो मुझे बिना खाना खाये जाने नहीं देते. तब इन्होने मुझे बैठाया और कहा की ठीक है अब खाना खा कर hi जाना. इस लिए मैं यहाँ खाने का इंतज़ार hi कर रहा मगर चची इतनी देर से यहाँ आपसे बाते करने में लगी हुयी हैं और मुझे भूखा बिठा रखा है. ये तो हद है न काका.?" मैंने मुस्कुराते हुए सरपंच को ये सब बताया तो सरपंच के चेहरे पर राहत दिखी और फिर उसने मुस्कुराते हुए रेखा चची से कहा.
"क्यों रानी ये विक्की क्या कह रहा है.?" सरपंच ने चची को गलती से रानी बोल दिया तो चची हड़बड़ा कर सरपंच की तरफ देखा तो सरपंच भी हड़बड़ा गया. उसे अपनी गलती का अहसास हुआ. शायद उसकी आदत पद चुकी थी चची को रानी कहने की. इस लिए उसके मुँह से गलती से निकल गया था मगर अब क्या हो सकता था. मैंने देखा की सरपंच के चेहरे का रंग उड़ गया था. फिर उसने जल्दी से खुद को सम्हलते हुए कहा.
"ारी हाँ तुम्हारा नाम तो रघुवीर ने रेखा बताया था न. मुझे बार बार भूल जाता है. इस लिए मुँह से रानी कह दिया था मैंने. खेर chhodo....wo मैं रघुवीर से मिलने आया था. उससे कहना की मैंने उसे घर बुलाया है ठीक है na.....aur हाँ विक्की को खाना खिला देना. अच्छा अब चलता हु मैं." सरपंच ने ये सब कहा और फिर पलट कर जाने लगा. मैंने देखा की उसके कंधे पर जो सफ़ेद रंग का गमछा था उसने उसे एक हाथ पकड़ कर निकला और फिर अपने चेहरे का पसीने पोंछते हुए आगे बढ़ गया.
इधर हालत तो रेखा चची की भी बहुत खराब हो गयी थी. सरपंच का यहाँ आना और फिर एकदम से मेरा उसके पीछे से आ जाना इस सबसे उन दोनों की hi हालत खराब हो गयी थी. सरपंच के जाने के बाद भी रेखा चची वैसी hi कड़ी रह गयी थी. शायद उन्हें ख़याल hi नहीं रह गया था की सरपंच जा चूका है और वो अभी भी वैसे hi दरवाजे के पास कड़ी हैं.
"क्या हुआ chachi...ab आप कड़ी क्यों हैं इस तरह.? चलिए मुझे खाना नहीं खिलाना kya...ya मैं जाओ यहाँ से और अपने hi घर में खाना खाओ.?" मैंने मन hi मन मुस्कुराते हुए चची से ये कहा तो चची एकदम से हड़बड़ा गयी. उन्हें होश आ गया. उन्होंने जल्दी से दरवाजा बंद किया और फिर मेरी तरफ पलटी तो मैं थोड़ा पीछे हैट गया.
मैंने देखा की उनका चेहरा पसीना पसीना हो गया था मरे घबराहट के. उन्होंने अपनी साडी के आँचल से जल्दी से पसीना पोंछा और फिर मेरी तरफ मुस्कुरा कर देखा. मैं उन्हें hi देख रहा था. वो मुस्कुराने ज़रूर लगी थी मगर उनके चेहरे से घबराहट गयी नहीं थी. मैं तो उनकी हालत जनता hi था मगर वो ये दिखने की कोशिश कर रही थी की सब ठीक है.
उसके बाद मैं चची के साथ बैठक में आ गया. चची ने मुझसे अंदर चलने के लिए कहा तो मैं अंदर रसोई की तरफ आ गया. वैसे तो मैं अपने घर में खाना खा चूका था मगर इस सबसे जो ख़ुशी मुझे महसूस हो रही थी उस ख़ुशी में थोड़ा सा खा लेने में भी मुझे कोई प्रॉब्लम नहीं थी. मैं मन hi मन ये सोच कर मगन था की मैंने आज रंग में भांग दाल दिया था. बेचारी दोनों चाचियों ने क्या आस लगा रखा था और मैंने उनके आस के अस्स व्होले पर अपना मोटा सा लौड़ा दाल दिया था आज. एक चची की गांड का आज उद्घाटन होना था और दूसरी चची को आज एक नया लुंड अपनी छूट में लेने के लिए मिलने वाला था. मगर मेरी वजह से सारा गुड़ गोबर हो गया था.
रसोई में आ कर चची ने एक चटाई मेरे बैठने के लिए बिछाई तो मैं आराम से बैठ गया. उर्मिला चची रेखा चची को बड़े ध्यान से देख रही थी. शायद वो समझने की कोशिश कर रही थी की उनके चेहरे पर जो अभी भी बारह बजे हुए हैं उसका रीज़न क्या है.? मेरे सामने तो वो चची से पूछ नहीं सकती थी. मैंने सोचा की चलो थोड़ा इनकी भी हालत खराब की जाये. ये ख़याल मन में आते hi पहले तो मुझे बहुत मज़ा आया फिर मैंने मुस्कुराते हुए बोलै.
"ारी चची आपको पता hai...abhi सरपंच काका आये थे और पता है वो क्या कह रहे थे चची को.?" मैंने ये कहा तो उर्मिला चची के चेहरे का एकदम से रंग उड़ गया. उधर मेरी ये बात सुन कर रेखा चची ने भी घबरा कर देखा मुझे. दोनों ने बड़ी मुश्किल से सम्हाला अपने आप को. फिर उर्मिला चची ने मुझसे पूछा.
"क्या कह रहे थे रेखा को.?" उर्मिला चची ने मुझसे ये पूछा तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा.
"हाहाहाहा क्या बताओ chachi....wo चची को रानी कह रहे थे." मैंने ये कहा तो उर्मिला चची ने तो हैरानी से रेखा चची की तरफ देखा hi मगर मेरी इस बात से रेखा चची बुरी तरह घबरा गयी. एक बार फिर से उनका चेहरा पीने से तर हो गया. उधर उर्मिला चची ने हकलाते हुए उनसे पूछा.
"Rekha...ye विक्की क्या कह रहा है.? क्या सरपंच जी ने तुझे सच में रानी कहा था.?" उर्मिला चची ने उनसे ये पूछा तो रेखा चची ने बुरी तरह हड़बड़ाते हुए कहा.
"हाँ didi...magar ऐसा उन्होंने इस लिए कह दिया था क्यों की उनको मेरा नाम भूल गया था शायद. वो रेखा की जगह रानी कह दिए थे." रेखा चची ने सफाई देते हुए ये कहा तो उर्मिला चची हैरान रह गयी. इधर मैंने मुस्कुराते हुए कहा.
"ऐसा गलती से हो जाता है चची और सब से हो जाता है. ये कोई बड़ी बात नहीं है और मुझे तो लगता है की रेखा चची का नाम रानी hi होना चाहिए था क्यों की रानी नाम चची पर ज़्यादा अच्छा लगता है. मैंने सही कहा न चची.?" मैंने मुस्कुराते हुए उर्मिला चची से ये कहा तो रेखा चची ने मुझे हैरानी से देखा जबकि उर्मिला चची इस बार मुस्कुरा कर बोली.
"सही कहा तुमने विक्की. रेखा का नाम रानी hi होना चाहिए था. वैसे भी मेरी देवरानी किसी रानी से काम है क्या.?" उर्मिला चची ने मुस्कुराते हुए ये कहा तो रेखा चची पता नहीं क्यों बुरी तरह शर्मा गयी. वो शरमाते हुए hi आयी और मेरे सामने खाने की थाली रख दी और जा कर फिर से अपनी जगह पर बैठ गयी.
"मगर मुझे एक बात समझ में नहीं आयी बड़ी चची." मैंने उर्मिला चची की तरफ देखते हुए ये कहा तो दोनों ने मेरी तरफ अजीब तरह से देखा फिर उर्मिला चची ने पूछा कौन सी बात समझ में नहीं आयी तो मैंने कहा.
"जब मैं छोटी चची के पीछे दरवाजे पर पंहुचा तो सरपंच काका मुझे देखते hi इतना घबरा क्यों गए थे.? ऐसा लगा जैसे उनकी कोई चोरी पकड़ी गयी हो." मैंने ये कहा तो वो दोनों बुरी तरह हड़बड़ा गयी. रेखा चची की तो हालत hi खराब हो गयी. बड़ी मुश्किल से दोनों ने खुद को सम्हाला और इस बार रेखा चची ने कहा.
"तुम्हे ऐसा क्यों लगता है की वो तुम्हे देखते hi घबरा गए थे या उनकी कोई चोरी पकड़ी गयी थी मुझे तो ऐसा कुछ भी नहीं लगा." रेखा चची ने ये कहा तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा.
"क्या सच में आपको ऐसा कुछ नहीं लगा चची.?" मैंने रेखा चची की तरफ ध्यान से देखते हुए और मुस्कुराते हुए ये कहा तो रेखा चची सकपका गयी. वो अपनी नज़रे चुराने लगी. उर्मिला चची तो जैसे कुछ सोचे जा रही थी.
"H..haan मुझे तो ऐसा कुछ नहीं लगा. पता नहीं तुम्हे ऐसा क्यों लगा था.?" रेखा चची ने हकलाते हुए ये कहा तो मैंने मुस्कुरा कर कहा.
"बड़ी अजीब बात है. आप तो उनके पास में hi कड़ी थी फिर भी आपको ऐसा कुछ नहीं लगा. ये तो हैरानी की बात है चची. खेर chhodo....waise आप खाना बहुत अच्छा बनती हैं. कल शाम को जब मैंने खाया था तब भी मुझे खाना बहुत अच्छा लगा था. मगर मैंने खाने की तारीफ नहीं की थी." मैंने ये कहा तो रेखा चची ने राहत की सांस ली और मुस्कुराते हुए बोली.
"अच्छा ji...kal मेरी झूठ मुठ की तारीफ कर रहे थे और अब मेरे बनाये खाने की भी झूठ मुठ की तारीफ कर रहे हो." रेखा चची ने ये कहा तो मैंने कहा.
"अब आपको भरोसा hi नहीं तो क्या कहु मैं मगर मेरा तो मन करता है की रोज़ आपके घर आ जाया करू और आपके हाथो का बना स्वादिस्ट खाना खाया करू." मैंने ये कहा तो रेखा चची ने मेरी तरफ पहले हड़बड़ा कर देखा फिर मुस्कुराते हुए बोली.
"अच्छा ji...chalo ठीक है रोज़ आ जाना और मेरे हाथ का बना खा लिया करना." चची ने ये कहा तो मैंने मुस्कुरा कर कहा.
"सोच लीजिये chachi....main अब रोज़ाना आउगा आपके घर खाना खाने." मैंने ये कहा तो चची के चेहरे पर परेशानी नज़र आयी. मगर उन्होंने अपने आपको सम्हालते हुए और ज़बरदस्ती मुस्कुराते हुए कहा.
"इसमें सोचना क्या है विक्की.? तुम्हारा घर hai...tumhara जब मन करे आ जाना." रेखा चची ने ये कहा तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा.
"आप ये सच्चे मन से कह रही हैं या सिर्फ दिखने के लिए.?" मैंने ये कहा तो दोनों ने मेरी तरफ हैरानी से देखा फिर रेखा चची बोली.
"मैं मन से hi कह रही विक्की. तुम रोज़ आ जाना. मुझे ख़ुशी होगी की तुम मेरे हाथ का बना खाना खाने आओगे." रेखा चची ने ये कहा तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा.
"ठीक है चची. अब ये पक्का हो गया की मैं अब से रोज़ाना आपके यहाँ आउगा." मैंने हाथ मुँह धोते हुए ये कहा तो दोनों ने ज़बरदस्ती मुस्कुराने की कोशिश की.
खाना खाने के बाद मैं उठा और फिर दोनों से कुछ देर और बातचीत की मैंने. उसके बाद मैं वह से अपने घर की तरफ चल दिया. सच कहु तो मुझसे अपनी हसी रोकी नहीं जा रही थी. मुझे ये सोच कर बहुत मज़ा आ रहा था की दोनों चाचियों ने इसके पहले बड़ा ख्वाब सजाया रहा होगा. बड़ा टीम टॉम किया रहा होगा मगर मेरे आ जाने से सब पर पानी फिर गया था. उधर सरपंच का भी यही हाल हुआ होगा. आज ज़रूर उसने अपने लुंड को अच्छे से साफ़ किया रहा होगा और उसकी तेल लगा कर मालिश की रही होगी मगर उसके लुंड को छूट और गांड न मिल पायी थी.
सरे रास्ते मैं यही सब सोचते हुए मन hi मन हस्ता रहा. मेरे मन में ये भी ख़याल आया की कही ऐसा न हो की मेरे वह से आने के बाद सरपंच फिर से न रेखा चची के घर पहुंच जाये. ऐसा हो तो सकता था मगर मुझे इसके चांस काम hi लग रहे थे. क्यों की दोनों तरफ एक बात कॉमन हो गयी थी और वो थी घबराहट और दर जो उनको काम से काम आज तो ऐसा कुछ करने से रोके hi रखेंगे. कल का कल देखा जायेगा. मैं भी रेखा चची से कह आया था की अब से मैं रोज़ाना आउगा उनके घर. इस लिए वो दोनों भी ऐसा वैसा करने का नहीं सोचेगी. मैंने बाते भी ऐसी की थी जिससे उनके दिमाग में बात बैठ जाये की मुझे उन पर शक हो गया है. शक ऐसी चीज़ है जो उन्हें ऐसा काम करने से रोकेगा और यही मैं चाहता था.
भाई लोग....
आज के लिए इतना hi....
रीड एन्जॉय & गिव योर फीडबैक....
कीप सपोर्टिंग & स्टे विथ....
:थैंक्यू:
अपडेट = 31
अपने कमरे में बीएड पर लेता मैं आज के सरे दिन के बारे में सोच रहा था. रेखा चची काफी हसमुख स्वभाव की थी और मस्त मालदार औरत भी थी. उनका जिसम मस्त कैसा हुआ था. मुझे सबसे ज़्यादा उनकी बड़ी बड़ी चूचिया अच्छी लगी थी. जब वो मेरे पास hi बैठ गयी थी तो मेरी नज़र बार बार ब्लॉउज को फाड़ कर बाहर निकलने को आतुर उनकी छाहतियो पर पद जाती थी. चची ने ज़रूर महसूस किया होगा की मैं उनकी छतियो को देख लेता था.
रात काफी हो गयी मगर आज प्रिय पूजा मेरे कमरे में सोने के लिए नहीं आयी. मैं समझ गया की वो दोनों आज शाम को हुए इंसिडेंट से मेरे सामने आने से कटरा रही हैं. मैं उन दोनों से कल सुबह बात करने का सोचते हुए सो गया.
अब आगे पढ़िए....
सुबह मैं अपने टाइम पर उठा और नीचे बाथरूम में फ्रेश होने के लिए चला गया. फ्रेश हो कर वापस आया तो मेरी नज़र रसोई की तरफ गयी तो देखा वह लाइट जल रही थी. मैं समझ गया की दीदी रसोई में चाय बना रही हैं. मैं रसोई की तरफ बढ़ गया. थोड़ी hi देर में मैं रसोई के दरवाजे पर पहुंच गया. मेरे आने की आहात से दीदी ने पलट कर मेरी तरफ देखा.
"तुम यहाँ क्या कर रहे हो विक्की.?" दीदी ने ये कहा तो मुझे अजीब सा लगा. फिर मैंने कहा.
"ये कैसा सवाल है दीदी.? क्या मैं यहाँ नहीं आ सकता.?" मैंने थोड़ा दुखी हो के ये कहा तो दीदी ने कहा.
"हाँ आ सकते ho...magar." दीदी ने ये कहा तो मैंने कहा.
"फ़िक्र मत कीजिये दीदी. अगर आपको मेरे आने से किसी तरह की तकलीफ होती है तो आज के बाद अब कभी नहीं आउगा और ये मेरा वडा है आपसे. मैंने जब देखा की रसोई में आप चाय बना रही हैं तो बस चाय के लिए hi आ गया था यहाँ. मगर कोई बात नहीं." मैंने बड़ी मुश्किल से इतना कहा और पलट कर वापस चल दिया अपने कमरे की तरफ. मेरा दिल बुरी तरह दुःख गया था. मुझे रोना आने लगा था. मैंने दीदी का कोई जवाब सुने बिना hi अपने कमरे की तरफ चला आया था.
कमरे में आ कर मैं बीएड पर लेट गया. मुझे बहुत तेज़ रोना आ रहा था मगर मैं रोना नहीं चाहता था. इस लिए अपने आपको मजबूती से सम्हाला और आँखे बंद किये लेता रहा. थोड़ी hi देर में कमरे का दरवाजा खुला तो मैंने आँखे खोल कर देखा तो दीदी हाथ में ट्रे लिए दरवाजे के पास कड़ी थी. उनकी आँखों में आँशु साफ़ दिख रहे थे. वो कमरे के अंदर नहीं आयी बस दरवाजे पर hi ट्रे लिए कड़ी रही. मैं भी बीएड से नहीं उठा और फिर से अपनी आँखे बंद कर ली.
तभी मैंने दीदी के कदमो की आहात सुनी. शायद वो कमरे के अंदर आ गयी थी. मगर मैं आँखे बंद किये चुप चाप लेता रहा. तभी मेरे कानो में दीदी की आवाज़ पड़ी. वो मुझसे कह रही थी की विक्की चाय पि लो. उनके ऐसा कहने पर भी मैंने आँखे नहीं खोली और न hi कुछ बोलै. थोड़ी देर बाद मुझे दीदी के सिसकने की आवाज़ सुनाई दी तो मैंने आँखे खोल कर देखा.
कुसुम दीदी पास में hi रखे स्टूल पर बैठी सिसक रही थी. उनका सर नीचे झुका हुआ था और चाय का ट्रे कमरे के फारस पर रखा था. उन्हें इस तरह रट देख मुझे तकलीफ तो बहुत हुयी मगर मैं कुछ न बोलै बल्कि बीएड से नीचे उतरा और फारस पर रखे ट्रे से चाय का कप उठा लिया और फिर बीएड पर आ कर बैठ गया. उधर दीदी वैसी hi पोजीशन में सिसकती रही.
"मैंने तो अपनी तरफ से बहुत चाहा की आपके हर दुःख तकलीफ को अपने सीने से लगा लू और आपको दुनिया की हर ख़ुशी दू मगर आपने कभी ये चाहा hi नहीं की इन दुखो से आपको छुटकारा मिले. सच तो ये है की आप चाहती hi ये हैं की आप घुट घुट कर जिए. खेर chhodiye...jaiye didi..maine चाय का कप ले लिया है. अब jaiye...aur जो दिल करे वो कीजिये." मैंने ये सब कहा तो दीदी ने सर उठा कर मेरी तरफ देखा.
दीदी का चेहरा आंशुओ से भीगा हुआ था. ये देख कर मेरी रूह तक तड़प उठी मगर मैं चाह कर भी कुछ नहीं कर सकता था. ये सब उन्होंने खुद चुना था तो अब ये दुःख तकलीफ तो उन्हें साहनी hi पड़ेगी.
"तुझे क्या लगता hai...main ये दुःख ये तकलीफ ख़ुशी से सह रही हु.? मेरा भी मन करता है की मैं सबकी तरह खुश राहु और सब की तरह हसी मज़ाक करू मगर ये मेरी किस्मत में है hi नहीं." दीदी ने रट हुए ये कहा तो मैंने कहा.
"किस्मत को इस तरह दोष नहीं दिया जाता दीदी. किस्मत पहले से लिखी हुयी नहीं होती है बल्कि उसे बनाना पड़ता है. हम अपने कर्मो से अपना भाग्य बनाते हैं. आप चाहती hi नहीं हैं की आपका भाग्य ख़ुशी से भरा हो. बेवजह किस्मत को दोष दे रही हैं आप." मैंने ये कहा तो दीदी ने कहा.
"कहने में और करने में फर्क होता है विक्की मगर छोड़ जाने दे. तू मेरी मजबूरियों को नहीं समझेगा." दीदी ने ये कहा और स्टूल से उठ कर कड़ी हो गयी. फर्श पर रखा ट्रे भी उठा लिया था उन्होंने.
"आप जिन मजबूरियों की बात कर रही हैं न दीदी उन मजबूरियों को मैं बहुत पहले समझ चूका था और ये भी जनता हु की उन बजबूरियो को साथ में ले के चलने का कोई मतलब नहीं है और न hi उससे किसी का भला होगा. ज़िन्दगी में खुश रहना है तो वही करो जो दिल कहे." मैंने ये कहा तो दीदी ने कहा.
"मैंने कहा न की कहने और करने में बहुत फर्क होता है. खेर chhod...tu खुश रह यही मेरी कामना है बस." दीदी ने ये कहा और कमरे से बाहर चली गयी.
मैं सब समझ रहा था. वो अपने आप से भाग रही थी. वो हकीकत से भाग रही थी और हकीकत से दर भी रही थी. उनके जाने के बाद मैं काफी देर तक उनके बारे में सोचता रहा. उस वक्त मेरा मन दुखी हुआ था जिसकी वजह से मैंने उनसे वडा कर लिया था मगर अब लग रहा था की मुझे वडा नहीं करना चाहिए था. मगर अब तो कुछ नहीं हो सकता था. मैंने भी फ्यूचर पर छोड़ दिया सब कुछ.
जब सुबह के 6 बजे तो मैं उठा और प्रिय पूजा के कमरे की तरफ बढ़ गया. उनके कमरे के दरवाजे को मैंने हलके से अंदर की तरफ धकेला तो वो खुल गया. वैसे मुझे इस तरह उनके कमरे में बिना आवाज़ लगाए जाना तो नहीं चाहिए था क्यों की वो जाने किस हालत में पड़ी सो रही हो. मगर मुझे ये भी पता था की वो उस हालत में तो नहीं सो रही होंगी जिस हालत में कल शाम को मैंने उन्हें देखा था.
कमरे के अंदर आया तो देखा दोनों गहरी नींद में सोई हुयी थी. दोनों एक दूसरे की तरफ पीठ किये लेती होती थी और दोनों ने पुरे कपडे पहने हुए थे. मैं बीएड के पास पंहुचा और दोनों को ध्यान से देखा. दोनों hi सोते हुए छोटी बच्ची की तरह मासूम लग रही थी. मुझे दोनों पर बहुत ज़्यादा प्यार आया तो मैं बीएड के किनारे पर बैठ गया. प्रिय इस तरफ hi थी जिस तरफ मैं बैठा था जबकि पूजा उसके दूसरी तरफ थी. मैंने झुक कर प्रिय के कोमल गाल पर हलके से चूमा और फिर उठ कर मैं घूमते हुए पूजा की तरफ गया और उसके गाल पर भी चूमा. उसके बाद मैंने थोड़ा ुचि आवाज़ में गुड मॉर्निंग माय एंगेल्स कहा तो दोनों hi थोड़ा हिली मगर उनकी नींद न टूटी.
मैं दोनों को देख रहा था और तभी मेरी आँखों के सामने कल शाम वाला वो मंज़र घूम गया. उफ्फ्फ्फ़ एक पल में मेरा दिमाग खराब हो गया. मैंने अपने दिमाग को ज़ोर से झटक दिया और इस बार मैंने दोनों को हिलाते हुए उन्हें जगाने की कोशिश की तो थोड़ी hi देर में दोनों अंगड़ाई लेते हुए जाग गयी. मगर जैसे hi दोनों ने मुझे देखा तो दोनों की हालत अजीब सी हो गयी. शायद तभी उन्हें याद आ गया था की कल शाम मैंने दोनों को नंगी हालत में देख लिया था. ये याद आते hi दोनों बुरी तरह शरमाते हुए सिकुड़ गयी. मैं समझ गया की ये दोनों अभी नार्मल नहीं हो सकती मगर मुझे दोनों को नार्मल करना था.
"क्या hua....meri दोनों परिया इस तरह सिकुड़ क्यों गयी.? चलो utho....maine तो तुम दोनों को गुड मॉर्निंग भी किया और तुम दोनों के गालो पर किश भी किया और अब तुम दोनों भी गुड मॉर्निंग करो. उसके बाद मुझे गरमा गरम अपने हाथ की बानी चाय भी पिलाओ." मैंने ये सब कहा तो दोनों ने एक दूसरे को देखा. उनके चेहरे पर देख कर ऐसा लगा जैसे वो अपने आपको नार्मल करने की कोशिश कर रही हैं.
"और हाँ ये बताओ की कल रात तुम दोनों मेरे कमरे में आयी क्यों नहीं.? कितना इंतज़ार किया मैंने तुम दोनों ka...fir पता नहीं कब मैं सो गया था. खेर छोडो और जल्दी से गुड मॉर्निंग करो." मैंने मुस्कुराते हुए ये कहा तो दोनों के चहरो पर चमक आयी और फिर दोनों थोड़ा सा मुस्कुरायी.
मैं चाहता था की दोनों नार्मल हो जाये और उनके दिमाग से कल शाम वाला किस्सा हैट जाये. मैं दोनों के पास hi बीएड के किनारे पर बैठा हुआ था और दोनों के गुड मॉर्निंग करने का इंतज़ार कर रहा था. कुछ hi देर में वो दोनों उठी और फिर मेरे पास खिसक कर आयी. दोनों के चेहरे पर शर्म की लाली अभी भी मैं साफ़ देख सकता था. मेरे करीब आ कर दोनों मेरे चेहरे पर झुकी और फिर दोनों ने मेरे गालो पर एक साथ किश किया और फिर गुड मॉर्निंग कहा.
"ये हुयी न बात. अब जा कर मुझे अच्छा लगा है. तुमको पता है कल रात अकेले मुझे बीएड पर बिलकुल भी अच्छा नहीं लग रहा था. तुम दोनों की आदत हो गयी है मुझे." मैंने ये कहा तो दोनों मुस्क़ुआई फिर पूजा ने कहा.
"भाई वो हम कल शाम को जो हुआ उसकी वजह से नहीं आये थे. हमारी हिम्मत hi नहीं हो रही थी तुम्हारे सामने आने की." पूजा ने ये कहा hi था उसके बाद प्रिय भी बोल पड़ी.
"भाई उसके लिए हम बहुत ज़्यादा शर्मिंदा हैं. उसके बाद तो हमें ऐसा लग रहा था जैसे की शर्म से कही डूब के मर जाये." प्रिय ने नज़रे झुका के ये कहा तो मैंने कहा.
"खबरदार मरने की बात की तो. देखो जो कुछ भी हुआ उसे भूल जाओ. उसमे किसी की कोई गलती नहीं थी. जो कुछ भी हुआ वो अनजाने में हुआ. अब वो सब भूल जाओ और जैसे पहले मेरे साथ हस्ते बोलते थे वैसे hi हसो बोलो. अब चलो जल्दी से फ्रेश हो लो और फिर मुझे चाय पिलाओ. मैं अपने कमरे में जा रहा हु. चाय ले कर वही आ जाना ठीक है.?" मैंने दोनों की तरफ बारी बारी से देखते हुए ये कहा तो दोनों ने हाँ में सर हिलाया और फिर ख़ुशी ख़ुशी बीएड से उतर कर कमरे से बाहर चली गयी. उनके जाने के बाद मैंने भी राहत की सांस ली और अपने कमरे में आ गया.
अपने कमरे में बीएड पर लेता मैं आज के दिन के बारे में सोच रहा था. आज रचना मेरे घर आने वाली है और माँ उससे जाने क्या क्या बात करेगी. फिर मुझे रेखा चची का ख़याल आया. आज दोपहर को सरपंच काका रेखा चची के घर जायेगे और उनकी गांड छोड़ेगे. ये ख़याल आते hi मेरे जिसम में झुरझुरी सी हुयी. मेरे मन में ये ख़याल आया की आज सरपंच को भी थोड़ा झटका देना चाहिए मगर सवाल था की कैसे.?
दोपहर को मैं कमरे से नीचे आया और बाहर की तरफ जाने hi लगा था की पीछे से माँ ने मुझे आवाज़ दी तो मैं रुक गया और पलट कर उनकी तरफ देखा. मेरे करीब आ कर माँ ने मुझसे पूछा की कहा जा रहा हु मैं तो मैंने उन्हें बताया की ज़रूरी काम से जा रहा हु. मेरी बात सुन कर माँ ने कहा की रचना आने वाली है और वो चाहती हैं की जब रचना से उनकी बात हो तो मैं भी उनके पास राहु.
मुझे माँ की इस बात ने परेशानी में दाल दिया. मैं तो रेखा चची के घर की तरफ जा रहा था. मैं चाहता था की जब सरपंच वह पहुंचे तो उसका मुझसे टकराव हो मगर यहाँ तो माँ मुझसे रुकने का कह रही थी. मैंने माँ से कहा की उन्हें रचना से जो भी बात करना हो वो कर ले. मेरा काम से बाहर जाना ज़रूरी है. मेरी इस बात से माँ ने मुझे कुछ देर तक देखा और फिर कहा ठीक है जाओ.
माँ की इजाज़त मिलते hi मैं अंदर से खुश हुआ और फिर घर से बाहर आ गया. बाहर आ कर जैसे hi मैं सड़क पर आया तो मुझे सामने से आती हुयी रचना दिखी. उसे देख कर मैं थोड़ा रुका और फिर आगे बढ़ने लगा. मैंने देखा की रचना कुछ सोचते हुए आ रही थी. उसका ध्यान कही और था. उसने मुझे देखा नहीं था जबकि मैं उसे hi देख रहा था. वो दूध की तरह गोरी थी. चेहरा आज भी बहुत सुन्दर था उसका जिसमे संसार भर की मासूमियत थी. उसकी गर्दन से नीचे का हिस्सा मोटा हो गया था. जो थोड़ा अजीब सा लगता था.
मैं जैसे hi उसके थोड़ा पास पंहुचा तो एकदम से उसकी नज़र मुझ पर पड़ी तो वो पहले सकपकायी फिर शायद उसने अपने आपको सम्हाला था. उसके गुलाबी होठो पर हलकी सी मुस्कान उभरी. मुझे समझ न आया की मैं उसकी उस मुस्कान पर कैसे रियेक्ट करू.? मगर मुझे इस बात का अहसास था की ये वो लड़की है जिसने मेरे लिए कितना बड़ा त्याग किया है और मेरे न रहने पर मेरे परिवार की रक्षा की है. मुझ में उसका निरादर करने की हिम्मत न हुयी बल्कि उसके लिए सम्मान जगा मेरे मन में.
जब वो मेरे बिलकुल करीब आ गयी तो उसने hi मुझसे पूछा कैसे हो विक्की तो मैंने धीरे से थोड़ा मुस्कुराते हुए जवाब दिया ठीक हु. उसके बाद मैं आगे बढ़ गया. सड़क पर रुक कर उससे बात करना ठीक नहीं था. उसे भी ये बात पता थी इस लिए उसने भी मुझसे रुकने को नहीं कहा और मेरे घर के दरवाजे की तरफ बढ़ गयी.
रचना के बारे में सोचते हुए मैं थोड़ी hi देर में रेखा चची के घर के पास पहुंच गया. उनके घर के बाहर बने मिटटी के चबूतरे पर आज वो बच्चा नहीं था जिसका नाम बबलू था. आस पास के घरो के बाहर भी कोई नहीं दिखा. मैं समझ गया की सरपंच के आने का टाइम सही है. इस वक्त आस पास के घरो के बाहर कोई था नहीं जिससे सरपंच को रेखा चची के घर के अंदर जाने में कोई प्रॉब्लम नहीं होनी थी.
मैंने सोचा रघुवीर काका तो खेतो पर होंगे इस वक्त. क्यों की अगर वो घर पर होते तो रेखा चची सरपंच को आने से मन कर देती. मतलब साफ़ था की रघुवीर काका खाना पीना करके खेत जा चुके थे. मुझे समझ न आया की अब मैं क्या करू. मैं चची के घर के अंदर जाओ या बाहर hi सरपंच के आने का इंतज़ार करू. घर के बाहर खड़े रहना भी ठीक नहीं था इस लिए मैं आगे की तरफ धीरे धीरे चल दिया. रघुवीर काका के घर के बगल से उनके बड़े भाई तेजवीर काका का घर था. रघुवीर काका दो भाई थे और दोनों hi खेती बाड़ी करते थे. मैंने अंदाज़ा लगाया की तेजवीर काका भी शायद खेतो पर hi होंगे. उनके घर के थोड़ा आगे एक बरगद का बड़ा सा पेड़ था जो सड़क के किनारे पर था और उसके नीचे पक्का चबूतरा बना हुआ था लोगो के बैठने के लिए. मगर इस वक्त वह पर कोई नहीं था.
मैं उस चबूतरे तक गया और आस पास के घरो की तरफ देखने के बाद वापस मुद आया. मुद कर जैसे hi मैं तेजवीर काका के घर के सामने आया तो मेरी नज़र उनके घर के दरवाजे पर पड़ी. उनके घर का दरवाजा उसी वक्त खुला था और दरवाजे से रेखा चची और उनका छोटा सा बीटा बबलू निकला था. रेखा चची अपनी जेठानी के घर आयी थी. ये देख कर मुझे कल की बात याद आयी की उन्होंने अपनी जेठानी को भी सरपंच से छुड़वाने के लिए तैयार कर लिया था. इसका मतलब कही ऐसा तो नहीं की आज उनकी जेठानी सरपंच से छोड़ने के लिए आने वाली है रेखा चची के घर में. मुझे मेरा ये ख़याल सही तो लगा मगर उनकी जेठानी तो बाहर निकली नहीं. शायद बाद में आये वो.
रेखा चची की नज़र जब मुझ पर पड़ी तो पहले तो वो चौंकी फिर मुस्कुराते हुए मेरे पास आयी और बोली कहा जा रहे हो विक्की.? उनके पूछने पर मैंने उन्हें झूठ मुठ का बताया की मैं आज अपने खेतो की तरफ गया था और अभी वही से आ रहा हु और अब घर जा रहा हु. मेरी ये बात सुन कर चची ने मुस्कुराते हुए कहा की खेती बाड़ी के काम में बहुत म्हणत लगती है विक्की और ये तुम्हारे बस का नहीं है. उनकी इस बात से मैंने कहा की हाँ ये मैं जनता हु और इसी लिए सोच रहा हु की दो चार मजदूर लगा लू जिससे काम आसानी से हो सके.
मैं उनसे बाते करते हुए hi चलते हुए उनके घर के सामने आया. जब मैं उनके घर के सामने आया तो मैं चाह रहा था की चची मुझसे अपने घर आने को कहे मगर ऐसा न हुआ. मैं समझ गया की वो मुझसे ऐसा कह भी नहीं सकती थी क्यों की आज सरपंच या तो उनकी गांड का उद्घाटन करने आने वाला है या फिर उनकी जेठानी की छूट मरने. जब मुझे लगा की चची मुझे आने को नहीं कहेगी तो मैंने hi कहा की चची बड़ी प्यास लगी है. मेरी ये बात सुन कर चची ने मुस्कुराते हुए कहा की आ जाओ मैं तुम्हे पानी पिलाती हु.
रेखा चची की इस बात से मैं मन hi मन खुश हो गया और फिर उनके साथ उनके घर के दरवाजे की तरफ चल पड़ा. मेरी नज़र उनके बेटे पर पड़ी जो मुझे hi देखे जा रहा था. मैं समझ गया की वो मुझे क्यों देखे जा रहा था. उसे पता था की मैं आज भी उसे पैसे दुगा और वो उन पैसो से गुड़ नमकीन दूकान से खरीद कर लाएगा और फिर खायेगा. मुझे मन hi मन उसकी मासूमियत पर और उसकी इस आस पर प्यार आया.
थोड़ी hi देर में मैं चची के साथ उनके घर के अंदर आया और फिर चची मुझे बैठक में बिठा कर अंदर पानी लेने चली गयी. उनके जाते hi बबलू ने मुझसे कहा की भैया मैंने माँ को नहीं बताया की कल तुमने मुझे पैसा दिया था. मैंने उसकी ये बात सुनी तो मुस्कुराते हुए उससे कहा की अच्छा किया जो नहीं बताया. मेरी इस बात से वो खुश हो गया और फिर बोलै की आज भी मुझे पैसा डोज तो मैंने अपनी पॉकेट से निकल कर उसे दस रूपया दिया और कहा की इसे छुपा कर रखे और बाद में जो खाना हो खरीद के खा लेना. बबलू ने मेरे हाथ से पैसा ले कर जल्दी से अपने हाफ पेंट की छोटी सी पॉकेट में छुपा लिया. उसका चेहरा ख़ुशी से चमकने लगा था.
तभी रेखा चची लोटा गिलास में पानी ले कर आयी और मुझे गिलास थमा दिया. मैंने पानी से भरा गिलास देखा और फिर रेखा चची की तरफ देखते हुए मुस्कुरा कर कहा क्या चची सिर्फ पानी पिलाएगी आप मुझे.? रघुवीर काका होते तो मुझे बिना खाना खाये न जाने देते. इससे ये साफ़ हो गया की काका मुझे ज़्यादा मानते हैं और आप काम. मेरी इस बात से चची हड़बड़ा गयी मगर फिर जल्दी hi खुद को सम्हाल भी लिया और फिर मुस्कुराते हुए बोली. नहीं विक्की ऐसी तो कोई बात नहीं hai...wo तुमने सिर्फ पानी पिने को कहा तो मैं पानी ले कर आ गयी. उनकी इस बात से मैंने मुस्कुराते हुए कहा की अपने से तो कोई भी ये नहीं कहता चची की मुझे खाना खिला दो. ज़्यादातर लोग पानी के लिए hi कहते हैं. अब ये तो सामने वाले की सोच पर निर्भर करता है की वो उसे सिर्फ पानी पिलाता है या और भी कुछ खिलता पिलाता है.
मेरी इस बात से चची मुस्कुराते हुए बोली अच्छा बाबा माफ़ करो मुझे. गलती हो gayi...chalo मैं तुम्हे खाना खिलाती हु. उनकी इस बात पर मैंने कहा अब रहने दीजिये चची. ये तो आपको पहले सोचना चाहिए tha...jab मैंने कहा तब आपने कहा तो क्या मतलब रह गया. चलिए कोई बात नहीं रघुवीर काका जब मिलेंगे मुझे तो उनसे कहुगा मैं की आप नहीं थे तो चची ने मुझे सिर्फ पानी पीला कर hi भेज दिया था.
मेरी इस बात से चची ने मुस्कुराते हुए कहा तुम भी कमाल करते हो विक्की. अब माफ़ भी कर दो न अपनी इस मासूम सी चची को. मैं कह तो रही हु न की चलो मैं तुम्हे खाना खिलाती हु. उनकी इस बात पर मैंने हस्ते हुए kaha...na अब तो मैं काका से ऐसा कह कर hi रहुगा. मैं उनसे कहुगा की आप तो मुझसे प्यार करते हैं मगर चची नहीं करती हैं. उन्होंने मुझे सिर्फ पानी पीला कर घर से भगा दिया है आज.
मेरी इस बात से चची मुझे हैरानी से देखती रह गयी जबकि मैं उनकी तरफ मुस्कुराते हुए देखता रहा. चची कुछ देर तक मुझे मुस्कुराते हुए देखती रही फिर कुछ कहने hi वाली थी की तभी घर का दरवाजा बाहर से खटखटाया गया. खटखटाने की आवाज़ सुनते hi चची के चेहरे का रंग उड़ता नज़र आया मुझे. उनके चेहरे पर घबराहट दिखी मुझे तो मैं समझ गया की बाहर शायद सरपंच आ पंहुचा है और वही दरवाजे को खटखटा रहा है. मगर मेरे रहते हुए चची दरवाजा खोल कर उसे अंदर कैसे आने दे सकती थी.?
रेखा चची हैरान परेशां सी कड़ी रह गयी तो मैंने चची से कहा की देखिये तो कौन आया hai...shayad काका होंगे. मेरी इस बात से चची हड़बड़ा गयी और मुझे अजीब तरह से देखने लगी तो मैंने कहा क्या हुआ chachi....aap मुझे इस तरह क्यों देख रही hain...ja कर दरवाजा खोलिये न. मैंने ये कहा hi था की दरवाजा फिर से खटखटाया गया. मैंने देखा की चची की हालत खराब होने लगी थी. उनके चेहरे का रंग उड़ गया था. मगर दरवाजा तो खोलना hi पड़ेगा उन्हें ये बात उन्हें भी पता थी. इस लिए जैसे hi वो बाहर की तरफ जाने लगी तो तभी बैठक में चची की जेठानी आती दिखी और उनके साथ बबलू भी. मैं समझ गया की दरवाजा बबलू ने खोल दिया था जबकि मैं और चची ने उसकी तरफ ध्यान hi नहीं दिया था की वो कब दरवाजा खोलने चला गया था.
अपनी जेठानी पर नज़र पड़ते hi चची के चेहरे पर राहत दिखी और फिर उनकी हालत भी ठीक हो गयी. मगर मैं मन hi मन ये सोच कर हसे जा रहा था की कुछ देर पहले इनकी हालत ये सोच कर खराब हो गयी थी की बाहर शायद सरपंच आ गया था. इधर चची की जेठानी के आने से मैं ये समझ गया की आज सरपंच इनकी जेठानी की चुदाई करेगा. उधर चची की जेठानी बैठक में आयी और फिर जब उनकी नज़र मुझ पर पड़ी तो वो हैरानी से कभी मुझे देखती तो कभी रेखा चची को. शायद उन्हें उम्मीद नहीं थी की यहाँ मैं मौजूद होगा.
रेखा चची की जेठानी का नाम उर्मिला था. उनका रूप रंग रेखा चची से थोड़ा साफ़ था और दिखने में भी मस्त पटाखा लग रही थी. उनकी उम्र यही कोई 35 या 38 साल की रही होगी. मुझे देख कर वो हैरान तो हुयी थी मगर जल्दी hi खुद को सम्हाल भी लिया था. उसके बाद मुस्कुराते हुए मुझसे boli...kya बात है विक्की आज हमारे घर में.? उनके ऐसा कहने पर मैंने मुस्कुराते हुए कहा की क्या मैं यहाँ नहीं आ सकता चची.? मेरे ऐसा कहने पर उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा की बिलकुल आ सकते हो ये भी तो तुम्हारा hi घर है. उसके बाद मैंने उन्हें बताया की कैसे मैं यहाँ आया और कैसे रेखा चची मुझे सिर्फ पानी पीला कर यहाँ से तर्क देना चाहती थी. मेरी ये बात सुन कर दोनों चची मुझे हैरानी से देखने लगी. रेखा चची ने कहा की तुम भी न vicky...kyo मुझे तंग कर रहे हो.? मैं कह तो रही हु चलो मैं तुम्हे खाना खिला देती हु.
मैंने भी सोचा की अगर मुझे यहाँ रुकना है तो थोड़ा बहुत खाना खाने का नाटक करना hi पड़ेगा. मैं चाहता था की जब सरपंच की यहाँ एंट्री हो तो उसका सामना मुझसे ज़रूर हो. मैं देखना चाहता था की जब वो मुझे यहाँ देखेगा तो उसकी हालत क्या होती है.?
मैंने रेखा चची से कहा की ठीक है अब जब कह hi दिया है तो ले आइये कुछ खाने को क्यों की मुझे भूख भी लगी है. आखिर खेतो की तरफ से आया हु. मैंने ये कहा तो दोनों चाचियों के चेहरे पर परेशानी दिखने लगी. मगर वो मुझे यहाँ से जाने का कह भी नहीं सकती थी. मैं उनकी बहुत बड़ी आफत बन कर आ गया था यहाँ और वो दोनों अब बेबस सी हो गयी थी. खेर मेरे कहने पर रेखा चची को अंदर जाना hi पड़ा खाने के लिए कुछ लेन के लिए. उन्होंने सोचा था की मैं बस ऐसे hi कह रहा था. उन्हें क्या पता था की मैं सच में खाना खाने के लिए उनसे खाना मगाऊगा.
रेखा चची अंदर गयी तो उनके पीछे उर्मिला चची भी चली गयी. मैं समझ गया की अब दोनों अंदर कोई सलाह वगैरा करेगी. मगर मुझे इससे kya..main तो यहाँ सरपंच के आने का इंतज़ार hi करने वाला था. दोनों की हालत देख कर मुझे मज़ा भी बहुत आ रहा था. आखिर उनके लिए कबाब में हड्डी जो बन गया था मैं.
मुझे इंतज़ार करते हुए पांच मिनट से ज़्यादा हो गए थे मगर दोनों चचिया अंदर से नहीं आयी थी. मैं समझ सकता था उनकी हालत को मगर मैं उनको राहत देने का काम करने वाला नहीं था अभी. मैं ये सोच hi रहा था की तभी बाहर का दरवाजा एक बार फिर से खटखटाया गया और इस बार मैं पक्का सूरे हो गया की सरपंच ने दरवाजा खटखटाया था. ये सोचते hi मैं बहुत खुश हो गया मगर मेरा दिल भी ज़ोरो से धड़कने लग गया था.
उधर दरवाजा खटखटाने की आवाज़ शायद अंदर तक भी पहुंच गयी थी. तभी तो रेखा चची भागते हुए आयी थी. उनके चेहरे पर इस बार बारह बजे हुए थे और चेहरे का रंग एक बार से उदा हुआ दिखा मुझे. बैठक में आते hi उन्होंने मुझे देखा तो मैंने जल्दी से कहा क्या हुआ चची खाना नहीं ले आयी आप.? मेरी इस बात पर चची से कुछ कहते न बना. उधर दरवाजा फिर से खटखटाया गया तो इस बार मैंने चची से कहा की रुकिए मैं दरवाजा खोलता हु आप खाना ले कर आइये. मेरी इस बात से चची बुरी तरह घबरा गयी और फिर जल्दी से boli...nahi विक्की रुको. मैं जा के देखती हु कौन hai...tum बैठो यही. उनकी इस बात पर मैंने उनकी घबराहट को और बढ़ने के लिए pucha...kya बात है चची आप इतना घबराई हुयी क्यों लग रही हैं.? कोई परेशानी है क्या.?
मेरी इस बात से चची बुरी तरह हड़बड़ा गयी और फिर हकलाते हुए boli....nahi तो. मैं कहा घबराई हुयी हु vicky...tumhe ऐसे hi लग रहा है. तुम बैठो yahi...main दरवाजा खोल कर देखती हु की कौन आया है बाहर. चची ने ये कहा तो मैंने कहा ठीक है. मेरे ऐसा कहने पर चची बैठक से बाहर की तरफ बढ़ गयी तो मैं भी अंदर की तरफ एक बार नज़र दाल कर उनके पीछे चुपके से दबे पाँव बैठक से बाहर की तरफ चल दिया.
उधर रेखा चची दरवाजे के पास पहुंच चुकी थी और फिर उन्होंने कांपते हाथो से दरवाजा खोला. मैं दिवार के पीछे hi छिप गया था और मैं यहाँ से दरवाजे की तरफ साफ़ देख सकता था. जैसे hi दरवाजा खुला तो बाहर सरपंच खड़ा दिखा मुझे. सरपंच को देखते hi रेखा चची की हालत खराब हो गयी.
"क्या बात है मेरी rani....itni देर क्यों लगा दी दरवाजा खोलने में.?" दरवाजा खुलते hi सरपंच ने चची को देख कर धीरे से ये कहा तो चची बुरी तरह घबरा गयी और फिर जल्दी से पीछे पलट कर एक बार देखा और फिर सरपंच से बोली.
"तुम यहाँ से चले जाओ अभी. इस वक्त तुम्हारा यहाँ आना बहुत बड़ी मुसीबत खड़ा कर देगा." चची ने ये कहा तो सरपंच ने हैरानी से पहले चची को देखा फिर थोड़ा नाराज़गी से बोलै.
"तुम मुझे ऐसे कैसे यहाँ से जाने का बोल सकती ho...aur तुम कौन सी मुसीबत के खड़ा होने की बात कर रही हो.? तुम्हे शायद पता नहीं है की मैं खुद इस गांव के लोगो के लिए एक बहुत बड़ी मुसीबत हु. यहाँ कोई भी मेरे लिए मुसीबत नहीं बन सकता. अब हटो दरवाजे से और मुझे अंदर आने दो. मेरा दिमाग ख़राब हो गया तो तुम सोच भी नहीं सकती हो की मैं क्या कर सकता हु तुम्हारे और तुम्हारे पति के साथ." सरपंच ने रेखा चची को जैसे धमकी देते हुए ये कहा तो रेखा चची बुरी तरह दर गयी मगर वो भला कैसे सरपंच को अंदर आने दे सकती थी.?
"तुम समझ नहीं रहे हो मेरे राजा. इस वक्त तुम अंदर नहीं आ सकते." रेखा चची ने घबराते हुए ये कहा तो सरपंच ने इस बार कुछ सोचते हुए कहा.
"क्या बात hai...koi परेशानी है क्या.? कही तुम्हारा पति तो घर के अंदर नहीं है मगर वो तो इस वक्त खेतो पर होता है न.?" सरपंच ने ये कहा तो रेखा चची ने बेबसी से अभी कुछ कहना hi चाहा था की तभी मैं दिवार के पीछे से निकल कर उनके पीछे आ गया. असल में मैंने सोचा की ये सही टाइम है सरपंच को और चची दोनों को झटका देने का. यही सोच कर मैं एकदम से चची के पीछे आ कर खड़ा हो गया था और फिर इस तरह बोल पड़ा जैसे मुझे कुछ पता hi न हो.
"क्या हुआ chachi...kaun आया है बाहर.? कितनी देर लगा दी आपने.? मैं यहाँ खाने के इंतज़ार में बैठा हु और आप यहाँ किस्से बाते कर रही हैं.?" मैंने अनजान बनते हुए जैसे hi ये सब कहा तो दोनों के देवता कुछ कर गए. रेखा चची की हालत तो बदतर हुयी hi मगर मुझे देखते hi सरपंच की भी जैसे नानी मर गयी.
दरवाजे के दोनों पल्लो को पकडे खड़ा सरपंच मुझे देखते hi एकदम हड़बड़ा गया था. उसके पैरो के नीचे से जैसे ज़मीन खिसक गयी थी. उसके चेहरे पर बुरी तरह घबरा जाने के निशाँ दिखे. फिर जैसे उसको होश आया तो वो एकदम से पीछे हैट गया और फिर अपने आपको बड़ी मुश्किल से सम्हाला उसने. मुझे देखते हुए वो मुस्कुरा कर बोलै.
"ारी विक्की बीटा तुम यहाँ.?" सरपंच इससे ज़्यादा कुछ बोल न पाया मगर मैं उसकी इस बात पर इस तरह मुस्कुराया जैसे वो मेरे सामने कोई बच्चा हो और उसने कोई बेवकूफाना हरकत कर दी हो. मेरे इस तरह मुस्कुराने पर सरपंच के माथे पर पसीना उभर आया.
"हाँ kaka...wo मैं खेतो की तरफ से आ रहा था तो चची मुझे यही पर मिल गयी. फिर मैंने इनसे पानी मांगा तो इन्होने सिर्फ मुझे पानी पकड़ा दिया. मैंने इनसे कहा की अगर काका होते तो मुझे बिना खाना खाये जाने नहीं देते. तब इन्होने मुझे बैठाया और कहा की ठीक है अब खाना खा कर hi जाना. इस लिए मैं यहाँ खाने का इंतज़ार hi कर रहा मगर चची इतनी देर से यहाँ आपसे बाते करने में लगी हुयी हैं और मुझे भूखा बिठा रखा है. ये तो हद है न काका.?" मैंने मुस्कुराते हुए सरपंच को ये सब बताया तो सरपंच के चेहरे पर राहत दिखी और फिर उसने मुस्कुराते हुए रेखा चची से कहा.
"क्यों रानी ये विक्की क्या कह रहा है.?" सरपंच ने चची को गलती से रानी बोल दिया तो चची हड़बड़ा कर सरपंच की तरफ देखा तो सरपंच भी हड़बड़ा गया. उसे अपनी गलती का अहसास हुआ. शायद उसकी आदत पद चुकी थी चची को रानी कहने की. इस लिए उसके मुँह से गलती से निकल गया था मगर अब क्या हो सकता था. मैंने देखा की सरपंच के चेहरे का रंग उड़ गया था. फिर उसने जल्दी से खुद को सम्हलते हुए कहा.
"ारी हाँ तुम्हारा नाम तो रघुवीर ने रेखा बताया था न. मुझे बार बार भूल जाता है. इस लिए मुँह से रानी कह दिया था मैंने. खेर chhodo....wo मैं रघुवीर से मिलने आया था. उससे कहना की मैंने उसे घर बुलाया है ठीक है na.....aur हाँ विक्की को खाना खिला देना. अच्छा अब चलता हु मैं." सरपंच ने ये सब कहा और फिर पलट कर जाने लगा. मैंने देखा की उसके कंधे पर जो सफ़ेद रंग का गमछा था उसने उसे एक हाथ पकड़ कर निकला और फिर अपने चेहरे का पसीने पोंछते हुए आगे बढ़ गया.
इधर हालत तो रेखा चची की भी बहुत खराब हो गयी थी. सरपंच का यहाँ आना और फिर एकदम से मेरा उसके पीछे से आ जाना इस सबसे उन दोनों की hi हालत खराब हो गयी थी. सरपंच के जाने के बाद भी रेखा चची वैसी hi कड़ी रह गयी थी. शायद उन्हें ख़याल hi नहीं रह गया था की सरपंच जा चूका है और वो अभी भी वैसे hi दरवाजे के पास कड़ी हैं.
"क्या हुआ chachi...ab आप कड़ी क्यों हैं इस तरह.? चलिए मुझे खाना नहीं खिलाना kya...ya मैं जाओ यहाँ से और अपने hi घर में खाना खाओ.?" मैंने मन hi मन मुस्कुराते हुए चची से ये कहा तो चची एकदम से हड़बड़ा गयी. उन्हें होश आ गया. उन्होंने जल्दी से दरवाजा बंद किया और फिर मेरी तरफ पलटी तो मैं थोड़ा पीछे हैट गया.
मैंने देखा की उनका चेहरा पसीना पसीना हो गया था मरे घबराहट के. उन्होंने अपनी साडी के आँचल से जल्दी से पसीना पोंछा और फिर मेरी तरफ मुस्कुरा कर देखा. मैं उन्हें hi देख रहा था. वो मुस्कुराने ज़रूर लगी थी मगर उनके चेहरे से घबराहट गयी नहीं थी. मैं तो उनकी हालत जनता hi था मगर वो ये दिखने की कोशिश कर रही थी की सब ठीक है.
उसके बाद मैं चची के साथ बैठक में आ गया. चची ने मुझसे अंदर चलने के लिए कहा तो मैं अंदर रसोई की तरफ आ गया. वैसे तो मैं अपने घर में खाना खा चूका था मगर इस सबसे जो ख़ुशी मुझे महसूस हो रही थी उस ख़ुशी में थोड़ा सा खा लेने में भी मुझे कोई प्रॉब्लम नहीं थी. मैं मन hi मन ये सोच कर मगन था की मैंने आज रंग में भांग दाल दिया था. बेचारी दोनों चाचियों ने क्या आस लगा रखा था और मैंने उनके आस के अस्स व्होले पर अपना मोटा सा लौड़ा दाल दिया था आज. एक चची की गांड का आज उद्घाटन होना था और दूसरी चची को आज एक नया लुंड अपनी छूट में लेने के लिए मिलने वाला था. मगर मेरी वजह से सारा गुड़ गोबर हो गया था.
रसोई में आ कर चची ने एक चटाई मेरे बैठने के लिए बिछाई तो मैं आराम से बैठ गया. उर्मिला चची रेखा चची को बड़े ध्यान से देख रही थी. शायद वो समझने की कोशिश कर रही थी की उनके चेहरे पर जो अभी भी बारह बजे हुए हैं उसका रीज़न क्या है.? मेरे सामने तो वो चची से पूछ नहीं सकती थी. मैंने सोचा की चलो थोड़ा इनकी भी हालत खराब की जाये. ये ख़याल मन में आते hi पहले तो मुझे बहुत मज़ा आया फिर मैंने मुस्कुराते हुए बोलै.
"ारी चची आपको पता hai...abhi सरपंच काका आये थे और पता है वो क्या कह रहे थे चची को.?" मैंने ये कहा तो उर्मिला चची के चेहरे का एकदम से रंग उड़ गया. उधर मेरी ये बात सुन कर रेखा चची ने भी घबरा कर देखा मुझे. दोनों ने बड़ी मुश्किल से सम्हाला अपने आप को. फिर उर्मिला चची ने मुझसे पूछा.
"क्या कह रहे थे रेखा को.?" उर्मिला चची ने मुझसे ये पूछा तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा.
"हाहाहाहा क्या बताओ chachi....wo चची को रानी कह रहे थे." मैंने ये कहा तो उर्मिला चची ने तो हैरानी से रेखा चची की तरफ देखा hi मगर मेरी इस बात से रेखा चची बुरी तरह घबरा गयी. एक बार फिर से उनका चेहरा पीने से तर हो गया. उधर उर्मिला चची ने हकलाते हुए उनसे पूछा.
"Rekha...ye विक्की क्या कह रहा है.? क्या सरपंच जी ने तुझे सच में रानी कहा था.?" उर्मिला चची ने उनसे ये पूछा तो रेखा चची ने बुरी तरह हड़बड़ाते हुए कहा.
"हाँ didi...magar ऐसा उन्होंने इस लिए कह दिया था क्यों की उनको मेरा नाम भूल गया था शायद. वो रेखा की जगह रानी कह दिए थे." रेखा चची ने सफाई देते हुए ये कहा तो उर्मिला चची हैरान रह गयी. इधर मैंने मुस्कुराते हुए कहा.
"ऐसा गलती से हो जाता है चची और सब से हो जाता है. ये कोई बड़ी बात नहीं है और मुझे तो लगता है की रेखा चची का नाम रानी hi होना चाहिए था क्यों की रानी नाम चची पर ज़्यादा अच्छा लगता है. मैंने सही कहा न चची.?" मैंने मुस्कुराते हुए उर्मिला चची से ये कहा तो रेखा चची ने मुझे हैरानी से देखा जबकि उर्मिला चची इस बार मुस्कुरा कर बोली.
"सही कहा तुमने विक्की. रेखा का नाम रानी hi होना चाहिए था. वैसे भी मेरी देवरानी किसी रानी से काम है क्या.?" उर्मिला चची ने मुस्कुराते हुए ये कहा तो रेखा चची पता नहीं क्यों बुरी तरह शर्मा गयी. वो शरमाते हुए hi आयी और मेरे सामने खाने की थाली रख दी और जा कर फिर से अपनी जगह पर बैठ गयी.
"मगर मुझे एक बात समझ में नहीं आयी बड़ी चची." मैंने उर्मिला चची की तरफ देखते हुए ये कहा तो दोनों ने मेरी तरफ अजीब तरह से देखा फिर उर्मिला चची ने पूछा कौन सी बात समझ में नहीं आयी तो मैंने कहा.
"जब मैं छोटी चची के पीछे दरवाजे पर पंहुचा तो सरपंच काका मुझे देखते hi इतना घबरा क्यों गए थे.? ऐसा लगा जैसे उनकी कोई चोरी पकड़ी गयी हो." मैंने ये कहा तो वो दोनों बुरी तरह हड़बड़ा गयी. रेखा चची की तो हालत hi खराब हो गयी. बड़ी मुश्किल से दोनों ने खुद को सम्हाला और इस बार रेखा चची ने कहा.
"तुम्हे ऐसा क्यों लगता है की वो तुम्हे देखते hi घबरा गए थे या उनकी कोई चोरी पकड़ी गयी थी मुझे तो ऐसा कुछ भी नहीं लगा." रेखा चची ने ये कहा तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा.
"क्या सच में आपको ऐसा कुछ नहीं लगा चची.?" मैंने रेखा चची की तरफ ध्यान से देखते हुए और मुस्कुराते हुए ये कहा तो रेखा चची सकपका गयी. वो अपनी नज़रे चुराने लगी. उर्मिला चची तो जैसे कुछ सोचे जा रही थी.
"H..haan मुझे तो ऐसा कुछ नहीं लगा. पता नहीं तुम्हे ऐसा क्यों लगा था.?" रेखा चची ने हकलाते हुए ये कहा तो मैंने मुस्कुरा कर कहा.
"बड़ी अजीब बात है. आप तो उनके पास में hi कड़ी थी फिर भी आपको ऐसा कुछ नहीं लगा. ये तो हैरानी की बात है चची. खेर chhodo....waise आप खाना बहुत अच्छा बनती हैं. कल शाम को जब मैंने खाया था तब भी मुझे खाना बहुत अच्छा लगा था. मगर मैंने खाने की तारीफ नहीं की थी." मैंने ये कहा तो रेखा चची ने राहत की सांस ली और मुस्कुराते हुए बोली.
"अच्छा ji...kal मेरी झूठ मुठ की तारीफ कर रहे थे और अब मेरे बनाये खाने की भी झूठ मुठ की तारीफ कर रहे हो." रेखा चची ने ये कहा तो मैंने कहा.
"अब आपको भरोसा hi नहीं तो क्या कहु मैं मगर मेरा तो मन करता है की रोज़ आपके घर आ जाया करू और आपके हाथो का बना स्वादिस्ट खाना खाया करू." मैंने ये कहा तो रेखा चची ने मेरी तरफ पहले हड़बड़ा कर देखा फिर मुस्कुराते हुए बोली.
"अच्छा ji...chalo ठीक है रोज़ आ जाना और मेरे हाथ का बना खा लिया करना." चची ने ये कहा तो मैंने मुस्कुरा कर कहा.
"सोच लीजिये chachi....main अब रोज़ाना आउगा आपके घर खाना खाने." मैंने ये कहा तो चची के चेहरे पर परेशानी नज़र आयी. मगर उन्होंने अपने आपको सम्हालते हुए और ज़बरदस्ती मुस्कुराते हुए कहा.
"इसमें सोचना क्या है विक्की.? तुम्हारा घर hai...tumhara जब मन करे आ जाना." रेखा चची ने ये कहा तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा.
"आप ये सच्चे मन से कह रही हैं या सिर्फ दिखने के लिए.?" मैंने ये कहा तो दोनों ने मेरी तरफ हैरानी से देखा फिर रेखा चची बोली.
"मैं मन से hi कह रही विक्की. तुम रोज़ आ जाना. मुझे ख़ुशी होगी की तुम मेरे हाथ का बना खाना खाने आओगे." रेखा चची ने ये कहा तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा.
"ठीक है चची. अब ये पक्का हो गया की मैं अब से रोज़ाना आपके यहाँ आउगा." मैंने हाथ मुँह धोते हुए ये कहा तो दोनों ने ज़बरदस्ती मुस्कुराने की कोशिश की.
खाना खाने के बाद मैं उठा और फिर दोनों से कुछ देर और बातचीत की मैंने. उसके बाद मैं वह से अपने घर की तरफ चल दिया. सच कहु तो मुझसे अपनी हसी रोकी नहीं जा रही थी. मुझे ये सोच कर बहुत मज़ा आ रहा था की दोनों चाचियों ने इसके पहले बड़ा ख्वाब सजाया रहा होगा. बड़ा टीम टॉम किया रहा होगा मगर मेरे आ जाने से सब पर पानी फिर गया था. उधर सरपंच का भी यही हाल हुआ होगा. आज ज़रूर उसने अपने लुंड को अच्छे से साफ़ किया रहा होगा और उसकी तेल लगा कर मालिश की रही होगी मगर उसके लुंड को छूट और गांड न मिल पायी थी.
सरे रास्ते मैं यही सब सोचते हुए मन hi मन हस्ता रहा. मेरे मन में ये भी ख़याल आया की कही ऐसा न हो की मेरे वह से आने के बाद सरपंच फिर से न रेखा चची के घर पहुंच जाये. ऐसा हो तो सकता था मगर मुझे इसके चांस काम hi लग रहे थे. क्यों की दोनों तरफ एक बात कॉमन हो गयी थी और वो थी घबराहट और दर जो उनको काम से काम आज तो ऐसा कुछ करने से रोके hi रखेंगे. कल का कल देखा जायेगा. मैं भी रेखा चची से कह आया था की अब से मैं रोज़ाना आउगा उनके घर. इस लिए वो दोनों भी ऐसा वैसा करने का नहीं सोचेगी. मैंने बाते भी ऐसी की थी जिससे उनके दिमाग में बात बैठ जाये की मुझे उन पर शक हो गया है. शक ऐसी चीज़ है जो उन्हें ऐसा काम करने से रोकेगा और यही मैं चाहता था.
भाई लोग....
आज के लिए इतना hi....
रीड एन्जॉय & गिव योर फीडबैक....
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:थैंक्यू: