SAB KUCH JAYAZ HAI... - Page 9 - SexBaba
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SAB KUCH JAYAZ HAI...

सब कुछ जायज़ है....

अपडेट = 38


माँ ने ये सब बताया तो मैं ज़्यादा तो कुछ न बोलै बस यही कहा की ऐसे आदमी के साथ ऐसा hi होना चाहिए था. दुसरो की बहु बेटियों के साथ हमेशा hi गलत किया था उसने. मैंने माँ को ये नहीं बताया की ये साडी आग मेरी hi लगाई हुयी थी. माँ ने ये भी बताया की पुरे गांव में इसी बात की चर्चा है. लोग तो ये भी कह रहे हैं की सरपंच को कठोर से कठोर सजा मिलनी चाहिए.

मैंने माँ से कहा की कल सुबह आप सब तैयार रहिएगा. हम यहाँ से सुबह चार बजे निकलेंगे. मेरी इस बात से माँ ने कहा की ज़रूरी सामान जो भी था उसे उन्होंने पैक कर लिया है. सुबह नाहा धोकर हम सब तैयार रहेंगे और जैसे hi टैक्सी आएगी हम सब उसमे सामान रख कर चल देंगे.

अब आगे पढ़िए....


शाम तक मैं अपने कमरे में hi रहा और आज की घटना के बारे में सोचता रहा था. शाम के जब सात बजे तो मैं कमरे से निकल कर नीचे आ गया. माँ और कुसुम दीदी रसोई में थी और रात के लिए खाना बनाने की तयारी कर रही थी. मैं चुप चाप घर से बाहर आ गया. बाहर आया तो देखा अँधेरा हो चूका था. मैं रेखा चची के घर की तरफ नहीं जाना चाहता था और न hi वह जाना उचित था मगर हाँ कोमल के घर जाने के लिए ज़रूर सोचा मैंने.

अभी मैं ये सोच कर सड़क की तरफ बढ़ा hi था की तभी मेरा मोबाइल फ़ोन बजा तो मैंने पेंट की पॉकेट से मोबाइल निकला. मोबाइल की स्क्रीन पर कोई अननोन नंबर शो हो रहा था. ये देख कर मैं सोचने लगा की ये किसका नंबर हो सकता है. जब कुछ समझ न आया तो मैंने कॉल पिक करके मोबाइल कान से लगा लिया.

मोबाइल कान से लगाया तो तभी मेरे कानो में जो आवाज़ पड़ी उसे मैं जल्द hi पहचान गया. ये तो रचना की कॉल आयी हुयी थी और वही बात कर रही थी. मैं पहले ये सोच कर हैरान हुआ की इसके पास मेरा नंबर कैसे फिर ध्यान आया की शायद इसने मेरे घर में माँ से या मेरी जुड़वाँ बहनो से मेरा नंबर लिया होगा.

"कैसे हो विक्की.??" मेरे कानो में रचना की ये आवाज़ पड़ी तो मैंने कहा.

"मैं ठीक हु. तुम कैसी हो.?" मैंने ये कहा तो रचना ने कहा.

"बस ठीक hi hu....to तुम सब लोग कल यहाँ से चले जाओगे.?" रचना ने ये कहा तो मैंने कहा.

"Haan....maine तो तुम्हारी भी टिकट बनवा ली थी मगर माँ ने बताया की तुम हमारे साथ अभी नहीं जा सकती." मैंने ये कहा तो रचना ने कहा.

"हाँ वो आज पिता जी के साथ जो कुछ भी हुआ उसकी वजह से मेरा यहाँ से जाना ठीक नहीं होगा और न hi अच्छा लगेगा." रचना ने ये कहा तो मैंने कहा.

"इस वक्त तुम्हारे आस पास और कौन है.?" मैंने कुछ सोचते हुए उससे ये पूछा तो उसने कहा.

"कोई नहीं है. मैं अपने कमरे में हु. वैसे भी इस वक्त घर में मैं माँ और भाभी hi हैं. रुपेश भैया और बाकी परिवार के चाचा और भैया शहर गए हैं पिता जी के साथ." रचना ने ये कहा तो मैंने कहा.

"आज जो कुछ भी काका के साथ हुआ बहुत बुरा हुआ." मैंने ये कहा तो रचना ने कहा.

"किसी की बहु बेटी के साथ ऐसा करने का यही फल मिलना चाहिए. मैं मानती हु की वो मेरे पिता हैं मगर गलत तो गलत hi होता है चाहे कोई भी करे. उनके बारे में इस गांव का बच्चा बच्चा जनता है की वो कैसे हैं. खेर chhodo..tum बताओ ये क्यों पूछ रहे थे की मेरे आस पास और कौन है??" रचना ने ये सब कहा तो मैंने कहा.

"तुम्हे एक ज़रूरी बात बताना है." मैंने ये कहा तो रचना ने कहा.

"हाँ तो बताओ न." रचना ने ये कहा तो मैंने कहा.

"मुझे कही से पता चला है की तुम्हारे पिता जी तुम्हे अपने रास्ते से हटाना चाहते हैं. ऐसा इस लिए क्यों की तुम उनके काम में रुकावट बानी हुयी हो. मुझे पता चला है की सरपंच काका मेरी माँ बहनो के साथ गलत करना चाहते हैं मगर वो तुम्हारी वजह से ऐसा कुछ नहीं कर सकते. इस लिए अब वो तुम्हे अपने रास्ते से हटाने की बात कर रहे थे. मुझे लगता है की कही वो तुम्हे......" मैंने ये कहा hi था की रचना बोल पड़ी.

"हाँ मैं जानती हु विक्की. ये सच है की मैं अपने बाप के रास्ते का रोड़ा हु और मेरे रहते वो तुम्हारे परिवार के साथ कुछ भी गलत नहीं कर सकते. मैंने भी ये सुना है की वो तुम्हारी माँ और बहनो के साथ बहुत बुरा करने की बात कहते हैं. विक्की मैं अपने बाप से अच्छी तरह परिचित हु. मुझे यकीन है की वो अपनी ख्वाहिश पूरी करने के लिए मुझे अपने रास्ते से हटा सकते हैं." रचना ने ये कहा तो मैंने कहा.

"मुझे लगता है की जैसे hi काका को हमारे जाने के बारे में पता चलेगा वो तुम्हारे साथ कुछ भी कर सकते हैं. इस लिए मैं तुमसे ये कह रहा हु की तुम हमारे साथ hi चलो. क्या सही है क्या गलत ये सोचने का ठेका सिर्फ तुमने hi बस नहीं ले रखा है. हमारे जाने के बाद अगर तुम्हे कुछ हो गया तो मैं....." मैं ये कह hi रहा था की रचना बीच में बोल पड़ी.

"क्या सच में vicky.....kya सच में तुम मुझसे इतना प्यार करते हो.?" रचना ने ये कहा तो मैं चौंका. वो कुछ और hi समझ बैठी थी जबकि मैंने कहा.

"क्या अब ये बताना ज़रूरी है.?" मैंने ये कहा तो रचना ने कहा.

"हाँ बिलकुल ज़रूरी है. तुम नहीं समझ सकते vicky....tum बिलकुल भी नहीं समझ सकते मेरे अंदर की हालत को और शायद मैं तुम्हे समझा भी नहीं पाओगी. पांच साल गुज़र gaye....jab तुम यहाँ से चले गए थे तो मेरी ज़िन्दगी जैसे मौत से भी बदतर हो गयी थी. जैसे जैसे वक्त गुज़र रहा था मेरी जान भी निकलती जा रही थी. मगर मैंने आस नहीं छोड़ी. फिर मुझे पता चला की तुम्हारे जाने की असल वजह मेरा बाप था. मैंने खुद साडी हकीकत का पता लगाया और जब मुझे पता चल गया की मेरा बाप तुम्हारे साथ क्या करना चाहता था तो मुझे अपने बाप से नफरत सी हो गयी. मुझे ये भी पता चल गया था की मेरा बाप तुम्हार परिवार के साथ बहुत बुरा करना चाहता था. तब मैंने सोच लिया की अपने बाप से तुम्हारे परिवार की रक्षा मैं खुद करुँगी. बस फिर क्या tha....maine वो सब किया जो मैं कर सकती थी. जिसका नतीजा ये निकला की मेरे बाप ने मुझे त्याग दिया. उसने खुद कहा की मैं उसके लिए मर चुकी हु. मुझे ये सब मंजूर था vicky....sirf तुम्हारे और तुम्हारी चाहत के लिए. पता नहीं ये सब कैसे कर गयी मैं.? शायद मोहब्बत की ताकत ने ये सब करवा दिया मुझसे." रचना ने ये सब कहा तो मुझे समझ न आया की मैं उसकी इन सब बातो का क्या जवाब दू.?

"ज़िन्दगी में कोई अरमान नहीं रह गया था और न hi किसी चीज़ की ख्वाहिश रह गयी थी. अपने hi परिवार वालो को दुखी करके मैं भला अपने लिए कोई ख़ुशी कैसे हासिल कर लेती.? मेरे भी दिल और दिमाग में जैसे ये बात बैठ गयी थी की मुझे अब किसी चीज़ की ख्वाहिश नहीं रखनी है. मेरा बस एक hi मकसद था तुम्हारे न रहने पर तुम्हारे परिवार की अपने बाप से रक्षा करना. मैंने तो हर उम्मीद छोड़ दी थी विक्की. मैंने तो ख्वाब में भी नहीं सोचा था की एक दिन ऐसा आएगा जब तुम्हारी माँ मुझे अपनी बहु बना लेंगी. जिस वक्त तुम्हारी माँ ने मुझसे पूछा की मेरी बहु बनोगी उस वक्त मुझे लगा की कही मैं उस बात की ख़ुशी से मर hi न जाओ. एक पल में सरे अरमान जाग uthe...zindagi फिर से खूबसूरत लगने लगी मुझे. उस वक्त मेरा जी चाहा की तुम मुझे मिल जाओ और फिर मैं तुमसे लिपट खूब रौ." रचना कहते कहते रो पड़ी तो मुझे बहुत अजीब सा फील हुआ. मैं उसकी फीलिंग्स को समझ सकता था. क्यों की मुझे पता था की उसने हमारे लिए बहुत कुछ किया था और इसके लिए उसने अपनी हर ख़ुशी का त्याग कर दिया था.

"मेरे पास तुम्हारा नंबर नहीं था. तुम्हारी माँ ने खुद मुझे तुम्हारा नंबर कुसुम दीदी से दिलवाया था. मैं हर पल सोचती थी की तुम्हे फ़ोन लगाओ मगर हिम्मत hi नहीं होती थी. मैं ये भी सोचती थी की तुमसे कैसे और क्या बाते करुँगी.? आज हिम्मत करके इस लिए तुम्हे फ़ोन लगाया क्यों की कल तुम चले जाओगे. मेरा बहुत मन है की मैं तुम्हे एक बार जी भर के देख लू." रचना ने ये कहा तो मेरे पुरे जिसम में अजीब सी झुरझुरी हुयी.

"क्या तुम इस वक्त मेरे घर आ सकते हो विक्की.?" रचना ने ये कहा तो मैंने कहा.

"क्या ऐसे माहौल में मेरा वह आना सही होगा.? अगर किसी को पता चल गया की मैं ऐसे माहौल में तुम्हारे घर आया हु जबकि तुम्हारे परिवार का हर इंसान हॉस्पिटल में है तो कोई क्या सोचेगा.?" मैंने ये कहा तो रचना ने कहा.

"पांच साल के बाद पहली बार तुमसे कुछ कहा है तो क्या तुम मेरी इतनी सी इच्छा पूरी नहीं करोगे.? क्या सच में तुम्हारे दिल में मेरे लिए कोई जगह नहीं है.?" रचना ने ये कहा तो मैंने जल्दी से कहा.

"अगर ऐसा होता तो मैं माँ के कहने पर तुमसे ब्याह करने को क्यों राज़ी होता.? मैंने तो उनसे एक बार भी ये नहीं कहा की मैं तुमसे ब्याह नहीं करुगा. खेर chhodo...main आता हु थोड़ी देर में." मैंने ये कहा तो रचना ने ठीक है कह कर कॉल कट कर दिया.

रचना से बात करने के बाद मैं सोच रहा था की अब कोमल के घर जाने का शायद कोई मौका नहीं है. अगर मैं कोमल के घर के पास गया तो हो सकता है की उसके घर के बगल से hi रचना अपने घर के बाहर मेरे आने के इंतज़ार में कड़ी मिल जाये मुझे. मैंने सोचा देखते हैं क्या होता है.

मैंने मोबाइल को पॉकेट में डालने के बाद रचना के घर की तरफ चल दिया. अँधेरा काफी हो गया था. आस पास के घरो में जो लाइट जल रही थी वो बस टिमटिमाती हुयी hi दिख रही थी. चलते हुए मैं कुछ hi देर में रचना के घर के पास पहुंच गया. रचना के घर के पहले कोमल का घर था. कोमल और रचना का घर एक तरह से जुड़ा हुआ hi tha....bas घर के अंदर जाने का दरवाजा अलग अलग था.

मैं जब उस जगह पंहुचा तो देखा रचना के घर के बाहर कोई न दिखा मुझे. मैंने थोड़ा पास जा कर अच्छे से देखा और आस पास का भी जायजा लिया मगर कही कोई न नज़र आया मुझे. मैंने सोचा मौका अच्छा है. मैं कोमल के घर जा सकता हु. मगर मैं ये नहीं जनता था की कोमल का पति और उसका ससुर घर में hi है या शहर गए हुए हैं सरपंच के साथ.

मैंने सोचा एक बार पता कर hi लेता हु.

मैं चुपके से कोमल के घर के दरवाजे के पास आया और दरवाजे की कुण्डी बजायी. थोड़ी hi देर में दरवाजा खुला और कोमल नज़र आयी मुझे. मुझ पर नज़र पड़ते hi वो मुस्कुरायी और फिर एक तरफ को हैट गयी. मैं समझ गया की रास्ता क्लियर है. अगर ऐसा न होता तो वो मुझे अंदर आने के लिए एक तरफ हैट कर रास्ता न देती. इसका मतलब ये भी हुआ की उसका पति और उसका ससुर दोनों hi सरपंच के साथ शहर गए हुए हैं.

मैं अंदर आया तो कोमल ने दरवाजा बंद कर दिया. उसके बाद हम दोनों hi अंदर कमरे में आ गए. अंदर हर जगह सन्नाटा फैला हुआ था. कोमल ने चलते हुए hi बताया था मुझे की घर में उसके और उसकी सास के अलावा कोई नहीं है. मैंने उससे कहा की टाइम ज़्यादा नहीं है मेरे पास इस लिए मैं उसका काम करने के बाद जल्दी hi यहाँ से चला जाउगा. मेरी बात सुन कर कोमल ने कहा की ठीक है.

उसके बाद मैंने काम वक्त में कोमल की जैम कर चुदाई की. वो इस चुदाई से मस्त हो गयी थी और कहा की अब जा कर उसे चैन मिला है. मैंने उसे बताया की मैं कल चला जाउगा. अब जो होना होगा वो भगवन पर hi निर्भर है. कुछ देर बाद मैंने अपना हुलिया वगैरा अच्छे से ठीक किया और फिर कोमल के घर से चल दिया. बाहर दरवाजे के पास आ कर कोमल अचानक मुझसे लिपट गयी और सिसकिया भर कर रोने लगी. वो कह रही थी की मेरे जाने के बाद अब उसे बिलकुल भी अच्छा नहीं लगेगा. खेर मैंने उसे समझाया बुझाया और फिर घर से बाहर आ गया.

जब कोमल ने दरवाजा बंद कर लिया तो मैं कुछ दूर आने के बाद से वापस लौटा और इस बार रचना के घर के दरवाजे के पास आ गया. मैंने धड़कते दिल से दरवाजे की कुण्डी बजायी तो कुछ hi देर में दरवाजा खुल गया. दरवाजा रचना ने hi खोला था. मुझ पर नज़र पड़ते hi उसका चेहरा खिल उठा और उसके होठो पर मुस्कान फ़ैल गयी. मैं अंदर आया तो उसने दरवाजा वापस बंद कर दिया.

रचना मुझे ले कर अंदर hi आ गयी. अंदर उसकी माँ भी मिल गयी मुझे. शायद रचना ने अपनी माँ को बता दिया था मेरे आने के बारे में. इस लिए वो मुझे देख कर हैरान नहीं हुयी. उन्होंने रचना से कहा की वो मुझे ले कर अपने कमरे में जाये तो रचना मुझे ले कर ऊपर अपने कमरे में आ गयी. थोड़ी देर में रचना की माँ भी कमरे में आ गयी. मुझे समझ नहीं आ रहा था की मैं रचना की माँ के सामने कैसा रियेक्ट करू. मैं अंदर से हैरान भी था की रचना अपनी माँ के सामने मुझसे मिलने का कैसे सोच सकती है.?

रचना की भाभी यानी रुपेश की बीवी घर पर hi थी मगर मुझे वो नज़र न आयी. बातो बातो में hi पता चला की वो नीचे रसोई में खाना बना रही है. मैं अंदर से दर भी रहा था की अगर उसे मेरे बारे में पता चल गया तो वो क्या करेगी. कही वो अपने पति से बता न दे. ऐसे में बहुत बड़ी मुसीबत हो सकती थी.

रचना की माँ ने मुझसे बहुत hi अच्छे से बात की और ये भी कहा की उसे ख़ुशी है की उसकी बेटी के लिए मेरे जैसा लड़का दामाद के रूप में उन्हें मिला है. उन्होंने कहा की उन्हें ख़ुशी तो है मगर इस बात का दुःख भी है की वो अपनी बेटी की शादी मेरे साथ धूम धाम से नहीं कर सकती. वैसे भी जिस दिन रचना यहाँ से चली जाएगी और सरपंच को साडी बात का पता चलेगा तो वो बहुत गुस्सा होगा.

मैंने रचना की माँ से भी ये बता दिया की सरपंच काका रचना को अपने रास्ते से हटाने की बात कर रहे थे ऐसा मैंने कही से सुना है. इसका मतलब ये हुआ की रचना की जान को खतरा है. हम लोगो के जाने का पता जब काका को चलेगा तो वो गुस्से में कही रचना को कोई नुक्सान न पंहुचा दे. इस लिए मैं चाहता हु की रचना कल हमारे साथ hi जाये.

मेरी इस बात से रचना की माँ हैरान रह गयी थी. मैंने उन्हें समझाया की रचना की भलाई के लिए यही ठीक है वर्ण हमारे जाने के बाद काका कुछ भी कर सकते हैं. मैंने उनसे कहा की मैं मानता हु की ये सही वक्त नहीं है रचना के यहाँ से जाने का मगर ये भी सच है की वो सही वक्त कभी भी नहीं होगा क्यों की काका तो ये सब कभी चाहेंगे hi नहीं. बल्कि उल्टा बुरा hi होगा इस लिए अच्छा यही है की रचना कल हमारे साथ hi यहाँ से चले.

मेरे समझने बुझाने का काफी असर हुआ और फिर रचना की माँ को भी साड़ी बातो का अंदाज़ा हो गया. उन्हें सब समझ भी आ गया. उन्होंने मुझसे कहा की ठीक है बीटा अब रचना कल तुम लोगो के साथ hi जाएगी. वैसे भी अब तो उस पर तुम लोगो का hi हक़ है तो उसके अच्छे भले के बारे में भी तुम लोग hi सोचोगे.

रचना की माँ ने रचना से कहा की वो उसके जाने की तयारी करती है. तब तक वो मुझसे मिल ले. उसके बाद रचना की माँ नीचे चली गयी. उनके जाने के बाद कमरे में सन्नाटा फ़ैल गया. मुझे समझ न आया की मैं रचना से क्या बाते करू.

"क्या तुम्हे इस बात का अंदाज़ा है की मेरे यहाँ से जाने के बाद पिता जी इस घर में कितनी बड़ी महाभारत कड़ी कर देंगे.?" रचना ने धीरे से ये कहा तो मैंने कहा.

"ये तो होगा hi रचना मगर उसके लिए तुम या मैं क्या कर सकते हैं.? मुझे अंदाज़ा है की काका तुम्हारी माँ से इस सबके बारे में पूछेंगे मगर वो यही बताएंगी की उन्हें इस बारे में कुछ नहीं पता है. वो यही कहेंगी की उन्हें इस बात का ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था की तुम इस तरह घर से चली जाओगी. बस उसके बाद काका कर भी क्या सकेंगे.?" मैंने ये कहा तो रचना ने कहा.

"मुझे तो बस माँ की hi चिंता है विक्की. मैं नहीं चाहती की मेरी माँ के साथ कुछ भी बुरा हो. मेरी माँ ने हमेशा मुझे प्यार किया है. तुम्हारे जाने के बाद जब मैंने वो सब किया था तो पिता जी और रुपेश भैया मुझसे बहुत नाराज़ हुए थे और मुझे जान से मार देने की धमकी भी देते थे मगर माँ ने मुझे उनकी हर बात से बचाये रखा था. इस घर में माँ के शिव कोई मुझसे बात नहीं करता. माँ के अलावा मैं सबके लिए मर चुकी हु. तुम नहीं समझ सकते विक्की की मैंने ये पांच साल कितने कास्ट में गुज़ारे हैं." रचना ने ये कहा तो मैंने उसकी तरफ देखा. उसके खूबसूरत चेहरे पर दुःख के भाव थे और उसकी सीप सी आँखों से आँशु बहने लगे थे. रचना को इस तरह दुखी होते देख मुझे भी दुःख हुआ और मैंने आगे बढ़ कर उसे अपने सीने से लगा लिया.

रचना को जैसे hi मैंने अपने सीने से लगाया तो वो फुट फुट कर रो पड़ी. उसने मुझे कास के पकड़ लिया. शायद ये पांच सालो का गुबार था जो अभी तक उसके सीने में दबा हुआ था और जब मैंने उसे अपने सीने से लगाया तो उसका वो गुबार आँशु के रूप में निकलने लगा था. मैंने भी रचना को शांत करने की कोई कोशिश नहीं की बल्कि उसे रोने दिया. कुछ देर बाद जब रचना का रोना धोना थोड़ा काम हुआ तो मैंने उसकी पीठ पर हाथ फेरते हुए उससे कहा.

"चलो अब शांत हो जाओ dear...tumhe जितना रोना था रो लिया. जितना दुःख सहना था सह लिया मगर अब नहीं. अब बस खुशियों में जीना है tumhe...aur हाँ मेरे दिल में तुम्हारे लिए बहुत जगह है. मेरी नज़र में तुम्हारा कद बहुत बड़ा है." मैंने ये कहा तो रचना ने मुझे और भी ज़्यादा कास के पकड़ते हुए कहा.

"ओह्ह vicky...tum सच कह रहे हो न.?" रचना ने ये कहा तो मैंने हाँ कहा तब उसने कहा.

"आज मुझे लग रहा है की मेरी तपस्या सफल हो गयी विक्की. मुझे लग रहा है की मैंने जो कुछ भी किया वो बिना मतलब नहीं था. मैं तुम्हारे दिल में जगह बनाने में सफल हो गयी यही बहुत बड़ी बात है मेरे लिए." रचना ने ये कहा तो मैंने कहा.

"अब चलो ये रोना धोना और इमोशनल होना बंद करो. मुझे फिर से वही रचना चाहिए जो आज से पांच साल पहले हुआ करती थी." मैंने ये कहा तो रचना ने मुझसे अलग हो कर मेरी तरफ देखा और फिर कहा.

"हाँ वो मैं मोती हो गयी हु न.?" रचना ने बड़ी मासूमियत से ये कहा तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा.

"हाँ मोती तो हो गयी हो मगर इसके बाद भी क्यूट दिखती हो. ारी हाँ वो एक गण है na....Jiski बीवी मोती उसका भी बड़ा नाम है." मैंने ये कहा तो रचना खिलखिला कर है पड़ी. फिर एकदम से वो थोड़ा रूठे हुए लहजे से बोली.

"तुमने मुझे मोती kaha....jaao मुझे तुमसे अब बात नहीं करना." रचना ने ये कहा तो मैंने कहा.

"ये हुयी न baat...yahi वाली रचना चाहिए मुझे. जो थोड़ा रूठे तो मुझे वो प्यारी प्यारी सी लगे." मैंने ये कहा तो रचना ने फिर से मेरी तरफ देखा. इस बार उसके होठो पर मुस्कान थी.

"अच्छा ji...soch लो फिर. मुझे मानते मानते परेशां हो जाओगे तुम." रचना ने मुस्कुराते हुए ये कहा तो मैंने भी मुस्कुराते हुए कहा.

"तुम्हे मानाने का मेरे पास बस एक hi तरीका है." मैंने ये कहा तो रचना ने हैरानी से देखते हुए कहा.

"अच्छा जी और वो कौन सा तरीका है. मुझे भी तो बताओ." रचना ने ये कहा तो मैंने कहा.

"तुम्हारे इन रसीले और शहद जैसे होठो को चूमूँगा तो तुम जल्द hi खुश हो जाओगी." मैंने ये कहा तो रचना एकदम से शर्मा गयी मगर फिर जल्द hi सम्हाल कर बोली.

"ऐसा कुछ नहीं है. मैं तब भी रूठी रहूगी तो क्या करोगे तुम.?" रचना ने ये कहा तो मैंने उसकी आँखों में देखते हुए कहा.

"तब मैं कुछ और करुगा." मैंने ये कहा तो रचना ने कांपते होठो के साथ कहा.

"और क्या करोगे तुम विक्की.?" रचना ने ये कहा तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा.

"वो तो तभी पता चलेगा जब तुम रूठोगी और मेरे मानाने से न मानोगी." मैंने ये कहा तो रचना कुछ देर मेरी आँखों में देखती रही फिर नज़रे झुकाते हुए धीरे से बोली.

"मेरे अरमानो को क्यों जगा रहे हो विक्की.? अभी कुछ वक्त के लिए रुक जाओ न." रचना ने ये कहा तो मेरे जिसम में अजीब सी झुरझुरी हुयी. मेरी आँखों के सामने एक पल में वो सरे मंज़र घूम गए जो आज से पांच साल पहले के थे और जब मैं रचना के होठो को चूमता चुस्त था. इतना hi नहीं उसकी छातियों को भी मसलता था.

"क्या हुआ..??" मैंने ये कहा तो रचना ने नज़र उठा कर मेरी तरफ देखा फिर कहा.

"कुछ nahi...bas पुराणी बाते और पुराणी चीज़े याद आ गयी थी." रचना ने ये कहा तो मैंने कहा.

"तो कैसा लग रहा है वो सब याद करके.?" मैंने ये कहा तो रचना ने कहा.

"कैसे बताओ विक्की.? उन यादो के सहारे hi तो अब तक जी रही थी मैं." रचना ने ये कहा तो मुझे उस पर बहुत ज़्यादा प्यार आया और मैंने उसे फिर से अपने सीने से लगा लिया और कहा.

"अब कुछ मत कहो डिअर. मैं तुम्हारे सरे गम भुला दुगा. अब चलो मुझे एक प्यारी सी मुस्कान दिखाओ जिससे मैं खुश हो जाओ और फिर मैं जाओ यहाँ से." मैंने ये कहा तो रचना ने कहा.

"पता नहीं कैसे अब तक मैं तुम्हारे बिना रह रही थी.? मगर अब लगता है की तुम्हारे बिना मैं एक पल भी नहीं रह पाओगी. इसके पहले तो मैंने ये सोच लिया था की तुम्हारी यादो के सहारे साडी ज़िन्दगी गुज़ार दूगी मगर अब तुमसे मिलने के बाद लगता है की साड़ी ज़िन्दगी तो क्या अब एक पल भी नहीं गुज़ार पाओगी. मुझे अपने से अब कभी जुड़ा न करना विक्की. तुम मिले हो तो अब फिर से जुड़ा हो कर जी नहीं पाओगी मैं. मुझे बहुत सारा प्यार करना मेरे सनम. मैं तुम्हारे प्यार के लिए बहुत तदपि हु." रचना कहते कहते फिर से सिसकिया ले कर रोने लगी तो मैंने उसकी पीठ पर हाथ फेरते हुए कहा.

"दुःख दर्द के तुम्हारे दिन गुज़र गए डिअर. अब तुम्हे मुझसे जुड़ा नहीं होना पड़ेगा. मैं वडा करता हु की तुम्हे बहुत प्यार करुगा. अब से तुम्हे कभी कोई दुःख नहीं होगा. चलो अब ये रोना धोना बंद करो और अपनी मनमोहक मुस्कान दिखाओ मुझे." मैंने ये कहा तो रचना मुझसे अलग हुयी तो मैंने अपने हाथो से उसके आँशु पोंछे. उसके बाद मैंने उसके चेहरे को अपनी हथेलियों में लिया और उसकी आँखों में देखते हुए प्यार से कहा.

"अब बिलकुल भी दुखी मत होना और न hi इन आँखों से कोई आँशु बहाना. इस चेहरे पर हमेशा खुशियों की चमक होनी चाहिए. चलो अब मुस्कुराओ." मैंने ये कहा तो रचना हलके से मुस्कुरायी. वो मेरी आँखों में hi देख रही थी. शायद मेरी आँखों में अपने लिए मोहब्बत तलाश कर रही थी जो की उसे मिल भी गयी. मुझे रचना से बेपनाह तो नहीं मगर कुछ तो मोहब्बत हो hi गयी थी और अब शायद ये मोहब्बत बढ़ती hi जनि थी.

अभी मैं रचना के चेहरे को हथेलियों में लिए उसकी मुस्कान को देख hi रहा था की तभी कमरे में किसी के द्वारा हलके से खखारने की आवाज़ हुयी तो मैं और रचना एकदम से एक दूसरे से अलग हो गए. हम दोनों की धड़कने एकदम से बढ़ गयी थी. हम दोनों जैसे hi अलग हुए तो कमरे में रचना की माँ आ गयी. काकी को देखते hi मैं समझ गया की उन्होंने हमारी साड़ी बाते सुन ली हैं. ये जान कर मुझे बहुत अजीब सा फील हुआ.

"अब मुझे अपनी बेटी के लिए कोई चिंता नहीं है बीटा. मैं देख चुकी हु की तुम मेरी बेटी से कितना प्यार करते हो. मेरी तुमसे बस यही विनती है बीटा की इस अभागन को ऐसे hi प्यार देना. इसने अपनी इस छोटी सी उम्र में बहुत दुःख सही हैं." रचना की माँ ने ये सब कहा तो मैंने कहा.

"फ़िक्र मत कीजिये काकी. मैं रचना को कभी किसी बात से दुखी नहीं होने दूँगा. हम सब इसे बहुत प्यार करेंगे." मैंने ये कहा तो रचना की माँ ने आगे बढ़ कर मेरे चेहरे को प्यार से सहलाया और फिर कहा हमेशा खुश रहो बीटा और खूब तरक्की करो.

उसके बाद हमारे बीच कुछ ऐसी hi और बाते हुयी. मैं ने आते वक्त रचना की माँ से कहा की वो रचना को ले कर सुबह hi आ जाये क्यों की हम सुबह चार बजे यहाँ से निकलेंगे. मेरी बात सुन कर रचना की माँ ने कहा की ठीक है बीटा मैं रचना को ले कर सुबह चार बजे से पहले आ जाओगी. उसके बाद मैं चुप चाप रचना के घर से बाहर आ गया. रुपेश की बीवी को मेरे आने जाने का पता नहीं चला था और न hi उसे किसी ने बताया था.

जब मैं घर आया तो माँ ने मुझसे daat'te हुए पूछा की रात में मैं कहा चला गया था तो मैंने उन्हें बताया की मैं रचना के घर से आ रहा हु अभी. माँ के पूछने पर मैंने उन्हें साड़ी बात बता दी. मेरी बाते सुनने के बाद माँ ने कहा चलो ये अच्छा हुआ की सावित्री दीदी अपनी बेटी को हमारे साथ hi भेजने के लिए राज़ी हो गयी.

मैं माँ से बात hi कर रहा था की मेरी नज़र एकदम से रसोई के दरवाजे की तरफ पड़ी. रसोई के दरवाजे पर कुसुम दीदी छुप कर कड़ी थी. उनका एक पेअर और उनका पीले रंग का कुरता मुझे दिखाई दे रहा था और साथ hi ऊपर उनका थोड़ा सा चेहरा भी. मैं अभी उस तरफ देख hi रहा था की तभी उन्होंने चेहरा थोड़ा सा बाहर किया तो उनकी नज़र मुझसे मिल गयी. जैसे hi हमारी नज़रे एक दूसरे से मिली तो उन्होंने जल्दी से अपना चेहरा पीछे कर लिया और दरवाजे से हैट कर अंदर हो गयी.

मुझे समझ नहीं आ रहा था की उनके मन में क्या चल रहा था या उनके मन में क्या था.? खेर खाना पीना करने के बाद मैंने माँ से कहा की वो मुझे सुबह जल्दी hi जगा दे. उसके बाद मैं अपने कमरे में आ गया और फिर रात वाले कपडे पहन कर बीएड पर लेट गया. लेते लेते मैं हर चीज़ के बारे में सोच रहा था. कल हम सब इस गांव से हमेशा हमेशा के लिए चले जायेगे. अब यहाँ पर हमारा कुछ नहीं बचने वाला tha...na घर और न hi ज़मीने.

सोचते सोचते एक बार फिर से मेरा ध्यान कुसुम दीदी पर गया. पहली मोहब्बत तो दो मिनट की थी मेरी. उसके बाद फिर कभी उस मोहब्बत से मुलाकात नहीं हुयी और न hi मैंने उससे मिलने का सोचा था. उसके बाद मेरी लाइफ में जो मेरे सबसे करीब आया था वो मेरी दीदी थी. कुसुम didi...jinhone बचपन से मुझे प्यार किया और मेरी हर बात का ख़याल रखा. जब से होश सम्हाला था तब से मैंने भी यही किया था.

मेरी हमेशा से यही चाहत रहा करती थी की मेरी कुसुम दीदी हर पल मेरे पास रहे और हम दोनों ढेर साड़ी बाते करे. पहले तो नहीं समझ आया था और जब समझ आया तो मैं उस बात को एक्सेप्ट नहीं करना चाहता था या शायद एक्सेप्ट करने से डरता था. मगर जब प्रिय पूजा ने क्लियर बता दिया और हम आगे भी बढ़ गए तो मैंने भी ये एक्सेप्ट कर hi लिया की मैं अपनी दीदी से बहुत प्यार करता हु. मैंने उन्हें किसी भी बात के लिए मजबूर नहीं किया बल्कि वही किया जो वो चाहती थी.

ये तो अब मैं भी समझ सकता था और मुझे यकीन भी था की दीदी मुझसे ज़्यादा मुझसे प्यार करती हैं मगर ये नहीं समझ प् रहा था की वो इस बात को खुल कर मुझसे कह क्यों नहीं रही.? फिर मुझे माँ की उस दिन की बात याद आयी तो मैंने सोचा क्या दीदी उस दिन उनके कमरे में नहीं रही होंगी.? अगर रही होंगी तो उन्होंने भी तो माँ की वो बात सुनी होगी और अगर सुनी होती तो फिर वो ये सब क्यों करती.? इसका मतलब तो ये हुआ की उस दिन दीदी माँ के कमरे में थी hi नहीं. बल्कि माँ के साथ सिर्फ रचना hi thi...to क्या रचना को ये सब पता है.????

मेरे दिल और दिमाग में एकदम से बम सा फटा और भयंकर विस्फोट हुआ. माय गॉड इसका मतलब रचना को सब पता है मगर आज जब हम मिले थे तो उसने मुझसे इसके बारे में कोई भी बात नहीं की thi..kyo..?? क्या माँ ने उसे मन किया था वो सब मुझे बताने से.?

सोचते सोचते मेरा दिमाग फटने लगा था. मैंने इसके पहले इस बारे में इस तरह सोचा hi नहीं था. फिर मैंने सोचा की अगर मैं सोच भी लेता तो क्या मैं खुद इस बारे में रचना से कोई बात कर सकता था.? मेरे दिल और दिमाग में तेज़ तूफ़ान चलने लगा था. मैं सोच रहा था की रचना हम सबके बारे में क्या सोच रही होगी.? सबसे बड़ी बात तो ये थी की माँ ने उस दिन रचना से वो सब कैसे कहा होगा.? क्यों की ये ऐसी बाते हैं जो इस तरह किसी से भी नहीं कही जा सकती. मगर ये सच था की उन्होंने कहा और मैंने बाहर से सुन भी लिया था. उस वक्त उनके कमरे में रचना hi थी और अब उसे सब पता है. हे bhagwan....rachna ने उस सब को एक्सेप्ट भी कर लिया है. ये सब सोचते सोचते पता नहीं कब मेरी आँख लग गयी और मैं सो गया था.

भाई लोग....

आज के लिए इतना hi....

रीड एन्जॉय & गिव योर फीडबैक....

कीप सपोर्टिंग & स्टे विथ....

:थैंक्यू:
 
थैंक्स फॉर योर लवली कमेंट....

कामदेव भय आपने काफी दूर तक का सोचा और जो भी कहा वो अपनी जगह सही है. मगर इस कान के बाद गांव में क्या क्या होगा ये देखने के हीरो यहाँ रहेगा hi नहीं. हाँ ये हो सकता है की उसे किसी के द्वारा कुछ पता चले....

नेक्स्ट अपडेट पोस्टेड....

रीड & एन्जॉय....
 
थैंक्स फॉर योर लवली कमेंट....

भय स्टोरी पढ़ना न पढ़ना ये आपकी मर्ज़ी है. बाकी आपको बोरिंग लगी इसके लिए मैं क्या कर सकता हु.?

अपने बोलै था की पता नहीं कैसे लोगो को पसंद आ रही है तो भय ये लोगो से hi पूछो की उनको कैसे पसंद आ रही है. शायद वो अच्छे से बता सके....

नेक्स्ट अपडेट पोस्टेड ों पेज no. 161....

रीड & एन्जॉय....
 
सब कुछ जायज़ है....

अपडेट = 39


मेरे दिल और दिमाग में एकदम से बम सा फटा और भयंकर विस्फोट हुआ. माय गॉड इसका मतलब रचना को सब पता है मगर आज जब हम मिले थे तो उसने मुझसे इसके बारे में कोई भी बात नहीं की thi..kyo..?? क्या माँ ने उसे मन किया था वो सब मुझे बताने से.?

सोचते सोचते मेरा दिमाग फटने लगा था. मैंने इसके पहले इस बारे में इस तरह सोचा hi नहीं था. फिर मैंने सोचा की अगर मैं सोच भी लेता तो क्या मैं खुद इस बारे में रचना से कोई बात कर सकता था.? मेरे दिल और दिमाग में तेज़ तूफ़ान चलने लगा था. मैं सोच रहा था की रचना हम सबके बारे में क्या सोच रही होगी.? सबसे बड़ी बात तो ये थी की माँ ने उस दिन रचना से वो सब कैसे कहा होगा.? क्यों की ये ऐसी बाते हैं जो इस तरह किसी से भी नहीं कही जा सकती. मगर ये सच था की उन्होंने कहा और मैंने बाहर से सुन भी लिया था. उस वक्त उनके कमरे में रचना hi थी और अब उसे सब पता है. हे bhagwan....rachna ने उस सब को एक्सेप्ट भी कर लिया है. ये सब सोचते सोचते पता नहीं कब मेरी आँख लग गयी और मैं सो गया था.

अब आगे पढ़िए....


मुझे ऐसा लग रहा था जैसे कोई मेरे चेहरे पर झुका हुआ है और मुझे मेरे मुँह और होठो पर कुछ अजीब सा फील हो रहा था. मेरी नींद खुल गयी और मैं एकदम से घबरा सा गया. जैसे hi मैंने घबराहट का रिएक्शन दिया तो तभी मेरे चेहरे से कोई हैट कर दूर हो गया.

मेरी नज़र इधर उधर घूमती हुयी जिस चेहरे पर पड़ी वो पूजा थी. उसे देख कर मैं सब कुछ समझ गया. मुझे सोता देख कर वो बड़े आराम से मेरे होठो को चूम और चूस रही थी और फिर जैसे hi मेरी आँखे खुली तो वो मुझसे दूर हो गयी थी. मैंने देखा की मेरी आँख खुलते hi वो शरमाते हुए मुस्कुराने लगी थी.

"ये तुम क्या कर रही थी मेरे साथ.?" मैंने ये कहा तो पूजा ने कहा.

"वो तुम्हे जगाने आयी थी मैं तो देखा की तुम गहरी नीड में सो रहे हो. फिर मेरी नज़र तुम्हारे होठो पर पड़ी तो मेरा दिल किया की चूम लू तो बस वही करने लगी थी." पूजा ने ये सब कहा तो मैंने कहा.

"मतलब सोते हुए मेरी इज्जत लूट रही थी तुम. हे भगवन मैं लूट गया बर्बाद हो गया. किसी को मुँह दिखने के काबिल नहीं रहा. इस लड़की ने मुझे कही का नहीं छोड़ा." मैं ये सब अजीब तरह से कहने hi लगा था की पूजा एकदम से घबरा गयी. जब मैंने उसे घबराते देखा तो मेरी हसी छूट गयी.

मुझे हस्ता देख उसे सब समझ आ गया की मैं उसे छेड़ रहा था. ये जान कर उसने नाराज़गी से दूसरी तरफ अपना चेहरा कर लिया. मुझे वो इस वक्त बहुत ज़्यादा क्यूट लगी तो मैंने हाथ बढ़ा कर उसका एक हाथ पकड़ा और ज़ोर दे कर अपने ऊपर खींच लिया. वो एकदम से मेरे ऊपर आ गिरी. इस सब में उसकी चीख भी निकल जाने वाली थी की मैंने जल्दी से उसके मुँह पर हाथ रख दिया.

"छोड़ दो mujhe...mujhe तुमसे कोई बात नहीं करना." पूजा ने मुझसे छूटने की कोशिश करते हुए नाराज़गी से ये कहा तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा.

"ारी कैसे छोड़ दू अपनी जान को और उस हसीं लड़की को तो बिलकुल भी नहीं छोड़ूगा जिसके शहद जैसे होठो की छुवन से मेरी सुबह इतनी हसीं हो गयी हो." मैंने ये कहा तो पूजा ने कहा.

"जाने do...aur अब बाते बनाने की कोई ज़रूरत नहीं है. छोडो मुझे वर्ण माँ या दीदी मुझे ढूढ़ते हुए यहाँ आ जाएगी." पूजा ने ये कहा तो मुझे ध्यान आया की हमें आज सुबह चार बजे यहाँ से निकलना है. इसका मतलब पूजा मुझे माँ के कहने पर जगाने आयी थी.

"चलो ठीक है मेरी जान मगर अब जब तुम मेरे पहलु में hi हो तो अपने होठो की शहद चखा hi दो. मेरा तो मन करता है की तुम्हे खा hi जाओ." मैंने ये कहा तो पूजा ने मुस्कुराते हुए कहा.

"अच्छा ji...mujhe खा जाओगे तो फिर बाद में क्या करोगे.?" पूजा ने ये कहा तो मैंने कहा.

"बाद का बाद में देखेंगे डिअर. पहले अपने मन की तो कर hi लगा मैं." मैंने ये कहा और फिर देर न करते हुए मैं पूजा के होठो को अपने मुँह में भर लिया.

पूजा पहले तो मुझसे छूटने की कोशिश की मगर फिर वो शांत पद गयी और खुद भी मेरा साथ देने लगी. मैंने अपना एक हाथ बढ़ा कर उसकी एक चुकी को मुट्ठी में भरा और थोड़ा ज़ोर से दबाने लगा. मेरे ऐसा करते hi पूजा मचलने लगी. अभी मैं ये सब कर hi रहा था की मेरे कानो में किसी के कदमो की आहात पड़ी तो मैं एकदम से पूजा से अलग हो गया. पूजा को भी पता चल गया था इस लिए वो खुद भी बड़ी तेज़ी से मुझसे अलग हुयी और बीएड से नीचे जा कर कड़ी हो गयी. उसकी साँसे इन कुछ पालो में hi तेज़ हो गयी थी.

तभी कमरे में प्रिय दाखिल हुयी. उसे देख कर हम दोनों में जान आयी. कमरे में आते hi प्रिय ने बताया की पहले माँ आने वाली थी मेरे कमरे में. फिर उसे लगा की हम दोनों कही कुछ कर न रहे हो इस लिए वो खुद माँ से कह कर यहाँ आ गयी थी.

प्रिय की बात सुन कर हम दोनों खुश हो गए. उसके बाद मैंने प्रिय के होठो का शहद भी कुछ पालो तक पिया. फिर प्रिय पूजा को ले कर ये कहते हुए चली गयी की मैं जल्दी से फ्रेश हो कर तैयार हो जाओ. दोनों के जाने के बाद मैं भी बीएड से उठा और नीचे बाथरूम की तरफ चला गया.

हम सब तैयार हो चुके थे और हर चीज़ के बारे में अच्छे से ध्यान करके उस चीज़ को पैक भी कर लिया था. मेरा जो सामान था वो प्रिय पूजा ने पहले hi पैक कर दिया था. इस वक्त सुबह के साढ़े तीन बजे थे. हम सब जब तैयार हो कर नीचे हॉल में आये तो प्रिय पूजा ने हम सबको चाय दी. माँ ने बताया की उन्होंने रास्ते में खाने के लिए भी कुछ तैयार करके रख लिया है.

अभी हम सब चाय hi पि रहे थे की तभी हमारे घर के बाहर वाला दरवाजा बजा. दरवाजे के बजते hi माँ ने पूजा से कहा की वो जा कर दरवाजा खोले. हम सब समझ गए की रचना और उसकी माँ hi होंगी. कुछ देर में जब पूजा आयी तो उसके पीछे सावित्री काकी और उनकी बेटी रचना भी आती दिखी.

मैंने देखा की जैसे hi रचना अपनी माँ के साथ हमारे पास आयी तो कुसुम दीदी का चेहरा अजीब तरह का हो गया. उनकी नज़र रचना पर hi थी और वो उसे अजीब तरह से देखे जा रही थी. मुझे थोड़ा थोड़ा समझ आया की ऐसा क्यों. इधर रचना ने आते hi सबसे पहले मेरी माँ के पेअर छुए तो माँ ने खुश हो कर उसे ढेर सारा आशीर्वाद और दुआए दी. रचना के आने से मुझे भी थोड़ा अजीब सा फील होने लगा था.

मेरी नज़र अचानक प्रिय पूजा पर पड़ी. वो दोनों मुझे hi देख रही थी और मुस्कुरा भी रही थी. जैसे hi मेरी नज़रे उनसे मिली तो दोनों ने बड़ी सफाई से मुझे आँख मार दी. ये देख कर मैं एकदम से हैरान रह गया और सकपका भी गया.

सावित्री काकी माँ से बाते करने लगी थी और दुखी भी हो रही थी अपनी बेटी के लिए. उनकी बातो से माँ उन्हें बड़े अच्छे ढंग से समझा बुझा रही थी. रचना कुछ पल माँ के पास कड़ी रही फिर उसने नज़र उठा कर मेरी तरफ देखा और फिर जल्दी hi नज़रे झुका ली. तभी मैंने देखा की प्रिय पूजा दोनों उसके पास गयी और दोनों ने उसके कान में जाने क्या कहा की रचना बुरी तरह शर्मा गयी. मैंने सोचा मेरी ये नटखट बहनो ने ऐसा क्या कह दिया उससे जो वो इतना शर्मा गयी थी. उसके बाद वो उनके पास नहीं रुकी बल्कि पलट कर कुसुम दीदी के पास चली गयी.

कुसुम दीदी ने जैसे hi देखा की रचना उनके hi पास आ रही है तो उनके चेहरे के भाव नार्मल हो गए. अब इतना तो कोई छोटा सा बच्चा भी समझ सकता था की कुसुम दीदी रचना को कुछ ख़ास पसंद नहीं कर रही थी. मगर सवाल था की क्यों पसंद नहीं कर रही थी उसे.

मैंने अपनी हैंड वाच पर टाइम देखा तो चार बज गए थे. मतलब टैक्सी वाला पहुंच hi रहा होगा. वो टैक्सी कहने को hi टैक्सी थी, मैंने बड़ी वाली कार बुक की थी. क्यों की मुझे पता था की सामान के साथ साथ लोग भी ज़्यादा हैं. अभी मैं टाइम देख कर ये सोच hi रहा था की तभी बाहर किसी वाहन के आने की आवाज़ सुनाई दी मुझे.

मैं तेज़ी से बाहर की तरफ गया और दरवाजा खोल कर बाहर देखा मगर बाहर कोई वाहन नहीं था. तभी मेरा मोबाइल बजा तो मैंने कॉल पिक की. कॉल टैक्सी वाले का hi था. वो मुझसे कह रहा था की वो गांव में आ गया है और अब उसे मैं बताओ की किस गली से हमारे घर की तरफ आना है तो मैंने उसे बता दिया. वो पास में hi था. रात के सन्नाटे में वाहन की आवाज़ ऐसी लगी थी जैसे बाहर hi से आयी हो.

थोड़ी hi देर में टैक्सी वाला आ गया. मैंने टैक्सी ड्राइवर की मदद से फटाफट सामान रखवाया. रचना का भी एक छोटा सा बैग था. थोड़ी hi देर में सारा सामान टैक्सी के ऊपर रख दिया गया. टैक्सी के ऊपर जो सामान था उसे टैक्सी ड्राइवर रस्सी से बाँधने लगा था.

मैंने प्रिय पूजा को कार की सबसे पीछे वाली शीट पर बैठा दिया. जबकि माँ और दीदी बीच वाली शीट पर बैठने वाली थी. रचना की माँ बेटी के जाने से रोने लगी थी और खुद रचना भी रो रही थी. माँ उन दोनों को सम्हाल रही थी. रोने धोने की आवाज़ बहुत धीमी थी.

सावित्री काकी ने माँ से कुछ और रट हुए बाते की उसके बाद मैंने उन सबको कार में बैठने को कहा तो वो थोड़ी देर में बैठ गयी. रचना और उसकी माँ एक दूसरे से लिपट कर ऐसे रो रही थी जैसे कोई लड़की ब्याह के बाद विदा होते वक्त रोटी है. वैसे इस वक्त रचना का मामला ब्याह जैसा hi था.

मैंने जब देखा की ये तो रोटी hi रहेगी तो मैंने जा के उनसे कहा की यहाँ पर रोना धोना ज़्यादा नहीं हो सकता. अगर इस वक्त आस पास के घरो में से किसी की आँख खुल गयी और वो बाहर आ कर हमें इस तरह देख लेगा तो झमेला हो सकता है. खेर मेरे ऐसा कहने पर सावित्री काकी ने खुद अपनी बेटी को कार में बैठाया. उसके बैठने के बाद माँ और दीदी भी बैठ गयी.

मैंने जा कर अपनी होने वाली सास को प्रणाम किया और फिर उनसे विदा ले कर कार में ड्राइवर के बगल से बैठ गया. मेरे बैठते hi टैक्सी वाले ने कार आगे बढ़ा दी. हम सब भगवन का नाम ले कर घर से निकल पड़े थे. घर पर हमने बाहर से टाला लगा दिया था जिसकी चाभी हमारे hi पास थी. घर की चाभी शहर जा कर हमने गायत्री देवी को दे देने का सोचा था.

कुछ hi देर में हम गांव से बाहर आ गए और अब हम सब बड़ी तेज़ी से शहर की तरफ जा रहे थे. मैं सोच रहा था की अगर सरपंच सही सलामत गांव में hi होता तो क्या हम सब इतनी आसानी से गांव से निकल पते.??? इसका मतलब सरपंच के साथ जो कुछ भी हुआ वो सही वक्त पर हुआ था. मेरे दिमाग में उस दिन अगर वो ख़याल न आता तो शायद आज कहानी कुछ और होती. भगवन सही वक्त पर इंसान की बुद्धि को palat'ta है.

तेज़ स्पीड में चलते हुए हम सब एक घंटे से पहले hi शहर पहुंच गए. मैंने रास्ते में गायत्री देवी को फ़ोन लगाया था और उन्होंने इतने संजय पर फ़ोन दूसरी बार लगाने पर उठाया था. मैंने उन्हें बताया की हम सब शहर आ रहे हैं और थोड़ी hi देर में पहुंच जायेगे. मैंने गायत्री देवी से कहा की मैं घर की चाभी ले के आया हु तो वो मुझसे घर की चाभी ले ले और फिर वो पुरसोत्तम जी को दे देंगी.

गायत्री देवी ने मुझसे पूछा की ट्रैन कितने बजे की है तो मैंने बताया की सुबह 9 बजे की है. मेरी ये बात सुन कर उन्होंने पूछा की तब तक कहा रहेंगे हम log...kya रेलवे स्टेशन में hi रहेंगे तो मैंने कहा और कहा रह सकते हैं.? मेरी इस बात पर उन्होंने कहा की हम सब उनके घर hi आ जाये. उसके बाद वह से हम सब साढ़े आठ बजे तक रेलवे स्टेशन चले जायेगे.

गायत्री देवी के कहने पर मैं राज़ी हो गया और फिर मैंने ड्राइवर को गायत्री देवी के घर चलने को कहा. करीब दस मिनट बाद हम गायत्री देवी के घर पहुंच गए. गायत्री देवी और उनका बीटा हमें घर के बाहर दरवाजे पर hi खड़े दिखे.

टैक्सी से हम सब उतरे और फिर मैंने ड्राइवर की मदद से सारा सामान उतरवा कर गायत्री देवी के घर के अंदर रखवा दिया. उसके बाद मैंने टैक्सी वाले को उसके दोगुने पैसे दिए जिसे लेकर वो खुश हो गया और बोलै की वो साढ़े आठ बजे फिर से यहाँ आ जायेगा हम सब को रेलवे स्टेशन छोड़ने के लिए. उसकी इस बात से मैंने कहा ठीक है. टैक्सी वाले के जाने के बाद मैं भी गायत्री देवी के घर के अंदर आ गया. बाकी सब लोगो को गायत्री देवी पहले hi अंदर ले गयी थी.

सुबह अभी ठीक से नहीं हुयी थी मगर भोर होने लगी थी. गायत्री देवी ने हम सबसे हाल चाल पूछा और चाय नास्ते के बारे में भी तो हमने उन्हें बताया की हम सब चाय नास्ता करके आये हैं और सफर के लिए खाना भी ले रखे हैं. उसके बाद लेडीज लोग गायत्री देवी के पास hi बैठ कर बाते करने लगी और मैं गायत्री देवी के बेटे के साथ उसके कमरे में आ गया.

साढ़े आठ बजे तक हमने ऐसे hi टाइम पास किया उसके बाद हम सब रेलवे स्टेशन चलने को फिर से तैयार हुए. टैक्सी ड्राइवर अपनी बात का पक्का था. वो साढ़े आठ बजे हमें लेने के लिए टैक्सी ले कर आ गया था. माँ ने गायत्री देवी को घर की चाभी दे दी थी. उसके बाद हम सब एक बार फिर से उसी तरह टैक्सी में सामान रख कर बैठे और गायत्री देवी से विदा ले कर चल दिए. गायत्री देवी के पति घर पर नहीं थे बल्कि वो कही बाहर गए हुए थे.

टैक्सी ड्राइवर ने हमें वक्त से पहले hi रेलवे स्टेशन छोड़ दिया और उसने हमारा सारा सामान भी स्टेशन के अंदर रखवा दिया और बोलै की वो ट्रैन में हमारा सारा सामान रखवा कर hi यहाँ से जायेगा. उसकी बात सुन कर मैं खुश हो गया.

ट्रैन ट्रैक पर hi कड़ी थी तो मैंने ड्राइवर की मदद से सारा सामान ट्रैन में रखवाया और सबको अपनी अपनी शीट पर बैठाया भी. उसके बाद मैंने ड्राइवर को जितना उसने मांगा उतना पैसा दे दिया तो वो पैसा ले कर ख़ुशी ख़ुशी चला गया. उसके जाने के बाद मैं भी आ कर अपनी शीट पर बैठ गया.

हम सबकी शीट्स पास में hi थी तो हम सब आराम से hi बैठ गए थे. मैं ये सोच कर अंदर से खुश भी था की यहाँ तक हम सही सलामत गांव से आ गए हैं और अब तो कोई टेंशन वाली बात भी नहीं है.

लम्बी वाली एक शीट पर माँ कुसुम दीदी और रचना बैठी हुयी थी और दूसरी शीट पर मैं और प्रिय पूजा बैठे हुए थे. हम सबके चेहरे आमने सामने थे. कुसुम दीदी खिड़की के पास बैठी हुयी थी. उनके बाद रचना और फिर माँ. मैं देख रहा था की शीट पर आमने सामने बैठते hi कुसुम दीदी मुझसे नज़रे चुराने लगी थी. हमारे बीच अब बिलकुल hi बोल चाल बंद था. मैं सोचा करता था की ऐसा क्या हो गया है हमारे बीच जिसकी वजह से हम अब एक दूसरे से बात भी नहीं करते.?

प्रिय पूजा का चेहरा hi बता रहा था की वो दोनों बहुत खुश हैं. माँ किसी सोच में गम थी और रचना चुप चाप बैठी हुयी थी. वो कभी हमारी तरफ देखती तो कभी मेरी दोनों जुड़वाँ बहनो की तरफ मगर वो ज़्यादा देर तक हमसे नज़रे नहीं मिला रही थी. अभी मैं ये सब देख कर सोच hi रहा था की तभी ट्रैन में एक झटका लगा और ट्रैन स्टेशन से धीरे धीरे चल पड़ी.

प्रिय पूजा को छोड़ कर बाकी हम सब खामोश hi थे. खेर कुछ hi देर में ट्रैन ने स्पीड पकड़ ली और चलती हुयी ट्रैन के शोर से ख़ामोशी भांग हो गयी. मैं अपनी जगह से उठा और ट्रैन के बाथरूम की तरफ आ गया. इस तरफ आ कर मैंने अपना मोबाइल निकला और दक्षिणा को कॉल लगाया.

"तो जनाब को मेरी याद आ hi गयी." जैसे hi मैंने मोबाइल कान से लगाया तो दक्षिणा की आवाज़ मेरे कान में पड़ी. उसकी ये बात सुन कर मैंने मुस्कुराते हुए कहा.

"ारी हमने तुम्हे भुलाया hi कब था डिअर जो याद करना पड़े.?" मैंने ये कहा तो दक्षिणा ने कहा.

"अब बाते न बनाओ तुम. सब जानती हु और सब समझती भी हु. तुम कह कर गए थे की मुझे रोज़ फ़ोन लगाओगे और मुझसे बात करोगे मगर ऐसा हुआ नहीं. तुमने तो मुझे सिर्फ तभी फ़ोन लगाया जब तुम्हे ज़रूरत पड़ती थी मेरी." दक्षिणा ने शिकायत करते हुए ये कहा तो मैंने कहा.

"हाँ मैं तुम्हारी बात मानता हु डिअर और इसके लिए मैं तुमसे माफ़ी भी मांगता हु मगर मैं भी क्या करता यार.? यहाँ मैं ऐसे ऐसे चक्करो में फसा था की किसी बात का होश hi नहीं आता था." मैंने ये कहा तो दक्षिणा ने कहा.

"ट्रैन में हो न तुम.? इसका मतलब तुम सबको ले कर दिल्ली आ रहे हो. हद है यार तुमने मुझे इस बारे में एक बार फ़ोन करके बताया भी नहीं." दक्षिणा ने इस बार नाराज़ होते हुए ये कहा तो मैंने कहा.

"अब बता तो रहा हु न. ट्रैन में अभी बैठा हु और ट्रैन भी अभी hi यहाँ से चली है. अब कल सुबह दस बजे तक पहुंच जाउगा दिल्ली. तुम बताओ वह पर सब कुछ सेट कर दिया है न.?" मैंने ये पूछा तो दक्षिणा ने कहा.

"हाँ सब सेट कर दिया है मैंने. मैं तुम्हारी तरह भुलक्कड़ नहीं हु और न hi अपनी जिम्मेदारियों को भूलती हु." दक्षिणा ने ये कहा तो मैं मुस्कुरा उठा.

मैं जनता था की वो सही कह रही थी. मैंने सच में उसे तभी फ़ोन किया था जब मुझे ज़रूरत होती थी और इसके लिए अगर वो मुझसे नाराज़ हो जाये तो गलत नहीं था. खेर मैंने उसे मनाया और फिर उसके पूछने पर सब कुछ प्यार से बताया. साडी बाते jan'ne के बाद दक्षिणा ने कहा.

"तो अब तुम अपनी फॅमिली के साथ hi रहोगे और मेरा क्या.? मेरे बारे में क्या कुछ नहीं सोचा तुमने.?" दक्षिणा ने दुखी होते हुए ये कहा तो मैंने कहा.

"सोचा है माय डिअर. ऐसा कैसे हो सकता है की मैं तुम्हारे बारे में सोचुगा hi नहीं.?" मैंने ये कहा तो दक्षिणा ने कहा.

"अच्छा तो बताओ फिर की क्या सोचा है मेरे बारे में.?" दक्षिणा ने ये कहा तो मैंने कहा.

"वो सब मैं फ़ोन पर नहीं बताउगा बल्कि जब तुम्हारे पास आउगा तब बताउगा तुम्हे." मैंने ये कहा तो दक्षिणा ने कहा.

"चलो ठीक है. अच्छा ये बताओ की कल तुम सबको लेने रेलवे स्टेशन आ जाओगी न.?" दक्षिणा ने ये कहा तो मैंने कहा.

"ारी पागल हो क्या.? तुम वह आओगी तो मैं अपनी फॅमिली को क्या बताउगा की तुम कौन हो.? नहीं नहीं dear...tumhe वह आने की ज़रूरत नहीं है. हाँ तुम एक काम कर सकती हो की मुझ तक किसी तरह उस घर की चाभी पंहुचा देना." मैंने ये कहा तो दक्षिणा ने कहा.

"मैं घर की चाभी तुम तक कैसे पंहुचा सकती हु यार.? एक काम करती हु मैं रेलवे स्टेशन के बाहर रहूगी और वही से तुम्हे कॉल करुँगी. तुम किसी बहाने मेरे पास आ जाना और मुझसे चाभी ले लेना." दक्षिणा ने ये कहा तो मैंने सोचते हुए कहा.

"चलो ठीक है ऐसा hi करते हैं. तुम मुझे उस घर का पता व्हाट्सप्प कर देना." मैंने ये कहा तो दक्षिणा ने कहा.

"हाँ ठीक है मैं एड्रेस सेंड कर दूगी. और बताओ जहापनाह मेरे लिए क्या आज्ञा है.?" दक्षिणा ने ये कहा तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा.

"आज्ञा वाग्य कुछ नहीं hai...bas एक मीठी मीठी किश दे दो अपने होठो की." मैंने ये कहा तो दक्षिणा ने आअह्ह्ह भरते हुए कहा.

"हाय zaalim....is सबके लिए तो कब से तड़प रही हु मैं. जब तुम यहाँ से चले गए तो चार दिन भी अपने आपको सम्हाल नहीं पायी मैं और फिर एक दिन सविता से बदन की मालिश करवाने के बहाने से अपने अंदर की आग को शांत किया मैंने." दक्षिणा ने ये सब कहा तो मैं हैरान रह गया फिर बोलै.

"ये क्या कह रही हो तुम.?" मैंने हैरानी से ये कहा तो दक्षिणा ने कहा.

"क्या करती जान. मेरे बस में कुछ नहीं रह गया था. उस दिन सविता से बदन की मालिश करवाई और फिर बहाने बहाने से सब कुछ होता चला गया. उस दिन सविता को भी उस सब में बड़ा मज़ा आया था. दूसरे दिन मुझसे कह रही थी की मेरा जिसम बहुत सुन्दर है उसे बहुत अच्छा लगा था. जब मैंने उससे पूछा की क्या वो सब करना उसे भी अच्छा लगा तो उसने शरमाते हुए एक्सेप्ट किया की हाँ उसे अच्छा लगा था. तब मैंने उससे पूछा की क्या वो फिर से वो सब करना चाहेगी तो उसने इंकार नहीं किया. मैं भी वही चाहती थी. इस लिए लेस्बो बनना पड़ा. कुछ तो राहत मिल hi जाती थी उस सबसे जान. मगर अब और नहीं रहा जाता. ऐसा लगता है की उड़ कर तुम्हारे पास आ जाओ." दक्षिणा ने ये सब कहा तो मैंने कहा.

"अपने अंदर की इस आग को कण्ट्रोल करने की कोशिश करो यार. तुम तो बिलकुल सेक्स एडिक्ट बनती जा रही हो." मैंने ये कहा तो दक्षिणा ने कहा.

"ऐसा नहीं है जान. अगर ऐसा होता तो मैं इसके लिए किसी के भी नीचे लेट जाती. ये तो बस तुम्हारे लिए hi है जान." दक्षिणा ने ये कहा तो मैंने कहा.

"चलो कोई बात नहीं. अच्छा अब मैं फ़ोन रखता हु. तुमसे बात करने के लिए मैं अपनी शीट से उठ कर टॉयलेट की तरफ आ गया था और यहाँ आये हुए मुझे काफी देर भी हो गयी है. कही ऐसा न हो मेरी फॅमिली में से कोई इस तरफ आ जाये." मैंने ये कहा तो दक्षिणा ठीक है कहा. उसके बाद मैंने दक्षिणा को फ़ोन पर hi किश किया और फिर कॉल कट कर दी.

दक्षिणा से बात करने के बाद मैं आया और अपनी जगह पर बैठ गया. मैंने देखा की माँ रचना से बाते कर रही हैं. जबकि कुसुम दीदी खिड़की पर सर टिकाये बैठी हुयी थी. उनकी आँखे बंद थी. खिड़की से आती हुयी हवा से उनके बालो की एक दो लत उड़ रही थी. उनके बाल खुले हुए नहीं थे बल्कि उन्होंने छोटी कर रखा था.

मेरी नज़र उनके चेहरे पर मानो जैम सी गयी थी. मैं यु hi नहीं कहा करता था की वो दुनिया की सबसे सुन्दर और सबसे मासूम hain...wo तो सच में hi थी. दिल्ली में पांच साल से रह रहा हु और वह पर मैं बहुत घूमा भी हु मगर अपनी दीदी से ज़्यादा सुन्दर और मासूम कोई दूसरी लड़की नहीं देखा था मैंने.

उनके चेहरे की खूबसूरती और सादगी सबसे ख़ास थी. वो कभी कोई मेक उप वगैरा नहीं करती थी इसके बाद भी वो मेक उप करने वाली लड़कियों से हज़ार गुना ज़्यादा सुन्दर दिखती थी. इस वक्त वो आँखे बंद किये हुए थी मगर मैं जनता था की वो सो नहीं रही थी. बल्कि उनके दिल और दिमाग में बहुत सी बाते चल रही होंगी. उनके चेहरे से लग भी रहा था की वो कही खोयी हुयी हैं.

अभी मैं दीदी पर hi खोया हुआ था की तभी किसी ने मुझे हिलाया तो मेरा ध्यान टूट गया. मैंने हड़बड़ा कर बगल में देखा तो पूजा मुझे hi देखती हुयी मुस्कुरा रही थी. फिर उसने आगे बढ़ कर मेरे कान में धीरे से kaha...Aise क्यों देख रहे हो उनको.? हम भी तो बगल से और पास में hi बैठे हैं. हम पर भी थोड़ा नज़र दाल लो.

पूजा की इस बात से मैं कुछ न बोलै. मैंने उसकी तरफ से नज़रे हटा कर माँ और रचना की तरफ देखा. माँ अभी भी रचना से जाने क्या बाते कर रही थी. वो धीरे धीरे बाते कर रही थी जो की हमें सुनाई नहीं दे रही थी. ट्रैन के चलने से शोर भी हो रहा था जिससे कुछ सुनाई नहीं दे रहा था. रचना नीचे सर झुकाये चुप चाप बैठी हुयी थी.

"भाई, ये माँ रचना से क्या बाते कर रही हैं.? हमें तो कुछ सुनाई hi नहीं दे रहा. क्या कोई ख़ास बाते कर रही हैं जिसे हम सब सुन hi नहीं सकते.?" प्रिय ने मेरे कान के पास अपना मुँह ला कर धीरे से ये कहा तो मैंने कहा.

"क्या पता क्या बाते कर रही हैं वो.?" मैंने ये कहा तो प्रिय ने कहा.

"भाई एक बात कहु.?" प्रिय ने ये कहा तो मैंने उससे कहा की हाँ कहो तो उसने कहा.

"अब तो हम सब गांव से चले hi आये हैं और ये भी सच है की अब हम दुबारा कभी अपने गांव जाने वाले नहीं हैं. अब दिल्ली जा कर हम नयी ज़िन्दगी शुरू करने वाले हैं. इधर दीदी का हाल अब मुझसे देखा नहीं जाता. हमें उनके लिए कुछ तो सोचना hi पड़ेगा वर्ण ऐसे कब तक चलेगा भाई.?" प्रिय ने ये कहा तो मैंने कहा.

"हाँ मैंने भी यही सोचा है. दिल्ली जा कर इस बारे में मैं कुछ करुगा hi मगर तुम दोनों को भी मेरा साथ देना होगा." मैंने ये कहा तो प्रिय ने कहा.

"हम दोनों तुम्हारे साथ hi हैं भाई. तुम जो कहोगे हम वो करेंगे. हम बस ये चाहते हैं की दीदी जो चाहती हैं उन्हें मिल जाये." प्रिय ने ये कहा तो मैंने कहा.

"अभी तो ठीक से यही नहीं पता की वो क्या चाहती हैं और उनके मन में क्या है.? खेर मैंने सोच लिया है की अब मैं ऐसा कुछ करुगा की दीदी खुद hi मेरे पास आ कर मुझे बताएगी की वो क्या चाहती हैं या उनके मन में क्या है.?" मैंने ये कहा तो प्रिय ने कहा.

"ऐसा कैसे होगा भाई.? भला दीदी खुद तुम्हारे पास आ कर कैसे अपने दिल की बात बताएगी.? वो तो तुमसे हर पल दूर hi रहती हैं और उनकी यही कोशिश रहती है की उनका तुमसे सामना न हो. फिर ऐसा कैसे हो पायेगा.?" प्रिय ने हैरानी से ये कहा तो मैंने कहा.

"ऐसा होगा प्रिय और ज़रूर होगा. बस तुम देखती जाओ. मैं तुम दोनों को जैसा कहु वैसा करते रहना बस." मैंने ये कहा तो प्रिय ने कहा.

"ठीक है भाई हम वैसा hi करेंगे जैसा तुम करने को कहोगे मगर मुझे भी तो बताओ की तुम करने क्या वाले हो.?" प्रिय ने ये कहा तो मैंने उसके कान में धीमी आवाज़ में सब कुछ बता दिया. साडी बात सुन कर प्रिय पहले तो हैरान हुयी उसके बाद खुश भी.

"तुम दोनों क्या खुसुर खुसुर करके बाते कर रहे हो.? मुझे भी बताओ जल्दी." पूजा ने एकदम से हमारे पास आते हुए धीरे से ये कहा तो मैंने उससे कहा की उसे बाद में प्रिय बता देगी.

उसके बाद हमारे बीच ऐसी hi बाते होती रही और ट्रैन फुल स्पीड में चलती रही. दोपहर एक बजे हम सबने घर से बना कर लाया हुआ खाना खाया. उसके बाद माँ ने कहा की उन्हें थोड़ी देर आराम करना है तो मैंने उन्हें शीट पर लेट जाने के लिए कह दिया. मैंने प्रिय पूजा से कहा हम तीनो ऊपर वाली शीट पर बैठ जाते हैं और हमारी नीचे वाली शीट पर कुसुम दीदी और रचना बैठ जाएगी.

मैंने प्रिय पूजा को ऊपर वाली शीट पर भेज दिया. उसके बाद मैंने माँ से कहा की हमारी वाली शीट पर दीदी और रचना बैठ जाये और वो उसमे आराम से लेट जाइये. मेरे ऐसा कहने पर ऐसा hi हुआ. जैसे hi मैं ऊपर की शीट पर प्रिय पूजा के पास बैठा वैसे hi कुसुम दीदी और रचना हमारी वाली शीट पर आ कर बैठ गयी. उधर वाली शीट जब खाली हो गयी तो माँ उसमे आराम से लेट गयी.

हम तीनो ऊपर थे इस लिए अब हम अपने नीचे कुसुम दीदी और रचना को नहीं देख सकते थे. मैं जनता था की नीचे वाली शीट पर अब कुसुम दीदी और रचना hi हैं और दीदी को रचना से प्रॉब्लम है. खेर मैं भी देखना चाहता था की इस सिचुएशन में दोनों के बीच क्या होता है. रचना के मन में दीदी के लिए कोई बात नहीं थी ये मैं जनता था. मुझे ये भी पता था की रचना को अब सब कुछ पता है तो हो सकता है की वो उस बारे में दीदी से कोई बात करे.

अभी मैं ये सब सोच hi रहा था की तभी नीचे से दीदी की आवाज़ आयी. वो माँ से कह रही थी की उन्हें भी आराम करना है. ये देख कर मैं समझ गया की दीदी रचना के साथ अकेले इस तरह नहीं बैठना चाहती थी और अब आराम करने का बहाना करके उससे दूर होना चाहती थी. खेर दीदी के ऐसा कहने पर माँ ने मुझे आवाज़ दी और कहा की दीदी को ऊपर वाली शीट पर चढ़वा दे.

माँ की बात सुन कर मैंने कहा की शीट के इस तरफ से छोटी छोटी सीढिया बानी हुयी हैं तो उसी से ऊपर आ जाये. मैंने ये कहा तो दीदी ने पलट कर देखा तो उन्हें सीढ़ी नज़र आयी. वो आगे बढ़ कर सीढ़ी में चढ़ने की कोशिश करने लगी. मुझे लगा कही ये गिर न जाये वर्ण एक अलग hi मुसीबत हो जाएगी. इस लिए मैं जल्दी से नीचे उतरा और दीदी के बगल से आ कर खड़ा हो गया.

मैं कुछ कर नहीं रहा था बल्कि बस खड़ा hi था उनके पास. मेरा मकसद ये था की अगर दीदी गिरने लगेगी तो मैं उन्हें पकड़ लूँगा. बाकी वो खुद hi सीढ़ी से ऊपर चली जाएगी और ऐसा हुआ भी. दीदी के लिए ये सब पहली बार hi था इस लिए वो थोड़ा दर रही थी मगर फिर वो किसी तरह ऊपर चढ़ hi गयी. उनके ऊपर जाते hi मैंने एक बार रचना की तरफ देखा. वो मुझे hi देख रही थी. उसके होठो पर मुस्कान थी. ये देख कर मैं भी हलके से मुस्कुराया और फिर अपनी जगह पर आ गया.

ऊपर आ कर मैंने पूजा को नीचे रचना के पास भेज दिया. मैं नहीं चाहता था की वो बेचारी अकेले बैठी बोर होती रहे. इधर ऊपर अब दीदी भी हमारे सामने वाली शीट पर आ गयी थी और एक बार हमारी तरफ देखने के बाद वो शीट पर लेट गयी थी. उनका चेहरा हमारी तरफ hi था मगर उन्होंने जल्दी hi अपने फेस पर अपना दुपट्टा दाल लिया. शायद वो नहीं चाहती थी की उनके चेहरे की तरफ हम देखे या फिर शायद वो कम्फर्टेबले फील नहीं कर रही थी.

इधर इस शीट पर मैं और प्रिय बैठे हुए थे और अब दीदी के सामने आ जाने से हम दोनों फ्री हो कर बात नहीं कर सकते थे. दीदी का दुपट्टा बहुत hi पतला था और उससे उनका फेस क्लियर हमें दिख रहा था. जिससे हम देख रहे थे की वो आँखे बंद किये लेती हुयी हैं. उनकी तरफ ध्यान से देखने के बाद प्रिय ने मेरे कान में धीरे से कहा.

"मुझे तो लगता है भाई की दीदी हमारे सामने वाली शीट पर जान बुझ कर आयी हैं. जब हम नीचे से ऊपर आ गए तो उन्हें लगा होगा की हम उनके बारे में कोई बात करेंगे या फिर शायद वो ये शक कर रही होंगी की हम आपस में hi कुछ करेंगे." प्रिय ने ये कहा तो मैंने हैरानी से उसकी तरफ देखा फिर सामने की तरफ देखते हुए धीरे से कहा.

"ऐसा तुम कैसे कह सकती हो की उन्हें शक होगा.? वैसे उस दिन फिर क्या हुआ था जब वो तुम दोनों को मेरे कमरे से ले कर गयी थी.? क्या उस दिन बाद में भी उन्होंने तुम दोनों को कुछ कहा था.?" मैंने ये कहा तो प्रिय ने कहा.

"हाँ bhai...didi हमें डाट रही थी और कह रही थी अब दुबारा हम तुम्हारे कमरे में न जाये." प्रिय ने ये कहा तो मैं हैरान हुआ फिर बोलै.

"ऐसा क्यों कहा उन्होंने.? क्या उन्हें किसी बात का शक हो गया था.?" मैंने ये पूछा तो प्रिय ने कहा.

"शक का तो पता नहीं भाई मगर जब उन्होंने हमें तुम्हारे कमरे में न जाने को कहा तो हमें भी गुस्सा आ गया था. हमने उनसे कहा की आप हमें हमारे hi भाई के कमरे में जाने से मन कैसे कर सकती हैं.? आखिर क्या है आपके मन में हमारे प्रति.? या फिर आप ये चाहती हैं की जैसे आप भाई से बात नहीं करती हैं वैसे hi हम भी न करे." प्रिय ने ये कहा तो मैंने हैरानी से कहा.

"फिर क्या कहा दीदी ने.?" मैंने पूछा तो प्रिय ने कहा.

"जब मैंने ऐसा कहा तो दीदी हम पर और भी ज़्यादा गुस्सा हो गयी और कहने लगी की तुम दोनों उसके कमरे में नहीं जाओगी बस. बाकी वो कुछ नहीं सुन्ना चाहती. उनके ऐसा कहने पर हमने भी कह दिया की आपको जो अच्छा लगा आपने किया मगर ये ज़रूरी नहीं की हम भी वही करेंगे जो आप भाई के साथ करती हैं. पूजा ने तो कह भी दिया था की आखिर ऐसा क्या गुनाह कर दिया हमारे भाई ने जिसकी वजह से आप उससे बात नहीं करती हैं. पूजा ने ये भी कहा की उसे सब कुछ पता है की उनके मन में क्या है और वो किस बात से भाग रही हैं. पूजा की ये बाते सुन कर दीदी गुस्से से देखती रही और फिर चुप चाप चली गयी थी." प्रिय ने ये सब बताया तो मैंने कहा.

"उसके बाद दुबारा उनसे बात हुयी तुम दोनों की.?" मैंने ये पूछा तो प्रिय ने कहा.

"हाँ बात तो हमने hi की उनसे. तुम्हे तो पता hi है की हम ज़्यादा देर तक किसी से नाराज़ नहीं रह सकते और न hi ये हमारी आदत है की हम किसी बात को दिल में बैठा कर रखे. दीदी से हम खुद hi बाते करने लगे थे. पहले तो वो नहीं बोलती थी फिर धीरे धीरे बोलने लगी. उसके बाद हमारे बीच उस बारे में कोई बात नहीं हुयी." प्रिय ने ये कहा तो मैं कुछ न बोलै. बस दीदी के बारे में hi सोचता रहा.

भाई लोग....

आज के लिए इतना hi....

रीड एन्जॉय & गिव योर फीडबैक....

कीप सपोर्टिंग & स्टे विथ....

:थैंक्यू:
 
थैंक्स फॉर योर लवली कमेंट....

भय आप सब लोग उस एक बात के पीछे क्यों पद गए हैं. वैसे आप सब लोगो ने तो गेस तो कर hi लिया है फिर बताने का फायदा क्या है....

यारा उस बात को मैंने अभी तक क्लियर नहीं बताया इसके पीछे एक रीज़न है. रीज़न ये है की उस बात को सही वक्त पर और सही तरीके से बताया जायेगा. तब आप सबको पढ़ने में भी अच्छा लगेगा....

नेक्स्ट अपडेट पोस्टेड....

रीड & एन्जॉय....
 
थैंक्स फॉर योर लवली कमेंट....

भय उस एक बात की वजह से स्टोरी पढ़ने में मज़ा नहीं आ रहा आपको. ये बात समझ नहीं आयी मुझे. उस बात को बता देने से ऐसा क्या हो जायेगा जिससे आपको स्टोरी पढ़ने में मज़ा आने लगेगा ये बताओ मुझे....

नेक्स्ट अपडेट पोस्टेड ों पेज no. 166....

रीड & एन्जॉय....
 
थैंक्स फॉर योर लवली कमेंट....

Don't वोर्री भय....

ये स्टोरी मैजिकल या फंतासी बेस्ड नहीं है. मुझे मैजिक वाली स्टोरीज पसंद नहीं हैं. नार्मल लाइफ पर स्टोरी लिखना और पढ़ना अच्छा लगता है. सो don't वोर्री. इसमें ऐसा कुछ नहीं होगा जैसे की आप बात कर रहे हो....

कीप सपोर्टिंग & स्टे विथ उस....

नेक्स्ट अपडेट पोस्टेड ों पेज no. 166....

रीड & एन्जॉय....
 
भाई लोग....

इस अपडेट में हीरो अपनी फॅमिली को ले के दिल्ली जा रहा है और अब वो कभी गांव आएगा की नहीं ये कहना मुश्किल है. मतलब अब आगे की स्टोरी दिल्ली में रह कर hi चलेगी....

यारा मेरा आप लोगो से कहना ये है की इसके आगे स्टोरी में आप सब लोग क्या चाहते हैं....

प्ल्ज़ अपना अपना सुग्गेस्टियन्स दे कर मुझे बताओ. मुझे भी आप लोगो के सुग्गेस्टिव से कुछ न कुछ मिल hi जायेगा....

वैसे तो इसके आगे स्टोरी में क्या होगा वो तो मैंने सोचा hi है मगर मैं आप सबकी राय भी जानना चाहता हु....

कीप सपोर्टिंग & स्टे विथ....

:थैंक्यू:
 
सब कुछ जायज़ है....

अपडेट = 40


"फिर क्या कहा दीदी ने.?" मैंने पूछा तो प्रिय ने कहा.

"जब मैंने ऐसा कहा तो दीदी हम पर और भी ज़्यादा गुस्सा हो गयी और कहने लगी की तुम दोनों उसके कमरे में नहीं जाओगी बस. बाकी वो कुछ नहीं सुन्ना चाहती. उनके ऐसा कहने पर हमने भी कह दिया की आपको जो अच्छा लगा आपने किया मगर ये ज़रूरी नहीं की हम भी वही करेंगे जो आप भाई के साथ करती हैं. पूजा ने तो कह भी दिया था की आखिर ऐसा क्या गुनाह कर दिया हमारे भाई ने जिसकी वजह से आप उससे बात नहीं करती हैं. पूजा ने ये भी कहा की उसे सब कुछ पता है की उनके मन में क्या है और वो किस बात से भाग रही हैं. पूजा की ये बाते सुन कर दीदी गुस्से से देखती रही और फिर चुप चाप चली गयी थी." प्रिय ने ये सब बताया तो मैंने कहा.

"उसके बाद दुबारा उनसे बात हुयी तुम दोनों की.?" मैंने ये पूछा तो प्रिय ने कहा.

"हाँ बात तो हमने hi की उनसे. तुम्हे तो पता hi है की हम ज़्यादा देर तक किसी से नाराज़ नहीं रह सकते और न hi ये हमारी आदत है की हम किसी बात को दिल में बैठा कर रखे. दीदी से हम खुद hi बाते करने लगे थे. पहले तो वो नहीं बोलती थी फिर धीरे धीरे बोलने लगी. उसके बाद हमारे बीच उस बारे में कोई बात नहीं हुयी." प्रिय ने ये कहा तो मैं कुछ न बोलै. बस दीदी के बारे में hi सोचता रहा.

अब आगे पढ़िए....


सारा दिन मैं और प्रिय एक दूसरे से दुनिया जहां की बाते करते रहे. कुसुम दीदी हमारी तरफ पीठ करके सो गयी थी. मैंने नीचे देखा था माँ तो पहले hi सो गयी थी आराम करते हुए और अब रचना और पूजा भी सो गयी थी. पूजा बीच वाली शीट में थी और रचना नीचे वाली में.

मुझे प्यास लगी तो मैं नीचे उतरा और बैग से पानी का बोतल ऊपर hi ले आया. पहले मैंने पानी पिया उसके बाद मैंने प्रिय को दे दिया. प्रिय ने जैसे hi बोतल को ऊपर करके मुँह में पानी डाला तो चलती ट्रैन में हल्का सा झटका लगा तो पानी उसके मुँह के साइड पर गिर गया जिससे पानी बहता हुआ नीचे उसके कुर्ते में आ गया और कुर्ते के गले से उसके सीने में. ये देख कर मैं मुस्कुराया तो प्रिय भी मुझे देख कर मुस्कुरा पड़ी.

मैंने प्रिय से कहा की वो बोतल में मुँह लगा कर पानी पिए. मेरे कहने पर उसने वैसा hi किया. पानी पिने के बाद उसने बोतल का ढक्कन लगा कर एक तरफ रख दिया. मैं देख रहा था की उसका कुरता गले से भीग गया था. गले में अभी भी उसके जिसम में पानी की धार बानी हुयी चमक रही थी. प्रिय के दूध जैसे गोर जिसम में वो धार मुझे पागल कर रही थी. मैंने जल्दी से आस पास देखा और फिर झुक कर मैं प्रिय के गले में दिख रही पानी की उस लाइन को जीभ से चाटने लगा.

मेरे ऐसा करते hi प्रिय एकदम से घबरा गयी. उसने मुझे हटाने की कोशिश की और मेरे कान में धीरे से कहा ये कर रहे हो bhai...didi सामने hi हैं और यहाँ इतने सरे लोग भी हैं. ये सब देखेंगे तो क्या सोचेंगे.?

प्रिय के ऐसा कहने पर मैं सीधा बैठा और उससे बोलै की कोई नहीं देख रहा. मैंने पहले hi देख लिया था और दीदी तो दूसरी तरफ मुँह करके लेती हुयी हैं. मेरी ये बात सुन कर प्रिय ने कहा की इस वक्त ये सब करना ठीक नहीं है बल्कि रात में कर लेना जो करना हो. उसकी ये बात सुन कर मैंने कहा.

"रात में क्या पता क्या होता है.? हो सकता है की माँ तुम्हे अपने ऊपर वाली शीट पर लेटने को कह दे. तब हम क्या कर सकेंगे.?" मैंने ये कहा तो प्रिय ने कुछ सोचते हुए कहा.

"हाँ ये हो सकता है. तो फिर हम ऐसा करते हैं की यहाँ कुछ नहीं करेंगे. जब दिल्ली पहुंच जायेगे तो तब वही पर करेंगे जो करना होगा." प्रिय ने ये कहा तो मैंने कहा.

"वह तो करेंगे hi मेरी जान. मगर यहाँ पर भी करेंगे. रिष्क का अपना hi मज़ा है. अब चलो मुझे अपने होठो का रास पिलाओ." मैंने ये कहा तो प्रिय ने हैरानी से मेरी तरफ देखते हुए कहा.

"हे भगवन तुम पागल हो क्या भाई.? हम यहाँ ऐसा कुछ नहीं कर सकते. कोई भी हमें देख लेगा." प्रिय ने ये कहा तो मैंने कहा.

"कोई नहीं देखेगा यार. तुम इतना डर्टी क्यों हो.? अब चलो टाइम बर्बाद मत करो." मैंने ये कहा तो प्रिय देखती रह गयी मुझे. उसके चेहरे से hi लग रहा था की उसके अंदर घबराहट बढ़ गयी थी मेरी इन बातो से.

मैंने पीछे से हाथ दाल कर उसको कंधे से पकड़ा और फिर उसे अपनी तरफ करके उसके गुलाबी होठो की तरफ देखते हुए बोलै.

"तुम्हारे होठो को खा जाने का मन करता है प्रिय. सच में ये बहुत सुन्दर और मीठे हैं." मैंने ये कहा तो प्रिय के कांपते होठो पर हलकी सी मुस्कान उभर आयी.

मैंने इधर उधर देखा और जल्दी से आगे बढ़ कर उसके होठो को चूम लिया. हम दोनों की धड़कने बढ़ गयी थी. हमारे आस पास लोग बैठे तो थे मगर ऊपर की तरफ कोई नहीं बैठा था और न hi किसी का ध्यान इस तरफ था. वो सब अपने अपने मोबाइल में बिजी थे. मैंने प्रिय को दिखाया की देख लो हमारी तरफ किसी का ध्यान नहीं है. मैंने पीछे पलट कर भी देखा. मेरे पीछे जो जाली लगी थी उसके पीछे भी कोई नहीं बैठा था.

प्रिय ने झाँक झाँक कर हर तरफ देखा तब जा कर उसे चैन मिला. कुसुम दीदी अभी भी हमारी तरफ पीठ किये हुए hi लेती हुयी थी. शायद वो गहरी नीड में सो गयी थी. मैंने प्रिय को फिर से अपनी तरफ किया और इस बार मैंने उसके होठो को मुँह में भर लिया और चूसने लगा. प्रिय के शहद जैसे मीठे होठो को चूसने में मुझे बहुत मज़ा आ रहा था. ऐसा लग रहा था की बस चुस्त hi जाओ. प्रिय का जिसम हल्का हल्का कांप रहा था और वो बिलकुल शांत थी.

थोड़ी hi देर में हमारी साँसे भारी हो गयी. मैं उससे अलग हुआ तो वो गहरी गहरी साँसे लेने लगी. उसका चेहरा सुर्ख पद गया था. मैंने एक बार फिर से आस पास देखा और फिर उसके बाद मैंने प्रिय के कान में धीरे से कहा की मुझे उसका दुधु पीना है. मेरी ये बात सुन कर प्रिय बुरी तरह शर्मा गयी.

मैंने अपना एक हाथ बढ़ा कर प्रिय की एक चुकी को पकड़ लिया तो उसने जल्दी से मेरे उस हाथ पर अपना हाथ रख कर दबा दिया. मैंने उसके कान में फिर से कहा की वो अपना कुरता ऊपर करे. मेरी इस बात से प्रिय ने न में सर हिलाया. वो शायद दर रही थी की ये सब करते हुए कही कोई देख न ले और दूसरी बात ये भी थी की उसे इस तरह खुले में ये सब करने में शर्म भी आ रही थी.

मैंने अपना जो हाथ उसकी चुकी पर रखा हुआ था उसे हरकत में लाया और उसकी चुकी को दबाने लगा. प्रिय नज़रे झुकाये बैठी हुयी थी और मेरे उस हाथ को और ज़ोर से दबाये जा रही थी. मैंने एक बार फिर से उसके कान में कहा की वो कुरता ऊपर करे. मगर वो न मानी तो मैंने उसकी तरफ कुछ देर देखा और फिर मैंने उसकी चुकी से अपना हाथ हटा लिया और उससे थोड़ा दूर हो कर चुप चाप बैठ गया.

मेरे ऐसा करते hi प्रिय ने जल्दी से मेरी तरफ देखा. मैं सामने की तरफ देखते हुए चुप चाप बैठा गया था. प्रिय को समझते देर न लगी की मैं नाराज़ हो गया हु. इस लिए वो मेरे करीब खिसक कर आयी और धीमी आवाज़ में बोली.

"भाई, क्या नाराज़ हो गए हो मुझसे.?" प्रिय ने ये कहा तो मैंने कोई जवाब नहीं दिया. मुझे चुप देख कर उसने फिर कहा.

"भाई देखो नाराज़ न हो. तुम्हारा जो दिल करे वो मेरे साथ कर लो. मेरा सब कुछ तुम्हारा hi तो है. मैं तो बस इस लिए रोक रही थी की मुझे यहाँ खुले में ये सब करने में बहुत शर्म आ रही है. किसी ने अगर देख लिया तो क्या होगा.?" प्रिय ने ये कहा तो मैं इस बार भी कुछ न बोलै. मेरी चुप्पी देख कर प्रिय की आँखों में आँशु आ गए. उसने दुखी हो के कहा.

"ठीक है bhai...kar लो जो करना है तुम्हे. मैं अब नहीं रोकूंगी. तुम्हारी चीज़े हैं चाहे जो करो मगर भगवन के लिए मुझसे नाराज़ न हो. मैं तुम्हारी नाराज़गी नहीं सह सकती." प्रिय ये सब कहते हुए रोने लगी तो मेरा दिल पसीज गया.

मुझे एकदम से अहसास हुआ की ये मैंने अच्छा नहीं किया. ये तो मैं भी जनता था की वो मुझे किसी भी चीज़ के लिए मन नहीं कर सकती थी. मगर इस वक्त अगर वो मन कर रही तो सिर्फ इस लिए क्यों की वो खुले आम ये सब करने से घबरा रही थी.

मैंने उसे खींच कर अपने से छुपका लिया और कहा की मुझे माफ़ कर दे. मुझे उसकी इज्जत के बारे में भी सोचना चाहिए था. खेर मेरे मानाने पर वो जल्दी hi मान गयी और कहने लगी की आइंदा मैं उससे कभी नाराज़ न हो. मैंने भी उसकी इस बात पर मुस्कुरा कर हाँ में सर हिला दिया तो उसने पहले आस पास देख फिर जल्दी से मेरे होठो को चूम लिया.

उसके बाद हमारे बीच ऐसी hi नार्मल बाते होती रही. शाम हुयी तो दीदी के जिसम में हलचल हुयी और वो सीढ़ी huyi...fir उठ कर बैठ गयी. उनकी नज़र हम दोनों पर पड़ी और फिर जब मुझसे उनकी नज़र मिली तो उन्होंने जल्दी से मुझसे नज़रे हटा कर नीचे की तरफ देखने लगी. शाम हो गयी थी इस लिए ट्रैन के अंदर की लाइट जल गयी थी.

कुसुम दीदी खिसकते हुए सीढ़ी के पास गयी और फिर बड़ी सावधानी से उससे नीचे उतर गयी. नीचे जा कर उन्होंने माँ को जगाया तो माँ भी उठ कर बैठ गयी. दीदी ने माँ के कान में कुछ कहा तो माँ ने ऊपर मेरी तरफ देखा और फिर फर्श पर खड़े हो कर मुझसे कहा की कुसुम को बाथरूम जाना है. माँ के ऐसा कहने पर मैंने उन्हें बता दिया की बाथरूम किधर है. मेरे बताने पर माँ दीदी को ले कर बाथरूम चली गयी.

मैं और प्रिय तो सोये hi नहीं थे मगर जो सोये हुए थे वो सब अब जाग चुके थे. माँ और दीदी को गए हुए अभी दो मिनट hi हुए थे की प्रिय भी नीचे उतरने के लिए खिसकने लगी तो मैंने उससे पूछा कहा जा रही हो तो उसने मुस्कुराते हुए कहा की उसे भी बाथरूम जाना है तो मैंने कहा मैं भी साथ में चालू क्या तो उसने मुस्कुराते हुए hi कहा की तुम क्यों जाओगे.? मैं माँ के साथ चली जाओगी या फिर पूजा को लेके चली जाओगी.

प्रिय की इस बात पर मैंने उसके कान में धीरे से कहा की मुझे भी बाथरूम लगी है इस लिए हम दोनों साथ hi चलते हैं और फिर बाथरूम में एक साथ hi करेंगे. मेरी ये बात सुन कर प्रिय ने शरमाते हुए कहा अच्छा ji...na बाबा न ये संभव नहीं है. माँ को अगर पता चल गया तो मुझे मार hi डालेंगी. मैंने कहा चलो अभी जब माँ आएगी तो मैं उनसे बोलूगा की मैं तुम्हे बाथरूम भेजने जा रहा हु. मेरी इस बात से प्रिय ने हैरानी से मेरी तरफ देखते हुए कहा.

"तुम सच में मुझे माँ से मरवाओगे क्या.?" प्रिय ने ये कहा तो मैंने कहा.

"यार माँ इसमें कुछ नहीं कहेगी. उनको क्या पता की हम दोनों बाथरूम में एक साथ hi घुस जायेगे.?" मैंने ये कहा तो प्रिय ने मुस्कुराते हुए कहा.

"मैं सब समझ रही हु. तुम्हारे इरादे कुछ ठीक नहीं लग रहे मुझे." प्रिय ने ये कहा तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा.

"इरादे तो नेक hi हैं मेरी जान. बस बंद बाथरूम में तुम्हे अच्छे से प्यार करुगा और क्या.?" मैंने ये कहा तो प्रिय ने धीरे से हस्ते हुए कहा.

"अच्छा ji...to ये सोच रखा है तुमने. मगर एक बात तुम भी सुन lo...main ऐसा कुछ नहीं करने दूगी तुम्हे यहाँ पर." प्रिय ने ये कहा तो मैंने थोड़ा उदास सा मुँह बनाते हुए कहा.

"कोई बात नहीं प्रिय जी. हमारी तो किस्मत hi खराब है. एक तुम्ही से उम्मीद थी हमें और अब तुमने भी हमें na-ummeed कर दिया तो कोई बात नहीं जाओ तुम." मैंने ये कहा तो प्रिय ने मुस्कुराते हुए कहा.

"ये सब नाटक बंद करो. मैंने कह दिया तो कह दिया. यहाँ ट्रैन में मैं कुछ भी ऐसा वैसा सबके सामने नहीं करने वाली. हाँ जब हम दिल्ली पहुंच जायेगे तो तुम बंद कमरे में जो चाहे कर लेना मैं ज़रा सा भी मन नहीं करुँगी तुम्हे." प्रिय ने ये कहा तो मैंने कहा.

"ठीक है जैसी तुम्हारी मर्ज़ी." मैंने ये कहा तो प्रिय ने मेरी तरफ ध्यान से देखा और फिर सीरियस हो कर बोली.

"ऐसी ज़िद क्यों करते हो जान.? मैंने कहा न की मेरा सब कुछ तुम्हारा hi है. तुम जो चाहो कर सकते हो या ले सकते हो मगर मुझे यहाँ पर ऐसा कुछ करने में बहुत दर लग रहा है. मैं नहीं चाहती की किसी को भी हमारे बारे में पता चल जाये या कोई हमें वो सब करते हुए देख ले. इसके बाद भी अगर तुम चाहते हो की मैं तुम्हारी ख़ुशी के लिए वो सब करू तो ठीक है. मैं वो सब करने को तैयार हु. आखिर मैं अपने प्यार अपनी मोहब्बत की किसी मांग को कैसे न पूरा करुँगी.?" प्रिय ने ये सब कहा तो मैं उसे देखता रह गया.

बात सच hi कह रही थी वो. मगर मैं तो बस ये चाहता था की ऐसे माहौल में भी अगर हम छुप के प्यार करे तो उसका एक अलग hi मज़ा होगा. मुझे पता था की प्रिय ट्रैन में ये सब करने से दर रही थी वर्ण वो मुझे किसी बात के लिए मन करने वाली नहीं थी.

अभी मैं ये सब सोच hi रहा था की तभी माँ और दीदी आ गयी. उनके आते hi प्रिय ने धीरे से मेरे कान के पास अपना मुँह ला कर कहा की मैं माँ से कह दू की मैं प्रिय को बाथरूम भेजने जा रहा हु. प्रिय की इस बात से मैं समझ गया की उसने ऐसा इस लिए कहा है की वो मुझे फिर से नाराज़ नहीं करना चाहती थी.

उधर जैसे hi माँ और दीदी आयी तो पूजा शीट से उठ कर फर्श पर कड़ी हो गयी और माँ से बोली की उसे और रचना दीदी को भी बाथरूम जाना है. पूजा की बात सुन कर माँ ने कहा ठीक है जाओ. फिर एकदम से उन्होंने ऊपर हमारी तरफ देखा और फिर प्रिय से कहा की तुझे भी जाना हो तो जा इन दोनों के साथ. माँ की इस बात से प्रिय को मजबूरन कहना hi पड़ा की हाँ उसे भी जाना है. बस फिर क्या था माँ के कहने पर वो भी नीचे उतर गयी और फिर तीनो एक साथ बाथरूम की तरफ जाने लगी.

वो तीनो जैसे hi आगे बढ़ी तो इधर मेरा चेहरा लटक गया. मगर तभी माँ ने मुझे आवाज़ दी और कहा की विक्की बीटा जा उन लोगो के साथ. लड़किया हैं कही कोई कुछ उल्टा सीधा न कर दे उनके साथ. माँ की इस बात से मेरे मन में एक उम्मीद जगी और मैं हामी भरते हुए जल्द hi नीचे उतरा और उन तीनो के पीछे पीछे चला गया बाथरूम की तरफ. मैं अभी चार पांच कदम hi आगे बढ़ा था की तभी प्रिय ने पीछे पलट कर देखा. मुझ पर नज़र पड़ते hi वो मुस्कुरायी और फिर आगे की तरफ देखते हुए पूजा और रचना के पीछे जाने लगी.

कुछ hi देर में हम ट्रैन के बाथरूम के पास पहुंच गए. पूजा और रचना ने जब मुझे वह पर आया देखा तो दोनों hi हैरान हुयी. रचना तो शर्माने लगी थी जबकि मैंने उन तीनो से ये कहा की मुझे माँ ने भेजा है तुम तीनो की देख भाल के लिए. मेरी बात सुन कर प्रिय पूजा मुस्कुरायी और फिर पूजा ने मुस्कुराते हुए मुझसे kaha....hamari देख भाल के लिए या सिर्फ रचना भाभी की देख भाल के लिए.?

पूजा की ये बात सुन कर मैं तो हैरान हुआ hi मगर रचना बुरी तरह शर्मा गयी. पूजा ने जब रचना को भाभी कहा तो मुझे बड़ा hi अजीब लगा था मगर मैं इस बारे में कुछ न बोलै. बस यही कहा की जिसके लिए यहाँ आयी हो तुम सब वो काम करो बाद में मुझे भी जाना है.

मेरी बात सुन कर पूजा ने रचना की तरफ देखते हुए कहा की भाभी जी पहले आप जाइये. पूजा की इस बात पर रचना शरमाते हुए जल्दी से बाथरूम का दरवाजा खोल कर अंदर घुस गयी. उसको इतना जल्दी अंदर जाते देख पूजा ने मुस्कुराते हुए मुझसे kaha....bhai लगता है की भाभी को ज़ोर से आयी हुयी थी. शुक्र है हम उन्हें यहाँ ले कर आ गए थे और सबसे पहले उन्हें hi अंदर भेजा वर्ण जाने क्या होता.

पूजा की ये बात सुन कर प्रिय खिलखिला कर हसने लगी जबकि मैं बस मुस्कुरा कर रह गया. मैं जनता था मेरी ये दोनों नटखट बहने मुझे और रचना को छेड़ रही थी. कुछ देर बाद जब रचना बाहर निकली तो प्रिय ने पूजा से कहा की अब तू जा अंदर. प्रिय के कहने पर पूजा बाथरूम में घुस गयी. रचना एक तरफ चुप चाप कड़ी हो गयी थी. उसे चुप देख कर प्रिय ने उससे kaha...aap इतना चुप क्यों हैं भाभी जान. या फिर आपको अब हम से शर्म आती है.

प्रिय की इस बात पर रचना ने पहले मेरी तरफ देखा फिर प्रिय की तरफ देखते हुए kaha...nahi ऐसा कुछ नहीं है प्रिय. बस थोड़ा अजीब सा लग रहा है. रचना की इस बात पर प्रिय ने कहा की अजीब लगने वाली कौन सी बात है भाभी जी.? अब तो आपको हमारे साथ hi हमारी भाभी बन कर रहना है इस लिए हम सबसे तो घुलना hi पड़ेगा.

प्रिय ने ये कहा hi था की तभी पूजा बाहर आ गयी और उसने मुझसे कहा की भाई मैं भाभी को ले कर जाती हु तुम प्रिय को ले कर आ जाना. पूजा की ये बात सुन कर मेरे दिल की धड़कन एकदम से तेज़ हो गयी. मुझे समझ न आया की उसको क्या कहु. यही हाल प्रिय का भी था. मेरे दिमाग में एकदम से ये बात आयी की पूजा ने ऐसा क्यों कहा होगा.? क्या वो चाहती थी की मैं अकेले में प्रिय के साथ कुछ करू.? अगर ऐसा था तो वो भला ऐसा क्यों चाहती थी.? उसे तो पता था की यहाँ ये सब करना ठीक नहीं था.

तभी प्रिय ने पूजा से कहा की रुक जा थोड़ी देर मैं भी फ्रेश हो के आती हु फिर साथ hi चलेंगे. प्रिय की इस बात पर पूजा ने kaha...tab तक क्या मैं और भाभी तुम दोनों का इंतज़ार करेंगे यहाँ खड़े रह कर.? तू भाई के साथ आ जाना मैं भाभी को ले के जा रही हु. पूजा ने ये कहा और प्रिय का जवाब सुने बिना hi रचना को ले कर चली गयी. प्रिय ने उसे एक बार आवाज़ भी दी मगर पूजा न रुकी.

उन दोनों के जाने के बाद प्रिय ने मेरी तरफ हैरानी से देखा तो मैंने धीरे से कहा की लगता है वो हमें चांस दे कर गयी है की हम कुछ करे. मेरी इस बात से प्रिय ने कहा भाई तुम देख hi रहे हो की यहाँ पास में hi शीतो पर सब लोग बैठे हुए हैं. इन सब की आँखों के सामने हम दोनों कैसे बाथरूम में घुस जायेगे. किसी ने हमें एक साथ जाते हुए या अंदर से बाहर आते हुए देख लिया तो बहुत बड़ी गड़बड़ हो जाएगी.

प्रिय की बात बिलकुल सही थी. मैंने आस पास देखा तो मुझे भी समझ आ गया की हम दोनों का एक साथ बाथरूम के अंदर जाना ठीक नहीं था. मैंने भी सोचा इतना बड़ा रिष्क नहीं लेना चाहिए. प्यार करने का कोई दूसरा मौका देख लगे. ये सोच कर मैंने प्रिय से कहा की वो अंदर जाये मैं यही खड़ा हु. मेरे कहने पर प्रिय बाथरूम में चली गयी. उसके बाहर आने के बाद मैंने भी बाथरूम किया और फिर हम दोनों अपनी शीट पर आ गए. मुझे और प्रिय को आया देख पूजा ने सबकी नज़र बचा कर मुझसे आँखों के इशारे से पूछा की हम दोनों इतना जल्दी कैसे चले आये वह से तो मैंने उसे कोई जवाब न दिया और ऊपर की शीट पर आ गया जबकि प्रिय नीचे hi पूजा और रचना के साथ बैठ गयी.

उसके बाद कुछ ख़ास नहीं हुआ. नीचे वो लोग बाते करती रही. कुसुम दीदी ज़्यादा बात नहीं कर रही थी. उनसे माँ अगर कोई बात कहती तो वो धीरे से जवाब दे कर चुप हो जाती थी. खेर रात साढ़े दस बजे के आस पास हम सबने थोड़ा बहुत खाना खाया उसके बाद हम सब अपनी अपनी शीट पर सोने के लिए लेटने लगे. जैसा की मुझे पता था वही हुआ. यानी माँ तो नीचे hi लेट गयी. प्रिय उनके ऊपर वाली शीट पर और दीदी सबसे ऊपर जहा वो दिन में लेती हुयी थी. जबकि पूजा इस तरफ की शीट में सबसे neeche..uske ऊपर रचना लेट गयी. मैं सबसे ऊपर अपनी जगह पर hi था.

प्रिय या पूजा अगर सबसे ऊपर वाली शीट पर मेरे सामने होती तो रात में मेरे लिए कोई चांस बन सकता था मगर अब ये संभव नहीं था. मेरे सामने वाली शीट पर एक बार फिर से दीदी लेट गयी थी. इस बार वो सीधा लेती हुयी थी और अपने चेहरे को फिर से दुपट्टे से ढँक लिया था.

पता नहीं क्यों मगर इस साडी सिचुएशन से मेरा मूड खराब सा हो गया था. मेरा बहुत मन था की प्रिय या पूजा ऊपर hi होती और मैं रात में मौका देख कर उनके साथ कुछ न कुछ करता. खेर अब क्या हो सकता था. अपना मन मार कर मैं भी चुप चाप लेट गया और साड़ी बातो के बारे में सोचने लगा. अभी मैं सोचने hi लगा था की तभी नीचे से माँ ने मुझे आवाज़ दे कर पूछा की क्या यहाँ की लाइट नहीं बंद हो सकती.? असल में उनको जलती हुयी लाइट में नीड नहीं आ रही थी. माँ की इस बात पर मैंने हाथ नीचे बढ़ा कर इस तरफ की लाइट को बटन ऑफ कर के बंद कर दिया. अब हम सबके बीच अँधेरा हो गया था. वैसे इतना अँधेरा भी नहीं हुआ था क्यों की बाकी जगहों की लाइट जल रही थी जिसकी रौशनी का असर इस तरफ भी थोड़ा थोड़ा हो रहा था.

लाइट बंद करने के बाद एक बार फिर से मैं सोच में डूब गया. मेरे मन में कई तरह की बाते चल रही थी. जिनके बारे में मैं थोड़ा गहराई से सोच रहा था. मैं सोच रहा था की दिल्ली पहुंच कर मैं सबके बीच कैसा माहौल बना कर रखुगा जिससे सब बेहतर hi रहे.

मैं ये तो जान चूका था की रचना को सब कुछ पता है और मैं ये भी जनता था की माँ ने रचना से क्या क्या कहा था. माँ ने खुद मुझसे उस बारे में अभी तक कोई बात नहीं की थी मगर ये निश्चित था की दिल्ली पहुंच कर वो मुझसे इस बारे में बात ज़रूर करेंगी. ये भी हो सकता है की माँ मान मर्यादा की वजह से खुद मुझसे न कहे और वो उसी बात को रचना के जरिये मुझसे कहे या उससे कहवाये. रचना ने भी मुझसे इस बारे में अभी तक कोई बात नहीं की थी. मैं जनता था की दिल्ली जाने के बाद बहुत कुछ बदल जाने वाला था और अब मैं उस सबके हिसाब से खुद को ढालने का फैसला कर रहा था.

बाकी सब तो ठीक hi था मगर मेरी सबसे बड़ी प्रॉब्लम ये थी की मैं दक्षिणा के बारे में अपनी फॅमिली को कैसे बताता और उन्हें उसको भी एक्सेप्ट करने के लिए कैसे कह सकता था.? दक्षिणा एक ऐसा करैक्टर थी मेरी लाइफ का जिसके बारे में अगर मेरी फॅमिली को पता चल जाये तो न जाने क्या हो.

मैं दक्षिणा को अकेला भी नहीं छोड़ सकता था. उसने मेरे लिए अपना सब कुछ कुर्बान कर दिया है. उसका तन मन धन सब कुछ मेरे हवाले हो चूका है. वैसे तो उसकी प्रॉपर्टी में उसके अलावा उसकी बेटी किरण का hi कानूनी हक़ होता है मगर इस बारे में उसकी बेटी ने भी साफ़ कह दिया था की उसे उसकी माँ की प्रॉपर्टी से कुछ नहीं चाहिए. बल्कि उसके बदले में मैं उसकी माँ का ख़याल राखु और उसे अकेला न छोड़ू. दक्षिणा की करोडो की प्रॉपर्टी एक तरह से अब मेरी hi थी. मगर मैं उसे और उसकी प्रॉपर्टी को अपनी फॅमिली से कैसे जोडू ये मुझे समझ नहीं आ रहा था.

मैं ये सोच सोच कर थोड़ा अजीब सा फील कर रहा था की दक्षिणा मेरी माँ की उम्र वाली औरत है और जिस तरह का रिश्ता मेरे और उसके बीच में है उसके बारे में मैं अपनी फॅमिली को कैसे बता पाउगा. मेरी माँ को अगर इस बारे में पता चला तो वो मेरे बारे में क्या सोचेंगी.? उनके मन में बस यही बात पैदा होगी की उनका शरीफ बीटा आज क्या से क्या बन गया है. जो कभी किसी लड़की की तरफ भी नहीं देखता था आज उसके सेक्स रिलेशन्स उनकी hi उम्र की औरत से हैं. ये एक ऐसी बात थी जिसे सोच सोच कर मेरा दिल और दिमाग बुरी तरह घबराये जा रहा था.

मेरे सामने कई साडी प्रोब्लेम्स क्रिएट हो गयी थी. एक तरफ माँ ने रचना को मेरी बीवी hi बना दिया था और मैं देख रहा था की कुसुम दीदी रचना को बिलकुल भी पसंद नहीं कर रही थी और न hi वो उससे बात करना चाहती थी. इसका मतलब ये हुआ की वो किसी भी कीमत पर ये नहीं चाहती हैं की मेरी शादी रचना से हो. दीदी के मन में ऐसा क्यों था ये समझने में कोई मुश्किल नहीं था. मैं जनता था की वो मुझसे बहुत प्यार करती हैं और वो चाहती हैं मेरी लाइफ में उनके सिवा कोई दूसरी लड़की या औरत न आये. जब की मेरी लाइफ में तो लड़कियों की या औरतो की भीड़ सी लगने वाली थी. ऐसी सिचुएशन में कुसुम दीदी क्या करेंगी ये भी सोचने वाली बात थी. इस वक्त तो हालात यही थे की वो खुद मुझसे बात नहीं कर रही थी मगर ऐसा हमेशा नहीं रहेगा ये मुझे पता था.

दूसरी प्रॉब्लम दक्षिणा थी जिसके बारे में पता चलते hi सब पर बम फुट जायेगा. क्या ये सब लोग दक्षिणा और मेरे रिश्ते को समझ पाएंगे या फिर यही कहेंगे की मैंने या दक्षिणा ने सिर्फ अपनी हवस मिटने के लिए एक दूसरे से ऐसा रिश्ता बनाया. जब की सच्चाई तो ये थी की दक्षिणा भी मुझसे बेपनाह प्यार करती थी. अब ये उसकी किस्मत थी की वो मेरी माँ की उम्र की थी जिसकी वजह से उसकी पाक मोहब्बत को भी ये लोग गलत hi कहेगे.

तीसरी प्रॉब्लम ये थी की दक्षिणा को भी ये नहीं पता था की मेरे रिलेशन्स मेरी बहनो से कैसे हैं. उसे मेरी फॅमिली के बारे में सब कुछ पता था मगर ये सब नहीं और अब जब उसे इस बारे में पता चलेगा तो वो क्या सोचेगी मेरे और मेरी बहनो के बारे में.? क्या वो समझेगी की प्यार तो अँधा hi होता है. वो किसी से भी हो सकता है फिर चाहे वो अपनी hi बहने क्यों न हो.

मैं हर बात के बारे में गहराई से सोचे जा रहा था. मेरा ध्यान इस बात पर गया की इस सारे मामले में एक रचना hi ऐसी है जिसे सब पता है. उसे माँ से पता चल चूका है की कुसुम दीदी के दिल में क्या है और वो क्या चाहती हैं. रचना को ये मंजूर भी है तो ऐसा भी हो सकता है की दीदी के अलावा अगर प्रिय पूजा भी उसकी इस जानकारी में शामिल हो जाये तो उसे कोई प्रॉब्लम नहीं होगी. उसके बाद जब उसे दक्षिणा के बारे में पता चलेगा तो शायद वो उसके बारे में भी सोचेगी. मैं उसे समझाऊंगा की मेरे और दक्षिणा के बीच वो सब किन हालातो में हुआ था और अब हालात कैसे हैं. मुझे ये यकीन था की रचना मेरी बात समझेगी और इस मामले में मेरी हेल्प भी करेगी.

मेरा भटकता हुआ मन एकदम से रचना पर आ कर ठहर गया था. मैंने सोच लिया की सही वक्त पर मैं रचना से दक्षिणा के बारे में बताउगा और उसे समझाऊंगा की दक्षिणा की मेरी लाइफ में क्या इम्पोर्टेंस है. उसके बाद मैं रचना से ये भी कहुगा की वो किसी तरह माँ से इस बारे में बात करे और उन्हें दक्षिणा की अहमियत का अहसास कराये. मुझे मेरी ये सोच और फैसला बहुत हद तक सही लगा तो मैंने चैन की सांस ली.

ट्रैन में बस ट्रैन के चलने का hi शोर हो रहा था. बाकी लोग शायद अब सोने लगे थे. कही कही से कुछ लोगो की यदा कड़ा आवाज़े आ जाती थी. मैंने अपनी हैंड वाच पर टाइम देखा तो रात के एक बजने वाले थे. आने वाला वक्त हम सबकी लाइफ को बदल देने वाला था. अभी मैंने टाइम देख कर एक तरफ को करवट hi लिया था की तभी मुझे ट्रैन के चलने से हो रहे शोर में एक जानी पहचानी आवाज़ सुनाई दी. मगर फिर मैंने सोचा की शायद ये मेरा वहां होगा इस लिए मैंने ज़्यादा ध्यान नहीं दिया और करवट ले लिया.

मेरे मन में एकदम से ख़याल आया की ये आवाज़ कही प्रिय की तो नहीं. हो सकता है की वो सबके सो जाने के बाद मेरे पास आना चाहती हो. वो सोच रही होगी की मैं उससे नाराज़ हो गया होगा. इस लिए वो मेरे पास आ कर मुझे मानना चाहती होगी. मेरे भी दिमाग में ये बात आयी की सबके सोने के बाद अगर प्रिय मेरे पास hi आना चाहती है तो अच्छा hi है. मैं उसके साथ इस अँधेरे में बहुत कुछ कर सकता था. अभी मैं ये सब सोच hi रहा था की आवाज़ फिर से आयी तो मैंने धीरे से पलट कर आवाज़ की दिशा में देखने की कोशिश की तो हलके अँधेरे में मुझे एक साया नज़र आया जिसे मैं जल्द hi पहचान गया.

भाई लोग....

आज के लिए इतना hi....

रीड एन्जॉय & गिव योर फीडबैक....

कीप सपोर्टिंग & स्टे विथ....

:थैंक्यू:
 
थैंक्स फॉर योर लवली कमेंट....

थैंक्स भय फॉर योर लवली सुग्गेस्टिव. यारा आप लोगो के सुग्गेस्टिव से भी पॉइंट मिल जाते हैं मुझे. जिससे मुझे स्टोरी लिखने में हेल्प मिलती है. इस लिए हर बार बोलता हु की आप लोग अपने कमैंट्स में अपना कोई न कोई सुग्गेस्टिव देते रहा करो....

नेक्स्ट अपडेट पोस्टेड ों पेज no. 171....

रीड & एन्जॉय....
 
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