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सब कुछ जायज़ है....
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माँ ने ये सब बताया तो मैं ज़्यादा तो कुछ न बोलै बस यही कहा की ऐसे आदमी के साथ ऐसा hi होना चाहिए था. दुसरो की बहु बेटियों के साथ हमेशा hi गलत किया था उसने. मैंने माँ को ये नहीं बताया की ये साडी आग मेरी hi लगाई हुयी थी. माँ ने ये भी बताया की पुरे गांव में इसी बात की चर्चा है. लोग तो ये भी कह रहे हैं की सरपंच को कठोर से कठोर सजा मिलनी चाहिए.
मैंने माँ से कहा की कल सुबह आप सब तैयार रहिएगा. हम यहाँ से सुबह चार बजे निकलेंगे. मेरी इस बात से माँ ने कहा की ज़रूरी सामान जो भी था उसे उन्होंने पैक कर लिया है. सुबह नाहा धोकर हम सब तैयार रहेंगे और जैसे hi टैक्सी आएगी हम सब उसमे सामान रख कर चल देंगे.
अब आगे पढ़िए....
शाम तक मैं अपने कमरे में hi रहा और आज की घटना के बारे में सोचता रहा था. शाम के जब सात बजे तो मैं कमरे से निकल कर नीचे आ गया. माँ और कुसुम दीदी रसोई में थी और रात के लिए खाना बनाने की तयारी कर रही थी. मैं चुप चाप घर से बाहर आ गया. बाहर आया तो देखा अँधेरा हो चूका था. मैं रेखा चची के घर की तरफ नहीं जाना चाहता था और न hi वह जाना उचित था मगर हाँ कोमल के घर जाने के लिए ज़रूर सोचा मैंने.
अभी मैं ये सोच कर सड़क की तरफ बढ़ा hi था की तभी मेरा मोबाइल फ़ोन बजा तो मैंने पेंट की पॉकेट से मोबाइल निकला. मोबाइल की स्क्रीन पर कोई अननोन नंबर शो हो रहा था. ये देख कर मैं सोचने लगा की ये किसका नंबर हो सकता है. जब कुछ समझ न आया तो मैंने कॉल पिक करके मोबाइल कान से लगा लिया.
मोबाइल कान से लगाया तो तभी मेरे कानो में जो आवाज़ पड़ी उसे मैं जल्द hi पहचान गया. ये तो रचना की कॉल आयी हुयी थी और वही बात कर रही थी. मैं पहले ये सोच कर हैरान हुआ की इसके पास मेरा नंबर कैसे फिर ध्यान आया की शायद इसने मेरे घर में माँ से या मेरी जुड़वाँ बहनो से मेरा नंबर लिया होगा.
"कैसे हो विक्की.??" मेरे कानो में रचना की ये आवाज़ पड़ी तो मैंने कहा.
"मैं ठीक हु. तुम कैसी हो.?" मैंने ये कहा तो रचना ने कहा.
"बस ठीक hi hu....to तुम सब लोग कल यहाँ से चले जाओगे.?" रचना ने ये कहा तो मैंने कहा.
"Haan....maine तो तुम्हारी भी टिकट बनवा ली थी मगर माँ ने बताया की तुम हमारे साथ अभी नहीं जा सकती." मैंने ये कहा तो रचना ने कहा.
"हाँ वो आज पिता जी के साथ जो कुछ भी हुआ उसकी वजह से मेरा यहाँ से जाना ठीक नहीं होगा और न hi अच्छा लगेगा." रचना ने ये कहा तो मैंने कहा.
"इस वक्त तुम्हारे आस पास और कौन है.?" मैंने कुछ सोचते हुए उससे ये पूछा तो उसने कहा.
"कोई नहीं है. मैं अपने कमरे में हु. वैसे भी इस वक्त घर में मैं माँ और भाभी hi हैं. रुपेश भैया और बाकी परिवार के चाचा और भैया शहर गए हैं पिता जी के साथ." रचना ने ये कहा तो मैंने कहा.
"आज जो कुछ भी काका के साथ हुआ बहुत बुरा हुआ." मैंने ये कहा तो रचना ने कहा.
"किसी की बहु बेटी के साथ ऐसा करने का यही फल मिलना चाहिए. मैं मानती हु की वो मेरे पिता हैं मगर गलत तो गलत hi होता है चाहे कोई भी करे. उनके बारे में इस गांव का बच्चा बच्चा जनता है की वो कैसे हैं. खेर chhodo..tum बताओ ये क्यों पूछ रहे थे की मेरे आस पास और कौन है??" रचना ने ये सब कहा तो मैंने कहा.
"तुम्हे एक ज़रूरी बात बताना है." मैंने ये कहा तो रचना ने कहा.
"हाँ तो बताओ न." रचना ने ये कहा तो मैंने कहा.
"मुझे कही से पता चला है की तुम्हारे पिता जी तुम्हे अपने रास्ते से हटाना चाहते हैं. ऐसा इस लिए क्यों की तुम उनके काम में रुकावट बानी हुयी हो. मुझे पता चला है की सरपंच काका मेरी माँ बहनो के साथ गलत करना चाहते हैं मगर वो तुम्हारी वजह से ऐसा कुछ नहीं कर सकते. इस लिए अब वो तुम्हे अपने रास्ते से हटाने की बात कर रहे थे. मुझे लगता है की कही वो तुम्हे......" मैंने ये कहा hi था की रचना बोल पड़ी.
"हाँ मैं जानती हु विक्की. ये सच है की मैं अपने बाप के रास्ते का रोड़ा हु और मेरे रहते वो तुम्हारे परिवार के साथ कुछ भी गलत नहीं कर सकते. मैंने भी ये सुना है की वो तुम्हारी माँ और बहनो के साथ बहुत बुरा करने की बात कहते हैं. विक्की मैं अपने बाप से अच्छी तरह परिचित हु. मुझे यकीन है की वो अपनी ख्वाहिश पूरी करने के लिए मुझे अपने रास्ते से हटा सकते हैं." रचना ने ये कहा तो मैंने कहा.
"मुझे लगता है की जैसे hi काका को हमारे जाने के बारे में पता चलेगा वो तुम्हारे साथ कुछ भी कर सकते हैं. इस लिए मैं तुमसे ये कह रहा हु की तुम हमारे साथ hi चलो. क्या सही है क्या गलत ये सोचने का ठेका सिर्फ तुमने hi बस नहीं ले रखा है. हमारे जाने के बाद अगर तुम्हे कुछ हो गया तो मैं....." मैं ये कह hi रहा था की रचना बीच में बोल पड़ी.
"क्या सच में vicky.....kya सच में तुम मुझसे इतना प्यार करते हो.?" रचना ने ये कहा तो मैं चौंका. वो कुछ और hi समझ बैठी थी जबकि मैंने कहा.
"क्या अब ये बताना ज़रूरी है.?" मैंने ये कहा तो रचना ने कहा.
"हाँ बिलकुल ज़रूरी है. तुम नहीं समझ सकते vicky....tum बिलकुल भी नहीं समझ सकते मेरे अंदर की हालत को और शायद मैं तुम्हे समझा भी नहीं पाओगी. पांच साल गुज़र gaye....jab तुम यहाँ से चले गए थे तो मेरी ज़िन्दगी जैसे मौत से भी बदतर हो गयी थी. जैसे जैसे वक्त गुज़र रहा था मेरी जान भी निकलती जा रही थी. मगर मैंने आस नहीं छोड़ी. फिर मुझे पता चला की तुम्हारे जाने की असल वजह मेरा बाप था. मैंने खुद साडी हकीकत का पता लगाया और जब मुझे पता चल गया की मेरा बाप तुम्हारे साथ क्या करना चाहता था तो मुझे अपने बाप से नफरत सी हो गयी. मुझे ये भी पता चल गया था की मेरा बाप तुम्हार परिवार के साथ बहुत बुरा करना चाहता था. तब मैंने सोच लिया की अपने बाप से तुम्हारे परिवार की रक्षा मैं खुद करुँगी. बस फिर क्या tha....maine वो सब किया जो मैं कर सकती थी. जिसका नतीजा ये निकला की मेरे बाप ने मुझे त्याग दिया. उसने खुद कहा की मैं उसके लिए मर चुकी हु. मुझे ये सब मंजूर था vicky....sirf तुम्हारे और तुम्हारी चाहत के लिए. पता नहीं ये सब कैसे कर गयी मैं.? शायद मोहब्बत की ताकत ने ये सब करवा दिया मुझसे." रचना ने ये सब कहा तो मुझे समझ न आया की मैं उसकी इन सब बातो का क्या जवाब दू.?
"ज़िन्दगी में कोई अरमान नहीं रह गया था और न hi किसी चीज़ की ख्वाहिश रह गयी थी. अपने hi परिवार वालो को दुखी करके मैं भला अपने लिए कोई ख़ुशी कैसे हासिल कर लेती.? मेरे भी दिल और दिमाग में जैसे ये बात बैठ गयी थी की मुझे अब किसी चीज़ की ख्वाहिश नहीं रखनी है. मेरा बस एक hi मकसद था तुम्हारे न रहने पर तुम्हारे परिवार की अपने बाप से रक्षा करना. मैंने तो हर उम्मीद छोड़ दी थी विक्की. मैंने तो ख्वाब में भी नहीं सोचा था की एक दिन ऐसा आएगा जब तुम्हारी माँ मुझे अपनी बहु बना लेंगी. जिस वक्त तुम्हारी माँ ने मुझसे पूछा की मेरी बहु बनोगी उस वक्त मुझे लगा की कही मैं उस बात की ख़ुशी से मर hi न जाओ. एक पल में सरे अरमान जाग uthe...zindagi फिर से खूबसूरत लगने लगी मुझे. उस वक्त मेरा जी चाहा की तुम मुझे मिल जाओ और फिर मैं तुमसे लिपट खूब रौ." रचना कहते कहते रो पड़ी तो मुझे बहुत अजीब सा फील हुआ. मैं उसकी फीलिंग्स को समझ सकता था. क्यों की मुझे पता था की उसने हमारे लिए बहुत कुछ किया था और इसके लिए उसने अपनी हर ख़ुशी का त्याग कर दिया था.
"मेरे पास तुम्हारा नंबर नहीं था. तुम्हारी माँ ने खुद मुझे तुम्हारा नंबर कुसुम दीदी से दिलवाया था. मैं हर पल सोचती थी की तुम्हे फ़ोन लगाओ मगर हिम्मत hi नहीं होती थी. मैं ये भी सोचती थी की तुमसे कैसे और क्या बाते करुँगी.? आज हिम्मत करके इस लिए तुम्हे फ़ोन लगाया क्यों की कल तुम चले जाओगे. मेरा बहुत मन है की मैं तुम्हे एक बार जी भर के देख लू." रचना ने ये कहा तो मेरे पुरे जिसम में अजीब सी झुरझुरी हुयी.
"क्या तुम इस वक्त मेरे घर आ सकते हो विक्की.?" रचना ने ये कहा तो मैंने कहा.
"क्या ऐसे माहौल में मेरा वह आना सही होगा.? अगर किसी को पता चल गया की मैं ऐसे माहौल में तुम्हारे घर आया हु जबकि तुम्हारे परिवार का हर इंसान हॉस्पिटल में है तो कोई क्या सोचेगा.?" मैंने ये कहा तो रचना ने कहा.
"पांच साल के बाद पहली बार तुमसे कुछ कहा है तो क्या तुम मेरी इतनी सी इच्छा पूरी नहीं करोगे.? क्या सच में तुम्हारे दिल में मेरे लिए कोई जगह नहीं है.?" रचना ने ये कहा तो मैंने जल्दी से कहा.
"अगर ऐसा होता तो मैं माँ के कहने पर तुमसे ब्याह करने को क्यों राज़ी होता.? मैंने तो उनसे एक बार भी ये नहीं कहा की मैं तुमसे ब्याह नहीं करुगा. खेर chhodo...main आता हु थोड़ी देर में." मैंने ये कहा तो रचना ने ठीक है कह कर कॉल कट कर दिया.
रचना से बात करने के बाद मैं सोच रहा था की अब कोमल के घर जाने का शायद कोई मौका नहीं है. अगर मैं कोमल के घर के पास गया तो हो सकता है की उसके घर के बगल से hi रचना अपने घर के बाहर मेरे आने के इंतज़ार में कड़ी मिल जाये मुझे. मैंने सोचा देखते हैं क्या होता है.
मैंने मोबाइल को पॉकेट में डालने के बाद रचना के घर की तरफ चल दिया. अँधेरा काफी हो गया था. आस पास के घरो में जो लाइट जल रही थी वो बस टिमटिमाती हुयी hi दिख रही थी. चलते हुए मैं कुछ hi देर में रचना के घर के पास पहुंच गया. रचना के घर के पहले कोमल का घर था. कोमल और रचना का घर एक तरह से जुड़ा हुआ hi tha....bas घर के अंदर जाने का दरवाजा अलग अलग था.
मैं जब उस जगह पंहुचा तो देखा रचना के घर के बाहर कोई न दिखा मुझे. मैंने थोड़ा पास जा कर अच्छे से देखा और आस पास का भी जायजा लिया मगर कही कोई न नज़र आया मुझे. मैंने सोचा मौका अच्छा है. मैं कोमल के घर जा सकता हु. मगर मैं ये नहीं जनता था की कोमल का पति और उसका ससुर घर में hi है या शहर गए हुए हैं सरपंच के साथ.
मैंने सोचा एक बार पता कर hi लेता हु.
मैं चुपके से कोमल के घर के दरवाजे के पास आया और दरवाजे की कुण्डी बजायी. थोड़ी hi देर में दरवाजा खुला और कोमल नज़र आयी मुझे. मुझ पर नज़र पड़ते hi वो मुस्कुरायी और फिर एक तरफ को हैट गयी. मैं समझ गया की रास्ता क्लियर है. अगर ऐसा न होता तो वो मुझे अंदर आने के लिए एक तरफ हैट कर रास्ता न देती. इसका मतलब ये भी हुआ की उसका पति और उसका ससुर दोनों hi सरपंच के साथ शहर गए हुए हैं.
मैं अंदर आया तो कोमल ने दरवाजा बंद कर दिया. उसके बाद हम दोनों hi अंदर कमरे में आ गए. अंदर हर जगह सन्नाटा फैला हुआ था. कोमल ने चलते हुए hi बताया था मुझे की घर में उसके और उसकी सास के अलावा कोई नहीं है. मैंने उससे कहा की टाइम ज़्यादा नहीं है मेरे पास इस लिए मैं उसका काम करने के बाद जल्दी hi यहाँ से चला जाउगा. मेरी बात सुन कर कोमल ने कहा की ठीक है.
उसके बाद मैंने काम वक्त में कोमल की जैम कर चुदाई की. वो इस चुदाई से मस्त हो गयी थी और कहा की अब जा कर उसे चैन मिला है. मैंने उसे बताया की मैं कल चला जाउगा. अब जो होना होगा वो भगवन पर hi निर्भर है. कुछ देर बाद मैंने अपना हुलिया वगैरा अच्छे से ठीक किया और फिर कोमल के घर से चल दिया. बाहर दरवाजे के पास आ कर कोमल अचानक मुझसे लिपट गयी और सिसकिया भर कर रोने लगी. वो कह रही थी की मेरे जाने के बाद अब उसे बिलकुल भी अच्छा नहीं लगेगा. खेर मैंने उसे समझाया बुझाया और फिर घर से बाहर आ गया.
जब कोमल ने दरवाजा बंद कर लिया तो मैं कुछ दूर आने के बाद से वापस लौटा और इस बार रचना के घर के दरवाजे के पास आ गया. मैंने धड़कते दिल से दरवाजे की कुण्डी बजायी तो कुछ hi देर में दरवाजा खुल गया. दरवाजा रचना ने hi खोला था. मुझ पर नज़र पड़ते hi उसका चेहरा खिल उठा और उसके होठो पर मुस्कान फ़ैल गयी. मैं अंदर आया तो उसने दरवाजा वापस बंद कर दिया.
रचना मुझे ले कर अंदर hi आ गयी. अंदर उसकी माँ भी मिल गयी मुझे. शायद रचना ने अपनी माँ को बता दिया था मेरे आने के बारे में. इस लिए वो मुझे देख कर हैरान नहीं हुयी. उन्होंने रचना से कहा की वो मुझे ले कर अपने कमरे में जाये तो रचना मुझे ले कर ऊपर अपने कमरे में आ गयी. थोड़ी देर में रचना की माँ भी कमरे में आ गयी. मुझे समझ नहीं आ रहा था की मैं रचना की माँ के सामने कैसा रियेक्ट करू. मैं अंदर से हैरान भी था की रचना अपनी माँ के सामने मुझसे मिलने का कैसे सोच सकती है.?
रचना की भाभी यानी रुपेश की बीवी घर पर hi थी मगर मुझे वो नज़र न आयी. बातो बातो में hi पता चला की वो नीचे रसोई में खाना बना रही है. मैं अंदर से दर भी रहा था की अगर उसे मेरे बारे में पता चल गया तो वो क्या करेगी. कही वो अपने पति से बता न दे. ऐसे में बहुत बड़ी मुसीबत हो सकती थी.
रचना की माँ ने मुझसे बहुत hi अच्छे से बात की और ये भी कहा की उसे ख़ुशी है की उसकी बेटी के लिए मेरे जैसा लड़का दामाद के रूप में उन्हें मिला है. उन्होंने कहा की उन्हें ख़ुशी तो है मगर इस बात का दुःख भी है की वो अपनी बेटी की शादी मेरे साथ धूम धाम से नहीं कर सकती. वैसे भी जिस दिन रचना यहाँ से चली जाएगी और सरपंच को साडी बात का पता चलेगा तो वो बहुत गुस्सा होगा.
मैंने रचना की माँ से भी ये बता दिया की सरपंच काका रचना को अपने रास्ते से हटाने की बात कर रहे थे ऐसा मैंने कही से सुना है. इसका मतलब ये हुआ की रचना की जान को खतरा है. हम लोगो के जाने का पता जब काका को चलेगा तो वो गुस्से में कही रचना को कोई नुक्सान न पंहुचा दे. इस लिए मैं चाहता हु की रचना कल हमारे साथ hi जाये.
मेरी इस बात से रचना की माँ हैरान रह गयी थी. मैंने उन्हें समझाया की रचना की भलाई के लिए यही ठीक है वर्ण हमारे जाने के बाद काका कुछ भी कर सकते हैं. मैंने उनसे कहा की मैं मानता हु की ये सही वक्त नहीं है रचना के यहाँ से जाने का मगर ये भी सच है की वो सही वक्त कभी भी नहीं होगा क्यों की काका तो ये सब कभी चाहेंगे hi नहीं. बल्कि उल्टा बुरा hi होगा इस लिए अच्छा यही है की रचना कल हमारे साथ hi यहाँ से चले.
मेरे समझने बुझाने का काफी असर हुआ और फिर रचना की माँ को भी साड़ी बातो का अंदाज़ा हो गया. उन्हें सब समझ भी आ गया. उन्होंने मुझसे कहा की ठीक है बीटा अब रचना कल तुम लोगो के साथ hi जाएगी. वैसे भी अब तो उस पर तुम लोगो का hi हक़ है तो उसके अच्छे भले के बारे में भी तुम लोग hi सोचोगे.
रचना की माँ ने रचना से कहा की वो उसके जाने की तयारी करती है. तब तक वो मुझसे मिल ले. उसके बाद रचना की माँ नीचे चली गयी. उनके जाने के बाद कमरे में सन्नाटा फ़ैल गया. मुझे समझ न आया की मैं रचना से क्या बाते करू.
"क्या तुम्हे इस बात का अंदाज़ा है की मेरे यहाँ से जाने के बाद पिता जी इस घर में कितनी बड़ी महाभारत कड़ी कर देंगे.?" रचना ने धीरे से ये कहा तो मैंने कहा.
"ये तो होगा hi रचना मगर उसके लिए तुम या मैं क्या कर सकते हैं.? मुझे अंदाज़ा है की काका तुम्हारी माँ से इस सबके बारे में पूछेंगे मगर वो यही बताएंगी की उन्हें इस बारे में कुछ नहीं पता है. वो यही कहेंगी की उन्हें इस बात का ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था की तुम इस तरह घर से चली जाओगी. बस उसके बाद काका कर भी क्या सकेंगे.?" मैंने ये कहा तो रचना ने कहा.
"मुझे तो बस माँ की hi चिंता है विक्की. मैं नहीं चाहती की मेरी माँ के साथ कुछ भी बुरा हो. मेरी माँ ने हमेशा मुझे प्यार किया है. तुम्हारे जाने के बाद जब मैंने वो सब किया था तो पिता जी और रुपेश भैया मुझसे बहुत नाराज़ हुए थे और मुझे जान से मार देने की धमकी भी देते थे मगर माँ ने मुझे उनकी हर बात से बचाये रखा था. इस घर में माँ के शिव कोई मुझसे बात नहीं करता. माँ के अलावा मैं सबके लिए मर चुकी हु. तुम नहीं समझ सकते विक्की की मैंने ये पांच साल कितने कास्ट में गुज़ारे हैं." रचना ने ये कहा तो मैंने उसकी तरफ देखा. उसके खूबसूरत चेहरे पर दुःख के भाव थे और उसकी सीप सी आँखों से आँशु बहने लगे थे. रचना को इस तरह दुखी होते देख मुझे भी दुःख हुआ और मैंने आगे बढ़ कर उसे अपने सीने से लगा लिया.
रचना को जैसे hi मैंने अपने सीने से लगाया तो वो फुट फुट कर रो पड़ी. उसने मुझे कास के पकड़ लिया. शायद ये पांच सालो का गुबार था जो अभी तक उसके सीने में दबा हुआ था और जब मैंने उसे अपने सीने से लगाया तो उसका वो गुबार आँशु के रूप में निकलने लगा था. मैंने भी रचना को शांत करने की कोई कोशिश नहीं की बल्कि उसे रोने दिया. कुछ देर बाद जब रचना का रोना धोना थोड़ा काम हुआ तो मैंने उसकी पीठ पर हाथ फेरते हुए उससे कहा.
"चलो अब शांत हो जाओ dear...tumhe जितना रोना था रो लिया. जितना दुःख सहना था सह लिया मगर अब नहीं. अब बस खुशियों में जीना है tumhe...aur हाँ मेरे दिल में तुम्हारे लिए बहुत जगह है. मेरी नज़र में तुम्हारा कद बहुत बड़ा है." मैंने ये कहा तो रचना ने मुझे और भी ज़्यादा कास के पकड़ते हुए कहा.
"ओह्ह vicky...tum सच कह रहे हो न.?" रचना ने ये कहा तो मैंने हाँ कहा तब उसने कहा.
"आज मुझे लग रहा है की मेरी तपस्या सफल हो गयी विक्की. मुझे लग रहा है की मैंने जो कुछ भी किया वो बिना मतलब नहीं था. मैं तुम्हारे दिल में जगह बनाने में सफल हो गयी यही बहुत बड़ी बात है मेरे लिए." रचना ने ये कहा तो मैंने कहा.
"अब चलो ये रोना धोना और इमोशनल होना बंद करो. मुझे फिर से वही रचना चाहिए जो आज से पांच साल पहले हुआ करती थी." मैंने ये कहा तो रचना ने मुझसे अलग हो कर मेरी तरफ देखा और फिर कहा.
"हाँ वो मैं मोती हो गयी हु न.?" रचना ने बड़ी मासूमियत से ये कहा तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा.
"हाँ मोती तो हो गयी हो मगर इसके बाद भी क्यूट दिखती हो. ारी हाँ वो एक गण है na....Jiski बीवी मोती उसका भी बड़ा नाम है." मैंने ये कहा तो रचना खिलखिला कर है पड़ी. फिर एकदम से वो थोड़ा रूठे हुए लहजे से बोली.
"तुमने मुझे मोती kaha....jaao मुझे तुमसे अब बात नहीं करना." रचना ने ये कहा तो मैंने कहा.
"ये हुयी न baat...yahi वाली रचना चाहिए मुझे. जो थोड़ा रूठे तो मुझे वो प्यारी प्यारी सी लगे." मैंने ये कहा तो रचना ने फिर से मेरी तरफ देखा. इस बार उसके होठो पर मुस्कान थी.
"अच्छा ji...soch लो फिर. मुझे मानते मानते परेशां हो जाओगे तुम." रचना ने मुस्कुराते हुए ये कहा तो मैंने भी मुस्कुराते हुए कहा.
"तुम्हे मानाने का मेरे पास बस एक hi तरीका है." मैंने ये कहा तो रचना ने हैरानी से देखते हुए कहा.
"अच्छा जी और वो कौन सा तरीका है. मुझे भी तो बताओ." रचना ने ये कहा तो मैंने कहा.
"तुम्हारे इन रसीले और शहद जैसे होठो को चूमूँगा तो तुम जल्द hi खुश हो जाओगी." मैंने ये कहा तो रचना एकदम से शर्मा गयी मगर फिर जल्द hi सम्हाल कर बोली.
"ऐसा कुछ नहीं है. मैं तब भी रूठी रहूगी तो क्या करोगे तुम.?" रचना ने ये कहा तो मैंने उसकी आँखों में देखते हुए कहा.
"तब मैं कुछ और करुगा." मैंने ये कहा तो रचना ने कांपते होठो के साथ कहा.
"और क्या करोगे तुम विक्की.?" रचना ने ये कहा तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा.
"वो तो तभी पता चलेगा जब तुम रूठोगी और मेरे मानाने से न मानोगी." मैंने ये कहा तो रचना कुछ देर मेरी आँखों में देखती रही फिर नज़रे झुकाते हुए धीरे से बोली.
"मेरे अरमानो को क्यों जगा रहे हो विक्की.? अभी कुछ वक्त के लिए रुक जाओ न." रचना ने ये कहा तो मेरे जिसम में अजीब सी झुरझुरी हुयी. मेरी आँखों के सामने एक पल में वो सरे मंज़र घूम गए जो आज से पांच साल पहले के थे और जब मैं रचना के होठो को चूमता चुस्त था. इतना hi नहीं उसकी छातियों को भी मसलता था.
"क्या हुआ..??" मैंने ये कहा तो रचना ने नज़र उठा कर मेरी तरफ देखा फिर कहा.
"कुछ nahi...bas पुराणी बाते और पुराणी चीज़े याद आ गयी थी." रचना ने ये कहा तो मैंने कहा.
"तो कैसा लग रहा है वो सब याद करके.?" मैंने ये कहा तो रचना ने कहा.
"कैसे बताओ विक्की.? उन यादो के सहारे hi तो अब तक जी रही थी मैं." रचना ने ये कहा तो मुझे उस पर बहुत ज़्यादा प्यार आया और मैंने उसे फिर से अपने सीने से लगा लिया और कहा.
"अब कुछ मत कहो डिअर. मैं तुम्हारे सरे गम भुला दुगा. अब चलो मुझे एक प्यारी सी मुस्कान दिखाओ जिससे मैं खुश हो जाओ और फिर मैं जाओ यहाँ से." मैंने ये कहा तो रचना ने कहा.
"पता नहीं कैसे अब तक मैं तुम्हारे बिना रह रही थी.? मगर अब लगता है की तुम्हारे बिना मैं एक पल भी नहीं रह पाओगी. इसके पहले तो मैंने ये सोच लिया था की तुम्हारी यादो के सहारे साडी ज़िन्दगी गुज़ार दूगी मगर अब तुमसे मिलने के बाद लगता है की साड़ी ज़िन्दगी तो क्या अब एक पल भी नहीं गुज़ार पाओगी. मुझे अपने से अब कभी जुड़ा न करना विक्की. तुम मिले हो तो अब फिर से जुड़ा हो कर जी नहीं पाओगी मैं. मुझे बहुत सारा प्यार करना मेरे सनम. मैं तुम्हारे प्यार के लिए बहुत तदपि हु." रचना कहते कहते फिर से सिसकिया ले कर रोने लगी तो मैंने उसकी पीठ पर हाथ फेरते हुए कहा.
"दुःख दर्द के तुम्हारे दिन गुज़र गए डिअर. अब तुम्हे मुझसे जुड़ा नहीं होना पड़ेगा. मैं वडा करता हु की तुम्हे बहुत प्यार करुगा. अब से तुम्हे कभी कोई दुःख नहीं होगा. चलो अब ये रोना धोना बंद करो और अपनी मनमोहक मुस्कान दिखाओ मुझे." मैंने ये कहा तो रचना मुझसे अलग हुयी तो मैंने अपने हाथो से उसके आँशु पोंछे. उसके बाद मैंने उसके चेहरे को अपनी हथेलियों में लिया और उसकी आँखों में देखते हुए प्यार से कहा.
"अब बिलकुल भी दुखी मत होना और न hi इन आँखों से कोई आँशु बहाना. इस चेहरे पर हमेशा खुशियों की चमक होनी चाहिए. चलो अब मुस्कुराओ." मैंने ये कहा तो रचना हलके से मुस्कुरायी. वो मेरी आँखों में hi देख रही थी. शायद मेरी आँखों में अपने लिए मोहब्बत तलाश कर रही थी जो की उसे मिल भी गयी. मुझे रचना से बेपनाह तो नहीं मगर कुछ तो मोहब्बत हो hi गयी थी और अब शायद ये मोहब्बत बढ़ती hi जनि थी.
अभी मैं रचना के चेहरे को हथेलियों में लिए उसकी मुस्कान को देख hi रहा था की तभी कमरे में किसी के द्वारा हलके से खखारने की आवाज़ हुयी तो मैं और रचना एकदम से एक दूसरे से अलग हो गए. हम दोनों की धड़कने एकदम से बढ़ गयी थी. हम दोनों जैसे hi अलग हुए तो कमरे में रचना की माँ आ गयी. काकी को देखते hi मैं समझ गया की उन्होंने हमारी साड़ी बाते सुन ली हैं. ये जान कर मुझे बहुत अजीब सा फील हुआ.
"अब मुझे अपनी बेटी के लिए कोई चिंता नहीं है बीटा. मैं देख चुकी हु की तुम मेरी बेटी से कितना प्यार करते हो. मेरी तुमसे बस यही विनती है बीटा की इस अभागन को ऐसे hi प्यार देना. इसने अपनी इस छोटी सी उम्र में बहुत दुःख सही हैं." रचना की माँ ने ये सब कहा तो मैंने कहा.
"फ़िक्र मत कीजिये काकी. मैं रचना को कभी किसी बात से दुखी नहीं होने दूँगा. हम सब इसे बहुत प्यार करेंगे." मैंने ये कहा तो रचना की माँ ने आगे बढ़ कर मेरे चेहरे को प्यार से सहलाया और फिर कहा हमेशा खुश रहो बीटा और खूब तरक्की करो.
उसके बाद हमारे बीच कुछ ऐसी hi और बाते हुयी. मैं ने आते वक्त रचना की माँ से कहा की वो रचना को ले कर सुबह hi आ जाये क्यों की हम सुबह चार बजे यहाँ से निकलेंगे. मेरी बात सुन कर रचना की माँ ने कहा की ठीक है बीटा मैं रचना को ले कर सुबह चार बजे से पहले आ जाओगी. उसके बाद मैं चुप चाप रचना के घर से बाहर आ गया. रुपेश की बीवी को मेरे आने जाने का पता नहीं चला था और न hi उसे किसी ने बताया था.
जब मैं घर आया तो माँ ने मुझसे daat'te हुए पूछा की रात में मैं कहा चला गया था तो मैंने उन्हें बताया की मैं रचना के घर से आ रहा हु अभी. माँ के पूछने पर मैंने उन्हें साड़ी बात बता दी. मेरी बाते सुनने के बाद माँ ने कहा चलो ये अच्छा हुआ की सावित्री दीदी अपनी बेटी को हमारे साथ hi भेजने के लिए राज़ी हो गयी.
मैं माँ से बात hi कर रहा था की मेरी नज़र एकदम से रसोई के दरवाजे की तरफ पड़ी. रसोई के दरवाजे पर कुसुम दीदी छुप कर कड़ी थी. उनका एक पेअर और उनका पीले रंग का कुरता मुझे दिखाई दे रहा था और साथ hi ऊपर उनका थोड़ा सा चेहरा भी. मैं अभी उस तरफ देख hi रहा था की तभी उन्होंने चेहरा थोड़ा सा बाहर किया तो उनकी नज़र मुझसे मिल गयी. जैसे hi हमारी नज़रे एक दूसरे से मिली तो उन्होंने जल्दी से अपना चेहरा पीछे कर लिया और दरवाजे से हैट कर अंदर हो गयी.
मुझे समझ नहीं आ रहा था की उनके मन में क्या चल रहा था या उनके मन में क्या था.? खेर खाना पीना करने के बाद मैंने माँ से कहा की वो मुझे सुबह जल्दी hi जगा दे. उसके बाद मैं अपने कमरे में आ गया और फिर रात वाले कपडे पहन कर बीएड पर लेट गया. लेते लेते मैं हर चीज़ के बारे में सोच रहा था. कल हम सब इस गांव से हमेशा हमेशा के लिए चले जायेगे. अब यहाँ पर हमारा कुछ नहीं बचने वाला tha...na घर और न hi ज़मीने.
सोचते सोचते एक बार फिर से मेरा ध्यान कुसुम दीदी पर गया. पहली मोहब्बत तो दो मिनट की थी मेरी. उसके बाद फिर कभी उस मोहब्बत से मुलाकात नहीं हुयी और न hi मैंने उससे मिलने का सोचा था. उसके बाद मेरी लाइफ में जो मेरे सबसे करीब आया था वो मेरी दीदी थी. कुसुम didi...jinhone बचपन से मुझे प्यार किया और मेरी हर बात का ख़याल रखा. जब से होश सम्हाला था तब से मैंने भी यही किया था.
मेरी हमेशा से यही चाहत रहा करती थी की मेरी कुसुम दीदी हर पल मेरे पास रहे और हम दोनों ढेर साड़ी बाते करे. पहले तो नहीं समझ आया था और जब समझ आया तो मैं उस बात को एक्सेप्ट नहीं करना चाहता था या शायद एक्सेप्ट करने से डरता था. मगर जब प्रिय पूजा ने क्लियर बता दिया और हम आगे भी बढ़ गए तो मैंने भी ये एक्सेप्ट कर hi लिया की मैं अपनी दीदी से बहुत प्यार करता हु. मैंने उन्हें किसी भी बात के लिए मजबूर नहीं किया बल्कि वही किया जो वो चाहती थी.
ये तो अब मैं भी समझ सकता था और मुझे यकीन भी था की दीदी मुझसे ज़्यादा मुझसे प्यार करती हैं मगर ये नहीं समझ प् रहा था की वो इस बात को खुल कर मुझसे कह क्यों नहीं रही.? फिर मुझे माँ की उस दिन की बात याद आयी तो मैंने सोचा क्या दीदी उस दिन उनके कमरे में नहीं रही होंगी.? अगर रही होंगी तो उन्होंने भी तो माँ की वो बात सुनी होगी और अगर सुनी होती तो फिर वो ये सब क्यों करती.? इसका मतलब तो ये हुआ की उस दिन दीदी माँ के कमरे में थी hi नहीं. बल्कि माँ के साथ सिर्फ रचना hi thi...to क्या रचना को ये सब पता है.????
मेरे दिल और दिमाग में एकदम से बम सा फटा और भयंकर विस्फोट हुआ. माय गॉड इसका मतलब रचना को सब पता है मगर आज जब हम मिले थे तो उसने मुझसे इसके बारे में कोई भी बात नहीं की thi..kyo..?? क्या माँ ने उसे मन किया था वो सब मुझे बताने से.?
सोचते सोचते मेरा दिमाग फटने लगा था. मैंने इसके पहले इस बारे में इस तरह सोचा hi नहीं था. फिर मैंने सोचा की अगर मैं सोच भी लेता तो क्या मैं खुद इस बारे में रचना से कोई बात कर सकता था.? मेरे दिल और दिमाग में तेज़ तूफ़ान चलने लगा था. मैं सोच रहा था की रचना हम सबके बारे में क्या सोच रही होगी.? सबसे बड़ी बात तो ये थी की माँ ने उस दिन रचना से वो सब कैसे कहा होगा.? क्यों की ये ऐसी बाते हैं जो इस तरह किसी से भी नहीं कही जा सकती. मगर ये सच था की उन्होंने कहा और मैंने बाहर से सुन भी लिया था. उस वक्त उनके कमरे में रचना hi थी और अब उसे सब पता है. हे bhagwan....rachna ने उस सब को एक्सेप्ट भी कर लिया है. ये सब सोचते सोचते पता नहीं कब मेरी आँख लग गयी और मैं सो गया था.
भाई लोग....
आज के लिए इतना hi....
रीड एन्जॉय & गिव योर फीडबैक....
कीप सपोर्टिंग & स्टे विथ....
:थैंक्यू:
अपडेट = 38
माँ ने ये सब बताया तो मैं ज़्यादा तो कुछ न बोलै बस यही कहा की ऐसे आदमी के साथ ऐसा hi होना चाहिए था. दुसरो की बहु बेटियों के साथ हमेशा hi गलत किया था उसने. मैंने माँ को ये नहीं बताया की ये साडी आग मेरी hi लगाई हुयी थी. माँ ने ये भी बताया की पुरे गांव में इसी बात की चर्चा है. लोग तो ये भी कह रहे हैं की सरपंच को कठोर से कठोर सजा मिलनी चाहिए.
मैंने माँ से कहा की कल सुबह आप सब तैयार रहिएगा. हम यहाँ से सुबह चार बजे निकलेंगे. मेरी इस बात से माँ ने कहा की ज़रूरी सामान जो भी था उसे उन्होंने पैक कर लिया है. सुबह नाहा धोकर हम सब तैयार रहेंगे और जैसे hi टैक्सी आएगी हम सब उसमे सामान रख कर चल देंगे.
अब आगे पढ़िए....
शाम तक मैं अपने कमरे में hi रहा और आज की घटना के बारे में सोचता रहा था. शाम के जब सात बजे तो मैं कमरे से निकल कर नीचे आ गया. माँ और कुसुम दीदी रसोई में थी और रात के लिए खाना बनाने की तयारी कर रही थी. मैं चुप चाप घर से बाहर आ गया. बाहर आया तो देखा अँधेरा हो चूका था. मैं रेखा चची के घर की तरफ नहीं जाना चाहता था और न hi वह जाना उचित था मगर हाँ कोमल के घर जाने के लिए ज़रूर सोचा मैंने.
अभी मैं ये सोच कर सड़क की तरफ बढ़ा hi था की तभी मेरा मोबाइल फ़ोन बजा तो मैंने पेंट की पॉकेट से मोबाइल निकला. मोबाइल की स्क्रीन पर कोई अननोन नंबर शो हो रहा था. ये देख कर मैं सोचने लगा की ये किसका नंबर हो सकता है. जब कुछ समझ न आया तो मैंने कॉल पिक करके मोबाइल कान से लगा लिया.
मोबाइल कान से लगाया तो तभी मेरे कानो में जो आवाज़ पड़ी उसे मैं जल्द hi पहचान गया. ये तो रचना की कॉल आयी हुयी थी और वही बात कर रही थी. मैं पहले ये सोच कर हैरान हुआ की इसके पास मेरा नंबर कैसे फिर ध्यान आया की शायद इसने मेरे घर में माँ से या मेरी जुड़वाँ बहनो से मेरा नंबर लिया होगा.
"कैसे हो विक्की.??" मेरे कानो में रचना की ये आवाज़ पड़ी तो मैंने कहा.
"मैं ठीक हु. तुम कैसी हो.?" मैंने ये कहा तो रचना ने कहा.
"बस ठीक hi hu....to तुम सब लोग कल यहाँ से चले जाओगे.?" रचना ने ये कहा तो मैंने कहा.
"Haan....maine तो तुम्हारी भी टिकट बनवा ली थी मगर माँ ने बताया की तुम हमारे साथ अभी नहीं जा सकती." मैंने ये कहा तो रचना ने कहा.
"हाँ वो आज पिता जी के साथ जो कुछ भी हुआ उसकी वजह से मेरा यहाँ से जाना ठीक नहीं होगा और न hi अच्छा लगेगा." रचना ने ये कहा तो मैंने कहा.
"इस वक्त तुम्हारे आस पास और कौन है.?" मैंने कुछ सोचते हुए उससे ये पूछा तो उसने कहा.
"कोई नहीं है. मैं अपने कमरे में हु. वैसे भी इस वक्त घर में मैं माँ और भाभी hi हैं. रुपेश भैया और बाकी परिवार के चाचा और भैया शहर गए हैं पिता जी के साथ." रचना ने ये कहा तो मैंने कहा.
"आज जो कुछ भी काका के साथ हुआ बहुत बुरा हुआ." मैंने ये कहा तो रचना ने कहा.
"किसी की बहु बेटी के साथ ऐसा करने का यही फल मिलना चाहिए. मैं मानती हु की वो मेरे पिता हैं मगर गलत तो गलत hi होता है चाहे कोई भी करे. उनके बारे में इस गांव का बच्चा बच्चा जनता है की वो कैसे हैं. खेर chhodo..tum बताओ ये क्यों पूछ रहे थे की मेरे आस पास और कौन है??" रचना ने ये सब कहा तो मैंने कहा.
"तुम्हे एक ज़रूरी बात बताना है." मैंने ये कहा तो रचना ने कहा.
"हाँ तो बताओ न." रचना ने ये कहा तो मैंने कहा.
"मुझे कही से पता चला है की तुम्हारे पिता जी तुम्हे अपने रास्ते से हटाना चाहते हैं. ऐसा इस लिए क्यों की तुम उनके काम में रुकावट बानी हुयी हो. मुझे पता चला है की सरपंच काका मेरी माँ बहनो के साथ गलत करना चाहते हैं मगर वो तुम्हारी वजह से ऐसा कुछ नहीं कर सकते. इस लिए अब वो तुम्हे अपने रास्ते से हटाने की बात कर रहे थे. मुझे लगता है की कही वो तुम्हे......" मैंने ये कहा hi था की रचना बोल पड़ी.
"हाँ मैं जानती हु विक्की. ये सच है की मैं अपने बाप के रास्ते का रोड़ा हु और मेरे रहते वो तुम्हारे परिवार के साथ कुछ भी गलत नहीं कर सकते. मैंने भी ये सुना है की वो तुम्हारी माँ और बहनो के साथ बहुत बुरा करने की बात कहते हैं. विक्की मैं अपने बाप से अच्छी तरह परिचित हु. मुझे यकीन है की वो अपनी ख्वाहिश पूरी करने के लिए मुझे अपने रास्ते से हटा सकते हैं." रचना ने ये कहा तो मैंने कहा.
"मुझे लगता है की जैसे hi काका को हमारे जाने के बारे में पता चलेगा वो तुम्हारे साथ कुछ भी कर सकते हैं. इस लिए मैं तुमसे ये कह रहा हु की तुम हमारे साथ hi चलो. क्या सही है क्या गलत ये सोचने का ठेका सिर्फ तुमने hi बस नहीं ले रखा है. हमारे जाने के बाद अगर तुम्हे कुछ हो गया तो मैं....." मैं ये कह hi रहा था की रचना बीच में बोल पड़ी.
"क्या सच में vicky.....kya सच में तुम मुझसे इतना प्यार करते हो.?" रचना ने ये कहा तो मैं चौंका. वो कुछ और hi समझ बैठी थी जबकि मैंने कहा.
"क्या अब ये बताना ज़रूरी है.?" मैंने ये कहा तो रचना ने कहा.
"हाँ बिलकुल ज़रूरी है. तुम नहीं समझ सकते vicky....tum बिलकुल भी नहीं समझ सकते मेरे अंदर की हालत को और शायद मैं तुम्हे समझा भी नहीं पाओगी. पांच साल गुज़र gaye....jab तुम यहाँ से चले गए थे तो मेरी ज़िन्दगी जैसे मौत से भी बदतर हो गयी थी. जैसे जैसे वक्त गुज़र रहा था मेरी जान भी निकलती जा रही थी. मगर मैंने आस नहीं छोड़ी. फिर मुझे पता चला की तुम्हारे जाने की असल वजह मेरा बाप था. मैंने खुद साडी हकीकत का पता लगाया और जब मुझे पता चल गया की मेरा बाप तुम्हारे साथ क्या करना चाहता था तो मुझे अपने बाप से नफरत सी हो गयी. मुझे ये भी पता चल गया था की मेरा बाप तुम्हार परिवार के साथ बहुत बुरा करना चाहता था. तब मैंने सोच लिया की अपने बाप से तुम्हारे परिवार की रक्षा मैं खुद करुँगी. बस फिर क्या tha....maine वो सब किया जो मैं कर सकती थी. जिसका नतीजा ये निकला की मेरे बाप ने मुझे त्याग दिया. उसने खुद कहा की मैं उसके लिए मर चुकी हु. मुझे ये सब मंजूर था vicky....sirf तुम्हारे और तुम्हारी चाहत के लिए. पता नहीं ये सब कैसे कर गयी मैं.? शायद मोहब्बत की ताकत ने ये सब करवा दिया मुझसे." रचना ने ये सब कहा तो मुझे समझ न आया की मैं उसकी इन सब बातो का क्या जवाब दू.?
"ज़िन्दगी में कोई अरमान नहीं रह गया था और न hi किसी चीज़ की ख्वाहिश रह गयी थी. अपने hi परिवार वालो को दुखी करके मैं भला अपने लिए कोई ख़ुशी कैसे हासिल कर लेती.? मेरे भी दिल और दिमाग में जैसे ये बात बैठ गयी थी की मुझे अब किसी चीज़ की ख्वाहिश नहीं रखनी है. मेरा बस एक hi मकसद था तुम्हारे न रहने पर तुम्हारे परिवार की अपने बाप से रक्षा करना. मैंने तो हर उम्मीद छोड़ दी थी विक्की. मैंने तो ख्वाब में भी नहीं सोचा था की एक दिन ऐसा आएगा जब तुम्हारी माँ मुझे अपनी बहु बना लेंगी. जिस वक्त तुम्हारी माँ ने मुझसे पूछा की मेरी बहु बनोगी उस वक्त मुझे लगा की कही मैं उस बात की ख़ुशी से मर hi न जाओ. एक पल में सरे अरमान जाग uthe...zindagi फिर से खूबसूरत लगने लगी मुझे. उस वक्त मेरा जी चाहा की तुम मुझे मिल जाओ और फिर मैं तुमसे लिपट खूब रौ." रचना कहते कहते रो पड़ी तो मुझे बहुत अजीब सा फील हुआ. मैं उसकी फीलिंग्स को समझ सकता था. क्यों की मुझे पता था की उसने हमारे लिए बहुत कुछ किया था और इसके लिए उसने अपनी हर ख़ुशी का त्याग कर दिया था.
"मेरे पास तुम्हारा नंबर नहीं था. तुम्हारी माँ ने खुद मुझे तुम्हारा नंबर कुसुम दीदी से दिलवाया था. मैं हर पल सोचती थी की तुम्हे फ़ोन लगाओ मगर हिम्मत hi नहीं होती थी. मैं ये भी सोचती थी की तुमसे कैसे और क्या बाते करुँगी.? आज हिम्मत करके इस लिए तुम्हे फ़ोन लगाया क्यों की कल तुम चले जाओगे. मेरा बहुत मन है की मैं तुम्हे एक बार जी भर के देख लू." रचना ने ये कहा तो मेरे पुरे जिसम में अजीब सी झुरझुरी हुयी.
"क्या तुम इस वक्त मेरे घर आ सकते हो विक्की.?" रचना ने ये कहा तो मैंने कहा.
"क्या ऐसे माहौल में मेरा वह आना सही होगा.? अगर किसी को पता चल गया की मैं ऐसे माहौल में तुम्हारे घर आया हु जबकि तुम्हारे परिवार का हर इंसान हॉस्पिटल में है तो कोई क्या सोचेगा.?" मैंने ये कहा तो रचना ने कहा.
"पांच साल के बाद पहली बार तुमसे कुछ कहा है तो क्या तुम मेरी इतनी सी इच्छा पूरी नहीं करोगे.? क्या सच में तुम्हारे दिल में मेरे लिए कोई जगह नहीं है.?" रचना ने ये कहा तो मैंने जल्दी से कहा.
"अगर ऐसा होता तो मैं माँ के कहने पर तुमसे ब्याह करने को क्यों राज़ी होता.? मैंने तो उनसे एक बार भी ये नहीं कहा की मैं तुमसे ब्याह नहीं करुगा. खेर chhodo...main आता हु थोड़ी देर में." मैंने ये कहा तो रचना ने ठीक है कह कर कॉल कट कर दिया.
रचना से बात करने के बाद मैं सोच रहा था की अब कोमल के घर जाने का शायद कोई मौका नहीं है. अगर मैं कोमल के घर के पास गया तो हो सकता है की उसके घर के बगल से hi रचना अपने घर के बाहर मेरे आने के इंतज़ार में कड़ी मिल जाये मुझे. मैंने सोचा देखते हैं क्या होता है.
मैंने मोबाइल को पॉकेट में डालने के बाद रचना के घर की तरफ चल दिया. अँधेरा काफी हो गया था. आस पास के घरो में जो लाइट जल रही थी वो बस टिमटिमाती हुयी hi दिख रही थी. चलते हुए मैं कुछ hi देर में रचना के घर के पास पहुंच गया. रचना के घर के पहले कोमल का घर था. कोमल और रचना का घर एक तरह से जुड़ा हुआ hi tha....bas घर के अंदर जाने का दरवाजा अलग अलग था.
मैं जब उस जगह पंहुचा तो देखा रचना के घर के बाहर कोई न दिखा मुझे. मैंने थोड़ा पास जा कर अच्छे से देखा और आस पास का भी जायजा लिया मगर कही कोई न नज़र आया मुझे. मैंने सोचा मौका अच्छा है. मैं कोमल के घर जा सकता हु. मगर मैं ये नहीं जनता था की कोमल का पति और उसका ससुर घर में hi है या शहर गए हुए हैं सरपंच के साथ.
मैंने सोचा एक बार पता कर hi लेता हु.
मैं चुपके से कोमल के घर के दरवाजे के पास आया और दरवाजे की कुण्डी बजायी. थोड़ी hi देर में दरवाजा खुला और कोमल नज़र आयी मुझे. मुझ पर नज़र पड़ते hi वो मुस्कुरायी और फिर एक तरफ को हैट गयी. मैं समझ गया की रास्ता क्लियर है. अगर ऐसा न होता तो वो मुझे अंदर आने के लिए एक तरफ हैट कर रास्ता न देती. इसका मतलब ये भी हुआ की उसका पति और उसका ससुर दोनों hi सरपंच के साथ शहर गए हुए हैं.
मैं अंदर आया तो कोमल ने दरवाजा बंद कर दिया. उसके बाद हम दोनों hi अंदर कमरे में आ गए. अंदर हर जगह सन्नाटा फैला हुआ था. कोमल ने चलते हुए hi बताया था मुझे की घर में उसके और उसकी सास के अलावा कोई नहीं है. मैंने उससे कहा की टाइम ज़्यादा नहीं है मेरे पास इस लिए मैं उसका काम करने के बाद जल्दी hi यहाँ से चला जाउगा. मेरी बात सुन कर कोमल ने कहा की ठीक है.
उसके बाद मैंने काम वक्त में कोमल की जैम कर चुदाई की. वो इस चुदाई से मस्त हो गयी थी और कहा की अब जा कर उसे चैन मिला है. मैंने उसे बताया की मैं कल चला जाउगा. अब जो होना होगा वो भगवन पर hi निर्भर है. कुछ देर बाद मैंने अपना हुलिया वगैरा अच्छे से ठीक किया और फिर कोमल के घर से चल दिया. बाहर दरवाजे के पास आ कर कोमल अचानक मुझसे लिपट गयी और सिसकिया भर कर रोने लगी. वो कह रही थी की मेरे जाने के बाद अब उसे बिलकुल भी अच्छा नहीं लगेगा. खेर मैंने उसे समझाया बुझाया और फिर घर से बाहर आ गया.
जब कोमल ने दरवाजा बंद कर लिया तो मैं कुछ दूर आने के बाद से वापस लौटा और इस बार रचना के घर के दरवाजे के पास आ गया. मैंने धड़कते दिल से दरवाजे की कुण्डी बजायी तो कुछ hi देर में दरवाजा खुल गया. दरवाजा रचना ने hi खोला था. मुझ पर नज़र पड़ते hi उसका चेहरा खिल उठा और उसके होठो पर मुस्कान फ़ैल गयी. मैं अंदर आया तो उसने दरवाजा वापस बंद कर दिया.
रचना मुझे ले कर अंदर hi आ गयी. अंदर उसकी माँ भी मिल गयी मुझे. शायद रचना ने अपनी माँ को बता दिया था मेरे आने के बारे में. इस लिए वो मुझे देख कर हैरान नहीं हुयी. उन्होंने रचना से कहा की वो मुझे ले कर अपने कमरे में जाये तो रचना मुझे ले कर ऊपर अपने कमरे में आ गयी. थोड़ी देर में रचना की माँ भी कमरे में आ गयी. मुझे समझ नहीं आ रहा था की मैं रचना की माँ के सामने कैसा रियेक्ट करू. मैं अंदर से हैरान भी था की रचना अपनी माँ के सामने मुझसे मिलने का कैसे सोच सकती है.?
रचना की भाभी यानी रुपेश की बीवी घर पर hi थी मगर मुझे वो नज़र न आयी. बातो बातो में hi पता चला की वो नीचे रसोई में खाना बना रही है. मैं अंदर से दर भी रहा था की अगर उसे मेरे बारे में पता चल गया तो वो क्या करेगी. कही वो अपने पति से बता न दे. ऐसे में बहुत बड़ी मुसीबत हो सकती थी.
रचना की माँ ने मुझसे बहुत hi अच्छे से बात की और ये भी कहा की उसे ख़ुशी है की उसकी बेटी के लिए मेरे जैसा लड़का दामाद के रूप में उन्हें मिला है. उन्होंने कहा की उन्हें ख़ुशी तो है मगर इस बात का दुःख भी है की वो अपनी बेटी की शादी मेरे साथ धूम धाम से नहीं कर सकती. वैसे भी जिस दिन रचना यहाँ से चली जाएगी और सरपंच को साडी बात का पता चलेगा तो वो बहुत गुस्सा होगा.
मैंने रचना की माँ से भी ये बता दिया की सरपंच काका रचना को अपने रास्ते से हटाने की बात कर रहे थे ऐसा मैंने कही से सुना है. इसका मतलब ये हुआ की रचना की जान को खतरा है. हम लोगो के जाने का पता जब काका को चलेगा तो वो गुस्से में कही रचना को कोई नुक्सान न पंहुचा दे. इस लिए मैं चाहता हु की रचना कल हमारे साथ hi जाये.
मेरी इस बात से रचना की माँ हैरान रह गयी थी. मैंने उन्हें समझाया की रचना की भलाई के लिए यही ठीक है वर्ण हमारे जाने के बाद काका कुछ भी कर सकते हैं. मैंने उनसे कहा की मैं मानता हु की ये सही वक्त नहीं है रचना के यहाँ से जाने का मगर ये भी सच है की वो सही वक्त कभी भी नहीं होगा क्यों की काका तो ये सब कभी चाहेंगे hi नहीं. बल्कि उल्टा बुरा hi होगा इस लिए अच्छा यही है की रचना कल हमारे साथ hi यहाँ से चले.
मेरे समझने बुझाने का काफी असर हुआ और फिर रचना की माँ को भी साड़ी बातो का अंदाज़ा हो गया. उन्हें सब समझ भी आ गया. उन्होंने मुझसे कहा की ठीक है बीटा अब रचना कल तुम लोगो के साथ hi जाएगी. वैसे भी अब तो उस पर तुम लोगो का hi हक़ है तो उसके अच्छे भले के बारे में भी तुम लोग hi सोचोगे.
रचना की माँ ने रचना से कहा की वो उसके जाने की तयारी करती है. तब तक वो मुझसे मिल ले. उसके बाद रचना की माँ नीचे चली गयी. उनके जाने के बाद कमरे में सन्नाटा फ़ैल गया. मुझे समझ न आया की मैं रचना से क्या बाते करू.
"क्या तुम्हे इस बात का अंदाज़ा है की मेरे यहाँ से जाने के बाद पिता जी इस घर में कितनी बड़ी महाभारत कड़ी कर देंगे.?" रचना ने धीरे से ये कहा तो मैंने कहा.
"ये तो होगा hi रचना मगर उसके लिए तुम या मैं क्या कर सकते हैं.? मुझे अंदाज़ा है की काका तुम्हारी माँ से इस सबके बारे में पूछेंगे मगर वो यही बताएंगी की उन्हें इस बारे में कुछ नहीं पता है. वो यही कहेंगी की उन्हें इस बात का ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था की तुम इस तरह घर से चली जाओगी. बस उसके बाद काका कर भी क्या सकेंगे.?" मैंने ये कहा तो रचना ने कहा.
"मुझे तो बस माँ की hi चिंता है विक्की. मैं नहीं चाहती की मेरी माँ के साथ कुछ भी बुरा हो. मेरी माँ ने हमेशा मुझे प्यार किया है. तुम्हारे जाने के बाद जब मैंने वो सब किया था तो पिता जी और रुपेश भैया मुझसे बहुत नाराज़ हुए थे और मुझे जान से मार देने की धमकी भी देते थे मगर माँ ने मुझे उनकी हर बात से बचाये रखा था. इस घर में माँ के शिव कोई मुझसे बात नहीं करता. माँ के अलावा मैं सबके लिए मर चुकी हु. तुम नहीं समझ सकते विक्की की मैंने ये पांच साल कितने कास्ट में गुज़ारे हैं." रचना ने ये कहा तो मैंने उसकी तरफ देखा. उसके खूबसूरत चेहरे पर दुःख के भाव थे और उसकी सीप सी आँखों से आँशु बहने लगे थे. रचना को इस तरह दुखी होते देख मुझे भी दुःख हुआ और मैंने आगे बढ़ कर उसे अपने सीने से लगा लिया.
रचना को जैसे hi मैंने अपने सीने से लगाया तो वो फुट फुट कर रो पड़ी. उसने मुझे कास के पकड़ लिया. शायद ये पांच सालो का गुबार था जो अभी तक उसके सीने में दबा हुआ था और जब मैंने उसे अपने सीने से लगाया तो उसका वो गुबार आँशु के रूप में निकलने लगा था. मैंने भी रचना को शांत करने की कोई कोशिश नहीं की बल्कि उसे रोने दिया. कुछ देर बाद जब रचना का रोना धोना थोड़ा काम हुआ तो मैंने उसकी पीठ पर हाथ फेरते हुए उससे कहा.
"चलो अब शांत हो जाओ dear...tumhe जितना रोना था रो लिया. जितना दुःख सहना था सह लिया मगर अब नहीं. अब बस खुशियों में जीना है tumhe...aur हाँ मेरे दिल में तुम्हारे लिए बहुत जगह है. मेरी नज़र में तुम्हारा कद बहुत बड़ा है." मैंने ये कहा तो रचना ने मुझे और भी ज़्यादा कास के पकड़ते हुए कहा.
"ओह्ह vicky...tum सच कह रहे हो न.?" रचना ने ये कहा तो मैंने हाँ कहा तब उसने कहा.
"आज मुझे लग रहा है की मेरी तपस्या सफल हो गयी विक्की. मुझे लग रहा है की मैंने जो कुछ भी किया वो बिना मतलब नहीं था. मैं तुम्हारे दिल में जगह बनाने में सफल हो गयी यही बहुत बड़ी बात है मेरे लिए." रचना ने ये कहा तो मैंने कहा.
"अब चलो ये रोना धोना और इमोशनल होना बंद करो. मुझे फिर से वही रचना चाहिए जो आज से पांच साल पहले हुआ करती थी." मैंने ये कहा तो रचना ने मुझसे अलग हो कर मेरी तरफ देखा और फिर कहा.
"हाँ वो मैं मोती हो गयी हु न.?" रचना ने बड़ी मासूमियत से ये कहा तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा.
"हाँ मोती तो हो गयी हो मगर इसके बाद भी क्यूट दिखती हो. ारी हाँ वो एक गण है na....Jiski बीवी मोती उसका भी बड़ा नाम है." मैंने ये कहा तो रचना खिलखिला कर है पड़ी. फिर एकदम से वो थोड़ा रूठे हुए लहजे से बोली.
"तुमने मुझे मोती kaha....jaao मुझे तुमसे अब बात नहीं करना." रचना ने ये कहा तो मैंने कहा.
"ये हुयी न baat...yahi वाली रचना चाहिए मुझे. जो थोड़ा रूठे तो मुझे वो प्यारी प्यारी सी लगे." मैंने ये कहा तो रचना ने फिर से मेरी तरफ देखा. इस बार उसके होठो पर मुस्कान थी.
"अच्छा ji...soch लो फिर. मुझे मानते मानते परेशां हो जाओगे तुम." रचना ने मुस्कुराते हुए ये कहा तो मैंने भी मुस्कुराते हुए कहा.
"तुम्हे मानाने का मेरे पास बस एक hi तरीका है." मैंने ये कहा तो रचना ने हैरानी से देखते हुए कहा.
"अच्छा जी और वो कौन सा तरीका है. मुझे भी तो बताओ." रचना ने ये कहा तो मैंने कहा.
"तुम्हारे इन रसीले और शहद जैसे होठो को चूमूँगा तो तुम जल्द hi खुश हो जाओगी." मैंने ये कहा तो रचना एकदम से शर्मा गयी मगर फिर जल्द hi सम्हाल कर बोली.
"ऐसा कुछ नहीं है. मैं तब भी रूठी रहूगी तो क्या करोगे तुम.?" रचना ने ये कहा तो मैंने उसकी आँखों में देखते हुए कहा.
"तब मैं कुछ और करुगा." मैंने ये कहा तो रचना ने कांपते होठो के साथ कहा.
"और क्या करोगे तुम विक्की.?" रचना ने ये कहा तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा.
"वो तो तभी पता चलेगा जब तुम रूठोगी और मेरे मानाने से न मानोगी." मैंने ये कहा तो रचना कुछ देर मेरी आँखों में देखती रही फिर नज़रे झुकाते हुए धीरे से बोली.
"मेरे अरमानो को क्यों जगा रहे हो विक्की.? अभी कुछ वक्त के लिए रुक जाओ न." रचना ने ये कहा तो मेरे जिसम में अजीब सी झुरझुरी हुयी. मेरी आँखों के सामने एक पल में वो सरे मंज़र घूम गए जो आज से पांच साल पहले के थे और जब मैं रचना के होठो को चूमता चुस्त था. इतना hi नहीं उसकी छातियों को भी मसलता था.
"क्या हुआ..??" मैंने ये कहा तो रचना ने नज़र उठा कर मेरी तरफ देखा फिर कहा.
"कुछ nahi...bas पुराणी बाते और पुराणी चीज़े याद आ गयी थी." रचना ने ये कहा तो मैंने कहा.
"तो कैसा लग रहा है वो सब याद करके.?" मैंने ये कहा तो रचना ने कहा.
"कैसे बताओ विक्की.? उन यादो के सहारे hi तो अब तक जी रही थी मैं." रचना ने ये कहा तो मुझे उस पर बहुत ज़्यादा प्यार आया और मैंने उसे फिर से अपने सीने से लगा लिया और कहा.
"अब कुछ मत कहो डिअर. मैं तुम्हारे सरे गम भुला दुगा. अब चलो मुझे एक प्यारी सी मुस्कान दिखाओ जिससे मैं खुश हो जाओ और फिर मैं जाओ यहाँ से." मैंने ये कहा तो रचना ने कहा.
"पता नहीं कैसे अब तक मैं तुम्हारे बिना रह रही थी.? मगर अब लगता है की तुम्हारे बिना मैं एक पल भी नहीं रह पाओगी. इसके पहले तो मैंने ये सोच लिया था की तुम्हारी यादो के सहारे साडी ज़िन्दगी गुज़ार दूगी मगर अब तुमसे मिलने के बाद लगता है की साड़ी ज़िन्दगी तो क्या अब एक पल भी नहीं गुज़ार पाओगी. मुझे अपने से अब कभी जुड़ा न करना विक्की. तुम मिले हो तो अब फिर से जुड़ा हो कर जी नहीं पाओगी मैं. मुझे बहुत सारा प्यार करना मेरे सनम. मैं तुम्हारे प्यार के लिए बहुत तदपि हु." रचना कहते कहते फिर से सिसकिया ले कर रोने लगी तो मैंने उसकी पीठ पर हाथ फेरते हुए कहा.
"दुःख दर्द के तुम्हारे दिन गुज़र गए डिअर. अब तुम्हे मुझसे जुड़ा नहीं होना पड़ेगा. मैं वडा करता हु की तुम्हे बहुत प्यार करुगा. अब से तुम्हे कभी कोई दुःख नहीं होगा. चलो अब ये रोना धोना बंद करो और अपनी मनमोहक मुस्कान दिखाओ मुझे." मैंने ये कहा तो रचना मुझसे अलग हुयी तो मैंने अपने हाथो से उसके आँशु पोंछे. उसके बाद मैंने उसके चेहरे को अपनी हथेलियों में लिया और उसकी आँखों में देखते हुए प्यार से कहा.
"अब बिलकुल भी दुखी मत होना और न hi इन आँखों से कोई आँशु बहाना. इस चेहरे पर हमेशा खुशियों की चमक होनी चाहिए. चलो अब मुस्कुराओ." मैंने ये कहा तो रचना हलके से मुस्कुरायी. वो मेरी आँखों में hi देख रही थी. शायद मेरी आँखों में अपने लिए मोहब्बत तलाश कर रही थी जो की उसे मिल भी गयी. मुझे रचना से बेपनाह तो नहीं मगर कुछ तो मोहब्बत हो hi गयी थी और अब शायद ये मोहब्बत बढ़ती hi जनि थी.
अभी मैं रचना के चेहरे को हथेलियों में लिए उसकी मुस्कान को देख hi रहा था की तभी कमरे में किसी के द्वारा हलके से खखारने की आवाज़ हुयी तो मैं और रचना एकदम से एक दूसरे से अलग हो गए. हम दोनों की धड़कने एकदम से बढ़ गयी थी. हम दोनों जैसे hi अलग हुए तो कमरे में रचना की माँ आ गयी. काकी को देखते hi मैं समझ गया की उन्होंने हमारी साड़ी बाते सुन ली हैं. ये जान कर मुझे बहुत अजीब सा फील हुआ.
"अब मुझे अपनी बेटी के लिए कोई चिंता नहीं है बीटा. मैं देख चुकी हु की तुम मेरी बेटी से कितना प्यार करते हो. मेरी तुमसे बस यही विनती है बीटा की इस अभागन को ऐसे hi प्यार देना. इसने अपनी इस छोटी सी उम्र में बहुत दुःख सही हैं." रचना की माँ ने ये सब कहा तो मैंने कहा.
"फ़िक्र मत कीजिये काकी. मैं रचना को कभी किसी बात से दुखी नहीं होने दूँगा. हम सब इसे बहुत प्यार करेंगे." मैंने ये कहा तो रचना की माँ ने आगे बढ़ कर मेरे चेहरे को प्यार से सहलाया और फिर कहा हमेशा खुश रहो बीटा और खूब तरक्की करो.
उसके बाद हमारे बीच कुछ ऐसी hi और बाते हुयी. मैं ने आते वक्त रचना की माँ से कहा की वो रचना को ले कर सुबह hi आ जाये क्यों की हम सुबह चार बजे यहाँ से निकलेंगे. मेरी बात सुन कर रचना की माँ ने कहा की ठीक है बीटा मैं रचना को ले कर सुबह चार बजे से पहले आ जाओगी. उसके बाद मैं चुप चाप रचना के घर से बाहर आ गया. रुपेश की बीवी को मेरे आने जाने का पता नहीं चला था और न hi उसे किसी ने बताया था.
जब मैं घर आया तो माँ ने मुझसे daat'te हुए पूछा की रात में मैं कहा चला गया था तो मैंने उन्हें बताया की मैं रचना के घर से आ रहा हु अभी. माँ के पूछने पर मैंने उन्हें साड़ी बात बता दी. मेरी बाते सुनने के बाद माँ ने कहा चलो ये अच्छा हुआ की सावित्री दीदी अपनी बेटी को हमारे साथ hi भेजने के लिए राज़ी हो गयी.
मैं माँ से बात hi कर रहा था की मेरी नज़र एकदम से रसोई के दरवाजे की तरफ पड़ी. रसोई के दरवाजे पर कुसुम दीदी छुप कर कड़ी थी. उनका एक पेअर और उनका पीले रंग का कुरता मुझे दिखाई दे रहा था और साथ hi ऊपर उनका थोड़ा सा चेहरा भी. मैं अभी उस तरफ देख hi रहा था की तभी उन्होंने चेहरा थोड़ा सा बाहर किया तो उनकी नज़र मुझसे मिल गयी. जैसे hi हमारी नज़रे एक दूसरे से मिली तो उन्होंने जल्दी से अपना चेहरा पीछे कर लिया और दरवाजे से हैट कर अंदर हो गयी.
मुझे समझ नहीं आ रहा था की उनके मन में क्या चल रहा था या उनके मन में क्या था.? खेर खाना पीना करने के बाद मैंने माँ से कहा की वो मुझे सुबह जल्दी hi जगा दे. उसके बाद मैं अपने कमरे में आ गया और फिर रात वाले कपडे पहन कर बीएड पर लेट गया. लेते लेते मैं हर चीज़ के बारे में सोच रहा था. कल हम सब इस गांव से हमेशा हमेशा के लिए चले जायेगे. अब यहाँ पर हमारा कुछ नहीं बचने वाला tha...na घर और न hi ज़मीने.
सोचते सोचते एक बार फिर से मेरा ध्यान कुसुम दीदी पर गया. पहली मोहब्बत तो दो मिनट की थी मेरी. उसके बाद फिर कभी उस मोहब्बत से मुलाकात नहीं हुयी और न hi मैंने उससे मिलने का सोचा था. उसके बाद मेरी लाइफ में जो मेरे सबसे करीब आया था वो मेरी दीदी थी. कुसुम didi...jinhone बचपन से मुझे प्यार किया और मेरी हर बात का ख़याल रखा. जब से होश सम्हाला था तब से मैंने भी यही किया था.
मेरी हमेशा से यही चाहत रहा करती थी की मेरी कुसुम दीदी हर पल मेरे पास रहे और हम दोनों ढेर साड़ी बाते करे. पहले तो नहीं समझ आया था और जब समझ आया तो मैं उस बात को एक्सेप्ट नहीं करना चाहता था या शायद एक्सेप्ट करने से डरता था. मगर जब प्रिय पूजा ने क्लियर बता दिया और हम आगे भी बढ़ गए तो मैंने भी ये एक्सेप्ट कर hi लिया की मैं अपनी दीदी से बहुत प्यार करता हु. मैंने उन्हें किसी भी बात के लिए मजबूर नहीं किया बल्कि वही किया जो वो चाहती थी.
ये तो अब मैं भी समझ सकता था और मुझे यकीन भी था की दीदी मुझसे ज़्यादा मुझसे प्यार करती हैं मगर ये नहीं समझ प् रहा था की वो इस बात को खुल कर मुझसे कह क्यों नहीं रही.? फिर मुझे माँ की उस दिन की बात याद आयी तो मैंने सोचा क्या दीदी उस दिन उनके कमरे में नहीं रही होंगी.? अगर रही होंगी तो उन्होंने भी तो माँ की वो बात सुनी होगी और अगर सुनी होती तो फिर वो ये सब क्यों करती.? इसका मतलब तो ये हुआ की उस दिन दीदी माँ के कमरे में थी hi नहीं. बल्कि माँ के साथ सिर्फ रचना hi thi...to क्या रचना को ये सब पता है.????
मेरे दिल और दिमाग में एकदम से बम सा फटा और भयंकर विस्फोट हुआ. माय गॉड इसका मतलब रचना को सब पता है मगर आज जब हम मिले थे तो उसने मुझसे इसके बारे में कोई भी बात नहीं की thi..kyo..?? क्या माँ ने उसे मन किया था वो सब मुझे बताने से.?
सोचते सोचते मेरा दिमाग फटने लगा था. मैंने इसके पहले इस बारे में इस तरह सोचा hi नहीं था. फिर मैंने सोचा की अगर मैं सोच भी लेता तो क्या मैं खुद इस बारे में रचना से कोई बात कर सकता था.? मेरे दिल और दिमाग में तेज़ तूफ़ान चलने लगा था. मैं सोच रहा था की रचना हम सबके बारे में क्या सोच रही होगी.? सबसे बड़ी बात तो ये थी की माँ ने उस दिन रचना से वो सब कैसे कहा होगा.? क्यों की ये ऐसी बाते हैं जो इस तरह किसी से भी नहीं कही जा सकती. मगर ये सच था की उन्होंने कहा और मैंने बाहर से सुन भी लिया था. उस वक्त उनके कमरे में रचना hi थी और अब उसे सब पता है. हे bhagwan....rachna ने उस सब को एक्सेप्ट भी कर लिया है. ये सब सोचते सोचते पता नहीं कब मेरी आँख लग गयी और मैं सो गया था.
भाई लोग....
आज के लिए इतना hi....
रीड एन्जॉय & गिव योर फीडबैक....
कीप सपोर्टिंग & स्टे विथ....
:थैंक्यू: