SAB KUCH JAYAZ HAI... - Page 11 - SexBaba
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SAB KUCH JAYAZ HAI...

भाई लोग....

आप लोगो ने सोच लिया होगा की मैंने ये स्टोरी क्लोज कर दी है मगर ऐसा नहीं है भाई लोग. मैं काफी दिनों से पेरशनल रीज़न की वजह से परेशां था और मेरी तबियत भी बहुत खराब हो गयी थी. अभी भी ठीक नहीं हु....

भाई लोग मैंने पहले भी कहा था की ये स्टोरी मैं ज़रूर कम्पलीट करुगा और अब भी यही कह रहा हु. अपनी बीमारी और परेशानी में मैं ऐसा हो गया था की मुझमे यहाँ आ कर कुछ बताने की भी हिम्मत नहीं थी. आज इस वक्त आया तो देखा कुछ लोगो ने बड़े अच्छे अच्छे कमैंट्स दे रखे हैं जिन्हे पढ़ कर बहुत अच्छा लगा....

कुछ लोग कहते हैं की मैं लिखे कमेंट का रोना रो रहा हु तो भाई लोग इसके लिए भी मैंने कह दिया था उस टाइम की मेरी स्टोरी में कोई कमेंट न करे बस बात ख़तम. मैं तो अपनी हालत से बेबस था इस लिए अपडेट नहीं दे पाया इतने दिनों से. अगर मैं ये कहु की क्या आप लोगो ने एक दिन भी ये सोचा की मैं अगर अपडेट नहीं दे रहा तो इसकी कोई दूसरी वजह भी हो सकती है. यारा ये लाइफ है इंसान के साथ कब क्या हो जाये किसे पता है. क्या किसी ने मेरी तबियत के बारे में सोचा या पूछा मुझसे.????

भाई लोग मैं इस वक्त भी यही कह रहा हु की मैं इस स्टोरी को ज़रूर कम्पलीट करुगा. मेरी तबियत में सुधार हुआ है तो अब अपडेट लिखने की कोशिश करुगा और जल्द hi अपडेट भी दुगा. मैं बस ये कहना चाहता हु की कोई ये न सोचे की ये स्टोरी बंद हो गयी या मैं इस स्टोरी को छोड़ कर चला गया हु....

मेरी गलती ये है की मैं अपडेट न देने की किसी को वजह नहीं बता पाया मगर मैं क्या करता यारा. मैं ऐसी हालत में hi नहीं था की कुछ बता पता....

:थैंक्यू:
 
सब कुछ जायज़ है....

अपडेट = 43


"बात हक़ की नहीं है डिअर. मैं बस ये कहना चाहता हु की फालतू में इतना पैसा खर्चा करने की क्या ज़रूरत थी.?" मैंने ये कहा तो दक्षिणा ने कहा.

"पैसा तो आता जाता रहेगा जान. वैसे भी दिन दिन महगाई बढ़ रही है. अगर हमने आज hi इतना अच्छा घर ले लिया तो फ्यूचर के लिए अच्छा hi होगा न." दक्षिणा ने ये कहा तो मैंने कहा.

"चलो ठीक है. अच्छा अब मुझे जाना होगा. अभी मुझे अपने लिए बीएड खरीदना है और कुछ ज़रूरी सामान भी." मैंने ये कहा तो दक्षिणा ने कहा.

"चलो मैं भी तुम्हारे साथ चलती हु. इसी बहाने तुम्हारे साथ रहने का कुछ देर और मौका मिल जायेगा मुझे." दक्षिणा ने ये कहा तो मैंने कहा ठीक है.

उसके बाद मैं और दक्षिणा बाथरूम में जा कर अच्छे से फ्रेश हुए और फिर कपडे पहन कर घर से बाहर आ गए. दक्षिणा ने कार की चाभी मुझे दी तो मैंने ड्राइविंग शीट सम्हाली और दक्षिणा मेरे बगल से बैठ गयी. उसके बाद हम मार्किट के लिए निकल गए. रास्ते में मैंने दक्षिणा से कहा की एक कार मुझे भी लेना पड़ेगा और छोटे मोठे कामो के लिए एक मोटर सिक्ले भी.

अब आगे पढ़िए....


शाम तक मैं दक्षिणा के साथ hi रहा. मैंने इस बीच दक्षिणा को साडी बाते बता दी थी. मैंने उसे बताया की माँ ने मेरी शादी रचना के साथ फिक्स कर दी है और अब वो उससे शादी करने के लिए मुझसे कभी भी कह सकती हैं. मैंने दक्षिणा को ये भी बताया की कुसुम दीदी के दिल में मेरे लिए क्या है और वो क्या चाहती हैं और कुसुम दीदी के बारे में माँ ने रचना से क्या बताया था. मैंने ये भी बताया की इस एक महीने में मेरे साथ क्या क्या हुआ था गांव में और मेरे घर में. मैंने दक्षिणा से कुछ भी नहीं छुपाया. बल्कि उसे सब कुछ बता दिया था.

मेरी साड़ी बाते सुन कर दक्षिणा बुरी तरह हैरान रह गयी थी. मुझे भी समझ नहीं आ रहा था की सब कुछ बता कर मैंने सही किया या गलत. हाँ मैं ये जनता था की ये साडी बाते जान कर दक्षिणा मेरे बारे में बहुत कुछ सोच रही होगी मगर ये भी सच था की एक दिन हर किसी के बारे में सब को हकीकत का पता चलना hi था.

दक्षिणा काफी देर तक जाने क्या सोचती रही थी फिर उसने मुझसे कहा की इसका मतलब मेरी लाइफ में रचना के अलावा मेरी बीवी के रूप में मेरी बहने भी शामिल हो सकती हैं. उसकी बात पर मैंने कहा की हालात तो यही हैं और वैसे भी मेरी जुड़वाँ बहने तो यही चाहती हैं. कुसुम दीदी का भी सबको पता है की वो क्या चाहती हैं.

मेरी बात सुन कर दक्षिणा ने कहा की कुसुम तो तुमसे बात नहीं करती इस लिए सबसे पहले उसे सही लाइन पर लाओ और उसके अंदर की बात को भी बाहर लाओ. क्यों की वो इन साड़ी बातो से अंदर hi अंदर घुट रही है जो की बिलकुल भी अच्छी बात नहीं है. दक्षिणा की इस बात से मैंने कहा की मेरा भी यही ख़याल है मगर उससे पहले मुझे माँ से खुल कर बात करना है. मुझे उनसे ये जानना है की उन्होंने वैसा क्या सोच कर कहा था रचना से.?

शाम को मैं घर आ गया था. घर के लिए मैं ढेर सारा राशन भी ले आया था. मैंने ये देखा था की जब मैंने दक्षिणा को साड़ी बाते बतायी थी तो उससे दक्षिणा को कोई प्रॉब्लम नहीं हुयी थी और न hi उसने ये कहा था की मेरा मेरी बहनो से ऐसे रिलेशन रखना गलत है. उसने यही कहा की अगर दोनों तरफ प्रेम है और इसकी सहमति है तो फिर सब कुछ जायज़ है.

जब मैं घर आया तो माँ ने मुझसे पूछा की इतने समय तक मैं कहा रहा तो मैंने उन्हें बताया की मैं अपने लिए एक बीएड खरीदने गया था और घर के लिए राशन के साथ साथ कुछ ज़रूरी सामान भी.

बीएड वाला बीएड पहुंचने के लिए कल को बोलै था. ये बात जान कर माँ ने कहा की मैं आज उनके साथ hi उनके कमरे में सो जाओ. उनकी ये बात सुन कर मुझे लगा की ये अच्छा रहेगा. काम से काम इससे मैं अकेले में माँ से अच्छी तरह बाते कर लगा सबके बारे में.

उसके बाद हम सबने शाम को चाय पि. हम सब वही सोफों पर hi बैठे हुए थे. मैंने सबसे कहा की कल मैं आप सभी को शॉपिंग करने ले जाउगा. आप सब लोग शहर के हिसाब से hi अपने अपने लिए कपडे खरीद लेना. मेरी बात सुन कर प्रिय पूजा तो सबसे पहले ख़ुशी से उछलने लगी थी. जबकि बाकियो का रिएक्शन नार्मल hi था.

उसके बाद कुछ ख़ास नहीं हुआ. प्रिय पूजा तो ऊपर अपने कमरे में चली गयी. जबकि माँ ने कुसुम दीदी और रचना से कहा की रात के खाने की तैयार शुरू करे. माँ की ये बात सुन कर रचना और दीदी सोफे से उठ कर किचन की तरफ चली गयी.

"बीटा मुझे तुझसे बहुत साडी बाते करनी हैं." सबके जाने के बाद माँ ने मेरी तरफ देखते हुए ये कहा तो मैंने कहा.

"कैसी बाते माँ.?" मैंने उनसे ये पूछा तो माँ कुछ देर मेरे चेहरे की तरफ देखती रही फॉर बोली.

"सबसे पहले तो तू मुझे ये बता की तू यहाँ ऐसा क्या काम करता है जिससे तुझे इतना सारा पैसा मिलता है.?" माँ ने ये सवाल किया तो मैं मुस्कुराया. मैं तो ये बात पहले से hi जनता था की ये घर देखने के बाद माँ मुझसे सबसे पहले यही सब पूछेंगी.

"आप बस ये समझिये माँ की मैं कोई भी ऐसा काम नहीं करता हु जिसे पाप की कमाई कहते हैं." मैंने ये कहा hi था की माँ बोल पड़ी.

"ये तो बहुत अच्छी बात है बीटा की तू ऐसा कोई काम नहीं करता है और मुझे ये जान कर ख़ुशी भी हुयी है की मेरा बीटा कोई गलत काम नहीं करता है मगर...." माँ कहते कहते रुक गयी तो मैंने कहा.

"मगर क्या माँ.?" मैंने पूछा तो माँ ने कहा.

"मगर यही की तू ऐसा कौन सा काम करता है जिससे तुझे इतना सारा पैसा मिलता है और तूने उस पैसे से इतना बड़ा और इतना सुन्दर घर बनाया. इसे देख कर तो लगता है की ये घर बहुत महगा होगा." माँ ने एक बार घर के अंदर चारो तरफ नज़र घूमते हुए ये कहा तो मैंने कहा.

"ये सब मेरी म्हणत का नतीजा है माँ. पांच साल से यहाँ रह कर काम कर रहा हु. तब से ले कर अब तक बहुत पैसा जोड़ रखा था मैंने और कुछ पैसा मेरे ऐसे जान पहचान वाले ने दिया जो मुझे अपना मानता है. खेर आप फ़िक्र मत करो माँ अब किसी बात का टेंशन नहीं है. हम सब यहाँ बहुत अच्छे से रहेंगे. मैं आप सब को हर तरह से खुश रखने की पूरी कोशिश करुगा." मैंने ये कहा तो माँ ने कुछ देर मेरी तरफ देखा फिर कहा.

"कहने और करने में बहुत फर्क होता है बीटा. तुम हमेशा ये कोशिश करोगे की हम सब खुश रहे मगर क्या ऐसा हो पायेगा.? हर इंसान की खुशियों की वजह अलग अलग होती हैं तो क्या तुम सब को उनकी इच्छा के अनुसार खुश रख पाओगे.?" माँ ने ये कहा तो मैं उनकी तरफ देखने लगा. मैं समझ तो गया था की माँ के कहने का क्या मतलब था मगर मैं माँ के मुख से खुल कर jan'na चाहता था इस लिए बोलै.

"मैं सब को खुश रखने की पूरी कोशिश करुगा माँ. जो जिस तरह से खुश रहना चाहेगा उसे उस तरह से खुश रखुगा. बाकी अगर मैं सबको खुश रखने में कामयाब न हो पाउ तो आप मेरी मदद करना और अपना आशीर्वाद मुझे देना. मुझे पूरा भरोसा है की आपके आशीर्वाद से मैं सब को खुश रखने में ज़रूर कामयाब हो जाउगा." मैंने ये कहा तो माँ ने मुझे फिर से कुछ देर तक देखा और फिर मुस्कुराते हुए बोली.

"मेरा आशीर्वाद तो तुम सबको हमेशा hi रहेगा बीटा. मेरी ख़ुशी इसी में है की मेरे सभी बच्चे खुश रहे." माँ ने ये कहा तो मैं बस उनकी तरफ देखता रहा. पता नहीं क्यों मगर मुझे ऐसा लग रहा था जैसे माँ मुझसे कुछ और hi कहना चाह रही थी मगर शायद झिझक की वजह से वो कह नहीं पायी थी. खेर जब मैं कुछ देर तक कुछ न बोलै तो माँ मुझे एकटक देखती रही और फिर मेरी तरफ hi देखती हुयी बोली.

"मैं तुझसे कुछ और भी बाते करना चाहती हु बीटा मगर मुझे समझ नहीं आ रहा की कैसे कहु.?" माँ ने ये कहा तो मैंने कहा.

"आप मेरी माँ हैं माँ और आपको मुझसे कोई भी बात कहने में कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए. आप बेझिझक मुझसे बात कीजिये. वैसे भी पिछले पांच सालो से आपसे कोई बात नहीं हुयी थी मेरी और जब मिला भी तो ढंग से नहीं मिल पाया. अब हम सब अपने गांव को हमेशा के लिए छोड़ कर यहाँ आ गए हैं तो मैं चाहता हु की यहाँ पर हम सब शहर के हिसाब से नया जीवन शुरू करे." मैंने ये कहा तो माँ ने कहा.

"कह तो तू सही रहा है बीटा मगर यहाँ के हिसाब से जीवन शुरू करने में हमें थोड़ा वक्त तो लगेगा hi. तेरे पिता के जाने के बाद अब हम सब का करता धर्ता तू hi है. तू जैसे कहेगा हम सब वैसे hi यहाँ रहेंगे." माँ ने ये कहा तो मैंने जल्दी से कहा.

"नहीं maa...aisi कोई बात नहीं है. पिता जी के न रहने के बाद मैं भले hi करता धर्ता हो गया हो मगर हम सब वैसे hi रहेंगे जैसा आप चाहेगी. आपका हर हुकुम सर आँखों पर रहेगा हमारे." मैंने ये कहा तो माँ की आँखों में एकदम से आँशु आ गए और फिर उन्होंने झपट कर मुझे अपने सीने से लगा लिया. मेरी पीठ पर अपने दोनों हाथ फेरते हुए बोली.

"मुझे तुझसे यही उम्मीद थी मेरे बेटे. मैं जानती थी की तू अपने पिता जी के न रहने के बाद अपनी मर्ज़ी से कोई काम नहीं करेगा. मुझे बहुत ख़ुशी हुयी की तू मुझे इतना मान दे रहा है." माँ ने ये कहा तो मैंने कहा.

"अपने माँ बाप का सम्मान करना और उनकी बातो का आदर करना हर बेटे का फ़र्ज़ होता है माँ. मैं ये कभी नहीं चाहता की मैं आप सबको यहाँ ला कर आप सब पर अपना हुकुम चलाऊ. बल्कि मैं हमेशा आप के hi हुकुम का पालन करुगा. आप जैसा कहेगी मैं वैसा hi करुगा." मैंने ये कहा तो माँ ने मुझे अपने से अलग किया और फिर मेरे चेहरे को अपनी हथेलियों में ले कर मुस्कुराते हुए कहा.

"तेरी इन बातो से मेरे मन का बोझ हल्का हो गया बीटा. इसके पहले मैं सोच रही थी की जो बाते मैं तुझसे करना चाहती हु उन बातो को तू मानेगा या नहीं मगर तेरी इन बातो से मुझे भरोसा हो गया है की तू मेरी हर बात मानेगा." माँ ने ये कहा तो मैंने कहा.

"तो फिर बताइये maa....aap मुझसे क्या बाते करना चाहती हैं.?" मैंने हलके से मुस्कुराते हुए ये कहा तो माँ ने कुछ सोचते हुए कहा.

"अभी नहीं बीटा. खा पि कर जब हम सब अपने अपने कमरे में सोने के लिए चले जायेगे तब मैं अपने कमरे में तुझसे वो बाते करुँगी." माँ ने ये कहा तो मैंने कहा.

"ठीक है माँ जैसी आपकी मर्ज़ी." मैंने ये कहा तो माँ ने कहा.

"अच्छा अब तू जा और हाथ मुँह धो कर आ. मैं देखु ज़रा तेरी होने वाली बीवी ने खाना बना लिया की नहीं." माँ ने मुस्कुराते हुए ये कहा तो मैं एकदम से शर्मा गया और फिर सोफे से उठ कर ऊपर कमरे में जाने के लिए सीढ़ियों की तरफ बढ़ गया.

ऊपर जैसे hi मैं प्रिय पूजा के कमरे में आया तो दोनों बीएड से उतर कर भागते हुए आयी और मुझसे लिपट गयी. ये देख कर मैं मुस्कुराया. दोनों मेरे अगल बगल से जोंक की तरह चिपक गयी थी और बहुत ज़्यादा खुश नज़र आ रही थी.

"क्या बात है तुम दोनों बड़ा खुश लग रही हो.?" मैंने दोनों की तरफ बारी बारी से देखते हुए ये कहा तो दोनों ने मुस्कुरा कर मेरी तरफ देखा फिर पूजा ने कहा.

"ख़ुशी की तो बात hi है भाई. अब हम यहाँ जैसे चाहे वैसे रहेंगे. जैसे चाहे वैसे कपडे पहन सकेंगे और तुम से खुल के प्यार भी कर सकेंगे." पूजा ने ये कहा तो मैंने कहा.

"और तो सब ठीक है मगर खुल के कैसे प्यार कर सकोगी ये समझ नहीं आया.?" मैंने सोचते हुए ये पूछा तो इस बार प्रिय ने कहा.

"बस हमें ऐसा लगता है भाई की यहाँ पर हम जो कुछ भी करेंगे उसे कोई रोकेगा नहीं. वैसे भी इतना तो समझ में आ hi गया है की अब पहले जैसे हालात नहीं हैं. गांव में तो हर कोई हमें अच्छी तरह से जनता था और वह पर हमें बहुत साडी पाबंदियों में भी रहना पड़ता था. मगर यहाँ ऐसा नहीं होगा." प्रिय ने ये कहा तो मैं हैरान रह गया.

"पर जिन चीज़ो की तुम दोनों बात कर रही हो वो क्या इतना आसान है.? मैं ये मानता हु की गांव जैसी पाबंदिया यहाँ नहीं होंगी मगर जो रिश्ता हमारे बीच बन गया है उसके बारे में अगर माँ को दीदी को या रचना को पता चल गया तो क्या होगा.? क्या माँ या कोई भी हमारे इस रिश्ते के लिए हमें माफ़ करेगा.?" मैंने ये कहा तो प्रिय ने कहा.

"तुम बहुत सोचते हो भाई और बार बार वही सोचते हो मगर सोचने के बाद भी समझते नहीं. ये बात तो तुम्हे भी मालूम है की दीदी के बारे में माँ और रचना दीदी सब कुछ जानती हैं. माँ और रचना दीदी को पता है की कुसुम दीदी तुमसे कितना प्यार करती हैं और वो इस प्यार की वजह से किसी दूसरे लड़के से अब कभी शादी नहीं कर सकती. तो भाई जब ये बात उन्हें पता hi है तो क्या माँ ने इस बारे में दीदी से कोई बात न की होगी.? ज़रूर की होगी bhai..aur मुझे पता है की माँ दीदी को समझने बुझाने में कामयाब नहीं हुयी होंगी." प्रिय ने इतना कहा hi था की तभी पूजा ने उसकी बात को बीच में kaat'te हुए कहा.

"हाँ bhai....maa को भी समझ में आ hi गया होगा की प्यार में बावली हुयी अपनी बेटी को अब वो किसी भी तरह से तुम्हारी बहन नहीं बानी रहने दे सकती. उस हालत में माँ ने भी बहुत कुछ सोचा होगा उनके बारे में. ये मत भूलो भाई की गांव में कुछ तो ऐसी बात हुयी थी जिसकी वजह से दीदी अपने कमरे में रो रही थी. इस बात से अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं है की माँ ने हार कर क्या फैसला लिया होगा. मुझे तो पक्का यकीन है की रचना दीदी के साथ साथ कुसुम दीदी का भी ब्याह माँ तुमसे करेगी." पूजा ने ये कहा तो मैं उसकी तरफ आँखे फाड़ कर देखने लगा.

"ये क्या कह रही हो तुम.?" मैंने हैरानी से ये कहा तो पूजा ने मुस्कुराते हुए कहा.

"ऐसे हैरान न हो भाई जैसे इतनी सी बात तुम भी न समझे चुके होंगे. खेर अब जब माँ ने यही सोच लिया होगा तो उन्हें इस बात को भी सोचना hi होगा की उनकी बाकी की दोनों बेतिया भी अपने भाई से वैसा hi प्यार करती हैं जैसे उनकी बड़ी बेटी करती है." पूजा ने ये कहा तो प्रिय बोल पड़ी.

"हाँ bhai....maa को अगर हमारे बारे में ये सब पता चल भी गया तो वो अब हमें कुछ नहीं कहेगी. मतलब की अब हम सब कुछ खुल के कर सकते हैं. इसी बात से हम इतना खुश हो रहे हैं." प्रिय ने ये कहा तो मैंने कहा.

"चलो मात लेता हु की तुम दोनों की बाते सच होंगी मगर इसके बावजूद हम ऐसा नहीं करेंगे. इस सबका मतलब ये नहीं होना चाहिए की हम किसी बात से माँ को चोट पहुचाये या उन्हें बेबस कर दे. ऐसा सोचना भी बहुत गलत बात है. कुछ भी करो मगर माँ के प्रति इज्जत सम्मान हमारे अंदर वैसा hi रहना चाहिए जैसे इसके पहले हुआ करता था. बाकी आगे क्या होगा इसे वक्त पर hi छोड़ दो." मैंने ये कहा तो प्रिय ने कहा.

"हम तुम्हारी इस बात से सहमत हैं भाई और हम तुमसे वडा करते हैं की हमारे दिलो में माँ के लिए हमेशा इज्जत सम्मान रहेगा." प्रिय ने ये कहा तो मुझे बहुत अच्छा लगा.

उसके बाद हम तीनो फ्रेश हुए और डिनर करने के लिए नीचे आ गए. डिनर रेडी था तो हम सबने एक साथ बैठ कर खाना खाया. खाना कहते वक्त कुछ ख़ास बाते नहीं हुयी. खाने के बाद हम सब सोने के लिए अपने अपने कमरों में चले गए. मैंने प्रिय पूजा को पहले hi बता दिया था की आज रात मैं माँ के कमरे में hi सौगा.

रात के दस से ज़्यादा का टाइम हो चूका था और इस वक्त मैं ऊपर प्रिय पूजा के कमरे में था. असल में मैं रात वाले कपडे पहनने के लिए आया था. यहाँ पर प्रिय पूजा मेरे साथ कुछ देर प्यार करना चाहती थी जबकि मैं मन कर रहा था की माँ के कमरे में जल्दी पहुंचना ज़रूरी है क्यों की मैं उनसे कह के आया था की रात वाले कपडे पहन कर आता हु अभी.

मेरे मन करने पर भी मेरी दोनों जुड़वाँ बहने न मानी थी और दोनों ने मुझे बीएड पर सीधा लेता दिया था. उसके बाद वो दोनों बारी बारी से मेरे होठो को चूमने चूसने में लग गयी थी. मैंने भी सोचा की उनके लिए पांच मिनट के लिए रुक hi जाता हु. मैंने कुछ देर अपनी परियो को प्यार किया उसके बाद उन्हें समझा बुझा कर कमरे से बाहर आ गया.

अपनी बहनो से प्यार करने से मैं अंदर से बड़ा गर्म सा हो गया था और मेरा लुंड भी खड़ा हो गया था. इस लिए मैंने कुछ देर ऊपर hi सामने वाले बड़े से हाल में इधर उधर टहलते हुए खुद को शांत किया और फिर नीचे आ गया.

जैसे hi मैं माँ के कमरे में आया तो मैंने देखा माँ बीएड पर सीधा लेती हुयी थी एक साइड और उनकी आँखे बंद थी. मेरे आने hi आहात से उन्होंने आँखे खोल कर मेरी तरफ देखा और कहा की मैं दरवाजा अंदर से बंद कर दू. मैंने माँ के कहने पर दरवाज़े की कुण्डी लगाई और फिर बीएड पर आ कर दूसरी तरफ थोड़ा फासले पर लेट गया.

मैं जनता था की माँ मुझसे कौन सी ज़रूरी बाते करने वाली थी और इसी लिए ये सब सोचते हुए मैं थोड़ा घबरा भी रहा था और मेरे दिल की धड़कन भी बढ़ गयी थी. कमरे में हम दोनों के रहते हुए भी एकदम से सन्नाटा छाया हुआ था और ये सन्नाटा काफी देर तक छाया hi रहा.

"अपने गांव वाले घर से यहाँ आ कर कैसा लग रहा है माँ.?" मैंने सन्नाटे को भेदते हुए और कुछ बात शुरू करने की गरज़ से ये कहा तो माँ ने मेरी तरफ करवट ली और फिर बोली.

"अभी तो अजीब सा hi लग रहा है बीटा मगर धीरे धीरे यहाँ भी अच्छा hi लगने लगेगा. गांव में हर इंसान समाज के बीच रहता है और समाज के नियमो के बारे में भी सोच कर काम करता है. जिसकी वजह से कभी कभी इंसान कई तरह की परेशानियों में भी पद जाता है मगर यहाँ ऐसा नहीं है. यहाँ तो सब अपने से hi मतलब रखते हैं." माँ ने ये सब कहा तो मैंने कहा.

"गांव और शहर में यही तो फर्क होता है माँ. यहाँ इंसान अपना कोई भी वक्त बेकार नहीं जाने देता जबकि गांव में ज़्यादातर लोग वक्त की बर्बादी hi करते हैं." मैंने ये कहा तो माँ ने कहा.

"गांव में हर किसी से मिलना जुलना और एक दूसरे के लिए कुछ न कुछ करते रहना अगर अपने वक्त की बर्बादी कहलाता है तो हाँ इसे वक्त की बर्बादी hi कहेगे. यहाँ पर तो ऐसा है की लोग किसी दूसरे से कोई मतलब hi नहीं रखते. खेर छोड़ जाने दे ये सब इंसानो की अपनी अपनी सोच है." माँ ने ये कहा तो मैंने कहा.

"ारी हाँ आप मुझसे कोई बात करना चाहती थी न माँ.?" मैंने जान बुझ कर ऐसा कहा तो माँ ने मेरी तरफ ध्यान से देखा और फिर वो उठ कर बीएड में बैठ गयी. उनके बैठ जाने पर मैं भी उठ गया और बीएड की पिछली पुष्ट से पीठ टिका कर बैठ गया.

"हाँ बात तो करना है बीटा मगर थोड़ा झिझक लगती है और अजीब भी लगता है की मैं अपने hi बेटे से वैसी बाते कैसे करू.?" माँ ने ये कहा तो मैंने अपना एक हाथ बढ़ा कर माँ के हाथ को पकड़ा और फिर उनके उस हाथ को हलके से दबाते हुए बड़ी इज्जत से बोलै.

"जो भी बात हो आप बेझिझक कहिये माँ. मुझे पता है की अगर कोई बात कहनी बेहद ज़रूरी हो और अगर उस बात के कहने से hi हमारा आगे का काम बनता हो तो हमें उसे कहने में कोई झिझक या कोई शर्म नहीं करनी चाहिए. इस लिए आपको जो भी बात करनी हो आप खुल कर कीजिये." मैंने ये कहा तो माँ ने मेरी तरफ देखा और फिर बोली.

भाई लोग....

आज के लिए इतना hi....

रीड एन्जॉय & गिव योर फीडबैक....

कीप सपोर्टिंग & स्टे विथ....

:थैंक्यू:
 
भय आपकी बाते सही हैं. असल में कुछ टाइम से मैं पेरशनल रेअसोंस की वजह से बहुत परेशां था जिसकी वजह से दिमाग में हर वक्त गुस्सा भरा रहता था और उसी का असर ये हुआ की मैंने वो सब बोल दिया था. फिर मैं बहुत ज़्यादा बीमार पद गया. मेरे अपनों ने उस कंडीशन में मुझे बहुत समझाया बुझाया. तब जा कर मेरा मन शांत हुआ. उसके बाद मैं बीएड पर लेता हर वक्त सोचता रहता की मैंने क्या क्या गलत किया है....

भय मुझे याद आया की मैं सफ में भी कुछ टाइम से अपने फ्रेंड्स के साथ अच्छा नहीं कर रहा हु. आखिर ये तो सच hi है न की यहाँ पर हर कोई मनोरंजन के लिए आता है और सबसे हस्ता बोलता रहता है. सोचने का नजरिया बदल लो तो सब कुछ अलग लगने लगता है. सो मैंने सोच लिया की ठीक होने के बाद नए तरीके से सब कुछ स्टार्ट करुगा....

सो कामदेव भय जो कुछ भी मैंने कहा उसके लिए सब लोग मुझे माफ़ करे. नया साल शुरू हो गया है तो इस साल में हम सबके साथ अच्छी अच्छी यादे बनायेगे. ी होप एवरीथिंग विल बे ाललरिघ्त....

यारा तबियत में सुधार तो हुआ है मगर अंदर से अभी कमज़ोरी फील होती है. सो अगर अपडेट आने में लेट हो जाये तो एडजस्ट कर लेना....

नेक्स्ट अपडेट पोस्टेड ों पेज no. 194....

रीड & एन्जॉय....
 
सब कुछ जायज़ है....

अपडेट = 44


"हाँ बात तो करना है बीटा मगर थोड़ा झिझक लगती है और अजीब भी लगता है की मैं अपने hi बेटे से वैसी बाते कैसे करू.?" माँ ने ये कहा तो मैंने अपना एक हाथ बढ़ा कर माँ के हाथ को पकड़ा और फिर उनके उस हाथ को हलके से दबाते हुए बड़ी इज्जत से बोलै.

"जो भी बात हो आप बेझिझक कहिये माँ. मुझे पता है की अगर कोई बात कहनी बेहद ज़रूरी हो और अगर उस बात के कहने से hi हमारा आगे का काम बनता हो तो हमें उसे कहने में कोई झिझक या कोई शर्म नहीं करनी चाहिए. इस लिए आपको जो भी बात करनी हो आप खुल कर कीजिये." मैंने ये कहा तो माँ ने मेरी तरफ देखा और फिर बोली.

अब आगे पढ़िए....


मेरी बात सुन कर माँ के चेहरे पर अजीब से रंग आये और कुछ देर ठहरने के बाद चले गए. मैं समझ सकता था की वो अपने आपको ऐसी बाते करने के लिए तैयार कर रही थी जो बाते शायद एक माँ अपने बेटे से नहीं कर सकती थी. इधर मेरे दिल और दिमाग में भी हलचल मची हुयी थी और मेरे दिल की धड़कने बढ़ गयी थी. मैं सोच रहा था की मैं किस तरह से मुझसे वो सब बाते करेंगी.

"ये वक्त और ये किस्मत भी कितनी अजीब होती है न बीटा. अक्सर वही हो जाता है जिसके बारे में हमने कभी ख्वाब में भी नहीं सोचा होता. आम हालत में जिन बातो को हम किसी कीमत पर स्वीकार नहीं करते उन्ही बातो को हमें सहज hi स्वीकार कर लेना पड़ता है. ऐसा इस लिए क्यों की वक्त और हालात हमें ऐसा करने के लिए मजबूर कर देते हैं और हमारे पास दूसरा कोई चारा नहीं होता." माँ इतना कहने के बाद कुछ देर के लिए रुक गयी. जैसे अपने अंदर के जज़्बातो को काबू में करने की कोशिश कर रही हो. इधर मेरी बढ़ी हुयी धड़कन थोड़ा सा और बढ़ गयी थी.

"विस्तार से बताने में शायद मुझे सहज न लगे मगर सब कुछ विस्तार से कहना भी ज़रूरी है. शायद तुम भी इतना समझ चुके होंगे की मुझे सब कुछ पता है और अगर नहीं समझे हो तो अब जान भी लो. मैं बहुत पहले से जानती थी की तेरी बड़ी बहन तुझे कितना चाहती थी. एक बहन की तरह नहीं बल्कि एक प्रेमिका की तरह. जब मुझे इस बात का पता चला तो मेरे पैरो के नीचे से ज़मीन hi गायब हो गयी थी. मैंने एक दिन कुसुम से उस बारे में बात की और उसे उसके लिए डाटा भी. मेरे डाटने की वजह से hi उसने तुझसे बोलना बंद कर दिया था. मगर ये भी सच था की वो अंदर hi अंदर घुट घुट कर मरने लगी थी. उसके बाद तुम्हारे पिता जी ने तुम्हे घर से निकाल दिया और तुम यहाँ आ गए. तुम्हारे जाने के बाद हम सब बेहद दुखी हो गए थे मगर तुम्हारे जाने का सबसे ज़्यादा दुःख कुसुम को हुआ था. उसने ऐसा मौन धारण किया की दो साल तक उसने हम में से किसी से भी कोई बात नहीं की. घर के सरे काम खुद hi करती थी मगर कभी कुछ बोलती नहीं थी. मैं उसे बहुत समझती और उसे सबसे घुलने मिलने को कहती मगर वो सब कुछ अनसुना कर के चली जाती थी. मैंने तेरे पिता से कुछ नहीं बताया था. मैं जानती थी की ऐसी बाते जान कर तेरे पिता को बहुत बड़ा सदमा लग जायेगा." माँ इतना कहने के बाद सांस लेने के लिए रुकी. मैं चुप चाप ख़ामोशी से उनकी बाते सुन रहा था.

"घर के अंदर हालत दिन पर दिन खराब होते जा रहे थे. उधर हम सब को दुखी करने में सरपंच भी कोई कसार नहीं छोड़ रहा था. तेरे चले जाने का दुःख तो हम सबको था मगर मैं कुसुम को देख कर भी दर रही थी की कही उसे कुछ हो न जाये. शुरू में तो हम लोग खुद भी तेरे पिता से बात नहीं कर रहे थे मगर जब उन्हें एक दिन दिल का दौरा पड़ा तो हम सब बहुत ज़्यादा घबरा और दर गए थे. उसके बाद हम तेरे पिता से बोलने लगे थे और उनका ख़याल रखने लगे थे. तेरे जाने का सदमा उन्हें भी था और वो भी अंदर hi अंदर घुट रहे थे. वो हमेशा यही कहते की उन्होंने अपने बेटे के साथ बहुत बड़ा अत्त्याचार किया है. एक दिन उन्होंने मुझसे पूछा की कुसुम को मैंने ऐसा क्या कह दिया है की वो किसी से बात नहीं करती है. उनकी ये बात सुन कर मैं हैरान हुयी की वो भला ऐसा कैसे कह सकते थे. उन्होंने कहा भी की विक्की के जाने का दुःख तो हम सभी को है मगर ऐसा तो नहीं है न की उसकी वजह से हम एक दूसरे से बात hi नहीं कर रहे. मगर कुसुम किसी से बात क्यों नहीं करती ये उनका सवाल था. उन्हें लगता था की कुछ तो ऐसा है जिसकी वजह से वो किसी से बात नहीं कर रही थी. मैं भी भला उनसे क्या कहती.? एक दिन उन्होंने कुसुम से खुद बात की मगर तब भी कुसुम ने अपने मुख से एक लफ्ज़ भी नहीं कहा था." माँ एक बार फिर से सांस लेने के लिए रुकी.

"तेरे पिता जी की तबियत भी खराब रहने लगी थी और वो बिस्तर पकड़ चुके थे. मैं हमेशा सोचती की कुसुम के बारे में जो बाते मैंने उनसे छुपाई थी तो क्या मैंने सही किया था.? मेरी आत्मा चीख चीख कर कहती की ये मैंने सही नहीं किया है और फिर एक दिन मैंने तेरे पिता जी को सब कुछ बता दिया. कुसुम के बारे में ये बात jaan'ne के बाद तेरे पिता जी अवाक रह गए थे और उन्हें उसी वक्त फिर से दिल का दौरा पद गया था. ये देख कर मैं बहुत दर गयी थी और बहुत रोई भी. भगवन की कृपा से उन्हें कुछ नहीं हुआ. उसके बाद उन्होंने मुझसे कहा की उन्हें कुसुम से खुद बात करनी है और उन्होंने बात की भी थी. उन्होंने कुसुम से कहा की उसके मन में अपने भाई के लिए अगर ऐसे जज़्बात हैं और अगर वो यही चाहती है तो वो उसकी ख़ुशी के लिए सब कुछ करेंगे मगर उसके बाद गांव में लोग उनके और हम सबके बारे में क्या कहेगे. तेरे पिता ने कुसुम को उस दिन बहुत समझाया था. उन्होंने उसे दुनियादारी की बहुत साड़ी बाते समझायी और उससे विनती की की वो हम सबसे बोले और हसी ख़ुशी रहे. मन में अपने hi भाई के लिए जो जज़्बात उसने पाल रखे हैं उन्हें धीरे धीरे हटाने की कोशिश करे." माँ सांस लेने के लिए फिर से रुकी और फिर एक लम्बी सांस लेने के बाद बोली.

"उस दिन तेरे पिता जी के समझने का असर ये हुआ की कुसुम ने हम सबसे बोलना शुरू कर दिया था और सबसे बात करने लगी थी. मगर मैं जानती थी की वो अपने पिता जी के कहने पर सिर्फ दिखावा कर रही थी. उसके मन में अपने भाई के लिए जो जज़्बात थे वो वैसे के वैसे hi बने हुए थे. इसके लिए कोई कुछ नहीं कर सकता था. वैसे भी यही बहुत था की वो हम सबसे बात करने लगी थी. ऐसे hi चलता रहा और इधर तेरे पिता जी की तबियत फिर से बिगड़ने लगी. इस बार उनकी तबियत में कोई सुधार नहीं हो रहा था बल्कि दिन दिन उनकी तबियत बाद से बदतर होती जा रही थी. हम सब उनकी हालत देख कर बहुत दुखी हो गए थे. एक रात उन्होंने मुझसे कहा की अगर उनके मरने के बाद hi उनका बीटा घर वापस आये तो उससे कहना की वो हम सबको लेके इस गांव से कही दूर चला जाये. क्यों की इस गांव में हमारे लिए जीना बहुत मुश्किल होगा." माँ इतना कहने के बाद चुप हो गयी और मेरी तरफ देखने लगी. मैं उन्हें hi देखा रहा. कुछ देर मेरी तरफ देखने के बाद माँ ने फिर कहा.

"तेरे पिता जी ने कुसुम के लिए मुझसे कहा था की अगर कुसुम अपने मन से तुम्हारे लिए वैसे जज़्बात नहीं हटती या फिर वो तुम्हे hi अपना सब कुछ मानती है तो फिर उसकी ख़ुशी के लिए वही करना जो वो चाहती है मगर ये सब तभी करना जब तुम घर आ जाओ और हम सबको उस गांव से कही दूर ले जाओ. तुम्हारे पिता जी की इस बात से मैं हैरान रह गयी थी की वो भला ऐसा कैसे कह सकते थे.? वो ये कैसे भूल सकते थे की खून के रिश्ते में ऐसा कभी नहीं हो सकता है और ऐसा करना गलत hi नहीं बल्कि पाप था.? जब मैंने उनसे इस बारे में सवाल किया तो उन्होंने बस इतना hi कहा की बड़े बड़े आदर्शो और उसूलो में चल कर क्या मिला हमें.? भगवन पर इतनी आस्था राखी मगर उसने क्या किया हमारे साथ.? आखिर क्या गुनाह किया था मेरी बेटी ने जो उसकी शादी नहीं हो रही. हर बार क्यों उस मासूम के साथ वो खिलवाड़ होता रहा.? अब अगर उसके मन में अपने hi भाई के लिए ऐसे जज़्बात पैदा हो गए तो इसका मतलब है की भगवन यही चाहता है. आखिर हर चीज़ का करता धर्ता तो वही है. हम सब तो उसके इशारे पर hi कठपुतली बन कर चल रहे हैं. तुम्हारे पिता ने काफी देर तक मुझसे इस बारे में बात की और यही कहा की अब मैं वैसा hi करू जिसमे हमारे बच्चो की ख़ुशी हो." माँ ने ये सब कहा तो मैं ये जान कर हैरान था की इस सबके बारे में पिता जी को पहले से पता था और उन्ही के कहने पर माँ ये सब कर रही थी.

"उसके बाद जब तू आया तो तेरे पिता ने तुझसे बस इतना hi कहा की तू हम सबको ले के गांव से कही दूर चला जा और सबका अच्छे से ख़याल रखना. उन्होंने तुझसे उस सबके बारे में कोई बात नहीं की. क्यों की उनमे उस वक्त हिम्मत नहीं थी. मगर अपनी बातो से तुझे अपनी इच्छा को जाता ज़रूर दिया था. खेर उनके गुज़र जाने के बाद कुछ दिन तो वैसे भी हालात दुःख भरे थे मगर एक दिन मैंने तेरी और कुसुम की बाते भी सुन ली. वो तुझसे कह रही थी की तू उसे किसी बात के लिए मजबूर मत कर और उसके सामने मत आना. उसे मैंने नहीं बताया था की उसके पिता उसके लिए क्या कह कर गए थे मुझसे और न hi मैंने उसे बताया था. उसने तुझसे यही सोच कर वैसा कहा की मैं उस सबके लिए खिलाफ थी. मैंने अक्सर उसे अपने कमरे में रट हुए और तड़पते हुए देखा था. इस बारे में मैंने उस वक्त उससे कोई बात नहीं की थी और न hi मैंने उसे बताया था की उसके पिता क्या कह कर गए थे. मैं बस ये चाहती थी की तुम दोनों खुद hi आपस में सुलह करो और एक दूसरे के करीब आओ. मगर ऐसा हुआ नहीं बल्कि वो तुझसे दूर hi होती गयी." माँ ने ये सब कहा तो इस बार मैंने भी सवाल किया.

"आपको सब पता था फिर भी आपने हमारे बीच में हस्तक्षेप नहीं kiya..kyo.? आप जानती थी की अगर उस वक्त आपने हम दोनों को पिता की बातो को या उनकी इच्छा को बता दिया तो हम दोनों के बीच इतनी दूरी नहीं होती और न hi दीदी इस तरह घुट घुट कर जीती. यहाँ पर आपने गलत किया माँ. आपको उसी वक्त सब कुछ बता देना चाहिए था. आपने ऐसा क्यों किया माँ.? क्यों अपनी बेटी को पल पल तड़पाया. वो बेचारी ये सोच कर खुद को मुझसे दूर रख कर के सजा देती रही की अगर किसी को पता चल गया तो लोग हमारे बारे में या हमारे माँ बाप के बारे में क्या सोचेंगे.?" मैंने ये सब दुखी हो कर कहा तो माँ ने भी दुखी हो के कहा.

"मैं क्या करती बीटा.? मैं मजबूर थी. तेरे पिता ने hi मुझसे कहा था की मैं अपने से वो बात तुम दोनों को न बताओ. उन्होंने मुझसे कहा था की तुम दोनों खुद hi एक हो जाओ और अगर ऐसा न हो और मुझे लगे की तुम दोनों खानदान की इज्जत मर्यादा के बारे में सोच कर अपने प्रेम को कुर्बान कर देना चाहते हो तो मैं उस हालत में सब कुछ बता दू. बताने का मतलब यही था की हमारे बच्चे उस सबके लिए क्यों तड़पे जिसके लिए सोचने से कभी हमारे साथ अच्छा नहीं हुआ." माँ ने ये कहा तो मैंने कहा.

"आपको कैसे पता चला की कुसुम दीदी मुझे प्रेम करती थी या मैं भी उनसे प्रेम करता हु.?" मैंने ये कहा तो माँ ने कहा.

"ये तो मुझे शुरू में hi पता चल गया था बीटा. एक रात जब मैं कुसुम के कमरे में किसी काम से गयी तो देखा की उसका कमरा बंद तो था मगर अंदर कोई नहीं था. मैंने सोचा की शायद वो बाथरूम गयी होगी इस लिए मैं उसके आने का इंतज़ार करने लगी. मगर जब वो काफी देर तक न आयी तो मुझे उसकी चिंता होने लगी थी. मैं उसको खोजने के लिए पहले बाथरूम गयी और जब वो वह न मिली तो मैं उसे ढूंढते हुए ऊपर वाले माले में आ गयी थी. प्रिय पूजा के कमरे में देखा तो वो न मिली मुझे तो मैंने सोचा कहा गयी होगी. मैं उसके लिए बहुत घबरा गयी थी और फिर मैं तेरे पिता को बताने के लिए जैसे hi वापस आने लगी तो मेरे मन में आया की एक बार तेरे कमरे में भी देख लू. जब मैं तेरे कमरे के दरवाज़े के पास पहुंची तो मुझे अंदर से तुम दोनों की आवाज़े सुनाई दी. मैं ये सोच कर हैरान हुयी की कुसुम इतनी रात को तेरे कमरे में किस लिए थी.? मेरे कानो में तुम दोनों की आवाज़े सुनाई दे रही थी. खेर उस दिन तो मेरे मन में तुम दोनों के बारे में कोई दूसरा ख़याल नहीं आया था. कुछ देर बाद मैं चुप चाप चली आयी अपने कमरे में. उस बारे में मैंने अगली सुबह कुसुम से कुछ पूछा भी नहीं क्यों की मुझे लगा था की इसमें कोई गलत बात नहीं थी. उसके बाद कुछ दिन ऐसे hi गुज़र गए. एक रात मैं बाथरूम जाने के लिए कमरे से निकली. बाथरूम कर के जब मैं वापस आयी तो एकदम से मेरे मन में आया की एक बार कुसुम को देख लू. मुझे उसकी हमेशा फ़िक्र रहती थी. क्यों की वो हमेशा उदास रहती थी. जब मैं उसके कमरे में गयी तो कमरे में उसे न पा कर फिर से हैरान रह गयी. मैं सोचने पर मजबूर हो गयी की ये इतनी रात को अपने कमरे में क्यों नहीं है.? मुझे समझने में देर नहीं लगी थी की वो कहा होगी. मैं उसके कमरे से निकल कर ऊपर तुम्हारे कमरे के दरवाजे के पास आयी तो मुझे अंदर से तुम दोनों की आवाज़े सुनाई दी. मैं ये जान कर हैरान थी की कुसुम हर रात तेरे कमरे में क्यों जाती थी. मेरे मन में कई तरह के ख़याल आने लगे थे. मगर मैं उन खयालो को मान नहीं रही थी क्यों की मुझे पता था की मेरे बच्चे ऐसे नहीं हो सकते. खेर उसके बाद मैंने दो तीन बार और देखा. मुझे यही पता चला की कुसुम हर रात तुम्हारे कमरे में hi सोती थी और फिर सुबह जल्दी उठ कर हम सबके लिए चाय बनती थी. जब वो पहले दिन मेरे कमरे में चाय देने आयी थी तो मैं हैरान थी की मेरी बेटी इतनी सुबह उठ कर हम सबके लिए चाय कैसे बना कर ले आयी थी. खेर उस दिन मैंने इस बारे में ज़्यादा नहीं सोचा था बल्कि मुझे ख़ुशी हुयी थी की मेरी बेटी ने वो सब ख़ुशी से और जिम्मेदारी से करने के बारे में सोचा था. उसके बाद हर रोज़ यही होने लगा था. मगर जब मुझे ये पता चला की वो हर रात तेरे साथ hi तेरे कमरे में सोती है तो मेरे मन में न चाहते हुए भी ये ख़याल आने लगे की कही तुम दोनों के मन में एक दूसरे के प्रति कुछ गलत तो नहीं है.? ये सब सोच कर मैं एकदम से परेशान हो गयी थी. मैं अक्सर देखती की कुसुम खुश खुश रहने लगी थी. वो जब भी तुझे खाना देती तो मुझे ऐसा लगता जैसे वो अपने भाई को नहीं बल्कि अपने पति को खाना परोस रही हो. उसकी आँखों में उस वक्त तेरे लिए ढेर सारा प्यार होता था. वैसा hi प्यार जैसे मिया बीवी में या फिर किसी प्रेम करने वाले में होता है. ये सब देख कर मुझे यकीन होने लगा की तुम दोनों के मन में वही है जो नहीं होना चाहिए था. कुसुम तुम्हारा हर तरह से ख़याल रखती थी और मैं बारीकी से उसकी गतिविधियों को देखती थी. रात में जब वो तुम्हारे कमरे में जाती तो कुछ देर बाद मैं भी तुम्हारे कमरे के पास पहुंच जाती. कमरे के अंदर से तुम दोनों के बात करने की आवाज़े आती और फिर कुछ वक्त बाद ख़ामोशी छ जाती. तुम दोनों की बातो से मुझे इतना तो समझ आ गया था की तुम दोनों एक दूसरे को बहुत प्रेम करते हो मगर उस प्रेम को खुल कर एक दूसरे से कह नहीं रहे थे." माँ सांस लेने के लिए रुकी. इधर मैं भी उनकी बाते सुन कर हैरान था. मैं सोच रहा था की माँ को ये सब पहले से पता था और हम यही समझ रहे थे की किसी को कुछ नहीं पता था उस वक्त.

"मैं इसके बारे में सोच सोच कर बहुत परेशान हो गयी थी. तेरे पिता जी को कुछ पता नहीं था और अगर मैं उनसे बता देती तो उस वक्त सच में क़यामत आ जाती. गुस्से में वो तुम दोनों के साथ क्या करते यही सोच कर मैं दर रही थी और चुप थी मगर मुझे ये भी पता था की ये सही नहीं है. इसे रोकना बहुत ज़रूरी है वर्ण बहुत कुछ बुरा हो जायेगा. मैंने इस बारे में बहुत सोचा और फिर एक दिन मैंने कुसुम से उस बारे में बात की और उसे डाटा भी. उसे दुनियादारी की बाते बतायी. उसे ये अहसास दिलाया की तुम दोनों के मन में जो चल रहा है वो कितना गलत है. उस दिन मेरी इन बातो से कुसुम बहुत दर गयी थी मगर बोली कुछ नहीं. उसने ये भी स्वीकार नहीं किया की वो तुझे प्रेम करती है. खेर उस दिन के बाद मैंने ये जाना की वो अब तेरे कमरे में नहीं जाती थी और न hi वो तुझसे बात करने की कोशिश करती थी. ये सब देख कर मुझे भी लगा की चलो अब सब ठीक हो गया है. एक रात मैं बाथरूम जाने के लिए अपने कमरे से निकलने hi वाली थी की मैंने देखा की प्रिय पूजा चोरी चोरी कुसुम के कमरे के पास आयी और जाने क्या देखने लगी थी. उन दोनों की ये हरकत देख कर मैं सोच में पद गयी थी की ये दोनों कुसुम के कमरे के बाहर इस तरह क्यों कड़ी अंदर कमरे में जानक रही हैं.? थोड़ी देर बाद वो चुप चाप ऊपर चली गयी. मैं सोचने लगी की अब इनका क्या माजरा था.? अगले दिन जब मैंने दोनों से डरा धमका कर रात वाली बात पूछी तो दोनों ने सब कुछ बता दिया. उन्होंने बताया की उन्हें शक है की कुसुम के मन में तेरे लिए कुछ है और उन्होंने एक दिन कुसुम के कमरे में कुसुम को तेरी फोटो के साथ रट हुए भी देखा था. उनकी बातो से मैं समझ गयी की दोनों को भी इस बारे में पता है. मैंने उन दोनों से बस यही कहा की वो अपनी दीदी का ख़याल रखा करे. उसके कुछ दिन बाद वो वाक्य हुआ जब तेरे पिता जी ने तुझे घर से निकाल दिया था. हम सब इससे दुखी तो थे hi मगर मुझे कुसुम के बारे में सोच कर ये भी लगा की शायद अब इसके मन से वो सब चला जाये मगर ऐसा हुआ नहीं." माँ एक बार फिर से सांस लेने के लिए रुकी और फिर लम्बी सांस लेने के बाद बोली.

"जब तू वापस आया तो तेरे पिता जी गुज़र गए. कुछ दिन तो ऐसे hi गुज़रा मगर मैंने देखा की कुसुम का तेरी तरफ झुकाव फिर से होने लगा है. मगर इस बार मैं उसे इसके लिए डाटने वाली नहीं थी क्यों की पांच सालो में बहुत कुछ बदल गया था. साडी बाते जब तेरे पिता जी को पता चली थी तो उन्होंने मुझसे आखिर में यही कहा था की मैं वही करू जिसमे बच्चो की ख़ुशी हो. खेर मैं एक दिन कुसुम के कमरे में गयी और उससे तेरे बारे में बस ऐसे hi बात की मगर उसे लगा की मैं फिर से उससे यही कहने आयी हु वो तुझसे एक प्रेमिका बन कर न मिले. इस लिए उसने फिर से तुझसे दूरी बना ली और खुद को दुःख दर्द के हवाले कर दिया." माँ ने ये सब कहा तो इस बार मैंने कहा.

"चलिए ये सब तो ठीक है माँ. पिता जी ने तो साफ़ कह दिया था न की दीदी अगर मुझे hi अपना सब कुछ मानती हैं तो ये भी सही है की वो यही चाहती होंगी की उन्हें मैं एक पति के रूप में मिल जाओ. ये बात आप भी समझ hi गयी होंगी तो फिर आपने रचना से मेरी शादी करने के लिए ज़ोर क्यों दिया. ये तो आपको पता hi था की कुसुम दीदी और मैं एक दूसरे से प्यार करते थे तो शादी भी हम एक दूसरे से hi करने का सोचे होंगे. मगर आपने मुझे रचना से शादी करने के लिए ज़ोर diya...aisa क्यों.?" मैंने ये सब कहा तो माँ ने कहा.

"क्यों की रचना ने हम सबके लिए बहुत कुछ किया था. उसी की वजह से हम सब इतने सालो तक सही सलामत रहे थे. वो सिर्फ तुम्हारे लिए हम सब की रक्षा अपने बाप से करती रही थी. जब मुझे उसकी साड़ी असलियत का पता चला तो मेरी आत्मा चीख पड़ी बीटा. आज के युग में ऐसा कौन है जो किसी के लिए इतना कुछ करता है और अपना जीवन बर्बाद करता है.? मेरी नज़र में वो एक महान लड़की है और उसे वो मिलना hi चाहिए जिसके लिए उसने अपनों से बगावत की और अपनी जान की भी परवाह नहीं की." माँ ने ये कहा तो मैंने कहा.

"क्या सिर्फ यही एक वजह थी.?" मैंने ये कहा तो माँ ने कहा.

"इससे बड़ी वजह और क्या होगी बीटा.? उसके दिल में तेरे प्रति अथाह प्रेम था जिसकी वजह से उसने वो करने का भी साहस किया जो दूसरा कोई नहीं कर सका था अब तक. मुझे लगा की उसे इस सबके बाद भी अगर तुम न मिलोगे तो ये उसके साथ अन्याय होगा. तुम तो उसे अपनाने के बारे में सोचोगे नहीं तो मैंने hi सोच लिया और कर भी दिया. मगर मैं ये भी जानती थी की रचना शादी के बाद जब हमारे साथ रहेगी तो एक न एक दिन उसे ये भी पता चल जायेगा की उसकी बड़ी ननद के मन में उसके पति के प्रति क्या है. इस लिए मैंने सोचा की उसे पहले इस बारे में सब कुछ बता देना चाहिए. सब कुछ jan'ne के बाद अगर वो शादी के लिए राज़ी होगी तो hi शादी होगी. उसे मैं किसी तरह के धोखे में नहीं रखना चाहती थी. इस लिए मैंने उसे उस समय अपने घर बुलाया था और उसे सब कुछ बताया था. साड़ी बाते jaan'ne के बाद पहले तो वो बुरी तरह हैरान हुयी थी फिर उसने ख़ुशी ख़ुशी कह दिया की उसे इस बात से कोई आपत्ति नहीं है. बल्कि उसे ख़ुशी होगी की कुसुम उसकी तरह hi तुम्हारी बीवी बन जाएगी और वो दोनों हसी ख़ुशी एक साथ रहेगी. उसके बाद मैंने रचना को एक दिन फिर से उसकी माँ के साथ घर बुलाया और उसकी माँ से भी इस बारे में बात की. उसकी माँ का भी वही हाल हुआ था जो रचना का हुआ था. खेर उसकी माँ को भी कोई आपत्ति नहीं थी. वो तो इसी में खुश थी की आखिर उसकी बेटी का जीवन किसी तरह hi सही मगर सवार तो रहा है. वर्ण उसने तो अपना जीवन hi ब्यर्थ कर लिया था. उसके बाद मैंने सोचा की इस मौके पर कुसुम को भी सब कुछ बता दू. उसे बता दू की उसके पिता जी जाते समय क्या कह गए थे. कुसुम को कमरे में बुला कर जब मैंने उसे सब कुछ बताया तो वो बहुत रोई. कहने लगी की जब पिता जी ने खुद hi कह दिया था तो मैंने उसे तुझसे दूर कर के इतना दुःख क्यों दिया था. उसकी इस बात पर मैंने उससे यही कहा की मैंने विक्की के आने के बाद एक बार भी उससे ये नहीं कहा की वो तुझसे न मिले या तुझसे दूर रहे. उस दिन तो मैं बस ऐसे hi चर्चा कर रही उससे मगर उसे लगा की मैं एक बार फिर से उसे डाटने आयी हु और उसे तुझसे दूर रहने का कहने आयी हु. इस लिए उसने बाकी की बात सुनी hi नहीं और अपने कमरे में चली गयी थी. खेर जब मैंने रचना और उसकी माँ के सामने कमरे में कुसुम से वो सब बताया और कहा की वो चाहे तो तुझसे शादी कर सकती है. मैंने उसे ये भी बताया की रचना के साथ तेरी शादी अब तय हो चुकी है. ये सब बाते सुन कर कुसुम ने रचना की तरफ एक बार देखा और फिर रट हुए कमरे से बाहर चली गयी थी. बाद में मैंने जब उससे बात की तो उसने साफ़ कह दिया की उसे रचना पसंद नहीं है और वो नहीं चाहती की उसकी शादी तुझसे हो. उसका कहना था की तुझ पर सिर्फ उसका हक़ है. मैंने उसे बहुत समझाया मगर उसने यही कहा की अगर मैं विक्की के साथ रचना की शादी करुँगी तो वो तुझसे कभी शादी नहीं करेगी और न hi वो तुझसे कभी बात करेगी. वो वैसे hi रहेगी जैसे अब तक रह रही थी. उसकी बाते सुन कर मुझे अच्छा तो नहीं लगा था मगर मैंने सोचा की शहर जा कर इस बारे में तसल्ली से बात होगी. संभव है की वो तुझसे बात करे मगर मुझे पता था की उसने तुझसे कोई बात नहीं की. वो तुझसे भी नाराज़ है की तूने रचना से शादी करने के लिए हाँ क्यों कहा.? शायद यही वजह है की उसने तुझसे अब तक कोई बात नहीं की है." माँ ने ये सब कहा तो मैं सोचने लगा इन सब बातो के बारे में.

"मैंने उनसे कई बार बात करने की कोशिश की थी मगर हर बार उन्होंने इस बारे में बात करने से मन कर दिया. बल्कि उन्होंने तो आज तक ये भी नहीं कहा की वो मुझसे प्रेमिका की तरह प्यार करती हैं. उन्होंने कसम दिया था मुझे की मैं उन्हें किसी बात के लिए मजबूर न करू. इस लिए मैंने फिर उसके बाद उनसे कोई बात hi नहीं की." मैंने ये कहा तो माँ ने कहा.

"इसकी एक वजह और भी है बीटा. उसने जब देखा की तू अपनी जुड़वाँ बहनो के ज़्यादा करीब हो रहा है तो उसे तुझ पर और तेरी जुड़वाँ बहनो पर बेहद गुस्सा आया था. मुझे पहले पता नहीं था इस बारे में मगर फिर पता भी चला. बच्चे अपनी होशियारी में जो भी करते हैं उसके बारे में वो यही समझते हैं की वो जो कुछ भी कर रहे हैं उसके बारे में किसी को कुछ नहीं पता है. जबकि ऐसा समझना उनकी भूल होती है. कुसुम ने तो इतना सोच लिया था की वो जो कर रही है उससे उसके खानदान की इज्जत मिटटी में मिल जाएगी इस लिए उसने खुद को दुखो के हवाले कर दिया था और उसने एक बार भी अपनी जुबां खोल कर मुझसे बागी हो कर बात नहीं की थी मगर मेरी जुड़वाँ बेटियों ने तो साड़ी मान मर्यादा को hi टाक पर रख दिया. मुझे दुःख तो बहुत हुआ बीटा मगर क्या कर सकती थी.? तेरे पिता जी का कहना था की वही करू जिसमे बच्चो की ख़ुशी हो. मैं सब कुछ सह गयी और सब कुछ मान भी लिया मगर ये मुझसे भी हजम नहीं हुआ की प्यार ने हवस का रूप ले लिया. कुसुम ने तो काम से काम मान मर्यादा के बारे में सोचा था मगर प्रिय पूजा ने तो प्रेम की परिभाषा को hi बदल दिया. खेर शिकायत तो मुझे तुझसे भी थी की तू भी हवस में उनके साथ इस तरह कैसे शामिल हो गया मगर मैं तुझसे भला कहती भी तो क्या.? खेर मुझे प्रिय पूजा के बारे में भी पता चल गया तो मुझे समझ आ गया की कुसुम अचानक से उन दोनों पर इस तरह क्यों गुस्सा करने लगी थी. एक दिन मैंने कुसुम से इस बारे में बात की और कहा की अगर उसकी दोनों बहने भी अपने भाई के साथ hi अपना जीवन बिताना चाहती हैं तो शहर जा कर तुम सबकी शादी एक साथ विक्की से कर दूगी. मेरी बात सुन कर कुसुम फैट पड़ी थी उस दिन. मैं समझ सकती थी की उसके दिल पर क्या बीत रही थी मगर उसकी दोनों बहनो को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता था अब. कुसुम ने उस दिन साफ़ कह दिया की उसका प्रेम गंगा जल की तरह पवित्र था और हमेशा रहेगा. उसने कभी अपने प्रेम को अपने भाई के सामने अपनी जुबां से बाहर नहीं निकला और न hi उससे कहा. उसने हमेशा यही सोचा की उसकी वजह से उसके माँ बाप और उसके घर खानदान की इज्जत मिटटी में न मिले और अब अगर ये सब हो रहा है तो उसे अब अपने भाई से कभी कहना भी नहीं है. उसने मन hi मन तुझे चाहा था तो अब ज़िन्दगी भर अपने प्रेम को मन में hi रखेगी. वो अब कभी ये नहीं कहेगी किसी से की उसे उसका प्रेम या उसका प्रेमी उसे दे दो." माँ ने ये सब कहा तो मेरे पुरे जिसम में झुरझुरी सी हुयी. मेरा दिल तड़प कर रह गया.

"मैं ये मानती हु बीटा की खुनी रिश्तो में ये नहीं होना चाहिए था क्यों की ये हर तरह से गलत था. मगर अब जब हो hi गया और तेरे पिता जी ने भी मंजूरी दे दी थी तो मैं भी मजबूर हो गयी. सच कहु तो मुझे कुसुम पर नाज़ है की वो भले hi अपने hi भाई से प्रेम कर बैठी मगर उसके प्रेम में कही भी हवस नहीं थी. मैं हमेशा सोचती थी की उसके जैसी सच्चे दिल वाली लड़की के साथ भगवन ऐसा कैसे कर सकता है मगर उसकी किस्मत पर भला किसका ज़ोर हो सकता था. वक्त और हालात ऐसे पैदा हो गए की सब कुछ बदलता चला गया. किसी ने नहीं सोचा था की एक दिन ऐसा कुछ हो जायेगा. मैं ये भी समझती हु की प्रिय पूजा ने उसी के प्रेम के बारे में जान कर खुद भी ऐसा करने का साहस किया है मगर ये गलत था की उन दोनों ने खुद को सम्हाला नहीं." माँ ने ये कहा तो मैं कुछ न बोलै. क्यों की कही न कही मैं भी इसके लिए जिम्मेदार था. अगर मैंने शाह न दी होती तो वो दोनों इतना खुल कर मेरे सामने न आती.

"खेर अब जो हो गया उसे बदल नहीं सकता कोई. मैं बस इतना hi चाहती हु बीटा की बाकी तो सब खुश हैं मगर तेरी बड़ी बहन आज भी तड़प रही है. उसे उस तड़प से बाहर निकाल दे बीटा. उस बेचारी ने बहुत दुःख सही हैं. तेरे जाने के बाद उसकी क्या हालत थी ये सिर्फ मैं जानती हु और महसूस भी करती हु. मैं ऐसे धरम संकट में थी की मुझे कुछ समझ में hi नहीं आता था की मैं क्या करू और क्या न करू.? वो तुझसे बहुत प्रेम करती है. तू उसके जीने की वजह है. अपनी आँखों के सामने जब वो तुझे किसी और का होते देखेगी तो ये मैं जानती हु की वो बर्दास्त नहीं कर पायेगी. उसे इस दुःख से बाहर निकालना अब तेरा फ़र्ज़ है. शायद उसे तेरी बाते समझ में आ जाये. उसे समझा की प्रेम में प्रेमी सिर्फ एक का hi नहीं रहता. राधा भी कृष्ण से प्रेम करती थी और गोकुल की सब ग्वालिनि भी कृष्ण से प्रेम करती थी. कृष्ण सिर्फ राधा के hi नहीं थे बल्कि वो तो सबके थे. जो भी उनसे प्रेम करता था वो उनके थे. यहाँ पर अगर उसके अल्वा रचना और तेरी दोनों जुड़वाँ बहने भी तुझसे प्रेम करती हैं तो इसमें उसे कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए. उसे ये सब समझाना होगा बीटा." माँ ने ये कहा तो मैंने लम्बी सी सांस खींचते हुए कहा.

"आप फ़िक्र मत कीजिये माँ. मैं सब कुछ ठीक कर दुगा. मैं तो पहले भी सब कुछ ठीक कर देता मगर दीदी ने अपनी कसम दे कर मुझे कुछ भी करने से रोक दिया था. आज भी मैं उनकी उसी कसम में बढ़ा हुआ हु. इस लिए खुल कर तो मैं उनसे कोई बात कर नहीं सकता मगर अब कुछ ऐसा करुगा जिससे वो खुद मेरे पास आये." मैंने ये कहा तो माँ ने कहा.

"वो नहीं आएगी बीटा. मैं उसे अच्छी तरह जानती हु. वो अपनी बात पर तिकी रहने वाली लड़की है. इस लिए तुझे कुछ और सोचना पड़ेगा." माँ ने ये कहा तो मैंने कहा.

"ठीक है माँ मैं ज़रूर कुछ न कुछ करुगा. आपने इस सबकी इजाज़त दे दी है तो अब मैं बेझिझक हो कर कोई काम कर सकता हु." मैंने ये कहा तो माँ मेरी तरफ देखती रही.

भाई लोग....

आज के लिए इतना hi....

रीड एन्जॉय & गिव योर फीडबैक....

कीप सपोर्टिंग & स्टे विथ....

:थैंक्यू:
 
थैंक्स फॉर योर लवली कमेंट....

भय रेगुलर अपडेट नहीं दे सकता. जो बात है पहले hi बता रहा हु. अभी तो बीमारी से उबार रहा हु. घर में और भी बहुत से काम होते हैं. मगर मैं हप्ते में दो अपडेट देने की ज़रूर कोशिश करुगा....

नेक्स्ट अपडेट पोस्टेड ों पेज no. 199....

रीड & एन्जॉय....
 
थैंक्स फॉर योर लवली कमेंट....

थैंक्स कामदेव भय....

ज़िन्दगी का कोई भरोसा नहीं है और न hi किसी की तबियत का. सीटुएशन्स ऐसी हो जाती हैं की हम ऐसा कुछ कर जाते हैं जो नार्मल सिचुएशन में हम नहीं करते. खेर ये अच्छा हुआ की इस बिमारी में अपनों ने बहुत सम्हाला मुझे जिसका असर ये हुआ की मैं एक बार फिर से आपके सामने हु मगर पहले की तरह. मैं कोशिश करुगा की दुबारा ऐसा न हो....

एंड थैंक्स यारा की इतना कुछ होने के बाद भी मुझे आप लोगो का साथ मिला. वर्ण ये भी हो सकता था की कोई यहाँ न आता....

ये वाला अपडेट डिटेल में लिखा है तो हो सकता है की बोर करे. मगर मैंने सोचा था की डिटेल में लिखुगा तो बाते समझ में आएगी. अब मेरी सोच कितनी सही है ये आप लोगो से hi पता चलेगा....

नेक्स्ट अपडेट पोस्टेड ों पेज no. 199....

रीड & एन्जॉय....
 
सब कुछ जायज़ है....

अपडेट = 45


"आप फ़िक्र मत कीजिये माँ. मैं सब कुछ ठीक कर दुगा. मैं तो पहले भी सब कुछ ठीक कर देता मगर दीदी ने अपनी कसम दे कर मुझे कुछ भी करने से रोक दिया था. आज भी मैं उनकी उसी कसम में बढ़ा हुआ हु. इस लिए खुल कर तो मैं उनसे कोई बात कर नहीं सकता मगर अब कुछ ऐसा करुगा जिससे वो खुद मेरे पास आये." मैंने ये कहा तो माँ ने कहा.

"वो नहीं आएगी बीटा. मैं उसे अच्छी तरह जानती हु. वो अपनी बात पर तिकी रहने वाली लड़की है. इस लिए तुझे कुछ और सोचना पड़ेगा." माँ ने ये कहा तो मैंने कहा.

"ठीक है माँ मैं ज़रूर कुछ न कुछ करुगा. आपने इस सबकी इजाज़त दे दी है तो अब मैं बेझिझक हो कर कोई काम कर सकता हु." मैंने ये कहा तो माँ मेरी तरफ देखती रही.

अब आगे पढ़िए....


मैं देख रहा था की माँ मुझे hi देख रही थी और उनके चेहरे पर सोचने वाले भाव थे. इतनी साड़ी बाते हमारे बीच हो चुकी थी मगर अब एकदम से जैसे हमारे बीच ख़ामोशी छ गयी थी. ऐसा लगता था जैसे कहने को कुछ बचा hi नहीं था. मगर सच तो ये था की अभी भी बहुत कुछ ऐसा था जिसे कहना बाकी था.

माँ ने तो शायद सब कुछ बता कर अपना मन हल्का कर लिया था मगर मेरा मन अभी पूरी तरह से हल्का नहीं हुआ था. मेरे मन में बहुत सी बाते थी जिन्हे सिर्फ मैं hi जानता था. किसी दूसरे को पता नहीं थी वो सब बाते. ये सब तो अभी घर के अंदर के लोगो की बाते थी मगर अभी घर के बाहर वाले पर्सन की बात नहीं हुयी थी. मैं सोच रहा था की क्या मुझे इस सिचुएशन में माँ से दक्षिणा के बारे में बता देना चाहिए.?

मेरी हिम्मत नहीं हो रही थी की मैं माँ से दक्षिणा के बारे में बताओ. मैं उनसे खुल कर कैसे बताता की दक्षिणा कौन है और उसके साथ मेरा क्या रिलेशन है. इतना hi नहीं वो मुझसे क्या चाहती है. अभी तक जो भी बाते हुयी थी उससे इतना तो हो hi गया था की अब मेरे और माँ के बीच शायद कुछ भी छुपा नहीं था और ये भी था की उन सब बातो से माहौल एकदम से नार्मल सा हो गया था.

कही न कही इस बात से मैं और माँ खुश hi हो गए थे. दक्षिणा के बारे में माँ से बता कर मैं फिलहाल माँ का मूड खराब नहीं करना चाहता था. दूसरी बात ये भी थी की मुझे उनसे दक्षिणा के बारे में बताने में बहुत ज़्यादा झिझक और शर्म महसूस हो रही थी.

मैंने फैसला किया की मैं दक्षिणा के बारे में माँ से नहीं बल्कि रचना से बताउगा. वो खुद hi अपने तरीके से माँ को बता देगी. मैं उससे ये भी कह दुगा की वो माँ से कह देगी की मैं दक्षिणा के बारे में उनसे बताने में शर्म महसूस कर रहा था.

"क्या सोचने लगे बीटा.?" मेरे कानो में माँ की ये आवाज़ पड़ी तो मैं सोचो की दुनिया से बाहर आया और फिर उनकी तरफ देखते हुए हलके से मुस्कुराते हुए कहा.

"कुछ नहीं maa....bas यही सोच रहा था की क्या कुसुम दीदी को मेरी बात समझ में आएगी.? क्या वो इस सब को स्वीकार करेंगी.? ये तो मैंने भी देखा है की वो रचना को पसंद नहीं करती हैं और न hi उसके पास जाने के बारे में सोचती हैं. वो हमेशा उससे दूर hi रहने की कोशिश करती रहती हैं. कहने का मतलब ये की उन्होंने खुद को हम सबसे अलग कर रखा है. जैसे वो हमारे साथ रह कर भी हमारे साथ नहीं हैं." मैंने ये सब कहा तो माँ ने कहा.

"यही तो समस्या की बात है बीटा. वो किसी से कोई मेल मिलाप नहीं करना चाहती और न hi अपने से वो किसी से बात करना चाहती है. मैं उसकी माँ हु मगर वो मुझसे भी अपने से बात नहीं करती है. जब मैं उससे कोई बात करुँगी तभी वो हाँ या न में कुछ कहेगी और फिर से चुप हो जाएगी. वो सबके सामने यही दिखने की कोशिश करती है की उसे अब इस सबसे कोई फर्क नहीं पद रहा है. मगर मैं जानती हु की उसने अंदर hi अंदर अपने आप को कितना दुखी कर रखा है. मुझे लगता है की अगर रचना की शादी का मामला तुझसे न होता तो शायद वो इतना गुमसुम न होती और न hi वो अपनी छोटी बहनो से नाराज़ रहती. वो अपने साथ उन दोनों को ज़रूर स्वीकार कर लेती." माँ ने ये कहा तो मैंने कहा.

"रचना को वो शुरू से hi पसंद नहीं करती थी. उन्होंने मुझे पहले भी उससे दूर रहने को और उससे ताल्लुक न रखने को कहा था. मैंने उनकी बात भी मानी थी और रचना से मिलना जुलना भी बंद कर दिया था मगर फिर बाद में जाने क्या हुआ की उन्होंने खुद hi मुझसे कह दिया था की मैं जो चाहे करू उन्हें कोई मतलब नहीं है. उसके बाद उन्होंने मुझसे बोलना बंद कर दिया था." मैंने ये कहा तो माँ ने कहा.

"हाँ ये तब की बात है शायद जब मैंने उसे डाटा था. खेर अब तो सब कुछ बदल गया है. शुरू में वो रचना को इस लिए भी पसंद न करती रही होगी की उसको लगा होगा की रचना ने तुझसे ये सोच कर दोस्ती की थी की वो तुझे फसा सके या अपने भाई की मार का बदला ले सके. मगर रचना के मन में ऐसा कुछ था hi नहीं. वो शुरू से hi तुझे पसंद करती थी. अब जबकि उसे भी रचना के बारे में सब कुछ पता चल चूका है तो उसे अब रचना से कोई समस्या नहीं होनी चाहिए और न hi उसके बारे में उसे गलत सोचना चाहिए. उसे समझना चाहिए की जिस तरह का प्रेम वो तुझसे करती है वैसा hi प्रेम रचना भी तो तुझसे करती है. अगर वो तुझे अपने पति के रूप में पाना चाहती है तो रचना भी तो ऐसा hi चाहती है. इसमें रचना गलत कहा है.?" माँ ने ये कहा तो मैंने कहा.

"इसी बात का तो उन्हें अहसास करना है माँ. जब तक वो इस बात को नहीं समझेंगी तब तक उनके मन में रचना के लिए अपनापन नहीं होगा. खेर जो हो गया उसकी बात hi क्या है मगर अब हालात को बदलना पड़ेगा. उस दिन जब मैं रचना के घर में रचना और उसकी माँ से मिला था तब उसने मुझसे ये नहीं बताया था की उसे आपके द्वारा सब कुछ पता चल चूका है. उसके बाद मैं उससे मिला hi नहीं. मुझे उससे भी बात करना है. मैं खुद उससे मिल कर जानना चाहता हु की वो इस सबके बारे में क्या सोचती है और क्या कहती है मुझसे.?" मैंने ये कहा तो माँ ने कुछ सोचते हुए कहा.

"कितनी अजीब बात है. मैंने सपने में भी नहीं सोचा था की आगे भविष्य में ऐसा भी होगा जब मैं अपने hi बच्चो की सास बानगी. जिन बेटियों को मैंने अपनी कोख से पैदा किया वो एक दिन मेरी बहुये बन जाएँगी और मेरा बीटा मेरा दामाद बन जायेगा. हे भगवन ये तेरी कैसी लीला है.? ये कैसी किस्मत लिख दी है तूने हम सबकी.?" माँ ने ये सब कहा तो मुझे भी ये सब सोच कर बड़ा अजीब सा लगा. मेरे जिसम का रोया रोया फड़क उठा था.

सच hi तो कहा था माँ ने की कितनी अजीब बात है. माँ कही खो सी गयी थी. मुझे भी समझ न आया की मैं उनकी इन बातो के बाद क्या बोलू. एक बार फिर से हमारे बीच अजीब सी ख़ामोशी छ गयी थी. कुछ देर ऐसी hi सिचुएशन रही उसके बाद माँ चुप चाप बीएड पर लेट कर दूसरी तरफ को करवट ले लिया. उनके लेट जाने पर मैं भी चुप चाप लेट गया. मैं समझ सकता था की माँ के दिल और दिमाग इस वक्त क्या क्या बाते चल रही होगी. मेरा अपना हाल भी उनसे जुड़ा नहीं था. जाने कब मुझे नींद आ गयी और मैं सो गया था.

सुबह मेरी नीड प्रिय पूजा के जगाने पर खुली. मेरी नज़र उन दोनों पर पड़ी तो मैंने देखा वो दोनों ताज़े खिले गुलाब की तरह खिली खिली लग रही थी. मैं समझ गया की दोनों नाहा धो कर फ्रेश हो चुकी हैं. मैं कुछ पल के लिए उन दोनों की सुंदरता में खो सा गया था. फिर जब दोनों ने मुझे चाय के लिए कहा तो मेरी नज़र दोनों के चेहरों से हैट कर उनके हाथ में पड़ी. पूजा ने हाथ में ट्रे पकड़ा हुआ था जिसमे एक कप रखा था.

पूजा ने मुस्कुराते हुए थोड़ा झुक कर मेरी तरफ ट्रे किया तो मेरी नज़र कप में मौजूद चाय पर पड़ी. चाय देख कर मुझे हैरानी हुयी और मैंने सर उठा कर पूजा की तरफ देखा और फिर उससे बोलै.

"ये क्या है.? ये तुम काली चाय ले कर क्यों आयी हो मेरे पास.?" मैंने बुरा सा मुँह बनाते हुए ये कहा तो वो दोनों खिलखिला कर हसने लगी फिर प्रिय ने कहा.

"इसमें हमारी कोई गलती नहीं है भाई. असल में दूध था hi नहीं घर में तो भला कैसे दूध वाली चाय बनती.? हम सबने तो इसे hi पिया है और अब तुम्हारे लिए भी ले आये हैं." प्रिय ने ये कहा तो मुझे ध्यान आया की मैं तो इस वक्त दिल्ली में हु और नए घर में हु.

"ओह्ह तो तुमने मुझे पहले क्यों नहीं बताया.?" मैंने ये कहा तो पूजा ने कहा.

"कैसे बताते भला.? महाराज जी सो रहे थे गहरी नीड में और माँ ने भी जगाने से मन कर दिया था." पूजा ने ये कहा तो मैंने कहा.

"चलो कोई बात नहीं. तुम ये चाय वापस ले जाओ. मैं बाहर से दूध ले कर आता हु." मैंने ये कहा और बीएड से नीचे उतर कर अटैच बाथरूम में चला गया.

कुछ hi देर में मैं फ्रेश हो कर बाहर निकला और कमरे से बाहर ड्रिंग रूम में आ गया. ड्रिंग रूम में माँ बैठी हुयी थी. मैंने उनसे भी कहा की उन्होंने मुझे जगाया क्यों नहीं तो उन्होंने कहा कोई बात नहीं बीटा. खेर उसके बाद मैं घर से बाहर दूध लेने जाने का कह कर चला गया.

सुबह के आठ बज चुके थे. बाहर दूकान से मैं दूध ले कर आया तो फिर से चाय बानी मगर इस बार दूध वाली. मैंने सबसे कहा की हम सब आज दोपहर बाद शॉपिंग के लिए चलेंगे इस लिए सब कोई तैयार रहे.

चाय नास्ता करने के बाद मैं माँ को बता कर बाहर निकल गया. मुझे आज अपने लिए एक बीएड हर हालत में कमरे में सेट करना था और ऊपर वाले फ्लोर पर फ्रंट साइड में गयम बनाना था.

बाहर आ कर मैंने बीएड बनाने वाले को फ़ोन किया और उससे पूछा की वो बीएड कब तक घर पंहुचा देगा. मेरे पूछने पर उसने बताया की आज शाम तक वो मेरे कमरे में बीएड सेट करवा देगा. बीएड बनाने वाले से बात करने के बाद मैंने दक्षिणा को कॉल किया. वो मेरी कॉल आयी देख कर बड़ा खुश हुयी. मैंने उसे बताया की मैं आ रहा हु उसके पास.

दक्षिणा के घर पंहुचा तो वो दरवाज़ा बंद करने के बाद सीधा मुझसे लिपट गयी और फिर मेरे चेहरे को पकड़ कर मेरे होठो पर दो तीन बार किश किया. मैं जनता था की ये उसका प्यार जताने का अपना तरीका था. हम दोनों चलते हुए ड्रिंग रूम में आये और सोफे पर बैठ गए.

मैं अभी इधर उधर hi देख रहा था की तभी मेरे कानो में दक्षिणा की आवाज़ पड़ी. उसने बैठे बैठे hi सविता को उसका नाम ले कर पुकारा था. मैं ये सुन कर हैरान रह गया. मैंने पलट कर उसकी तरफ देखा तो दक्षिणा मुझे hi देखते हुए मुस्कुरा रही थी.

"वो कल शाम को यहाँ आयी है जान. बार बार मुझे फ़ोन कर के कह रही थी की मैं उसे अपने साथ hi राखु हमेशा के लिए. जब तुम अपने गांव में थे तब उसके पति का एक्सीडेंट हो गया था और उसकी ों थे स्पॉट मौत हो गयी थी. पति की मौत से वो बहुत दुखी थी. उसका उसके पति के शिव कोई सहारा नहीं था. अपनी चौदह साल की बेटी को ले कर वो कहा जाती.? जब उसने मुझसे ये कहा की वो जीवन भर मेरी सेवा करेगी तो मैंने भी सोचा की उस बेसहारा को सहारा देना चाहिए. इस लिए मैंने उसे यहाँ बुला लिया. अब वो हमेशा यही रहेगी." दक्षिणा ने ये सब बताया तो मुझे भी सविता के पति के बारे में जान कर बड़ा अफ़सोस हुआ.

सविता का पति कही पर सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी करता था. उसे शराब की लत भी लगी हुयी थी. अपनी कमाई की वो ज़्यादातर शराब पि लेता था. घर का खर्चा चलने के लिए सविता लोगो के घरो में जा कर काम करती थी. उसी से उसका गुज़ारा होता था. सविता को चौदह साल की एक बेटी थी जिसका नाम उसने नैना रखा था. यु तो सविता लोगो के घरो में काम करती थी मगर दक्षिणा के यहाँ उसको काम करने में ज़्यादा अच्छा लगता था और खुद दक्षिणा भी उसके काम से बहुत संतुस्ट रहती थी.

अभी मैं ये सोच hi रहा था की तभी सविता हमारे पास आ गयी और आते hi उसने सबसे पहले मुस्कुराते हुए मुझे नमस्ते किया. ये पहली बार था जब उसने मुझे नमस्ते किया था. इसके पहले ऐसा उसने कभी नहीं किया था. जब हम रोहिणी में रहते थे तब उससे हल्का फुल्का hi मेरी बात हो जाती थी कभी kabhi...wo भी जब कोई काम हो तब वर्ण मैं उससे ज़्यादा मतलब नहीं रखता था. वो भी मुझे घर का एक ऐसा नौकर समझती थी जो नौकर की तरह उसे कभी नहीं लगता था.

मेरे गांव जाने के बाद दक्षिणा उसके बेहद करीब आ गयी थी. यहाँ तक की दोनों ने आपस में लेस्बियन सेक्स तक किया था. दक्षिणा ने शायद उसे अपने और मेरे रिश्ते के बारे में सब बता दिया था. शायद यही वजह थी की सविता ने आज मुझे नौकर नहीं बल्कि एक मालिक समझ कर नमस्ते किया था.

मुझे थोड़ा अजीब तो लगा मगर अब तो उसे सब पता hi था और अब वो यही रहेगी हमेशा तो इसका मतलब ये हुआ की वो अब इस घर की एक पारिवारिक मेंबर की तरह हो गयी थी. सविता की उम्र दक्षिणा से काम थी और उसको एक बेटी थी जो चौदह साल की थी. सविता की रंगत अगर ज़्यादा साफ़ नहीं थी तो ज़्यादा गन्दी भी नहीं थी. काफी साल पहले वो अपने पति के साथ दिल्ली जैसे शहर में आयी थी. पिछले पांच सालो से तो मैं hi उसे जनता था. पहले वो एकदम से सावली सी हुआ करती थी मगर वक्त के साथ उसकी रंगत कुछ हद तक साफ़ हो गयी थी. उसका जिसम म्हणत करने की वजह से कैसा हुआ था. उसके जिसम की बनावट भी ऐसी थी की कोई भी मर्द उसे पलट कर एक बार ज़रूर देखना चाहेगा.

"ारी तुम इस तरह क्या आँखे गड़ाए देख रही हो सविता.? नज़र लगाने का इरादा है क्या मेरी जान पर.?" दक्षिणा ने हस्ते हुए ये कहा तो सविता एकदम से सकपका गयी और फिर उसने बुरी तरह शरमाते हुए मुझ पर से अपनी नज़रे हटा ली. जबकि दक्षिणा की इस बात से मैं भी मुस्कुरा उठा था.

"अब जाओ और इनके लिए गरमा गरम चाय बना कर ले आओ." दक्षिणा ने ये कहा तो सविता मुस्कुराते हुए पलट कर चली गयी. उसके जाने के बाद मैंने दक्षिणा से कहा.

"तो तुमने उसे हमारे बारे में सब कुछ बता दिया है.?" मैंने ये कहा तो दक्षिणा ने मुस्कुराते हुए कहा.

"तो क्या हुआ माय डिअर. उससे छुपाने का भी तो कोई मतलब नहीं था. वैसे मैंने उसे कल रात hi सब कुछ बताया है. पहले उसे कुछ पता नहीं था." दक्षिणा ने ये कहा तो मैंने कहा.

"चलो कोई बात nahi...aur उसकी बेटी कहा है.? क्या उसे भी सब कुछ पता है.?" मैंने ये कहा तो दक्षिणा ने कहा.

"उसकी बेटी को अभी कुछ पता नहीं है. कल शाम जब ये दोनों यहाँ आयी थी तो मैंने सविता के लिए नीचे hi एक कमरा दे दिया था रहने के लिए और उसकी बेटी को ऊपर वाले फ्लोर पर कमरा दे दिया है. कल रात दूध में नींद की गोली मिला कर मैंने नैना को सुला दिया था और फिर उसके सो जाने के बाद hi सविता को मैंने अपने कमरे में बुला लिया था. उसके बाद हम दोनों के बीच क्या हुआ ये बताने की ज़रूरत नहीं है तुम्हे." दक्षिणा ने ये सब कहा तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा.

"चलो ये अच्छा है की तुम्हारे मनोरंजन के लिए सविता यही रहेगी. अब काम से काम तुम्हे यहाँ पर अकेलापन नहीं लगेगा." मैंने ये कहा तो दक्षिणा ने कहा.

"मगर मेरे दिल को सुकून तो तुम्हारे साथ hi रहने से मिलेगा न माय डिअर." दक्षिणा ने ये कहा तो मैंने कहा.

"उसकी फ़िक्र मत करो. मैं हर रोज़ यहाँ आउगा. रात में आना मुश्किल है मगर दिन में एक बार ज़रूर आउगा." मैंने ये कहा तो दक्षिणा ने कहा.

"और ऐसा कब तक चलेगा.? मेरा मतलब है की क्या साड़ी ज़िन्दगी ऐसा hi चलता रहेगा. क्या कभी ऐसा नहीं होगा की मैं भी तुम्हारी फॅमिली का एक हिस्सा बन जाओ.?" दक्षिणा ने ये कहा तो मैंने कहा.

"Don't वोर्री डिअर. इसके लिए कुछ टाइम लगेगा. तुम खुद इस बात को समझ सकती हो की ये इतना आसान नहीं है. अभी तो मेरी फॅमिली के बीच hi काफी साड़ी मुश्किलें हैं जिन्हे सम्हालने में मुझे बहुत से पापड बेलने पड़ेगे. तुम तो जानती हो की कुसुम दीदी किस तरह की हैं. कल रात माँ से मेरी बहुत सी बाते हुयी थी और यकीन मानो माँ से बात करने के बाद मुझे बहुत राहत मिली है. अब ऐसा नहीं है की मुझे किसी बात के लिए दर rahega..balke अब हर चीज़ आसान हो गयी है सिर्फ कुसुम दीदी को लाइन पर लेन के शिव. अब मेरे पास सबसे पहला काम यही है की किसी तरह दीदी को लाइन पर लौ और उनके दुखो को दूर करू. जब मेरी फॅमिली के बीच की साडी प्रॉब्लम सोल्वे हो जाएगी तो मेरे लिए तुम्हे भी अपनी फॅमिली में शामिल करना आसान हो जायेगा." मैंने ये सब कहा तो दक्षिणा कुछ देर तक मुझे देखती रही फिर बोली.

"मैं भगवन से दुआ करती हु की सब कुछ जल्दी से ठीक हो जाये. वैसे ये सच है की मैं यही चाहती हु की मैं तुम्हारी फॅमिली का हिस्सा बन जाओ मगर मुझे दर भी लगता है की अगर तुम्हारी फॅमिली ने मुझे एक्सेप्ट नहीं किया to....to फिर क्या होगा जान.? उन सबको जब मेरे बारे में पता चलेगा तो वो सब क्या सोचेंगे मेरे बारे में.? वो ज़रूर यही सोचेंगे की मैंने अपनी हवस को मिटने के लिए तुम्हे फसाया हुआ है.?" दक्षिणा ने ये कहा hi था की मैंने जल्दी से कहा.

"ये तुम क्या कह रही हो दक्षिणा.? ये तुमसे किसने कह दिया की तुमने मुझे फसाया हुआ है. प्ल्ज़ यार ऐसा मत कहो और न ऐसा socho.Tumhare बारे में कोई गलत नहीं sochega....main उन सबको बताउगा की असलियत क्या है.?" मैंने ये कहा तो दक्षिणा ने अजीब तरह से मुस्कुराते हुए कहा.

"तुम भले hi चाहे चीख चीख कर उन सबको सफाई दो जान मगर वो सब यही समझेंगे की मैंने अपनी हवस को मिटने के लिए hi तुम्हे फसाया हुआ है. इतना जल्दी कोई यकीन नहीं करेगा की हमारे बीच हवस के अलावा भी एक चीज़ है जिसे प्यार कहते हैं. तुम मेरे बेटे की उम्र के हो विकास. हमारे बीच के रिलेशन को कोई भी अच्छा नहीं कहेगा और न hi समझेगा." दक्षिणा ने ये कहा तो मैंने कहा.

"तुम कुछ ज़्यादा hi सोच रही हो डिअर. ऐसा कुछ नहीं होगा और अगर होगा भी तो उन्हें मैं जवाब दुगा. ऐसा जवाब जिसके बाद सब की बोलती बंद हो जाएगी और सब की सोच भी बदल जाएगी." मैंने ये कहा तो दक्षिणा ने हैरानी से मेरी तरफ देखते हुए कहा.

"ऐसा क्या जवाब डोज jaan...bhala ऐसा कौन सा जवाब है जिसके बाद सबकी बोलती बंद हो जाएगी और उनकी सोच भी बदल जाएगी.?" दक्षिणा ने हैरानी से ये पूछा तो मैंने कहा.

"सीढ़ी सी बात है दक्षिणा. अगर वो सब ये समझेंगे की तुमने मुझे सिर्फ अपनी हवस को मिटने के लिए फसाया हुआ है तो फिर मेरी बहनो ने क्या सोच कर मुझसे रिलेशन बना लिया है. उससे ज़्यादा गलत और क्या हो सकता है इस दुनिया में.? सेज भाई बहन के बीच बने ऐसे रिश्ते के बारे में लोगो के क्या विचार होंगे.? क्या सिर्फ ये कह देने से की वो मुझसे प्रेम करती हैं लोगो को समझा पाएंगी या लोगो को चुप करा पाएंगी वो.? यही baate.....aur यही वो जवाब होगा डिअर जिसके द्वारा उन्हें ये समझ में आएगा की तुम गलत नहीं हो और अगर गलत हो तो फिर वो भी गलत hain...warna यही समझो की ये एक प्रेम hi था जिसकी वजह से तुम मुझसे कनेक्ट हो गयी. प्रेम ये कहा देखता है की रिश्ता क्या है और उम्र क्या है.?" मैंने ये सब कहा तो दक्षिणा मेरी तरफ देखती रह गयी.

अभी दक्षिणा कुछ बोलने hi वाली थी की तभी सविता हाथ में ट्रे लिए हमारे पास आयी. मैं और दक्षिणा ने ट्रे से अपने अपने लिए चाय का एक एक कप उठा लिया. चाय दे कर सविता जब वापस चली गयी तो दक्षिणा ने कहा.

"कह तो तुम सही रहे हो जान मगर तुम अगर उन सबको इस तरह के जवाब डोज तो हो सकता है की उन्हें बुरा लग जाये. वो सब यही समझ बैठेंगे की तुमने एक परायी औरत के लिए अपने परिवार वालो को ऐसा कहा." दक्षिणा ने ये कहा तो मैंने कहा.

"सोचने को तो इंसान क्या नहीं सोच लेता माय डिअर. ऐसा भी तो हो सकता है की जिन बातो के बारे में तुम बात कर रही हो या जिन बातो से तुम दर रही हो वो सब बाते हो hi न. मतलब की वो लोग तुम्हारे बारे में ये सब सोचे hi न." मैंने ये कहा तो दक्षिणा ने मुस्कुराते हुए कहा.

"बातो को कैसे घूमना है ये कोई तुमसे सीखे. खेर chhodo...maine तो पहले से hi सोचा हुआ है की जब तुमसे प्यार कर hi लिया है तो उसके अंजाम से क्या डरना.?" दक्षिणा ने मुस्कुरा कर ये कहा तो मैंने भी मुस्कुरा कर कहा.

"तो फिर ऐसी बाते क्यों कर रही थी अब तक.?" मैंने मुस्कुरा कर ये कहा तो दक्षिणा ने शरारत से मुस्कुराते हुए कहा.

"बात करने का कोई तो मुद्दा होना चाहिए था न मेरे जानू. तुम हमेशा अपनी बातो से मुझे घूमते रहते हो तो मैंने सोचा आज थोड़ा सा मैं भी तुम्हे घुमा दू." दक्षिणा कहने के साथ hi खिलखिला कर है पड़ी तो मैंने कहा.

"अच्छा ji...to फिर क्या लगा तुम्हे.? तुम्हारे हिसाब से क्या मैं तुम्हारी इन बातो से घूम गया.?" मैंने ये कहा तो दक्षिणा ने मुस्कुराते हुए कहा.

"यही तो बात है न जान. कोशिश तो मैंने की मगर तुम्हे घुमा नहीं पायी शायद." दक्षिणा ने ये कहा और इससे पहले के मैं उससे कुछ कहता उसने झट से अपने होठ मेरे होठो पर रख दिए.

दक्षिणा ने जोश में आ कर मेरे होठो पर अपने होठ रख ज़रूर दिए थे मगर इससे आगे उसे कुछ करने का मौका नहीं मिला क्यों की उसी वक्त उसे मुझसे अलग होना पद गया था. सविता की आवाज़ से वो मुझसे अलग हो गयी थी. सविता ने उसी वक्त अपनी बेटी का नाम लिया था. हुआ ये था की जैसे hi दक्षिणा ने अपने होठ मेरे होठो पर रखा उसी वक्त ऊपर से सविता की बेटी नैना सीढ़ियों से उतरती हुयी सविता को दिख गयी थी और उसने जल्दी से ये सोच कर अपनी बेटी का नाम लिया था की इधर हम दोनों सम्हाल जाये. असल में नैना के सामने ये सब नहीं हो सकता था.

कुछ hi देर में सविता की बेटी नीचे आ गयी और हम दोनों की तरफ एक बार देखने के बाद अपनी माँ की तरफ चली गयी. मैंने देखा की नैना दिखने में भले hi चौदह साल की थी मगर उसके जिसम से ऐसा आभास हो रहा था जैसे वो अब जवान हो गयी हो. आज के युग में लड़की की ज़ात बहुत जल्दी बड़ी हो जाती है.

मैं कुछ देर और दक्षिणा के पास रहा उसके बाद मैं दक्षिणा की कार की चाभी ले कर वह से बाहर आ गया. दक्षिणा की कार ले कर मैं मार्किट की तरफ चला गया. मार्किट से मैं दो घंटे बाद वापस लौटा और दक्षिणा के घर में उसकी कार कड़ी करने के बाद अपने घर आ गया.

घर आया तो लंच तैयार था. हम सबने एक साथ hi खाना खाया. कुसुम दीदी किचन में थी और रचना खाना परोस रही थी. मेरे रहने पर कुसुम दीदी साथ में बैठ कर खाना नहीं खाती थी, ऐसा गांव में भी होता था. वैसे ये भी सोचने वाली बात थी की वो रचना को बिलकुल भी पसंद नहीं करती थी और न hi उससे बात करती थी मगर यहाँ पर किचन में दोनों ने साथ में रह कर hi खाना बनाया था. मैं सोच रहा था की किचन में क्या दोनों के बीच ज़रा सी भी बात नहीं हुयी होगी. वैसे मैंने तो अब तक कुसुम दीदी को रचना से बात करते हुए नहीं देखा tha..jabke रचना उनसे बोल देती थी. रचना के मन में उनके लिए कोई बैर नहीं था.

खाना पीना करने के बाद हम सबने एक घंटे आराम किया उसके बाद मैंने सबको तैयार रहने के लिए कहा और घर से बाहर आ गया. मैं सीधा दक्षिणा के घर गया और उससे उसकी कार ली और वापस अपने घर आ गया. असल में मैं सबको शॉपिंग के लिए ले जा रहा था. मैं चाहता था की ये सब लोग यहाँ के हिसाब से कपडे ले ले.

कार बाहर hi कड़ी करके मैं घर के अंदर आया और सबको चलने के लिए कहा. मैंने देखा की माँ कुसुम दीदी पर थोड़ा गुस्सा थी. मैंने जब पूछा तो माँ ने बताया की कुसुम दीदी हम सबके साथ नहीं जाना चाहती थी. उनका कहना था की उन्हें अपने लिए किसी चीज़ की ज़रूरत नहीं है. उनकी इसी बात पर माँ गुस्सा हुयी थी और उन्हें थोड़ा सा डाटा भी था. खेर माँ के डाटने की वजह से न चाहते हुए भी कुसुम दीदी को हमारे साथ चलना hi पड़ा.

हम सब घर से बाहर आये तो माँ ने गेट पर टाला लगा दिया. बाहर सड़क के किनारे कार कड़ी देख कर माँ ने मुझसे कहा की इसे यहाँ पर किसने कड़ी कर दिया.? माँ को मैंने बताया की इसे मैं ले कर आया हु और हम सब इसमें बैठ कर hi चलेंगे. माँ के पूछने पर मैंने उन्हें बताया की ये कार मेरे एक दोस्त की है.

कार में सबके बैठने के बाद मैंने कार को आगे बढ़ा दिया. पूजा मेरे बगल से hi बैठी थी और बड़ा खुश नज़र आ रही थी. कुछ भी कहो मेरी जुड़वाँ बहनो में एक अलग hi क्वालिटी थी. चाहे जैसी भी सिचुएशन हो ये दोनों मस्त रहती थी. इस वक्त भी पूजा की मस्ती चालु थी. वो मेरी तरफ कई तरह के इशारे किये जा रही थी. असल में वो इशारो में मुझसे पूछ रही थी की हम क्या क्या खरीदेंगे अपने लिए.? उसके इशारे की इस बात से मुझे याद आया की मैंने इन दोनों के लिए कुछ ज़रूरी चीज़े लेन को कहा था.

कुछ hi टाइम में हम सब एक मॉल के सामने आ कर रुके. मेरे कहने पर सब कार से उतर गए तो मैंने कार को एक साइड पार्क किया और फिर सबको लेके मॉल के अंदर आ गया. प्रिय पूजा के अलावा सब नार्मल थे. मॉल के अंदर आ कर मैं सबको ऊपर की तरफ ले गया. कुछ hi देर में हम सब लेडीज सेक्शन में आ गए. मेरी दोनों जुड़वाँ बहने तो आँखे फाड़ फाड़ कर चारो तरफ देखे जा रही थी और ख़ुशी से फूली नहीं समां रही थी. माँ बीच बीच में उन दोनों को डाट भी देती थी.

मेरी नज़र एक सेल्स गर्ल पर पड़ी तो मैं उसके पास गया. उसने मुझे देखा तो बड़े hi अदब से मुझसे कहा की वो मेरी क्या हेल्प कर सकती है तो मैंने उसे अपनी फॅमिली की तरफ इशारा करते हुए कहा की इन सबके लिए जो सबसे स्पेशल हो वो कपडे यहाँ से दिलाये और वो सब भी जो गर्ल्स या लेडीज उसे करती हैं. मेरी बात सुन कर सेल्स गर्ल मुस्कुरायी और फिर उसने मुझसे कहा don't वोर्री सर.

मैंने सेल्स गर्ल से कहा की मैं कुछ देर में आता हु तब तक आप इन सब के लिए सब चीज़े दिला दीजिये. सेल्स गर्ल से बात करने के बाद मैं पलट कर माँ के पास आया और सब को उस सेल्स गर्ल के पास ले आया. उसके बाद मैंने माँ से कहा की आप सबके लिए ये कपडे वगैरा दिखाएंगी और आप लोगो को जो भी पसंद आये उसे ले लीजियेगा. बस इतना याद रहे की कपडे यहाँ के हिसाब से hi सलेक्ट करना. मैंने सब से ये कहा और फिर सेल्स गर्ल को इशारा कर के लेडीज सेक्शन से बाहर आ गया.

मैं जनता था की यहाँ पर टाइम लग जायेगा इस लिए मैं मॉल से बाहर आ गया था और सीधा एक पान की दूकान के पास गया. दूकान वाले से मैंने एक सिगरेट ली और उसे जला कर पिने लगा. सिगरेट पि कर मैंने दूकान वाले को पैसे दिए और उससे एक बाबा इलायची ले कर वापस कार के पास आ गया. कार में बैठ कर मैंने मोबाइल निकला और दक्षिणा को कॉल किया.

भाई लोग....

आज के लिए इतना hi....

रीड एन्जॉय & गिव योर फीडबैक....

कीप सपोर्टिंग & स्टे विथ....

:थैंक्यू:
 
भय आपकी बाते सच hi होंगी मगर मैं आपकी बातो से पूरी तरह सहमत नहीं हु. आप कहते हो की इंसान सिर्फ अपने भगवन से hi प्रेम करता है जबकि आप भी जानते हैं की इसी दुनिया में एक माँ बाप भी होते हैं जो अपने बच्चो से बहुत प्यार करती हैं. आप कहते हो की इंसान सिर्फ सेक्स hi करने के लिए इंसान से प्यार करता है तो फिर एक माँ और beta/beti के बीच जो प्यार होता है वो क्या होता है....

यारा बुरा लगने वाली कोई बात नहीं है. आपने अपने थॉट्स पेश किये हैं बात ख़तम....

नेक्स्ट अपडेट पोस्टेड ों पेज no. 204....

रीड & एन्जॉय....
 
सब कुछ जायज़ है....

अपडेट = 46


मैंने सेल्स गर्ल से कहा की मैं कुछ देर में आता हु तब तक आप इन सब के लिए सब चीज़े दिला दीजिये. सेल्स गर्ल से बात करने के बाद मैं पलट कर माँ के पास आया और सब को उस सेल्स गर्ल के पास ले आया. उसके बाद मैंने माँ से कहा की आप सबके लिए ये कपडे वगैरा दिखाएंगी और आप लोगो को जो भी पसंद आये उसे ले लीजियेगा. बस इतना याद रहे की कपडे यहाँ के हिसाब से hi सलेक्ट करना. मैंने सब से ये कहा और फिर सेल्स गर्ल को इशारा कर के लेडीज सेक्शन से बाहर आ गया.

मैं जनता था की यहाँ पर टाइम लग जायेगा इस लिए मैं मॉल से बाहर आ गया था और सीधा एक पान की दूकान के पास गया. दूकान वाले से मैंने एक सिगरेट ली और उसे जला कर पिने लगा. सिगरेट पि कर मैंने दूकान वाले को पैसे दिए और उससे एक बाबा इलायची ले कर वापस कार के पास आ गया. कार में बैठ कर मैंने मोबाइल निकला और दक्षिणा को कॉल किया.

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"क्या बात है jaan...meri बहुत याद आ रही है क्या.?" कॉल पिछ करते hi दक्षिणा ने एकदम से चहकते हुए ये कहा तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा.

"याद तो तब आने का सवाल तो तब होगा न माय डिअर जब मैं तुम्हे भूलू." मैंने ये कहा तो दक्षिणा ने कहा.

"अच्छा जी ऐसी बात है क्या.?" दक्षिणा ने ये कहा तो मैंने कहा.

"बिलकुल yaar...yahi बात है." मैंने ये कहा तो दक्षिणा ने कहा.

"अगर ऐसा है तो आ जाओ फिर मेरे पास. नैना को ऊपर कमरे में बंद कर दूगी और फिर हम दोनों प्यार करेंगे." दक्षिणा ने ये कहा तो मैंने कहा.

"अभी नहीं आ सकता है यार क्यों की मैं सब को ले कर मॉल आया हु. वो क्या है न की यहाँ के हिसाब से सबके लिए कपडे वगैरा लेना है. इस लिए सब को लेके आया हु." मैंने ये कहा तो दक्षिणा ने कहा.

"ओह्ह तो सबके लिए अपनी पसंद के कपडे खरीद रहे हो और मेरे लिए कुछ नहीं.?" दक्षिणा ने ये कहा तो मैंने कहा.

"तुम भी आ जाओ उसमे क्या है.? तुम्हारे लिए भी दिला दुगा. मगर यार मैं उन सबके साथ मॉल के अंदर नहीं हु इस वक्त. मैंने सेल्स गर्ल को सब कुछ समझा दिया है. वो उन सबको जो लेना होगा दिलवा देगी." मैंने ये कहा तो दक्षिणा ने कहा.

"ये क्या बात हुयी जान.? तुम्हे उनके साथ hi रहना चाहिए था. साथ में रह कर साड़ी चीज़े खरीदते तो ज़्यादा अच्छा होता. अब तुम उनके साथ नहीं हो तो उन्हें कैसा लग रहा होगा.?" दक्षिणा ने ये कहा तो मुझे भी लगा की बात तो सही है मगर मैं इस लिए चला आया था की मेरे रहने पर किसी को किसी तरह की झिझक न हो.

लडीएसओ के कई ऐसे कपडे भी होते हैं जिन्हे वो अपने बेटे या भाई के सामने नहीं ले सकती. यही सोच कर मैं चला आया था. मैंने दक्षिणा को भी इस बारे में बताया तो उसने कहा.

"बात तो तुम्हारी सही है जान मगर फिर भी तुम्हे उनके साथ hi रहना चाहिए. उन सबके लिए ये जगह अभी नयी है और तुम उन्हें छोड़ कर इस तरह चले आये हो तो उन्हें बिलकुल भी अच्छा नहीं लगेगा." दक्षिणा ने ये कहा तो मैंने कहा.

"चलो ठीक है यार तुम कहती हो तो मैं वापस मॉल के अंदर उनके पास चला जाता हु." मैंने ये कहा तो दक्षिणा ने बाद में बात करने का कह कर कॉल कट कर दिया. मैंने मोबाइल को पॉकेट में डाला और कार से बाहर आ गया. कार को लक करते हुए मैं सीधा मॉल के अंदर चला आया.

थोड़ी hi देर में मैं माँ लोगो के पास पहुंच गया. मुझे देख कर माँ के चेहरे पर पहले तो चौकने जैसे भाव आये फिर वो मुस्कुरा पड़ी. उधर कुड़ुम दीदी किनारे साइड ऐसे कड़ी थी जैसे वो कुछ ले hi न रही हो. मैंने माँ से उनके बारे में पूछा तो माँ ने बताया की उन्होंने ले लिया है उसके लिए सब कुछ.

प्रिय पूजा को कुछ समझ में hi नहीं आ रहा था की वो क्या ले और क्या न ले. वो दोनों hi कंफ्यूज थी. एक चीज़ पसंद आती तो दूसरे hi पल उस चीज़ को रिजेक्ट भी कर देती थी. मुझे आया देख कर दोनों मुझसे कहने लगी की मैं उनके लिए कपडे पसंद करू.

उनकी बात सुन कर माँ ने कहा बीटा अब तो तू hi इनके साथ माथा पच्ची कर अपना. माँ की बात सुन कर मैं बस मुस्कुराया और सेल्स गर्ल की तरफ देखा तो उसने मुस्कुराते हुए बताया की वो हर तरह के कपडे उन दोनों को दिखा चुकी है मगर ये दोनों इतने सरे कपडे देख कर कंफ्यूज हो गयी हैं की कौन से कपडे ले.?

काफी मसक्कत के बाद आखिर उन दोनों को कपडे लिए मैंने. इस सब में काफी टाइम लग गया था. मैंने माँ से पूछा की और तो कुछ नहीं लेना तो माँ ने कहा नहीं बीटा सब हो गया है और अब सीधे घर चलना है. माँ की बात सुन कर मैंने कहा ठीक है. उसके बाद हम सब कपड़ो के थैले ले कर चल दिए. नीचे आ कर काउंटर पर मैंने सभी सामान को चेक करवाया और पैसे पेड किये.

मॉल से बाहर आ कर मैंने सब को कार में बैठने को कहा और थैलो को मैंने कार की डिक्की में रख दिया. सबके बैठने के बाद मैंने कार को घर की तरफ बढ़ा दिया. मेरी नज़र कार के बैक मिरर पर पड़ी. उसमे कुसुम दीदी का चेहरा दिख रहा था. तभी उन्होंने भी मिरर पर देखा और एकदम से हम दोनों की नज़रे मिल गयी. मैं उन्हें देख कर मुस्कुराया तो उन्होंने जल्दी से अपना चेहरा दूसरी तरफ कर लिया. ये देख कर मेरे होठो पर मुस्कान फ़ैल गयी. दुनिया में जिसे मैं सबसे ज़्यादा पसंद करता हु और जिसके चेहरे पर एक पल के लिए भी उदासी नहीं देख सकता वो मुझसे खफा थी. मैं सबके साथ अपने दिल को बहलाता रहता था. उन्होंने अपनी कसम दे कर मुझे कुछ भी करने से मन कर दिया था वर्ण मैं इतना बर्दास्त नहीं करता. मगर अब तो सच में बर्दास्त नहीं हो रहा था मुझसे.

मैंने सोच लिया की अब दीदी चाहे कुछ भी कहे मगर मैं उनके पास जा कर उनसे बात करके hi रहुगा. ऐसा भी हो सकता है की दीदी ये सोच कर कुछ ज़्यादा hi नाराज़ हो की मैंने उन्हें किसी भी चीज़ के लिए अहमियत नहीं दी जबकि ऐसा था नहीं. उन्होंने मुझसे कहा था की मैं उनसे दूर राहु या उनसे बात न करू तो मैंने अब तक वही किया था. मगर हो सकता है की वो इसके बाद भी ये एक्सपेक्ट करती रही हो की मैं उनके पास जाओ और उन्हें मानाने की कोशिश करू. जबकि मैंने ऐसा किया hi नहीं था. इस लिए ये हो सकता है की इस बात से वो मुझसे काफी ज़्यादा नाराज़ हो. अगर ऐसा था तो ये मेरी गलती थी और मुझे अपनी इस गलती के लिए उनसे माफ़ी मांगना चाहिए था.

एक तरफ रचना थी जिससे मेरी अभी तक उस हिसाब से बात hi नहीं हुयी थी जिस हिसाब से होनी चाहिए थी. मैं जब उससे 2ंद टाइम मिला था तब मुझे पता hi नहीं था की उसे सब कुछ पता है. खेर मुझे अब ये समझ नहीं आ रहा था की मैं सबसे पहले किस्से बात करू.? कुसुम दीदी से या फिर रचना से.??

रचना के मामले में कोई पन्गा नहीं था मगर कुसुम दीदी का मामला hi पंगे वाला था इस लिए मुझे लग रहा है की सबसे पहले मुझे उनसे hi बात करना चाहिए. मगर ये इतना आसान नहीं था. क्यों की एक तो मुझमे इतनी हिम्मत hi नहीं थी की मैं उनसे आसानी से मिल कर बात करू और दूसरा दर ये था की कही उन्होंने गुस्से में आ कर कुछ उल्टा सीधा बोल दिया तो क्या होगा. या फिर ऐसा भी हो सकता था की वो कोई हंगामा खड़ा कर दे. उस सिचुएशन में बाकी लोगो को भी पता चल सकता था. माँ को अगर पता चला तो बेकार में hi कुसुम दीदी को डाट देंगी जो की बिलकुल भी अच्छा नहीं होगा. मगर ये तो ज़रूरी hi था की उनसे बात की जाये और उन्हें मनाया जाये.

इन्ही सब बातो के बारे में सोचते हुए हम अपने घर पहुंच गए. सब कार से बाहर उतर गए. माँ ने स्टील वाले गेट का लॉक खोला जबकि मैंने कार की डिक्की खोली. डिक्की के खुलते hi प्रिय पूजा ने बड़ी स्पीड से उसमे से अपने अपने थैलो को निकला. बाकी बचे थैलो को रचना ने निकला. जबकि कुसुम दीदी कार से उतरने के बाद माँ के पास चली गयी थी.

गेट खुलने के बाद सब अंदर चले गए. उनके पीछे मैं भी कार लॉक करके आ गया. घर के अंदर जैसे hi हम सब आये तो प्रिय पूजा का शोर गूजने लगा. वो दोनों बड़ा खुश थी. दोनों ने अपना अपना थैला पकड़ा और सीधा ऊपर की तरफ जाने के लिए सीढ़ियों की तरफ दौड़ पड़ी. उन्हें इस तरह भागते देख माँ ने कहा इन दोनों का क्या करू मैं.?

कुसुम दीदी सीधा अपने कमरे में चली गयी थी जबकि रचना थैलो को वही पर रख कर सोफे पर माँ के पास hi बैठ गयी थी. मैं माँ के सामने वाले सोफे पर बैठ गया था. मेरी नज़र रचना पर पड़ी तो उसने माँ की तरफ देखने के बाद मेरी तरफ देखा और जैसे hi हमारी नज़रे मिली तो उसके होठो पर हलकी सी मुस्कान उभर आयी.

"मैं सोच रहा हु माँ की यहाँ पर मैं एक छोटा सा गयम खोल लू. जिससे आप सब अपने आपको फिट रख सके." मैंने रचना की तरफ एक बार देखने के बाद माँ से ये कहा तो माँ ने कहा.

"ये तू क्या बोल रहा है beta...mujhe कुछ समझ नहीं आया.?" माँ ने ये कहा तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा.

"ारी मेरा मतलब ये है की आप सब लोग थोड़ा बहुत ब्यायाम या कसरत वगैरा करे जिससे शरीर फिट रहे. इस लिए उसके लिए ज़रूरी है की यहाँ पर एक छोटा सा गयम खोलू." मैंने ये कहा तो माँ ने हैरानी से मेरी तरफ देखा और फिर रचना की तरफ. रचना की तरफ देखने के बाद उनके होठो पर मुस्कान उभर आयी.

"अगर तू इसे देख कर ऐसा कह रहा है तो एक बात कान खोल कर सुन ले. ये इस तरह भी मुझे अच्छी लगती है और तुझे भी ये इसी तरह अच्छी लगनी चाहिए." माँ ने ये कहा तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा.

"बात अच्छी लगने या न लगने की नहीं है माँ. बात है फिट रहने की. ये सबके लिए hai..kisi एक के लिए नहीं है. इस लिए मैंने सोचा है की ऊपर वाले फ्लोर पर सामने की तरफ जो बड़ा सा हॉल है वह पर एक छोटा सा गयम बनाओ. शाम सुबह आधा एक घंटा गयम में कसरत करेंगे तो शरीर भी फिर रहेगा और तंदुरुस्ती भी आएगी." मैंने ये कहा तो माँ ने कहा.

"तुझे जो करना है कर और हाँ ज़्यादा फ़िज़ूल खर्ची मत करना." माँ ने ये कहा तो मैंने कहा.

"ठीक है माँ. जैसा आप कहेंगी वैसा hi करुगा मैं. मगर जिन चीज़ो की ज़रूरत है उसे तो लेना hi पड़ेगा न. जैसे अभी एक कार की ज़रूरत है. जहा मैं काम करता हु वह मैं कार से hi जाता था और वैसे भी यहाँ के हिसाब से इतना तो अपने पास होना hi चाहिए." मैंने ये कहा तो माँ ने कहा.

"ठीक है जैसा तुझे सही लगे वैसा कर. अच्छा मैं जा रही हु कमरे में. बड़ा थक गयी हु मैं. तू अपनी होने वाली जोरू के पास बैठा रह." माँ ये कहने के बाद सोफे से उठी और अपने कमरे की तरफ चली गयी. जबकि उनकी इस बात से मैं और रचना बस मुस्कुरा कर रह गए.

"मेरी होने वाली जोरू." माँ के जाने के बाद मैंने धीरे से ये कहा तो रचना ने शर्मा कर अपनी नज़रे नीची कर ली फिर बोली.

"हाँ तो क्या गलत कहा माँ जी ने.?" रचना ने ये कहा तो मैंने उसकी तरफ देखा फिर कहा.

"ारी तो मैंने ये कब कहा की माँ ने गलत कहा है.?" मैंने ये कहा तो रचना ने सर उठा कर मेरी तरफ देखा. उसके चेहरे पर हलके शर्म के भाव थे. उसका सुन्दर चेहरा मुझे अपनी तरफ आकर्षित करने लगा था. वो जिसम से मोती ज़रूर हो गयी थी मगर लगती एकदम क्यूट सी थी.

"तो तुम मेरी वजह से यहाँ पर गयम बनाना चाहते हो.?" रचना ने ये कहा तो मैंने कहा.

"अपने होने वाले पति से क्या ऐसे बात की जाती है.?" मैंने ये कहा तो रचना ने एकदम से कहा.

"गलती हो गयी पति देव. आप कृपया मुझे छमा करे. मुझे लगा की हम पहले जैसे दोस्त की तरह hi हैं." रचना ने ये कहा तो मैंने कहा.

"अगर दोस्त की तरह hi होते तो क्या हम पति पत्नी बनने जा रहे होते.?" मैंने ते कहा तो रचना ने कहा.

"हाँ ये भी सही कहा आपने." रचना ने बड़ी इज्जत दे कर ये कहा तो मुझे उसके इस अंदाज़ पर मन hi मन हसी आयी.

"मैं चाहता हु की तुम वैसी hi बन जाओ जैसे पहले थी. एक बिंदास और बेबाक लड़की जो किसी भी बात के लिए झिझकती नहीं थी और जिसमे चंचलता के साथ साथ शरारत कूट कूट कर भरी हुयी थी." मैंने ये कहा तो रचना ने सर उठा कर फिर से मेरी तरफ देखा.

"पति पत्नी का रिश्ता नाम के लिए hi रहेगा. जबकि हम तो एक दोस्त की तरह hi रहेंगे. मुझे वही नाज़ुक सी और शोख सी रचना चाहिए. अब ये तुम पर है की तुम मेरे लिए ऐसी बनती हो की नहीं." मैंने ये कहा तो रचना ने कहा.

"मैं ज़रूर बानगी विक्की. बस एक बार कह दो की तुम भी मुझसे बहुत प्यार करते हो." ये कहते हुए रचना की आँखों में आँशु के कतरे नज़र आये तो मैंने कहा.

"अगर मेरे कहने से hi तुम्हे यकीन होगा तो ठीक है कह देता हु. मैं ये तो नहीं कहता की मेरे दिल में तुम्हारे लिए बेपनाह प्यार है मगर ये सच है की अब मैं भी तुमसे बहुत प्यार करने लगा हु और ये प्यार बढ़ता hi जायेगा." मैंने ये कहा तो रचना की आँखों में मौजूद आँशु के कतरे छलक कर बाहर आ गए. रचना एकदम से सोफे से उठी और मेरे पास आ कर मुझसे लिपट गयी.

मैं समझ सकता था की इस वक्त वो भावनाओ में बाह रही है. खेर कुछ देर मुझसे लिपटे रहने के बाद रचना मुझसे अलग हुयी तो मैंने देखा उसकी आँखों से बहे आँशु उसके खूबसूरत गालो को भिगो चुके थे. मैंने खुद अपने हाथो से उसके गालो पर बाह आये आंशुओ को पोंछा और फिर झुक कर हलके से उसके गुलाब जैसे होठो को चूम लिया. मैंने जैसे hi उसके होठो को चूमा तो उसका जिसम कांप कर रह गया. वो एकदम से मुझसे अलग हुयी और मुझसे थोड़ा दूर हैट गयी.

"माँ जी ने या किसी और ने अगर देख लिया तो क्या कहेगे वो की कितनी बेशर्म हु मैं." रचना ने लाज से मुस्कुराते हुए धीरे से ये कहा तो मैंने मुस्कुरा कर कहा.

"अच्छा अगर ऐसी बात है तो चलो कमरे में चलते हैं." मैंने ये कहा तो रचना ने हैरानी से मेरी तरफ देखते हुए कहा.

"इरादा क्या है जनाब का.?" रचना ने ये कहा तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा.

"इरादा तो बड़ा नेक hi है माय डिअर और अगर अच्छे से पता करना है तो चलो कमरे में." मैंने ये कहा तो रचना ने आँखे फैलाते हुए कहा.

"न बाबा न मुझे नहीं जाना कमरे में. तुम तो पहले से बहुत ज़्यादा बदल गए हो. पहले तो मेरे बार बार कहने पर भी कुछ करने से झिझकते थे और ab...hey भगवन लगता है दिल्ली आ कर कुछ तो ऐसा हुआ है जिसकी वजह से तुम इतना बदल गए हो." रचना ने ये कहा तो मैं एक बार के लिए तो ये सोच कर हैरान रह गया की रचना कही मेरे मन की बात तो नहीं जान गयी. मगर फिर मुस्कुराते हुए बस यही कहा.

"सब वक्त वक्त की बात है रचना डार्लिंग. वक्त के साथ हर चीज़ में चंगेस आ जाते हैं." मैंने ये कहा तो रचना ने इस बार कुछ सोचते हुए कहा.

"मैं तुमसे कुछ कहना चाहती हु विक्की." रचना ने ये कहा तो मैंने कहा.

"हाँ तो कहो न." मैंने ये कहा तो रचना ने मेरी तरफ देखते हुए कहा.

"मैं चाहती हु की तुम सबसे पहले कुसुम दीदी से बात करो और उनकी नाराज़गी दूर करो." रचना ने ये कहा तो मैंने हैरानी से कहा.

"तुम ऐसा क्यों कह रही हो.? क्या उन्होंने तुमसे कुछ कहा है.?" मैंने धड़कते दिल से ये कहा तो रचना ने इंकार में सर हिलाते हुए कहा.

"उन्होंने मुझे कुछ नहीं कहा विक्की. बल्कि वो तो मुझसे बात hi नहीं करती हैं. मैं जानती हु की वो मुझे पसंद नहीं करती हैं मगर मुझे इसका बुरा नहीं लगता. मुझे माँ जी ने सब कुछ बता दिया था. इस लिए मुझे पता है की दीदी के मन में क्या है और वो क्या चाहती हैं. मेरी भी एक इच्छा ये है की तुम्हारी शादी सबसे पहले दीदी से hi हो. क्यों की तुम पर सबसे पहला हक़ उनका hi है. मुझे बहुत ख़ुशी होगी की उन्हें वो मिल जायेगा जिसकी उन्होंने जाने कबसे चाहत की हुयी है." रचना ने ये कहा तो मैंने कहा.

"ये इतना आसान नहीं है यार. खेर छोडो मैं तो वैसे भी उनसे बात करने की सोच hi रहा था. मगर मुझे भी तुमसे कुछ ज़रूरी बाते करनी हैं." मैंने ये कहा तो रचना ने कहा.

"कैसी ज़रूरी बाते.?" रचना ने ये पूछा तो मैंने कहा.

"वो बाते ऐसे यहाँ पर नहीं बतायी जा सकती. उसके लिए हमें कही बाहर चलना पड़ेगा." मैंने ये कहा तो रचना ने हैरानी से मेरी तरफ देखा.

"जैसा की तुम्हे माँ से सब कुछ पता चल hi चूका है तो अब तुम ये भी समझ सकती हो की मेरे जीवन में एक नहीं दो नहीं बल्कि चार चार लड़किया जुड़ने वाली हैं वो भी मेरी बीवी बन कर. तुम खुद सोचो रचना की क्या ये इतना आसान होता है.? दुनिया में इंसान से एक बीवी सम्हाली नहीं जाती जबकि यहाँ तो मुझे चार चार को सम्हालना पड़ेगा." मैंने ये कहा hi था की रचना ने बीच में टोकते हुए कहा.

"इसमें सम्हालने वाली बात कहा से आ गयी.? ये सब तो किस्मत और भाग्य की बात है. कौन जनता था की ऐसा कुछ हो जायेगा.? मैंने भी तो यही सोचा था की अगर मेरी तुमसे शादी हो जाएगी तो तुम सिर्फ मेरे hi रहोगे. मगर बाद में पता चला की तुम किसी एक के हो hi नहीं सकते. जिस दिन ये सब मुझे माँ जी ने बताया था उस दिन मुझे बहुत बड़ा झटका लगा था. मुझे यकीन नहीं हो रहा था की ऐसा भी हो सकता है. मगर फिर ये सोच कर सब कुछ स्वीकार कर लिया की ये सब प्रेम की वजह से hi तो हुआ है. तुम्हारी अपनी बहने तुमसे प्रेम करती हैं और तुम्हे अपना सब कुछ मानती हैं. इस प्रेम में उनका क्या बस चल सकता था.? मैं तो बस इसी बात से खुश हो गयी की कैसे भी सही तुम मुझे मिल तो रहे हो न. मैं तुम्हे हर तरह से प्यार करुँगी. मुझे ये पता है की किसी को किसी से बात लेने से प्रेम काम नहीं हो जाता है बल्कि वो और बढ़ता है. मैं नहीं जानती की कुसुम दीदी को मुझसे इतनी नफरत क्यों है मगर मेरे दिल में उनके लिए हमेशा प्यार और सम्मान hi रहेगा. मेरी बस यही इच्छा है की सबसे पहले उन्हें hi तुम मिलो और उनसे hi तुम्हारी शादी हो. मेरी शादी तुमसे सबसे आखिर में भी होगी तो मुझे कोई मलाल नहीं होगा." रचना ने ये सब कहा तो मैं कुछ देर तक सोचता रहा उसकी बातो के बारे में.

"हम सब कुसुम दीदी को चाहे जितना मन ले या चाहे जितना समझा ले मगर उन्हें जब तुम मनाओगे या समझाओगे तभी उन पर असर होगा विक्की. इस लिए मेरी तुमसे रिक्वेस्ट है की तुम दीदी को मन लो. वो हर पल गुमसुम गुमसुम रहती हैं तो मुझे उनके लिए बहुत दुःख लगता है." रचना ने ये कहा तो मैंने कहा.

"दुःख तो हम सबको लगता है रचना मगर प्रॉब्लम ये है की उन्होंने खुद को सबसे अलग कर रखा है. मुझे भी अपनी कसम दे कर अपने से दूर किया हुआ है. मगर अब और nahi....mujhse अब और बर्दास्त नहीं होगा. तुम्हे पता है rachna....bachpan से hi मेरा और दीदी का आपस में बहुत लगाव रहा है. वक्त ऐसे hi गुज़रता गया और मेरे दिल में उनकी मूर्ति बनती गयी. मैं हमेशा चाहता था की मेरी दीदी हर पल मेरे पास हो और मैं एकटक उनको देखता राहु. शुरू शुरू में जब मुझे अहसास हुआ की मुझे अपनी इस बहन से प्यार हो गया है तो मैं ये सोच कर अपने आपको कोस्टा की ये पाप है और मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए. मगर मैं अपने आपको या ये कहो की अपने दिल को समझा नहीं पाया. मैंने ये ज़रूर सोच लिया था की अपने इस प्यार को दीदी से कभी नहीं कहुगा. बस मन hi मन उनकी पूजा करता रहुगा. एक वक्त ऐसा भी आया जब मुझे ये लगने लगा की दीदी भी मुझसे प्यार करने लगी हैं. कसम से मेरे दिल को उस दिन बहुत ख़ुशी हुयी थी मगर जब ठन्डे दिमाग से सोचा तो दिल को ये सोच कर बेहद तकलीफ भी हुयी की क्या fayda...wo अगर मुझसे प्यार भी करने लगी हैं तो उसका क्या फायदा.? हमारा रिश्ता ऐसा है की अगर किसी को इस सबका पता चल गया तो क़यामत आ जाएगी. गांव समाज में जो बची हुयी इज्जत है वो भी मिटटी में मिल जाएगी. ब्राह्मण समाज को जब इस बात का पता चलेगा तो वो हम सबको उस गांव से निकाल देने में एक पल की भी देरी नहीं करेंगे. यही सब सोच कर दिल को बेहद तकलीफ हुयी. मैंने अपने कदम वापस खींचने की कोशिश की मगर नाकाम रहा. दीदी के लिए वो प्यार वो चाहत बढ़ती hi रही. उसी टाइम पिता जी ने मुझे घर से निकाल दिया. घर से बेघर हुआ तो महीनो तक कही ठिकाना नहीं मिला. उस समय ऐसा लगता था जैसे मेरा सब कुछ बर्बाद हो गया हो. मेरी चाहत मेरी ख़ुशी सब कुछ फ़ना हो गयी हो. मन में बस एक hi ख़याल आता था की अपनी जान दे दू. मगर मरना भी इतना आसान नहीं था. किस्मत में तो कुछ और hi होना लिखा था इस लिए ज़िंदा hi रहा. पांच सालो बाद जब वापस घर गया तो वह पर एक नया hi लेशन शुरू हो गया था." मैं ये सब बोलते बोलते एकदम से रुक गया. असल में मैं भावना में बहने लगा था और मेरी साँसे भारी हो गयी थी.

"खेर छोडो ये सब. अपने पांच सालो की दास्ताँ किसी दिन फुर्सत से बताउगा तुम्हे और उस दास्ताँ को बताना भी ज़रूरी है. क्यों की वो भी मेरी लाइफ का एक इम्पोर्टेन्ट हिस्सा है." मैंने ये कहा तो रचना बस मेरी तरफ देखती रही.

"अब तुम जाओ रचना और हाँ फ़िक्र मत करो. मेरा सबसे पहला काम दीदी को मानना hi होगा." मैंने ये कहा तो रचना के चेहरे पर ख़ुशी की चमक आ गयी. उसके बाद वो उठी और पास में hi रखे कपड़ो के थैलो को उठा कर अपने कमरे की तरफ चली गयी.

रचना के जाने के बाद मैं सोफे पर पीठ टिका कर लगभग लेट सा गया. अभी मैं लेता hi था की तभी मेरा मोबाइल बजा. मैंने पॉकेट से मोबाइल निकल कर उसकी स्क्रीन पर देखा. कॉल बीएड बनाने वाले मिस्त्री की थी. मैं कॉल पिक करके मोबाइल कान से लगाया तो उस तरफ से मिस्त्री ने कहा की वो घर के बाहर खड़ा है. उसकी ये बात सुन कर मैं जल्दी से सोफे से उठा और बाहर की तरफ चल दिया.

घर से बाहर आया तो देखा. एक टेम्पो खड़ा था और उसके पास hi मिस्त्री के साथ साथ तीन लोग और खड़े थे. मुझे बाहर आया देख मिस्त्री ने बताया की वो बीएड ले कर आया है. मैंने उससे कहा की बीएड को कमरे में सेट करना है. मेरी बात सुन कर वो अपने आदमियों से बीएड निकालने को बोलै.

कुछ hi देर में बीएड ऊपर मेरे कमरे में आ गया. उसके बाद मिस्त्री ने बीएड को सेट करना शुरू कर दिया. मैंने पूजा को आवाज़ दे कर उसे चाय बनाने के लिए कह दिया. नीचे से माँ भी आ गयी थी मेरे कमरे में. आधे घंटे बाद वो सब लोग चले गए. मैंने मिस्त्री को पहले hi बोल दिया था की बीएड फुल कम्पलीट चाहिए. बीएड के साथ साथ सब कुछ.

माँ मेरे कमरे में hi थी. मैंने उनसे कहा की मुझे दीदी से बात करना है इस लिए वो मेरे कमरे में hi रहे. माँ ने कहा ठीक है. उसके बाद मैं नीचे आ गया. रचना के कमरे के पास आ कर मैंने दरवाजे पर नॉक किया तो कुछ hi पालो में उसने दरवाज़ा खोला. जैसे hi दरवाज़ा खुला तो मैंने उससे कहा की वो ऊपर मेरे कमरे में माँ के पास चली जाये क्यों की मुझे यहाँ पर दीदी से अकेले में बात करना है. मेरी ये बात सुन कर रचना ख़ुशी ख़ुशी कमरे से निकल कर ऊपर मेरे कमरे की तरफ चली गयी.

नीचे अब कोई नहीं था. अब यहाँ पर मैं था और अपने कमरे में कुसुम दीदी. उनका कमरा दूसरी साइड था और मैं जनता था की दरवाज़ा अंदर से लॉक hi होगा. मैं उनके कमरे की तरफ बढ़ने लगा. मुझे एकदम से ऐसा महसूस हुआ जैसे साड़ी दुनिया में सन्नाटा छ गया हो और इस सन्नाटे में सिर्फ मेरे दिल के तेज़ तेज़ धड़कने की आवाज़ hi गूँज रही हो. मेरे मन में अनगिनत ख़याल उभरने लगे थे. दिमाग में एक सवाल कूद रहा था की क्या कुसुम दीदी मुझसे बात करने पर राज़ी होंगी या फिर वो मुझ पर गुस्सा हो जाएँगी और मुझे अपने कमरे से चले जाने को कह देंगी.

भाई लोग....

आज के लिए इतना hi....

रीड एन्जॉय & गिव योर फीडबैक....

कीप सपोर्टिंग & स्टे विथ....

:थैंक्यू:
 
सब कुछ जायज़ है....

अपडेट = 47


माँ मेरे कमरे में hi थी. मैंने उनसे कहा की मुझे दीदी से बात करना है इस लिए वो मेरे कमरे में hi रहे. माँ ने कहा ठीक है. उसके बाद मैं नीचे आ गया. रचना के कमरे के पास आ कर मैंने दरवाजे पर नॉक किया तो कुछ hi पालो में उसने दरवाज़ा खोला. जैसे hi दरवाज़ा खुला तो मैंने उससे कहा की वो ऊपर मेरे कमरे में माँ के पास चली जाये क्यों की मुझे यहाँ पर दीदी से अकेले में बात करना है. मेरी ये बात सुन कर रचना ख़ुशी ख़ुशी कमरे से निकल कर ऊपर मेरे कमरे की तरफ चली गयी.

नीचे अब कोई नहीं था. अब यहाँ पर मैं था और अपने कमरे में कुसुम दीदी. उनका कमरा दूसरी साइड था और मैं जनता था की दरवाज़ा अंदर से लॉक hi होगा. मैं उनके कमरे की तरफ बढ़ने लगा. मुझे एकदम से ऐसा महसूस हुआ जैसे साड़ी दुनिया में सन्नाटा छ गया हो और इस सन्नाटे में सिर्फ मेरे दिल के तेज़ तेज़ धड़कने की आवाज़ hi गूँज रही हो. मेरे मन में अनगिनत ख़याल उभरने लगे थे. दिमाग में एक सवाल कूद रहा था की क्या कुसुम दीदी मुझसे बात करने पर राज़ी होंगी या फिर वो मुझ पर गुस्सा हो जाएँगी और मुझे अपने कमरे से चले जाने को कह देंगी.

अब आगे पढ़िए....


मैं अपने दिल और दिमाग पर मचे हुए तूफ़ान को काबू करते हुए कुसुम दीदी के कमरे की तरफ बढ़ता चला गया. कुछ hi पालो में मैं कुसुम दीदी के कमरे के दरवाज़े के पास पहुंच गया. सबसे पहले मैंने एक बार फिर से अपने अंदर मची हुयी हलचल को शांत करने की कोशिश की उसके बाद मैंने अपने कांप रहे राइट हैंड से दरवाज़े को अंदर की तरफ धकेला.

मुझे उम्मीद थी की दरवाज़ा अंदर से लॉक होगा और मेरी उम्मीद सच hi निकली. मैंने दरवाज़े पर हलके हाथ से दो बार नॉक किया और दरवाज़ा खुलने का वेट करने लगा मगर दरवाज़ा न खुला. ये देख कर मेरे अंदर अजीब सी बेचैनी बढ़ने लगी. मैंने एक बार फिर से दरवाज़ा नॉक किया. मुझे लगा कही ऐसा तो नहीं की दीदी सो गयी हो. ऐसा हो भी सकता था मगर मेरा मूड बन चूका था की आज मुझे दीदी से खुल कर बात करना है.

तीसरी बार जब मैंने दरवाज़ा नॉक किया तो उसके कुछ देर बाद दरवाज़ा खुला. मेरे सामने दुनिया की सबसे सुन्दर और सबसे मासूम मेरी कुसुम दीदी नज़र आयी. उनकी आँखों से hi समझ आ गया की वो सो रही थी. दरवाज़े पर मुझे खड़ा देख कर उनके चेहरे पर से नींद से उठने के बाद की जो खुमारी रहती है वो एकदम से गायब हो गयी और उनकी आँखे थोड़ा सा फ़ैल गयी.

"Tu..tum यहाँ क्या कर रहे हो.?" दीदी ने एकदम से अपने आपको सम्हालते हुए थोड़ा कठोर आवाज़ में ये कहा तो मैंने बड़ी hi शालीनता से कहा.

"क्या मैं ये भी ख्वाहिश न करू की मैं जिसकी इबादत करता हु उसका जी भर के दीदार कर सकू.?" मैं ये कहते हुए एकदम से जज़्बात में बहने लग गया था. मुझे लग रहा था की मैं अपनी दीदी से लिपट जाओ और बिलख बिलख कर रोना शुरू कर दू.

उधर जब मैंने ऐसा कहा तो दीदी के चेहरे पर छाये कठोर भाव एकदम से गायब हुए मगर फिर जल्दी से वापस भी आ गए. जैसे उन्होंने अपने आपको कमज़ोर होने से बचा लिया हो और फिर से उसी कठोरता से मुझसे कहा.

"ये तुम क्या बकवास कर रहे हो.? मेरे पास तुम्हारी ये बकवास सुनने का वक्त नहीं है और न hi मैं तुम्हारी कोई बकवास सुन्ना चाहती हु. जाओ यहाँ से और खबरदार अगर अब दुबारा मेरे सामने भी आये. मैं तुम्हारी शकल भी नहीं देखना चाहती." कुसुम दीदी ने एकदम से गुस्सा हो के ये कहा तो मेरे दिल में इतना तेज़ दर्द उठा की लगा मैं उस दर्द को सहन नहीं कर पाउगा और उसी वक्त हार्ट अटैक से मर जाउगा. मेरी आँखों में पल भर में आँशु भर आये.

"अगर मुझसे इतनी hi ज़्यादा नफरत हो गयी है की अब आप मेरी शकल hi नहीं देखना चाहती तो ठीक है. आज के बाद अब कभी आपको मेरी ये शकल देखने को नहीं मिलेगी. एक आखिरी बात ज़रूर कहना चाहता हु की मैंने वो सब कभी नहीं चाहा जो मुझे बिना चाहे मिल गया hai...maine तो हमेशा उसी को चाहा है जो शायद अब मुझे मिल hi नहीं सकता." मैंने ये सब कहा और फिर एक पल के लिए भी नहीं रुका मैं.

मेरे दिल और दिमाग में एकदम से ऐसा दर्द और गुबार उठा था की मुझसे अब कुछ भी बर्दास्त नहीं हो प् रहा था. जिस दीदी को मैं अपनी जान से भी ज़्यादा चाहता हु उसके दिल में मेरे लिए कोई भाव कोई जगह नहीं थी. जिसका चेहरा देख कर hi मेरी सुबह सफल होती थी वो मुझसे इतना ज़्यादा नफरत करती थी की अब वो मेरी शकल तक नहीं देखना चाहती थी. मैं तेज़ तेज़ कदमो से चलते हुए घर से बाहर निकल गया. मेरे दिल और दिमाग में भीषण आग लग गयी थी. मुझे अब कुछ भी नहीं दिखाई दे रहा था. ऐसा लग रहा था इसी वक्त अपने आपको ख़तम कर लू.

बाहर आया तो मेरी नज़र रोड के किनारे पर कड़ी दक्षिणा की कार पर पड़ी. मैंने एक झटके से ड्राइविंग दूर खोला और ड्राइविंग शीट पर बैठ गया. पेंट की पॉकेट से चाभी निकाल कर मैंने कार को स्टार्ट किया और आगे बढ़ा दिया.

मैं नहीं जनता था की अब मैं कहा जा रहा हु. मेरे कानो में कुसुम दीदी की वो बाते गूँज रही थी जो मेरे कानो के पर्दो को फाड़े दे रही थी. मेरे हाथ कार की स्टेरिंग पर जैम गए और मेरा पेअर एक्सीलेटर पर.

कार की स्पीड एकदम से बढ़ गयी. ऐसा लगने लगा जैसे मैं कार रेसिंग करने लगा हु. मुझे नहीं पता की मैं कितने रेड लाइट्स को क्रॉस करता हुआ आगे बढ़ता गया. मैं किसी मोड़ पर मुद नहीं रहा था बल्कि एकदम सीधा hi कार को दौड़ाये जा रहा था. मेरे दिल और दिमाग में आँधिया सी चल रही थी और कानो में गूँज रही थी दीदी की वो बाते जो हर गुज़रते पल के साथ मेरी सोचने समझने की शक्ति को जाम करती जा रही थी.

एक एक सामने फ्लाईओवर आ गया और कार उस फ्लाईओवर पर चलने लगी. मुझे नहीं पता की कार की स्पीड कितनी तेज़ थी. मेरी आँखों के सामने कुछ भी नज़र नहीं आ रहा था. एक एक मुझे ऐसा लगने लगा जैसे चारो तरफ से वाहनों की कितनी साड़ी आवाज़े आने लगी हो और चारो तरफ कितना ज़्यादा चीखो पुकार मच गया हो और फिर......

एकदम से एक भयंकर झटका लगा कार में और कार के साथ साथ मुझे भी. मुझे कुछ समझ न आया की अचानक ये क्या हुआ. उसके बाद मुझे कुछ याद नहीं की उसके बाद क्या हुआ. शायद मेरा ज़बरदस्त एक्सीडेंट हो चूका था.

उधर घर में मेरे इस तरह चले जाने के बाद कुसुम दीदी कुछ पल तक देखती रही और जब मैं बाहर निकल गया तो एकदम से उनकी आँखों से आँशु छलक पड़े. उन्होंने जल्दी से कमरे का दरवाज़ा तेज़ी से बंद किया और पलट कर दौड़ते हुए बीएड की तरफ आयी और बीएड पर ओढ़े मुँह गिर पड़ी. वो बिलख बिलख रोने लगी थी.

कुछ देर रोने के बाद एकदम से उनका रोना बंद हो गया और वो बिजली की स्पीड से बीएड से उठी. उनके चेहरे पर चिंता और परेशानी नज़र आने लगी थी. वो बीएड से उतर कर दरवाज़े की तरफ भागी. दरवाज़े को एक झटके से खोल कर वो कमरे से बाहर आयी और फिर लगभग भागते हुए ड्रिंगरूम और फिर बाहर आ गयी. बाहर आ उन्होंने स्टील वाला गेट खोला और सड़क के दोनों तरफ देखने लगी. मगर मैं उन्हें कही नज़र न आया. वो पागलो की तरह कुछ देर तक इधर देखती रही फिर वो वापस मुड़ी और गेट बंद करके अंदर ड्रिंगरूम में आयी.

कुसुम दीदी पागलो की तरह ड्रिंगरूम में इधर उधर देखने लगी मगर आस पास उन्हें कोई नज़र न आया. ये देख कर उनके चेहरे पर एकदम से दुखो के भाव उभर आये और वो पूरी ताकत से चिल्लाने लगी. वो बार बार माँ का नाम ले रही थी. उनके चिल्लाने का असर जल्द hi हुआ और कुछ hi पालो में ऊपर से माँ और रचना भागती हुयी आती दिखी.

"क्या हुआ, इतना क्यों चिल्ला रही है तू.?" माँ ने आते hi कुसुम दीदी से ये कहा तो दीदी उन्हें देख कर कुछ बोल न सकीय और ekdàm से रोने लगी. उनके रोने पर किसी को कुछ समझ न आया.

माँ ने आगे बढ़ कर दीदी को सम्हाला और फिर थोड़ा नरम लहजे में उनसे पूछा की क्या बात है वो इस तरह रो क्यों रही है. क्या विक्की ने उसे कुछ उल्टा सीधा बोलै है.? माँ के पूछने पर दीदी ने इंकार में सर हिला दिया और रट हुए बोली की विक्की जाने कहा चला गया है.

कुसुम दीदी की इस बात से माँ को हैरानी हुयी. वो तो यही समझ रही थी की विक्की अपनी बहन से अकेले में बात करना चाहता था इस लिए उसने सबको ऊपर वाले कमरे में भेज दिया था. माँ ने दीदी से कहा की वो साफ़ साफ़ बताये की क्या हुआ है. माँ के ऐसा कहने पर कुसुम दीदी ने रट हुए सब कुछ बता दिया. उन्होंने बताया की कैसे उन्होंने विक्की को वो सब बाते कही थी जिसके बाद विक्की वो सब बोल कर घर से बाहर चला गया था.

कुसुम दीदी की साड़ी बात सुन कर माँ का चेहरा भी देखने लायक हो गया. माँ को समझते देर न लगी की ऐसी बातो से विक्की के दिल पर क्या गुज़री होगी और वो भावावेश में आ कर घर से निकल गया है. वो उस दुःख और दर्द में कोई भी उल्टा सीधा कदम उठा सकता है. ये सब सोच कर एकदम से माँ बुरी तरह घबरा गयी.

"ये तूने क्या किया कुसुम.? तू इतनी कठोर कैसे हो सकती है की अपने hi भाई को इतने ज़हर से बुझे शब्द बोल दे.? अगर मेरे बेटे को कुछ भी हुआ तो देख लेना मुझसे बुरा कोई नहीं होगा." माँ ने एकदम से गुस्से में ये कहा तो कुसुम दीदी और भी बुरी तरह रोने लगी.

"यहाँ हम में से किसी को कोई आपत्ति नहीं थी सिर्फ तुझे hi बुखार चढ़ा हुआ था. मैंने और तेरे पिता जी ने सिर्फ तुम्ही लोगो की ख़ुशी के लिए एक ऐसे रिश्ते को स्वीकार कर लिया था जो रिश्ता हर तरह से गलत था. मगर इसके बावजूद तुझे समझ नहीं आया. तुझे भी पता है की तेरा भाई तुझे कितना प्यार करता है. खेर छोड़ तुझसे ये सब कहने का क्या फायदा. तू सिर्फ अपने बारे में सोचती है और अपनी खुशियों के बारे में. तुझे दुसरो की खुशियों से कोई मतलब नहीं है." माँ पता नहीं क्या क्या और बोलती मगर तभी रचना ने आगे बढ़ कर माँ को चुप कराने की कोशिश की तो उन्होंने रचना की तरफ देखते हुए कहा.

"मेरा मन बहुत घबरा रहा है बेटी. मेरे बेटे को कही कुछ हो न जाये. जिस तरह की बाते इसने उससे कही हैं वो बाते उसके दिल को चीयर गयी होंगी और अब वो यहाँ से चला गया है. हे भगवन मेरे बेटे की रक्षा करना. उसे कुछ मत होने देना वर्ण मैं मर जाओगी." माँ ये सब कहते हुए रोने लगी. तभी उनकी नज़र कोने में बने संगेमरमर के मंदिर पर पड़ी. उसमे राधा कृष्ण की मूर्ती थी.

माँ भागते हुए उस मंदिर के पास आयी और घुटनो के बल बैठने के बाद उन्होंने हाथ जोड़ कर उनसे प्रार्थना करने लगी. वो रोटी जा रही थी और भगवन से प्रार्थना करती जा रही.

घर के अंदर कुछ hi पालो में ऐसा माहौल बन गया जैसे कोई मातम छ गया हो. प्रिय पूजा भी ऊपर से नीचे आ गयी थी और जब उनको सब कुछ पता चला तो वो दोनों भी रोने लगी थी. हर कोई दुःख से रोने में लगा हुआ था. किसी को इस बात का होश नहीं था की रोने से भला क्या होगा. अगर कुछ होगा भी तो वो विक्की का पता करने से होगा.

रचना की आँखों से भी आँशु बाह रहे थे मगर उसने अपने आपको सम्हाला और सबसे पहले उसने माँ को सम्हाला और उनसे कहा की भगवन पर भरोसा रखिये माँ. Unhe(Vicky) कुछ नहीं होगा. बड़ी मुश्किल से आखिर कुछ देर बाद हर कोई शांत हुआ. मगर सवाल था की विक्की का पता कैसे करे.

प्रिय पूजा ने कहा की विक्की को फ़ोन लगा कर पता करते हैं. उनकी बात सुन कर जैसे सब का मोबाइल फ़ोन की तरफ ध्यान गया. फिर क्या tha...pooja दौड़ती हुयी ऊपर गयी और अपने कमरे से अपना मोबाइल उठा लायी. उसने मोबाइल को अनलॉक करके जल्दी से विक्की को फ़ोन लगाया मगर फ़ोन बंद बता रहा था.

विक्की का मोबाइल बंद बता रहा था. ये जान कर सबकी हालत फिर से खराब होने लगी. ये सब लोग इस शहर से अनजान थे. उनमे से किसी को भी इस शहर के बारे में कुछ भी पता नहीं था. वो अगर विक्की को कही तालाश करने का सोचते भी तो सबसे पहले उनके सामने ये सवाल खड़ा हो जाता की विक्की को तलाश करने के लिए वो जाये भी तो कहा.?

प्रिय पूजा विक्की के मोबाइल पर फ़ोन करती hi रही मगर फ़ोन बंद hi बताता रहा. हर गुज़रते पल के साथ सबकी हालत खराब होती जा रही थी. सबसे बुरा हाल माँ और कुसुम का था. माँ कुसुम को बीच बीच में कुछ न कुछ उल्टा सीधा बोल hi देती थी जिससे उसकी हालत और भी खराब हो जाती थी. ऐसे hi सारा दिन गुज़र गया और शाम हो गयी मगर न तो विक्की वापस घर आया और न hi उसका फ़ोन लगा. सबके मन में जिन बातो की शंकाये थी वो हकीकत में बदलती नज़र आने लगी थी. जिससे उन सब की हालत बाद से बदतर होती जा रही थी.

शाम से रात और रात से सुबह हो गयी मगर सिचुएशन जैसी की तैसी hi बानी रह गयी थी. माँ की हालत तो बहुत खराब हो गयी थी रो रो कर. चेहरे से hi ऐसा लग रहा था जैसे वो बर्षो की बीमार हो. हालत तो सबकी hi खराब थी मगर कोई कर भी क्या सकता था.?

सुबह हुयी तो माँ एक झटके से उठ कड़ी हुयी और पागलो की तरह कहने लगी की वो अपने बेटे को इस शहर में खुद ढूढ़ने जाएगी. माँ के ऐसा कहने पर रचना उन्हें रोकने लगी तो उसने इस बार उसे भी डाट दिया गुस्से में. वो अब किसी की सुनने को राज़ी नहीं थी. माँ का पागलपन देख कर हर कोई दुखी और परेशां हो गया. प्रिय पूजा और रचना ने बड़ी मुश्किल से उनको समझाया और रोका.

तभी पूजा के मोबाइल की रिंगटोन बजी. उसने जल्दी से मोबाइल निकाल कर स्क्रीन पर देखा तो उसके चेहरे पर ख़ुशी की चमक आ गयी. उसने एकदम से चीखते हुए सबको बताया की विक्की का कॉल है. उसकी ये बात सुन कर सबके मुरझाये चेहरों पर जैसे बहार ने दस्तक दे दी. माँ ने तो झपट कर पूजा से मोबाइल छीन लिया और उसको कानो से लगा कर विक्की मेरे बेटे कहा है तू चिल्लाने लगी. मगर मोबाइल पर रिंगटोन hi बजती रही.

असल में माँ ने कॉल को पिक नहीं किया था बल्कि ऐसे hi कान से लगा लिया था. पूजा ने आगे बढ़ कर माँ से कहा की पहले कॉल तो उठाओ माँ. उसकी बात सुन कर माँ ने जल्दी से कांपते हाथ से हरा वाला बटन दबाया और फिर जल्दी से मोबाइल कान से लगा लिया. अभी उसने कान से लगाया hi था की उसके कान में किसी दूसरे आदमी की आवाज़ पड़ी जिसे सुन कर वो चौंक पड़ी और फिर उस आदमी ने जो कहा उसे सुन कर तो माँ के हाथ से मोबाइल hi छूट गया.

सब माँ को hi देख रहे थे. माँ की अचानक हुयी इस हालत को देख कर सब लोग सकते में आ गए. उधर रचना ने फर्श पर गिरे मोबाइल को उठा कर जल्दी से अपने कान में लगाया. शुक्र था की कॉल कट नहीं हुयी थी.

"Hello." रचना ने ये कहा hi था की उसके कान में एक आदमी की जो आवाज़ और जो बाते पड़ी उसे सुन कर रचना एकदम से सुन्न पद गयी. उसे होश तब आया जब कॉल कट हो गयी.

जैसे hi रचना ने मोबाइल को कान से हटाया तो माँ और बाकी सब उससे पूछने लगे की क्या बात हुयी. उन सबके पूछने पर रचना ने बड़ी मुश्किल से बताया की विक्की का एक्सीडेंट हो गया था और इस वक्त वो हॉस्पिटल में हैं. फ़ोन पर जो बात कर रहा था वो कोई पुलिस वाला था और उसने कहा की हम लोग जल्द से जल्द उस हॉस्पिटल में आ जाये.

रचना की ये बात सुन कर सबके ऊपर जैसे आसमान गिर पड़ा था. माँ तो दहाड़े मार मार कर फिर से रोने लगी. उनकी नज़र कुसुम पर पड़ी तो उनके चेहरे पर बहुत hi खतरनाक भाव उभर आये. वो कुसुम दीदी के पास गयी और चीखते हुए बोली.

"अब सुकून मिल गया न तुझे.? तेरी वजह से मेरे बेटे का एक्सीडेंट हुआ और वो इस वक्त हॉस्पिटल में है. भगवन जाने वो किस हाल में होगा. अगर मेरे बेटे को कुछ हुआ तो मैं अपने हाथो से तेरा गाला काटूगी सोच लेना." माँ ने ये कहा और पलट कर सबसे कहा की जल्दी से हॉस्पिटल चलो.

कुसुम दीदी तो किसी सदमे में थी. उन पर माँ की बात का क्या असर हुआ ये पता करना मुश्किल था. रचना ने जब देखा की माँ दरवाज़े की तरफ जाने लगी हैं तो उसने जल्दी से कुसुम को झकझोर कर हिलाया तब जा कर उसे होश आया. उसके बाद रचना ने उनसे कहा की हमें हॉस्पिटल चलना है. रचना की इस बात से कुसुम कहने लगी की वो कही नहीं जाएगी बल्कि यही रहेगी. उसकी वजह से उसके भाई ने अपनी ये हालत की है तो अब वो उसे खुद अपनी मनहूस शकल नहीं दिखाएगी.

कुसुम की बाते बड़ी अजीब सी थी. रचना को लगा की कही ये अपने आपको कुछ कर न बैठे. इस लिए उसने ज़बरदस्ती कुसुम को उठाया और अपने साथ ले जाने लगी. अभी सब लोग दरवाज़े के पास hi पहुंचे थे की तभी दुर्बल बजी. माँ ने जब दरवाज़ा खोला तो बाहर एक अनजान औरत को खड़े देखा तो बाकी सबके चेहरों पर भी अजनबियत के भाव उभर आये. ये औरत कोई और नहीं बल्कि दक्षिणा hi थी मगर ये लोग उसे नहीं जानते थे.

पुलिस वाले ने सबसे पहले दक्षिणा को hi कॉल किया था विक्की के फ़ोन से. उसने दक्षिणा को साड़ी बात बतायी तो दक्षिणा ने उस पुलिस वाले से ये कहा की वो विक्की की रिश्तेदार है. विक्की के अपने रिलेशन वालो के बारे में भी उसी ने पुलिस वाले को बताया था. पुलिस वाले ने उससे कहा की वो मोबाइल में चेक करके उन्हें फ़ोन लगाएगा.

विक्की के एक्सीडेंट की खबर से दक्षिणा का भी बुरा हाल हो गया था. उसे समझ नहीं आया था की ये सब कैसे हुआ था. उसे ये बात पता थी की विक्की बहुत क्लीन ड्राइविंग करता था. फिर ऐसा क्या हुआ की उसका इतना बड़ा एक्सीडेंट हुआ. दक्षिणा को लगा इस एक्सीडेंट के पीछे कुछ तो वजह हो hi सकती है.

दक्षिणा से बात करने के बाद पुलिस वाले ने मोबाइल ने पूजा नाम से नंबर देखा तो उसे लगाया था. इधर दक्षिणा ने सोचा की विक्की के फॅमिली मेंबर्स इस शहर में नए हैं. वो इस खबर से बहुत दुखी हो जायेगे और कैसे विक्की तक पहुचेगे.? इस लिए उसने सोचा की वो खुद विक्की के घर जाएगी और सबको ले कर हॉस्पिटल जाएगी. अगर किसी ने उससे पूछा की वो विक्की को कैसे जानती है तो वो कोई न कोई बहाना बता देगी. इस वक्त ज़रूरी ये था की वो सबको ले कर हॉस्पिटल जाये. उसे ये भी पता था की हॉस्पिटल में खर्चा पानी भी लगेगा जो की इस वक्त विक्की की फॅमिली कैसे दे सकती थी.

"आप कौन हैं और यहाँ आप किस काम से आयी हैं.?" रचना ने माँ के पीछे से निकल कर दक्षिणा से ये कहा तो दक्षिणा ने थोड़ा असहज भाव से कहा.

"देखिये मैं कौन हु ये तो बाद में भी पता चल जायेगा मगर इस वक्त आप सबका मेरे साथ चलना बहुत ज़रूरी है." दक्षिणा ने ये कहा तो सब हैरान रह गए.

"क्या मतलब है आपका.?" दक्षिणा की बात सुन कर इस बार माँ ने ये कहा तो दक्षिणा ने कहा.

"आप सबको हॉस्पिटल जाना है न.? मैं भी वही जा रही हु. आप सब अभी यहाँ पर नए हैं इस लिए आप लोगो को क्या पता की कहा है हॉस्पिटल.?" दक्षिणा ने अभी ये कहा hi था की माँ ने फिर कहा.

"क्या उसी हॉस्पिटल जा रही हो जहा मेरा बीटा है.?" माँ ने जल्दी से ये कहा तो दक्षिणा ने हाँ में सर हिलाया. फिर क्या था माँ और बाकी सब भी दक्षिणा के साथ बाहर आये और सड़क किनारे कड़ी एक टैक्सी में सब बैठ गए. टैक्सी में बैठते hi दक्षिणा ने टैक्सी ड्राइवर को हॉस्पिटल का नाम बताया तो ड्राइवर चल पड़ा.

टैक्सी के अंदर सन्नाटा छाया हुआ था. दक्षिणा विक्की के लिए अंदर से दुखी थी मगर इस वक्त वो उस दुःख को ज़ाहिर नहीं कर रही थी. बीस मिनट बाद टैक्सी एक हॉस्पिटल के सामने रुकी तो सब लोग टैक्सी से बाहर निकले. दक्षिणा ने टैक्सी वाले को उसका भाड़ा दिया और फिर सबको ले के हॉस्पिटल की तरफ बढ़ चली.

रास्ते में दक्षिणा ने अपने मोबाइल से किसी से बात की थी. हॉस्पिटल के अंदर जैसे hi ये सब पहुंचे तो सामने से एक पुलिस वाला आता नज़र आया. उसे देख कर दक्षिणा ने हाथ को हवा में उठा कर इशारा किया तो वो पुलिस वाला दक्षिणा के पास hi आ गया.

"अगर मैं गलत नहीं तो आप मरस दक्षिणा हैं.?" पुलिस वाले ने ये कहा तो दक्षिणा ने हाँ में सर हिलाया और फिर उसने माँ और बाकी सबकी तरफ इशारा करते हुए कहा.

"ये सब उसकी फॅमिली वाले हैं." दक्षिणा ने ये कहा तो पुलिस वाले ने माँ और बाकी सबकी तरफ देखा फिर कहा.

"बाकी सब तो मैंने आपसे बता hi दिया था. डॉ ने बताया की अभी उसे होश नहीं आया है." पुलिस वाले ये कहा hi था की माँ एकदम से पागलो की तरह पुलिस वाले से कहने लगी.

"क्या हुआ है मेरे बेटे को. कैसा है मेरा बीटा. मुझे उसके पास जाना है." माँ ने ये कहा तो पुलिस वाले ने बड़ी इज्जत से कहा.

"माँ जी फ़िक्र करने की अब कोई बात नहीं है. डॉ ने बताया की एक्सीडेंट बड़ा ज़रूर था मगर भगवन की दया से आपके बेटे को ज़्यादा छोटे नहीं लगी." पुलिस वाले ने ये कहा तो माँ ने कहा.

"अगर ऐसा hi है तो फिर मेरा बीटा होश में क्यों नहीं है.? देखो मुझे उसके पास ले चलो. मैं उसे अपनी आँखों से देखना चाहती हु." माँ ये कहते हुए रोने लगी तो पुलिस वाले ने बाकी सबकी तरफ देखा फिर कहा.

"अच्छा ठीक है. मैं डॉ से बात करता हु. आप सब आइये मेरे साथ." पुलिस वाले ने ये कहा और पलट कर चल दिया. उसके पीछे पीछे बाकी सब भी चल दिए. थोड़ी hi देर में वो पुलिस वाला एक डॉ को देख कर उसे आवाज़ दिया और उसके पास जा कर खड़ा हुआ.

"वो अभी खतरे से बाहर हैं इंस्पेक्टर साहब. वो जैसे hi होश में आएंगे हम सबसे पहले आपको hi सूचित करेंगे." डॉ ने ये कहा तो पुलिस वाले ने कहा.

"वो सब तो ठीक है डॉ. ये उस आदमी की माँ हैं. ये उसे एक बार देखना चाहती हैं तो प्ल्ज़ आप एक बार इनकी तसल्ली के लिए दिखा दीजिये." पुलिस वाले ने ये कहा तो डॉ ने माँ और बाकी सबकी तरफ देखा फिर बोलै.

"ोकक fine...plz के." डॉ ने ये कहा और एक तरफ को बढ़ गया. उसके पीछे बाकी सब भी चल दिए. कुछ hi देर में डॉ एक कमरे के पास रुका. कमरा बंद था और दरवाजे के ऊपरी हिस्से पर कांच लगा हुआ था. डॉ ने सबकी तरफ देखने के बाद बोलै आप सब यही से देख सकते हैं उन्हें.

डॉ की बात सुन कर माँ सबसे पहले दरवाज़े की तरफ लपकी. दरवाज़े पर ऊपर लगे कांच से कमरे के अंदर की तरफ उसने देखा. अंदर कमरे में बीएड पर पड़े अपने बेटे पर जब उनकी नज़र पड़ी तो उनकी आँखों से आँशु बहने लगे. कलेजा हिल कर रह गया उनका. कमरे के अंदर मैं सीधा लेता हुआ था और मेरे हाथ पेअर और पुरे सर पर सफ़ेद पत्तिया बढ़ी हुयी थी. मुझे इस हालत में देख कर माँ का बुरा हाल हो गया था.

माँ ज़्यादा देर तक मुझे इस हालत में देख न सकीय और वो दरवाज़े से हैट गयी. दो कदम पीछे हैट कर वो बुरी तरह रोने लगी थी. डॉ ने उन्हें समझाया की फ़िक्र की कोई बात नहीं है. ये तो भगवन का शुक्र है की इतने बड़े एक्सीडेंट के बाद भी आपके बेटे को कुछ नहीं हुआ. कुछ छोटे ज़रूर हैं मगर वो ठीक हो जाएगी.

बारी बारी से सबने उस कांच से झाँक कर मुझे देखा. जब सबने मुझे देख लिया तो डॉ ने सबको उस जगह से जाने के लिए कह दिया. उसके बाद पुलिस वाला सबको ले कर वेटिंग रूम की तरफ आ गया.

माँ उस पुलिस वाले से सब कुछ पूछने लगी. उस पुलिस वाले ने बताया की कल ये एक्सीडेंट फ्लाईओवर के नीचे हुआ था. असल में ये आदमी सरे रेड लाइट्स सिग्नल को तोड़ते हुए कार उड़ाए ले जा रहा था. उसके पीछे ट्रैफिक पुलिस भी लगी हुयी थी. मगर ये कार इतनी तेज़ चला रहा था की कोई उस तक पहुंच hi नहीं प् रहा था. कण्ट्रोल रूम से कॉल आयी तो हम भी इसके पीछे लग गए. फ्लाईओवर से उतरने के कुछ देर बाद जब एक और फ्लाईओवर आया तो इसने कार को ऊपर चढाने की बजाय उसकी रेलिंग में थोक दिया. स्पीड इतनी तेज़ थी रेलिंग तो टूटी hi साथ hi इसकी कार भी कलाबाज़ियां खाती हुयी नीचे वाली सड़क की तरफ ulat'ti चली गयी. जब तक हम लोग पहुंचे तब तक बहुत कुछ हो गया था. खेर हमने किसी तरह इसे एम्बुलेंस में दाल कर यहाँ हॉस्पिटल भिजवाया. इसके मोबाइल फ़ोन की स्क्रीन टूट गयी थी. हमने सिम के द्वारा इसके अपनों के बारे में पता करना चाहा मगर सिम में कोई नंबर सेव नहीं थे. सरे नंबर फ़ोन में सेव थे उस लिए हमने इसके मोबाइल को बनवाने के लिए भेज दिया और जब इसका मोबाइल बन गया तो आप लोगो को कॉल किया." पुलिस वाले की बाते सुन कर सब िस्तब्ध थे.

अभी सब लोग पुलिस वाले की बाते hi सुन रहे थे की तभी रचना का ध्यान कुसुम की तरफ गया. कुसुम अपनी जगह से गायब थी. पता नहीं कब वो उठ कर बाहर चली गयी थी और किसी को पता भी नहीं चल पाया था. ये देख कर रचना बुरी तरह घबरा गयी. उसने लगभग चीखते हुए माँ से कहा की कुसुम दीदी यहाँ नहीं हैं. रचना की इस बात से सब कोई दांग रह गया. तभी माँ ने कहा की उसे जहा जाना है जाने दो. मुझे उससे अब कोई मतलब नहीं है. उसी की वजह से मेरे बेटे की आज ये हालत हुयी है.

माँ की ये बाते सुन कर सब अवाक रह गए. कोई माँ अपनी बेटी के लिए ऐसा कैसे कह सकती थी.? दक्षिणा जल्दी से उठी और वेटिंग रूम के बाहर की तरफ तेज़ी से बढ़ चली. उसके पीछे पुलिस वाला भी चल पड़ा था. उन दोनों ले जाते hi प्रिय भी तेज़ी से बाहर की तरफ बढ़ गयी थी. जबकि रचना और पूजा माँ के पास उनको सम्हालने के लिए बैठी रही.

भाई लोग....

आज के लिए इतना hi....

रीड एन्जॉय & गिव योर फीडबैक....

कीप सपोर्टिंग & स्टे विथ....

:थैंक्यू:
 
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