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SANJU ( V. R. ) भाई मैं आपकी पीड़ा को समझता हूँ l केवल आप ही नहीं मेरे हर एक पाठक को वीर और अनु से खासा लगाव हो गया था l पर यह कहानी है इसके हर आयाम में मैंने सारे रंग भरने की कोशिश की है l आप जैसे प्रतिक्रिया शील विश्लेषक मेरा ना सिर्फ मार्ग दर्शन की है बल्कि लिखने में मेरा मार्ग प्रशस्त भी किया है l जैसा कि मैंने पहले भी उल्लेख किया है यह कहानी मैंने खेल खेल में शुरु किया था l केवल विश्व और भैरव सिंह ही मेरे जेहन में थे l कहानी में धीरे धीरे पात्र जुड़ते चले गए और कहानी इस मोड़ तक पहुँच गया है l आप को शायद विश्वास ना हो पर सच्चाइ यह है कि इसमें वैदेही का चरित्र था ही नहीं l पर कहानी के धारा में उसका चरित्र आया, वीर और विक्रम थे ही नहीं, पर कहानी के धारा में वह भी आए l कहानी इसलिए काफ़ी लंबी हो गई l मैंने कोशिश यही की है के चाहे कुछ भी हो जाए कहानी का मूल भावना से ना भटके l अब आपके पीड़ा भरे मन को शांत करने के लिए इतना ज़रूर कहूँगा के एक सुंदर प्रेम कहानी लिखूँगा, अवश्य लिखूँगा l इसलिए चलिए इस कहानी को अंजाम तक पहुँचा देते हैं l
साभार के साथ आभार व्यक्त कर रहा हूँ
धन्यवाद
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