Thriller "विश्वरूप" ( completed ) - Page 8 - SexBaba
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Thriller "विश्वरूप" ( completed )

👉एक सौ बयालीसवां अपडेट

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क्षेत्रपाल महल

नागेंद्र के कमरे में एक मेडिकल बेड लगा हुआ है l डॉक्टर्स और नर्सेस अपने काम में लगे हुए हैं l बेड के पास एक चेयर पर भैरव सिंह बैठा हुआ है और बेड के सिरहाने पर सुषमा खड़ी हुई है l कमरे में भीमा और बल्लभ भी दरवाजे के पास खड़े हैं l एक सैलाईन बोतल स्टैंड पर लगा कर नागेंद्र के कलाई पर ड्रिप लगा देता है, उसके बाद डॉक्टर नागेंद्र को एक इंजेक्शन देता है और फिर भैरव सिंह के पास आकर कहता है

डॉक्टर - राजा साहब... उम्र का तकाजा है... इस पड़ाव पर... लाइट फ़ूड खाना सेहत के लिए ठीक होता है... बड़े राजा जी को... बदहजमी के वज़ह से उल्टी और गैस हो गई थी... हमने इंजेक्शन दे दिया है... अब फिक्र करने की कोई जरूरत नहीं है....

भैरव सिंह - (ताली बजाता है, कुछ नौकर दौड़कर आते हैं) जाओ... डॉक्टर और उनकी टीम को छोड़ कर आओ... (सुषमा से) छोटी रानी... इनकी जितनी भी फीस बनती है... इन्हें दे दीजिए...

डॉक्टर - यह फीस की क्या बात कर रहे हैं राजा साहब... हम तो आपकी प्रजा हैं... बड़े राजा जी की सेवा... बड़े भाग्य से मिला है... हम भाग्य को पैसों से कैसे तोल सकते हैं...

भैरव सिंह - यह क्या कह रहे हो डॉक्टर... आपने सर्विस दी है...

बल्लभ - राजा साहब... जैसी जिसकी भावना... भावना अगर नेक हो... तो उसका सम्मान तो होनी ही चाहिए...

भैरव सिंह - ठीक कहते हो प्रधान... (भीमा की ओर देख कर) भीमा... जाओ इन्हें हमारी गाड़ी से छोड़ आओ...

सारे मेडिकल स्टाफ़ झुक कर नमस्कार करते हैं और भीमा के साथ बाहर चले जाते हैं l भैरव सिंह एक नजर सुषमा को देखता है, सुषमा समझ जाती है और अपना सिर पर घूंघट ला कर सिर हिला कर कमरे में ठहर कर नागेंद्र की सेवा करने की हामी भरती है l उसके बाद उस उस कमरे से पहले भैरव सिंह निकलता है और उसके पीछे पीछे बल्लभ l दोनों महल के लंबे से गलियारे में पहुंचते हैं l बल्लभ भैरव सिंह से अपनी घुटी जुबान से पूछता है

बल्लभ - राजा साहब.. राजगड़ हो या यशपुर... आप फीस देना चाहें तो भी कोई फीस लेने की हिम्मत आज तक किया नहीं है... यह जानते हुए भी... आप उन्हें फीस क्यों ऑफर कर रहे थे...

भैरव सिंह - (कुछ सोच में खोया खोया सा था, उसी खोए खोए अंदाज में) कुछ नहीं... चांद सुरज में ग्रहण अक्सर लगते हैं... कहीं क्षेत्रपाल के रुआब में ग्रहण तो नहीं लग रहा... यही चेक कर रहे थे...

बल्लभ - ऐसा क्यूँ राजा साहब... लगता है... कोई चिंता का विषय है...

भैरव सिंह - खास तो नहीं है... पर... क्या हम... उसे खास ना समझ कर नजर अंदाज कर... गलती तो नहीं कर रहे हैं...

बल्लभ - ओ.. समझ गया... शायद आप विश्वा... (बल्लभ आगे कुछ कहता नहीं है)

भैरव सिंह - प्रधान बाबु... मत भूलें... आप कौन हैँ... क्षेत्रपाल से दोस्ती या दुश्मनी करने के लिए... क्षेत्रपाल के बराबर का कद होना चाहिए... विश्वा जैसे आदमी के लिए सोच कर... हम समय और शक्ति दोनों का नष्ट नहीं करना चाहते...

बल्लभ - (थोड़ा खरासते हुए) हम भी यही मानते हैं... जानते हैं... पर समय के चिलमन में क्या छुपा है... कौन जाने...

भैरव सिंह - हमारी उम्र जरुर ढल रही है प्रधान... पर आज भी हमारी सोच वैसी की वैसी ही है... रुआब और पैसों के आगे हम किसीके लिए... दिल में कोई दयामाया नहीं पालते...

बल्लभ - हम भी यही कह रहे हैं... आप अपनी रबाब से नीचे ना सोचें... विश्व जैसों के लिए सोचने के लिए... आपने हम जैसे लोग पाल रखे हैं..

भैरव सिंह - हाँ अब वही लोग... एक एक करके नाकारा साबित हो रहे हैं...

बल्लभ - ऐसा अभी क्या हो गया है राजा साहब...

भैरव सिंह - प्रधान... हमने विश्व के पीछे... रोणा को छोड़ा था... पर अब... रोणा गायब हो गया है... कोई खबर ही नहीं है... पता नहीं कहीं... मर मरा तो नहीं गया...

बल्लभ - नहीं... राजा साहब... वह जिंदा जरूर है... विश्वा को दबोचने के लिए... आड़े हाथ लेने के लिए... जरुर कोई तिकड़म भीड़ा रहा होगा...

भैरव सिंह - पुरी बात बताओ प्रधान... विश्वा... जिसकी सिर को अपने जुते की बराबर की ऊँचाई पर रखे थे... अब लगता है या तो वह अपना कद बढ़ा रहा है... या फिर... हमें हमारी कद से नीचे की ओर खिंच रहा है... रोणा को विश्व के पीछे छोड़ा था... पर पता नहीं क्या हुआ... उसकी कोई खबर नहीं है... फोन भी स्विच ऑफ आ रहा है...

बल्लभ - राजा साहब... विश्वा... लगता है शायद उसके ऊपर भारी पड़ा... इस कदर भारी पड़ा के... शर्म और जिल्लत के मारे... अब मुहँ छुपाये कहीं छिप गया है... इंडेफिनाइट छुट्टी की एप्लिकेशन डाल कर चला गया है... उधर भुवनेश्वर में श्रीधर परीड़ा... भी गायब हो गया है...

भैरव सिंह - ह्म्म्म्म... इसका मतलब यह हुआ... की विश्वा अपना दायरा फैला रहा है... ताकि हमारे दायरे को काट सके...

बल्लभ - बात वहाँ तक नहीं आएगी... हम आने ही नहीं देंगे...

भैरव सिंह - वह तो देखा जाएगा... फिलहाल... हम अपने घर के सदस्यों के बारे में सोच रहे हैं...

बल्लभ - राजकुमार के बारे में...

भैरव सिंह - ह्म्म्म्म....

बल्लभ - समझ सकता हूँ... युवराज के मना करने के बाद... आपने राजकुमार को राजनीति में युवा चेहरा बना कर सामने लाने की कोशिश की गई... पर राजकुमार जी के उस लड़की के साथ... (चुप हो जाता है)

भैरव सिंह - कहो प्रधान कहो... चुप क्यूँ हो गए... राजकुमार ने हमारी सारे प्लान पर पानी फ़ेर दिया... वज़ह... वह दो कौड़ी की लड़की... और जब तक वह लड़की उसके साथ है... राजकुमार वापस नहीं आयेंगे...

बल्लभ - छोटे राजा जी भी तो अभी नहीं आए हैं... उन्हें अब राजगड़ आ जाना चाहिए... भुवनेश्वर में पता नहीं क्या कर रहे हैं...

भैरव सिंह - नहीं भुवनेश्वर में उनका काम बाकी है... जब तक काम ख़तम ना हो जाए... तब तक... छोटे राजा जी राजगड़ नहीं आयेंगे...

बल्लभ - क्या आप... उस बाबत भुवनेश्वर जाएंगे...

भैरव सिंह - नहीं... फ़िलहाल.. नहीं... हम यहाँ अपनी किला को मजबूत करेंगे... ताकि कोई दुश्मन राजगड़ में हमारे खिलाफ कोई किलाबंदी ना कर सके...

बल्लभ - क्या हम युवराज जी से संपर्क करें...

भैरव सिंह - प्रधान... बेटा अपने पैर में बाप का जुता पहनता है... बाप बेटे का जुता नहीं पहनता...

बल्लभ - क्षमा चाहते हैं... फिर राजकुमार कैसे वापस आयेंगे...

भैरव सिंह - हमने छोटे राजा जी को कह रखा है... उनके बारे में... छोटे राजा जी ज़रूर कुछ ना कुछ सोच रहे होंगे....

थोड़ी देर के लिए दोनों के बीच एक चुप्पी पसर जाती है l दोनों यूँही चले जा रहे थे l कुछ देर बाद बाद भैरव सिंह कहता है

भैरव सिंह - प्रधान...

बल्लभ - जी राजा साहब...

भैरव सिंह - तुम्हें क्या लगता है...

बल्लभ - जी... मैं कुछ समझा नहीं...

भैरव सिंह - (एक गहरी साँस छोड़ते हुए) देखो... कितना शांत वातावरण है... इतना शांत... के... कहीं दुर बहती नदी की कल कल शब्द यहाँ तक सुनाई दे रही है...

बल्लभ - (चुप रहता है)

भैरव सिंह - वातावरण इतना शांत कब होता है प्रधान...

बल्लभ - (हकलाते हुए) न न.. नहीं जानता राजा साहब...

तभी भीमा इन दोनों के पास आ पहुँचता है और चुपचाप सिर झुकाए खड़ा हो जाता है l

भैरव सिंह - प्रधान... इतनी खामोशी किसी आने वाले तूफान का इशारा है... तुम अब हर कोने में... हर हिस्से में... अपनी पैनी नजर घुमाओ... अपना कान लगाओ... हमारे अंदर से एक वाईव सा आ रहा है... कहीं ना कहीं... कुछ ना कुछ.. हो रहा है... पर क्या... हमें बहुत सतर्क रहना होगा... और भीमा तुम...

भीमा - जी हुकुम...

भैरव सिंह - कुछ दिनों के लिए... आखेट परिसर के... मगरमच्छों को और लकड़बग्घों को भूखा रखो...

भीमा - जी हुकुम...

भैरव सिंह - लगता है... बहुत जल्द उन्हें इंसानी गोश्त मिलने वाली है...

भीमा हैरानी भरे नजरों से बल्लभ की ओर देखता है l वैसा ही हाल बल्लभ का भी हुआ जा रहा था l

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किचन में अनु गैस पर कुकर को रखती है फिर गैस जलाती है l तभी उसे कलिंग बेल की टिंग टोंग की आवाज सुनाई देती है l अपने पल्लू से हाथ और चेहरा पोछते हुए दरवाजा खोलती है l सामने वीर खड़ा था l चेहरे पर थोड़ी उदासी और मायूसी लिए l वीर हल्का सा मुस्कराते हुए अंदर दाखिल होता है और सोफ़े पर धप कर बैठ जाता है l अनु अभी भी दरवाजे पर थी l वीर अनु की ओर देखता है, अनु अपनी बड़ी बड़ी आँखों से वीर की ओर थोड़ी हैरानी और परेशान भरे नजरों से देखे जा रही थी l वीर अपना हाथ बढ़ा कर इशारे से अनु को बुलाता है l अनु का चेहरा खिल उठता है l वह किसी मासूम बच्ची की तरह खिलखिलाते हुए भागते हुए आती है और दोनों हाथों से वीर की हाथ पकड़ लेती है l वीर उसे अपनी गोद में खिंच लेता है l

अनु की पीठ अब वीर के सीने से चिपकी हुई थी l वीर अपना चेहरा अनु की कंधे पर रख देता है l अनु को अपने कंधे पर एक गर्म चुंबन का एहसास होता है l उसकी आँखे बंद हो जाती है l पर उसे हैरानी होती है कि वीर अपना चेहरा उसके कंधे पर रख कर वैसे ही बैठ गया था l अनु वीर से सवाल करती है

अनु - राजकुमार जी... आज क्या हुआ...

वीर - (वैसे ही अपने गालों को अनु की कंधे पर रगड़ते हुए कहता है) कुछ नहीं मेरी जान... कुछ भी तो नहीं...

अनु - फिर आप ऐसे... मायूस से.. हारे हुए से क्यूँ लग रहे हैं...

वीर - (अपना माथा अनु के कंधे से हटा कर) क्या मैं तुम्हें हारा हुआ लग रहा हूँ... (अनु चुप रहती है, उसे सूझती नहीं है क्या कहे, वीर उसकी मनःस्थिति को समझ जाता है) अरे मेरी अनु... मेरी तो सबसे बड़ी जीत तु है... और जब तक तु मेरे साथ है... मुझे कौन हरा सकता है... खुद वह तकदीर लिखने वाला भी नहीं...

अनु - (वीर की ओर घुमती है, अपने दोनों हाथों से वीर की चेहरे को थामती है) राजकुमार... तो आपके चेहरे पर यह मायूसी क्यूँ...

वीर - चलो नहीं बताता... मैं तुम से नाराज हूँ... बहुत बहुत नाराज हूँ...

अनु - (वीर की चेहरे को छोड़ देती है) झूठे... नहीं बताना चाहते हैं... तो मत बताइए... यूँ मुझसे नाराज होने की झूठी बात क्यूँ कर रहे हैं...

वीर - क्या करूँ बोलो... मैं दुखी होने की ऐक्टिंग करता हूँ... पर तुम्हारा चेहरा देखता हूँ... तो सारे दुख भुला जाता हूँ... कभी कभी सोचता हूँ... के तुम्हें थोड़ा नाराज कर दूँ... ताकि तुम्हें मनाऊँ... पर तुम हो कि मेरी झूठ पकड़ लेती हो... और रूठने की झूठी नाटक तक नहीं करती...

अनु - जान चली जाए मेरी... अगर कभी आपसे मैं रूठी तो...

वीर - (अनु के गाल पर हल्का सा चपत लगाते हुए) श्श्श... क्या बात कर रही है... ऐसी बातों से मुझ पर क्या गुज़रती है.. सोच समझ कर बातेँ किया कर.. समझी...

अनु - (वीर की गोद से उतर कर वीर के बगल में बैठ जाती है और अपने कान पकड़ कर) ठिक है बाबा कान पकड़ती हूँ... फिर कभी ऐसा नहीं कहूँगी... पर मुझे बताइए तो सही... आप जाके कहाँ से आ रहे हैं...

वीर - (अनु के दोनों हाथों को अपने गालों पर रख कर) हमारे प्यारे संसार में... खुशियां ही खुशियां है... घर है... पैसा भी है... पर... संसार जैसा कुछ लग नहीं रहा है... इसलिए एक संसार का बंदोबस्त करने गया था...

अनु - मतलब...

वीर - अरे मेरी भोली अनु... काम ढूंढने गया था...

अनु - काम...

वीर - हाँ... ताकि मैं सुबह तेरी यह खूबसूरत चेहरा देख कर काम को निकलुं... तु मुझे पीछे से आवाज देकर बुलाए... मैं तेरी आवाज सुन कर रुक जाऊँ... तु मेरे पास आकर... मेरे हाथ में टिफिन कैरेज दे दे... मैं इस आशय से निकलुं... के मुझे शाम को लौटना है.. दो प्यारी प्यारी बड़ी सी हिरनी जैसी आँखे मेरी राह तक रही होंगी... जब मैं दुनिया से जद्दोजहद कर थका हारा लौटुं... तो मेरी राह में पलकें बिछाये इन दो नैनों को देखते ही... मेरी थकान सारी फुर्र हो जाए...

अनु मुस्करा देती है, शर्म से उसके गालों पर लाली छाने लगती है, वह वीर के गालों से अपना हाथ खिंच कर अपना चेहरा छुपा लेती है l

वीर - है.. क्या हुआ... (अनु के चेहरे पर हाथ हटा कर)

अनु - आप ना बड़े... छोड़िए...

वीर - अरे बात तो पुरा करो...

अनु - आप बड़े...

वीर - हाँ हाँ... आगे..

अनु - आप बड़े झूठे हो...

वीर - (अनु की हाथ छोड़ कर) लो करदिया मेरा मुड़ खराब...

अनु - (घबराते हुए) उई माँ.. क्या हुआ...

वीर - बताऊँगा... पहले यह बोलो... मैंने झूठ क्या बोला...

अनु - वह तो मैंने यूँही कह दी..

वीर - मुझे झूठा कहना... तुम्हें बड़ा मजा देता है ना...

अनु बड़ी मासूमियत से अपना सिर हिला कर हामी भरती है, जिसे देख कर वीर उसकी नाक खिंच कर कहता है l

वीर - तुम्हारी यही अदा तो मुझे दुनिया से टकराने के लिए हिम्मत देती है...

अनु - पर आपने बताया नहीं... किस काम के लिए गए थे और हुआ क्या...

वीर अनु को अपने उपर खिंच लेता है l अनु उसके उपर आकर गिरती है l पहले वीर उसके आँखों में झाँकता है फिर अपना सिर अनु के सीने पर धड़कन के पास रख देता है l अनु भी उसके सिर को थाम लेती है l

वीर - जानती है अनु... मेरे पिता ने... मेरी मदत को सबसे मना कर रखा है... यहाँ तक... जो कभी मुझसे डरा करते थे... मेरे रीकमेंडेशन पर जो दूसरों को नौकरी दिया करते थे... वे लोग भी... अब मुझसे कन्नी काटने लगे हैं... पर तु इसे दिल पर मत लगा ले... जो मैंने कभी बोया था... आज वह लौट कर आ रहा है... दुनिया से असल पहचान हो रही है...

अनु - आपके पास तो पैसे हैं ना... फिर आप क्यूँ कहीं जा रहे हैं...

वीर - वह मेरे पैसे नहीं है अनु... वह विक्रम भैया के पैसे हैं... मैं जिंदगी भर कुछ भी ना करूँ... फिर भी... मेरा एकाउंट कभी खाली होने नहीं देंगे... तेरे बदन पर... सूती साड़ी ही सही... पर एक बार अपनी कमाई से देखना चाहता हूँ... किसी रेस्टोरेंट के बजाय... फुटपाथ ही सही... पर एकबार तुझे अपनी कमाई से नास्ता खिलाना चाहता हूँ... (वीर के गालों पर गर्म पानी की बूंद आकर गिरती है, वीर अचानक अनु से अलग हो जाता है) अनु... यह क्या... तेरे आँखों में आँसू.. मेरे दिल को चीर देंगे... प्लीज मत रो...

अनु - मैं एक पनौती बन कर आपके जीवन में आई ना... आप राजकुमार... काम ढूंढ रहे हैं...

वीर - धत पगली... तु जानती है ना... मेरे पास इतना पैसा है कि... तुझे हीरों से सजा सकता हूँ... (अनु अपना सिर हामी भरते हुए हिलाती है) तुझे सेवन स्टार होटल में खिला सकता हूँ... (अनु उसी मासूमियत के साथ हाँ कहती है) यह तो एक मेरी एक ऐसी.. मासूम सी ख़्वाहिश है... जिसे एक दिन मैं पुरा करना चाहता हूँ... (अनु की नाक पकड़ कर उसका सिर हिलाते हुए) समझी मेरी मासूम पगली... (अनु हँस देती है) यह हुई ना बात... अब तुझे खुश ख़बर भी सुना देता हूँ... एक बंदे ने मुझे काम पर रख लिया...

अनु - झुठे...

वीर - सच्ची...

अनु - झूठ मत बोलिए... आपको झूठ बोलना आता ही नहीं है...

वीर - अच्छा... मुझे झूठ बोलना नहीं आता... तो और एक बात कहूँ...

अनु - (अपनी आँखे पोछते हुए) जी कहिये...

वीर - आई लव यु... (अनु शर्मा कर उठ कर जाने लगती है तो वीर अनु की हाथ पकड़ लेता है) क्या हुआ...

अनु - राजकुमार जी छोड़िए ना... किचन में बहुत कम पड़ा है...

वीर - (खड़े होकर) हाँ हाँ... पता है कितना काम पड़ा है... आज मिली हो तुम मुझे... चलो... मेरे बात का जवाब दो...

अनु - (हाथ छुड़ाने की कोशिश करती है) छोड़िए ना राजकुमार जी...

वीर - नहीं... बिल्कुल नहीं... आज तो तुम्हारे मुहँ से सुन कर ही रहूँगा...

अनु हाथ छुड़ा नहीं पाती और वीर की घुम जाती है, वीर उसे फिर से अपने पास खिंच कर सीने से जकड़ लेता है l

वीर - चलो बोलो...

अनु - (शर्म ओ हया के साथ अपनी हँसी को दबाते हुए) क्या...

वीर - आई लव यु...

अनु - ऊँ.. हूँ..

वीर - अनु...

अनु - हूँ...

वीर - प्लीज...

अनु - अच्छा ठीक है... आप अपनी आँखे बंद कर लीजिए...

वीर - यह क्या... इसमे आँख बंद करने वाली क्या बात है..

अनु - प्लीज...

वीर - ठीक है... (आँखे बंद कर लेता है) कहो अब...

अनु - (धीरे से,धीमी आवाज़ में)आई...

वीर - हाँ हाँ... आई...

अनु - लव...

वीर - हाँ हाँ... लव...

अनु - आई लव...

वीर - हाँ हाँ.. आई लव...

तभी प्रेसर कुकर की सीटी जोर से बजने लगती है जिससे वीर चौंक कर अनु को छोड़ देता है l मौका पाकर अनु किचन की ओर भाग जाती है l

वीर - अनु... (अनु रुक कर पीछे मुड़ कर देखती है) दिस इज़ नॉट फेयर... (अनु वीर को जीभ दिखा कर किचन के अंदर चली जाती है, वीर मुस्करा कर रह जाता है)

अनु के किचन के अंदर जाने के बाद वीर सोफ़े पर बैठ कर रिमोट से टीवी ऑन करता है l टीवी पर एक न्यूज ब्रीफिंग चल रही थी l न्यूज सुनते ही वीर की आँखे हैरानी से फैल जाती हैं

"कल देर रात कटक में वाव की अध्यक्षा प्रतिभा सेनापति जी के घर पर कुछ अज्ञात लोगों ने डकैती की कोशिश की थी l घर में समान तितर-बितर होकर पड़े थे l घर पर तक कोई था या नहीं इस बात की पुष्टि अभी तक नहीं हो पाई है l पुलिस सेनापति दंपति से संपर्क करने की कोशिश कर रही है पर अभी तक कोई सफलता हाथ नहीं लगी है l "

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भुवनेश्वर के प्रवेश पर टोल नाके पर सुपरिटेंडेंट जान निसार खान सादे कपड़े में जीप के बोनेट पर कुहनियों पर टेक लगाए खड़ा था l कुछ देर बाद एक ट्रक टोल नाके पर रुकती है l विश्व उस ट्रक से उतर कर भागते हुए खान के पास आता है l खान जल्दी से जीप की ड्राइविंग सीट पर बैठ जाता है और बगल में विश्व l खान गाड़ी स्टार्ट कर शहर की ओर घुमा देता है l विश्व बहुत ही सीरियस हो कर अपनी सीट पर बैठा हुआ था l मुट्ठीयाँ भिंची हुई थी चेहरा सख्त हो गया था l

खान - विश्व डोंट बी सो पेनिक...

विश्व - (बिना खान की ओर देखे) कैसे ना होऊँ खान सर... माँ और डैड... रात से गायब हैं... उनकी अभी तक कोई खबर नहीं...

खान - देखो मुझे भी देर रात खबर मिली... जोडार ने तुम्हारे साथ साथ... मुझे भी खबर किया था... पुलिस हरकत में आ चुकी है... घबराओ नहीं... ट्विन सिटी पुरा नाका बंदी कर ली गई है...

विश्व - कोई फायदा नहीं होगा खान सर...

खान - ओह... कॉम ऑन विश्व... इतना भी निरास ना हो... कम से कम... तुम... भाभीजी का स्टेट में... क्या पोजीशन है... तुम जानते हो... और तापस एक बड़े अहदे वाला ऑफिसर रहा है... जिसने भी अगुआ किया है... वह पुरे सिस्टम से पंगा नहीं ले सकता...

विश्व - हाँ नहीं ले सकता... पर अगर वह सिर फ़िरा हुआ तो...

इस बार खान चुप रहता है l गाड़ी जोडार ग्रुप्स लिमिटेड के ऑफिस में रुकती है l विश्व और खान दोनों उतर कर ऑफिस के अंदर सीधे कांफ्रेंस रुम में पहुँचते हैं l विश्व देखता है कमरे में सुभाष और सुप्रिया भी जोडार के साथ बैठे हुए थे l विश्व को देखते ही तीनों खड़े हो जाते हैं l

विश्व - (जोडार से) जोडार साहब... मैं क्या कहूँ... कैसे कहूँ...

सुप्रिया - विश्व प्रताप...

विश्व - मैं आपसे बात नहीं कर रहा हूँ... यह कोई मीडिया मसाला वाली बात नहीं है...

जोडार - तुम्हें एक बार... मिस सुप्रिया को सुनना चाहिए...

सुभाष - हाँ विश्व... सुप्रिया के पास तुम्हारे लिए एक खबर है...

विश्व हैरानी से सुप्रिया की ओर देखता है, सुप्रिया हाँ में अपना सिर हिलाते हुए अपना मोबाइल निकाल कर एक विडिओ चला कर विश्व के हाथ में देती है l विश्व के लिए प्रतिभा का वीडियो मैसेज था

प्रतिभा - मेरे बेटे प्रताप... जानती हूँ... तु डर रहा होगा... हमारे बारे में सोच कर... हाँ... यह सच है... हमारी किडनैपिंग की कोशिश हुई... गनीमत है मर्डर करने की कोशिश नहीं हुई... पर उन किडनैपर से हमें तेरे एक शुभ चिंतक ने बचा लिया है... अब हम... यानी मैं और तेरे डैड दोनों उसके पास महफ़ूज़ हैं... नाम उसका मैं तुमसे इस वक़्त रिवील नहीं कर सकती... उसका कहना है कि तुम... समझ जाओगे और बहुत जल्द तुम उसे और हमें ढूंढ लोगे...

वीडियो बंद हो जाता है l विश्व के माथे पर बल पड़ जाता है l पास ही एक चेयर पर धढ़ाम कर बैठ जाता है l जोडार एक पानी का ग्लास लाकर विश्व को देता है पर विश्व मना कर देता है l

विश्व - जोडार सर... कैसे हुआ... मुझे थोड़ा डिटेल में बतायेंगे प्लीज...

जोडार - देखो विश्व... मुझसे एक छोटी गलती यह हुई कि... मुझे डबल लेयर सिक्युरिटी लगानी चाहिए थी... पर मैंने सिंगल लेयर सिक्युरिटी लगाया था... जो कि ब्रिच हो गया... जिन्होंने भी यह कांड किया है... वे लोग पहले से ही... अच्छी तरह से रेकी किए थे... (एक गहरी साँस छोड़ता है, फिर, एक छोटा सा इलेक्ट्रॉनिक डीवाइस निकाल कर विश्व के हाथ में देता है) यह एक ट्रांसमिशन जैमर है... जिसके वज़ह से... सीसीटीवी की ट्रांसमिशन रुक गई... जिसकी अलर्ट... तुम्हारे मोबाइल पर तुम्हें मिली... जाहिर है... ऐसा ही अलर्ट... हमारे कंट्रोल रुम में भी आया था... तुमने जैसे ही फोन किया... मेरे आदमी जब तक घर पर पहुँचे... तब तक... सेनापति जी... और मैम किडनैप हो चुके थे... हमने अपने आदमियों को चेक किया तो पाया... (सीरींज नुमा एक शॉट दिखाते हुए) सबको ऐनेस्थेटीक ट्रांकुलाइजर शॉट से... बेहोश किया गया था...

विश्व - (उस शॉट को हाथ में लेकर) आपके आदमियों को बेहोश कर जिन्होंने माँ और डैड को किडनैप करी... माँ उन्हीं के कब्जे में है... या किसी और के कब्जे में...

सुभाष - जोडार ग्रुप को छका कर जो चोर सेनापति सर और मैम को किडनैप किया... उन पर कोई तीसरा मोर बन गया...

विश्व - यह आप कैसे कह सकते हैं...

सुभाष - देखो विश्व... मैं इस केस में नहीं हूँ... तुम्हारे वज़ह से... मुझे होम मिनिस्ट्री ने... रुप फाउंडेशन का एसआईटी चीफ बनाया है... तुम तक खबर पहुँचाने के लिए मैम ने... तुम्हारे फोन के बजाय... सुप्रिया जी को क्यूँ इन्फॉर्म किया... यह मैं नहीं कह सकता... पर जैसे ही यह विडिओ... सुप्रिया जी को मिला... उन्होंने मुझे कॉन्टैक्ट किया... मैंने खान सर से मिलकर... तुम्हारे लिए कुछ इन्फॉर्मेशन जुटाए हैं... शायद तुम्हारे काम आ जाए... (इतना कह कर सुभाष एक टेबलेट निकाल कर विश्व के हाथ में देता है) यह देखो... यह लिंक रोड पर जो प्रेस क्लब है... वहाँ की सीसीटीवी की फुटेज है...

विश्व देखता है दो काली रंग की गाड़ी को प्रेस क्लब जंक्शन के आगे चार काले रंग के गाड़ी आकर रुकती हैं l उससे कुछ बंदे उतर कर उन दो गाड़ी में बैठे लोगों को बंदूक की नोक पर ले लेते हैं, फिर वे लोग गाड़ी की डोर खोल कर बेहोश तापस दंपति को अपनी गाड़ी में लेकर उन दो गाड़ियों के हवा निकाल कर चले जाते हैं l तब एक आदमी एक गाड़ी से उतर कर अपना नकाब उतरता है और फिर बोनेट पर मुक्का मारता है l

विश्व - रंगा... यह तो रंगा है... इसने...

सुभाष - हाँ... रंग चरण सेठी... याद है... तुमसे छत्तीस का आँकड़ा है...

विश्व - इसने इतनी हिम्मत जुटाई कहाँ से... पर न्यूज में तो यह क्लिप नहीं चला रहे हैं...

खान - अभी तक पुलिस वालों को भी यह क्लिप नहीं मिली है...

विश्व - व्हाट...

सुभाष - हाँ... इसे हमने सुप्रिया जी की मदत से... पूरा का पूरा मास्टर क्लिप ले आए हैं... क्यूँकी... खान सर चाहते थे... पहले तुम... तसल्ली कर लो... उसके बाद ही हम... पुलिस और मीडिया तक पहुँचाएँगे...

विश्व - मुझे अभी भी समझ में नहीं आ रहा... डैड के पास एक रिवॉलवर है... कैसे इस्तेमाल नहीं कर सके...

खान - उनके सोने के बाद... यह सब आधी रात को हुआ है... घर में घुसने वाले... किचन की खिड़की की सरिया को तेजाब से पिघला कर घुसे थे...

विश्व सोच में पड़ जाता है l सभी के सभी विश्व की ओर देखने लगते हैं l तभी अचानक विश्व सुभाष से दोबारा टेबलेट दिखाने के लिए कहता है l विश्व फुटेज को गौर से देखता है l सेनापति दंपति को अपनी गाड़ी में बिठाने के बाद एक नकाबपोश रंगा के गाड़ी के पास आता है और सीसीटीवी की ओर देखता है फिर एक काग़ज़ की पर्ची निकाल कर गाड़ी के छत पर चिपका का चला जाता है l

विश्व - (सुभाष से) सतपती जी... यह गाड़ी मौका ए वारदात पर क्या पुलिस को मिली...

सुभाष - हाँ... इस गाड़ी का चारों टायरों के हवा निकाल दी गई थी... इसलिए किडनैपर मजबूरन उस गाड़ी को छोड़ कर चले गए...

विश्व - क्या यह गाड़ी अभी पुलिस की कब्जे में है...

सुभाष - नहीं... पुलिस को यह नहीं मालुम है कि सेनापति सर और मैम की इस गाड़ी से किडनैपिंग की कोशिश हुई थी... इसलिए... यह गाड़ी ट्रैफ़िक पुलिस ऑफिस में है...

विश्व - क्या... मुझे इस चिट... या फिर इस चिट की फोटो मिल सकती है...

विश्व की हाथ से टेबलेट लेकर सुभाष वीडियो को दोबारा देखता है फिर अपना मोबाइल निकाल कर कहीं पर फोन लगाता है l कुछ देर बाद सुभाष के फोन पर एक व्हाट्सअप फोटो का मेसेज आती है l सुभाष उस फोटो को डाउन लोड करने के बाद विश्व को दिखाता है l वह फोटो ओरायन मॉल की पार्किंग एरिया की टोकन थी l अचानक विश्व की आँखे फैल जाती हैं l

विश्व - (जोडार से) सर मुझे आपकी गाड़ी चाहिए...

खान - मतलब तुम्हें मालुम हो गया... सेनापति और भाभी जी कहाँ है इस वक़्त...

विश्व - जी... पर यह निमंत्रण सिर्फ मेरे अकेले के लिए है... जाहिर है... मुझे अकेले जाना होगा...

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"अबे चुप"

चिल्लाया पिनाक l उसके सामने एक शख्स खड़ा हुआ था l पिनाक एक कुर्सी पर शराब का ग्लास हाथ लिए बैठा था l एक घुट पीने के बाद अपने आस्तीन से अपना मुहँ साफ करता है l

पिनाक - साले... तुझे काम दिया था... यह सिला दिया... कुछ भी नहीं हो रहा है तुझसे... (ग्लास ख़तम कर, एक छटपटाहत के साथ) लगता है... किसी और से बोलना पड़ेगा... तुझसे कुछ नहीं हो पा रहा है...

@ - जो आप समझ सकते हैं समझ लें... न्यूज में दिखा रहा है... सेनापति दंपति अभी भी... लापता हैं...

पिनाक - पर मेरे कब्जे में तो नहीं हैं ना.... पता नहीं वह कौनसा मनहूस दिन था... जो मैं तुझ पर इम्प्रेस हो गया.... पर तु तो एकदम से पनौती निकला... कोई एक काम ढंग से किया भी है तु...

@ - (एक गहरी साँस छोड़ते हुए) हाँ पर काम जब भी... लगभग लगभग होने को था... तभी कोई ना कोई भाजी मार जाता है... पर क्या करूँ... मैं आपके हुकुम का गुलाम... हमेशा इसी कोशिश में रहा... कहीं भी कभी भी... आपका नाम बाहर ना आए...

पिनाक - फायदा क्या हुआ.... ना मेरा बेटा मेरे पास है... ना ही उस विश्व को अपने घुटने पर ला सका... यह कौन आकर... सेनापति दंपति को हमसे छुड़ा ले गया...

@ - जो भी है... विश्व का दोस्त तो हो नहीं सकता... जरुर विश्व का कोई दुश्मन होगा... क्यूँकी अभी भी... वे लोग लापता हैं... और मुझे लगता है... विश्व का दुश्मन... विश्व से कॉन्टैक्ट किया भी नहीं होगा... वर्ना पुलिस की हलचल हमें बता चुकी होती...

पिनाक - ठीक है... हम ना सही... कोई तो विश्व को घुटने पर लाएगा... पर तुमने उस दो कौड़ी लड़की का भी अभी तक कुछ नहीं किया...

@ - इस बात के लिए... आपका भतीजा... मेरा मतलब है... युवराज जिम्मेदार हैं...

पिनाक - उसने क्या किया...

@ - जिस अपार्टमेंट में राजकुमार... और वह लड़की रह रहे हैं... उस अपार्टमेंट की सेक्यूरिटी से लेकर लिफ्ट मेन... दुध वाला... सब्जी वाला... सब... ESS के लोग हैं...

पिनाक - ओ... मतलब युवराज पूरी जान लगा कर... उस लड़की की हिफाजत कर रहे हैं...

@ - हाँ शायद... इसलिए तो... हमारे कोई भी आदमी... उस अपार्टमेंट के आसपास भी फटक नहीं पा रहे हैं...

पिनाक - चलो मान लिया... उस लड़की के पास तुम या तुम्हारा कोई आदमी फटक भी नहीं पा रहे हैं... पर सेनापति दंपति की हिफाजत तो युवराज नहीं कर रहे थे ना... वहाँ तो तुम्हारी दाल नहीं गली....

@ - अब विश्वा सिर्फ क्षेत्रपालों से तो दुश्मनी नहीं रखी होगी... जैल में विश्वा भाई था... जरुर किसी और ने दुश्मनी उतारी होगी... हाँ यह बात और है कि... वह हम पर भी नजर रखे हुए था...

पिनाक - यह कहते हुए... तुम्हें शर्म भी नहीं आ रही...

@ - छोटे राजा जी... मैं कोई प्रोफेशनल नहीं हूँ... हाँ जिन्हें प्रोफेशनल समझ कर काम सौंपा था... वह फुस्सी बम निकले...

पिनाक - जानते हो... मैं कुछ न कुछ कर के... एक जीत वाली सुकून के साथ... राजगड़ जाना चाहता हूँ... सिर उठा कर... सीना ताने... अपनी मूँछ पर ताव देते हुए... इसलिए... मैं ना तो... पार्टी ऑफिस जा रहा हूँ... ना ही... मेयर ऑफिस...

@ - कोई नहीं छोटे राजा जी... मेरा वादा है आपसे... अगला जो भी कदम हम उठाएंगे... चाहे वह उस लड़की के मामले में हो या... विश्व के मामले में... कामयाबी के साथ ही हम... लौटेंगे... फिलहाल तो विश्व की मुहँ बोले माँ बाप... लापता हैं... इस खबर का मजा लीजिए....

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चर्र्र्र्र्र्र्र्र् की आवाज के साथ एक गाड़ी द हैल की लोहे के फाटक के सामने आकर रुकती है l ड्राइविंग सीट की डोर खोल कर विश्व उतरता है l तब तक फाटक के बाहर चार गार्ड्स आकर अपना पोजीशन ले लेते हैं l विश्व उनके पास आकर खड़ा होता है l

विश्व - (उन गार्ड्स से) जाओ... अपने मालिक को खबर दो... विश्वा आया है...

गार्ड्स विश्व की बात सुनकर हैरानी से एकदूसरे को देखते हैं फिर उनमें से एक गार्ड विश्व से कहता है l

गार्ड - युवराज जी ने कहा था... विश्वा नाम का कोई बंदा आए तो उन्हें अदब के साथ सीधे जीम पर भेज देना... (इतने में बाकी गार्ड्स फाटक खोल देते हैं) वह रहा जीम... जहां पर युवराज एक्सरसाइज कर रहे हैं... और आपका इंतजार भी...

विश्व द हैल के परिसर के अंदर दाखिल होता है और सीधे जीम की ओर बढ़ने लगता है l जीम में दाखिल होते ही देखता है एक बड़ा सा हॉल है जो लाइट्स से जगमगा रहा है l एक और जीम के सभी प्रकार के इंस्टृमेंट्स लगे हुए हैं और दुसरी तरफ स्पेरिंग के लिए रिंग भी सजा हुआ है l वहीँ सिफ एक पैंट में और ऊपर का पूरा बदन नंगा था, विक्रम एक ओर पंच बैग पर घुसों और लातों की बौछार कर रहा था l विक्रम पसीने से लथपथ था, अपनी जीम पर विश्व को नजर घूमाते देख विश्व से पूछता है

विक्रम - पसंद आया... यह मेरा वर्ल्ड क्लास जीम है...

विश्व - (उसके पास पहुँच कर) मेरे माँ डैड कहाँ हैं...

विक्रम - वाव... मैं तो डर गया... मुझे लगा तुम मुझे थैंक्यू कहोगे...

विश्व - विक्रम... मैंने तुमसे पहले ही कह दिया था... तुम्हारे और मेरे फिलींग्स के बीच परिवार आना नहीं चाहिए...

विक्रम - हाँ कहा तो था... और तुमने यह वॉर्न भी किया था... के मुझे तुम्हारे घर में कभी घुसना नहीं चाहिए... क्यूँकी अगर मैंने ऐसा किया तो तुम... मेरे घर में घुसोगे...

विश्व - हाँ...

विक्रम - पर मैं तुम्हारे घर में घुसा ही नहीं... विश्व प्रताप... पर तुम मेरे घर में घुस आये... हा हा हा...

विश्व - विक्रम... मैं यहाँ तुमसे कोई बकवास करने नहीं आया हूँ... अब सीधी तरह से मेरे माता पिता को मेरे हवाले करो... नहीं तो...

विक्रम - ह्म्म्म्म... धमकी... गुड... (पंच बैग से दुर चलते हुए स्पेरिंग रिंग में पहुँच कर) नहीं तो... क्या कर लोगे... विश्वा...

विश्व स्पेरिंग रिंग की रस्सी को पकड़ कर एक कुदी मार कर रिंग के अंदर पहुँचता है l

विश्व - नहीं तो... मैं तुम्हारा वह हश्र करूँगा के तुम कभी सोच भी नहीं पाओगे युवराज...

विक्रम - वाह मजा आ गया... चलो दिखाओ... तुम क्या क्या कर सकते हो... जो मैं... सोच नहीं सकता... (विश्व एक पंच मारता है जिसे विक्रम डॉज करता है) ना... इस पंच में... कोई ताकत नहीं है... चलो... आज विश्वा द बिष्ट को दिखाओ...

विश्व अब लगातार कुछ पंच और किक मारने लगता है पर विक्रम आसानी से सारे पंच और किक को डॉज कर लेता है l पर धीरे धीरे विश्व की पंच और किक में तेजी आने लगती है l डॉज करते हुए विक्रम एक जबरदस्त मुक्का विश्व के जबड़े पर मारता है l मुक्का जबरदस्त था विश्व छिटक कर रस्सियों के बकल पर गिरता है l थोड़ी देर के लिए विश्व का सिर झनझना जाता है l

विक्रम - बहुत दिन हो गए हैं ना... तुम्हें मार खाते हुए... कोई ना... आज सारी की सारी कसर मैं पुरा कर दूँगा...

विश्व अब अपना शर्ट उतार कर एक ओर फेंक देता है l फिर स्पेरिंग वाला पोजिशन लेता है l विक्रम भी अपना पोजीशन लेता है l विश्व अब हमला कर देता है, विक्रम विश्व के सारे मूव को डॉज करते हुए परखता है फिर एक हिट विश्व के पिंजर पर करता है l पर इस बार विश्व तैयार था l विक्रम की पंच को रोक कर विश्व एक अपरकट पंच विक्रम के जबड़े पर जड़ देता है l इसबार विक्रम छिटक कर रिंग के बकल पर पड़ता है l

विक्रम - आह... वाव... बहुत अच्छे... पर विश्व तुम्हारे हर दाव का तोड़ है आज मेरे पास..

इस बार विक्रम विश्व पर धाबा बोल देता है l अब दोनों एक-दूसरे पर हावी होने के लिए दाव पर दाव आजमाने लगते हैं l पर कोई किसी को पछाड़ नहीं पा रहा होता है l दोनों थक कर आमने सामने वाले बकल पर साँस दुरुस्त करने लगते हैं l

विक्रम - सिर्फ दो मिनट... आज हर हाल में... फैसला हो जाना चाहिए...

विश्व इस बार विक्रम पर जम्प लगा देता है, पर वार खाली जाता है, क्यूंकि शायद विक्रम को अंदाजा हो गया था, इसलिए विक्रम फर्श पर रोल होते हुए दूसरे किनारे पर पहुँच जाता है l

विक्रम - बड़ी जल्दी है तुम्हें... चलो फिर... आज खेल ख़तम कर ही देते हैं...

दोनों के बीच फिर से स्पेरिंग शुरु हो जाती है l इस बार विक्रम धीरे धीरे स्लो होने लगता है तो विक्रम बकल के पास पहुँचता है और अचानक दाव बदल कर अपने पैरों का सीजर लॉक मूव विश्व के पैरों पर आजमाता है विश्व रिंग के बकल पर गिरता है तो विक्रम नीचे वाले बकल के रस्सी को विश्व के गले में फांस देता है l विश्व रस्सी में फंसे अपनी गर्दन को छुड़ाने के लिए अपने हाथ को बकल के बीच रख देता है l विक्रम पीछे से विश्व के घुटने पर अपना पैर रख कर विश्व का घुटना मोड़ देता है l इससे विश्व अब विक्रम के कब्जे में आ जाता है l तभी एक चीखने की जनाना आवाज आती है तो दोनों का ध्यान उस आवाज के तरफ जाता है l प्रतिभा भागते हुए रिंग के पास आती है l

प्रतिभा - यह क्या कर रहे हो विक्रम... मेरे बेटे ने क्या किया है...

विक्रम - ओह माँ जी आप... यहाँ... कैसे...

प्रतिभा - तुम दोनों लड़ क्यूँ रहे हो... और मेरे बेटे ने किया क्या है... देखो अगर इससे कोई गलती हो गई है... तो मैं इसके लिए माफी मांगती हूँ... (प्रतिभा हाथ जोड़ कर) प्लीज... छोड दो मेरे बेटे को...

विक्रम इतना सुनते ही विश्व के गले से वह बकल वाला रस्सी निकाल देता है l विश्व रिंग पर बकल वाले रस्सी पर पीठ टिकाए बैठ कर जोर जोर से साँस लेने लगता है l प्रतिभा विश्व को पीछे से पकड़ कर गले लगा कर रोने लगती है l अपनी साँस दुरुस्त करने के बाद विश्व विक्रम की ओर देखता है l विक्रम विश्व को देखते हुए एक विजयी मुस्कान के साथ अपनी मूँछों पर ताव देता है l विश्व के चेहरे पर भी एक मुस्कान आ कर चली जाती है l इतने में शुभ्रा, रुप और तापस सभी आकर रिंग के पास पहुँचते हैं l

घूम कर विश्व प्रतिभा की आँखों को पोंछता है फिर रिंग से उतर कर प्रतिभा और तापस दोनों के पैरों को छूता है l

प्रतिभा - (हैरानी के साथ) यह क्या है विक्रम....

विक्रम - कोई बात नहीं माँ जी... बस एक सुकून था जो खो गया था... आज आपने पुरा कर दिया...

विक्रम रिंग से बाहर आता है और गौर से शुभ्रा और रुप की ओर देखता है, फिर तापस और प्रतिभा की ओर देखता है l

विक्रम - वैसे माँ जी...

प्रतिभा - क्यूँ ना आती तो मार देता मेरे बच्चे को...

विश्व - रिलैक्स माँ रिलैक्स... कुछ नहीं हुआ है...

प्रतिभा - (विक्रम से) हमें उन किडनैपरों से बचा कर... क्या यह दिखा ने के लिए यहाँ लाए थे...

विक्रम - माँ जी... यह एक इतिहास है... और गुरुर भी...

विक्रम - माँ जी... मैं हमेशा से आपका गुनहगार रहा हूँ... शायद उसकी सजा आपके इस बेटे के हाथों मुझे मिली थी... पर क्या करूँ... मेरे धमनीयों में राजसी खुन बह रही है... अपना सिर और मूंछें ऊँचा रखने के लिए... हम किसी भी हद तक चले जाते हैं... आपके बेटे ने मुझे मूंछें रखने लायक नहीं रखा था... मैंने बस आज वही गुरुर दोबारा हासिल कर लिया है... (प्रतिभा हैरानी के साथ विक्रम की ओर देख रही थी) एक वह दिन था... जब मेरी पत्नी विश्व के आगे मेरे लिए गिड़गिड़ाइ थी... आज विश्व के लिए... मेरे सामने हाथ जोड़ दिए... बस... आपका मान रह गया... और मेरा गुमान बच गया...

 
हाँ चिंतित है

आगे चलकर वह विक्षिप्त भी हो जाएगा

क्यूंकि धीरे धीरे उसकी शक्तियाँ सिमट जाएंगी

हाँ वह लड़ाई में आएगा जरुर क्यूंकि विश्व उसका दोस्त जो ठहरा

हा हा हा हा हा

हर चरित्र अपने चारो तरफ़ एक सीमा बनाए हुए हैं जिसे वे नहीं लांघ रहे हैं

विक्रम भी ऐसा ही है

कोलकाता में विक्रम ने भैरव सिंह को जवाब देकर इसकी शुरुआत कर दी थी

आगे भी वह धीरे धीरे करता ही जाएगा

पर हाँ यह भी सच है कि वह अपने अहंकार का मारा है जो अपनी बीवी और बहन के सामने मार खाया था जिसकी टीस उसे दर्द दे रहा था जिसका निवारण आज हो गया

शुक्रिया मेरे दोस्त मेरे भाई मेरी चिंता करने के लिए व शुभकामनाओं के लिए

कार्तिक पूर्णिमा के दिन हम सपरिवार नाव छोड़ते हैं नदियों में तालाब में

जो इस बार भी हमने बहाया
 
जी बिलकुल

विक्रम चाहे जैसा भी है पर अपने इरादों का पक्का है

वह अपनी बीवी और बहन के सामने विश्व के हाथों पीटा था

उसे अपने ताकत पर अभिमान भी था जिसे विश्व ने मिट्टी पलित कर दिया था l

अपना वह पुरुषत्व वाला अहंकार पुनः प्राप्त करना चाहता था उसे वह मौका दिखा जिसे उसने भुनाया भी

सटीक

हाँ हैं तो

अब वह समय भी बहुत नजदीक आ रहा है जब दोनों भाइयों के बीच नफरत पलेगी

हाँ आखिर अब वह संघर्ष दिख रहा है

ज़माने से जुझ रहा है

शुक्रिया मेरे भाई आपका बहुत बहुत शुक्रिया
 
शुक्रिया मेरे लियोन भाई

मरेगा तड़प तड़प कर मरेगा

जिंदा इसलिये है कि भैरव सिंह का अहं जिंदा है

भैरव सिंह के अहंकार के साथ वह भी मर जाएगा

हाँ कुछ खबरें दबाने से भी नहीं दबती

राजगड़ में अबतक जो भी हुआ है या स्टेट में जो भी हुआ है वह लोगों के दिल और दबी जुबान पर है

जिसे भैरव सिंह बखूबी समझता है

इसलिये परख रहा था

हाँ यह वह बदला था जिसे विक्रम को चुकाना ही था

क्यूंकि विश्व ने एक बार शुभ्रा को बचा कर हस्पताल ले गया था

हाँ कह सकते हो

वज़ह अगली कड़ी में मालुम पड़ेगा

दोस्ती नहीं होगी यह सच है

पर दुश्मनी भी नहीं होगी

वीर अब वास्तविकता से रुबरु हो रहा है

खैर उसकी भी भूमिका आगे है
 
👉एक सौ तैंतालीसवां अपडेट

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बारंग रिसॉर्ट

म्युनिसिपल ऑफिस के कुछ कर्मचारी व अधिकारीयों से शहर के बारे में बात करने के बाद कुछ फाइलों पर दस्तखत कर पिनाक सबको विदा करता है l उन सबके जाने के बाद पिनाक अपने कमरे में आता है l कमरे में मद्धिम रौशनी थी, अपने कोट के कुछ बटन्स खोल कर सोफ़े पर बैठ जाता है और फिर आवाज देता है

पिनाक - ओये... कोई है... (कोई आकर उसके पास खड़ा होता है, उसके ओर बिना देखे) जाओ... एक बोतल लेकर आओ...

वह शख्स जाकर फ्रिज खोलता है एक शराब की बोतल और बर्फ के कुछ सिल्ली निकाल कर लाता है और सोफ़े के सामने रखे ग्लास में शराब उड़ेल कर पेग बना कर उसमें बर्फ डाल कर पिनाक को देता है l पिनाक एक घुट पीने के बाद उस शख्स से

पिनाक - एक काम कर.. टीवी लगा दे... देखें तो सही... ख़बरें क्या चल रही है...

वह शख्स टीवी ऑन करता है तो नभ वाणी न्यूज में सुप्रिया के साथ प्रतिभा का साक्षात्कार चल रहा था l

सुप्रिया - प्रतिभा मैंम... इतना बड़ा कांड हो गया... इस बात से आप की क्या प्रतिक्रिया है...

प्रतिभा - मैं तो स्थब्द हूँ... यकीनन.. डकैती... वह भी मेरे घर में... हमने कोई अथाह दौलत इकट्ठा नहीं की है... जितनी भी कमाई थी... सब लगा कर... हमने यही घर बनाया था... आई पिटी... उन चोरों को कुछ नहीं मिला होगा...

सुप्रिया - फिर भी... यह तो हैरानी की बात है... यहाँ तक आपके पड़ोसियों को भी खबर नहीं थी के आप... दोनों... आई मीन... आप और आपके पति दोनों... घर पर मौजूद नहीं थे...

प्रतिभा - हाँ... बात दरअसल यह है कि... मेरे पति सेनापति जी ने.. अचानक प्रोग्राम बनाया की... कहीं चलते हैं... एक दो दिन के लिए... इस तरह हम अपनी गाड़ी में... सातपड़ा की ओर चले गए थे... पर बीच में गाड़ी खराब हो गई थी... और उस रास्ते में... मोबाइल का टावर भी नहीं था... इसलिए क्या हुआ कब हुआ... इन बातों से हम सब अनभिज्ञ रहे...

सुप्रिया - ओ... तो फिर इसका मतलब क्या समझा जाए.. आई मिन.. मेरा आशय यह था कि.. यह डकैती थी या... फिर... (सुप्रिया चुप रहती है)

प्रतिभा - आप बीच में क्यूँ रुक गईं... कोई नहीं... फिर भी मैं आपके प्रश्न का उत्तर दिए देती हूँ... आपने कहा कि हमारे पड़ोसियों को भी मालुम नहीं था... के हम अपने घर में हैं या नहीं... फिर चोरों को कैसे मालुम हुआ... अगर चोरों को मालुम हुआ... तो इस मामले में... वे लोग वाकई बहुत स्मार्ट निकले... पर बदनसीब भी बहुत... क्यूँकी उन्हें खाली हाथ से ही संतुष्ट करना पड़ा होगा...

पिनाक - (भड़क कर) बंद कर यह टीवी... (शख्स टीवी बंद कर देता है) साली.. कमिनी चालाकी दिखा रही है... सीधे सीधे कह भी नहीं रही है... की कोई उसकी किडनैप करने की कोशिश की... (पेग ख़तम कर, उस शख्स से) ऐ... और एक बना... (वह शख्स ग्लास में शराब उड़ेलता है, रुकता नहीं l ग्लास भर कर बहने लगती है) ऐ... अबे अंधा हो गया क्या... कमरे में इतना अंधेरा नहीं है कि... ग्लास ठीक से दिखे ना...

यह कहते हुए पिनाक उस शख्स की ओर देखने लगता है, उसे वह जाना पहचाना सा लगने लगता है, वह शख्स धीरे धीरे स्विच बोर्ड तक चलकर जाता है और स्विच ऑन करता है l कमरे में लाइट जलते ही पिनाक देखता है वीर उसके सामने खड़ा था l

पिनाक - राजकुमार तुम...

वीर - हाँ...

पिनाक - (अंदर ही अंदर खुश होकर) आप... वापस आ गए...

वीर - नहीं...

पिनाक - (चेहरे के भाव बदल जाता है) तो... यहाँ क्या करने आए हैं...

वीर - अपना शक़ को पुख्ता करने आया था...

पिनाक - कैसा शक़...

वीर - आपने... सेनापति दंपति को किडनैप करने की कोशिश क्यों कि...

पिनाक - हमने कोई किडनैपिंग करने की कोशिश नहीं करी...

वीर - तो न्यूज इंटरव्यू पर इतना भड़क क्यूँ रहे थे...

पिनाक - हू द हैल यु आर... तुम होते कौन हो... हमसे जिरह करने की... राजकुमार... ओह... हम तो भूल ही गए थे... तुम अब क्षेत्रपाल नहीं रहे... सही कहा ना वीर सिंह...

वीर - जी बिल्कुल... आपके सामने कोई क्षेत्रपाल राजकुमार नहीं है... आपके सामने विश्व प्रताप का दोस्त खड़ा है...

पिनाक - दोस्त... (पेग वाला ग्लास उठा कर खड़ा हो जाता है और नीचे पटक देता है, ग्लास टुट कर बिखर जाता है) माय फुट... (तिलमिलाए हुए) हम... हम उसकी... उसके खानदान की... धज्जियाँ उड़ा देंगे...

विश्व - ना... ऐसा कुछ भी करना तो दुर... सोचिएगा भी नहीं...

पिनाक - (अब गुस्से से थर्राने लगता है) क्या कहा... कंधे के बराबर आ जाने से... बेटा बाप को नसीहत नहीं देता... बाप.. बाप होता है... कमजर्फ...

वीर - नसीहत नहीं... हिदायत दे रहा हूँ... अभी तक जो हो गया... सो हो गया... बस... (पिनाक के पास आकर उसके आँखों में आँखे डाल कर) अगर आपने या आपके किसी और बंदे ने यह गुस्ताखी की... तो कसम है मुझे मेरी माँ की... मैं उसकी धज्जियाँ उड़ा दूँगा...

पिनाक की आँखे हैरानी से बड़ी हो जाती है l वह वीर को ऐसे देखने लगता है जैसे उसे कोई करेंट का जबरदस्त झटका लगा हो l

पिनाक - क्या... क्या कहा तुमने... तुम... हमें... धमका रहे हो...

वीर - नहीं... समझा रहा हूँ...

पिनाक - हमारे रगो में... क्षेत्रपाल का खुन बह रहा है... इसकी गर्मी के आगे... लावा भी भस्म हो जाता है... हम जो एक बार ठान लें... वह करके ही मानते हैं...

वीर - वहम है आपका... बुढ़े हो गए हैं आप... मेरे खुन की गर्मी के आगे... आपका खुन बर्फ़ लगेगा...

पिनाक - हे... हेइ... तुम हमारे खुन की गर्मी को आज़माना चाहता है...

वीर - नहीं मुझे अंदाजा है... मैं बस इतना कहना चाहता हूँ... आप मेरे खुन की गर्मी को मत आजमाइए...

पिनाक - हा हा... हा हा हा हा हा... बच्चे... जा... अपनी लौंडी की गोद में छुप जा... (अपना हाथ वीर के चेहरे के सामने लाकर) इसी हाथ की उंगली पकड़ कर... चलना सीखा था... चल आजा... इसी हाथ में हाथ मिलाकर... अपनी गर्मी दिखा दे...

वीर - जैसी आपकी मर्जी...

वीर उन टुटे बिखरे काँच में से एक काँच का टुकड़ा उठाता है l फिर उस काँच के एक धार वाली सिरे को अपने हाथ में लेकर पिनाक की हाथ में दुसरा सिरा लगा कर हैंडशेक की तरह कस के पकड़ लेता है l अचानक वीर के इस हरकत से पहले पिनाक भौचक्का हो जाता है पर कुछ देर में उसके हाथों में दर्द होने लगता है l पिनाक अब अपने दुसरे हाथ से बंधे हाथ को छुड़ाने की कोशिश करने लगता है पर उसका दर्द और भी तेजी से बढ़ने लगता है l कुछ भी सेकेंड के बाद पिनाक दर्द के मारे चिल्लाने लगता है l वीर पिनाक की हाथ को आज़ाद कर देता है l पिनाक अपने हाथ में देखता है, बीचों-बीच काँच की धार को वज़ह से कट कर खुन बह रहा था, वहीँ वीर के चेहरे पर कोई शिकन नहीं था l वीर के हाथ में वह काँच का टुकड़ा गड़ा हुआ था और खुन भी बह रहा था l

वीर - अब बात... आपके समझ में आ गई होगी... (पिनाक अपनी ज़ख्मी हाथ को पकड़े हुए कराहते हुए वीर को देख रहा था) आपके खुन की गर्मी से लावा भले ही भस्म हो जाए... पर मेरे खुन की गर्मी को कभी मत ललकारीएगा...

पिनाक - नालायक... बतमीज... तु मेरा बेटा नहीं हो सकता... हराम जादे... तु मेरा बेटा कभी नहीं हो सकता...

वीर - क्यूँ... आप पर भारी पड़ गया... इसलिए...

पिनाक - खामोश... निकल जाओ यहाँ से... गेट ऑउट...

वीर - मैं यहाँ रुकने के लिए नहीं आया हूँ... बस आपको हिदायत देने आया हूँ... आपका गुस्सा... मेरे लिए हो.. तो मुझे स्वीकार है... पर अगर मेरे दोस्त के लिए हो... तो मुझे अपने सामने इसी तरह पायेंगे...

पिनाक के जबड़े सख्त हो जाते हैं l आँखे और आँखों के नीचे की मांस पेशियाँ थर्राने लगते हैं l वीर अपनी हाथ में घुसे उस काँच के टुकड़े को निकाल कर फर्श पर फेंक देता है फिर पिनाक की ओर देखने लगता है l

पिनाक - तु मेरा बेटा... नहीं हो सकता...

वीर - दिल कर रहा है... आपका मुहँ तोड़ दूँ... क्यूँकी बार बार यह कह कर... आप मेरी माँ को गाली दे रहे हैं... फिर सोच रहा हूँ... बहुत दर्द में हैं आप... आखिर जवान बेटा... छोड़ कर गया है आपको... उस दर्द की सोच कर माफ कर रहा हूँ...

पिनाक - तु... मेरा बेटा नहीं हो सकता...

वीर - पिताजी...

पिनाक - व्हाट... हाऊ डैर यु... डोंट कॉल मी... पिताजी... आई एम... छोटे राजा जी...

वीर - सही कहा आपने... हम कभी इस रिश्ते में थे ही नहीं... खैर... एक बात आपको बताना चाहता हूँ... भगवान पर विश्वास कभी था ही नहीं... पर अनु की सौबत ने मुझे उस पर यकीन करना सीखा दिया... इसलिए कभी भगवान ने ऐसा मौका बनाया के मैं अपने पिता के लिए... कुछ कर पाऊँ... तो करने से भी पीछे नहीं हटुंगा... पर... यह भी सच है... मेरे जज्बातों से टकराने की कोशिश की... तो वह सजा दूँगा... जिसकी आपने कभी सोचा भी नहीं होगा...

इतना कह कर वीर वहाँ से चला जाता है l अपनी आँखे फाड़े हाथ को पकड़े कसमसाते हुए वीर को जाते और दरवाजा बंद होते देखता है l

पिनाक - तु मेरा बेटा... हो नहीं सकता... तु मेरा बेटा... हो नहीं सकता... आह... (फिर जोर से चिल्लाता है) आह...

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बक्शी जगबंधु सोसाईटी

सेनापति का घर

ड्रॉइंग रुम में तापस, विश्व, खान, सुभाष और जोडार बैठे हुए हैं, किचन में इन सबके लिए प्रतिभा चाय बना रही थी l विश्व कुछ चिंतित था l

तापस - तुम... नर्वस लग रहे हो..

विश्व - हाँ... पहली बार... डरा हूँ... (एक पॉज लेकर) डरा क्या... हिल गया हूँ... अंदर से...

तापस - कुछ हुआ तो नहीं ना...

विश्व - पर मेरे उम्मीद से भी थोड़ा भयानक हो गया...

जोडार - आई एम... सॉरी विश्व... यह मेरी गलती है...

विश्व - जोडार सर... मुश्किलों से भरा सफर है... हादसों से भरा डगर है... जितना अब तक खो चुका हूँ... बहुत खो चुका हूँ... अब और नहीं... (कुछ देर के लिए सबके बीच एक ख़ामोशी छा जाता है)

सुभाष - (खामोशी को तोड़ते हुए) वेल... जो भी हुआ... बेशक बुरा हुआ... पर भयानक नहीं था... यूँ कहो कि... हमारे लिए... एक अलर्ट था... जिस पर अब हमें ध्यान देना चाहिए... खैर... वह बाद की बात है... तुमने मैंम से ऐसा स्टेटमेंट क्यूँ दिलवाया... के जो हुआ तब... घर में कोई नहीं था.. जबकि तुम अच्छे तरह से जानते हो... इसके पीछे किसका हाथ था...

विश्व - नहीं... मैं अब भी... श्योर नहीं हूँ... और इस मामले को... मैं पोलिटिक्स से दुर रखना चाहता हूँ...

सुभाष - कैसी पालिटिक्स...

विश्व - आप समझा करें... सतपती जी... क्षेत्रपाल पर उंगली उठाने से पहले... हमारे आस्तीन में... पक्के सबुत होने चाहिए...

तापस - हाँ... और हमारे पास... कोई सबूत नहीं है...

सुभाष - पता नहीं क्यूँ... मुझे इसमें विक्रम का ही हाथ लग रहा है...

विश्व - नहीं... विक्रम का कोई हाथ नहीं है...

सुभाष - तुम ऐसे कैसे कह सकते हो... हो सकता है... तुम्हारे नजर में हीरो बनने के लिए... उसने ही सारा प्लॉट सेट किया हो...

विश्व - नहीं...

सुभाष - कोई खास वज़ह...

विश्व - रंगा... उर्फ रंग चरण सेठी... उस वक़्त विक्रम उसे देख लिया होता... तो रंगा को जान से मार देता...

सुभाष - ठीक है... चलो मान लेते हैं... पर अगुवा तो... मेयर ने करवाया था ना...

विश्व - यही तो समझ में नहीं आ रहा... रंगा... जिसने क्षेत्रपाल की बहू पर हमला बोला था... वह छोटे राजा के खेमे में कैसे... या फिर... (रुक जाता है)

खान - या फिर... जरूर कोई तीसरा बंदर है... जो दो बिल्लियों को लड़ा कर... अपना उल्लू सीधा करवाना चाहता है...

जोडार - तो वह तीसरा है कौन... क्यूंकि जहां तक मुझे इल्म है... रंगा... विश्व से उलझने से पहले.. सौ बार सोचेगा...

तापस - हाँ... फिर भी... रंगा ने विश्व की पूंछ पर हाथ तो मारा है... और उसके इस हिमाकत के पीछे कौन हो सकता है...

सुभाष - ह्म्म्म्म... वाकई... बात में गहराई तो है... तो सवाल है... वह तीसरा... किसका दुश्मन है... विश्व का... या... क्षेत्रपाल का...

कुछ देर के लिए फिर से सबके बीच खामोशी हो छा जाती है और सभी अपने अपने ख़यालों में खो जाते हैं l तभी ट्रे में हॉल में मौजूद सब के लिए चाय लेकर प्रतिभा अंदर में आती है l

प्रतिभा - ओके ओके... पहले सब चाय ले लो... इससे दिमाग खुल जाएगी...

सभी चाय की कप उठा कर चुस्की लेने लगते हैं l पर विश्व अपना कप नहीं उठाता l यह देख कर तापस प्रतिभा को इशारा करता है तो

प्रतिभा - क्या बात है प्रताप...

विश्व - हूँ... कुछ नहीं माँ...

प्रतिभा - माँ से झूठ बोलोगे...

विश्व - माँ... बात यहाँ तक... इस तरह पहुँचेगी... मैंने सोचा भी नहीं था... (तापस की ओर देख कर) डैड... आपका वह माउजर... वह भी काम ना आया... और आपने कोई रीटालीयट भी नहीं किया...

सुभाष - उनके जगह तुम होते... तो तुम भी कुछ नहीं कर सकते थे... (विश्व हैरान हो कर सुभाष की ओर देखता है) हाँ... जिस तरह... तुमने मैंम को सब बातेँ छुपाने के लिए कहा... उसी तरह.. मैंने भी एक बात छुपाई...

विश्व - क्या...

खान - वह मैं बताता हूँ... विश्व... इनके विंडो ऐसी में... बाहर से... स्लीपिंग गैस छोड़ा गया था... जिसके वज़ह से... यह लोग... अनकंशीयस पैरालाइज हो गए थे... उसके बाद जाकर... वे लोग किचन के रास्ते घर में घुसे थे...

विश्व - क्या...

तापस - हाँ.. हमें सब मालूम तो हो रहा था... पर हम बेबस और लाचार थे... वह लोग आए... हमें उठाए और गाड़ी में डाल कर चल दिए... उसी तरह रास्ते में गाड़ी रुकी... कोई और आए हमें उठाए और चल दिये... जब हम सचेत हुए... तब खुद को... किसी प्राइवेट क्लिनिक में पाया... और हमारे पास विक्रम खड़ा था...

प्रतिभा - हमारे होश में आने के बाद... विक्रम ने हमें अपना घर ले गया... और अपने गेस्ट रुम में सुला दिया... बस.... यही हुआ था...

जोडार - तुम अब घबराना मत... अब आगे से कोई सेक्यूरिटी ब्रिच नहीं होगी... अब तुम्हारे पेरेंट्स का जिम्मा मेरा... तो... अब थोड़ा टॉपिक चेंज करें...

विश्व - (मुस्कराते हुए अपना सिर हिलाता है) अच्छा माँ... आपने... विक्रम से मेरे लिए क्यूँ गिड़गिड़ाई...

प्रतिभा - अरे... अपने बच्चे के लिए... कौन माँ ऐसा नहीं करेगी...

विश्व - क्यूँ आपको मुझ पर भरोसा नहीं था... जब मैं उस शख्स के बाप और उसकी सल्तनत से टकरा रहा हूँ... तब आपको लगता है... मैं उसके बेटे से हार जाता...

प्रतिभा - (मुस्करा देती है) ह्म्म्म्म... ऊँ हूँ... अपनी वक़ालती दिमाग मुझ पर चला रहे हो...

तापस - अरे भाग्यवान क्यूँ बेचारे को और टेंशन दे रही हो... चलो मैं ही बता देता हूँ... तो हुआ यूँ बर्खुर्दार... हम गेस्ट रुम में सोये हुए थे कि... अचानक दरवाजा खोल कर... नहीं नहीं... दरवाजा तोड़ कर... हाँ यह ठीक रहेगा... हमारी बहु... कमरे में घुस आई... उसने हमें उठाया... हम आँख मलते मलते उठे... उसके बाद... वह तुम्हारे माँ के सामने घुटनों पर आकर गिड़गिड़ाई... विक्रम की जिद के बारे में सब कहा... और यह भी कहा... अगर इसबार विक्रम हार जाता है... तो वह अंदर से टुट जाएगा... इसलिए तुम्हारी माँ से यह लड़ाई रोकने के लिए कहा... समझे बर्खुर्दार...

प्रतिभा - हो गया...

तापस - जी... सरकार...

प्रतिभा - फिर भी... एक पल के लिए तो मैं सकपका गई थी... जब विक्रम ने पुछा.. किसके खबर करने पर मैं वहाँ पहुँची...

तापस - हाँ भाग्यवान... क्या ग़ज़ब की ऐक्टिंग की तुमने...

प्रतिभा - (शर्माते हुए) ओ हो बस भी करो... मैं अपनी बहु के लिए... और बेटे के लिए... इतना भी नहीं कर सकती... क्यूँ प्रताप...

कमरे में सभी मुस्करा कर विश्व की ओर देखने लगते हैं तो विश्व शर्म के मारे अपना चेहरा इधर उधर करने लगता है l उसकी परिस्थिति देख कर जोडार कहता है

जोडार - ओके ओके... लेट चेंज द टॉपिक... अच्छा विश्व... तुमने अब तक कुछ जुटाया या नहीं... आई मीन टू से... कुछ काम के इन्फॉर्मेशन निकाले की नहीं...

विश्व - जी निकाला तो है... पर

फिर विश्व अपने अज्ञात इन्फॉर्मर के जरिए राजगड़ मल्टीपर्पोज कोऑपरेटिव सोसाइटी की धांधली के बारे में सबको बताता है l

खान - अरे बाप रे... क्या खतरनाक दिमाग लगाया है... यह तो भयंकर लूट है...

विश्व - हाँ...

सुभाष - तो फिर क्यूँ ना... हम मीडिया स्टिंग ऑपरेशन करें... बात मीडिया में आएगी... तो पोल खुल जाएगी...

प्रतिभा - नहीं... इससे ज्यादा कुछ फायदा होगा नहीं...

सुभाष - क्यूँ नहीं...

प्रतिभा - पहली बात... मीडिया में बात ले जाने के लिए... हमारे पास कुछ आधार होने चाहिए... और मुझे लगता है... राजा क्षेत्रपाल... इस एंगल से भी सोचा होगा... अगर मीडिया में बात आई भी... तो जाँच बिठा दी जाएगी... जाँच में उनके द्वारा संचालित सिस्टम के अधिकारी बैठेंगे.... फिर कच्छुए की रफ्तार में जाँच आगे बढ़ेगी... और जब तक... जाँच रिपोर्ट आएगी... तब तक ना तो राजा क्षेत्रपाल होगा... ना हम...

खान - हाँ इंडियन जुड़ीसियरी सिस्टम की यही तो खामी है...

विश्व - हाँ... हमारे सिस्टम में जो छेद है... उसमें हाती निकल जाएगा... पर चूहा फंस जाएगा...

जोडार - मानना पड़ेगा... क्या परफेक्ट मैनेजमेंट है... लोगों की घर और जमीन... बैंक के पास मॉडगैज है... पर लोगों को खबर नहीं... उनका इंस्टालमेंट मनरेगा के जरिए... जन-धन खाते से कट रही है... उन्हें मालुम भी नहीं हो रहा है...

खान - पर यह कैसे मुमकिन है... खाते में किसका फोन नंबर अटैच है... और एड्रेस...

विश्व - मैंने सब कुछ इंक्वायरी कर लिया है... सभी के सभी खातों में... राजा साहब के गुर्गों के नंबर अटैच हैं... एड्रेस सभी केयर ऑफ क्षेत्रपाल महल है... इसलिए चाहे एसएमएस हो या... हार्ड कॉपी मेसेज... सभी राजा साहब को हासिल होता है... ना कि उन लोगों को... जिनकी ऐसेट बैंक में मॉडगैज है...

खान - ओह माय गॉड...

विश्व - जाहिर है... इस घपले बाजी में... सिस्टम के... या तो करप्ट लोग... या फिर मजबूर लोग ईनवॉल्व हैं... इसलिए लोगों को बताऊँगा तो भी... उन्हें यकीन नहीं होगा... क्यूँकी उन्हें यकीन दिलाने के लिए... मेरे पास... सिवाय इंफॉर्मेशन के... कोई ठोस सबूत भी नहीं है...

खान - वाक़ई... यह क्षेत्रपाल बहुत कमिनी चीज़ निकला.....

प्रतिभा - (चिल्लाती है) बिंगो.....

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रंग महल की दिवान ए खास की प्रकोष्ठ

भैरव सिंह अपनी राजसी कुर्सी पर पैरों पर पैर मोड़ कर बैठा हुआ है l सामने उसके एक टेबल पर कुछ ब्रीफकेस रखे हुए हैं l एक और कुछ लोग खड़े हुए हैं और उनके सामने कुछ कुर्सियाँ लगी हुई हैं l भैरव सिंह के कुर्सी के बगल में एक तरफ बल्लभ और दुसरी तरफ भीमा खड़ा था l

बल्लभ - (आए हुए लोगों से) आप सबका स्वागत है... इन कुछ महीनों में... हम लोगों ने इतना कमाया है... जितना कभी सोच भी नहीं सकते थे... यह सब आपके सामुहिक समर्पण के वज़ह से संभव हुआ है...

कह कर बल्लभ ताली बजाता है l सारे लोग जो एक तरफ खड़े थे वे पहले एक दूसरे को देखते हैं फिर सब मिलकर ताली बजाने लगते हैं l भैरव सिंह अपने हाथ से हल्का सा इशारा करता है तो सब ताली बजाना रोक देते हैं l

बल्लभ - अब आप लोग तैयार हो जाएं... अपने अपने हिस्सा लेने के लिए... (बल्लभ चुप हो जाता है)

भैरव सिंह - और मैनेजर.... (बैंक मैनेजर से) कोई तकलीफ...

बैंक मैनेजर - नहीं राजा साहब... आपका राज है... आपका आशीर्वाद है... तकलीफ कैसी...

भैरव सिंह - ह्म्म्म्म... (सबसे) किसी को कोई तकलीफ है... (सब चुप चाप खड़े हो कर एक-दूसरे को ताकने लगते हैं) अगर कोई तकलीफ है... तो बात कर सकते हो... आओ बैठो और हमसे अपना तकलीफ साझा करो...

सभी - नहीं राजा साहब... आपके सामने हम खड़े हैं... यही बहुत है... इससे हमारी इज़्ज़त को चार चांद लग जाता है... आपके बगल में बैठें... ऐसी हमारी औकात नहीं... हमें... हमें कोई तकलीफ नहीं है...

एक शख्स - पर लगता है... इंस्पेक्टर रोणा को कोई तकलीफ है... दिखाई नहीं दे रहे हैं...

भैरव सिंह की जबड़े सख्त हो जाते हैं, वह बल्लभ की ओर देखता है l बल्लभ समझ जाता है और सबसे कहता है

बल्लभ - यह क्या बात हुई... क्या सच में आपको मालुम नहीं है... इंस्पेक्टर रोणा छुट्टी पर हैं... (सभी अपना सिर हिला कर ना कहते हैं) वह... अपने पारिवारिक काम के सिलसिले में... कुछ दिनों के लिए बाहर गए हैं...

एक शख्स - ओह... हम तो यशपुर में रहते हैं... इसलिए शायद हम बेख़बर रहे...

बल्लभ - ठीक है... अभी एक एक करके... अपना अपना ब्रीफकेस उठाओ और चलते बनो...

सब वही करते हैं l एक एक कर आगे आते हैं, टेबल पर रखे एक एक ब्रीफकेस उठाते हैं और भैरव सिंह के पैरों पर झुक कर बाहर निकल जाते हैं l उनके जाने के बाद भैरव सिंह भीमा से कहता है

भैरव सिंह - जाओ भीमा... सबको विदा कर यहाँ आओ... (भीमा वैसा ही करता है, उन सभी लोगों के पीछे चला जाता है) प्रधान.... वाकई... यह रोणा कहाँ छुप गया है...

बल्लभ - राजा साहब... मुझे भी खबर नहीं है... पर आपको उसकी क्या जरुरत पड़ गई...

भैरव सिंह - आज ही सोनपुर डिविजन के एसपी का फोन आया था...

बल्लभ - क्या...

भैरव सिंह - तुम जानते हो... सीआई और आईआईसी में क्या फर्क़ है...

बल्लभ - हाँ... दोनों के रैंक और पावर एक हैं... सीआई का मतलब होता है... सर्कल इंस्पेक्टर... जिसके अधीन में... कुछ छोटे थाने और आउट पोस्ट होते हैं... पर आईआईसी मतलब इंस्पेक्टर इनचार्ज होता है... जिसके आधीन में एक ही थाना क्षेत्र होता है... जो एक सेंसिटिव इलाके में होती है...

भैरव सिंह - और राजगड़ एक सेंसिटिव एरिया है...

बल्लभ - (चुप रहता है)

भैरव सिंह - (अपनी जगह से उठ कर बल्लभ के पास आता है) एसपी ने इसीलिए फोन किया था... के कोई इतना बड़ा पदाधिकारी... इंडेफिनाईट छुट्टी पर रह नहीं सकता... डीसीप्लिनेरी एक्शन लिया जा सकता है... और सबसे खास बात... (बल्लभ भैरव सिंह के चेहरे की ओर देखता है) एसपी ने भले ही बताया नहीं पर... रोणा को गुमशुदगी को... श्रीधर परीड़ा से जोड़ कर देख रहे हैं...

बल्लभ - क्या... एसपी कहना क्या चाह रहे थे...

भैरव सिंह - हमसे गुजारिश कर रहे थे... के राजगड़ थाने में... किसीको डेपुटेशन पर भेजेंगे... जब तक... रोणा आकर फिरसे ड्यूटी टेक ओवर नहीं करता...

बल्लभ - ओ...

भैरव सिंह - तुम हमारे लीगल एडवाइजर हो... क्या करना चाहिए हमें...

बल्लभ - राजा साहब... मेरा काम है... आपके हर कामों को... लीगलाईज करना... एडवाइज करना नहीं...

भैरव सिंह - ठीक है... अपना राय दो...

बल्लभ - राजा साहब... यह लॉ एंड ऑर्डर का सिचुएशन और डीसीप्लीन की बात है... आप को जो ठीक लगे...

भैरव सिंह बल्लभ की ओर देखता है l बल्लभ अपना नजर झुका लेता है l तभी बाहर से भीमा अंदर आता है l भीमा से भैरव सिंह फोन लाने के लिए कहता है l

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कमरे में मौजूद सभी प्रतिभा को ओर सवालिया नजर से देखने लगे l सबकी नजरों की आशय को प्रतिभा समझ कर पूछती है

प्रतिभा - क्या हुआ... आप सभी लोग... मुझे ऐसे क्यूँ देख रहे हो...

तापस - अरे भाग्यवान ह... आपके श्री मुख से... समाधान वाली वाणी सुनने के लिए... सब आपको देख रहे हैं...

प्रतिभा - हो गया...

विश्व - प्लीज डैड...

तापस - ओके ओके...

विश्व - प्लीज माँ... कंटीन्यु...

प्रतिभा - तो सुनो... गाँव में... तुम्हारा अपना टीम है राइट...

विश्व - हाँ...

प्रतिभा - तो हालात से और संयोग से... तुम्हारे लिए यहाँ पर भी एक टीम उपलब्ध है... (सभी से) क्यूँ ठीक कहा ना मैंने... (सभी अपनी सहमती देते हैं)

विश्व - माँ... तुम कहना क्या चाहती हो...

प्रतिभा - अरे... हेव पेशेंस... देखो... अब यह तो तय है कि... तुम चाहते हो के राजगड़ और आसपास के गाँव के लोगों को मालुम हो... की उनकी घर जमीन सब बैंक के पास गिरवी है... उसका पैसा कोई और खा रहा है...

विश्व - हाँ...

प्रतिभा - तो हमें ऐसा कुछ करना होगा कि बैंक खुद... उन लोगों को... उनकी जमीन जायदाद की ना सिर्फ इन्फॉर्मेशन दे... बल्कि... गिरवी के बारे में... लोन के बारे में... इंस्टॉलमेंट के बारे में भी जानकारी दे...

विश्व - कैसे माँ कैसे... इन सबके बारे में... बैंक जो भी मेसेज करता है... उसकी एसएमएस राजा साहब के पाले हुए कुत्तों के मोबाइल पर आता है... और हार्ड कॉपी सब... क्षेत्रपाल महल को जाति है...

तापस - तभी मैं सोचूँ... तुमसे इतना मार खाने के बावजुद... भैरव सिंह उन्हें माफ कैसे किए हुए है...

विश्व - हाँ... यह एक वज़ह हो तो सकती है...

खान - ओ हो... डोंट चेंज द टॉपिक... प्लीज भाभी... आप बताइए...

प्रतिभा अपनी जबड़े भिंचते हुए तापस और विश्व को घूरने लगती है l विश्व और तापस दोनों भीगी बिल्लियों की तरह सिर झुका कर बैठ जाते हैं l

प्रतिभा - (दोनों को घूरते हुए) नहीं... मैं नहीं कहूँगी...

कह कर मुहँ मोड़ लेती है l विश्व इशारे से तापस से कहता है प्रतिभा को मनाने के लिए l तापस अपना कान पकड़ कर सिर हिला कर ना करता है तो विश्व घुटनों पर आकर प्रतिभा के सामने बैठ जाता है l

विश्व - माँ प्लीज ना... सॉरी कहा ना मैंने... प्लीज प्लीज बताओ ना...

प्रतिभा - ठीक है ठीक है... ज्यादा ओवर ऐक्टिंग मत कर... अब चुपचाप मेरी बात सुन...

तापस - हाँ बोलो बोलो... भाग्यवान...

प्रतिभा - आप चुप रहेंगे... (अपनी होंठ पर उंगली रख कर कहती है, तापस अपने होंठ पर उँगली रख लेता है) तो अब ध्यान से मेरी बात सुनो... तुम राजगड़ और आसपास के गाँव में से... कुछ लोग चुनो... जिनकी तुम्हारे पास... और तुम्हारे पास एप्रोच हो... कम से कम... दस लोग... बैंक में एक प्रोसिजर होता है... केवाईसी का... इसमें फोन नंबर और एड्रेस अपडेट किया जाता है... तुम उन्हीं दस लोगों का केवाईसी करवा दो... ताकि अगली इंस्टॉलमेंट की खबर उन्हें एसएमएस के जरिए मालुम हो जाए... और लोन डिटेल्स उन्हें लेटर के जरिए... उनके ही एड्रेस में मिल जाए... (विश्व थोड़ी सोच में पड़ जाता है) क्या सोचने लगा...

विश्व - माँ आइडिया तो तुम्हारा बढ़िया है पर...

प्रतिभा - पर क्या...

विश्व - पर गाँव में यह सब करने के लिए... बैंक मैनेजर का भी साथ चाहिए... और राजगड़ हो या यशपुर... दोनों जगहों पर यह संभव नहीं...

प्रतिभा - जानती हूँ... पर यह केवाईसी तुम ब्रांच ऑफिस या जोनल ऑफिस के बजाय... हेड ऑफिस से मदत लो...

विश्व - हेड ऑफिस... हेड ऑफिस में भी कौन मदत करेगा... जैसे ही राजगड़ का नाम आयेगा... सब अपना पल्ला झाड़ लेंगे...

जोडार - नहीं... सब नहीं...

विश्व - मतलब...

जोडार - वाकई... सेनापति मैंम ने बहुत ही बढ़िया आइडिया दिया है... उन्होंने सच ही कहा है... की गाँव में तुम्हारी एक टीम है... और यहाँ.. हालात से और संयोग से तुम्हारे पास एक टीम है... तुम्हारा यह प्रॉब्लम मैं सॉल्व करूँगा...

तापस और विश्व - व्हाट... हाऊ... कैसे...

जोडार - देखो... मेरा एक बहुत बड़ा लोन सैंक्शन होने वाला है... इत्तेफाक से... बैंक का डायरेक्टर से मेरी अच्छी जान पहचान है... तुम केवाईसी की फॉर्म साइन करवा कर लाओ.... उसे हेड ऑफिस में अपडेट... मैं करवाऊंगा...

सभी अचानक से ताली बजाने लगते हैं l विश्व उठ कर प्रतिभा को गले लगा लेता है और प्रतिभा के गाल पर एक लंबी धन्यबाद वाली चुंबन जड़ देता है l

प्रतिभा - बस बस..

विश्व - अरे माँ.. थैंक्यू कर रहा हूँ...

प्रतिभा - मालुम है... पर मत भूल... मेरी बहु को भी तुझे थैंक्यू करना है...

विश्व - (चेहरा शर्म से लाल हो जाता है, हकलाते हुए) क्क्क्.. क्क्क्या...

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अगले दिन

xxxx कॉलेज लाइब्रेरी में रुप कुछ किताबें लौटा कर लाइब्रेरियन से क्लियरेंस ले कर जैसे ही घूमी सामने उसके छटी गैंग खड़ी थी l रुप रास्ता बना कर किनारे से निकल जाती है तो फिर बनानी और भाश्वती दोनों जाकर उसे लाइब्रेरी के बाहर रोकते हैं l रुप रुक जाती है तो बाकी दोस्त भी उसके पास आकर खड़े हो जाते हैं l

भाश्वती - क्या यार... इतना भी क्या रूठना...

बनानी - हाँ नंदिनी... उस दिन से तुम मुहँ मोड़ कर गई हो कि आज तक... हमसे बात भी नहीं कर रही हो... हमसे अलग... दूर बैठती हो...

इतिश्री - ओके... तुम रूठी हुई हो... जायज है... पर कितने दिन...

रुप - तुम कुछ नहीं कहोगी... तब्बसुम... और तुम... दीप्ति... ह्म्म्म्म...

दोनों - वह... सॉरी यार... फॉर गिव अस...

रुप उन सबके चेहरे को गौर से देखती है l सबके चेहरे पर मायूसी साफ दिख रही थी l

रुप - ओके ओके... तुम सब लगता है गले तक भरे हुए हो... चलो.. बोटनिकल गार्डन चलते हुए...

सभी रुप के पीछे बोटनिकल गार्डन में पहुँचते हैं l वहाँ पहुँचने के बाद रुप एक बेंच पर बैठ जाती है पर सारी लड़कियाँ खड़ी रहती हैं l

रुप - हम्म... बोलो.. क्या प्रॉब्लम है...

दीप्ति - यह क्या नंदिनी... हमने तो बताया... और माफी भी मांग रहे हैं...

रुप - यह बहुत अच्छा है... पहले ठेस पहुँचाओ फिर माफी माँगो...

बनानी - अरे यार... तुम क्यूँ किसी रेकार्ड की तरह वहीँ पर अटकी हुई हो...

रुप - ह्म्म्म्म... ठीक है... एक काम करो... सबसे पहले बैठ जाओ.... तुम सब... (सभी बैठ जाते हैं पर रुप के सामने) देखो... आज मेरे बोलने का दिन है... इसलिए तुम सब चुप चाप सुनोगे... बीच में कोई नहीं बोलेगा... ठीक... (सभी अपना सिर हिला कर हामी भरते हैं) तो.. मेरी जिंदगी... तुम लोगों के जैसी नहीं रही... तुम लोग बचपन से ही... अपने आसपास लोगों को... दोस्तों को... रिश्तेदारों को देखी होंगी... उनके साथ वक़्त बिताते बिताते यहाँ तक पहुँची होंगी... पर मेरी जिंदगी ऐसी नहीं थी... ना कोई दोस्त था... ना कोई रिश्तेदार... बस बड़ी होती गई... पहली बार ऊँची पढ़ाई के लिए... यहाँ आई... जब नाम छुपाया... तो तुम सबसे दोस्ती हुई... पर जब असलियत सामने आई... तुम लोग मेरी दोस्ती से भी... कतराने लगे थे... डराया धमकाया... तब जाकर तुम लोग दोस्त बने.. है ना...

बनानी - नहीं... यह पूरी तरह ठीक नहीं है...

रुप - ओके... लेट मी फिनिश फर्स्ट... मेरे खानदान का इमेज कितना खराब था... यह मैं अच्छी तरह से जानती हूँ... पर चूँकि जीवन में पहली बार... मैंने खुद से दोस्त बनाए थे... इसलिए मैं तुम लोगों को खोना नहीं चाहती थी... क्यूंकि मेरी जिंदगी की सबसे क़ीमती तोहफा थे तुम लोग... बनानी... तुम्हें याद है... तुम्हारी बर्थ डे पर... क्या हुआ था... मैं सेलीब्रेट करना चाहती थी... पर... खैर जो भी हुआ... उसके पीछे दीप्ति... तुम्हारी कंस्पीरैसी थी... रवि के साथ मिलकर... रॉकी की मदत कर रही थी... सब जानने के बाद भी... तुम्हें माफ किया था... क्यूँकी तुम दोस्त थी मेरी... जबकि पूरा शहर जानता है.. मेरे भाई कैसे हैं... इंक्लुडिंंग यु ऑल... पर क्राइम तो किया था ना तुमने... यु सो कॉल्ड सोशल पीपल... (दीप्ति का चेहरा उतर जाता है) और भाश्वती... तेरी मदत को मैं हरदम तैयार रहती थी... यहाँ तक मेरी बचपन की सारी बातें तुझसे शेयर किया था... पर फिर भी... तुझे... अनाम के अतीत से... प्रॉब्लम हो गई... कैसे भूल गई... तुझे कैसे बचाया था... (भाश्वती का चेहरा झुक जाता है) और तब्बसुम तुम... छुप कर बैठी थी... खुर्दा में... आज अगर भुवनेश्वर में बेखौफ रह रही हो... किसकी बदौलत...

सबके चेहरे उतरे हुए थे और झुके हुए थे l रुप खुद को दुरुस्त करती है फिर कहना शुरु करती है l

रुप - मैंने समाज को किताबों में पढ़ा था... पर तुम लोगों से मिलने के बाद... तुम लोगों से जुड़ने के बाद... मेरा अपना एक समाज बना... पर समाज कितना बेरहम हो सकता है... यह तुम लोगों ने एहसास कराया...

दीप्ति - (भर्राई आवाज़ में) सॉरी यार...

रुप - प्लीज... लेट मी फिनिश... दोस्तों में झगड़े हो सकते हैं... मनमुटाव भी हो सकते हैं... पर पीठ पर बात करते हुए छुपाना... (आवाज़ थर्रा जाती है) मुझे बहुत ठेस पहुँचाया... मुझे वाकई में पता चला... आख़िर समाज का ऐसा भी हो सकता है... (मुर्झाई हँसी के साथ) कहीं सुना था... या शायद कहीं पढ़ा था... प्यार और दोस्ती में फर्क़ क्या है... प्यार जहां आँखों में आँसू दे जाता है... वहीँ दोस्ती होंठों पर मुस्कान लाती है... पर... मेरे साथ थोड़ा उल्टा हो गया... मेरे दोस्त मेरे आँखों में आँसू ला दिए... जबकि मेरा प्यार... मेरे होंठो पर हँसी देखने के लिए... किसी भी हद तक गुजर सकता है...

रुप चुप हो जाती है, सभी आँखों में आँसू लिए रुप की ओर देखते हैं l रुप का चेहरा लाल हो गया था और अपनी आँखों को पोछ रही थी l

दीप्ति - सॉरी यार सॉरी... इन कुछ दिनों में... हमारी भी यही हालत है... प्लीज यार... अब तो शिकवा दुर कर ले...

रुप - फ्रेंड्स... ऐक्चुयली... आई नीड सम स्पेस... मैं कुछ ही दिनों में... गाँव जा रही हूँ... होली के छुट्टी पर... जब वापस आऊंगी... तुम्हारी दोस्त बन कर आऊंगी... हाँ... पर मैं कब आऊंगी... मैं नहीं जानती...

बनानी - क्यूँ... तु ऐसा क्यूँ कह रही है...

रुप - पता नहीं... अंदर से एक वाईव सा आ रहा है... इस बार का जाना...नजाने कब लौटना होगा... (हँस कर दिलासा देते हुए) पर... दोस्तों... मैं आऊंगी जरूर... यह वादा रहा....

इतना कह कर रुप वहाँ से बिना पीछे मुड़े अपनी दोस्तों की ओर देखे गाड़ी की पार्कींग की ओर चल देती है l

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हाथ में टिफिन बॉक्स लेकर विक्रम की केबिन में आती है शुभ्रा l विक्रम अपनी कुर्सी में लेट कर किन्ही ख़यालों में गुम था l जैसे ही शुभ्रा को देखता है वह सीधा हो कर बैठता है l शुभ्रा कमरे के एक कोने में स्थित डायनिंग टेबल पर खाना लगा कर विक्रम की ओर देखती है l विक्रम अपनी जगह से उठ कर अपनी प्लेट के पास बैठता है l विक्रम देखता है शुभ्रा उसे एक अलग सी नजर से एक टक घूरे जा रही है l

विक्रम - क्या हुआ...

शुभ्रा - आपसे बहुत कुछ जानना चाहती हूँ... पता नहीं कहाँ से शुरु करूँ...

विक्रम - कहीं से भी कीजिए... मैं ज़वाब दूँगा जरुर...

शुभ्रा - (विक्रम के सामने बैठ जाती है, वैसे ही घूरते हुए) क्या आपको पता था... सेनापति दंपति की अपहरण होने वाला है...

विक्रम - नहीं पर अंदेशा था.... (शुभ्रा के चेहरे को देखते हुए) पर... यह सब आप मुझसे कल भी तो पूछ सकती थी... और ऐसा क्यूँ लग रहा है कि... आपको मुझ पर शक़ हो रहा है...

शुभ्रा - शक़ नहीं... पर...

विक्रम - हम्म... पर क्या...

शुभ्रा - विकी... मैं जानती हूँ... आई मीन... मुझे एहसास है... आपका... विश्व के प्रति... (कह नहीं पाती चुप हो जाती है)

विक्रम - देखीए शुब्बु... आपके मन में जो भी है... साफ साफ कहीये...

शुभ्रा - (थोड़ी हिचकिचाते हुए) देखीए विकी... मैं जानती हूँ... आपने कहा भी था... के एक दिन.. विश्व का एहसान आप उतारोगे... और एक दिन वक़्त ऐसा भी आएगा... के कोई उसका अपना... आपके आगे गिड़गिड़ाएगा... तो... (फिर से चुप हो जाती है)

विक्रम - तो

शुभ्रा - आप इतने दिनों बाद आज क्लीन सेव्ड हैं... आपकी मूंछें भी पहले जैसे... शार्प और... ताव भरे हैं...

विक्रम - हूँ... तो आपको यह लग रहा है कि... मैं अपनी मूँछों के लिए... अपनी इगो को साटिसफाई करने के लिए... यह प्लॉट रचा है... (शुभ्रा की नजरें झुक जाती है) शुब्बु... मेरे तरफ देखिए... (शुभ्रा नजर उठा कर देखती है) विश्व प्रताप... जिस तेजी से... आग की ओर बढ़ रहा है... मुझे मालूम था... उसकी आँच एक दिन उसके परिवार तक पहुँचेगी... इसलिए मैं अपने आदमियों के जरिए... सेनापति दंपति पर नजर रख रहा था... वैसे भी मुझे... आप पर किए एहसान को उतारना भी तो था... सो उतार दिया... बाकी आगे जो हुआ... हाँ मैं उसकी तलबगार था... और हुआ भी वैसे ही... पर...

शुभ्रा - पर क्या...

विक्रम - आपकी सखी... सहेली... दोस्त... आपकी ननद... दिखी नहीं मुझे सुबह से...

शुभ्रा - (सकपका जाती है) वह... ऐक्चुयली... कॉलेज की लाइब्रेरी में... बुक्स लौटाने गई है...

विक्रम - या फिर... मेरा सामना ना हो जाए... इसलिए जल्दी ही कॉलेज निकल गई...

शुभ्रा - यह... यह आप.. क्या कह रहे हैं... (अब विक्रम घूर कर देखने लगा शुभ्रा को, शुभ्रा को लगता है जैसे उसकी चोरी पकड़ी गई) आप ऐसे क्यूँ... देख रहे हैं...

विक्रम - शुब्बु... जब सेनापति दंपति को मैंने रेस्क्यू किया... तब वे दोनों अंकंसियस थे... ट्रीटमेंट करा कर... उन्हें गेस्ट रुम में रखा था... फिर उन्हें कैसे मालुम हुआ... जीम में क्या हो रहा है... ना सिर्फ वे लोग पहुँचे... पीछे पीछे आप और नंदिनी भी...

शुभ्रा - वह.. बात दरअसल यह है कि... (अटक अटक कर) हमें... गेस्ट रुम से कुछ आवाजें सुनाई दी... और हम वहाँ पहुँचकर देखा... एडवोकेट सेनापति... बदहवास... पूछ रही थी... के वे कहाँ हैं... उनका बेटा कहाँ है... तो... (आगे कुछ कह नहीं पाती)

विक्रम - ह्म्म्म्म... वैसे क्या वह... नंदिनी को जानते हैं...

शुभ्रा - नहीं नहीं... हाँ हाँ...

विक्रम - क्या मतलब...

शुभ्रा - नहीं का मतलब... नंदिनी क्षेत्रपाल है यह नहीं जानती... और हाँ इसलिए... की नंदिनी उनकी सुपर्णा मैग्जीन की एडिटोरीयल राइटिंग की बड़ी फैन है... और एक बार इसी सिलसिले में... उसकी एक दो बार... मुलाकात भी हुई थी...

विक्रम - (कोई रिएक्शन दिए वगैर) ओ...

शुभ्रा को विक्रम का ऐसा रिएक्शन अटपटा लगता है l विक्रम चुप चाप अपना खाना खाने लगता है l शुभ्रा को लगता है जरूर कोई और बात है, विक्रम उसे या तो पूछ नहीं रहा है या फिर बता नहीं रहा है l

शुभ्रा - विकी...

विक्रम - हूँ...

शुभ्रा - मुझे ऐसा क्यूँ लग रहा है... आप मुझसे कुछ पूछना चाह रहे हैं...

विक्रम - (एक कुटिल मुस्कान मुस्कराते हुए) आप दोनों... ननद भाभी के बीच बहुत से राज हैं... जो मैं नहीं जानता...

शुभ्रा - यह... आ.. आप.. क्क्क्या...

विक्रम - शुब्बु... कल जब मैं विश्व को रस्सियों के सहारे दबोच रखा था... तब... उसके गर्दन के पीछे... मुझे रुप नाम गुदा हुआ दिखा... तब से मैं कुछ डॉट जोड़ने लगा हूँ... अब आप इसके बारे में क्या कहेंगी...

शुभ्रा - (चेहरा सफेद हो जाता है)

विक्रम - मुझसे आप कुछ ना कहें... तो कोई बात नहीं... पर क्या मुझे इतना तो मालुम होना ही चाहिए... विश्व की वह रुप कौन है...

शुभ्रा अपनी आँखे मूँद कर एक गहरी साँस लेती है और अपना सिर हाँ में हिलाती है l फिर विक्रम की ओर देख कर विश्व और रुप की कहानी बताने लगती है, जो जो उसे रुप ने जैसा बताया था, वैसे ही सारी बातेँ बता देती है l सारी बातेँ सुनने के बाद विक्रम कहता है

विक्रम - हूँ... तो मेरा शक़ सही था... प्रतिभा जी को... नंदिनी ने जीम में हो रही फाइट के बारे में बताया था...

शुभ्रा कुछ नहीं कहती l विक्रम उठ कर अपना हाथ धोने चला जाता है फिर वापस जब आता है तो देखता है शुभ्रा की चेहरे पर परेशानी थी l

विक्रम - शुब्बु... आप परेशान मत हों... मैं चाहे जैसा भी हूँ... पर बातों को जज्बातों को समझ सकता हूँ... मेरी बहन की बचपन आम ल़डकियों की बचपन की तरह नहीं गुजरी है... इसलिए विश्व का नंदिनी के जीवन में होना... कोई अचरज की बात नहीं है... पर हाँ चिंता की बात जरूर है... जब राजा साहब को उन दोनों के बारे में पता चलेगा... तब क्या होगा...

शुभ्रा - मतलब... आपको... कोई शिकायत नहीं है...

विक्रम - किस बात की शिकायत... शुब्बु... एक अहंकार तो मन में था... शायद है भी... के मुझसे बेहतर कोई नहीं है... या तो मुझ से कम हो सकते हैं... या फिर मेरे बराबर... पर विश्व अलग है... वह खुदको इतना उपर रखा है कि... मुझे उसके बराबर होने के लिए जद्दोजहद करना पड़ा... आपके सामने मुझे यह स्वीकारने में कोई दिक्कत नहीं है... के विश्व मुझसे हर मामले में बेहतर है...

शुभ्रा - तो क्या... अब आप वीर की जैसे मदत कर रहे हैं... आगे नंदिनी की वैसे मदत करेंगे...

विक्रम इस सवाल पर खामोश रहता है, शुभ्रा भी ना तो कोई और सवाल करती है ना ही सवाल को दोहराती है l अचानक विक्रम अपनी कुर्सी के पास जाता है और अपना ब्लेजर उठा कर बाहर चला जाता है l अपनी सवाल के साथ कमरे में शुभ्रा रह जाती है l

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वॉशरुम में अपनी मूँछों पर सफेद बालों को छाँट छाँट कर रोणा काट रहा था l अभी अभी बालों पर डाई लगाया था l तभी उसके कानों में मोबाइल की वाईव्रेशन की आवाज़ आती है l वह मोबाइल के पास जाता है स्क्रीन पर वीडियो कॉल में लेनिन दिखाई दे रहा था l रोणा झट से कॉल उठाता है l उसे स्क्रीन पर एक पार्क में बेंच पर एक जोड़ा बैठे दिखते हैं l

लेनिन - देख रहे हैं...

रोणा - अबे यह जोड़ा है किसकी...

लेनिन - कमाल कर रहे हैं... आपको... विश्वा और उसकी माशुका दिख नहीं रहे हैं...

रोणा - अबे हराम के... किसको दिखा कर मेरे मजे ले रहा है...

लेनिन - एक मिनट...

मोबाइल के कैमरे के सामने कोई लेंस फिट करता है l तब रोणा को अपनी स्क्रीन पर वह जोड़ा साफ नजर आते हैं और वह जोड़ा कोई और नहीं विश्व और रुप ही थे l उन्हें देखते ही रोणा की आँखों में अंगारे उतर आते हैं l

लेनिन - अब तो आपको साफ दिख रहे होंगे...

रोणा - हाँ... पर यह सब दिखा कर क्या साबित करना चाहता है...

लेनिन - यही की... मैं बहुत ही सीरियस हूँ... आपने मेरा काम कर रखा है... और मैं आपका काम बहुत जल्द करने वाला हूँ...

रोणा - उस लड़की के बारे में कुछ पता चला...

लेनिन - नहीं... पता करने की कोई जरूरत नहीं... मतलब आप ही ने बताया था... की कोई भी हो... आपको फर्क़ नहीं पड़ता... इसलिए मैंने भी कोई कोशिश नहीं की...

रोणा - मुझे उन तोता मैना की बातेँ सुननी है...

लेनिन - यह कैसे हो सकता है... वे लोग बहुत दुर हैं... मैं उनके सामने या पास भी नहीं जा सकता...

रोणा - पर तु तो कह रहा था... उसकी मोबाइल में तुने बग लगाया है...

लेनिन - हाँ पर वह उसके फोन पर बातेँ सुनने के लिए... वह बग तभी काम करेगा... जब उसकी फोन पर कोई कॉल आएगी या... कॉल जाएगी...

रोणा - तो फिर फ़ालतू में कॉल लगा कर मेरा टाइम खोटा क्यूँ किया...

लेनिन - तो क्या कॉल काट दूँ...

रोणा - नहीं चलने दे... कम से कम दिख तो रही है... साली कमिनी.. कुतिया...

पार्क में विश्व और रुप दोनों बातेँ कर रहे थे l

विश्व - क्या बात है... आज इतना गुमसुम क्यूँ हैं आप...

रुप - आज मैं अपने दोस्तों से... कुछ वक़्त का गैप माँगा है...

विश्व - क्यूँ....

रुप - ओ हो... अनाम... देखो... मैं आज मज़ाक के मुड़ में बिल्कुल नहीं हूँ...

विश्व - ओके ओके... आज गुस्सा पहले से ही नाक पर बैठी है...

रुप - (थोड़ा शांत हो कर) मैंने ठीक किया ना...

विश्व - हाँ बिल्कुल... किसी भी रिश्ते में अगर थोड़ी सी भी खिटपिट हो... तो उस रिश्ते में... थोड़ा गैप देना चाहिए...

रुप - थैंक्स... वैसे एक बात कहूँ...

विश्व - हाँ जरूर...

रुप - कल मैं थोड़ी डर गई थी...

विश्व - क्यों...

रुप - अरे... देखा नहीं... माँ से भैया ने जब पूछा... जीम में तुम दोनों के बारे में किसने खबर दी...

विश्व - तो इतनी सी बात पर आप डरी क्यूँ...

रुप - डर लगता है... वह मेरे बड़े भैया हैं...

विश्व - ह्म्म्म्म.... अगर मैं यह कहूँ.. के विक्रम को... कल ही मालुम हो गया... आपके और मेरे बारे में...

रुप - (उछल पड़ती है) व्हाट... क.. क.. क्कैसे..

विश्व - (अपने गर्दन के पीछे हाथ फेरते हुए) आपकी गुदाए हुए.... आपका नाम देख लिया था विक्रम ने....

रुप कुछ कहने के बजाय, अपने अंगुठे का नाखुन चबाने लगती है l विश्व उसकी हालत देख कर मुस्कराने लगता है l

विश्व - अब क्या हुआ....

रुप - ओह माय गॉड... अब मैं भईया का सामना कैसे करूंगी...

विश्व - अगर लगे के आपसे गुनाह या पाप हुआ है... तो मुहँ छुपा लीजियेगा...

रुप - (बिदक जाती है) खबरदार जो मेरे प्यार को पाप कहा तो...

विश्व - तो वैसे ही सामना कीजिए... जैसे आप रोज करती हैं...

उधर रोणा देखता है विश्व कुछ कागजात रुप के हाथों में दे रहा है l रुप उन कागजातों को लेकर बेंच से उठती है और पार्क के बाहर की ओर जाने लगती है तो अचानक विश्व उसे आवाज़ देकर रोक देता है और भागते हुए रुप के गले लग जाता है l रोणा देखता है कि रुप मुस्कराते हुए विश्व से कुछ पुछ रही है l

रुप - आह... क्या बात है... आज पहली बार जनाब ने... आगे आकर मुझे गले लगाया है...

विश्व - मैं बस यह कहना चाहता हूँ... आप कभी भी... डरीयेगा मत... मैं आपके साथ आपकी धड़कन की तरह रहूँगा...

रुप - मैं जानती हूँ... जब तुम मेरे साथ हो... कोई खतरा मुझे छु भी नहीं सकता...

इतना कह कर रुप विश्व से अलग होती है और पार्क से बाहर चली जाती है l यह देख कर रोणा अपनी जबड़े भिंच लेता है और कॉल काट देता है l

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शाम का समय

ट्वेंटी फोर सेवन हाई वे रेस्टोरेंट के एक केबिन में विक्रम बैठा हुआ था l बार बार घड़ी देख रहा था l तभी केबिन का पर्दा उठा कर विश्व अंदर आता है l

विक्रम - बोलो क्यूँ बुलाया...

विश्व - (उसके सामने बैठते हुए) एक बार तुमने मुझे बुलाया था... इसलिए सोचा... मैं तुम्हें बुला दूँ...

विक्रम - तुमने भी वही फ़ार्मूला अपनाया...

विश्व - हाँ... तुम्हें बुलाने के लिए... तुम्हारा ही आजमाया हुआ फार्मूले से बुलाना पड़ा...

विक्रम - बोलो फिर...

विश्व - थैंक्यू... मेरी माँ को बचाने के लिए...

विक्रम - बचाया इसलिये था... के तुम्हारा एहसान जो उतारना था मुझे...

विश्व - हाँ एहसान और बोझ... दोनों उतार दिए तुमने...

विक्रम - हाँ.... बात समझ में आ गई... इसलिए अब जब फिरसे सामना होगा... ना मुझ पर कोई बोझ या एहसान होगा... ना तुम पर...

विश्व - हाँ... तब बेफिक्र हो कर... तब तक लड़ सकते हैं... अपना खुन्नस उतार सकते हैं... जब तक कोई एक घुटना ना टेक दे...

विक्रम - हाँ और वह वक़्त... बहुत जल्द शायद आएगा भी... वैसे यह मेरी दिल की दुआ है... क्यूँकी तुम फ़िलहाल... अपर हैंड में हो...

विश्व - मतलब...

विक्रम - देखो विश्व... बड़ी मुद्दतों बाद... मुझे रिश्ते हासिल हुए हैं... फ़िलहाल मैं ऐसा कुछ कर नहीं सकता... जिससे मैं वह सारे रिश्ते खो दूँ...

विश्व - ओह... और वज़ह

विक्रम - वीर और नंदिनी... हाँ विश्व... वीर और नंदिनी... मैं उन्हें आज किसी भी कीमत पर खो नहीं सकता... भले ही अब तुम्हारे और मेरे बीच में... फ़िलहाल के लिए.. दुश्मनी की गुंजाईश ना हो... पर तुम यह समझने की भी भूल मत कर बैठना... के तुममे और मुझमें कोई दोस्ती हो सकती है...

विश्व - ठीक कहा तुमने... तुम्हारा मेरा रिश्ता ही कुछ ऐसे बन रहे हैं... ना दोस्ती होगी... ना दुश्मनी... पर फिर भी... हम एक दुसरे के काम आते रहेंगे... और काम लेते रहेंगे...

विक्रम - ओ... इसका मतलब... कोई काम है...

विश्व - हाँ पर वास्ता मेरा जितना है... तुम्हारा भी उतना ही है... या फिर यूँ कहो के शायद तुम्हारा ज्यादा है...

विक्रम - अच्छा... ठीक है फिर... बोलो क्या काम है... और उस काम से मेरा क्या वास्ता है....

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पैराडाईज

वीर के हाथों से अनु पट्टी बदल रही थी l अनु के आँखे नम थी l तभी दोनों के कानों में कलिंग बेल की आवाज सुनाई देती है l अनु और वीर एक दुसरे को हैरान हो कर देखते हैं फिर वीर अनु को बैठने का इशारा कर दरवाजे की ओर जाता है और मैजिक आई से बाहर देखता है पर उसे कोई नहीं दिखता, इसलिए वह दरवाजा धीरे से खोलता है l उसे बाहर कोई नहीं दिखता के तभी रुप "हू" कर आवाज निकाल कर सामने आती है l वीर थोड़ा चौंकता है l

रुप - भैया डर गए...

वीर - (मुस्कराते हुए रुप के सिर पर एक टफली मारते हुए) रोज के रोज बड़ी हो रही है... या छोटी...

रुप - आपने मुझे मारा... चलो मैं आपसे बात नहीं करती...

इतना कह कर रूठने की नाटक करते हुए घर में दाखिल होती है और अंदर जाकर अनु के गले लग जाती है l फिर अचानक उसकी आँखे पास रखे टेबल पर डेटॉल,गौज और बैंडेज वगैरह देखती है l

रुप - यह क्या है भाभी...

अनु - कुछ नहीं... (वीर की तरफ देखती है तो वीर इशारे से कुछ ना कहने के लिए कहता है) वह मुझसे काँच की ग्लास टुट गई थी... मुझे चुभ ना जाएं... इसलिए तुम्हारे भैया ने काँच के टुकड़ों को उठाया... इसलिए उनके हाथ ज़ख़्मी हो गया...

रुप - ओह... हाऊ स्वीट... भैया... आपको कितना प्यार करते हैं...

अनु - हाँ वह तो है... पर मैं उनके लिए... बदकिस्मत बन गई हूँ...

रुप - क्यूँ... क्या हुआ...

वीर - कुछ नहीं... यह तुम्हारी भाभी कुछ भी... अनाप सनाप बोलती रहती है...

रुप - ओके ओके... बताना नहीं चाहते तो कोई बात नहीं...

वीर - नहीं ऐसी कोई बात नहीं... पहले तु बता... यहाँ इस वक़्त कैसे आना हुआ...

रुप - ओ... पहले भाभी की हाथ से कुछ हो जाए... फिर ना जाने आना होगा या नहीं...

अनु - मैं अभी कुछ लाती हूँ...

अनु किचन के अंदर चली जाती है l वीर रुप की ओर मुड़ता है और पूछता है l

वीर - ना जाने फिर कब आना होगा... इसका मतलब क्या हुआ...

रुप - वह बात दरअसल यह है कि... मैं इस बार होली मनाने राजगड़ जा रही हूँ... तो मुझे लग रहा है कि शायद... राजा साहब इसबार जल्दी आने ना दें...

वीर - (हैरानी के साथ) तु... होली में... गाँव जा रही है...

रुप - हाँ...

वीर - पागल तो नहीं हो गई... गाँव में आज तक कभी कोई त्योहार मनाया भी गया है...

रुप - भैया... मैं त्योहार मनाने नहीं... छुट्टियाँ मनाने जा रही हूँ...

तभी अनु प्लेट में कुछ नास्ता और चाय लेकर आती है l टेबल से फर्स्ट ऐड सामान हटा कर रुप को बिठाती है और खाने के लिए प्लेट आगे करती है l

अनु - कहीए राजकुमारी जी... कैसे आना हुआ..

रुप - ओहो भाभी... आप भले ही भैया को राजकुमार बुलाईए... पर मुझे आप नंदिनी ही कहें...

अनु - मुस्किल होगा...

रुप - फिर भी... कहिये...

अनु - अगली बार कोशिश करुँगी... फिलहाल के लिए बताओ... आप आईं किसलिए...

रुप - ओके पहले खाने तो दीजिए...

रुप नास्ता ख़तम कर देती है l करचीफ से हाथ मुहँ साफ कर लेने के बाद अपनी वैनिटी बैग से कुछ कागजात निकाल कर अनु के हाथों में रख देती है l

अनु - यह... यह क्या है...

वीर - यह कैसे कागजात हैं...

रुप - भैया... जोडार ग्रुप ने... पाढ़ी होटल्स में टूर एंड ट्रैवल्स में कुछ गाड़ी लगाए हैं... तो उनके कॉन्ट्रैक्ट को जब उन्होंने सबलेट किया था... तब मैंने भाभी जी के नाम पर... वही सब लेटींग कॉन्ट्रैक्ट उठा लिया...

वीर - (चौंक कर) व्हाट... यह तुमने क्या किया...

रुप - हाँ भैया... रॉकी न मुझे बताया कि कैसे तुम काम मांगने उसके होटल में गए थे... भैया... उसने तुम्हारी बात मान कर... उस दिन... होटल में तुम्हारी और भाभी की मदत की... पर छोटे राजा जी ने... उन्हें धमकाया भी बहुत था... इसलिए उसीने ही... मुझे सबलेटींग कॉन्ट्रैक्ट के बारे में बताया था... तुम्हारे नाम से मिलती नहीं.. इसलिये भाभी जी के नाम पर मैंने यह टेंडर डाला था... और लकीली कॉन्ट्रैक्ट मिल भी गई... इसलिए भैया... आप अभी किसी से भी काम मत माँगों... और देखो ना... भाभी की नाम लक्ष्मी देवी के समान हो गई... पहली ही कॉन्ट्रैक्ट में कामयाबी मिली... यह लो अब कागजात...

वीर और अनु रुप को मुहँ फाड़े बेवक़ूफ़ों की तरह देखे जा रहे थे l बहुत आनाकानी किए भी पर रुप की जिद के आगे उन दोनों को झुकना पड़ा और रुप से वह कागजात ले लिए l रुप उनसे विदा लेकर अपार्टमेंट के नीचे आती है और अपनी गाड़ी में बैठ कर वहाँ से निकल जाती है l थोड़ी दूर बाद गाड़ी रोकती है अपना फोन निकाल कर विश्व के नंबर पर मेसेज करती है

"थैंक्यू"
 
हा हा हा हा

शुक्रिया भाई शुक्रिया

मेरे बेटे का एक स्टेज फर्फर्मांस में थोड़ा बिजी था

मेरे कहानी को इतना इज़्ज़त देने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया

हाँ यह बात आपने सौ फीसद सच कहा

मेरे साथ भी ऐसा ही वाक्या हुआ था पर ट्रेन में

मैं अपने पिता माता के साथ आ रहा था l मेरे पास दो ही लोअर बर्थ थी जिस पर मेरे माता पिता बैठे थे l उस बुढ़े आदमी के पास एक लोअर बर्थ थी जिस पर उसने अपनी गर्भवती बेटी को बिठाया था l अपने लिए वह मुझसे या मेरे माता पिता से एक लोअर बर्थ की उम्मीद कर अनुरोध किया l मैंने खारिज कर दी l उसके बाद बहुत भाषण दिया अपने पुलिस में होने की बात भी बताई l उम्र में मेरे पिताजी से भी कम था और नौकरी सुदा था l मैंने अपने पिता का एक रिटायर्ड पुलिस अधिकारी के रुप में परिचय दिया और बोला जो उखाड़ना है उखाड़ लो l

क्या करें ऐसे नमूने कभी कभी टकराते हैं l

जी धन्यबाद

हाँ जरूर

आगे इसके उपर भी धीरे धीरे सबको ज्ञात होगा

हाँ विक्रम इस बात पर ईमानदार जरूर है

और वास्तव में विक्रम ने अपनी तैयारी करी भी थी खुद को विश्व के बराबर खड़ा करने के लिए

हाँ फिलहाल

बढ़िया हूँ

आपके सुझाव के लिए तह दिल से आभार

हाँ इसबार एक प्लान है मेरी बेटी ने बनाया है

इसबार हम पहले छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले के तीरथगड फिर चित्रकोट जाएंगे l उसके बाद रायपुर मेरी मौसी के यहाँ होते हुए सम्बलपुर हीराकुद जाएंगे l उसके बाद अंगुल जा कर टिकरपाड़ा मगरमच्छ सैंचुरी l

फिर अपने घर वापस

आपकी शुभ कामना के लिए फिर से धन्यबाद
 
❤️

❤️

😊

थोड़ा सस्पेंस तो बनता है बॉस

हाँ रुप क्षमा कर देगी

पर यहां रुप के मन में एक आवेश है उसे शांत होना आवश्यक है

निश्चय ही प्रभाव पड़ेगा

बस विश्व की टीम को अच्छे से मैनेज करना होगा

संभव इसलिए होगा क्यूंकि भैरव सिंह उस वक़्त बहुत परेशानी में होगा जिसके वज़ह से उसके नाक के नीचे विश्व और उसका टीम अपनी मकसद में कामयाब हो पाएंगे

❤️😍🤩🥰

शुक्रिया थैंक्स आभार धन्यबाद
 
शुक्रिया लियोन भाई आपका बहुत बहुत शुक्रिया

सबकी कर्म अब सामने आएगी

हर एक अपने अपने हिस्से की गंवाएंगे

क्यूंकि यह धर्म युद्ध है

कुर्बानी हर एक हिस्से की ली जाएगी

विश्वा से भी

हाँ यही वह आइडिया है

जिसके वज़ह से भैरव सिंह का पोल खुल जाएगी

अब रोणा अपना जीवन जी लिया है

अब उसके हिस्से में मौत है

जो उसे मिलने वाली है

दोस्त आख़िर मे काम आता है

यही तो बात है

जो आपको अगले अपडेट में मालुम होगा

हाँ विक्रम क्षेत्रपाल की दल दल से निकलना चाहता है

अब वह धीरे धीरे निकल आएगा
 
शुक्रिया मेरे भाई आपका बहुत बहुत शुक्रिया

🤩

हाँ कहानी में यह पड़ाव अत्यंत आवश्यक था

भैरव सिंह का तिलस्मी दुनिया अब भरभरा कर बिखरेगा

थैंक्स शुक्रिया आभार मेरे भाई

हाँ एक ऐसा दोस्त जिसकी दोस्ती उसे कबुल नहीं

हाँ यह भी जरूरी है भाई

क्यूंकि विश्व ने एक बार कहा भी था वीर के लिए वह किसी भी हद तक जा सकता है

हा हा हा

लेनिन रोणा की सुईसाइडल ऐक्ट में उसकी चिता सजाने में मदत कर रहा है

अगले अपडेट में रोणा का खात्मा होने वाला है

थैंक्स भाई

आपके साथ के लिए बहुत बहुत शुक्रिया
 
👉एक सौ चौवालीसवां अपडेट

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राजगड़

भीमा का अखाड़ा

अखाड़े में पहलवानों का जमावड़ा लगा हुआ है l कुछ कुस्ती में मसरूफ थे तो कुछ कसरत में l भीमा पुरा मैदान घूम कर निरीक्षण कर रहा था l इतने में वह देखता है सत्तू के साथ कुछ पहलवान हाथों में कसरती गदा लिए प्रवेश करते हैं l सबके मुहँ पर एक परेशानी सा भाव को देखता है l

भीमा - क्या बात है सत्तू... कहाँ गए थे... और यूँ मुहँ लटकाये क्यूँ आ रहे हो...

सत्तू - कुछ नहीं गुरु... बस हम नदी किनारे गए थे...

शनिया - बे बहन के लौड़े... तब हाथ में लोटा होना चाहिए था... यह गदा क्या करने ले गए थे...

सत्तू - वह... (एक बंदे की ओर इशारा करते हुए) यह नीलकंठ कह रहा था... वह... (रुक जाता है)

भीमा - रुक क्यूँ गया... बोल...

सत्तू - ऐ नील... तु बोल... (नील इशारे से मना करता है)

भीमा - (गुस्से में) अबे कोई तो बोलो... ऐसे जता रहे हो... जैसे तुम्हारी माँ चोद दी किसीने...

सत्तू - ठीक है... मैं बताता हूँ... वह गुरु... इस नील को खबर मिली... के विश्वा... अकेले कसरत करने शाम को नदी किनारे जाता है... जहां से कनाल खुलता है...

भीमा - हाँ तो...

सत्तू - तो इसने कुछ पट्ठों को साथ लिया... मैं भी उसके साथ हो लिया... मिलकर विश्वा की ऐसी की तैसी करने के लिए...

शनिया - ओ... तो यह बोलो ना... विश्वा से फिर से पीट कर आए हो... तुम लोग...

भीमा - तु चुप रह... तु कौनसा... विश्वा से मार खाए वगैर आया है...

सत्तू - नहीं गुरु... बात हमारे मार खाने तक कि गई नहीं...

भीमा - तो...

सत्तू - हम जब पहुँचे... तो देखा... विश्वा एक पेड़ के नीचे कसरत कर रहा था... हम लोग छुप कर... योजना बनाने लगे... किस वक़्त और कैसे उस पर धाबा बोलना है... पर...

भीमा - अबे... यह बार बार अटक क्यूँ रहा है... सीधे बोल... विश्वा ने तुम लोगों की गांड मारी तो कैसे मारी...

सत्तू - हमने देखा... जब विश्वा पसीना पसीना हो गया... तब वह अपने बदन से कपड़े निकाल दिया... उसका बदन... शाम की ढलती सूरज की चमक से चमक रही थी... उसका बदन ऐसा लाग रहा था... जैसे पत्थरों को काट कर किसी शिल्पी ने... पेशियों वाली मुरत बनाया हो...

भीमा - बस वही देख कर... तुम लोगों की फट गई...

सत्तू - सिर्फ वही नहीं गुरु... हमने देखा... वह... ईंटों को... हाथ के वार से तोड़ रहा था... काठ के पाटों को... हाथ के वार से तोड़ रहा था... पेड़ से टंगे पानी से भरे बड़े बड़े मटकों को कभी लात से.. कभी कुहनियों से फोड़ रहा था...

सत्तू रुक जाता है, उसे महसुस होता है जैसे पुरे अखाड़े को कोई सांप सूँघ गया हो, यह देख कर रुक जाता है l उसे चुप देख कर भीमा पूछता है

भीमा - बस इतना ही...

सत्तू - नहीं... विश्वा फिर एक बाँस की लाठी उठाया... ऐसे चलाया... की हमको दिखी ही नहीं... हवाओं को चीरती हुई उस बाँस की आवाज... ऐसा लग रहा था जैसे... कोई आँधी हो... या बवंडर...

सत्तू फिर चुप हो जाता है l वह देखता है कुछ पहलवान उसे मुहँ फाड़े देखे जा रहे हैं और भीमा की नजरें सत्तू से हट गया था और भवें सिकुड़ कर कुछ सोच में पड़ गया था l

सत्तू - क्या हुआ गुरु...

भीम - क्या बस इतना ही...

सत्तू - हाँ... बस इतना ही... उसकी लाठी जब चलती है... तो गायब ही लगती है... तब समझ में आया... कैसे तलवार घुमा कर... सरपंच की गमछे को तीन टुकड़ों में काटा था...

तभी अखाड़े में बल्लभ अंदर आता है l इन सबके सामने आकर खड़ा हो जाता है l सभी उसके सामने सीधा हो कर खड़े हो जाते हैं l

भीमा - क्या हुआ वकील साहब...

बल्लभ - यह सत्तू जो तुम लोगों से कह रहा था... मैं थोड़ी दुर से सब सुन रहा था... (सबकी चेहरे पर गौर करता है, जैसे सब शर्मिंदा हो रहे हैं) देखो... तुम लोग वह क्या है... क्या किया है... यह सोचने की जहमत मत उठाओ... बस इतना याद रखो... तुम लोग... जब तक राजा साहब के काम के हो... तब तक जिंदा हो... जिस दिन राजा साहब को यह एहसास हो गया... तुम लोग उनके किसी काम के नहीं रहे... उस दिन... तुम्हें कोई बचा नहीं पाएगा... दो बार... उसने तुम्हें मात दी है... पर जरूरी नहीं... के यह हर बार... दोहराया जाए... इसलिए तुम लोग... अपनी तैयारी मत छोड़ो...

शनिया - वही तो कर रहे हैं... वकील साहब...

बल्लभ - हाँ मुझे दिख भी रहा है... बस एक बात अच्छे से याद कर लो... क्षेत्रपाल महल के वज़ह से... सिर्फ राजगड़ में ही नहीं... आसपास के पचीस तीस गाँव में भी तुम लोगों का बहुत भाव है... इसलिए अब तक जो हुआ... सो हुआ... अब कि बार... अगर क्षेत्रपाल की साख पर... तुम लोगों के वज़ह से कोई बट्टा लगा... तो भीमा... आखेट महल में... जो मगरमच्छ और लकड़बग्घे भूखे हैं... उनके निवाला तुम लोग भी हो सकते हो...

सब के सब डर के मारे अपनी हलक से थूक निगलने लगते हैं l उनकी हालत देख कर बल्लभ उनसे कहता है

बल्लभ - डर बहुत ही अच्छी चीज़ है... डर को इज़्ज़त देना चाहिए... पर डर वाला इज़्ज़त तुम किसे दोगे... राजा साहब को... या विश्वा को... उस डर को अच्छी तरह से तोल लो... (सबकी चेहरे पर नजर घुमा कर) तो क्या फैसला किया...

भीमा - हम... हम राजा साहब के नमक ख्वार हैं वकील बाबु... हम उनके लिए... ऐसे कई विश्वा से भीड़ जाएंगे... (सब से) क्यूँ साथियों...

सत्तू - राजा सहाब की...

सभी - जय हो...

बल्लभ - शाबाश...

भीमा - वैसे वकील साहब... हफ़्तों हो गए... दरोगा जी... दिख नहीं रहे हैं...

बल्लभ - हाँ... अब पता नहीं... दरोगा कहाँ चला गया... पर तुम्हें दरोगा की क्या जरूरत है...

भीमा - जैसे आप हमारे साथ हैं... उसी तरह दरोगा जी की भी साथ मिल जाए... तो हिम्मत सौ गुना बढ़ जाती है...

बल्लभ - इतनी जल्दी पंचायत भवन की कांड भूल गए लगता है...

शनिया - नहीं वकील बाबु... अगर उस दिन टाईम पर दरोगा जी पहुँच गए होते... तो बात अलग होती...

बल्लभ - खयाली पुलाव पकाना छोड़ दो... अनिकेत... फ़िलहाल छुट्टी पर है... अपनी निजी वज़ह से... पर इतना पक्का बता सकता हूँ... वह जहां भी होगा... विश्वा को ख़तम करने की ही सोच रहा होगा...

भीमा - वह... वकील बाबु... उस दिन... राजा साहब ने... एसपी को फोन पर नए दरोगा के लिए... सिफारिश किये थे....

बल्लभ - हाँ... नया दरोगा... एक या दो दिन में... थाने का चार्ज ले लेगा... फ़िलहाल जब तक राजा साहब ना कहें... तुम लोग कोई बेवकूफ़ी मत करना... विश्वा पर तुम लोग सिर्फ नजर रखो... हर बाजी... हमेशा कोई जीत नहीं सकता... उसकी हार भी... उसकी प्रतीक्षा में होगी... हमें उस वक़्त का इंतज़ार करना होगा... समझे...

भीमा - जी...

बल्लभ - वह कसरत करे या सर्कस... फ़िलहाल उससे दूरी बनाए रखो... उसका अंजाम जिसके हाथों होना है... वह तय है... तुम लोग बीच में मत घुसो...

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पसीने को पोंछ कर अपने कपड़े समेटते हुए विश्व को महसूस होता है कि कोई आसपास है जो उससे शायद छुपा हुआ है l थोड़ा ध्यान देने पर विश्व को मालुम हो जाता है छुप कर देखने वाला कौन है l विश्व मुस्करा देता है

विश्व - छुप कर क्यूँ देख रहा है... बाहर आजा... (पत्थर के ओट से अरुण बाहर आता है, विश्व उसके गाल को पकड़ कर) क्यूँ रे... अपने मामा के कसरत को छुप कर देख रहा है...

अरुण - आह... मामा... लग रहा है...

विश्व उसके गाल छोड़ देता है l अरुण अपने गाल पर हाथ रखकर मलने लगता है l विश्व अपने कपड़े और सामान समेट कर चलने लगता है l उसके साथ साथ अरुण भी चलने लगता है l

अरुण - मामा... आप क्या कसरत करने के लिए... जगह बदल दी...

विश्व - क्यूँ...

अरुण - नहीं... आप तो हमेशा घर पर... कसरत किया करते थे ना...

विश्व - आज मन किया तो यहाँ चला आया...

अरुण - ओ...

विश्व - तु यहाँ क्यों आया था...

अरुण - मैं... मैं हमेशा की तरह... दो टाईम लंडन जाता हूँ ना... (लोटा दिखाते हुए) इसलिये...

विश्व - (मुस्करा देता है) बहुत बदमाश हो गया है तु...

अरुण - हाँ... माँ भी यही कहती है...

विश्व - स्कुल में पढ़ाई कैसी चल रही है...

अरुण - वह तो बढ़िया चल रही है... पर अब छुट्टियाँ चल रही है...

विश्व - ओ हाँ... होली की छुट्टियाँ...

अरुण - हाँ... पर होली हम खेलते कहाँ हैं... सिर्फ किताबों में ही पढ़ा है... होली में रंग खेला जाता है...

इस बात पर विश्व खामोश रहता है l विश्व से जवाब ना पाकर अरुण विश्व की ओर देख कर पूछता है l

अरुण - मामा...

विश्व - हूँ...

अरुण - तुमने कभी होली खेली है...

विश्व - (अरुण के चेहरे की ओर देखता है आशा भरी मासूमियत सवाल था) हाँ... खेली तो है... पर राजगड़ में नहीं...

अरुण - फिर कहाँ खेला तुमने...

विश्व - राजगड़ से बहुत दुर... पिछले साल तक... भुवनेश्वर में...

फिर एक शांति छा जाती है दोनों के बीच l दोनों चलते चलते विश्व के बनाए श्रीनिवास लाइब्रेरी में पहुँचते हैं l विश्व अपना सामान बरामदे में रख कर अरुण से पूछता है l

विश्व - घर नहीं जाओगे...

अरुण - मामा... हम राजगड़ में होली क्यूँ नहीं खेल सकते...

विश्व - अपनी माँ या बाप से पुछा है कभी...

अरुण - हाँ...

विश्व - क्या कहा उन्होंने... बापू ने तो कुछ कहा नहीं पर... माँ ने कहा...

विश्व - क्या कहा...

अरुण - यहाँ त्योहार मनाने से... राक्षस राजा जाग जाएगा... हमें उठा लेगा... और कच्चा चबा जाएगा...

विश्व - ह्म्म्म्म... ठीक कहती है तुम्हारी माँ...

अरुण - पर मामा... हम होली खेलना चाहते हैं...

विश्व - अपनी माँ की कही बात भुला रहे हो...

अरुण - प्लीज मामा... तुम भी हमारे साथ खेलो ना... मैं जानता हूँ... तुम खेलोगे... तो कोई राक्षस नहीं आएगा...

विश्व - यह तुम कैसे कह सकते हो... क्या यह बात तुम्हारी माँ ने कही...

अरुण - नहीं... यह तो मैं कह रहा हूँ... क्यों कि मुझे पता है... तुमसे राक्षस सारे डरते हैं...

विश्व - (मुस्कराता है) तुझे होली के बारे में कुछ पता भी है...

अरुण - हाँ पता है ना... होली में लोग एक दुसरे को रंग लगाते हैं...

विश्व - और...

अरुण - और क्या... म्म्म्म्म्म्म्... हाँ आम खाते हैं...

विश्व - होली... रंगों का त्योहार है... पर अलग अलग प्रांतों में... अलग अलग मान्यताओं के अनुसार मनाया जाता है... जैसे कहीं... होली दहन के अगले दिन... राख और रंग खेलते हैं... और कहीं लठ होली खेला जाता है... पर हमारे प्रांत में... इसे होली नहीं फगु कहते हैं... जो फाल्गुन पूर्णिमा के अगले दिन खेला जाता है... जगन्नाथ संस्कृति में फाल्गुन दशमी के दिन से... श्री कृष्ण जी की मूर्ति को... विमान में नगर परिक्रमा कराया जाता है... इसी विमान को... दोल कहते हैं... आम के फलों का भोग लगाया जाता है... उसके पश्चात ही लोग आम कहते हैं... उससे पहले नहीं खाया जाता... लोग जो रंग खेलते हैं... उसे अबीर कहते हैं...

अरुण - ओ... तो अबीर खेलने के लिए... हमें श्री कृष्ण जी की मूर्ति को... विमान में... घुमाना पड़ेगा...

विश्व - हाँ पर तु इतना बेताब क्यूँ है... तेरे माँ बाप... थोड़े ना राजी होंगे...

अरुण - मामा... अगर तुम साथ दोगे... तो माँ और बापू थोड़े ना कुछ कहेंगे...

विश्व - (चौंकते हुए) क्या... पाँच दिनों तक विमान परिक्रमा करवाओगे...

अरुण - हाँ... (विश्व एक टफली मारता है अरुण के सिर पर) आह... ठीक है... मामा... कम से कम... एक दिन के लिए... तो कर सकते हैं ना...

विश्व - तु जानता भी है... पुरे राजगड़ में ही नहीं... आसपास के इलाकों में भी... कभी त्योहार नहीं मनाया जाता...

अरुण - मालूम है... पर मामा... इसबार तुम रहोगे ना हमारे साथ...

विश्व - क्या... क्यूँ...

अरुण - तुम रहोगे तो कोई हिम्मत नहीं करेगा... यहाँ तक राक्षस राजा भी नहीं... हमारे मौहल्ले से शुरु करेंगे... वैदेही मासी की दुकान से होकर... यहाँ श्रीनिवास लाइब्रेरी में... परिक्रमा ख़तम करेंगे...

विश्व कोई जवाब नहीं देता, अरुण बड़ी आस भरी नजर से विश्व की ओर देखता है l विश्व का चेहरा थोड़ा गंभीर दिख रहा था l वह जैसे किसी सोच में खो गया था l

अरुण - मामा... बोलो ना... तुम हमारे साथ रहोगे ना...

विश्व - (पॉज)

अरुण - हम होली खेलना चाहते हैं... बोलो ना...

विश्व - (पॉज)

विश्व से कोई जवाब ना पाता देख कर अरुण मायूस सा चेहरा लेकर वापस जाने लगता है l विश्व अपनी सोच से बाहर आता है और आवाज देता है

विश्व - अरुण... (अरुण मूड कर देखता है) मैं साथ हूँ... पर एक दिन के लिए बस...

अरुण भागते हुए आता है और विश्व के उपर खुद कर गोद में चढ़ जाता है l विश्व भी उसे गोद में उठा लेता है l अरुण विश्व के गाल पर एक लंबा चुंबन देता है l फिर विश्व की गोद से उतर कर हाथ हिला कर विश्व से विदा लेता है और उछलते कुदते अपने घर की जाने लगता है l उसे यूँ जाता देख विश्व के होठों पर एक मुस्कान उभर जाती है l तभी उसके कानों में एक आवाज पड़ती है l

- भाई... बच्चे को यूँ झूठ बोल कर बहलाना ठीक बात नहीं... (यह टीलु था)

विश्व - (टीलु की ओर मुड़ कर) तुम कब आए...

टीलु - आया तो थोड़ी देर पहले था... पर मामा भांजे का प्यार गुफ़्तगू देख कर... ठिठक गया...

विश्व - काम का क्या हुआ...

टीलु - (कुछ कागज निकाल कर विश्व की ओर बढ़ाता है) देख लो... पुरे के पुरे दस लोग... जेरॉक्स हैं...

विश्व - (सारे कागजात देखते हुए) ह्म्म्म्म... बहुत बढ़िया...

टीलु - ओरिजिनल सारे सीलु के पास है... और आज ही वह... भुवनेश्वर जा रहा है... जोडार सर के हवाले कर आयेगा...

विश्व - बहुत अच्छे...

टीलु - पर भाई... तुमने जवाब नहीं दिया...

विश्व - (टीलु की ओर देखते हुए) तुम्हें लगता है... मैं अरुण से झूठ बोल रहा था...

टीलु - तो क्या सच में... गाँव में होली खेला जाएगा...

विश्व - हाँ... बच्चे और मैं... और जो हमारे साथ आयेंगे... वे लोग...

तभी विश्व के मोबाइल पर मैसेज ट्यून बजने लगती है l विश्व मोबाइल निकाल कर मैसेज देखता है l मैसेज रुप ने भेजा था l

“आई एम कमींग"

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xxxx गोदाम यशपुर

गोदाम के अंदर सारे ऐसों आराम की सहूलियतें हैं l बड़ा सा बिस्तर है जिस पर फूलों के पंखुड़ियां बिखरे पड़े हैं l एक आईने के सामने कुर्ते पाजामे में गुनगुनाता रोणा अपने ऊपर फ्रेगनेंस छिड़क रहा था l तभी उसके कानों में गाड़ी की हॉर्न सुनाई देता है l रोणा अपने लैपटॉप पर देखता है बाहर एक मर्सिडीज गाड़ी खड़ी है l कुछ देर बाद गाड़ी की खिड़की डाउन होती है टोनी उर्फ लेनिन खिड़की से झाँकता है और हाथ हिलाता है l रोणा के आँखों में चमक उभर आती है और होठों पर मुस्कान आ जाती है l वह लैपटॉप पर कुछ टाइप करता है l तो एक दरवाजा खुल जाता है l मर्सिडीज अंदर आती है l गाड़ी अंदर आकर सीधे उसके बिस्तर के पास रुकती है l रोणा देखता है पिछली सीट पर रुप हैरानी से भवें सिकुड़ कर गोदाम को और रोणा को देख रही है l

लेनिन - हाँ तो रोणा बाबु.... मेरे कागजात कहाँ हैं...

रोणा - इतनी जल्दी भी क्या है...

कहकर गाड़ी की तरफ जाने लगता है, लेनिन अपनी जेब से पिस्टल निकाल कर रोणा पर तान देता है l रोणा यह देख कर रुक जाता है l

रोणा - यह क्या है टोनी...

लेनिन - बहुत बड़ा कांड कर आया हूँ... और मुझे अभी के अभी राजगड़ से निकल जाना है... इसलिए मेरे कागजात मेरे हवाले कर दो... वर्ना... मैं अभी के अभी इस लड़की को लेकर चला जाऊँगा...

रोणा - ओके ओके... (कह कर एक टेबल के ड्रॉयर को खोलता है)

लेनिन - अगर गन निकालने की कोशिश की... तो तुम्हारा भेजा उड़ा दूँगा रोणा...

रोणा - बहुत जल्द औकात में आ गया तु... साहब से... तु..

लेनिन - हाँ... क्यूँ की तु कोई महात्मा है नहीं... हरामी पन में... मुझ से दो कदम आगे है बस...

रोणा एक पैकेट निकाल कर लेनिन के हाथ में देता है l लेनिन पैकेट खोल कर देखता है संतुष्टि होने पर पैकेट को जेब में रखते हुए रोणा से कहता है l

लेनिन - ठीक है रोणा बाबु... इस लड़की की गाड़ी खराब होने के बाद इसे झूठ बोल कर... लिफ्ट देने के बहाने यहाँ तक ले आया... अब यह लड़की तुम्हारे हवाले... (कह कर लेनिन दरवाजा खोलता है l रुप नीचे उतरती है, रुप से) मेम साहब... यही आपकी मंजिल थी... जहां मैंने आपको पहुँचा दिया है...

कह कर लेनिन अपनी गाड़ी में बैठता है और बैक करते हुए गोदाम से निकल जाता है l उसके जाते ही रोणा दरवाजे को बंद करने का कमांड देता है और दरवाजा बंद हो जाता है l गुस्से से दांत पिसते हुए रुप रोणा की देखती है l

रोणा - हैरान हो.. जानेमन... हा हा हा हा... परेशान हो... ओ हो हो हो... कोई ना... आज मेरा दिन है... वह कहते हैं ना... अँग्रेजी में... "एवरी डॉग हेज हीज डे" (चेहरा बहुत गंभीर हो जाता है, अपने गाल पर हाथ फेरते हुए) आज मेरा दिन है... कमीनी कुतिया...

रुप - (चुप रहती है, पर उसे घूरती रहती है)

रोणा - (अपनी दोनों बाहें फैला कर) मैं जब राजगड़ आया था... तब इस गोदाम पर मेरी नजर पडी थी... तब से इसे धीरे धीरे अपने कब्जे में लेकर... सवांर रहा था... आज ही के दिन के लिए... बहुत बड़ा गोदाम है... जितना चाहे भाग सकती है... तु जब भागते भागते थक जाएगी... तब मैं तेरी फाडुंगा... तु रोती रहेगी... चीखती चिल्लाएगी... तब मैं तुझे रौंदुंगा... चल भाग... (चिल्लाते हुए) भाग....

रोणा इतनी जोर से चिल्लाया था कि भाग शब्द कुछ देर तक गुंजती रही l जैसे ही भाग शब्द की गुंजन थम जाती है l रुप हँसने लगती है l हँसते हँसते वह टेबल के पास रखे चेयर पर बैठ जाती है और अपनी दाहिनी पैर को बाएँ पैर बड़े अदब से रखती है और राजसी ठाठ पर बैठती है l रोणा भैवें सिकुड़ कर रुप की ओर देखने लगता है l

रुप - एक लड़की... दो अंजान मर्दों के बीच आकर भी... ना चीखती है... ना चिल्लाती है... तुझे हैरानी नहीं हुई... इंस्पेक्टर अनिकेत रोणा...

रूप अपनी चूडी से एक सेफ्टी पिन निकाल कर अपनी मोबाइल फोन को चुभो देती है l एक स्लॉट खुल जाती है l एक चिप को निकाल कर रोणा को दिखाते हुए कहती है

रुप - इस बग वाली चिप ट्रिक से तुझे और तेरे इस छछूंदर को लगा... मुझे ट्रैप कर लोगे... हा हा हा हा... (रुप हँसने लगती है, फिर अचानक अपनी हँसी रोक कर) स्मार्ट तु है नहीं... चालाक तु बन नहीं पाया... और बेवक़ूफ़ इतना के तेरी बेवक़ूफ़ों में भर्ती होगी नहीं... (रोणा की आँखे हैरानी से फैल जाती हैं, वह रुप की ओर आगे बढ़ने की कोशिश करता है तो उसे रुप की हाथों में एक गन दिखता है, रुप एक हवाई फायर करती है) कोई हरकत मत करना... मिस्टर रोणा... मौत और तुझमे दूरी उतनी ही है... जितनी मेरी ट्रिगर पर उंगली...

रोणा - मतलब... तुझे सब पता था...

रुप - हाँ रोणा हाँ... कैसे कब... यह तुझे बताने वाले और हैं... तुझे उनसे मालुम पड़ेगा... पर तुझे इस वक़्त जो जानना जरूरी है... वह जान ले...

रोणा हैरानी से रुप की ओर देख रहा था, सोच रहा था कुछ ही सेकेंड में सबकुछ कैसे बदल गया l क्या सोचा था और क्या हो गया l

रुप - मेरा पीछा करता रहा... स्टॉक करता रहा... पर ताज्जुब है... मेरे बारे में जानने की कोशिश भी नहीं की... अगर जान गया होता... तो आज तु ना जान से जाता... ना जहान से जाता...

रोणा - (हकलाते) क्क्क्क्क् कौन हो तुम....

रुप - मेरा नाम... रुप नंदिनी सिंह क्षेत्रपाल है... राजा भैरव सिंह क्षेत्रपाल की बेटी... दादा राजा नागेंद्र सिंह क्षेत्रपाल की पोती... छोटे राजा पिनाक सिंह क्षेत्रपाल की भतीजी... युवराज विक्रम सिंह क्षेत्रपाल और राजकुमार वीर सिंह क्षेत्रपाल की लाडली बहन...

यह सुनते ही रोणा के पैरों तले जमीन हिलने लगती है l उसका शरीर पुरा का पुरा पसीने से सरोवर हो जाता है l उसका जिस्म कांपने लगती है l

रोणा - ज्ज्ज्ज्झुठ... झूठ कह रही हो.... त्त्त्त्त्त्तुम...

रुप - तुझ जैसे कमिने मुझे कौनसा सत्यवादी होने की सर्टिफिकेट लेना है... तु बस इतना जान ले... मेरी पेंडेंट... मेरी बैंगल... मेरी पायल और मेरी मोबाइल फोन में... मेरे भैया... ट्रैकर लगा रखे हैं... मैं कहीं भी जाती हूँ... उनकी नज़र में रहती हूँ... अभी भी... रास्ते में तेरे छछूंदर ने मेरी गाड़ी खराब कर लिफ्ट ऑफर की... उसे लगा कि प्लान उसका है... जब कि यह प्लान... मेरे भैया विक्रम सिंह क्षेत्रपाल का है... वह बराबर दूरी बनाए... मेरे पीछे पीछे आ रहे थे... बस कुछ सेकेंड रुक जा... तेरे इस गोदाम को धज्जियाँ उड़ाते हुए... आ धमकेंगे... फिर... फिर तेरा क्या होगा... रोणा

रोणा - साली... हराम जादी... विश्व की रंडी कमीनी... अपनी झूठ में मुझे फंसा रही है... मैं तेरे झांसे में नहीं आने वाला...

रुप - अच्छा यह बात है... (इतना कह कर रुप अपनी गन को रोणा की ओर फेंकती है जिसे रोणा कैच कर लेता) यह ले... अब मैं निहत्थी हूँ... बस पाँच सेकेंड

रोणा - (हाथ में गन आते ही थोड़ा हिम्मत दिखाते हुए रुप की ओर बढ़ता है)

रुप - पाँच.... चार... तीन... दो... एक... बूम...

धड़ाम से गोदाम का दरवाज़ा तोड़ते हुए विक्रम की गाड़ी अंदर आती है l अंदर गाड़ी, गाड़ी में विक्रम को देख कर रोणा के चेहरे पर हवाईयाँ उड़ने लगती है l विक्रम गाड़ी से उतरता है l रोणा को नजर अंदाज करके आगे बढ़ता है और रुप के पास पहुँचता है l

विक्रम - नंदिनी... मुझे देर तो नहीं हुई...

नंदिनी - नहीं भैया... हाँ पर इस कमीने को... यकीन नहीं दिला पाई...

विक्रम - (रोणा की ओर घूम कर दहाड़ती आवाज में) रोणा... हमारे टुकड़ों में पलने वाले कुत्ते... तेरी इस गुस्ताखी की क्या सजा दी जाए...

रोणा रुप की उस गन को अब दोनों पर तान देता है l विक्रम के बाएँ आख का भौवां तन जाता है l जबड़े इस तरह से भिंच जाते हैं कि कड़ कड़ की आवाज रोणा के कानों में सुनाई देने लगती है, पर रोणा को लगता है यह आवाज उसके हड्डियों के जोड़ से आ रही है l रोणा ट्रिगर दबा देता है पर गोली निशाने पर नहीं लगती, वज़ह साफ थी उसके हाथ डर के मारे कांप रहे थे l पर गोली चलने के बाद रुप जरुर चीखती है और अपने भैया को देखने लगती है l विक्रम को गोली लगी नहीं थी l विक्रम अब गुस्से में रोणा की ओर बढ़ने लगता है l रोणा फिर से फायर करता है पर इसबार गोली नहीं चलती, रोणा इस बार गन को विक्रम की ओर फेंक मारता है l विक्रम साइड हो जाता है l फिर रोणा बिना पीछे देखे भागने लगता है l वह पीछे बिल्कुल नहीं देखता विक्रम उसका पीछा कर रहा है या नहीं l वह बस बदहवास भगा जा रहा था l डर उसके उपर इस कदर हावी था कि उसके आँखे बड़ी और इस कदर फैली हुई थी कि जो देखे उसे लगता था जैसे आँखे अभी के अभी बाहर आ जायेंगी l यशपुर के सड़क पर लोगों से टकराते हुए भाग रहा था l सभी लोग उसे देख कर हैरान हो रहे थे l रोणा भागते भागते राजमार्ग पर आता है l यशपुर अब पीछे छूट चुका था l फिर भी वह बदहवास भागे जा रहा था l तभी एक ट्रक उसे ओवर टेक करते हुए उसके आगे चलने लगती है l वह देखता है ट्रक तिरपाल से ढका हुआ था और पीछे से उसका पर्दा हिल रहा था l रोणा चिल्ला कर ट्रक को रोकने के लिए कहता है के तभी पीछे वाला पर्दा हटा कर लेनिन उसकी ओर हाथ बढ़ाता है l रोणा की आँखों में चमक आ जाता है और मन में जीने की आश दिखने लगता है l वह अपना हाथ बढ़ाता है लेनिन उसका हाथ पकड़ कर ट्रक के अंदर खिंच लेता है l ट्रक में पहुँच कर देखता है l ट्रक खाली था बस वह और टोनी ही थे l जोर जोर से हांफते हुए पीठ को टेक लगा कर बैठ जाता है l टोनी को इशारे से सिगरेट माँगता है l टोनी उसे सिगरेट और लाइटर देता है l अपनी साँसे दुरुस्त करते हुए होठों पर सिगरेट लेकर लाइटर से सुलगता है l फिर जली हुई सिगरेट को लेकर अपने हाथ में लगाता है कहीं सपना तो नहीं देख रहा l चमड़ी पर जलन की छाल पड़ने तक सिगरेट को रगड़ता है, नहीं यह कोई सपना नहीं था l अभी अभी जो भी हुआ था सब सच ही था l उसे जब एहसास होता है कि वह सपना नहीं देख रहा था कुछ देर पहले उसके साथ वाकई वही हुआ है जिससे वह भाग रहा है l यह जान कर रोने लगता है l धीरे धीरे उसका रोना दहाड़े मार कर रोने में बदल जाता है l

लेनिन - (रोणा को झंझोड़ते हुए) रोणा... क्या हो गया है तुझे... ऐसे क्यों रो रहा है...

रोणा - (लेनिन की गर्दन पकड़ कर उसे नीचे डाल कर) साले जानता भी है... वह लड़की कौन है... वह क्षेत्रपाल की बेटी है... (लेनिन का गर्दन छोड़ कर) प्रधान ठीक कह रहा था... उस लड़की के पीछे मत पड़... साला दिमाग खिसक कर... मेरा लौड़े से सोच रहा था...

लेनिन - (अपनी गर्दन पर हाथ मलते हुए) मैं भी तो तुझे मना कर रहा था... मामला विश्वा से जुड़ा है... दुर रह उसके मैटर से... पर तुने ही नहीं माना...

अचानक रोणा का रोना बंद हो जाता है l उसके आँखों में जीने का आखिरी आश नजर आता है l

रोणा - एक मिनट... एक मिनट... हम किसी तरह से... राजा साहब तक यह खबर पहुँचा दें... के उनकी बेटी... विश्वा के साथ रंग रलीयाँ मना रही है... वह भी सबूतों के साथ... तो मुझे जीने का और एक मौका मिल सकता है....

लेनिन - पता नहीं... कोशिश करके देख ले...

रोणा - हाँ... चल निकाल वह सबूत....

लेनिन - कहाँ... मेरी गाड़ी के साथ साथ मोबाइल भी छूट गया है... तेरे मोबाइल फोन में तो होगा ना....

रोणा-( कुर्ते के जेब से मोबाइल निकालता है) (विश्व और रुप की फोटोस देखते ही उसके आँखों में चमक आ जाती है) यह देख... यह रहा... (सारे फोटो देख कर)

लेनिन - ना... इससे कोई फायदा नहीं होगा....

रोणा - (गुस्से में तमतमाते हुए) क्यूँ नहीं होगा...

लेनिन - पता नहीं... तुझे अगर वापस जाना है तो बोल... यहीँ छोड़ जाता हूँ... फिर तु जाने... तेरी किस्मत....

रोणा - एक मिनट... एक मिनट... (गुर्राते हुए) यह तु मुझे आप से तु क्यूँ कहने लगा है बे...

लेनिन - मरने से पहले... तुझे आप कहूँ तो... क्या तुझे मौत नहीं आएगी भड़वे... साले... मैं कहते कहते थक गया... मामला विश्वा से जुड़ा है... ना उलझे तो जिंदगी लंबी होगी... पर तेरी एहसान का बदला चुकाने के चक्कर में... अब मेरी भी यह गत बन गई...

रोणा - (कोई जवाबी प्रतिक्रिया नहीं देता, बस इतना ही कहता है) एक आखिरी कोशिश करते हैं... दाव सही लगा... तो हमारी तरफ आ रही मौत को... विश्वा की तरफ मोड़ सकते हैं...

लेनिन - विश्व के पास पहले से ही इन सबके तोड़ होगा... हम अगर जाएंगे... तो सिर्फ फंसेंगे...

रोणा - वह बाद में देखा जाएगा...

कह कर रोणा सारे फोटों सिलेक्ट कर राजा साहब के नंबर पर भेजने की सोचता है पर उसे नंबर लिस्ट में राजा साहब का नंबर नहीं दिखता l वह चिढ़ जाता है तो बल्लभ को फोन लगाता है l पर फोन लगता नहीं, चेक करता है तो पाता है कि मोबाइल में सिग्नल ही नहीं है, रोणा खीज कर अपना मोबाइल को कस के पकड़ कर चीखने लगता है l

रोणा - क्या मुसीबत है... यह मोबाइल टावर क्यूँ लग नहीं रहा है... (इतना कह कर गहरी गहरी साँस लेने लगता है) यकीन नहीं हो रहा है... राजकुमारी नंदिनी को... मालुम था... मोबाइल में तुने बग लगाया था... उसके वज़ह से... मेरे लिए... युवराज ने जाल बिछाया था... उसे मालुम कैसे हुआ... और तेरी गाड़ी का क्या हुआ... यह ट्रक... और भोषड़ी के तुझे मालुम कैसे नहीं हुआ... वह... लड़की क्षेत्रपाल है... हराम के ढक्कन...

लेनिन - (थोड़े देर के लिए चुप रहता है फिर एक गहरी साँस छोड़ते हुए कहना शुरु करता है) गाड़ी की कहानी बाद में बताऊँगा... पहले यह जान लो... हम डाल डाल जा रहे थे... विश्वा पात पात...

रोणा - अब इसमें विश्वा कहाँ से आ गया बे... मादरचोद...

लेनिन - जिस तरह... तुमने मुझे नंदिनी पर नजर रखने के लिए छोड़ रखा था... उसी तरह.. नंदिनी के आसपास नजर रखने के लिए... विश्वा... लल्लन को छोड़ रखा था...

रोणा - अब यह लल्लन कौन है... और... तुझे कब मालुम हुआ...

लेनिन - अभी... थोड़ी देर पहले...जब लगा कि जाल बिछ गया है... मैं गाड़ी छोड़ भागा... तो मैंने अपने झींगुरों से पता लगाने को बोला... तो सालों ने बताया के... आज से कुछ दिन पहले... जब विश्वा की मुहँ बोले माँ बाप... गायब हो कर मिले थे... उसके अगले दिन... हाई वे ट्वेंटी फॉर सेवन रेस्टोरेंट में विश्वा ने... लल्लन को विक्रम सिंह से... इसी सिलसिले में... मिलवाया था... उसने विक्रम को तेरे फिलिंग के बारे में... बताया था... विक्रम को पहले यकीन नहीं हुआ... रंगे हाथ पकड़ने के लिए... उसीने अपनी बहन के साथ मिलकर... जाल बिछाया था...

रोणा - बे मादरचोद... किसने कैसे गांड हमारी मारी पुछ नहीं रहा हूँ... लल्लन कौन है... विश्वा के साथ उसका क्या लेनादेना है... तुझे उसके बारे में कोई जानकारी थी या नहीं... पुछ रहा हूँ...

लेनिन - उसके बारे में जानकारी रखता हूँ ना... बिल्कुल उतना ही... जितना अपने बारे में...

रोणा - (गुस्से से फट पड़ता है) तो हरामी कुत्ते... वह तेरी और मेरी दोनों की मिला कर मार रहा था... तुझे पता कैसे नहीं लगी... (लेनिन चुप रहता है) बोल कुत्ते... उसके बारे में कुछ जानकारी दे... शायद मैं कुछ तिकड़म लगा सकूँ...

लेनिन - उसका असली नाम... ललीतेंदु लक्ष्मण नायक... शॉर्ट कर्ट में लल्लन... तुझे... यश वर्धन चेट्टी... याद है... एक लड़की की कत्ल के इल्ज़ाम में जैल गया था... जिसे विश्वा ने मार दिया... पोस्ट मोर्टेम रिपोर्ट में... ड्रग्स का ओवर डोज आया था...

रोणा - हाँ... पर लल्लन का यश के केस के साथ क्या सम्बंध...

लेनिन - है... वही बता रहा हूँ... यश जिस लड़की को... निहारिका को.. गाड़ी से कुचला था... लल्लन निहारिका का... प्रमोटर था... और आशिक भी... जब निहारिका... यश से मिली... तो यश ने उसे फ़िल्में और एल्बम में बहुत काम दिलवाया... यश ने उसे ड्रग्स का आदि बना कर अपना गुलाम बना कर रखा... जब इस बात को लेकर लल्लन ने यश के खिलाफ कुछ करने की कोशिश की... तब यश ने... अपने कॉन्टेक्ट के जरिए... उसी ड्रग्स के केस में फंसा कर... जैल भिजवा दिया... जैल में उसकी दोस्ती विश्वा से हुआ... पर जैल में वह दोनों एक-दूसरे से दुश्मन की तरह पेश आते थे... इसलिए के कोई भी... अगर विश्व के खिलाफ साजिश को अंजाम दे... तो विश्वा उस साजिश को नाकाम कर... सजा देता था...

रोणा - ओ... तो इसलिए... तेरी पहचान लल्लन से हुई... जो आगे चलकर... विश्वा के खातिर जैल में तेरी गांड मारी...

लेनिन - नहीं...

रोणा - मतलब...

लेनिन - यश को मारने के लिए... जो कबड्डी का मैच हुआ था... दो टीम बनी थी... एक विश्वा की... और दूसरी...

रोणा - हाँ मालुम है दुसरी तेरी...

लेनिन - हाँ... जब विश्वा पर यश ने चोक का दाव आजमाया... तो विश्वा प्लान के मुताबिक... अपनी कुहनी को यश के सीने पर रख कर पलट जाता है.... तभी यश के कहने पर... लल्लन छलांग लगा देता है... जिसके वज़ह से... यश की पसलियाँ टुट कर साँसे रुक गई थी... (कह कर लल्लन चुप हो जाता है)

रोणा - ठीक है... विश्वा और लल्लन का रिश्ता समझ में आ गया... पर तुझे कैसे मालुम नहीं हुआ... के तेरे पीछे वह लगा हुआ है...

लेनिन - विश्वा हमेशा एक बात कहता था... कहो कुछ... करो कुछ... दिखाओ कुछ हो जाए कुछ... उसके सभी दोस्त.. इस मामले में... माहिर और शातिर हैं... विश्वा ने अपनी माँ बाप से बात कर... लल्लन को माफी दिलवा दिया... और विश्वा के जैल से छूटने के डेढ़ साल पहले... उसे तेरे पीछे लगा दिया... और तेरे सारे हरकतों पर नजर रख रहा था...

रोणा - (झटका खाता है) क्या... इसका मतलब... लल्लन मेरे पीछे दो सालों से लगा हुआ था... (फिर अचानक उसकी आँखे बड़ी हो जातीं हैं) एक मिनट एक मिनट... दो साल पहले... तु भी तो मेरे पास आया था... लल्लन... लेनिन... (झट से खड़ा हो जाता है) मादरचोद...

लेनिन - (मुस्करा कर, खड़ा हो जाता है) देखा... जब लड़की सिर पर चढ़ गई थी... तो दिमाग लंड के मुहँ से सोच रही थी... जैसे ही लड़की दिमाग से उतरी... दिमाग पुलिसिये की तरह सोचने लगी...

रोणा - साले हरामी कुत्ते... मतलब तुने विश्वा के साथ मिलकर... विक्रम को मेरे बारे में...

लेनिन - हाँ... मैंने वह सारी बातें भी बताई... मिर्च मसाला लगा कर... जो तुने कभी करना तो दूर सोचा भी नहीं होगा...

रोणा - (चिल्ला कर) ग़द्दार...

लेनिन - ना ना ना... मैं विश्वा का यार.. सिर्फ यार ही नहीं... अयार हूँ...

रोणा गुस्से से कांपते हुए लेनिन पर झपटा मार देता है l पर उसके लिए लेनिन तैयार था किनारे हट कर एक और लुढ़क जाता है l पर दुसरी बार जब रोणा झपटा मारने के लिए तैयार होता है तो लेनिन के हाथ में एक बड़ी सी खुखरी देखता है l खुखरी देख कर रुक जाता है l तभी चलती ट्रक भी रुक जाती है l

रोणा - यह ट्रक यहाँ क्यूँ रुक गया...

लेनिन - ताकि तेरी मुलाकात तेरे बाप से हो... पर्दा उठा कर देख नीचे तेरा बाप खड़ा मिलेगा...

रोणा तिरपाल पर्दा उठाता है l ट्रक राजगड़ के नदी किनारे पर रुका हुआ था l थोड़ी ही दुर विश्व अपनी बाहों में हाथ फंसाये खड़ा था l विश्व को सामने देख कर रोणा गुस्से से दांत पिसते लगता है l रोणा ट्रक से उतरने की सोच ही रहा था कि एक जोरदार लात उसके पीठ पर पड़ती है l वह उड़ते हुए विश्व के कदमों से कुछ ही दुर मुहँ के बल आ कर गिरता है l

विश्व - चु चु चु चु... क्या से क्या हो गया... रोणा... क्या से क्या हो गया... बढ़े ठाठ थे... अब देखो... मेरे पैरों पर पड़ा है...

रोणा अपना चेहरा उठा कर देखता है विश्वा के पीछे और पाँच बंदे खड़े थे l उन में से एक बंदा को देख कर रोणा चौंकता है l वह कोई और नहीं राजगड़ का ग्राम रखी उदय था l रोणा उठ कर भागने की कोशिश करता है पर दो कदम भी भाग नहीं पाता, उसके पैरों को अपने पैरों से बाँध दिया था लेनिन ने l

लेनिन - देखा विश्वा भाई... आज भी मैं तुमसे बेहतर कबड्डी खेल सकता हूँ...

विश्वा - सब कुछ खत्म हो जाने दो... फिर अपनी अपनी टीम बना कर खेलते हैं...

लेनिन - ठीक है...

सीलु मीलु जिलु और टीलु आकर रोणा को पकड़ लेते हैं l रोणा छटपटाने लगता है और पुरी ताकत लगा कर छूटने की कोशिश करता है l

रोणा - छोड़ो... छोड़ दो मुझे...

विश्व - छोड़ दिया तो क्या करेगा...

रोणा - तेरा और इस उदय का खुन पी जाऊँगा...

विश्व - (अपने दोस्तों से) छोड़ दो इसे...

जैसे ही सब रोणा को छोड़ देते हैं रोणा विश्व के ऊपर हमला कर देता है पर उसके सारे वार खाली जातें हैं l फिर विश्व एक जोरदार पंच रोणा के पेट में जड़ देता है l पंच इतना जोरदार था कि रोणा तीन फुट ऊपर उछल कर घुटनों पर गिर कर बैठ जाता है l उसके आँखों के चारो तरफ़ जुगनू दिखाई देने लगते हैं l

विश्व - कुछ याद आया... ऐसे ही तेरी ठुकाई की थी मैंने... कटक में... हफ्तों तक हास्पिटल के बेड में पड़ा था..

रोणा - (दर्द से कराहते हुए बड़ी मुश्किल से) विश्वा.... मुझे छोड़ दे... वादा करता हूँ... रुप फाउंडेशन केस में... तेरा सरकारी गवाह बनूँगा...

विश्व - ऊँ हूँ... अब कोई फायदा नहीं... तेरी गवाही अब मेरे किसी काम नहीं आएगा...

रोणा - देख तुने कसम खाई थी... एक ही खुन करने के लिए... दुसरा मुझ जैसे लीचड़ के खुन से अपने हाथ गंदे मत कर...

विश्व - ठीक कहा तुने... तुझे जैसे गंदे आदमी के खुन से अपना हाथ कभी नहीं रंगना चाहिए... पर मैं जब भी तुझे देखता हूँ... मुझे श्रीनु याद आता है... बोल मैं क्या करूँ...

रोणा - मरे हुए को क्या मारेगा रे विश्वा... वैसे भी... अब तक राजा साहब को मेरे बारे में पता चल चुका होगा... अब हर जगह मेरी तलाशी हो रही होगी... इसलिए प्लीज मुझे जाने दो... कसम से... मैं किसी के हाथ नहीं लगूंगा... मैं... मैं यह देश छोड़ कर चला जाऊँगा...

विश्वा - ह्म्म्म्म... बात तो तुने फतेह की कि है... पर श्रीनु का बदला उतारूँ कैसे... अपनी कसम के वज़ह से मार नहीं सकता... श्रीनु के लिए तुझे छोड़ नहीं सकता... एक काम करता हूँ... तुझे सीधे भैरव सिंह के हवाले कर देता हूँ...

रोणा - (लड़खड़ाते हुए खड़ा हो जाता है) साले हरामी... कितनी देर से... गिड़गिड़ा रहा हूँ... मज़ाक लग रहा है क्या... अगर मैं राजा साहब के हत्थे लग गया... तो तेरी और राजकुमारी की रंगरलियां बता दूँगा... समझा... अब मुझे सीधी तरह जाने दे... वर्ना तु भी बहुत पछताएगा...

सीलु - लो विश्वा भाई... यह तुमको गाली के साथ साथ... धमकी भी दे रहा है...

विश्व - ठीक कह रहे हो सीलु... मैं सच में इसे छोड़ देता... अगर यह मुझसे खौफ रखता तो... पर क्या करूँ... मैं खतरनाक जो नहीं हूँ... (रोणा से) चल मुझे... मार... तेरा एक भी पंच मुझे हिट कर गया... तो वादा है मैं तुझे छोड़ दूँगा...

रोणा खुशी के मारे रो पड़ता है और रोते हुए फिर से घुटने पर बैठ कर झुक जाता है l हाथ में नदी किनारे की रेत उठा कर विश्वा के उपर फेंक देता है, पर वहाँ विश्वा था ही नहीं इधर उधर देख कर खड़ा होता है तब उसे महसूस होता है कि कोई उसके पीछे खड़ा है l जैसे ही घूम कर वार करने के लिए हाथ उठाता है विश्वा का सिंगल फीस्ट पंच रोणा की कलाई पर पड़ती है l रोणा का पूरा का पूरा दाहिना हाथ शुन पड़ जाता है l दर्द से बिल बिलाते हुए बायाँ हाथ चलाता है l विश्व वैसे ही सिंगल फीस्ट पंच लगाता है नतीज़ा वही बायाँ हाथ भी शुन पड़ जाता है l

रोणा - (दर्द से बिल बिलाते हुए) यह क्या कर दिया...

विश्व - वर्म कलई... कल्लडी मार्शल आर्ट की एक अद्भुत कला...

रोणा - देख आखिरी बार कह रहा हूँ... मुझे जाने दे... वर्ना... राजा साहब को तेरे और राजकुमारी के बारे कह दूँगा...

विश्व - इतना कुछ होने के बाद भी... मेरे लिए तेरे आँखों में डर जितना नहीं दिख रहा है... हेकड़ी उससे भी ज्यादा दिख रहा है... इसलिए तुझे राजा के हवाले ही करूँगा... तेरी मौत का फैसला वही करेगा...

रोणा - देख मैं बता दूँगा... सब बता दूँगा...

विश्वा - ऊँ हूँ... नहीं... नहीं बता पाएगा...

फिर विश्व एक पंच रोणा के गले में वॉकल कॉर्ड के पास एक धमनी पर मारता है, जिसे रोणा के मुहँ से थोड़ा खून निकल आता है, उसके बाद विश्व रोणा के कंधों पर, कमर के जॉइंट्स पर, घुटनों पर और पसलियों के किनारों पर पंचेस की बरसात कर देता है l रोणा किसी कटे हुए पेड़ की तरह नदी के रेत पर गिर जाता है l

विश्व - (उदय की ओर देख कर) उदय... इसके साथ क्या करना है... तुम जानते हो...

उदय - हाँ विश्वा... तुम बेफ़िक्र रहो... मैं इसे इसके अंजाम तक पहुँचाऊंगा....

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क्षेत्रपाल महल के सामने भैरव सिंह की ऑडी गाड़ी रुकती है l सीडियां चढ़ कर अंतर्महल में आता है l देखता है रुप को सुषमा अपने सीने से लगा कर दुलार रही है और बगल में विक्रम चहल कदम कर रहा है l भैरव सिंह को देख कर सभी खड़े हो जाते हैं l सुषमा कुछ कहने को होती है कि हाथ के इशारे से भैरव सिंह चुप करवा देता है l

भैरव सिंह - युवराज...

विक्रम - जी राजा साहब...

भैरव सिंह - आप अपनी बात एक साथ रखेंगे... ना हम दोबारा आपसे पूछेंगे... ना ही दोबारा सुनेंगे... अब जो सवाल जवाब होगा... सिर्फ राजकुमारी जी के साथ होगा...

विक्रम - जी राजा साहब...

भैरव सिंह - कहिए...

विक्रम - दो दिन पहले... एक आदमी मेरे पास आया था... नाम था लेनिन... सुंदरगड पोस्टिंग के दौरान... उसके ऊपर इंस्पेक्टर रोणा ने उस पर बहुत मेहरबान रहा... उसके लिए... फेंक आधार कार्ड का जुगाड़ कर नयी पहचान भी दिया था... टोनी के रुप में... एक दिन रोणा भुवनेश्वर में टोनी को बुला कर राजकुमारी जी की डिटेल्स निकाल कर देने के लिए कहा था... टोनी जब छानबीन की... तब उसे राजकुमारी जी के बारे में मालुम हुआ... वह डर गया... डर के मारे... रोणा को भी सारी बातेँ बताई... पर रोणा इसे हल्के में लिया... वह जब जब भुवनेश्वर गया है... सिर्फ और सिर्फ राजकुमारी को स्टॉक करने ही गया है... एक दिन उसे मालुम हुआ... राजकुमारी होली की छुट्टी में राजगड़ लौट रही हैं... तो उसने टोनी को जिम्मा दिया राजकुमारी जी को बीच रास्ते में किडनैप करने के लिए... टोनी डर के मारे मना ना कर सका... इसलिए सीधे मेरे पास आकर सब कुछ बता दिया... प्रूफ के लिए... मैंने उसे विडिओ कॉल करने के लिए कहा... उसने अपनी साइड कैमरा पर उंगली रख कर वीडियो कॉल किया... वीडियो में रोणा ही था... मेरे गुस्से का ठिकाना नहीं था... भीमा से पता चला कि... कुछ दिनों से रोणा गायब है... तो मैंने गुरु को रोक कर टोनी को अपनी गाड़ी दी... राजकुमारी जी को रोणा तक ले जाने के लिए... और बराबर दूरी बनाए पीछे पीछे उस गोदाम में पहुँचा... जहां मैंने रोणा की करतूत और इरादों को रंगे हाथ पकड़ा.... पर वह भागने में कामयाब रहा... मैंने आदमी दौडायें हैं.... जरुर हाथ लगेगा... (कह कर चुप हो जाता है)

भैरव सिंह - बस...

विक्रम - जी बस...

भैरव सिंह - राजकुमारी...

रुप - जी...

भैरव सिंह - हमारे सारे सवालों का ज़वाब... आप हमारी आँखों में आँख मिला कर दीजिए...

सुषमा - आज तक... इस घर की बेटियां कभी आँख मिला कर ज़वाब दिए हैं भला...

भैरव सिंह - (हाथ दिखा कर) आप चुप रहें तो बेहतर होगा... (सुषमा चुप हो जाती है) राजकुमारी जी...

रुप - (हिम्मत जुटा कर) जी...

भैरव सिंह - क्या आप... विश्वा को जानती हैं...

रुप - कौन विश्वा...

भैरव सिंह - एडवोकेट प्रतिभा सेनापति के बेटे को जानती हैं...

रुप - जी... जानती हूँ... पर उसका नाम तो प्रताप है...

भैरव सिंह - ह्म्म्म्म... कैसे जानती हैं....

रुप - एक बार... राजकुमार वीर जी ने कहा... के मुझे ड्राइविंग सीखनी चाहिए... इसलिए ड्राइविंग स्कुल में मेरी क्लासमेट भाश्वती के साथ एडमीशन ली थी... वहीँ पर एक दिन बस में कुछ गुंडे भाश्वती को छेड़ दिया था... जिस पर प्रताप ने उन सबकी पिटाई कर दी थी... उसके बाद भाश्वती प्रताप को भाई मानने लगी... आखिरी दिन प्रताप ने हम सभी को... पार्टी के लिए बुलाया था... तो हम उसके घर गए थे... बस उतना ही...

भैरव सिंह - क्या उसी पार्टी के दिन... आपने इंस्पेक्टर रोणा को थप्पड़ मारा था...

रुप - जी... पर मुझे मालूम ही नहीं था कि वह इंस्पेक्टर है...

भैरव सिंह - ठीक है... उसे थप्पड़ मारा क्यूँ...

रुप - क्योंकि की उसकी नजर मुझे बहुत चुभ रही थी... बड़ी गंदी नजर से देख रहा था...

भैरव सिंह - क्या आपको पता था... के वह आपको स्टॉक कर रहा है...

रुप - नहीं... पर मुझे कोई स्टॉक करेगा... यह मैं सोच भी नहीं सकती थी... क्यूँकी मुझे अपने खानदान और भैया की रेपुटेशन पर पूरा भरोसा था...

भैरव सिंह - (जबड़े भिंच जाते हैं) एक आखिरी सवाल... आपको याद है... एक दिन किसी ने बड़े राजा जी के कमरे में कोई घुस आया था...

रुप - उस दिन मैं रात भर पढ़ते पढ़ते सो गई थी... छोटी माँ के जगाने पर मैं उठी थी...

भैरव सिंह रुप की आँखों में झाँक कर देखता है l बड़ी सफाई से रुप ने हर बातों का जवाब दिया था l भैरव सिंह थोड़ी देर रुप को घूरने के बाद रुप से

भैरव सिंह - हमें आपका मोबाइल दीजिये...

रुप मोबाइल दे देती है l भैरव सिंह कॉल लिस्ट देखता है सिर्फ दस से पंद्रह कॉन्टैक्ट ही थे l फाइल मैनेजर में कोई फोटो उसे दिखती नहीं l फिर वह मोबाइल को अपनी जेब में रख देता है l

रुप - जी... वह मोबाइल...

भैरव सिंह - आज से आपको किसी को भी फोन करना हो तो... घर की कॉर्डलेस से कीजिए... आपका अब भुवनेश्वर जाना बंद... आप घर में ही पढ़ेंगी... सिर्फ इम्तिहान देने... भुवनेश्वर जायेंगी... (रुप का चेहरा उतर जाता है और उदास मन से चेहरा झुका लेती है) हम ने आप से कुछ कहा...

रुप - जैसी आपकी इच्छा...

भैरव सिंह - युवराज...

विक्रम - जी राजा साहब...

भैरव सिंह - आप प्रिन्सिपल से बात कर लीजिए...

विक्रम - जी...

भैरव सिंह - अब आप हमारे साथ आइए...

विक्रम और भैरव सिंह अंतर्महल से निकलने लगते हैं l वह देखते हैं भीमा सीडियों पर भागते हुए आ रहा है l

विक्रम - क्या खबर लाए हो भीमा...

भीमा - वह... वह मिल गया... पर...

भैरव सिंह - पर क्या...

भीमा - वह हस्पताल में था... कनाल के पास ज़ख्मी हालत में पड़ा हुआ था... उदय ने उसे यशपुर हस्पताल में भर्ती करवाया था... जब होश आकर डर के मारे बड़बड़ाने लगा... मुझे राजा से बचाओ... मुझे विक्रम से बचाओ... तब उदय ने हमें खबर दी...

भैरव सिंह - वह हराम का पिल्ला जैसी भी हाल में है... उसे उठा कर रंग महल लेकर आओ... जाओ...

भीमा - जी... हुकुम... हम उसे रंग महल ले आए हैं...

 
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