Thriller "विश्वरूप" ( completed ) - Page 9 - SexBaba
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Thriller "विश्वरूप" ( completed )

धीरे धीरे भीमा के लोगों में विश्व का डर बैठ रहा है

हाँ क्यूंकि जब से क्षेत्रपाल परिवार अपनी पर आई है तब से ना त्योहार ना खुशियां ना मातम सरेआम नहीं मना सकते l इस बार पहली बार होगा जो गाँव में होली मनेगी

हाँ लेनिन ही लल्लन है

जैल में विश्वा से दुश्मनी इसलिये कर रहा था ताकि कोई दुश्मनी उतारने आए तो लेनिन से उसे पता लगे l विश्व सबके लिए प्लान बना कर रखा है l अभी तक एक भी बैक फायर नहीं हुआ है l पर....

अब केस में विश्व के लिए वह गैर ज़रूरी हो गया था

और बेकार में अड़ंगा डाल रहा था

हाँ यह अगले अपडेट में मालूम होगा

दिमाग चला जरूर पर हाथ पैर नहीं चल रहे हैं अब और ऊपर से जुबान भी लकवा ग्रस्त हो गया
 
धन्यबाद SANJU ( V. R. ) भाई आपको पसंद आया इसके लिए तह दिल से आभार

शुक्रिया

लगाया ही तो है

नंदिनी अब भुवनेश्वर नहीं जाएगी और नंदिनी की मोबाइल अपने कब्जे में ले लिया

हाँ उसे शक़ है और अपनी शक़ तह तक पहुँचने की कोशिश भी करेगा

धन्यबाद मेरे भाई

चाहता तो पुरा इतिहास लिख सकता था पर अरुण की उम्र के हिसाब से सिर्फ इतना ही काफी है

शुक्रिया धन्यबाद आभार
 
👉एक सौ पैंतालीसवां अपडेट

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राजगड़

सुबह सुबह सूरज पुर्व आकाश में निकल रहा था l जैसे जैसे उजाला फैल रहा था उसके साथ साथ एक गाड़ी तेज रफ्तार से धूल उड़ाते हुए राजगड़ की सड़कों पर भागे जा रही थी l लक्ष था रंग महल l चर्र्र्र्र्र्र्र्र् की आवाज के साथ गाड़ी रंग महल के सामने रुकती है l बाहर पहरा दे रहे पहरेदारों में से एक भागते हुए आता है और गाड़ी का दरवाज़ा खोलता है l गाड़ी से बल्लभ उतर कर सीढियों से होकर महल के अंदर जाता है l दिवाने आम कमरे में भीमा और कुछ पहलवान नजर आते हैं l

बल्लभ - भीमा... राजा साहब...

भीमा - वह... उपरी मंजिल में, अति विशेष कक्ष में आपका इंतजार कर रहे हैं...

बल्लभ आगे और कुछ नहीं पूछता, सीधे भागते हुए पहली मंजिल पर अति विशेष कक्ष में आता है देखता है भैरव सिंह बालकनी से बाहर झाँक रहा था l उसके अंदर आने का एहसास भैरव सिंह को होता है पर भैरव सिंह बाल्कनी से अभी भी बाहर ही झाँक रहा था l कुछ वक़्त भयानक शांति से गुजर जाते हैं l भैरव सिंह पलट कर अंदर आता है और अपनी कुर्सी पर बैठ जाता है l

भैरव सिंह - आओ... (अपने सामने बैठने के लिए इशारा करते हुए) बैठो...

बल्लभ - नहीं राजा साहब... मैं ठीक हुँ...

भैरव सिंह - कहाँ थे...

बल्लभ - जी मैं... ऑडिट रिपोर्ट सबमिट करने गया हुआ था...

भैरव सिंह - हूँ... और... दरोगा का कोई खबर...

बल्लभ - जी अब तक तो नहीं...

भैरव सिंह - हूँ... वह तुम्हारा अच्छा दोस्त है ना...

बल्लभ - जी...

भैरव सिंह - फिर तुम अब तक उससे... कैसे इतने बेख़बर हो...

बल्लभ - वह एक दीवड सांप है... जा जा कर कहाँ जाएगा.... लौट कर आएगा... अपने ही बिल में...

भैरव सिंह - ह्म्म्म्म... हमें तो मालुम ही नहीं था... के वह दीवड सांप है...

भैरव सिंह के इस बात पर बल्लभ थोड़ा असहज हो जाता है l उसे कुछ समझ नहीं आता l उसे लगता है जरूर रोणा से हो ना हो कोई बड़ी गलती हो गई है l वह अपनी शंका दुर करने के लिए भैरव सिंह से पूछता है

बल्लभ - राजा साहब.. आपने अचानक बुलाया... रोणा ने कुछ कर दिया क्या...

भैरव सिंह - उसने क्या किया... क्यूँ किया... पर जो भी हुआ... हमें एक असमंजस सा बना दिया है... ऐसा लग रहा है... जैसे हमारे सामने हर कोई एक मुखौटा पहने... कोई अलग सा चरित्र जिए जा रहा है...

बल्लभ - मैं कुछ समझा नहीं...

भैरव सिंह - समझना पहले हमें है... प्रधान... हमें पहले समझने दो... इसलिए जो जो सवाल हम तुमसे करते जाएं... सबका सही सही जवाब देते जाओ...

बल्लभ - जी...

भैरव सिंह - तुम दोनों... राजगड़ से जब विश्व के बारे में पता लगाने के लिए गए हुए थे... तब पहले रोणा हॉस्पिटलाईज किस वज़ह से हुआ था...

बल्लभ - जी वह जोगर पार्क में... एक लड़की से बदतमीजी के चलते... वहाँ पर मौजूद लोगों ने उसे पीट डाला था...

भैरव सिंह - ह्म्म्म्म... और दूसरी बार...

बल्लभ - (याद करने की कोशिश करते हुए) हूँ... शायद... हाँ... हम जब एडवोकेट प्रतिभा जी से मुलाकात कर आए थे... उसके अगले दिन...

भैरव सिंह - ह्म्म्म्म... हमें याद है... तुमने कहा था... वहाँ पर एक लड़की ने... रोणा को थप्पड़ मारकर जलील किया था...

बल्लभ - जी...

भैरव सिंह - और शायद रोणा ने यह भी कहा था कि... हो ना हो... वह विश्व की प्रेमिका होगी...

बल्लभ - हाँ कहा तो था... पर बाद में... उसीने कंफर्म कर मना किया था...

भैरव सिंह - हाँ... हमें याद है... अच्छा क्या तुम जानते हो... भुवनेश्वर में... रोणा ने किसे हायर किया था... उस लड़की के बारे में... पुरा डिटेल्स निकालने के लिए...

बल्लभ - हाँ... जहां तक मुझे याद है... उसका नाम शायद... लेनिन है...

भैरव सिंह - ओ...

बल्लभ - क्या हुआ राजा साहब...

भैरव सिंह - तो क्या उस लेनिन ने कोई डिटेल्स निकाली...

बल्लभ - पता नहीं... शायद निकाला भी हो...

भैरव सिंह - ह्म्म्म्म... तुमने दोबारा कभी उस लड़की से मिले... या देखा...

बल्लभ - (सोच में पड़ जाता है और फिर कहता है) शायद मैंने उस लड़की को... निर्मल सामल की बेटी की होने वाली मंगनी के दिन देखा था... ठीक से याद नहीं...

भैरव सिंह अपनी भौंहे सिकुड़ कर पैनी नजर से बल्लभ की ओर देखने लगता है l बल्लभ फिर से असहज हो जाता है

बल्लभ - क्या हुआ राजा साहब... आज अचानक...

भैरव सिंह - तुम क्षेत्रपाल परिवार के... बहुत बड़े राज़दार हो... बहुत सी ऐसी बातेँ जानते हो... जिसे हम दुनिया से छुपा कर रखना चाहते हैं... पर... (रुक जाता है)

बल्लभ - पर क्या है राजा साहब...

भैरव सिंह - फ़र्ज़ करो... कोई तुम्हारे घर की औरत को... उठा ले जाए... तो तुम क्या करोगे...

बल्लभ - मेरे परिवार पर ऐसी मुसीबत अलबत्ता आएगी नहीं... क्यूँकी मैं और मेरा परिवार आपकी छत्रछाया में हैं... अगर ऐसा कभी हुआ भी... तो आपके पास... हाथ फैलाने आऊँगा...

भैरव सिंह - और हमसे तुम क्या उम्मीद रखोगे...

बल्लभ - कड़ी से कड़ी सजा देने के लिए कहूँगा...

भैरव सिंह - हूँ... मतलब...

बल्लभ - मौत की सजा...

भैरव सिंह - हूँ... आओ हमारे साथ

बस इतना कह कर अपनी जगह से उठता है और आगे आगे चलने लगता है l बल्लभ उसे फॉलो करता है l कुछ ही क्षण के बाद दोनों एक कमरे में पहुँचते हैं l बल्लभ देखता है उस कमरे में एक मेडिकल बेड लगा हुआ है l उस बेड पर रोणा पट्टियों के साथ आँखे मूँद कर लेटा हुआ है l एक डॉक्टर उसे चेक कर रहा है l बेड के दुसरे तरफ ग्राम रखी उदय खड़ा हुआ है l भैरव सिंह, बल्लभ की ओर देखता है l बल्लभ की आँखे हैरानी से बाहर आने को थे l

बल्लभ - र्र्र्र्र्र्र्र्राजा साहब... यह...

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बाथ रोब पहन कर बाथ रुम से शुभ्रा जैसे ही निकलती है सामने वह विक्रम को देखती है l वह चौंकते हुए विक्रम से पूछती है

शुभ्रा - आप...

विक्रम - क्यूँ नहीं आना था क्या...

शुभ्रा - मुझे लगा आप शायद शाम को आयेंगे... (कह कर आईने के सामने जाती है और अपने बालों को खोल कर साफ करने लगती है) खैर नंदिनी सही सलामत पहुँच तो गई ना... फोन लगा रही थी... स्विच ऑफ आ रहा है...

विक्रम - ह्म्म्म्म.. अब शायद ही नंदिनी का फोन ऑन हो...

शुभ्रा - (शॉक होते हुए) क्यूँ... क्या हुआ...

विक्रम - अरे कुछ नहीं... (कमरे में एक सोफ़े पर बैठते हुए) बस... राजा साहब ने उसे... कैद कर लिया.... और उसका मोबाइल अपने पास रख लिया...

शुभ्रा - ओ... (एक थकी हुई ज़वाब के साथ बेड पर बैठ जाती है)

विक्रम - क्या हुआ शुब्बु...

शुभ्रा - विक्की... अब यह घर काटने को लगता है... पहले वीर थे... पर अब ना तो वीर हैं... ना ही नंदिनी... इतना बड़ा घर... और हम.. सिर्फ दो जान...

विक्रम - हाँ बात तो आप सही कह रही हो... एक काम क्यूँ नहीं करतीं... अपना प्रैक्टिस शुरु कर दीजिए...

शुभ्रा - (मुहँ बना लेती है) नहीं... अब यह इतना आसान नहीं है...

विक्रम - क्यूँ नहीं... आपने हाऊस सर्जन के तौर पर... इंट्रेंशिप किया हुआ है ना...

शुभ्रा - आप बात समझ नहीं रहे हैं... मैंने डिग्री के बाद... प्रैक्टिस बिल्कुल किया नहीं है... और आप भी जानते हैं... अगर मैं प्रैक्टिस करना शुरु करूँ तो... इस बात का विरोध सबसे पहले... अपने घर से ही आएगा...

विक्रम - वह मैं देख लूँगा... उसकी जवाब देही मेरी... आप बस तैयारी कीजिए...

शुभ्रा - (खीज जाती है) ओह गॉड... ट्राई टु अंडरस्टैंड विक्की... यह डॉक्टरी है... बहुत रेस्पांसिबल ड्यूटी होती है... समाज के लिए... और स्पेशियली पेशेंट के लिए... जिम्मेदारी बढ़ जाती है...

विक्रम - हाँ तो... आप जिम्मेदारी उठाओ... आप ने जो हासिल किया... अगर वह समाज के लिए किसी काम ना आया तो... उस उपलब्धी की क्या मायने रह जाएंगे...

शुभ्रा - यह इतना आसान नहीं है विक्की... ऐक्चुयली मैं मेंटली तैयार नहीं हूँ... यह मेडिकल साइंस... बड़ी रेस्पांसिबल जॉब होता है...

विक्रम - ह्म्म्म्म... तो फिर आपके अकेले पन का कोई इलाज नहीं है... हाँ अगर आप कहें तो... मैं अपना काम छोड़ कर कुछ दिनों लिए... आपको कम्पनी दे सकता हूँ...

शुभ्रा - जानती हूँ... पर आप रोज रोज तो घर पर नहीं रह सकते ना... काम भी तो इम्पोर्टेंट है...

विक्रम - इसी लिए तो कह रहा हूँ... आप इस हैल से बाहर निकलिये... अपनी जिम्मेदारी उठाईए... खुद को आप बिजी रखोगी... तो यह घर और यह अकेलापन काटने को नहीं दौड़ेगा...

शुभ्रा - काश... (थोड़ा siriyas हो कर) मैं और कोई स्टडी की होती...

विक्रम - हाँ तब शायद... हम मिले भी ना होते... और आपकी जिंदगी... शायद... बहुत खूब सूरत होती...

शुभ्रा - आप को बुरा लगा... आई एम सॉरी... मैं यह कहना चाहती थी के... मैं अपनी जिम्मेदारियों से भाग नहीं रही हूँ... असल में... इस जॉब के तहत... हर एक को स्पेशल केयर और अटेंशन देना पड़ता है... और मुझे लगता है... मैं अभी इसके लिए तैयार नहीं हूँ...

विक्रम कोई जवाब नहीं देता l शुभ्रा देखती है विक्रम कुछ सोच में खोया हुआ है l वह अपनी जगह से उठती है और विक्रम के पास बैठती है l

शुभ्रा - प्लीज विक्की... आप मन खराब मत कीजिए... वर्ना... मुझे भी बहुत बुरा लगेगा...

विक्रम - नहीं... मैं मन खराब नहीं कर रहा... (शुभ्रा भौंहे सिकुड़ कर देखने लगती है) नहीं सच्ची... कसम से...

शुभ्रा - तो किस गहरी सोच में खोए हुए हैं आप...

विक्रम - आपकी प्रॉब्लम की सोल्यूशन के बारे में सोच रहा था...

शुभ्रा - अच्छा... (मुस्कराते हुए हुए) तो जनाब... क्या साल्यूशंस निकाला आपने...

विक्रम - देखिए... वीर की दुनिया बस गई है... वह और अनु उनकी अपनी दुनिया को संवारने में लगे हुए हैं... आज नहीं तो कल... नंदिनी को भी अपने घर जाना ही है...

शुभ्रा - हाँ... सो तो है... पर जनाब आपका सोल्यूशन क्या है...

विक्रम - हूँ... एक मिनट... (कह कर उठ जाता है) म्म्म्म्म्म... आप भी खड़े हो जाइए... (शुभ्रा उठ खड़ी होती है, तो विक्रम उसे अपनी बाहों में उठा लेता है)

शुभ्रा - आह... विक्की... यह क्या कर रहे हैं...

विक्रम कुछ नहीं सुनता है, शुभ्रा को लेकर बेड पर डाल देता है और शुभ्रा के ऊपर आ जाता है l

विक्रम - आपको.. केयर और अटेंशन की प्रैक्टिस जरूरत है... और ऊपर से आपको अकेलापन भी खाए जा रहा है... इसलिए अब टाइम आ गया है... या तो जूनियर विक्की को लाया जाए... या फिर जूनियर शुब्बु को लाया जाए... बस यही साल्यूशं है...

शुभ्रा - (शर्म से गाल लाल हो जाती है) ओ तो जनाब... राजगड़ से ठान कर आए हैं... जाइए मुझे छोड़िए...इसके लिए रात होने दीजिए... और ऑफिस जाने के लिए रेडी हो जाइए...

विक्रम - (बाथ रोब की गांठ खोल कर अलग कर) ना... अब जब तक... किसी जूनियर की आने की कंफर्मेशन नहीं मिलती... दिन रात आपकी अकेले पन की यही इलाज है... और मुझे मेरे डॉक्टर साहिबा का इलाज करने दीजिए...

इससे पहले शुभ्रा कुछ और कह पाती उसके होंठों को विक्रम गिरफ्त में ले चुका था l शुभ्रा भी हल्का सा विरोध के बाद खुद को समर्पित कर देती है l

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बहुत कुछ पूछना चाहता था पर कुछ और नहीं पुछ पाता बल्लभ, फिर से बेड की ओर देखता है और बेड के करीब जाता है l रोणा की आँखे बंद थीं और डॉक्टर एक सालाइन में इंजेक्शन चुभो देता है फिर भैरव सिंह के पास आता है l

डॉक्टर - राजा साहब... इतना तो समझ में आ रहा है... इंस्पेक्टर साहब के जिस्म कुछ पर्टिकुलर जगहों पर लकवा का अटैक हुआ है... समझ में नहीं आ रहा... यह न्यूरो अटैक है या कुछ और... इससे आगे की चेक अप के लिए... हमारे पास.. मशीने नहीं हैं...

भैरव सिंह - फिर भी... डॉक्टर तुम क्या गैस कर रहे हो...

डॉक्टर - शायद हाई ब्लड प्रेशर के कारण... ब्रेन हैमरेज हुआ है... जिसके वज़ह से... जुबान के साथ साथ हाथ पैर भी शुन्य हो गए हैं....

भैरव सिंह - ठीक है डॉक्टर... तुम जा सकते हो... (डॉक्टर मुड़ने को होता ही है कि) सुनो डॉक्टर... यह बात अपनी जेहन से मिटा देना... किसीको भी मालुम नहीं हो पाए कि इंस्पेक्टर यहाँ इस हालत में है...

डॉक्टर - जी राजा साहब...

भैरव सिंह - बेहतर... वर्ना... इसके जगह तुम खुद को... ऐसी ही हालत में पाओगे...

डॉक्टर की हलक सुख जाती है l वह बिना कुछ कहे अपना ब्रीफकेस उठा कर बाहर चल देता है l उसके जाने के बाद बल्लभ भैरव सिंह के पास आता है l

बल्लभ - मैं कुछ समझा नहीं राजा साहब...

भैरव सिंह बल्लभ कुछ कहने की सोच ही रहा था कि उसके कानों में एक घंटी की आवाज सुनाई देता है l बदले में भैरव सिंह कमरे में लगे एक घंटे को बजा देता है l बल्लभ इसका मतलब समझ जाता है l अब तक जो बातचीत भैरव सिंह और बल्लभ के बीच हो रहा था उसे तीसरा कोई नहीं सुन रहा था l अब शायद भीमा अंदर आने के लिए पुरानी तरीके से घंटी बाजा कर परमिशन माँगा और उसी तरह से भैरव सिंह ने आने की परमीशन दी l थोड़ी ही देर बाद भीमा अंदर आता है

भीमा - हुकुम...

भैरव सिंह - क्या बात है भीमा... क्या हो गया...

भीमा - हुकुम... एक आदमी आया है... खुद को नया दरोगा कह रहा है... और आपसे मिलना चाहता है...

भैरव सिंह - ह्म्म्म्म... ठीक है... बिठाओ उसको... हम आ रहे हैं... (भीमा अपना सिर झुका कर उल्टे पाँव लौट जाता है l उसके जाते ही) प्रधान... इस नए दरोगा को... कब जॉइन करना था...

बल्लभ - शायद दो या तीन दिन पहले...

भैरव सिंह - ह्म्म्म्म... चलो मिल लेते हैं... (जाते जाते पीछे मुड़ कर उदय से) उदय...

उदय - जी राजा साहब...

भैरव सिंह - अगर इसे होश आए... तो...

उदय - समझ गया राजा साहब... मैं इन्हें... आपके सामने पेश कर दूँगा...

भैरव सिंह - हाँ पर तब... जब कोई बाहर वाला ना हो... समझ गए...

उदय - जी अच्छी तरह से...

आगे आगे बल्लभ कमरे से निकल जाता है और रास्ता बना कर चलने लगता है और भैरव सिंह उसके पीछे चलते हुए सीढियों से उतर कर दिवाने खास में आता है l देखता है पुलिस की वर्दी में एक नौजवान पुलिस ऑफिसर बैठा हुआ था l जैसे ही वह भैरव सिंह को देखता है अपनी जगह से उठ खड़ा होता है और भैरव सिंह को एक सैल्यूट ठोकता है l

भैरव सिंह - अपना परिचय दो ऑफिसर...

दरोगा - जी मेरा नाम... दाशरथी दास है... आप मुझे सिर्फ दास कह सकते हैं... अब तक ट्रेनिंग के बाद मैं पुलिस हेड क्वार्टर में... इंटेलिजंस विंग में था... यह मेरा पहला फिल्ड जॉब है... वह भी डेपुटेशन पर...

भैरव सिंह - दास... (बैठते हुए) जहां तक... हमें मालूम था... तुम्हें दो या तीन दिन पहले ही जॉब टेक ओवर कर लेना था...

दास - जी ऐक्चुयली... मैं यहाँ राजगड़ आना ही नहीं चाहता था...

भैरव सिंह - ह्म्म्म्म... क्यूँ...

दास - (झिझकते हुए इधर उधर देखने लगा)

भैरव सिंह - कोई बात नहीं... रिलेक्स... बैठ कर बात बताओ...

दास - नहीं राजा साहब... आपके सामने बैठने की जुर्रत नहीं कर सकता....

भैरव सिंह - क्यूँ... क्यूँ नहीं बैठ सकते... पुलिस वाले हो... इतना हक् तो कानून या सरकार ने तुम्हें दी ही है...

दास - हाँ... पर कानूनी या सरकारी ओहदे से भी जो बड़ा हो... उनके आगे कैसे बैठ सकते हैं...

भैरव सिंह - ठीक है... पहले यह बताओ क्यूँ नहीं आना चाहते थे... राजगड़ में...

दास - खौफ... या डर भी कह सकते हैं... यह मेरी पहली फिल्ड जॉब है... और इसमें मैं ना अपने रिपोर्टिंग ऑफिसरों को... ना आपको... किसीको भी नाराज नहीं करना चाहता था...

भैरव सिंह - ह्म्म्म्म... तो किसके कहने पर अपना इरादा बदला...

दास - जी वह... यहाँ के पूर्व तहसीलदार... नरोत्तम पत्री... उनके कहने पर ही आया हूँ... उन्होंने कहा कि... यह मेरी जिंदगी की सबसे बड़ी पोस्टीं है... बहुत बड़ी ऑपर्चुनिटी है... राजा साहब के छत्रछाया में ही... मैं फल फूल सकता हूँ...

भैरव सिंह - तो पत्री के कहने पर तुमने यहाँ... जॉइन किया...

दास - जी... और आते ही काम शुरु भी कर दिया है...

भैरव सिंह - कैसा काम...

दास - जी... वह... रोणा के बारे में इंक्वायरी...

भैरव सिंह - (भौहें सिकुड़ कर) रोणा के बारे में... कैसी इंक्वायरी...

दास - जी वह अभी तक लापता हैं ना... और आते ही मुझे कुछ सुराग भी मिल गए हैं...

भैरव सिंह इस बार चुप रहता है और अपनी पैनी नजर से दास को परखने की कोशिश करने लगता है l भैरव सिंह को खामोश देख कर बल्लभ, दास से सवाल पूछता है l

बल्लभ - कौन से और क्या क्या सुराग मिले हैं तुम्हें...

दास - जी आपकी तारीफ़...

बल्लभ - मैं... राजा सहाब के इस्टेट का वकील हूँ...

दास - ओ... सॉरी... कभी देखा नहीं ना... इसलिए पहचान नहीं पाया...

बल्लभ - ठीक है... पर बताया नहीं इंस्पेक्टर तुमने... क्या क्या और कौन कौन-से सुराग हाथ लगे हैं...

दास - जी ज्यादा कुछ नहीं... पर अनिकेत रोणा बाहर कहीं नहीं गए हैं... या तो यशपुर या फिर.. राजगड़ में हैं...

बल्लभ - यह तुम किस बिनाह पर कह सकते हो...

दास - कल तकरीबन दोपहर को... अनिकेत बाबु... बदहवास यशपुर के सड़कों पर भाग रहे थे... इस बात को... कुछ चश्मदीद गवाहों ने तस्लीम किया है... जिसके बिनाह पर तहकीकात को आगे बढ़ाया तो पता चला... कल उन्हें ज़ख्मी हालत में... हस्पताल में भर्ती कराया गया था... पर शाम आते आते... उन्हें किसीने हस्पताल से अगवा कर लिया है... या किसी अपने ने उन्हें अपने साथ ले गया है... और अभी फिलहाल अनिकेत बाबु... फिर से लापता हैं...

भैरव सिंह - बहुत अच्छे... बढ़िया खबर सुनाया तुमने...

दास - थैंक्यू राजा साहब... पर मुझे लगता है... आपको भी यह खबर मालुम है... और शायद आप भी इस बात को लेकर परेशान हैं...

भैरव सिंह - बहुत बढ़िया... दास बहुत बढ़िया... तुम वाकई बहुत काबिल ऑफिसर हो... पर तुम्हें कैसे पता चला... के हम रोणा को लेकर परेशान हैं...

दास - आपका चेहरा देख कर... क्यूंकि हर किसी को मालुम है... इंस्पेक्टर अनिकेत रोणा... सरकारी अधिकारी कम... आपके सिपाह सालार ज्यादा थे... तो जाहिर है... राजा को अपने सालार की चिंता होना स्वाभाविक है...

भैरव सिंह - (मुस्कराता है) बहुत अच्छे दास... बहुत अच्छे... तुमने पहली बार में ही हमें इम्प्रेस कर गए... तो क्या तुमने कुछ रिपोर्ट भी बनाई है इस पर...

दास - जी वही... बनाई है... इसे जमा करने से पहले आपको इन्फॉर्म करना चाहता था... और वैसे भी... किसी तीर्थ पर आए हों तो भगवान के दरबार में हाजिरी भी लगानी पड़ती है... और साथ साथ आपसे यह कहना भी चाहता हूँ... मैं अनिकेत जी को ढूँढ कर सबसे पहले आपके सामने प्रस्तुत करूँगा...

भैरव सिंह - ह्म्म्म्म... बहुत अच्छे... ठीक है... दास... तुमसे मिलकर वाकई बहुत खुशी हुई... जाओ... अपने अथॉरिटी को इन्फॉर्म कर दो... भीमा इन्हें इनके गाड़ी तक बाइज्जत छोड़ दो... और थोड़ी देर के लिए हमें एकांत में रहने दो...

भीमा - जी हुकुम...

दास - थैंक्यू राजा साहब... थैंक्यू वेरी मच...

इतना कह कर दास भैरव सिंह को सैल्यूट ठोकता है और बाहर जाने लगता है, भीमा उसके साथ बाहर चला जाता है l बल्लभ देखता है भैरव सिंह का जबड़ा सख्त हो गया है l

बल्लभ - राजा साहब... रोणा कल यशपुर के सड़कों पर बदहवास भाग रहा था... और ज़ख्मी हालत में हस्पताल में था... और अब सरकारी रिकार्ड पर गायब है... मैं कुछ... (रुक जाता है)

भैरव सिंह - अभी थोड़ी देर पहले... हमने तुमसे पुछा था... के अगर कोई तुम्हारे घर की.. किसी औरत को उठा ले तो तुम क्या करोगे...

बल्लभ की आँखे हैरानी के मारे बड़ी हो जाती हैं, उसे माजरा कुछ कुछ समझ में आ जाता है l रोणा के बारे में सोचते ही उसके माथे पर पसीना उभर आती है l उसे अपना थूक तक गटकने में मुश्किल होने लगी l भैरव सिंह अपनी कुर्सी से उठता है और बल्लभ की ओर देखते हुए

भैरव सिंह - हाँ प्रधान हाँ... जो तुम सोच रहे हो... बिल्कुल सही सोच रहे हो... अनजाने ही सही...

रोणा ने... क्षेत्रपाल की मूंछ पर... अपना हवस का पंजा मारा है...

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वैदेही के दुकान में अरुण और उसके कुछ दोस्त आकर घुस आते हैं और कोई टेबल के नीचे कोई गौरी के पीछे छिप जाते हैं l अरुण सीधे जाकर वैदेही के पीछे से पकड़ कर छुप जाता है l

वैदेही - ऐ... यह सब क्या हो रहा है... तुम सब छुप क्यों रहे हो...

अरुण - श्श्श्श... मासी चुप रहो... माँ और बापु... ढूंढ रहे हैं... पकड़े गए तो मारेंगे...

तभी दुकान के सामने हरीआ लक्ष्मी आदि आकर खड़े होते हैं l सब की आँखों में गुस्सा और डर साफ दिख रहा था l वैदेही उनकी ओर देख कर पूछती है

वैदेही - लक्ष्मी... क्या हुआ... इन बच्चों ने क्या किया...

हरीआ - देखो वैदेही... हम सब तुम भाई बहन से दूरी बनाए रखे हैं... पर तुम्हारा भाई... हमारे घर में जबरदस्ती घुसने की कोशिश कर रहा है...

वैदेही - ऐ हरीआ... खबर दार... मुहँ सम्भाल कर... वर्ना मुहँ तोड़के दूँगी... मेरे भाई ने किया क्या है...

हरीआ - क्या किया है... हमारे बच्चों को उल्टी सीधी पट्टी पढ़ा रहा है... क्या वह नहीं जानता... आखिर यहीं पर तो पला बढ़ा है... कभी गाँव में.. कोई त्योहार मनाया भी गया है... नहीं ना... क्यूँ... क्यूँकी क्षेत्रपाल महल से हुकुम है... ना त्योहार ना मातम... कुछ भी कोई भी नहीं मना सकता यहां... हमारे बाप दादा ओं से यह परंपरा निभाया जा रहा है... इसलिए... कोई नहीं मनाता... पर यह... टींडे... बोल रहे हैं... होली मनाएंगे... कृष्ण विमान... नगर परिक्रमा कराएंगे... इसलिए इन बच्चों को हमारे हवाले करो... हम इनके सिर पर चढ़े भूत उतारेंगे...

वैदेही - रुको थोड़ा... (बच्चों से) ऐ तुम सब सामने आओ मेरे... (बच्चे जहां जहां छुपे हुए थे, सब बाहर आकर वैदेही के सामने खड़े हो जाते हैं) यह तुम लोगों के माँ बापु क्या कह रहे हैं...

अरुण - वह मासी... (अरुण विश्व के साथ हुए अपनी सारी बातें बताता है)

वैदेही - (सारी बातें सुनने के बाद, लोगों की ओर देखते हुए) यह तो कह रहे हैं... त्योहार यह लोग मनाएंगे... और त्योहार मनाने के लिए... इन्होंने विशु से मदद माँगी है बस...

हरीआ - हाँ हाँ... पर यह सब इनके दिमाग में आया कहाँ से... यह लोग जो रोज रोज लाइब्रेरी में जाकर झक्क मारते रहते हैं... वहीँ से तो इन्हें यह फितूर मिला है बस...

वैदेही - बस हरीआ बस... बच्चों की इच्छा की... इसलिए उनको विशु मना नहीं कर सका... तो अपनी हामी भरी है... पर तुम लोग क्यूँ अपने बच्चों के इच्छा के बीच आ रहे हो...

लक्ष्मी - बच्चे हमारे हैं... हमने जने हैं... हमें उनकी फिक्र क्यूँ नहीं हो... माँ बाप हैं हम उनके... मत भूलो... माँ बाप से ज्यादा जो बच्चों पर प्यार लुटाये... उसे क्या कहते हैं जानती हो ना तुम... (चुप हो जाती है)

वैदेही - (अपनी जबड़े भिंच लेती है और फिर गुस्से से फट पड़ती है) हाँ हाँ... चुप क्यों हो गई... उसे डायन कहते हैं... यही कहना चाहते थे ना तुम... यही वह गाँव है... और यही वह गाँव वाले हैं... जिन्होंने मुझ पर... डायन कह कर पत्थर बरसाये थे... बच्चे तुम्हारे ही हैं... पर तुमसे सम्भले भी हैं... भूल गई... तुम्हारी ही बेटी को... उठा लेने की बात करता था... शनिया... तब मैंने ही बचाया था... हाँ गाँव में त्यौहार मनाया नहीं जाता... पर वह सब मुहँ पर मूँछ उगाने वालों के लिए... ताकि उनकी मर्दानगी क्षेत्रपाल के आगे... दबी रहे... जो आज तक दबी हुई है... बच्चों के लिए ऐसा कोई हुकुम नहीं है... तो उन्हें क्यूँ रोक रहे हो...

सभी चिल्लाने लगते हैं गौरी और वैदेही के ऊपर, पर कोई हिम्मत नहीं करता अंदर आकर बच्चों को ले जाने के लिए l तभी अचानक वैदेही चिल्लाती है l

वैदेही - चुप... चुप... चुप.. (सब चुप हो जाते हैं) तुम लोगों के पीछे मेरा भाई खड़ा है... बात कर लो उससे...

सभी घूम कर पीछे देखते हैं l विश्व अपने बांह में बांह फंसा कर खड़ा हुआ था l विश्व को देखते ही सबके मुहँ बंद हो जाते हैं l विश्व उनके बीच से हो कर दुकान के अंदर आता है l अरुण उसे मामा कह कर कस कर पकड़ लेता है l

विश्व - हूँ... क्या हुआ... इतना हल्ला क्यूँ मचा रहे हो...

लक्ष्मी - वह... हमारे बच्चे... (चुप हो जाती है)

विश्व - इन्होंने अपने मामा से कुछ मांगा है... तो मामा ने इन्हें वह देने का वादा किया है... इसलिए आज अरुण और उसकी टोली कृष्ण विमान... नगर परिक्रमा करवाएंगे...

हरीआ - देखो विश्वा हमारे बच्चों को कुछ हुआ तो... (विश्व के देखते ही चुप हो जाता है)

विश्व - अलबत्ता कुछ होगा नहीं... बच्चों के साथ जब तक मेरा रिश्ता रहेगा... तब तक... उनकी हर वह ख्वाहिश जो मुझसे पूरी हो सके... मैं पूरी करूँगा...

हरीआ - हमारे बच्चों पर... तुम जोर आजमा रहे हो... ज़बरदस्ती कर रहे हो...

विश्व - ज़बरदस्ती... इनके साथ... नहीं... मैं तुम लोगों के साथ जबरदस्ती कर सकता हूँ... जिस दिन अपने बच्चों के लिए... मेरे साथ लड़ने की जिगर बना लो... उस दिन तुम लोग अपने बच्चों पर अपनी मर्जी चलाना... (सभी एक पल के लिए चुप हो जाते हैं, सब एक दुसरे को देखने लगते हैं l विश्व से लड़ने की हिम्मत कौन करे) फिर भी... मैं तुम लोगों को एक मौका देता हूँ... अगर उस मौके को तुम लोगों ने भुना दिया... तो बच्चे... आज विमान परिक्रमा नहीं करेंगे...

अरुण - मामा...

विश्व - श्श्श...

सभी - (एक साथ) हाँ हाँ हम तैयार हैं...

विश्व - ठीक है फिर... (आवाज़ देता है) टीलु...

टीलु - जी भाई...

टीलु उस चौक के बीचों-बीच एक बेंत के डंडे से बड़ी सी गोल बनाता है l और डंडा विश्व की ओर फेंक देता है l विश्व डंडा पकड़ कर उस गोल के बीच खड़ा हो जाता है l

विश्व - (सारे लोगों से) अपने हाथ में कुछ पत्थर लेलो... (लोग नासमझों की तरह एक दुसरे की ओर देखने लगते हैं) हाँ हाँ अपने हाथ में पत्थर लेलो... और मुझे मारो... मुझे अगर एक भी पत्थर लगी... तो बच्चों का कृष्ण विमान परिक्रमा बंद... अगर मुझे कोई भी पत्थर नहीं लगी... तो... तो परिक्रमा होगी...

विश्व की इस घोषणा के बाद बच्चे खुशी से उछल पड़ते हैं और ताली बजाने लगते हैं l सारे मर्द एक दुसरे को इशारा करते हुए हाथों में छोटे छोटे पत्थर लेकर गोलाई के बाहर फैल जाते हैं l हरीआ मारने को होता है कि टीलु चिल्ला कर रोक देता है l

टीलु - ऐ... ऐ रुक... मारना तब चालू करोगे जब मैं तीन तक कि गिनती गिन लूँ... सब तैयार हो.. (सब अपने हाथ में पत्थर को गोली की तरह उछाल कर विश्व पर निशाना बनाने लगते हैं)

एक...

दो...

तीन...

सारे मर्द पूरी ताकत के साथ पत्थरों को विश्व के उपर बरसाने लगते हैं पर विश्व को पत्थर लगना तो दूर, विश्व जितनी तेजी से बेंत घुमा रहा था उससे वह पत्थर टकरा छिटक कर लोगों की तरफ जा कर उनको लग रही थी l जिसके कारण कुछ ही देर बाद सारे लोग गोलाई से तितर-बितर हो जाते हैं l लोगों के पत्थर बाजी बंद होते ही विश्व का डंडा घुमाना भी बंद हो जाती है l बच्चे ताली बजाते हुए विश्व के पास उछलते कुदते झूमते गाते आते हैं और चिल्ला चिल्ला कर कहने लगते हैं

हाती घोड़ा पालकी

जय कन्हैया लाल की

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बल्लभ एकदम से लाजवाब हो जाता है l उसे अपना पैर कांपते हुए महसूस होता है l उसकी हालत भैरव सिंह से छुपती नहीं है l भैरव सिंह उससे कहता है

भैरव सिंह - हम जानते हैं प्रधान... रोणा तुम्हारा दोस्त है... इसलिए तुमसे बातों की गहराई तक पहुँचने की कोशिश कर रहे थे...

बल्लभ कुछ कहने की कोशिश करता है पर उसकी आवाज़ हलक में ही घुट कर रह जाती है l सीढियों पर भागते हुए उदय भागते हुए आता है और भैरव सिंह के पास पहुँच कर सिर झुका कर खड़ा हो जाता है l भैरव सिंह समझ जाता है कि रोणा होश में आ रहा है l वह अपना सिर हिला कर रोणा को लाने के लिए इशारा करता है l उधर धीरे धीरे रोणा अपनी आँखे खोलता है और खुद को रंग महल में देख कर हैरान हो जाता है l इतने में उदय रोणा के पास पहुँचता है l

उदय - अरे... इंस्पेक्टर साहब... आप जाग गए... इसे अपना ही रंग महल समझिए... बस थोड़ी देर के लिए... चलिए... राजा साहब ने आपको याद किया...

उदय को रंग महल में देख कर गुस्से में कांपने लगता है, और गली देने की कोशिश करता है पर ना तो उसके हाथ पैर हिलते हैं, ना ही मुहँ से कोई आवाज निकलता है l उदय उसकी भावनाओं को दरकिनार कर एक व्हीलचेयर पर बिठा देता है और एक बेल्ट को चेयर के साथ उसके कमर पर कस कर बाँध देता है और रोणा को दिवाने खास में लेकर आता है l रोणा को होश में देख कर भैरव सिंह उससे कहता है

भैरव सिंह - बड़े मौके पर जागा है रोणा... तु अपनी ख्वाब की दुनिया में बेहोश था... अपनी करनी के कारण... स्वागत है तेरा... क्षेत्रपाल के दुनिया की वास्तविकता में...

रोणा के हाथ और पैर, लकवा के कारण हिल नहीं पा रहे थे और जुबान खुल नहीं रही थी l फिर भी अपना जिस्म और सिर हिला कर भैरव सिंह को कुछ कहने की कोशिश करता है l पर उसकी कोशिश बेकार जाती है तो बल्लभ को इशारा कर समझाने के लिए कहता है l पर बल्लभ उसकी इशारों को समझ नहीं पाता और उसे लगता है रोणा से गलती हो गई है और वह बहुत पीड़ा में है यही बताना चाह रहा है l यह सोचते सोचते बल्लभ की आँखे छलक पड़ती हैं l

भैरव सिंह - हम क्षेत्रपाल हैं... हमारी ही घर की नुर पर... तुने, बदनीयती रखी... नजर खराब की... देख... नियति ने तुझे कैसी सजा दी... लकवे से जिस्म ही नहीं... जुबान भी अकड़ गई है... हम चाहते तो बेहोशी में ही तुझे... मौत के घाट उतार सकते थे... पर नहीं... तुझे तेरी करनी की याद दिलाना जरूरी था... इसलिए तेरे होश में आने का इंतजार कर रहे थे...

इतना सुनते ही रोणा की चेहरे पर हवाईयाँ उड़ने लगती हैं l वह अपनी पुरी ताकत लगा कर चीखना चाहता था l पर चीख नहीं पाता l उधर बल्लभ की आँखे बहने लगी थी l बल्लभ की ओर देखते हुए भैरव सिंह कहता है

भैरव सिंह - वकील... हमें इसे ख़तम करना है... वह भी अपने आदमियों से... पर जो ज़ख़्म इसने दी है... वह अपने आदमियों को दिखा भी नहीं सकते... इसलिए इल्ज़ाम तु बतायेगा... और सारे लोग इसकी मौत हमसे मांगेंगे...

यह सुनते ही बल्लभ हैरानी भरे नजरों से भैरव सिंह की ओर देखता है l इसका मतलब यह हुआ कि जो कांड रोणा ने किया है वह सिर्फ क्षेत्रपाल परिवार वालों को मालुम है l बाहर वालों में सिर्फ उसको पता है l अब रोणा पर इल्ज़ाम लगा कर उसे भैरव सिंह के लोगों के सामने दोषी बनाना है ताकि ना सिर्फ भैरव सिंह उसे मौत दे सके, बल्कि भैरव सिंह का खौफ उसके आदमियों में बनी भी रहे और आगे चलकर किसीसे भी किसी प्रकार की गलती ना हो पाए l

बल्लभ - र्र्र्र्र्राजा साहब... क्या इस मामले में मुझे आप दुर रख सकते हैं...

भैरव सिंह - नहीं... तुम्हें इसकी मौत की वज़ह बनानी पड़ेगी... और हम इसे सबसे भयानक मौत देंगे.... (रोणा की ओर देख कर) हम तुझे यह महल देने की सोचे थे... पर तु इतना बड़ा कमजर्फ निकला... के इसी महल में तेरी मौत देने की सोच रहे हैं...

बल्लभ - राजा साहब... सरकार की नजर में यह अभी भी लापता है... सरकारी तंत्र इसे ढूंढ रही है... इसकी यशपुर में बदहवास हो कर रास्ते पर दौड़ने की रिपोर्ट बन चुकी है... हस्पताल की रिकार्ड में... ट्रीटमेंट के लिए दाखिल होना और... किसी के द्वारा अगवा होने की भी रिपोर्ट बन चुकी है... ऊपर से यह दाशरथी... मुझे ठीक नहीं लग रहा है... ऐसे में... अगर यह सचमुच गायब हो गया... और किसी भी तरह से इस बात की भनक दाशरथी को लगी... तो मैं सौ फीसदी गैरेंटी के साथ कह सकता हूँ... वह इस बात की भी रिपोर्ट बना कर ऊपर भेज सकता है...

भैरव सिंह - (हँसते हुए) आखिर तुने अपना वकील दिमाग चला ही दिया... इस हरामजादे को बचाने के लिए... बहुत वाज़िब बातेँ पेश की... पर इसकी मौत आज अटल है वकील... अटल है... तु बस इसकी गुनाह बयां कर... और मेरे लोगों के बीच साबित कर...

इतने में भैरव सिंह कमरे में मौजूद एक घंटा बजाता है l कुछ देर बाद भीमा कमरे में प्रवेश करता है और भैरव सिंह के सामने सिर झुका कर खड़े हो जाता है l

भैरव सिंह - भीमा...

भीमा - जी हुकुम..

भैरव सिंह - हमारे सारे कारिंदों को बुलाओ....

भीमा - जी हुकुम... (भीमा कमरे से बाहर निकल जाता है)

भैरव सिंह - (बल्लभ से) मेरे सारे आदमियों को... इस हरामजादे के बारे में क्या कहोगे... तय कर लो...

बल्लभ - (लड़खड़ाती जुबान पर) र्र्र्र्राजा स्स्स्स्साहब...

इतने में भीमा बाहर खड़े सारे पहलवानों को अपने साथ लेकर अंदर आता है l सभी के सभी भैरव सिंह के सामने सिर झुकाए खड़े हो जाते हैं l भैरव सिंह बिना कोई प्रतिक्रिया दिए अपनी कुर्सी पर बैठ जाता है l अब बल्लभ बड़े असमंजस में पड़ जाता है l वह कहे तो क्या कहे l भैरव सिंह अपना गला खरासता है l

बल्लभ - (लड़खड़ाती जुबान से) हाँ तो... मैं... मेरा मतलब यह है कि... मैं दरअसल राजा सहाब से कह रहा था कि... यह इंस्पेक्टर... यह दरोगा... राजा साहब से गद्दारी कर छुपा हुआ था...

सभी हैरान हो कर बल्लभ की ओर देखने लगते हैं और फिर व्हीलचेयर पर बैठा रोणा की ओर देखने लगते हैं, रोणा तेज तेज सांसे ले रहा था l छटपटा रहा था l

शनिया - क्या... राजा साहब से गद्दारी... यह कैसे हो सकता है... इन्होंने तो राजगड़ वापस आने के लिए... राजा साहब के पाँव धो धो कर पी रहे थे...

बल्लभ - हाँ...

भूरा - क्या किया था... इस दरोगा ने...

बल्लभ - वह... तुम लोग जो विश्वा के हाथों पीटे थे ना... वह सब द द द्द्द्दरोगा ने... जान बुझ कर तुम सबको विश्वा के हाथों पिटवाया था...

सभी - क्या...

बल्लभ - हाँ... इसीलिए तो... उस दिन पंचायत भवन में... यह जानबूझकर काम का बहाना बनाकर नहीं आया... और तुम लोगों की सारी जानकारी... विश्व को दे दिया.... यह जैसे ही राजा साहब को मालुम हुआ... डर के मारे... यशपुर के xxx गोदाम में छुपा बैठा था...

तभी सबके कानों में कुछ गिरने की आवाज़ आती है l सबकी नजर उस तरफ जाती है तो पाते हैं रोणा की व्हीलचेयर पलट गई थी, रोणा नीचे गिर कर छटपटा रहा था l उसके मुहँ से गॅँ गॅँ की आवाज़ निकल रही थी l उदय उसे फिर से उठा कर बिठाता है l

बल्लभ - (अपना सिर झुका कर नीचे फर्श की ओर देखते हुए कहना चालू रखता है) अब चूँकि विश्वा से मिलकर... राजा साहब के खिलाफ काम कर रहा था... इसलिए... इस ग़द्दार को क्या सजा मिलनी चाहिए... यह तुम लोग तय करो...

सभी खुसुर-पुसुर करते हुए एक साथ चिल्ला कर कहने लगते हैं l इसे आखेट गृह की सजा दी जाए l तभी सत्तू दौड़ते हुए कमरे में दाखिल होता है और हुकुम कह कर भैरव सिंह के सामने झुक कर घुटनों में बैठ जाता है l

भैरव सिंह - कौन हो तुम...

सत्तू - जी मैं सत्तू..

भैरव सिंह - कौन सत्तू

भीमा - माफी हुकुम... यह हमारा ही पट्ठा है... इसे गाँव में नजर रखने के लिए भेजा था...

भैरव सिंह - हूँ...

सत्तू - जी... जी हुकुम...

भैरव सिंह - तो क्या खबर है...

सत्तू - (एक साँस में जल्दी जल्दी में) गाँव में बगावत होगई है हुकुम... युगों से जो कभी नहीं हुआ... आज हो गया है हुकुम... कुछ बच्चे उस विश्वा के साथ मिलकर आज... गाँव में आम के पत्तों से सजा कर... आम के फलों को टांग कर.. कृष्ण विमान परिक्रमा कराए हैं...

सत्तू ने जैसे एक बम फोड़ दिया था, उसके इस खुलासे से कमरे में ऐसी ख़ामोशी छा जाती है जैसे मसान में बसती है l सभी मुहँ फाड़े भैरव सिंह की ओर देखते हैं l भैरव सिंह का चेहरा सख्त हो चुका था l तमतमाते हुए अपनी पूछता है l

भैरव सिंह - पूरी बात बताओ...

सत्तू वैदेही के दुकान और मुख्य चौक पर जी भी हुआ वह और उसके साथ बच्चों के द्वारा विमान परिक्रमा का पूरा विवरण देता है l

भैरव सिंह - लगता है... अब इस नामुराद रोणा के साथ साथ... सभी गाँव वालों को भी सजा देनी पड़ेगी.... ( कुर्सी से उठता है) प्रधान... क्या करना चाहिए...

बल्लभ - राजा साहब... सत्तू की माने... तो गुस्ताखी विश्व और बच्चों ने को है... गाँव वालों ने तो टोका था...

भैरव सिंह - प्रधान... (इस बार गरजते हुए) सत्तर वर्षों की परंपरा टूटी है...

बल्लभ - सजा दी जाए तो किसे और कैसी राजा साहब... अगर कुछ उजागर हो गया... तो सारे सरकारी तंत्र यहाँ के लिए कूच कर आयेंगे... तब हम कितनों से लड़ पाएंगे... राजा का ताकत उसका सैन्य बल ही नहीं... प्रजा भी होती है...

भैरव सिंह - सत्तर सालों में... यह पहली ना फर्मानी है... इसे यहीं पर रोका नहीं गया... तो आदत बन जाएगी... अगर कुछ नहीं किया... तो हमें आत्मदाह कर... खुद को ख़तम कर लेना चाहिए...

उदय - आत्मदाह करे आपके दुश्मन राजा साहब...(सबका ध्यान उदय की तरफ़ जाता है) माफी चाहता हूँ... बहुत ही छोटा आदमी हूँ... बीच में यूँ बोलता ठीक नहीं है... पर राजा साहब... अगर आप इजाज़त दें... तो मैं कुछ कहूँ... (भैरव सिंह अपना सिर हिला कर हामी भरता है) मेरे पिता एक हवलदार थे... जिनके अकाल मृत्यु के पश्चात... मुझे अनुदान नौकरी के तहत ग्राम रखी कि नौकरी दी गई... मैं रोणा बाबु के पास अर्दली के रूप में भी काम किया करता रहा ताकि आगे चलकर यह मुझे कम-से-कम कांस्टेबल पद तक पदोन्नति दें..

भैरव सिंह - हम तुम्हारा इतिहास जानने के लिए बैठे नहीं हैं... बीच में जुबान क्यूँ घुसाई वह बोलो... नहीं तो तुम भी इसके (रोणा को दिखा कर) साथ मारे जाओगे...

उदय - जी हुकुम... गाँव वालों को सजा देने के लिए मेरे पास एक प्लान है...

भैरव सिंह - बको....

उदय - आज बच्चों ने विश्व के साथ मिल कर होली के पूर्व कृष्ण विमान परिक्रमा का त्योहार मनाया है... आप आज पूरे गाँव को होली जलाने के लिए प्रेरित करें...

भैरव सिंह - (भौहें-चढ़ा कर उदय के पास आकर खड़ा होता है, बहुत शांत मगर हड्डियां कंपकंपा देने वाली सर्द लहजे में) क्या कहा... हम होली मनाने के लिए कहें...

उदय - (डर के मारे) जी हुकुम.. मैं वह.. पूरा प्लान...

भैरव सिंह - ठीक है.. अपना प्लान पुरा करो...

उदय - (लड़खड़ाती लहजे में) जैसा कि वकील बाबु ने कहा... सरकारी रिपोर्ट के अनुसार... रोणा बाबु कल यशपुर के रास्ते में भागते दिखे... और हस्पताल के... रजिस्टर में भी उनका नाम मिला है... पर उसके बाद गायब हैं...

बल्लभ - हाँ तो...

उदय - तो... रोणा बाबु की गद्दारी की सजा तो उन्हें मिलनी ही चाहिए... पर इस बात का रिकार्ड सरकारी अधिकारियों के लिए... क्यूँ न बनाया जाए... के गाँव वालों ने... रोणा को हस्पताल से अगवा किया... और उन्होंने इसे होली में... होलिका की जगह बिठा कर... जिंदा जला दिया...

कमरे में मौजूद सभी लोग मुहँ फाड़े उदय की ओर देखने लगते हैं l फिर सभी भैरव सिंह की ओर देखते हैं l रोणा को महसूस होता है कि भैरव सिंह को यह आइडिया बहुत पसंद आया है l

भैरव सिंह - हम अगर... होली के लिए कहेंगे... तो रिकार्ड यह भी बन सकता है... के हमने अगुवा कर लोगों के हवाले किया था...

उदय - नहीं... ऐसा नहीं होगा... हम इसे... (रोणा की ओर दिखा कर) होलिका की तरह सजा देंगे... आपके आग्रह अनुसार लोग आज होलीका दहन करेंगे... जिसकी विडिओ रिकार्डिंग बना देंगे... इसे एक ठेले पर बिठा कर... हाथ पैर बाँध कर मुहँ में पट्टी चिपका कर... एक औरत की पुतले की तरह बना देंगे... लकड़ियों से घेर देंगे... लोगों से भी कहा जाएगा... अपने अपने हिस्से की लकड़ियां और गोबर के उपले जमा कर ढक देने के लिए... फिर लोगों को ही कहा जाएगा... आग जला देने के लिए... इससे एक क्राइम लोग करेंगे... और आपका मान भी रह जाएगा... दाशरथी दास इंक्वायरी कर रहा है... हममे से ही बारी बारी से... उसके कानों में खबर देंगे... की गाँव के लोगों ने... एक सरकारी अधिकारी को जिंदा जला दिया...

इतना सुनने के बाद भैरव सिंह के चेहरे पर एक प्रसन्नता का भाव दिखने लगता है l भैरव सिंह रोणा की ओर देखता है जैसे वह मना कर रहा है और बख्शने की दरख्वास्त कर रहा है l भैरव सिंह बल्लभ की ओर देखता है जिसके चेहरे पर दुख अनुकंपा डर के साथ साथ दर्द भी दिख रहा था l

भैरव सिंह - (अपने लोगों से) तो... कुछ जाओ गाँव में ऐलान कर दो... बच्चों की खुशी देख कर... राजा ने होली मनाने की हुकुम दिया है... आज रात सब अपने अपने हिस्से के लकड़ी और उपले लेकर होलिका की पुतले को जलायेंगे... और तब तक तुमसे से कुछ लोग इसे... होलिका की तरह सजाओ... और होलिका दहन के लिए मंच बना कर बिठाओ... जाओ...

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अपने कमरे में गुमसुम बेड के हेड रेस्ट पर अपना चेहरा टिकाए खिड़की से बाहर की नजारों को रुप देख रही थी l तभी उसके दरवाजे पर दस्तक होती है l रुप खुद को सम्भाल कर दरवाजे के तरफ देख कर कहती है

रुप - आ जाओ...

दरवाजा खुलता है, फूड ट्रॉली पर ढके हुए खाने के साथ सेबती कमरे के अंदर आती है l कमरे के कोने में जो टी पोए था उस पर खाना लगाने लगती है l

सेबती - खाना लगा दिया है राजकुमारी जी...

रुप - (सेबती की ओर बिना देखे) हाँ ठीक है... जाओ यहाँ से...

सेबती - नहीं जा सकती... हुकुम है मुझे... आप खाना खा लीजिए...

रुप - मुझे अभी भूख नहीं है... जाओ जब भूख लगेगी खा लूँगी...

सेबती - जी आपको अभी भूख नहीं होगा... यह जान कर आपके एक मित्र ने आपके लिए... भूख की एक दवा भेजा है...

रुप - देख सेबती... कल से मेरा दिमाग खराब है... उसे और मत खराब कर... अभी जा यहाँ से... (झल्ला कर) नहीं तो... मैं... पता नहीं क्या कर बैठूंगी...

सेबती - ठीक है... मैं आपको... आपकी मर्ज की दवा दिए जाती हूँ... ईस्तेमाल करना या ना करना... आप पर छोड़ जाती हूँ...

यह कह कर अपनी कमर से कपड़ों में लिपटी एक चीज़ निकालती है l रुप देखती है कपड़ा हटा कर सेबती उसमें से एक मोबाइल निकालती है और रुप की तरफ बढ़ा देती है l मोबाइल देखते ही रुप की आँखों में चमक आ जाती है l मोबाइल लेने के लिए अपना हाथ आगे करती है पर अचानक रुक जाती है l कहीं यह राजा साहब की चाल हुई तो l शायद सेबती रुप की मनोदशा समझ जाती है l वह मोबाइल बेड पर रख कर बाहर चली जाती है l सेबती के बाहर जाते ही रुप भाग कर दरवाज़ा पर कुण्डा लगा देती है l और धीरे से मोबाइल के पास आती है l मोबाइल उल्टा रखा हुआ था और मोबाइल एक पारदर्शी कवर के अंदर था l पारदर्शी कवर के अंदर एक चिट्ठी मुड़ी हुई दिखती है l कवर हटा कर चिट्टी निकालती है, हाँ चिट्ठी उसीके नाम की थी

"आज ऐसा पहली बार हुआ,

नकचढ़ी ने अपना वादा नहीं निभाया l

मैं बेवक़ूफ़ तकते तकते तरसता ही रह गया

पर महबूब की कोई पैगाम भी नहीं आया

आज का सुबह कितना बेवफ़ा निकला

मेरे महबूब के पैगाम लिए वगैर सूरज पुरब से निकला

अभी भी मैं सोया हुआ हूँ

नकचढ़ी के ख़यालों में खोया हुआ हूँ

और सितम ना करो ऐ मेरे जान ओ जहान के शहजादी

जान निकलने को है आवाज़ दो ताकि जाग जाए जिंदगी

इश्क जागे तो हुस्न की गालियों में आए

आगोश में उनके दोनों जहां भुला कर समा जाएं "

चिट्ठी पढ़ते ही शर्म और खुशी के मारे रुप के गाल लाल हो जाते हैं l मोबाइल की स्वीट ऑन करती है, टावर लगते ही विश्व की नंबर डायल कर फोन लगाती है l एक ही रिंग के बाद फोन पीक हो जाती है l

विश्व - (उबासी लेते हुए) हैलो..

रुप - दोपहर ढलने को है.. मेरा खाना लग गया है...

विश्व - अच्छा... मेरे लिए तो सुबह अभी हुआ है...

रुप - मसखरी करते शर्म नहीं आती...

विश्व - अगर मैं शर्माने लगुँ... तो प्यार में आगे कैसे बढ़ुंगा...

रुप - ओ हो.. तो आशिक महाराज बेशरम होने की तैयारी में हैं...

विश्व - क्या करें... किसी ने मुझे पढ़ाया है...

मुहब्बत की यही दस्तूर होता है...

हुस्न शर्म की पट ओढ़ लेती है...

इश्क बेशरम हो जाता है...

तभी तो प्यार मुकम्मल होता है...

रुप - ओ हो... क्या बात है... आज बड़े शायराना मुड़ में हो... क्या इरादा है आज जनाब का...

विश्व - याद है.. वादा किया था आपको... आज पूनम की रात में... तो सोच रहा हूँ.. थोड़ा और बेशरम हो लूँ...

रुप - (शर्म से अपनी आँखे बंद कर लेती है, थोड़ी देर की चुप्पी के बाद धीमी आवाज में) बेशरम होने तक तो ठीक है... पर कहीं अगर बेलगाम हो गए तो... मैं अकेली लड़की...

विश्व - आपकी इजाजत के वगैर तो मुझसे बेशरम भी ना हुआ जाएगा... बेलगाम तो दूर की बात है...

रुप - रहने दो रहने दो... बातें ना बनाओ...

विश्व - क्या मुझ पर भरोसा नहीं है...

रुप - मौत आ जाए मुझे... जिस दिन तुम पर भरोसा उठ जाए...

विश्व - तो फिर आज रात तैयार रहिएगा... लेने आ रहा हूँ...

रुप - ठीक है... आ जाना... तैयार मिलूंगी तुम्हें...

विश्व - अच्छा... इतना भरोसा है.. राजा साहब को खौफ तो कीजिए..

रुप - बात मेरे अकेले की होती तो खौफ खा लेती... पर बात मेरे हमदम... हम कदम.. हम राज.. हम साया ने कही है... तो डर किस बात का... मुझे यकीन है... तुमने कोई ना कोई जुगत लगाया ही होगा...

विश्व - ठीक है फिर... मिलते हैं आज रात को... वैसे आज का दिन बनाने के लिए शुक्रिया..

रुप - तुम्हारा भी....

विश्व फोन काट देता है, रुप खुशी के मारे फोन चूम लेती है l तभी दरवाजे पर दस्तक होती है, रुप जाती है कुंडा खोल देती है l सामने सेबती खड़ी थी, उसे रुप बड़े एटीट्यूड के साथ देखती है l सेबती अपना सिर झुका कर अंदर आती है l रुप दरवाजा फिर से बंद कर देती है l
 
हाँ विश्व चाहता तो रोणा को अपने हाथों से खत्म कर सकता था l पर उसे उसके ही मालिक के हाथों खत्म करवा रहा है l इसके पीछे भी विश्वा का एक फ्युचर प्लान है l

उदय के बारे में पहले से ही थोड़ा थोड़ा कर बताता रहा हूँ l उदय वह चरित्र है जिसे राजगड़ में रोणा ने विश्व की जासूसी करने के लिए लगाया था l जैसे लेनिन की राज खुला ठीक उसी तरह आगे चलकर उदय का भी राज खुलेगा l

हाँ यह बात तो फ़िलहाल के लिए सही लग रहा है पर आगे चलकर इसकी प्रतिक्रिया होने वाली है

भाई साहब आप भूल रहे हैं विश्व ही एक मात्र पुरुष था जिसका आवा गमन क्षेत्रपाल मर्दों के अतिरिक्त अंतर्महल में हो रहा था l बाकी आगे चलकर धीरे धीरे जानेंगे

हाँ यह कहानी का एक महत्वपूर्ण भावनात्मक अंश है l आगे चलकर इसकी आवश्यकता मालूम पड़ेगी l

जी avsji भाई

बहुत ही बढिय़ा l बस खा खा कर जी उकता गया है l बच्चों ने तो जमकर मजे किए l हम इकत्तीस की रात को टिकरपड़ा में थे l बस कल शाम को ही घर पहुँचा हूँ l और आप बताइए आपका नव वर्ष संध्या और रात्री कैसे गुजरी l सबसे अहम बात आपका नन्हा हीरो कैसा है l

आज से फिर से कर्म मय जीवन की रूटीन शुरु

अंत में धन्यबाद और नव वर्ष की हार्दिक अभिनंदन
 
शुक्रिया मेरे दोस्त आपका बहुत बहुत शुक्रिया

आपको भी नव वर्ष की हार्दिक अभिनंदन


हाँ रोणा ने जीवन भर दूसरों की मज़बूरी का फायदा उठाता रहा l पर आज वह शारीरिक तौर पर इतना मज़बूर हो गया है कि अपने लिए पैरवी तक नहीं कर पा रहा है

नहीं यह इंस्पेक्टर विश्व के दोस्तों में से कोई भी नहीं है पर विश्व से गहराई तक जुड़ा हुआ है l आनेवाले अंकों में मालुम पड़ेगा

अब तक जो भी हो रहा है वह सब विश्व के बनाए हुए चक्रव्यूह है l इसमे सभी फंसते जा रहे हैं l राजा भी फंस चुका है और यह बात बहुत देर बाद राजा को मालुम पड़ेगा l

छुट्टियां बहुत शानदार गुजरी आशा करता हूं आपकी भी वैसी गुजरी होगी

धन्यबाद और तह दिल से आभार
 
हाँ उसका अंत विश्व ने तय कर दिया था

चाहे कोई कितना भी कमीना क्यूँ ना हो दोस्त तो थे ही एक दूसरे के l

ठीक कहा आपने उदय विश्व का ही आदमी है और यह होलिका दहन विश्व के प्लान के तहत ही आयोजन हो रहा है

जैसा कि विश्व का वादा था अरुण से होली मनाएंगे

क्यूंकि अरुण के भीतर विश्व को श्रीनु दिखा था इसलिए बदला भी आवश्यक था l

यही कांड आगे चलकर गाँव वालों में राजा के खिलाफ एकजुट करेगा

बिल्कुल पर सच यह भी है कि उसने सोचने के लिए बल्लभ को रखा है यानी खुद कुछ नहीं सोचता l वह गांव वालों को सजा भी देना चाहता था और साथ साथ रोणा को भी l उदय ने उसे एक तीर से दो निशाने वाला आइडिया दिया जो उसे भा गया है l पर कांड के कुछ दिनों बाद उसे एहसास हो जाएगा क्या भूल हुआ है

अति क्रोध और अहंकार आदमी की मति और बुद्धि नष्ट और भ्रष्ट कर देती है l ऐसे में जो शांत होता है वह आसानी से सामने वाले की दिमाग को नियंत्रित कर सकता है l यहीँ पर यही तो हुआ है

बिल्कुल

हर घटनाक्रम अपने आप में भविष्य के लिए कुछ ना कुछ छुपा कर रखा है

धन्यबाद एवं आभार
 
जी जरूर

हाँ भैरव सिंह अपनी अहंकार के चलते मानसिक दिवालिया पन का शिकार हो गया है

जिसका फायदा विश्व उठा रहा है

हाँ जब भैरव सिंह को एहसास होगा तब विश्व को भी बहुत गहरी चोट देगा

हाँ यार खा खा कर कितना खाओगे

बस सेलिब्रेशन के नाम पर सिर्फ खाने के सिवा होता भी कुछ नहीं है उसके बाद उछलना और कुदना

बिल्कुल सही बंधु

वाह क्या बात है

हाँ बच्चों के लिए यह भी एक खूबसूरत अनुभव है
 
शुक्रिया लियोन भाई

हाँ दोस्त था उसका l अपनी दोस्ती के लिये जितना हो सका किया पर कामयाब ना हो सका

दास क्या यह नाम कुछ सुना सुना नहीं लग रहा

हाँ भाई विश्व ने अरुण से वादा जो किया था

अब जो भी हो रहा है अरुण के लिए हो रहा है

और विश्व का एक पुराना बदला भी पुरा हो रहा है

भैरव के अंदर की शैतान को थोड़ी देर के लिए भटका दिया

वर्ना भैरव सिंह का कहर गाँव वालों पर टुट पड़ता l एक तरह से गाँव वालों को फंसाने का आइडिया देकर उदय ने भैरव सिंह को फ़ंसा दिया

यह उसे बाद में पता चलेगा

यह जानकारी आपको आगे मिलेगी

हाँ इसी लिए तो विश्व ने सारे चक्रव्यूह रचा है

यह बात भावनात्मक रूप से महत्त्वपूर्ण है

आगे चल कर इस घटना का कहानी के साथ जुड़ाव पता चलेगा
 
👉एक सौ छियालीसवां अपडेट

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राजगड़

शाम होने को है

सूरज की रौशनी और ताप दोनों मद्धिम पड़ रहे हैं l रोज की रुटीन के अनुसार दोपहर का खाना खाने के बाद भैरव सिंह क्षेत्रपाल महल में भीतर नागेंद्र सिंह के कमरे में, उसके बेड के करीब बैठा हुआ था l कमरे में आज वह अकेला था l सुषमा या कोई नर्स नहीं थीं l नागेंद्र सिंह टेढ़े मुहँ से भैरव सिंह की ओर ताक रहा था l

भैरव सिंह - आपकी हालत मुझसे देखी नहीं जा रही है बड़े राजा... मज़बूरी है... आपको जिंदा रहना है... और मुझे जिंदा रहना है... हमें समझ में आ गया है... उस दिन आपने क्यूँ कहा था... राजकुमारी जी पर नजर रखने के लिए... हमने जिसे भेजा था... वह कमबख्त... नाकारा निकला... छोटे राजकुमार जी की बात आकर कही पर... राजकुमारी के बारे में... टोह तक ना ले पाया... (नागेंद्र सिंह की आँखे चौड़ी हो जाती हैं) हाँ... बड़े राजा... आप सही थे... राजकुमारी घर से निकली... बाहर.... (अपनी आँखे बंद कर जबड़े भिंच कर कुछ देर के लिए चुप हो जाता है) हमें संदेह है... शायद यकीन भी है... पर नाम नहीं बता सकते... क्यूँकी... हम साबित नहीं कर सकते... अगर झूठे साबित हो गए... तो अपने बच्चों के आगे इज़्ज़त गवा बैठेंगे... राजकुमारी को सजा देने का मन कर रहा है... पर राजनीतिक मज़बूरी के चलते... हम उस सच से फिलहाल किनारा किए हुए हैं... (अपनी जगह से उठता है,नागेंद्र की ओर पीठ कर खड़ा होता है) क्यूंकि... अगर यह राज खुला... तो जिन लोगों के भगवान बने फिर रहे हैं... उनके गप्पी में उपहास के किरदार बन जाएंगे... इसलिए अब राजकुमारी घर में रहकर पढ़ाई करेंगी... जैसे बचपन में किया करतीं थीं... सिर्फ इम्तिहान देने के लिए बाहर जाएंगी... (नागेंद्र के हलक से हुम्म्म्म... ह्म्म्म्म की आवाज आती है, भैरव सिंह मुड़ कर देखता है, नागेंद्र इशारों से कुछ कहने की कोशिश कर रहा है) हाँ... समझ रहे हैं... अगर हम पहले की तरह... अपनी राज पाठ सिर्फ राजगड़ और इसके आसपास सीमित रखते... तो बात इतनी मुश्किल नहीं होती... पर जब दायरा जितना फैलता गया... तो बीच में खाली पन उतना ही बनता गया... अब अपने रुतबे और गुरूर के दम पर... उस खाली पन को ढकने की... छुपाने की कोशिश किए जा रहे हैं... जाहिर है... दायरा बढ़ा... तो महल की खिड़की को भी ऊँचा करना पड़ रहा है... क्यूँकी दुनिया की आदत है... हर ऊंचे घरों की खिड़की से अंदर झाँकना... पर बड़े राजा जी... निश्चिंत रहिए... हम सब ठीक कर देंगे... जिसकी भी जुर्रत सामने खुल रहा है... उसे हम अंजाम तक पहुँचा रहे हैं... आज रोणा का होली जलेगी.. वह भी गाँव के लोगों के हाथों... क्यूँकी उसने अपनी औकात भूल कर... क्षेत्रपाल महल की खिड़की खोलने की कोशिश की... सजा तो मिलेगी... यह सजा... हमें अंदर से... आश्वासन दे रहा है... के एक दिन हम उस हरामजादे विश्व प्रताप को... इससे भी भयंकर सजा देंगे... इसीलिए तो... हम मगरमच्छ और लकड़बग्घे की भूख को... मिटने नहीं दे रहे हैं... आप निश्चित रहें... हम आपको आखेट गृह में... वह दृश्य ज़रूर दिखाएंगे...

तभी भैरव सिंह को बाहर से आहत सुनाई देती है l वह दरवाजे की ओर मुड़ता है l दरवाजे पर दस्तक सुनाई देती है l

भैरव सिंह - कौन है...

भीमा - हुकुम... मैं...

भैरव सिंह - क्या हुआ...

भीमा - वह सारे गाँव वाले आपसे पूछने... महल के परिसर में आए हैं...

भैरव सिंह - पूछने... हमसे...

भीमा - जी हुकुम...

भैरव सिंह कमरे से निकालता है और दिवाने आम कमरे में पहुँचता है, जहाँ पर बल्लभ खड़ा हुआ था l कमरे के दरवाजे पर उदय खड़ा हुआ था l

भैरव सिंह - यह गाँव वाले... बेवजह यहाँ क्यूँ आए हैं प्रधान...

बल्लभ - मैं नहीं जानता हूँ... राजा साहब... मैं तो यहाँ आपकी इंतजार में हूँ...

भैरव सिंह - भीमा क्या वज़ह है... तुम्हें कुछ पता है...

उदय - गुस्ताखी माफ़ राजा साहब...

भैरव सिंह - क्या बात है...

उदय - सत्तू या भूरा... जानते होंगे... क्यूँकी यही दोनों... होलिका दहन की मचान सजाने गए थे...

भैरव सिंह - हूँ... कहाँ है वह दोनों...

उदय - जी बाहर हैं... बुला लाऊँ...

भैरव सिंह - हाँ... बुला लाओ...

उदय तुरंत पलट कर बाहर जाता है और थोड़ी देर के बाद अपने साथ सत्तू और भूरा को साथ लेकर आता है l वे दोनों अपने हाथ जोड़ कर भैरव सिंह के सामने खड़े हो जाते हैं l

भैरव सिंह - यह बाहर कैसा शोर है...

सत्तू - र्र्राजा सा.. सहाब... (जुबान लड़खड़ा जाता है)

भैरव सिंह - क्या बात है... क्या हो गया है...

भूरा - राजा साहब... जैसा आपने कहा... हमने बिलकुल वैसा ही किया... हमने एक स्टूल पर... दरोगा को... आलथी पालथी की तरह बिठा कर... मुखौटा लगा कर... साड़ी पहना कर... होलिका की तरह सजा कर... बांस का दस फुट ऊँचा भाड़ा बना कर बिठा दिया...

सत्तू - यह देख कर लोगों ने... हमसे वज़ह पूछी... तो हमने कहा कि... बच्चों का उत्साह देख कर... राजा साहब ने... गाँव वालों को... होलिका दहन के साथ साथ.. फगु खेलने के लिए भी कहा है... इसलिए गाँव वालों के सहूलियत के लिए... हमने होलिका का पुतला बना कर गाँव के बाहर भाड़े पर सजा दिया है...

भूरा - अब होलिका दहन के लिए... गाँव वाले.. अपने अपने हिस्से के लकड़ी... गोबर के कंडे... उपले आदि लाकर जमा करें... और होलिका दहन करें...

बस इतना कह कर चुप हो जाते हैं दोनों l उनको चुप देख कर भैरव सिंह पूछता है l

- आधी बात बता कर... आधा गटक क्यों गए...

सत्तू - हमारे कहे पर... गाँव वालों को विश्वास नहीं हुआ...

भूरा - इसलिए... इसलिए... (फिर से दोनों चुप हो जाते हैं...

उदय - ओ.. इसका मतलब यह हुआ... गाँव वाले... इनकी कहीं बातों पर... यकीन करने आए हैं...

भैरव सिंह पैनी दृष्टि से उदय की ओर देखने लगता है l उदय अपना सिर झुका लेता है l फिर भैरव सिंह बल्लभ की ओर देखता है l

बल्लभ - यह स्वाभाविक है राजा साहब... सात दशकों से... सिर्फ यही गाँव नहीं... आसपास के तकरीबन तीस गाँव में... त्योहार या मातम नहीं मनाया गया है... कई पीढ़ियां गुजर गई... आज जब कोई आपके नाम पर कहे... त्योहार मनाने के लिए... तब... इस बात की पुष्टि करने... जाहिर है... महल ही आयेंगे...

भैरव सिंह - (जबड़े भिंच जाती है, शब्दों को चबाते हुए कहता है) इनकी इतनी हिम्मत... राजा भैरव सिंह से पुष्टि करने आए हैं...(गुर्राते हुए) भीमा बंदूक ला.. (भीमा पलट कर जाने को होता है कि बल्लभ उसे रोक देता है)

बल्लभ - एक मिनट भीमा... (भैरव सिंह से) गुस्ताख़ी माफ राजा साहब... गाँव वालों में कभी इतनी हिम्मत हो ही नहीं सकती के... आपसे बात की पुष्टि करें... जैसा कि मैंने कहा... सात दशकों से... जो नहीं हुआ... आज अचानक मनाएंगे... तो उन्हें... यह सत्तू या भूरा की साजिश ही लगेगी... बेहतर होगा... उनके मन में... कोई संशय पैदा होने ना दिया जाए... दरोगा रोणा को... आखेट गृह ले चलते हैं... कोई भी जान नहीं पाएगा...

उदय - गुस्ताखी माफ राजा साहब... (भैरव सिंह उदय की ओर देखता है) राजा साहब... एक बार तीर कमान से निकल जाए... तो उसे उसका लक्ष भेदने की प्रतीक्षा करनी चाहिए...

भैरव सिंह - ऐसी... तगड़ी और भारी भरकम बातेँ... वकील के मुहँ से अच्छे लगते हैं... तुम अपनी बात साफ करो...

उदय - आपका गुस्सा जायज है राजा साहब... पर आपने ही खबर भिजवाई... लोगों को होली मनाने के लिए... जैसा कि वकील ने कहा.... कि सत्तर सालों में जो नहीं हुआ... उसे करने के लिए.. लोग डरेंगे जरूर... पर आपसे गद्दारी करने वाले की सजा आपने मुकर्रर की है... सजायाफ्ता को मिलनी ही चाहिए... यह बात आपके लोगों को भी तो पता चलनी चाहिए... गाँव वाले... आपसे पुष्टि चाहते हैं... इससे यह होगा... उनके हाथों एक क्राइम होने जा रहा है... धीरे धीरे... उनके संज्ञान में आएगा... तब यह लोग फिर कभी हिम्मत नहीं जुटा पाएंगे... आगे त्योहार मनाने की...

भैरव सिंह - तुम्हें क्या बनाना चाहता था... रोणा...

उदय - जी हेल्पर कांस्टेबल...

भैरव सिंह - बैल बुद्धि था वह... तुम अगर हमारे वफादार रहे... तो हम उन्हें दरोगा बना देंगे...

उदय - (खुशी के आँसू आँखों में लिए, भैरव सिंह के आगे घुटनों पर आ जाता है) आपकी बड़ी कृपा होगी राजा साहब...

यह सब बल्लभ देख रहा था l वह गुस्से में अपना चेहरा फ़ेर लेता है l उसकी यह प्रतिक्रिया भैरव सिंह देख लेता है l

भैरव सिंह - प्रधान...

बल्लभ - जी.. जी राजा साहब...

भैरव सिंह - हम ना सिर्फ... ग़द्दार दरोगा को सजा देना चाहते थे... बल्कि... इन गांवों वालों को भी सजा देना चाहते थे... तुम अपने दोस्त के लिए बाज नहीं आए... खैर... तुम्हारी इस बेवकूफ़ी को हम नजर अंदाज करते हैं... गाँव वालों को हमसे... त्योहार मनाने की छूट चाहिए... हम देंगे...

उदय - राजा साहब... एक और बात... इजाजत हो तो कहूँ...

भैरव सिंह - ह्म्म्म्म...

उदय - राजा साहब... आपके हामी के बाद... हो सकता है... लोग आपको... होलिका दहन पर... उपस्थित रहने के लिए कहें... तो आप उन्हें मना कर दीजिए... (भैरव सिंह अपना भौहों को सिकुड़ कर देखता है) क्राइम गाँव वाले करेंगे... वे लोग आगे चलकर क्रिमिनल होंगे... पर अगर आप वहाँ उपस्थित हुए... तो आप गवाह बन जाएंगे... और उनके लिए सबूत भी... आप बस आज रात... राजगड़ से दूर हो जाइए.... आगे... वकील बाबु हैं... वह गाँव वालों के साथ रह कर... उनसे होने वाली गुनाह की सबूत बनाएंगे...

भैरव सिंह - बहुत खूब... आज फिर से तुमने मुझे इंप्रेस किया है... भीमा..

भीमा - जी हुकुम...

भैरव सिंह - चलो.. हमारी प्रजा हमसे मिलने आयी है...

इतना सुनते ही भीमा सत्तू और भूरा के साथ बाहर की ओर चलने लगता है l सभी पहलवान रास्ते के दोनों तरफ खड़े हो जाते हैं l भैरव सिंह उनके बीच में से जाते हुए महल के बरामदे में सटी हुई मचान पर पहुँचता है l जैसे ही मचान पर गाँव वाले भैरव सिंह को देखते हैं सब के सब अपना सिर झुका कर चुप हो जाते हैं l भैरव सिंह अपने कमर पर हाथ रखकर गाँव वालों पर एक नजर डालता है l सभी के झुके हुए सिर देख कर उसके होठों पर एक संतुष्टि की मुस्कान उभर कर गायब हो जाती है l बल्लभ भी पीछे पीछे आया हुआ था l वह कुछ कहने को होता है कि भैरव सिंह उसे रोक कर भीमा की ओर देख कर इशारा कर लोगों से पूछने के लिए कहता है l तो भीमा गाँव वालों से कहता है

भीमा - गाँव वालों... तुम लोग अब राजा साहब के दरबार में हो... राजा साहब अब यह जानना चाहते हैं... उनके दरबार में क्यूँ आए हो...

लोगों में चुप्पी छाई हुई थी l किसीको भी हिम्मत नहीं हो पा रही थी कि राजा भैरव सिंह से कुछ भी पूछे l क्यूंकि ऐसा पहली बार हुआ था कि सारे गाँव वाले मिलकर राजा के महल में राजा के सामने खड़े हो कर कुछ पूछे l भीमा भैरव सिंह की ओर देखता है, भैरव सिंह अपना सिर हिला कर फिर से पूछने के लिए इशारा करता है l

भीमा - हरिया... क्या हुआ... क्यों आए हो... रविन्द्र... क्या काम पड़ गया है तुम लोगों को... राजा साहब से...

हरिया - हम... व.. व... वह...

अचानक से चुप हो जाता है l सभी लोग महल के बाहर खड़े हैं पर फिर भी सन्नाटा इस कदर पसरा हुआ था मानों दूर दूर तक कोई नहीं हो l मजबूर होकर भैरव सिंह पूछता है l

भैरव सिंह - क्या हुआ है... क्या जरुरत आ गई... तुम लोग यहाँ आ गए... (जब कोई जवाब नहीं देता तब सत्तू लोगों के पास चला जाता है)

सत्तू - राजा साहब माफी... गाँव वालों के तरफ से... मैं कुछ कहूँ...

भैरव सिंह - तुम...

सत्तू - क्यूँ गाँव वालों... मैं पूछुं...

सारे गाँव वाले - हाँ हाँ...

सत्तू - राजा साहब... मैं पूछूं...

भैरव सिंह - ठीक है पूछो...

सत्तू - राजा साहब... कई पीढ़ियां चली गई... किसीने भी ना त्योहार मनाया... ना किसीको मनाते देखा... ऐसे में... आज जब इन्हें खबर लगी के होली मनाने के लिए... इस बार क्षेत्रपाल महल से इजाजत मिली है... तो इन्हें विश्वास नहीं हुआ... सच और झूठ जानने यह लोग आए हैं... (गाँव वालों से) क्यूँ गाँव वालों... सही कहा ना...

सभी गाँव वाले हाँ कहते हैं l इसके बाद सत्तू चुप हो जाता है l भैरव सिंह भीमा की ओर इशारे में चुप रहने के लिए कहता है और भीमा के बगल में खड़े बल्लभ को इशारा कर लोगों से होली के बारे में कहने के लिए कहता है l

बल्लभ - गाँव वालों... तुम लोग जानते हो... राजा तुम लोगों के लिए कितना कुछ सोच रहे हैं.. कितना कुछ कर रहे हैं... आज सुबह जब मालुम हुआ... तुम्हारे बच्चों ने... कृष्न विमान नगर परिक्रमा कराए हैं... तो राजा साहब कहा... त्योहार अधूरा ना रह जाए... इसीलिये अपने लोगों के जरिए... तुम लोगों तक खबर पहुंचाई है... ताकि तुम लोग होली... परंपरा के अनुसार मनाओ... (बल्लभ रुक जाता है)

सत्तू - बोलो... राजा भैरव सिंह की...

सारे गाँव वाले - जय...

हरिया - राजा साहब... यह हमारा परम भाग्य है... के आपके शासन में हम... यह दिन देख रहे हैं... राजा साहब... हमारी एक छोटी सी प्रार्थना है... (भैरव सिंह समझ चुका था हरिया क्या प्रार्थना करने वाला है इसलिये उसे कहने के लिए इशारा करता है) राजा साहब... ऐसा पहली बार हो रहा है... वह भी आपके आशीर्वाद से... अगर इस मौके पर... आप हमारे साथ.. हमारे पास रहते... तो बड़ी कृपा होगी...

भीमा - ऐ हरिया... अपनी औकात में रह... थामने के लिए हाथ दिया तो कंधे पर चढ़ कर कान में मूतने की बात कर रहा है...

हरिया - (डर के मारे) ना ना.. महाराज ना... ऐसी गुस्ताखी... सपने में भी नहीं कर सकते हम... वह तो... (आगे कुछ कह नहीं पाता, अपना सिर झुका लेता है l भैरव सिंह बल्लभ को आगे की बात कहने के लिए इशारा करता है)

बल्लभ - देखो... तुम लोग आज... त्योहार मनाने जा रहे हो... यह तुम लोगों के लिए बहुत बड़ी बात है... राजा साहब... तुम लोगों की इच्छा का मान रखते... पर... आज तहसीलदार के साथ राजा साहब की... ज़रूरी मीटिंग है... इसलिए... राजा साहब आज राजगड़ में नहीं रहेंगे...

- पर आप लोग मन खराब ना करें... (उदय आकर पहुँच कर कहने लगता है) राजा साहब ने... वकील बाबु को कह दिया है... आप लोगों के बीच खुद वक़ील बाबु रहेंगे... आपके साथ त्योहार मनाएंगे...

लोग यह सुन कर खुशी के मारे ताली बजाने लगते हैं l बल्लभ का चेहरा उतर जाता है l बड़े दुखी मन से भैरव सिंह की ओर देखता है l भैरव सिंह इशारे से उसे अपनी सहमती जताता है l बल्लभ अपनी दांत पिसते हुए उदय की ओर देखने लगता है l उदय भी हँसते हुए लोगों के साथ ताली बजाते हुए बल्लभ की ओर देखने लगता है l बल्लभ को उदय के चेहरे पर छाई हुई भाव समझ में नहीं आता l दुसरे तरफ गाँव के सारे लोग भैरव सिंह के नाम की जयकारा लगाते हुए उल्टे पाँव महल की परिसर से निकलने लगते हैं l लोगों को उल्टे पाँव पीछे लौटते हुए देख भैरव सिंह के चेहरे पर गुरुर से भरी मुस्कान छा जाती है l

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कटक चेट्टी मैशन

एक बड़ा सा कमरा जहां चार लोग हैं l एक ओर ओंकार बैठा हुआ है और दुसरी तरफ केके और रॉय बैठे हुए हैं l उनके बीच एक बड़ी सी टी पोए है जिस पर तीन खाली ग्लास तीन चार प्लेट में चखना रखा हुआ है l चौथा बंदा उन खाली ग्लास में शराब डाल कर पैग बना रहा है l पैग बन जाने के बाद वह पहले ओंकार को देता है फिर केके को देता है और तीसरा उठा कर बगल में बैठे रॉय को देता है और तीनों से अलग सोफ़े पर बैठ जाता है l वे तीनों चियर्स करते हैं और सीप लेने लगते हैं l

केके - चेट्टी साहब... आपको नहीं लगता... हम थोड़े लेट हो रहे हैं...

चेट्टी - नहीं केके... कोई देरी नहीं हो रही है... इलेक्शन को और भी टाइम है... उससे पहले... क्षेत्रपाल वर्तमान के भूगोल से इतिहास हो जाएगा... तुम बस धैर्य रखो...

केके - (चेट्टी से ) चेट्टी बाबु... आपका वह बंदा कहां तक पहुँचा...

चेट्टी - जहां उसे पहुँचना चाहिए था...

रॉय - केके साहब... आप उतावले बहुत हो रहे हो...

चेट्टी - कोई बात नहीं... इनकी तसल्ली के लिए कह देता हूँ... जब से वीर उस लड़की से शादी कर अलग रहने लगा है... तब से मेयर क्षेत्रपाल पुरी तरह से टुट गया है... दिन रात शराब के नशे में डूबा रहता है... उसके घाव में नमक मिर्च उस दिन रगड़ गया... जिस दिन... एडवोकेट सेनापति की किडनैपिंग फैल हुआ...

केके - हाँ... पर हमें क्या फायदा हुआ... कोई तीसरा आकर उन्हें बचा ले गया...

चेट्टी - देखो केके... बड़े ऐहतियात से.... मैंने उस बंदे को... पिनाक के पास रखवाया है... पिनाक ना तो उसके बारे में जानता है... ना हमारे बारे में... हमारा आदमी... धीरे धीरे... पिनाक की दिमाग को अपने कब्जे में कर चुका है... तुम बस मजे देखते जाओ...

केके - (एक ही साँस में ग्लास खत्म कर देता है) एक बार... शॉक के चलते... दिल का दौरा पड़ चुका है... दुसरा दौरा पड़ने से पहले... मैं क्षेत्रपाल परिवार की बर्बादी देखना चाहता हूँ...

रॉय - आप खामख्वाह छटपटा रहे हैं... अब तो छटपटाने की बारी क्षेत्रपालों की है...

केके - दुनिया चाहे कुछ भी कहे रॉय... मगर मैं मानता हूँ... मेरे बेटे का कातिल वही... वीर सिंह है... जो जिंदगी मेरे बेटे ने जी नहीं... उसे वीर सिंह को जीता देख कर... मेरे सीने में सांप लौट रहे हैं...

चेट्टी - शांत केके शांत... मेरा बंदा पिनाक के पास रह कर वही प्लानिंग कर रहा है... तुम मुझे देखो... मैं कितनी शिद्दत से... क्षेत्रपाल के बर्बादी की इंतजार में दिन गिने जा रहा हूँ... और मुझे मालुम है... क्षेत्रपाल बर्बाद होने वाले हैं...

केके - आपने आपके बेटे के हत्यारे को छोड़ दिया... मुझसे वह नहीं हो सकता...

चेट्टी - (चेहरा अचानक कठोर हो जाता है) तुमने यह कैसे सोच लिया... सरकारी रिपोर्ट चाहे कुछ भी कहे... मुझे बस इतना मालुम है... मेरे बेटे का कातिल विश्व प्रताप है...

इतना कह कर चेट्टी चुप हो जाता है l अपना पैग खाली करने के बाद चौथे बंदे से पैग बनाने के लिए इशारा करता है l चेट्टी के चेहरे पर आए बदलाव को देख कर केके और रॉय थोड़ा दब जाते हैं l पैग बन जाने के बाद चेट्टी पैग उठा कर कहता है l

चेट्टी - फ़िलहाल विश्व और मेरा दुश्मन एक ही है... विश्व अपने काम में तेजी से आगे बढ़ रहा है... तुम जानते हो... और मानते भी होगे... क्षेत्रपाल का खात्मा विश्व ही कर सकता है... उसके पीछे उनकी निजी वज़ह है... पर विश्व जो नहीं जानता... वह यह कि... उसका काम खत्म होने के बाद... मैं उसे मरवा दूँगा...

केके - किससे... रंगा से... विश्व का नाम सुनते ही... जिसका पिछवाड़े में से झाग निकलने लगती है...

चेट्टी - हा हा... हा हा हा हा... अरे यार चेट्टी... शेर को मारने के लिए... शिकारी चाहिए... कुत्तों की बस की बात होती... तो विश्व कब का अपने भगवान का प्यारा हो चुका होता... यह वह शतरंज की बिसात है... जहां के तीसरे खिलाड़ी हम हैं...

रॉय - और हमारी चालों से... दोनों खिलाड़ी मारे जाएंगे... चियर्स...

केके खुश होता है और इस बार अपना पैग उठा कर खत्म कर देता है l चखने की प्लेट से चिकन टंगड़ी उठा कर खाते हुए रॉय से पूछता है l

केके - अच्छा रॉय... अब वीर की क्या खबर है...

रॉय - केके साहब... वीर बस अपनी जिंदगी एंजॉय कर रहा है... हम फ़िलहाल गैलरी में बैठ कर देख रहे हैं...

केके - क्या प्लान बनाया था... विश्व और क्षेत्रपाल के बीच की दुश्मनी में... पेट्रोल डालने के लिए... पर..

चेट्टी - इसलिए तो कह रहा हूँ... थोड़ा धीरज धरो... अब जोडार के सिक्योरिटी... सेनापति दंपति की रखवाली चुस्ती के साथ कर रही है... और वीर की रखवाली... विक्रम की ESS के... स्पेशल कमांडोज कर रहे हैं... कुछ भी किया... तो यह हरकत हमें पर्दे के पीछे से खिंच कर बाहर ले आएगी... मौका आयेंगी... हमें बस भुनाना है...

केके - ठीक कहा आपने...

अपना ग्लास रख कर, चौथे बंदे से पैग बनाने के लिए कहता है, जैसे ही वह बंदा पैग बनाने के लिए बोतल उठाता है तो रॉय उसे रोक लेता है l

रॉय - अब बस भी कीजिए केके सर... कितना और जिगर जलायेंगे... एक बार दौरा पड़ चुका है... कम से कम... क्षेत्रपाल की बर्बादी तक तो जिगर संभालीए...

चेट्टी - हाँ केके... रॉय ठीक कह रहा है...

केके - जिसका जिगर का टुकड़ा ही नहीं हो... उसका जिगर क्या जलायेगा... यह दो कौड़ी का शराब...

केके - प्लीज...

चेट्टी - रॉय... एक काम करो... केके को... ले जाओ और उसके घर पहुँचा दो...

रॉय - ठीक है...

रॉय केके को अपने कंधे से सहारा देकर उसे बाहर ले जाता है l वह चौथा बंदा भी रॉय का साथ देता है l दोनों केके को गाड़ी में बिठा कर विदा करते हैं l केके की गाड़ी जाने के बाद रॉय भी अपना गाड़ी लेकर केके के गाड़ी के पीछे पीछे उस मैंशन से बाहर निकल जाता है l सबके चले जाने के बाद वह चौथा बंदा कमरे में आता है जहां चेट्टी टी पोए के ऊपर दोनों पैर फैला कर शराब की चुस्की ले रहा था, उस बंदे को कमरे में देख कर

चेट्टी - चले गए सब...

बंदा - हाँ...

चेट्टी - ह्म्म्म्म आओ बैठो... (शराब की ग्लास को दिखाते हुए) इसे मिलकर खत्म करते हैं...

बंदा - नहीं... मुझे नहीं करना...

चेट्टी - क्यूँ... नाराज हो... अरे नाराजगी छोड़... बहुत जल्द अपना राज वापस लौटने वाले हैं...

बंदा - कब तक... मैं तो जैसे फुटबॉल हो गया हूँ... इधर से लतीया जाता हूँ... और उधर से...

चेट्टी - ऐ... क्या कहना चाहता है तु... मैं तुझे लतीया रहा हूँ...

बंदा - वह... मुहँ से बरबस निकल गया... मेरे कहने का वह मतलब नहीं था... मेरा मतलब है... मुझे कब दुनिया के सामने आप लाओगे... कब मैं अपनी असली पहचान के साथ... सबके सामने आऊँगा...

चेट्टी - तु भी ना... केके की तरह बड़ा बेसब्रा है... मैंने अपना सब कुछ तेरे नाम कर तो दिया है... फिर... ऐस तो कर रहा है ना... ठंड रख ठंड... तु बस अपने काम में लगा रह... इस बार चोट कुछ ऐसा हो... के क्षेत्रपाल पूरा का पूरा... तितर-बितर हो जाएगा... उसके बाद मैं तुझे डंके की चोट पर... दुनिया के सामने लाऊँगा...

बंदा - मैं तो कब से लगा हुआ हूँ... अब तक... सारे वार खाली गए हैं...

चेट्टी - कहाँ खाली गए हैं... देखा नहीं... क्षेत्रपाल टुट रहे हैं... बिखर रहे हैं... हमें मालूम है... कहाँ कब चोट मारना है... उन्हें मालुम नहीं है... चोट कौन मार रहा है... (चेहरा बहुत सख्त हो जाता है) क्षेत्रपाल... मुझे वैशाखी बना कर... भुवनेश्वर आए... राजनीति में पाँव जमाए... जब मतलब निकल गया... हरामियो ने... मक्खी की तरह निकाल कर फेंक दिया... मेरा बेटा यश को बचा सकते थे... साले हरामी... उसे मरने के लिए छोड़ दिया...

कहते कहते चेट्टी चुप हो जाता है, उसके गाल फडफडाने लगते हैं l दांत पीसने लगता है l उसकी यह हालत देख कर वह बंदा उसके पास बैठता है और उसके हाथ पकड़ कर कहता है l

बंदा - मैं हूँ ना... आपका बदला लेने के लिए...

चेट्टी - (उसके कंधे पर हाथ रखकर) तु मुझे मिला... इसलिए तो क्षेत्रपाल से बदला लेने की सोचा... वर्ना मैं तो खुद को लावारिस समझ कर... मरने की सोच रहा था... (चेट्टी अपने पैर नीचे कर सोफ़े से उठ खड़ा होता है) आज मैं खुश हूँ... यश की मौत लावारिस नहीं है... ना ही वह विरासत जो मैंने कमाई है... वह लावारिस है... तु उसका वारिस है... लावारिस तो अब क्षेत्रपाल होगा... हाँ लावारिस तो क्षेत्रपाल होगा...

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अनु कमरे में चहल कदम कर रही है, दीवार पर लगी घड़ी की ओर देख रही थी l थोड़ी देर बाद कॉलिंग बेल की आवाज़ आती है l कॉलिंग बेल की आवाज़ सुनते ही अनु के चेहरे पर पर रौनक आ जाती है l भाग कर जाती है दरवाजा खोलती है l सामने वीर काले, नीले, पीले, लाल आदि रंगों में पुता हुआ खड़ा था l उसे इस हालत में देख कर पहले अनु चौंकती है फिर जोर जोर से हँसने लगती है l

अनु - (हँसते हुए) यह... क्या हाल बना रखा है आपने... होली तो कल है... आज खेल कर आ गए क्या...

वीर - हाँ हाँ हँस लो... कल होली की छुट्टी है... इसलिए सारे स्टाफ ने... मुझे आज रंगों में पुत दिया...

अनु - ठीक है... जाइए आप नहा धो लीजिए...

वीर - (अंदर आ कर) अरे सिर्फ रंग ही तो है... वह भी होली वाली... थोड़ा रहने तो दो... (सोफ़े पर बैठ जाता है)

अनु - अरे... सोफ़े पर रंग लग जाएगा...

वीर - तो क्या हुआ... नए कवर ला देंगे...

अपना सिर हाँ में हिला कर अनु मुस्करा कर वीर के पास खड़ी होती है l वीर अपना हाथ अनु की ओर बढ़ाता है l अनु अपना हाथ देती है l वीर उसे अपने ऊपर खिंच लेता है l अनु घुमती हुई वीर के गोद में बैठ जाती है l वीर अनु के कंधे पर अपना चेहरा रख कर कहता है

वीर - आह... क्या जिंदगी है अनु... सुबह मुझे टिफिन कैरेज के साथ जब विदा करती है... तेरे आँखों में... बिछड़ने का दर्द को मुझे महसूस होता है... और जब वापस आता हूँ... तेरे चेहरे पर ग़ज़ब की खुशी देखता हूँ... कितना सुकून मिलता है... क्या कहूँ... (फिर अनु के कंधे पर अपने सिर को अनु के साथ झूमते हुए हिलने लगता है) अनु...

अनु - हूँ...

वीर - कुछ बोल ना...

अनु - क्या कहूँ...

वीर - कुछ भी... मुझसे बातेँ कर... पुछा कर... दुनिया भर की... कचर कचर सुन सुन कर... खीज जाता हूँ... पर जब तेरी आवाज सुनता हूँ... आह.. ऐसा लगता है... कानों में शहद घुल रही है...

अनु - हूँ...

वीर - क्या हूँ...

अनु - मतलब हाँ... मतलब हूँ...

वीर - ना... आज मेरी अनु को कुछ हो गया है...

अनु - सच मुझे कुछ नहीं हुआ है...

वीर - झूठ...

अनु - सच्ची...

वीर - ऊँ हूँ... यह मेरी अनु का स्टाइल नहीं है...

अनु - अच्छा... फिर आपके अनु का स्टाइल क्या है...

वीर - मेरी हर बात पर मुझे झूठा कहना... यह मेरी अनु का स्टाइल है...

अनु - (हँस देती है) धत...

वीर - क्या धत... (अनु के कान के पास चूम कर) बोल ना...

अनु - क्या...

वीर - झूठे...

अनु - पहले मुझे छोड़िए...

वीर - (किसी बच्चे की तरह मासूमियत के साथ पूछता है) क्यूँ... तुम्हें अच्छा नहीं लग रहा...

अनु - सोफा गंदा हो गया... साथ साथ... मेरे कपड़े भी गंदे हो गए हैं... (हाथ छुड़ा कर उठ खड़ी होती है) चलिए... जाइए... आप नहा धो कर पहले साफ हो जाइए...

वीर - तुम कहना क्या चाहती हो... मैं गंदा हूँ... अरे मेरी जान... इसे गंदा होना नहीं.. रंगना कहते हैं... और यह आज से नहीं... तब से... जब से तुझे देखा था...

अनु - (समझ नहीं पाती) म.. मतलब...

वीर - अरे मेरी प्यारी अनु... मैं तो तेरे प्यार में कब से रंगा हुआ हूँ... आज तो बस रंग उभरा है... इसलिए दिख रहा है...

अनु - अच्छा... (अपने बदन पर लगे रंग दिखाते हुए) तो यह... अब क्यूँ उभरा है...

वीर - अब तक मैं तेरे रंग में रंगा हुआ था... आज मैंने तुझे रंग दिया है...

अनु - (मुहँ पर पाउट बना कर) झूठे...

वीर - ओ.. हो.. जान... अब बहुत अच्छा लगा... चलो... मिलकर साफ होते हैं...

अनु - क्या... छी...

वीर - इसमे छी वाली बात कहाँ से आ गई...

अनु - (सिर नीचे की ओर कर आँखे मूँद कर बाथरूम की ओर हाथ दिखा कर ) जाइए... पहले आप नहा धो लीजिए...

वीर किसी मासूम बच्चे की तरह मुहँ बना कर भारी पाँव से बाथरूम की ओर जाने लगता है l धीरे धीरे अनु अपना सिर उठा कर आँखे धीरे धीरे खोलती है वीर को भारी कदमों के साथ जाते देख अपनी हँसी दबा देती है l वीर बाथरूम के पास पहुँच कर पीछे मुड़ता है और आवाज देता है l

वीर - अनु...

अनु -.....

वीर - ए अनु... (मासूम सा मुहँ बना कर)

अनु - (अपनी हँसी दबा कर) क्या है...

वीर अपनी बाहें खोल देता है और मुस्कराते हुए अनु की ओर देखता है l अनु भी मुस्कुराते हुए भाग कर वीर के गले लग जाती है l वीर उसे बाहों में उठा लेता है के अनु के पैर फर्श से कुछ इंच उपर रह जाती हैं l

वीर - आख़िर मेरी बाहों में आ गई...

अनु - वादा जो लिया था आपने... जब भी बाहें खोलेंगे... मैं आपकी बाहों में समा जाऊँगी...

वीर - जानता हूँ... तु मुझसे बहुत प्यार जो करती है...

ऐसे ही बाहों में उठाए वीर अनु को बाथरूम में ले जाता है और शावर के नीचे खड़ा हो जाता है l अंदर पहुँचने के बाद

अनु - आपने... अपनी कर ली..

वीर - कहाँ... अब शुरु करना है...

अनु - अच्छा... और मुझे क्या करना होगा...

वीर - आज मैंने तुम्हें रंग दिया है... तो तुम गाना गा लेना...

अनु - क्या...

वीर - हाँ... तुम गाना..

रंगीला रे... तेरे रंग में... यूँ रंगा है... मेरा मन...

छलीआ रे... ना बुझे है... किसी जल से.. यह जलन...

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रुप आज खुद को संवार रही थी l माथे पर चमकता हुआ सफेद बिंदी लगा कर आईने में खुद को निहार रही थी l ड्रायर से लिपस्टिक निकाल कर अपनी होठों को रंगने लगती है l कभी मुहँ पर पाउट बना कर तो कभी मुस्करा कर बार बार खुद को देखने लगती है l फिर आईने के सामने से उठ कर खिड़की के पास आती है l रौशनी मद्धिम पड़ रही थी l वह अपनी वैनिटी पर्स से एक एक अठ्ठन्नी की कॉइन निकाल कर खिड़की पर लगे ग्रिल की स्क्रू एक एक कर खोलने लगती है l सारे स्क्रु खुल जाने तक अंधेरा छा चुकी थी l अब अपने बेड पर आकर चेहरे को बेड के हेड रेस्ट पर रख कर विश्व की राह देखने लगती है l कभी बाहर तो कभी घड़ी देख की ओर देखने लगती है l जैसे जैसे वक़्त गुज़रता जा रहा था वैसे वैसे रुप खीज ने लगी थी l चिढ़ कर अपना मोबाइल निकाल कर विश्व को कॉल लगाती है, पर विश्व की फोन पर उसे कॉल बिजी की ट्यून सुनाई देती है l ऐसे कुछ देर बाद जब विश्व के फोन पर रुप की कॉल लगती नहीं तो चिढ़ कर फोन को बेड पर पटक देती है l खिड़की की तरफ़ देखते हुए अपना सिर हेड रेस्ट पर रख कर विश्व की राह तकने लगती है l

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सारे गाँव वाले उस मैदान में जमा हो गये हैं l अपने हाथों में अपने अपने हिस्से के लकड़ी, गोबर के उपले आदि लेकर l जिस भाड़े पर होलिका का पुतला बैठी हुई थी l उसी पुतले के नीचे जलन की लकड़ियां जमा कर उस के ऊपर उपलों को भी सजाने लगे l कुछ लोग अपने कंधे और गले में ढोल,चांगु थाली लटकाये हुए थे, और किन्ही किन्ही के हाथों में शंख भी था l यह सारे दृश्य को उदय, बल्लभ के हाई रीजोल्युशन मोबाइल के जरिए शूट कर रहा था और मोबाइल नेटवर्क के जरिए ट्रांसमिशन कर रहा था l यशपुर में अपने क्षेत्रपाल पंथ निवास में बल्लभ के ही लैपटॉप पर भैरव सिंह लाईव देख रहा था उसके बगल में बल्लभ एक अलग कुर्सी पर बैठा हुआ था l थोड़ी दुर पर भीमा खड़ा हुआ था l भैरव सिंह देखता है कि हाथ में एक बड़ा से थैला भर कर सत्तू कुछ दारु की बोतलें निकालता है और लोगों के बीच पहुँच कर उन सबमें बाँटना शुरु करता है l उसे यूँ लोगों में दारु बांटता देख कर भैरव सिंह लैपटॉप का वॉयस ऑफ कर सवालिया नजरों से भीमा की ओर देखता है l

भीमा - वह... हुकुम... उदय ने बोला था...

बल्लभ - पर क्यूँ...

भीमा - उदय ने कहा... की लोग अगर नशे में रहेंगे... तो आगे बात को संभाला जा सकता है... और गलती से दरोगा से कोई हरकत हो भी गई तो... नशे में धुत लोगों का ध्यान उस तरफ़ नहीं जाएगा...

भैरव सिंह - (एक शातिर मुस्कान खिल उठता है) ह्म्म्म्म... बहुत ही खतरनाक दिमाग पाया है... यह उदय...

बल्लभ - राजा साहब... बुरा ना माने तो एक बात कहूँ...

भैरव सिंह - हूँ... कहो...

बल्लभ - मुझे लग रहा है... जैसे... उदय हमारे जरिए... मेरा मतलब है... हमारी आड़ लेकर... अपना खुन्नस उतार रहा है...

भैरव सिंह चुप रहता है और बल्लभ की ओर अपना भौह चढ़ा कर देखता है l बल्लभ के जिस्म में एक सुर सूरी सी सिहरन दौड़ जाती है l

भैरव सिंह - हमें लगता है... तुम अपनी दोस्त के होने वाले अंजाम को देखने से पहले... बहक रहे हो... (बल्लभ अपना सिर झुका लेता है) बात को पुरी करो...

बल्लभ - र राज आ.. साहब... मुझे माफ करें... जिस तरह से... वह बढ़ चढ़ कर... दरोगा के खिलाफ यह सब किए जा रहा है... मेरे मन में.. शंका पैदा कर रहा है...

भैरव सिंह - क्यूँ... तुम इस उदय से पहले से परिचित नहीं हो...

बल्लभ - कभी कभी उसे... रोणा के क्वार्टर में देखा था... रोणा के क्वार्टर में... रोणा के सारे काम किया करता था... यहाँ तक कि... विश्व पर निगरानी का जिम्मा भी... रोणा ने... उदय पर सौंप रखा था... इतना मालुम था कि... यह कंपेंशेशन ग्राउंड में... ग्रेड फॉर कटेगरी में... ग्राम रखी कि नौकरी कर रहा था... रोणा ने इसे... कांस्टेबल बनाने का वादा किया था...

भैरव सिंह - तो अब तक... पूरी वफ़ादारी के साथ... इस उदय ने... रोणा का काम किया है... अब हमसे वफादारी कर रहा है...

बल्लभ - मैं इसी बात पर हैरान हूँ... रोणा से उसकी वफ़ादारी... अब अचानक से... (एक पॉज लेकर) अब रोणा की जान पर आ गई...

भैरव सिंह कुछ सोच में पड़ जाता है,

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रुप की आँखे बंद थीं l उसे हल्का सा ठंडक महसूस हो रही थी l वह सिकुड़ कर अपनी बाहों को अपने गले और कंधों के पास कस लेती है l तभी उसे महसूस होता है कि कोई फूंकते हुए उसके चेहरे पर लटों को हटा रहा है l रुप के चेहरे पर पर एक खुशी भरी मुस्कान छा जाती है l हल्का सा आँख खोलती है l उसके आँखों के विश्व का चेहरा दिखता है, बहुत ही करीब था विश्व का चेहरा l विश्व को देखते ही

रुप - मुझे मालुम था... यह तुम ही होगे... (कह कर रुप फिर से अपनी आँखे बंद कर लेती है) आह... अनाम... कितना प्यारा सपना है... कास के इस सपने से कभी बाहर ही ना निकलुं... हकीकत में तो तुम आए नहीं... पर सपने में आए हो... प्यार जता रहे हो... कितना अच्छा लग रहा है.. उम्म्म्म्...

अचानक रुप अपनी आँखे खोलती है l विश्व का चेहरा रुप के चेहरे के पास ही था l वह अब सीधे हो कर बैठती है l अपने चारों तरफ देख कर चौंकती है और बड़ी बड़ी आँखों से हैरानी भरे नजरों से देखने लगती है l रुप एक नाव पर थी l एक चौपाई के सिरहाने सिर टिका कर सोई हुई थी l नाव बीच नदी में था l यह देख कर रुप चिल्लाने को होती है कि विश्व उसके मुहँ पर हाथ रख देता है l रुप अपने मुहँ से विश्व की हाथ हटाने के लिए छटपटाती है l जब थक जाती है

विश्व - हाथ निकालूँ...

अपना सिर हिला कर हाँ कहती है, विश्व रुप की मुहँ से हाथ हटाता है, रुप विश्व की हाथ पकड़ कर अपने दांतों से काटती है l विश्व चिल्लाते चिल्लाते रह जाता है और अपने बाएं हाथ से अपना मुहँ दबा लेता है l

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कुछ शोर शराबा सुनाई देने लगता है तो अपना ध्यान लैपटॉप पर चल रहे दृश्य पर गाड़ देता है l देखता है सत्तू सबको शराब पीने के लिए उकसा रहा है l

सत्तू - यह लो... ऐस करो... आज का यह दारु मेरे तरफ से.. जी भर के पियो...

एक गाँव वाला - अरे सत्तू पहलवान... तुझे कौनसा ख़ज़ाना मिल गया है... जो आज तु ऐसे लूटा रहा है...

सत्तू - अरे ताऊ... आज पहली बार... होली जलाई जाएगी... कल होली खेली जाएगी... क्या यह कम बड़ी बात है... इसलिए पिलो... आज फोकट में दे रहा हूँ... कल से तुमको अपना जेब ढीला करना पड़ेगा...

सब खुशी के मारे हल्ला मचाते हुए दारु के बोतल उठा कर घुट गटकने लगते हैं l इसी तरह सत्तू सभी गाँव वालों में बोतल बांटने लगता है और लोग अपने हिस्से आई बोतल को खाली करने लगते हैं l

भैरव सिंह - यह सत्तू... कह रहा था... बच्चों ने आज... विमान परिक्रमा कारवाई... पर यहाँ पर बच्चे बिल्कुल दिख नहीं रहे हैं... (इस पर बल्लभ चुप रहता है, तो इसबार भैरव सिंह भीमा की ओर देखता है)

भीमा - हुकुम... औरतें भी तो नहीं दिख रहे हैं... हो सकता है... डर के मारे नहीं आए हों... मतलब.. उन्हें अभी भी यकीन नहीं हो रहा हो...

भैरव सिंह - ह्म्म्म्म... (लैपटॉप का वॉयस ऑन कर) उदय...

उदय - जी हुकुम...

भैरव सिंह - गाँव से सिर्फ मर्द ही आए हैं क्या... औरतें और बच्चे...

उदय - (ट्रांसमीशन करते हुए) हुकुम... औरतें और बच्चे... कुछ दूरी पर खड़े हैं...

कह कर मोबाइल घुमाता है, भैरव सिंह देखता है कि एक जगह पर गाँव की औरतें और बच्चे सभी खड़े हो कर तमाशा देख रहे हैं l बच्चे पास जाने के लिए उतावले हो रहे हैं l पर उनकी माँएँ उन्हें जाने से टोक रहे हैं l उन लोगों के भीड़ में भैरव सिंह को वैदेही खड़ी नजर आती है l जिसका चेहरा भाव शून्य सा लग रहा था l

भैरव सिंह - ठीक उदय... मोबाइल दहन की जगह दिखाओ...

उदय वैसा ही करता है l कुछ देर बाद कुछ अचानक ढोल, चांगु बजने लगते हैं l महरी तुरी भेरी बजने लगते हैं l कुछ लोगों के हाथों में जलते हुए मशाल दिखते हैं l एक गाँव वाला मशाल फेंकने को होता है कि उसे सत्तू रोक देता है l

सत्तू - नहीं नहीं... ऐसे नहीं...

गाँव वाला - फिर कैसे...

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रुप विश्व की हाथ छोड़ देती है l विश्व हाथ को फूंकने लगता है l रुप की और देखता है l रुप अपनी आँखे सिकुड़ कर विश्व को देख रही थी l

रुप - मैं समझ रही थी... के मैं सपना देख रही हूँ... पर... मैं सच में... नाव पर हुँ... कब आई... कैसे आई...

विश्व - क्यूँ... आप खुद को यहाँ देख कर थ्रिल नहीं हुईं..

रुप - थ्रिल... पहले मैं डर गई... बात समझने के लिए... कुछ वक़्त लगा मुझे... तुम... मुझे यहाँ तक कैसे लाए... और... मैं सो कैसे गई थी...

विश्व - (चुप रहता है)

रुप - देखो मुझे सब सच सच बताओ... वर्ना...

विश्व - वर्ना...

रुप - वर्ना... आज पूरा गाँव... विश्व प्रताप को चीख मारते हुए सब देखेंगे... इतनी जोर से ऐसे काटुंगी के...

कहते कहते रुक जाती है और जोर जोर से साँस लेने लगती है, विश्व उसे इस हालत में देख कर पहले हैरान हो जाता है l फिर हँस डेट है l उसे यूँ हँसते देख कर रुप और भी ज्यादा चिढ़ जाती है l

रुप - (मुहँ बना कर, मुहँ फ़ेर कर बैठ जाती है) जाओ मैं तुमसे बात नहीं करती...

विश्व - (रुप के पास आकर बैठ जाता है) मैं छुप कर देख रहा था,.. कैसे एक परियों की रानी... मेरे लिए सज रही थी... सँवर रही थी... फिर देखा उसकी आँखे लग गई थी... तो मैंने... एक रुमाल में थोड़ा सा क्लोरोफॉर्म डाल कर... उसकी नींद को थोड़ा गहरा कर दिया... बस... फिर उसे अपने पुराने तरीके से... खिड़की से नीचे उतारा... और उसी नींद के हालात में... यहाँ... नाव पर चौपाई के सहारे बिठा दिया...

रुप - (अपना मुहँ बना कर, फिर से मुहँ फ़ेर लेती है) हूँ ह...

विश्व - क्या आप... थ्रिल नहीं हुईं...

रुप - थ्रिल... थ्रिल तो तुम्हें महसुस हुआ होगा... अगर मैं होश में होती... तो वह थ्रिल मैं भी महसुस करती ना...

विश्व - मैं आपको... यह सारा एहसास... सपने की तरह महसुस कराना चाहता था... (एक पॉज लेकर) बुरा लगा...

रुप - (विश्व की ओर बिना देखे अपना सिर ना में हिलाती है)

विश्व - सॉरी... वेरी सॉरी... आप जो भी सजा देंगे.. (अपने घुटनों पर बैठ कर) मुझे कुबूल होगी...

रुप - (मुड़ती है) खड़े हो जाओ... (विश्व खड़ा हो जाता है, रुप उसके सीने पर मुक्के मारने लगती है, पर विश्व वैसे ही खड़ा रहता है) मैं तुम पर मुक्के बरसा रही हूँ... और तुम हो कि...

विश्व - आह... ओह... उह... (करने लगता है)

रुप को और भी ज्यादा गुस्सा आता है l विश्व को धक्का देती है विश्व थोड़ा पीछे हटता है l फिर रुप उस पर कुदी मारती है l विश्व अब पीठ के बल गिरता है और रुप उसके ऊपर गिरती है l विश्व के पेट पर बैठ कर विश्व की कलर पकड़ लेती है l

रुप - होगे तुम बड़े तुर्रम खान... पर मैं भी तुम्हें हरा सकती हूँ... समझे...

विश्व - जी.. आपसे जितने कि... सोच भी नहीं सकता कभी...

रुप शर्मा जाती है, पर विश्व की कलर नहीं छोड़ती l विश्व रुप की दोनों हाथों को पकड़ लेता है और अपना चेहरा थोड़ा किनारा कर आसमान की ओर देखता है फिर रुप की ओर देखता है l ऐसा दो तीन बार करता है l

रुप - ऐसे क्या देख रहे हो...

विश्व - आज पूनम की रात है... मैं आपके चेहरे को और चांद को देख रहा था... और इतरा रहा था

रुप - क्यूँ...

विश्व - उस चांद का कहाँ मुकाबला होगा... (रुप के चेहरे को अपने दोनों हाथों में लेकर) मेरे इस चांद के आगे...

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सत्तू - जैसे बचपन में... घो घो राणी खेलते थे ना...

गाँव वाले - हाँ...

सत्तू - वैसे ही... इस होलिका भाड़े के चारो ओर... घूमो... फ़िर आग लगा ओ...

सत्तू की बात मान कर, हाथों में मशाल लिए सारे मर्द दहन मंच के घेर कर घूमने लगते हैं l शराब धीरे धीरे उन पर असर कर रहा था l लोग मशालों को घुमा घुमा कर एक तरह से उद्दंड नृत्य कर रहे थे l तभी एक गाँव वाले की नजर होलिका की पुतले पर पड़ती है l उसे लगाकि वह पुतला हिल रही थी l वह रुक जाता है और डर के मारे कांपने लगता है l उसे रुकता देख कर उसके साथी भी रुक जाते हैं और उससे पूछने लगते हैं

- अबे क्या हुआ... रुक क्यूँ गया

वह - होलिका हिल रही है...

गाँव वाले - क्या...

सभी रुक कर पुतले को देखने लगते हैं l उधर यशपुर पर सीधा प्रसारण देख रहे भैरव सिंह की भौहें सिकुड़ जाती हैं l तभी सत्तू उन गाँव वालों के पास पहुँचता है l

सत्तू - ओये... क्या हो गया... रुक क्यूँ गए तुम लोग...

वह - होलिका... हिल रही थी...

सत्तू - सालों... कमीनों... होलिका नहीं हिल रही है... दारू बाज कहीं के... तुम सारे हिल रहे हो...

गाँव वाले - हाँ... हाँ... हमें भी यही लग रहा है...

वह - नहीं नहीं... होलिका हिल रही है...

सत्तू - अबे मरदूत... जब नशा संभाल नहीं पाता... तो इतना पिता क्यूँ है... (सारे गाँव वालों से) एक काम करो...

गाँव वाले - क्या...

सत्तू - तुम सब को... दरोगा रोणा याद है... (सब गाँव वाले हैरानी के मारे एक दुसरे को देखने लगते हैं) अबे बोलो... याद है...

एक गाँव वाला - ह... हाँ.. हाँ.. याद है..

सत्तू - जानते हो... वह अभी लापता है... हमारे राजा सहाब के सर्कार उसे ढूँढ रही है...

गाँव वाले - क्यूँ...

सत्तू - उसने लोगों के साथ बहुत बुरा किया है... उसे सजा देने के लिए...

गाँव वाले - (उल्लासित होकर) अच्छा...

सत्तू - हाँ... इसलिए... अब इस पुतले को... कुछ देर के लिए ही सही... दरोगा रोणा समझो... और अपने दिल की भड़ास निकालते हुए... इन लकडिय़ों में आग लगा दो...

गाँव वाले पहले एक दुसरे को देखते हैं l उनके बीच से हरिया आगे आता है और पुतले को देखते हुए चिल्ला कर गला फाड़ कर कहने लगता है

हरिया - अबे हरामी कुत्ते रोणा... बहुत दिनों से खुन्नस था... आज हाथ लगा है तु मेरे... साले कमीने हरामी... यह ले...

कह कर मशाल को पुतले की ओर फेंकता है l मशाल पुतले से लग कर भाड़े से लगे लकडिय़ों पर गिरती है l उसके देखा देखी और एक गाँव वाला सामने आता है और वह भी रोणा को गालियाँ बकते हुए मशाल दे मारता है l इस तरह से लोग एक के बाद एक रोणा को गाली अभिशाप देते हुए अपनी अपनी मशालें फेंक मारते हैं l लकड़ियों में धीरे धीरे आग जलने लगती है l जैसे जैसे आग भड़कने लगती है l लोग जो बाहर ढोल, चांगु, मादल बजाने लगते हैं l ऐसा प्रतीत होता है जैसे ढोल आदि के ताल से ताल बिठा कर लपटें आकाश की ओर उठने लगती हैं l यह सब देख कर जहां भैरव सिंह के दिल में एक सुकून महसूस होती है वहीँ बल्लभ की अंतरात्मा छटपटाने लगती है l

धीरे धीरे आग की लपटें जोर पकड़ने लगती है l उसके साथ साथ लोगों में हल्ला व उल्लास के साथ शोर भी बढ़ने लगती है l ढोल मादल चांगु की ताल से ताल बिठा कर शंख फूंकने लगते हैं l बल्लभ एक नजर भैरव सिंह पर डालता है l भैरव सिंह के आँख उसे जलती हुई दिखाई दे रही थी l लैपटॉप से आ रही हल्ला उल्लास की आवाजें उसके भीतर उसे दहला रही थी l बल्लभ छटपटा रहा था पर अपने अंदर की भावनाओं को बाहर उजागर नहीं कर पा रहा था l

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रुप शर्मा कर विश्व के ऊपर से हट जाती है और नाव के एक छोर पर आ कर नाव पर नजर घुमाने लगती है l वह देखती है दो बड़े नावों को बांध कर उस पर दो लकड़ी के खाट बंधे हुए हैं l सबसे अहम बात ना सिर्फ नाव में वे दोनों ही थे बल्कि बीच नदी में नाव एक दम स्थिर थी l रुप को महसुस होती है विश्व उसके पीछे खड़ा है l

रुप - एक बात पूछूं...

विश्व - पूछिये...

रुप - तुम मुझे यहाँ पर क्यूँ लाए... तुम्हें डर नहीं लगा... हम पकड़े भी जा सकते थे...

विश्व - नहीं... आज हम पकड़े नहीं जाएंगे... क्योंकि... आज महल पुरी तरह से... मर्दों से रहित है... और राजा साहब और उनके खास... कोई भी... महल या उसके आस-पास भी नहीं है... वैसे भी... आपको सरप्राइज पसंद है ना...

रुप - (हैरान हो कर पीछे मुड़ती है) सरप्राइज... तुमने सरप्राइज़ नहीं मुझे शॉक दे दिया था... एक पल के लिए... मुझे तो जोर का झटका लगा था...

विश्व - (मुस्करा देता है)

रुप - वैसे... क्यूँ... (पॉज लेकर) इसका मतलब... तुमने ऐसा क्या किया है.... की वे सारे लोग... (चुप हो जाती है)

विश्व - मैंने कहा था... आप मुझसे जो भी ख्वाहिश करेंगी... उस पल को मैं खास बना दूँगा...

रुप - है... भगवान... मतलब... तुम... इस खेल में कर्ता हो... कारक हो... बाकी सब... क्रिया हैं...

विश्व - (चुप रहता है)

रुप - वाव... तुम कितने परफेक्ट हो...

विश्व - नहीं... कोई कभी भी... परफेक्ट नहीं हो सकता... बस चालें सही बैठ रही हैं... इसलिए... रिजल्ट मन माफिक मिल रहा है... अगर कभी चल गलत बैठ गया... तो लेने के देने पड़ जाएंगे...

दोनों के बीच चुप्पी छा जाती है l रुप फिर से विश्व की ओर पीठ कर खड़ी हो जाती है और चांद की ओर देखने लगती है l विश्व को अब समझ में नहीं आता आगे करे तो क्या करे और कैसे आगे बढ़े l ठंडी हवाएं चलने लगती है l रुप की चूनर उड़ कर विश्व के चेहरे पर लहराने लगती है l विश्व रुप की चूनर को पकड़ लेता है l रुप की धड़कने तेजी से ऊपर नीचे होने लगती है l वह अपनी चुनरी को पकड़ लेती है l विश्व अपने चेहरे पर लहराते हुए चुनरी को झटका देकर खिंचता है l रुप उस झटके के साथ विश्व के सीने पर आ गिरती है l विश्व की हाथ रुप की कमर पर कस जाती है l रुप अपना चेहरा विश्व के सीने में छुपा लेती है l

विश्व - (थर्राती आवाज में) राजकुमारी जी...

रुप - ह्म्म्म्म...

विश्व - आसमान में चाँद मुझसे जल रहा है...

रुप - (सिर नहीं उठाती) ह्म्म्म्म..

विश्व - देखिए ना... कितना खूबसूरत नज़ारा है... चांद की चांदनी में नहाया हुआ इन फ़िज़ाओं में... कल कल आवाज करती बहती नदी पर... दो नाव... उस पर दो प्रेमी... अपनी पहली चुंबन के लिए...

रुप की मुट्ठी विश्व के शर्ट पर कस जाती हैं l चेहरा और भी जोर से सीने में गड़ जाती है l विश्व की हाथ कमर से उठ कर पीठ पर लहराते हुए उठती है l रुप की बदन उसी लहर के नागिन की तरह बलखाने लगती है l विश्व की हाथ रुप के सिर पर आकर रुक जाती है फिर दोनों हाथों से रुप की चेहरे को अपने सामने लाता है l रुप की आँखे बंद थीं l

विश्व - (हलक से बड़ी मुश्किल से आवाज़ निकाल कर) रा.. ज.. राज.. कु.. मारी...

रुप - हूँ...

रुप की चेहरे को अपने चेहरे के पास लाता है और अपना चेहरा धीरे धीरे रुप की चेहरे पर झुकाता है l दोनों की साँसे टकरा रही थी l दोनों की धड़कने बड़ी तेजी से उपर नीचे हो रहीं थीं l वे दोनों एक दूसरे की धड़कनों को साफ सुन पा रहे थे कि नदी की कल कल की आवाज दब गई थी l विश्व और झुकता है रुप की हॉट पर अपना होंठ रख देता है l जैसे ही रुप के होठों पर विश्व की होंठ का स्पर्श अनुभव होती है उसका सारा जिस्म कांप जाती है l उसका बदन हल्का हो जाती है और पैरों के उँगलियों पर खड़ी हो जाती है l उसका हाथ अब फिसल कर विश्व के कमर पर आ जाती है l विश्व अपना हॉट खोल कर रुप की निचली होंठ को चूसने लगता है l रुप की भी प्रतिरोध ढीली पड़ जाती है और उसके होंठ खुल जाती है l धीरे धीरे चुंबन प्रगाढ़ से प्रगाढ़ तक होने लगती है l रुप के हाथ अब विश्व के बालों से खेल रहीं थीं l वहीँ विश्व के हाथ भी अनुरुप रुप के केशुओं में उलझ गए थे l

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होलिका दहन अपने चरम पर पहुँच गया था l लपटों में इतनी तेज थी के अब लोग उसके आसपास भी मंडरा नहीं पा रहे थे l दुर से खड़े हो कर गाँव वाले यह दृश्य देख रहे थे l धीरे धीरे उन लोगों के पास उनके परिवार जमा होने लगते हैं l उनके लिए यह एक अद्भुत दृश्य था l क्यूंकि दशकों से ना तो उनके पुरखों ने कभी त्योहार मनाया था ना ही उन्होंने l पर आज उनके बच्चों के वज़ह से और राजा भैरव सिंह के अनुग्रह से ना सिर्फ होलिका दहन मनाया गया बल्कि इसी राख से कल रंग भी खेला जाएगा l यह दृश्य यशपुर में बैठा भैरव सिंह भी देख रहा था l मन ही मन वह उदय से प्रभावित भी हो गया था l क्यूंकि उसके घर की इज़्ज़त पर किसी ने आँख उठाया है यह बात कोई जान लेता तो ज़रूर कानाफूसी होती l जिस पर उसके साख पर बट्टा लग जाता l वह गाँव वालों को भी सजा देना चाहता था l इस तरह से गाँव वालों का जुर्म भले ही अनजाने में किया गया था पर सबुत बन गया था उसके पास l हो सकता है भविष्य में यह उसके काम आए l जितना संतुष्ट भैरव सिंह था, उतना ही दुखी बल्लभ था l जो भी था जैसा भी था रोणा उसका दोस्त था l हर मामले में वह भैरव सिंह का वफादार था l बल्लभ यह समझ चुका था रोणा से गलती हुई थी पर अपराध नहीं हुआ था l पर भैरव सिंह के डायरि में क्षमा शब्द ही नहीं था l उसकी भी नजर लैपटॉप में घट रहे मंज़र देखे जा रहा था l तभी अचानक वह देखता है कि वह भाड़ा जिस पर रोणा को होलिका बना कर बिठा दिया गया था l वह भाड़ा टुट जाता है और आग की लपटें एका एक और ऊपर उठ जाते हैं l जिसे देख कर लोग उद्दंडता से चिल्लाने लगते हैं l इससे आगे बल्लभ और देख नहीं पाता l क्यूंकि उसे कुछ दिखाई ही नहीं दे रहा था l उसे समझते देर नहीं लगी कि उसकी आँखे बह रही थी l आखेट गृह में नजाने कितने मौत देखे हैं पर आज वह अपना परम मित्र को जिंदा जलते देख रहा था l अपनी आँखे पोंछता है, उसका मन कर रहा था कि वह गला फाड़ कर रोये, पर वह लाचार था l अपनी लाचारी को छुपा कर आपनी आँखे बंद कर लेता है l पर बल्लभ का यह दुख और लाचारी भैरव सिंह के आँखों से छुप नहीं पाती l भैरव सिंह उसकी दुर्दशा को नजर अंदाज कर लैपटॉप में चल रहे दृश्य को गौर से देखे जा रहा था l

भैरव सिंह - अच्छा हुआ... तुम यह सब देखने के लिए... वहाँ नहीं थे... वर्ना... तुम अपनी कमजोरी को जाहिर कर देते... यह उदय ने अच्छा आइडिया दिया था... हमें यशपुर चले आने के लिए... अब तुम्हें इस रेकॉर्डिंग को... एडिट वगैरह कर... एक कंस्पैरी क्रिमिनल ऐक्ट प्रूफ़ बनाना है... क्यूँकी... रोणा ऑफिसियली गायब है... जिसे डेपुटेशन पर आए नया ऑफिसर दास ढूँढ रहा है... पहले कहानी बताओगे... लोग कैसे... रोणा को हस्पताल से गायब किए... उसके बाद... यह विडिओ... सबुत बना कर... दास तक पहुँचाने की जिम्मेदारी तुम्हारी... समझे...

बल्लभ - (जैसे नींद से जागता है) जी... जी.. राजा साहब...

आग की लपटें धीरे धीरे शांत हो रही थी l चूंकि विडिओ कॉल पर था, भैरव सिंह अपना माइक ऑन कर उदय से कैमरा घुमा कर गाँव वालों की तरफ मोड़ ने के लिए कहता है l उदय कैमरा घुमाता है l कैमरा सभी गाँव वालो पर घूमने लगता है l अचानक भैरव सिंह लैपटॉप को उठा कर घूरने लगता है l लैपटॉप को चिपका कर ऐसे देखने लगता है कि मानो वह किसीको कैमरे के जरिए ढूँढ रहा था l धीरे धीरे उसके जबड़े भिंच जाते हैं और चेहरा सख्त हो जाता है l उधर ट्रांसमिशन करते हुए उदय देखता है कि उसका कॉल कट चुका था l

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रुप और विश्व का चुंबन टूटता है l दोनों ऐसे हांफने लगते हैं जैसे मानों कोई मैराथन दौड़ कर आए थे l दोनों अपने अपने सिर एक दुसरे पर टिका कर गहरे गहरे साँस लेने लगते हैं l जब साँसे दुरुस्त होने लगती है तब विश्व अचानक रुप को छोड़ कर थोड़ी दुर जाकर रुप की ओर देखने लगता है l रुप उसे सवालिया नजर से देखती है l

विश्व - (साँसों को संभालते हुए) आपसे वादा किया था... बेशरम हो सकता था... पर बेकाबू... बे लगाम नहीं हो सकता... (रूप कि और पीठ घुमा लेता है)

रुप - (पीछे से आकर पकड़ लेती है और विश्व के सीने पर हाथ फेरने लगती है)

विश्व - राज कुमारी जी...

रुप - (मस्ती के मुड़ में आ चुकी थी) जी कहिये मेरे भोले अनाम जी...

विश्व - वह आपको... मतलब कैसा... (चुप हो जाता है)

रुप - क्या हुआ... चुप क्यों हो गए...

विश्व - वह... मुझसे... कोई गलती तो नहीं हो गई...

रुप - (विश्व को अपने तरफ झटके के साथ मोड़ कर) ओये.. मौसमी बेशरम... चूमा लेने और देने के बाद... शर्म नहीं आई... अब शर्म नहीं आ रही... ऐसे शर्माते हुए...

विश्व - जी आ रही है... मतलब नहीं... आह.. (खीज जाता है)

रुप उसकी हालत देख कर खिलखिला कर हँसने लगती है l फिर विश्व के पैरों पर अपने पैर रख कर पैरों की उंगली पर खुदको उठा कर विश्व के बराबर आ जाती है l विश्व के हाथों को अपने कमर पर रख कर विश्व के चेहरे को अपने हाथों में लेती है और वह विश्व के होठों पर टुट पड़ती है l विश्व उसके चुंबन से खुद को छुड़ाने की कोशिश करता है पर फिर वह भी रुप के चुंबन की प्रतिक्रिया में रुप की गहरी चुंबन लेने लगता है l फिर कुछ समय बाद इस बार रुप विश्व को अलग कर देती है l चुंबन टूटते ही विश्व रुप की ओर हैरानी भरे निगाह से देखने लगता है l

रुप - तो मिस्टर बेशरम... बेकाबू क्यूँ होने लगे... ह्म्म्म्म.. बेकाबू होने लगे...

विश्व - कहाँ... कैसे...

रुप - (विश्व की पेंट पर बने उभार की ओर इशारा करती है) यह... यह रहा... तुम्हारा बे - लगाम...

विश्व - मैं कहाँ बे लगाम हुआ था... वह तो आपने मुझे...

रुप - हाँ हाँ... अब तो दोष मुझे ही दोगे... क्यों... छी.. कितने अश्लील हो तुम...

विश्व - कमाल है... आप जिस तरह मुझ पर टुट पड़ी... मुझे लगा आप कहोगे... वाव.. अनाम तुम कितने नैचुरल हो...

रुप - यु...

कह कर रुप विश्व की ओर कुद कर उछल जाती है l विश्व उसे पकड़ लेता है l रुप अपने दोनों पैरों को विश्व के कमर के इर्द-गिर्द कस कर बाँध लेती है और विश्व के चेहरे को अपने हाथों में लेकर विश्व के होंठ पर टुट पड़ती है l विश्व भी इस बार रुप का बड़े जोशीले अंदाज में साथ देता है कि तभी विश्व की मोबाइल बज उठता है l

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भीमा गाड़ी को भगा रहा था l रात गहरी भले ही हो गई थी पर आसमान में चाँद आज चमक नहीं दहक रहा था l भैरव सिंह पंथ निवास में बल्लभ को छोड़ कर भीमा को साथ लेकर महल की तरफ ले जाने के लिए कह कर निकला था l भीमा को कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था l अचानक भैरव सिंह को क्या हो गया l वैसे भी भैरव सिंह, क्षेत्रपाल - महल में कम, रंग महल में ज्यादातर रात बिताता था l कभी भी रात को इस तरह क्षेत्रपाल महल गया नहीं था l जब उससे रहा नहीं गया तो भैरव सिंह से पूछता है

भीमा - हुकुम... आप राजमहल ही जा रहे हैं ना..

भैरव सिंह - हाँ...

भीमा और सवाल नहीं करता l चुप चाप गाड़ी चलाता है l भैरव सिंह इस बार भीमा से पूछता है l

भैरव सिंह - भीमा...

भीमा - जी.. जी... हुकुम...

भैरव सिंह - एक बात याद रखना... हम हार या जीत को बाद में तरजीह देते हैं... सब से पहले... हम अपनी अहं को तरजीह देते हैं... क्यूंकि... अगर अहं रह गया... तो जीत भी आएगी...

भीमा - जी... हुकुम...

भैरव सिंह - रोणा बेशक वफादार था... पर अनजाने ही सही... हमारे अहं की रास्ता काटने की गलती कर बैठा... इसलिए... उसका अंजाम देखा तुने...

भीमा - जी... जी हुकुम..

भैरव सिंह - अब मुझे तु बता... उस हराम के पिल्लै... विश्वा को... कौन मार सकता है...

भीमा - (इस बार चुप रहता है)

भैरव सिंह - जिसे हमने एक बार अपने पैरों के धुल के बराबर रखा हो... उसे हम अपने हाथों से सजा नहीं दे सकते... इसलिए... रोणा को जिम्मेदारी सौंपी थी... पर उससे ना हो पाया... अब तु बता... तुझसे या तेरे पट्ठों से होगा या नहीं... अगर नहीं होगा... तो हमें... बाहर से आदमी लाकर रखने होंगे... और तुम लोगों के बारे में सोचना होगा...

भीमा गाड़ी में ब्रेक लगाता है l क्षेत्रपाल महल के सीढियों के सामने गाड़ी रुक जाती है l भीमा गाड़ी से उतर कर भागते हुए आता है और गाड़ी का दरवाजा खोलता है l भैरव सिंह चारों तरफ नजरें घुमा कर देखता है l महल के आसपास उसे इक्का-दुक्का पहरेदार नजर आते हैं l वह समझ जाता है कि होलिका दहन में लोगों के बीच रह कर होलिका को जलाने के लिए गाँव के लोगों को उकसाने के लिए सब चले गए हैं l दो पहरेदार भागते हुए उसके पास आकर सलामी ठोक कर खड़े हो जाते हैं l

भैरव सिंह - कोई खबर...

पहरेदार - सब ठीक है राजा साहब...

भैरव सिंह कोई और सवाल नहीं करता l सीधे सीढ़ियां चढ़ने लगता है l भीमा उसके पीछे पीछे जाने लगता है तो भैरव सिंह हाथ से इशारा कर उसे वही ठहरने के लिए कह कर आगे बढ़ जाता है l अंदर सारे दासियां दीवारों से सट कर सोये हुए थे l पर जैसे ही गाड़ी रुकी थी l सभी जाग कर दीवारों के ओट में सिर झुका कर खड़े हो गए थे l उन सभी को नजर अंदाज कर भैरव सिंह अंतर्महल में आता है और सीधे रुप के कमरे के दरवाजे के सामने खड़ा होता है l अपने कमर पर हाथ रखकर चारों ओर नजर घुमाने लगता है l देखता है कुछ दासी दीवार से लग कर सिर झुकाए खड़ी हुई हैं l

भैरव सिंह - एकांत...

सभी दासियां वहाँ से निकल जाती हैं l भैरव सिंह दरवाजे पर दस्तक देता है l अंदर से कोई आवाज नहीं आती है l और एक बार दस्तक देता है l जब कोई शोर सुनाई नहीं देती है इस बार थोड़ी ताकत लगा कर दस्तक देता है l दरवाजे के नीचे वाली फांक से उजाला आता है l थोड़ी देर बाद दरवाज़ा खुलता है l भैरव सिंह देखता है सादी लिबास में रुप अपनी भारी आँखे मलते हुए भैरव सिंह की ओर देख रही है l अचानक चौंकती है जैसे सामने अभी भैरव सिंह को पहचान लिया l

रुप - राजा साहब... आप... इतनी रात गए...

भैरव सिंह उसे अनसुना कर कमरे में जो दो खिड़कियाँ थी उनकी रेलिंग खिंच कर देखता है फिर रुप को बिना देखे कमरे से जाने लगता है l पर जाते जाते दरवाजे पर रुक जाता है, फिर रुप की ओर मुड़ता है l

भैरव सिंह - राज कुमारी... हम जानते हैं... आप इस समय हैरान हैं... पर हम आप बस इतना जान जाइए... हमें शक नहीं यकीन है... पर हमारी यकीन को हम फ़िलहाल के लिए साबित नहीं कर सकते... पर इतना तय मान लीजिए... आप इस घर से जाएंगी... दसपल्ला राज घराने में ही जायेंगी... बाकी अगर और कोई ख्वाहिश है भी... तो भूल जाइए...

कह कर भैरव सिंह मूड कर जाने लगता है l पर उसके कदम ठिठक जाते हैं l क्यूंकि रुप ने पीछे से आवाज दी थी

रुप - राजा साहब... (भैरव सिंह मुड़ता है) हम आपकी यकीन की इज़्ज़त करते हैं... और वादा करते हैं... हम जब भी इस घर से जाएंगे... आपकी आँखों के सामने से जाएंगे... सिर उठा कर जाएंगे...

भैरव सिंह का पारा चढ़ जाता है l वह तेजी से रुप के पास आता है और जोर से अपना हाथ घुमाता है पर अपना हाथ ठीक रुप के गाल के पास रोक देता है l देखता है रुप के आँखों में जरा सा भी डर नहीं था l भैरव सिंह गुस्से में थर्राते हुए मुट्ठी कसने लगता है l रुप को भैरव सिंह की मुट्ठी कसते हुए कड़ कड़ की आवाज़ सुनाई देने लगती है l

भैरव सिंह - एक राजनीतिक मजबूरी है... वर्ना...

इतना कह कर भैरव सिंह कमरे से निकल जाता है l उसके जाते ही रुप एक गहरी साँस छोड़ती है और भागते हुए दरवाज़ा बंद कर देती है l दरवाजा बंद करने के बाद वह घुमती है पीछे विश्व खड़ा था l उसके पास भाग कर विश्व के गले लग जाती है l
 
धन्यबाद SANJU ( V. R. ) भाई प्रेम परिणय में पहला अनुभव हमेशा खास होता है l विश्वा से रुप ने प्रेम का पहला चुंबन माँगा था l विश्व ने उसे कहा था कि वह उस क्षण को यादगार बना देगा और विश्व ने वही किया l

हाँ पर आगे इन दो प्यार के परिंदों को समय और अहं की नजर लगने वाली है

हाँ अपनी कर्म के अनुसार इंस्पेक्टर रोणा को उसका अंजाम मिल गया l अब उसकी मौत जाहिर है गुल खिलाएगा

SANJU ( V. R. ) भाई यह मादा नहीं नर है और यह वही है जो पिनाक के पास रह कर उसके लिए काम कर रहा है

धन्यबाद फिर से शुक्रिया तह दिल से
 
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