Thriller "विश्वरूप" ( completed ) - Page 3 - SexBaba
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Thriller "विश्वरूप" ( completed )

👉एक सौ उनतीसवां अपडेट

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दो दिन बाद

सुबह सुबह सुरज अभी निकला भी नहीं था, हर दिन की तरह विश्व की मोबाइल बजने लगती है l विश्व एक मुस्कान के साथ आँखे मूँदे हुए ही कॉल को उठाता है l

विश्व - गुड मॉर्निंग जी...

रुप - गुड मॉर्निंग... तो इसका मतलब यह हुआ कि... तुम्हें मालुम है कि... इतनी सुबह तड़के मैं ही तुम्हें जगाती हूँ...

विश्व - कोई शक...

रुप - पर तुम्हारी बातों से ऐसा नहीं लगता...

विश्व - क्यूँ... क्यूँ नहीं लगता...

रुप - मुझे लगता है... तुम पहले से ही जगे हुए हो.... मुझसे बात करके... मुझे गुड मॉर्निंग कह कर सिर्फ़ फॉर्मालिटी निभा रहे हो...

विश्व - ह्म्म्म्म... ऐसा क्यूँ लग रहा है आपको...

रुप - बस लग रहा है...

विश्व - आपको क्या पता... आपने क्या रोग लगा दिया है... हर सुबह आपकी ही आवाज़ की खनक सुनने की आश में यह कमबख्त नींद टुट जाती है...

पर यकीन मानिये...

अभी भी हम आँखे मूँदे हुए हैं...

क्यूँकी ख़यालों में आप ही की तस्सबुर लिए खोए हुए हैं...

रुप - ओ हो.. क्या बात है... आज कल जो भी मुहँ से निकल रहा है... सब शेरों शायरी बन कर निकल रहे हैं...

विश्व - क्या करें... रोग ही ऐसा लगा है..

रुप - ओ हो.. बड़ा भयंकर रोग है... तो इसका इलाज क्या है...

विश्व - लाइलाज मर्ज है... क्या पता इसका क्या दवा है... बस आपकी फोन की दुआ कर रहे हैं... और आप हर सुबह फोन कर हमको जगा रहे हैं...

रुप - ह्म्म्म्म हूँ... बस बस... इतना भी मत उड़ो... धरती पर आओ... वैसे आज तुम्हारा प्लान क्या है...

विश्व - गाँव है... कनाल या नदी की ओर जाना तो है नहीं... क्यूंकि सर्कार की कृपा से इस घर में शौचालय बनवा दिया है...

रुप - छी.. छी... छी... देखो मुझे सुबह सुबह ऐसे छेड़ोगे तो कॉल काट दूंगी...

विश्व - (हँस देता है) ठीक है... ठीक है... मेरा छोड़िए... आपका प्लान क्या है...

रुप - (एक उम्मीद भरी गहरी साँस छोड़ते हुए) ह्म्म्म्म... कास तुम यहाँ होते... आज हम छटी गैंग पार्टी लेते तुमसे...

विश्व - पार्टी... किस बात की पार्टी...

रुप - क्या तुम भी... जान बुझ कर अनजान बन रहे हो... कल तुम्हारा रिजल्ट आया ना... तुम्हारा लाइसेंस नंबर भी आ गया... और कल ही माँ ने अल मोस्ट सभी अखबार में... तुम्हारा पैड प्रमोशन भी करदिया है... तो जाहिर सी बात है... पुरे स्टेट को मालुम हो गया होगा या फिर... हो जाएगा.... यकीन ना आए... तो आज की अखबार देख लो...

विश्व - ओ हो... क्या बात है... आज कल माँ के साथ... बड़ी गहरी खिचड़ी बन रही है....

रुप - क्यूँ... तुम्हें जलन हो रही है... हूँह्ह्ह्... जाओ जाओ और अखबार देखो... माँ ने कैसे तुम्हारा प्रमोशन किया है...

विश्व - हमारे यहाँ अखबार आने में अभी टाइम है... टीलु अभी थोड़ी देर बाद उठेगा... यशपुर जाएगा... फिर वहाँ से अखबार लाएगा...

रुप - अच्छा तो अखबार टीलु लाएगा... और तुम क्या करोगे...

विश्व - तब तक... आपके ख़यालों में खोए रहने का प्लान है....

रुप - क्यूँ दीदी से आशीर्वाद लेने नहीं जाओगे...

विश्व - जाऊँगा तो जरुर... अखिर मेरा सब कुछ दीदी ही तो है... उनकी आशीर्वाद के वगैर... मैं क्या... मेरी हस्ती क्या... मेरी वज़ूद ही क्या...

रुप - ह्म्म्म्म... अच्छा मैं फोन रखती हूँ...

विश्व - क्यूँ बुरा लगा...

रुप - नहीं तो... ऐसी कोई बात नहीं है...

विश्व - देखिए... आप मेरी जिंदगी हैं... पर मेरी वज़ूद मेरी दीदी है... और जो तरासा हुआ विश्व प्रताप को आप देख पा रहे हो.. उसकी वज़ह मेरी माँ है... मेरी जिंदगी में आप तीनों अहम हो... कोई एक छूट गया... तो मैं टुट जाऊँगा...

रुप - स्सॉसरी...

विश्व - किस लिए...

रुप - कुछ पल के लिए ही सही... मुझे.... दीदी से... थोड़ी जलन हो गई...

विश्व - और अब...

रुप - कास के मैं अपनी जिंदगी का कुछ हिस्सा उनके संगत में बिताई होती...

विश्व - तब तो मेरी जिंदगी में मेरी यह नकचढ़ी राजकुमारी कभी ना होती...

रुप - (बिदक कर) क्या... क्या कहा...

विश्व - हाँ सच में... तब मेरी जिंदगी में... एक सुशील, शांत, शर्मीली... सीधी सधी राजकुमारी होती...

रुप - (मुस्करा देती है) कहीं ऐसा तो नहीं... तुम्हें यह नकचढ़ी पसंद नहीं...

विश्व - अरे क्या बात कर रही हैं आप... पसंद बहुत है... आप ही से तो मेरी जिंदगी में रंगत है... वर्ना जिंदगी बेरंग हो जाती...

रुप - अच्छा जी...

विश्व - जी...

रुप - अच्छा कब आ रहे हो...

विश्व - क्यूँ...

रुप - देखो... तुम मुझे फिर से छेड़ने लगे...

विश्व - अजी हम अपना हक अदा कर रहे हैं...

रुप - देखो मुझे गुस्सा मत दिलाओ... वर्ना...

विश्व - वर्ना...

रुप - वर्ना लगता है... बचपन की बातेँ भूल गए हो... कोई ना... सामने मिलो तो सही... तुम्हें काट खाऊँगी...

विश्व - वाव.. सच में... आप मुझे काट खाओगे...

रुप - ऐ फट्टू... तुम फिर उड़ने लगे... फोन पर ज्यादा होशियारी मत दिखाओ... कुछ बातेँ हैं... जो तुम से ना हो पाया... ना हो पायेगा...

विश्व - ठीक है... हम से नहीं हो पाया... पर क्या आपसे हो पायेगा...

रुप - तुम... तुम मुझे चैलेंज कर रहे हो...

विश्व - उँम्म्म्... हूँ... हाँ ऐसा ही कुछ...

रुप - आ... हा हा आ... जीत भी तुम्हारी और पट भी तुम्हारी... चलो जाओ... ऐसा कुछ नहीं होगा...

विश्व - क्यूँ... क्यूँ नहीं होगा...

रुप - हूँम्म्म्म... करना तो तुम्हें होगा...

विश्व - क्यूँ मैंने तो सुना है... आज कल की लड़कियाँ... बहुत फास्ट होती हैं... और जो मेरी नकचढ़ी है... वह तो फास्टेस्ट है...

रुप - अच्छा... तो इसका मतलब यह हुआ... के तुम लड़कों के दुम निकले हुए हैं... जो हर वक़्त दबा कर दुबके रहते हैं...

विश्व - देखिए अभी आप मुझे चैलेंज कर रही हैं...

रुप - हाँ... कर रही हूँ... बोलो क्या कर लोगे...

विश्व - मैं...

रुप - हाँ तुम..

विश्व - मैं.. वह...

रुप - हाँ हाँ तुम...

विश्व - वह.. टीलु आ गया... मैं बाद में बताता हूँ...

रुप - हूँह्ह्ह् फट्टु...

रुप देखती है विश्व फोन काट दिया था,वह अपनी बेड से उठ कर बालकनी की पर्दा हटाती है, पेड़ों की ओट में धीरे धीरे निकल रही सुरज की रौशनी से उजाला फैल रहा था, और उधर विश्व फोन काट कर झठ से बिस्तर छोडकर बाहर आता है l सुबह खिल चुकी थी, विश्व रुप की बातों को याद कर अपने आप पर हँसने लगता है l तभी उसके फोन पर एक मैसेज आता है l विश्व फोन निकाल कर मैसेज को पढ़ने लगता है l

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अपने घर में सरपंच तैयार हो रहा था l तभी दरवाज़े पर दस्तक होने लगती है l दरवाजा खोलते ही उसे सामने शनिया, भूरा, शुकुरा, सत्तू और उनके गुर्गे दिखते हैं, जिन्हें देख कर वह चौंकती है और घर के अंदर भाग जाती है l सरपंच उसे घबराया हुआ देख सरपंच बाहर आकर इन्हें देखकर थोड़ी देर के लिए हैरान हो जाता है l

सरपंच - (हकलाते हुए) त त त तुम.. तुम लोग इस वक़्त.. यहाँ...

सत्तू - क्यूँ तेरा घर पाकिस्तान में है... नहीं आना चाहिए था क्या...

सरपंच - नहीं ऐसी बात नहीं... पर इस वक़्त तुम लोगों को यहाँ देख कर... गाँव वाले क्या समझेंगे...

शनिया - उनको जो समझना था... वह उसी दिन समझ गए... जिस दिन हमने घूम घूम कर लोगों के घरों में चिटफंड कर्ज की कागजात बांटें थे...

सरपंच - फिर भी... यहाँ.. तुम लोग क्यूँ आए...

भूरा - अपने साथ ले जाने के लिए...

सरपंच - हाँ हाँ चलो फिर...

शुकुरा - अभी टाइम है... तु जानता है ना... वहाँ पर क्या होने वाला है...

सरपंच - हाँ भाई हाँ... पर तुम लोग मेरे यहाँ आने से अच्छा था... दरोगा बाबु के साथ आते...

शनिया - गए थे... बाहर ताला लगा हुआ था... सोचा तुझे मालुम होगा...

सरपंच - नहीं नहीं कसम से मुझे नहीं पता है...

सत्तू - देख बे सरपंच... दरोगा को गवाह बनाने का प्लान तेरा था... इसलिए... वह कैसे पंचायत भवन पहुँचेगा वह तेरी जिम्मेदारी...

सरपंच - आरे वाह... प्लान तुम लोगों का... दरोगा को शीशे में उतारने के लिए... राजा साहब से... मुझसे कहलवाया... वह आयेंगे या नहीं... उसका जिम्मा मेरा क्यूँ... नहीं नहीं... दरोगा वहाँ पर कैसे आयेंगे... यह तुम लोग देखो...

तभी उदय वहाँ हाथ में एक पेपर लेकर आता है l उसे अपने बीच देख कर सरपंच बोल पड़ता है l

सरपंच - लो शैतान को याद किया... इसका दुम आ पहुँचा... ऐ ग्राम सेवक के बच्चे... कहाँ है तेरा बाप...

उदय - मेरा या तुम लोगों का...

सत्तू - चल किसीका भी हो... दरोगा है कहाँ...

उदय - कल रात को वह यशपुर गए हैं... और मुझे तुम लोगों को खबर करने के लिए कह गए थे... आज तहसील ऑफिस में... किसी वारंट की तारीख निकली है... जिसके लिए उनका वहाँ होना जरूरी है... देर हो सकती है... इसलिए तुम लोगों को... थोड़ा लेट में पंचायत शुरु करने के लिए कह गए हैं....

सरपंच - (शनिया से) तो क्या हम... किसी और दिन के लिए सुनवाई को खिसकायें...

शनिया - नहीं... यह और भी अच्छी बात है... वैसे भी पुलिस के सामने मार पीट ठीक नहीं है...

सरपंच - हाँ जैसे पहले उखाड़े थे... बिल्कुल वैसे ही उखाड़ोगे...

भूरा - (सरपंच की गर्दन पकड़ लेता है) क्यूँ बे कहना क्या चाहता है...

सरपंच - छोड़ो मेरा गर्दन... (कह कर अपनी गर्दन छुड़ाता है) मैंने दरोगा को तुम लोगों की हिफाजत के लिए वहाँ पर चाहता था... वर्ना... राजगड़ में ऐसा कोई घर नहीं... ऐसा कोई गली नहीं... जहां पर तुम लोगों की रात में विश्व की हाथों कुटाई की चर्चा ना हो रहा हो...

शनिया - उन घरों में... तेरा भी घर होगा... तेरे घर की गली भी होगी... क्यूँ सही कहा ना... (सरपंच सकपका जाता है, शनिया उसकी गिरेबान पकड़ कर अपनी तरफ खिंच कर) अबे हराम के... हमारी कुटाई की चर्चा करने वालों की भी हम से कितना फटती है... देखा नहीं या समझा नहीं... अभी थोड़ी देर पहले तेरी बीवी कैसे अंदर भाग गई...

सरपंच - म म मेरा मतलब यह नहीं था...

शनिया - सुन बे भोषड़ी के... तुम जैसे के लिए ही... हमने यह पंचायत बुलाया है... ताकि चर्चा कभी बंद ना हो पाए... सिर्फ चर्चा का विषय बदल जाए...

सरपंच - (गिड़गिड़ाते हुए) फिर भी... पुलिस अगर हो... तो तुम्हारे लिए... मेरा मतलब है... हम सबके लिए अच्छा है...

उदय - सरपंच ठीक कह रहा है... यह देखो... (न्यूज पेपर दिखाते हुए) अब वह कोई मामुली बंदा नहीं है... हाइकोर्ट का वकील बन गया है... यह देखो... एडवोकेट विश्व प्रताप महापात्र... और एक बात... मैं यहाँ आने से पहले... रास्ते में एक डाकिया मिला था... जो वैदेही का पता पुछ रहा था...

सरपंच - क्या... (हैरान हो कर) लाओ पहले यह अखबार दिखाओ...

उदय से अखबार लेकर शनिया, शुकुरा, भूरा के साथ साथ सरपंच सब मुहँ फाड़े पेपर पर छपे विश्व की तस्वीर देख रहे थे l

सरपंच - यह... यह अब कोई मामुली बंदा नहीं है... इसके पर हाथ फेरने से पहले हर तरफ से तैयारी मुकम्मल होनी चाहिए... एक चुक बहुत भारी पड़ सकता है...

शनिया सरपंच की गिरेबान छोड़ देता है l और उदय से पेपर लेकर अच्छे से देखने लगता है l

सरपंच - मेरी मानों... दरोगा से बात करो... वहाँ पर पुलिस वालों की मौजूदगी बहुत जरूरी है... उनकी रिपोर्ट... बाद में हमारे ही काम आएगी...

शनिया अपनी मोबाइल निकाल कर रोणा का नंबर पर कॉल लगाता है l कॉल के उठते ही

शनिया - हैलो दरोगा बाबु...

@ - हाँ बोलो क्या बात है...

शनिया - आज आपने वादा किया था... पंचायत भवन में मौजूद रहने के लिए...

@ - अर्रे हाँ... अरे भाई.. मैं वारंट पर तहसील आया हूँ... एक काम करता हूँ... मैं अपने तीन थोड़े छोटे ओहदेदार ऑफसरांन को भेज रहा हूँ... एक आध घंटे में पहुँच जायेंगे... वह लोग सब सम्भाल लेंगे... चिंता मत करो... पंचायत सभा रूकनी नहीं चाहिए...

शनिया - जी... क्या नाम हैं उनका... मेरा मतलब है... उन ऑफिसरों का...

@ - पहला ऑफिसर है... सब इंस्पेक्टर शैतान सिंह... दुसरा ऑफिसर है.. असिस्टेंट सब इंस्पेक्टर मक्खन सिंह... और हवलदार जैलांन सिंह...

शनिया - जी ठीक है... हम उनका कहाँ पर इंतजार करें...

@ - पंचायत भवन में...

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वैदेही अपनी दुकान में चूल्हे में आग लगाने के बाद थोड़ी पुजा करती है l गौरी दुकान में पड़े एक कुर्सी पर बैठ जाती है l जब वैदेही पुजा ख़तम कर मुड़ती है तब गौरी उससे सवाल करने लगती है l

गौरी - आज तेरा मन बहुत खुश क्यूँ है... और क्या सोच कर चूल्हे में आग लगाई है... दिन से हफ्ते हफ्ते से महीना हो गया है... कोई नहीं आ रहा है... तेरे इस दुकान पर खाना खाने... यह जानते हुए भी... आज तुने चूल्हे में आग लगाई है...

वैदेही - मेरा विशु अब वकील बन चुका है... उसे अब सरकारी स्वीकृति भी मिल गई है... इस खुशी में दावत तो बनती है ना काकी....

गौरी - हाँ हाँ बनती है... पर हम कुछ लोगों के बीच... तेरी यह खुशी बांटने कोई नहीं आएगा... जैसे तेरे दुख बांटने कोई नहीं आया था...

वैदेही - आयेंगे काकी आयेंगे... आज नहीं तो कल सही... पर आयेंगे...

गौरी - क्यूँ तु बावरी होई जा रही है... तु इतने सालों से... इनके लिए क्या नहीं किया बोल... अपनी कमाई के पैसों से दूसरों के कर्ज उतारी... उनके घरों की इज़्ज़त बचाई... ज्यादातर बच्चों को... अपने दम पर पढ़ा रही है... फिर भी... कोई नहीं है यहाँ पर... तेरा एहसान मानने वाले...

वैदेही - (हँसते हुए गौरी के पास बैठ जाती है) काकी... कोई मेरा एहसान माने इसलिये मैंने किसीकी मदत नहीं की... मैं सबको अपना मनाती हूँ... इसलिए मैं सबकी मदत कर रही हूँ... तुम देखना... आज जो पढ़ रहे हैं... कल सब एक एक विशु की तरह नाम कमाएंगे...

गौरी - हूँह्ह... पता नहीं तु सपना देखना कब छोड़ेगी...

वैदेही - काकी... तुम ना बहुत जल्दी हार मान जाति हो... (समझाते हुए) अभी जिंदगी बहुत बाकी है... देखना... तुम अपनी जीते जी देखोगी... इस गाँव को बदलते हुए... इस गाँव के लोगों को बदलते हुए...

वैदेही की बहस के आगे गौरी हार मानते हुए अपनी जगह से उठती है और अंदर की ओर जाने लगती है l

वैदेही - कहाँ जा रही हो काकी... गल्ले पर नहीं बैठना क्या...

गौरी - (बिदक कर) नहीं बैठना है मुझे... वैसे भी... तेरा विशु और उसका पुंछ चमगादड़ आयेगा नाश्ते के लिए.... और कोई नहीं आने वाला है आज... कोई दावत नहीं होगी आज.. सब के सब आज पंचायत भवन में होंगे...

वैदेही - (चिहुँक कर उठती है) क्या... अरे हाँ... ठीक कहा तुमने... आज तो पंचायत है...

तभी दीदी दीदी चिल्लाते हुए टीलु आता है l दुकान के अंदर पहुँचकर हांफने लगता है l

गौरी - क्या रे नासपीटे... किसकी जान खा कर आ रहा है..

टीलु - (मुहँ बना कर) खा कर नहीं बुढ़िया रानी... खाने आया हूँ...

गौरी - क्या कहा.. कमबख्त... मुझे बुढ़िया कह रहा है...

टीलु - क्या काकी... (मलाई मारने के अंदाज में) मैंने तो तुमको गुड़िया रानी कहा है...

गौरी - कीड़े पड़े तेरे जुबान पर.. झूठ बोलते शर्म नहीं आई...

टीलु - ऐ... (धमकाते हुए) काकी... कभी सुना है... किसी बुढ़िया को रानी कहते हुए... (नाटक करते हुए) मैं तो तुम्हें अपना समझ कर... इज़्ज़त देते हुए... रानी कह रहा हूँ... तुम हो कि नासपीटे... कमबख्त.. और ना जाने क्या क्या कह रही हो... (वैदेही से रहा नहीं जाता, टीलु का कान पकड़ कर खिंचने लगती है) आ आह... आह... दीदी दर्द कर रहा है...

वैदेही - कब से देख रही हूँ.. यह क्या मस्ती लगा रखा है... माफी मांग..

टीलु - ऐ बुढ़िया...

गौरी - खिंच और जोर से कान...

वैदेही - क्या (कान खिंचने लगती है)

टीलु - आह... नहीं नहीं... काकी ओ काकी... माफ़ कर दो... प्लीज...

गौरी - अब आया ना रास्ते पर...

टीलु - कहाँ रास्ते पर... दुकान पर आया हूँ.. दीदी छोड़ो ना... आह कहीं मर मरा ना जाऊँ...

गौरी - तो मर आज.. वैदेही... मत छोड़ना आज उसे...

पर वैदेही मुस्कराते हुए छोड़ देती है l टीलु अपना कान पर हाथ फेरने लगता है l

वैदेही - ज्यादा नाटक मत कर...

गौरी - क्यूँ छोड़ दिया उसे.. मरने तक तो पकड़ कर रखती...

टीलु - देखो काकी... अगर मैं मर गया होता... तो तुम ही पछताती...

गौरी - अच्छा... वह क्यूँ भला..

टीलु - बताता हूँ... (एक न्यूज पेपर निकाल कर वैदेही को दिखाते हुए) यह देखो दीदी... भाई का क्या मस्त फोटो आया है... वह भी पहले पन्ने पर...

वैदेही पेपर पर वकील के कपड़ों में विश्व की तस्वीर देख कर बहुत खुश हो जाती है l पेपर के दाहिने तरफ एक चौथाई पन्ने पर विश्व के फोटो के साथ " शिक्षा का अधिकार का श्रेष्ठ उदाहरण एडवोकेट विश्व प्रताप महापात्र"

यह पढ़ कर वैदेही की आँखों से कुछ बूंद आँसू टपक पड़ते हैं l गौरी वैदेही से पेपर लेकर विश्व की तस्वीर देखती है l

टीलु - दीदी... दुख भरे दिन बीते रे दीदी... शुभ दिन आयो रे... फिर यह आँसू क्यूँ...

दीदी - यह खुशी की आँसू है.. एक तपस्या का फल है... एक कदम न्याय की ओर है... कास आज विशु... पंचायत भवन में आए...

टीलु - दीदी... विश्व भाई ने जो दुनिया देखा है... जो सीखा है.. उसीके हिसाब से जी रहे हैं... मदत उसकी करो... जो मांगे... जिसे बिन मांगे दो... वह मदत बेकीमत हो जाता है... बिन मांगे उसकी मदत किया जा सकता है... जिसमें अपनी लड़ाई लड़ने की ज़ज्बा हो... हिम्मत हो... आज विश्वा भाई उनकी लड़ाई लड़ भी लें तो क्या होगा... आज यह राजा जाएगा... कल इन्हीं पर राज करने कोई दुसरा राजा आ जाएगा... तब... तब क्या होगा... (वैदेही चुप रह कर एक टक टीलु को देखे जा रही थी, टीलु घबरा जाता है) ऐ... ऐसे क्या देख रही हो दीदी...

वैदेही - देख रही हूँ... विशु के साथ रह कर... उसके जैसे बातेँ करने लगा है...

टीलु - (शर्मा जाता है)

गौरी - ज्यादा मत शर्मा... वर्ना गलती से लोग लड़की समझ बैठेंगे...

टीलु - (बिदक कर मुहँ बना कर गौरी को देखने लगता है)

वैदेही - खैर अब यह बता... विशु और तु नाश्ता करने तो आओगे ना...

टीलु - जरुर दीदी जरुर... अच्छा चलता हूँ...

कह कर टीलु गौरी को खा जाने वालीं नजर से घूरते हुए बाहर की ओर जाने लगता है l गौरी भी दांत पिसते हुए उसे देख रही थी, जैसे ही टीलु बाहर की ओर होने लगा गौरी चिल्ला कर

गौरी - ऐ नासपीटे रुक...

टीलु - (टीलु अपनी आँखे सिकुड़ कर और मुहँ बना कर गौरी को देख कर) क्या है...

गौरी - यह बता... तु मर गया तो मेरा किस बात का पछतावा होगा...

टीलु - काकी अगर मैं मर गया... तो तुझे ढोने वालों में से एक कंधा कम हो जाएगा... समझी...

इतना कह कर टीलु बिना पीछे देखे भाग जाता है l गौरी दुकान पर टीलु को गाली बकती रह जाती है l उसकी हालत देख कर वैदेही हँसने लगती है l पर धीरे धीरे वैदेही की हँसी रुक जाती है, एक संतोष भरी नजर से विश्व की फोटो को देखते हुए फोटो पर बड़े प्यार से हाथ फेरने लगती है l

गौरी - तुझे क्या लगता है... विशु जाएगा...

वैदेही - पता नहीं काकी... पर मुझे तो जाना ही होगा...

गौरी - पर मुझे तो विशु की बात ही सही लगती है... उन लोगों की दुनिया में... तुम लोगों की जरूरत भी है... मुझे तो नहीं लगता... उन लोगों को तुम्हारी कोई जरूरत...

वैदेही - ऐसा नहीं है काकी... आज उन्हें महसूस नहीं हो रहा है... और विशु को समझ नहीं आ रहा है... पर हम सब जुड़े हुए हैं...

गौरी - इसका मतलब तु जाएगी... (एक गहरी साँस छोड़ते हुए) ह्म्म्म्म... तुम दो बहन भाई के रिस्तों को समझना बहुत मुश्किल है...

गौरी - जानती हो काकी... कल जब विशु के बारे में मासी से बात कर रही थी... मासी ने कहा था... की मासी की और मेरी विशु से खुन का रिश्ता नहीं है... पर अगर भगवान कभी पलड़े मैं एक तरफ मुझे और दुसरी तरफ मासी को रख कर चुनने को कहे... तो विशु मुझे ही चुनेगा...

गौरी - यानी तुझे यकीन है... पंचायत भवन जाएगा...

वैदेही - हाँ... मेरे लिए वह जाएगा....

तभी एक डाकिया आता है और दुकान के सामने अपनी साइकिल रोकता है l दुकान के बाहर खड़े होकर

डाकिया - क्या यह वैदेही महापात्र जी का पता है...

गौरी - हाँ क्या हुआ

डाकिया - नहीं शायद यह डाक राजगड़ के इतिहास में पहली बार आया है.... आपके नाम...

वैदेही - क्या.. क्या आया है...

डाकिया - पता नहीं... दो दो डाक हैं... मैं यशपुर डाक थाने से पहली बार... राजगड़ आया है... दोनों सरकारी है... एक गृह मंत्रालय से है... और दूसरा उच्च न्यायालय से....

वैदेही - क्या...


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पंचायत भवन

समय साढ़े ग्यारह बजे

लोग धीरे धीरे भवन में भरते जा रहे हैं l अपनी जगह बना कर बैठ रहे हैं l वैदेही भी भवन के अंदर औरतों के झुंड के बगल में एक जगह बना कर बैठी हुई थी l वह आशा भरी नजर दौड़ा कर विश्व को ढूँढ रही थी l पर उसे कहीं भी विश्व नजर नहीं आता l उधर भवन के बाहर सरपंच, उदय और शनिया के गुर्गे उन पुलिस वालों का इंतज़ार कर रहे हैं l थोड़ी देर बाद पुलिस की एक जिप्सी दिखती है जो उनके पास आकर रुकती है l जिप्सी से दो ऑफिसर उतरते हैं, ड्राइवर गाड़ी को एक जगह ले जा कर पार्क कर इन लोगों के पास आ कर खड़ा हो जाता है l सरपंच देखता है वह एक कांस्टेबल था l सरपंच तीनों के सीने में नेम प्लेट से पहचान लेता है वे सब इंस्पेक्टर शैतान सिंह, असिस्टेंट सब इंस्पेक्टर मक्खन सिंह और कांस्टेबल जैलांन सिंह थे l तीनों में एक खासियत थी तीनों के चेहरे पर बड़ी बड़ी मूंछों के साथ आखों पर काला चश्मा था l

सरपंच - आइए आइए दरोगा जी...

शैतान सिंह - तो तुम सरपंच हो...

सरपंच - जी...

शैतान सिंह - ठीक है... यह लोग कौन हैं... और यह लोग हमें ऐसे घूर घूर कर क्यूँ देख रहे हैं... क्या कभी पुलिस नहीं देखे क्या...

सरपंच - नहीं ऐसी बात नहीं है... आपको तो हमारे गाँव के दरोगा जी... मेरा मतलब है रोणा बाबु जी भेजा है ना...

शैतान सिंह - हाँ... पर इन लोगों के देखने की तरीके से लगता है... यह लोग हम पर शक कर रहे हैं...

सरपंच - क्या... नहीं नहीं दरोगा जी... (कह कर शनिया और उसके गुर्गों की ओर देख कर इशारों से हाथ जोड़ने के लिए कहता है, शनिया और उसके सारे आदमी इन पुलिस को हाथ जोड़ते हैं)

शैतान सिंह - (शनिया से) तुम शनिया हो...

शनिया - जी...

शैतान सिंह - तुम्हारे बारे में... अनिकेत बाबु ने मुझे सबकुछ बता दिया है.... घबराओ मत... हम यहाँ तुम्हारे मदत के लिए ही आये हैं... अब प्लान क्या है बताओ...

भूरा - साहब... पंचायत में मुमकिन है... बीच बहस में दंगा हो...

माखन सिंह - ओ.. तो दंगा करने का प्लान है... वह भी कानून के आड़ में...

सत्तू - जी साहब... इसीलिये तो हम रोणा साहब को खोज रहे थे...

जैलांन - अबे तुम्हारा रोणा साहब ने ही हमें भेजा है... हम यहाँ एक से भले तीन आए हैं...

शैतान सिंह - हाँ... पर यह बोलो... दंगे में कितने निपटेंगे...

शनिया - सिर्फ एक... (तभी उसके कान में शुकुरा आकर कुछ कहता है, वह शुकुरा को हैरान व परेशान भरे नजरों से देखने लगता है)

शैतान सिंह - क्या हुआ... सब ठीक है ना...

शनिया - ककु कुछ नहीं... कुछ नहीं...

शैतान सिंह - पर तेरा थोबड़ा तो कुछ और बता रहा है...

शनिया - क्या... क्या बता रहा है...

शैतान सिंह - यही के... बलि का बकरा गायब है...

शनिया - (चौंक जाता है, आँखे फैल जाते हैं) यह... आपने कैसे जान लिया...

शैतान सिंह - बोला ना तेरा थोबड़ा बोल रहा है... तो प्रोग्राम आगे बढ़ाना है... या...

शनिया - नहीं साहब.... (दांत पिसते हुए) प्लान में कोई तब्दीली नहीं होगी... बकरा ना सही... बकरे की अम्मा ही सही... आज तो हर हाल में बलि चढ़ेगी...

शैतान सिंह - मतलब...

शनिया - उसकी दीदी है... वह फुदकेगी... उछलेगी...

शैतान सिंह - तो...

शनिया - तो हम उसे ही निपटा देंगे...

शैतान सिंह - कैसे...

शुकुरा - हमारे लोग... भीड़ के बीच से हमला बोल देंगे... सबको लगेगा... भीड़ हमलावर हो गई... बेचारी की जान चली गई...

शैतान सिंह - एक मिनट... तुम लोग क्या करोगे कैसे करोगे... हमें कोई मतलब नहीं... पर पत्थर बाजी बिल्कुल नहीं होनी चाहिए...

शनिया - क्यूँ साहब...

शैतान सिंह - अबे घन चक्करों... पत्थरबाजी से हम लोग भी घायल हो सकते हैं... क्यूँ सरपंच...

सरपंच - हाँ.. हाँ हाँ.. बात तो सही है... एक को निशाना बनाओगे... चुका तो हम लपेटे में आयेंगे...

शैतान सिंह - हाँ... अगर ऐसा कुछ हुआ... तो... (होल्स्टर से रिवाल्वर निकाल कर) जो मेरे नजर में आएगा... उसे भुन के रख दूंगा...

शुकुरा - पर मान लीजिए... भीड़ में से कोई छुपे हुए हथियारों से हमला कर दिया तो...

शैतान सिंह - कोई वादा नहीं... पर शर्त है... आँच हम तक ना आए....

भूरा - नहीं जाएगा... साहब... पर फर्ज कीजिए... उसे बचाने... बीच में कोई आया...

शैतान सिंह - अगर एक दो आए... तो उसकी जिम्मेदारी तुम लोगों की... हाँ अगर एक दो से ज्यादा आए... तो... शांति बनाए रखने के लिए... हमें गोलीबारी करनी होगी...

सरपंच - ठीक है साहब अब अंदर चलें... लोग आ गए हैं... हम पंचायत फैसला सुना कर... फैसले पर मोहर लगाने की कवायद करेंगे...

शैतान सिंह - ठीक है... चलो फिर...

सभी भवन के अंदर आते हैं l लगभग आधे से ज्यादा गाँव वाले मौजूद थे l सरपंच पंडाल पर एक जगह किनारे पर पुलिस वालों को बिठा देता है और खुद अपने पंचो को लेकर बीच पंडाल में टेबल पर बैठ जाता है l लोगों में पहले पंक्ति में समिति सभ्य और कुछ वार्ड मेंबर बैठे हुए हैं l सरपंच एक समिति सभ्य को इशारा करता है l वह समिति सभ्य माइक के पास जाकर सबको स्वागत करता है और सरपंच को माइक पर आकर सभा बुलाने कारण कहने को बुलाता है l सरपंच अपनी पगड़ी ठीक करता है फिर माइक पर आता है l एक नजर लोगों के बीच बैठा शनिया पर डालता है, शनिया हल्के से अपना सिर हिला कर शुरु करने के लिए इशारा करता है l सरपंच एक इत्मीनान भरी साँस छोड़ते हुए औरतों के झुंड में नजर दौड़ाता है l उसे वैदेही की झलक दिख जाती है l

सरपंच - देवियों और स्वजनों... आप सबका स्वागत है... आप सबकी जानकारी के लिए बता दूँ के... यहाँ कुछ विषयों पर चर्चा होगी... चर्चे में हर पक्ष की बात सुनी जाएंगी... चर्चे के उपरांत पंचायत अपना निर्णय सुनाएगी... और आप सबको वह निर्णय स्वीकार करना होगा... यह मैं याद दिलाना बेहतर समझता हूँ... के यह राजा क्षेत्रपाल जी का राजगड़ है... यहाँ केवल राजा साहब के अनुमोदित कानून ही मान्य है... इसलिए यहाँ पर जो न्याय होगा... वह अंतिम होगा.... थाना और कचहरी केवल नाम मात्र के लिए है... इसके बाद जो भी निर्णय के विरुद्ध जाएगा... उसे राजा क्षेत्रपाल के राज के नियम के विरुद्ध समझा जाएगा... अब मैं... चर्चा के लिए विषय को आपके समय प्रस्तुत करने के लिए... पंचो से अनुमती मांगता हूँ...

वैदेही - (औरतों के बीच से उठ कर) एक मिनट सरपंच जी... क्या मैं एक सवाल कर सकती हूँ...

सरपंच - जी जरुर...

वैदेही - आपने अभी कहा... यहाँ का न्याय अंतिम न्याय है... थाना और कचहरी केवल नाम मात्र के लिए है....

सरपंच - जी...

वैदेही - तो फिर यहाँ मंच के सिरे पर वह पुलिस वाले क्यूँ बैठे हुए हैं...

सरपंच - वह आमंत्रित अतिथि हैं... जो पंचायत की कार्यप्रणाली की निरीक्षण करने के पश्चात... सर्कार को अपनी रिपोर्ट सौंपेंगे... मुझे लगता है आप समझ गई होंगी... इसलिए बैठ जाएं... (वैदेही बैठ जाती है) क्या चर्चा आरंभ करने के लिए मुझे पंचों की इजाजत प्राप्त है... (पंचों में आए सभी लोग अपना सिर हिला कर सहमती देते हैं) तो देवियों और स्वजनों... जैसा कि आप सब जानते हैं... डेढ़ वर्ष पूर्व राजगड़ मल्टीपरपोज कोआपरेटिव सोसाइटी का गठन हुआ था... उस सोसाइटी के कुछ वरिष्ठ अधिकारीयों ने सोसाईटी की आय के लिए... एक चिट फंड चलाने की मंजुरी दी गई थी... अब यह देखा गया है... गाँव के कुछ लोग चिट फंड से... अपनी हद से ज्यादा कर्ज उठा चुके हैं... इसलिए उन कर्जो की अदायगी पर चर्चा के लिए आप सब यहाँ आमंत्रित हैं... (कुछ लोग आपस में खुसुर-पुसुर करने लगते हैं, जाहिर से बात थी किसीको कुछ भी समझ में नहीं आई) तो जिन लोगों को इस बाबत नोटिस मिला है... उनका कुछ कहना है... (सरपंच पूछता है, कोई कुछ नहीं कहता)

वैदेही - (अपनी जगह से उठती है) सरपंच जी... अगर कर्जा राजगड़ मल्टीपरपोज कोआपरेटिव सोसाइटी की चिट फंड से दिया गया है... तो उसकी वसूली के लिए... नोटिस शराब की ठेके चलाने वाले क्यूँ थमाए...

सरपंच - (कुछ देर के लिए सोच में पड़ जाता है, फिर) चिट फंड का अपना कोई पैसा नहीं है... वे लोग... चिट फंड में अपना पैसा लगाए हैं... इसलिए...

वैदेही - कमाल करते हैं... सरपंच जी... चिटफंड चलाओ आप... मगर पैसा लगाएं शराब बेचने वाले...

सरपंच - क्या आपको नोटिस मिला है...

वैदेही - जी... जी नहीं...

सरपंच - तो आप क्यूँ बीच में कुद रही हैं... जिनको नोटिस मिला है... उन्हें पूछने.. जानने दीजिए... बैठ जाइए...

मन मसोस कर वैदेही बैठ जाती है l बेबसी के साथ भीड़ में विश्व को ढूंढने लगती है पर उसे कहीं भी विश्व नहीं दिखता l

सरपंच - तो पहला नाम है... हरिया... अरे बाप रे पाँच लाख रुपये... क्यूँ हरिया... इतने पैसों का क्या किया तुमने...

हरिया - (हाथ जोड़ कर, रोनी सुरत बनाते हुए अपनी जगह से उठ कर) सरपंच जी... मुझे नहीं पता कब और कैसे मैंने इतने पैसे लिए...

सरपंच - यह क्या शनिया... हरिया कह रहा है.. इतना पैसा कब लिया... उसे मालुम ही नहीं है...

शनिया - यह झूठ बोल रहा है... आज तक मेरे भट्टी में आकर जितना मर्जी उतना पिया है... यहाँ तक उल्टी करने के बाद भी पिया है... इसलिए मैंने उसे... चिट फंड में से निकाल कर पिलाया... पर अब और नहीं.. पाँच लाख हो गए... अब मुझे मेरे पैसे चाहिए... बस...

सरपंच - यह क्या सुन रहा हूँ हरिया...

हरिया - यह शनिया भाई झूठ बोल रहा है... मैंने कभी हज़ार रुपये इकट्ठे नहीं देखे... और मैं कैसे... कैसे... पांच लाख रुपये तक की दारु पी सकता हूँ...

सरपंच - अरे हरिया... तुने पाँच लाख रुपये के दारु नहीं पी है.. यह दारु तुझे चिटफंड के पैसों से... व्याज के साथ पिलाया है.. असल और व्याज मिला कर पाँच लाख हो गया है...

हरिया - नहीं नहीं... आप ही सोचो सरपंच जी... पी पी कर एक आदमी कितना पी सकता है...

सरपंच - अरे हरिया.. तु अकेला कहाँ है... इनके कर्जे में बिल्लू है... बलराम है... चित्तरंजन है... और कमाल की बात है... सबने पाँच पाँच लाख देने हैं...

शनिया - सरपंच जी...जमीन पुश्तों से राजा साहब के यहाँ गिरवी प़डा है... सिर्फ घर बार बचा है... उन्हें बेचकर.. खुद को बेच कर भी यह कर्ज नहीं चुका सकता हूँ मैं...

सरपंच - अरे भाई... हम यहाँ इसीलिए तो बैठे हैं... आज यह तय करना है... तुम सब के कर्ज कैसे चुकता होगा... जिसे तुम भी मानोगे... और शनिया भी... क्यों शनिया... बात ठीक है ना...

शनिया - (अपनी मूँछों पर ताव देते हुए) बिल्कुल दुरुस्त कहा आपने सरपंच जी...

सरपंच - हाँ तो फिर तुम बोलो शनिया भाई... हरिया तो कह दिया.. घरबार ही नहीं... यह खुद भी बिक जाए... तब भी... पाँच लाख रुपये नहीं चुका पायेगा... ऐसे में... तुम कैसे अपना कर्ज वापस लेना चाहोगे...

शनिया - (अपनी जगह पर खड़ा हो जाता है) पंचों... मैं भी समझता हूँ... आखिर हरिया ही नहीं... चाहे बिल्लू हो या बलराम या चित्तरंजन... सभी मेरे गाँव वाले हैं... इन लोगों में से कोई दुश्मनी तो नहीं मेरी... पर बात पैसों की है... अगर मुझे वापस ना मिला तो मैं और मुझ पर आश्रित मेरे आदमी जिएंगे कैसे... पर मैं बहुत बड़ा दिल रखता हूँ... अब घर देखने के लिए... घर में बीवी... और कमा कर घर चलाने के लिए बाहर मर्द... तो बचे कौन बच्चे... तो इन सबके घरों में जितने भी बच्चे हैं... वह मेरे घर में आकर मेरे बताये हुए काम करें... वादा करता हूँ... एक साल में ही इन सबके कर्ज उतर जाएगा...

सरपंच - वाह.. एक साल में उतर जाएगा... और क्या चाहिए... क्या कहते हो... हरिया और बाकी लोग...

वाह वाह वाह... (खिल्ली उड़ाने के अंदाज में वैदेही अपनी जगह से उठती है और ताली बजानी लगती है) वाह सरपंच... तुने तो कमाल कर दिया... सरपंची छोड तु भड़वा और दल्ला भी बन गया... जिनके घरों की इज़्ज़त आबरू को बचाना था... उन्हीं की सौदा.. उनके माँ बाप से करवा रहा है... वाह...

सरपंच - ऐ लड़की... कब से देख रहा हूँ... न्याय के बीच में... तु टोकने के लिए घुस रही है...

वैदेही - न्याय... थु... यह कह तेरी दल्ले गिरी के बीच क्यूँ घुस रही हूँ...

शैतान सिंह - (अपनी जगह पर खड़े हो कर) सुनो मोहतरमा... तुम ऐसे कैसे किसी सरपंच को गाली दे सकती हो... यह (हरिया को दिखा कर) तुम्हारा कौन लगता है...

वैदेही - आपके सामने यह गरीबों की इज़्ज़त की कीमत लगा रहा है... और आप उसकी तरफदारी कर रहे हैं... हाँ यह मेरा कुछ नहीं लगता.. पर उसके बच्चे मुझे मासी कहते हैं... और उनके लिए मैं किसी भी हद तक जा सकती हूँ...

शैतान सिंह - अच्छा यह बात है... क्या तुम उस हरिया की पैरवी करना चाहती हो... (कह कर शनिया को आँख मारता है) अगर कुछ कहना चाहती हो... तो मंच पर जाओ और कहो...

कह लेने के बाद अपनी भवें नचा कर शनिया की ओर देखता है l वैदेही भी मंच पर चढ़ कर माइक के पास आ जाती है l वैदेही को माइक के पास देख शनिया खुश हो जाता है और अपनी पलकें झपका कर इशारे से शैतान सिंह को अपनी कृतज्ञता व्यक्त करता है और मन ही मन सोचने लगता है

- यह तो कमाल करदिया दरोगा ने... शिकार को सामने लाकर खड़ा कर दिया... विश्वा नहीं तो विश्वा की बहन ही सही... मरना तो है आज तुझे कमिनी... (आँखों में खुन उतर आता है) कितनी बार मुझे जलील किया है तुने साली रंडी... आज तुझे मार कर अपनी भड़ास निकालूँगा... (अपने आदमियों को तैयार होने के लिए इशारा करता है)

शैतान सिंह - सरपंच जी... इन्हें एक माइक दीजिए... हम भी तो देखें... क्या पैरवी कर लेंगी यह...

सरपंच एक ऑपरेटर को इशारा करता है l वह ऑपरेटर एक माइक लाकर वैदेही को देता है l

शैतान सिंह - तो मोहतरमा जी... आपको किस बात पर ऐतराज है...

वैदेही - इंस्पेक्टर साहब... जैसा कि इस सरपंच ने कहा... डेढ़ साल हुए हैं... कोआपरेटिव सोसाइटी को... तो चिटफंड भी इन्हीं डेढ़ सालों में बना होगा... मैं इतना जानती हूँ... किसी भी चिट फंड चलाने के लिए... सर्कार के साथ साथ आरबीआई की मंजुरी होनी चाहिए... कम से कम... सोसाईटी की मेंबर्स की मंजुरी चाहिए... क्या इनके पास हमारे राज्य सर्कार की या आरबीआई की मंजुरी है... या फिर... सोसाईटी मेंबर्स की मंजुरी है...

सरपंच - इसकी कोई जरूरी नहीं थी... हमारे लिए हमारी सर्कार... राजा साहब हैं...

वैदेही - इसका मतलब तुम लोगों की यह चिटफंड ही गैर कानूनी है... और दुसरी बात... यह बात यहाँ पर बिल्कुल भी तुमने नहीं कहा... हरिया पर कितना कर्जा है... कितने व्याज पर कितने महीनों के बाद... यह पाँच लाख हुआ है...

वैदेही के इतने कहने पर सरपंच का चेहरा ऐसा हो जाता है जैसे उसके हाथों से तोते उड़ गए हों l हरिया की बीवी खड़ी हो जाती है और पूछती है

लक्ष्मी - सही पकडी हो दीदी... हाँ पहले यह बताओ... मेरे मर्द का कर्जा कितना है... व्याज कितना और कितने महीने हुए हैं...

शैतान सिंह - क्यूँ... तु उसकी पत्नी है... तुझे नहीं मालूम...

लक्ष्मी - (हाथ जोड़ कर) साहब... यह शनिया जब भी वसुली के लिए मेरे घर आया है.. कभी खाली हाथ नहीं लौटा है... उसने जब भी जितना पैसा कहा... दीदी ने उसके मुहँ पर मारा है... उसके बावजुद... पाँच लाख कैसे हो गया...

शनिया - ऐ चुप करो तुम सब... (अपने एक आदमी से) बिठा रे उसको...

एक आदमी औरतों के बीच में घुस कर लक्ष्मी को ज़बरदस्ती बैठने के लिए कहता है l लक्ष्मी जिस जोश के साथ उठी थी उसी तेजी के साथ बैठ जाती है l

वैदेही - देखा इंस्पेक्टर साहब... यह है इनकी चाल बाजी... यह अपने घर बच्चों से काम लेने नहीं बुला रहे हैं... बल्कि बढ़ रही बेटीयों को नोचने के लिए बुला रहे हैं... पर मैं जिंदा हूँ अभी... मेरे जीते जी... इस गाँव की किसी भी लड़की पर कोई आँच नहीं आने दूंगी...

शनि - तो आज मर जा फिर... (अपने आदमियों से) देखो गाँव वालों... यह कानून राजा साहब का है... यह बदजात राजा साहब से नमक हरामी कर रही है... उठो और ख़तम कर दो इसे...

भीड़ में से शनिया और उसके सारे लोग पंडाल की ओर भागते हैं और पंडाल पर चढ़ जाते हैं l सभी गाँव वाले यह देख कर डर जाते हैं कि तभी शनिया चिल्लाता है

शनिया - कोई नहीं जाएगा यहाँ से... जो भी इस भवन से बाहर जाएगा... वह राजा साहब का गुनहगार होगा... हम उसे ढूंढ ढूंढ कर मार डालेंगे...

सभी गाँव वाले रुक जाते हैं डरते हुए पंडाल की ओर देखने लगते हैं l वैदेही अपनी जगह पर डट कर खड़ी हुई थी l उसकी आँखों में इतनी हिम्मत थी के शनिया वैदेही से नजरें मिला नहीं पा रहा था l शनिया खुद को सम्भालता है और वैदेही के पास आता है l

शनिया - बड़ा मतलबी निकला तेरा भाई... हमने तो उसे लपेटे में लेने के लिए यह प्लान बनाया था... पर वह आया नहीं... तु हत्थे चढ़ गई... कोई नहीं... आज वह नहीं तु सही... ऐ (अपने आदमियों से) निकालो अपने हथियार...

वैदेही को घेरे हुए सभी अपने अपने हथियार निकालते हैं l सारे हथियार खेती में उपयोग होते हैं l यह सब देख कर भी वैदेही विचलित नहीं होती l

शनिया - किस मिट्टी की बनी है तु... जरा भी डर नहीं लग रहा तुझे...

वैदेही - जिसका विश्वा जैसा भाई हो... उसे किस बात कर....

शनिया - अच्छा... यह बात है... (अपने आदमियों से) काट डालो इस रंडी...

आगे कुछ नहीं कह पाया l एक लात शनिया के निचले जबड़े पर लगता है l वह हवा में उड़ते हुए पंडाल से नीचे कुर्सियों पर गिरता है l वह सम्भल कर उठ कर देखता है l उसीके आदमियों के लिबास में विश्वा उसके आदमियों को धूल चटा रहा है l एक एक आदमी को उठा उठा कर पटक रहा था l पहले से ही उसके हाथों मार खाए हुए थे l थोड़ा डर पहले से ही था l अब विश्व को सामने देख कर उन पर डर और भी हावी हो गया l उनके हाथ पैर चलने से पहले ही विश्व के हाथ पैर चल रहे थे l कोई एक घुसे में तो कोई एक लात से गिर रहा था वह भी पंडाल से छिटक कर नीचे पड़े कुर्सियों पर l शनिया देखा पुलिस वाले बड़े मजे से विश्वा को उसके आदमियों को मारते हुए देख रहे हैं l वह शैतान सिंह के पास जाता है

शनिया - यह आप क्या कर रहे हैं इंस्पेक्टर साब... वह मेरे आदमियों को मार रहा है...

शैतान सिंह - मैंने पहले ही कहा था... मैं सिर्फ गाँव वालों को रोकुंगा... तुम्हारे आदमियों को नहीं...

शनिया - पर वह मेरा आदमी नहीं है...

शैतान सिंह - तुम लोगों के पास हथियार तो है ना... टूट पड़ो उस पर...

शनिया - तो फिर आप क्या करेंगे...

शैतान सिंह - अबे भोषड़ी के... मर्द ही है ना तु... कुछ देर पहले लड़की पर... बड़ी बड़ी हांक रहा था... साले हरामी एक ही लात में क्या छक्का बन गया...

शनिया अपने कपड़ों के बीच से एक तलवार निकालता है और धीरे धीरे विश्वा के पास जाने लगता है l जब तक वह विश्वा के पास पहुँचा शनिया के सारे आदमी भवन के फर्श पर धुल चाट रहे थे l शनिया विश्व के पीछे पहुँच कर हमले के लिए जैसे ही तलवार उठाता है विश्व अचानक मुड़ता है और शनिया के आँखों में घूर कर देखने लगता है l विश्व की ऐसे नजर से शनिया तलवार उठाए वैसे ही मुर्ति बन खड़ा रह जाता है l

विश्वा - तुझे मारने के लिए... मुझे किसी हथियार की जरूरत नहीं है... मेरी यह तीखी नजर ही काफी है... तेरी साँस अटक जाएगी...

शनिया फिर भी वैसे मुर्तिवत खड़ा था l विश्व उसके हाथों से तलवार ले लेता है l शनिया का कोई विरोध नहीं होता l विश्व शनिया को एक धक्का देता है l शनिया कई कदम पीछे जा कर गिरता है l विश्व अब सरपंच की ओर देखता है l सरपंच भय के मारे गिला कर देता है l विश्व तलवार से सरपंच की पगड़ी को निकाल कर उपर उछाल देता है l पगड़ी खुल कर उड़ते हुए धीरे धीरे नीचे गिरने लगता है l विश्व बहुत तेजी से तलवार घुमाने लगता है l इतनी तेज के सिर्फ हवाओं के चिरने की आवाज ही आ रही थी, और आँखों में जैसे बिजली कौंध रही थी l विश्व अचानक तलवार घुमाना बंद कर कमर पर हाथ रखकर खड़ा हो जाता है l जब पगड़ी उड़ते उड़ते विश्व के कंधे के बराबर पहुँचती है, विश्व बहुत तेजी से सिर्फ तीन बार तलवार घुमाता है l पहले ऊपर की ओर फिर दाहिने की ओर फिर बाएँ l पगड़ी की कपड़ा चार बराबर हिस्सों में कट कर उड़ते हुए नीचे बिखर कर गिरता है l यह दृश्य कुछ ऐसा था कि वहाँ पर मौजूद सभी लोग सम्मोहित हो गए थे l जब तक होश में आए तब तक विश्व अपनी दीदी को लेकर वहाँ से जा चुका था l शनिया मुड़ कर देखता है वहाँ पर पुलिस वाले भी नहीं थे

शनिया - वह... वह...

शुकुरा - क्क्क क्या हुआ... भाई..

शनिया - द... द..

शुकुरा - दरोगा...

शनिया - हाँ हाँ हाँ... क क कहाँ गया..

उदय - वह तीन पुलिस वाले... विश्व और उसकी बहन को अपनी गाड़ी में बिठा कर कब के निकल गए

शनिया - क्या...
 
हा हा हा हा

जी बिलकुल शैतान सिंह सीलु है माखन सिंह मिलु है और जैलांन सिंह जिलु

वैदेही तब भी भैरव सिंह या उनके द्वारा आदमियों से उलझ रही थी जब विश्वा जैल में था

वह मुर्ख नहीं है पर मजबूर और बेबस गाँव वालों के वर्तमान और भविष्य के लिए अति चिंतित है

अब वैदेही बाज तो नहीं आएगी

वैदेही जिंदा भी इसलिए है कि भैरव सिंह को अपने अहं पर बड़ा गुमान है

वह एक साडीस्ट है जिसे वैदेही के आखों में दर्द देखना है

यही कारण है कि विश्व करप्शन के झूठे चार्ज में फंसा और वैदेही को पीड़ा हुई थी

बस अगले अपडेट में इस पर पर्दा उठ जाएगी

हा हा हा

जैल में उसे गुरु प्रणव, हरिस, वसंत याद है जिन्होंने उसे हर तरह की विद्या में माहिर किए थे जिसमें तलवार बाजी एक थी

यह भी मालुम हो जाएगा

एक अलग किस्म का करप्शन है

मानता हूँ पर भाई क्या करूँ मैं इस कहानी को जल्द से जल्द ख़तम करदेना चाहता हूँ

इसलिये रोमांस को किनारे कर रहा हूँ

कारण मेरे दिमाग में एक रोमांटिक कहानी की कीड़ा कुलबुला रहा है

उसे जल्द से जल्द काग़ज़ पर उतारना चाहता हूँ

बस यह कहानी जल्द अपनी अंजाम तक पहुंच जाये

शुक्रिया धन्यवाद आभार तह दिल से
 
वाह SANJU ( V. R. ) भाई आपने तो मेरी बात कह दी

जी बिलकुल

परफेक्ट यह आपकी बेहतरीन विश्लेषण है

अरे वाह आपने तो पुरी बात पुरा उत्तर कह दी

अब मैं क्या कहूँ इस पर

🙏❤️🙏

जी बिलकुल

विश्व अपने शत्रुओं पर उनके हर सोच एवं हर हरकत पर नजर गड़ाए हुए है

इसलिये उनकी हर चाल को नाकाम करते आ रहा है अब तक

धन्यवाद शुक्रिया आभार तह दिल से
 
भाई आप कोई अंडर कवर एजेंट बन गए हो

आईडी में मौसम की तरह बदल जाता है

खैर आप आए बहार आई

औरतों में एक गुण है वह जिसे प्यार करते हैं वह चाहती हैं कि सबसे ज्यादा प्यार उससे पाएं पर

जो सच्चा मर्द होता है वह अपनी माँ से ही ज्यादा प्यार करेगा

वैदेही बेशक यहाँ उसकी दीदी है पर विश्व की माँ की जगह है इसलिए स्वाभाविक था विश्व का वह उत्तर

हा हा हा

टीलु वही मान दे रहा है गौरी को जो वैदेही और विश्व उसे देते हैं

टीलु कुछ ज्यादा ही आत्मीय हो रहा है

हाँ अब समय आ चुका है कि वह उसकी बार काउंसिल की लाइसेंस नंबर का आ जाना

कोई ना बस अगले अपडेट में मैं यह क्लियर कर देता हूँ

वैदेही की प्रयास यही है कि लोग राजा के खिलाफ आवाज उठाएं

विश्व की भी यही चाहत है

पर कुछ कुर्बानियों के बाद ही यह सम्भव होगा

परफेक्ट हाँ यह वही तीनों हैं

विश्व ने रोणा को धमका कर साइड कर अपने दोस्तों को ले आया था

भाई यह तो होना ही था

यह लोग पहले से ही विश्व से डरे हुए थे

वही डर उस वक़्त उन पर हावी हो गया के उनके हाथ पैर नहीं चले

औऱ बाकी जो बचा है अगले अपडेट में

अंत में लियोन भाई आपका बहुत बहुत शुक्रिया
 
हाँ पर जैसा कि मैंने पहले भी उल्लेख किया है

यह मेरी एक नायिका प्रधान नाटक की एक्सटेंडेड रुप है जहां मैंने नायिका को नगण्य कर दिया है

तो बीच बीच में वह निकल ही आता है

अभी फ्रेम में भैरव सिंह को आने दीजिए

अभी विश्वा अपना गेम खेल रहा है वह भी आराम से अभी तक भैरव सिंह के तरफ़ से पलटवार हुआ नहीं है

हाँ बंधु मैंने अकारण ही कहानी को खिंच लिया बहुत से चरित्रों को जोड़ दिया अब मुश्किल यह हो रहा है कि हर चरित्र के बीच तालमेल बिठाते हुए कहानी को आगे बढ़ाना पड रहा है l इसलिए मैं इस जुगत में लगा हूँ जितनी जल्दी हो सके उतनी जल्दी कहानी को अंत तक पहुँचा सकूँ

अब मैंने निश्चय कर लिया है अगली कहानी को ज्यादा से ज्यादा सौ अपडेट तक या उससे भी कम अपडेट में सीमित रखूं

जी जरूर

आशा है पसंद आयेगा

हाँ भाई पहले मेरा विश्वरुप ख़तम हो जाने दीजिये

हाँ भाई स्वस्थ हूँ

अब हाथ पर कम दबाव डाल रहा हूँ

बस अब काम व्यस्तता भी अधिक है

समय निकाल रहा हूँ लिख भी रहा हूँ
 
👉एक सौ तीसवां अपडेट

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पंचायत भवन कांड के दो दिन बाद

यशपुर क्षेत्रपाल गेस्ट हाउस

समय दो पहर का वक़्त

क्षेत्रपाल गेस्ट हाउस, अंदर रोणा कुर्सी पर बैठा हुआ था और एक कोने में शनिया और उसके गुर्गे लाइन हाजिरी में खड़े हुए थे, उनके सामने भीमा भी खड़ा था

शनिया - (हिचकिचाते हुए) हमें यहाँ... इस वक़्त क्यूँ बुलाया है आपने दरोगा जी

रोणा - वकील बाबु आ रहे हैं... उनको राजा साहब ने भेजा है... खैरियत बुझने के लिए... थोड़ी देर बाद वकील बाबु पहुँचेंगे...

शनिया - हम... हम उनसे क्या कहेंगे साहब... हम तो उनसे नजरें तक मिला नहीं पायेंगे...

रोणा - (बिदक कर ) मैंने उदय के हाथों खबर भिजवाया था... पंचायत की सभा देर से शुरु करने के लिए...

शनिया - मैंने तो आपको फोन लगाया था... आपके फोन पर...

रोणा - (बिदक कर खड़ा हो जाता है) कितनी बार कहा है... मेरा फोन बाहर डिपॉजिट था... किसने फोन उठाया... क्या किया मैं नहीं जानता...

अभी बाहर से चर्र्र्र्र्र् की आवाज सुनाई देती है l मतलब बाहर कोई गाड़ी रुकी थी l सबकी ध्यान दरवाजे की ओर जाता है l थोड़ी देर बाद बल्लभ अंदर आता है

सभी बल्लभ को देखते ही सकपका जाते हैं और नजरें चुराने लगते हैं

बल्लभ - (ताली बजाते हुए) वाह वाह वाह... राजा साहब के गैर हाजिरी में... क्या क्या कारनामें किए हो तुम सब हराम जादे... वाह..

सबके सिर शर्म से झुक जाते हैं, बल्लभ गुस्से में फनफनाते हुए चल कर शनिया के सामने खड़ा होता है

बल्लभ - क्यूँ बे कुत्ते... आखिर कार तुझे घी हजम हुई ही नहीं....

शनिया - जी वह वकील साहब..

बल्लभ - चुप बे... समझाया था तुम हराम जादों को... अगली बार कोई भी कांड करने से पहले... मुझसे सलाह कर लिया करो... (रोणा की ओर देखते हुए) क्यूँ बे दरोगा... तेरे सामने ही इनकी क्लास ली थी ना मैंने... फिर तुने भी नहीं समझाया इनको...

रोणा - (नरम आवाज में) सस.. समझाया था मैंने इन्हें... पर इन्हें ही चूल मची थी... राजा साहब को भी उस सरपंच के जरिए मना लिए... इसलिए...

बल्लभ - अबे इन सबसे ज्यादा तेरा विश्वा से पाला पड़ चुका है... इन अक्ल के अंधों को समझा भी सकता था... और पंचायत भवन में... हर हाल में तुझे उनके साथ होना चाहिए था... राजा साहब ने तुझे हिदायत भी तो यही दी थी...

रोणा - मैंने उदय के हाथों खबर भिजवाया था... मेरा इंतजार करने के लिए... पर यहाँ पर भी.. कांड हो गया...

बल्लभ - कैसा कांड...

रोणा - चार साल पहले का वारंट था... जब मैं देवगड़ में पोस्टिंग था... अचानक एक दिन पहले मुझे तहसील से कॉल आया... और वारंट अटेंड करने से पहले... ना करता... तो कंटेप्ट ऑफ कोर्ट हो जाता... मैंने अपना मोबाइल बाहर अटेंडेंट के पास डिपॉजिट दे आया था... तभी शायद इस शनिया का फोन आया था... किसी ने फोन लिफ्ट कर... मेरे या मेरे स्टाफ के बदले... वहाँ पंचायत भवन में पहुंच गए... और वहाँ पर वही हुआ... सब जैसा विश्वा चाहता था...

बल्लभ - ऐसे कैसे हो गया... तेरा फोन लॉक नहीं था क्या...

रोणा - कॉल लिफ्ट करने के लिए... लॉक क्या संबंध...

बल्लभ - (भीमा से) और तु... तु कैसे इन सबके साथ नहीं था...

भीमा - अब मैं क्या कहूँ वकील साहब... ( शनिया को देख कर) इस कमबख्त ने जैसे डींगे हांके थे... साथ में पच्चीस तीस पट्ठों का लश्कर... फिर भी... इस बार... दिन के उजाले में मार खाए...

बल्लभ एक कुर्सी पर बैठ जाता है और ठुड्डी पर हाथ रखकर कुछ सोचने लगता है l दांत पिसते हुए सब पर एक नजर डालता है

बल्लभ - सरपंच कहाँ है..

रोणा - हस्पताल में...

बल्लभ - क्या... हस्पताल में... क्यूँ...

रोणा - सबसे ज्यादा डरा हुआ... तो वही है... गहरा सदमा लगा है... इतना गहरा के... हाथ पैर ठंडा पड़ गया... इसलिए इमर्जेंसी में हस्पताल में दाखिल करना पड़ा...

बल्लभ - (शनिया और उसके लोगों से) जानते हो तुम लोग अभी कहाँ पर हो.... (कहते हुए खड़ा हो जाता है) यह जहां तुम लोग खड़े हुए हो... क्षेत्रपाल गेस्ट हाउस है... राजा साहब रुतबा ही है... के यहाँ सरकारी मुलाजिम पहरेदारी करते हैं.... तुम लोगों के मूर्खता के वज़ह से... राजा साहब के साख पर बट्टा लगा है... इसे अब साफ करने का जिम्मा भी अब तुम्हारा है...

शनिया - जी अब तो... राजा साहब का सामना हम कैसे करें... इस बात की परेशानी है..

बल्लभ - वह तुम जानो... बहुत बहादुरी दिखा दी तुमने... अभी कमीना पन दिखाने की बारी है तुम्हारी... बहादुरी और सीधे रास्ते पर... कोई उसे हरा नहीं सकता... तब बहादुरी छोड़ो... अपना कमीना पन आजमाओ... कुछ भी करो... (जोर देते हुए) उसे.... उसे जान से मार दो..

बल्लभ को आवाज़ गूंज रही थी l कमरे में इतनी खामोशी थी के बाहर से अंदाजा लगाना मुश्किल था के अंदर करीब करीब तीस आदमी हैं l बल्लभ फिर बोलना शुरु करता है

बल्लभ - उसे सामने से मार नहीं सकते... तो पीठ पर वार करो... छुप कर वार करो... पर उसे मारना जरुर... जानते हो... तुम लोग हारे क्यूँ.... वह इसलिए कि आज तक तुम लोगों पर किसीने पलट वार नहीं किया था... एक बार पलट वार किया तो तुम लोगों की यह गत बन गई... (सब खामोशी के साथ सुने जा रहे थे) मुफ्त की... हराम की खा खा कर ऐसे हो गए हो कि.... (चुप हो जाता है) इससे पहले कि लोग... तुम लोगों की नाकारा पन की कहानियां बनाने लगे... (फिर से चुप हो जाता है) शूकर करो... छोटे राजा जी ने भीमा का फोन उठाया था.... और उन्होंने मुझे बात का पता करने के लिए भेज दिया.... इससे पहले कि राजा साहब मामला को अपने हाथ पर लें... तुम लोग कुछ करके दिखाओ... वर्ना... राजा साहब का गुस्सा विश्वा पर फूटेगा बाद में... टुटेगा पहले तुम लोगों पर... अब जाओ यहाँ से... तभी राजा साहब के सामने आना... जब विश्वा की कटे हुए सिर को राजगड़ के गालियों में ठोकर मारते हुए गुजरोगे.... अब जाओ यहाँ से... जाओ

शनिया और उसके सारे पट्ठे वहाँ से चले जाते हैं l कमरे में अब सिर्फ बल्लभ, रोणा और भीमा रह जाते हैं l बल्लभ हांफते हुए धप कर बैठ जाता है

बल्लभ - रोणा... क्या रिपोर्ट बनाया है तुमने..

रोणा - यही की... शराब के नशे में... कुछ लोग... वहाँ पर बातचीत में गरम हो गए... हाथापाई कर बैठे...

भीमा - वकील बाबु... कभी सोचा भी नहीं था... विश्वा जैसा कोई आयेगा... इतना नाक में दम कर देगा...

रोणा - यह तो कुछ भी नहीं है भीमा... असली परेशानी अब शुरु होने वाला है...

बल्लभ - कैसी परेशानी...

रोणा - तु जानता है वकील... तु जानता है... यशपुर के डाक खाने से... पहली बार... डाक गया था... परसों वैदेही के पते पर.... (अपनी भवें सिकुड़ कर बल्लभ रोणा को देखने लगता है) तुझे याद होगा वकील... विश्वा ने दो जगह पर आरटीआई दाखिल किया था... एक होम सेक्रेटरीयट में... दुसरा हाइकोर्ट में... दोनों जगह से ज़वाब आ गया है शायद... अब हो ना हो... इन कुछ दिनों में... विश्वा पीआईएल फाइल करेगा... रुप फाउंडेशन की केस फिर से उछलेगा...

यह सुनते ही बल्लभ की आँखे हैरानी के मारे फैल जाते हैं l भीमा बल्लभ की प्रतिक्रिया देख रहा था l रोणा थोड़ी देर की चुप्पी लेकर फिर से कहने ल

रोणा - वह जैल में पुरे सात साल रहा... इन सात सालों में... उसने हर तरह की पढ़ाई की... जुर्म की दुनिया की हर दाव पेच से लेकर लड़ाई मार धाड़ तक सब कुछ... खुद को हर सांचे में बेहतरीन तरीके से ढाला हुआ है... हर जगह अपने आदमियों की जाल फैला रखा है... भुवनेश्वर से लेकर... राजगड़ और यशपुर के चप्पे-चप्पे तक... हम सोचते ही रह जाते हैं... वह अपना काम पुरा कर निकल जाता है.... ऐसा लग रहा है... जैसे हम कुछ कर नहीं रहे हैं... वह हमसे करवा रहा है.

रोणा की बात ख़तम होता है l कमरे में मरघट की शांति महसुस हो रही थी l इतनी के बल्लभ को अपनी साँसे तक सुनाई दे रही थी l कुछ देर बाद

बल्लभ - भीमा..

भीमा - जी वकील साब...

बल्लभ - तुम... शनिया और उसके आदमियों को कहीं छुपे रहने के लिए कह दो... फ़िलहाल विश्वा से और राजगड़ से दुर रहने के लिए कह दो...

भीमा - क्यूँ... वकील साहब... अभी तो आप उसकी सिर लाने की बात कह रहे थे...

बल्लभ - जब उसने आरटीआई दाखिल किया.. तभी से खुद को आरटीआई ऐक्टिविस्ट घोषित करवा दिया था.... अब जब उसे पब्लिक इन्फॉर्मेशन ऑफिसर से जवाब मिल गया होगा... तो पीआईएल दाखिल करते वक़्त... अपनी जान का खतरा बताएगा... उसे खरोंच भी आई... तो लेने के देने पड़ जाएंगे...

रोणा - हाँ भीमा... वकील साहब ठीक कह रहे हैं... अभी विश्वा को छेड़ना नहीं है... उसे अपनी इस छोटी सी जीत का जश्न मना लेने दो... अब कुछ ऐसा प्लान करना होगा... की वह जान से जाए... जहान से भी जाए... पर सरकार को लगे.... वह फरार हो गया है... जैसे हम लोग रुप फाउंडेशन केस में... बैंक अधिकारी और तहसीलदार के साथ किया था...

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एक ऑटो मध्यम गति से राजगड़ की ओर रास्ते पर धुल उड़ाते हुए बढ़ी जा रही थी l ऑटो में पिछली सीट पर बीचों-बीच वैदेही बैठी थी और उसके अगल बगल दो बड़े भरे हुए थैले सटे हुए थे l एक में सब्जियाँ थीं और दुसरे में किराना के सामान l

वैदेही - (ऑटो वाले से) तो तुम्हारा नाम सीलु है...

सीलु - जी दीदी...

वैदेही - पर तुम लोग आज मुझसे अलग अलग हो कर क्यूँ मिले... इकट्ठे क्यूँ नहीं...

सीलु - दीदी... आपको शायद मालुम नहीं... जब से भाई गाँव लौट कर आए हैं... तब से राजा अपने कुछ प्यादों को भाई पर नजर रखने के लिए... इधर उधर बिखरा के रखा है.... ताकि भाई की कोई कमजोर नस उसे मिल जाए...

वैदेही - ओ... पर आज मैं तुम तीनों से इकट्ठे मिलना चाहती थी...

सीलु - दीदी.. मन तो हमारा भी बहुत करता है... क्यूंकि जब भी टीलु हमसे मिलता है... आपकी बड़ी प्रशंसा करता है... पर क्या करें... हम बिलकुल नहीं चाहते... आपकी तपस्या और भाई की लक्ष की राह में कोई रुकावट आए... हमसे कोई चुक ना हो...

वैदेही - बड़ी गहरी दोस्ती निभा रहे हो तुम लोग...

सीलु - नहीं दीदी... यह रिश्ता उससे भी अधिक है... उससे भी आगे है...

वैदेही - ह्म्म्म्म समझ सकती हूँ... इसी लिए तुम लोग मुझे दीदी बुला रहे हो... (सीलु चुप रहता है) अच्छा... तुम लोगों को डर नहीं लगा... पंचायत भवन में कुछ ऊँच नीच हो गया होता तो...

सीलु - नहीं होता.... हमें विश्वा भाई की प्लानिंग पर पुरा भरोसा था... (वैदेही हैरान हो कर सुन रही थी) वारंट पर मीटिंग के वक़्त... प्रोटोकॉल के तहत रोणा ने अपनी मोबाइल को रिसेप्शन में जमा करवाया था... मैं उससे बराबर दूरी बना रखा था... जैसे ही वह मैजिस्ट्रेट के चेंबर में गया... मैं उसका सॉबओर्डीनेट बन कर रिसेप्शन के पास पहुँच गया... बाकी आप तो जानते हो...

वैदेही - हाँ... (कहते हुए हँसने लगती है) अपने लिए क्या नाम चुना था तुम लोगों ने... तुम शैतान सिंह... (हँसने लगती है, फिर थोड़ी देर बाद, अपनी हँसी रोक कर) अच्छा हमें तुम सुरक्षित पंचायत भवन से निकाल कर बाहर ले आए... पर दुकान पर या घर के बाहर क्यूँ नहीं छोड़ा...

सीलु - (मुस्करा देता है) दीदी आपके इस सवाल पर... जवाब वही है... हमारा ताल्लुक जान कर... कोई हमारा पीछा ना करदे इस लिए...

वैदेही - ओह.. खैर... यह तुम लोग मुझे इतना सारा सब्जी और किराना के सामान क्यूँ दे दिए...

सीलु - यह मिलु और जिलु ने दिए हैं... इसमें मैं क्या कर सकता था...

वैदेही - क्यूँ...

सीलु - दीदी हमारी एक इच्छा है... सच कहें तो कभी कभी हम सबको... टीलु से जलन होती है...वह साक्षात अन्नपूर्णा स्वरूप के हाथों से खाना खा रहा है... पता नहीं कब हम इकट्ठे होंगे...


वैदेही - क्यूँ... तुम इतने नकारात्मक क्यूँ सोच रहे हो... क्या हम कभी भी... इकट्ठे नहीं होगे...

सीलु - होंगे दीदी होंगे... वह भी बहुत जल्द... हमारा तो सपना है ही... के आपके साथ बैठ कर... आपकी हाथों से बनी खाना खाएं...

वैदेही - (थोड़ी उदास हो कर) हाँ... सभी अपने मिलकर इकठ्ठे हों... ऐसा त्योहार भी तो राजगड़ में नहीं आता... कुछ दिनों बाद होली है... पर सदियों से यहाँ कोई त्योहार मनाना तो दुर मातम तक नहीं मनाता....

सीलु - (दिलासा देते हुए) बस कुछ दिन और दीदी... बस कुछ दिन और...

ऑटो अब गाँव में प्रवेश करता है l लोग वैदेही को ऑटो में आते हुए देख हैरान होते हैं l ऑटो वैदेही की दुकान के आगे रुकती है l सीलु उतर कर दोनों थैलों को दुकान के अंदर छोड़ता है l

सीलु - (धीरे से इशारे के साथ) दीदी... थोड़ा पानी...

वैदेही - हाँ हाँ...

वैदेही मटके से ठंडा पानी निकाल कर सीलु को देती है l सीलु पानी पीते हुए नजरें घुमाता है और वैदेही से कहता है

सीलु - दीदी... मुझे कुछ नजरें दिख रही हैं... जो तुम पर और तुम्हारी दुकान पर टिकी हुई हैं... इसलिए मुझे भाड़े के पैसे दे दो... और कोशिश करो... किसी से भी... वह चाहे कितना भी अपना हो... हमसे मुलाकात की बात नहीं कहोगी... (वैदेही हैरान हो कर सीलु को देखती है) हैरान मत हो दीदी... तुमसे कुछ गलती नहीं होगी... पर किसी और से गलती हो सकती है... अगर यह बात खुली... तो आपकी तपस्या और विश्वा भाई की मुहिम को झटका लगेगा... हम सब खतरे में आ जाएंगे...

कह कर वैदेही को ग्लास लौटाता है l वैदेही भी चुप चाप सीलु के हाथों में कुछ पैसे रख देती है l सीलु पैसे लेकर वहाँ से ऑटो लेकर बिना पीछे मुड़े बिना उसे देखे चला जाता है l उसके जाते ही वैदेही एक कुर्सी पर पीठ टिकाए बैठ जाती है और छत की देख कर एक आत्म संतोष के साथ आखें मूँद लेती है l कुछ देर बाद उसके कानों में गौरी की आवाज़ सुनाई देती है

गौरी - क्या सोच रही है अपने मन में...

वैदेही - (अपनी आँख खोल कर देखती है) क्या... अरे काकी तुम कब आई... और क्या पुछा तुमने अभी...

गौरी - अरे बेटी... अपनी मन में क्या कुछ सोच रही हो... और बड़ी खुश भी दिख रही हो... क्या बात है...

वैदेही - काकी... मुझे आज अपने विशु की किस्मत पर गर्व भी हो रहा है और खुशी भी...

गौरी - गर्व... खुशी...

वैदेही - हाँ काकी... मैं जिंदगी भर खोती रही... पर मेरा विशु... आज हर मोड़ पर हासिल कर रहा है... वह चाहे रिश्ता हो... या... मुकाम...

गौरी - तु अपनी किस्मत की बात क्यूँ कर रही है...

वैदेही - काकी... मेरी किस्मत बड़ी अजीब है... जब तक माँ का साया था... पिता का पता नहीं था... फ़िर माँ का साथ छुटा तो माता पिता दोनों मिले... फिर जब विशु आया... माँ ने विशु की जिम्मेदारी दे कर चली गई... मैं विशु की दीदी रही.. माँ भी बन गई... जब खुद बर्बाद हो गई... तो पिता का साया भी सिर से उठ गया... वापस जब गाँव लौटी... (आवाज़ भर्रा जाती है) विशु की बर्बादी बन गई....

गौरी - तु किसी ना किसी बात पर खुद को दोष देती है... कोसती रहती है... क्यूँ...

वैदेही - (हँसने की कोशिश करते हुए) काकी... पर मेरा विशु... के किस्मत में सिर्फ पाना ही पाना लिखा है... देखो ना... आज विशु के पास... माँ है... पिता हैं... दोस्त हैं... और होने वाली जीवन साथी भी है... आज वह वकील भी बन गया है... शहर में अच्छी नौकरी भी है.... (थोड़ी उदासी में अपने आप में खोते हुए) पता नहीं क्यूँ... यहाँ मेरी अहंकार की लड़ाई वह लड़ रहा है... (चुप हो जाती है, थोड़ी देर बाद) काकी... कहीं मैं स्वार्थी तो नहीं हो गई हूँ...

गौरी - नहीं मैं नहीं जानती... तु स्वार्थी हो गई है या नहीं... पर इतना जानती हूँ... तु सिर्फ दो रिश्तों में खुद को बांधे रखी है... पहली बेटी... फिर माँ... और तु यह क्यूँ सोच रही है... विशु तेरी लड़ाई लड़ रहा है... यह हर राजगड़... हर यशपुर वालों की लड़ाई है... हर एक के भीतर उस विद्रोह की बीज पड़ी हुई है... पर उनके आत्मा की जमीन बंजर हुई पड़ी है... बस तेरे अंदर बीज फुट कर विशाल वृक्ष बना है... तु अपने उस वृक्ष की साये में विशु को अपने जैसा बनाया है... पर तु देखना... विशु के वज़ह से... इन सोये हुए लोगों की आत्मा जागेगी... तब सबकी संघर्ष की राह तेरी राह से जुड़ जाएगी....

वैदेही - हाँ... यह जब होगा... तब होगा... ज़रा सोचो काकी... विशु... इसी गाँव की गालियों में पला बढ़ा... पर उसे वैसे दोस्त नहीं मिले... जैसे उसे परदेश में मिले... जो विशु के लिए जान भी दे सकते हैं और जान ले भी सकते हैं...

गौरी - क्या...

वैदेही - हाँ काकी... मैं ऐसे ही दोस्तों से मिलने गई थी... और मिल कर आ रही हूँ...

गौरी - क्या... तो तु... यह सामान लेने नहीं गई थी...

वैदेही - नहीं...

गौरी - तो क्या मिल लिया उनसे...

वैदेही - हाँ... पर वह सब मिले तो ऐसे मिले... जैसे कि भुत... पास साये की तरह आए... रहे... सामने कब आए कब गए पता भी नहीं चला... बस इतना संतोष है कि सबसे मिली... सबको आशीर्वाद दे कर आ पाई...

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देखिए मुझे कोई ऐतराज नहीं है... आप लोग मरीज़ से मिल सकते हैं... पर फिर भी... मैं इतना कहूंगा... मरीज़ कॅंसियस में नहीं है... कभी कभार थर थर कांपने लगता है... तो कभी कभी ऊल जलूल बड़बड़ाने लगता है...

यह डॉक्टर था, बल्लभ और रोणा से कह रहा था l डॉक्टर के ऐसे कहने पर बल्लभ रोणा की ओर देखता है पर रोणा कोई खास प्रतिक्रिया नहीं देता l

बल्लभ - सुनो डॉक्टर... मैं यहाँ उस कमबख्त की जानकारी लेने आया हूँ... बस... उसे अपने आँखों से देख लूँ और आत्म संतोष कर लूँ... वैसे मेडिकल टर्म में... उसे हुआ क्या है...

डॉक्टर - पता नहीं... हम अभी भी टेस्ट कर रहे हैं... सरपंच जी को इतनी गर्मी में भी ठंड लग रहा है... यह हैपो थर्मिया के सिमटंस् लगते हैं... पर और कुछ टेस्ट करलेने के बाद ही हम श्योर हो कर कुछ कह पाएंगे...

बल्लभ - ओके... ओके... क्या हम उससे मिल सकते हैं...

डॉक्टर - हाँ हाँ क्यूँ नहीं... चलिए मैं खुद लिए चलता हूँ...

हस्पताल में एक ही विशेष सुविधा वाली केबिन थी, डॉक्टर इन दोनों को अपने साथ उसी केबिन में ले जाता है l केबिन में सरपंच की बीवी और बच्चे थे l केबिन में पहुँच कर बल्लभ देखता है सरपंच लेटने के बजाय बैठा हुआ है और सिर पर चादर की मोटी फ़ोल्ड बंधी हुई है और पूरा शरीर दो तीन ब्लैंकेट से ढका हुआ है l फिर भी उसका शरीर ऐसे कांप रहा था जैसे सर्दियों में बिना गर्म लिबास के नंगा शरीर जैसे कांपता है l सरपंच की बीवी जैसे ही डॉक्टर को देखती है

स. बीवी - देखिए ना डॉक्टर साहब... इनको क्या हो रहा है... कुछ भी समझ में नहीं आ रहा है... कंबल ओढ़े हुए हैं... अंदर से पसीने से भीगे भी हुए हैं... पर फिर भी ठंड लगने की बात कर रहे हैं...

डॉक्टर - (स. बीवी से) बस एक दो दिन में इनकी हालत ठीक हो जाएगी... (बल्लभ से) अब आप ही देख लीजिए... ऐसी इनकी हालत है...

बल्लभ - क्या यह बातेँ करता है... आई मिन...

डॉक्टर - हाँ हाँ... यह सवालों का जवाब देते हैं... पुछ सकते हैं...

बल्लभ - (आगे बढ़ कर सरपंच के बगल में बैठ जाता है, और उसके कंधे पर हाथ रखकर) सरपंच... क्या हुआ... बताओ...

सरपंच - (थरथराती आवाज़ में) वह... वह... शनिया भाई के लोगों के बीच में था... शुरु से ही... पर कोई नहीं जान पाया... (रुक जाता है)

बल्लभ - हाँ... रुक क्यूँ गए...

सरपंच - (उसी तरह कांपती आवाज में) वह जब सामने आया... मैंने देखा... सबको एक साथ सांप सूँघ गया... सबको जैसे लकवा मार गया... (फिर रुक जाता है)

बल्लभ - (झिंझोडते हुए) सरपंच... फिर क्या हुआ...

सरपंच - (अपना चेहरा घुमा कर बल्लभ की ओर देखता है) वह... बड़े आराम से... जैसे कोई बच्चा... खिलोनों को पटकता है... वैसे ही सबको पटकने लगा... सब के सब जैसे खुद को उसके हाथों पटकने के लिए.. उसके पास जा रहे थे... वह भी लोगों को बड़े सावधानी से... सबको पटक रहा था... फिर... (रुक जाता है)

बल्लभ - फिर... फिर क्या हुआ...

सरपंच - फिर.. कुछ नहीं... कुछ भी नहीं हुआ... शनिया अपनी तलवार निकाल कर मारने को खड़ा हो गया... पर... पर वह शनिया के आँखों में घुर कर देखने लगा... शनिया जैसे जड़ हो गया... वह शनिया से तलवार ऐसे लिया... जैसे शनिया ने तलवार उसीके लिए निकाला हो... फिर उसके बाद... वह... तलवार को ऐसे घुमाया के... मंच पर हवाओं को चीरती हुई बवंडर की आवाज़ गूंजने लगी... और उस बवंडर के भीतर से कभी कभार बिजली सी कौंधती दिखी.... उ... हू.. हू... (कांप जाता है)(इसबार बल्लभ उसे गौर से देखता है) (सरपंच का चेहरा सफेद पड़ रहा था) उसके बाद... मेरी पगड़ी को... तलवार की नोक से उछाला फिर सिर्फ तीन बार... तलवार चलाया... मेरी पगड़ी चार बराबर टुकड़ों में फर्श पर बिखरी पड़ी थी... मैंने देखा... नहीं नहीं... हम सबने देखा... वह तीन पुलिस वाले... मंच पर आए... उन दो भाई बहन को ले कर चले गए... बस... बस इतना ही हुआ....

बल्लभ वहाँ से इतना सुनते ही केबिन से बाहर आ जाता है l उसके पीछे पीछे रोणा भी बाहर आ जाता है l हस्पताल से बाहर आकर बल्लभ गाड़ी में बैठ जाता है l रोणा गाड़ी में बैठ कर बल्लभ से पूछता है

रोणा - अब कहाँ जाना चाहोगे...

बल्लभ - गेस्ट हाउस...

रोणा - (गाड़ी स्टार्ट कर आगे बढ़ा देता है)

बल्लभ - (कुछ देर बाद) तुझे क्या हुआ है...

रोणा - कुछ नहीं... मुझे क्या होगा..

बल्लभ - कमाल है... हमेशा की तरह... तेरी चुतिया काटा उसने... फिर भी तुझे कुछ नहीं हुआ...

रोणा - (जबड़े भींच जाते हैं पर कोई जवाब नहीं देता)

बल्लभ - तुने मूंछें भी मुंडवा ली... क्या विश्वा ने तुझे मूंछें रखने के लायक भी नहीं छोड़ा...

रोणा गाड़ी की स्पीड बढ़ाने लगता है, बल्लभ देखता है रोणा की आँखों में खुन उतर आया था, बल्लभ यह भी देखता है कि गाड़ी गेस्ट हाऊस के बजाय नहर के पास रुकता है l रोणा गाड़ी से उतर कर नहर के किनारे पर खड़ा हो जाता है l उसके पीछे बल्लभ पहुँचता है और उसे महसूस होता है कि रोणा तेज तेज साँस ले रहा है l

बल्लभ - तुने राजा साहब से झूठ क्यूँ बोला...

रोणा - (वगैर बल्लभ को देखे) कौनसा झूठ...

बल्लभ - उस लड़की का... विश्वा से कोई कनेक्शन नहीं है...

रोणा - जब नहीं है... तो कैसे कह देता की कनेक्शन है...

बल्लभ - (कुछ देर तक चुप रहता है) तेरी छटपटाहट देख कर... मैंने बहुत कुछ समझ लिया है...

रोणा - (बल्लभ की ओर देखते हुए, खीजते हुए) क्या... समझ लिया है तुने... हाँ... क्या समझ लिया है...

बल्लभ - मैं तेरी रग रग से वाकिफ हूँ... जहां लड़की देखी... लार टपकाने लगता है... वहीँ आज सरपंच की बीवी की ओर... नजर उठा कर देखा तक नहीं तुने... इसलिए कम से कम मैंने तो सारे डॉट्स जोड़ लिए... और सारी बात समझ में आ गई....

रोणा - (अपनी जबड़ों को भींच कर) क्या... क्या समझ में आ गया तुझे...

बल्लभ - मत भूल... हम मिलकर ही भुवनेश्वर गए थे... यह बात और है... छोटे राजा जी ने मुझे काम पर लगा दिया... पर उसी दौरान किन्नरों वाला कांड बहुत मशहूर भी हुआ था... उसके बाद तेरा चौबीस घंटों के लिए गायब हो जाना... और आज तुझे मूछ मुंडा देख कर सब समझ में आ गया.... (दांत पिसते हुए रोणा बल्लभ की ओर देखने लगता है) तेरा अनुमान बिल्कुल सही था... उस लड़की का जरूर विश्वा से कोई लेना-देना है... विश्वा ने जिसकी सजा तुझे दी है...

रोणा - हाँ हाँ हाँ... (चिल्लाते हुए कहता है, फिर थोड़ी देर चुप हो जाता है, अपने हाथों से बालों को नोचने लगता है फिर गाड़ी के पास आकर दोनों हाथों की मुट्ठी को पटक देता है, फिर गुर्राते हुए) उस लड़की का नाम... नंदनी है... और वह विश्वा की माशुका है... बस इतना ही जान पाया हूँ...

बल्लभ - तो फिर तुने राजा साहब से झुठ क्यूँ कहा... उस लड़की के बारे में...

रोणा - क्यूंकि अब यह मेरा निजी मामला है... राजा साहब का भले ही... सौ खुन्नस हो विश्वा से... पर वह है मेरी निजी मामला... (बल्लभ चुप रह कर सुनता है) राजा साहब को अगर बता देता... तो उस लड़की को... पहले अपने नीचे लिटाते... जब कि उसे सबसे पहले... (अपनी गाल पर हाथ फेरते हुए) अपने नीचे लाने का हक और जुनून मेरा है....

बल्लभ - कल को अगर... राजा साहब को सच्चाई मालुम पड़ा तब... तब क्या करेगा...

रोणा - कुछ खुन्नस बहुत निजी होते हैं प्रधान... बहुत ही निजी... अब यह मेरी जिंदगी की मक़सद बन चुकी है... उस हराम खोर विश्वा के पास... मेरी कमजोरी है... मुझे उसकी कमजोरी पर हावी होना है... बस मुझे मेरी बारी की इंतजार है...

बल्लभ - मेरे सवाल का जवाब नहीं दिया तुने... अगर कल को राजा साहब को मालुम पड़ा... तब क्या करेगा तु...

रोणा - वह जब पता चलेगा... तब देखा जाएगा... उसने एक तरह से मेरा रेप किया है...

बल्लभ - रेप... कैसा रेप...

रोणा - याद है... रंगा... उसे मैंने ही छोटे राजा जी के पास लेकर गया था... उसे विश्वा के वज़ूद को उसके भीतर ही ख़तम करने के लिए भेजा गया था... यह बात और है... विश्वा उस पर भारी पड़ा... पर किन्नरों के आड़ विश्वा ने मेरे साथ वही किया... पर... (आवाज़ कांपने लगती है) मैं टूटा नहीं हूँ... मैं... उसकी माशुका को... अपनी रखैल बनाऊँगा... (आवाज़ में कड़क पन) पहले उसकी इज़्ज़त को फाड़ुंगा.. फिर उसकी जिस्म की चिथड़े चिथड़े कर दूँगा.... वह भी (चिल्लाते हुए) उस हरामजादे के आँखों के सामने... (हांफने लगता है)

बल्लभ - मानना पड़ेगा... साला खुब छका रहा है तुझे... नचा भी रहा है...

रोणा - गलत बोल रहा है प्रधान... गलत बोल रहा है... बेशक वह मुझे नचाया है... पर सच्चाई यही है... वह हम सबको छका रहा है... हम में से कोई भी उसे पार नहीं पा सका है...

बल्लभ - तु अपनी हार... हमारे मत्थै क्यूँ मढ रहा है...

रोणा - हा हा हा हा (हँसने लगता है) उसके साथ उलझ उलझ कर... मुझे इतना मालुम हो गया है... जहां हमारी सोच की हद ख़तम होती है.... (गंभीर हो कर) वहीँ से उसकी सोच शुरु होती है... तभी तो... वह आसानी से... हमें अपनी सोच की ज़द में ले लेता है... हम सिर्फ दो आँखों से नजर रखने की कोशिश करते हैं... पर विश्वा हज़ार आँखों से हम पर नजर रखता है... वकील बाबु... आज जो भी हुआ है... या हो रहा है... मैं दावे के साथ कह सकता हूँ... विश्वा के नॉलेज में है...

बल्लभ - ओ हो... विश्वा ने तेरी इस कदर ली है... की उसके लिए तारीफ ही निकल रही है...

रोणा - हाँ वकील बाबु हाँ... तुझे एक किस्सा सुनाता हूँ... पंचायत सभा से पहले... उसने मुझसे कहा था... की मैं पंचायत ना जाऊँ...

बल्लभ - तो क्या तुने इसलिए तहसील में वारंट का बहाना बनाया...

रोणा - नहीं... मैं यह कहना चाहता हूँ... जरा टाइमिंग को देख... यह कोई इत्तेफाक नहीं है... सोची समझी वैल प्लान्ड हरकत है... के देवगड में मेरे पुराने केस की वारंट निकाल कर... राजगड़ तहसील को ट्रांसफर करवाया....

बल्लभ - (हैरानी के साथ) क्या... यह तु कैसे कह सकता है...

रोणा - कह सकता हूँ... उसने वह ऑर्डर भिजवा के मुझे यह एहसास दिलाया कि मैं उसके हर चाल के आगे बेबस हूँ... और मज़बूर हूँ...

बल्लभ - तु है ही... मूढमति... इसलिये तुझ पर वह हावी हो गया... मैं वकील हूँ... हर काम दिमाग से लेता हूँ... मैंने अभी अभी एक केस हाथ में लिया है... उसके मेंटर को झटका देने... देखना (चुटकी बजाते हुए) वह मेरी दिमाग की शतरंज की चाल से कैसे बिल बिला जाएगा...

रोणा - हा हा हा हा... (हँसते हुए) कोई ना... बहुत जल्द तुझे यह एहसास हो जाएगा... तु विश्वा को लपेटे में लेने के लिए जो जाल बिछाया है... खुद को उसी जाल में फंसा हुआ पाएगा...

बल्लभ - तुझे उससे खुन्नस है... या डर... तु ऐसे क्यूँ सोच रहा है...

रोणा - मैं सोच नहीं रहा हूँ... अपनी बारी का इंतजार कर रहा हूँ... हर कुत्ते का दिन आता है... मेरा भी दिन आएगा... तु देखना... मेरा भी दिन आएगा...


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क्या भाई जबसे यह काग़ज़ के बंडल आए हैं... उसी दिन से तुम दिन दुनिया भूल कर उन्हीं काग़ज़ों में खोए हुए हो....

यह टीलु कह रहा था विश्व से, विश्व बड़ी शिद्दत से आरटीआई के जरिए मिले उन दस्तावेजों को पढ़ रहा था l टीलु की बात सुन कर विश्व उसकी ओर देखता है l

टीलु - भाई तुम यहाँ ईन काग़ज़ों में खोए हुए हो... और उधर बच्चे तुमसे मिलने आ रहे हैं... और तुमसे मिले वगैर चले भी जाते हैं...

विश्व - क्यूँ ऐसा क्यूँ... उनके लिए तो हमने लाइब्रेरी बनाए हैं...

टीलु - हाँ बनाए हैं... पर बच्चे किताबों से ज्यादा तुम्हें ढूंढते हैं...

विश्व - मुझे ढूंढते हैं... तो तुम किस मर्ज की दवा हो... तुम उनके साथ खेलो..

टीलु - कह तो तुम सही कह रहे हो... पर... इस बात का ज़वाब तुम उन से क्यूँ नहीं पूछते...

विश्व कुर्सी पर पीठ टीका कर टीलु को घूरने लगता है l टीलु विश्व का इस तरह घूरने को नजर अंदाज कर देता है l

विश्व - तुम जानते हो... यह कैसे कागजात हैं...

टीलु - हाँ... यह उसी केस के दस्तावेज हैं... जिसमें तुम फंसे हुए थे...

विश्व - हाँ... (एक बंडल दिखाते हुए) यह... कोर्ट में हुए सारी कारवाई की डिटेल है... और यह... (दूसरी बंडल दिखा कर) एसआईटी की... कोर्ट के ऑर्डर के बाद की तहकीकात की अधूरी रिपोर्ट है... मुझे इन दोनों के सार निकाल कर पीआईएल फाइल करनी है...

टीलु - देखो भाई... यह सब बड़ी बड़ी बातेँ तुम ही समझ सकते हो.... पर मैं उन बच्चों का क्या... जो अपने मामा से मिलने आने वाले हैं...

विश्व - अरे यार... तुम बच्चों को बहला भी नहीं पाते...

टीलु - नहीं... नहीं बहला पा रहा हूँ... क्यूँकी उनसे मामा भांजे का रिश्ता तुमने बनाया है... मैंने नहीं...

विश्व - ठीक है... मैं बच्चों से मिल लूँगा... पर तुम्हें उन सबको बहलाते रहना होगा....

टीलु - वह क्यूँ...

विश्व - मैं शायद एक दो दिन कटक निकलने वाला हूँ... पीआईएल फाइल करने...

टीलु - ह्म्म्म्म... मतलब सब सीधे खतरे को... घर में दावत देने जा रहे हो...

विश्व - हाँ... अब आमने सामने होने का वक़्त आ गया है...

तभी बाहर से कुछ आवाजें आने लगते हैं l विश्व और टीलु बाहर आते हैं l अरुण और उसकी टोली आई हुई थी l विश्व को देख कर सब खुश हो जाते हैं l

विश्व - हाँ तो बच्चों... यह शोर किसलिए...

अरुण - वह मामा... यह छुटकी है ना... (अपने बगल में खड़ी एक लड़की की ओर इशारा करते हुए) आपसे कुछ पूछना चाहती थी....

विश्व - अच्छा... तो यह है छुटकी... हाँ तो छुटकी क्या पूछना चाहती हो तुम मुझसे...

छुटकी - कुछ नहीं मामा... यह.. (अरुण के कंधे पर मुक्का मारते हुए) झूठ बोल रहा है... इसे ही आपसे पूछना है...

अरुण - चल झूठी..

छुटकी - तु झूठा...

अरुण - ऐ मुझे झूठा कहती है..

छुटकी - क्यूंकि तु झूठ बोलता है...

अरुण छुटकी की चोटी पकड़ लेता है l बदले में छुटकी भी अरुण के बाल पकड़ लेती है l इससे पहले कि वहाँ पर झपटा झपटी शुरु होता विश्व दोनों को छुड़ाता है l

विश्व - ऐ.. ऐ.. (अरुण के कान खिंचते हुए) तु पक्का शैतान है... बोल तुझे क्या पूछना है... (दुसरे बच्चे खुशी से उछल कर ताली मारते हुए कूदने लगते हैं)

अरुण - आह आ... बताता हूँ मामा... बताता हूँ... मेरे कान छोड़ो ना...

विश्व - (कान छोड़ देता है) हाँ अब बोलो...

अरुण - वह मामा... (अटक अटक कर शर्माते हुए) आप ना...

विश्व - हाँ मैं...

अरुण - हम सबको...

विश्व - हाँ तुम सबको...

अरुण -(जल्दी जल्दी) तलवार घुमाना सीखा दोगे...

विश्व - (चौंक कर) क्या...

सभी बच्चे मिलकर - हाँ हमें आप तलवार घुमाना सीखा दो...

विश्व - ऐ... तुम लोगों को कैसे मालुम हुआ यह सब...

छुटकी - यही अरुण ने हम सबको बटाया...

विश्व - (अरुण के गाल खिंच कर) तो यह सब नाटक क्या है... तुझे कैसे मालुम हुआ यह सब...

अरुण - आह... आ.. ह... मामा उस दिन मैं छुप कर पंचायत ऑफिस गया था.... आह...

विश्व - (अरुण के गाल छोड़ते हुए) पर वहाँ पर बच्चों का आना मना था...

अरुण - तभी तो छुप कर गया था... घर में माँ और बापू के बीच झगड़ा हुआ था... बापू पर भी कर्जा चढ़ा था ना.. इसलिए...

विश्व - तो तु तलवार सीख कर कर्जा उतारेगा...

अरुण - नहीं.. मैं तो बस तुम्हारी तरह तलवार पंखे की तेजी से घुमाऊँगा... जिसे देखकर शनिया दादा डर कर हमारे घर नहीं आएगा...

विश्व मुस्कराते हुए अरुण के गाल पर थपकी लगाता है और टीलु की ओर देखता है, टीलु भी हैरानी से अरुण की ओर देखता है

टीलु - क्यूँ रे छछूंदर... यह लाइब्रेरी है... भूल गया क्या...

अरुण - नहीं चमगादड़ मामा... नहीं भूला...

टीलु - अबे मुझे चमगादड़ बोलता है...

अरुण - तुमने क्यूँ मुझे छछूंदर बुलाया...

विश्व - बस... बस... बस... (बच्चों से) तो तुम लोगों को... तलवार नहीं... लट्ठ घुमाना सीखना चाहिए...

बच्चे - लट्ठ...

विश्व - हाँ...

अरुण - आप सीखाओगे...

विश्व - नहीं मैं नहीं... (टीलु को दिखाते हुए) यह... तुम्हारा यह मामा सिखाएगा...

अरुण - क्या... यह चमगादड़ मामा...

टीलु - अबे छछूंदर तेरी तो...

विश्व - ऐ... ऐ... (अरुण से) मैंने क्या कहा था इन्हें क्या बुलाने के लिए...

अरुण - (मुहँ फुला कर) बैटमैन मामा...

विश्व - गुड... हाँ तो चमगादड़... ओह मेरा मतलब है टीलु... तुम इन सब बच्चों को लट्ठ घुमाना सीखाओगे...

टीलु - (अपनी आँखे सिकुड़ कर विश्व को घूरने लगता है)

विश्व - अरे यार... गलती से मुहँ से निकल गया..

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रास्ते पर एक आदमी बदहवास हो कर भाग रहा है जैसे उसके पीछे उसका मौत पड़ा हो l वह भागते हुए अपना फोन निकाल कर कॉल करता है l

आदमी - है... हैलो...

@ - क्या हुआ इतना हांफ क्यूँ रहा है...

आदमी - मैं... मैं... अपनी मौत से पीछा छुड़ाने के लिए भाग... भाग रहा हूँ... मेरे पीछे वीर पड़ा है...

@ - तु कब उसे मिल गया...

आदमी - मिला नहीं... आज पार्टी ऑफिस में यूथ वर्कर रियूनियन हुआ था... वहाँ मैं... मैं... अपने दोस्त के लिए बाहर इंतजार कर रहा था... वीर ने मुझे देख लिया... अब... वह.. मेरे पीछे पड़ा है...

@ - तो भोषड़ी के... गाड़ी से नहीं भाग सकता था...

आदमी - मौका... मौका नहीं मिला...

@ - अच्छा बोल कहाँ है इस वक़्त... अपना लोकेशन बताओ...

वह आदमी भागते हुए पहले पीछे मुड़ कर देखता है, वीर किसी जुनूनी की तरह उसके पीछे भागते हुए आ रहा था, वह बिना देरी किए अपना लोकेशन बताता है l

@ - कोई ना... थोड़ी दूर पुलिस हेड क्वार्टर है... वहाँ पर... xxxx को मैं फोन कर देता हूँ... वह पहुँच कर तु अपना गिरफ्तारी दे देना...

वह आदमी फोन काट कर फिर से पीछे मुड़ कर देखता है l वीर बहुत तेजी से उसके तरफ बढ़ रहा था l आदमी अपनी पुरी ताकत लगा कर बिना पीछे मुड़े भागने लगता है l थोड़ी देर बाद उसे पुलिस हेड क्वार्टर दिखता है l वह "बचाओ बचाओ" "मुझे इस आदमी से बचाओ" चिल्लाते हुए हेड क्वार्टर के अंदर भागने लगता है l कुछ देर बाद पुलिस वाले उस आदमी को अपने घेरे में ले लेते हैं l वीर अंदर भागते हुए आता है, उसे कुछ पुलिस वाले रोकने की कोशिश करते हैं l पर वीर इस कदर जुनूनी हो गया था कि उन चंद पुलिस वालों की पिटाई कर उस आदमी तक पहुँचने की कोशिश करता है l बात जब चंद पुलिस वालों से नहीं बनती तो बड़ी तादात में पुलिस वाले वीर को कब्जे में लेने की कोशिश करते हैं l वीर को पंद्रह से बीस पुलिस वाले पकड़ लेते हैं l फिर भी वीर उन्हें अपने साथ खिंचते हुए उस आदमी की तरफ बढ़ने लगता है l वीर का यह उग्र रुप देख कर उस आदमी की पेशाब निकल जाता है l इतने में शोर शराबा सुन कर कमिश्नर बाहर आ जाता है l वीर का यह रुप और अपने पुलिस वालों की हालत देख कर कमिश्नर मोटे रस्सियों वाली जाल लाने के लिए कहता है l कुछ पुलिस वाले वही रस्सियाँ वाली जाल लाकर वीर पर डाल देते हैं और पुलिसीए लाठी से वीर के हाथ पैर जाल के अंदर बाँध देते हैं l वीर जाल के अंदर गुर्राता रहता है l वीर को जाल के अंदर छटपटाते देख कमिश्नर के पास खड़ा एक कांस्टेबल कहता है

- हे भगवान... यह जाल तो जंगली हाथी या जंगली शेरों को काबु में लाने के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा है... यह राजकुमार क्षेत्रपाल तो सच में उतना जंगली लग रहा है...

कमिश्नर उसे घूरने लगता है तो वह कांस्टेबल नजरें चुराते हुए दुबक कर अपना सिर झुका लेता है l कमिश्नर वीर के पास जाता है और

कमिश्नर - राजकुमार... होश में आइये... यह आप क्या कर रहे हैं...

वीर - मुझे वह हरामजादा चाहिए कमिश्नर... मैं अपने हाथों से उसे चिर दूँगा...

कमिश्नर - इनॉफ... माना कि स्टेट पालिटिक्स में... आप बहुत रुतबा रखते हैं... पर यह पुलिस हेड क्वार्टर है... आप शांत हो जाइए... प्लीज...

वीर फिर भी कमिश्नर को अनसुना कर उस जाल निकल ने के लिए अंदर छटपटाने लगता है l कमिश्नर उस आदमी के पास जाता है और पूछता है l

कमिश्नर - सच सच बताओ... राजकुमार क्यूँ तुम्हें मारना चाहता है... अगर सच नहीं बताया तो तुम्हें मजबूरन उनके हवाले कर दिया जाएगा...

आदमी - (डर के मारे गिड़गिड़ाते हुए) नहीं... नहीं कमिश्नर साहब नहीं... लगभग दो महीने पहले... राजकुमार एक लड़की के साथ... मेरिन बीच में घुम रहे थे... मैं और मेरे दोस्तों ने उस लड़की को छेड़ने की कोशिश की थी... यह कौन है जाने वगैर... आज xxxx पार्टी में अगली मीटिंग के लिए भीड़ जुटाने के लिए मुझे बुलाया गया था... वहीं पर राजकुमार जी ने मुझे देख लिया.... मैं तभी से जान बचाने के लिए यहाँ भाग कर आया हूँ... प्लीज कमिश्नर साहब मुझे बचा लीजिए... मैं मरना नहीं चाहता... प्लीज...

कमिश्नर एक थप्पड़ मारता है उस आदमी को l फिर वह घुम कर वीर के पास पहुँचता है l वीर अभी भी जाल से छूटने के लिए हाथ पैर चला रहा था l

कमिश्नर - राजकुमार जी... देखिए... यह मत समझिए की इसने जो किया है... उसका कबुल नामा को मद्देनजर रखते हुए हम इसे गिरफ्तार कर रहे हैं... इसकी जान को खतरा देख कर हम इसे हिरासत में ले रहे हैं... बेहतर होगा आप यहाँ से चुप चाप निकल जाइए... क्यूँकी... बाहर मीडिया वालों को हमने रोक रखा है... उन्हें अगर यह मसाला दार खबर मिल गई... तो उसमें और नमक मिर्च लगा कर आपकी और आपकी पार्टी की बदनाम करने से नहीं चुकेंगे... आप समझदारी से काम लें... इसे सजा बहुत थोड़ी होगी... जब यह छूटेगा... तब इसे आप देख लीजिएगा... मगर यहाँ आप और कोई सीन ना बनाए... वर्ना...

वीर - (गुर्राते हुए) वर्ना...

कमिश्नर - वर्ना हम कुछ नहीं करेंगे... मीडिया वालों को अंदर बुला लेंगे... आगे आप समझ दार हैं... किसे कैसे जवाब देंगे... (यह सुन कर वीर थोड़ा शांत होता है, कमिश्नर अपने स्टाफ से) इसे अंदर लेकर लकअप में डाल दो... और जल्द से जल्द कोर्ट फॉरवर्ड करने की तैयारी करो...

पुलिस वाले वैसा ही करते हैं, उस आदमी को जल्द ही अंदर ले जाते हैं l उसके बाद कमिश्नर इशारा करता है, पुलिस वाले वीर के उपर लाठियों से जो पकड़ बनाए थे वह हटाते हैं और उसके बाद उसके उपर से वह जाल हटाते हैं l

कमिश्नर - देखिए राजकुमार जी... आपके परिवार के प्रति हमारा पूरा सम्मान है... पर हम भी बंधे हुए हैं...

वीर - जी... मुझे माफ कर दीजिए...

कमिश्नर - अरे क्यूँ शर्मिंदा कर रहे हैं... माफी तो हम आपसे मांगते हैं... के हम इस वक़्त आपके कोई काम नहीं आए... (वीर कोई जवाब नहीं देता, मुड़ कर वापस जाने लगता है) राजकुमार जी... (वीर कमिश्नर के तरफ मुड़ता है) एक राय है... आप बुरा ना मानें तो... पिछले रास्ते से चले जाइए... वर्ना बाहर मीडिया वाले आपको घेर लेंगे....

वीर अपना सिर सहमति से हिलाते हुए एक पुलिस वाले के साथ पिछले रास्ते हो कर हेड क्वार्टर से बाहर आता है, हेड क्वार्टर के बाहर आते ही मायूसी के साथ गहरी सोच में डूब जाता है l खुद पर गुस्सा आ रहा था उसे l आज अगर वह आदमी हाथ में आ जाता तो इस खेल के पीछे कौन है उसे मालुम हो जाता l पर वह अपने आप को दिलासा देता है कि उसे किसी ना किसी तरह से छुड़वाएगा और अपने कब्जे में लेकर पर्दे के पीछे खेलने वाले खिलाड़ी के बारे में पता लगाएगा l वीर ऐसे ही सोच में खोया हुआ था कि उसका मोबाइल बज उठता है l वीर मोबाइल निकाल कर देखता है प्राइवेट नंबर लिखा आ रहा था l वीर की आँखे हैरानी के मारे फैल जाते हैं l वीर फोन उठाता है पर कुछ नहीं कहता

@ - क्या बात है वीर... कोई हैलो नहीं दुआ सलाम नहीं... मुझसे नाराज हो...

वीर - (चुप रहता है)

@ - हाँ बुरा तो लग रहा होगा... आखिर कुत्ते की मुहँ से हड्डी जो छिन ली मैंने...

वीर - (जिल्लत से अपनी आँखे मूँद लेता है और जबड़े भींच लेता है, दांत पिसते हुए) तुम्हारा किस्मत... कब तक साथ देगी

@ - अरे मेरी किस्मत मेरी आखिरी साँस तक देगी... पर तुम्हारी किस्मत... ना ना ना... वह कहावत भी झूठा हो जाएगा... हर कुत्ते का दिन आता है...

वीर - तु फोन पर ही बड़ी बड़ी फेंक सकता है.... कभी सामने तो मिल... मर्द होने की गलत फहमी दुर ना हो जाए... तो कहना....

@ - मिलेंगे वीर... मिलेंगे... पर तब... जब तु आखिरी साँसे गिन रहा होगा...

वीर - फिर भी वादा रहा... तुझे मारे वगैर इस दुनिया से जाऊँगा नहीं...

@ - ना ना वीर ना... तु कुछ नहीं कर पाएगा... बस ऐसे ही छटपटता रहेगा.... तु अनु की सोच... बहुत कम दिन बचे हैं बेचारी के...

वीर - खबरदार... वह निर्दोष है... मासूम है...

@ - नहीं है... उसकी सबसे बड़ी गुनाह यह है कि... उसने तुझ जैसे गलीज से मुहब्बत की है...

वीर - (चिल्लाते हुए) तु मुझे क्यूँ नहीं मार देता... (टूटते हुए) उस बेचारी ने तेरा क्या बिगाड़ा है...

@ - क्या बात है वीर... गिड़गिड़ा रहा है...

वीर - अबे चुप...

@ - हाँ... यह हुई ना बात... तुझे क्यूँ लग रहा है... उसकी मौत उसके लिए सजा होगी... उसकी मौत तो उसके लिए मुक्ति होगी... तुझ जैसे गलीज से...

वीर - बस बहुत हुआ... तुने मेरी सब्र का इम्तिहान ले लिया है... अब तु सुन... मुझे तेरे बारे में जानने की देरी होगी... कसम है मुझे मेरी अनु की... तुझे ऐसे खौफनाक मौत दूँगा के तु तो क्या तेरे फरिश्ते भी नहीं सोचे होंगे....

वीर फोन काट देता है और चलने लगता है आज की बात याद करते हुए खुद पर खीजने लगता है ऐसे ही कुछ देर तक
अपना मन मसोसने के बाद वह अपना फोन निकाल कर विक्रम को फोन लगाता है l फोन के उठते ही



विक्रम - हैलो वीर...

वीर - (टुटे और भर्राई आवाज में) भैया...

विक्रम - क्या बात है वीर... बहुत परेशान लग रहे हो...

वीर - हाँ भैया... थोड़ा अकेला महसूस कर रहा हूँ...

विक्रम - क्या हुआ...

वीर - कुछ नहीं... बस तुम्हें मिस कर रहा हूँ...

विक्रम - बस यार दो तीन दिन और... हम आ जाएंगे....

वीर - ठीक है भैया... मुझे इंतजार रहेगा...

विक्रम - अरे मेरा भाई शेर है... अकेला सब सम्भाल सकता है... फिक्र मत कर... मैं बहुत जल्द तेरे सामने होउँगा....

वीर फोन काट देता है l उसे महसुस होता है कि उसके आँखों के कोने भीगने लगे हैं l वह अपना हाथ उठा कर पोछता है, फिर मोबाइल से प्रताप को कॉल करता है l जैसे ही कॉल लिफ्ट होता है

वीर - हैलो...

विश्व - हैलो वीर.. सरप्राइज... कैसे हो यार...

वीर - अच्छा हूँ... और तुम...

विश्व - मैं भी ठीक हुँ... कहो कैसे याद किया...

वीर - यार... जिंदगी के कुछ पल ऐसे भी होते हैं... जब दोस्त की जरूरत बड़ी सिद्दत से महसुस होता है...

विश्व - ह्म्म्म्म... लगता है... किसी बड़ी उलझन में हो...

वीर - हाँ... हाँ यार... मुझे तुम्हारी एडवाइज की सख्त जरूरत है....

विश्व - हाँ बोलो क्या जानना चाहते हो...

वीर - नहीं यार... ऐसे नहीं... फीजिकली मिलते हैं... आमने सामने...

विश्व - ठीक है... हम परसों मिलते हैं...

वीर - ठीक है... मैं दो दिन किसी तरह से सम्भाल लूँगा... प्लीज यार... जल्दी आना...



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विक्रम अपने कमरे से निकल कर पिनाक के कमरे में आता है l देखता है पिनाक कमरे में बनी बार काउंटर पर बैठ कर फोन को कान पर लगाए बैठा है l विक्रम उसके पास आता है, पिनाक उसे देखता है और इशारे से बैठने के लिए कहता है l कुछ देर बाद अपनी जेब में रख देता है l

पिनाक - क्या बात है युवराज...

विक्रम - हम यहाँ अभी तक क्यूँ हैं... मुझे लगता है... हम बेकार में ही यहाँ रुके हुए हैं...

पिनाक - राजा साहब का कोई काम... बेकार नहीं होता....

विक्रम - राजा साहब के रुतबे के हिसाब से... हम तीनों यहाँ अपने लीगल पर्सनल्स को लेकर... एग्रीमेंट कर सकते थे... बेवजह हम अपनी एजेंसी के सीनियर ऑफिसियल्स को लेकर आए... ना कहीं उन्होंने डेमो दिया... ना ही कोई प्रेजेंटेशन...

पिनाक - तो... तुम कहना क्या चाहते हो...

विक्रम - (कुछ देर तक पिनाक को घूर कर देखता है फिर) मुझे लगता है.... बात कुछ और है...

पिनाक - अच्छा... तो बताओ तुम्हें क्या लगता है...

विक्रम - बात.... बात शायद... वीर से ताल्लुक रखती है...

पिनाक - वीर नहीं... राजकुमार... राजकुमार कहो... और यह क्या... तुम हम कहने के बजाय... बकरी की तरह मैं मैं क्यूँ कर रहे हो...

विक्रम - आप बात को घूमा रहे हैं...

पिनाक अपनी जबड़े भींच कर विक्रम की ओर देखता है, फिर शराब की ग्लास को उठा कर पी लेता है और दांत पिसते हुए विक्रम की ओर देखता है l

पिनाक - तुम सवाल सीधा करो... जवाब तुम्हें सीधा मिलेगा...

विक्रम - (एक गहरी साँस लेता है और पिनाक की आँखों में झांकते हुए) कुछ ऐसा होने वाला है... जिससे वीर और उसकी जिंदगी प्रभावित होने वाली है... वीर अकेला है... उसने कभी भी... सिक्युरिटी ऑपरेशन और मूवमेंट को डील नहीं किया है... खुदा ना खास्ता कुछ ऐसा हो... जिसके लिए उसे सिक्युरिटी सिस्टम से मदत लेनी हो... तो वह ले नहीं सकता... ऐसा अपाहिज कर दिया गया है उसे... है ना...

पिनाक - (एक कड़वी हँसी हँसते हुए, शराब की एक घूंट अपनी हलक में उतारता है, फिर) हाँ... है...

विक्रम - क्यूँ... छोटे राजा जी क्यूँ...

पिनाक - क्षेत्रपाल के चश्म ओ चराग के ऊपर... एक चुड़ैल का साया है... उसे उतारने के लिए यह सब किया गया है... (विक्रम को कोई प्रतिक्रिया नहीं देते देख पिनाक एक कुटिल मुस्कान मुस्कराता है) मतलब तुम पहले से ही उस चुड़ैल के बारे में अच्छी तरह से जानते हो...

विक्रम - वह लड़की बहुत अच्छी है... शायद शुभ्रा जी से भी ज्यादा...

पिनाक - तो तुम क्यूँ नहीं उस चुड़ैल से नाता जोड़ लेते...

विक्रम - (बिदक कर) आप होश में तो हैं...

पिनाक - (हाथ में ग्लास उठा कर) इतने से पैमाने में तो बस तबीयत ही झूम सकती है... होश फाख्ता हो जाए... कहाँ मैखाने में इतना मैसर है...

विक्रम - अगर बात यही थी... तो सीधे सीधे अनु को रास्ते से हटा सकते थे...

पिनाक - हाँ... वही तो कर रहे हैं... पर सीधे सीधे नहीं... खुद को टेढ़ा कर रहे हैं... पहले तुम... मुहब्बत कर बैठे... पर औकात और हैसियत देख कर... बीरजा किंकर सामंतराय की बेटी... xxx पार्टी की अध्यक्ष की बेटी... इसलिए तुम्हारा सौ खुन माफी हो गया... पर राजकुमार... एक छोटी जात की ओछी लड़की को... क्षेत्रपाल घराने के माथे पर सजाने की बेवकूफ़ी कर रहा है... इसलिये... राजकुमार को उसकी बेवकूफ़ी आजादी और क्षेत्रपाल के माथे से बदनामी से निजात के लिए... उस बदजात लड़की को गायब होना होगा...

विक्रम - इसका मतलब आपने किसीको काम सौंप रखा है...

पिनाक - हाँ कोई शक़...

विक्रम - आपको पहले... वीर से बात करनी चाहिए...

पिनाक - बात... हा हा हा हा... बात... (सीरियस हो जाता है) बात तो हो सकती थी... अगर वीर को मुहब्बत ना हो गया होता.... (अपनी जगह से उठ खड़े होकर) वीर बचपन से ही बहुत जिद्दी है... कभी किसीका सुना ही नहीं... हमेशा अपनी मन की किया है... इसलिए उसके जानकारी के वगैर... वह लड़की गायब हो जाएगी... हमेशा के लिए...

विक्रम - वीर आपका बेटा है छोटे राजा जी...

पिनाक - (थोड़े दर्द भरे लहजे में) बेटा है... तभी तो... हम उसे अपने तरीके से बचाना चाहते हैं...

विक्रम - क्या मतलब...

पिनाक - हम राजा साहब को नाराज नहीं कर सकते हैं... हमें राजा साहब ने इशारे से बता चुके हैं... के लोग क्षेत्रपाल के चराग पर गप्पे लड़ा रहे हैं... छिटाकसी कर रहे हैं...

विक्रम - तो आपने राजा साहब को समझाने की कोशिश क्यूँ नहीं की... अनु अगर बहु बन जाती है... तो हमें आगे चलकर पालिटिकल माइलेज मिल सकता है...

पिनाक - युवराज... बेशक तुम उनके औलाद हो.... पर उन्हें ठीक से जानते नहीं हो.... बात इज्ज़त और अहंकार पर आ जाए... तो ना तुम.. ना हम और ना ही बड़े राजा... वह किसीको भी माफ नहीं करेंगे....

विक्रम - यह सारी बातें ज़ज्बातें... गैरों के लिए या बाहर वालों के लिए होनी चाहिए... अपनों के लिए भी...

पिनाक - युवराज... तुम बचपन से बाहर रहे...

विक्रम - हाँ... पर जब मैंने शुभ्रा के साथ भुवनेश्वर में रहने की बात की... राजा साहब ने कोई विरोध नहीं किया...

पिनाक - वह इसलिए... कि राजा साहब को क्षेत्रपाल महल में... उस लड़की की मौजूदगी हरगिज बर्दास्त नहीं थी... वैसे भी... हमारा राजनीतिक भविष्य और प्रभाव के लिए तुम्हारा भुवनेश्वर में होना आवश्यक था... इसलिए तुम्हें मंजूरी मिल गई...

विक्रम - क्या अनु से वीर की शादी से... राजनीतिक भविष्य और प्रभाव... कम हो जाएगा...

पिनाक - (छटपटाते हुए) ओ ह... अब कैसे तुम्हें समझाउँ... तुम जानते भी हो... जब तुम राजगड़ में नहीं थे... तब राजगड़ में क्या क्या हुआ...

विक्रम - (चुप हो कर कुछ देर के लिए पिनाक को घूरने लगा, फिर) हाँ...

पिनाक - (हैरानी से आँखे फैल जाते हैं) क्या... क्या जानते हो...

विक्रम - कुछ सालों से रंग महल की रस्में बंद थी... क्यूँकी वहाँ से एक लड़की भाग गई थी... वैदेही... यही नाम है ना... जब वह मिली... उसके बाद रंग महल की रस्म फिर से शुरू हुआ... रंग महल में हमेशा... क्षेत्रपाल घराने... और क्षेत्रपाल गुरुर के दुश्मनों का श्मशान बना रहा... यहां तक कि... क्षेत्रपाल परिवार की मूँछ... रुप फाउंडेशन केस में नीची होते होते रह गई... फिर भी... दिलीप कर की बेटी रंग महल की रस्म की भेंट चढ़ गई... रुप फाउंडेशन की बेदी में बलि चढ़ने वाला कोई और नहीं... वैदेही की भाई विश्व प्रताप महापात्र है... यही ना...

पिनाक - वाह वाह वाह... बहुत खूब... कितना कुछ जानते हो... फिर भी बहुत कम जानते हो... राजा क्षेत्रपाल की औलाद हो... पर उनके बारे में कम ही जानते हो.... (पिनाक अब काउंटर पर जा कर बोतल से शराब एक ग्लास में डाल कर पीता है फिर विक्रम की ओर देख कर) राजा क्षेत्रपाल की इच्छा, अहंकार, और मूँछ की ताव के आगे... कोई भी रिश्ता... कोई मायने नहीं रखता.... (विक्रम की ओर पीठ कर) युवराज... तुम्हें क्या लगता है... रानी जी की मौत कैसे हुई थी....

विक्रम - ( पिनाक की ओर ऐसे देखता है जैसे उसके उपर बिजली गिरी हो, उसकी जुबान लड़खड़ाने लगती है) मेरी.. म माँ की मौत.... क्या म मतलब है आपका...

पिनाक - वैदेही को रंग महल लाने के तीन दिन बाद... जब राजा साहब महल लौटे... रानी जी उनसे बहुत झगड़ा किया... बदले में... राजा साहब ने... रानी जी को सभी नौकरों के आगे थप्पड़ मार कर बहुत जलील किया... वैदेही की हालत खराब हो गई थी... उसे हस्पताल में इलाज के लिए भेज दिया गया... उस रात जब राजा साहब लौटे... तो बहुत नशे में थे... हमने राजा साहब को उनके कमरे में पहुँचाया था... पर ज्यादा दुर नहीं जा सके... बाहर लॉबी में कुर्सी पर बैठ गए... तब राजा सहाब और रानी जी के बीच बातेँ हुईं ऊँची आवाज में... हम... खुद को संभालते हुए... दरवाजे तक पहुँचा... रानी जी खुद को छूने नहीं दे रही थीं... राजा साहब गुस्से में आकर रानी जी की पल्लू को ही... उनके गले में बांधकर... पंखे पर लटका दिया.... सबको लगा... रंग महल कांड से रानी जी आत्महत्या कर ली... हत्या करते वक़्त राजा साहब ने हमें देख लिया था... पर उन्हें किसी बात की कोई फिक्र नहीं थी... उनके आँखों में एक ग़ज़ब की भयानक चमक देखे थे... तब से लेकर आज तक.... हम कभी भी... उनके आँखों में झांकने की हिम्मत नहीं कर पाए... वह जैसा कहते गए... हम खुद को वैसे ही ढालते रहे.... उस हत्या का कोई और गवाह था ही नहीं... पर जो बात... राजा साहब तक नहीं जानते वह यह कि... उस हत्या कांड का... एक और गावह है... और वह कोई और नहीं... रुप थी... राजा जी... रानी जी की हत्या के बाद... कमरे से निकल गए... पर हम वहाँ स्तब्ध खड़े थे... तब हमने देखा... डरी सहमी कबोर्ड के अंदर रुप खड़ी थी... (पिनाक एक और ग्लास उठा कर पी लेता है) तुम राजा साहब को नहीं जानते... वह अपनी मूँछ के लिए... किसी भी हद तक जा सकते हैं...

पिनाक मूड कर देखता है, विक्रम स्तब्ध सा कुर्सी पर बैठा हुआ है l पिनाक ने राज खोल कर जो बिजली गिराई थी उससे विक्रम खुद को सम्भाल नहीं पा रहा था l पिनाक एक पेग बना कर विक्रम को देते हुए

पिनाक - यह पी लो.... यह तुम्हें झटके से उबार लेगा...

विक्रम झटके से पिनाक की हाथों से ग्लास ले कर शराब की घूंट गटक जाता है l फिर विक्रम हांफने लगता है l

पिनाक - अगर तुम्हें लगता है... की हम सब वीर की मदत रोकने आए हैं... तो यह सच है... पर राजा साहब अपने किसी और काम से भी आए हैं... (विक्रम नजर उठा कर पिनाक को देखता है) राजा साहब जिसको अपने जुते के बराबर रखे हुए थे... अगर वह अपनी औकात से उपर उठने की कोशिश कर रहा है... उसके पीछे की बैसाखी के बारे में पता करने यहाँ आए हैं...

विक्रम - मतलब....

पिनाक - विश्वा... वैदेही का भाई विश्व... राजा साहब... उसके मेंटर डैनी को ढूँढ कर मिलने आए हैं....

विक्रम - डैनी से.... वह एक माफिया... उससे राजा साहब को क्या मतलब है....

पिनाक - ओह ओ... तो तुम्हें डैनी के बारे में भी जानकारी है... खैर उन्हें क्या काम है... यह तो वही जाने.... पर तुम्हें मेरी इतनी सलाह है... तुम जिस काम के लिये आए हो... तुम सिर्फ उसी पर ध्यान दो... हम अपनी काम में ध्यान देंगे... राजा साहब... डैनी को ढूंढने आए हैं... उसे मिलने... परखने आए हैं... फिर वह क्या करेंगे... वही जानें
 
जी बिलकुल पूछेगा ही

यहीं से विक्रम में परिवर्तन भी आएगा

पर भैरव सिंह से छुटकारा अभी नहीं है उसका उसके लिए भी बहुत जल्द टर्निंग पॉइंट आने वाला है

हाँ अब तक वह एक कठपुतली वाली जीवन जी रहा था

विक्रम सिंह वाली जीवन तो जिया ही नहीं था

अब वह धीरे धीरे उसके जीवन में मोड़ आने वाला है जहां वह खुद को क्षेत्रपाल से अलग करेगा

ना इस बार विश्व पहले पहुँचेगा वीर के पास

अगले अपडेट में वीर यह रिवील करेगा

यह मुलाकात एक खास मुलाकात होगी

कारण और परिणाम आप सभी पाठकों को पसंद आएगा

ऐसा मेरा विचार है

हाँ एक अदालती दृश्य तो बाकी है

विश्व ना सिर्फ भैरव सिंह को कटघरे में खड़ा करेगा बल्कि मुजरिम साबित भी करेगा

अंत में SANJU ( V. R. ) भाई आपका बहुत बहुत शुक्रिया
 
हाँ भाई

यह बात तो वैदेही ने विश्व को भी बताई थी के क्यूँ एक राजकुमारी छोटी उम्र में विश्व के प्रति आसक्त हो गई थी

शायद अब ना दे

हाँ पिनाक आगे एक अलग तरह की भूमिका में आएगा

पर क्या होगा... देखते हैं

हाँ विश्व ही बहुत जल्दी वीर के पास पहुँचने वाला है

वीर और विश्व का मिलीत मिशन होगा

मत भूलिए डैनी एक माफिया डॉन है

इस मुलाकात के पीछे भैरव सिंह की क्या मंशा है

अगले अपडेट में मालुम हो सकता है

हा हा हा

क्या करें औरतें होती ही ऐसी हैं

शुक्रिया avsji भाई वैसे आपकी अपडेट की अभी भी प्रतीक्षा है
 
👉एक सौ इकत्तीसवां अपडेट

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रात को डिनर टेबल पर रुप, शुभ्रा और वीर तीनों अपना डिनर ले रहे थे l तीनों खामोशी के साथ खाना तो खा रहे थे पर वीर अपने में खोया हुआ था, गुमसुम था l शुभ्रा यह देख कर इशारे रुप की ध्यान अपने तरफ खिंचती है l रुप आँखों के इशारे से पूछती है "क्या है" l शुभ्रा फिर इशारे से वीर की ओर देखने को कहती है l वीर अपनी प्लेट पर चम्मच फ़ेर रहा था पर खाना नहीं खा रहा था l वह बेहद गंभीर हो कर कुछ सोचे जा रहा था l

रुप - भैया.... क्या हुआ...

वीर - (ध्यान टूटता है) हम्म... हाँ वह... मैं... क्या हुआ...

शुभ्रा - क्या बात है वीर... तुम बहुत चिंतित लग रहे हो... क्या ऑफिस या पार्टी में कुछ हुआ है...

वीर - नहीं... ऐसा कुछ भी नहीं... (मुस्कराने की कोशिश करता है) (फिर कुछ सेकेंड का पॉज लेकर) भाभी... मैं हमेशा एक खुश फहमी में था... जो मैं चाहूँ... जिसे मैं चाहूँ... हासिल कर सकता हूँ... अपने क्षेत्रपाल होने का बड़ा गुरूर था... पर अब.... अब मुझसे मेरी ख्वाहिश छिनने का डर सता रहा है... ऐसा लगता है... जैसे... जैसे....

शुभ्रा - रुक क्यूँ गए जैसे...

वीर - पता नहीं भाभी... मुझे ज़माने के हर ज़र्रे में साजिश नजर आ रहा है... जैसे मुझसे हर खुशियों को छीनने की...

रुप और शुभ्रा दोनों एक दुसरे को बड़ी हैरानी के साथ देखते हैं, फ़िर दिनों वीर की ओर देखते हैं l

शुभ्रा - क्या बात है वीर... ऐसा तुम कह रहे हो... तुम... तुम ऐसे नहीं टुट सकते... वीर क्या हुआ है... जरा खुलकर बताओ...

वीर - (एक टूटी हुई हँसी के साथ) भाभी... मेरी हर गलती पर कभी कोई सजा नहीं थी... पर अब... मैं अच्छा बनना चाहता हूँ तो मेरी अच्छाई पर सजा क्यूँ मिल रही है...

रुप - भैया प्लीज... तुम पहेलियाँ बुझा रहे हो...

वीर - नहीं मेरी बहन... मैं फलक से जमीन पर आ रहा हूँ...

शुभ्रा - वीर... आज तुम्हें क्या हो गया है....

वीर - भाभी... भैया और आपकी तरह मैं और मेरा प्यार... खुश किस्मत नहीं हैं.... आपके प्यार में... कोई बाधा नहीं आया... अपनी अंजाम तक पहुँच गया... पर लगता है... मेरी किस्मत में... वह मुकाम नहीं है...

यह सुन कर शुभ्रा और रुप दोनों को झटका सा लगता है l दोनों अपनी अपनी जगह से उठ कर वीर के पास आ जाते हैं l

शुभ्रा - क्या बात है वीर... आज कुछ हुआ है...

वीर - भाभी... आप जानती हो ना... मैंने तय किया है... अनु से शादी का... मेरे इस फैसले से... माँ और आप सबकी मंजुरी है... इसलिए मैंने सोचा... घर के बड़ों से सीधे मुहँ बात कर... उनको राजी कर... जल्द से जल्द अनु से शादी कर लूँ... पर... घर के बड़े... कलकत्ता में हैं...

रुप - तो क्या हुआ भैया... बड़े दो तीन दिन बाद... यहाँ भुवनेश्वर में होंगे ना...

वीर - तुझे क्या लगता है... मैं नहीं जानता या समझ रहा...

रुप - तो भैया... आपको अगर जल्दी है... आप कलकत्ता चले जाओ ना... राजा साहब से बात कर लो ना...

वीर - सोचा मैंने भी यही था.... पर....

शुभ्रा - पर क्या...

वीर कुछ नहीं कहता है l अपनी जगह से उठ कर अपनी कमरे की ओर चला जाता है l पीछे असमंजस स्थिति में शुभ्रा और रुप रह जाती हैं l

रुप - अच्छा भाभी... मैं भी अपने कमरे में जाति हूँ...

शुभ्रा - नंदिनी... कम से कम... तुम तो अपना खाना ख़तम कर लो...

रुप - नहीं भाभी... अब मुझसे भी खाया ना जाएगा... प्लीज...

इतना कह कर रुप भी वहाँ पर शुभ्रा को छोड़ कर अपनी कमरे में आ जाती है l आज वीर की व्यवहार से वह भी स्तब्ध थी l अपने बेड पर आकर पीठ टीका कर बैठ कर वीर के बारे में सोचने लगती है l फिर अचानक वह अपना फोन निकाल कर कॉल लिस्ट खंगालती है l 'बेवक़ूफ़' नाम देखते ही उसके होंठों पर एक दमकती मुस्कान आ जाती है l वह कॉल लगाती है, कॉल लिफ्ट होते ही

विश्व - हैलो...

रुप - क्या सो रहे हो...

विश्व - हाँ बड़ी गहरी नींद में हूँ... सपने में बात कर रहा हूँ...

रुप - सॉरी... ठीक है मैं फोन रखती हूँ...

विश्व - जैसी आपकी इच्छा...

रुप चिढ़ कर फोन नहीं काटती, कान से निकाल कर स्क्रीन को देखने लगती है, विश्व ने भी फोन नहीं काटा था l रुप अपने कानों से फोन को लगा कर सुनती है, इस बार रुप को 'धक धक' सुनाई देती है l रुप समझ जाती है विश्व ने फोन को अपने सीने से लगाया है या फिर दिल की धड़कन वाली किसी आवाज को माइक पर सुना रहा है जिसके वज़ह से उसे धड़कते धड़कनें सुनाई दे रही थी l

रुप - यह क्या है...

विश्व - क्या है...

रुप - तुम... तुम मुझे छेड़ रहे हो...

विश्व - कहाँ... आप हो वहाँ.. और मैं यहाँ... कैसे छेड़ सकता हूँ...

रुप - देखो... तुम मुझे... नहीं... मैं बात नहीं करती तुमसे...

विश्व - पर मैं तो सुनना चाहता हूँ ना...

रुप - ओह... छोड़ो ना...

विश्व - मैंने पकड़ा ही कहाँ है...

रुप - आह... देखो... मैं बहुत ही सीरियस हूँ... और मज़ाक के मुड़ में बिल्कुल नहीं हूँ...

विश्व - हाँ अब ठीक है... अब बोलिए... फोन किस लिए किया...

रुप - बताऊंगी... पहले यह बताओ... तुमने यह धक धक की आवाज़... फोन पर कैसे सुनाया..

विश्व - वेरी सींपल... आपकी फोन आने की खुशी में.... थोड़ा उछलकूद कर लिया... और स्टेथोस्कोप की हीअरिंग पॉइंट को मोबाइल माइक पर लगा दिया...

रुप - (हैरान हो कर) क्या...

विश्व - देखा... हूँ ना मैं बहुत स्मार्ट...

रुप - (बुदबुदाते हुए) बेवक़ूफ़...

विश्व - जी नकचढ़ी...

रुप - व्हाट... तुम्हें सुनाई दिया...

विश्व - हाँ... अब इसमें मैं क्या कर सकता हूँ... वकील हूँ... बातेँ समझ लेता हूँ...

रुप - (इस बात पर खिलखिला कर हँस देती है, फिर थोड़ी सीरियस हो कर) अनाम...

विश्व - हाँ बोलिए...

रुप - क्या वीर भैया ने तुम्हें फोन किया था...

विश्व - क्यूँ...

रुप - वह आज बड़े... टुटे बिखरे से... उखड़े उखड़े से लग रहे थे... आज रात का खाना भी नहीं खाया... क्या तुमसे इस बाबत कोई बात की...

विश्व - नहीं... पर... वीर मुझसे क्यूँ बात करेगा...

रुप - तुम दोस्त हो उनके... कोई जहनी या दिली परेशानी होगी तो तुमसे कहेंगे ना...

विश्व - क्या... वीर परेशान है...

रुप - हाँ... लगता है... वीर भैया... बहुत टेंशन में हैं...

विश्व - ह्म्म्म्म... तो वीर वाकई बहुत टेंशन में है... हाँ... वीर ने फोन किया था आज... पर बात क्या है कुछ बताया नहीं...

रुप - क्या... यु... यु...

विश्व - अरे बताया ना... फोन पर उसने कुछ भी नहीं कहा...

रुप - शायद इसलिए... के तुम उनकी मनकी समझ पाओ... बड़े वकील बने फिरते जो हो...

विश्व - यह ताना था..

रुप - कुछ भी समझ लो...

विश्व - वैसे... क्या वीर ने आपको कुछ बताया...

रुप - नहीं... पर लगता है... वीर भैया.. अपने और अनु भाभी के लिए... बहुत टेंशन में हैं... कुछ तो हुआ है... हमसे भी शेयर नहीं कर रहे हैं... मतलब वह अपने आप को अकेला महसुस कर रहे हैं...

विश्व - ओ... आज उसकी आवाज़ में... एक तड़प तो थी... क्या आपने वीर के लिए फोन किया है...

रुप - नहीं... नहीं... पर... वह.. हाँ... पता नहीं... तुम... तुम कब आ रहे हो...

विश्व - शायद परसों...

रुप - जल्दी आओ ना...

विश्व - अच्छा... आ जाऊँ...

रुप - ह्म्म्म्म...

विश्व - ठीक है...

रुप - सच... कब आ रहे हो...

विश्व - अपनी दिल से आवाज़ दीजिए... हम आपकी खिदमत में बंदा हाजिर हो जाएंगे....

तभी रुप की फोन पर कॉल अलर्ट की ट्यून बजने लगती है l रुप फोन कान से हटा कर स्क्रीन पर देखती है विक्रम भैया लिखा आ रहा था l रुप हैरान हो जाती है l इस वक़्त विक्रम का फोन वह भी उसे

रुप - अच्छा फोन रखती हूँ... विक्रम भैया का फोन आ रहा है...

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कुछ गाडियों का काफिला एक आलीशान बंगले के सामने रुकती है l गाडियों के रुकते ही गेट पर पहरा दे रहे एक गार्ड भागते हुए जाता है और बीच वाले गाड़ी का दरवाजा खोलता है l गाड़ी से भैरव सिंह उतरता है l कलकत्ता के इसी आलिशान बंगले में भैरव सिंह, पिनाक और विक्रम के साथ उसके कारिंदे भी रुके हुए हैं l गाड़ी से उतर कर भैरव सिंह सीधा बंगले के अंदर प्रवेश करता है l दरवाजे पर पहरेदारी में खड़े गार्ड्स उसे सलामी ठोकते हैं l अपने काफिले में आए सभी मुलाजिम और गार्ड्स को नजर अंदाज करके भैरव सिंह अंदर चला जाता है l अंदर सीधे शराब खाने में पहुँचता है l वहाँ पर पिनाक बैठ कर अपने लिए आखिरी जाम बना रहा था l भैरव सिंह के वहाँ पहुँचते ही पिनाक अपनी नजर घुमा कर देखता है l भैरव सिंह को देखते ही अदब से खड़े होकर

पिनाक - राजा साहब....

भैरव सिंह - क्या बात है छोटे राजा जी.... आप अभी तक.. मय खाने में...

पिनाक - वह... (नशे में हल्का सा बहकते हुए) अभी तक तो... युवराज हमारा साथ दे रहे थे... पता नहीं वह कब हमें यहाँ अकेला कर चले गए... शायद ज्यादा नशा उठा नहीं पाए... इसलिए सोने चले गए...

भैरव सिंह - ह्म्म्म्म.... और आप... आप क्यूँ जागे हुए हैं...

पिनाक - हम.... वह... हम... आपकी प्रतीक्षा कर रहे थे...

भैरव सिंह - क्यूँ....

पिनाक - वह... आपकी देर रात इस्तकबाल के लिए...

भैरव सिंह आगे बढ़ कर एक कुर्सी पर बैठ जाता है और अपनी शूट की गले का बटन खोलते हुए इशारे से पिनाक को अपने पास पड़े दुसरे कुर्सी पर बैठने के लिए कहता है l पिनाक संभलते हुए बैठ जाता है

भैरव सिंह - हम यहाँ किस काम के लिए आए थे... क्या आपको भान है...

पिनाक - जी...

भैरव सिंह - आप और युवराज को हम अपने साथ यहाँ क्यूँ लाए... आप को इसका भी भान होगा...

पिनाक - जी...

भैरव सिंह - अब बताइए... आप कहाँ तक पहुँचे...

पिनाक - क्या हम आपके लिए... एक पेग बनाएं...

भैरव सिंह उसे घूरते हुए देखता है, पिनाक उसके सामने थोड़ा अस्वाभाविक लगता है l भैरव सिंह अपना सिर हाँ में हिलाते हुए इशारे से ही पेग बनाने के लिए कहता है l पिनाक अपनी जगह से उठता है और भैरव सिंह के लिए पेग बना कर उसके हाथों में देता है l पेग पिनाक के हाथों से लेने के बाद

भैरव सिंह - हमने आपसे कुछ पुछा था... छोटे राजा जी...

पिनाक - (थोड़ा हिचकिचाते हुए) आज तो हो नहीं पाया... वह... हमें दो या तीन दिन... और चाहिए...

भैरव सिंह - दो दिन या तीन दिन...

पिनाक - दो... दो दिन...

भैरव सिंह - ठीक है... तो हम परसों यहाँ से निकलेंगे... आप निर्मल सामल से कह दीजिए... नर्सो... भुवनेश्वर में मंगनी की तैयारी करे..

पिनाक - इ.. इ.. इतनी जल्दी...

भैरव सिंह - क्यूँ क्या हुआ....

पिनाक - कु... कुछ नहीं... हम यह सोच रहे थे... दो दिन भीतर राजकुमार जी को... हम कैसे तैयार करें...

भैरव सिंह - कोई घटना... या दुर्घटना... हमें हमारी मंशा से दुर नहीं कर सकती.... राजकुमार को युवराज तैयार करेंगे...

पिनाक - (सिर झुका कर बैठ जाता है) जी...

भैरव सिंह - और कुछ...

पिनाक - कुछ नहीं... कुछ नहीं... वैसे आप किसी और खास काम के लिए गए थे..... (रुक जाता है)

भैरव सिंह - हाँ... वह हो नहीं पाया है... पर हो जाएगा.... हम ने यहाँ के होम मिनिस्टर... और कमिश्नर से मुलाकात की... अंडरवर्ल्ड के जो खबरी हैं... उनको कमिश्नर के जरिए ख़बर भिजवा दिया है... शायद कल तक हमारी मुलाकात.... उस डैनी से हो जानी चाहिए....

पिनाक - ओह... मतलब सिस्टम आपका और उस डॉन का मुलाकात करवाएगा...

भैरव सिंह - हाँ... हम जहां भी जाते हैं... वहां के सिस्टम ले काम निकलवाते हैं... क्यूँकी... यहाँ डैनी को इन्हीं की सिस्टम और सर्कार की सुरक्षा प्राप्त है...

पिनाक - (चुप रहता है)

भैरव सिंह - अब क्या हुआ...

पिनाक - नहीं... क्या... राजकुमार के लिए... हम थोड़ी लीवर्टी ले सकते हैं... युवराज कह रहे थे... अगले चुनाव में... हमें फायदा हो सकता है...

भैरव सिंह - नहीं... जात और औकात बराबर ना हो... तो भी कमर थोड़ी टेढ़ा किया जा सकता है... थोड़ा झुका जा सकता है... पर जो फर्श में ढूंढने से ना दिखे... उसके लिए क्षेत्रपाल कमर तो क्या घुटने भी नहीं मोड़ सकते...

पिनाक - हमे बस एक ही चिंता है... पता नहीं राजकुमार कैसे प्रतिक्रिया देंगे...

भैरव सिंह - जवान खून है... जोश से लवालव है... पर उन्हें पगड़ी और जुते में फर्क़ समझ में नहीं आ रहा है... ऐसे में उन्हें समझाओ... औरत बिस्तर होती है... मर्द उसका चादर... पर बीवी और रखैल में फर्क़ करना आनी चाहिए...

पिनाक - जी... जी राजा साहब...

भैरव सिंह - इसीलिए आपको हमने नर्सों मंगनी के लिए कहा...

पिनाक - जी हम निर्मल सामल को कह देंगे...

भैरव सिंह - ठीक है... (भैरव सिंह उठने को होता है)

पिनाक - वह एक गड़बड़ है...

भैरव सिंह - (बैठ जाता जाता है) कैसी गड़बड़...

पिनाक - वह... हमने... एक बात... आपको नहीं बताई... हम... वह आपसे क्या कहें... कैसे कहें... राजगड़ में क्या हुआ है...

भैरव सिंह - ह्म्म्म्म... हम सब जानते हैं...

पिनाक - (चौंकता है) क्या... आप जानते हैं...

भैरव सिंह - हाँ... वहाँ से भीमा का फोन आना... आपका फोन अटेंड करना... प्रधान को निर्मल सामल की केस के बहाने राजगड़ भेज ख़बर लेना... हम सब जानते हैं....

पिनाक - और इस बात का... आपके चेहरे पर जरा भी शिकन नहीं...

भैरव सिंह अपनी कुर्सी से उठ खड़ा होता है और बार काउंटर पर जाकर अपने लिए एक पेग बनाता है l पेग पी लेने के बाद मुस्कराते हुए पिनाक की ओर देखता है l

भैरव सिंह - छोटे राजा जी... हमारे कुछ लोग... जो राजगड़ और यशपुर में दहशत बन कर हमारे नाम का डंका बजा रहे थे... वही हरामजादे... भरी सभा में पीट गए... यही कहना चाहते थे ना आप... (हँसने लगता है) हा हा हा हा हा.... सदियों से कोई आवाज़ हमारे खिलाफ उठा नहीं था... इसलिए इन कमजर्फों को यह गुमान हो गया था... के राजा भैरव सिंह का दबदबा इन्हीं के हड्डियों के दम से है... उन हरामजादों की यह खुश फहमी दुर हो गई... हा हा हा हा....

पिनाक - राजा साहब... जो भी हो... पीटे हमारे आदमी हैं... इज़्ज़त हमारी दाव पर लगा है... बट्टा हमारी साख पर लगा है...

भैरव सिंह - नहीं छोटे राजा जी... भैरव सिंह क्षेत्रपाल की इज़्ज़त कोई गेंद नहीं... जो यूहीं कोई उछाल देगा.... विश्वा ने जो किया... वह बरसाती चींटियों की आसमान छूने जितना बराबर है... दो चार पल उड़ेंगे... फिर झड़ कर गिर जाएंगे...

पिनाक - राजा साहब... आपकी बातें आप ही जाने... पर सच्चाई यही है... की आदमी हमारे मार खाए हैं... हमारे लिए लड़ने वाले.... उनका इज़्ज़त भले दो कौड़ी की हो गई... नुकसान तो फिर भी हमारा हुआ है...

भैरव सिंह - (कुछ देर के लिए ख़ामोश हो जाता है, फिर) छोटे राजा जी... हुकूमत करने वाले... अपनी सल्तनत की हिफाजत के लिए... लाव लश्कर पालते हैं... जंग में हमेशा एक दस्ता आगे रखते हैं... और बेहतरीन दस्ता को ओढ़ में रखते हैं... उस लश्कर में... जो पहला दस्ता होता है... उसे हरावल कहते हैं... हरावल दस्ता हमेशा आगे की पंक्ति में रहता है... जो या तो सामने वाले की हरावल पंक्ति को तितर-बितर कर देता है... या फिर मार खा कर नेस्तनाबूद हो जाता है... दसियों सालों से जीतते आए यह हमारे हरावल... और हमला कर जीत की जश्न मनाने वाले... यह भुल गए हैं कि जंग का सबसे बेहतरीन दस्ता... सालार के पास रहता है... यह जो मार खा कर भागे हैं... वह राजा क्षेत्रपाल के लश्कर का हरावल थे... अभी तो हमारे बेहतरीन सिपहसलार बाकी हैं...

पिनाक - (मुहँ फाड़े भैरव को देख रहा था)

भैरव सिंह - आपको क्या लगता है... हम इन टटपुंजों के सहारे पुरे स्टेट में हुकूमत चला रहे हैं... छोटे राजा जी... भैरव सिंह सियासत और हुकूमत में हाथी के बराबर है... जिसने खाने के दांत अलग... दिखाने के दांत अलग हैं... इसलिए जिसको भी यह खुश फहमी पालना है... पाल लेने दीजिए... जंग अभी शुरु ही कहाँ हुआ है...

पिनाक - इसका मतलब यह हुआ कि.... विश्वा के खिलाफ अभी भी कुछ नहीं करेंगे...

भैरव सिंह - छोटे राजा जी... जिस दिन विश्वा हम पर लपका था.... उस दिन हम सीढियों के उस ऊंचाई पर थे... जितना विश्वा का कद होता है... उसका सिर हमारे जुते के बराबर आ रहा था... उसे यह एहसास दिला रहे थे... की उसकी हस्ती... उसकी हैसियत... हमारे जुतों के नोक बराबर है...

पिनाक - फिर भी... वह छलांग पर छलांगे मारे जा रहा है... आपके गिरेबां तक पहुँचने के लिए... प्रधान कह रहा था... विश्वा को आरटीआई से ज़वाब मिल गया है... जिसके आधार पर वह कभी भी... पीआईएल दाखिल कर... रुप फाउंडेशन केस को फिर से उछालेगा....

भैरव सिंह - तो उछालने दीजिये... लोग भूलने लगे हैं... राजा क्षेत्रपाल के बारे में... अब फिर से लोगों के जुबान पर चढ़ने का वक़्त आ गया है...

पिनाक - आप इतने शांत हैं... लगता है आपने इस विषय पर सोच रखा है... तो ठीक ही सोचा होगा...

भैरव सिंह उठ कर उस कमरे से जाने लगता है l दरवाजे के पास रुक जाता है और मुड़ कर पिनाक की ओर देखते हुए

भैरव सिंह - छोटे राजाजी... हम उम्मीद करें या यकीन... यह आप तय कर लीजिए... नर्सों... राजकुमार की मंगनी... निर्मल सामल से होगी या नहीं....

कह कर पिनाक को सोच में डूबा कर भैरव सिंह वहाँ से चला जाता है l पिनाक छटपटाते हुए अपना मोबाइल निकाल कर एक कॉल डायल करता है

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रुप जब तक विश्व की फोन काट कर विक्रम की कॉल लिफ्ट करती तब तक रुप की फोन पर विक्रम का कॉल कट जाता है और वह मिस कॉल हो जाता है l रुप बजाय विक्रम को कॉल बैक करती वह घड़ी देखती है रात के ग्यारह बजने को थे l रुप बहुत हैरान हो कर सोचने लगती है विक्रम ने उसे इस वक़्त क्यूँ फोन किया, ऐसा क्या काम पड़ गया के उसे फोन किया, उसकी भाभी शुभ्रा को क्यूँ नहीं l ऐसे ही सोच रही थी के उसका फोन फिर से झनझना उठा l स्क्रीन पर विक्रम भैया डिस्प्ले हो रहा था l रुप झट से कॉल लिफ्ट करती है

रुप - हैलो... भैया...

विक्रम - (एक मायूस भरी आवाज में) तुम्हारा फोन बिजी आ रहा था...

रुप - हाँ वह... एक्जाम पास आ रही है ना... इसलिए सिलेबस के ऊपर... दोस्तों से बात कर रही थी...

विक्रम - ह्म्म्म्म...

रुप - क्या हुआ भैया... आप इस वक़्त... मुझे... फोन...

विक्रम - (चुप रहता है)

रुप - भैया...

विक्रम - हाँ...

रुप - क्या... क्या हुआ भैया...

विक्रम - न.. नंदिनी...

रुप - हाँ...

विक्रम - ह.. ह्ह.. हमारी माँ.... (आवाज़ भर्रा जाती है) कैसे मरी थी...

रुप - (यह सुन कर स्तब्ध हो जाती है) भ भ भैया....

विक्रम - देखो तुम्हें मेरी कसम है... मुझे सब सच सच बताना... ह ह हमारी माँ की मौत... कैसे हुई... थी...

रुप को महसुस हो जाता है, जैसे विक्रम बहुत रोया है और अभी मुश्किल से अपनी रुलाई को रोक कर बात कर रहा है l यह महसुस होते ही रुप की आँखों में आँसू भरने लगते हैं, पर रुप अपनी रुलाई पर काबु नहीं पा पाती

रुप - भैया... आज आपको क्या हो गया है...

विक्रम - देख मेरी बहन... मैंने तुझे अपनी कसम दी है... वह रात तु कभी नहीं भूली होगी... (आवाज सख्त हो जाती है) क्यूंकि वह रात... भूलने वाली थी ही नहीं...

रुप - (सुबकते हुए) ह्ह.. हाँ भैया... वह रात... वह रात मैं... कैइसे.. भूल सकती थी...

विक्रम - हाँ मेरी बहन तूने भूली नहीं होगी... पर तुने मुझे बताया भी तो नहीं...

रुप - कैसे बताती भैया... कैसे बताती... मेरे पास मेरे भाई थे ही कहाँ... एक भाई मुझे मेरे इसी जनम दिन पर मिला... और दुसरा भाई जनम दिन के कुछ दिनों बाद मिले...

विक्रम - सॉरी गुड़िया सॉरी... मैं सच में... तेरा गुनाहगार हूँ... कास... कास के उस महल में.. मैं तेरा भाई बन कर रहा होता... सॉरी गुड़िया सॉरी...

रुप - (संभलने की कोशिश करते हुए) कोई नहीं भैया... अब तो मेरे पास... मेरे लिए जान देने वाले... जान लेने वाले एक नहीं... दो दो भाई हैं ना... (फिर थोड़ी सीरियस हो कर) पर भैया... यह बात इतने सालों बाद... आपको किसने... (चौंक कर) होंओ... कहीं.. कहीं छोटे राजा जी....

विक्रम - (अपनी रुलाई को रोकते हुए) ह्म्म्म्म....

रुप - (अब और भी सीरियस होकर) तो भैया... अब.... आ आप.. क्या करोगे...

विक्रम - पता नहीं.... पता नहीं बहना पता नहीं... मैं... मैं तो अब खुद से लड़ रहा हूँ... अब तक जिस शख्स में... अपने बाप को देख कर... पाप हो या पुण्य... उसके हर एक बात को पत्थर की लकीर समझ कर... करते जा रहा था... कल को उसके भीतर... मुझे अपनी माँ का कातिल दिखाई देगा... मैं... कैसे... आह यह दर्द.... पर.. पर तु बेचारी... यह दर्द... यह टीस... पंद्रह सालों से कैसे सह रही थी....

रुप - (रो पड़ती है) भैया...

विक्रम - तु वाकई... बहुत बहादुर है... मैं....

रुप - भैया प्लीज...

विक्रम - पर बहना... माँ से... एक शिकायत रहेगी.. माँ ने अपनी आखिरी समय में... मेरे साथ ठीक नहीं किया... बिल्कुल ठीक नहीं किया...

रुप - (खुद पर काबु पाते हुए) भैया... आप... माँ को दोष दे रहे हैं... क्यूँ भैया क्यूँ...

विक्रम - (सिसकते हुए) हाँ... बहना हाँ.. तु नहीं जानती... माँ ने उस रात... मुझे आखिरी बार दुलार ने आई थी... सुलाने आई थी... और दुलारती सुलाती मुझसे एक ऐसी वादा ले ली... के आज तलक मैं उस वादे की आग में जल रहा हूँ... झुलस रहा हूँ... और अब खाक होने वाला हूँ...

रुप - (संभल जाती है) आप माँ पर इल्ज़ाम लगा रहे हो भैया...

विक्रम - इल्ज़ाम... हाँ शायद... तु जानती भी है... उस रात माँ ने मुझसे कौनसा वादा लिया था...

रुप - हाँ... भैया हाँ... जानती हूँ...

विक्रम - (हैरान हो कर) क्या... तु.. तु जानती है... कैसे...

रुप - क्यूंकि जब माँ ने मुझे सुलाने के बाद तुम्हारे कमरे में गई थी... तब मैं सोई ही नहीं थी... इसलिए माँ के पीछे पीछे तुम्हारे कमरे तक चली गई थी... बाहर से तुम्हारा और माँ का दुलार देख व सुन रही थी....

विक्रम - और तुझे लगता है... माँ ने मुझसे जो कहा सब तुझे याद है....

रुप - हाँ भईया... क्यूँ के अभी अभी आप ही ने तो कहा... उस रात की बात मैं कैसे भूल सकती थी... माँ ने कहा था... राजा साहब के साथ तब तक बने रहो... के जब तक वह खुद से तुम्हें उनका साथ छोड़ने के लिए ना कह दें...

विक्रम - हाँ... यही कहा था... पर क्यूँ... क्यूँ क्यूँ... मैं क्यूँ उस जालिम शख्स के साथ देता रहा... बल्कि उसका हाथ बन कर उसे मजबूत करता रहा... क्यूँ... क्यूँ... क्यूँ... जानती हो... लोग कहते हैं... मैं राजा साहब का हाथ हूँ... कहीं ना कहीं... मुझे इस बात का गुमान था... पर आज यह गाली लग रहा है... ऐसा लग रहा है... जैसे मैंने अपने हाथों से अपनी माँ को मारा है...

रुप - आप... आप गलत हो भैया...

विक्रम - क्या... मैं गलत हूँ... हाँ गलत ही तो हूँ... इस राह पर... मेरी माँ ने जो मुझे भेजा नहीं है... चलाया है....

रुप - नहीं नहीं नहीं.. आप माँ की बातों को गलत समझा है...

विक्रम - क्या गलत समझा है...

रुप - माँ ने कहा था कि... वह पिता हैं... तुम साथ छोड़ दोगे तो... तुम धर्म से उनके दोषी हो जाओगे... ताकि जब वह साथ छोड़ने के लिए कह दें... तब धर्म का दोष तुम पर ना लगे.... इसलिए... माँ ने सिर्फ और सिर्फ. राजा साहब के साथ बने रहने के लिए कहा था... उनका साथ देने के लिए नहीं... तुम साथ देते रहोगे... तो राजा साहब तुम्हें अपना साथ छोड़ने के लिए क्यूँ कहेंगे....

विक्रम रूप कि इस बात को सुन कर बहुत जोर से चौंकता है l उसकी आँखे फैल जाते हैं l उसे इतना जोर का झटका लगा था कि उसके मुहँ से कोई बोल नहीं फुट पा रहा था l

रुप - भैया... क्या हुआ...

विक्रम - हाँ... मैं... वह... (फिर चुप हो जाता है)

रुप - भैया...

विक्रम - बस बहना बस... अपनी नासमझी की पट्टी को आँखों में बाँध कर... माँ की आखिरी ख्वाहिश समझ कर... मैं जिंदगी भर अंधेरे में भटक रहा था... तेरा शुक्रिया मेरी बहन... तुने उजाला की राह दिखाई है...

रुप - भैया...

विक्रम - हाँ बहना हाँ... मैं अब निश्चित हूँ... माँ की आत्मा को मुक्ति न मिली होगी... वह तड़प रही होगी... मेरे जैसे ना लायक औलाद के वज़ह से... तु देखना गुड़िया... तु देखेगी... (लहजा कठोर हो जाता है) राजा भैरव सिंह क्षेत्रपाल... मुझे अपनी जिंदगी से... एकदिन जरुर निकाल फेंकेगा....

रुप - भैया...

विक्रम - हाँ बहन... हाँ... अब आज मुझे सुकून की नींद आएगी... मुझे मेरी माँ को याद करते हुए... उसके गोद को तरसते हुए मुझे सोना है... कल का सुबह... विक्रम सिंह के लिए... एक अलग सुबह आएगी...

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गहरी नींद में भैरव सिंह सोया हुआ था l उसके कानों में अलार्म की आवाज सुनाई देती है l वह नींद में ही चिढ़ कर करवट बदल कर तकिया अपने कानों पर रख देता है l थोड़ी देर बाद अलार्म बंद हो जाता है l वह फिर से करवट बदल कर पीठ के बल सीधा होकर सोने लगता है l फिर थोड़ी देर बाद अलार्म बजने लगता है l इसबार भैरव सिंह की आँख खुल जाती है l वह बेड पर उठ बैठता है l अलार्म बंद हो जाता है l दीवार की ओर देखता है इलेक्ट्रॉनिक घड़ी पर सुबह के साढ़े चार बज रहे थे l वह हैरान होता है बेड के पास स्टूल पर से अपना मोबाइल निकालकर देखता है कोई अलार्म नहीं बजा था l वह सावधान हो जाता है, कमरे में अंधेरा था पर फिर भी अपना नजर घुमाता है l एक जगह उसकी नजर ठहर जाता है l एक साया सा अक्स सोफ़े पर बैठा हुआ महसुस हो रहा था l भैरव सिंह धीरे धीरे तकिये के नीचे अपना हाथ ले जाता है और झट से रिवाल्वर निकाल कर उस साये की ओर तान देता है l

भैरव सिंह - कौन है वहाँ...

साया - डर गए क्या... राजा भैरव सिंह...

भैरव सिंह - डर गए होते तो अब तक तु नहीं तेरी लाश से हम मुखातिब हो रहे होते... कौन है तु... और यहाँ की सेक्यूरिटी ब्रीच कर.. यहाँ कैसे आया...

साया - यह ना तो राजगड़ है... ना ही ओड़िशा... यह बंगाल है राजा भैरव सिंह... और मैं... पुरे नॉर्थ ईस्ट का राजा...

भैरव सिंह - ( रिवॉल्वर को उसी तरह ताने ) ओ... डैनी... डैनीयल फेडरीक पॉल... राजा चाहे कहीं का भी हो... शेर की गुफ़ा में आए हो वह भी इतनी लापरवाही बरत कर... चलो अपना हाथ उपर उठाओ...

डैनी अपने दोनों हाथ उठा कर वहीं बैठा रहता है l भैरव सिंह नाइट रॉब पहले हुए वैसे ही रिवाल्वर ताने हुए अपनी बेड से उतरता है और दीवार के पास जाकर स्विच दबाता है l पुरा कमरा रौशन हो जाता है l भैरव सिंह देखता है काले रंग के ओवर कोट, हेट और गॉगल पहले हुए डैनी के दोनों हाथों में ग्रेनेड थे जिनके ट्रिगर पिन के रिंग दोनों अंगूठे में फंसे हुए थे l यह देख कर भैरव सिंह की आँखे फैल जाती है l

भैरव सिंह - ओ... पुरी तैयारी के साथ आए हो...

डैनी - हाँ... यह मेरा स्टाइल है... जब भेड़िया की मांद में जाता हूँ... तो सबसे पहले उसके जबड़े बाँध देता हूँ... ताकि भेड़िया गुर्रा तो सके पर काट ना सके...

भैरव सिंह - अपनी यकीन पर इतना भी यकीन मत करो... के शेर की गुफा... तुम्हें भेड़िया की मांद लगे... शिकार होने में ज्यादा देर ना लगेगी...

डैनी - मैं वह शिकारी हूँ... जिसे जानवरों की हर नस्ल का इल्म है... इसीलिए तो... तुम्हारी मांद में... तुम्हारे जबड़े के सामने आ खड़ा हूँ... पर तुम गुर्राना तो दुर कुछ नहीं कर सकते....

भैरव सिंह अपना रिवॉल्वर अपनी नाइट रॉब के जेब में रख देता है और डैनी के सामने खड़ा हो जाता है l

डैनी - राजा साहब... आप बैठ तो जाओ... यह आपका ही कमरा है... और यह कुर्सी यह सोफा सब आप ही की है...

भैरव सिंह - (डैनी को घूरते हुए उसके सामने बैठ जाता है)

डैनी - (उसके सामने बैठते हुए) बुरा तो लग रहा होगा... आप ही के कमरे में... आप ही के कुर्सी में बैठने के लिए... मैं कह रहा हूँ...

भैरव सिंह - नहीं... तुम इससे ज्यादा मेरा कुछ कर नहीं सकते... यह हम जानते हैं...

डैनी - पिछले तीन चार दिनों से... अपने सारे सोर्सेज से... मुझसे मिलने के लिए ख़बर भिजवाए हो... वज़ह क्या है...

भैरव सिंह - खुद को राजा कह रहे हो... वज़ह मालुम होना चाहिए...

डैनी - विश्वा... यही ना...

भैरव सिंह - नहीं... डैनी... हमें फ़िलहाल तो डैनी से मतलब है... और... डैनी के बारे में जानना है...

डैनी - मुझसे... हा हा हा हा... (हँसने लगता है) सच बोलो राजा साहब... सच बोलो... अगर विश्वा ना होता... तो तुमको... डैनी से क्या मतलब होता... है ना...

भैरव सिंह - आधे गलत हो... हाँ तुम्हें जानने की वज़ह... विश्वा तो है... पर उसकी औकात उतनी है नहीं... कि वह राजा क्षेत्रपाल की माथे पर शिकन का बल पड़ जाए...

डैनी - ह्म्म्म्म... औकात... बहुत बड़ी चीज़ है... विश्वा अब वह शख्सियत रखता है... जो दूसरों को उनकी औकात दिखाता है....

भैरव सिंह - इतना यकीन है... अपने चेले पर... खैर उसे तो हम निपट लेंगे... फ़िलहाल हमें डैनी से मतलब है...

डैनी - राजा क्षेत्रपाल को डैनी पर इंट्रेस्ट... बात थोड़ी समझ के परे है...

भैरव सिंह - या तो तुम हमें ठीक से जाना नहीं... या फिर जान कर अनजान बन रहे हो....

डैनी - हाँ... अब लग रहा है... मैं अपने बराबर किसी राजा से बात कर रहा हूँ...

भैरव सिंह - हम... पैदाइशी राजा हैं.. जिनके सजदे... आवाम से लेकर सिस्टम तक करतीं हैं... तुम... एक वांटेड माफिया... जो सिस्टम के लूप होल्स के वज़ह से... किंग पिन बना बैठा है....

डैनी - हाँ... हूँ तो मैं किंग पिन... पर तुम कौन-से दुध के धुले हो राजा क्षेत्रपाल... सिस्टम में लूप होल्स ना होती... तुम भी मेरी तरह किंग पिन ही कहलाते... राजा क्षेत्रपाल नहीं... जैसे हम दोनों अभी बराबर लबादे में हैं... फर्क़ यही है कि... तुम सफेद रंग के नाइट गाउन में हो और मैं... काले रंग के ओवर कोट में हो....

भैरव सिंह - यह शान ओ शौकत... खानदानी है... इतिहास हमारे बारे में कहता है...

डैनी - डाकु भी तुम खानदानी हो... यह भी इतिहास में लिखा हुआ है...

भैरव सिंह के जबड़े सख्त हो जाते हैं l वह डैनी को घूर कर देखने लगता है l फिर एक गहरी साँस छोड़ते हुए कहना शुरू करता है l

भैरव सिंह - ठीक कहा तुमने... जैसी नाम और हैसियत है बंगाल में तुम्हारी... हम उससे भी बड़ी हैसियत और कद रखते हैं ओड़िशा में... इसलिए स्टेट का हर बच्चा बच्चा तक जानता है.. हमारे बारे में... इसलिए जो हमसे उलझने की गलती करता है... उसे खुद समाज कैंसर की तरह अपने से काट कर अलग कर देता है...

डैनी - ह्म्म्म्म... तो... तुम्हारे समाज को... डैनी से क्या काम पड़ गया...

भैरव सिंह - तुमने हमारी उसी समाज के कैंसर को... ना सिर्फ आगे पढ़ाया... बल्कि हमसे लड़ने के लिए खड़ा भी किया... यह जानते हुए... के वह... हमसे उलझने की गलती किया था.... क्यूँ...

डैनी - वह इसलिए... कि मैं... राजा क्षेत्रपाल की हुकूमत के दायरे में नहीं आता...

भैरव सिंह - ह्म्म्म्म... चलो कुछ देर के लिए... हम यह मान भी लें... फिर भी एक जगह पर... हमारी सोच... हमारी अनुभव हमें यह बताती है कि... तुम हमसे कुछ ना कुछ बैर रखते ही हो...

डैनी - वज़ह...

भैरव सिंह - एक साल पहले... कलकत्ता म्यूज़ियम में एंटीक चीजों का अकशन हुआ था... जिसमें फर्गुशन के तलवार की मूठ की एक स्पेशल अकशन हुआ था... तुम्हारे एक खास आदमी ने खरीदा था... जो बाद में... तुम्हारे पास पहुँचा था... (डैनी मुस्कराता है) एक ऐसी एंटीक पीस... जो कई दशकों से कभी नहीं बिकी... पर जब बिकी... तो... (भैरव सिंह और आगे कुछ नहीं कहता है)

डैनी - चुप क्यूँ हो गए राजा साहब... कहिये ना बिकी तो आखिर क्यूँ बिकी...

भैरव सिंह - उस तलवार की मूठ बेकार है... उसके ऊपर की कार्बन स्टील की तलवार के वगैर... (एक पॉज लेकर) क्यूँ खरीदा...

डैनी - राजा साहब... अभी आप ही ने तो कहा... एंटीक पीस...

भैरव सिंह - हाँ एंटीक पीस... उस एंटीक पीस के साथ एक मिथक भी मशहूर है... ऐसे में... उस बिना मूठ की तलवार को... क्षेत्रपाल परिवार का कोई दुश्मन ही खरीद सकता है...

डैनी - ह्म्म्म्म... (मुस्करा कर) तो यह बात है... की उस तलवार की मूठ का खरीदार... क्षेत्रपाल परिवार का दुश्मन हो सकता है... यह एक लाजिक है.... जिस लाजिक के आधर पर तुमको लगता है कि... मेरी तुमसे कोई पुरानी दुश्मनी हो सकती है...

भैरव सिंह अपना बायाँ भवां उठा कर डैनी को घूर कर देखने लगता है l मुस्कुराते हुए डैनी का चेहरा एक दम सीरियस हो जाता है l

डैनी - राजा भैरव सिंह क्षेत्रपाल... वक़्त की दरिया में... कुछ राज बहुत गहराई में दबे होते हैं... वक़्त आने पर... उसी दरिया का सीना चिर कर... वह राज फुट निकलते हैं.... यह उस वक़्त की बात है... जब तुम राजा साहब नहीं थे... तब युवराज हुआ करते थे... तुम ग्रैजुएट की डिग्री के लिए... कोलकात्ता यूनिवर्सिटी में जॉइन हुए थे.... तुमने अपनी रुतबे के हिसाब से... एक कोठी भाड़े पर ली थी... उस कोठी में तुम्हारे हर काम के लिए... नौकर चाकर सब थे... उन चाकरों में एक चाकर था जिसका नाम था नीमाई मंडल.... याद है... उसकी एक खूबसूरत सी बेटी थी... नाम था... सोमा मंडल.... याद है....

भैरव सिंह को झटका सा लगता है l उसे लगता है जैसे आसमान में सैकड़ों बिजलियाँ कौंधने लगी हैं और बादल गरजने लगे हैं l भैरव सिंह हैरानी से डैनी की ओर देखने लगता है l

डैनी - पढ़ाई के दिनों में... अपने रुतबे के दम पर... कॉलेज में बड़ा नाम किए... उस नाम और व्यक्तित्व से सोमा मंडल प्रभावित हुई थी... एक दिन तुम बीमार पड़े... तब वह बुढ़ा नीमाई और उसकी बेटी सोमा ने तुम्हारी बहुत सेवा की.... और तुमने भी उस सेवा का मेवा में उस मासूम भोली लड़की की भावनाओं को भड़का कर अपने नीचे लिटा कर खूब दिया.... इश्क और मुश्क शायद छुप जाए... पर हवस कैसे छुपे... वह लड़की की पेट में आकार लेती ही है... जब बात लोगों के बीच पहुँची... लोगों ने सवाल उठाए... लड़की बड़ी हिम्मत से दुनिया की सामना किया... क्यूंकि उस लड़की का विश्वास... गुरूर... अहंकार तुम थे... उसका जवाब ज़माने को तुम थे.... पर जब लोगों के सामने सबूत का वक़्त आया... तुमने क्या कहा... याद है.... तुमने कहा था... यह नीची छोटी ओछी जात की लोगों की साया भी पड़ जाए... तो तुम्हें स्नान करना पड़ता है... ऐसी छोटी और ओछी जात की लड़की को अपने साथ... अपने बिस्तर पर... नहीं.. कभी नहीं.... याद है.... तब उस लड़की का विश्वास... अभिमान सब टुट कर बिखर गया.... वह कुए में कुद कर अपनी जान दे दी.... उसके पीछे पीछे उस लड़की की मज़बूर बाप... उसने भी कुए में कूद कर आत्महत्या कर ली... याद है....

भैरव सिंह - (पसीना पसीना हो गया था) तुम.... यह... यह सब... क..कैसे जानते हो....

डैनी - उस नीमाई का एक बेटा भी था... और उस सोमा की... एक छोटा भाई भी था... जो उस वक़्त... उस मजबूर पिता और मासूम बहन के पास नहीं था.... मरने से पहले... सोमा ने... अपने भाई के नाम एक चिट्ठी में सब कुछ लिख कर... अपनी बेबसी बता चुकी थी...

भैरव सिंह - हाँ... याद आया... डिग्री लेते वक़्त... एक लड़के ने एक बार मुझ पर हमला किया था... दिनेश... दिनेश नाम था उसका... पर उसे तो मेरे आदमियों ने मार कर हावड़ा के नीचे फेंक दिया था...

डैनी - हाँ... जब उसने हमला किया था... तब तुमने अपनी वही बात दोहराई थी... दिनेश के छूने से... तुम अशुद्ध हो गए थे... शुद्धि स्नान के लिए... तुम वहाँ पर उस लड़के को... अपने लोगों के हवाले कर चले गए थे... उन्होंने उसे बहुत मारा... मार मार कर... उसे गंगा में फेंक दिया....

भैरव सिंह - ओ... तो तुम उस दिनेश का बदला ले रहे हो...

डैनी - नहीं... बदले के लिए... दिनेश मंडल... आगे चल कर... डैनी बन गया... पर वह यह बात हमेशा के लिए गांठ बाँध ली... भैरव सिंह को वह कभी छुएगा नहीं... हाथ नहीं लगाएगा... पर उसे सजा दिला कर ही रहेगा.... एक ऐसे आदमी से... जिसे वह अपनी पैरों की जुती समझता होगा... देखो विधि का विधान... वक़्त ने मुझे विश्वा से मिलवाया.... मैंने पहली ही नजर में उसके अंदर की आग को पहचान लिया था...

भैरव सिंह - तो दिनेश से डैनी बने... कहानी क्या बनाए... पुलिस वाले की बेटा... और विश्वा को सिखाने के लिए... उसकी उपकार लेने का ड्रामा किया लोगों को यह जताया कि... आंध्र प्रदेश से आए गुंडों से बचाने के कारण... तुमने उसे मदत की....

डैनी - हाँ... कुछ बातों को छुपाने के लिए... कहानियाँ बनानी पड़ती हैं... जैसे... बीते दिनों के ग़द्दार डाकू... आज के राजा बने बैठे हैं....

भैरव सिंह - ह्म्म्म्म... हमें लगा... हमारे खिलाफ स्टेट में कोई नहीं जाता.... पर तुम एकसेपशनल निकले.... इसलिए थोड़ी इनक्वायरी की... तब पता चला... फर्गुशन की तलवार की मूठ तुम्हारे आदमी ने खरीदी है... तब तुम पर शक हुआ... अब मालुम हुआ मामला निजी है....

डैनी - हाँ... बहुत निजी है... मैंने कसम खाई थी... तुम्हें हाथ नहीं लगाऊंगा.... पर तुम्हें ख़तम भी करूँगा... विश्वा और मेरी कहानी में ज्यादा फर्क़ नहीं है... पर विश्वा के अंदर जो आग है... उसके लपेटे में तुम ख़ाक हो जाओगे....

भैरव सिंह - हा हा हा हा हा... (हँसने लगता है) विश्वा... उसे हमने उसकी औकात दिखा दी थी... उसकी हस्ती कितना बौना है... उसे हमने अपना विश्वरुप दिखाया था....

डैनी - उसी विश्वा की... ट्रांसफर्मेशन देख कर... उसके गुरु की इनक्वायरी करते हुए कलकत्ता पहुँच गए...

भैरव सिंह - चींटी काट सकता है... शिकार नहीं कर सकता...

डैनी - अगर मारना होता तो यकीन करो... अब तक तुम्हें मार चुका होता... तुम जिंदा हो... तो उसके लिए... कभी सेनापति दंपती के पैर धो कर पानी पी लेना...

भैरव सिंह - क्या बकते हो...

डैनी - सही कह रहा हूँ... विश्वा की काबिलियत क्या है सुनो बताता हूँ... तुम्हारे पुराने दोस्त के बेटे को... जैल के अंदर लाकर... उसे मौत दे दी... ऐसी मौत के पुलिस और पोस्ट मोर्टेम करने वाले डॉक्टर तक को लगा वह मौत हाइपर बीपी और ड्रग्स ओवर डोज के वज़ह से हुआ था...

भैरव सिंह - (आँखे हैरानी से बड़ी हो जाती हैं) यश... यश वर्धन चेट्टी...

डैनी - हाँ... जरा सोचो राजा जी... एक मामुली सा मुजरिम... यश जैसी शख्सियत को जैल के अंदर ले आया... और उसे मौत की घाट भी उतार दिया... तो सोचो वह तुम्हारे साथ क्या कर सकता था....

भैरव सिंह - (हलक से थूक गटकता है)

डैनी - तुम अगर जिंदा हो... तो उसके लिए... कभी फुर्सत निकाल कर एडवोकेट प्रतिभा सेनापति की पैर धो कर पानी पी लेना... क्यूँकी उन्होंने ही विश्वा से वचन ली थी... के तुम्हें विश्वा कानूनन सजा देगा....

भैरव सिंह - और तुम इसमें विश्वा की मदत करोगे....

डैनी - वह विश्वा है... राजा क्षेत्रपाल... उसे मेरी मदत की कोई जरूरत नहीं है... वैसे भी... अभी में इस कुरुक्षेत्र में... बेलाल सेन की भूमिका में हूँ... तुम्हें या तुम्हारी सल्तनत को छूउंगा भी नहीं.... पर तुम्हारी हुकूमत का दायरा जितना सिकुड़ता जाएगा... मैं उतना ही फैलता जाऊँगा.... क्यूँकी तुम्हारे खिलाफ मैंने एक अमोघ हथियार चला दिया है... जिसकी काट... ना तुम्हारे पास है... ना ही तुम्हारे सिस्टम के पास है...

भैरव सिंह - यह खुश फहमी तुम्हारी जल्द दूर कर देंगे.... विश्वा कुरेदना शुरु किया है... पर वादा करते हैं... काटने की नौबत नहीं आएगी... उससे पहले वह अंजाम तक पहुँच जाएगा...

डैनी - थोड़ी देर बाद सुबह होने वाली है राजा साहब... जागो... और समझो... विश्वा तुम्हें नींद से ना सिर्फ जगाएगा... बल्कि तुम्हें तुम्हारी असली औकात भी दिखाएगा...

भैरव सिंह - वह तो जब दिखाएगा तब देखा जाएगा... डैनी उससे पहले... तुम अपनी सोचो....

डैनी - जोश जोश में तुम यह भूल रहे हो... यह कलकत्ता है... यहाँ का राजा मैं हूँ...

तभी बिजली चली जाती है, भैरव सिंह अपनी नाइटरॉब की जेब से रिवाल्वर निकाल कर तान देता है l थोड़ी देर बाद जब बिजली आती है तो वहाँ पर कोई नहीं था l

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दरवाज़े पर दस्तक हो रही थी, और रुप को अपना नाम भी सुनाई सुनाई दे रही थी पर वह जाग नहीं पा रही थी l आँखों में नींद इस कदर ज़मी हुई थी के वह चाह कर भी उठ नहीं पा रही थी l जब दरवाजे पर दस्तक नहीं रुकती तो बड़ी मुश्किल से बेड से उठ कर दरवाजा खोलती है l सामने शुभ्रा खड़ी थी l शुभ्रा को रुप के आँखों के नीचे आँसू की सूखी धार स्पष्ट दिखती है l

शुभ्रा हैरान होती है पर कहती नहीं है अंदर आकर वह रुप की बेड पर बैठ जाती है l रुप उसके पीछे पीछे बेड तक पहुँचती है कि तभी उसकी नजर आईने में पड़ती है l उसे अपनी हालत का जायजा हो जाता है l वह तुरंत अपनी वॉशरुम में घुस जाती है और चेहरा अच्छी तरह से धो कर टावल से साफ करते हुए बेड रुम में आती है l शुभ्रा की नजर उसे जिस तरह से घूर रही थी रुप खुद को असहज महसूस करने लगती है l पर कोई किसीसे कुछ भी नहीं कह रहे थे l अंत में असहजता के साथ रुप कमरे में खामोशी तोड़ते हुए शुभ्रा से सवाल करती है l

रुप - आप कबसे दरवाजा दस्तक दे रहीं थीं...

शुभ्रा - नाश्ते का वक़्त हो गया है.... टेबल पर कब तक इंतजार करती... और शायद पहली बार... तुमने अपना मोबाइल स्विच ऑफ कर रखा था... तुम भाई बहनों को क्या हो गया है आज...

रुप - भाई बहन मतलब...

शुभ्रा - वीर नाश्ता किए वगैर आज घर से निकल गए हैं... उनके जीवन में क्या चल रहा है... कुछ बता नहीं रहे हैं... खुद में घुट रहे हैं... कल रात का खाना तुमने खाया नहीं... भूखे पेट सो गई... पर यह क्या... तुम रात भर रोई हो... क्यूँ नंदिनी...

रुप - मैं कहाँ रोई थी भाभी...

शुभ्रा - बताना नहीं चाहती तो मत बताओ... पर झूठ तो मत बोलो...

कह कर शुभ्रा वहाँ से उठ कर जाने लगती है l रुप को ग्लानि महसूस होती है तो वह शुभ्रा को आवाज दे कर रोकती है l

रुप - भाभी प्लीज...

शुभ्रा - (बिना रुप की ओर देख कर रुक जाती है)

रुप - भाभी... कल रात विक्रम भैया से बात हुई थी... एक ऐसी बात... जो बचपन से मैं भुलाने की कोशिश कर रही थी... पर विक्रम भैया के वज़ह से... वह व्याक्या... मेरे यादों को रात भर तार तार कर रही थी...

शुभ्रा हैरानी के साथ रुप की ओर मुड़ती है l रुप उसे अपने बेड पर बिठा कर विक्रम से हुई सारी बातेँ बताती है l सारी बातें सुन कर शुभ्रा चेहरा हैरानी और डर के मारे सफेद हो जाती है l

रुप - भाभी... (झिंझोड कर) भाभी...

शुभ्रा - (चौंक कर) हाँ...

रुप - बीते कल की गुजरी हादसा है... तुम उसे लेकर परेशान क्यूँ हो...

शुभ्रा - बेशक बीते कल की गुजरी हादसा है... पर आज के बाद विक्की की आने वाले कल प्रभावित होने जा रही है...

रुप - मैं भी यही सोच रही थी भाभी... अब ऐसा लग रहा है... जैसे सब हर रिश्तों के बीच बवंडर आने वाला है... क्षेत्रपाल अब तितर-बितर होने वाले हैं... और हर रिश्ते की अपनी अपनी वज़ह है... कल रात तुम पर जो गुजरी है... शायद विक्की पर भी वही गुजरी है...

रुप - हाँ भाभी... क्षेत्रपाल महल की आन... और क्षेत्रपाल की मूँछ की शान में... पता नहीं क्या क्या क़ुरबान होने वाली है...

शुभ्रा - (अचानक कुछ याद करते हुए) अरे मैं तो भूल गई... चलो जाओ तुम जल्दी से तैयार हो जाओ...

रुप - नहीं भाभी... आज कॉलेज जाने का मुड़ नहीं है...

शुभ्रा - ठीक है... जाना ना जाना तुम्हारी मर्जी... पहले तैयार हो कर नीचे तो आओ... भाश्वती आने वाली है...

रुप - क्या... भाश्वती... पर क्यूँ...

शुभ्रा - तुम रात से फोन बंद कर सो गई थी... भाश्वती कह रही थी... तुम दोनों में चैलेंज था... कौन जल्दी उठ कर किसे कॉल करते हो... हमेशा तुम जीतती थी... आज उसने तुम्हें कॉल बैक किया तो... तुम्हारा मोबाइल स्विच ऑफ था...

रुप यह सुनते ही अपनी जीभ बाहर निकाल कर अपनी सिर पर हाथ दे मारती है l वह समझ जाती है, आज पहली बार उसने विश्व को सुबह फोन नहीं की थी l यह बात ज़रूर विश्व ने भाश्वती से कहा होगा l अब भाश्वती हर बात पर छेड़ना शुरु कर देगी l वह जल्दी से बाथरुम में घुस जाती है l उधर रुप की हालत देख कर थोड़ी देर के लिए शुभ्रा मुस्करा देती है पर रुप के बाथरुम जाने के बाद उसके चेहरे पर चिंताएं छाने लगती हैं l वह रुप की कहे बातों को याद करते हुए नीचे आती है l नीचे अपनी मोबाइल से वह विक्रम को फ़ोन लगाती है l विक्रम की फोन स्विच ऑफ आ रहा था l वह मोबाइल हाथ में लेकर गहरी चिंता में खो जाती है l कुछ देर बाद नौकर आकर ख़बर देता है कि राजकुमारी जी की कोई दोस्त आई हुई हैं l शुभ्रा उसे अंदर भेजने के लिए कहती है l कुछ देर बाद भाश्वती अंदर आती है l

भाश्वती - नमस्ते भाभी...

शुभ्रा - आओ भाश्वती... तो बहुत दिनों बाद... पर भाभी के लिए नहीं... अपनी दोस्त नंदिनी के लिए...

भाश्वती - नहीं... ऐसी बात नहीं है भाभी... वह...

शुभ्रा - हाँ हाँ... समझती हूँ... इस घर में पहली बार... घर के सदस्यों के बाद... तुम लोग थे जो आए थे... पर फिर ऐसे गायब हुए कि... आज नजर आए हो... (एक गहरी साँस छोड़ते हुए) पर इसमें तुम लोगों क्या दोष... इस घर का नाम ही द हैल है... और हैल में कौन आता है...

भाश्वती कुछ नहीं कहती बस मुस्कराने की कोशिश करती है l इतने में रुप तैयार हो कर नीचे आ जाती है l वह भाश्वती की हाथ पकड़ कर खिंचते हुए बाहर ले जाती है l पीछे शुभ्रा एक दो बार रुप को आवाज देती है मगर रुप शुभ्रा को अनसुना कर बाहर चली जाती है l बाहर भाश्वती की गाड़ी में दोनों जाकर बैठ जाते हैं l गाड़ी के अंदर

रुप - तुने भाभी को कुछ कहा तो नहीं...

भाश्वती - (एटीट्यूड के साथ, ड्राइविंग करते हुए ) तुने मुझे क्या चुगलखोर समझ रखा है... हुँह्ह्ह...

रुप - अरे मैंने ऐसा थोड़े ना कहा...

भाश्वती - पर तु तो कहती थी... भाभी तेरे और प्रताप भैया के बारे में जानती हैं...

रुप - हाँ... पर सारी बातेँ तुझे भी कहाँ पता है... जैसे तेरे प्रताप भैया ने मेरी चुगली कर बता दिया... हर सुबह उस बेवक़ूफ़ को मैं फोन कर जगाती हूँ...

भाश्वती - ऐ खबरदार... मेरे भैया को बेवक़ूफ़ कहा तो... जितने हैंडसम हैं... उतने ही स्मार्ट एंड इंटेलिजेंट हैं..

रुप - हाँ हाँ... ज्यादा उछल मत... हुँह्ह्ह... (मुहँ मोड़ लेती है)

भाश्वती - हुँह्ह्ह... (मुहँ मोड़ लेती है)

कुछ देर बाद एक पार्क के पास गाड़ी झटके मार रुक जाती है l गाड़ी के रुकते ही रुप एक टेढ़ी नजर से भाश्वती की ओर देखती है l

भाश्वती - ठीक है.. ठीक है... ऐसे घूर मत... प्रॉब्लम मैं जानती हूँ... दो मिनट में गाड़ी स्टार्ट हो जाएगी... तु... (रुप की सीट को पीछे की तरफ डाउन कर देती है) दो मिनट के लिए आराम कर... हुँह्ह्ह...

कह कर भाश्वती गाड़ी से उतर जाती है और बॉनेट खोल कर उठा देती है l रुप सीट पर आँखे मूँद कर लेटी रहती है l कुछ देर बाद बॉनेट गिरने की आवाज उसके कानों में पड़ती है और कार की डोर खुलती है ड्राइविंग सीट पर किसी के बैठने का एहसास होता है l गाड़ी स्टार्ट होती है और चलने लगती है l रुप कुछ अजीब सा लगता है, वह अपनी आँखे खोल कर देखती है भाश्वती की जगह कोई मर्द ड्राइविंग सीट पर बैठा हुआ है l वह सीट को उठाने की कोशिश करती है पर सीट ऐसी लॉक हो गई थी कि वह सीट ऊपर नहीं उठ पाती l रुप अपनी सीट बेल्ट निकालने की कोशिश करती है l पर सीट बेल्ट भी फंसी हुई थी, बेल्ट नहीं निकलती l वह छटपटाने लगती है पर सीट बेल्ट नहीं खुलती
 
जी बिलकुल

भैरव सिंह जितना कमीना है उतना ही अधिक शातिर भी है l उसके व्यक्तित्व के बहुत से आयाम है जिससे पिनाक अनभिज्ञ है

नए और पुराने चरित्र हैं उनकी भूमिका सीमित होगी

भैरव सिंह अपना जागीर या स्टेट ही नहीं घर के सदस्यों को भी अपने अनुरुप चलाना चाहता है इसलिये पिनाक को पूछने के बहाने चेतावनी दे दी

कम से कम भैरव सिंह के इस व्यक्तित्व से पिनाक अच्छी तरह से परिचित है

विक्रम अब इस प्रयास में रहेगा कि भैरव सिंह उसे घर से जीवन से निकल जाने के लिए कह दे

हाँ यह उसकी बदकिस्मती है

पहल dडैनी को छोड़ा था वह डॉन बन गया और दुसरी बार विश्व को छेड़ा वह उसका काल बन जाने वाला है

एक बढ़िया विश्लेषण के लिए धन्यवाद व तह दिल से आभार
 
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