Thriller "विश्वरूप" ( completed ) - Page 5 - SexBaba
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Thriller "विश्वरूप" ( completed )

शुक्रिया भाई पर मुझे उम्मीद कुछ ज्यादा ही थी

हमने श्री प्रदीप भौमिक की कहानी "कहीले लाज" की कहानी में थोड़ा अपना मसाला डाल कर नाटक किया था

असल में उनकी कहानी सिर्फ पच्चीस मिनट की थी l यह कहानी हमारे एच ओ डी को बेहद पसंद थी l उन्होंने मुझे दायित्व दिया था इसे एक घंटे का बनाने के लिए l इसलिए उस कहानी में अपना कुछ जोड़ने में व्यस्त रहा l जैसा कि मेरा ही निर्देशन में यह नाटक मंचन हुआ l

पर उम्मीद कुछ ज्यादा की थी पर जो मिला असंतुष्ट नहीं हूँ

फिर से धन्यवाद
 
👉एक सौ चौंतीसवाँ अपडेट

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विक्रम के चेहरे पर कोई भाव नहीं था l यह खबर सुनने के बाद ना वह चौंका ना ही किसी तरह का कोई प्रतिक्रिया दी l यह देख कर पिनाक थोड़ा हैरान हो जाता है l

पिनाक - क्या बात है युवराज... हमारी सूचना से आप की कोई प्रतिक्रिया नहीं आई...

विक्रम - आप ऐसा करने जा रहे हैं... यह तो मैं जानता था... वैसे भी आपने राजा साहब से वादा जो किया था... आज ही अनु को ठिकाने लगाने के लिए... पर मैं यह निश्चिंत तौर पर कह सकता हूँ... अनु जिंदा होगी...

पिनाक - यह आप किस बिनाह पर कह सकते हैं...

इस सवाल पर विक्रम के चेहरे पर एक मुस्कान उभरता है l वह इशारा करता है पिनाक को बैठ जाने के लिए l पिनाक एक कुर्सी पर बैठ जाता है विक्रम उसके सामने बैठ जाता है l

विक्रम - वीर कैसा है... यह आप अच्छी तरह से जानते हैं... वह अगर बेकाबू हो गया... तो वह किसीके भी संभाले नहीं संभलेगा... और आप चाहते हैं कि... वीर आपकी मर्जी से मंगनी भी कर ले और शादी भी... वगैर कुछ विरोध किए... इसके लिए... वीर की कमजोरी को कब्जे में लेना जरूरी था... इसलिए मैं कह सकता हूँ... अनु जिंदा होगी...

पिनाक - हाँ है तो वह जिंदा... पर ज्यादा देर के लिए नहीं...

विक्रम - आप अभी भी... वीर को हल्के में ले रहे हैं... वीर अनु को ढूँढ निकालेगा...

पिनाक - युवराज लगता है... आप सबसे ज्यादा दुखी हैं... अनु के अगवा हो जाने से...

विक्रम - मैंने आपको बस एक भविष्यवाणी सुनाई...

पिनाक का चेहरा सख्त हो जाता है l जबड़े भींच जाते हैं l मुट्ठीयाँ कस जाते हैं l आँखों के नीचे वाले पेशियों में थिरखन होने लगते हैं l

पिनाक - (दांत पिसते हुए) वीर कुछ नहीं कर पाएगा... उसे एहसास होगा... क्षेत्रपाल उपनाम के वगैर... इस दुनिया में... उसकी कोई हस्ती नहीं है... वीर सिंह नाम का जो बल्ब जल रहा है... उसके अंदर का फ़िल्मेंट क्षेत्रपाल है... उसके वगैर वह एक फ्यूज बल्ब है... जिसकी जगह... गटर के पास वाले कोई कूड़ेदान है... आज वह अकेला होगा... असहाय... बेबस मजबूर... हम जिस दुनिया को झुकाते हैं... कुचलते हैं... जीतते हैं... राजकुमार उसी दुनिया का हिस्सा बनने की कोशिश कर रहे हैं...

विक्रम - आप ऐसा क्यूँ चाहते हैं... वीर आपका बेटा है... कहीं ऐसा ना हो... की आप दुनिया को जीतते के गुमान में... अपनी ही दुनिया ना हार जाएं...

पिनाक - मैं उसे वीर सिंह नहीं... वीर सिंह क्षेत्रपाल बनते देखना चाहता हूँ... लड़कियाँ उसकी कमजोरी तो हों... पर कोई एक लड़की उसकी कमजोरी ना बन जाएं...

विक्रम - अनु उसकी जिंदगी है...

पिनाक - और मुझे वह ना पसंद है...

विक्रम - छोटे राजा जी... आप हमेशा... राजा साहब के कहे मानते रहे... एक बार आप अपने लिए... वीर की बात मान लेते...

पिनाक - राजकुमार ने हमसे माँगा ही कब...

विक्रम - आपने मौका दिया ही कब....

कुछ देर के लिए पिनाक चुप हो जाता है l फिर अचानक से उठ कर जाने लगता है l उसे जाता देख विक्रम भी उठ खड़ा होता है l जाते जाते पिनाक दरवाजे के पास रुक जाता है l

पिनाक - आज कल आपकी बातेँ चुभ नहीं रहे हैं युवराज... कलेजा छलनी कर रही है... खैर राजकुमार को संभाल कर... उन्हें मंगनी के लिए तैयार करना अब आपके जिम्मे है...

विक्रम - जी मैं कोशिश करूँगा... पर शायद उसकी नौबत ना आए...

पिनाक - (विक्रम की ओर घुम जाता है) क्या... (जैसे खिल्ली उड़ते हुए) आपको लगता है... राजकुमार उस बदजात को ढूँढ लेगा...

विक्रम - हाँ...

पिनाक - युवराज... हम मानते हैं... आप राजकुमार के बहुत करीब हैं... इसलिए राजकुमार का दर्द आपको बर्दाश्त नहीं हो रहा... पर खुद को यह झूठी तसल्ली देना बंद करें...

विक्रम - (चुप रहता है)

पिनाक - युवराज... हमने राजकुमार की हर हरकत की खबर रखा करते थे... पर कभी सोचा नहीं था... एक लड़की के लिए वह पागल भी हो सकते हैं... उन्हें कम तकलीफ हो... इसीलिए हम सब पास नहीं हैं... जब हम पहुँचेंगे... उनको एक कंधे की दरकार होगी... वह कंधा आप बनेंगे...

विक्रम - दर्द भुला भी नहीं होगा... और आप उसी दिन उसकी मंगनी कराने की सोच रहे हैं...

पिनाक - हाँ... अच्छे से मान गया तो ठीक... वर्ना... उस लड़की की नाजुक हालत दिखा कर ही सही... यह मंगनी और शादी करा देनी है...

विक्रम - मुझे खेद है... ऐसा कुछ भी नहीं होगा...

पिनाक - (अपना भवां टेढ़ा कर) कहीं आपने कुछ...

विक्रम - नहीं.. मैंने कुछ भी नहीं किया... उसकी नौबत ही नहीं आई... सच तो यह है कि... वीर ने मुझे कुछ करने के लिए मौका दिया ही नहीं...

पिनाक - उसके साथ हम में से कोई भी नहीं है.... सच तो यह है कि... उसके साथ उसका अपना साया तक नहीं है...

विक्रम - उसके साथ उसका दोस्त है...

पिनाक - (हैरानी के साथ) दोस्त...

विक्रम - हाँ... दोस्त... अभी आप कह रहे थे... आप वीर की सारी ख़बरें रखा करते थे... फिर दोस्त की बात आपसे कैसे छूट गया....

पिनाक - कौन दोस्त... कैसा दोस्त...

विक्रम - वह दोस्त.. जो वीर के साथ चट्टान जैसा खड़ा है...

पिनाक - कौन है... क्या किया है....

विक्रम टीवी का मोबाइल उठाता है और टीवी को फिर से ऑन करता है l पिनाक देखता है नभ वाणी न्यूज चैनल पर न्यूज क्लिप चल रहा था l जिसमें एक एंकर के बगल में एक विंडो में दिख रहा था कुछ औरतें किसी ऑफिस की घेराव किए हुए हैं l उन महिलाओं के पास न्यूज रिपोर्टर और पुलिस वाले खड़े हैं l विक्रम टीवी का वॉल्युम बढ़ाता है l

" आज की ब्रेकिंग न्यूज में मैं सुप्रिया रथ आप दर्शकों का स्वागत करती हूँ... जैसा कि आप दर्शक अवगत होंगे कुछ घंटों पहले राजधानी में एक काम काजी महिला का सिटी हस्पताल से अपहरण हो गया है... उन महिला का नाम है अनुसूया दास... अनुसूया जी की दादी जी के कंप्लेंट पर पुलिस की ढुलमुल रवैये से दुखी हो कर वाव की अध्यक्षा श्रीमती प्रतिभा सेनापति जी से मदत मांगी... घटना को जानने के पश्चात प्रतिभा जी पुलिस की कारवाई पर सवाल उठा कर कमिश्नरेट का अपने कुछ कार्यकर्ताओं के सहित घेराव किया है... हमारी संवाददाता निधि उनके विचार जानने के लिए उनके निकट गई हुई हैं... आइए जानते हैं आगे क्या करने की उनकी विचार है...

निधि - धन्यवाद सुप्रिया... जैसा कि जानते हैं... पहली बार ऐसा हुआ है कि सिटी हस्पताल के परिसर से... एक लड़की का अपहरण हुआ है... और सबसे खास बात... वह लड़की ESS से संबंधित है... इसलिए तरह तरह के कयास लगाए जा रहे हैं... पर पुलिस महकमा कह रहा है... वे अपने काम कर रहे हैं... पर उनके काम से वर्किंग वुमेन एसोसिएशन ऑफ ओडिशा की अध्यक्षा श्रीमती प्रतिभा सेनापति इत्तेफ़ाक नहीं रख रहीं हैं... आइए जानते हैं उनसे उनके विचार... जी प्रतिभा जी...

प्रतिभा - देखिए... हम पुलिस की कारवाई से नाखुश हैं... लड़की दुपहर से लापता है... जब कि पुलिस शाम की बात कर रही है... इसलिए हमें पुलिस की मंशा पर शक हो रहा है...

निधि - क्या इसलिये अपने कमिश्नरेट का घेराव किया है...

प्रतिभा - नहीं हमने कोई घेराव नहीं किया है... हम वाव के तरफ़ से कुछ ही कार्यकर्ता कमिश्नरेट के सामने प्रदर्शन मात्र कर रहे हैं... पर कल सुबह तक अगर लड़की लापता रही... तो कल से यहाँ कमिश्नरेट के सामने कामकाजी महिलाओं का जामावड़ा शुरु होगी... इसके लिए... राज्य की कानून मंत्रालय और कमिश्नर जिम्मेदार होंगे...

तभी एक एसीपी कुछ ऑफिसरों के साथ प्रतिभा सेनापति के पास आता है l निधि यह देख कर उस एसीपी से मुखातिब होती है

निधि - यह रहे पुलिस ऑफिसर... शायद कमिशन ऑफिस से कोई सूचना लेकर आए हैं... जी सर

एसीपी - जी मैं... एसीपी सुभाष सतपती... आप गण माध्यम के जरिए... पुलिस प्रशासन के तरफ से यह आश्वासन दे रहा हूँ... हम पुरी कोशिश करेंगे... अगवा हुई लड़की को जितनी जल्दी हो सके ढूँढ कर आपके समक्ष लाएंगे... "

पिनाक पास रखे एक फ्लावर वॉश को उठा कर टीवी पर दे मारता है l टीवी का स्क्रीन फट जाता है और धुआं निकलने लगता है l विक्रम पिनाक की ओर देखता है

पिनाक - यह सब कैसे... राजकुमार वीर ऐसे कैसे सोच सकता है... उस औरत... प्रतिभा के पास वह पहुँचा कैसे...

विक्रम - अब आप बेबस.. असहाय लग रहे हैं...

पिनाक - हमें बेबस कर सके किसी में दम नहीं...

इतना कह कर पिनाक अपना मोबाइल निकाल कर कानून मंत्री सुजीत जेना को फोन लगाता है l पर उसका फोन लगता नहीं है l खीज कर वह बल्लभ को फोन लगाता है l

पिनाक - प्रधान... वहाँ पर क्या हो रहा है...

बल्लभ - छोटे राजा जी... यहाँ बात कुछ बिगड़ रहा है... फिर भी मैं और कमिश्नर संभालने की कोशिश कर रहे हैं...

पिनाक - क्या खाक कोशिश कर रहे हो... एक मामुली दो कौड़ी की लड़की के लिए... मीडिया और वाव... कमिश्नरेट का घेराव हो रहा है... इस औरत के पास वीर पहुँचा कैसे...

बल्लभ - यह तो मुझे भी समझ में नहीं आ रहा है... उन्हें यह आइडिया दिया किसने... और इतनी जल्दी एक्शन में भी आ गए...

पिनाक - मैं कुछ नहीं जानता... तुम कैसे और किस तरह से मैनेज करोगे... पर पुलिस और प्रशासन का कोई भी दखल नहीं होनी चाहिए...

बल्लभ - मैं अपनी पूरी कोशिश करूँगा... पर पुलिस ने सारे शहर में नाकाबंदी लगा दी है... आप उनसे कहिये... किसी भी तरह से... या तो शहर से गायब हो जाएं... या फिर अंडरग्राउंड हो जाएं...

पिनाक - आआआहहह... (फोन काट देता है और विक्रम की ओर देखने लगता है) यह कौन दोस्त है... वीर को मिल गया है...

विक्रम - एडवोकेट प्रतिभा सेनापति को जानते हैं आप...

पिनाक - अच्छी तरह से... सेनापति दंपती के बारे में...

विक्रम - तो आपको यह भी मालुम होगा... उनका एक मुहँ बोला बेटा है....

पिनाक की आँखे हैरत से बड़ी हो जाती हैं l मुहँ खुला रह जाता है l अविश्वास के भाव से विक्रम की ओर देखने लगता है l

पिनाक - नहीं... यह नहीं हो सकता... हमारे दुश्मन से... वीर की दोस्ती... विश्वा से वीर की दोस्ती.....

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द हैल

वीर को देखते ही तीनों खड़े हो जाते हैं, सुषमा आगे बढ़ती है और वीर के गले लग जाती है l वीर भी उसके गले लग जाता है l सुषमा सुबक रही थी पर वीर शांत था l उसका चेहरा जैसे कुछ आने वाले तूफान या जलजले का संदेश दे रहा था, यह बात रुप को साफ एहसास हो रहा था l

रुप - भैया... माँ... प्लीज बैठ जाइए ना...

रुप के इतने कहने से दोनों अलग होते हैं l वीर सुषमा को लाकर सोफ़े पर बिठा देता है l सुषमा वीर की ओर देखते हुए पूछती है

सुषमा - यह क्या हो रहा है वीर...

वीर - माँ शांत... तुम पहले अपनी बताओ...

सुषमा - वीर... मेरे समझ में कुछ नहीं आ रहा है... मुझे आज अचानक से बुलावा आया कि मुझे भुवनेश्वर तुम लोगों के पास पहुँचना है... मैं नर्सों और डॉक्टरों की टीम को बड़े राजा जी को देखभाल के लिए लगा कर आ गई... यहाँ पहुँचने के कुछ ही समय पहले जानकारी मिली... के कल तुम्हारी मंगनी है... मुझे हैरत हुई... पर धक्का तब लगा... जब यह खबर मिली कि... हमारी अनु को अगवा कर लिया गया है... यह क्या हो रहा है...

वीर - माँ... यह क्षेत्रपाल मर्दों की ना मर्दानगी है...

सुषमा - क्या.. क्या मतलब... मैं कुछ समझी नहीं...

वीर - अनु को छोटे राजा जी ने उठवाया है...

सुषमा - क्या... (उछलकर उठ खड़ी हो जाती है)

ऐसा ही हाल रुप और शुभ्रा का भी था l हैरानी और अविश्वास से तीनों का चेहरा सन्न था l रुप और शुभ्रा आँख और मुहँ फाड़े कभी एक दुसरे को कभी वीर और सुषमा को देखे जा रहे थे l

सुषमा - यह तु क्या कह रहा है...

वीर - (एक टूटी हुई हँसी हँसते हुए) इसमें अविश्वास ना कर पाने वाली बात क्या है माँ...

सुषमा - (मुश्किल से) जिंदा है...

वीर - हाँ.. शायद...

सुषमा - हाँ शायद... मतलब...

वीर - जिंदा इसलिये... की मैं जिंदा हूँ... पर आज छोटे राजा जी ने... मुझे सच में मार दिया...

रुप - ऐसे क्यूँ कह रहे हो भैया...

वीर कोई जवाब नहीं देता l एक गहरी साँस लेते हुए उठ खड़ा होता है l रुप की ओर देखता है l

रुप - तुमने कोई जवाब नहीं दिया...

वीर - (शुभ्रा की ओर देख कर) आप कुछ नहीं पूछेंगी भाभी...

शुभ्रा - मैं क्या पूछूं... मुझे अभी तक विश्वास नहीं हो पा रहा है... तुम्हारा मंगनी है... और अनु का अगवा कर लिया गया है...

वीर अपनी माँ की तरफ देखता है l सुषमा स्तब्ध सी चेयर पर धप से बैठ जाती है, जैसे उसे गहरा सदमा लगा है l वह खोई खोई सी लग रही थी

वीर - माँ...

सुषमा - (चौंक कर) हाँ... (वास्तविकता में लौटते हुए) हाँ...

वीर - क्या हुआ...

सुषमा - यह क्या हो रहा है... क्षेत्रपाल किसीको अपने रास्ते से हटाना चाहें तो... कहाँ नामुमकिन है... फिर ऐसे अनु को उठवाने का क्या मतलब... वह भी दुनिया को बता कर...

वीर - दुनिया में किसी को कुछ भी नहीं पता... इस साजिश के पीछे क्षेत्रपाल हैं... यह तो मुझे किडनैपर ने बताया है...

शुभ्रा - तो उसने जरूर झूठ बोला होगा...

वीर - नहीं... उसने सच कहा है...

रुप - यह तुम कैसे कह सकते हो...

वीर विक्रम की चिट्ठी की जिक्र करते हुए बताता है कैसे उसके ऑफिस में हर विभाग के इंचार्ज सभी कलकत्ता गए हुए हैं l यह सब सुन कर तीनों और भी हैरान होते हैं l

सुषमा - हे भगवान... यह कैसी हैवानियत है... अपनी ही औलाद के खिलाफ... (सुबकते हुए) मैं तेरे... अनु के और अनु की दादी की गुनाहगार हूँ वीर... मैं अब किस मुहँ से अनु के और उसकी दादी का सामना कर पाऊँगी...

वीर - माँ... मुझे कभी क्षेत्रपाल होने का गुरूर था... पर अनु के आगे मेरा वह गुरुर बहुत बौना हो जाता था... मैंने ता उम्र अपने गुरुर के चलते सिर्फ दुश्मन ही दुश्मन कमाए हैं... पर अनु के मेरी जिंदगी में आने के बाद... मुझे सच्चा प्यार और एक सच्चा दोस्त मिला है... आज उसी दोस्त के मदत से मैं अनु को ढूंढने जा रहा हूँ...

सुषमा - (थोड़ी अचरज के साथ) दोस्त...

वीर - हाँ माँ दोस्त... आज मेरे साथ... ना मेरे अपने हैं... ना ज़माना है... ना भगवान... ना मेरा अपना साया है... पर इस हालत में भी.. मेरा दोस्त मेरे साथ खड़ा है... जब भी मैंने उसे आवाज दी.. वह मेरे सामने आ कर खड़ा हो गया... आज जब मुझे किसी की साथ की जरूरत थी... तब वही मेरे सामने आकर खड़ा हो गया... अब मुझे ऐसा लगता है कि... मैं दुनिया से टकरा सकता हूँ... दुनिया बदल सकता हूँ...

वीर इतना कह कर फिर चुप हो जाता है l तीनों ध्यान से वीर को सुन रहे थे l खामोशी ऐसी थी के किसी में हिम्मत ही नहीं हो रही थी खामोशी तोड़ने के लिए l फिर भी कुछ देर के बाद

शुभ्रा - वीर... जानते हो ना... कल शाम साढ़े सात बजे xxxx होटल में... तुम्हारा मंगनी करा दी जाएगी...

वीर - जानता हूँ...

रुप - फिर यह सब...

वीर सुषमा की ओर देखता है, सुषमा उसे डबडबाई आँखों से देख रही थी l ऐसा लग रहा था जैसे वह कहना और पूछना बहुत कुछ चाह रही थी पर उसका जुबान साथ नहीं दे रही थी l

वीर - माँ... तुमने अनु की दादी से जो वादा किया है... वह नहीं टुटेगी... कल उसी समय... उसी होटल में... मैं पुरी दुनिया के सामने ऐलान करूँगा... के अनु ही मेरी जीवन साथी होगी... चाहे कुछ भी हो जाए...

सुषमा - मुझे डर है... कहीं क्षेत्रफ़ल के अहंकार के चलते... अनु को कुछ हो ना जाए...

वीर - अगर अनु को कुछ हो गया... तो वीर भी नहीं रहेगा...

सुषमा - क्या... (एक झटके के साथ चेयर से उठ खड़ी होती है)

वीर - हाँ माँ...

शुभ्रा - वीर... तुम यह कैसी बातेँ कर रहे हो... वह भी अपनी माँ के सामने... जिन्होंने ना जाने कितनी दुआएँ माँगी होंगी... तुम्हारी लंबी उमर के लिए...

वीर - जानता हूँ भाभी..

रुप - फिर भी माँ का दिल दुखा रहे हो...

वीर - आप सब जानते हैं... अनु के साथ यह हादसा... बताने के लिए काफी है... के वह कभी भी... क्षेत्रपाल परिवार में स्वीकारी नहीं जाएगी... इसलिए मैं यह कहने आया हूँ... की आज के बाद इस घर में... या राजगड़ में... मेरा आना जाना तभी होगा... जब अनु क्षेत्रपाल परिवार में स्वीकारी जाएगी....

यह बात एक बिजली की तरह तीनों पर गिरती है l तीनों भौंचके हो जाते हैं और एक दुसरे के मुहँ को ताकने लगते हैं l सुषमा धप से चेयर पर बैठ जाती है l

शुभ्रा - वीर... तुम होश में तो हो... जानते हो क्या कह रहे हो...

रुप - देखो माँ को कितना गहरा सदमा पहुँचा है...

वीर - (फिर से अपनी माँ के आगे झुक जाता है) माँ... मैं जानता हूँ... तुमको... बल्कि... आप सब लोगों को तकलीफ होगी... पर सच्चाइ यही है... की आप में से कोई क्षेत्रपाल के खिंचे लकीर लांघ नहीं सकता... और मैं नहीं चाहता... मेरी और क्षेत्रपाल के अहंकार के टकराव के बीच मेरा अपना कोई पीस जाए... इसलिए आज आप लोगों से मैं इजाजत लेने आया हूँ...

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अपने कमरे में चहल कदम करते हुए पिनाक अपनी हाथ की मुट्ठी बना कर दुसरे हाथ पर मार रहा था l उसके चेहरे पर बैचैनी साफ झलक रहा था l सारी दुनिया सो रही थी पर उसके आँखों में नींद गायब था l अचानक वह टेबल लैम्प के पास रखे अपना मोबाइल उठाता है और एक नंबर पर डायल करता है l

@ - (उबासी लेते हुए) हैलो छोटे राजा जी... कहिए... इतनी रात गए कैसे याद किया...

पिनाक - बे कुत्ते... हरामी साले... जब सारा भुवनेश्वर जाग रहा है... तु कैसे चैन से सोया हुआ है...

@ - क्यूँ छोटे राजा जी क्या हो गया....

पिनाक - हराम जादे... उस लड़की को कहाँ पर रखा है... तुम ने...

@ - छोटे राजा जी... आप भुल रहे हैं... किडनैप मैंने नहीं किया है... करवाया है... आपने ही कहा था... यह काम किसी ऐसे इंसान से करवाने के लिए... जिसका क्षेत्रपाल परिवार से दुर दुर से वास्ता ना हो... अगर हो तो दुश्मनी हो... और मैंने ऐसा ही किया है... इस कांड में... आपके या आपके परिवार का नाम बिल्कुल नहीं उछलेगा...

पिनाक - हाँ तुम ठीक कह रहे हो... पर हम यह भी चाहते थे... वह लड़की फिर कभी दिखे ही ना...

@ - वह लोग हैं ही ऐसे... वह लोग उस लड़की को... ना जाने कितनी बार बेचेंगे.... और फिर उसकी ऑर्गन बेच कर किसी कोने में दफना देंगे....

पिनाक - पर अब उस लड़की को पुलिस ढूँढ रही है...

@ - सॉरी छोटे राजा जी... यह काम आपने मुझे नहीं दी थी... और यह काम मेरे बस की है भी नहीं... आपने इसे जिसके बस की कही थी... उसे ही तो आपने सौंपा रखा है...

पिनाक - हाँ तुम ठीक कह रहे हो... तुमने अपना काम करदिया है... क्या... (थोड़ी देर के लिए चुप हो जाता है)

@ - पूछिये छोटे राजा जी... पूछिये... आपको किस बात का डर है...

पिनाक - अपनी जुबान पर लगाम दे कुत्ते... डर हम से डरता है... हम तो बस यह तसल्ली करना चाहते हैं... तुमने जिसे काम सौंपा है... कहीं पुलिस के डर से उस लड़की को छोड़ ना दे...

@ - आप घबराईये मत छोटे राजा जी... जिसे यह काम सौंपा गया है... या तो वह उस लड़की को बेच देगा... या फिर मार देगा... पर छोड़ेगा नहीं... आप बस अपने प्रधान बाबु से पुलीस कारवाई पर तसल्ली कर लीजिए...

पिनाक - ठीक है....

@ - तो क्या अब मैं सो जाऊँ... (उबासी लेते हुए) बड़ी जोर की नींद आ रही है....

पिनाक - हूँ... सो जा...

कोई जवाब नहीं मिलता l पिनाक फोन पर देखता है कॉल कट हो चुका था l पिनाक की जबड़े सख्त हो जाते हैं l वह बल्लभ को फोन लगाता है

बल्लभ - हे हैलो...

पिनाक - (गम्भीर आवाज में) यह हम न्यूज में क्या देख रहे हैं...

बल्लभ - सॉरी छोटे राजा जी... हमने ऐसा बिल्कुल सोचा भी नहीं था... मैंने कमिश्नर से और जेना बाबु से बात कर... अगवा हुई उस लड़की की तलाश की तफ्तीश को भटकाने और देर करने के लिए राजी करा दिया था... उस काम के लिए... टीम भी बना दिया गया था... पर...

पिनाक - ह्म्म्म्म... आगे बोलो... हम तुम्हारे मुहँ से सुनना चाहते हैं...

बल्लभ - पता नहीं कैसे... अनु की दादी उस एडवोकेट प्रतिभा सेनापति के पास पहुँच गई... अब कानून मंत्री सुजीत जेना और कमिश्नर पर बहुत प्रेसर है...

पिनाक - मतलब...

बल्लभ - जी मैं कमिश्नर जी से बात कर रहा था... अगर इस मामले में मीडिया नहीं घुसती तो कुछ कर सकते थे... पर अब यह डिपार्टमेंट की इज़्ज़त पर बात आ गई है... इसलिए वह अब उस लड़की को ढूंढने की पुरी कोशिश करेंगे...

पिनाक - आ आ आह्य... देखो मैं कुछ नहीं जानता... राजा सहाब के सामने मेरी गर्दन झुकनी नहीं चाहिए... तलाश के काम में जितनी देर हो सके करवाओ... जहां पर जितना पैसा लगे... खिलाओ... पर लड़की मिले तो कल नहीं... परसों या किसी और दिन मिले... बस वह जिंदा ना मिले उसका इंतजाम मैं करवाऊंगा...

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अस्सिटेंट कमिश्नर ऑफ पुलिस सुभाष सतपती अपनी जिप्सी के अंदर उतरता है और चले हुए एक चेक पोस्ट पर पहुँचता है l उसे देखते ही पोस्ट पर तैनात सभी पुलिस वाले उसे सैल्यूट ठोकते हैं l

सतपती - कैसा चल रहा है अब तक...

एक संत्री - हम सभी को चेक कर रहे हैं सर...

सतपती - गुड...

इतना कह कर सतपती अपनी गाड़ी में आकर बैठता है और गाड़ी स्टार्ट कर वहाँ से चल देता है l गाड़ी कुछ देर बाद एनएच के एक ढाबा 24/7 पर रुकती है l गाड़ी से उतर कर वह एक केबिन में घुस जाता है l केबिन के अंदर विश्व बैठा हुआ था l

सतपती - मुझे ज्यादा देर तो नहीं हुई...

विश्व - नहीं... आइए सतपती सर... बैठिए...

सतपती - (बैठते हुए) अकेले हो...

विश्व - फ़िलहाल... अभी दो और लोग आयेंगे...

सतपती - एक को मैं गेस कर सकता हूँ... वीर... वीर सिंह क्षेत्रपाल... यह दुसरा कौन है..

विश्व - उसे आने दीजिए... मिल लीजिएगा... वैसे मेरे बुलाने पर आने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया...

सतपती - क्या करें... सेनापति सर का हुकुम था... और मुझ पर तुम्हारा एहसान भी तो बहुत है... तुम्हारे ही किए क्रेडिट के वज़ह से आज इस पोस्ट पर हुँ...

विश्व - आप खुश नहीं लग रहे हैं...

सतपती - ऐसा नहीं है विश्व... सेनापति सर के कहने से मैं... अपना ट्रांसफ़र और प्रमोशन दोनों स्वीकार किया... इनाम के तौर पर देहरादून में आईपीएस ट्रेनिंग भी मिला... पर पोस्टिंग देखो... फिल्ड के बजाय इंटेलिजंस विंग में डाल दिया... दिन भर फाइलें छानता रहता हूँ... और कमिश्नरेट के तरफ से... मीडिया का स्पोक पर्सन बन गया हूँ... रही तुम्हारी बात... मैं तुमसे कभी शिकायत नहीं रख सकता यार... खैर यह जो हो रहा है.. मेरे समझ में कुछ नहीं आ रहा है... तुम और वीर सिंह... (चुप हो जाता है)

विश्व - मेरा दुश्मन भैरव सिंह है... और वीर सिंह मेरा दोस्त है...

सतपती - तो तुम इस तरह से... बदला ले रहे हो...

विश्व - नहीं... यह इत्तेफाक है कि भैरव सिंह मेरा दुश्मन और उसका भतीजा मेरा दोस्त... और मेरी रीढ़ की हड्डी इतनी कमजोर नहीं... भैरव सिंह से बदला लेने के लिए... मुझे उसके भतीजे के ओट लेना पड़े...

सतपती - क्या वीर सिंह... तुम्हारे और भैरव सिंह के बारे में जानता है...

विश्व - हाँ... उस दुश्मनी से इस दोस्ती का कोई वास्ता नहीं है... भैरव सिंह के लिए इतना खुन्नस है कि मैं उसका जान ले सकता हूँ... पर वीर सिंह के लिए दोस्ती इतनी पक्की है कि... मैं उसके लिए जान दे सकता हूँ...

विश्व की जवाब सुन कर सतपती चुप हो जाता है l तभी केबिन में वीर आता है और एक कुर्सी खिंच कर दोनों के साथ बैठ जाता है l विश्व देखता है वीर थोड़ा खोया खोया सा लग रहा था l

विश्व - क्या हुआ वीर...

वीर - कुछ नहीं... (सतपती की ओर देख कर) आपकी तारीफ...

सतपती - मैं विश्व का दोस्त... एसीपी सुभाष सतपती...

वीर - ओ.. थैंक यु... (विश्व की ओर देख कर) तो...

विश्व - एक मिनट वीर... मेरा एक और दोस्त आ रहा है... उसे आने दो...

तभी कमरे में एक और शख्स आता है l तीनों को बारी बारी से सलाम ठोकता है l उसे देख कर सतपती हैरान होता है l

सतपती - तुम...

शख्स - (हँसते हुए) जी...

सतपती - (विश्व की ओर देखते हुए) यह यहाँ कैसे...

विश्व - (उस शख्स से) तुम यहाँ बैठो लल्लन... (लल्लन बैठ जाता है, विश्व सतपती से) आप जिस दुसरे की बात कर रहे थे... यह यही है... इस केस में... इसकी मदत भी बहुत जरूरी है...

सतपती - (लल्लन से) तु भुवनेश्वर में कैसे...

लल्लन - जब भाई बुलाते हैं... मैं उनकी सेवा में हाजिर हो जाता हूँ....

विश्व - ओके... हम उस बात पर जिसके लिए यहाँ आए हैं... सतपती जी आप के पास क्या जानकारी है...

सतपती - पहली बात... मैंने सारे सीसीटीवी फुटेज खंगाल कर कुछ फोटोस लाया हूँ... इस किडनैपिंग के पीछे यही लोग हैं...

इतना कह कर मोबाइल निकाल कर दो शख्सों की फोटो निकाल कर दिखाता है l विश्व लल्लन को वह फोटो देखने के लिए कहता है l लल्लन उन फोटोस को गौर से देखता है

लल्लन - यह लोग नीरा के आदमी हैं..

सतपती - हाँ बिल्कुल...

विश्व - (वीर से, फोटो दिखा कर) वीर... क्या इन्हें जानते हो या इनके बॉस नीरा को... (वीर अपना गर्दन हिला कर ना कहता है)

सतपती - राजकुमार जी को याद ना हो शायद... पर...

वीर - (टोकते हुए) एक मिनट एसीपी सर... मुझे आप वीर कहिये... (सतपती उसे हैरानी भरे नजरों से देखता है) प्लीज... और यह आप आप मत कहिए... मैं अभी अभी आप वाली औकात से बाहर आया हूँ... तुम कहिये... या तु भी कह सकते हैं...

सतपती - ओके... तो वीर... तुम्हें मालुम होना चाहिए... नीरा आइकन ग्रुप से जुड़ा हुआ था... केके ग्रुप के साथ टेंडर को लेकर झगड़ा था... इसका भाई सुरा और उसकी महबूबा एक दिन गायब हो गए... और शायद... (कहते कहते रुक जाता है)

वीर - हाँ... हाँ... याद आया... केके की एक बेटी भी थी... यही नीरा और सुरा के डर से... उसकी शादी कर दी थी... और उसे विदेश भेज दिया था...

सतपती - हाँ... बिल्कुल... और पुलिस को लगता है... मिस अनु के किडनैपिंग उसी दुश्मनी के वज़ह से हुई है...

कुछ देर के लिए केबिन में खामोशी छा जाती है l सभी वीर की ओर देखते हैं, वीर अपनी भवें सिकुड़ कर सोच में था l विश्व बात को आगे बढ़ाते हुए

विश्व - तो सतपती जी... अगर पुलिस के पास इतनी जानकारी है... तो फिर... कारवाई में इतनी देरी क्यूँ...

सतपती - पता नहीं... पर मुझे जहां तक अंदाजा मिल पा रहा है... महकमे में कोई भी इंट्रेस्टेड नहीं है... इसलिए केस को घुमा रहे हैं... चूंकि अब मीडिया इंवॉल्व हो गई है... खाना पूर्ति के लिए इधर उधर हाथ पैर मार रहे हैं...

विश्व - तो क्या अनु को भुवनेश्वर से बाहर ले गए हैं...

सतपती - नहीं... अनु पक्के तौर पर भुवनेश्वर में ही है... नाकाबंदी बड़ी जबरदस्त है... बस ढूंढने में थोड़ी ढील है...

विश्व - (लल्लन से) तो लल्लन प्यारे... कुछ पता चला पाए...

लल्लन - (बातचीत के दौरान वह मोबाइल पर झुका हुआ था, वैसे ही झुके हुए) भाई दो मिनट... मैंने फोटो देखते वक़्त अपने मोबाइल पर ट्रांसफ़र करवा लिया था... उसे अपने पट्ठों के पास भेज दिया है... खबर मिल जाएगी...

थोड़ी देर बाद उसके मोबाइल पर एक अलर्ट ट्यून बजता है l लल्लन मेसेज पढ़ने के बाद विश्व की ओर देखता है l

लल्लन - भाई... नीरा... बालासोर में था... कुछ ही दिन हुए हैं... वह भुवनेश्वर में आया है... अभी वह सुंढी साही बस्ती में है... और मुमकिन है... अनु वहीँ पर हो... क्यूँकी पुरे भुवनेश्वर में... अनु को छिपाने के लिए... एक वही बस्ती ही सेफ है... जहां पुलिस भी रेड डालने से पहले सौ बार सोचती है...

वीर - (उठते हुए) तो फिर देर किस बात की... चलो चलते हैं...

वीर अकेला खड़ा होता है पर विश्व, सतपती और लल्लन अपनी जगह से नहीं उठते l वीर थोड़ा हैरान होता है l

वीर - क्या हुआ...

सतपती - थोड़ी देर के लिए बैठ जाइए वीर... (वीर बैठता है)

विश्व - (सतपती से) आपका क्या प्लान है...

सतपती - विश्व... तुम्हें शायद अंदाजा हो... यह सुंढी साही बस्ती है... इस बस्ती में... जितने भी लोग रहते हैं... एक से बढ़कर एक छटे हुए बदमाश हैं... गुंडई उन लोगों का खानदानी पेशा है... वहाँ घुसने के लिए... वेल प्रीपेयरड फोर्स चाहिए... और फोर्स लेने के लिए...इंफोर्मेशन पक्की होनी चाहिए...

विश्व - मतलब... आप कुछ नहीं कर सकते...

सतपती - कर तो सकता हूँ... पर... मुझे सुबह तक टाइम चाहिए... ताकि मैं कमिश्नर को... यकीन दिला कर मना सकूँ...

वीर - तब तक... अनु के साथ कुछ भी हो सकता है... उसे कहीं ले भी जा सकते हैं...

विश्व - वीर... हिम्मत रखो... लल्लन तुम्हारा क्या खयाल है...

लल्लन - भाई... सतपती सर सही कह रहे हैं... पर मुझे लगता है... सुबह तक भी देर हो सकती है... वे लोग कोई ना कोई तरकीब लगा कर अनु को भुवनेश्वर से दुर ले जाने की कोशिश करेंगे...

वीर - तो फिर... हम किस बात का इंतज़ार कर रहे हैं...

विश्व - वीर... शांत रहो... जज्बाती हो कर जल्दबाज़ी में काम ना लो... (सतपती से) ठीक है सतपती जी... यहां तक मदत के लिए शुक्रिया... आप कोशिश कीजिए... किसी तरह सुबह तक... सुंढी साही के बाहर तक फोर्स ले आयें...

सतपती - (उठते हुए) ठीक है फिर... मैं कुछ भी करके... कमिश्नर साहब को राजी कर... एक बटालियन लेकर सुबह तक पहुँचने की कोशिश करता हूँ...

इतना कह कर सतपती वहाँ से चला जाता है l उसके जाने के बाद विश्व कुछ सोचने लगता है l उसे सोच में देख कर लल्लन विश्व से पूछता है

लल्लन - क्या बात है भाई...

विश्व - जिस तरह पुलिस सारे शहर की नाकाबंदी कर रखा है... जाहिर है... उस बस्ती में लोग... अपनी बस्ती की पहरेदारी में होंगे...

लल्लन - बिल्कुल भाई... मेरा एक पट्ठा गया है... ख़बर निकाल कर पुरी जानकारी देगा...

वीर - देखा प्रताप... मेरे बाप ने सुपारी दी भी किसे... जिसके साथ हमारी दुश्मनी है... ताकि दुनिया को लगे अनु... हमारी दुश्मनी की चलते किडनैप हुई है...

विश्व - मुझे लगता है... कोई तीसरा भी है... जो खेल रहा है...

वीर - मतलब...

विश्व - मतलब... तुमसे बात करने वाला नीरा नहीं था... कोई और था... जिसने तुम्हारे बाप की सुपारी की बात कही थी...

वीर - वह चाहे कोई भी हो... सुपारी की बात सच है... (एक गहरी साँस लेते हुए) यार प्लीज कुछ करो.. पता नहीं अनु कैसी होगी किस हाल में होगी...

तभी लल्लन की मोबाइल बजने लगता है l लल्लन मोबाइल उठा कर अपने कान में लगाता है l उसकी आँखों में एक चमक दिखने लगता है l कुछ देर मोबाइल सुनने के बाद

लल्लन - भाई... अनु उसी बस्ती में है... शहर की नाकाबंदी देख कर... सुबह सुबह अनु को ले जाने की प्लान बना रहे हैं...

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एक कमरे में अनु कुर्सी पर बैठी हुई है l उसके सामने एक आदमी खिड़की से बाहर देखते हुए सिगरेट पी रहा है l तभी बाहर से एक आदमी आता है और कमरे में खड़ा हो जाता है l उसके आने का एहसास होते ही पहला शख्स अपना सिगरेट खिड़की से फेंक कर उसके तरफ मुड़ता है l

शख्स - क्या बात है मंगू...

मंगू - नीरा भाई... कुछ देर के बाद सुबह हो जाएगी... हम रात में इस लड़की को निकाल नहीं पाए... सुबह कैसे निकलेंगे...

नीरा - ह्म्म्म्म...

मंगू - उसने कहा था... पुलिस का लफड़ा वह सम्भाल लेगा... पर पुलिस ने इस कदर घेरा बंदी की है कि...

नीरा - ह्म्म्म्म...

मंगू - हम बेकार में इस लफड़े में फंस गए...

नीरा - बेकार में नहीं... बस अपना टाइम थोड़ा खराब निकला... पर कोई ना... हम जहां हैं... वहाँ कोई भी आने से पहले सौ बार सोचेगा...

मंगू - भाई... पुलिस को तो नहीं मालुम ना... इसे किसने उठाया है...

नीरा - अब तक मालुम हो चुका होगा...

मंगू - तो... अब इस मुसीबत को हम गले में बाँध कर क्यूँ घूमें... इसे यहीं मार कर निकल जाते हैं ना...

नीरा - मुसीबत इस लड़की के पीछे पीछे आई है... अब उसी मुसीबत से यही लड़की बचाएगी...

यह कह कर नीरा अनु की तरफ मुड़ता है l अनु के चेहरे पर अभी भी खौफ नहीं था l भाव हीन चेहरे पर भवें हल्की सी सिकुड़ी हुई थी l

नीरा - डर नहीं लग रहा तुझे... यह तो मुझे समझ में आ रहा है... पर इस सपाट चेहरे पर जो हैरानी दिख रही है... वह क्यूँ है...

अनु - यही की... मेरा अपहरण के बाद... तुम लोगों की पहली हार... मुझे भुवनेश्वर से दूर नहीं ले जा पाए... आगे हार ही हार है... फिर भी...

नीरा - ऐ लड़की... ज्यादा मत सोच... तेरा मुहँ खुला रखा है तो कुछ भी चपड़ चपड़ मत कर... शुक्र मना अभी तक हमने तेरे साथ कुछ किया नहीं है...

अनु - कुछ करने की सोचना भी मत... इतना तो समझ चुकी हूँ... मैं जिंदा और सलामत अभी तक इसलिए हूँ... क्यूंकि तुम लोगों ने वीर सिंह क्षेत्रपाल से दुश्मनी ली है....

मंगू - तो... तो क्या हो गया... तु वीर सिंह की टाइम पास है जानने के बाद ही तो उठाया है...

नीरा - सुन लड़की... वीर सिंह ने आज से छह महीने पहले... मेरे भाई सुरा और उसकी गर्लफ्रेंड को उठवाकर गायब कर दिया था... उसे वही दर्द और चोट देने के लिए तुझे उठवाया है... शुक्र मना... मेरे बदले की आग में... तु अभी तक जली नहीं...

अनु - अलबत्ता सोचना भी मत... क्यूँकी मुझे खरोंच भी आई... तो मैं खुद को ख़तम कर दूंगी... और इतना तो समझ ही चुकी हूँ... आखिरी मौके पर सौदे बाजी के लिए... मेरा सही सलामत होना जरूरी है... क्यूँकी राजकुमार की जुनून से मुझसे ज्यादा तुम लोग वाकिफ हो...

नीरा - (मंगू से) इसके मुहँ पर पट्टी बाँध दे...

मंगू एक पॉली टेप निकाल कर अनु के मुहँ पर लगा देता है l अनु कोई विरोध नहीं करती l इतने में एक और आदमी कमरे में आता है l

नीरा - क्या है मल्ला...

मल्ला - आपने बुलाया...

नीरा - हाँ...

मल्ला - तो हुकुम करो नीरा भाई...

नीरा - देखो... जहां तक मुझे अंदाजा है... इस लड़की के लिये... पुलिस सुबह तक बस्ती का घेराव करेगी...

मल्ला - तो करने दो ना भाई... पुलिस अंदर आ नहीं पाएगी...

नीरा - जानता हूँ... पर कितनी देर तक...

मल्ला - (चुप रहता है)

नीरा - देखो... मैं क्षेत्रपाल को घुटने पर देखना चाहता हूँ... समझ लो यह मेरी आखिरी जंग है... (अनु की तरफ देख कर) मुझे इस लड़की का घमंड भी तोड़ना है...

मल्ला - तो क्या करना है बोलो भाई...

नीरा - सुबह तड़के बस्ती से कुछ लोग मछली पकड़ने के लिए निकलेंगे... (अनु के तरफ़ देख कर) तुम अपने आदमियों के साथ इसे एक जाल में लपेट कर एक नाव में डाल देना... और दया नदी से हो कर चीलका में चले जाना.... वहाँ से बोट लेकर... चांदबाली पहुँच जाना...

नीरा का यह प्लान सुन कर अनु की आँखे हैरानी से फैल जाती हैं l उसकी यह दसा देख कर नीरा के चेहरे पर एक चमक उभर आता है l

नीरा - (अनु के पास जाकर उससे) हाँ... बस यही... हाँ यही तेरे चेहरे पर देखना चाहता था... हैरान... डर और परेशान... (कह कर उसके मुहँ से पट्टी निकाल देता है) अब क्या बोलेगी... एक बार तुझे भुवनेश्वर से बाहर ले चलूँ... फिर तु सोच भी नहीं सकती तेरे साथ क्या क्या करूँगा...

अनु - (बड़े गुरूर के साथ) कुछ नहीं कर पाओगे... तुम कुछ देर के लिए इस भ्रम में रहोगे की तुमने मुझे भुवनेश्वर से बाहर निकाल दिया... पर देखना तुम ही गिड़गिड़ा कर मुझे वापस बुलाओगे....

नीरा गुस्से से अनु के मुहँ पर पट्टी लगा देती है l मंगू और मल्ला की ओर देखते हुए कहता है l

नीरा - इसकी हिम्मत और इसका विश्वास हद से ज्यादा है... यही वज़ह है कि मैं अब तक इसके साथ कुछ किया नहीं है... इसकी हिम्मत और विश्वास को टूटते देखना चाहता हूँ... ले जाओ इसे...

मंगू और मल्ला दोनों आते हैं अनु को लेकर जाने लगते हैं l अनु भी किसी तरह का कोई विरोध नहीं करती l उनके साथ बाहर चली जाती है l

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सुबह के करीब चार बज रहे थे l

सुंढी साही बस्ती से कुछ दुर पर एक बड़े से बरगत के पेड़ के नीचे एक काली रंग की वैनिटी वैन खड़ी हुई है l ऐसा लगता है जैसे कोई न्यूज एजेंसी की ट्रांसमिशन वैन है l वैन के ऊपर रेडार लगा हुआ है l गाड़ी के अंदर सिर्फ तीन लोग बैठे हुए थे, जोडार, विश्व और वीर l

जोडार - (विश्व से) तुम्हें लगता है... पुलिस आ जाएगी...

विश्व - मुझे सतपती जी पर भरोसा तो है... पर...

जोडार - पर... यह पर क्यूँ...

विश्व - जोडार सर... हम जितना प्लानिंग कर रहे हैं... वे लोग भी उतना ही अपने प्लानिंग में होंगे... मैं नहीं चाहता... पुलिस आने तक अनु को किसी तरह से बस्ती से निकालने कोशिश की जाए...

जोडार - ह्म्म्म्म...

विश्व - पर जोडार सर... आप खामखा हमारे साथ आए... किसी ऑपरेटर को भेज देते.. तो काम बन सकता था...

जोडार - ओये... मैं एक एक्स सर्विस मेन हूँ... मुझे मत सिखाओ... मुझे क्या करना चाहिए... वैसे भी... चूंकि तुम डायरेक्टली इंवॉल्व हो... इसलिए अपने मैं भी तैयार हो गया...

विश्व - फिर भी... यह सब गैजेट्स... आप ऑपरेट करेंगे...

जोडार - देखो विश्व... तुम मेरे अपने... बहुत खास हो... (वीर को दिखा कर) यह तुम्हारा दोस्त है.... पर मेरा... पर्सनल और प्रोफेशनल दुश्मन का बेटा है... पर मजबूरी यह है कि... यह तुम्हारा दोस्त है...

वीर - थैंक्यु... जोडार सर...

जोडार - देखो वीर... बुरा मत मानना... आई एम फ्रोम आर्मी... झूठ बोल नहीं सकता...

वीर - मैं आपका आभार रहूँगा...

जोडार - वेल... मैं मदत भी इसलिए कर रहा हूँ... क्यूंकि बात एक लड़की की भी है... सो योंग मेन... अब आगे क्या करना है...

विश्व - सर... आपके गैजेट्स के मदत से मैं... बस्ती के अंदर छुपके छुपाते हुए जाऊँगा... और अनु तक पहुँचने की कोशिश करूँगा....

जोडार - गुड... आइडिया बुरा नहीं है... पर खतरा है...

विश्व - मैं उसके लिए तैयार हूँ... आप बेफिक्र रहें... मैं निपट सकता हूँ...

वीर - नहीं प्रताप... बस्ती के अंदर जाऊँगा तो मैं..

विश्व - देखो वीर... तुम इस मामले में कच्चे हो... तुम्हारी एक गलती... उन्हें ना सिर्फ अलर्ट कर देगी... बल्कि तुम्हें खतरे में डाल देगी...

वीर - नहीं प्रताप... मुझ पर यकीन करो... अनु को सिर्फ मैं ही ढूंढ सकता हूँ... मेरी दिल की धड़कन उसकी पता लगा लेगी... तुम बस.. बाहर से जो मदत हो सके वही करो...

विश्व - पर वीर...

वीर - प्लीज प्रताप... यह मेरे प्यार का... और अनु की मुझ पर विश्वास का इम्तिहान है... अगर कामयाब रहा... तो प्यार जीतेगी... अगर हार भी गया तो... प्यार हारेगी नहीं... पर विश्वास जीत जाएगा... प्लीज...

विश्व - तो चलो हम मिल कर चलते हैं...

वीर - नहीं प्रताप नहीं... यह जंग मेरा अपना है... इसे मुझे ही लड़ने दो... तुम्हें अपने प्यार का वास्ता... तुम्हें अपनी शेरनी का वास्ता... प्लीज... आज एक आशिक को... अपने प्यार के लिए... दुनिया से लड़ जाने दो...

विश्व कुछ कह नहीं पाता, बस छटपटा कर रह जाता है l उसके कंधे पर हाथ रखते हुए जोडार कहता है

जोडार - वीर सही कह रहा है विश्व... लेट हीम गो... उसे जाने दो... यह वीर और अनु विश्वास की परिक्षा है...

विश्व - ठीक है... अगर आप दोनों का यही मानना है... तो यही सही... पर मेरी भी एक शर्त है...

वीर - कहो...

विश्व - देखो गैजेट्स के मदत से... तुम्हें अलर्ट करने के साथ साथ... रास्ता भी बताता रहूँगा... पर जैसे ही मुझे आभास होगा... तुमसे सिचुएशन नहीं संभालेगा... तब मैं भी अंदर जाऊँगा...

वीर - प्रताप... बात अगर मार पीट की है... तो मैं हर सिचुएशन को संभाल सकता हूँ...

विश्व - वह मैं कुछ नहीं जानता... जब मुझे लगेगा के तुम फंस गए हो... बाहर नहीं निकल सकते... तब मैं भी अंदर जाऊँगा...

वीर - ओके...

विश्व वीर को एक ब्लू टूथ वाली कंपनी के इयर बड देता है l वीर उसे कान में लगा लेता है l वीर अपने जेब में एक फोल्डिंग रॉड को निकाल कर चेक करता है और फिर अपनी आस्तीन में वापस रख लेता है l उसके बाद विश्व और वीर दोनों वैन से उतरते हैं l विश्व एक हाथ घड़ी वाली माइक निकाल कर कलाई पर बाँधता है l विश्व उस घड़ी को ऑन करता है l

विश्व - हाँ... जोडार साहब... हम रेडी हैं... आप पतंग उड़ाईये...

विश्व का इशारा पाते ही जोडार अपने गाड़ी के सिस्टम में एक लिवर दबाता है l तभी गाड़ी के ऊपर से कुछ छोटे छोटे ड्रोन्स उड़ने लगते हैं l कुछ ऊंचाई पर ड्रोन्स अपनी दिशाएँ बदल कर बस्ती के उपर उड़ने लगते हैं l

जोडार - (विश्व से) क्या वीर तुमसे कनेक्ट है...

विश्व - हाँ...

जोडार - उसे कहो वैन के बायीं ओर सीधे जाए और...

विश्व - वीर तुम अपनी बायीं ओर सीधे जाओ... तीसरे पोल के पास... वहाँ पर पहरेदारी पर आदमी गायब है...

वीर - ओके..

कह कर वीर भागने लगता है l तीसरे पोल के पास एक संकरी गली दिखती है l वीर उस गली में घुस जाता है l विश्व के हाथ में एक टेबलेट मानिटर था l वीर के बदन पर एक ट्रैकर लगा दिया था l इसलिए वीर की मूवमेंट विश्व मॉनीटर से पता कर रहा था l थोड़ी देर बाद विश्व अपनी जगह से वीर के दिशा में चलने लगता है l

जोडार - अखिर तुमसे रहा नहीं गया ना... चल दिए वीर के पीछे...

विश्व - (अपने बाएं कान का इयर बड को म्यूट करता है) हाँ... वीर बेवक़ूफ़ है... अपने इश्क की बेवक़ूफ़ी मैं सूइसाइड करने जा रहा है... मैं उसे ऐसे कैसे जाने दे सकता हूँ... आप बस ड्रोन मॉनीटर से रास्ता बनाइये... और खतरे से आगाह कीजिए... बाकी मैं संभाल लूँगा...

जोडार - हाँ मैं बस देखे जा रहा हूँ... तुम भी वीर को रास्ता बताते हुए अंदर पहुंचने की कोशिश करो... वैसे भी... इस बस्ती में सोचने समझने वाले कम हैं...

विश्व - जी... हमें जो भी करना है... पुलिस के आने से पहले करना है...

विश्व अपने कान का इयर बड को फिर से ऑनलाइन करता है और जोडार के कहे बात को वीर तक पहुँचाते हुए खुद भी अंदर जाने लगता है l अचानक उसे एहसास होता है कि वीर के सामने कुछ लोग खड़े हो गए हैं l विश्व भागते हुए एक जगह पहुँचता है जहां दो लोग हाथ में कटार लिए वीर पर हमला करने के लिए तैयार दिखते हैं l वीर भी उनके सामने खड़ा था l उन दो आदमियों से एक हाथ में कटार को हिलाते हुए वीर पर हमला करता है l
 
थैंक्स भाई

हाँ फ़िलहाल वीर गुस्से और जोश में है

उसकी स्थिति को विश्व अच्छी तरह से भांप गया है

इसलिये विश्व वीर को बैकअप देगा

यह कोई स्पयलर नहीं है दोनों अनु को बचा लेंगे

कोई शक़ नहीं है उसमें

हाँ यह बात आपने बिल्कुल सही कही सेंधमारी तो हो चुकी है

निश्चय

पर लिखना शुरु नहीं किया है

अपने बेटे के लिए एक रथ का निर्माण कर रहा था

आज रथयात्रा के उपरांत मैं लिखना शुरु करूँगा
 
हा हा हा

इसे मूर्खता भी कहा जा सकता है

उसे अपने राजकुमार पर और अपने प्यार पर हद से ज्यादा भरोसा है l

हाँ अब परिवार में बिखराव शुरु हो गया है

आगे चलकर पिनाक की भी एक अहम भूमिका रहेगी

हाँ यह तो सच है

हाँ वीर अपने प्यार में, गुस्से में और जोश के साथ अकेले अनु तक पहुँचना चाहता है l पर ऐसे परिस्थितियों पर नजाने कितनी बार गुजर चुका है l इसलिए उसकी पारखी नजर यह समझते देर नहीं की वीर मूर्खता करने जा रहा है जिसकी भरपाई विश्व को ही करनी पड़ेगी

हाँ यह तो है

भाई आखिर थ्रिलर फोरम की कहानी है एक्शन तो बनता है
 
बिल्कुल सही कहा लियोन भाई आपने

पिनाक यह स्वीकार ही नहीं कर पा रहा है कि वीर को इतना अकेला कर देने के वाबजूद वीर ने मदत हासिल कर ली और सबसे बड़ा झटका तब लगा उसकी मदत क्षेत्रपालों के सबसे बड़े दुश्मन विश्व उसका मदत कर रहा है

हाँ यहीं से क्षेत्रपाल साम्राज्य का पतन शुरु हो गया

हाँ विश्व का दिमाग पर सच यह भी है कि सेनापति दंपति वही करेंगे जो विश्व कहेगा या चाहेगा

सतपती वही ऑफिसर है जो तापस सेनापति के अंडर जैल में पोस्ट था l जाहिर है कि उसके प्रमोशन में विश्व का बड़ा हाथ है

हाँ यही लल्लन विश्व का एक सीक्रेट वेपन है l जो आगे चलकर एक जबरदस्त धमाका करने वाला है

यह स्वाभाविक है

ऐसे मामलों में विश्व को अनुभव है

जब कि वीर पुरी तरह अनभिज्ञ है

हाँ आख़िर दोस्त है वीर उसका
 
मैंने पहले ही कहा था इस कहानी में तीन प्रेम कहानियाँ हैं l उनमें वीर और अनु की भी एक कहानी है

वीर ही वह वज़ह बनने वाला है जिसके बिखरने से क्षेत्रपाल साम्राज्य ढह जाने वाला है

हाँ ऐसे हालातों का विश्व को बखूबी अनुभव है l वीर इन मामलों में बहुत कच्चा है

पर विश्व है ना जो अपने दोस्त के लिए राह आसान करते जाएगा

अपडेट पांच में आपने पढ़ा होगा केके के कहने पर विक्रम सुरा और उसकी प्रेमिका को रंग महल के आखेट गृह में भेज दिया था l नीरा उसी सुरा का भाई है l क्यूँ उठाया था यह अगले अपडेट में मालुम पड़ेगा

हाँ यहां पर ब्रह्मास्त्र तो प्रतिभा जी ही रहीं

थैंक्स

शुक्रिया

धन्यवाद

आभार
 
मित्रों जीवन कभी आसान नहीं होता l कुछ घटनायें होंगी यह प्रकृति का नियम हैं l पर उसका समय हम निर्धारण नहीं कर सकते l मेरे जीवन में एक दुर्घटना हुई है l संभलने में थोड़ा समय लगा l कहीं भी मेरा मन नहीं लग रहा था l पर चूंकि मैंने वादा किया था इस कहानी को पूरा करने के लिए इसलिए बहुत दिनों बाद आया हूँ l कहानी का अगला अंक लेकर l

धन्यबाद व आभार
 
👉एक सौ पैंतीसवां अपडेट

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वीर चार लोगों से घिरा हुआ था l अचानक उनमें से एक वीर पर कटार से हमला कर देता है l वीर उससे बचता है और अपने कमर के पीछे रखे फोल्डिंग रॉड को झटका देकर निकालता है l रॉड उस झटके से तीन फुट लंबा हो जाता है l इतने में जिसने वीर पर हमला किया था वह अब संभल जाता है और उसके साथी भी अपनी अपनी हथियार निकाल लेते हैं l चारों के हाथों में हथियार देख कर वीर अपना पॉजिशन बनता है l इतने में कुछ दुर से देख रहा विश्व अपने पेंट की जेब से एक छोटा सा थैला निकालता है और उसमें से शर्ट के बटन की आकार के कुछ नुकीले चक्र निकालता है और उन लोगों पर फेंक मारने के लिए तैयार हो जाता है l जैसे ही एक आदमी अपना हथियार उठाकर हमलावर होता है तभी उसके कलाई पर कुछ चुभती है l ऐसी हालत उस अकेले की नहीं होती बल्कि एक पलक झपकी में बारी बारी से चारों के साथ होता है l उनकी वही थोड़ी डिस्ट्रेकशन का फायदा उठाकर वीर उन चारों पर रॉड से हमला कर देता है l रॉड के मार से चारों के मुहँ से दर्द भरी कराह निकलने लगती है l पर वीर उन्हें ज्यादा समय नहीं देता चारों को एक एक घुसा मारता है l वीर के हर एक घुसे के साथ वे लोग कटे पेड़ की तरह जमीन पर गिरने लगते हैं l उनके गिरते ही वीर चारों तरफ़ अपनी नजरें घुमाता है फिर सावधानी से आगे बढ़ जाता है l उसके वहाँ से निकलने के बाद विश्व उन चारों के पास पहुँच कर उन लोगों का जायजा लेता है l चारों के जबड़े पर मार जबरदस्त लगी थी l चारों कराह रहे थे l तभी विश्व के कान में लगे पॉड में आवाज आती है l

जोडार - तुम वहीँ पर क्यूँ रुक गए...

विश्व - (अपनी बायीं तरफ की पॉड को म्यूटे कर) सोच रहा हूँ... इन्होंने हमला तो किया पर किसीको आगाह नहीं किया.. क्यूँ...

जोडार - क्यूँ.. शक की कोई वज़ह...

विश्व - हम छुप कर इस बस्ती में घुस रहे हैं... मैंने जैसा सोचा था... वैसी पहरेदारी भी नहीं है... फ़िर भी पहली ही कदम पर वीर घेर लिया गया... वैसे वीर ने उन्हें अच्छे से हैंडल किया...

जोडार - तो प्रॉब्लम क्या है...

विश्व - यह लोग कौन हैं... मार तो खाए पर किसी को आगाह तक नहीं किया...

जोडार - हाँ पॉइंट तो है... वैसे कैसी हालत है उनकी...

विश्व - जबड़ों की हालत खराब है...

जोडार - क्या... (चौंक कर) वीर के पंच में इतना ताकत है...

विश्व - नहीं... शायद वीर अपने हाथों में... आइरन पंच वाला ग्लोभ्स पहना हुआ है...

जोडार - ओ... वैसे वीर कहाँ तक पहुँचा...

विश्व - आप भी तो ड्रोन विजन से देख रहे होंगे...

जोडार - हाँ... पर जिस आई पैड में सुंढी साही का मैप डाला था... वह तुम्हारे पास है...

विश्व - तो क्या हुआ... वीर आपके नजरों में तो होगा ना... आखिर सारे ड्रोन्स में... इंफ्रा रेड थर्मल विजन है...

जोडार - हाँ वीर सही रास्ते में बढ़ रहा है... आगे शायद तुम्हें कंटैक्ट करेगा... क्यूंकि जंक्शन आ रहा है....

विश्व - ठीक है...

जोडार - वैसे तुम इन लोगों के साथ क्या कर रहे हो...

विश्व - इन लोगों की बेहोशी को बढ़ा रहा हूँ... और कचरे में फेंक रहा हूँ...

विश्व पहले अपने कान में लगे इयर पॉड को ऑन करता है फिर एक एक करके उन लोगों के बायीं कान के नीचे एक नस पर हल्का सा दबाव बढ़ा कर सबको उठा उठा कर कूड़ेदान में डालता है l तभी उसके कान में वीर की आवाज़ गूंजती है l

वीर - प्रताप... मैं एक जंक्शन पर कन्फ्यूज हो रहा हूँ...

विश्व - देखो... मैंने पहले ही कहा था.. मुझे साथ लेने के लिए...

वीर - तुम्हें शायद पता नहीं... मैंने खुद ही... अभी थोड़ी देर पहले... कुछ लोगों को निपटा दिया है...

विश्व - हाँ देखा आपने टैब से... तुम जोडार साहब के... इंफ्रा रेड ड्रोन सर्विलांस में हो...

वीर - तो... अभी बताओ... मुझे जाना कहाँ है...

विश्व - सीधे जाओ... फिर बायीं तरफ एक मोड़ मिलेगा... वहाँ पर पहुँचो...

वीर - ठीक है...

विश्व - जल्दी करो... सुबह होने वाला है... हमें सुबह होने से पहले उस घर तक पहुँचना होगा... लोग जाग गए तो... ना तो अनु के पास पहुँचेंगे... ना ही निकल पायेंगे...

वीर - मैं... अनु के वगैर... यहाँ से जाऊँगा ही नहीं...

विश्व - ओके ओके.. चल आगे बढ़...

वीर आगे चलता है, पर उसे अंदाजा तक नहीं था कि विश्व भी उसके पीछे बराबरी की दूरी बनाए जा रहा है और मैप के अनुसार वीर को रास्ता बता रहा है l कुछ ही देर बाद वीर एक घर के सामने रुकता है l

वीर - एक जगह पर पहुँच गया हूँ... क्या यह सही जगह है...

विश्व - हाँ बिल्कुल...

वीर - तो अब मैं... अंदर जा रहा हूँ...

विश्व - ठीक है... संभल कर...

वीर घर के बरामदे में बड़ी सतर्कता के साथ खड़ा होता है l चारों ओर अपनी नजरें दौड़ता है l वीर अपना फोल्डिंग रॉड निकालता है और बायीं हाथ में एक आइरन पंच पहनता है l धीरे धीरे दरवाजे तक पहुँच कर धक्का देता है l दरवाजा खुल जाता है l अंदर कुर्सी पर वीर को एक आदमी बैठा हुआ मिलता है जो वीर की ओर रीवॉल्वर ताने हुए था l

आदमी - आओ... क्षेत्रपाल खानदान के चश्मों चराग आओ... तुम्हारा ही इंतजार था... (वीर के पीछे देख कर) ओ... लगता है... मेरे आदमियों को निपटा कर आए हो... साले नालायक निकले...

वीर - हाँ... चार ही थे... अपनी नींद खराब कर... बड़े उतावले हो रहे थे... मैंने कुछ नहीं किया... बस कुछ देर के लिए सुला दिया...

आदमी - चु.. चु.. चु.. नहीं करना था ऐसा... आखिर तुम्हें उन्हीं के कंधे पर जाना था... अब तुम्हें किसी मरे हुए कुत्ते की तरह घसीटते हुए ले जाना पड़ेगा...

वीर - बस.. बहुत हो गई बकचोदी... बोल हराम जादे... कहाँ है मेरी अनु...

आदमी - बकचोदी... तुझे लगता है मैं बकचोदी कर रहा हूँ... तु आयेगा... मैं जानता था... अनु को चारा बनाया... और अपने पिंजरे में तुझे लाया... तुझे मारने से पहले... यह एहसास दिलाने... किसी अपने को खोने का दर्द क्या होता है...

वीर आगे बढ़ने की कोशिश करता है कि तभी उस आदमी की रीवॉल्वर से एक गोली वीर पैरों के पास फर्श पर लगती है l वीर रुक जाता है l

आदमी - नहीं वीर नहीं... तुझे आज मरना है... मरेगा भी तु... पर मरने से पहले... तुझे कुछ कहना है...

आदमी की बात ख़तम होते ही कुछ और लोग उस कमरे में आ जाते हैं l गिनती में बीस या पच्चीस होंगे l वीर अपनी नजरें एक बार घुमा कर जायजा लेता है फिर उस आदमी की ओर देखता है l

आदमी - मैं नीरा... आज से तक़रीबन छह महीने पहले... तुमने मेरे भाई सुरा और उसकी मंगेतर एलोरा को उठवा लिया था... जो आज तक गायब हैं... (वीर कुछ याद करने की कोशिश करता है) याद आया... यह उसीका बदला है... (दांत चबाते हुए) तुम क्षेत्रपाल... अपनी अहं के आगे किसीको कुछ भी नहीं समझते... तुम लोगों के गुरूर और हवस के आगे... मेरा भाई और उसकी मंगेतर... (और कुछ भी नहीं कह पाता)

वीर - हाँ हाँ... याद आया... तु बात ऐसे कर रहा है... जैसे तु, तेरा भाई और उसकी मंगेतर... क्या नाम बताया... अरे हाँ.. एलोरा... बी ग्रेड अल्बम की रंडी... जैसे दूध के धुले और बड़े मासूम थे...

नीरा - (तमतमा कर खड़ा हो जाता है) वीर...

वीर - हाँ... तुम सब हरामजादे... आइकन ग्रुप के लिए... काम करते हुए... क्षेत्रपाल की सल्तनत में सेंध लगाने की कोशिश करी थी... वह तुम्हारा भाई सुरा... अपनी मंगेतर एलोरा के जरिए... बड़े बड़े लोगों को फंसा कर... टेंडर हासिल करने की कोशिश की थी... मैंने उन्हें उनकी किए कि सजा दी थी...

नीरा - वीर...

वीर - और तुम क्या कह रहे थे... सुरा की मंगेतर... अबे हरामजादे... सच तो यह है कि... वह एलोरा तुम दो भाइयों की रखैल थी...

नीरा - वीर... (गोली चला देता है, पर वीर को लगती नहीं है, पर वीर अपनी जगह से टस से मस नहीं होता)

वीर - कहाँ है अनु...

नीरा - हा हा... हा हा हा हा... क्या अजीब फॅमिली है... साला बाप जिसकी सुपारी देता है... बेटा उसे बचाने आया है...

वीर - मेरे बाप ने तुझे तो सुपारी दे नहीं सकता.... तेरे और मेरे बीच में तीसरा कोई है... कौन है वह...

नीरा - उससे तुझे क्या मतलब... उसे तेरे बाप का काम करना था... और मुझे तुझसे बदला लेना था...

वीर - अनु कहाँ है...

नीरा - एलोरा को... तुम लोगों ने... अपने रंग महल ले गए थे ना... अब अनु तुझे वहाँ मिलेगी जहां लोग अपनी रातें रंगीन करने के लिए जाएंगे...

वीर - कमीने...

वीर नीरा के ऊपर छलांग मारता है, पर उस कमरे में मौजूद दुसरे लोग वीर को पकड़ लेते हैं और वीर को उसके घुटने पर ला देते हैं l वीर के सामने नीरा खड़े होकर

नीरा - आह... क्या सीन है... क्षेत्रपाल मेरे सामने घुटनों पर... मज़ा आ गया...

नीरा अपना रीवॉल्वर वीर के सिर पर तान देता है कि तभी उसके हाथ में एक छोटा सा तारा नुमा धातु आ कर चुभती है l नीरा के हाथ से रीवॉल्वर छिटक जाता है l उसके चेहरे पर दर्द उभर जाता है और कराहने लगता है l इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता जो लोग वीर को घुटने पर गिरा कर पकड़े हुए थे सबकी पकड़ ढीली हो जाती है क्यूंकि सबकी हाथों में उसी तरह की धातु से हमला हुआ था l वीर छूटते ही नीरा पर फिर से टूट पड़ता है l दुसरे लोग जब संभल कर वीर की ओर बढ़ते तब अचानक से विश्व उन लोगों के सामने आ जाता है l विश्व को सामने देख कर सभी भौचक्के हो जाते हैं l यहाँ तक वीर भी अपनी हैरानी छुपा नहीं पाता l अपनी मेटल पंच से वीर नीरा की हालत खराब करने में लग जाता है l उधर विश्व अकेले ही उस कमरे में मौजूद लोगों को सुबह सुबह तारे दिखाने लगता है l

वीर - (नीरा की धुनाई करते हुए विश्व से) तुम... कब आए...

विश्व - बस तुम्हारे उपर खतरे का जब एहसास हो गया...

वीर - (नीरा की गर्दन पकड़ कर) इसने जब मुझ पर गोली चलाई... तब क्या देख रहे थे...

विश्व - हाँ... देख रहा था...

वीर - मैं मर गया होता तो...

विश्व - जो बदला लेने के वक़्त... बैकलॉल करे... वह इतनी जल्दी किसी को गोली नहीं मार सकता... इसे मारना होता... तो तुम्हें तभी मार चुका होता...

विश्व की मार से कुछ लोग खिड़की तोड़ कर बाहर गिरने लगते हैं l बाहर कुछ लोग यह देख कर चिल्ला कर सबको इकट्ठा होने को कहते हैं l

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दम दम एयर पोर्ट की ओर चार कारों का काफिला बढ़ रहा था l सबसे आगे वाली कार में सेक्यूरिटी सवार थे l उस कार के पीछे वाले कार में भैरव सिंह बैठा हुआ था l भैरव सिंह के कार के पीछे एक और कार में पिनाक और विक्रम बैठे हुए थे l विक्रम देख रहा था पिनाक के चेहरे पर परेशानी साफ झलक रही थी l

विक्रम - छोटे राजा जी... क्या हुआ... बहुत परेशान लग रहे हैं...

पिनाक - (अपनी दांत चबाते हुए) वज़ह आप जानते हैं युवराज...

विक्रम - तो क्या... वीर ने अनु को ढूंढ लिया...

पिनाक - नहीं... पर राजकुमार... कल रात घर नहीं पहुँचे हैं...

विक्रम - ओ...

पिनाक - आज उनकी मंगनी है... अगर वह नहीं आए... तो राजा साहब की बड़ी बेइज्जती होगी... और हमारा सिर हमेशा के लिए नीचे झुक जाएगा...

विक्रम - कमाल है ना... आपने मंगनी ऐसे तय की है... जैसे सरकार इमर्जेंसी डिक्लेर करती है... आपने वीर से पूछा तक नहीं...

पिनाक - हमने जरूरी नहीं समझा...

विक्रम - आपने वीर की बातों पर... या कामों पर तवज्जो दी ही कब थी... पता नहीं आपने कभी वीर को... अपने लिए जरुरी कभी समझे भी थे या नहीं...

पिनाक - (बिदक जाता है) युवराज... आप अपनी हद से आगे जा रहे हैं... मत भूलिए हम कौन हैं...

विक्रम चुप हो कर खिड़की से बाहर की ओर देखने लगता है l अभी सुबह होने में कुछ देर है l फिर भी धीरे धीरे उजाला फैल रहा था l गाड़ी के भीतर कुछ देर के लिए खामोशी पसर जाती है l यह खामोशी पिनाक को बर्दास्त नहीं होती l

पिनाक - आप... आप चुप क्यूँ हो गए...

विक्रम - खुद को हद के दायरे में रखने की कोशिश कर रहा हूँ...

पिनाक - प्लीज युवराज... कुछ तो सुझाव दीजिए... आपको लगता है यह शादी जल्दबाज़ी में हो रहा है... हम इंकार नहीं कर रहे हैं... पर रास्ता कुछ नहीं था... केके के हमसे टूटना और हमारे ना सिर्फ पोलिटिकल राइवल बल्कि बिजनैस राइवल से हाथ मिलाना... हमारे वज़ूद को चैलेंज कर रहा था... इसलिए उसके टक्कर में.... निर्मल सामल को खड़ा करना पड़ रहा है... बदले में...

विक्रम - बदले में... मैरेज कम बिजनस एग्रीमेंट...

पिनाक - आप अभी तक सिर्फ सिक्यूरिटी सम्भाले हुए हैं... जिस दिन सत्ता और साम्राज्य संभालेंगे... तब हमारी बातेँ समझ में आयेंगी...

विक्रम - ह्म्म्म्म...

पिनाक - अब आप ही बताएं... हम कैसे राजकुमार जी का पता लगाएं...

विक्रम - आपका सबसे क़ाबिल और समझदार आदमी भुवनेश्वर में है ना... प्रधान उससे खबर लीजिए...

पिनाक को विक्रम का जवाब पसंद नहीं आता l फिर भी अपना मोबाइल निकाल कर बल्लभ को कॉल लगाता है l कॉल मिलते ही

पिनाक - प्रधान...

बल्लभ - जी छोटे राजा जी...

पिनाक - अब तक की क्या खबर है...

बल्लभ - पता नहीं पर...

पिनाक - पर...

बल्लभ - अभी कुछ देर पहले... कुछ प्लैटुन सुंढी साही बस्ती की ओर रवाना हुए हैं...

पिनाक - अच्छा... समझ गया... अब फोन रखो...

पिनाक कॉल काट कर फोन को कस कर पकड़ लेता है और अपनी जांघ पर रगड़ने लगता है l विक्रम अपनी भवें सिकुड़ कर पिनाक की हरकत पर गौर कर रहा था l फिर अचानक पिनाक एक और कॉल करता है l उधर से कॉल पीक होते ही

पिनाक - हैलो...

@ - जी छोटे राजा जी कहिए...

पिनाक - जानते हो... पुलिस निकल चुकी है...

@ - निकलने दीजिए... कौनसा उसे ढूंढ लेगी...

पिनाक - देखो कुछ भी हो जाए... आज शाम मंगनी से पहले पुलिस के हत्थे कुछ लगनी नहीं चाहिए...

@ - आप बेफिक्र हो जाइए छोटे राजा जी... उस लड़की का अगुवा आप ही के दुश्मन से कराया है... वह तो लड़की को छोड़ने से रहा...

पिनाक - कहीं यह लड़की सुंढी साही में तो नहीं है...

@ - यह मुझे पता नहीं है... हो भी सकती है... क्यूँ क्या हुआ..

पिनाक - पुलिस वहीँ पर जा रही है...

@ - तो फिर आप बेफिक्र हो जाइए... सुंढी साही एक अंधेरी कुआं है... जो उसमें खो गया... किसीको नहीं मिलेगा... और उस बस्ती के लोग बड़े ही खुंखार होते हैं... इसलिए आज तक कभी पुलिस या प्रशासन उस बस्ती में जाने की हिम्मत नहीं की है...

पिनाक - ठीक है...

पिनाक एक आत्म सन्तुष्टि के साथ फोन पर कॉल को काट देता है और एक इत्मीनान भरी मुस्कान के साथ विक्रम की ओर देख कर कहता है

पिनाक - अब सिर्फ आपके हिस्से का काम बाकी है युवराज... राजकुमार को शाम की पार्टी में लाना आपका जिम्मा...

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वीर, सुरा के साथ बाहर आकर घर की बरामदे में गिरता है l वीर सुरा का गर्दन दबोच रखा था वह अपनी नजर उठा कर देखता है कि घर के बाहर भीड़ हैरान हो कर उसे देख रही है l उस भीड़ के बीच मल्ला था, उसके आँखों में आश्चर्य और गुस्सा दोनों था l यूँ तो गोली चलने की आवाज से धीरे धीरे घर के बाहर इकट्ठे हो रहे थे और एक दुसरे को हैरानी के साथ देख रहे थे, क्यूंकि पहली बार ऐसा हुआ था कि कोई उसके जानकारी के वगैर सुंढी साही में घुसा है और तो और उसके मेहमान को दबोच रखा है l मल्ला का जिस्म गुस्से में थर्राने लगता है l

मल्ला - मारो इस हराम जादे को...

भीड़ इतना सुनते ही वीर की ओर बढ़ने हो वाली थी के पास में सीमेंट के बने इलेक्ट्रिक खंबो में एक के बाद ही के चार धमाके होने लगते हैं l और वह खंबे कुछ इस तरह से टूटते हैं कि बरामदे के पास एक वर्गाकार क्षेत्र बन जाता है l मल्ला और कुछ लोग उस वर्गाकार क्षेत्र में रह जाते हैं और बाकी भीड़ उन खंबो से बने क्षेत्र के बाहर खड़ी रह जाती है l अभी अभी जो हुआ था ना सिर्फ बस्ती वाले बल्कि खुद वीर भी हैरान था l हाथ में एक रिमोट लेकर घर के भीतर से विश्व निकलता है l मल्ला जैसे ही विश्व को देखता है हैरानी से उसकी आँखे बड़ी हो जाती हैं l भीड़ में कुछ लोग हल्ला मचाते हुए उन गिरे हुए खंबों को लांघ कर हमले की बात कर रहे थे कि विश्व रिमोट से एक और बटन दबाता है l एक जोरदार धमाका होता है पास के जंक्शन के ट्रांसफॉर्मर में l सबका ध्यान उस तरफ खिंच जाता है l जो लोग हरकत कर रहे थे वह लोग अपनी गुस्से को दबा कर विश्व की ओर देखने लगते हैं l उस भीड़ में से एक आदमी विश्व की रिमोट वाली हाथ पर निशाना लगा कर एक दरांती फेंक मारता है l निशाना अचूक था पर बेकार l विश्व जैसे इस हमले के लिए तैयार था अपनी बाएँ हाथ से दरांती पकड़ लेता है और पलक झपकते ही उसी आदमी पर वापस फेंक मारता है l दरांती उसी आदमी के कंधे पर लगती है l इससे पहले कि लोग किसी और तरह से प्रतिक्रिया देते मल्ला पीछे घुम कर

मल्ला - बस... अब कोई कुछ नहीं करेगा...

सब लोग जैसे रोबोट की तरह रुक जाते हैं l मल्ला विश्व और वीर की ओर मुड़ता है l

मल्ला - विश्वा भाई आप यहाँ..

विश्व - हाँ मैं यहाँ... पर तुम यहाँ कैसे...

मल्ला - यही मेरी बस्ती है.... यहाँ के सारे धंधे मेरे जिम्मे और हिफाजत में होते हैं...

विश्व - आज तुम्हारे लिए मेरी राय बदल गई है...

मल्ला - आप भूल रहे हो विश्वा भाई... सुपारी उठा कर काम करना मेरा पेशा है...

विश्व - हाँ जानता हूँ... पर जुर्म करो तो कुछ मर्दाना हो... तुम तो दल्ले निकले... एक लड़की को उठा लाए...

मल्ला - ना विश्वा भाई ना... ना मैंने ना मेरे किसी आदमी ने लड़की को उठाया है... (सुरा की ओर इशारा करते हुए) इसने और इसीके आदमियों ने लड़की को उठाया था... बदले में एक रात की पनाह और रास्ता मांगा था... मोटी रकम के बदले... सो हमने दी...

विश्व - अब रात ख़तम हो चुकी है मल्ला...

मल्ला - पर है तो मेरी पनाह में...

विश्व - बात एक रात की थी... जिसकी उसने रकम चुकाई थी... रात गई... बात गई...

वीर - अब मैं तुमसे आज का पूरा दिन खरीदता हूँ... अपनी रकम बोलो...

सुरा - नहीं... मल्ला... नहीं... यह धोका है... तु मेरे साथ ऐसा नहीं कर सकता...

विश्व - अपनी कीमत बोलो मल्ला...

मल्ला के पास खड़ा एक आदमी - मल्ला भाई... यह दो लोग हैं... हम इतने हैं... हुकुम करो... काट डालेंगे...

भीड़ - हाँ हाँ मल्ला भाई हाँ हाँ...

मल्ला घुम कर उस आदमी के गाल पर एक थप्पड़ जड़ देता है l यह देख कर वह आदमी और भीड़ भी सन्न रह जाते हैं l

मल्ला - जानता है वह कौन है... विश्वा... विश्वा भाई है... वह एक अकेला सौ के बराबर है... अगर इस बस्ती में वह आया है... तो यकीनन पूरी तैयारी... बंदोबस्त के साथ आया होगा... देखा नहीं अपनी चारों तरफ हुए धमाकों को...

जिस ऊंची आवाज़ से मल्ला बस्ती वालों से कह रहा था वह आवाज ना सिर्फ बस्ती वालों पर प्रभाव छोड़ रही थी बल्कि वीर और सुरा पर भी बराबर असर कर रही थी l

विश्व - मल्ला... यकीन मानों मैं कोई और खूनखराबा नहीं चाहता... अपनी आज के दिन भर की कीमत बोलो...

मल्ला - ठीक है... आज का पूरा दिन आपको दे दी... पर कोई फायदा नहीं होगा... क्यूँकी सुबह के अंधरे में... इसने अपने आदमियों के जरिए उस लड़की को मछवारों के साथ... दया नदी के जरिए चीलका भेज दिया है...

यह सुन कर वीर गुस्से में सुरा को अपनी तरफ़ घुमाता है और घुसे बरसाने लगता है l विश्व एक बार फिर रिमोट में बटन दबाता है l एक धमाका और होता है पास वाले कूड़े दान में l धमाके की आवाज का असर था कि ना सिर्फ वीर रुक जाता है बल्कि जो लोग विश्व को धर दबोचने की सोच भी रहे थे वह लोग भी अपनी सोच से बाज आ गए l

विश्व - (मल्ला से) तुम उसकी मत सोचो... लड़की हम तक कैसे पहुँचेगी वह हम सोच लेंगे...

इतने में एक आदमी भागते हुए आता है और चिल्लाते हुए कहता है l

- पुलिस वाले आए हैं...

मल्ला विश्व की तरफ हैरानी भरे नजरों से देखता है l फिर पास खड़े अपने आदमी से

मल्ला - कहा था ना.. यह आपनी पूरी तैयारी और बंदोबस्त के साथ आया होगा... (जो खबर लाया था उस आदमी से) कितने पुलिस वाले हैं...

आदमी - तीन चार ट्रकों में भर भरकर आए हैं...

मल्ला - क्या... (विश्वा से) पहली बार ऐसा हुआ है... इतने पुलिस वाले यहाँ आए हैं...

विश्व - हाँ इस बस्ती की इतिहास मालुम है... पहले पुलिस वाले सिर्फ जीप पर आते थे... आज प्लाटुन भर कर आए हैं.... फैसला तुम्हारे हाथ में है मल्ला... या तो तुम पीस जाओगे... या फिर पैसे बनाओगे...

मल्ला - ठीक है... कोई खून खराबा नहीं... अब तुम बोलो हमें क्या करना है....

विश्व - कुछ लोगों के लेकर बस्ती के मुहाने पुलिस को रोकने के लिए बैरिकेड् बनाओ...

मल्ला - पुलिस हमला कर सकती है...

विश्व - जब तक मेरा इशारा ना हो... पुलिस कुछ नहीं करेगी...

मल्ला अपना सिर हिलाता है और कुछ मर्द और औरतों को पुलिस को अंदर आने से रोकने के लिए कहता है l आधे से ज्यादा भीड़ पुलिस को रोकने के लिए वहाँ से चली जाती है l विश्व वीर को इशारा करता है l

वीर - अपना कीमत बोलो मल्ला...

मल्ला - लड़की मिल जाए... तो जो सही लगे... इस बस्ती के खाते में जमा कर देना...

फिर मल्ला अपने आदमियों को इशारा करता है l धीरे धीरे वहाँ से लोग चले जाते हैं l वहाँ पर सुरा और नीचे गिरे छटपटाते हुए उसके साथियों के साथ वीर और विश्व रह जाते हैं l वीर सुरा को खिंच कर अंदर लाता है और उसी सोफ़े पर पटक देता है जहाँ वह बैठा था l फिर सुरा को घुमा कर सोफ़े के हेड रेस्ट पर उल्टा लिटा देता है और उसके हाथों को सोफ़े के पीछे वाले पैरों में बाँध देता है और सुरा के पैरों को सोफ़े के आगे वाले पैरों में बाँध देता है l उसके बाद सुरा के चेहरे के सामने आकर खड़ा हो जाता है l उसके बालों का पकड़ कर सुरा का चेहरा उठाता है

वीर - बोल कमीने... कहाँ है मेरी अनु...

दर्द भरी चेहरे पर मुस्कान लाते हुए सुरा - नहीं बताऊँगा...

वीर - बता हराम जादे... नहीं तो..

सुरा - कुछ भी कर ले... मर जाऊँगा... मगर नहीं बताऊँगा...

वीर - सुन हरामजादे... मैं तेरे अंदर इतना दर्द और खौफ भर दूँगा के... तू अपने आप तोते की तरह बोलने लगेगा...

सुरा - हा हा हा हा... कोशिश करके देख ले...

वीर सुरा के चेहरे पर एक घुसा जड़ देता है l सुरा दर्द के मारे कराहने लगता है l विश्व सुरा से पूछने के लिए आगे आता है तो वीर उसे रोक देता है l

वीर - नहीं प्रताप... इसने मेरे जुनून को छेड़ा है... इससे मुझे हो पूछने दो...

विश्व - पर वीर...

वीर - भरोसा रखो... अगर मैं हार गया... तो तुम्हें ही कहूँगा इससे उगलवाने के लिए...

विश्व रुक जाता है l वीर इसबार सुरा के पीछे आता है और उसका पेंट घुटने तक उतार देता है l

सुरा - यह क्या कर रहे हो...

वीर - कहा था ना... तेरे अंदर दर्द और खौफ इतना भर दूँगा के तु तोते की रटने लगेगा...

विश्व भी हैरान था वीर के इस हरकत पर l वीर कमरे में किचन की ओर जाता है l विश्व को किचन से वीर की कुछ ढूंढने की आवाज़ आ रही थी l कुछ देर बाद वीर के हाथ में दो अंडे थे l

विश्व - तुम करना क्या चाहते हो वीर...

वीर - शक्कर ढूंढ रहा था... शक्कर तो नहीं मिली पर यह दो अंडे मिल गए...

विश्व - हाँ दिख रहा है मुझे... पर तुम करना क्या चाहते हो...

वीर - टॉर्चर... एक स्पेशल टॉर्चर... जो इसने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा...

विश्व - मतलब...

वीर - अभी देखो...

वीर एक ग्लास में अंडे फोड़ कर डाल देता है, चम्मच से फेंट लेने के बाद थोड़ा थोड़ा कर सुरा के पिछवाड़े के सूराख और गांड पर चम्मच से मलने लगता है l विश्व की आँखे हैरत से फैल जाता है l वीर अब सुरा के सामने आकर खड़ा हो जाता है l

वीर - देख सुरा दर्द से पहले... तु अनु का पता बता दे...

सुरा - तु कुछ भी कर ले... तुझे इस जनम में अनु नहीं मिलेगी...

वीर - (अपनी जैकेट की जीप खोल कर एक कपड़े से लिपटी छोटा थैला निकालता है, और उसे सुरा को दिखाते हुए) तु तो जानता है ना... मैं हमेशा अनु की हिफाजत के लिए उसके पीछे लगा रहता था... उसके गली के बाहर एक पेड़ के नीचे उसके इंतजार में छुपा रहता था... उसी पेड़ के एक शाखा पर यह लाल चीटियों का घोंसला था... (यह सुनते ही विश्व और सुरा की आँखे हैरानी से फैल जाते हैं) लाल चींटी... वह भी बड़े बड़े... जानता है ना... यह झुंड में खाना खाते हैं... इनकी झुंड की भूख के आगे हाथी भी बेबस हो जाती है... अब तेरे पिछवाड़े मैंने अंडे का फेंट मल दिया है... इससे पहले कि इन चीटियों को तेरा पिछवाड़ा खाने की दावत में पेश कर दूँ... सीधी तरह से बता दे... अनु कहाँ है...

सुरा - (चिल्लाते हुए) मैंने अपने साथी मंगू के साथ उसे दया नदी के रास्ते.... चीलका भेज दिया है...

वीर - तो उसे फोन कर... और अनु को वापस लाने के लिए बोल...

सुरा - तु कुछ भी कर ले... मैं... मंगू को नहीं बुलाऊंगा...

वीर - ठीक है... अब मैं यह चीटियां तेरे पिछवाड़े पर छोड़ दूँगा... यह धीरे धीरे पहले स्टार्टर में तेरे गांड का नास्ता करेंगे... उसके बाद मैंस में तेरे लंड और टट्टे खाएंगे... यकीन मान... दो घंटे बाद... तेरे कमर के नीचे की ढांचे में... सिर्फ हड्डियाँ होंगी... पर मांस नहीं होगा....

सुरा - नहीं...

वीर धीरे धीरे सुरा के पीछे आता है और अपने दस्ताने पहने हुए हाथों से उस कपड़े के थैले से सूखे पत्तों का एक गोला निकालता है l उस गोले का एक सिरे में छोटा सा छेद कर देता है l सिर्फ दो ही सेकेंड के बाद बहुत बड़े बड़े और डरावने गहरे लाल रंग के कुछ चींटी बाहर निकलते हैं l वीर उन्हें सुरा के पिछवाड़े पर छिड़क देता है और फिर उस गोले की छेद को बंद कर कपड़े की थैले में वापस रख देता है l उसकी इस हरकत को विश्व मुहँ फाड़े देख रहा था l थोड़ी देर बाद सुरा का चीखना शुरु हो जाता है l

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दया नदी में एक मोटर चालित नाव तेजी से आगे बढ़ रही थी l सुरज पूर्व आकाश को चीर कर थोड़ा ही ऊपर उठा है, पर दूर से ऐसा लग रहा था जैसे एक नाव तेजी से उगते सुरज की ओर बढ़ी जा रही थी l नाव मैं मंगू दो साथियों के साथ बैठ कर सिगरेट फूँक रहा था l एक कोने पर अनु चुप चाप बैठी हुई थी l

एक - मंगू... ए मंगू...

मंगू - क्या है बे...

एक - यार... कल से भूख बड़ी जबरदस्त लग रही है...

मंगू - क्यूँ बे... रात को ही तो ठूंस ठूंस कर खाया था... फिर भी भूख लग रही है... पहले चीलका पहुँचने दे... लड़की को पार्सल करने दे... उसके बाद जी भर के ठूंस लेना...

एक - यार तु समझा नहीं...

मंगू - क्या मतलब...

एक - अरे यार मंगू... तु समझ नहीं रहा है... यह भूक अलग है... पेट की नहीं... लौडे की है... तन बदन की है... (यह सुनते ही मंगू चौंकता है और सवालिया नजरों से अपने उस आदमी को देखता है) बात इस लड़की को बर्बाद करने की है... तो क्यूँ ना... हम ही बोहनी कर देते...

दुसरा - (चहकते हुए) हाँ... यार... लड़की का जब पार्सल ही करना है... तो अच्छी तरह से जाँच परख कर पार्सल कर देते हैं...

मंगू - (एक कुटिल मुस्कराहट के साथ अनु की ओर देखते हुए) हाँ मैं भी यही सोच रहा हूँ... साली है बहुत कड़क... ऊपर से तीखी... चखने को मन कर रहा है... (तीनों हँसने लगते हैं)

एक - पर मेरे को तो पहले चाटना है... फिर काट काट कर खाना है...

दुसरा - तो देरी क्यूँ... चलो एक साथ मिलकर... इसकी मुनिया में डुबकी लगाते हैं...

तीनों खड़े होते हैं और धीरे धीरे अनु की तरफ आगे बढ़ते हैं l इतनी देर से बेखौफ रही अनु को अब डर लगने लगती है l वह डर के मारे अपनी जगह पर खड़ी हो जाती है और उन्हें धमकाते हुए

अनु - रुक जाओ... खबर दार जो आगे बढ़ने की कोशिश की तो...

मंगू - (अपने साथियों से) ऐ... तुम लोग रुको रे... मुझे इसके क़रीब जाने दो... (अनु से) मैंने इन्हें रोक दिया है... अब हम इकट्ठे नहीं... एक एक कर के आयेंगे...

अनु - देखो... अपने हद में रहो... वर्ना... मैं कुद जाऊँगी... तुम जानते नहीं हो... तुम लोगों का क्या होगा... यह तुम लोग सोच भी नहीं सकते....

मंगू - अरे अरे रे... लड़की डर गई... (तीनों हँसने लगते हैं) अब तक तेरे आशिक ने क्या उखाड़ा है... पुलिस कमिश्नरेट का घेराव ही तो किया है...

अनु - सिर्फ उतने में ही तो तुम लोगों की गिली हो गई... के शहर के रास्ते के बजाय... नदी के रास्ते मुझे ले जा रहे हो... (यह सुन कर मंगू भड़क जाता है)

मंगू - साली... डर रही है... मगर डराने की भी कोशिश कर रही है...

दो साथी - हाँ भाई... अभी तक सलामत है... इसीलिए इतना फुदक रही है... एक बार फुद्दी फटी तो लाइन में आ जाएगी... (तीनों फिर से आगे बढ़ने लगते हैं, अनु पीछे हटते हुए नाव के सिरे पर पहुँच जाती है)

अनु - देखो मैं आखिरी बार कह रही हूँ... मेरे करीब आए तो कुद जाऊँगी... मुझे अगुवा कर पहले ही अपनी बर्बादी पर मोहर लगा चुके हो... अब इससे आगे बढ़े... तो तुम्हारा अंजाम बहुत बुरा होगा...

मंगू - अच्छा... क्या बुरा होगा... कितना बुरा होगा...

अनु - यकीन ना आए तो अपने मालिक से पूछ लो...

तीनों मरदुत ठहाके लगा कर हँसने लगते हैं के तभी मंगू की जेब से मोबाइल बजने की आवाज आती है l मंगू अपने जेब से मोबाइल निकाल कर देखता है स्क्रीन पर बॉस डिस्प्ले हो रहा था l फोन कॉल पर लेते हुए

मंगू - (स्पीकर पर डालते हुए) वाह सुरा भाई वाह... बड़ी लंबी उमर है तुम्हारी... अभी अभी इस लड़की ने तुम्हें याद किया और तुमने फोन लगा दिया...

सुरा - (चिल्ला कर) अबे भोषड़ी के मंगू... जल्दी लड़की को वापस ला...

यह सुनते ही तीनों की सिट्टी-पिट्टी गुम हो जाती है, चेहरे पर जो भद्दी हँसी थी एकाएक गायब हो जाती है l लड़खड़ाती हुई लहजे में मंगू पूछता है

मंगू - क्या.. क्या हुआ... सुरा भाई...

सुरा - आह... पुलिस को तुम्हारी लोकेशन मालुम हो गया है... आह... और चीलका पुलिस और नेवी तुम लोगों के लिए आगे आ रही है... आह... बस्ती को पुलिस घेर चुकी है... आह...

मंगू - पर मल्ला तो कह रहा था... बस्ती में कभी पुलिस घुस नहीं सकती...

सुरा - अबे मादरचोद... मैं यहाँ... तुझे कैफ़ियत नहीं दे रहा हूँ... मल्ला हमसे पैसे लिए... हमारा काम कर दिया... अब राजकुमार से पैसा लेकर उनका काम कर रहा है... आह मेरी हालत तब तक खराब रहेगी जब तक लड़की उन्हें... आ आह... नहीं मिल जाती... इसलिए भोषड़ी वाले अपनी खैरियत की सोच कर लड़की को वापस ले आओ... वर्ना अंजाम बहुत बुरा हो... गा... आ आह...

फोन कट जाता है, अब तीनों के चेहरे पर हवाईयाँ उड़ने लगती है l तीनों अपनी नजर घुमा कर अनु की तरफ़ देखते हैं l अनु के चेहरे पर एक जबरदस्त आत्मविश्वास भरा मुस्कराहट था l

मंगू - (मोटर वाले से) ऐ ऐ... नाव घुमा... नाव घुमा रे वापस...

मोटर वाला नाव को वापस मोड़ देता है l अब दृश्य कुछ इस तरह था कि नाव के आगे अपनी हाथ को मोड़ कर कुहनियों के बीच फांस कर अनु खड़ी थी और मंगू और उसके दो साथी डरे डरे से मोटर वाले के पास खड़े हुए थे l हवाएँ अनु के जुल्फों को उलझा रहे थे और अनु बार बार अपनी उलझी लटों को एक रूहानी खुशी के साथ सुलझा रही थी l उसे ऐसा लग रहा था जैसे वह हवा में उड़ते हुए जा रही है l करीब आधे घंटे बाद नाव किनारे पर लगती है l अनु पीछे मुड़ कर नहीं देखती सीधे किनारे पर कुदते हुए उतरती है और भागने लगती है l उसे लगता है जैसे उसके भागते रास्ते के दोनों तरफ लोग उसकी इस्तकबाल कर रहे हैं उसे उसकी राजकुमार से मिलाने के लिए l वह बस भागी जा रही थी l जैसे ही उसे वह घर दिखती है जहां उसे कैद कर रखा गया था, वह अचानक उस घर से कुछ दूर ठिठक जाती है l उसके रुकते ही एक हवा का झोंका उसे छुते हुए गुज़रती है l वह देखती है दरवाजे से बदहवास वीर भागते हुए बाहर आता है और बरामदे पर आकर ठिठक जाता है जैसे उस हवा के झोंके ने अनु का संदेश वीर तक पहुँचाया हो l दोनों एक दूसरे को देखते ही एक दूसरे की ओर भागने लगते हैं l वीर के करीब पहुँचते ही अनु छलांग लगा देती है वीर उसे अपनी बाहों में थाम कर गले से लगा लेता है, अनु का चेहरा वीर के कंधे पर थी और पैर जमीन से छह इंच उपर थे l वीर की बाहों में अनु झूल रही थी l दोनों की आँखे भीगी हुई थीं पर दोनों के चेहरे पर अद्भुत रौनक थी l कुछ लोग यह दृश्य देख कर हैरान हो रहे थे और कुछ लोग खुश l

वीर - अनु...

अनु - हूँ..

वीर - तुझे डर लगा...

अनु - थोड़ा... और आपको..

वीर - ना... ऊँहुँ...

अनु - (मुस्कराते हुए) झूठे...

वीर - सच में...

अनु - झूठ... कितनी जोर से आपने मुझे जकड़ रखा है...

वीर - (बड़ी मुश्किल से अपनी जज्बातों को काबु करते हुए) हाँ... बहुत डर गया था... तु मिल गई.. ऐसा लग रहा है... जिंदगी मिल गई... इन सत्रह घंटों में... ना जाने कितनी बार मरा हूँ... कई मौतें मरा हूँ... तु सीने से क्या लग गई... मैं जी उठा हूँ...(अनु चुप रहती है)

अनु - (झूलते हुए वीर के कंधे से अपना सिर निकालती है और वीर के माथे पर अपना माथा लगा देती है) मैं भी... बस भगवान से प्रार्थना कर रही थी... या तो मेरे राजकुमार आ जाएं या मेरी मौत... आपने तो मेरी मौत को हरा दिया...

वीर - (अनु को जोर से भींच कर) चुप पगली... तुझे कुछ हो जाता तो... मैं जिंदा ही कहाँ रहता... अब चाहे कुछ भी हो जाए... मुझे तुझसे कोई अलग नहीं कर सकता...
 
👉एक सौ छत्तीसवाँ अपडेट

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भुवनेश्वर एयर पोर्ट से क्षेत्रपाल एंड कम्पनी बाहर आती है l बाहर गाड़ियों के साथ बल्लभ इन सबकी इंतजार में था l भैरव सिंह अपनी गाड़ी के पास जाकर गाड़ी में बैठ जाता है l पिनाक उसके पास आकर खड़ा होता है l

भैरव - क्या आप हमारे साथ बारंग रिसॉर्ट जाना चाहेंगे...

पिनाक - नहीं राजा सहाब... हम प्रधान के साथ... सब ठीक कर लेने के बाद... शाम की पार्टी में बुलाने के लिए आयेंगे...

भैरव - ठीक है... हम प्रतीक्षा करेंगे...

भैरव सिंह की गाड़ी वहाँ से निकल जाता है l पिनाक उसे जाते हुए देखता है l उसे महसूस होता है कि उसके बगल में बल्लभ और विक्रम खड़े हैं l

विक्रम - आपका प्लान क्या है छोटे राजा जी...

पिनाक - (बल्लभ से) जाओ प्रधान गाड़ी लाओ... (विक्रम से गाड़ी में बात करते हैं...

बल्लभ इशारा करता है एक बड़ी गाड़ी आकर उसके आगे रुकती है l बल्लभ आगे ड्राइवर के बगल वाली सीट पर बैठ जाता है विक्रम और पिनाक पीछे वाली सीट पर बैठ जाते हैं l

पिनाक - ड्राइवर... गाड़ी को द हैल ले चलो... (ड्राइवर गाड़ी स्टार्ट कर आगे बढ़ा देता है) हाँ तो प्रधान... अब मुझे स्थिति के बारे में जानकारी दो...

बल्लभ - राजा सहाब... मेरी जानकारी के मुताबिक... लड़की को दया नदी के रास्ते... डिपोर्ट कर दिया गया है... बस्ती के लोग पुलिस को शाम तक रोके रखेंगे... जब तक पुलिस बस्ती के अंदर घुस कर लड़की को ढूँढेगी... उनके हाथ कुछ नहीं लगेगा...

पिनाक - ह्म्म्म्म... और मीडिया... उसका क्या...

जवाब में बल्लभ गाड़ी के भीतर ही रूफ पर लगे एक एलसीडी को निकाल कर ऑन कर देता है l उसमें नभवाणी चैनल पर न्यूज चल रहा था l न्यूज सुप्रिया पढ़ रही थी l

" वाव की महिलाएँ अनु की दादी को लेकर अभी भी एडवोकेट प्रतिभा जी के नेतृत्व में कमिश्नरेट के बाहर धरने पर बैठीं हुई हैं l रात भर पुलिस हाथ पैर मारती रही पर कहीं भी अनु की कोई खबर नहीं मिली है l इधर विपक्ष के नेता भी मैदान में कुद चुके हैं l ऐसा प्रतीत हो रहा है अनु की गुमशुदगी सरकार व प्रशासन पर भारी पड़ने वाली है l

हमारी सूत्रों से प्राप्त खबर के अनुसार पुरी रोड पर स्थित सुंढी साही बस्ती में दंगा भड़क गया है, जिसे नियंत्रित करने के लिए भारी पुलिस बल को सुंढी साही बस्ती की ओर भेज दिया गया है l दंगे के कारण पुरी जाने वाली राज मार्ग को बंद कर दिया गया है l अभी तक दंगे का कारण पता नहीं चल पाया है l यह सब देखकर विपक्ष के नेता पुछ रहे हैं इस राज्य में क्या हो रहा है "

बल्लभ न्यूज को बंद कर एलइडी स्क्रीन को रूफ टॉप पर वापस लगा देता है l

बल्लभ - जैसा कि आपने देखा... मीडिया... इस मामले में पुरी तरीके से अंधेरे में है...

पिनाक - गुड... बहुत अच्छा मेंटेन किया है तुमने...

बल्लभ - राजकुमार की कोई खबर...

बल्लभ - आई एम सॉरी... उनके बारे में मेरे पास कोई जानकारी नहीं है...

पिनाक के जबड़े भिंच जाते हैं l एक गहरी साँस छोड़ते हुए सवालिया नजर से विक्रम की ओर देखने लगता है l विक्रम उसके मन की आशय को समझ जाता है

विक्रम - नहीं छोटे राजा जी... वीर ने मुझसे किसी भी तरह का कॉन्टेक्ट नहीं किया है...

पिनाक - हम जानते हैं... हम राजकुमार ने आपसे किसी भी तरह से संपर्क नहीं किया होगा..

विक्रम - फिर... आप वीर के बारे में प्रधान से पूछने के बाद... मेरी तरफ क्यूँ देख रहे थे...

पिनाक - बात तजुर्बे की है युवराज... ज़माने को देखने के लिए... तजुर्बे की चश्मा चढ़ानी पड़ती है... हमें खुद पर भरोसा रहता है... दुश्मन को अपने सामने गिनते भी नहीं है... पर आपने जिस तरह से... उस हरामजादे विश्वा की बात कही... थोड़ा शक तो होने ही लगा था... कहीं राजकुमार उस लड़की तक पहुँच तो नहीं गए...

विक्रम - आपने सच कहा... बात तजुर्बे की है... आप अपनी तजुर्बे की चश्मे से दुनिया को देखते हैं... और हम अपनी...

पिनाक - हाँ... और दुश्मन को देखने और पहचानने की नजरिया हमारी आपसे बेहतर है... (विक्रम चुप रहता है) कल आपने जिस तरह से बात रखी थी... हमें लगा था... राजकुमार कामयाब हो जाएंगे... पर आप गलत निकले...

विक्रम - रात को मंगनी भी है... आपकी जीत तभी मुकम्मल होगी... जब वीर मंगनी करने आएगा... अभी तक वीर की कोई ख़बर भी तो नहीं है...

इस बार पिनाक चुप हो जाता है l दांत पिसते हुए विक्रम की ओर देखता है l गाड़ी इतने में हैल की परिसर में प्रवेश करती है l गाड़ी के रुकते ही कुछ गार्ड्स भागते हुए आते हैं और दरवाजा खोलते हैं l विक्रम तो उतर जाता है पर पिनाक जो कुछ सोच में खोया हुआ था उतरता नहीं है l उसे विक्रम आवाज देता है

विक्रम - छोटे राजा जी...

पिनाक - (ख़यालों से वापस आते हुए) हुँम्म्म्म.......

विक्रम - हम हैल में आ गए...

पिनाक - ओ...

पिनाक गाड़ी से उतरता है l विक्रम और पिनाक दोनों आगे आगे चलते हैं पीछे पीछे बल्लभ चलता है l बैठक में पहुँचने के बाद पिनाक बल्लभ को वहीँ रुकने के लिए कह कर अंदर हॉल में आता है l देखता है घर की तीनों औरतें बैठीं हुई हैं l पिनाक को देखते ही तीनों उठ खड़े होते हैं l शुभ्रा भागते हुए आती है पिनाक की पैर छूती है l पिनाक शुभ्रा को इग्नोर करते हुए सुषमा के पास जाता है और उसके सामने खड़ा हो जाता है l पिनाक सुषमा की चेहरे पर गौर करने लगता है l

सुषमा - ऐसे क्या देख रहे हैं छोटे राजा जी...

पिनाक - हमें आपसे कुछ जानना है...

सुषमा - तो पूछिये...

पिनाक - (अपनी भवें सिकुड़ कर) राजकुमार कहाँ हैं...

सुषमा - हम नहीं जानते...

पिनाक - हूँम्म्म्म्म.... क्या आपकी उनसे बात नहीं हुई है अब तक...

सुषमा - नहीं...

पिनाक - क्यूँ...

सुषमा - राजकुमार ने बताया नहीं...

पिनाक - आपने पुछा नहीं...

सुषमा - क्षेत्रपाल मर्द घर कब आते हैं... कब जाते हैं यह पूछने का हक है हमें...

पिनाक - माँ हैं आप उनकी...

सुषमा - और आप... आप पिता हैं उनके...

पिनाक - इसलिए तो हम अपना फर्ज अदा कर रहे हैं... उनकी विवाह निश्चित कर...

सुषमा - उनकी मर्जी जाने वगैर...

पिनाक - मर्जी... कैसी मर्जी... क्षेत्रपाल की आन बान और शान के आगे किसीकी भी मर्जी मायने नहीं रखती...

सुषमा - यह बात समझाया भी जा सकता था...

पिनाक - समझा दिया है और एहसास भी हो जानी चाहिए...

सुषमा - आपने जो किया... जो भी किया... वह पहले हमें आगाह कर देते...

पिनाक - क्यूँ... क्या कर लेतीं आप... और आप होती कौन हैं... जिसे हम खबर कर देते... (थोड़ी देर के लिए सुषमा चुप हो जाती है) क्यूँ सांप सूँघ गया...

सुषमा - हम... राजकुमार को समझाते...

पिनाक - हाँ बिल्कुल वैसे ही... जैसे माली साही बस्ती में जाकर... उस दो कौड़ी लड़की को कंगन पहनाने की तरह...

वहाँ पर खड़े सब के सब सन्न रह जाते हैं l पिनाक सबके चेहरे पर एक नजर दौड़ाने के बाद कहता है

पिनाक - हम जानते हैं.... राजकुमार की इस ओछी हरकत में... आप सबकी सहमती है... शुक्र कीजिए... हमने यह बातें राजा साहब से किया नहीं है... हम बस यह कहने यहाँ आए हैं... आज आप सब सिम्फनी होटल में शाम सात बजे तक राजकुमार जी को लेकर आ जाइए... कैसे किस हाल में... हमें कोई मतलब नहीं है... बस मंगनी के वक़्त वहाँ पर राजकुमार मौजूद रहना चाहिए वह भी चेहरे पर हँसी खुशी लिए....

इतना कह कर पिनाक वहाँ से निकल जाता है l पीछे सभी को गहरी सोच में छोड़ कर l

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सुबह के नौ बज रहे थे l कमिश्नरेट के मुख्य गेट के बाहर रोड के दूसरे किनारे पर एक शामियाना के नीचे दादी बैठी हुई थी और उसके बगल में प्रतिभा बैठी हुई थी l रात भर तकरीबन डेढ़ सौ के करीब औरतें इनके साथ धरने पर बैठीं हुई हैं l गेट के बाहर और धरने पर बैठीं महिलाओं को घेर कर बड़ी तादात में पुलिस बल तैनात थी l घेराव के बाहर कुछ न्यूज चैनल वाले अपनी अपनी रिपोर्ट देने की तैयारी कर रहे थे l पुलिस मुख्यालय की किसी भी कार्यवाही में बाधा न पहुँचे इसलिए कमीश्नरेट की गेट के पास कोई घेराव नहीं था l ऐसे में नभवाणी चैनल की बड़ी सी न्यूज ट्रांसमिशन वैन पहुँचती है l उसमें से सुप्रिया रथ उतर कर धरने पर बैठे औरतों के पास जाती है l एक किनारे पर प्रतिभा किसी से फोन पर बात कर रही थी l उसकी बात ख़तम होते ही जैसे ही मुड़ती है सामने सुप्रिया दिखती है l सुप्रिया उसे नमस्कार करती है l जवाब में प्रतिभा अपना सिर हिला कर अभिवादन स्वीकार करती है l जैसे ही प्रतिभा महिलाओं के सामने दादी के पास बैठ जाती है, सुप्रिया दादी के सामने आकर दादी को प्रणाम करते हुए कहती है

सुप्रिया - दादी.. हम आपकी एक इंटरव्यू लेना चाहते हैं... (अपनी ट्रांसमिशन गाड़ी दिखाते हुए) वह हमारी मोबाइल स्टुडियो है... उसके भीतर कुछ देर के लिए...

दादी - नहीं... मैं कहीं नहीं जाऊँगी... मुझे मेरी पोती चाहिए...

सुप्रिया - (प्रतिभा से) आंटी जी... कम से कम आप समझाइए... दादी की यह बाइट बहुत इम्पोर्टेंट है...

प्रतिभा - (दादी की कंधे पर हाथ रखकर) माँ जी यह ठीक कह रही है... आपकी लड़ाई लड़ने के लिए... हम सब यहीं हैं...

दादी - नहीं नहीं... मैं नहीं जाऊँगी...

प्रतिभा - ठीक है चलिए... मैं भी चलती हूँ आपके साथ...

बड़े मनाने के बाद दादी तैयार होती है और प्रतिभा के साथ ट्रांसमिशन वैन में चली जाती है l एक छोटा कमरे जैसे था और उसके अंदर कुछ कुछ सोफ़े पडी हुईं थीं l पीछे दीवार पर हरे रंग की स्क्रीन लगी हुई थी l दादी को लेकर सुप्रिया सोफ़े पर बिठा देती है l वैन के दुसरे सिरे पर दरवाजा खुलती है, पहले एएसपी सुभाष सतपती निकलता है उसके पीछे विश्व, उनके पीछे वीर और अनु निकलते हैं l अनु को देखते ही दादी हैरान और खुशी के मारे सोफ़े से उछल पड़ती है l अनु भागते हुए अपनी दादी की गले लग जाती है l

दादी - अनु.. यह तु ही है ना... कहीं मैं सपना तो नहीं देख रही हूँ...

अनु - हाँ दादी मैं ही हूँ...

वीर - दादी... जैसा कि मैंने तुम्हें वादा किया था... देख लो... अनु सही सलामत है...

दादी अनु को छोड़ वीर के गले लग जाती है और बहुत जोर से रोने लगती है l अनु उसे संभालते हुए दिलासा देने लगती है और चुप होने के लिए कहती है l दादी की रोना धीरे धीरे सिसकियों में बदलने लगती है l

वीर - (दादी को अपने से अलग करते हुए) दादी... जो हुआ... उसके लिए जो चाहो सजा दे सकती हो...

दादी - क्या सजा दूँ दामाद जी आपको.... जब रानी साहिबा ने इसे कंगन पहना कर बहु मान लिया... तब मेरा इस पर हक कहाँ रह गया था... पर हाँ झूठ नहीं कहूँगी... कल से अब तक डर रही थी... आखिर दादी हूँ मैं इसकी... ऊपर जा कर इसके बाप को मुहँ भी तो दिखाना है...

अनु - ऐसी बातेँ क्यूँ कर रही हो दादी...

दादी - कह लेने दे मुझे कह लेने दे... डर इसलिये गई थी... कहीं सपना और ख्वाहिश औकात से बड़ी तो नहीं ही गई... पर... (वीर की बाहों को पकड़ कर हिलाते हुए) आज दामाद जी ने यकीन दिला दिया... मेरी अनु को अब कोई खतरा नहीं है... (दादी अनु की हाथ लेकर वीर के हाथ में देते हुए) लो दामाद जी... अब यह बोझ भी हल्का कर दो... मुझे चिंता मुक्त कर दो..

वीर - हाँ दादी... तुमसे वादा करता हूँ... मैं अनु से जल्द ही शादी करूँगा...

दादी के कंधे पर प्रतिभा हाथ रखती है l तब दादी प्रतिभा की ओर मुड़ती है और उसके गले लग कर कहने लगती है

दादी - पता नहीं आपको मैं कैसे धन्यवाद कहूँ...

प्रतिभा - मैंने कुछ नहीं किया... कुछ भी नहीं किया... क्या करूँ... (विश्व को दिखाते हुए) यह जो है ना... मेरा बेटा... इसने जो कहा जैसा कहा बस मैंने किया... इसके खातिर...

वीर - (विश्व के पास जाकर) हाँ दादी... आज अगर यह ना होता... तो मैं तुम्हें मुहँ दिखाने लायक न होता...

दादी विश्व के आगे जाकर हाथ जोड़ देती है l

विश्व - यह क्या कर रही हैं आप दादी... मैंने जो भी किया वह सब अपने दोस्त के लिए और... बहन मानता हूँ अनु को... उसके लिए... और मैं अकेला कहाँ था... (सुभाष को दिखा कर) यह और... (सुप्रिया को दिखा कर) यह भी तो साथ दिए... तभी हम अनु को ढूँढ पाए...

दादी घूमते हुए सबको हाथ जोड़ कर अपनी आँखों से कृतज्ञता जताती है l वीर दादी को सोफ़े पर बिठा कर पानी पिलाने के लिए अनु से कहता है l अनु वैसा ही करती है l

सुप्रिया - तो... अब क्या हुआ डिटेल में बताओ.. और आगे क्या करेंगे... क्या प्लान है...

विश्व - सुप्रिया जी... क्या हुआ सब आपको सुभाष जी बतायेंगे... और आगे क्या करना है... वीर जैसा कहेगा.. हम वैसे ही आगे बढ़ेंगे...

सुभाष - हमने तक़रीबन तीस अरेस्ट कर लिया है... पर शाम तक अरेस्ट नहीं दिखाएंगे...

सुप्रिया - क्यूँ..

सुभाष - उनमें से कुछ एक ही हालत खराब है... इलाज चल रहा है... सीक्रेटली...

सुप्रिया - ओह... पर पुरी एनएच तो अभी भी जाम है... (कुछ समझते हुए) अच्छा तो शाम को सड़क खुलेगा...

सुभाष - हाँ...

सुप्रिया - और शाम तक यह सीन चलाना पड़ेगा...

सुभाष - हाँ... शाम को ही हम मुजरिमों की गिरफ्तारी दिखा सकते हैं.... और इंट्रोगेट कर पाएंगे...

वीर - इंट्रोगेट करना क्या है... (दादी की तरफ़ देख कर थोड़ी धीमी आवाज में) आप सबको तो मालुम है.. इसके पीछे कौन है...

विश्व - हाँ... पर कुछ नहीं कर सकते... वह क्रिमिनल थर्ड पार्टी से हैं... फर्स्ट और थर्ड के बीच सेकेंड होता है.. उस सेकेंड पार्टी को ढूंढना होगा...

सुभाष - विश्व सही कह रहा है वीर... हमें थोड़ी सावधानी बरतने की जरूरत है.. वर्ना उनके गिरेबां पर हाथ रखने की छोड़ो... हम उनके पास फटक भी नहीं सकते...

थोड़ी देर के लिए वैन में शांति छा जाती है l इतनी देर से शांत खड़ी प्रतिभा, शांति को तोड़ते हुए पूछती है

प्रतिभा - ठीक है... वह सब कानूनी प्रक्रिया है... फिलहाल के लिए तुम लोग करना क्या चाहते हो...

सुप्रिया - हाँ एकजाक्टली मैं भी यही पुछ रही हूँ...

विश्व - इस वक़्त... अनु के बारे में सभी अंधेरे में रहें तो ठीक है... शाम तक.... सतपती जी गिरफ्तारी दिखाएंगे और मीडिया को खबर करेंगे...

सुप्रिया - तब तक धरने का क्या... और अनु और वीर कहाँ जायेंगे...

सुभाष - अभी कुछ देर बाद... कमीश्नरेट के अंदर से... कुछ ऑफिसर आयेंगे... मैडम सेनापति जी से वार्तालाप करेंगे... उसे आप टीवी पर लाइव प्रसारण करेंगे... आज रात की मोहलत मांगी जाएगी... प्रदर्शन करीयों से... जिसे मैडम स्वीकार करेंगी...

सुप्रिया - ठीक है... समझ गई... क्या यह सब कमिश्नर जानते हैं...

सुभाष - नहीं... मैं खुद अपने कुछ साथियों के साथ मिलकर यह सब संभाल लूँगा...

सुप्रिया - वाव... आई एम इम्प्रेस्ड... और दादी जी...

सुभाष - इन्हें मैं... इनके घर में छोड़ दूँगा... (दादी से) हाँ दादी जी... शाम तक आपको खुदको संभालना होगा... जब तक... अनु फिरसे आपके पास वापस नहीं आ जाती...

दादी - क्यूँ... अब अनु कहाँ जाएगी...

वीर - दादी... आज शाम तक अनु मेरे साथ रहेगी... फिर देर शाम तक मैं और अनु दोनों आपके पास.. आपके साथ होंगे... और हाँ... आज रात का खाना भी आपके साथ होगी...

दादी - (खुश हो जाती है) ठीक है दामाद जी...

वीर - (आगे बढ़ कर दादी के पैर के पास बैठते हुए) दादी... अब चाहे कुछ भी हो जाए... आज दुनिया को मालुम हो जाएगा... वीर सिंह क्षेत्रपाल की शादी कल अनु से होगी...

दादी वीर के चेहरे पर हाथ फ़ेर कर दुआएँ देने लगती है और बलाएँ लेने लगती है l

प्रतिभा - ह्म्म्म्म... तो माँ जी... चले पहले धरने पर...

सुभाष - हाँ दादी... आप अभी धरने पर जाइए... मैं खुद आपको बस्ती में छोड़ने जाऊँगा...

प्रतिभा और दादी नभवाणी के ट्रांसमिशन वैन से उतर कर धरने पर जाते हैं l इतने में छुपते हुए वीर और अनु वैन से सटे एक गाड़ी में बैठ कर चले जाते हैं l सुप्रिया अपने कैमरा मेन को लेकर धरने के पास पहुँच कर रिपोर्टिंग शुरु कर देती है l इतने में कमीश्नरेट से कुछ ऑफिसर वार्ताकार बन कर धरने के पास आते हैं, प्रतिभा और दादी से बात करते हैं l प्लान के अनुसार प्रतिभा और दादी धरना स्थगित करने के लिए राजी हो जाते हैं l सुभाष सतपती दादी को लेकर वहाँ से चला जाता है l धरने पर बैठे औरतों को प्रतिभा धन्यवाद कर विदा करती है l सभी जाने के बाद विश्व को लेकर प्रतिभा अपनी गाड़ी के पास जाती है और विश्व को बिठा कर उस जगह से निकल जाती है l

प्रतिभा - (गाड़ी चलाते हुए) खुश लग रहा है...

विश्व - हँ... क्या... कहा तुमने..

प्रतिभा - यही की... खुश तो है ना तु...

विश्व - हाँ... माँ बहुत... और थैंक्यू...

प्रतिभा - ऐ... झापड़ मारूंगी समझा...

विश्व - माँ किसी गैर के लिए कौन इतना करता है... ना तो अनु से तुम्हारी कोई जान पहचान है... ना ही वीर से कोई रिश्ता...

प्रतिभा - मुझसे ना सही... तुझसे तो है... वैसे... खुश तु किसके लिए है...

विश्व - मैं समझा नहीं...

प्रतिभा - वीर की जीत पर... या क्षेत्रपाल की हार पर...

विश्व - ओ... तो यह है तुम्हारा सवाल... ओविऔसली वीर के लिए माँ...

प्रतिभा - क्यूँ... क्षेत्रपाल की हार से नहीं...

विश्व - यह क्षेत्रपाल की हार नहीं है माँ... यह बस एक झटका है... जो उसे उसके खून ने दिया है...

प्रतिभा - हाँ पर कंधा तो तुम्हारा है ना...

विश्व - वह दोस्ती का हक था माँ...

प्रतिभा - वैसे... क्या प्लान है वीर का... आज शाम के लिए...

विश्व - तेरी कसम माँ... नहीं जानता...

प्रतिभा - क्यूँ... तुझे नहीं बताया... आज शाम को क्या करने वाला है...

वीर - नहीं... नहीं... पर आगे की लड़ाई उसकी निजी है... मैं बस तब उसके साथ होऊंगा... जब जब वह आवाज देगा... बुलाएगा...

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सिम्फनी होटल आज आम लोगों के लिए बंद था l क्यूंकि आज होटल की मुख्य फंक्शन हॉल में विशेष कार्यक्रम होना था l निर्मल सामल होटल के एंट्रेंस पर खड़े अपने अतिथियों का स्वागत कर रहा था l कुछ देर बाद पिनाक की गाड़ी पहुँचती है l पिनाक जैसे ही गाड़ी से उतरता है निर्मल सामल उसके पास आता है और उसका अभिवादन करता है l दोनों मिलकर अंदर जाते हैं l

निर्मल - क्या बात है छोटे राजा जी... आप के चेहरे पर रौनक नहीं दिख रही है...

पिनाक - हम अपने परिवार वालों को ढूँढ रहे हैं...

निर्मल - ओ... चिंता ना करें... वह लोग जल्दी ही आ जाएंगे...

पिनाक - (थोड़ी हैरानगी के साथ) मतलब...

निर्मल - ओह... लगता है आप को पता नहीं है...

पिनाक - क्या... क्या पता नहीं है...

निर्मल - आज दो पहर को... दामाद जी घर पर आए थे... बेशक मैं उस वक़्त घर पर नहीं था... पर दामाद जी मेरी बेटी सस्मीता से बात किए... उसके बाद वह चले गए... उनके जाने के बाद... मेरी बेटी भी खुशी खुशी यहाँ मंगनी के लिए आई है....

पिनाक - (भवें सिकुड़ कर कुछ सोचते हुए) क्या... राजकुमार आपकी बेटी से मिलने आए थे...

निर्मल - जी...

पिनाक - क्या हम आपकी बेटी से बात कर सकते हैं...

निर्मल - हाँ हाँ क्यूँ नहीं... आप ही की बेटी है अब... ब्राइड रूम में होगी... चलिए...

पिनाक - नहीं आप नहीं... हम बात करना चाहते हैं... अगर आपको बुरा न लगे तो...

निर्मल - इसमें बुरा लगने वाली क्या बात है... आप जाइए... मैं मेहमानों का आव भगत देखता हूँ...

इतना कह कर निर्मल वहाँ पिनाक को छोड़ कर बाहर चला जाता है l पिनाक कुछ देर यूहीं खड़े खड़े सोचते हुए ब्राइड रूम की तरफ़ जाता है l दरवाजे पर पहुँच कर दस्तक देने लगता है l थोड़ी देर बाद दरवाजा खुलता है l अंदर एक लड़की बाहर आती है पिनाक को देख कर

लड़की - जी कहिये...

पिनाक - हम... पिनाक सिंह क्षेत्रपाल...

लड़की - जी नमस्ते अंकल...

पिनाक - हम... अपनी होने वाली बहु से कुछ बात करना चाहते हैं...

लड़की - जी ज़रूर... मैं उन्हें ख़बर करती हूँ...

इतना कह कर लड़की अंदर चली जाती है और कुछ देर बाद बाहर आकर पिनाक सिंह को अंदर बुलाती है l पिनाक उस लड़की के साथ अंदर जाता है तो देखता है सस्मीता अपनी सहेलियों से घिरी एक गद्दे के बीचों-बीच बैठी हुई है l सस्मीता अपनी जगह से उठती है और आगे आकर पिनाक की पैर छूती है l पिनाक अपनी जेब से कुछ नोट निकाल कर सस्मीता के सिर पर घुमा कर उसकी सहेलियों को दे देता है l

सस्मीता - जी कहिये... आप हमसे क्या बात करना चाहते थे...

पिनाक - (हिचकिचाते हुए) वह... बात... दरअसल...

सस्मीता - (बात को समझते हुए, अपनी सहेलियों से) क्या आप लोग कुछ देर के लिए हमें अकेला छोड़ सकते हैं... (उसकी सारी सहेलियाँ बाहर चलीं जाती हैं) हाँ... अब कहिये...

पिनाक - हम कहने नहीं... कुछ पूछने आए हैं...

सस्मीता - जी पूछिये...

पिनाक - क्या आज दुपहर को... राजकुमार आपसे मिलने आए थे...

सस्मीता - जी आए थे...

पिनाक - बुरा मत मानिएगा बेटी जी... आपसे उनकी क्या बातेँ हुईं...

सस्मीता - कुछ नहीं... बस मेरी मंजूरी जानी... उसके बाद इतना कहा... शाम को वह आयेंगे... अपने परिवार के साथ... और मंगनी जरुर करेंगे...

पिनाक - (थोड़ा खुश हो कर) क्या... राजकुमार... मंगनी करेंगे ऐसा कहा...

सस्मीता - हाँ...

पिनाक - ओह... जुग जुग जियो बेटी.... जुग जुग जियो... हम बाहर जाकर बाकी रस्मे देखते हैं...

इतना कह कर अंदर ही अंदर बहुत खुश होते हुए कमरे से बाहर निकालता है और फंक्शन हॉल के बाहर जाकर निर्मल के बगल में खड़ा हो जाता है l अपने पास पिनाक को देख कर निर्मल बहुत आश्चर्य और खुश भी होता है l गिने चुने ही सही पर विशेष अतिथि आ रहे थे जिनको दोनों मिल कर स्वागत कर रहे थे l कुछ देर बाद विक्रम की गाड़ी आकर रुकती है उसमें से विक्रम के साथ सुषमा, शुभ्रा और रुप उतरते हैं l वीर को गायब देख कर पिनाक के चेहरे की रंगत उड़ जाती है l जैसे ही चारों इन दोनों के पास पहुँचते हैं

निर्मल - आइए... समधन जी... दामाद जी.... (रुक जाता है)

पिनाक - (दबे सुर में दांत पिसते हुए) राजकुमार आए नहीं...

तभी चर्र्र्र्र् करती हुई एक गाड़ी आकर रुकती है l उसमें से वीर अकेला उतरता है l अपनी माँ और भाई बहन के पास आकर

वीर - सॉरी... सॉरी.. वेरी सॉरी... वह मैं... मेंन्स पार्लर में से सीधे आ रहा हूँ...

निर्मल - ओ हो हो हो... कोई नहीं... आखिर आज आप ही का दिन है... जाइए आप अंदर जाइए... ग्रूम्स रुम में...

वीर - जी जरुर...

इतना कह कर अपनी माँ भाई बहन और भाभी को साथ लेकर अंदर चला जाता है l जो रौनक पिनाक के चेहरे से उड़ गई थी वह दुबारा वापस लौट आती है l

निर्मल - समधी जी... राजा साहब जी को फोन कर दीजिए... सब आ गए... रस्म पुरा करते हैं...

पिनाक - जी जरुर...

पिनाक अपना फोन निकाल कर बल्लभ को फोन लगाता है l बात खत्म होते ही निर्मल से कहता है

पिनाक - अभी थोड़ी ही देर में पहुँच रहे हैं...

थोड़ी देर बाद सफेद रंग की बड़ी सी चमचमाती हुई रॉल्स रोएस आकर रुकती है l दोनों भागते हुए गाड़ी के पास जाते हैं, तब तक बल्लभ गाड़ी से उतर कर डोर खोल देता है l गाड़ी से भैरव सिंह उतरता है l उसे स्वागत करते हुए सभी फंक्शन हॉल में दाखिल होते हैं l हॉल में सभी मेहमान हल्की म्युजिक के साथ मॉकटेल एंजॉय कर रहे थे l जैसे ही भैरव सिंह दाखिल होता है म्युजिक बंद हो जाता है और सबका ध्यान भैरव सिंह की ओर चला जाता है l भैरव सिंह के पास लॉ मिनिस्टर विजय जेना भागते हुए जाता है हाथ मिलाने के लिए हाथ बढ़ाता है पर जैसे ही भैरव सिंह की चेहरे पर गुरुर और रौब देखता है उसकी अंदर तक फट जाती है l धीरे से सिर झुका कर किनारे हो जाता है l बस इतना सा सीन पुरे हॉल में मरघट सी खामोशी ला देती है l भैरव सिंह का रास्ता बनाते हुए निर्मल एक आलिशान कुर्सी पर बिठाता है और इशारे से इवेंट मैनेजर को प्रोग्राम चालू करने के लिए कहता है l इवेंट मैनेजर कोई और नहीं रॉकी था l आखिर होटल उसकी जो थी l

रॉकी - सभी मेहमानों का स्वागत करते हैं... मैं रॉकी... आज का इवेंट और स्टेज मैनेज मेंट दोनों मेरे जिम्मे है... राजा साहब जी के आ जाने से इस महफिल की कसर अब पूरा हो गया है... जैसा कि आप आज जानते हैं... आज दो बड़े दिग्गज परिवार के बीच रिश्ता बनने जा रही है... क्षेत्रपाल खानदान के चश्म ओ चराग राजकुमार जी का मंगनी सामल ग्रुप के मालिक श्री निर्मल सामल जी की इकलौती सुपुत्री के साथ होने जा रही है... (सभी मौजूद लोग तालियां बजाने लगते हैं) तो स्टेज पर पहले मैं... आज के शाम के नायक... राजकुमार वीर सिंह क्षेत्रपाल जी को बुला रहा हूँ...

ग्रूम वाली रुम से निकल कर वीर रुप और सुषमा के साथ स्टेज पर आ कर खड़ा हो जाता है l आज वाकई वीर बहुत ही सुंदर दिख रहा था l

रॉकी - हमने आज की इवेंट को स्पेशल करने के लिए... सामल परिवार की चांद को... चांद की झूले के सहारे स्टेज पर लाने के लिए... एक खास व्यवस्था की है...

हॉल की सारी लाइटें बुझ जाती हैं l एक स्पॉट लाइट स्टेज की छत पर पड़ती है l चांद की आकर की झूले के बीच सफेद चमकीली लहंगा चोली और सिर पर घूंघट लिए धीरे धीरे सस्मीता उतरती है l फिर स्टेज पर सस्मीता की माँ आ जाती है l फिर पूरा हॉल में लाइट वापस आ जाती है l लाइट के आते ही सभी लोग तालियां बजाने लगते हैं l

रॉकी - थैंक्यू थैंक्यू... तो रस्म अदायगी के लिए... लड़की और लड़का... दोनों के पिता स्टेज पर आयें...

पिनाक खुश होते हुए पहले भैरव सिंह का पैर छूता है l भैरव सिंह उसे एक अंगुठी की डिबिया देता है, उसे लेकर पिनाक स्टेज पर जाता है l उधर निर्मल भी हाथ में अंगुठी वाली एक डिबिया लेकर स्टेज पर आता है l

रॉकी - अभी आप दोनों पिता... अपने अपने संतानो को अंगुठी दे दीजिए... (दोनों वैसा ही करते हैं, अब जैसे ही वीर और सस्मीता अंगुठी ले लेते हैं, रॉकी उन दोनों से कहता है) अब आप दोनों एक दूसरे को अंगुठी पहना कर... मंगनी की रस्म पुरा करें...

सबसे पहले सस्मीता अपना हाथ बढ़ाती है, वीर उसे अंगुठी पहना देता है l फिर सस्मीता वीर को अंगुठी पहना देती है l पूरा हॉल तालियों से गूंज उठती है l स्टेज पर खड़े पिनाक भी बड़ी जोश के साथ ताली बजा रहा था l सबकी ताली रुक चुकी थी पर पिनाक ताली बजाये जा रहा था l उसे जब एहसास होता है कि ताली सिर्फ वह बजा रहा है, चारों और देख कर पिनाक अपनी ताली रोकता है l

निर्मल - हा हा हा हा... आज आपकी खुशी छुपाये नहीं छुप रहा है समधी जी...

पिनाक - हाँ... हा हा हा हा... सॉरी... (सस्मीता की घूंघट देख कर) बेटी सस्मीता... आप घूंघट में क्यूँ हैं... (निर्मल से) क्या यह आपके खानदान की कोई परंपरा है...

निर्मल - अरे नहीं नहीं... सच कहूँ तो मैं भी हैरान हूँ... अपनी बेटी की घूंघट देख कर...

पिनाक - (सस्मीता को) बेटी... विवाह की मंडप में घूंघट करना... अभी तो अपने चेहरे से घूंघट हटाओ...

सस्मीता अपना घूंघट हटा देती है, जैसे ही घूंघट हटती है एक बिजली सी गिरती है पिनाक पर l वैसा ही हाल निर्मल का भी था l क्यूंकि घूंघट के पीछे सस्मीता नहीं अनु थी l यह देख पिनाक और निर्मल दोनों को झटका लगता है l सारे लोग इन दोनों की प्रतिक्रिया देख रहे थे l

निर्मल - यह... ऐ... कौन है... (अनु चुप रहती है)

पिनाक - यह क्या मज़ाक है सामल... अपनी बेटी की जगह... यह किसके साथ मंगनी करा दी राजकुमार की...

निर्मल - क्या... क्या कहा आपने... (चिल्ला कर) सस्मीता बेटी... (तेजी से रॉकी के पास जा कर उसकी कलर पकड़ कर) यह तुमने किया है...

रॉकी - नहीं.. नहीं सामल जी... यह आइडिया... खुद सस्मीता जी की थी... पर मुझे मालुम नहीं था... उनकी जगह यह लड़की आएगी

कुछ ही सेकेंड में स्टेज पर सस्मीता आकर अपनी माँ के पास खड़ी हो जाती है l

निर्मल - यह क्या है बेटी... क्या यह कोई मज़ाक था...

सस्मीता - नहीं डैडी... मंगनी कोई मज़ाक नहीं होती... जिंदगी भर की बात है... मज़ाक कैसे हो सकती है... (चल कर अनु के पास पहुँचती है) राजकुमार जी आज दुपहर को अनु को साथ लेकर आए थे... सारी बात बताए थे... जो भी हुआ या हो रहा है... सारी बातें... इसलिए मैंने बस राजकुमार जी का साथ दिया...

पिनाक - लड़की... तुमने क्या कर दिया... हमें यह मंगनी मंजुर नहीं है...

सस्मीता - क्यूँ अंकल जी.. क्यूँ...

पिनाक - हमें तुम मंजुर थीं... पर तुम्हारी जगह यह... नहीं हरगिज नहीं...

सस्मीता - ओ... मेरी जगह आपको यह पसंद नहीं... पर आप मुझे मुझे इसकी जगह देख सकते हैं...

पिनाक - इसकी कोई जगह ही नहीं बनती...

सस्मीता - पर मेरे लिए तो है... बचपन से... मैं सामल घर की इकलौती रही हूँ... अकेली रही हूँ... पहली रही हूँ... तो मैं दुसरी कैसे बन सकती थी... यह विवाह का मामला है... जीवन भर साथ रहने.. जीने मरने की बात है... राजकुमार जी किसीसे प्यार कर रहे हैं... मैं उसकी जगह लेकर उनकी जिंदगी में दुसरी तो नहीं बन सकती थी ना...

कुछ देर के लिए चुप्पी छा जाती है l पिनाक बड़ी मुश्किल से अपना चेहरा घुमा कर भैरव सिंह की ओर देखता है तो पाता है भैरव सिंह बाहर की ओर जा रहा था और उसके पीछे पीछे बल्लभ भागते हुए चला जा रहा था l पिनाक की चेहरे का रंगत पुरी तरह से उड़ चुका था l पिनाक सारे लोगों को हाथ जोड़कर इशारे से जाने के लिए कहता है l लोग परिस्थिति को भांप कर वहाँ से चले जाते हैं l

पिनाक - (सस्मीता से) लड़की... यह तुमने हमारे साथ ठीक नहीं किया... हमारे अहं पर चोट मारी है तुमने...

वीर - जो भी हुआ है उसका जिम्मेदार मैं हूँ... उस बिचारी को क्यूँ धमका रहे हैं...

सस्मीता - अंकल जी... अहंकार... गुरुर... सिर्फ आपकी जागीर नहीं है.. हम भी पालते हैं... वह टनों के हिसाब से... जैसा कि मैंने पहले ही कहा... मुझे दुसरी होना मंजुर नहीं है... इसलिए मैंने राजकुमार जी का साथ दिया...

निर्मल - पर बेटी किसी अंजान लड़की के लिए... तुमने अपना भविष्य खराब करदिया.. यह तुमने ठीक नहीं किया बेटी...

सस्मीता - (निर्मल से) डैडी... मुझे सिर्फ एक बात का जवाब दीजिए... राजकुमार जी के बारे में... क्या आपको जानकारी थी... (निर्मल का सिर झुक जाता है) आपने मेरे साथ ठीक नहीं किया डैडी... चलिए मम्मी...

अपनी माँ को लेकर सस्मीता वहाँ से चली जाती है l निर्मल सामल भी झुके सिर के साथ उनके पीछे पीछे चला जाता है l वहाँ से रॉकी भी अपने साथियों को लेकर निकल जाता है l बाकी जो मौजूद थे सभी क्षेत्रपाल परिवार के सदस्य ही रह गए थे l सबकी ध्यान पिनाक की ओर जाता है l पिनाक अंदर ही अंदर गुस्से से उबल रहा था l उसकी आँखें बंद थी, अचानक वह अपनी आँखे खोलता है जो किसी भट्टी की अंगार की तरह दहक रही थी l खा जाने वाली नज़रों से पिनाक अनु को देखता है l अनु वीर के पीछे वीर की हाथ को जोर से पकड़ कर खड़ी रहती है l पर अनु की आँखों में डर लेश मात्र नहीं था l यह देख कर पिनाक सुषमा के पास जाता है और उसे एक थप्पड़ मार देता है l थप्पड़ के प्रभाव से सुषमा कुछ दुर हट कर गिर जाती है l शुभ्रा और रुप दोनों "माँ" चिल्ला कर उसे उठाते हैं l पिनाक सुषमा के पास आकर

पिनाक - कमिनी... (वीर की ओर इशारा करते हुए) यह मेरा औलाद नहीं हो सकता... यह किस हराम की औलाद है...

विक्रम - छोटे राजा जी... यह क्या बहकी हुई बात कर रहे हैं...

वीर - मर्दों वाली बात रही नहीं तो नामर्दों की तरह... औरतों पर जोर दिखा रहे हैं...

पिनाक - तु चुप कर कमबख्त... अब मेरी आखिरी बात का जवाब दे... तुझे क्षेत्रपाल बने रहना है या नहीं...

वीर - क्यूँ क्षेत्रपाल बने रहने के लिए क्या करना पड़ेगा...

पिनाक - तुझे मेरी कही हुई लड़की के साथ शादी करनी होगी... अगर तूने इस लड़की को नहीं छोड़ा... तो तेरा... क्षेत्रपाल खानदान से कोई रिश्ता नहीं रह जाएगा...

वीर - अच्छा... (अपने पीछे से अनु को अपने साथ खड़ा कर) और इसका क्या होगा...

पिनाक - इसका वही होगा... जो शादियों से क्षेत्रपाल के मर्द करते आए हैं... इसे अपने पास रखो और रोज खेलो...

वीर - (चिल्लाते हुए) छोटे राजा जी...

पिनाक - हाँ... इसे अपना रखैल बनाकर रखो... ना इसकी जात है... ना औकात...

वीर - यह कह कर आपने भी अपनी जात और औकात बता दी है... नाम और पहचान से बड़े... मगर सोच बहुत ही छोटी.. ओछी और गिरी हुई... छोटे राजा जी

पिनाक - मत कहो मुझे छोटे राजा... अब तुमने मुझे कहाँ छोटे राजा बने रहने दिया.. अब तो खुद को हम कहने लायक भी नहीं छोड़ा तुमने... अब फैसला तुम्हारा... तुम इस खानदान से जुड़े रहना चाहते हो... या..

अनु - (वीर की हाथ पकड़ कर) चलिए हम यहाँ से चले जाते हैं...

पिनाक - ऐ... ऐ... ऐ लड़की... तेरी यह हिम्मत... (कहते हुए अनु की तरफ बढ़ने लगता है, तो वीर उसके सामने आ जाता है) झुका... झुका अपनी नजर... (पर अनु की नजरें नहीं झुकती, जो पिनाक की अंदर की गुस्से को और भी भड़का देती है) कामिनी दो कौड़ी की लौंडी... मुझसे नजर मिला रही है... गुस्ताख... झुका अपनी नजर... तेरी इतनी हिम्मत...

वीर - हाँ... है तो उसमें बहुत हिम्मत... (हैरानी से वीर की ओर पिनाक देखता है) अनु की हिम्मत मैं हूँ... उसका गुरुर मैं हूँ... उसकी यकीन मैं हूँ... क्यूंकि उसका वज़ूद... मैं ही हूँ...
 
👉एक सौ सैंतीसवाँ अपडेट

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बल्लभ तेजी से भागते हुए कमरे के आगे खड़ा हो जाता है l दरवाज़ा बंद नहीं था, पर्दा हटा कर अंदर झाँकता है अंदर अभी भी अंधेरा था l अपना गला खराश कर अपनी मौजूदगी जाहिर करता है पर उसे कोई जवाब नहीं मिलता l मज़बूर हो कर आवाज़ देता है

बल्लभ - क्या मैं अंदर आ सकता हूँ...

- आँ... कौन..

अंदर से एक घुटी हुई थकी हुई आवाज़ आती है l यह आवाज पिनाक सिंह की थी, बल्लभ अंदर नहीं जाता, वहीं दरवाजे पर खड़े रह कर बोलता है

बल्लभ - छोटे राजा जी... मैं प्रधान...

पिनाक - क्यूँ आया है... नकारा वकील...

बल्लभ - मुझसे जितना बन पड़ा किया तो था... बस आपने जिसे काम सौंप रखा था... उससे हुआ नहीं...

पिनाक - हाँ... मैंने जिससे भी कोई काम दिया... सबके सब नकारा निठल्ले निकले... वह साला हरामी अभी तक मेरे सामने नहीं आया है... जब मेरे सामने आयेगा... उसका गला... (हांफते हुए) रेत दूँगा... (फिर कुछ सेकेंड में खुद को सम्भालने के बाद) क्यूँ आए हो... तुम तो राजा साहब के साथ... चले गए थे ना...

बल्लभ - वह राजा साहब... कल रात को ही... राजगड़ चले गए हैं...

पिनाक - तो तुम क्यूँ नहीं गए...

बल्लभ - वह... (चुप हो जाता है)

पिनाक - बोल बे भोषड़ी के बोल...

बल्लभ - मैं थोड़ा अंदर आकर बात करूँ....

पिनाक - (कुछ देर की पॉज लेने के बाद) आ जाओ...

बल्लभ अंदर आता है तो उसके पैर में एक बोतल ठोकर लगती है l लुढ़कने की आवाज़ आती है l वह लड़खड़ाता है तो दरवाजे के पास जा कर बिजली की स्विच को ऑन करता है l लाइट जलने के बाद पिनाक अपनी आँखे मूँद लेता है जैसे चुँधीया गया हो l

पिनाक - आह... भोषड़ी के... लाइट क्यूँ जलाई...

बल्लभ - वह मुझे कुछ दिखाई नहीं दे रहा था...

पिनाक - अच्छा ठीक है... जल्दी बक... क्या बकने आया था...

बल्लभ देखता है रात की पार्टी वाली कपड़े में ही पिनाक टेबल लगा कर रात भर शराब पिया है शायद l उसके शूट के सारे बटन खुले हुए हैं l कमरे में तीन या चार बोतल लुढ़क रहे हैं l

पिनाक - ऐ हरामी... जल्दी बक...

बल्लभ - वह मैं यह कह रहा था... राजा साहब सीधे पार्टी से निकलते ही... राजगड़ को रवाना हो गए...

पिनाक - हाँ बोला था... आगे बोल... तु क्यूँ नहीं गया...

बल्लभ - वह मुझे दो दिन तक रुकने के लिए कहा है....

पिनाक - (अपना चेहरा उठाता है और एक टूटी हुई हँसी हँसता है) क्या सिर्फ यही बताने आया था...

बल्लभ - हाँ... पर खबर और भी है...

पिनाक - हाँ वह भी बता देना... पर तुझे दो दिन के लिए रुकने के लिए क्यूँ कहा...

बल्लभ - क्यूंकि दो दिन बाद... सामल एंड ग्रुप की... वह सनशाइन प्रोजेक्ट की भू पूजन है...

पिनाक - हा हा हा हा हा...(हँसते हुए) मतलब राजा साहब को यकीन हो गया है... वह जमीन जिसको सामल को दिलवाने के लिए... तुने इतने पापड़ बेले... वह सारे गुड़ गोबर हो गया है...

बल्लभ - यह आप क्या कह रहे हैं... मैंने सामल को जमीन की पट्टा निकलवा कर दिया है...

पिनाक - तुने प्लान भी बढ़िया बनाया था... पुलिस वालों को जेब में ले लिया था... मीडिया वालों को भी... फिर... अनु पार्टी में पहुँच गई ना... (आवाज़ को चबाते हुए) उस हरामजादे विश्वा के वज़ह से... उसकी चाल के आगे हम सब मात खा गए...

बल्लभ - पर... हम ने तो सारी जमीनों की डीसप्युट दुर कर... रजिस्ट्री भी करा ली है... फिर कैसे विश्वा काम रोक सकता है...

पिनाक - बस यही तो तुझे देखना है... क्यूँकी अब जंग शुरु हो चुकी है... उसकी अपनी तैयारी है... हमें अब तैयार होना है... (बल्लभ अपनी भवें सिकुड़ लेता है) तुझे क्या लगता है... विश्वा राजकुमार का मदत कर रहा है... यह राजा साहब को मालुम नहीं था... अच्छे तरह से जानते थे... बस इतना समझ ले... कल की आने वाली जंग के लिए... हमारी काबिलियत परख रहे थे... हम नाकामयाब रहे... अब तेरी क़ाबिलियत की बारी है...

बल्लभ - क्या...

पिनाक - हाँ प्रधान हाँ... अब तु अपनी तसरीफ की सोच...

बल्लभ - इतनी बारीकी से काम किया है... जमीन भी सामल के नाम पर रजिस्ट्रेशन हो चुका है... फिर...

पिनाक - रजिस्ट्रेशन नहीं बे लीज... लीज बोल लीज... यहीं... विश्वा की दिमाग की परख होगी... खेर... वह तेरी किस्मत... पहले तु बता... यहाँ सिर्फ़ यह बताने तो आया नहीं...

बल्लभ - वह कल रात... उस लड़की अनु की दादी का देहांत हो गया है... आज सुबह उसकी अंत्येष्टि के लिए श्मशान ले गए हैं... और उसकी अंत्येष्टि... राजकुमार करने जा रहे हैं...

पिनाक - ओ... साली बुढ़िया से खुशी बर्दास्त नहीं हुआ... इसलिए चल बसी...

बल्लभ - छोटे राजा साहब...

पिनाक - ह्म्म्म्म...

बल्लभ - अब मैं जाऊँ...

पिनाक - हाँ जाओ... और जाते जाते लाइट बंद करते जाना...

बल्लभ - क्यूँ राजा साहब... सुबह भी तो हो रही है...

पिनाक - कल से मेरी जिंदगी में अंधेरा ही अंधेरा है.... इसलिए उजाले से मुझे अब परेशानी हो रही है...

बल्लभ - बुरा ना मानें तो एक सवाल पूछूं...

पिनाक - हाँ पूछ ले...

बल्लभ - कब तक...

पिनाक - मतलब...

बल्लभ - आप ही ने कहा जंग छिड़ चुकी है...

पिनाक - हाँ जंग छिड़ चुकी है... ज़द में सब आयेंगे... पर पहले अपने घर की सफाई की बहुत जरूरी है... देखा नहीं दुश्मन ने कैसे हमारे कमजोर नस पर वार किया... मुझे क्या करना है... मैं जानता हूँ... और वह कर लेने के बाद ही राजगड़ वापस लौटुंगा... पर तु अपनी सोच... दो दिन बाद... तुझे अपना मुहँ काला करवा कर राजगड़ जाना है...

बल्लभ - नहीं मेरे साथ ऐसा कुछ नहीं होगा...

पिनाक - प्रधान... शतरंज के बिसात पर... तु अपनी चाल चल चुका है... इसलिए तुझे लग रहा है... तेरे मोहरे महफ़ूज़ हैं... पर आज... अभी मेरी छटी इंद्रिय कह रही है... तेरे शाह को मात मिल चुकी है...

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चर्र्र्र्र्र्र्र्र् आवाज़ करते हुए एक गाड़ी श्मशान के बाहर रुकती है l गाड़ी से सेनापति दंपति और विश्व उतरते हैं l श्मशान के बाहर कुछ लोगों का मजमा लगा हुआ था l पुलिस के कुछ कर्मचारी और सुभाष सतपती भी मौजूद था l मीडिया वाले भले ही नहीं थे पर सुप्रिया वहीँ पर थी l अनु रो रही थी, उसे सुप्रिया संभाल रही थी l वीर चिता के पास कर्मकांड के लिबास में तैयारी कर रहा था l प्रतिभा जैसे ही अनु के पास पहुँचती है, अनु सुप्रिया को छोड़ प्रतिभा के गले लग जाती है l विश्व और तापस सुभाष के पास आते हैं l सुभाष तापस को सैल्यूट करता है l

विश्व - यह क्या... मतलब कैसे हो गया...

सुभाष - कल शाम को पार्टी से... जब वीर और अनु घर पहुँचे तब घर के आगे भीड़ लगी हुई थी... पर चूँकि प्लान ही ऐसा था कि शाम तक अनु की खबर किसीको होने नहीं दिया गया था... इसलिए बस्ती में रहने वाले एक शख्स ने लोकल पुलिस स्टेशन में खबर करी... इत्तेफ़ाक से पुलिस और वीर एक साथ पहुँचे थे... बेड पर दादी सोई हुई लग रही थी... हस्पताल ले जाया गया तो डॉक्टर ने डिकलैर कर दी...

तापस - रीजन...

सुभाष - कार्डियक अरेष्ट...

तापस - ओ...

सुभाष - हाँ कत्ल या साजिश की कोई निशानी नहीं थी... डॉक्टर ने कहा उम्र भी हो गई थी... ऐसे में यह नॉर्मल है....

तापस - ह्म्म्म्म...

इस दौरान वीर चिता में आग लगा चुका था l यह देख कर अनु जोर जोर से रोने लगी थी l ठीक उसी समय एक और गाड़ी वहाँ पर आकर रुकती है l गाड़ी में से सुषमा, शुभ्रा और रुप उतरते हैं l वे तीनों जैसे ही अनु के पास पहुँचते हैं अनु रोते हुए चिता की ओर इशारा करती हुई रोने लगती है l सुषमा उसे सहारा देती है l

सुप्रिया - विश्वा...

विश्व सुप्रिया की तरफ देखता है l सुप्रिया उसे इशारे से पास बुला रही है l वह सुप्रिया के पास जाता है साथ में तापस और सुभाष भी आते हैं l

सुप्रिया - सीचुएशन थोड़ा पैनिक हो गया है... अब बात पुलिस और मीडिया पर आ गई है... लोग तरह तरह की बातेँ करने लगे हैं...

विश्व - हाँ समझ सकता हूँ... पर मुझे लगता है... तुमने अपने हिस्से का रोल ठीक से निभाया है...

सुप्रिया - हाँ... वेसे... सुभाष जी ने भी बहुत पापड़ बेले हैं रात भर...

तापस - देखो बेटी... मैं एहसानमंद रहूँगा तुम्हारे और सतपती के... विश्व की बात रखने के लिए... तुम लोगों ने अपने ऊपर थोड़ी निंदा ली है...

सुभाष - यह क्या कह रहे हैं सर... आप तो मेरे आइडल रहे हैं... और विश्व ने उस दिन जो किया था... उसके लिए... इतना तो बनता तो था...

विश्व - थैंक्स... यह मेरे लिए जिस तरह से आप लोगों ने... पर्सनली सिचुएशन को अपने ऊपर लेकर नॉर्मलाइज किया... उसके लिए थैंक्स...

सुभाष - हाँ उसके लिए सुप्रिया जी को थैंक्स तो बनता है... क्यूँकी जैसे ही खबर फैली दादी मर गई है... लोग पुलिस की नाकारे और निकम्मे पन की चर्चा करनी शुरु कर दी थी... यह तो सुप्रिया जी ने अपनी न्यूज के जरिए... अनु को ढूँढ लाने का श्रेय.. और गुनहगारों को पकड़ने का श्रेय हमें दी... इसलिए डिपार्टमेंट में हमारी इज़्ज़त बच गई... हाँ इस बात का दुख रहा... दादी... शाम को ही चल बसी...

इनकी बातेँ चल रही थी कि वीर वहाँ पहुँचता है l वीर की आँखे नम थीं l वह सीधे आकर विश्व के गले लग जाता है l यह दृश्य सुषमा देख रही थी l विश्व वीर के पीठ पर हाथ फेरते हुए दिलासा दे रहा था l कुछ देर बाद वीर विश्व से अलग होता है l अनु को लेकर सभी औरतें अनु को लेकर इन लोगों के पास आते हैं l

विश्व - सुन कर बहुत दुख हुआ...

वीर - हाँ दुख तो मुझे भी बहुत हुआ.... पर एक आत्म संतोष है... अनु को सही सलामत दादी के सामने खड़ा कर पाया...

विश्व - अब... सुना है... तुमने घर भी छोड़ दिया है...

वीर - हाँ... पता नहीं... अब अनु को लेकर कहाँ जाऊँगा...

सुभाष - क्यूँ अनु अपनी घर पर रह सकती है ना... हाँ तुम शायद उस बस्ती में... उसकी खोली में नहीं रह सकते... तुम्हें आदत जो नहीं है...

वीर - नहीं ऐसी बात नहीं है... कल मैंने निश्चय कर लिया था... अनु से शादी कर जब तक कुछ जुगाड़ नहीं हो जाता तब तक... अनु और दादी के साथ... उनकी ही बस्ती में रूकुंगा... पर...

विश्व - पर क्या...

वीर - अब माली साही बस्ती में... हालात कुछ और हो गई है...

विश्व - क्या मतलब...

वीर - अनु के नाम पर... बाते फैल गई है... कल दादी की लाश तक कोई आ नहीं रहा था... पर ताने सुनाई दे रही थी... बेवजह की ताने... बेमतलब की ताने...

विश्व - ओह... तो फिर...

बेबसी से अपना सिर ना में हिला कर अपनी मायूसी जाहिर करता है l तब प्रतिभा कहती है

प्रतिभा - यह कोई प्रॉब्लम नहीं है... अनु को मैं अपने साथ रख लुंगी... वैसे भी... मेरी कोई बेटी नहीं है... (तापस से) क्यूँ जी... क्या कहते हो...

तापस - बहुत अच्छा फैसला किया है तुमने...

विश्व - हाँ माँ बहुत बढ़िया फैसला किया तुमने... (वीर की ओर देख कर) क्यूँ वीर...

वीर - नहीं... यह सफर... अब मेरा और अनु का है... मैंने दादी से वादा किया था... अनु को कभी भी मैं अकेला नहीं छोड़ सकता हूँ...

प्रतिभा - अरे... अनु कहाँ अकेली होगी... हमारे साथ रहेगी और हम उसके साथ रहेंगे...

वीर - अच्छी विचार है आंटी जी... पर (हाथ जोड़ कर) मैं अपनी जिम्मेदारी किसी और के कंधे पर नहीं डाल सकता...

तापस - पर वीर सहाब... अभी तो आपके खुद के रहने के वांदे हैं...

वीर - जी हाँ अंकल जी... खैर आप सभी बड़े हैं... मैं फैसला अनु पर छोड़ रहा हूँ.... उसे अगर आपके साथ रुकने से कोई ऐतराज ना हो तो... मुझे कोई शिकायत नहीं होगी...

प्रतिभा - हाँ हाँ क्यूँ नहीं... (अनु से) क्यूँ अनु बेटी... रहोगी ना मेरे साथ... (सभी लोग गौर से अनु की ओर देखने लगते हैं, थोड़ी झिझक के साथ अनु जवाब देती है)

अनु - जैसे कि राजकुमार जी ने कहा... यह इम्तिहान उनका और मेरा है... और मेरा पुरा खयाल रखने के लिए... उन्होंने दादी से वादा किया था... मेरा साथ ना छोड़ने के लिए... भरोसा दिया था... इसीलिए तो... उन्होंने मेरे लिए... अपनी दुनिया छोड़ दी... अब जब इतनी बड़ी दुनिया में... वह अकेले सफर पर निकले हैं... मैं उन्हें अकेला कैसे छोड़ सकती हूँ.... यह जहां रहेंगे... उनकी साया बन कर मैं उनके साथ रहूंगी...

थोड़ी देर के लिए वहाँ पर खामोशी पसर जाती है l खामोशी को तोड़ते हुए प्रतिभा अनु से कहती है l

प्रतिभा - शाबाश बेटी शाबाश... तो यह तय हुआ... के तुम दोनों हमारे यहाँ रुकोगे....

वीर - नहीं आंटी... नहीं... आप यह भुल रही हैं... मैंने भले ही क्षेत्रपाल से नाता तोड़ दिया है... पर क्षेत्रपाल मुझे या मुझसे जुड़े किसी को भी नहीं छोड़ेंगे... मैं नहीं चाहता... उस आंच के दायरे में... आप या अंकल आयें... अगर ऐसा हुआ तो... मैं प्रताप को कभी मुहँ दिखा नहीं पाऊँगा...

विश्व - नहीं ऐसा कुछ नहीं...

वीर - (अपना हाथ उठा कर विश्व को कुछ और बोलने से रोक देता है) प्रताप... बस यार... बस...

विश्व - नहीं मेरा कहने का मतलब है....

सुषमा - वीर सही कह रहा है...

सबका ध्यान सुषमा की तरफ चली जाती है l सुषमा फिर से प्रतिभा और विश्व से कहती है

सुषमा - वीर सही कह रहा है... असल में सही मायने में... वीर का जन्म कल ही हुआ है... अब वह दुनिया को देखेगा... चलने की कोशिश में... गिरेगा... हर कदम पर ठोकरें मिलेगी... फिर वह संभलेगा... फिर दुनिया के सामने तन कर खड़ा होगा...(सभी कुछ देर के लिए स्तब्ध हो जाते हैं) अनु ने भी जो फैसला किया है... सही किया है...

अनु आकर सुषमा के गले लग जाती है l सुषमा के यह कह लेने पर प्रतिभा, तापस और विश्व एक दुसरे को ताकते रह जाते हैं l इतने में शुभ्रा वीर और अनु से कहती है

शुभ्रा - वीर.. अनु तुम दोनों मेरे साथ आओ...

वीर - नहीं भाभी... मैं उस हैल में वापस नहीं जाऊँगा...

शुभ्रा - तुम दोनों को मैं उस हैल में लेकर जाऊँगी भी नहीं... (मुस्कराते हुए) विश्वास रखो मुझ पर... आओ मेरे साथ...

वीर थोड़ा असमंजस सा होता है और सुषमा की ओर देखता है l सुषमा उसके पास आकर उसके पीठ पर हाथ रखते हुए

सुषमा - जाओ वीर... तुम्हारे भाभी के साथ जाओ...

वीर - पर माँ..

सुषमा - बात अगर तुम्हारे अकेले की होती तो... मैं कुछ ना कहती... पर बात मेरी बहु की है... इसलिए... इस वक़्त तुम अनु को लेकर अपने भाभी के साथ जाओ... (रुप से) हाँ रुप... तुम भी जाओ इनके साथ...

रुप - जी... जी माँ... और आप...

सुषमा - मुझे वीर के इस दोस्त से कुछ बातेँ करनी है... (प्रतिभा की ओर देख कर) अगर आप बुरा ना मानें... तो... अकेले में...

रुप - माँ आप को हम यहाँ अकेले कैसे छोड़ कर जाएं...

सुभाष - मैं प्रॉब्लम सॉल्व कर देता हूँ... मैं तापस सर को अपने साथ लेकर घर पर ड्रॉप कर देता हूँ... सुप्रिया जी प्रतिभा मैम को... कोर्ट में ड्रॉप कर देंगी.... विश्व मैम की गाड़ी अपने पास रख ले... जब मीटिंग खत्म हो जाएगी... तब विश्व रानी साहिबा को उनके घर पर ड्रॉप कर देगा... क्यों...

सुप्रिया - ठीक है... वीर... रुप और शुभ्रा जी एक गाड़ी में चले जाएं... अनु को लेकर मैं और मैम उनके पीछे पीछे जाते हैं... अनु को ड्रॉप करने के बाद हम कटक चले जाएंगे... क्यूँ मैंम...

प्रतिभा - ठीक है...

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ड्रॉइंग रुम में एक सोफ़े पर बैठा बल्लभ इंतजार कर रहा था l कुछ देर बाद निर्मल सामल आता है l उसकी हालत नॉर्मल नहीं लग रही थी l बाल बिखरे हुए थे और आँखे थकी हुई लग रही थी l

बल्लभ - गुड मॉर्निंग सामल साहब...

निर्मल - हूं ह्म्म्म्म... गुड मॉर्निंग..

बल्लभ - लगता है आप रात भर सोये नहीं...

निर्मल - हाँ... नींद ही नहीं आई...

बल्लभ - क्यूँ डर के मारे या...

निर्मल - (आँखे गुस्से से फैल जाते हैं और जबड़े भींच जाती हैं) डर... किस बात का डर... प्रधान बाबु... मैं निर्मल सामल हूँ... अपनी यह हस्ती ऐसे ही नहीं बनाया है मैंने...

बल्लभ - सॉरी मैं यहाँ आपको डराने के लिए नहीं आया था.... मैं बस ऐसे ही पूछ बैठा... चूंकि आप रात भर...

निर्मल - एक ग्लानि भाव था मन में... इसलिए सो नहीं पाया...

बल्लभ - ग्लानि भाव...

निर्मल - हाँ... राजा साहब के लिए भी... और अपनी बेटी के लिए भी... (इस बार बल्लभ चुप रहता है) राजा साहब खुद रिश्ता लेकर आए थे... मैंने ना आगे देखा ना पीछे... अपनी रजामंदी दे दी... कास के अपनी बेटी से पूछ कर बताया होता... तो यह नौबत ही नहीं आई होती... बाहर की बात और है प्रधान बाबु... अपनी ही घर में... अपनी ही बेटी से नजरें चुराना पड़ रहा है... यह तकलीफ तुम नहीं समझोगे.... उसके लिए एक बेटी का बाप होना चाहिए...

बल्लभ - आ... आई एम सॉरी... सामल बाबु...

निर्मल - वैसे... तुम किस लिए आए थे... क्या उस जमीन के बारे में...

बल्लभ - हाँ.. मैं वह.. यह कहने आया था... के... पर्सनल रिलेशन और प्रोफेशनल रिलेशन को मिक्स मत कीजिए... यह प्रोजेक्ट नहीं रुकनी चाहिए...

निर्मल - मैं एक बिजनैस मैन हूँ प्रधान बाबु... अभी आपने जो मुझसे कहा... यही बात मैं राजा सहाब तक पहुँचाना चाहता था... जो हुआ... उसे दिल पर ना लें... पर्सनली ना सही... प्रोफेशनली हम एक दुसरे के साथ दे और ले सकते हैं...

बल्लभ - ह्म्म्म्म... इसका मतलब आप सब पहले से ही सोच रखा है...

निर्मल - (भवें सिकुड़ जाते हैं) क्या मतलब है आपका प्रधान बाबु... क्या कहना चाहते हैं आप...

बल्लभ - कुछ नहीं... मुझे लगा कि आपको दुख होगा... रिश्ता ना बन पाने पर...

निर्मल - वह दुख तो था... प्रधान बाबु... पर...

बल्लभ - था... मतलब अब नहीं है...

निर्मल - नहीं... अब नहीं है... (बल्लभ कुछ कहना चाहता था पर हाथ के इशारे से निर्मल उसे टोकते हुए) प्रधान बाबु... हर कोई जानता है... क्षेत्रपाल परिवार के मर्दों के चरित्र को... पर सामने मुहँ पर कोई कहता नहीं है... समाज में प्रतिष्ठा के लिए... रुतबे के लिए थोड़ी देर के लिए... अपने बाप होने की बात को भूल गया था... पर मेरी बेटी सस्मीता ने रिश्ते को नकार कर मेरी बुद्धि पर पड़े मिट्टी को साफ कर दी... वैसे भी... वीर ने अपना फैसला सुना दिया ज़माने के सामने... और इतना तो आप भी जानते होंगे... मानते होंगे... वीर सिंह को फैसला बदलवाने पर खुद राजा साहब भी मजबूर नहीं कर सकते.... रही बिजनैस की बात... राजा साहब मुझे पहले बिजनैस की ऑफर की थी... रिश्ते की नहीं... वैसे भी... सन साइन प्रोजेक्ट के मामले में... मैं बहुत आगे आ गया हूँ... पैसा भी बहुत लग चुका है... इसलिए यह मेरी तरफ से सुझाव है... प्रोफेशन और पर्सनल रिश्तों को अलग रखते हैं... हाँ अगर उनकी प्रोजेक्ट में खलल डालने का कोई विचार हो तो... मैं इस प्रोजेक्ट से अपना हाथ खिंच सकता हूँ... सोच लूँगा थोड़ा नुकसान उठा लिया...

इतना कह कर निर्मल चुप हो जाता है l बल्लभ जो निर्मल की बातों को सुने जा रहा था वह एक दम से स्तब्ध रह जाता है l जब उसे एहसास होता है कि निर्मल चुप हो गया है बल्लभ अपना गला खरासता है और कहना शुरु करता है

बल्लभ - आहेम.. आहेम... आप तो पक्के बिजनैस मैन निकले सामल बाबु... अपने सब कुछ नाप तोल कर नहीं... बल्कि साफ साफ कह दिया... खैर... कुछ बातेँ मैं क्लियर कर देना सही समझता हूँ... देखिए सामल बाबु... राजा साहब आपको भुवनेश्वर में इसलिए लाए ताकि आप कमल कांत उर्फ केके की जगह ब्रांड बन जाएं... फ़िलहाल जो हुआ, राजा साहब और छोटे राजा जी उसके शॉक में हैं... उनकी कोई मंशा नहीं है यह प्रोजेक्ट बंद हो... बस वह चाहते हैं कि... आप जोडार ग्रुप को घुटने पर ले आयें... ताकि वह ओडिशा छोड़ कर वापस बंगाल भाग जाए... और रही आपका बहुत पैसा लगा है... तो आप इतना तो मान लीजिए... अरबों की प्लॉट को महज कुछ करोड़ों में हासिल किया है आपने... और इसके पीछे राजा साहब की एहसान को मत भूलिएगा... पर... (इतना कर कर अपनी बातों पर बल्लभ ब्रेक लगा देता है)

निर्मल - इसीलिये तो कहा प्रोफेशन को पर्सनल रिश्ते ना घोलें... और मैंने कभी इंकार भी नहीं किया और ना ही भुला हूँ... वह जमीन कैसे मिला है... उसके लिए आप लोगों ने क्या क्या पापड़ बेले हैं... वर्ना मुझे निन्यानबे साल की लीज नहीं मिलती... रही जोडार ग्रुप की... तो मैंने प्रोफेशनली उन्हीं की सिक्युरिटी ग्रुप की देख रेख में भूमि पूजन का प्रोग्राम रखा है..

बल्लभ - व्हाट... आई मिन वाव... पर...

निर्मल - फिर पर...

बल्लभ - हाँ सामल बाबु... आप आज अगर राजा साहब के दोस्त हैं... तो उनसे दुश्मनी रखने वालों की नजर में आप तो खटकेंगे ही... कहीं किसी प्रकार की गड़बड़ी ना हो इसलिए मैं आपको आगाह करने आया था...

निर्मल - क्या... जमीन की लीज मिल जाने पर भी... आपको लगता है... कोई डिस्टर्बांस होगा...

बल्लभ - मुझे तो नहीं लगता... कानूनन कोई अड़चन होगी... पर पता नहीं और कुछ... आई मिन..

निर्मल - इसीलिये तो मैंने जोडार ग्रुप सेक्यूरिटी हायर किया है... परसों की भू पूजन के लिए... आप इत्मिनान रखिए... उस दिन किसी प्रकार की... बाधा नहीं आएगी...

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शुभ्रा रुप के साथ अनु और वीर को लेकर xxxx अपार्टमेंट के पार्किंग एरिया में आती है l उनके पीछे पीछे सुप्रिया और प्रतिभा भी पहुँचते हैं l

वीर - भाभी... यह आप मुझे कहाँ ले आईं...

शुभ्रा - (भवें सिकुड़ कर मजाकिया लहजे में) तुम्हें... मैं तुम दोनों को लाई हूँ...

वीर - ओ हाँ... मतलब हमें यहाँ कहाँ लाईं हैं...

शुभ्रा - तुम ही ने तो कहा था... तुम्हें वापस हैल में नहीं जाना... इसलिए मैं तुम दोनों को... एक छोटे से पैराडाइज को लेकर आई हूँ...

वीर - क्या... पैराडाइज...

शुभ्रा - श्श्श्... अब और कोई सवाल नहीं... चुप चाप मेरे साथ चलो... (प्रतिभा और सुप्रिया से) आप भी आइए...

सभी लिफ्ट में सवार हो जाते हैं l अपार्टमेंट की छत पर लिफ्ट पहुँचती है l सभी देखते हैं छत पर एक पेंट हाउस था, जिसकी दरवाजे के पास दीवार पर पैराडाइज लिखा हुआ एक प्लेट लगा हुआ था l शुभ्रा चाबी निकाल कर दरवाजा खोलती है l जब सभी अंदर आने को होते हैं तभी शुभ्रा अनु और वीर को दरवाजे पर रोक देती है l दोनों हैरान हो कर शुभ्रा को देखते हैं l शुभ्रा मुस्कराते हुए अंदर जाती है और एक थाली में दीप और आरती लेकर आती है l दोनों की नजर उतारती है फिर दोनों को अपने अपने दाहिने पैर को आगे कर अंदर आने को कहती है l वीर और अनु दोनों थोड़े झिझकते हुए अंदर आते हैं l उनके अंदर आते ही रुप खुशी के मारे ताली बजाने लगती है l

वीर - भाभी... यह घर...

शुभ्रा - यह मेरा घर है... आज इसे मैं अपनी देवरानी को सौंप रही हूँ.. (यह कह कर घर की चाबी अनु के हाथ में देती है, पर अनु चाबी लेने से कतराती है)

प्रतिभा - रख लो बेटी रख लो... (अनु चाबी रख लेती है)

वीर - भाभी... यह...

शुभ्रा - देखो मैं जानती हूँ... अभी तुम्हारा खुन उबाल मार रहा है... पर तुम कल तक क्या थे... और आज क्या हो... दुनिया से आजमाइश करने निकले हो... तुम्हें किसीका साथ भी नहीं चाहिए... पर यह मत भूलो... (अनु के पास जाकर उसके कंधे पर हाथ रखकर) तुमसे... एक जिंदगी जुड़ी हुई है... जिसकी हिफाजत का वादा... उसके दादी से तुमने किया है... (वीर चुप रहता है) देखो... इस घर पर... किसी भी क्षेत्रपाल का कोई हक नहीं है... यह मेरी पैराडाइज है... जिसे अब मैं तुम दोनों के हवाले कर रही हूँ... यकीन मानों... तुम्हारे हर ख्वाहिश... हर ख्वाब यहाँ पर पुरा होगा...

वीर के आँखों से आँसू छलक पड़ते हैं l वह अपनी ज़ज्बात काबु नहीं कर पाता घुटनों पर आकर शुभ्रा के पैर पकड़ लेता है l

वीर - मुझे माफ कर दो भाभी... मैं तुम्हारे इस प्यार के लायक नहीं हूँ... मैं तुम्हारा गुनहगार हूँ... मैंने तुम्हारे खिलाफ कभी षड्यंत्र किया था...

शुभ्रा - शशश्श्... (वीर को उठाते हुए) वीर... अगर तुमने कुछ किया भी था... वह मैं सुनना नहीं चाहती... तुम्हारा और मेरा रिश्ता भाभी और देवर का है... मत भूलो... यह रिश्ता माँ और बेटे के समान होता है... बेटा कुछ गलती करे... तो माँ माफ कर देती है... वैसे भी... मुझे तुमसे कभी गिला था ही नहीं... इसलिए कुछ भी मत कहो... मैं तुमसे कोई गिला रखना भी नहीं चाहती...

वीर - पर भाभी...

शुभ्रा - कहा ना... मैं कुछ सुनना नहीं चाहती... अब यह घर तुम दोनों के हवाले... यहाँ पर तुम दोनों अपनी दुनिया बसाना....

प्रतिभा - वाह बेटी वाह... आज वाकई मैं तुमसे बहुत प्रभावित हो गई... तुम्हारे बारे में किसी से सुना करती थी... आज साक्षात देख भी लिया... (इतना सुनने के बाद रुप अपनी नजरें घुमा लेती है)

सुप्रिया - वाकई... जिनके बीच पली बढ़ी... वही लोग जब मुसीबत आई तो अनु का साथ छोड़ दिया... अनु को अकेला कर दर दर ठोकर खाने के लिए छोड़ दिया... पर वीर ने अनु का साथ नहीं छोड़ा... और (शुभ्रा से) आपने इन्हें ठोकर खाने से बचा लिया...

शुभ्रा - अच्छा... चलिए अब हम चलते हैं... इन दो प्यार के परिंदों को... इनके घोंसले में छोड़ कर चलते हैं...

सुप्रिया - हाँ हाँ... चलिए...

सभी लोग वीर और अनु को वहाँ पर छोड़ कर चले जाते हैं l वीर और अनु उस घर में असमंजस सा खड़े रह जाते हैं l

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विश्व की गाड़ी दौड़ी जा रही थी, बगल में सुषमा चुपचाप बैठी हुई थी l गाड़ी अब शहर से दुर अंगुल रोड पर आ चुकी थी l महानदी ब्रिज के पार होते ही एक सुनसान बियाबान जगह देख कर सुषमा विश्व को गाड़ी रोकने के लिए इशारा करती है l विश्व गाड़ी रोक देता है l सुषमा गाड़ी से उतर कर बाहर एक किनारे खड़ी हो जाती है और बियाबान के परे सूरज की रौशनी से चमकती हुई बहती महानदी को देख रही होती है l विश्व भी गाड़ी से उतर कर सुषमा के बगल में खड़े हो कर वही दृश्य को देखने लगता है l

विश्व - आपके मन में बहुत से सवाल हैं... पर कहाँ से कैसे शुरू करें.. इस बात पर आपको असमंजस है...

सुषमा - (विश्व की ओर देखती है) हाँ तुमने सही कहा... सवाल इतने हैं कि पूछो ही मत... पर जवाब... जवाब के लिए ना तो तुम्हारे पास वक़्त है... ना ही मेरे पास... (एक पॉज लेकर) तुम... अनाम हो ना...

विश्व - जी... (बेबाकी से जवाब देता है)

सुषमा - तुम चाहते क्या हो अनाम...

विश्व - मैं आपका मतलब नहीं समझा...

सुषमा - हूंह्... तुम्हारा इकलौता मकसद है... क्षेत्रपाल को मिटाना... चाहे कुछ भी हो... कैसे भी हो... क्या इसीलिए... रुप से प्यार का नाटक और वीर से दोस्ती का नाटक कर रहे हो...

विश्व - अब आप मुझ पर साजिश का इल्ज़ाम लगा रही हैं...

सुषमा - हाँ शायद... यह तुम क्षेत्रपाल से किस तरह का बदला लेना चाहते हो... अगर उन्हें मिटाना ही चाहते हो तो... सामने से वार क्यूँ नहीं कर रहे.. पीठ पीछे वीर और रुप के आड़ में... क्यूँ वार कर रहे हो...

विश्व - आप हाइपर हो रहीं हैं...

सुषमा - हाँ हो रही हूँ... मानतीं हूँ.. तुम्हारे साथ... क्षेत्रपाल सही नहीं किए.... पर यह किस तरह का बदला लेना चाहते हो...

विश्व - वीर... आपके परिवार से अलग हुआ... इसमें मेरा कोई हाथ नहीं है...

सुषमा - मामला वीर और क्षेत्रपाल के बीच था... तुम क्यों बीच में घुस आए...

विश्व - मैं घुसा नहीं हूँ... वीर ने आवाज दी... मैं आ गया... इससे पहले बात को आप आगे बढ़ाएँ... मैं कुछ कहूँ...

सुषमा - कहो...

विश्व - आपकी नाराजगी किससे है... मुझसे... या आपके बच्चों से... या फिर अपने आपसे...

सुषमा - (चुप रहती है)

विश्व - आपके आँखों के सामने ही बड़ा हुआ हूँ... मैं आपके आँखों के सामने उतना रहा हूँ... जितना कभी वीर नहीं रहा आपके सामने... क्या आपको लगता है... मैं कोई साज़िश कर सकता हूँ... (सुषमा चुप रहती है, पर विश्व के बोलने के लहजे में धीरे धीरे कड़क पन छाने लगता है) हाँ मैं जितना क्षेत्रपालों के बारे में जानता गया... मेरी दीदी के साथ हुए अन्याय के बारे में जानता गया... मुझे क्षेत्रपालों से नफरत होती गई... और जब मुझे फंसा कर जैल भिजवा दिया... तब मेरे पास सिर्फ एक ही लक्ष रह गया... बदला... बदला सिर्फ बदला... यकीन जानिए... मैं जैल में रह कर मुजरिमों के बीच रह कर.. जुर्म की दुनिया के हर दाव पेच से वाकिफ हूँ... खुद को भैरव सिंह को मिटाने के लिए तैयार कर लिया था... आप जिस औरत से इजाजत लेकर मुझे यहाँ लेकर आई हैं... अगर वह ना होतीं... तो यकीनन मैं क्षेत्रपाल महल में घुस कर... भैरव सिंह का सिर काट कर... गांव की गालियों में ठोकर मारते हुए पुलिस स्टेशन गया होता... मेरी माँ... मुहँ बोली माँ... उन्होंने.. मुझसे वादा लिया... भैरव सिंह क्षेत्रपाल को कानूनन सजा दिलाने के लिए... इसलिए... भैरव सिंह अभी तक सलामत है... और तो और मेरी बहन... वैदेही... जिसकी जिंदगी को नर्क बना दिया गया था... उसने मुझे अपनी रंजिश को भूल जाने के लिए कहा.. और इस लड़ाई को अपनी बजाय.... लोगों की लड़ाई में तब्दील करने के लिए बोली... यही वज़ह है कि भैरव सिंह अभी तक अपनी साँसे ले पा रहा है... (लहजा थोड़ा नर्म पड़ता है) रानी माँ... मैं इतना कमजर्फ, कमीना और गिरा हुआ नहीं हूँ... जो बदले के लिए... वीर या अनु को सीडी बनाऊँ... वीर से दोस्ती इत्तेफाक था.... और राजकुमारी से प्रेम बचपन का था... और उन दोनों को मेरे बारे में सबकुछ पता भी तो है... फिर यह इल्ज़ाम मुझपर आप क्यूँ लगा रही हैं...

इस सवाल के साथ विश्व चुप हो जाता है l सुषमा क्या कहे, उसे कुछ जवाब सूझ नहीं रही थी l एक गहरी साँस छोड़ते हुए सुषमा कहने लगती है

सुषमा - जिंदगी भर घुटती रही... आज मन किया... वह घुटन... वह दर्द सब बाहर निकाल दूँ... किसी पर चीखना चाह रही थी... चिल्लाना चाह रही थी... पर किस पर... कैसे... इसलिए तुम पर ऐसे अपनी घुटन को... भड़ास के रुप में तुम पर उतार दिया... दिल पर मत ले लेना...

विश्व - नहीं... नहीं लिया... पर आप यह सब कहने या करने तो नहीं आई होंगी ना... इसलिए जो कहने आई थी... वह कहिये...

सुषमा - बहुत समझदार हो... अनाम... वीर बचपन से... विक्रम के करीब रहा है... परिवार के किसी भी सदस्य से ज्यादा विक्रम से उसे लगाव है... फिर भी... जब मुसीबत में आया... उसने विक्रम के बजाय तुम्हें आवाज दिया... और तुम पहुँच भी गए...

विश्व - दोस्ती जो कि है...

सुषमा - हाँ... पर अनाम... वीर का सफर और इम्तिहान अभी शुरु ही हुआ है... आगे और भी मुसीबतें आयेंगी... (रुक जाती है l

विश्व - हाँ हाँ आगे बताईये...

सुषमा - तुम अपनी मकसद में होगे... कहीं उसकी पुकार तुम्हारे राह में रोड़ा बन कर आया तो...

विश्व - तब भी.. एक दोस्त... अपनी दोस्ती निभाएगा...

सुषमा - और रुप...

विश्व - रानी माँ... राजकुमारी जी का मेरे जीवन में आना... तब हुआ... जब मैं अपने बचपन से आगे बढ़ रहा था... और वह बचपन में कदम रख रही थीं... जुदा तब हुए... जब वह बचपन छोड़ रही थी... मैं जवानी की दहलीज पर कदम रख रहा था... सच कहूँ तो... मैं भुला चुका था उन्हें... वह दुबारा... मेरी जिंदगी में... एक बहार बन कर वापस आई हैं... मेरी जिंदगी पर सिर्फ उन्हीं कि हुकूमत चल सकती है.. बस....

सुषमा - (थोड़ा मुस्कराते हुए) बहुत प्यार करते हो रुप से... ह्म्म्म्म...

विश्व - हाँ...

सुषमा - अब जब वीर की वाक्या सामने है... क्या तुम्हें लगता है... तुम दोनों की राह आसान होगी...

विश्व - नहीं होगा... पर शायद उसकी नौबत ना आए... क्या पता क्षेत्रपाल आने वाले समय में... अपनी ही उलझन में उलझ जाएं...

सुषमा - हाँ... हो सकता है... पर तुम विक्रम को भूल रहे हो... उसे जब तुम्हारे और रुप के बारे में... मालुम होगा... तब उसकी दुश्मनी महंगी पड़ सकती है...

विश्व - दोस्ती बेशकीमती होती है... प्यार अनमोल होता है... और दुश्मनी महंगी ही होनी चाहिए... पर फ़िलहाल मुझे विक्रम से कोई खतरा नहीं है...

सुषमा - ऐसा क्यूँ...

विश्व - अभी विक्रम की कंधे और सिर दोनों... मेरे एहसान के आगे झुके हुए हैं... जिस दिन वह एहसान का बोझ उतर जाएगा... उस दिन विक्रम मुझपर पलटवार करेगा...

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रंग महल में अपनी ही तस्वीर के सामने भैरव सिंह खड़ा था l तस्वीर में वह एक सिंहासन पर बैठा हुआ था, बाएं हाथ में तलवार था और दाहिना पैर एक शेर के सिर रखा था l बड़ी ही रौब दार तस्वीर थी l अपनी दांत को पिसते हुए अपनी तस्वीर को घूरे जा रहा था l अचानक उसे एक हँसी सुनाई देने लगती है l अपनी नजर चारों ओर घुमाता है, उसे कोई नजर नहीं आता l फिर उसका ध्यान अपनी ही तस्वीर पर ठहर जाता है l उसके आँखों के सामने तसवीर में उसका अक्स जिवंत हो जाता है l

भैरव सिंह - (हैरानी के मारे) कौन हो तुम...

तस्वीर - हा हा हा हा... क्यूँ मुझे नहीं पहचान पा रहे... मैं तुम हूँ...

भैरव सिंह - तुम यहाँ क्यूँ आए हो...

तस्वीर - मैं आया ही कब था... मैं तो तब से हूँ... जब से तुम हो...

भैरव सिंह - ठीक है ठीक है... अकेला छोड़ दो हमें... जाओ यहाँ से...

तस्वीर - हम... यह हम क्या है..

भैरव सिंह - हम... हम क्षेत्रपाल हैं...

तस्वीर - अब इस पहचान पर ग्रहण लगने लगा है... तुम्हारे वृक्ष से डाली अब कटने लगा है... कहीं यह उस वैदेही के श्राप की वज़ह से तो नहीं... यही सोच रहे हो ना...

भैरव सिंह - हाँ...

तस्वीर - कहीं तुमने अपने दुश्मनों को जिंदा छोड़ कर गलती तो नहीं कर बैठे...

भैरव सिंह - हमसे दुश्मनी का लोहा कौन उठा सकता है...

तस्वीर - विश्व प्रताप महापात्र... यही नाम है ना उसका... उसने गाँव वालों के सामने... तुम्हारे आदमियों को दौड़ा दौड़ा कर मारा... अब तुम्हारा परिवार तुमसे टुट रहा है... जैसा वैदेही ने कहा था... वैसा ही हो रहा है...

भैरव सिंह - यह महज इत्तेफाक है... हमारे टुकड़ों में पलने वाला कुत्ता... हमारे ही झूठन पर पलने वाला... उसकी औकात क्या है... उसकी बिसात क्या है...

तस्वीर - हाँ ठीक कहा तुमने... उसने सुबह तड़के घर में घुस कर बड़े राजा को आँख दिखा कर महल से निकला था... भूल गए... अब राजकुमार वीर की मदत कर... उस दो कौड़ी लड़की को ढूँढ कर.... अब वीर को तुम्हारे खानदान से अलग कर दिया... और अब उसने आज रुप फाउंडेशन केस में पीआईएल दाख़िल कर दिया है...

भैरव सिंह - हाँ हाँ उसने ऐसा किया है... और अब उसकी सजा भी उसे मिलेगी...

तस्वीर - हाँ उसे सजा दो... ऐसा सजा... ताकि बरसों बरस तक फिर कोई विश्वा पैदा ना हो पाए...

भैरव सिंह - हाँ अब ऐसा ही होगा... इसबार कोई रहम नहीं होगी... (तभी दरवाजे पर दस्तक होती है, अपनी ख़यालों से भैरव सिंह बाहर आता है और दरवाजे की ओर देखता है जो बंद था) कौन है...

बाहर से आवाज आती है - दरोगा सहाब आए हैं हुकुम...

भैरव सिंह - ठीक है... भेजो उसे...

कुछ देर बाद दरवाजा खुलता है l रोणा अंदर आता है l आते ही भैरव सिंह को सैल्यूट ठोकता है l भैरव सिंह एक बड़ी सी कुर्सी पर बैठ जाता है l

रोणा - आपने याद किया हुकुम...

भैरव सिंह - हाँ दरोगा... अब वक़्त आ गया है... शतरंज पर अपनी चाल चलने की...

रोणा - मैं समझा नहीं हुकुम...

भैरव सिंह - दरोगा... तुम जानते हो... हम उस चींटी तक को नहीं मसलते... जिसकी औकात हमें काटने तक कि ना हो...

रोणा - जी हुकुम...

भैरव सिंह - तुम समझ रहे हो... हम किसकी बात कर रहे हैं...

रोणा - जी हुकुम... मैं अभी अभी न्यूज देख कर आ रहा हूँ... विश्व ने... रुप फाउंडेशन केस पर... दोबारा सुनवाई के लिए... पीआईएल दाखिल किया है...

भैरव सिंह - और...

रोणा - और अभी जो भुवनेश्वर हुआ है... उसका सारा ब्यौरा मुझे प्रधान से मिल चुका है...

भैरव सिंह - ह्म्म्म्म... अब तुम्हें लगता होगा... उस दिन हमने तुम्हें रोक कर बड़ी गलती कर दी थी...

रोणा - नहीं राजा साहब... झूठ नहीं बोलूंगा... पहले लगा तो था... पर अब लग रहा है... उस सांप का सिर कुचलने में बहुत मज़ा आएगा... जो सांप जितना जहरीला हो...

भैरव सिंह - तो... कब से काम पर लगोगे...

रोणा - बस प्रधान को आ जाने दीजिए... हम दोनों मिलकर... विश्व को ऐसा मजा चखायेंगे की... उसकी सात पुस्तें याद रखेंगी...

भैरव सिंह - ह्म्म्म्म... ठीक है... दो दिन बाद... प्रधान मुहँ लटका कर आ जाएगा... तब तुम दोनों अपनी सौ फीसद देकर देख लेना...

रोणा - प्रधान... मुहँ लटका कर आएगा... गुस्ताखी माफ... हुकुम पर क्यूँ...

भैरव सिंह - परसों जब आये... तो इसीसे पुछ लेना... एक बात हमेशा याद रखो दरोगा... दुश्मन पर वार तब करो... जब उसके ताकत का तुम्हें पुरा अंदाजा हो... हमें यह कहते हुए कोई असमंजस नहीं है... हमने विश्व को कम कर आंका था... अब तुम्हें और प्रधान को उसकी ताकत का अंदाजा हो गया होगा.... इसलिए अब वार करने के लिए... पुरी तरह से तैयार रहो...

रोणा - जी हुकुम...

भैरव सिंह - रोणा... हम तुम्हें पुरी आजादी देते हैं... जो भी करना है करो... मगर उस गंदी नाली के कीड़े को उसकी औकात दिखा दो...

रोणा - जी हुकुम ऐसा ही होगा...

भैरव सिंह - रोणा यह पहली बार है... की किसीके वज़ह से... हमारे माथे पर शिकन पड़ा है... Ham यह बात किसी और से कहेंगे तो इससे हमारी कमजोरी जाहिर होगी... इसलिए अगर तुमने यह कर दिया... तो यह रंग महल पुरी तरह से तुम्हें सौंप देंगे...

रोणा - जी... (आखें हैरानी के मारे फैल जाते हैं)

भैरव सिंह - हाँ दरोगा हाँ... तुम ऐश करना मरते दम तक... इतनी दौलत भी देंगे....

रोणा - जी... (एक अंदरुनी खुशी के साथ)

भैरव सिंह - पर याद रहे... यह बात सिर्फ तुम्हारे और हमारे बीच ही रहनी चाहिए... जो करो जैसा करो... तुम्हें आजादी होगी... कोई रुकावट नहीं होगी... पर अंजाम वह होना चाहिए... जो हमें दिखे...

रोणा - जी हुकुम... (एक पॉज लेकर) हुकुम... अगर आप बुरा ना माने तो... तो...

भैरव सिंह - पूछो क्या पूछना चाहते हो...

रोणा - यह काम आप... युवराज से भी करा सकते थे...

भैरव सिंह - दरोगा... बेटे के रौब के पीछे बात का रुतबा होता है... और हमें यह एहसास मत दिलाओ... के हमने एक गलत आदमी से... सौदा तय किया है...

रोणा - नहीं... नहीं राजा साहब नहीं... आपने आज मुझे इतनी इज़्ज़त दी है... तो वादा करता हूँ... सिर कटा कर भी उस हराम खोर विश्व को नेस्तनाबूद कर दूँगा...

भैरव सिंह - ठीक है... अब तुम जा सकते हो... पर याद रहे... यह बात हम दोनों की बीच रहे... कोई तीसरा जानेगा... तो तुम्हारी खैर नहीं...

रोणा - जी समझ गया..

कह कर रोणा रंग महल से बाहर आता है l आते ही अपनी जीप पर बैठ कर महल से निकल जाता है l अपने गाड़ी की रियर मिरर से रंग महल को बड़े चाव से देख रहा होता है l कुछ दूर बाद अपनी जीप को रोकता है और उतर कर रंग महल को देखता है l अपनी जेब से मोबाइल निकालता है और उसमें एक फोटो देखने लगता है l वह फोटो विश्व और रुप की थी जिसे खिंच कर लेनिन ने भेजा था l रोणा फोटो को एनलार्ज करता है जिससे विश्व फोटो से गायब हो जाता है, और सिर्फ रुप दिखने लगती है l

रोणा - हँसले... तेरी किस्मत में जितनी हँसी लिखी है हँसले... तेरे विश्वा को अब कुत्ते की मौत मारूंगा... और तेरी इसी रंग महल में उतारूंगा... कसम है... तु जिंदगी भर मेरी रंडी बनकर रहेगी... क्यूँकी अब किस्मत भी मेरे साथ है... हा हा हा हा हा...

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पैराडाइज

वन बीएचके पेंट हाऊस था l एक ही बेड पर वीर और अनु सोये हुए थे l कमरे में मद्धिम रौशनी को फैलते हुए एक नाइट बल्ब जल रहा था l दोनों के दरमियान कुछ फासला था l वीर की आँखों में नींद नहीं थी जबकि अनु सो चुकी थी l वीर अनु की तरफ पलटता है, अनु कुर्मी सलवार में थी और वीर की तरफ चेहरा कर पीठ के बल सोई हुई थी l वीर की आँखे अनु के चेहरे पर टिक जाती है l दुनिया जहान से बेख़बर कोई शिकवा या शिकायत नहीं किसी मासूम बच्चे की तरह नींद में खोई हुई है l वीर के चेहरे पर एक मुस्कान उभर जाती है l तभी अनु करवट बदलती है और वीर की तरफ पलट जाती है l ऐसे में अनु के गले के नीचे कुर्ती से स्तनों का उभार क्लीवेज दिखने लगती है l वीर यह दृश्य देख कर अपनी थूक निगलता है l तभी उसकी नजर फिसलता है, देखता है कमर के पास अनु की कुर्ती थोड़ी अस्तव्यस्त हो गई है जिसके कारण अनु की गोल गहरी नाभि साफ दिख रही थी l यह देख कर वीर का मुहँ खुला का खुला रह जाता है l वह अनु की तरफ देखता है l अनु सोई हुई थी l वीर की धड़कने अचानक रफ्तार पकड़ने लगती है l वह अपनी थरथराती हाथ को धीरे धीरे आगे बढ़ाता है और अनु के नाभि के करीब रोक देता है l वीर फिर से अनु के चेहरे की ओर देखता है, अनु अभी भी निश्चित होकर सोई हुई है l धीरे से अनु की नाभि को सहलाता है l अनु थोड़ी कुनकुनाते हुए करवट बदलती है और पीठ के बल सो जाती है l वीर अपना हाथ खिंच लेता है l फिर अपनी जगह पर बैठ जाता है, अनु की ओर देखता है, अनु नींद में है यह निश्चिंत होने पर बेड से उतरता है और बाहर छत पर आजाता है l आगे बढ़ कर छत के किनारे पर आ खड़ा होता है l रेलिंग पर हाथ रख कर कभी आसमान की और तो कभी नीचे स्ट्रीट लाइट में जगमगाते सड़कों को देख रहा था l अचानक वह चौंकता है जब वह अपने कंधे पर किसीके हाथ को महसुस करता है l पीछे मुड़कर देखता है, अनु थी l

वीर - ओह... तुम... तुम सोई नहीं...

अनु - यही सवाल मैं आपसे करूँ तो...

वीर - वह मुझे नींद नहीं आ रही थी...

अनु - झूठे....

वीर - सच में... वर्ना सोचो... मैं यहाँ क्या कर रहा हूँ...

अनु - (गौर से वीर की आँखों में झांकते हुए) कोई बात है... जिससे आप नाराज हैं... वही नाराजगी... आपको सोने नहीं दे रही है...

वीर - नाराज... नहीं मैं किसी से भी नाराज नहीं हूँ...

अनु - सच में...

वीर - हाँ... क्यूँ... तुम्हें क्यूँ ऐसा लग रहा है कि मैं किसी से नाराज हूँ...

अनु - किसी से नहीं... बल्कि... आप खुद से नाराज हो...

वीर - (कुछ देर के लिए वीर चुप हो जाता है) कहीं तुम यह तो नहीं कहना चाह रही हो... के मैं अपनी पिछली जिंदगी के वज़ह से खुद से नाराज हूँ... या फिर खुद को वर्तमान में नहीं ढाल पा रहा हूँ.. इसलिए नाराज हूँ...

अनु - नहीं ऐसी बात नहीं है... (अनु वीर की दोनों हाथों को अपने गालों पर लेती है) आप... अपने आप से लड़ रहे हैं... हैं ना...

वीर - (अपनी नजरें झुका लेता है)

अनु - आपने ज़माने के सामने मुझे अपनाया है... ज़माने के आगे मेरा हाथ थामा है... इसी लिए तो... भाभी जी ने... अपना पैराडाइज हमें सौंप दिया है... भले ही... संसार की नजर में व्याह नहीं हुआ हमारा... फिर भी... एक घर में... एक ही कमरे में... हमें आशीर्वाद के साथ रहने दिया है.... बेशक हम हादसों से गुजर कर आए हैं... तूफान झेल कर आए हैं... पर आए तो हम एक आसरे में ही है ना...

वीर - बस... बस... बस रुक जाओ... कितनी बातें कर रही हो...

अनु - नहीं... मुझे बात पुरा कर लेने दीजिये... आप अपने आपसे लड़ रहे हैं.. जुझ रहे हैं... इतनी हादसों से गुज़री जिंदगी के इस मुकाम पर... दो पल के प्यार में बीताने से डर रहे हैं... हैं ना...

वीर - (थोड़ा सीरियस हो कर) हाँ... मैं लड रहा हूँ खुद से... जुझ रहा हूँ खुद से... प्यार और हवस के बीच के फासले को ढूँढ रहा हूँ... वक़्त और बेवक्त में फर्क़ बांट रहा हूँ...

अनु - क्यों...

वीर - अभी अभी तुमने कहा ना... हम तूफान से गुजरे हैं... हादसों से निकल कर आए हैं... तभी दिल में उठ रहे यह ज़ज्बात... मुझे गुनाह का एहसास करा रहे हैं... दादी की चिता में आग सुबह ही लगाई है... चिता की आग बुझी भी नहीं होगी के.. तेरहवीं तक रुक नहीं पा रहा और...

अनु - समझी...(अनु वीर के गले लग जाती है) आप को जितना जाना... आप उससे भी बढ़ कर निकले... मेरे आँखों में आपका कद कितना ऊँचा हो गया है क्या कहूँ... खुद को कहीं नहीं पा रही हूँ...

वीर - (अनु को बाहों में ऊपर उठा कर अपने बराबर ले आता है, अनु के पैर हवा में झूलने लगती हैं ) यह लो तुम मेरे बराबर... मेरे साथ... मेरे सामने हो...

अनु - (मुस्कराते हुए वीर के गले लग जाती है) कितनी खुशी है... लगता है यहीं जिंदगी है... आपकी बाहों में मौत भी आ जाए... तो कोई ग़म नहीं...

वीर -(अनु के चेहरे को सामने लाकर) ऐ... ऐसी बातेँ क्यूँ कर रही है... मैंने तेरे लिए दुनिया छोड़ दी है... और तु मुझे छोड़ने की बात कर रही है...

अनु मुस्कराते हुए अपनी माथे को वीर के माथे पर रखती है और धीरे धीरे वीर के होंठो पर एक चुंबन जड़ कर फिर से वीर के गले से जोर से लग जाती है और बहुत धीरे से "आई लव यू" कहती है l

वीर - (अचानक से चौंकता है) है... क्या कहा तुमने अभी...

अनु - क्या...

वीर - ऐ.. मैं बहरा नहीं हूँ... (अनु को उतार देता है)

अनु - कुछ भी तो नहीं... ज़रूर आपके कान बजे होंगे...

वीर - देख अनु... आज तु बच नहीं सकती... आज कहा है... तो खुलकर बोलना... कान में जरा सी अमृत डाल कर अब मना करना... देख बिल्कुल ठीक नहीं...

अनु - कहूँगी कहूँगी...

वीर - तो कह ना...

अनु - मुझे आपसे प्यार है...

वीर - अरे यार... हिंदी में नहीं... अँग्रेजी में...

अनु - मुझे आपसे प्यार है... था और रहेगा... जिस दिन यह प्यार हद से गुजरेगा... उस दिन कहूँगी...

वीर - तो आज क्यूँ कहा...

अनु - क्यूंकि... आज आप पर प्यार हद से ज्यादा आ रहा था... इसलिए... (अनु जीभ दिखा कर भागती है)

वीर - तेरी तो...

अनु भागती है और वीर उसे पकड़ने के लिए उसके पीछे भागता है l कुछ ही देर में वीर अनु को पकड़ लेता है और उसे घर की दीवार से सटा देता है l दोनों की साँसे ऊपर नीचे हो रही थी l दोनों एक दूसरे की आँखों में खोए हुए थे l कब एक दूसरे के होंठ आपस में मिल गए दोनों को मालुम भी ना हो सका l ऊपर आसमान में चंद्रमा अपनी रौशनी बिखेर रही थी और नीचे दो प्रेमी जोड़े धीरे धीरे अपने प्रेम में मगन हो कर डूबने लगे l
 
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