Thriller "विश्वरूप" ( completed ) - Page 13 - SexBaba
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Thriller "विश्वरूप" ( completed )

जी मैं समझ सकता हूँ

कहानी जब लंबी अवधि तक चलती है तब पाठकों का कुछ चरित्रों से लगाव हो जाता है l इसलिए मुझे भी कभी-कभी डर लगता है कि कहीं अपनी चिंतन को लेखन में ढालते समय पाठकों को निरास तो नहीं कर रहा हूँ l क्यूँकी अनु की चरित्र का अंत बहुत पाठकों को पसंद नहीं आया l पर मैं क्या कर सकता था l कहानी को लेकर मेरे मस्तिष्क में जो भी कुछ है मैं केवल उसी सोच के साथ न्याय करने की कोशिश कर रहा हूँ l

चेट्टी और मृत्युंजय की बखिया उधेड़ दी जाएगी यह निश्चिंत है l

हाँ विश्व इतना समर्थ तो है

हाँ यह एक फैलुअर अटेंप्ट था

वीर वही प्रयत्न कर रहा है

SANJU ( V. R. ) भाई

कहानी के हर चरित्र के साथ न्याय करने की कोशिश कर रहा हूँ

सच कहूँ तो पाठक जुड़ते गए विश्लेषण करते गए और मार्ग दर्शन देते गए इसलिए कहानी यहाँ तक पहुँच पाया है l

मैं जल्द से जल्द इस कहानी को समाप्त कर देना चाहता हूँ इसलिए ज्यादा से ज्यादा और दस अपडेट या एक दो अपडेट ज्यादा होंगे पर कहानी अपने हर चरित्र के साथ न्याय करते हुए समाप्त हो जाएगी

आशा है अगला अपडेट भी सारे पाठकों को पसंद आएगा l लिखना शुरू कर दिया है शनिवार रात तक या फिर रविवार सुबह तक अगला अपडेट आ जाएगा l

धन्यवद aऔर आभार
 
हाँ यह एक दार्शनिक वाक्य था और वास्तविकता के निकट भी

विक्रम अब अपनी सैचुरेशन पर आ गया है l अगली मुलाकात भैरव सिंह से उसका बेटे के रुप में अंतिम मुलाकात होगा

हाँ मैंने पहले भी कहा था l इस कहानी में जितने भी दुश्चरित्र हैं वह किसी भी एंगल से भैरव सिंह से कम नहीं हैं l पर चूँकि मुख्य खलनायक भैरव सिंह ही तो इनकी भूमिका सीमित ही है l

हाँ रोचक तो होगी l पता नहीं पाठकों के आशाओं पर खरा उतर पाऊँगा या नहीं l पर फिर भी अपना पूरा प्रयास करूँगा और निर्णय विश्लेषक, आलोचक समालोचक एवं प्रतिक्रिया देते पाठकों पर छोड़ दूँगा l

भाई अगला अपडेट बहुत ही महत्वपूर्ण मोड़ पर जाने वाला है l

हाँ चूक तो हुई है

शुक्रिया मेरे भाई आपका बहुत बहुत शुक्रिया

सच कहूँ तो कहानी लिखते लिखते ऊब गया हूँ

इसे ख़तम करने के पश्चात एक लंबा विराम लेना चाहता हूँ और विराम काल में मेरे पसंदीदा लेखकों को पढ़ना चाहता हूँ l
 
हाँ इसीलिए अगली बार अगर मैं कोई कहानी लिखा तो पचास से सौ अपडेट में सीमित रखूँगा l

हाँ भाई यह बात आपकी सौ फीसदी सच है

ना सिर्फ भाषा बल्कि भावनायें और दिशा तक बदल जाती है l

हाँ वह तो मैं करूँगा ही

क्यूँकी मैं एक पाठक भी हूँ

पढ़ कर अपनी एक दुनिया का कल्पना करना भी एक रोमांचक अनुभूति होती है l

पर मेरी एक प्रॉब्लम भी है

कहानी चाहे किसी भी कटेगरी की हो भावनायें उसमें प्रमुख होनी चाहिए अगर उसमें वह नहीं मिलता तो मैं उन कहानियों से दूरी बनाए रखता हूँ l

खैर मुझे तो जल्दी है कहानी को ख़तम करने की इसलिये देखते हैं कब यह कहानी खत्म होता है
 
👉एक सौ बावनवाँ अपडेट

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कटक में बारिश की धार बढ़ चुकी थी l विक्रम और विश्व अपनी अपनी फाइट स्किल दिखाने लगे l पर जो लोग इन दोनों को घेरने आए थे, वे लोग भी डट कर भीड़ रहे थे l कुछ ही देर में दस बारह लोग पानी भरे रास्ते पर गिरे हुए थे l रास्ते पर पानी अब टखने तक आ चुका था l विश्व और विक्रम ना सिर्फ एक दूसरे को गार्ड करते हुए उन बदमाशों पर टूट पड़े थे बल्कि हाथ आए बदमाशों की ऐसी कुटाई कर रहे थे कि जो एक बार नीचे गिरा वह दुबारा नहीं उठ रहा था l कुछ ही देर में सभी बदमाश नीचे गिरे हुए थे l विश्व अपनी गैराज वाली मारुति 800 की ओर देखता है l गाड़ी पूरी तरह से तबाह हो चुकी थी l विक्रम नीचे गिर पड़े उन बदमाशों की पॉकेट खंगालने लगता है l एक बदमाश को उनकी मंशा समझ में आ जाता है l वह अपनी जेब से चाबी निकाल कर फेंक देता है l विक्रम जो मुर्गीयों वाली ट्रक की चाबी खो जाने से बिफर जाता है l दौड़ कर उस बदमाश को पकड़ कर उठा कर पीटने लगता है l विश्व उसे रोकता है l

विश्व - देखो... हाईकोर्ट यहाँ से आठ किलोमिटर दूर है... चलो भागते हुए गालियों के बीच से होकर जाते हैं... रास्ते में कुछ जुगाड़ भीड़ा कर जल्दी पहुँचने की कोशिश करते हैं...

विक्रम उस आदमी को वहीँ छोड़ विश्व के साथ भागने लगता है l दोनों संकरी गालियों में भागने लगते हैं l विश्व भागते भागते गौर करता है, कुछ लोग छतों से छत हो कर कूदते हुए उनके पीछे पीछे रेकी कर रहे हैं और फोन से किसी को खबर कर रहे हैं l कुछ गालियों से गुजरने के बाद दोनों एक संकरी चौराहे पर पहुँचते हैं l वहाँ पर सारे घरों के दरवाजे बंद थे l पर चौराहे के हर और से ना जाने कितने लोग हाथ में काँच के बोतल लिए इनसे कुछ दूर पर रुक जाते हैं l विश्व और विक्रम एक दूसरे की ओर पीठ कर उन लोगों को देख रहे थे और वह लोग विक्रम और विश्व की घूर रहे थे l विश्व और विक्रम अपने चारों ओर देख कर परिस्थिति को समझने की कोशिश कर ही रहे थे कि एक आवाज उनके कानों में पड़ती है l

"यह पास के राज्य से आए बच्चा चोर हैं... मारो इनको... बच कर भाग ना पाएँ.."

फिर अचानक सब के सब इन दोनों पर बोतलें फेंक मारने लगते हैं l दोनों से बोतल टकरा कर या छूट कर टूट कर बिखरने लगते हैं, या फिर इन्हीं के पास आपस में टकरा कर टूटे काँच कुछ इन्हें ज़ख्मी करने लगते हैं और कुछ नीचे गिर कर बिखरने लगते हैं l विश्व विक्रम को खिंच कर एक घर की ओर भागता है l विश्व उस बंद दरवाजे पर लात मारता है l दो लात पड़ने पर वह दरवाजा टूट जाता है l विक्रम विश्व के साथ उस घर में घुस जाता है l घर के सदस्य इन्हें देख कर डर जाते हैं और चीखने चिल्लाने लगते हैं l क्यूँकी विश्व और विक्रम दोनों खून से सने हुए थे l फिर भी उस घर के सदस्यों को गौर किए वगैर छत की ओर दोनों भागने लगते हैं l उसके बाद वे दोनों पास पास सटें घरों के छतों के ऊपर से भागने लगते हैं l

दोनों भागते हुए देखते हैं उनके पीछे अभी भी लोग हाथ में हथियार लेकर उनके पीछे लगे हुए हैं l एक छत पर पहुँच कर देखते हैं आगे रास्ता नहीं है l दोनों नीचे कूदते हैं l रास्ते पर पहुँच कर देखते हैं यहां पर भी हर कोने से लोग इनके तरफ भागते हुए आ रहे हैं l ऐसा लग रहा था जैसे पूरा का पूरा कटक शहर इनके पीछे पड़ गया है l दोनों थके हुए थे और हांफने लगे थे l लोग कुछ दूरी बना कर इन्हें घेर लिया था l

विक्रम - यह लोग हैं... या रावण के सिर... एक से बचो तो दूसरा सामने आ जाता है.. जहां देखो कुकुरमुत्ता की तरह दिख रहे हैं...

विश्व - अब वाकई... हमें इनके इलाके से निकलने के लिए... मदत की जरूरत पड़ेगी... वर्ना... आज हम कोर्ट पहुँच नहीं पाएंगे...

विक्रम - हाँ... तुमने ठीक कहा. पर मदत किससे लेंगे...

विश्व - लेंगे... पहले कोई मोबाइल मिल जाए.. तो सोचेंगे...

विक्रम - मोबाइल... क्या गाड़ी के पास वापस जाना पड़ेगा..

विश्व - नहीं.. इनमें से किसी एक से छीनना पड़ेगा...

विक्रम - अगर उसमें पैटर्न लॉक हुआ तो...

विश्व कुछ नहीं कहता, अब लोग भले ही चारों ओर से घेरते हुए इनके पास आ रहे थे l पर चूँकि यह दोनों मैले कुचले कपड़ों में खून से सने हुए थे, इनकी हालत इन्हें खुंखार दिखा रही थी l इसलिए लोग कुछ दूरी पर रुक गए l विक्रम लड़ने के लिए खुद को मानसिक तौर पर तैयार करता है और अपना पोजीशन बनाता है l विश्व लोगों पर साथ साथ अपने आसपास भी नजर दौड़ा रहा था l कहीं से थोड़ा रास्ता मिल जाए तो यहाँ से निकल सके l कुछ लोग छाते के साथ थे और कुछ लोग बरसाती में थे और कुछ वैसे ही भीग रहे थे l विश्व को कुछ दूर एक सीवर के कल्वर्ट पर बाइक सटा हुआ दिखता है, और इत्तेफाक से वहाँ पर लोगों की संख्या कम थी l पर उस बाइक तक पहुँचने के लिए उसे उन लोगों को लाँघ कर जाना पड़ेगा l

विश्व - विक्रम...

विक्रम - हूँ...

विश्व - मेरी तीन कि गिनती पर.. मेरे साथ... मेरे पीछे चिल्लाते... चीखते हुए... आना...

लोगों के हाथ में कुछ डंडे थे, किसी किसी ने पत्थर भी पकड़ रखे थे l विश्व धीरे से धीमी आवाज में अपनी गिनती शुरु करता है

एक

दो

.

.

.

.

तीन

विक्रम और विश्व दोनों जोर से चीख चिल्ला कर हमले की तेवर में लोगों की ओर भागने लगते हैं l दोनों अपनी पूरी ताकत से उन लोगों से टकराते हुए सीवर की कल्वर्ट की ओर भाग कर जाने लगते हैं l जो लोग वहाँ पर इन्हें घेरने आए थे वे थोड़े डरे हुए थे कुछ लोग मुकाबला करने आगे आए, पर सब टकरा कर लोग तितर-बितर होने लगे l जो इन दोनों के हत्थे चढ़े वह मार खा कर जमीन पर गिरे और जो बच गए वह डर कर इनसे दूरी बना कर हट गए l इस हाथापाई में विक्रम एक बंदे से एक डंडा छिन लिया था l दोनों कल्वर्ट पर गाड़ी के पास पहुँच गए l विश्व देखता है कि गाड़ी का हैंडल लॉक था l विश्व अपने अंदर की मैकेनिक को जगाता है l बाइक की सीट की ग्रिप पकड़ कर अपनी पैर से हैंडल को झटके से सीधा करता है l इतने मे एक पत्थर आकर विश्व के सिर पर लगती है l विश्व का ध्यान हटता है जिसके वज़ह से गाड़ी की बैलेंस बिगड़ जाता है और कल्वर्ट के कोने से गाड़ी की टंकी टकरा जाती है l जिसके वज़ह से वहाँ से पेट्रोल रिसने लगती है l विश्व अब खुद को संभाल लेता है पलक झपकते ही कुछ तारों से छेड़ छाड़ कर किक मारता है l गाड़ी स्टार्ट हो जाती है l पर रिसता हुए पेट्रोल स्पार्क प्लग के सम्पर्क में आते ही आग पकड़ लेता है l विश्व अब बाइक को गियर में डाल कर एक्सीलेटर को जोर जोर से मोड़ने लगता है l गाड़ी शोर के साथ धुआं भी छोड़ने लगती है l गाड़ी पर विश्व चढ़ने के बजाय कल्वर्ट पर गोल गोल घुमाने लगता है l लोग अब डर के मारे अपनी जगह रुक कर विश्व को गाड़ी को गोल गोल घुमाते देख तो रहे थे पर कोई इनके पास नहीं आ रहा था l विश्व मौका देख कर आग में लिपटी गाड़ी को गियर में डाल कर कल्वर्ट के पास भीड़ की ओर गाड़ी को छोड़ देता है l लोग डरके मारे भागने लगते हैं l आग में लिपटी गाड़ी उनके पीछे भाग रही थी l विश्व और विक्रम के लिए अब रास्ता बन चुका था l दोनों गाड़ी के पीछे भागते हुए भीड़ में घुल कर फिर भीड़ से कट जाते हैं और एक दूसरे गली में भागने लगते हैं l इतने में वह जलती हुई बाइक एक बिजली की ट्रांसफर्मर से टकरा जाती है l जिसके वज़ह से वहाँ पर एक भयानक धमाका होता है l विश्व और विक्रम मूड कर देखते हैं l वहाँ पर अब कोई नहीं था l भीड़ पूरी तरह से तितर-बितर हो चुका था l दोनों फिर आगे की ओर भागने लगते हैं l भागते भागते एक खुले सड़क पर आ गए थे l अचानक वीर को कुछ एहसास होता है वह विक्रम को खिंच कर एक गली के अंदर ले जाता है l वह एक व्यवस्थित कॉलोनी थी l वहाँ की ओट से देखता है कुछ लोग उन्हें ढूंढ़ने की कोशिश कर रहे हैं l विश्व और विक्रम अब बिना रुके उस कॉलोनी में हर घर में नजर डालते हुए भागते हैं l उन्हें एक घर का दरवाजा खुला दिखता है l वे दोनों उस घर में घुस जाते हैं l उस घर में इनके घुसते ही उस घर के सदस्य चीखने लगते हैं l विक्रम उस घर के एक बुजुर्ग की गर्दन पकड़ लेता है और खामोश रहने के लिए सबको कहता है l सभी लोग डर के मारे चुप हो जाते हैं l

विश्व - (उनसे) आपका लैंड लाइन फोन है...

एक सदस्य - जी... (डरते हुए फोन की तरफ इशारा करते हैं)

विश्व उस फोन के तरफ जा कर तापस को फोन लगाता है l उधर घर में सब चिंतित थे l क्यूँकी बहुत देर से सभी विश्व और विक्रम को फोन लगा रहे थे पर विक्रम का फोन स्विच ऑफ आ रहा था और विश्व का फोन रिंग होने के बाद कट जा रहा था l एक अंजना नंबर को डिस्प्ले में देख कर तापस फोन उठाता है l

तापस - हैलो...

विश्व - डैड...

तापस - प्रताप कहाँ हो.. कैसे हो... और मोबाइल क्यूँ नहीं उठा रहे हो..

विश्व - बहुत बड़ी कहानी है... फ़िलहाल हम हाईकोर्ट से तीन किलोमिटर दूर... हिंडल में... एक घर में हैं... आप जोडार साहब से कहिए.. हमें यहाँ से निकलें...

तापस - क्या... तुम लोग हिंडल में... वहाँ कहाँ चले गए..

विश्व - ओहो... डैड... मैं आपको बाद में सब डिटेल में बता दूँगा... प्लीज... हम दोनों बुरी तरह से फंसे हुए हैं... हमारे यहाँ से निकलने और कोर्ट पहुँचने का कोई बंदोबस्त कीजिए...

तापस - ठीक है... ओके... एड्रेस बताओ...

विश्व - (उस परिवार से) यहाँ का एड्रेस क्या है...

एक महिला सदस्य एड्रेस बताती है जिसे विश्व फोन पर दोहरा देता है l फोन रखने के बाद विश्व उस परिवार से कहता है

विश्व - देखिए... हमसे डरने की कोई बात नहीं है... आपको हमसे कोई खतरा नहीं है... हम कोर्ट जा रहे थे... कुछ लोगों ने हम पर हमला कर दिया... थोड़ी देर में... हमें लेने... हमारे लोग आ जाएंगे...

विश्व के इशारा पाते ही विक्रम उस आदमी को छोड़ देता है l सभी परिवार के लोग डर के मारे एक साथ एक कोने में खड़े हो जाते हैं l

विक्रम - (विश्व से) तुम पुलिस को बुला सकते थे...

विश्व - हाँ... तुम्हारे घर पर जब हमला हुआ था.. तब शुभ्रा जी ने पुलिस को ही कॉल किया था... पर पहुँचा मैं ही था... यह पोलिटिकल खेल है... सिस्टम में कौन किसके तरफ से कहां फील्डिंग कर रहा है... कह नहीं सकते... ऐसे में खुद पर और अपने लोगों पर भरोसा करना... अक्लमंदी का काम है...

यह सब सुनने के बाद विक्रम चुप हो जाता है l फिर मुस्कराने लगता है और उसकी मुस्कराहट हँसी में बदलने लगता है l धीरे धीरे उसकी हँसी बढ़ती जाती है l फिर उसी तरह धीरे धीरे उसकी हँसी कम होते हुए थम जाती है l विक्रम फिर सीरियस हो जाता है l

विश्व - क्या हुआ...

विक्रम - वक़्त क्या क्या दिखा रहा है... यही सोच कर हँसी आ गई...

विश्व - (हैरान हो कर देखने लगता है)

विक्रम - यह ट्विन सिटी... इसमे रहने वाले लोग... कभी हमारी गाड़ियों को दूर से देखते ही पहचान जाते थे... आज यही ट्विन सिटी के लोग... हमारी जान की प्यासे बन बैठे हैं... कभी लोग अपने अपने किस्मत का फैसला करने मेरे दरवाजे पर आया करते थे... आज अपनी जान की लाले पड़े हैं... दूसरों के दरवाजे तोड़ने पड़ रहे हैं... कभी मेरे घर में आने के लिए... लोग इजाजत लेते थे... आज किसी के घर में... चोरों की तरह घुस आये हैं... हूँह... वाकई वक़्त ने आज क्या वक़्त दिखाया है...

विश्व - इसीलिए कहते हैं.. वक़्त को हमेशा इज़्ज़त दिया करो... वक़्त को साथ दिया करो... वक़्त के साथ चला करो... जिसने भी वक़्त की बेकदरी की... वक़्त ऐसे ही किसी मोड़ पर लाकर छोड़ देता है...

इस बार विक्रम चुप रहता है l कुछ देर बाद, उस घर की लैंड लाइन फोन बज उठती है l विश्व जाकर फोन उठाता है l

विश्व - हैलो...

कॉल - ×××××××

विश्व - हाँ...

कॉल - ××××××××

विश्व - (फोन रख देता है l और विक्रम से कहता है) चलो... बाहर अपना गाड़ी खड़ी है...

विक्रम और विश्व बाहर आकर देखते हैं l बाहर एक एम्बुलेंस वैन खड़ी थी l दोनों घर के सदस्यों को थैंक्स कह कर गाड़ी के अंदर चले जाते हैं l

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मैं मृत्युंजय नायक गीता पर हाथ रखकर कसम खाता हूँ... जो भी कहूँगा सच कहूँगा... सच के सिवा कुछ ना कहूँगा...

अदालत में गवाह के कटघरे में खड़े हो कर गीता पर हाथ रखकर मृत्युंजय अपना अदालती आचार पूर्ण करता है l वीर उसे घूर रहा था l मृत्युंजय के कसम उठाने के बाद प्रोसिक्यूटर उसके के पास आता है और सवाल करता है

प्रोसिक्यूटर - आपका नाम...

मृत्युंजय - जी... मृत्युंजय नायक...

प्रोसिक्यूटर - अपना पारिवारिक पृष्ट भूमि के बारे बताएं...

मृत्युंजय - जी... (अपना परिचय के साथ अपने माँ बाप के बारे में और पार्टी के बारे में जानकारी देता है)

प्रोसिक्यूटर - ह्म्म्म्म... तो मृत्युंजय बाबु... आप अभी xxx पार्टी की टिकट से... सबसे युवा प्रार्थी बने हैं...

मृत्युंजय - जी...

प्रोसिक्यूटर - तो आपका कहना है कि... आपने यह हत्या होते हुए देखा है...

मृत्युंजय - जी... (वीर की ओर देख कर) देखा है...

प्रोसिक्यूटर - तो आपने... हत्या के बारे पुलिस को सूचित क्यूँ नहीं की... और इतने दिनों बाद... क्यों सामने आए...

मृत्युंजय - जी यह सच है कि हत्या होते हुए मैंने देखा है... मैं हत्याकांड को देखने के बाद... एक तरह से शॉक में था... बड़ा ना सिर्फ शॉक में बल्कि ही असमंजस में था... क्यूँकी... जीवन में पहली बार... इतना वीभत्स हत्याकांड देखा था... मैं पुलिस के पास जाकर सच बताने वाला ही था कि... मुझे खबर लगी कातिल ने अपना जुर्म कबूल कर लिया है... और अपनी गिरफ्तारी भी दे दिया है... इसलिए मैं खामोश रहा...

प्रोसिक्यूटर - ह्म्म्म्म... जब आप खामोश हो गए थे... तो फिर अब... अब क्यूँ सामने आए हैं... क्या वीर सिंह जी से कोई ज्यादती दुश्मनी...

मृत्युंजय - क्या बात कर रहे हैं आप... वीर सिंह जी से मेरी किस बात की दुश्मनी... मैं तो क्षेत्रपाल के के रुतबे के बराबर भी नहीं हूँ... मैं उनके ना दोस्ती... ना दुश्मनी के लायक हुँ... मैं तो xxx पार्टी की एक आम कार्यकर्ता का समान्य बेटा हूँ... जिसके पिता के मृत्यु के बाद... वीर सिंह ने अपनी सिक्युरिटी संस्था में नौकरी दी थी... इसलिए मैं उनसे कैसे दुश्मनी कर सकता हूँ...

प्रोसिक्यूटर - आपने नौकरी भी छोड़ दी थी.. है ना...

मृत्युंजय - जी... वह मेरा व्यक्तिगत निर्णय था... मेरी बहन पुष्पा की... आर्कु में हत्या हो गई थी... इसलिए मैं डिप्रेशन में चला गया था... डिप्रेशन से उबरने के लिए... नौकरी छोड़... कुछ दिनों के लिए... हरिद्वार ऋषिकेश चला गया था...

प्रोसिक्यूटर - तो आप कहना चाहते हैं... आपकी वीर सिंह जी से... कोई निजी दुश्मनी नहीं है...

मृत्युंजय - जी नहीं...

प्रोसिक्यूटर - (जज से) माय लॉर्ड... मैंने अब तक... इनसे जो भी सवालात किए हैं.. बेशक इस केस से कोई ताल्लुक ना हो... पर अदालत की जानकारी में... मैं यह रौशनी डालना चाहता था कि... मुल्जिम से... मेरे इस गवाह की... किसी भी प्रकार से.. कोई पूर्वाग्रह नहीं है... (मृत्युंजय की तरफ घूम कर) तो... मृत्युंजय बाबु... अब आप विस्तृत से बताएँ... उस दिन आपने क्या क्या देखा...

मृत्युंजय - आज से ठीक उन्नीस दिन पहले... ऑनअर्गानाइज सेक्टर के वर्कर... यानी... मजदूर फेरीवाले जैसे कामगारों से मिल कर... उनकी परेशानियों के बारे जान कर... आने वाले इलेक्शन में उनकी आवाज बनने के लिए... उनसे मिलने का कार्यक्रम बनाया था... जिस अंडर कंस्ट्रक्शन बिल्डिंग में हत्या हुई... उसी बिल्डिंग के सामने वाली अंडर कंस्ट्रक्शन बिल्डिंग के तीसरी मंजिल पर... मैं कामगारों की प्रतीक्षा कर रहा था... के एक गोली की आवाज से.. मेरा ध्यान हटा और सामने वाली बिल्डिंग पर गया... मैंने देखा... एक बंदा... एक लडकी की मुहँ बंद कर... उसे घसीट कर बिल्डिंग की तीसरी मंजिल पर लेकर पिलर के साथ खड़ा कर दिया... और यह साहब... (वीर की ओर इशारा कर) यह साहब... उस बंदे से कुछ बात किए... फिर.. उसी पिलर पर एक गोली चलाई... फिर भागते हुए... फर्श को सिरे पर आकर नीचे... और एक गोली चलाई... फिर बाहर की ओर देखते हुए... उस बंदे को इशारा किया... उस बंदे ने जो उस लड़की का मुहँ बंद किए रखा था... पेंट की जेब से एक खंजर निकाल कर... लड़की की पीठ पर घोंप दिया... फिर इन जनाब ने उस बंदे को चलता किया... और खुद लड़की के पास बैठ कर... कहीं पर फोन किया... थोड़ी ही देर बाद पुलिस आई... और इन्हें गिरफ्तार कर लिया... आगे क्या हुआ... मुझे शायद बताने की जरूरत नहीं...

प्रोसिक्यूटर - जी नहीं... बताने की कोई जरूरत नहीं... फिर भी मैं आपसे चंद सवाल करना चाहूँगा... उम्मीद है... आप उसका सही सही जवाब देंगे...

मृत्युंजय - जी... जरूर...

प्रोसिक्यूटर - आप कामगारों से मिलने गए थे... क्या इस बात का कोई सबूत है...

मृत्युंजय - जी... उनके लीडर से हुई बातों का मेरी फोन डिटेल्स... उसकी टाइमिंग... और अखिर में.. उस लीडर की गवाही ले सकते हैं... मै जब गवाही के लिए सामने आया था... मैंने यह सारी डिटेल्स पुलिस को दे दी थी... मुझे लगता है... पुलिस अब तक कंफर्म करा चुकी होगी...

प्रोसिक्यूटर - इंस्पेक्टर अरविंद कुमार...

अरविंद - जी... हमने कंफर्म कर रिपोर्ट अटैच कर दिया है...

प्रोसिक्यूटर - वेल... मृत्युंजय बाबु... आपने अपनी स्टेटमेंट में.. मक्तुला को लड़की कहा है... जबकि मुल्जिम को आपने पहचाना है... ऐसा क्यूँ...

मृत्युंजय - मैं लगभग... तीस चालीस फिट की दूरी से छुप कर देख रहा था.. लड़की का मुहँ पर हाथ था... और वह मुहँ छुड़ाने के लिए... संघर्ष कर रही थी... इसलिए मैंने उस वक़्त नहीं पहचान पाया... पर यह... (वीर की ओर इशारा करते हुए) यह शख्स... इन्हें तो मैं दूर से पहचान सकता हूँ... यह मेरे बुरे समय में... मेरे अन्नदाता रहे हैं... मेरे आदर्श रहे हैं... मैं क्या... ESS में काम करने वाला हर एक शख्स... इनके जैसे बनने की ख्वाहिश रखते हैं... इसलिए यह आसानी से पहचान लिए गए...

प्रोसिक्यूटर - ह्म्म्म्म... ठीक है... अब आप अपनी जगह पर जा सकते हैं...

मृत्युंजय वीर की ओर देख कर एक कुटिल मुस्कान देता है और जज को नमस्कार कर कटघरे से निकल कर चेट्टी के पास जा कर बैठ जाता है l प्रोसिक्यूटर अपने टेबल से एक फाइल निकाल कर तहरीर देना शुरु करता है l

प्रोसिक्यूटर - माय लॉर्ड... मृत्युंजय की गवाही के बाद मुझे लगता है... यह जो मुल्जिम के कठघरे में खड़ा है... बहुत ही चालक और... सैडिस्टीक चरित्र का है... अपने किसी बंदे के साथ मिलकर... पैराडाइज अपार्टमेंट में रह रहे... कुछ घरों को बाहर से बंद कर दिया... फिर नीचे अपनी गाड़ी की हवा निकाल दिया... उसके बाद अपने आदमी के साथ मिलकर अनुसूया का अपहरण किया... फिर पहले से तय जगह पर पहुँच कर... बड़ी निर्ममता से हत्या कर दिया... पुलिस को तहकीकात में फंसाने के लिए... खुद को... अनु का हत्यारा बता कर गिरफ्तार भी करवा लिया... क्या चालाकी देखिए... हत्या खंजर से हुई... खंजर पर मुल्जिम के हाथों के निशान नहीं है... मतलब अदालत अंत में... एक हताश आशिक की... बेवकूफ़ी समझ कर छोड़ दे... (ताली बजाते हुए) वाह क्या प्लान है... वाह... एंड देट्स ऑल फ्रॉम द प्रोसिक्यूशन माय लॉर्ड...

प्रोसिक्यूटर इतना कह कर अपनी जगह पर बैठ जाता है l जज अपनी केस डायरी में कुछ लिखने लगता है l कोर्ट रुम में बैठे मीडिया वाले और आम लोग खुसुर-पुसुर होंने लगते हैं l जज केस डायरी में लिखने के बाद गैवेल उठा कर टेबल पर मारने लगता है l

जज - वीर सिंह... आपने अभी प्रोसिक्यूशन की कारवाई देखी... अब आप अपना पक्ष रख सकते हैं... क्या आप रखना चाहेंगे...

वीर - जी जज साहब... एक और इजाजत मैं आपसे चाहूँगा...

जज - जी पूछिये...

वीर - क्या मैं... अपना कठघरा छोड़ कर... जिस तरह सरकारी वकील... बीचोबीच आपके सामने तहरीर करते रहे... मुझे वैसे ही तहरीर करने की इजाजत मिल सकती है... (कुछ सेकेंड के लिए सब हैरान हो जाते हैं)

जज - प्रोसिक्यूशन... क्या आपको कोई ऐतराज है...

प्रोसिक्यूटर - जी.. जी नहीं माय लॉर्ड...

जज - ठीक है वीर सिंह... आप अपनी तहरीर... कटघरों के बीच दे सकते हैं...

वीर - थैंक्यू माय लॉर्ड.. थैंक्यू..

वीर अपनी कठघरे से निकल कर बीच में आता है और जज के सामने खड़े हो कर कहता है

वीर - माय लॉर्ड... हत्या का जो कारण... पुलिस अपनी तफ्तीश में बताई थी... वह इंश्योरेंस पॉलिसी की... वह जो अभी संशय में है... यह बात तो सरकारी वकील और इंस्पेक्टर अरविंद कुमार मानेंगे ही... (प्रोसिक्यूटर को देखते हुए) एम आई राइट... (प्रोसिक्यूटर अपना सिर हाँ में हिलाता) तो हम दूसरे पहलुओं पर आते हैं... इंस्पेक्टर साहब की तफ्तीश... और चश्मदीद गवाह की गवाही से... सरकारी वकील साहब... मेरे सैडिस्ट होने पर मोहर लगा दिए... (प्रोसिक्यूटर को देखते हुए) एम आई राइट... (सरकारी वकील अपनी अगल बगल झांकने लगता है) खैर... अब चूँकि मेरी तहरीर बाकी है... इसलिए... मैं अदालत से... दरख्वास्त करूँगा... एक कटघरे में... इंस्पेक्टर साहब खड़े हों... और दूसरे कटघरे में... चश्मदीद गवाह...

जज - क्यूँ...

वीर - ज़ज साहब... मैं इन दोनों को आमने सामने रख कर.... यह साबित कर दूँगा... गवाह का गवाही झूठ है... और इनवेस्टिगेशन में अभी भी खामियाँ हैं...

जज - ठीक है... इजाज़त है...

अब वीर जिस कटघरे में खड़ा था उस कटघरे में इंस्पेक्टर अरविंद आकर खड़ा हो जाता है l मृत्युंजय की पीठ थपथपा कर चेट्टी भेजता है l गवाह वाली कटघरे में मृत्युंजय आकर खड़ा हो जाता है l वीर पहले इंस्पेक्टर के पास जाता है l

वीर - इंस्पेक्टर साहब... आपने.. अपनी तरफ से पूरी तहकीकात कर दी... पर कुछ खामियाँ रह गईं हैं... जिन्हें मैं अभी उजागर करने वाला हूँ... आप इसे हम ह्यूमन एरॉर भी कह सकते हैं... इंस्पेक्टर साहब... आप पुलिस में रहकर... अनगिनत केस देखे होंगे... सॉल्व भी किए होंगे... मेरा केस... क्या आपके सॉल्व किए केसों की तरह बिल्कुल वैसा है... या अलग...

अरविंद - आपका केस... बहुत ही अलग तरह की केस है... पहली बार ऐसा हुआ कि... जिसने फोन कर क्राइम स्पॉट पर बुलाया... उसीने खुद को... अरेस्ट भी कराया...

वीर - यह कोई बड़ी बात नहीं... जिन्हें क्राइम के बाद... सरेंडर करना होता है... वह करते हैं... पर कुछ खास... और हुआ हो..

अरविंद - जी... जो वेपन आपके हाथ में थी... उससे हत्या हुई नहीं थी... और जिस क्राइम वेपन से हत्या हुई... उसमें आपकी फिंगर प्रिंट थी ही नहीं...

वीर - फिर भी... अपने उसके पीछे की वज़ह को जानने की कोशिश नहीं की... जो कि शत प्रतिशत चीख चीख कर किसी तीसरे की उपस्थिति को दर्शा रहा था...

अरविंद - कैसे जानते... आपने पूरी तरह से चुप्पी बनाए रखा... कुछ भी कहा नहीं... ऊपर से इनवेस्टिगेशन के लिए... हमें अदालत से सिर्फ तीन दिन की मोहलत मिली थी...

वीर - फिर भी... आप किसी और से... पता करने की कोशिश भी नहीं की...

अरविंद - हमें लगा... अदालत में आप सारी बात बता देंगे... अगर नहीं भी बताये... तो अदालत हमें इतना समय तो देगा ही... के हम सारी बातेँ... वज़ह सब कुछ ढूंढ निकाल सकें... उसके बाद हम अदालत के डायरेक्शन के हिसाब से... आगे की तहकीकात करते...

वीर - ठीक है... इन पंद्रह दिनों में... आपने जो भी तफ्तीश की... क्या आपको लगता है.. मुकम्मल है...

अरविंद - (चुप रहता है)

वीर - ठीक है... अब मैं आपके सामने... आपके द्वारा पेश किए गए... आपके गवाह से कुछ सवाल करूँगा... आप तब तक के लिए यहीं खड़े रहिए...

वीर - (मृत्युंजय के पास आता है) मृत्युंजय... उर्फ मट्टू...

मृत्युंजय - जी...

वीर - आपने अपनी गवाही में... अपने बारे में... क्या पूरी जानकारी दी है...

मृत्युंजय - जी... जो भी पूछा गया... मैंने उस पर पूरी जानकारी दी है...

वीर - ह्म्म्म्म... क्या आपने अपने परिवार के बारे में.. अपने पिता के बारे में... सब कुछ बता दिया है...

मृत्युंजय - जी... कह दिया है... आपको किस बात का संदेह है... मुझे लगता है... (लोगों की तरफ देख कर) मेरी बर्थ सर्टिफिकेट... और राशनकार्ड लाकर दिखाना पड़ेगा... (लोग दबी हँसी हँसने लगते हैं)

वीर - नहीं नहीं... ऐसी कोई बात नहीं... वैसे वह लड़की... अनु... उस से आपका क्या रिश्ता था...

मृत्युंजय - जी... वह मुझे भाई कहती थी... मुहँ बोली बहन थी...

वीर - यह बात आपने... अदालत को बताया नहीं था... क्यूँ... खैर... फिर भी... आप उसे पहचान नहीं पाए...

मृत्युंजय - वह बेशक मेरी मुहँ बोली बहन थी... पर इतनी करीबी नहीं थी... के उसका चेहरा याद रख सकूँ...

वीर - ह्म्म्म्म... पर मैं आपका बहुत करीबी हूँ... क्यूँ... क्यूँकी आप तो... मेरे जैसे बनना चाहते हैं...

मृत्युंजय - मुझे इस बात का गहरा दुख है... की मैं आप जैसे व्यक्ति को अपना आदर्श मान कर... आप जैसा बनना चाहा...

वीर - ह्म्म्म्म... वैसे आप कितने दूरी पर थे... क्राइम स्पॉट से...

मृत्युंजय - जी... शायद.. लगभग... तीस या चालीस फिट...

वीर - आप तीस या चालीस फिट की दूरी से मुझे पहचान गए... और आपने मेरे हाथ में... गन भी देख लिया...

मृत्युंजय - जी...

वीर - (अरविंद के पास आता है) इंस्पेक्टर साहब... आपने मेरे बारे में... पूरी तरह से छानबीन की होगी.. क्या आपको पता है... मेरे पास एक लाइसेंसी रिवॉल्वर है...

अरविंद - जी...

वीर - फ़िर भी आपको लगता है... (सबूतों वाली टेबल से सीज किया गया रिवॉल्वर ओर दिखा कर ) यह मेरा रिवॉल्वर है...

अरविंद - जी यह आप के पास... आपके हाथ में मिला...

वीर - जब कि हत्या इस रिवॉल्वर से नहीं हुई...

अरविंद - इस पर मैं कुछ नहीं कह सकता... क्यूँकी आपने इस मामले में... हमसे कोई कोऑपरेशन नहीं किया था...

वीर - उसके लिए सॉरी... पर क्या आप बता सकते हैं... क्या यह वही रिवॉल्वर है...

अरविंद - जी... हंड्रेड पर्सेंट... इसे हमने... क्राइम स्पॉट से सीज किया था... और फॉरेंसिक वालों को हैंडओवर किया था...

वीर - फॉरेंसिक वालों ने... क्राइम स्पॉट पर जितने भी सबूत इकठ्ठे किए थे... अदालत तक पहुँचने तक... उसके कस्टोडियन कौन होता है...

अरविंद - (हकला जाता है) जी... पु... पुलिस...

वीर - जाहिर है... वह जो ब्रेसलेट सीज किया गया था... उसकी भी कस्टोडियन आप ही की डिपार्टमेंट थी...

अरविंद - जी...

वीर - पर वह तो आपके ही डिपार्टमेंट से खो गया था ना... इसलिए इसे अच्छी तरह से देखिए... फिर कहिये... क्या वह... वही रिवॉल्वर है... जो उस दिन मेरे हाथ से बरामद की गई थी... (जज की ओर देख कर, एविडेंश पोलीथीन को उठा कर) वीथ योर परमिशन... क्या इन्हें मैं यह दिखा सकता हूँ...

जज अपना सिर हिला कर हाँ कहता है l वीर उस एविडेंश वाली पोलीथीन जिसमें रिवॉल्वर था उसे लेकर इंस्पेक्टर अरविंद के पास पहुँचता है और उसके हाथ में देकर पूछता है

वीर - गौर से देख कर बताइए... क्या यही वह रिवॉल्वर है...

अरविंद - (चिढ़ते हुए रिवॉल्वर को एविडेंश पैक से निकाल कर रुमाल से पकड़ता है और उलट पुलट कर देखता है और कहता है) हाँ यही है...

वीर - आर यु श्योर... क्यूँकी उसमें से सिर्फ तीन गोली चली थी...

अरविंद - हाँ... यह वही रिवॉल्वर है... इससे तीन गोलीयाँ चली थी... और इसमें तीन गोली अभी भी है इसके अंदर...

वीर - अच्छा...

कह कर वीर वह रिवॉल्वर अरविंद के हाथ से लेता है और वह भी उलट पुलट कर रिवॉल्वर को देखने लगता है l फिर अचानक मृत्युंजय पर ऐम कर फायर कर देता है l गोली मृत्युंजय के सीने में लगता है l कोई इसे समझ नहीं पाता, यहाँ तक मृत्युंजय भी नहीं समझ पाता l कुछ सेकेंड के लिए पूरा अदालत स्तब्ध हो जाता है l मृत्युंजय के सीने में दर्द उठता है l उसका ध्यान अपने सीने की ओर जाता है l अपना सिर नीचे झुका कर सीने की ओर देखने लगता है l देखता है खून धीरे धीरे बहते हुए पिचकारी मार कर निकल रहा था l मृत्युंजय चेहरे पर जानलेवा पीड़ा के साथ अपने हाथ से ज़ख्म को थाम कर वीर की ओर देखता है l वीर और एक फायर करता है जो मृत्युंजय के भेजे के पार चला जाता है l मृत्युंजय वहीँ गिर जाता है l कोर्ट रुम में इसबार अफरातफरी मच जाता है l तभी विश्व और विक्रम पहुँच जाते है l ओंकार चेट्टी दर्शकों की दीर्घा में चिल्लाने लगता है

चेट्टी - हा मेरा बेटा... मट्टू मेरे लाल...

विश्व - नहीं.. वीर नहीं...

पर तब तक वीर चेट्टी पर फायर कर देता है l गोली चेट्टी के सीने में लगता है l इधर चेट्टी बेंच पर गिरता है उधर वीर भी गिर जाता है l क्यूँकी कोर्ट रुम में मौजूद इंस्पेक्टर अरविंद ने वीर पर गोली चला दी थी l खून से लथपथ वीर जमीन पर गिरा पड़ा था l विश्व और विक्रम गहरे शॉक में थे l वह वीर के पास जाना चाहते थे पर तब तक पुलिस ने घेर कर रास्ता रोक दिया था l

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नभ वाणी न्यूज पर सुप्रिया अपना स्पेशल बुलेटिन न्यूज पर हाई कोर्ट में हुए घटना पर बहुत दुख के साथ अपना विचार व्यक्त कर रही थी l

"कल न्याय की मंदिर में कुछ ऐसा हुआ, जो पूरे राज्य ही नहीं पूरे देश को स्तब्ध कर दिया है l यह समाज हमने बनाया है l यहाँ की सारी व्यवस्था भी हमारी ही बनाई हुई है l पर हमारी समाज की सामाजिक स्थिति शांति अथवा अशांति सब हमारे ही बीच रह रहे लोग और हम, यानी हमारे आचार विचार और व्यवहार पर ही निर्भर करता है l मैं सुप्रिया रथ आज कोई दार्शनिक बात या व्यथा नहीं व्यक्त नहीं कर रही हूँ पर कल की हुई गोली कांड पर आज पुलिस ने जो रिपोर्ट सार्वजनिक किया है वही आज मैं आपके समक्ष प्रस्तुत कर रही हूँ l

कल भरी अदालत में जो गोली कांड हुई उसमें केवल चार गोली चलीं l जिसमें तीन गोली अनुसूया के कत्ल के जुर्म में अभियुक्त वीर सिंह ने चलाई थी और एक गोली इंस्पेक्टर अरविंद कुमार ने चलाई थी l गोली कांड में xxx पार्टी की नव नियुक्त युवा अध्यक्ष मृत्युंजय की घटना स्थल पर ही मौत हो गई l पूर्व राजनीतिज्ञ श्री ओंकार चेट्टी बुरी तरह से घायल हो गए थे l जिन्होंने आज सुबह ही मैजिस्ट्रेट की मौजूदगी में, अपनी मृत्यु शैय्या पर अपना अंतिम बयान दिया है l जो इन कुछ महीनों में हुए और कुछ साल पहले हुए अपराध और षड्यंत्रों पर पर्दा उठाया है l

मरहुम चेट्टी जी के अनुसार उन्होंने स्वीकार किया है के उनका बेटा यश, मेडिकल कॉलेज और फार्मास्यूटिकल्स कंपनी के आड़ में प्रतिबंधित दवाओं का तस्करी किया करता था l उधर राजगड़ में हुए रुप फाउंडेशन घोटाले की जांच की आँच से बचने के लिए क्षेत्रपाल परिवार राजनीति में आने की योजना बनाई l चेट्टी जी ने छोटे राजा उर्फ पिनाक सिंह क्षेत्रपाल जी को प्रत्यक्ष राजनीति में आने में बड़ी और महत्वपूर्ण भूमिका निभाई l इन लोगों की दोस्ती को मजबूत करने के लिए यश ने तब रुप फाउंडेशन घोटाले में अभियुक्त विश्व प्रताप महापात्र के वकील श्री जयंत राउत पर चाँदनी चौक जगन्नाथ मंदिर में दर्शन करते समय एक धीमा जहर प्रयोग का हमला किया था, जिसकी परिणाम स्वरुप सुनवाई के दौरान श्री जयंत राउत को दिल का दौरा पड़ने से मृत्यु हो गई थी l इसी मदत के एवज में जब प्रतिबंधित दवाओं की तस्करी का निरोग हस्पताल में पढ़ रहे कुछ विद्यार्थियों को हुआ l उनमें से एक छात्र श्रीमती प्रतिभा सेनापति जी का बेटा प्रत्युष भी था l जिसे अपने रास्ते से हटाने के लिए क्षेत्रपाल से चेट्टी परिवार मदत लेनी चाही l पर उस मदत के लिए यश क्षेत्रपाल परिवार को अंधेरे में रखा और झूठ बोल कर पिनाक सिंह और विक्रम सिंह की मदत से हस्पताल से फरार हो कर, श्री मति प्रतिभा सेनापति जी के सुपुत्र प्रत्युष की हत्या कर दी थी l चूँकि इस हत्याकांड से क्षेत्रपाल परिवार अनभिज्ञ थे l इसलिए उनके बीच संपर्क में दरार पड़ना शुरु हो गई थी l

फिर जब अभिनेत्री निहारिका की एक्सीडेंट करा कर यश ने हत्या कर दी थी तब जैल में ही प्रतिबंधित दवाओं के अतिरिक्त सेवन से यश की मृत्यु हो गई थी l उस समय चूँकि क्षेत्रपाल परिवार उनके साथ नहीं आए थे इसी के चलते श्री चेट्टी, क्षेत्रपाल परिवार के लिए अपने मन में द्वेष पालते रहे l एक दिन उन्हें खबर लगी के उनकी पार्टी की एक कार्यकर्ता xxxx नायक ने आत्महत्या कर ली है l तब चेट्टी जी ने xxxx नायक के बेटे मृत्युंजय से संपर्क किया, जो कि असलियत में श्री चेट्टी की ही अवैध संतान थे l उन दोनों ने मिलकर तब क्षेत्रपाल परिवार को तबाह और बर्बाद करने की कसम खाई l उसके बाद शहर में क्षेत्रपाल परिवार पर हमले शुरु हो गए l इस दौरान अपना लक्ष साधने के लिए मृत्युंजय ने सबसे पहले अपनी माँ की हत्या कर दिया, उसके बाद ESS कंपनी के सेक्यूरिटी एडवाइजर और डायरेक्टर श्री अशोक महांती की हत्या कर दी, फिर अपनी बहन को कमलकांत के बेटे विनय के साथ भगा कर किडनैपिंग की नाटक किया उसके बाद वाइजैग जाकर आर्कु में दोनों की हत्या कर दी l इस बीच मृत्युंजय अनु की दादी की संपर्क में रह कर, पिनाक सिंह के पास छुपे रहे और उनको अनु के खिलाफ कान भर, भड़काते रहे ताकि कभी अनु पर कोई आपराधिक प्रयास हुआ तो उसमें क्षेत्रपाल परिवार फंसे l उसके बाद अनुसूया की किडनैपिंग मल्ला नाम की गुंडे के साथ मिलकर किया जिसे वीर ने निष्फल कर दिया था l इसी खीज में आखिर बीस दिन पहले मृत्युंजय अपने एक साथी के साथ मिलकर अनु का पुनः किडनैप किया और हत्या कर दी l उन्हें सुकून तब मिला जब वीर सिंह ने अनु की हत्या का आरोप अपने ऊपर ले लिया l पर वीर सिंह की दोस्त विश्व प्रताप ने आकर पूरा खेल बिगाड़ दिया l इसलिए कल की सुनवाई में विश्व प्रताप कोर्ट में ना पहुँच पाए इसके लिए उन्होंने अपनी पूरी ताकत झोंक दिया l विश्व को वीर के लिए पैरवी करने से, कोर्ट में पहुँचने से रोक तो दिया, पर वीर के हाथों अपने अवैध पुत्र और अपनी नियति को ना टाल सके l

मैं दर्शकों से यह कहना चाहती हूँ, जो भी तथ्य मैंने आपके समक्ष प्रस्तुत किया है वह सब चेट्टी जी का कुबूल नामा है जो उन्होंने मरने से पहले मजिस्ट्रेट के सामने पुलिस को दी थी l इसका अर्थ यह हुआ कि अनुसूया की हत्या वीर सिंह ने नहीं की थी l पर अनुसूया की हत्या के चलते विक्रम सिंह, उनकी पत्नी, घर और उनकी संस्थान ज़न आक्रोश की भेंट चढ़ गई l

अब मेडिकल बुलेटिन के मुताबिक वीर सिंह अभी भी कोमा में हैं l उन्हें अभी तक होश नहीं आया है l डॉक्टरों ने अपनी मेडिकल बुलेटिन में वीर सिंह की हालत नाजुक बताया है l पुलिस और उनके रिश्तेदार कैपिटल हॉस्पिटल की आईसीयू के बाहर अभी भी प्रतीक्षा रत हैं l आशा है कि कि वह स्वास्थ लाभ करें l

रुप की हाथों से मोबाइल गिर जाती है l सेबती उस मोबाइल को उठा कर अपनी ब्लाउज में छुपा कर तुरंत वहाँ से निकल जाती है l सेबती ने एक मोबाइल में नभवाणी की यह न्यूज क्लिप को डाउनलोड कर रुप के पास संदेशा पहुँचाया था l खबर जानने के बाद खुल कर रुप रो नहीं पाती पर बड़ी मुश्किल से अपनी रुलाई को दबाती है l जब उसे एहसास होता है कि कमरे में वह अकेली है l तब वह भागते हुए बाथरुम में घुस जाती है और आईने के सामने अपनी चीख को रोकते हुए रोने लगती है l कुछ देर बीतने के बाद अपने चेहरे पर पानी मारने लगती है l टावल से अपना चेहरा पोछती है उसके बाद ड्रेसिंग टेबल के पास आकर चेहरे पर हल्का सा मेकअप लेती है l उसके बाद अपनी कमरे से बाहर निकल कर दिवान ए खास में पहुँचती है l देखती है फर्श पर बिछे चादर पर, चेहरे पर आश और दर्द लिए पिनाक आखें बंद कर सो रहा है l दरवाजे की ओट से पिनाक को देखती है l दाढ़ी बहुत बढ़ चुकी है, बालों में अब सफ़ेदी दिख रहे थे l अब पिनाक थका हुआ अधेड़ जैसा दिख रहा था l उसे सोया हुआ देख कर रुप वहाँ से लौट जाती है और सुषमा की कमरे की ओर जाती है l वहाँ पहुँच कर देखती है सुषमा अपनी कमरे में नहीं थी l रुप समझ जाती है इस वक़्त सुषमा नागेंद्र की कमरे में हो सकती थी l इसलिए रुप अंतर्महल से निकल कर नागेंद्र के कमरे में पहुँचती है l दो नौकरानियां नागेंद्र की शरीर को साफ कर कपड़े पहना रही थीं l सुषमा वहीँ खड़े होकर उनका काम देख रही थी और बीच बीच में सही से करने की हिदायत दे रही थी l रुप के पहुँचते ही सुषमा मुड़ कर देखती है l रुप का चेहरा एकदम सपाट था l सुषमा रुप को देख कर नौकरानियों को खाना खिलाने की हिदायत देकर रुप के साथ बाहर आ जाती है और दोनों सुषमा की कमरे की ओर जाने लगते हैं l कमरे में आते ही रुप सीधे बालकनी चली जाती है l वहाँ से वह नदी की ओर देखने लगती है l सुषमा एक गहरी साँस लेती है और रुप के पास खड़े होकर बहती नदी की ओर देखती है l बिना एक दूसरे की ओर देखे बातेँ करने लगते हैं l

सुषमा - जानती हो रुप... कभी कभी.. कितना भी.. मेक अप कर लो... आँखे कितना रोई हैं... मेक अप छुपा नहीं पता...

रुप - माँ... (कह कर रुप रोने लगती है और सुषमा के गले लग जाती है)

सुषमा - तुझे जो भी खबर मिली है... बता मुझे...

रुप - (अपनी सिसकियों को रोकते हुए) माँ... आप वीर भैया की प्रण की बात कर रहीं थीं...

सुषमा - हूँ...

रुप - आपको अंदाजा था ना... वीर भैया क्या कर सकते हैं...

सुषमा - (एक झटका सा लगता है) हाँ...

रुप - (आवाज़ घुटने लगती है) आप ने सही कहा था... वीर भैया की नस नस से वाकिफ हैं...

सुषमा - (फिर नदी की ओर देखते हुए) सेबती ने क्या खबर लाकर दी है तुझे...

रुप - (रुलाई फुट पड़ती है) माँ... वीर भैया की हालत बहुत खराब है... (सुषमा की ओर मुड़ती है, देखती है सुषमा की आँखे भीगी हुईं हैं)

सुषमा - क्या हुआ... पूरी बात बता...

रुप से सहन नहीं होता, वह सुषमा के फिर से गले लग कर रोने लगती है l सुषमा उसकी पीठ पर हाथ फ़ेर कर दिलासा देने लगती है l

रुप - माँ... यह बारिश भी रुक गई है...

सुषमा - हूँ... (चुप रहती है)

रुप - यह बारिश जब भी हुई है... हमारी आफत की संदेश लेकर बरसी है...

सुषमा - बिन मौसम की बारिश थी... शायद इसलिये बरस गई... जो खबर तू सुनाने वाली है... कहीं उसके लिए आँसू कम ना पड़ जाएं... (एक गहरी साँस लेती है जिससे सुषमा की वज़ूद हिल जाती है) अब बता क्या हुआ है...

रुप सुषमा से अलग होती है और उसे बताती है जो उसे सेबती ने मोबाइल की डाउनलोडेड न्यूज क्लिपिंग में दिखाई थी l सब सुनने के बाद सुषमा कहती है

सुषमा - इसका मतलब वीर ने अपना प्रण पूरा कर दिया...

रुप - (हैरान हो कर देखती है) माँ... भैया की हालत बहुत नाजुक है...

सुषमा - रुप... जब अनु की साथ हुए हादसे के बारे में पता चला... मुझे तभी से अंदाजा हो चुका था... वीर क्या करने जा रहा है...

रुप - क्यूँ माँ क्यूँ...

सुषमा - (नदी की ओर देख कर) जिस दिन उसे प्यार हुआ था... वह यहाँ.. महल में आया था... मेरी ही गोद में सिर रख कर... अपने प्यार की बात कहा था... तभी मुझे इस प्यार के परिणाम का अंदाजा हो गया था... अपनी नाक बचाने के लिए... इस महल के बड़े किसी भी हद तक जा सकते हैं... पर मुझे यह भी पता था... जो वीर की प्यार का दुश्मन बनेगा... उसे वीर खुद अपने तरीके से सजा देगा... वही हुआ... मृत्युंजय... उसके साथ ही नहीं.. अनु के साथ.... अपनी बहन के साथ यहाँ तक तेरे चाचा के साथ... विश्वासघात किया था... ऐसे विश्वासघाती को कानून कैसे सजा दे सकता था... आखिर राजसी खून है उसके रगों में... उसने खुद से और अपने पिता से किया हुआ वादा पूरा जो किया...

रुप - माँ... आप भूल रहीं हैं... एक वादा... विक्रम भैया से भी लिया गया है... चाचा जी ने.. वीर भैया को वापस लाने की...

सुषमा - वीर इतना स्वार्थी नहीं है रुप... वह अपने भैया का सिर झुकने नहीं देगा... विक्रम के रगों में भी राजसी खून बह रहा है... देखना... वह अपने साथ वीर को लेकर ही लौटेगा...

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श्री राम चंद्र भंज देओ मेडिकल कॉलेज के सीसीयू (क्रिटिकल केयर यूनिट), चौबीस घंटे हो गए हैं, बाहर सेनापति दंपति, विक्रम, शुभ्रा, विश्व और जोडार सब इंतजार में हैं l किसी को भी अंदर छोड़ा नहीं जा रहा है l इन चौबीस घंटे में सिर्फ कुछ डॉक्टर और स्टाफ नर्सों को छोड़ कोई अंदर नहीं जा सका है l हॉस्पिटल एडमिनिस्ट्रेशन यहाँ तक विक्रम को भी अंदर नहीं छोड़ा है l बाहर बेंच पर विश्व अपने चेहरे पर हाथ रखकर आँखे मूँदे बैठा हुआ है l शुभ्रा की आँसू रुक ही नहीं रही है वह प्रतिभा के कंधे पर अपना सिर रख कर आँसू बहाए जा रही थी l विक्रम दीवार पर टेक लगाए खड़ा था l उसकी आँखे पथरा गईं थीं l उसके आँखों से शायद आँसू सूख गईं थीं l

तापस विश्व और विक्रम के बीच चहल रहा था l कुछ देर बाद विश्व के पास जाकर उसके कंधे को हिलाता है l विश्व अपनी आँखे खोलता है l

तापस - प्रताप... मर्द हो... खुद को संभालो... वीर की हालत नाजुक है... पर ठीक तो है...

विश्व - (अपनी जगह से खड़ा होता है) डैड... मुझे गुमान था... समाने वाले को समझ लेने की... पर अपने दोस्त को ही समझ नहीं पाया... अगर समझ गया होता... तो यह नौबत ही नहीं आती...

तापस - देखो जो हुआ... गलत तो हुआ... पर अगर इंसान उतना समर्थ होता... तो संसार को भगवान की क्या जरूरत है... और किसे पता... वह ऊपर वाला क्या चाहता है....

विश्व - पर डैड... मैं...... (कुछ पल का पॉज) मैं यह टाल सकता था... मैं समझ ही नहीं पाया... मैंने जब पूछा था... के तुम क्या चाहते हो... तो उसने मुझे साफ कहा था... पुष्पा की मौत का बदला... अनु की इंसाफ़... और अपनी मुक्ति... मुझे समझ जाना चाहिए था... पर...

विक्रम - (विश्व के पास आकर) तुम सिर्फ... कुछ ही महीने हुए हैं.. वीर के साथ दोस्ती किए हुए... वह तो जब से होश संभाला है... तब से मेरे साथ रहा है... मुझे गुमान था... मैं खुद को जितना नहीं जानता... उससे कहीं ज्यादा.... मैं वीर को जानता हूँ... उसने... जैल में कहा था... अब सब ठीक हो जाएगा... उन्होंने उसके भीतर के शैतान को जगा दिया है... और अब वह खुद को... ऊपरवाले के करीब महसुस कर रहा है... उसने सब कुछ साफ कह दिया था...

तभी सबके कानों में जुतों की आवाज़ पड़ती है l सबकी नजर उस तरफ़ घूम जाती है l कोई बड़े सरकारी अधिकारी पुलिस वालों के घेरे में आ रहे थे l ठीक उसी समय डॉक्टर नर्स के साथ सीसीयू से बाहर निकलता है l

डॉक्टर - आइए आइए... मजिस्ट्रेट सर आइए..

मजिस्ट्रेट - पेशेंट कैसा है...

डॉक्टर - बस आप ही इंतजार में है... आइए..

विक्रम - डॉक्टर साब... (डॉक्टर के पास जाकर)

डॉक्टर - नर्स... मैजिस्ट्रेट सर जी को अंदर ले जाइए... मैं इन्हें समझाता हूँ... (मजिस्ट्रेट से) सब आप इनके साथ अंदर जाइए... (मजिस्ट्रेट नर्स के साथ अंदर चला जाता है) हाँ... कहिये...

विक्रम - क्या कहिये... अंदर वह मेरा भाई है... पर आप हमें... (सभी पास आ जाते हैं) अंदर ले जाने के बजाय... मजिस्ट्रेट जी को भेज दिया...

डॉक्टर - देखिए विक्रम साहब... यह आप ही के भाई का विश था... उन्होंने होश में आते ही... अपने रिश्तेदारों के बजाय... पुलिस और मजिस्ट्रेट जी मिलने की इच्छा जतायी थीं...

विश्व - इच्छा जतायी मतलब... उसे होश कब आया... वीर कैसा है... कैसी हालत है उसकी...

डॉक्टर - क्या आप प्रताप हैं...

विश्व - जी...

डॉक्टर - देखिए... मुझे यह कहते हुए बहुत खेद हो रहा है... के... वीर सिंह जी के पास... अब कुछ ही वक़्त है...

विक्रम - यह आप क्या कह रहे हैं डॉक्टर... अगर आपसे कुछ नहीं होता... बोलिए... किस डॉक्टर को... कहाँ से बुलाया जाए... कितना पैसा चाहिए.. हम देने को तैयार हैं...

तापस - कुल... विक्रम कुल... यह शहर के जानेमाने डॉक्टर हैं...

डॉक्टर - डोंट बी हाइपर विक्रम साहब.. मैं आपकी मनोदशा समझ सकता हूँ... पर यह कोई छोटा हस्पताल नहीं है... ना ही यहाँ के डॉक्टर इतने नाक़ाबिल हैं...

विश्व - डॉक्टर साब... ऐसी बात नहीं है... हम बस...

डॉक्टर - मैंने कहा ना... मैं आप सबकी मनोदशा समझ सकता हूँ... पर यह सच है... वीर सिंह के पास ज्यादा वक़्त नहीं है...

तापस - ह्वाट..

डॉक्टर - येस... इनफैक्ट... वह इतने देर तक जिंदा कैसे है... मैं हैरान हूँ... क्यूँकी गोली सीधे दिल पर लगी है... और दिल को... ज़बरदस्त नुकसान किया है... मैं सर्जरी के वक़्त से... गौर कर रहा हूँ... वह जैसे मौत से लड़ रहा है... मौत को टाले जा रहा है... कोई बात है... जो उसके दिल को धड़का रहा है... ऑपरेशन के बाद जब वह होश में आया... तो सबसे पहले उसने... पुलिस और मजिस्ट्रेट को बुलाने की बात कही... और यह बात आप लोगों से ना कहने के लिए... रिक्वेस्ट की...

तापस - ओह... तो इसलिए आपने पहले पुलिस को खबर की...

डॉक्टर - हाँ...

विश्व - तो... हम... हम सब कब तक...

डॉक्टर - जैसे ही... उनकी बयान लेने की खानापूर्ति होती है... आप लोग अंदर जा सकते हैं...

विक्रम - ठीक है डॉक्टर... ठीक है...

डॉक्टर अंदर चला जाता है l शुभ्रा को अचानक चक्कर आता है वह गिरने को होती है कि प्रतिभा उसे संभाल लेती है और शुभ्रा को सहारा देते हुए बेंच पर बिठा देती है l विक्रम भी घबराया हुआ उसके पास पहुँचता है l

प्रतिभा - नजाने कितने रात ठीक से नहीं है... और कल से तुम लोगों के पेट में ना दाना ना पानी... कुछ नहीं गया है... शायद इसीलिए इसे चक्कर आ गया है...

तब सीसीयू का दरवाजा खुलता है l मजिस्ट्रेट और पुलिस वाले बाहर आते हैं और डॉक्टर से हाथ मिला कर जाने लगते हैं l उनके चले जाने के बाद सभी डॉक्टर की तरफ़ देखते हैं l डॉक्टर सब को अपने साथ अंदर आने के लिए इशारा करता है l सभी अंदर आते हैं l वीर बेड पर अपनी आँखे मूँद कर लेटा हुआ था l शरीर में बहुत जगह उसके तरह तरह की पतले ट्यूब लगे हुए थे l नाक में आक्सीजन ट्यूब, बाएं तरफ़ खून की बोतल लटकी हुई थी और दाहिने हाथ की तरफ़ सलाईन लगा हुआ था l सीने पर जो चार पाँच ट्यूब लगे हुए थे वह जाकर कार्डियक मॉनिटर से लगा हुआ था l कार्डियक मॉनिटर में वीर की हार्ट और पल्स रेट निरंतर चल रहा था l डॉक्टर वीर की मुहँ से एक पाइप निकाल देता है l वीर धीरे-धीरे आँखे खोलता है l विश्व और विक्रम दोनों उसके पास जाते हैं l

विश्व - तुमने... ऐसा क्यूँ किया... वीर...

वीर - (पीड़ा भरी आवाज में) मैंने कहा तो था... पुष्पा का बदला... अनु का इंसाफ और मेरी मुक्ति...

विश्व - यार तू बड़ा ख़ुदगर्ज निकला... बड़ा बेवफ़ा निकला... अपने दोस्त पर भरोसा नहीं था..

वीर - भरोसा था... इसलिए तो जुर्म अपने सिर ले लिया था... जो मुझे दिखा नहीं.. वह तुम सामने ले आए...

विश्व - बस थोड़ी देर ...इंतजार कर लेते यार...

वीर - मैं उन्हें... कानून की मौत देना नहीं चाहता था... मैं उन सबको अपने हाथों से सजा देना चाहता था... इसलिए जब मृत्युंजय ने मुझे अपने संदेशे में कहा कि... मैं अपनी पैरवी खुद करूँ... मैंने मौके को लपक लिया... उसने और उसके नाजायज बाप ने... अपनी पूरी ताकत लगा दी... तुमको रोकने के लिए... और मैंने दुआ पढ़ी... के तुम लोग... मेरे बदला पूरी होने तक ना पहुँच पाओ... इस बार... भगवान ने सुन ली... मेरा बदला पूरा हुआ... उसके बाद ही तुम आए... पर वह पुलिस अरविंद कुमार ने भी... क्या निशाना लगाया... शाला... गोली सीधे दिल पर लगी...

विश्व - मेरा पहला ही केस... मेरे दोस्त ने हरा दिया...

वीर - कहाँ... अभी तो तुम्हारा नाम हो गया होगा... के विश्व प्रताप ने.. अदालत में ऐसी दलील दी के... असली गुनहगारों को सामने आना ही पड़ा... पर यार... एक बात के लिए माफ कर देना...

विश्व - हाँ बोल...

वीर - मैं तुम्हारे जंग में... कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा होना चाहता था... पर...

विश्व - (कुछ कह नहीं पाता, आँसू फुट कर बहने लगते हैं)

वीर - पर...

विश्व - हाँ... पर...

वीर - यार तुमने बताया नहीं कभी अपनी शेरनी के बारे में... पर जानता हूँ... तुम्हारी शेरनी के कौन है... मे... मेरी ही बहन... रुप है... है ना...

विश्व - (अपना सिर हिला कर हाँ कहता है) हाँ... मुझे पता है... तुम्हें मालूम है...

वीर - हाँ... हाँ... मैंने उस दिन... मॉल में... तुम्हारे गर्दन के पीछे.. रुप का नाम... गुदा हुआ देख लिया था...

विश्व - मैं भी उस दिन जान गया था....

वीर - हाँ... हाँ... तुम... दिल की बात जो जान लेते हो...

विश्व - कहाँ... इसबार जान नहीं पाया...

वीर - हाँ यार... मैंने दिल की बात... दिल में दबा कर जो रख दी... पर यार एक वादा करेगा..

विश्व - हाँ... वादा.. किया वादा...

वीर - किसी भी हालत में... रुप को अकेला मत छोड़ना यार... वह बहुत अकेली है... बचपन से ही... एक बेज़ान गुड़िया सी... उसमें जान तब तब आई... जब जब तुम... उसके जिंदगी में आए... इसलिए अपनी उस शेरनी को... क्षेत्रपाल के पिंजरे की कैद से से निकाल लेना... प्लीज यार... और... और उसे कभी भी... अकेला मत छोड़ना... वादा...

विश्व - वादा...

वीर - थैंक्स यार... आह... भाभी... भैया...

विश्व किनारे हो जाता है l दोनों तरफ से विक्रम और शुभ्रा आकर वीर के दोनों हाथ पकड़ लेते हैं l वीर दोनों के हाथों को पकड़ कर अपने सीने पर लाता है l

वीर - भाभी...

शुभ्रा - हूँ...

वीर - भाभी... आप भैया पर कभी शक मत करना... भैया हमेशा से अच्छे थे... मैं ही बुरा था...

विक्रम - वीर... प्लीज...

वीर - नहीं भैया... मुझे कहने दो... आज कह लेने दो... ज्यादा वक़्त नहीं है मेरे पास... मौत तो कब से अपने कोशिश में है... मुझे ले जाने के लिए... पर मैं भाभी से अपने सारे गुनाह कबूल किए वगैर कैसे जा सकता हूँ... मत रोकिए मुझे...

विक्रम - (अपनी आँखे जोर से भिंच लेता है, और सिसकने लगता है)

वीर - भाभी...

शुभ्रा - हाँ.. हाँ वीर...

वीर - आप जब भैया के जिंदगी में आईं... तो आप मुझे बिल्कुल पसंद नहीं थीं... हाँ भाभी... आप मुझे बिल्कुल पसंद नहीं थीं... बचपन में... माँ छूटी... बाप छुटा.. घर और गाँव भी छुटा... पर भैया ने मुझे हमेशा थामे रखा... मैं उनके प्यार पर अपना हक समझने लगा था... आपके आने से... उसे बंटता देख.. मुझे बर्दास्त नहीं हुआ... तो मैंने आपको भैया की जिंदगी से निकाल फेंकने की तैयारी करने लग गया था... आह..

शुभ्रा - ठीक है वीर...

वीर - नहीं भाभी... प्लीज सुनो... यही बताने के लिए मैं अब तक जिंदा हूँ... प्लीज...

शुभ्रा - (एक पीड़ा भरी आह भरती है)

वीर - रंग महल की रस्म में.. भैया हिस्सा नहीं लेना चाहते थे... मैंने ही उन्हें चालाकी से... उनसे नशा करवा दिया... और यश से लिए... एफ्रोडिसीआक की दवा मिला दिया था... भैया बहक गए... और वह वाहियात वहशी रस्म अदायगी हो गया था... मुझे लगा... ग्लानि के चलते भैया... अपने आप को... आपकी जिंदगी से अलग कर लेंगे... पर ऐसा हुआ नहीं... आपके शादी के बाद...

विक्रम - बस वीर बस...

वीर - भैया... प्लीज... मुझे मत रोको... भाभी...

शुभ्रा - हाँ... हाँ वीर...

वीर - शादी के बाद... पहली रात... भैया ने कुछ नहीं किया था... पहली बार का धोखा... उन्हें याद था... इसलिए... उन्होंने अपने आप को बचा लिया... पर नौकरानी के हाथों... उनके खिलाफ खबर कर... मैंने उनकी इमेज को... आपकी नजरों से गिरा दिया... पर भैया कितने महान है देखो ना... आपसे वादा किया था... जब तक आप रूठी रहेंगी... आपको मनाते रहेंगे... और जब तक आप नहीं पूछेंगी... अपनी कैफ़ियत नहीं देंगे... आपको हरदम मनाते रहे... आपने कभी पूछा नहीं... इसलिए कभी बताया नहीं... पर मैं जानता हूँ... आप पूछते... तब भी... बताते नहीं... क्यूँकी शुरु से सब जानते थे... पर मुझे माफ कर देते थे... मेरे खिलाफ कभी... गुस्सा नहीं पाला उन्होंने... आपने भी बहुत बड़ी सजा दी उन्हें... बच्चा गिरा दिया... आह.. मैंने... मैंने... इसपर बड़े राजा जी से शिकायत कर दी... वैसे भी राजा साहब आपको पसंद नहीं करते थे... तब राजा जी ने... भैया से आपको छोड़ देने के लिए कह दिया... पर भैया... नहीं मानें... आपको लेकर भुवनेश्वर आ गए... आह...

शुभ्रा - वीर...

वीर - हाँ... भाभी... आह... पर मुझे खुशी है कि... आप और भैया... वापस एक हो गए... मैंने दो प्रेमियों को... अलग करने की कोशिश की... साजिश की... मेरे वज़ह से... आप दोनों बहुत तड़पे... जिसका फल... मुझे ऐसे मिलना था... वह क्या कहते हैं.. कर्मा द विच...

शुभ्रा - बस वीर... और नहीं प्लीज..

वीर - नहीं भाभी.. आपने फिर भी... मेरे और अनु के लिए... कितना कुछ किया... मैं आपको अपने तरफ से कुछ लौटा नहीं पाया... प्लीज भाभी... मुझे माफ कर दो...

शुभ्रा - वीर.. मुझे कोई शिकायत नहीं है... प्लीज अपने दिल से... यह बात निकाल लो..

वीर - दिल से कैसे निकाल दूँ भाभी... यही बात तो मेरी जान को अभी तक अटकाये हुए है...

शुभ्रा - वीर... वीर... मैं क्या करूँ वीर...

वीर - भाभी... कुछ माँगू...

शुभ्रा - हाँ वीर...

वीर - ना तो नहीं करोगी...

शुभ्रा - नहीं वीर माँगों...

वीर - आप दोनों से किया अपने पाप का... प्रायश्चित करना चाहता हूँ...

शुभ्रा - कैसे वीर... कैसे... मुझे क्या करना होगा...

वीर - मुझे आप.... अपना बेटा बना कर वापस बुलाना... प्लीज... मैं अपने दोस्त प्रताप की तरह बनना चाहता हूँ... प्लीज भाभी प्लीज... बुलाओगी ना...

शुभ्रा - (रोते हुए) हाँ वीर हाँ... तुम... तुम जरुर वापस आओगे... मेरे बेटे बन कर वापस आओगे...

वीर - हाँ भाभी... मुझे आना ही होगा... क्यूँकी मेरे और अनु का प्यार अधूरा है... मेरे लिए उसे भी तो आना होगा... आह... अब मैं सुकून के साथ मर सकता हूँ... भैया..

विक्रम - हाँ वीर...

वीर - अनु की मौत के बाद... किसीने... उसकी लाश को क्लेम नहीं किया था...

विक्रम - क्या...

वीर - हाँ.. मुझे देखो... यह बात मुझे भी याद नहीं रही... इसीलिए.. वह चेट्टी और उसका नाजायज बेटा मृत्युंजय ने... अपनी कॉन्टैक्ट लगा कर... इसी मेडिकल कॉलेज को... रिसर्च के लिए... सुपुर्द कर दी...

विक्रम और विश्व - क्या...

वीर - हाँ... यह बात मुझे... मृत्युंजय ने ही बताई थी... अनु की लाश लावारिस हो गई थी... सात दिन तक... किसी ने क्लेम नहीं किया तो उन्होंने ऐसा कर दिया... और मैं समझता था... कि मैं.. अनु से बेहद प्यार करता था...

विक्रम - आई एम... सॉरी मेरे भाई... आई एम सॉरी...

वीर - आपको मेरा एक काम करना है...

विक्रम - हाँ वीर बोलो...

वीर - मेरी भी लाश को... इस हस्पताल के सुपुर्द कर दो...

विक्रम - नहीं...

वीर - हाँ... भाई... प्लीज... वर्ना.. मेरी आत्मा को शांति नहीं मिलेगी... मैंने अपना यह ख्वाहिश... मजिस्ट्रेट को बता भी दिया है... प्लीज...

विक्रम - (आवाज़ भर्रा जाता है, तड़पती आवाज़ में) मुझसे क्या क्या करवा रहा है तु... तुझे वापस ले जाने की वादा कर आया था... उसे भी पूरा नहीं होने दे रहा है... और यह... बड़ा खुदगर्ज है... हमेशा अपनी ही बात मनवाता है...

अचानक कार्डियक मॉनीटर आवाज करने लगता है l ऊपर नीचे भाग रही बिंदुएँ अचानक स्थिर हो जाते हैं l विक्रम देखता है वीर की पलकें स्थिर हो गईं हैं और उसके चेहरे पर दमकती सुकून ठहर गई है l विश्व पास में इमर्जेंसी बटन दबा देता है l डॉक्टर और स्टाफ भागते हुए आते हैं l पर वीर का दिल धड़कना बंद हो चुका था l डॉक्टर की सारी कोशिशें बेकार जाती हैं l शुभ्रा रोये जा रही थी l वह अपना हाथ वीर के हाथ से छुड़ाती है और बदहवास रोते हुए पास बेंच पर बैठ जाती है l बाकी सभी के आँखों में आंसु थे l पर विक्रम शुन हो गया था l वह उठता है अपना हाथ वीर की हाथ से छुड़ाता है और धीरे धीरे कमरे से बाहर जाने लगता है l विश्व उसे रोकता है l विक्रम विश्व को देखता है फिर विश्व के गले लग कर रोने लगता है l तब शुभ्रा विक्रम को आवाज देती है l

शुभ्रा - विकी...

विक्रम किसी लुटे हुए शख्स की तरह शुभ्रा के सामने आता है l शुभ्रा विक्रम के दोनों हाथों को पकड़ लेती है और उसे खिंचते हुए घुटनों पर बिठा देती है l विक्रम का दाहिना हाथ अपनी पेट पर रखती है और विक्रम से कहती है

शुभ्रा - वीर... (अपना सिर हाँ में हिलती है)

विक्रम की आँखें हैरानी के साथ फैल जाती हैं l शुभ्रा अपने हाथ की तीन उंगली दिखाती है l और अपना सिर हिला कर हाँ कहती है l विक्रम रोते हुए शुभ्रा को गले लगा लेता है l
 
प्रिय Ronit Singh92

आपका तह दिल से आभार प्रकट कर रहा हूँ

मेरे इस लेखन के सफर में ना जाने कितने पाठक जुड़े और अपनी प्रतिक्रिया भी देते रहे पर शायद कहानी से ऊब कर साथ छोड़ भी दिए l

आप बस इसी तरह साथ बने रहें और अपनी प्रतिक्रिया देते रहें l

वैसे कहानी अपनी अंतिम पड़ाव पर पहुँच चुका है

फिर भी आप अपनी प्रतिक्रिया देने से कभी ना चुके

धन्यवाद और आभार
 
शुक्रिया मेरे दोस्त आपका बहुत बहुत शुक्रिया

सच कहूँ तो मेरी यह कहानी इस फोरम के लिए उपयुक्त नहीं है पर फिर भी पाठक जुड़ते गए, और कुछ साथ छोड़ते गए, कुछ हौसला बढ़ाते गए और कुछ साथ छोड़ते गए, फिर भी कहानी को इस मोड़ तक पहुँचा गए हैं l

मित्र मेरे लिए हर एक अपडेट एक नई खोज के समान होता है l

लिखना शुरु कर दिया है

अपनी संतुष्टि के पश्चात ही पोस्ट करूँगा

उम्मीद है जल्द पोस्ट कर सकूँ
 
मित्र मेरे भाई आप और avsji भाई जब से कहानी के साथ जुड़े मेरी लेखन इस मुकाम तक सफर तय कर पाई है l

इस फोरम के लिए या कहानी योग्य नहीं है l मुझे खुशी है कि फिर भी इस कहानी से लोग जुड़ते गए और कहानी को इस मोड़ तक लाने तक साथ बने रहें l

कहानी पर प्रतिक्रिया देना स्वाभाविक है पर विश्लेषण भरा प्रतिक्रिया देना हर किसी के बस की बात नहीं है l

प्रतिक्रिया, विश्लेषण, आलोचना और समालोचना हर लेखक के लेखन में धार पैदा करता है l मैं सदेव आप लोगों का आभार रहूँगा l सच कहूँ तो खेल खेल में यह कहानी लिखना शुरू किया था l जब शुरू किया था तब कहानी कहाँ से शुरू होगी यह भी तय नहीं था l और कहाँ खत्म होगी यह संदेह पर था l झूट नहीं बोलूंगा आप जैसे पाठकों ने अपनी मत, विश्लेषण से ही कहानी को दिशा दी, मार्ग दिखाया के कहानी यहाँ तक पहुँच पाया है l

इस फोरम के लिए यह कहानी उपयुक्त शायद ना हो पर पाठक पर्याप्त हैं यह तृप्त कर देता है l वीर और अनु की सफर समाप्त हो गया है पर सुखांत के लिए उन्हें आना होगा, आएँगे l

अब आगे विक्रम की बगावत, भैरव सिंह की गिरफ्तारी और अदालत में कारवाई बाकी है l पर फिर भी वह इतना आसान नहीं होगा l कहानी अपने अंत तक अग्रसर है l आपकी शुभकामनाएं और साथ ऐसे ही बने रहे l

धन्यवाद और आभार
 
हाँ यह केवल और केवल वीर ही ऐसा कर सकता था और उसने किया भी l वीर के साथ ऐसा क्यूँ हुआ वीर ने अपने अंतिम क्षण में अपने भाभी के सामने ग्लानि और अपराध बोध के साथ स्वीकर किया है l यह एक निष्ठावान और समर्पित प्रेमी ही इच्छा प्रकट कर सकता है कि वह दुबारा इस दुनिया में आएगा, अपने अधूरा प्रेम यात्रा को सम्पूर्ण करने के लिए l

आपको वीर का यह अंजाम पसंद आया यह मेरे लिए तृप्त की बात है l जैसा कि आपने कहा अब आगे विक्रम की बगावत, हाँ यह निश्चिंत और स्वाभाविक है l विक्रम चाहे जैसा भी हो, अपने भाई के प्रति सदेव सम्वेदनशील था l उसे पता था कि वीर उसके और शुभ्रा के खिलाफ था, षडयंत्र किया था पर उसने हमेशा अपने भाई को माफ किया था l क्यूँकी विक्रम के पास एक ही था जिसे वह अपना कह सकता था l आज वह उसे हमेशा के लिए छोड़ कर चला गया है l

अब विक्रम के पास बगावत के सिवाय बाकी कुछ भी नहीं रहा l

शुक्रिया धन्यवाद और आभार
 
हाँ कुछ पाठकों को यह अंदेशा था, वीर ऐसा ही कुछ करेगा और पाठक ऐसा ही वीर से उम्मीद भी कर रहे थे l

चेट्टी के जीवन में एक ही लक्ष शेष रह गया था, क्षेत्रपाल की बर्बादी l विश्व के पीआईएल दाखिल करने के बाद एसआईटी का पुनः गठन हो चुका है l पुराने एसआईटी का इनचार्ज परीड़ा अभी गायब है l और अब उसकी जगह सुभाष सतपती है l चेट्टी का यह मरणासन्न बयान रुप फाउंडेशन की तहकीकात को बल देगा l अब सरकार के सामने यह भेद भी खुल चुका है कि एडवोकेट जयंत राउत की मृत्यु स्वाभाविक नहीं थी बल्कि हत्या थी l

अब भले ही केस साफ दिख रहा है पर राह आसान नहीं होगा l भाई भैरव सिंह मुख्य खलनायक है l इतनी आसानी से वह ना टुटेगा ना ही झुकेगा l बस साथ बने रहिए और अपनी प्रतिक्रिया देते जाइए l धन्यवाद
 
हाँ उनको आत्म बोध और शत्रु बोध का ज्ञान था पर भीड़ तंत्र हमेशा किसी भी व्यक्ति को लाचार बना सकती है l चेट्टी की सहायता से विश्व पर भी आरंभ में कोर्ट परिसर में हमला हुआ था l एक राजनीतिज्ञ अगर कमीना हो तो हमेशा अपनी मकसद साधने के लिए भीड़ तंत्र का आड़ लेता है l दुख की बात तो है पर हमारे देश की राजनीति की यह एक पहलू है l

समय समय की बात है

हम अगर फिल्मी परिदृश्य से बात करें तो राजेश खन्ना हिंदी फ़िल्मों के प्रथम सुपर स्टार जितनी तेजी से उपर उठे, उतनी ही तेजी से पतन भी झेला l समय सबसे बेरहम साथी होता है l

वीर ने पहले से अपने भाई और दोस्त को अप्रत्यक्ष रूप में बता चुका था l उसने वही किया जो एक सच्चे प्रेमी को करना चाहिए था l

हाँ ना सिर्फ कबुल कर लिया बल्कि पुराने केस में हुई लापरवाही और अपराध को उजागर कर दिया l यानी जाते जाते क्षेत्रपाल के लिए गड्डा खोद कर निकल लिया l

वह वीर की नियति थी l इंस्पेक्टर को गोली चलानी ही थी l

जो हुआ वीभत्स हुआ, हाँ सुषमा को अंदेशा था l पर वह लाचार थी l क्षेत्रपाल के परिवार में औरतों की हालत ऐसी ही होती है l पर उसे वीर से माँ का सम्मान मिला और गर्व करने का क्षण l

वीर विक्रम का सिर झुकने नहीं देगा l तभी तो शुभ्रा के पेट में वीर का आगमन हुआ है l

हाँ

वीर एक भाई और दोस्त भी तो है

जो सही है उसे समर्थन दिया
 
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