Tumhaare Liye- Ek Prem Kahaani - Page 10 - SexBaba
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Tumhaare Liye- Ek Prem Kahaani

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अगर ऐसा कुछ है तो ये मेरे लिए बहुत खुशी की बात है कि मेरी तरफ से जो मेहनत की गई है वो सफल साबित हो रही है।।

सरिता और निश्चल के बीच ये प्यार भरी नोंक झोंक आगे भी चलती रहेगी।।

ये तो आपका बड़प्पन है महोदय जो आप मुझे इतना मान दे रहे हैं। बाकी अभी हम अपने आपको उस काबिल नहीं समझते। मेरी कोशिश बस इतनी कि कहानी पाठकों को पसंद आए।

आपकी बात बिल्कुल सही है महोदय।

अगर एक पुलिसवाला चाहे तो क्या नहीं कर सकता है। अगर वो अपने पर आ जाये तो बड़े से बड़ा गुंडा उसके कदमों पर अपनी नाक रगड़ेगा।। ये भले कहा जाता है कि कानून के हाथ बहुत लंबे होते है लेकिन कुछ ऊंची पहुच वाले उनके हाथ बांध देते हैं। लेकिन सरिता किसी की बात ही नहीं मान रही है और अपना काम किये जा रही है। जिसके कारण उसके ऊपर मुसीबत बढ़ती जा रही है।।

दोनों आगे चलकर पति पत्नी तो बनेंगे ही, लेकिन उसके पहले दोनों के बीच की जो कमेस्ट्री बनेगी वो बहुत लाजवाब होने वाली है। निश्चल का सरिता के प्रति लगाव जाहिर हो चुका है। जिसमे उसकी मदद साली साहिबा ही करने वाली हैं।।

कोई बात नहीं संजू जी।।

समय का पूरा सदुपयोग व्यक्तिगत जीवन में पहले करना चाहिए, उसके अगर समय मिले तो कहीं और।। बस आप ऐसे ही 3-4 भाग बाद अपनी खूबसूरत टिप्पणी दे दिया करिए, वही बहुत है कहानी के लिए।।

सही है महोदय। कम पाठक ही आते हैं लेकीनूनकी टिप्पणी सही होती है। हम उनपर अपनी बात कह सकते हैं। पिछली कहानी में आपने भी देखा होगा कि आई पाठक कैसी कैसी टिप्पणी करते थे जिसके जवाब देना बहुत मुश्किल होता था। तरह तरह के सवाल करते थे हमसे। एक दो का जवाब भी तो अपने भी दिया था।।

रोमांस, सस्पेन्स और थ्रिलर कहानियों में सुकून होता है पढ़ने और लिखने के बाद, उन कहानियों की अपेक्षा।।

पाठक चाहे कितने भी कम या ज्यादा आएं। कहानी पूरी होगी और ऐसे ही चलेगी।।

बहुत बहुत धन्यवाद आपका महोदय इस खूबसूरत समीक्षा के लिए।

साथ बने रहिए।।
 
अपडेट- 35


दोनों बहाने अपने में hi लगी हुई थी. उनकी बात बढ़ते देख रानी जी न कहा.

रानी जी- देखा न मैं न बोल रही थी की ये भले hi वह पर उदास रहती हो, लेकिन जैसे hi दोनों मिलेंगी. बिल्लियों की तरह लड़ना शुरू कर देंगी अब बस भी करो तुम दोनों. कभी तो अपनी बकबक बंद कर दिया करो.

सवी- इसी तरह सरिता निशु से भी लड़ती रहती है.

मनीषा- अब ये निशु कौन है.

सवी- मेरा भाई है निशु.

मनीषा- लेकिन नाम से लग रहा है की निशु आपकी बहन है.

मनीषा की बात सुनकर एक बार फिर से सभी हंसने लगे. हंसी रुकने पर राघव ने कहा

राघव- बस करिये दी आप आज इनका जन्मदिन है और आप लोग आज भी इनकी खिचाई करने पर तुले हुवे हैं.

मनीषा- अच्छा जी. अगर आप नहीं बताते तो हमें पता hi नहीं चलता. हमें तो अभी पता चल रहा है की आज मेरी दिदिया का जन्मदिन है.

मनीषा की बात सुनकर राघव झेंप जाता है और अपनी गार्डन झुका लेता है, जबकि मनीषा की बात सुनकर सभी मुस्कुराने लगते हैं. ये देखकर सरिता कहती है.

सरिता- मनीषा अब तुम मेरे हांथो मार खाओगी.

सवी- मार तो तुम भी मेरे हाथो खा सकती हो सरिता. सीधी तो तुम भी नहीं हो.

सरिता- अच्छा बस बस. आप लोगो का बस चले तो पता नहीं क्या करो मेरे साथ.

मनीषा- हाँ दिदिया. तुम सही कह रही हो, लेकिन दिक्कत ये है की इनका बस नहीं ट्रक चलता है.

मनीषा की बात सुनकर एक बार फिर से सभी हंसने लगते हैं. सरिता बुरा सा मुंह बनाकर मनीषा से कहती है.

सरिता- आखिर आ hi गयी अपने घटिया और सादे हुवे जोक्स लेकर तुम.

मनीषा- हाँ आ गयी मैं. आपको कोई दिक्कत है क्या.

सवी- अच्छा अब बहुत हुवा. तुम लोग बस भी करो. चलो अब सब लोग शांत हो जाइये और सरिता तुम जाकर तैयार हो जाओ. बालकनी से लगकर जो दूसरा रूम है वो मेरा है. तुम उसी में चली जाओ और तैयार हो जाओ.

सरिता- ठीक है दी. चल मनीषा तू मेरे साथ.

मनीषा- वो तो मुझे चलना hi पड़ेगा. नहीं तो पता नहीं तुम ऐसे तैयार होकर यहाँ आओ की तुम्हे देखकर hi लोग दर जाएं.

इतना कहकर मनीषा ने सविता को ताली दे दी. जिसे देखकर सरिता ने कहा.

सरिता- अरे वाह्ह क्या बात है. अभी ठीक से जान पहचान के कुछ hi घंटे हुवे हैं और आपने पार्टी बदल ली दी. वैसे आपकी जानकारी के लिए बता दूँ की बाद में अआप्के काम मैं hi आउंगी ये नहीं.

मनीषा- (नाक सिकोड़ते हुवे) आपको नहीं लग रहा है की कही से जलने की गंध आ रही है दीदी.

सवी- जलने वाले को जलने दो मनीषा.

सविता की बात सुनकर मनीषा हँसते हुवे ऊपर कमरे में चली जाती हैं. कमरे में जाकर सरिता तैयार होने लगती है और मनीषा सरिता को तैयार करवाने लगती है.

मनीषा- देखो दिदिया. अपने बाल खुले रखना. तुम पर बहुत अच्छा लगेगा. ये नहीं की रोज जो सदा सा जुड़ा बना लेती हो वो बनाने लग जाओ.

सरिता- लेकिन मनीषा. खुले बालो से मुझे परेशानी होती है

मनीषा- जब मैं तैयार करा रही हूँ आपको तो मेरी बात मनो दिदिया. तुम बहुत प्यारी लगोगी खुले बालो में.

सरिता- ठीक है मेरी माँ. जैसा तुम कहो. वैसे ये बताओ की तुम यहाँ पर पहुंची कैसे.

मनीषा- अरे यार दिदिया. तुम्हारी प्रॉब्लम क्या है. मुझे लगता है की तुम्हे हम सबको यहाँ देखकर ज्यादा ख़ुशी नहीं हुई. तुम्हे ये जानकर ज्यादा ख़ुशी होगी की हम लोग यहाँ पहुंचे कैसे. अरे यार. पहले तुम तैयार तो हो जाओ, बाद में तुम्हे पता चल hi जायेगा. अच्छा तुम कपडे सेट करो तब तक मैं इसके सेट निकल देती हूँ.

सरिता- नहीं मनीषा. इतना बहुत है. मैं ज्यादा कुछ नहीं पहनूंगी.

मनीषा- ज्यादा कुछ नहीं है दिदिया. बस ेअरिंग है और कुछ नहीं.

अभी मनीषा ने इतना hi कहा था की तभी दूर नॉक होता है. और राघव की आवाज़ सुनाई पड़ती है.

राघव- मनीषा जी. आपको दी बुला रही हैं.

मनीषा- आप चलिए मैं आती हूँ.

राघव- दी ने कहा है की बहुत जरूरी काम है उन्हें आपसे.

मनीषा- (चिढ़कर) अरे यार बोल तो रही हूँ न की आ रही हूँ. आप चलो.

सरिता- मनीषा. ये क्या तरीका है बात करने का उनसे. जाओ जल्दी और जल्दी hi आना.

सरिता की बात सुनकर मनीषा निचे चली जाती है. मनीषा के जाने के बाद सरिता दरवाज़ा लॉक नहीं करती है अपना कपडा और ेअरिंग pahan-ne लगती है.

तभी निश्छल भी घर आ जाता है और वो अंदर न आकर बहार बानी हुई सीढ़ियों से ऊपर आता है और कमरे का दरवाज़ा खोलता है. दरवाज़ा खुलने की आवाज़ सुनकर सरिता को लगा की मनीषा आ गयी है.

वही निश्छल कमरे में एक लड़की को देखकर समझ नहीं पता की वो कौन है क्योंकि दरवाज़े की तरफ सरिता की पीठ थी. निश्छल ने ऊपर आते समय सरिता के घरवालों के बोलने की आवाज़ निचे सुनी थी तो वो सोच रहा था की सब निचे hi हैं. जैसे hi वो उससे पूछना चाहता है वैसे hi सरिता भूल पड़ती है.

सरिता- (बिना मुड़े) मनीषा देखो तो ये चैन मुझसे नहीं बंद हो रही है. मेरा हाथ ठीक से पीछे नहीं पहुंच रहा है.

सरिता की आवाज़ सुनकर निश्छल उसे पहचान गया. अब उसे समझ में नहीं आ रहा था की वो क्या करे. कोई जवाब न पाकर सरिता फिर से कहती है.

सरिता- क्या कर रही हो मनीषा. जल्दी से चैन बंद करो तो निचे चलते हैं.

सरिता इतना बोलकर अपने बालो को पीछे से समेत कर आगे की तरफ कर लेती है. जिसके कारन उसकी पीठ नंगी दिखने लगती है. हालाँकि सरिता ने जो गाउन पहना था वो डीप बैक का नहीं था, लेकिन फिर भी थोड़ा बहुत था जिससे उसकी चिकनी पीठ निश्छल के सामने नुमाया हो रही थी.

निश्छल ने जब उसकी पीठ की हलकी सी झलक देखि तो उसके पांव जहा थे. वही पर जैम हो गए थे. उसने कुछ पल सरिता की पीठ देखने के बाद अपनी नज़ारे फेर ली. अभी तक मनीषा का कोई जवाब न मिलने के कारन सरिता घूम जाती है. सरिता जैसे घूमती है वो निश्छल को सामने खड़ा पति है.

यहाँ एक घटना ये घाटी की जिस समय सरिता पीछे की तरफ घूमती है उसी समय निश्छल भी सरिता की तरफ देखता है. दोनों की नजरें आपस में मिलती हैं. निश्छल से नजर मिलते hi सरिता जोर से चिल्लाने वाली होती है की तभी निश्छल दुअडकर उसके पास पहुँचता है और उसके मुंह पर अपना हाँथ रखकर उसे चुप करता है और उसे दीवार से सत्ता देता है और बोलता है.

निस्चल- पागल हो क्या तुम. मरवाओगी क्या. सब निचे हॉल में बैठे हुवे हैं. तुम्हारी आवाज़ सुनकर ऊपर आ जायेंगे. तुम्हे और मुझे एक कमरे में देखकर पता नहीं क्या सोचेंगे. सो प्लीज मैं अपना हाँथ हटा रहा हूँ. आवाज़ बिलकुल भी मत करना.

निश्छल के ऐसे आकर उसके मुंह पर हाँथ रखने और उसकी एक बांह पकड़ कर उसे दीवार से सताते समय निश्छल के स्पर्श से सरिता शरीर में झुरझुरी होने लगती है. वो बस एक तुक निश्छल की आँखों में देखने लगती है और उसमे खो जाती है. निश्छल क्या बोल रहा है उसे कुछ सुनाई नहीं पद रहा था. सरिता की तरफ से कोई जवाब न पाकर निश्छल ने सरिता को झिंझोड़ते हुवे कहा.

निश्छल- तुम सुन रही हो न मैं क्या कह रहा हूँ. चिल्लाना मत. मैं हाँथ हटा रहा हूँ.

निश्छल के झिंझोड़ने से सरिता वर्तमान में वापस आयी और अपना सर हाँ में हिलाया तो निश्छल ने अपना हाथ उसके मुंह से हटा लिया. मुंह से हाथ हटने के बाद सरिता ने कहा.

सरिता- ाअप्प्प… आप यहाँ क्या कर रहे हैं.

निश्छल- यही तो मैं तुम्हसे jan-na चाहता हूँ की तुम मेरे कमरे में क्या कर रही हो. अगर तुम्हे कपडे चेंज करना था तो तुम दी के रूम में चली जाती.

सरिता- क्या… ये आपका रूम हैई. लेकिन दी ने तो बोलै था की बालकनी से लगा हुवा दूसरा रूम दी का है. मैं उसमे चली जॉन.

निश्छल- हाँ दी ने सही कहा था. बालकनी से लगा हुवा दूसरा रूम, लेकिन बालकनी से लगा हुवा ये रूम मेरा है और बालकनी से लगा हुवा उधर वाला रूम दी का है. तो दी ने उस वाले रूम के बारे में कहा था.

सरिता- ओह्ह्ह्हह.. सॉरी. मुझे नहीं पता था की ये आपका रूम है. मैं जाती हूँ दी के रूम में तैयार होने के लिए.

इतना कहकर सरिता अपना सामान समेटने लगती है तो निश्छल उससे कहता है.

निश्छल- नहीं सरिता उसकी कोई जरूरत नहीं है. तुम यही पर तैयार हो जाओ. मैं निचे जा रहा हूँ.

सरिता- नहीं. आप यही रहिये. मैं दी के कमरे में जा रही हूँ.

इतना कहकर सरिता अपना सामान समेत कर जाने लगती है . जैसे hi सरिता निश्छल को क्रॉस करके आगे बढ़ती है. निश्छल उसकी कलाई पकड़ लेता है और एक हल्का सा झटका देखर अपनी तरफ खींच लेता है. जिसके कारन सरिता निश्छल के साइन से जा लगी.

सरिता निश्छल की आँखों में देखने लगी और निश्छल सरिता की आँखों में देखने लगता है. दोनों एक दुसरे की आँखों में देख कर फिर से खो जाते हैं. कुछ देर ऐसे hi एक दुसरे की आँखों में खोये रहने के बाद निश्छल होश में आता है और सरिता से कहता है.

निश्छल- तुम्हे एक बार में समझ नहीं आता क्या. जब मैं कह रहा हूँ की तुम यही पर चेंज कर लो मैं निचे जार अहा होऊं तो मेरी बात क्यों नहीं मानती तुम. तुमने मेरी बात न man-ne की कोई कसम वसं खा रही है क्या.

सरिता- मेरा हाँथ छोड़िये. मैं आज के दिन आपको थप्पड़ मार्कर कोई तमाशा नहीं खड़ा करना चाहती.

निश्छल- तुम्हे तो बस एक hi काम आता है मुझे थप्पड़ मरना. मेरे गाल को तुम्हे मंदिर का घंटा समझ रखा है क्या की तुम्हारा जब मन करेगा तुम बजा कर चली जाओगी. नहीं छोड़ता मैं तुम्हारा हाँथ. तुम चाहो तो मुझे थप्पड़ मर सकती हो.

सरिता- प्लीज सर. मेरा हाँथ छोड़ दीजिये. मुझे दर्द हो रहा है.

सरिता के मुंह से दर्द सुनकर निश्छल उसका हाथ छोड़ देता है. लेकिन अभी भी दोनों बहुत करीब खड़े हुवे थे. तभी मनीषा कमरे में दाखिल होती है और बोलती है.

मनीषा- क्या दिदिया. अभी तक तुम तैय…………….

आगे के शब्द उसके मुंह में हो रह गए जब मनीषा निश्छल को कमरे में देखा. वो उसे घूरती हुई बोलती है.

मनीषा- ऐ ड्राइवर तुम कमरे में क्या कर रहे हो. तुम्हे पता भी है की दिदिया कपडे बदल रही है. तुम यहाँ क्यों आये. तुम्हारे इरादे मुझे ठीक नहीं लग रहे हैं. रुको मैं अभी सबको बुलाती हूँ.

सरिता मनीषा के मुंह से निश्छल को ड्राइवर कहकर सम्बोधित करने पर चौक जाती है और सवालिया नज़रों से निश्छल को देखने लगती है. सरिता अपने मन में सोचती है की ये निश्छल को ड्राइवर क्यों कह रही है. आखिर चक्कर क्या है. ये हिटलर भी मनीषा की बात सुनकर कुछ नहीं बोल रहा है.

वही इतना कहकर मनीषा कमरे से जाने के लिए मुड़ती है तो सरिता दौड़कर उसका हाँथ पकड़ लेती है और बोलती है.

सरिता- ऐसा कुछ भी नहीं हैं मनीषा जैसा तुम समझ रही हो.

मनीषा- देखो दिदिया तुम बिलकुल भी मत डरो. मुझे पता है की ये तुम्हारा ड्राइवर है. लेकिन इसकी ये हिमाकत की ये तुम्हारे साथ गलत करने की कोशिश करे. मैं इसे ऐसे छोड़ने वाली नहीं हूँ.

मनीषा की बात सुनकर निश्छल जोर जोर से हंसने लगता है. जिससे मनीषा छिड़कर निश्छल से कहती है.

मनीषा- ऐ ड्राइवर. तुम क्यों अपने कोलगते से घिस घिस कर चमकाए हुवे दांतो की नुमाइश कर रहे हैं. क्या मैंने तुम्हे कोई चुटकुला सुनाया क्या. बड़े ढीठ आदमी हो तुम तो. मैं यहाँ सबको बुलाने की बात कर रही हूँ और तुम पागलो की तरह जोर जोर से हसे जा रहे हो.

निश्छल- हंसु नहीं तो और क्या करू. अभी तुमने जो कुछ कहा है न. वो किसी चुटकुले से काम नहीं है. मिस जोशी को दर लग रहा है. हाहाहाहा. दर और वो भी मिस जोशी को. कभी नहीं. मिस जोशी को देखकर तो दर को भी दर लगने लगता है. हहहहहहआ.

सरिता- रहने दो मनीषा. ये तो इनका रोज का काम है. इन्हे ऐसे दौरे हमेशा पड़ते रहते हैं. इन्हे इग्नोर करो और चलो हम दुसरे कमरे में चलते हैं.

मनीषा- आप इस ड्राइवर को इन्हे कहकर क्यों बात कर रही हैं. माना की आप सबको सम्मान देती हैं. लेकिन इसने तो सम्मान देने वाला कोई काम किया नहीं है. और दुसरे कमरे में क्यों जायेंगे हम. जायेगा तो ये ड्राइवर यहाँ से.

सरिता- मनीषा ये मेरे ड्राइवर नहीं हैं. ये मेरे बॉस हैं. निश्छल सिंह राठोड. मैं इन्ही के अंदर में काम करती हूँ. ये सविता दी के छोटे भाई निशु हैं और ये रूम इन्हीं का है.

सरिता की बात सुनकर मनीषा हरण रह गयी. क्योंकि निश्छल को ड्राइवर समझकर मनीषा ने कुछ ज्यादा hi रौदे बर्ताव किया था. धमकी भी दे दी थी. उसने सविता से निश्छल के बारे में थोड़ा बहुत सुना था. मनीषा ने हैरानी के साथ सरिता से कहा.

मनीषा- क्या. ये आप क्या बोल रही हैं दिदिया. ये तो आपके ड्राइवर हैं. इन्होने hi तो मुझे बताया था.


मनीषा की बात सुनकर निश्छल ने कहा.

निश्छल- मैंने कब कहा की मैं मिस जोशी का ड्राइवर हूँ. तुमने hi मेरी बात नहीं सुनी और मुझे अपनी दी का ड्राइवर बना दिया. तो मैंने भी सोचा की एक दिन ड्राइवर बैंकर भी देख लेता हूँ.

मनीषा- मुझे माफ़ कर दीजिये. जाने अनजाने अगर मुझसे कोई गलती हो गयी हो तो.

निश्छल- अरे कोई बात नहीं. थोड़ा बहुत तो चलता hi रहता है.

मनीषा- मतलब आप वही हैं जिन्होंने……..

निश्छल मनीषा की बात पूरी होने से पहले hi सर न में हिलाकर उसे मन करता है और कहता है.

निश्छल- आप दोनों भी जाकर तैयार हो जाइये नहीं तो अभी दी का बुलावा आ जायेगा.

निश्छल की बात सुनकर सरिता और मनीषा दुसरे कमरे में चली जाती हैं और तैयार होने लगती हैं. सरिता को तैयार करके मनीषा सरिता को निचे जाने के लिए बोलती है तो सरिता कहती है.

सरिता- तुम भी चलो न साथ में. तुम यहाँ बैठ कर क्या करोगी.

मनीषा- तुम चलो न दिदिया. मैं ये सब समेत कर आती हूँ.

मनीषा की बात सुनकर सरिता निचे चली जाती है. सब सामान समेटने के बाद मनीषा भी बहार जाने लगती है. फिर कुछ सोच कर निस्चल के रूम की तरफ जाती है. मनीषा उसके रूम का दरवाज़ा खटखटाती है. तो निश्छल की आवाज़ आती है.

निश्छल- दरवाज़ा खुला है. अंदर आ जाइये.

निश्छल की बात सुनकर मनीषा कमरे में आकर दरवाज़ा बंद कर लेती है और निश्छल से कहती है.

मनीषा- सॉरी. मुझे माफ़ कर दीजिये आप. मैंने आपसे अचे से बात नहीं की मुझे नहीं पता था की आप सविता दीदी के भाई हैं. मैंने बहुत कुछ उल्टा सिद्ध बोल दिया था आपको. फ़ोन पर भी मैंने आपको धमकी दे दी. आपको ड्राइवर बोलै. उसके लिए माफ़ कर दीजिये.

निश्छल- अरे कोई बात नहीं. ऐसे वाकिये हो जाते हैं कभी कभी. वैसे मुझे भी इस वाकिये में बहुत मज़ा आया.

मनीषा- (चहकते हुवे) वैसे मुझे एक बात समझ में नहीं आयी की जब मैं दिदिया को बता रही थी तो आपने मुझे मन क्यों किया की आपने hi हम लोगो को यहाँ बुलाया है दिदिया के बर्थडे में शामिल होने के लिए. उनको सुर्प्रीज़े देने के लिए.

निश्छल- तुम नहीं समझोगी. मेरी और उसकी बिलकुल भी नहीं बनती. 36 का आंकड़ा है हम दोनों के बिच. अगर उसे पता चल गया की मैंने hi तुम लोगो को यहाँ बुलाया है तो वो चिढ जाएगी और इससे भी सदा सरप्राइज हम सबको दे देगी.

मनीषा- (शातिर निगाहो से देखते हुवे) अच्छा. बनती नहीं है आपकी दिदिया से. फिर भी उसको इतनी बड़ी ख़ुशी दे दी आपने.

निश्छल- मतलब. तुम कहना क्या चाहती हो.

मनीषा- आपको नहीं पता की दिदिया मम्मी पापा को कितना प्यार करती है. उनकी तो जान बस्ती है मम्मी पापा में. उन्हें इस तरह से अचानक यहाँ देखकर वो बहुत खुश हैं.

निश्छल- चलो अच्छा hi है. काम से काम उसे ख़ुशी तो मिली किसी चीज़ से. फिर भी मेरा नाम गलती से भी मत लेना नहीं तो उसकी ख़ुशी गुस्से में बदलते देर नहीं लगेगी. इतना दिन बाद तो वो खुश दिख रही है. नहीं तो लेडी डॉन बानी फिरती रहती है. जंगली बिल्ली.

मनीषा- (हँसते हुवे) यस बॉस. वैसे दिदिया के ऊपर ये नाम बहुत शट कर रहा है. लेडी डॉन. जंगली बिल्ली.

मनीषा की बात सुनकर निश्छल हंसने लगा और बोलै.

निश्छल- एक बात बोलू तुमसे.

मनीषा- यस बॉस. कहिये.

निश्छल- वो क्या है की मुझे ऐसा लगता है की तुम अपनी बहन से कुछ ज्यादा hi समझदार हो.

मनीषा- (खुश होकर) धन्यवाद बॉस. मुझे ये सुनकर बहुत ख़ुशी हुई. काम से काम किसी ने तो मेरी काबिलियत को पहचाना. नहीं तो दिदिया हमेशा कहती है की मैं किसी काम की नहीं हूँ.

इतना कहकर मनीषा हंसने लगती है उसके साथ में निश्छल भी हंसने लगता है. हँसते हुवे निश्छल ने कहा.

निश्छल- आज से मैं तुम्हे छोटे मिया बुलाऊंगा. चलेगा न.

मनीषा- चलेगा नहीं दौड़ेगा. और मैं आपको आज से बॉस बुलाऊंगी. चलेगा न.

निश्छल- (हंसकर) चलेगा नहीं दौड़ेगा.

निश्छल की बात सुनकर मनीषा हंसने लगी साथ में निश्छल भी हंसने लगा. तभी सविता की आवाज़ आती है जो उन्हें निचे बुला रही थी. दोनों हँसते हुवे निचे आता हैं.



इसके आगे की कहानी अगले भाग में..
 
अपडेट- 36

निश्छल की बात सुनकर मनीषा हंसने लगी साथ में निश्छल भी हंसने लगा. तभी सविता की आवाज़ आती है जो उन्हें निचे बुला रही थी. दोनों हँसते हुवे निचे आता हैं.

हाल के बिच में एक बड़ा सा राउंड टेबल लगा हुवा था. जिस पर कक रखा हुवा था. हॉल की सजावट की गयी थी. टेबल के चारो और गुब्बारे लगाए गए थे. हॉल को एकदम दुल्हन की तरह सजाया गया था. इस सजावट के पूरे काम को मोहित, जावेद और राघव ने मिलकर किया था.

उसी टेबल के पास सभी लोग मौजूद थे. निचे आने के बाद मनीषा सरिता के पास चली गयी. निश्छल की नजर जब सरिता पर पड़ती है तो वो अपनी आँखे झपकना भूल जाता है.

सरिता के बदन पर इस समय हलके ग्रीन और ब्लू कलर का पार्टी गाउन था. उसके साथ hi चेहरे पर हल्का सा make-up, खुले हुवे बाल, कानो में गाउन से मैचिंग कलर की ेअरिंग और बहुत hi प्यारी मुस्कान के साथ उसकी ख़ूबसूरती में चार चाँद लगा रही थी.

उसके साथ hi उसके बालो की एक लत उसके चेहरे पर आ रही थी. जिसे वो अपने हांथो से बार बार संवर रही थी. निश्छल ने सरिता का ऐसा रूप पहली बार देखा था और ये रूप देखने के बाद वो सरिता में खो सा गया था. उसकी नजरें सरिता पर से हैट hi नहीं रही थी.

निश्छल न सरिता को हमेशा से वर्दी में देखा था या फिर साधारण से कुर्ते और जींस में देखा था. पर आज पार्टी गाउन में निश्छल सरिता को पहली बार देख रहा था. जिसमे सरिता कहर ध रही थी. निश्छल सरिता की ख़ूबसूरती में खोये हुवा था. उसका ध्यान मनीषा की खनकती हुई आवाज़ से भांग हुवा.

मनीषा- चलो दीदिद्या अब कक कट करो. बहुत जोरो की भूख लगी है.

मनीषा की बात सुनकर सरिता ने हाँथ में चाकू उठाया. मनीषा ने मोमबत्ती जलाई और सरिता जैसे hi कक काटने के लिए नीचे झुकी. उसके हाथ वही पर जैम हो गए और आँखों से जहर जहर आँशु बहाने लगे. सरिता ने चाकू निचे रख दिया. ये देखकर सवी ने कहा.

सवी- क्या हुवा सरिता चाकू क्यों निचे रख दिया. कक काटो न.

लेकिन सरिता ने उसकी बातो का जवाब नहीं दिया और रट हुवे कमरे में चली गयी. निश्छल. राघव, सविता, मोहित और जावेद आश्चर्य से सरिता को जाते हुवे देखते रहे. उन्हें समझ में hi नहीं आ रहा था की सरिता को अचानक क्या हो गया.

मनीषा, आनंद जी और रानी जी समझ गए थे की बात क्या है. इसलिए मनीषा दिदिया दिदिया करके उसके पीछे पीछे भागते हुवे उसके कमरे में चली गयी. खुशियों का माहौल ग़मगीन हो गया था. सविता ने रानी जी से पूछा.

सवी- सरिता को क्या हो गया ौंटी जी. ये अचानक रोने क्यों लगी.

रानी जज- अब क्या बताऊ बेटी तुम्हे. मेरी तो किस्मत hi ख़राब है. मेरी बच्ची ने जिंदगी में बहुत दुःख झेले हैं. ये दुःख मेरी बच्ची का पीछा hi नहीं छोड़ रहा है.

सवी- आखिर बात क्या है ौंटी. सरिता ने अचानक ऐसा रियेक्ट क्यों किया. हम लोगो ने तो उसे ऐसा कुछ नहीं कहा जिसकी वजह से वो रोने लग जाये.

आनंद जज- आप लोगो ने कुछ नहीं कहा. वो तो अपने भाई की वजह से रो रही है.

निश्छल- अपने भाई की वजह से. मैं कुछ समझा नहीं.

आनंद जी- बात ये है की मेरा एक बीटा भी था. अभिषेक नाम था उसका. वो अपनी बहनो से बहुत प्यार करता था. उसकी तो जान बस्ती थी अपनी बहनो में. सरिता और मनीषा भी उसे बहुत प्यार करती थी. मेरी एक गलती की वजह से वो घर छोड़ कर जो एक बार गया तो कभी लौटकर दुबारा घर नहीं आया.

मेरी बात को इग्नोर करके वो शायद घर आ भी जाता, लेकिन जब सरिता ने भी उसे गलत कहा तो शायद वो बर्दास्त नहीं कर पाया. इसलिए वो घर कभी लौट कर नहीं आया. हमने उसे बहुत ढूँढा, लेकिन वो नहीं मिला. उसके बात तो जैसे मेरी बच्ची के जीवन से खुशिया hi चली गयी.

कोई भी त्यौहार, ख़ुशी का मौका, बर्थडे सरिता का ऐसे hi bit-ta है. हर ख़ुशी के मौके पर वो अपने भाई को याद करके ऐसे hi रोटी है और हम सबको भी रुलाती है. वो कहती है की वो अपने भाई को धुन्ध लेगी. लेकिन पता नहीं वो कहा होगा, किश हाल में होगा, है भी या नहीं पता नहीं.

इतना कहकर आनंद जी और रानी जी की आँखों में भी आँशु आ गए. सवी ने रानी जी को जबकि निश्छल ने आनंद जी को संभाला. सभी के चेहरे पर गम साफ दिखाई दे रहा था. उधर मनीषा कमरे में सरिता को समझा रही थी.

मनीषा- ये क्या है दिदिया. तुम फिर से भैया को याद करके रोने लगी.

सरिता- मैं क्या करू मनीषा. मुझे भैया की बहुत याद आती है. जब भी ऐसा कोई मौका होता है तो मैं अपने आपको रोक नहीं पति हूँ. खास आज भैया भी हमारे साथ होते तो कितना अच्छा होता. मेरी एक गलती के कारन भैया मुझसे इतना नाराज़ हो गए की एक बार भी अपनी बहन से मिलने तक नहीं आये. क्या मैं इतनी बुरी हूँ मनीषा.

मनीषा- नहीं दिदिया. आप दुनिया की सबसे अच्छी बहन हो. देख लेना एक दिन भैया को अपनी गलती का एहसास होगा और वो हमारे पास लौट कर ायेगने.

सरिता- वो दिन कब आएगा मनीषा. जब भैया लौट कर आएंगे और हमें पहले की तरह प्यार करेंगे.

मनीषा- वो दिन बहुत जल्दी आएगा दिदिया. अब चलो बहार और कक काटो. तुमने अपने चक्कर में सबको रुला दिया है. तुमको पता है न की जब तुम भैया को याद करके रोटी हो तो मम्मी पापा को कितनी तकलीफ होती है. चलो अब जल्दी से अपना चेहरा साफ करो और बहार चलो. सब तुम्हारा इंतज़ार कर रहे हैं.

सरिता- तुम चलो मैं आती हूँ.

मनीषा सरिता की बात सुनकर बहार चली गयी और सरिता बाथरूम में घुस गयी. मनीषा जब बहार आयी तो रानी ने पूछा.

रानी जी- कैसी है मेरी बच्ची मनीषा.

मनीषा- आप की बच्ची को कुछ नहीं हुवा है. वो आ रही है. फालतू में ड्रामा करती रहती हैं दिदिया.

रानी जी- तू चुप कर. मेरी बेटी के प्यार को ड्रामा कह रही है.

तभी सरिता कमरे से बहार आती है. उसके चेहरे पर अब पहले जैसी ख़ुशी नहीं दिख रही थी. वो आकर टेबल के सामने कड़ी हो गयी. मनीषा ने फिर दोबारा से कैंडल जलाई. सरिता ने कक कटा और सबको एक एक पीस खिलने लगी. सबने उसे बर्थडे विश किया.

सरिता ने अपने मम्मी पापा को कक खिलने के बाद उसने उनका आशीर्वाद लिया. फिर सविता को सरिता ने कक खिलाया फिर एक टुकड़ा उठाकर मनीषा को खिलने जाने लगी. लेकिन मनीषा गुब्बारा फोड़ने के लिए इधर उधर भाग रही थी. मनीषा ने अपना फ़ोन सवी को दे दिया और फोटो खींचने के लिए बोल दिया. सरिता ने मनीषा से कहा.

सरिता- तुम एक जगह कड़ी नहीं हो सकती हो क्या. गुब्बारे बाद में फोड़ लेना, तुम्हारे अलावा यहाँ पर कोई छोटा बच्चा नहीं है. सब तुम्हे hi फोड़ने के लिए मिलेगा.

मनीषा- लो कड़ी हो गयी हूँ खिलाओ.

सरिता ने कक का टुकड़ा लिए अपना हाँथ आगे बढ़ाया. मनीषा को पता नहीं क्या शरारत सूझी की जैसे hi सरिता का हाँथ उसके मुंह के पास पंहुचा वो वह से हैट गयी. मनीषा के ठीक पीछे निश्छल खड़ा था.

जैसे hi मनीषा हटी. सरिता के सामने निश्छल खड़ा था. जब तक सरिता अपना कुछ समझती तब तक सरिता का हाँथ निश्छल के मुंह तक पहुंच गया था, फिर भी सरिता ने अपना हाँथ रोक लिया और हाँथ वापस करने लगी तो निश्छल ने कहा.

निश्छल- अब हाथ आगे बढ़ाया है तो खिला भी दो. वैसे भी किसी ने कहा है की डेन डेन पर लिखा होता है खाने वाले का नाम.

निश्छल की बातो का सरिता ने कोई जवाब नहीं दिया. वो वह से जैसे hi जाने को हुई. निश्छल ने उसका हाँथ पकड़ लिया और उसके हाँथ से कक लेकर उसके मुंह के पास करके बोलै

निश्छल- अगर मुझे खिला नहीं सकती हो तो काम से काम मेरे हांथो से खा hi लो. और हाँ जन्मदिन की बहुत बहुत बधाई मिस जोशी.

सरिता ने निश्छल को गुस्से से देखा, लेकिन इस समय वो कोई तमाशा क्रिएट नहीं करना चाहती थी. इसलिए उसने चुपचाप कक खा लिया. सवी ने मनीषा के फ़ोन से इस मूवमेंट को कैद कर लिया. कक खाने के बाद सरिता ने निस्चल को थैंक यू कहा और वह से चली गयी. निश्छल के चेहरे पर मुस्कान आ गयी.

उधर मनीषा गुब्बारे फोड़ने के चक्कर में इधर उधर भाग रही थी. तभी वो राघव से टकरा गयी. दोनों की टक्कर कुछ ज्यादा hi तेज़ थी. जिसके कारण दोनों का बैलेंस बिगड़ गया और दोनों जमीन पर गिर पड़े. अब सेतुएशन ये थी की राघव जमीन पर पीठ के बल गिरा हुवा था और राघव के ऊपर मनीषा पेट के बल गिरी हुई थी.

मनीषा पूरी तरह से राघव के ऊपर ढह गयी थी. गिरने के कारन उसके मुंह से चीख निकल गयी. उसकी चीख सुनकर सभी की नजर उनकी तरफ गयी तो सरिता जल्दी से उनके पास पहुंची और मनीषा को पकड़कर राघव के ऊपर से उठाया. मनीषा के उठाने के बाद राघव भी उठ कर खड़ा हो गया.

मनीषा चूँकि राघव के ऊपर गिरी थी, इसलिए उसे ज्यादा चोट नहीं आयी थी, लेकिन वो ठहरी लड़की और लड़कियां जल्दी अपनी गलती मानती नहीं है और लड़की होने के कारन नाटक भी करती हैं सम्पति गेन करने के लिए तो मनीषा ने राघव को घूरकर देखते हुवे कहा.

मनीषा- अंधे हो तुम. तुम्हे दिखाई नहीं देता क्या. देख के नहीं चल सकते क्या. तुम्हारी आँखे हैं या आलू. आह्ह्हह्ह्ह्ह मार डाला रीई. बहुत्त तेज़्ज़ दर्द्द हूँ रहा हीी मुझी. उउउउउइइइइइइ मम्मीयी.

राघव- मुझे माफ़ कर दीजिये मनीषा जी. मैंने आपको देखा नहीं था की आप उधर से आ रही हैं.

सरिता- अरे नही राघव जी. आप क्यों माफी मांग रहे हैं. ये सब इसकी नौटंकी है. जब बंदरो की तरह इधर उधर उछाल कूद कर रही है तो यही होगा न. इसे छोट वोट कुछ नहीं लगी है. छूट तो आपको लगी होगी, क्योकि ये भैस आपके ऊपर जो गिरी थी. (हँसते हुवे)

मनीषा- (घोरकर) दिदिया. तुम मेरी साइड हो या उसकी साइड. हे भगवान् मेरा तो कोई है hi नहीं इस कलयुगी संसार में. मुझे उठा ले भगवन. मुझे नहीं रहना इन प्राणियों के बिच.

मनीषा की नौटंकी देखकर सभी हंस रहे थे. राघव के चेहरे पर भी मुस्कान आ गयी रानी जी ने मनीषा से कहा.

रानी जी- चलो मनीषा अब बस करो. बहुत हो गया तुम्हारा. कही भी शुरू हो जाती हो. ये तुम्हारा घर नहीं है मनीषा.

रानी जी की बात सुनकर मनीषा बुरा सा मुंह बनती है. सभी लोग फिर से हाल में बैठ जाते हैं. मोहित और जावेद को घर जाना था इसलिए वो खाना खाने चले गए. मनीषा को फिर से कुछ शरारत सूझी तो मनीषा सोफे पर कड़ी हो गयी और अपने हाँथ को माइक बनाकर बोली.

मनीषा- hello, hello, माइक टेस्टिंग hello. हाँ अटेंशन प्लीज. सभी सर्व सामान्य को सूचित किया जाता है और जैसा की आप सब जानते हैं की आज हमारी प्यारी दिदिया, सुन्दर दिदिया, थोड़ी सी नकचढ़ी दिदिया और बहुत hi ज्यादा गुस्सैल दिदिया का जन्मदिन है. आज मेरी दिदिया पूरे… कितने साल की हो गयी हो दिदिया. हाँ पूरे 52 साल की हो गयी हैं.

मनीषा की बात सुनकर सभी हंसने लगे. सरिता ने मनीषा को गुस्से से देखते हुवे कहा.

सरिता- अभी तो तुमको चोट लगी थी और बहुत दर्द भी हो रहा था. लगता है उसी का प्रभाव है की तुम्हारा दिमाग ठीक से काम नहीं कर रहा है.

मनीषा- ओह्ह्ह्हह, लगता है की मैंने कुछ ज्यादा बोल दिया. तो देवियों और सज्जनो. मैंने अभी जो अपनी दिदिया की उम्र 52 वर्ष बताई है वो बहुत ज्यादा हो गया है. मेरी दिदिया तो अभी 25 साल की हुई हैं. तो इस ख़ुशी के मौके पर क्यों न कुछ मस्ती मजाक और डांस गण हो जाये. क्या कहते हैं आप सब लोग.

राघव- लेकिन आप डांस कैसे करेंगी. आपको तो अभी कुछ देर पहले चोट लगी है न.

मनीषा- वो तो ठीक हो गयी.

राघव- ऐसे कैसे ठीक हो गयी.

मनीषा- तो आप क्या चाहते हैं की मेरी चोट आपसे पूछकर ठीक होती. बात करते हैं.

सरिता- मैंने कहा था न की इसे कुछ नहीं हुवा है. ये सब इसकी नौटंकी है. इसे यही काम बहुत अच्छी तरीके से आता है.

मनीषा- लगता है आप दोनों को कुछ ज्यादा hi तकलीफ हो रही है मुझे ठीक देखकर. अगर आप दोनों कहे तो मैं अपने हाँथ पेअर तुड़वाकर बैठ जॉन. मतलब एक भली चंगी लड़की देखि नहीं जा रही है दोनों को. खैर छोडो मैं आप दोनों की बातो पर ध्यान नहीं दूँगी. ये बताइये की आप सब तैयार हैं या नहीं.

सवी- मैं तो तैयार हूँ और मुझे लगता है की बाकि सब भी तैयार होंगे.

सरिता- मुझे कोई इंट्रेस्ट नहीं है इन सब में. मुझे नहीं खेलना ये गेम.

मनीषा- देखो न माँ. दिदिया क्या कह रही हैं.

सरिता- माँ से क्या बात कर रही हो. मुझसे बात कर. मैंने एक बार कह दिया न तो तुम्हे समझ में नहीं आ रहा है क्या. मुझे इंट्रेस्ट नहीं है इस गेम में.

निश्छल- (अपने मन में) क्या लड़की है ये यार. कितना गुस्सा करती है. मैं इसे कैसे सम्भालूंगा. ओह्ह्ह सीईट्ट. ये मैं क्या सोचने लगा. अगर इस बात की भनक भी इसे लग गयी तो ये मुझे कच्चा चबा जाएगी.

मनीषा- तुम चुपचाप बैठी रहो दिदिया. मैंने तुमसे तो नहीं कहा न. मैंने मम्मी से कहा है.

रानी जी- ये क्या है सरिता. मनीषा इतने प्यार से कह रही है और तुम नाराज़ हो रही हो.

सरिता- मेरी सच में इस गेम में रुचे नहीं है और मेरी इच्छ्हा भी नहीं हो रही है कोई गेम खेलने की. आप समझ सकती हैं न माँ.

सवी- चलो कोई बात नहीं. फिर कभी ये गेम वगैरह का प्रोग्राम हो जायेगा. चलिए अब सबसे पहले खाना खा लेते हैं उसके बाद सोना भी तो है. आप लोग सुबह से सफर में थके हुवे होंगे.

मनीषा- (सरिता को घूरकर) तुम बहुत बोरिंग प्राणी हो दिदिया. तुम्हारे मन का हो गया न. कभी तो खुल कर किसी चीज़ में इंट्रेस्ट दिखाया करो न. हमेशा मुझे नहीं खेलना मुझे नहीं खेलना करती रहती हो. (राघव को देखकर) तुम्हारे मन का भी हो गया न. तुम भी तो यही चाहते थे न

राघव- (मन में) क्या लड़की है यार. जॉब hi मन में आता है बोल देती है. ये भी नहीं सोचती के सामने वाला क्या सोचेगा. बेइज्जती कर देती है एकदम से. इससे बचकर रहना पड़ेगा. जब तक ये यहाँ पर है मैं इससे दूर hi रहूँगा.

निश्छल- (मन में) क्या बात बोल दी तुमने छोटे मिया. कौन कहता है की तुम्हारी दीदी को किसी चीज़ में इंट्रेस्ट नहीं है. गुस्सा करना और थप्पड़ मरना इन दोनों में बहुत अच्छी तरह से इंटरेस्ट लेती है.

सरिता- दी. मैं सोच रही थी की खाना खाकर मैं सभी को लेकर अपने रूम पर चली जाउंगी. आप बिलकुल भी परेशां न हो.

सवी- क्यों. यहाँ रुकने में क्या बुराई है. आज यही रुक जाओ. कल सुबह नाश्ता वगैरह करके चली जाना. आज सब लोग साथ में हैं तो कितना अच्छा लग रहा है. रोज कहा अंकल, आंटी से मुलाकात होगी. प्लीज आंटी जी आज यही पर रुक जाइये न. कल सुबह चली जाइएगा.

रानी जी- अरे बिटिया तुम्हे प्लीज कहने की जरूरत नहीं है. जैसे मनीषा और सरिता मेरी बेटी हैं. वैसे तुम भी तो मेरी बेटी hi हो. हम आज रात यही रुकेंगे.

रानी जी की बात सुनकर सविता खुश हो जाती है. फिर सभी लोग मिलकर खाना कहते हैं. सरिता आज अपनी माँ के साथ hi सोई उनसे लिपटकर. इतने महीने बाद अपनी मान के आँचल में लिपटकर उसे सुकून की नींद आयी. उसके बगल में मनीषा सो रही थी. आनंद जी निश्छल के साथ उसके कमरे में सोने के लिए चले गए.



इसके आगे की कहानी अगले भाग में..
 
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