इन्सेस्ट रिश्ता - Page 10 - SexBaba
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इन्सेस्ट रिश्ता

अपडेट 45

उसके बाद वो स्टेशन पर पंहुचकर टैक्सी से घर आ गए. टैक्सी में दोनों बहुत hi करीब बैठे थे और उनकी टंगे आपस में रगड़ खा रही थी. घर पंहुचकर रुचिका अपनी माँ से मिलकर और अपने को थका हुआ बोलकर अपने रूम में चली गयी और मोहनलाल संध्या के साथ अपने रूम में आ गया.

संध्या ने मोहनलाल से खाने के बारे में पूछा तू उसने बताया की खाना ट्रैन में hi खा लिया था. संध्या ने पूछा की 'टूर कैसा रहा' तू मोहनलाल ने कहा की 'मेरे लिए तू नार्मल टूर था, बेटी से पूछना की उससे कैसा लगा'

संध्या ने कहा 'क्योँ आपने उससे नहीं पूछा की उससे टूर कैसा लगा' तब मोहनलाल ने कहा 'मुझे तू वो अच्छा hi बताएगी, हाँ वो तुम्हारे साथ जयादा नज़दीक है तू तुम्हे जयादा अच्छा बताएगी की उससे टूर कैसा लगा, चलो अब सोते हैं, मुझे कल जल्दी निकलना है'

संध्या ने कहा 'ये भी कोई बात हुई, अभी तू आये हो और अब कल जाने की बात कर रहे हो'

मोहनलाल 'क्या करूँ, काम के लिए तू जाना hi पड़ेगा न, वो तू अगर रुचिका साथ नहीं होती तू शायद मैं वंही से hi चला जाता, लेकिन उससे छोड़ने के लिए आ गया'

संध्या 'अब जब आपको जाना hi है तू मई कर भी क्या सकती हु, चलो आप अब आराम करो' ये कहकर उसने लाइट बंद कर दी और वो भी मोहनलाल के पास लेत गयी. मोहनलाल भी सोने की कोशिश करने लगा.

अब कहानी थोड़ा प्रेजेंट में चलेगी

मोहनलाल असल में भी जो रुचिका के साथ पुणे में था, नींद के अघोष में चला गया और रुचिका को गले लगाया लगाए hi सो गया.

चलो इन दोनों को हम यही छोड़कर आदित्य और संध्या के पास चलते हैं.

उसकी बात सुनकर वो दोनों hi हंसने लगे और इधर आदित्य कुछ कुछ अंग्रेजी के वर्ड्स सीखता रहा और घुटने पर इस तरह से मालिश कर रहा तह जिससे संध्या की उत्तेजना को बढ़ावा मिले, ताकि उसके मुंह से सिसकारियां संकर आदित्य को मजा आ रहा था और वो उसकी खूबसूरती में खोया हुआ था. काफी देर के बाद दोनों को नींद आने लगी तू आदित्य अपने कमरे में चला गया और अब वो दोनों सोने की तयारी कर रहे थे.

आदित्य सोते हुए सोच रहा था उसे क्या करना चाहिए क्यूंकि अब वह धीरे धीरे अपनी माँ की तरफ आकर्षित होने लगा था और उसके मन में कुछ कुछ नयी फीलिंग्स जन्म ले रही थी. वह बहुत कुछ सोच रहा था और सोचते सोचते कब नींद के आगोश में चला गया उसी पता hi नहीं चला और उधर संध्या में एक नै ऊर्जा का संचार हो रहा था और उस नयी ऊर्जा के साथ वह भी निद्रादेवी की गॉड में चली गई.

अगली सुबह आदित्य उठकर एक्सरसाइज करने लगा, लेकिन आज उसका एक्सरसाइज से धयान बार बार भांग हो रहा था. एक्सरसाइज करते हुए भी उसका ध्यान बार बार भटक कर अपनी माँ पर चला जाता जिससे एक्सरसाइज करने में दिक्कत होने लगी. थोड़ी देर बाद एक्सरसाइज छोड़कर वापस कमरे में आकर बीएड पैर लेट गया और ऑंखें बंद करके लेटने की कोशिश करने लगा. उसे यहाँ भी सफलता नहीं मिली और लेट कर भी उसके मन में अपनी माँ संध्या का चेहरा सामने नज़र आने लगा और उसे समझ नहीं आ रहा था ऐसा क्यों हो रहा है. काफी देर तक बीएड पर लेता रहा, लेकिन उसके ख्यालों से उसकी माँ नहीं निकली.

आदित्य बाथरूम में जाकर निथ्य करम करने के बाद नहाने के लिए शावर के निचे गया तू जैसे hi उसके शरीर पर पानी पड़ा तू उसे आनंद आने लगा और उसे आनंद में एक बार फिर से अपनी माँ दिखाई देने लगी उसने अपनी आँखें बंद कर ली. आँखे बंद करते hi उसने सोचा की उसकी माँ का चेहरा गायब हो जाएगा लेकिन हुआ कुछ उल्टा hi. उसकी माँ के चेहरे पर कशिश उसे अपनी और खींचने लगी और उसका मन अपने आप hi माँ के चेहरे की कशिश में खोने लगा. उसके दिल में हलचल मचने लगी और उसका मन कर रहा था की उस चेहरे को अपने आप से दूर न जाने दे. वो सोचने लगा की उससे क्या होता जा रहा है और इस चेरे को अपने से दूर नहीं जाने देना चाहता था, लेकिन वो अभी कुछ और सोचता उसकी माँ की आवाज़ आयी 'आदित्य, जल्दी आ जाओ, नाश्ता तैयार है'

आदित्य अपनी सोचो को एक तरफ रखते हुए जल्दी से शावर लेकर बाथरूम से बहार आया और कपडे पहन कर तैयार हो कर कमरे से बहार आया और ड्राइंग रूम में आ गया.

ड्राइंग रूम में आकर वो देखता है की उसकी माँ दिंनिंग टेबल पर ब्रेकफास्ट लगा रही थी. उसने अपनी माँ को देखते hi 'गुड मॉर्निंग' बोलै तू संध्या ने भी स्माइल करते हुए उसे 'गुड मॉर्निंग' कहती है. आज उसकी माँ कुछ जयादा. hi सुन्दर लग रही थी. वैसे तू संध्या बहुत. खूबसूरत थी, लेकिन आज ऐसा लग रहा था की शायद आदित्य का अपनी माँ को देखने का नजरिया बदल गया था जिस वजह से वो उससे आज कुछ जयादा hi सुन्दर लग रही थी. उसका मन नहीं हो रहा था की वो अपनी माँ से नज़र हटाए, लेकिन उसके मन में कनिह न कनिह ये दर भी था की उसकी माँ बुरा न मान जाये, इसलिए अपनी नज़रो को न चाहते हुए भी उसके चेहरे से हटा लिया.

संध्या ने आज आलू के परांठे बनाये थे जो उसने प्लेट में डालकर आदित्य को खाने के लिए कहा तू आदित्य को पता नहीं क्या हुआ उसने प्लेट में से परांठे का एक टुकड़ा तोड़कर उसमे दही लगा कर अपनी माँ के मुंह की तरफ ले जाकर बड़े प्यार से खाने के लिए कहा तू संध्या ने पूछा 'क्या बात है, आज बड़ा प्यार आ रहा है'

आदित्य 'आज hi क्योँ, प्यार तू आपसे हमेशा hi है. वो आज आप पहली बार फिर से पढ़ने जा रही है तू मेरे दिल ने कहा की आपको आज अपने हाथ से खिलौन जैसे कभी आप मुझे खिलाती थी' और फिर संध्या को वो टुकड़ा खिला दिया. फिर दूसरा टुकड़ा भी खिला दिया. दूसरा टुकड़ा खिलते हुए आदित्य के हाथ की उँगलियों ने संध्या के होठों को छुआ तू आदित्य को एक करंट लगा जिससे उसकी उत्तेजना बढ़ने लगी और उधर संध्या उससे इस तरह कहते हुए भावुक होने लगी.

आदित्य ने जब देखा की उसकी माँ के आखें नाम हो गयी हैं तू उसने अपनी उँगलियों के पोरों से उसकी नमी को हटते हुए पूछ 'क्या हुआ' तू उसकी माँ ने कहा 'कुछ नहीं, बस ऐसे hi, इतने प्यार से मुझे आज तक कभी किसी ने नहीं खिलाया तू तुम्हारा प्यार देखकर ख़ुशी से मेरी आँखें नाम हो गयी'

उसकी बात सुनकर आदित्य बड़े प्यार से उसके गलो को सहलाते हुए 'अगर ऐसी बात है तू आज से आप को रोज मैं hi खिलाया करूँगा' जिससे सुनकर संध्या और भी भावुक हो गयी और उसकी आँखों से आंसू निकलने लगे तू आदित्य उठकर संध्या की कुर्सी के पास जाकर उसके आंसुओं को अपने हाथों से साफ़ करते हुए उसके नरम नरम गलों को सहलाते हुए कहने लगा 'आप शांत हो जाइये और आज से मैं आपको रोज खिलाऊंगा'

संध्या ने उसकी बाज़ू पकड़ कर कुर्सी पर बैठने के लिए कहा और फिर अपने हाथ से वो भी आदित्य को खिलने लगी, जिससे आदित्य को मज़ा आने लगा और वो संध्या को आज एक अलग hi नज़र से देखने लग जाता. संध्या जैसे hi उससे खिलने लगती तू आदित्य की कोशिश होती की वो अपनी माँ की उँगलियों को अपने मुंह से स्पर्श कर सके और जब वो संध्या को खिलता तू उसका मन करता की उसके होठों को छू सके. इस खेल में वो दोनों तरफ से मज़े ले रहा था. ऐसा करते करते दोनों ने ब्रेकफास्ट ख़तम किया और चलने के लिए बहार आ गए.

आदित्य बाइक ले आया और संध्या आज कुछ अलग hi लग रही थी. उसके पहनावे से कोई नहीं कह सकता था की वो आदित्य की माँ हो सकती है. वो 20 से 25 के बिच की लग रही थी. उसके आत्मविश्वास ने उसके चेहरे पर एक नयी उमंग लेकर उसके चेहरे से एक अलग तरह की आभा का एहसास होता था. आदित्य ने उसे अपनी बाइक पर बिठाया तू वो कुछ ज्यादा hi मस्ती में लग रही थी क्योकि वो आदित्य से काफी सात के बैठी थी और अपनी चूचिया को उसकी पीठ पर लगा ली थी. उसकी चूचियों का आदित्य को जैसे hi अपनी पीठ पर एहसास हुआ तू उसकी उत्तेजना बढ़ने लगी, लेकिन अपनी उत्तेजना पर काबू पते हुए उसने बाइक आगे बढ़ा दी. संध्या का एक हाथ आदित्य के कंधे पर था जिससे बाइक के चलते hi वो आदित्य के ऊपर लड़ सी गयी. आदित्य, जिसके मन में अपनी माँ के प्रति सुबह से hi अलग भाव आ रहे थे, उसके इस तरह लड़ने से उसके मनोभावों को आग देने में कोई कसार बाकि नहीं रह गयी थी.

आदित्य अपने hi ख्यालों में गम था की संध्या ने पूछा 'तुम अब मुझे छोड़कर कॉलेज जाओगे'

आदित्य 'हाँ माँ'

संध्या 'माँ नहीं, संध्या'

आदित्य 'क्योँ माँ'

संध्या 'लगता है भूल गए की मैं अब तुम से उम्र में छोटी हु और तुम्हारी माँ नहीं हो सकती'

आदित्य 'लेकिन हो तू मेरी माँ hi न'

संध्या 'हमने डीडे किया था की मैं तुम्हारी रिश्तेदार हु और मुझे संध्या कहकर पुकारोगे'

आदित्य को उसकी बात सुनकर एक अजीब सी फीलिंग आ रही थी, लेकिन प्रत्यक्ष में उसने कहा 'ठीक है कोशिश करूँगा'

संध्या 'कोई कोशिश नहीं, मुझे संध्या बोलना hi होगा और जब तक मुझे संध्या नहीं बोलोगे मैं आज बाइक से नहीं उतरूंगी'

आदित्य ने बड़ी मुश्किल से अपने को सँभालते हुए 'Sa...aa..n..dh..ya'

संध्या 'अब से मुझे मेरे नाम से hi बुलाओगे'

आदित्य 'कोशिश करूँगा'

ऐसे hi बातें करते करते वो दोनों उस जगह पंहुच गए जंहा पर संध्या को जाना था. वंहा पंहुच कर आदित्य ने अपनी माँ से कहा 'संध्या आपका इंस्टिट्यूट आ गया है, बेस्ट ऑफ़ लक'

संध्या स्माइल करते हुए 'थैंक्स, लेकिन मुझे आप नहीं अब से तुम बोलोगे क्योँकि मैं नहीं चाहती की लोगों को हमारे रिश्ते का पता चले, अब से मैं उम्र में छोटी होने के कारन मुझे संध्या और तुम कहकर hi पुकारोगे'

आदित्य 'कोशिश करूँगा, अभी आप जाओ एंड टेक केयर' संध्या उसकी बात सुनकर मुंह बनाये हुए हंस दी और चली गयी और आदित्य उससे तब तक देखता रहा जब तक वो उसकी नज़रो से ओझल नहीं हो गयी.
 
अपडेट 46

संध्या स्माइल करते हुए 'थैंक्स, लेकिन मुझे आप नहीं अब से तुम बोलोगे क्योँकि मैं नहीं चाहती की लोगों को हमारे रिश्ते का पता चले, अब से मैं उम्र में छोटी होने के कारन मुझे संध्या और तुम कहकर hi पुकारोगे'

आदित्य 'कोशिश करूँगा, अभी आप जाओ एंड टेक केयर' संध्या उसकी बात सुनकर मुंह बनाते हुए हंस दी और चली गयी और आदित्य उससे तब तक देखता रहा जब तक वो उसकी नज़रो से ओझल नहीं हो गयी.

संध्या के जाते hi आदित्य वहां से अपने कॉलेज के लिए निकल गया और कॉलेज पहुँच कर वह सीधा क्लास में चला गया. क्लास में उसका मन नहीं लग रहा था क्यूंकि उसके ध्यान में सिर्फ और सिर्फ उसकी माँ थी. कब क्लास ख़त्म हुई उसे पता hi नहीं चला क्यूंकि अगले दो पीरियड खली थे तू स्टूडेंट्स क्लास से बहार जाने लगे, लेकिन आदित्य वहीँ पैर बैठा रहा और उसे पता hi नहीं चला. श्रुति (यह वही स्मार्ट सी लड़की है जो आदित्य की माँ से रेस्टोरेंट में मिली थी और यह मन hi मन आदित्य से प्यार करती है) की नजर जब आदित्य पर पड़ी उससे बेख्याली में पाया तो वह उसके पास जाकर आने लगी 'आदित्य कहाँ खोये हो' लेकिन आदित्य ने कोई जवाब नहीं दिया बल्कि उससे पता hi नहीं चला की कोई उसके पास आकर खड़ा हो गया. श्रुति को उसका व्यव्हार कुछ अजीब लगा तो उसने चुटकी बजा कर उसका ध्यान अपनी तरफ करने की कोशिश की, लेकिन फिर भी आदित्य अपने ख्यालों में खोया रहा.

जब श्रुति ने देखा की आदित्य तस से ा मास्स नहीं हो रहा तू उसने आदित्य को कंधे से पकड़ कर जखज़ोर दिया जिससे आदित्य का ध्यान टुटा और उसने जब श्रुति को सामने खड़ा पाया तू उससे होश आया की वो कान्हा है. श्रुति ने उससे पूछा 'आदित्य क्या हो गया है, सब ठीक तू है न'

आदित्य 'क्या हुआ है?'

श्रुति 'तुम काफी देर से अपने आप में खोये हुए थे और आस पास का कोई होश hi नहीं था'

आदित्य 'वो मैं कुछ सोच रहा था, इसलिए शायद ध्यान नहीं रहा'

श्रुति ' वो तू सब ठीक है, लेकिन ये बताओ की परेशानी क्या है'

आदित्य 'क्लास कान्हा चली गयी'

श्रुति 'यही तू मैं कह रही हु की तुम इतना अपने आप में खो गए थे की होश hi नहीं रहा, ये सब कोई न कोई बहुत बड़ी परेशानी का कारन है, वैसे अगले दो पीरियड्स खली है इसलिए क्लास चली गयी'

आदित्य ' Okay, वैसे ऐसी कोई बात नहीं है, सब ठीक है'

श्रुति 'ठीक है नहीं बताना चाहते तू कोई बात नहीं, वैसे भी तुमने मुझे कब अपना मन है. चलो जैसी तुम्हारी मर्जी, तुम खुश रहो, मैं चलती हु'

आदित्य 'ी ऍम सॉरी, मैं तुम्हें अपनी परेशानी में नहीं उलझना चाहता'

श्रुति थोड़ा उदास होते हुए 'जैसी तुम्हारी मर्जी'

आदित्य 'देखो श्रुति तुम मेरी एक अच्छी दोस्त हो और मैं तुम्हे परेशान नहीं करना चाहता'

श्रुति 'एक तरफ दोस्त कहते हो और दूसरी तरफ मुझे अपनी परेशानी भी बताना चाहते'

आदित्य 'चलो कैंटीन चलते हैं, वंही बताऊंगा'

श्रुति उसकी बात सुनकर खुश हो जाती है और जब वो दोनों कैंटीन जाते हैं तू बहुत साडी लड़किया मन hi मन श्रुति से ईर्ष्या करने लगती हैं क्योंकि वो सब भी मन hi मन आदित्य से प्यार करती हैं या करना चाहती हैं, लेकिन आदित्य तू किसी को अपने पास नहीं आने देता था. एक श्रुति hi थी जिससे कभी कभी वो बात कर लेता था लेकिन आज पहली बार उसके साथ कैंटीन आया था. श्रुति आदित्य से मन hi मन प्यार करती थी लेकिन कभी हिम्मत नहीं हुई थी की वो उसका इज़हार कर पाए क्योँकि वो जानती थी की आदित्य अपने आप में hi रहता है और इन् सब बातों से दूर है. वो तू इस बात में hi खुश थी की वो उससे काम से काम अपना दोस्त तू मंटा है.

इन्ही सोचों में वो दोनों कैंटीन में एक टेबल पर आकर बैठ गए और कॉफ़ी के लिए आर्डर कर दिया. उन दोनों के कई दोस्तों ने उन्हें जान बुझ कर आ आकर Hello करने लगे तू उन दोनों को लगा की यंहा वो बात नहीं कर पाएंगे. इसलिए कॉफ़ी पीटते हुए इशारों में गार्डन में जाने के लिए एक दूसरे से सहमत हो गए और जल्दी hi कॉफ़ी पीने के बाद एक एक करके वह दोनों अलग अलग वहां से निकलकर गार्डन में पहुँच गए.

गार्डन में पहुँच कर वह दोनों एक पेड़ की छाँव में जा कर बैठ गए तू श्रुति ने बिना वक़्त गवांये कहा 'हाँ अब बताओ क्या बात है'

आदित्य 'श्रुति जैसा की तुम जानती हो की मैं हमेशा अपने में मस्त रहता हूँ और कभी भी किसी से अपनी प्रोब्लेम्स को डिसकस नहीं करता, हाँ एक तुम hi हो जिससे मैं दोस्त मंटा हु. लेकिन मैं तुम्हें किसी भी परेशानी में नहीं डालना चाहता'

श्रुति 'परेशानी में डालने वाली कौन सी बात हो गई, अगर तुम अपनी परेशानी मुझे बताओगे तू हो सकता है मैं उसे सोल्वे कर पाऊं और अगर सोल्वे नहीं भी कर पायी तो काम से काम किसी से कह देने से दिल का बोझ काम हो जाता है इसलिए जो भी मन में है मुझे कह डालो'

आदित्य 'जैसा तुम जानती हो की मेरी रिश्तेदार जिससे तुम रेस्टोरेंट में मिली थी वह अब मेरे साथ रह रही है. मेरे लिए अपना खर्चा निकलना मुश्किल हो रहा था और अब उसके आ जाने से मुझे समझ नहीं आ रहा क्या करूँ'

श्रुति 'वैसे पूछना तो नहीं चाहिए लेकिन उसका खर्चा करना तुम्हे क्योँ करना पद रहा है'

आदित्य 'अब वह मेरे घर रह रही है तू मैं उस से थोड़ी न खर्चे के पैसे मांगूंगा'

श्रुति 'अगर तुम चाहो तो मैं तुम्हें एक अच्छी Part टाइम जॉब दिलवा सकती हु'

आदित्य 'नेकी और पूछ पूछ'

श्रुति 'अगर मैं तुम्हे जॉब दिलवा दू तू मुझे क्या मिलेगा'

आदित्य 'दोस्ती मैं मांग कर अपनी दोस्ती को छोटा मत करो, लेकिन जब तुमने मांगे hi लिया है जो कहोगी दूंगा'

श्रुति अपने चेहरे को नीचे करते हुए 'मैं जानती हूँ और इसलिए मजाक कर रही थी, तुम मेरे दोस्त हो यही मेरे लिए सबसे बड़ी बात है'

आदित्य 'थैंक्स मुझे समझने के लिए, वैसे कब जाना होगा जॉब के लिए'

श्रुति ने फ़ोन निकल कर किसी को फ़ोन करके आदित्य के बारे में बताया तू उसने कुछ जानकारियां ली और एक बजे आने के लिए कहा तू श्रुति ने उससे कहा की वो आ रहे हैं. उसने आदित्य को कहा की आज की क्लास छोड़कर वंहा चलते हैं. आदित्य को अच्छा तू लगा लेकिन उसने अपनी माँ को भी 2 बजे लेना था तू उसने सोचा की शायद उस वक़्त तक फ्री हो जायेंगे, इसलिए वो श्रुति के साथ जाने को तैयार हो गया और श्रुति का हाथ अपने हाथ में लेकर कहने लगा 'मैं तुम्हरा एहसान कैसे चुकूँगा'

श्रुति उसकी बात सुनकर गुस्सा हो गयी और बोली 'एक तरफ दोस्त कहते हो और दूसरी तरफ एहसान की बात करते हो, जाओ मैं अब तुमसे कभी बात नहीं करुँगी' ये बोलकर वो कड़ी होकर जाने लगी तू आदित्य को झटका लगा और उसे अपनी गलती का एहसास हुआ और वो भी जल्दी से खड़ा होकर उसके पीछे लपका और उसका एक हाथ पकड़ लिया. श्रुति अपने हाथ को छुड़ाते हुए कहने लगी 'छोडो मेरा हाथ'

आदित्य 'सॉरी, यार आगे से नहीं खाऊंगा"

श्रुति 'तुम मुझे अपना समझते hi नहीं हो'

आदित्य 'अगर मैं तुम्हे अपना नहीं समझता तो मैं अपनी परेशानी तुम्हारे साथ शेयर कभी नहीं करता'

श्रुति 'यह सब कहने की बात है'

उसकी बात सुनकर आदित्य को पता नहीं क्या हुआ उसने श्रुति को पकड़कर अपनी तरफ घुमाया और उसको हुग करते हुए उसके माथे को चुम लिया और कहा 'श्रुति, तुम मेरी बहुत प्यारी दोस्त हो और हमेशा राहोगीअगर तुम मुझसे नाराज हो गई मैं अपने आप को माफ़ नहीं कर पाउँगा'

श्रुति को जैसे hi आदित्य ने हुग किया तो श्रुति अपना सारा गुस्सा भूल गयी और वह मन में सोचने लगी एक दिन आएगा जब वह आदित्य को अपना बना लेगी और अपनी सोचो में उसने आदित्य को भी कसकर हुग कर लिया जिससे आदित्य को झटका लगा. श्रुति की मध्यम साइज की चूचियों ने जैसे hi आदित्य के सीने में स्पर्श किया तू आदित्य के अरमान जो पहले से hi अलग दिशा में जा रहे थे उन्हें हवा दे दिया और उसका रकत परवाह बढ़ने लगा. इस से आगे कुछ होता आदित्य ने अपने ऊपर कण्ट्रोल करते हुए श्रुति से कहा 'अगर किसी ने हमें ऐसे hi किसी ने गले लगे हुए देख लिया तू यही कहेंगे की आदित्य और श्रुति में कुछ चल रहा है और इसमें अगर तुम्हारी बदनामी हुई तू मैं किसी कीमत पैर बर्दाश्त नहीं कर पाउँगा'

श्रुति 'अगर ऐसा होता है तू मैं अपनी बदनामी झेलने के लिए भी तैयार हु'

आदित्य उससे अपने से दूर करते हुए 'क्या कह रही हो, तुम मेरी दोस्त हो और मेरे लिए ये दुब मरने वाली बात होगी की मैं तुम्हारी बदनामी का कारन बनु'

श्रुति ने अपने चेहरे पर सरे जहाँ की मासूमियत लेट हुए कहा 'मुझे अपनी गर्लफ्रेंड बना लो तू मुझे सब मंज़ूर है'

आदित्य 'अरे यू सीरियस'

षुरूति 'मुझे लगा था की तुम्हे अब तक समझ आ गया होगा'

आदित्य हक्काबक्का सा उससे देखने लगा और फिर वो उससे कहने लगा 'श्रुति तुम मेरी दोस्त हो और दोस्त का दर्जा गर्लफ्रेंड से कनिह ऊँचा होता है, इसलिए उस दर्जे को नीचे न लाओ'

श्रुति 'मुझे तू ऐसा नहीं लगता और अगर ऐसा है भी तू भी मुझे उसमे भी कोई परेशानी नहीं है'

आदित्य 'अभी चलें या और कुछ बहस करनी है'

श्रुति ने आदित्य का हाथ पकड़ कर कहा 'चलो जंहा ले जाना चाहते हो'

आदित्य 'अभी तो तुम मुझे ले कर जा रही हो'

ऐसे hi नोक झोंक करते हुए वो दोनों पार्किंग में आ गए तू आदित्य ने बाइक निकली और श्रुति आदित्य के पीछे अपनी टंगे दोनों तरफ करके उसके पीछे बैठ गयी और आदित्य के कन्धों को पकड़ लिया और वो आदित्य को रास्ता बताने लगी. श्रुति आज बहुत खुश थी की उससे आदित्य के साथ पहली बार वो भी इस तरह जाने का मौका मिला था. कई बार ब्रेक लगने से वो खिसक कर आगे हो जाती थी और उसकी तानी हुई छातियाँ आदित्य की पीठ पर टकराती तू उसकी चूचियों का एहसास आदित्य की भावनाओं को भड़का देती थी. आदित्य को ऐसा लगता था की उसकी माँ संध्या जैसे उसके पीछे बैठी हो और उसकी चूचियों का स्पर्श उससे अपनी पीठ पर हो रहा हो. फिर उससे लगता की उसकी माँ की चूचियां छोटी कैसे हो गयी हैं. ये बात उसके डिमै में आते hi वो चौक्कना हो जाता की पीछे उसकी माँ नहीं बल्कि श्रुति है. उससे ये दर लग रहा था की कनिह उसके मुंह से उसकी माँ का नाम न निकल जाये. जैसे कैसे वो दोनों उस ऑफिस में पंहुच गए थे.

वो दोनों वक़्त से काफी पहले आ गए थे. उन्होंने पता लगाया की अभी मीटिंग चल रही थी और मीटिंग ख़तम होने पर hi उनकी मुलाक़ात हो सकती थी. रिसेप्शनिस्ट ने उन्हें वेट करने के लिए कहा तू उन्होंने पूछा की क्या वंहा पर कैंटीन है तू उसने बताया की फोर्थ फ्लोर पर है. वो दोनों अपना नंबर देकर कैंटीन में आ गए और एक टेबल पर बैठने के बाद कुछ आर्डर किया और वेट करने लगे. श्रुति आदित्य को बड़े प्यार से देखे जा रही थी. उसके इतने प्यार से देखने की वजह से आदित्य को अच्छा भी लग रहा था लेकिन साथ hi परेशान भी हो रहा था. उससे तू आज बार बार अपनी माँ की याद आ रही थी. काफी देर वंही बैठे रहे लेकिन नीचे से कोई कॉल नहीं आया और समय बीतता गया.

कोई 1.40 पर एक फ़ोन आदित्य के मोबाइल पर आया तू उसकी माँ बोल रही थी की वो उससे कब लेने आएगा तू आदित्य ने बताया की उससे देर हो जाएगी और वो घर चली जाएँ. उसकी माँ को अच्छा नहीं लग रहा था की पहले hi दिन आदित्य ने उससे धोखा दे दिया है पर प्रत्यक्ष में यही कहा 'ठीक है'

आदित्य के मन से थोड़ा भोझ काम हुआ, लेकिन वो क्या जनता था की उसकी माँ उससे नाराज़ हो गयी है.

कुछ देर और इंतज़ार करने के बाद उन्हें बुलाया गया तू बे दोनों नीचे आये और उस ऑफिस में आ गए. अंदर ऑफिस में कोई 35-40 साल की महिला कुर्सी पर बैठी थी जो बहुत hi जयादा ग्रेसफुल थी और उसके आव भाव और चेहरे से नूर टपक रहा था. कोई उससे देख ले तू उसके चेहरे से नज़र hi न हटा पाए क्योँकि उसके चेहरे में कोई न कोई चुंबकीय शक्ति थी. जब हम अंदर आये तू श्रुति जाकर उससे गले मिली और आदित्य का परिचय करवाया की 'ये आदित्य हैं, क्लास के टोपर और इनका प्रोजेक्ट भी वही है जिस तरह के व्यक्ति की आपको तलाश थी'

मैडम का नाम िरा था और उसने बोलना शुरू किया 'आदित्य, देखो श्रुति तुम्हे यंहा लेकर आयी है तू कोई न कोई ख़ास बात तू तुमने होगी. मैं तुम्हारा इंटरव्यू न लेते हुए सीधा मुद्दे पर आउंगी. हमारी कंपनी कई तरह के सॉफ्टवर्स बनती है लेकिन हमारे कॉम्पिटिटर्स उन्हें सिक्योरिटी इश्यूज की वजह से चुरा लेते हैं. हमें ऐसा कोई व्यक्ति चाहिए जो उन सॉफ्टवर्स में सुधर कर दे ताकि कोई उससे चुरा न पाए और साथ hi वो व्यक्ति विश्वास पातर भी होना चाहिए'

आदित्य 'मैं ये सब कर सकता हु और जंहा तक बात विश्वास की है तू वो तू आपको मुझे परखने के बाद hi पता लगेगा. वैसे एक बात अपने बारे में कह सकता हु की मैं सिर्फ और सिर्फ इम्मंदारी में विश्वास रखता हु'

िरा मैडम 'गुड, आपका कॉन्फिडेंस देखकर मुझे अच्छा लगा. अब आपके पास दो ओप्तिओंस हैं, पहला आप यंहा एक फिक्स्ड टाइम पर आ जाओ और फिक्स्ड सैलरी लो और दूसरा सॉफ्टवेयर के हिसाब से एक फिक्स्ड अमाउंट मिलेगा और यंहा आने की भी जरुरत नहीं है'

आदित्य 'मैं दूसरे ऑप्शन को चुनुँगा'

िरा मैडम ने किसी को बुलाया और उससे कुछ इंस्ट्रक्शंस दी और फिर उसने एक डेमोंस्ट्रेशन दी. डेमोंस्ट्रेशन के बाद मैडम ने प्रॉब्लम बताई तू आदित्य स्माइल करने लगा. उसकी स्माइल देखकर िरा मैडम ने कहा 'ठीक है आपकी पहली असाइनमेंट के एक लाख मिलेंगे'

आदित्य 'मैडम मैं कर तू दूंगा, लेकिन मुझे लैपटॉप चाहिए होगा और अगर कुछ एडवांस मिल जाये तू आपकी बड़ी मेहरबानी होगी'

िरा मैडम 'मैं अगर आपकी बातें मान लेती हु और आप नहीं कर पाए तू'

आदित्य 'ऐसा हो hi नहीं सकता, फिर भी अगर हो जाता है तू आप मुझे कोई भी सजा दे सकती हैं'

िरा मैडम उसके कॉन्फिडेंस से बहुत प्रभावित हुई और किसी को बुला कर एक नया लैपटॉप और 10000 रुपैया उससे दे दिया और पूछा की कब तक प्रॉब्लम सोले हो जाएगी

आदित्य 'मैडम आप कब तक चाहती हैं'

िरा Madam'Jaldi से जल्दी'

आदित्य 'अगर मैं इससे कल कर देता हु तू क्या आप मुझे फिर भी एक लाख देंगी'

िरा मैडम 'अगर आप इससे अभी सोल्वे कर दो तू मैं आपको अभी एक लाख दे दूंगी'

आदित्य 'आप मुकुर तो नहीं जाएँगी'

िरा मैडम 'अगर आप ने ये आज कर दिया तू ये लैपटॉप भी आपका'

आदित्य 'मैडम अभी तू मैं श्रुति के साथ आया हु और मुझे इनको छोड़कर आना पड़ेगा'

िरा मैडम 'आप चिंता न करें, श्रुति मेरे पास रहेगी और जरुरत पड़ी तू मैं इससे छोड़ दूंगी'

आदित्य ने श्रुति की तरफ देखा तू उसने अपनी सहमति दे दी तू उसने कहा 'मैडम मुझे कोई एकांत कमरा मिलेगा'

िरा मैडम ने किसी को बुलाकर समझाया और आदित्य उस के साथ चला गया और वंहा जाकर अपने काम में जुट गया.

इधर िरा मैडम 'श्रुति, ये बता कर तू लेगा न'

श्रुति 'आप बस देखते जाओ, ये बहुत hi होशियार है और आपको निराश नहीं करेगा'

िरा मैडम 'अगर ऐसा हुआ तू ये बहुत पैसे कमायेगा. अच्छा ये बताओ क्या लोगी'

श्रुति 'वैसे तू हम कैंटीन में थे, लेकिन मैं आपको कैसे मन कर बसाक्ति हु'

कोई दो घंटे के बाद आदित्य वापिस आया और लैपटॉप पर प्रेजेंटेशन देने लगा. मैडम ने दूसरे एक्सपर्ट्स को बुलाया और उससे चेक करने के लिए बोलै और कोई भी उसमे कमी नहीं निकल पाया तू िरा मैडम खुश हो गयी और आदित्य को बाकि 90 हज़ार रुपैया का चेक दे दिया तू वो बहुत खुश हुआ. फिर वो वंहा से विदा लेकर बहार आये तू आदित्य की ख़ुशी का ठिकाना नहीं था.

बहार आकर उसने श्रुति को थैंक्स कहा और उससे ट्रीट देने के लिए कहा तू उसने कहा बाद में लेंगे, अभी तू बस घर छोड़ दे. उससे घर छोड़ कर वो अपने घर के लिए निकल पड़ा. घर पहुंचे के बाद उसने बेल्ल बजायी......
 
अपडेट 47

बहार आकर उसने श्रुति को थैंक्स कहा और उससे ट्रीट देने के लिए कहा तू उसने कहा बाद में लेंगे, अभी तू बस घर छोड़ दे. उससे घर छोड़ कर वो अपने घर के लिए निकल पड़ा. घर पहुंचे के बाद उसने बेल्ल बजायी......

संध्या जो बीएड पैर लेट कर अपनी सोचो में खोयी हुई थी बेल्ल बजने पैर और षड़बड़ा गयी और उसी हड़बड़ाहट में दरवाजा खोलने के लिए चली गयी. दरवाजा खोलने पैर सामने आदित्य खड़ा था. संध्या दरवाजा खोल कर आदित्य को देख कर बिना कुछ कहे मुद कर वापस चली गयी. आदित्य को समझ नहीं आया उसकी माँ ऐसे कैसे वापस चली गयी और उसके इस तरह जाने से आदित्य का ख़ुशी से मुस्कुराता हुआ चेहरा फीका पद गया. उससे लगने लगा की उसकी माँ उससे नाराज है.

आदित्य अपनी माँ के पीछे पीछे उसको मानाने के लिए चल पड़ा. जब वो अपनी माँ के कमरे में पंहुचा तू देखा की उसकी माँ बाद पैर बैठी हुई थी और ऐसा लग रहा था जैसे वो बहुत परेशां हो. आदित्य माँ के पास जाता है और बड़े धीरे से कहता है 'माँ आप उदास क्यों बैठी हो' संध्या ने उससे कोई जवाब नहीं दिया तो आदित्य ने दूसरी बार पूछा तो संध्या ने कहा 'तुम्हें क्या फर्क पड़ता है मैं जियु या मरू'

आदित्य उसकी बात सुनकर एकदम से परेशां हो गया और उसे लगा उसे की माँ उससे बहुत ज्यादा नाराज है तो उसने अपने मनोभावों को चुपहाते हुए बड़े प्यार से कहा 'आप ऐसा क्योँ कह रही हैं'

संध्या 'और क्या कान्हू, मेरी तू किसी को चिंता hi नहीं हैं'

आदित्य 'मैं आपकी चिंता नहीं करता क्या, आप ऐसा क्योँ कह रही हो'

संध्या 'अगर मेरी चिंता होती तू क्या मुझे लेने नहीं आते'

आदित्य 'मैं वाकई में उस वक़्त बिजी हो गया था और आपको अगर मेरे न आने से बुरा लगा हो तू ी ऍम सॉरी'

संध्या 'मैं सब समझती हु, किसी गर्लफ्रेंड के साथ बिजी होंगे, इसलिए मुझे लेने नहीं आये'

आदित्य को समझ आ गया की उसकी माँ उसके न आने से नाराज है तू उसने मज़े लेते हुए कहा 'इसमें कोई दो राइ नहीं की मैं उस वक़्त किसी फ्रेंड के साथ था'

संध्या 'और वो फ्रेंड लड़की hi होगी'

आदित्य 'हाँ ये भी सच है की वो लड़की hi है'

आदित्य की बात सुनकर संध्या कुछ गुस्से और उदासी में 'मुझे पहले से hi पता था की किसी गर्लफ्रेंड के छाकर में मुझे भूल गए होंगे'

आदित्य 'आपको ऐसा क्योँ लगा रहा है'

संध्या 'और क्या कान्हू जब तुम खुद hi उसकी पुष्टि कस्र रहे हो की किसी गर्लफ्रेंड की वजह से मुझे लेने नहीं आये'

आदित्य 'माँ आप भी न, मैंने ये कहा है की मैं किसी फ्रेंड के साथ बिजी था जो की लड़की है लेकिन ये नहीं कहा की उसकी वजह से आपको लेने नहीं आया'

संध्या 'मैं सब समझ रही हु तुम गर्लफ्रेंड के छाकर में मुझे भूल गए और अब बातों में उलझा कर मुझे समझने की कोशिश कर रहे हो'

आदित्य 'माँ आपको ऐसा क्योँ लग रहा है'

संध्या 'लग रहा है! लग नहीं रहा बल्कि ये तू कन्फर्म है की किसी गर्लफ्रेंड के छाकर में मुझे लेने नहीं आये'

आदित्य 'माँ अगर मैं आपको बताऊंगा की मैं क्योँ नहीं आ पाया तू आप खुश हो जाएँगी'

संध्या 'क्या मैं इस बात से खुश हो जॉन की तुमने अपने लिए गर्लफ्रेंड ढूंढ ली है'

आदित्य 'मुझे समझ नहीं आ रहा की आप किस बात से परेशान हैं, मैं आपको लेने नहीं आ पाया या मैं आपके कहे अनुसार किसी गर्लफ्रेंड के साथ था'

संध्या 'दोनों hi बातों से'

आदित्य 'मैं आपको लेने नहीं आ पाया ये बात तू समझ आती है लेकिन मेरी कोई गर्लफ्रेंड है इस बात से आप क्योँ परेशान हैं'

संध्या 'एक तरफ कहते हो की मेरा तुम पर पूरा अधिकार है और दूसरी तरफ कहते हो की मुझे तुमसे नाराज भी नहीं होना चाहिए'

संध्या 'अब तुम सोचो की अगर तुम अपना वक़्त किसी गर्लफ्रेंड के साथ गुजरोगे तू मेरा ध्यान कैसे रखोगे'

आदित्य ने अपनी माँ के कन्धों को पकड़ कर 'माँ आप क्या चाहती हैं की मेरी कोई गर्लफ्रेंड न हो'

संध्या 'मैं यह कहना चाहती हु की मैं इस वक़्त अकेली हो चुकी हु और अगर तुम भी किसी गर्लफ्रेंड की वजह से मेरा साथ नहीं दे पाए तू मैं क्या करुँगी फिर तू मेरा जिन्दा रहना hi मुश्किल हो जायेगा'

आदित्य ने आगे बढ़कर अपनी माँ के पास बैठ गया और उसको अपने गले लगते हुए कहा 'माँ ये आप कैसी बातें कर रही हैं, मैं भला आपको अकेला क्योँ छोड़ दूंगा'

संध्या ने अपना चेहरा थोड़ा सा ऊपर उठाकर आदित्य को देखा तू उसकी आँखों में नमी थी और उसकी साँसों की गर्मी आदित्य को अपने चेहरे पर महसूस होने लगी और संध्या कहने लगी 'तुम अगर न भी चाहो लेकिन तुम्हारी गर्लफ्रेंड तुम्हे मुझसे अलग कर सकती है'

आदित्य 'क्या माँ आप भी न कैसी कैसी बातें करती हो, आपको ऐसा लगता है की मैं किसी की बातों में आकर ऐसा कर सकता हु'

संध्या 'मुझे अपनी किस्मत पर भरोसा नहीं है. मैं अब बिलकुल अकेली रह गयी हु और सोचो की अगर तुम भी चले गए तू मुझ जैसी अनपढ़ का क्या होगा. मैं तू कनिह की नहीं रहूगी' ये केहनार वो रोने लगी.

आदित्य अपना हाथ उसकी पीठ पर ले गया और उससे धीरे धीरे सहलाते हुए संध्या को चुप करने लगा और कहने लगा 'माँ मैंने पहले भी कहा था और अब भी कह रहा हु की आप को चिंता करने की कोई जरुरत नहीं है, मैं आपको अकेला कभी नहीं छोडूंगा'

संध्या ने रोटी हुए कहा 'जब तुम किसी गर्लफ्रेंड के छाकर में मुझे आज लेना भूल सकते हो तू मुझे अकेला भी छोड़ कर जा सकते हो'

आदित्य ने अपने हाथों को अपनी माँ के गलों पर लेजाकर उसकी आँखों से बहते हुए आसुओं को साफ़ करते हुए कहने लगा 'माँ आप चुप हो जाओ और मेरा विश्वास करो की मैं आपको कभी भी अकेला नहीं छोडूंगा'

संध्या ने अपना चेहरा आदित्य के कंधे पर रख दिया और अपने हाथ आदित्य की पीठ पर ले गयी और ऐसा लग रहा था की जैसे दोनों आलिंगन में हो. आदित्य को उसकी माँ की नरम नरम चूचियों ने जैसे hi स्पर्श किया उसके जज्बात भड़काने लगे और उन्ही जज्बातों के वशीभूत होकर उसके हाथों ने संध्या की पीठ पर दबाव बढ़ा दिया जिससे संध्या थोड़ा और जयादा आदित्य के आगोश में पंहुच गयी और आदित्य से कहने लगी 'क्या तुम्हारी गर्लफ्रेंड बहुत सुन्दर है'

आदित्य को अपनी माँ की बात सुनकर फिर से झटका लगा और उससे समझ आने लगा की उसकी माँ को कुछ काम्प्लेक्स हो रहा है तू उसने कहा 'माँ वो खूबसूरत तू बहुत है'

संध्या 'मुझे मालूम था की खूबसूरत गर्लफ्रेंड जो की पढ़ी लिखी भी हो तू फिर मेरी चिंता किस्से होगी'

आदित्य 'माँ आप मेरी पूरी बात तू सुन लो जो मैं कहना चाहता हु, आप तू सुने बगैर hi अपने मन में जो है बोल देती हो. वो खूबसूरत तू बहुत है, मेरी दोस्त भी है लेकिन....'

संध्या 'लेकिन क्या'

आदित्य 'अभी वो मेरी गर्लफ्रेंड नहीं है'

संध्या और थोड़ा आदित्य के नजदीक हो गयी जिससे आदित्य की हालत ख़राब होने लगी. संध्या ने नजदीक होते हुए अपने हाथों से आदित्य की पीठ को सहलाते हुए 'अभी वो तुम्हारी गर्लफ्रेंड नहीं है, सिर्फ दोस्त है तब तुम मुझे लेने नहीं आये और जब वो तुम्हारी गर्लफ्रेंड बन जाएगी तब क्या होगा'

आदित्य ने अपनी माँ की पीठ सहलाते हुए कहा 'माँ आप समझ नहीं रही हो, उस वक़्त मई वाकई बिजी था और मेरी उस फ्रेंड ने मेरी उस वक़्त मेरे लिए अपना कीमती वक़्त निकलकर मेरे लिए इनकम का ऐसा इंतज़ाम किया है की आप जानकर उससे बहुत खुश होगी'

संध्या 'उसने ऐसा क्या किया है की तुम उसके गुणगान करते जा रहे हो'

आदित्य 'माँ, मेरी उस फ्रेंड ने अपने कांटेक्ट से बातचीत करके मेरे लिए एक part टाइम जॉब के लिए बात की और जिस वक़्त आपको लेना था, मैं अपनी फ्रेंड के साथ उस ऑफिस में गया हुआ था और वंहा पर वेट कर रहा था, इसलिए आपको वापिस खुद जाने के लिए कहा था'

संध्या 'मिल गयी जॉब'

आदित्य 'माँ आप जॉब की बात कर रही हो, मेरा तू जैकपोट लग गया है' और फिर आदित्य ने जो भी हुआ पूरी बात बता दी. जिससे सुनकर जंहा एक तरफ संध्या खुश थी वंही अचंबित भी थी की कोई कैसे इतने सरे पैसे एक डैम दे सकता है और सोच में पद गयी.

उससे सोचो में डूबा देखकर आदित्य ने उसके कंधे को पकड़ कर हिलाया तू संध्या ने कहा 'इसका मतलब अब तुम उसके एहसान टेल दबकर उसकी हर बात मानोगे'

आदित्य 'क्या मतलब'

संध्या 'ये सब एक चल है, उसने तुम्हे बड़े hi तरीके से अपने जाल में फंसाया है'

आदित्य 'माँ आप भी न किसी की भलाई और अच्छे को इस तरह ज़लील करना अच्छी बात नहीं है'

संध्या 'अब वो लड़की तुम्हे मजबूर कर देगी की तुम उसके बॉयफ्रेंड बन जाओ'

आदित्य 'माँ ऐसा कुछ नहीं होगा'

संध्या 'क्योँ नहीं होगा तुम मुझे बताओ की अगर वो अपनी दोस्ती को कभी और मजबूत करते हुए उसको कोई नाम देना चाहे तू क्या तुम मन कर पाओगे?'

आदित्य सोचने पर मजबूर हो गया और संध्या के दुबारा पूछने पर कहने लगा 'शायद मैं मन न कर पौन, लेकिन ये भी सच है की हम दोनों बहुत अच्छे दोस्त हैं'

संध्या 'मैं भी तू यही कह रही हु की कल को मेरे लिए वक़्त hi नहीं होगा और मैं इस दुनिया में अब अकेली हो गयी हु'

आदित्य अपनी माँ की बात पर मंथन करते हुए और उसकी सिसकारियों को सुनकर आदित्य ने अपनी माँ के चेहरे को अपने दोनों हाथों में पकड़ते हुए उसकी आँखों में झांककर कहा 'माँ आप बार बार ये बात कहकर मुझे कमजोर कर रही हैं, मैंने एक बार आपको कह दिया है की मैं आपको कभी भी अकेला नहीं छोडूंगा'

संध्या 'तुम अपनी बात पर डटे रहने के लिए क्या कर सकते हो'

आदित्य 'माँ मैं आपके लिए कुछ भी कर सकता हु'

संध्या 'तू सबसे पहले मुझे माँ कहना बंद करो और मुझे असल में अपनी गर्लफ्रेंड बना लो'

आदित्य उसके चेहरे को देखता hi रहा की उसकी माँ ने ये क्या कह दिया. उससे चुप देखकर संध्या ने कहा 'मुझे मालूम है की तुम ये नहीं कर सकते'

आदित्य 'माँ आप हमारे रिश्ते को ख़तम करने के लिए कह रही हो'

संध्या 'मैं तू एक नया रिश्ता कायम करना छह रही हु'

आदित्य 'नए रिश्ते के लिए पुराने और अटूट रिश्ते को ख़तम करने की क्या जरुरत है'

संध्या 'मुझे इस की सख्त जरुरत है, ये रिश्ता मेरे लिए गारंटी होगा की मैं अकेली नहीं रहूंगी'

आदित्य हंसने लगा 'माँ आप भी पता नहीं किस ज़माने के बात कर रही हैं. जिस रिश्ते की आप बात कर रही हैं उससे आजकल लोग कपड़ों की तरह बदलते हैं जबकि जो हमारा अटूट रिश्ता है वो कभी भी बदल नहीं सकता'

संध्या 'मैं सब जानती हु लेकिन अब तुम्हारे ऊपर है की मेरी बात मनो या न मनो'

आदित्य 'आप जिस तरह कर रही हैं उस तरह से आप मुझे मजबूर कर रही हैं और मज़बूरी में किया हुआ कोई फैसला कभी भी ख़ुशी नहीं देता लेकिन मैं आपके लिए कुछ भी करने के लिए तैयार हु, पर मेरी एक विनती है की आप मुझसे आप को माँ कहने का अधिकार न चाइनो'

संध्या 'तुम्हारा जो मन करे वो करो मैं कोई दबाव नहीं डालूंगी'

आदित्य 'आपको मालूम है की गर्लफ्रेंड बनने में बहुत सी मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा'

संध्या 'मैं तू तैयार हु, लेकिन मुझे लगता है की तुम मुझे गर्लफ्रेंड बनाकर खुश नहीं लग रहे'

आदित्य 'मैंने तू ऐसा कुछ नहीं कहा'

संध्या 'लेकिन हाँ भी तू नहीं कहा'

आदित्य 'मेरे पास कोई चॉइस है'

संध्या 'अगर मुझे गर्लफ्रेंड समझते हो तू फिर मुझे मेरे नाम से बुलाओ'

आदित्य 'ये कोई जरुरी है'

संध्या 'जरुरी तू बिलकुल नहीं है. ठीक है जब मन करे तब नाम से बुलाना'

आदित्य सोच में पद गया की क्या करे, वो तू वैसे hi हर जगह अपनी माँ को महसूस करने लगा था और अब तू ुड़का रास्ता बिलकुल साफ़ था क्योँकि उसकी माँ तू स्वयं उसकी गर्लफ्रेंड बनना के लिए उतावली थी. आदित्य ने सोचा मौका अच्छा है और उसने अपने मन में चल रहे द्वन्द को दरकिनार करते हुए बड़ी हिम्मत करके अपनी बांहे खोलकर अपनी माँ की तरफ देखते हुए जो की लगातार उससे hi देख रही थी को बोलै 'Ss...aaa...nn..dd.h..yaa' संध्या ने जब देखा की आदित्य उसकी तरफ बांहे फैलाकर उसके नाम से बुला रहा है तू वो जाकर उसकी बांहों में समां गयी तू आदित्य ने उससे अपने आगोश में कास लिया तू संध्या ने भी उसे अपनी बांहों में कास लिया
 
वेलकम तो थे थ्रेड.

आपने कहानी पढ़ी और आपको बहुत पसंद आयी ये ख़ुशी की बात है.

आपकी बात अपनी जगह ठीक है की अगला अपडेट कब आएगा राइटर की बता देना चाहिए, लेकिन ये किसी भी राइटर के लिए संभव नहीं है.

फिर भी मैं इतना hi कह सकती हु की जितना जल्दी हो सकता है मैं अगला अपडेट पोस्ट कर देती हु, बस थोड़ा सा पेशेंस रखिये, जल्दी hi अगला अपडेट मिलेगा.

धन्यवाद
 
अपडेट 48

आदित्य सोच में पद गया की क्या करे, वो तू वैसे hi हर जगह अपनी माँ को महसूस करने लगा था और अब तू उसका रास्ता बिलकुल साफ़ था क्योँकि उसकी माँ तू स्वयं उसकी गर्लफ्रेंड बनना के लिए उतावली थी. आदित्य ने सोचा मौका अच्छा है और उसने अपने मन में चल रहे द्वन्द को दरकिनार करते हुए बड़ी हिम्मत करके अपनी बांहे खोलकर अपनी माँ की तरफ देखते हुए जो की लगातार उससे hi देख रही थी को बोलै 'Ss...aaa...nn..dd.h..yaa' संध्या ने जब देखा की आदित्य उसकी तरफ बांहे फैलाकर उसके नाम से बुला रहा है तू वो जाकर उसकी बांहों में समां गयी तू आदित्य ने उससे अपने आगोश में कास लिया तू संध्या ने भी उसे अपनी बांहों में कास लिया

दोनों hi एक दूसरे की बांहों में आकर बहुत खुश थे. संध्या की ख़ुशी का कारन था की उसने आदित्य को अपना बॉयफ्रेंड बनाकर अपनी सोच के हिसाब से अपने भिवषय के लिए अपने अकेलेपन को दूर करने का इंतेज़ाम कर लिया था. आदित्य सोच रहा था की वो कल से हर तरफ अपनी माँ के बारे में सोचता रहता था और सोचते सोचते उसके ख्यालों में गम हो जाता था. मन के किसी कोने में उससे अपनी माँ से शायद प्यार हो गया था और जिसके बारे में वो किसी से बता भी नहीं सकता था. उसने तू कभी सपने में भी नहीं सोचा था की उसकी माँ उससे अपना बॉयफ्रेंड बनाने के लिए इतनी लालायित हो जाएगी, ये तू उसके लिए एक तरह से लाटरी लग गयी थी. फिर भी उसका मन विचलित था की क्या ये सही है या गलत.

आदित्य अभी सोच hi रहा था की उससे अपनी पीठ पर अपनी माँ के नरम नरम हाथों का एहसास हुआ तू वो जैसे नींद से जगा हो, उससे बहुत अच्छा लग रहा था. आदित्य को पीठ के साथ साथ अपनी छाती पर भी अपनी माँ की मुलायम मुलायम चूचियों का स्पर्श हुआ जिसने उसके जज्बातों को भड़काने में कोई कसार नहीं छोड़ी और स्वाभाविक तौर से उसके जज्बात भड़कने लगे लेकिन वो अभी उन्हें नियंत्रण में रखना चाहता था इसलिए उसने अपनी माँ को अपने से थोड़ा दूर करने लगा तू उसने कहा 'क्या हुआ' तू आदित्य ने कहा की 'मैं देखना छह रहा था की मेरी गर्लफ्रेंड कैसी लगती है'

उसकी बात सुनकर संध्या थोड़ा शर्मा गयी, लेकिन मंद मंद मुस्कराते हुए पूछा 'क्योँ क्या मुझे पहले कभी देखा नहीं है क्या' तब आदित्य ने कहा ' कान्हा देखा है'

संध्या 'रोज़ तू मुझे देखते हो'

आदित्य 'रोज़ कैसे देखता हु'

संध्या 'क्या मतलब, मुझे कभी देखते hi नहीं' और ये कहकर वो नाराज़ होकर अपनी पीठ करके कड़ी हो गयी.

आदित्य 'मैंने क्या गलत कहा है, आज तक मैं अपनी माँ को देखा करता था, लेकिन गर्लफ्रेंड को तू आज पहली बार देखने का मौका मिला है, नहीं देखने देना छाती तू आपकी मर्ज़ी'

आदित्य की बात सुनकर संध्या एकदम से शर्मा गयी और उसकी साँसें तेज़ चलने लगी की आदित्य उससे अब गर्लफ्रेंड के रूप में देखना चाहता है और मन में सोचने लगी 'हूँ तू मैं वही तू क्या देखना चाहता है'

तभी आदित्य की आवाज़ आयी 'ठीक है आप मेरी माँ hi ठीक हो, गर्लफ्रेंड कोई और सही' उसकी बात सुनकर संध्या एकदम से पलट गयी और दृढ निश्चय से 'नहीं माँ नहीं, मैं hi तुम्हारी गर्लफ्रेंड हु' और उसने नज़रे झुका ली. आदित्य उससे ऊपर से नीचे देखने लगा तू बीच में एक बार उसने आँखें ऊपर करके देखा की आदित्य उससे लगातार देखे hi जा रहा है तू वो और जयादा शर्माने लगी और कहने लगी 'बस न'

आदित्य 'मेरी गर्लफ्रेंड इतनी सुन्दर है और आप कह रही की बस न' संध्या से उसकी आँखों की तपिश बर्दाश्त नहीं हो रही थी तू उसने आगे बढ़कर अपनी बांहों को आदित्य के गले में दाल दी.

संध्या की बाहें आदित्य के गले के पास थी और आदित्य ने अपने दोनों हाथ अपनी माँ की कमर पर रख दिए और उसे धीरे धीरे अपने पास करते हुए अपने से और नज़दीक कर लिया. ऐसा करने से संध्या के मोठे मोठे स्तन आदित्य की छाती से पहले स्पर्श हुए तू संध्या की भवनों ने भी एक अलग अनुभूति का अनुभव किया. आदित्य ने उसकी कमर पर थोड़ा और दबाव बढ़ाया तू उसकी माँ के मोठे मोठे स्तन आदित्य की छाती से इस बार डाब से गए. उसे अपनी माँ के मम्मो के नरमाई की अनुभूति हो रही थी. संध्या को भी अपने स्तन दबने पर ाचा लगने लगा और उसके निप्पल्स कड़क होने लगे. संध्या ने अपने हाथों को आदित्य के गले में डालकर उसके कन्धों पर अपने हाथों का दबाव बढ़ा दिया जिससे पहले तू उसके स्तन और जयादा डाब गए लेकिन अब वो एकदम से नहीं चाहती थी की आदित्य उससे गलत समझे, इसलिए उसके होठों का दबाव कन्धों पर इस तरह से हो गया जैसे की वो आदित्य के और जयादा नजदीक न जा पाए.

संध्या की शारीरिक नज़दीकी की वजह से आदित्य के जज्बात फिर से भड़कने लगे, जिससे उसका रक्त परवाह बढ़ रहा था और उसकी साँसों की गति भी थोड़ी बढ़ गयी और वो दोनों इतने नज़दीक आ चुके थे की आदित्य की साँसे उसकी माँ को महसूस हो रही थी, जिससे उसकी माँ के जज्बात भी भड़क गए और उसकी भी गरम गरम साँसें आदित्य को अपनी गर्दन पर महसूस होने लगी. ऐसा होने से आदित्य का लिंग भी हरकत में आने लगा और पंत में से फुफकारने लगा. आदित्य को जैसे hi इस बात का अनुभव हुआ तू उससे लगा की कनिह उसका लिंग उसकी माँ के पेट को न चुभने लगे तू उसने अपनी माँ की कमर पर दबाव थोड़ा काम कर दिया और जानभूझकर अपनी माँ से अलग होने लगा. मन से तू वो अलग नहीं होना चाहता था. वो अब उससे दूर नहीं होना चाहता था लेकिन उसके दिमाग़ ने उससे चेताया की दूर होजाओ पर अपनी माँ के स्तनों की चुंबन उसको अछि लग रही थी, इसलिए उसने अपने निचले हिस्से को अपनी माँ से दूर करते हुए अपनी चाहती पर अपनी माँ के मम्मो का आनंद लेता रहा. शायद संध्या को भी कुछ कुछ आभास हुआ और वो भी आदित्य से अपने आप को थोड़ा बचने की कोशिश करने लगी. आदित्य के हाथ कमर से ऊपर होकर संध्या की पीठ ओर पंहुच गए और बड़े प्यार से हलके हलके उससे सहलाने लगा.

आदित्य के इस तरह करने से संध्या के पूरे बदन में मस्ती की एक लहर दौड़ गयी. उसने सर उठा कर अपने बेटे की तरफ देखा. आदित्य ने थोडासा झुककर संध्या की आँखों में देखते हुए कहा 'यू अरे ब्यूटीफुल'.

आदित्य अपनी सुन्दर माँ के चहरे की सुंदरता का रास आँखों की सहायता से पिने लगा. संध्याँए भी जवाब में अपने बेटे को निहारती रही. काफी देर तक दोनों एक दूसरे को निहारते रहे थे और फिर संध्या शर्मा कर अलग हो गयी तू आदित्य ने भी उससे नहीं रोका.

कुछ देर तक दोनों अलग होकर अपने में hi खोये हुए थे और कोई बात नहीं कर रहे थे. जब दोनों hi एक दूसरे से बात नहीं कर रहे थे तू आदित्य ने सोचा की वो मर्द है इसलिए उसने पहल करने की सोची और “क्या हुआ?” आदित्य ने पूछा तू संध्या मुस्कराने लगी और कहा 'थैंक्स की तुमने मेरी बात मान ली'

आदित्य ने झट से कहने लगा. “ थैंक्स तू मुझे कहना चाहिए की आपने मुझे अपना बॉयफ्रेंड बना लिया है'

संध्या 'मुझे तू यही लगता था की मैं बूढी हु और तुम जवान तू मुझे कान्हा गर्लफ्रेंड बनोगे, तुम्हे तू कोई जवान, पढ़ी लिखी और मॉडर्न लड़की चाहिए होगी'

आदित्य ने अपनी माँ के हाथों को अपने हाथों में लिया और अपनी तरफ करते हुए कहा 'आज के बाद कभी मत कहना की मेरी गर्लफ्रेंड बुढ़िया है, या अनपढ़ है या मॉडर्न नहीं है'

संध्या 'जो सच्चाई है वो मैंने कह दी है'

आदित्य 'पहली बात आप जवानो से भी जवान हो, दूसरी बात किसी सर्टिफिकेट से कोई पढ़ा लिखा नहीं हो जाता, आपकी समझदारी पढ़े लिखो से जयादा है और तीसरी बात मॉडर्न तू कोई कभी भी बन सकता है, लेकिन सादगी और सौमयता हर किसी में नहीं आ सकती, इसलिए आप सब से ऊपर हैं और अब कभी न कहना की आप किसी से काम हैं'

संध्या 'मुझे लगता है की तुम किसी जवान लड़की के छाकर में मुझे अकेला छोड़ डोज'

आदित्य ने फिर से अपनी माँ को अपनी बांहो में जाखडा और उसकी आँखों में झांककर “मैं जैसा भी हु और आप जैसी भी हैं, मेरी जिंदगी में कोई लड़की आये या न आये लेकिन आप को कभी अकेला नहीं छोडूंगा'

संध्या ने हँसते हुए कहा 'अगर कोई लड़की तुम्हे मुझसे दूर करने लगी तू'

आदित्य ने उसकी बात का विरोध करते हुए 'आपको अगर मुझपर विश्वास है तू आज के बाद आप कभी ऐसी बात नहीं कहेगी'

संध्या 'लेकिन मुझे अपनी किस्मत पर भरोसा नहीं है'

आदित्य 'अब हमारी किस्मत अलग नहीं बल्कि एक है'

संध्या ने आदित्य की बात को सुना और फिर उसने आदित्य को देखा की उसकी नज़र संध्या के हसीं चेहरे पर है तू संध्या खिलखिलाकर हसने लगी. आदित्य अचम्बे से उसके खूबसूरत चेरे की और देखने लगा. हँसते हुए उसके गाल पर एक डिंपल आ गया जिससे संध्या का चेहरा और भी हसीं लग रहा था. आदित्य अपनी माँ के चेरे में खो गया और सोचने लगा की उसकी माँ कितनी हसीं है.

उसको इस तरह देखता पाकर संध्या एक बार फिर खिलखिलाकर हसने लगी. अब आदित्य का ध्यान संध्या के चेहरे से हटकर उसके बूब्स पर आ गया. हँसते हुए उसके बूब्स थिरक रहे थे. आदित्य मंत्रमुग्ध हो कर उनकी और देखने लगा. आदित्य को लगा कनिह उसकी माँ उसको इस तरह देखते हुए देखकर बुरा न मान जाये इसलिए उसने अपनी नज़रें अलग कर ली. फिर उससे ध्यान आया की वो अपनी माँ के लिए एक ड्रेस लेकर आया था तू उसने अपने बैग से वो पैकेट निकलकर अपनी माँ को देते हुए कहा 'ये आपके लिए'

संध्या 'ये क्या है'

आदित्य 'वो मेरी आज पहली कमाई हुई तू मैं आपके लिए कुछ लाया था'

संध्या 'मेरे लिए मतलब अपनी गर्लफ्रेंड के लिए'

आदित्य 'लाया तू मैं अपनी माँ के लिए था पर.......'

संध्या 'अपनी माँ का लाया हुआ गिफ्ट अपनी गर्लफ्रेंड को डोज'

आदित्य की आँखों में थोड़ी सी नमी आ गयी जो संध्या से छुपी नहीं. आदित्य ने कहा 'अभी ये ले लो, आप मेरी गर्लफ्रेंड हो और आपको इसके अलावा कोई और गिफ्ट भी दिला दूंगा. इससे आप मन न करना'

संध्या ने उससे ख़ुशी से ले लिया और कहा 'थैंक्स और मुझे कोई और गिफ्ट नहीं चाहिए, मुझे जो चाहिए था वो मुझे मिल गया है' ये कहकर उसकी आँखों में भी नमी आ गयी थी.

आदित्य ने बात को हल्का करते हुए कहा 'आप जल्दी से रेडी हो जाओ, आज हम डिनर बहार करेंगे'

संध्या 'बहार क्योँ'

आदित्य 'आज डबल ख़ुशी का मौका है, पहला आज मेरी पहली कमाई हुई है और दूसरा आप आज hi मेरी गर्लफ्रेंड बानी हो, सेलिब्रेशन तू बनता है न'

संध्या 'ये बात है तू चलो, मैं रेडी हु'

आदित्य 'ऐसे नहीं, आप आज ये जो पैकेट में ड्रेस है उससे पहनकर तैयार हो जाओ'

संध्या 'तू तुम अपनी माँ को डिनर करना चाहते हो'

आदित्य 'ये तू आपके ऊपर है की आप कैसे जाना चाहती हैं, माँ या गर्लफ्रेंड बनकर'

संध्या 'सिर्फ और सिर्फ गर्लफ्रेंड'

आदित्य 'तू फिर जल्दी से तैयार हो जाओ'

संध्या 'मेरा बॉयफ्रेंड ऐसे hi चलेगा'

आदित्य 'आपका बॉयफ्रेंड आपसे पहले तैयार मिलेगा'

आदित्य भी तैयार होकर ड्राइंग रूम में अपनी माँ का इंतज़ार कर रहा था और जब उसकी माँ आयी तू वो देखता hi रह गया

संध्या ने आदित्य द्वारा लाया हुआ येलो कलर का सूट डाला हुआ था, जिसका नैक काफी डीप था. जिसमे उसके बूब्स के बिच की लाइन भी साफ़ साफ़ दिख रही थी. और उसकी पटिआला शाही सलवार में उसके मोठे मोठे नितम्बों को अपनी पूरी शेप में दिखाई दे रह थे. आदित्य तू अपनी माँ की खूबसूरती में खोया हुआ था तू संध्या ने उसका ध्यान भंग करते हुए कहा 'चलें'

आदित्य 'हाँ मैं बाइक निकलता हूँ, आप लॉक करके आ जाओ'

आदित्य बाइक लेकर बहार अपनी माँ का वेट कर रहा था की तभी उसकी माँ मैं गेट लॉक करके सामने से आ रही थी तू वो आदित्य को देख रही थी की अचानक उसका पेअर थोड़ा सा मुद गया और उसी वक़्त उसकी माँ का पल्लू निचे खिसक गया ऑर्डर उनकी गोरी गोरी बड़ी चूचिया साफ़ साफ़ दिखने लगी. आदित्य जल्दी से बाइक से उतारकर अपनी माँ के पास पंहुचा और उनको पकड़ कर सीधा करने लगा तू उसकी नज़र अपनी माँ की चूचियों पर से हैट hi नहीं रही थी लेकिन प्रत्यक्ष में 'आप ठीक हैं न' जैसे hi संध्या ने देखा की आदित्य उसकी चूचिया घूर रहा है तू उसने तुरंत शर्माते हुए अपना पल्लू उप्पेर कर लिया और कहा 'ठीक हु, थोड़ा सा पेअर मुद गया था' आदित्य उन्हें पकड़ कर बाइक के पास ले आया और कहने लगा की 'अगर प्रॉब्लम है तू फिर कभी चलें' जिससे सुनकर संध्या ने कहा 'लगता है मेरा बॉयफ्रेंड खर्चे के दर से नहीं ले जाना छटा. आदित्य ने अपनी माँ को बाइक पर बैठाया और चल पड़ा.
 
अपडेट 49

आदित्य बाइक लेकर बहार अपनी माँ का वेट कर रहा था की तभी उसकी माँ मैं गेट लॉक करके सामने से आ रही थी तू वो आदित्य को देख रही थी की अचानक उसका पेअर थोड़ा सा मुद गया और उसी वक़्त उसकी माँ का पल्लू निचे खिसक गया ऑर्डर उनकी गोरी गोरी बड़ी चूचिया साफ़ साफ़ दिखने लगी. आदित्य जल्दी से बाइक से उतारकर अपनी माँ के पास पंहुचा और उनको पकड़ कर सीधा करने लगा तू उसकी नज़र अपनी माँ की चूचियों पर से हैट hi नहीं रही थी लेकिन प्रत्यक्ष में 'आप ठीक हैं न' जैसे hi संध्या ने देखा की आदित्य उसकी चूचिया घूर रहा है तू उसने तुरंत शर्माते हुए अपना पल्लू उप्पेर कर लिया और कहा 'ठीक हु, थोड़ा सा पेअर मुद गया था' आदित्य उन्हें पकड़ कर बाइक के पास ले आया और कहने लगा की 'अगर प्रॉब्लम है तू फिर कभी बाद में चलें' जिससे सुनकर संध्या ने कहा 'लगता है मेरा बॉयफ्रेंड खर्चे के दर से नहीं ले जाना छटा. आदित्य ने अपनी माँ को बाइक पर बैठाया और चल पड़ा.

आदित्य ने बाइक तू चला दी लेकिन उसके मन में अपनी माँ की चूचियों को देखकर कुछ कुछ होने लगा, उसके दिल की धड़कन बढ़ी हुई थी. उससे समझ नहीं आ रहा था की ये जो हो रहा है वो ठीक है या गलत, लेकिन एक बात तू पक्की थी की उसके मन में अपनी माँ के प्रति आकर्षण बढ़ता hi जा रहा था. वो मन में सोच रहा था की पहले उसने कभी नोटिस नहीं किया की उसकी माँ कितनी सुन्दर है, ऐसा नहीं था की उससे अपनी माँ अच्छी नहीं लगती, बल्कि उससे बहुत अच्छी लगती थी, पर पिछले कुछ दिनों से उसका नजरिया बदलने लगा और आज जब उसकी माँ ने उससे खुद को गर्लफ्रेंड बनाने के लिए कहा तू वो अपनी माँ को और जयादा गौर से परखने लगा. आदित्य को अपनी माँ का हर एक अंग सांचे में ढला हुआ लगने लगा. वैसे तू वह लड़कियों से दूर hi रहता था, लेकिन पिछले कुछ दिनों से वह अपनी माँ के नज़दीक आ गया और इस वजह से उससे हर जगह अपनी माँ hi दिखाई देने लगी तू जब उनके बारे में सोचने लगता तू सवाभाविक तौर से उनके अंगो के बारे में भी सोचने लगता. आज पहली बार उसने कई लड़कियों के अंगो को चुपके चुपके निहारा, लेकिन उससे हर वो लड़की जिससे उसने निहारा उनके अंगो से जयादा अच्छे अंग अपनी माँ के लगने लगे आज जब उसकी माँ ने गर्लफ्रेंड बनने के लिए कहा तू पहले तू उससे विश्वास hi नहीं हुआ पर जब उसने देखा की उसकी माँ तू गर्लफ्रेंड बनने के लिए बहुत ज्यादा लालायित है तू उसने भी सोचा की क्या इतनी सुन्दर और रूपवती महिला उसकी गर्लफ्रेंड बनेगी तू उसने जयादा न सोचते हुए हाँ कर दी. उसके मन में दर भी था की कहीं उसकी माँ उसका टेस्ट तू नहीं ले रही है और उससे लगा की अगर ऐसा हुआ तू उसकी बेइज़्ज़ती hi जाएगी. फिर उसके मन में ख्याल आया की उसकी माँ अगर टेस्ट भी ले रही हैं तू भी वो किसी से कहने से तू रही, इसल6 बेइज़्ज़ती कैसे होगी. जयादा से जयादा कुछ दिन नाराज़ हो जाएँगी. उसने मन में सोचा की इतना सुघंधित फूल उसकी झोली में आने को तैयार है तू इतना रिस्क लेने में कोई हर्ज़ नहीं है और सबसे बड़ी बात ये थी की उसका मन पहले से hi उस फूल पर मोहित हो चूका था तू इस मौके का फायदा उठाना hi उससे उचित लगा.

उसने बेशक अपनी माँ को गर्लफ्रेंड बना लिया था और उसके अंगो में खोया हुआ था लेकिन उसके मन के किसी कोने में ये भी बार बार आ रहा था की क्या वो वास्तव में उससे गर्लफ्रेंड बना पायेगा जबकि वो असल में उसकी माँ भी है और सबसे बड़ी बात क्या उसकी माँ उससे बॉयफ्रेंड स्वीकार कर लेगी या ये सब वो किसी जलन या ईर्ष्या की वजह से उन्होंने अपने आप को मेरी गर्लफ्रेंड बनना मंजूर किया है. वो इन्ही सोचो में डूबा हुआ था की उससे अपनी पीठ पर अपनी माँ की मुलायम मुलायम चूचियों का एहसास हुआ तू उसके अरमान भड़कने लगे की तभी उसकी माँ ने उससे कहा 'क्या बात है खर्चा का सुनकर बिलकुल चुप हो गए हो, अगर लग रहा है की पैसे कुछ जयादा खर्च हो जायेंगे तू वापिस चलते हैं और कभी फिर आ जायेंगे'

आदित्य भी मज़े लेते हुए 'हाँ खर्चा तू होगा hi, लेकिन अब गर्लफ्रेंड बनायीं है तू खर्चा तू करना hi पड़ेगा'

संध्या 'मुझे कोई खर्चा नहीं करना, चलो वापिस चलते हैं'

आदित्य "ठीक है जैसी आपकी इच्छा" और वो अपनी बाइक सड़क से नीचे उतर कर रोक देता है और ऐसा प्रदर्शित करता है की जैसे वापिस जाने के लिए गर्दन को पीछे मोड़कर ट्रैफिक देखने का नाटक करता है लेकिन असल में अपनी माँ के चेहरे को निहार रहा होता है.

संध्या 'क्या बात है बड़ी जल्दी मेरी बात मान ली, हाँ क्योँ नहीं खर्चा जो बच रहा है'

आदित्य अपनी माँ के चेहरे को निहारते हुए 'अब आप मेरी गर्लफ्रेंड बन गयी हैं तू आपकी बात तू माननी hi पड़ेगी. रही बात खर्चे की तू मैं तू आपको खुद अपनी मर्जी से लेकर आया हूँ और जब लेकर आया हूँ तू खर्चे का सोच hi लिया था बाकि आपकी मर्जी है क्योँकि मैं जबरदस्ती में विश्वास नहीं रखता मैं तू सहमति के साथ कोई भी काम करने को अच्छा मंटा हु. अगर आपका जरा सा भी मन नहीं है तू वापिस चलने में मुझे कोई दिक्कत नहीं है.'

आदित्य की बात सुनकर संध्या सोच में पद गयी और कुछ सोचने के बाद जब उसने आदित्य से पूछा 'क्या गर्लफ्रेंड की बात को इतना महत्व डोज की वापिस चलने को तैयार हो गए'

आदित्य उनकी तरफ देखते हुए 'जब गर्लफ्रेंड किसी बात से खुश नहीं है तू उससे जबरदस्ती करने से न तू गर्लफ्रेंड को और न hi खुद को ख़ुशी मिलेगी तब ऐसा कुछ करना hi नहीं चाहिए. ये मेरी सोच है, इसलिए वापिस चलने में hi भलाई है'

संध्या 'गर्लफ्रेंड तू मुझे कुछ दिन पहले भी कहा था तब तू मेरी बात नहीं मानते थे, लेकिन अब क्योँ'

आदित्य 'बात तू मैंने तब भी मणि थी'

संध्या 'याद करो, जब मैंने तुम्हे पानी पूरी खाने के लिए कहा था तब तुमने मुझे मन कर दिया था'

आदित्य 'मैं आपको पानी पूरी खिलने के लिए ले तू गया था'

संध्या 'लेकिन मेरे साथ खायी तू नहीं था, मुझे अकेले hi खाना पड़ा था'

आदित्य 'उस वक़्त मेरा मन नहीं था लेकिन आप को तू खिलाया था. मुझे आपसे एक बात पूछनी है अगर आप बुरा न मने तू'

संध्या 'पूछो'

आदित्य 'जब आप पहले hi मेरी गर्लफ्रेंड बन गयी थी तू आज फिर से गर्लफ्रेंड बनने के लिए ज़िद क्योँ कर रही थी'

संध्या 'तुमने कभी मुझे मन से गर्लफ्रेंड मन hi नहीं, इसलिए मुझे आज कहना पड़ा'

आदित्य 'आपको कैसे पता की मैंने आपको गर्लफ्रेंड नहीं मन'

संध्या 'अगर मन होता तू मुझे बार बार माँ नहीं कहते'

आदित्य अपनी माँ की बात सुनकर अपने चेहरे को नीचे करता है तू उसकी नज़र अपनी माँ के स्तनों पर चली जाती है तू उससे उन चूचियों में कुछ ऐसा दिखाई देता है की वो सोच में पद जाता है लेकिन प्रत्यक्ष में कहता है 'आप माँ तू हो hi लेकिन मेरी गर्लफ्रेंड भी हो'

संध्या 'नहीं, मैं छाती हु की तुम मुझे सिर्फ और सिर्फ गर्लफ्रेंड समझो, माँ नहीं और मुझे सिर्फ मेरे नाम से बुलाओ, अगर नहीं कर सकते तू तुम्हारी मर्जी'

आदित्य 'मैंने तू आपकी बात मान ली है और अब भी आपकी बात मानकर वापिस चल रहे हैं'

संध्या उसकी बात सुनकर मुस्कराते हुए कहने लगी 'मैंने तू ये कहा था की खर्चा जयादा होगा तू वापिस चलते हैं और तुम खर्चे से बचने के लिए वापिस जा रहे हो. मैं तू पहली बार अपने बॉयफ्रेंड के साथ जा रही हु, अगर वो खर्चे के दर से नहीं ले जाना चाहता तू कोई बात नहीं'

आदित्य भी अपनी माँ की बात सुनकर मुस्कराते हुए नज़र को न चाहते हुए उनकी छतियोँ से हटाकर बाइक को चला देता है और संध्या के हाथ का दबाव भी उसके कंधे पर बढ़ जाता है जो आदित्य को अच्छा लगता है और इस तरह थोड़ी बहुत नोक झोंक करते हुए वे दोनों एक बहुत hi अच्छे मॉल में पंहुचते हैं और बाइक कड़ी करके चलने लगते हैं तू संध्या रुक जाती है तू आदित्य उसकी तरफ देखकर पूछता है की 'क्या हुआ'

संध्या 'अपनी गर्लफ्रेंड को ऐसे लेकर चलोगे'

आदित्य को कुछ समझ नहीं आया और उसने कहा 'मतलब' तब संध्या ने आदित्य के पास आकर उसका हाथ पकड़ लिया और कहा 'अब चलो'

आदित्य ने अपनी माँ का हाथ कई बार पहले भी पकड़ा था लेकिन आज उनका हाथ पकड़ने में उससे एक अलग hi फीलिंग का अनुभव हो रहा था और ऐसी खूबसूरत महिला का हाथ अपने हाथ में लेकर गौरवान्वित महसूस कर रहा था. दोनों साथ साथ चलते हुए मॉल की लिफ्ट के पास पंहुच कर लिफ्ट की वेट करने लगे और जब लिफ्ट आयी तू देखा की वो पहले से hi भरी हुई आयी थी तू आदित्य ने कहा की अगली वाली में चले जायेंगे तब वंहा पर मौजूद लोगों ने कहा की 'आ जाओ नहीं तू बहुत देर लग जाएगी क्योँकि ऊपर बहुत भीड़ है तू वो दोनों लिफ्ट में घुसकर अपने आप को एडजस्ट करने लगे. पहले आदित्य अंदर गया और फिर संध्या. आदित्य जानभूझकर पहले अंदर गया था ताकि दूसरे लोगो का स्पर्श उससे हो न की उसकी माँ को. भीड़ बहुत जयादा होने की वजह से दोनों इतने पास खड़े थे की दोनों के शरीरों के बिच में से हवा का निकलना भी बहुत मुश्किल था. दोनों एक दूसरे के शरीरों को महसूस करके उत्तेजित हो रहे थे. आदित्य की बाज़ू को संध्या ने अपने हाथ से कास कर दबाया हुआ था ताकि वो लिफ्ट के दरवाजे में न डाब जाये, लेकिन फिर भी उसके स्तन आदित्य की छथि में धंसे हुए थे और दोनों को इस बात का एहसास हो रहा था और दोनों hi अलग फीलिंग का अनुभव कर रहे थे, लेकिन उनके इस आनंद में खलल पद गया क्योँकि लिफ्ट अपने गंतव्य पर पंहुच चुकी थी और लोगों के धक्कों से वे दोनों बहार आ गए.

आज दूसरी बार बहुत थोड़ी देर के अंतराल में संध्या आदित्य के इतनी करीब गयी थी, और उससे आदित्य के सुडोल और शाक्त जिस्म का एहसास हुआ था. इस एहसास की वजह से उससे आनंद भी आ रहा था और वो बहुत उत्तेजित भी हो रही थी. आदित्य काफी हैंडसम इंसान थे. गोरा रंग, ऊँचा कद गठीला और शाक्त जिस्म, छोड़ी छाती, स्ट्रांग मसल्स और सबसे बड़ी बात वो संध्या की बात का मान रखता था. संध्या उसके बारे में सोच कर मन hi मन खुश हो रही थी और बिच बिच ने उससे निहारते हुए उसका हाथ अपने हाथ में लेकर चल रही थी. जब भी आदित्य और उसकी आँखें मिलती तू वो एक स्माइल दे देती.

आदित्य ने वंहा मौजूद एक अच्छे से रेस्टोरेंट में अपनी माँ का हाथ पकडे पकडे उसे वहां ले गया. रिसेप्शन पर जाकर उसने रेसियप्तियनिस्ट से कहा 'मैंने एक प्राइवेट केबिन बुक किया है' उसने नाम पूछा तू उसने रिकार्ड्स देखकर एक वेटर को बुलाया और उससे समझकर उन दोनों के साथ भेज दिया जो उन्हें एक प्राइवेट केबिन में ले गया. और कुछ बताकर वंहा से चला गया.

जब वो केबिन की तरफ जा रहे थे तू हॉल में जयादातर कपल्स hi थे और वो सब अपने पार्टनर्स के साथ मस्तियाँ कर रहे थे जिससे देखकर संध्या के मनोभाव उत्तेजक होने लगे.

वेटर के जाने के बाद आदित्य ने अपनी माँ का हाथ पकड़ कर उससे वंहा पड़े सोफे पर बैठाया और वंहा पर गुलदस्ते में से एक गुलाब का फूल निकल कर अपनी माँ की तरफ बढ़ा कर बड़े प्यार से 'फॉर माय ब्यूटीफुल गर्लफ्रेंड'

संध्या ने उसको बड़े hi प्यार से लिया और थैंक्स कहा तू आदित्य ने कहा 'आप क्या लेना पसंद करेंगी'

संध्या 'आज तू जो भी तुम खिलाओगे उससे बड़े प्यार से खाउंगी'

आदित्य 'आप आज मेरी गर्लफ्रेंड बानी hi तू आज का आर्डर आप डौगी'

संध्या 'अगर ये बात है तू फिर मेरा आर्डर तुम डोज' ये कहकर वो हसने लगी और आदित्य उसको हँसता देखकर उसके चेहरे की खूबसूरती में खो गया.

आदित्य ने जयादा बहस न करते हुए अपने हिसाब से वेटर को बुलाकर आर्डर दिया और उससे कुछ कहा तू वेटर ने कहा 'सर सब हो जायेगा' उसके जाने के बाद आदित्य ने केबिन को अंदर से बंद करके वो भी वंहा पर सोफे पर आकर बैठ गया और अपनी में से बातें करने लगा.

आदित्य ने उनसे पुछा की 'ये सब अच्छा तो लग रहा है न?'

संध्या 'पहले ये बताओ की यंहा पर टेबल कब बुक करवाई'

आदित्य 'वो तू घर से चलने से पहले hi बुक करवा ली थी और आपको सरप्राइज देना था'

संध्या 'तू फिर वापिस क्योँ चलने लगे थे'

आदित्य 'मैंने आपको पहले भी कहा था की मैं जबरदस्ती में विश्वास नहीं रखता'

संध्या 'फिर तू पैसे ख़राब हो जाते'

आदित्य 'पैसे की कीमत आपकी ख़ुशी से जयादा नहीं है. जब आप यंहा आकर खुश नहीं होती तू फिर आने का फायदा क्या'

संध्या की आँखों में नमी आ गयी और वो कहने लगी 'मेरा इतना ख्याल है'

आदित्य 'क्योँ नहीं होना चाहिए!'

संध्या 'मेरा इतना ख्याल रखोगे तू मुझे दर लगने लगा है'

आदित्य को कुछ समझ नहीं आये की किसी का ख्याल रखने पर उसको दर लगने लगे तू उसने पूछा 'आपको दर क्योँ लग रहा है'

संध्या 'जब तुम मेरा इतना ख्याल करोगे तो कोई तुम्हें मुझसे अलग न कर दे और अगर ऐसा हो गया तू मैं तू जीते जी मर hi जाउंगी' और उसके मुंह से रोने वाली हलकी सी सिसकी भी निकल गयी.

तब आदित्य वंहा से उठकर अपनी माँ के नजदीक जाकर अपना एक हाथ उनके सर के पीछे से लेजाकर उनके कंधे पर रख देता है और दूसरे हाथ से उसकी आँखों में आ गयी नमी को साफ़ करने लगता है. कंधे पर हाथ रखकर अपनी माँ को अपनी तरफ करके उनके कंधे को सहलाते हुए कहने लगा 'आप ये चिंता छोड़ दो और आज की पार्टी एन्जॉय करो, मैं आपको छोड़ कर कहीं नहीं जाऊंगा'

संध्या ने ये सुनकर अपने हाथों का घेरा आदित्य के गले में डालकर उससे अपने पास करने लगी तू आदित्य ने भी अपने होठ से उसके कंधे पर दबाव बढ़ाते हुए अपने आगोश में लेने लगा जिससे उनके शारिओं का सामीप्य एक बार फिर से होने लगा तू उनकी भावनाएं तू भडकनी hi थी. संध्या अपने हाथों को उसके गले में डेल डेल कहने लगी 'मुझे सच्ची में अकेला नहीं छोड़ेगा न'

आदित्य अपने हाथ को अब कंधे से थोड़ा बाजु की तरफ ले गया और उसकी मांसल बाजु को सहलाते हुए बड़े प्यार से उसकी आँखों में झंकार 'आपको मुझ पर विश्वास नहीं है क्या'

संध्या अपने हाथ को उसकी गर्दन के पीछे लेजाकर उसके सर के निचले हिस्से में उँगलियों को चलते हुए 'मुझे तुम पर तू पूरा विश्वास है, लेकिन अपनी किस्मत और अपने आप पर भरोसा नहीं है'

आदित्य का एक हाथ उसके बाजु को सेहला रहा था और उसने दूसरे हाथ से अपनी माँ के चेहरे को पकड़ कर अपनी और करके उसके गलों को सहलाते हुए 'अब आप मेरी गर्लफ्रेंड हो और मेरी गर्लफ्रेंड इतनी कमजोर नहीं हो सकती और अगर आपको लगता है की आप इतनी कमजोर हो तू ये जान लो की अब आप को किसी भी कमजोरी को महसूस नहीं करना है. जब भी कमजोर होने लगो तू ये याद रखना की आप के साथ मैं भी हु और मैं कभी भी किसी भी परिष्तिथि में हिम्मत नहीं हारता और न hi हार मंटा हु.'

संध्या ने उसकी बात सुनकर अपने आप को उसकी आँखों की तपिश को सेहन न कर पाने के कारन अपनी पलकों को झुका लिया और कहा 'मैं कमजोर हु क्योँकि मैं न तू पढ़ी लिखी हु, न hi मेरे में मॉडर्न ख्यालात हैं और न hi मैं जवान हु'

आदित्य 'आप बार बार वही बात दोहराती हो जिसका कोई मतलब नहीं है. आप अब मेरी गर्लफ्रेंड हैं और इसलिए आपकी ताकत और कमजोरी दोनों hi मेरी हैं. मुझे आप हर हाल में मंजूर हो, इसलिए अब के बाद आप कभी नहीं कहेगी की आप कमजोर हो या आप में कमी है. अगर आप ऐसा कहती हैं तू उसका मतलब ये है की वो कमजोरी मुझमे है.'

संध्या अपने हाथ की उंगलियां उसके सर के पीछे बालों में चलते हुए और अपनी गरम गरम साँसें आदित्य के चेहरे पर डालते हुए 'क्या मुझे तुम इतना मान देते हो'

आदित्य के चेहरे पर जैसे hi गरम गरम साँसें पड़ी तू उसका मन किया की वो अपनी माँ को अपनी बांहों में लेकर भींच ले, लेकिन वो अभी जल्दबाजी न करते हुए अपने पर नियंत्रण करते हुए उसकी आँखों में झंकार कहने लगा 'अब आप और मैं अलग अलग नहीं बल्कि एक हैं' और ये कहकर उसने अपनी बांहों के घेरे में लेने लगा की तभी............
 
अपडेट 50

आदित्य के चेहरे पर जैसे hi गरम गरम साँसें पड़ी तू उसका मन किया की वो अपनी माँ को अपनी बांहों में लेकर भींच ले, लेकिन वो अभी जल्दबाजी न करते हुए अपने पर नियंत्रण करते हुए उसकी आँखों में झंकार कहने लगा 'अब आप और मैं अलग अलग नहीं बल्कि एक हैं' और ये कहकर उसने अपनी बांहों के घेरे में लेने लगा की तभी.......

तभी दरवाजे पर नॉक हुआ और दोनों होश में आये और आदित्य ने जाकर दरवाजे को खोला तू सामने वेटर आर्डर लेकर आया और वंहा टेबल पर रखकर उसने टेबल के बीचो बिच पड़ी एक मोती सी डिज़ाइनर मोमबत्ती जला दी और वंहा पर बाकि सब लाइट्स बंद कर दी और ये बोलकर की 'प्लीज एन्जॉय योर डिनर' और फिर वंहा से चला गया तू आदित्य ने दूर को लॉक कर दिया और अपनी माँ के पास पंहुच गया.

जब वो सोफे पर बैठी अपनी माँ के पास पंहुचा तू उस केबिन में सिर्फ मोमबत्ती के प्रकाश के आलावा वंहा अँधेरा था तू संध्या ने कहा 'लाइट क्योँ बंद कर दी'

आदित्य 'ये आपके लिए स्पेशल कैंडल लाइट डिनर है'

संध्या 'वो क्या होता है'

आदित्य 'इसमें लाइट सिर्फ और सिर्फ मोमबत्ती की होती है'

संध्या 'घर में लाइट चली जाती है तू सब परेशान हो जाते हैं और मोमबत्ती में कोई खाना नहीं खाना चाहता और यंहा पर ऐसे डिनर के एक्स्ट्रा पैसे देने पड़ते हैं.'

आदित्य 'आप बिलकुल सही कह रही हैं, लेकिन ऐसा डिनर लोगों की प्राइवेसी के लिए होता है ताकि उन्हें कोई और न देख पाए'

संध्या 'बहुत अच्छा, ऐसा डिनर तू हम घर पर रोज कर सकते हैं'

आदित्य 'घर पर अभी तू पॉसिबल नहीं है, क्योंकि वंहा पर मोमबत्ती पंखे की हवा से भुझ जाएगी'

संध्या 'यंहा क्योँ नहीं बुझेगी'

आदित्य 'यंहा पर पंखा नहीं है बल्कि एक चल रहा है और मोमबत्ती पर डायरेक्ट हवा नहीं आ रही है'

संध्या 'लेकिन हमें ऐसे डिनर की जरुरत है क्या'

आदित्य 'अगर आपको लगता है की जरुरत नहीं है तू लाइट्स ों कर देते हैं'

संध्या 'मैंने ऐसा नहीं कहा है, मैं तू कह रही थी की अगर इस तरह का डिनर तू हम घर पर कर सकते थे'

आदित्य अपनी माँ के पास नाता है औरउसके चेहरे को अपने हाथ में लेकर उसकी आँखों में बड़े hi प्यार से देखते हुए कहता है 'अब आप घर से बहार आयी हैं तू थोड़ी देर के लिए घर को भूल जाओ. घर के महल से आप बहार निकलेंगी तभी आजकल की दुनिया को जान पाओगी. आप ने इतने साल घर में रहकर अपने आप को उस चारदीवारी में बंद कर लिया है और इसलिए आपको दुनिया सिर्फ वंही तक नज़र आती है. आपको ये बता दू की आप जिस टेबल पर बैठी हैं इसकी एडवांस बुकिंग होती है और कई कई दिन पहले बुकिंग करनी पड़ती है. आपको मुझे आज पार्टी देनी थी तू मैंने सोचा की आपको अच्छी जगह पर पार्टी दू इसलिए ये टेबल मेरे एक जानने वाले से बुक करवाई है, नहीं तू ये बुक नहीं होती अब आपने जब मेरी गर्लफ्रेंड बनने का फैसला कर लिया है तू अपने आप को आजकल के महल में ढल लो नहीं तू आपको काफी परेशानी होगी. जब आप परेशान होंगी तू मैं भी आपको परेशान देखकर खुश नहीं रह पाउँगा. अब अगर आपको लगता है की हमें एक नार्मल डिनर करना चाहिए तू लाइट्स ों कर देते हैं'

संध्या 'मुझे अब खुश रहना है और बहार की दुनिया का एक्सपीरियंस करना है तभी तू मैं अब सिर्फ संध्या बनकर hi जिंदगी को एन्जॉय करना है'

आदित्य 'That's लिखे ा गुड गर्ल'

संध्या 'मैं गर्ल हूँ'

आदित्य 'नहीं हो'

संध्या 'अब तू मैं बूढी हो गयी हूँ'

आदित्य उसके गलों को सहलाते हुए 'इतना प्यारा चेरा है और इतनी तू आप जवान हो तू बूढी कान्हा से हुई.'

संध्या 'मैं तुम्हे जवान लगती हु'

आदित्य 'मुझे hi क्या आप तू हर एक को जवान hi लगोगी, विश्वास नहीं है तू पता करा दू'

संध्या 'मुझे हर एक से नहीं सिर्फ तुम से पूछना है की मैं तुम्हे कान्हा से जवान लगती हूँ'

आदित्य 'कान्हा से मतलब ऊपर से लेकर नीचे तक आप में जवानी चालक रही है और आप पूछती हैं की कान्हा से जवान हु? पूछना है तू ये पूछो की कान्हा से नहीं हूँ'

संध्या शरमाते हुए 'तुम झूठ बोल रहे हो'

आदित्य उसका चेहरा छोड़ देता है और चुप करके अलग हो जाता है.

संध्या को समझ नहीं आता की क्या हो गया है तू वो पूछती है 'क्या हुआ'

आदित्य 'कुछ नहीं, सोच रहा था की खाना ठंढा न हो जाये, इसलिए खा लेते हैं'

संध्या 'ठीक कह रहे हो' ये कहकर वो प्लेट में खाना डालने लगती है और एक प्लेट में डालकर वो आदित्य की तरफ करने लगती है तू आदित्य कहता है 'आप ले लीजिये, मैं दाल लूंगा'

संध्या 'आज मेरे हाथ का डाला हुआ खा लो'

आदित्य बिना कुछ कहे प्लेट ले लेता है और फिर संध्या अपनी प्लेट में भी खाना दाल लेती है तू आदित्य बिना कोई बात किये खाना खाने लगता है जिससे देखकर संध्या भी खाने लगती है. आदित्य इस दौरान अपनी माँ की तरफ देखता तक नहीं है और चुप करके खाना ख़तम करता है. तब तक संध्या भी खाना ख़तम कर चुकी होती है. इस तरह जो महल थोड़ी देर पहले रोमांटिक हो रहा था वो अब उदासी में बदला हुआ था.

जब खाना ख़तम हुआ तू संध्या ने आदित्य से स्वीट डिश की बात की तू उसने स्वीट डिश को प्लेट में डालकर अपनी माँ को पकड़ा दिया और खुद नहीं लिया तू संध्या ने कहा 'तुम भी तू लो न'

आदित्य 'आप लो, मेरा मन नहीं है'

संध्या 'ये अच्छा है, गर्लफ्रेंड को डिनर पर लाओगे और उसके साथ स्वीट डिश भी नहीं खाओगे'

आदित्य अभी कुछ भी नहीं कहना चाहता था, इसलिए चुपके से स्वीट डिश ले ली और खाने लगा. स्वीट डिश खाने के बाद उसने अपनी माँ से पूछा 'कुछ और लेना चाहिए?' तू संध्या ने कहा 'नहीं बस, बहुत अच्छा डिनर था'

आदित्य मन में सोच रहा था की वो डिनर के बारे में जो जो bhi.sochkar आया था सब की ऐसी तैसी ho.gayi थी, फिर भी उसने कहा 'थैंक्स की आप इस डिनर का हिस्सा बानी'

संध्या 'थैंक्स तू मुझे करना चाहिए, इतने अच्छे डिनर के लिए'

आदित्य ने कहा 'तू चलें'

संध्या 'ठीक है चलते है'

फिर आदित्य ने वेटर को बुला कर बिल की बैलेंस पेमेंट की और उससे टिप दी तू उसने थैंक्स कहा और फिर आने के लिए कहा.

बाजार आकर आदित्य ने बाइक पर अपनी माँ को बैठाया और घर की तरफ चल पड़ा. घर पंहुच कर आदित्य अपने कमरे में जाने लगा तू संध्या ने उससे कहा एक मिनट और वो जाकर उसके गले लग गयी और उसको अपनी बांहों में लेकर उसके कान में कहा 'मुझे गर्लफ्रेंड बनाने और डिनर के लिए थैंक्स'

आदित्य से इस तरह गले लगाने से उसकी भावनाओं ने एक बार फिर गति पकड़नी शुरू की, लेकिन अपने नियंत्रण की वजह से आदित्य ने उस गति में ब्रेक मरते हुए कह 'थैंक्स की जरुरत नहीं है और अब मैं थक गया हु, अगर आपकी इज़्ज़ज़त होंतु थोड़ा आराम कर लू.

संध्या 'ठीक है तुम आराम कर लो'

आदित्य जल्दी से अपने कमरे में आ गया और उससे बहुत गुस्सा चढ़ा हुआ था. उसकी माँ उसको झूठा बोलती है. वो बीएड पर लेत गया और सोचने लगा की आज hi तू मैंने उसकी बात मानकर उससे गर्लफ्रेंड बनाया है. वो सोच रहा था की उसने आज पता नहीं क्या क्या प्लान किया हुआ था और सरे प्रोग्राम का सत्यानाश हो गया था. उससे लग रहा था की चलो अच्छा हुआ की अभी तक उसने अपने दिल की बात भी सही तरीके से नहीं बताई है और वो सोच में पद गया की आगे क्या करना चाहिए. इन बातों को सोचते हुए उससे पता नहीं कब नींद आ गयी.

इससे नींद की वादियों में छोड़कर हम चलते हैं मोहनलाल और रुचिका के पास

मोहनलाल असल में भी जो रुचिका के साथ पुणे में था, नींद के अघोष में चला गया और रुचिका को गले लगाया लगाए hi सो गया.

मोहनलाल की रात को नींद खुली तू उसने देखा की रुचिका उसकी बाज़ू पर सर रखकर और एक हाथ को उसकी छाती पर रखकर बहुत hi सुकून से सो रही है. मोहनलाल को प्यास लगी थी तू उसने बड़े आराम से पहले उसका हाथ अपनी छाती से हटाया और फिर धीरे से उसके सर के नीचे तकिया रखकर पास की टेबल पर रखे गिलास से पानी पिया और रुचिका के पास आकर लेत गया. वो रुचिका को देखने लगा जो उससे सोते हुए बहुत hi मासूम लग रही थी. मोहनलाल उससे निहारते हुए उन पालो को याद करने लगा जब वो उसको छोड़कर अगले दिन सुबह उससे मिले बिना hi चला गया था.

अब फ्लैशबैक

संध्या 'अब जब आपको जाना hi है तू मैं कर भी क्या सकती हु, चलो आप अब आराम करो' ये कहकर उसने लाइट बंद कर दी और वो भी मोहनलाल के पास लेत गयी. मोहनलाल भी सोने की कोशिश करने लगा.

अगले दिन सुबह सुबह उठकर मोहनलाल तैयार हो गया और घर से निकलने hi वाला था की संध्या चाय और नाश्ता लेकर आ गयी और मोहनलाल से कहने लगी 'यह क्या बिना नाश्ता किये hi जा रहे हो'

मोहनलाल 'वह मुझे जल्दी निकलना है, इसलिए सोचा की तुम्हे परेशां क्या करूँ'

संध्या 'अब आप जल्दी से नाश्ता कर लो और फिर चले जाना'

मोहनलाल ने बिना कुछ बात किये hi जल्दी से नाश्ता करने लगा, उसे दर लगा हुआ था की कहीं रुचिका उठ कर आ गयी तो उसका जाना मुश्किल हो जायेगा. नाश्ता करने के बाद वह जल्दी से घर से बहार निकला और कैब भी उसने घर के बहार आकर पकड़ी.

वंहा एयरपोर्ट पहुंचा और फ्लाइट पकड़ कर पुणे आ गया. रस्ते में वह उस टूर के बारे में सोचता रहा. आज उसका मन बिलकुल भी नहीं लग रहा था, उससे कुछ खालीपन महसूस हो रहा था. बीते तीन दिनों में उसका रुचिका के साथ लगाव कुछ ज्यादा hi बढ़ गया था और उसे रुचिका की आदत सी पद गयी थी, पर वो यह अच्छी तरह जानता था की उसका रुचिका से लगाव उसकी बेटी की जिंदगी ख़राब कर देगा. इसलिए आज सुबह सुबह अपना दिल पैर पत्थर रखकर उससे दूर हो गया. पुणे पहुंचकर उसका मन किसी भी चीज में नहीं लग रहा इसलिए वह जाकर बीएड पैर लेट गया और सोने की कोशिश करने लगा.

उधर जब रुचिका उठी तू वो अपने पापा को कमरे में ढूंढने लगी, लेकिन उससे याद आया की अब वो लोग घर पंहुच चुके हैं और उसके पापा दूसरे कमरे में होंगे. वो जल्दी से उठकर बाथरूम गयी और मुंह हाथ धोकर बहार आयी और अपने पापा को ढूंढने के लिए अपने कमरे से बहार आयी तू उसका सामना उसकी माँ से हुआ तू उसने सबसे पहले अपने पापा के बारे में पूछा तू संध्या ने बताया की उसके पापा को काम से जाना था इसलिए वो सुबह जल्दी चले गएँ हैं. ये सुनकर उससे झटका लगा और वो उद्दस हो गयी. उसकी उद्दासी संध्या से छिपी नहीं और उसने पूछा 'क्या हुआ' तू रुचिका बोली 'कुछ नहीं, लेकिन पापा को इतनी जल्दी क्या थी जाने की और बताया भी नहीं'

संध्या 'काम के सिलसिले में जाना पड़ता है और हो सकता है तुम्हे इसलिए न बताया हो की कहीं तुम उनसे नाराज़ न हो जाओ'

रुचिका 'नाराज़ तू मैं हूँ, ये भी कोई बात हुई की बिना बताये चले गए'

संध्या 'चल कोई बात नहीं, तुम तैयार हो जाओ, मैं नाश्ता लगा देती हूँ' रुचिका अपनी माँ को Okay बोलकर अपने कमरे में आ गयी.

रुचिका को बहुत बुरा लग रहा था. उससे कुछ कुछ खालीपन का अनुभव हो रहा था, लेकिन वो खालीपन क्या था वो उससे समझ नहीं आ रहा था. उससे लग रहा था की उसके पापा जानभूझकर जल्दी चले गए हैं ताकि वो उनसे मिल न पाए. वो सोचने लगी की क्या ऐसा हो सकता है या सही में वो काम के सिलसिले में चले गए हैं.

वो उठकर बाथरूम चली गयी और नहाने के लिए अपने कपडे उतरने लगी तू उससे होटल के बाथरूम की याद आने लगी की कैसे वो सोच रही थी की उसके पापा ने उसके साथ क्या क्या किया. उससे वो भी याद आ गया की कैसे उस रात पानी पीने के लिए वो उठी थी तू उसके पापा का हाथ उसकी योनि में पंहुच कर रगड़ खा रहा था तू अनायास hi उसका हाथ अब भी उसकी योनि पर पंहुच गया. फिर उससे याद आया की कैसे उसके बूब्स उसके पापा के चेहरे पर रगड़ खा रहे थे और उनके होंठो ने उसके बूब्स की घाटी को छुआ था और पानी पीने के बाद जब वो वापिस आ रही थी तू उसके पापा के होठों की उसके बूब्स और बूब्स के बिच की रगड़ और फिर उन होठों का गर्दन पर पंहुचने की प्रक्रिया को याद करते हुए वो उत्तेजित हो गयी और उसका दूसरा हाथ अपने आप hi उसके एक बूब पर पंहुच गया. वो अपने हाथों को सही गति देने लगी. एक हाथ उसकी योनि के बाहरी हिस्से को कुरेद रहा था और दूसरा हाथ उसके बूब को सेहला रहा था. धीरे धीरे ये प्रक्रिया वक़्त के साथ एज होती गयी और जब उससे बर्दाश्त नहीं हो रहा था तू उसने एक उंगली अपनी योनि के अंदर डालनी चाही तू उससे बहुत तकलीफ होने लगी. वंहा पर उससे ऐसा महसूस हुआ जैसे चीटियां चल रही हो और उसने जोर जोर सर कुरेदना शुरू किया और दूसरे हाथ से बूब्स को बदल बदल कर मसलने लगी और अंत में उसकी योनि से कॉमर्स का रिसाव होना शुरू हो गया और वो लम्बी लम्बी साँसें लेने लगी.
 
अपडेट 51

वो उठकर बाथरूम चली गयी और नहाने के लिए अपने कपडे उतरने लगी तू उससे होटल के बाथरूम की याद आने लगी की कैसे वो सोच रही थी की उसके पापा ने उसके साथ क्या क्या किया. उससे वो भी याद आ गया की कैसे उस रात पानी पीने के लिए वो उठी थी तू उसके पापा का हाथ उसकी योनि में पंहुच कर रगड़ खा रहा था तू अनायास hi उसका हाथ अब भी उसकी योनि पर पंहुच गया. फिर उससे याद आया की कैसे उसके बूब्स उसके पापा के चेहरे पर रगड़ खा रहे थे और उनके होंठो ने उसके बूब्स की घाटी को छुआ था और पानी पीने के बाद जब वो वापिस आ रही थी तू उसके पापा के होठों की उसके बूब्स और बूब्स के बिच की रगड़ और फिर उन होठों का गर्दन पर पंहुचने की प्रक्रिया को याद करते हुए वो उत्तेजित हो गयी और उसका दूसरा हाथ अपने आप hi उसके एक बूब पर पंहुच गया. वो अपने हाथों को सही गति देने लगी. एक हाथ उसकी योनि के बाहरी हिस्से को कुरेद रहा था और दूसरा हाथ उसके बूब को सेहला रहा था. धीरे धीरे ये प्रक्रिया वक़्त के साथ एज होती गयी और जब उससे बर्दाश्त नहीं हो रहा था तू उसने एक उंगली अपनी योनि के अंदर डालनी चाही तू उससे बहुत तकलीफ होने लगी. वंहा पर उससे ऐसा महसूस हुआ जैसे चीटियां चल रही हो और उसने जोर जोर सर कुरेदना शुरू किया और दूसरे हाथ से बूब्स को बदल बदल कर मसलने लगी और अंत में उसकी योनि से कॉमर्स का रिसाव होना शुरू हो गया और वो लम्बी लम्बी साँसें लेने लगी.

जब उसकी साँसें संभाली तू वो जाकर नहाने लगी. अपने शरीर को मलते हुए बार बार अपने पापा को याद कर रही थी. उससे ऐसा लग रहा था की उसके पापा को बिना बताये नहीं जाना चाहिए था. नहाकर वो जब कपडे पहनने लगी तू नै वाली ब्रा पहनकर उससे वो पल याद आने लगे जब सलेसगिरल उससे कह रही थी की 'इन् यौवन परसुनों को पति नहीं देखेगा तू कौन देखेगा' अब रुचिका को लगने लगा था की क्या उसके पापा उसके पति हैं या थे. ये बात याद आते hi उसके दिमाग़ ने कहा की 'तेरे पापा जानभूझकर तुझसे दूर हुए हैं, क्योंकि वो नहीं चाहते थे की ये रिश्ता आगे बढे क्योँकि इस रिश्ते का कोई भविष्य नहीं है' ये सोचते hi उसकी आँखों से दो बुँदे लुढ़क कर उसके गलों पर आ गयी. उसने जल्दी से मोबाइल निकला और अपने पापा को कॉल करने लगी लेकिन वो स्विच ऑफ आ रहा था. उसने दो तीन बार फिर तरय किया लेकिन हर बार वही. तभी उसकी माँ की आवाज़ आयी की 'जल्दी आओ, नाश्ता तैयार है'

रुचिका फिर से बाथरूम जाकर अपने चेहरे को साफ़ करके बहार आकर नाश्ता करने लगती है. वो चुप करके नाश्ता करने लगी और अपने hi ख्यालों में खोयी हुई थी की संध्या ने पूछा 'क्या बात है बहुत चुपचाप सी है'

रुचिका चौंकते हुए 'वो मैं टूर से थक गयी हु न'

संध्या 'ठीक है नाश्ता करके आराम कर ले'

रुचिका ने जल्दी से नाश्ता ख़तम किया और अपने कमरे में आ गयी. अब उसका मन बहुत अशांत था, वो अपने पापा से बात करना चाहती थी तू उसने फ़ोन किया लेकिन फ़ोन स्विच ऑफ आया. वो बार बार फ़ोन करती रही लेकिन फ़ोन हर बार स्विच ऑफ आया और ऐसा करते करते पूरा दिन निकल गया. रात को वो बहुत परेशान हो गयी और अब उसका संदेह विश्वास में बदलने लगा की उसके पापा जानभूझकर उससे दूर हुए हैं. यही सोचते हुए कब उससे नींद आ गयी, पता hi नहीं लगा.

अगले दिन सुबह जब रुचिका नहीं उठी तू संध्या उससे उठाने के लिए दरवाजे पर नॉक करती रही तू रुचिका ने कुनमुनाते हुए 'कौन है'

संध्या 'उठ जा न रूचि, देख 10 बज गए हैं, कब तक सोयेगी'

जैसे hi उससे पता लगा की 10 बज गए हैं तू वो उठी, लेकिन उसकी अभी नींद पूरी नहीं हुई थी क्योंकि कल साडी रात उससे नींद hi नहीं आयी थी. वो तू अपने पापा के ख्यालों में खोयी हुई थी. उसने न चाहते हुए भी उठकर दरवाजा खोला तू संध्या ने पूछा 'क्या हुआ, तबियत तू ठीक है न'

रुचिका 'वो थोड़ी थकावट लग रही थी तू सोती रह गयी'

संध्या 'कोई नहीं आराम कर लेना, पहले हाथ मुंह धोकर नाश्ता कर ले'

रुचिका उसकी बात मानकर बाथरूम जाने लगी और थोड़ी देर बाद वापिस कमरे में आ गयी तू देखा की उसकी माँ वंही नाश्ता लेकर बैठी हुई थी और उसके आने पर कहा 'आ जाओ अब जल्दी से नाश्ता कर लो'

रुचिका ने नाश्ता ख़तम किया तू संध्या ने कहा 'कोई दवा ला दू' तू रुचिका ने कहा 'नहीं, सिर्फ आराम करुँगी और ठीक हो जाउंगी' उसकी बात सुनकर संध्या ने कहा ' ठीक है आराम कर ले और जरुरत हो तू मुझे बुला लेना' और फिर वो चली गयी.

उसके जाने के बाद रुचिका ने मोबाइल उठाया तू देखा की बहुत साडी मिस्ड कॉल्स हैं. उसने देखा की बहुत साडी कॉल्स दिया की थी और दो कॉल उसकी फ्रेंड सीमा की भी थी. उसने उन्हें फ़ोन करने से पहले अपने पापा को फ़ोन करने की सोची तू इस बार फ़ोन स्विच ऑफ तू नहीं था पर रिंग बजती रही लेकिन पिक नहीं हुआ तू उसने कई बार फ़ोन लगाकर देखा लेकिन रिजल्ट वही. अब रुचिका निराश होने लगी और उसने सोच लिया था की अब उसके पापा जानभूझकर उससे दूर होने की कोशिश कर रहे हैं. वो बहुत उदास हो गयी और उसका मन बहुत अशांत था, पर उससे समझ नहीं आ रहा था की क्या करे और अभी वो सोच hi रही थी की उसकी सहेली सीमा का फ़ोन आ गया. उसने अपने मन को समझया और हिम्मत करके फ़ोन उठाया तू उसकी सहेली 'क्या कर रही है मेरी जान न कोई खोज न खब्बार'

रुचिका 'अरे यार थोड़ी तबियत ठीक नहीं थी'

सीमा 'क्योँ जीजाजी ने जयादा तंग कर दिया क्या'

रुचिका 'क्या बात कर रही है, कुछ भी बोलती है'

सीमा 'क्योँ कुछ नहीं किया अभी तक, इतनी जवान और हसीं सहेली है मेरी और जीजाजी ने कुछ नहीं किया, ऐसा तू नहीं हो सकता'

रुचिका 'यार तू भी न कान्हा से कान्हा पंहुच जाती है, पहले बॉयफ्रेंड और अब सीधा जीजाजी'

सीमा 'क्योँ बॉयफ्रेंड क्या सिर्फ मज़े लेने के लिए बनाया है'

रुचिका 'छोड़ न यार, कोई और बात कर'

सीमा 'तू कह रही है तू छोड़ रही हूँ क्योंकि तू मेरी सबसे प्यारी सेहली है. चल ये बता कहीं घूमने चलेगी'

रुचिका 'आज नहीं यार, आज तू थोड़ी तबियत ठीक नहीं है, हाँ एक दो दिन में चलते हैं'

सीमा 'कह तू आ जॉन तेरी सेवा करने के लिए'

अब रुचिका ने भी मज़े लेते हुए 'अगर तू मेरी सेवा करेगी तू तेरे जीजाजी क्या करेंगे'

सीमा 'अभी तू कह रही थी की जीजाजी नहीं हैं'

दोनों सहेलियां हसने लगी और थोड़ी बहुत नोक झोंक करते हुए मिलाने का वादा करके फ़ोन बंद हो गया.

ये छोटी सी बातचीत रुचिका के दिल के तारों को छेड़ गयी और वो फिर से टूर पर बीते पलों में खो गयी जब उसके पापा उसके पति बने हुए थे और वो सोचने लगी की क्या ऐसा हकीकत में हो सकता है? जब वो ये सोच रही थी तू उसकी अंतरात्मा उससे समझा रही थी की आग से मत खेलो, बड़ी मुश्किल से इस में से निकली हो, फिर वापिस जाने की सोच रही हो.

उसने अपने दिमाग़ की बात मानकर अपने दिल को बड़ी मुश्किल से मनाकर वंहा से अपने आप को दूर करने की सोची और उसने उन सब यादों को भी मिटने की सोची जो उस टूर पर हुई थी, इसलिए उसने दिया के फ़ोन का भी जवाब नहीं दिया. रुचिका के लिए था तू बड़ा मुश्किल लेकिन उसने निश्चय किया की अब वो सिर्फ अपनी पढाई पर ध्यान देगी. कहने तू आसान था लेकिन करना उतना hi मुश्किल. वो सारा दिन अपने आप से लड़ती रही और उसने पढाई करने की सोची लेकिन जैसे hi किताब खोलती, उसके पापा उससे दिखाई देने लगते तू वो अपनी किताब बंद कर देती और बीएड पर लेत कर लम्बी साँसें लेने लगती. काफी देर तक अपने आप को दुरुस्त करने के बाद वो कमरे से बहार आयी और अपनी माँ के पास जाकर कहने लगी की वो भी कुछ काम करेगी तू उसने मन कर दिया की उससे आराम करना चाहिए. तब रुचिका ने कहा 'ठीक है आप काम करो, मैं यंहा बैठूंगी'. संध्या भी उसके साथ बैठकर उससे गप्पे लगाने लगी. बिच बिच में उसका मन भटकने लगता लेकिन वो अपने आप को व्यस्त रखकर भूलने की कोशिश करती रही. ऐसे hi सारा दिन बीत गया और डिनर के बाद अपने कमरे में आ गयी.

सारा दिन तू उसने अपने ऊपर नियंत्रण करते हुए दिन निकल दिया लेकिन अब रात को फिर से खालीपन ने आ घेरा. काफी देर तक मोबाइल पर इधर उधर का देखती रही की तभी उससे अपनी और पापा की सेल्फी दिखाई दी तू वो फिर से विचलित हो गयी. वो अपने आप से लड़ने लगी लेकिन इस बार दिल जीत गया और उसने अपने पापा को फ़ोन लगाया तू उसके पापा ने फ़ोन उठा लिया. मोहनलाल भी दो दिन से अपने आप से लड़ रहा था. उसका भी मन किसी चीज़ में लग नहीं रहा था. उसका दिल तू रुचिका के पास था लेकिन दिमाग़ उससे वंहा से हटा रहा था. रुचिका के फ़ोन का जवाब देने की भी हिम्मत नहीं थी, पर अब उसने अपने आप को मजबूत कर लिया था तू उसने फ़ोन उठा लिया.

मोहनलाल 'Hello' उसके इतना कहते hi रुचिका की रुलाई फुट गयी और फ़ोन पर मोहनलाल को उसका रोना और सिसकियाँ hi सुनाई देती रही. मोहनलाल हिल सा गया और रुचिका को चुप करने लगा. जब रुचिका थोड़ा सा चुप हुई तू मोहनलाल 'क्योँ रो रही हो'

रुचिका गुस्से से फैट पड़ी 'आप एक तू बिना बताये चले गए और ऊपर से पहले तू फ़ोन स्विच ऑफ करके रखा और उसके बाद घंटी बजती रही लेकिन पिक hi नहीं किया'

मोहनलाल 'मुझे काम की वजह से जाना पड़ा और फ़ोन की बैटरी डिस्चार्ज हो गयी थी, फिर जब तुम फ़ोन कर रही थी तू मैं मीटिंग में था, अभी फ्री हुआ तू तुम्हे फ़ोन करने hi वाला था की तुम्हारा फ़ोन आ गया'

रुचिका 'मुझे बहलाने में तू आप माहिर हैं, सच झूठ बोलकर मुझे मन hi लेते हो'

मोहनलाल 'मैं सच कह रहा हु और अभी तक तू मैंने तुम्हारी माँ को भी फ़ोन नहीं किया है, सबसे पहले तुझे hi फ़ोन कर रहा हूँ'

रुचिका 'आप मुझे फिर से बहलाने की कोशिश कर रहे हैं'

मोहनलाल 'बीटा, मैं सच मेह रहा हूँ'

रुचिका 'मैं अब आपकी बेटी कान्हा रही'

मोहनलाल 'तुम मेरी बेटी हो तू वही रहोगी न'

रुचिका एकदम हंसने लगी और उसने कहा 'जो कुछ हम दोनों के बिच टूर पर हुआ उसके बाद भी आप मुझे बेटी कह रहे हो'

मोहनलाल 'देखो हम दोनों के बिच ये डीडे हुआ था की टूर खत्तम होते hi हम उसके बारे में बात नहीं करेंगे और बाप बेटी बनकर hi रहेंगे'

रुचिका फिर से चिढ़ाने वाली हंसी के साथ 'चलो मान लिया की मैं आपको पापा hi मानूंगी लेकिन मुझे आप सच सच बताना की क्या आप वो सब भूल पाएंगे'

मोहनलाल कुछ सोचते हुए चुप हो गया तू थोड़ी देर के बाद रुचिका ने कहा 'मुझे मालूम है की आप भी नहीं भूल सकते, लेकिन आप कह क्योँ नहीं रहे हैं'

मोहनलाल 'शायद मैं भी भूल नहीं पाउँगा, लेकिन तुम अब सिर्फ और सिर्फ मेरी बेटी हो'

रुचिका 'आप अपने आप से अब झूठ बोल रहे हो. मुझे भुला पाना अगर आसान होता तू आप मुझ से पीछा चढ़ा कर ऐसे hi नहीं चले जाते और फिर बात न करने के बहाने बनाते'

मोहनलाल 'देखो तुम्हे जो समझना है समझो मैं उसमे कुछ नहीं कर सकता, लेकिन अब तुम सिर्फ और सिर्फ मेरी बेटी हो'

रुचिका 'ha....ha....ha....ha...ha....ha, जिन लोगों के सामने हम पति पत्नी थे उनको क्या बताओगे'

मोहनलाल 'मैं उनसे मिलूंगा hi नहीं'

रुचिका 'कहना बहुत आसान है, क्या आप अपना काम बंद कर डोज या कभी उनके फ़ोन का जवाब hi नहीं डोज, आज hi दिया कई बार फ़ोन कर चुकी है, क्या जवाब दू उससे, मेरी तू समझ से परे है, इसलिए फ़ोन hi नहीं उठाया'

मोहनलाल 'वो सब मैनेज करना पड़ेगा, लेकिन अब तुम सिर्फ मेरी बेटी हो'

रुचिका 'कैसे मैनेज करूँ, उन्हें सच्चाई बता देती हूँ की आप मेरे पति नहीं बल्कि मेरे पापा हैं'

मोहनलाल 'देखो कुछ न कुछ रास्ता निकालेंगे, लेकिन फिलहाल तुम मेरी बेटी हो'

रुचिका फिर से फैट पड़ी 'क्या बार बार बेटी... बेटी... लगा रखा है, मुझे सब पता है आप मुझे कैसे देखते थे, क्या वो सब बेटी को देखने का नजरिया था'

मोहनलाल 'मैंने वो सब तुम्हारे कहने पर hi किया था और वो जो कुछ भी किया था या हुआ था वो सब एक नाटक का हिस्सा था और उससे जयादा कुछ नहीं'

रुचिका 'वो सब मेरे कहने पर किया था क्या आपको समझ नहीं थी, बल्कि अपने मुझे ऐसी उलझन में फंसा दिया है की उसमे से मेरा निकलना मुश्किल कर दिया है. आप अपने दिल पर हाथ रखकर बताओ की वो सब नाटक था या आप ने दिल से मुझे चाहा है और उस सब में हम दोनों की सहमति थी' उसकी बात सुनकर मोहनलाल थोड़ा विचलित हो गया था लेकिन उसने ये कहकर फ़ोन बंद कर दिया की 'मैं सिर्फ और सिर्फ अब अपनी बेटी से बात कर सकता हूँ' फ़ोन बंद होने पर रुचिका को गुस्सा तू बहुत आया लेकिन गुस्से को काबू में रखते हुए उसने फ़ोन किया तू बेल्ल होती रही लेकिन फ़ोन पिक नहीं हुआ और ऐसा कई बार हुआ लेकिन बात वंही की वंही. अब रुचिका जो दिन में अपने आप को मजबूत दिखा रही थी, वो बातें याद कर के रोटी रही.
 
यू अरे ओने ऑफ़ थे फिनस्ट रीडर हु वोउल्ड नेवर मिस अन्य अपडेट. नॉट ओनली थिस यू मेक आईटी ा पॉइंट तो रिव्यु बेऔतिफुल्ली एंड ब्रिंग आउट फिनस्ट पॉइंट्स ऑफ़ थे उपदटेस.

वेल ी अंडरस्टैंड तहत एच एंड एव्री अपडेट ऑफ़ माइन can't एंटरटेन अस एच डिटेल इस बीइंग एस्प्लेनेड. िफ़ ठोस डिटेल्स अरे मिस्ड थें एंटरटेनमेंट वोउल्ड डेफिनिटेली बे तेरे इन एच एंड एव्री अपडेट बूत वोउल्ड रेज मान्य क्वेरीज.

सो तो वर्के तहत डिटेलिंग इस तेरे.

होवेवेर सयिंग तहत , ी वोउल्ड डेफिनिटेली टेक केयर ऑफ़ योर वैल्युएबल सुग्गेस्टियन्स एंड यू वोउल्ड हैवे आल थे फन.

थैंक्स सी मच फॉर कॉन्टिनोएड सपोर्ट.
 
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रुचिका 'वो सब मेरे कहने पर किया था क्या आपको समझ नहीं थी, बल्कि अपने मुझे ऐसी उलझन में फंसा दिया है की उसमे से मेरा निकलना मुश्किल कर दिया है. आप अपने दिल पर हाथ रखकर बताओ की वो सब नाटक था या आप ने दिल से मुझे चाहा है और उस सब में हम दोनों की सहमति थी' उसकी बात सुनकर मोहनलाल थोड़ा विचलित हो गया था लेकिन उसने ये कहकर फ़ोन बंद कर दिया की 'मैं सिर्फ और सिर्फ अब अपनी बेटी से बात कर सकता हूँ' फ़ोन बंद होने पर रुचिका को गुस्सा तू बहुत आया लेकिन गुस्से को काबू में रखते हुए उसने फ़ोन किया तू बेल्ल होती रही लेकिन फ़ोन पिक नहीं हुआ और ऐसा कई बार हुआ लेकिन बात वंही की वंही. अब रुचिका जो दिन में अपने आप को मजबूत दिखा रही थी, वो बातें याद कर के रोटी रही.

उससे रट रट कब नींद आ गयी पता hi नहीं चला. अगले दिन सुबह फिर से उसकी माँ ने उठाया तू वो नाहा धोकर तैयार हो गयी और नाश्ता करने के बाद अपनी माँ से कहा की वो अपनी सहेली के साथ घूमने जा रही है तू उसकी माँ ने कहा 'आराम से जाना और जल्दी आ जाना'

उसने सीमा को फ़ोन करके घूमने का प्रोग्राम बनाया और खुद वंहा पंहुच गयी जंहा मिलना था. दोनों सहेलियां खूब गले मिली और सीमा उससे बहुत छेड़ती रही लेकिन आज उसने भी अपना मन पक्का कर लिया था की अब वो अपने पापा को यादों से धीरे धीरे बहार करेगी. सीमा से मिलकर उसको अच्छा लगा और वो घर आ गयी.

घर आकर जैसे hi वो खली होती तू टूर के पालो की याद आने लगाती और वो यादें उससे परेशान करती. रुचिका ने भी मन में थान लिया था की अब वो भी कमजोर नहीं पड़ेगी और इन परेशानियों का सामना करेगी. उसने अपने पापा को भी फ़ोन न करने का निर्णय ले लिया. ये जरूर है की इस निर्णय से वो मन hi मन बहुत व्यथित thi,ekin इसका हल उसने खोज लिया की अब जिंदगी में ऐसा खुछ करना है ताकि होटल जैसी जिंदगी अपने बुते पर प् सके. उसने काफी खोज बिन के बाद पता किया की ब की पढाई करने से उससे ये सब मिल सकता है तू उसने ब के एंट्रेंस के फॉर्म भरने शुरू कर दिए और पढाई में अपने आप को झोंक दिया.

वक़्त कब पंख लगा कर उड़ने लगा की वो फाइनल ईयर के एग्जाम भी दे चुकी थी और ब एंट्रेंस में भी सेलेक्ट हो चुकी थी. इस बिच उसके पापा एक बार घर पर आये लेकिन उसने अब उल्टा उनके सामने न जाने का प्राण किया लेकिन उसकी माँ की वजह से सामना तू हुआ लेकिन उसने भी दिखाया की उससे भी अपने पापा की कोई जयादा परवाह नहीं है. ये बात कोई दो महीने पहले की थी और जब उसके पापा आये थे तू वो डिस्टर्ब भी हो गयी थी लेकिन उसने अपने आप को संभल लिया था. उसका मन तू था की वो अपने पापा से खुलकर बात करे लेकिन उससे दर था की कहीं उसके पापा कोई ऐसी बात कह दे जिससे वो परेशान हो और उसकी पढाई में खलल पड़े, इसलिए उसने अपनी भावनाओं को दबा दिया.

रुचिका का रिजल्ट आ गया था और वो अब ग्रेजुएट हो गयी थी और उसकी यूनिवर्सिटी में बहुत अच्छी पोजीशन आयी थी, घर में उसकी माँ उसका रिजल्ट सुनकर बहुत खुश हुई थी. और घर में ख़ुशी का महल था. आदित्य भी बहुत खुश था और उसने रुचिका को एक अच्छा सा गिफ्ट भी दिया था. अब रुचिका को ब के एडमिशन के लिए बहार जाना था और उसने अपनी माँ से जाने के लिए कहा तू उसने कहा की 'तुम्हारे पापा आ रहे हैं, उनके साथ चली जाना' तू रुचिका ने कहा की वो अब बड़ी हो गयी है और अकेली चली जाएगी.

संध्या 'तेरे पापा तेरे साथ जायेंगे तू घिस नहीं जायेंगे' तब रुचिका ने कहा 'माँ हो सकता है मुझे कई जगह जाना पड़े और उसमे कई दिन भी लग सकते हैं तू पापा कान्हा से इतना वक़्त निकालेंगे'

संध्या 'उनको जाना hi पड़ेगा, तुम अपनी तयारी करो'

रुचिका के पास कोई चारा नहीं था और वो चुप करके अपने कमरे में आ गयी और वो आगे का सोच सोच कर परेशान होने लगी. उससे समझ नहीं आ रहा था की वो अपने पापा के साथ कैसे एडजस्ट कर पायेगी. उसने अपनी जिन भावनाओं को दबा कर रखा हुआ था वो कहीं उजागर न हो जाएँ. उसने सोचा की वो आदित्य को अपने साथ ले जाये तू. इस आशय से उसने आदित्य से साथ जाने के लिए पूछा तू वो राज़ी तू हो गया लेकिन उसके खुद के एक्साम्स होने की वजह से उसका जाना नामुमकिन हो गया. वो परेशान होने लगी. उसको समझ नहीं आ रहा था की वो अपने पापा का कैसे सामना करे और किस तरह का बर्ताव करे? ये सोचते हुए वो कब सो गयी पता hi नहीं चला.

अगले दिन उसके पापा आये तू संध्या ने उनसे कहा की वो रुचिका के साथ उसके अड्मिशन के लिए जायेंगे और कुछ दिन अपने काम से छूती ले ले. मोहनलाल बात सुनकर दुविधा में था, पहले तू मन करता रहा फिर मान गया.

मोहनलाल और रुचिका अड्मिशन के लिए अगले दिन सुबह सुबह hi निकल गए और रस्ते में कैब में मोहनलाल ने रुचिका को रिजल्ट के लिए कोंग्रटुलते किया तू उसने भी थैंक्स किया. मोहनलाल ने उससे बात करनी चाही लेकिन वो जयादा बात करने में इंटरेस्टेड नहीं लग रही थी. एयरपोर्ट पंहुच कर उन्होंने फ्लाइट पकड़ी और उस शहर पंहुच गए जंहा उन्हें जाना था. वंहा एयरपोर्ट से जैसे hi बहार निकले तू उन्हें सूरज और दिया (जो वंहा फ्लाइट पकड़ने आये थे) ने पकड़ लिया. अब तू रुचिका के लिए मुश्किल होने लगी, लेकिन अपने आप को संभल कर वो दिया से गले मिली और जब उसने शिकायत की तू उसने कहा की उसका मोबाइल गम हो गया था और किसी का भी नंबर नहीं है. वंहा पर उन दोनों ने अगले हफ्ते उनकी एनिवर्सरी पार्टी पर इन्विते किया और बड़े प्यार से उन्हें कहा की वो कोई भी बहाना नहीं सुनेगे. इतना कहकर वो तू चले गए लेकिन इन् दोनों के लिए अब परेशानी कड़ी करके चले गए.

मोहनलाल और रुचिका दोनों hi एक दूसरे को देखने लगे, लेकिन दोनों का देखने का अंदाज़ अलग था. रुचिका अभी अपने आप को इसमें उलझना नहीं चाहती थी और उसने इंस्टिट्यूट जाने के लिए एक कैब खुद hi बुक की और पापा के साथ वंहा पहुँच गए. वंहा पर इंटरव्यू देने के बाद वो कोई 12 बजे तक फ्री हो गयी थी और रिजल्ट का इंतज़ार था जो 1 बजे आना था तू वो कैंटीन में जाकर कॉफ़ी पीना चाहती थी. चाहे अनचाहे अपने पापा को भी ले गयी और वंहा पर कॉफ़ी लेकर टेबल लार बैठी हुई सोच रही थी की अड्मिशन होगा की नहीं, तभी मोहनलाल ने अपने हाथ को रुचिका के हाथ पर रख दिया तू रुचिका एकदम से चौंक गयी और अपने हाथ को छुड़ाने की कोशिश करने लगी, लेकिन मोहनलाल के मजबूत हाथ के पकड़ की वजह से सफल न हो पायी. उसने आँखें उठा कर मोहनलाल की तरफ गुस्से वाले अंदाज़ में देखा तू मोहनलाल 'मुझे पता है की तुम मुझसे नाराज़ हो'

रुचिका 'मैं क्योँ आपसे नाराज़ होउंगी, आप प्लीज मेरा हाथ छोड़ दीजिये'

मोहनलाल 'इतने नरम नरम और मुलायम हाथ को भी कोई छोड़ता है, हाँ तुम्हारी साडी नाराजगी मैं दूर कर दूंगा, ये वादा है'

रुचिका 'न तू मैं नाराज़ हूँ और न hi मुझे आपसे कोई वादा चाहिए'

मोहनलाल 'मैं समझ सकता हु की तुम्हे मेरी बात का बहुत बुरा लगा है ी ऍम सॉरी और रिक्वेस्ट है की प्लीज नाराज़ न हो'

रुचिका 'मैं आपसे सही में नाराज़ नहीं हु और आप सॉरी क्योँ बोल रहे हैं, आपने कोई गलती थोड़ी न की है. आपने तू बिलकुल सही बोलै था की मैं आपकी बेटी हूँ और मेरा भी वादा है की आपकी शान में कभी गुस्ताखी नहीं होगी'

मोहनलाल हलके से उसका हाथ सहलाते हुए और उसके चेहरे को बड़े hi प्यार से निहारते हुए 'रुचिका मुझे समझ आ गया है की उस टूर ने वाकई हमारी जिंदगी बदल दी है और उस टूर ने हमारे रिश्ते को एक नया नाम दे दिया है. हम अब चाहे या न चाहे उस नए रिश्ते का नाटक कुछ लोगों के सामने करना hi पड़ेगा'

रुचिका 'मैंने अपने आप को बड़ी मुश्किल से समझा लिया है और अब मैं दुबारा किसी भी कीमत पर उस जाल में फसने को तैयार नहीं हूँ. आपने कहा था न की मैनेज कर लेंगे तू आप कीजिये न, मैं बीच में नहीं आउंगी, लेकिन मुझे अब इस सब में न hi घसीटो तू अच्छा है'

मोहनलाल 'मैंने कोई जानभूझकर सूरज और दिया को तू बुलाया नहीं था की वो आकर हमसे एयरपोर्ट पर मिले और आज जो हुआ, ऐसे कई मौके आएंगे तब हम क्या करेंगे'

रुचिका अभी कुछ कहती की तभी अनाउंसमेंट हुई की रिजल्ट आउट हो चूका तू वो जल्दी से वंहा से उठी और नोटिस बोर्ड की तरफ जल्दी से जाने लगी और मोहनलाल उसके पीछे पीछे.

रुचिका जाकर रिजल्ट देखती है तू पता लगता है की उसका नाम वेटिंग लिस्ट में है और जो भी आज अड्मिशन नहीं लेगा उसकी जगह पर कल वेटिंग लिस्ट से एडमिशन हो गया. रुचिका थोड़ी सी उदास थी, लेकिन उम्मीद भी थी की शायद एडमिशन हो hi जाये. अब समस्या ये थी की शाम की फ्लाइट की टिकट थी जो उसने फ़ोन करके पोस्टपोन की और अब ठरना था तू मोहनलाल ने कहा की किसी होटल में रुक जाते हैं. कोई चारा नहीं था तू रुकना hi था, लेकिन उससे वो पल याद आने लगे जब वो पिछली बार अपने पापा के साथ उनकी पत्नी बनकर आयी थी.

मोहनलाल 'अगर तुम कहो तू होटल जाने से पहले कहीं लंच कर ले'

रुचिका तू होश में नहीं थी तू उसने कहा 'जैसा आप ठीक समझो'

दोनों एक अच्छे से रेस्टोरेंट में चले गए जिनमे प्राइवेट काबिन्स भी थे और वंहा पूरी प्राइवेसी थी. वो दोनों वंहा पर लंच का आर्डर करके बैठकर इंतज़ार कर रहे थे तू मोहनलाल ने उचित वक़्त समझते हुए बात शुरू की.

मोहनलाल उसके थोड़ा नज़दीक होते हुए 'मैं गलत था और तुम सही थी की मैनेज कर लेंगे, कहना जितना आसान था करना नहीं है और अब हमें मिलकर hi इसका हल खोजना पड़ेगा'

रुचिका 'मुझे अब उन सब से कोई मतलब नहीं है और जयादा हुआ तू मैं उन्हें पहचानोगी hi नहीं और कह दूंगी की मैं वो नहीं हूँ जो आप समझ रहे हैं'

मोहनलाल 'इसमें तू बहुत समस्या हो जाएगी क्योँकि मैं तू नहीं कह पाउँगा की मैं वही शक्श नहीं हु बल्कि कोई और हूँ'

रुचिका 'तू ठीक है, आप और मैं कभी इक्कठे नहीं जायेंगे और फिर जो मर्जी बहाना बना देना'

मोहनलाल 'ये भी पॉसिबल नहीं है, कभी न कभी तू हम दोनों इक्कठे होंगे hi, और मानो आज की तरह फिर मुलाकात हो गयी तू क्या करेंगे'

रुचिका ने झुंझलाकर कहा 'तू ठीक है, मैं मर जाती हु तू फिर न बांस होगा और न बांसुरी, आप जो मर्जी कहते रहना'

उसकी बात सुनकर मोहनलाल को इतना गुस्सा आ गया की उसका हाथ उठ गया और वो रुचिका के गाल से चिपकता उसने अपने हाथ की डायरेक्शन मोड़ कर दिवार पर दे मारा और कहने लगा 'अगर तुमने मरने की बात की तू मैं पूरी दुनिया को आग लगा दूंगा और खुद को मार डालूंगा'

रुचिका अपने पापा को ऐसे गुस्से में पहली बार देख रही थी, उससे समझ नहीं आ रहा था की वो ऐसा क्योँ बेहवे कर रहे हैं. रुचिका ने देखा की उसके पापा के हाथ में चोट लग गयी है और उनके हाथ में सूजन आ गयी है तू उसने आगे बढ़कर उनका वो हाथ पकड़ लिया और हलके हलके सहलाते हुए पूछने लगी 'आपने ऐसा क्योँ किया और आप को क्या फरक पड़ेगा अगर मैं मर जाउंगी'

मोहनलाल ने उस हाथ को जटके से चढ़ा लिया और कहने लगा 'तुम्हे अब तक समझ नहीं आया. लो फिर सुनो ी लव यू, लव यू & लव यू'

रुचिका को उसकी बात सुनकर हंसी आ गयी और कहने लगी 'पापा तू अपनी बेटी से लव करते hi हैं तू इसमें कौन सी बड़ी बात है'

मोहनलाल 'ी लव यू अस ा मन लव्स ा वुमन'

रुचिका 'मुझे आपके जाल में दुबारा नहीं फसना, बड़ी मुश्किल से निकलने की कोशिश कर रही हु, इस बार फांसी तू फिर निकलना hi मुश्किल हो जायेगा'

मोहनलाल 'रुचिका, मैं तुम्हे दिल की गहराईयों से प्यार करता हूँ. मैं समाज की वजह से डरता था, लेकिन अब मैं तुम से प्यार करना नहीं छोड़ सकता, अब ये तुम्हारी इच्छा है की मेरे प्यार को अपनाओ या नहीं, वो तुम्हारी मर्जी, लेकिन मुझे तुम्हे प्यार करने से कोई नहीं रोक सकता'

रुचिका 'अपनी बेटी से प्यार करोगे, आपको बुरा नहीं लगेगा'

मोहनलाल ने उसका एक हाथ अपने हाथ में ले लिया क्योँकि दूसरे में तू उससे चोट लगी हुई थी और बड़े hi प्यार से उसको देखते हुए 'मुझे नहीं पता की ये गलत है या सही, लेकिन ये सच है की मैं तुमसे प्यार करता हूँ और मैंने भी पिछले कुछ महीने बड़ी मुश्किल से अपने आप से लड़ते हुए निकले हैं. मैंने कभी नहीं सोचा था की ऐसा होगा, लेकिन ये शायद भगवन की hi मर्जी है की उसने हमें पति पत्नी बनने का मौका दिया और उस दौरान हमारे दिलों में प्यार का बीज बो दिया. अब तुम मेरी बेटी हो तो हो, लेकिन प्यार उस रिश्ते को नहीं मंटा, बल्कि वो एक नया रिश्ता बना देता है. तुम मेरी जान हो और हमेशा रहोगी. लव यू' ये कहकर उसकी हथेली को चुम लेता है.

रुचिका को ये तू समझ आ गया की उसके पापा भी उससे उतना hi प्यार करते हैं जितना वो उनसे करती है, लेकिन उसने अपने मन को काफी हद तक समझा लिया था की इससे दूर होने में hi भलाई है, लेकिन अब उसका मन विचलित होने लगा था क्योँकि उसके पापा जो अब प्रियतम बनकर सामने आये थे उससे फिर से अपनी तरफ खींच रहे थे. उससे समझ नहीं आ रहा था की क्या करे, तभी दूर पर नॉक हुई और वेटर आकर आर्डर सर्वे करके चला गया था.

उसके जाने के बाद मोहनलाल ने रुचिका से खाना खाने के लिए कहा तू दोनों ने अपनी अपनी प्लाटों में खाना डाला और जब खाना शुरू किया तू मोहनलाल के दांये हाथ में चोट लगी होने के कारन वो अपने बांये हाथ से ग्राही तोड़ने की कोशिश कर रहा था की रुचिका ने पहला ग्रास मोहनलाल की तरफ बढ़ा कर खाने के लिए कहा तू मोहनलाल ने वो ले लिया और बोलै 'अपने पापा को खिला रही हो' तब रुचिका ने आँखें झुका कर कहा 'थिस इस फॉर माय लव' वो बोल तू गयी लेकिन उसकी साँसें ऊपर नीचे होने लगी.

ये बात सुनकर मोहनलाल खुश हो गया और उसके नजदीक पंहुच कर उसको अपनी बांहों के घेरे में लेकर 'थैंक्स की तुमने मेरे प्यार को स्वीकार कर लिया'

रुचिका ने भी अपनी बांहों का घेरा मोहनलाल के गले में दाल दिया तू मोहनलाल ने उससे अपने आगोश में भींच लिया. दोनों की आँखों में नमी थी, लेकिन ख़ुशी की. उसके बाद दोनों हंसी ख़ुशी एक दूसरे को खाना खिलते रहे और मोहनलाल अपने हाथ के दर्द को भूल गया. स्वीट डिश दोनों ने एक hi चमच से खायी और एक दूसरे को खिलाई.

लंच ख़तम करके अपने हाथों को साफ़ करके उन दोनों ने चलने का निर्णय लिया और जैसे hi चलने के लिए खड़े हुए तू रुचिका आकर मोहनलाल से गले लग गयी और कहने लगी 'ी लव यू'

मोहनलाल ने उससे अपने साथ लिपटा कर भींच लिया और उसके कान में कहा 'लव यू फ्रॉम थे कोर ऑफ़ माय हार्ट' रुचिका ने ये सुना और अपने हाथों को मोहनलाल की पीठ पर ले गयी और उन्हें कास लिया. इससे रुचिका के बूब्स मोहनलाल की छथि में धंस गए और दोनों के अरमान भड़कने लगे. उन दोनों की साँसे तेज़ होने लगी तू रुचिका ने अपने चेहरे को उठाकर मोहनलाल की तरफ देखते हुए कहा 'अब तू आप मुझे फिर से मझधार में नहीं छोड़ डोज'

मोहनलाल उसकी बात सुनकर अपने चेहरे को उसके चेहरे के नजदीक करते हुए उसके माथे को चूमकर 'अब तुम्हे मुझसे कोई अलग नहीं कर सकता, चाहे वो मैं hi क्योँ न हूँ'

रुचिका ने ये सुनकर मोहनलाल के चेहरे पर चुम लिया तू मोहनलाल ने भी प्रतिक्रिया में उसके नरम नरम गलों पर अपने होठों से स्पर्श किया तू रुचिका सिहर उठी तू मोहन लाल ने अब होठों को दूसरे गाल पर भी स्पर्श किया तू रुचिका की साँसे तेज़ हो गयी और उसने धीरे से कहा 'चलें' तू मोहनलाल ने कहा 'ठीक है' और वो वंहा से बहार निकलने लगे.
 
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