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- Dec 5, 2013
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उसके बाद वो स्टेशन पर पंहुचकर टैक्सी से घर आ गए. टैक्सी में दोनों बहुत hi करीब बैठे थे और उनकी टंगे आपस में रगड़ खा रही थी. घर पंहुचकर रुचिका अपनी माँ से मिलकर और अपने को थका हुआ बोलकर अपने रूम में चली गयी और मोहनलाल संध्या के साथ अपने रूम में आ गया.
संध्या ने मोहनलाल से खाने के बारे में पूछा तू उसने बताया की खाना ट्रैन में hi खा लिया था. संध्या ने पूछा की 'टूर कैसा रहा' तू मोहनलाल ने कहा की 'मेरे लिए तू नार्मल टूर था, बेटी से पूछना की उससे कैसा लगा'
संध्या ने कहा 'क्योँ आपने उससे नहीं पूछा की उससे टूर कैसा लगा' तब मोहनलाल ने कहा 'मुझे तू वो अच्छा hi बताएगी, हाँ वो तुम्हारे साथ जयादा नज़दीक है तू तुम्हे जयादा अच्छा बताएगी की उससे टूर कैसा लगा, चलो अब सोते हैं, मुझे कल जल्दी निकलना है'
संध्या ने कहा 'ये भी कोई बात हुई, अभी तू आये हो और अब कल जाने की बात कर रहे हो'
मोहनलाल 'क्या करूँ, काम के लिए तू जाना hi पड़ेगा न, वो तू अगर रुचिका साथ नहीं होती तू शायद मैं वंही से hi चला जाता, लेकिन उससे छोड़ने के लिए आ गया'
संध्या 'अब जब आपको जाना hi है तू मई कर भी क्या सकती हु, चलो आप अब आराम करो' ये कहकर उसने लाइट बंद कर दी और वो भी मोहनलाल के पास लेत गयी. मोहनलाल भी सोने की कोशिश करने लगा.
अब कहानी थोड़ा प्रेजेंट में चलेगी
मोहनलाल असल में भी जो रुचिका के साथ पुणे में था, नींद के अघोष में चला गया और रुचिका को गले लगाया लगाए hi सो गया.
चलो इन दोनों को हम यही छोड़कर आदित्य और संध्या के पास चलते हैं.
उसकी बात सुनकर वो दोनों hi हंसने लगे और इधर आदित्य कुछ कुछ अंग्रेजी के वर्ड्स सीखता रहा और घुटने पर इस तरह से मालिश कर रहा तह जिससे संध्या की उत्तेजना को बढ़ावा मिले, ताकि उसके मुंह से सिसकारियां संकर आदित्य को मजा आ रहा था और वो उसकी खूबसूरती में खोया हुआ था. काफी देर के बाद दोनों को नींद आने लगी तू आदित्य अपने कमरे में चला गया और अब वो दोनों सोने की तयारी कर रहे थे.
आदित्य सोते हुए सोच रहा था उसे क्या करना चाहिए क्यूंकि अब वह धीरे धीरे अपनी माँ की तरफ आकर्षित होने लगा था और उसके मन में कुछ कुछ नयी फीलिंग्स जन्म ले रही थी. वह बहुत कुछ सोच रहा था और सोचते सोचते कब नींद के आगोश में चला गया उसी पता hi नहीं चला और उधर संध्या में एक नै ऊर्जा का संचार हो रहा था और उस नयी ऊर्जा के साथ वह भी निद्रादेवी की गॉड में चली गई.
अगली सुबह आदित्य उठकर एक्सरसाइज करने लगा, लेकिन आज उसका एक्सरसाइज से धयान बार बार भांग हो रहा था. एक्सरसाइज करते हुए भी उसका ध्यान बार बार भटक कर अपनी माँ पर चला जाता जिससे एक्सरसाइज करने में दिक्कत होने लगी. थोड़ी देर बाद एक्सरसाइज छोड़कर वापस कमरे में आकर बीएड पैर लेट गया और ऑंखें बंद करके लेटने की कोशिश करने लगा. उसे यहाँ भी सफलता नहीं मिली और लेट कर भी उसके मन में अपनी माँ संध्या का चेहरा सामने नज़र आने लगा और उसे समझ नहीं आ रहा था ऐसा क्यों हो रहा है. काफी देर तक बीएड पर लेता रहा, लेकिन उसके ख्यालों से उसकी माँ नहीं निकली.
आदित्य बाथरूम में जाकर निथ्य करम करने के बाद नहाने के लिए शावर के निचे गया तू जैसे hi उसके शरीर पर पानी पड़ा तू उसे आनंद आने लगा और उसे आनंद में एक बार फिर से अपनी माँ दिखाई देने लगी उसने अपनी आँखें बंद कर ली. आँखे बंद करते hi उसने सोचा की उसकी माँ का चेहरा गायब हो जाएगा लेकिन हुआ कुछ उल्टा hi. उसकी माँ के चेहरे पर कशिश उसे अपनी और खींचने लगी और उसका मन अपने आप hi माँ के चेहरे की कशिश में खोने लगा. उसके दिल में हलचल मचने लगी और उसका मन कर रहा था की उस चेहरे को अपने आप से दूर न जाने दे. वो सोचने लगा की उससे क्या होता जा रहा है और इस चेरे को अपने से दूर नहीं जाने देना चाहता था, लेकिन वो अभी कुछ और सोचता उसकी माँ की आवाज़ आयी 'आदित्य, जल्दी आ जाओ, नाश्ता तैयार है'
आदित्य अपनी सोचो को एक तरफ रखते हुए जल्दी से शावर लेकर बाथरूम से बहार आया और कपडे पहन कर तैयार हो कर कमरे से बहार आया और ड्राइंग रूम में आ गया.
ड्राइंग रूम में आकर वो देखता है की उसकी माँ दिंनिंग टेबल पर ब्रेकफास्ट लगा रही थी. उसने अपनी माँ को देखते hi 'गुड मॉर्निंग' बोलै तू संध्या ने भी स्माइल करते हुए उसे 'गुड मॉर्निंग' कहती है. आज उसकी माँ कुछ जयादा. hi सुन्दर लग रही थी. वैसे तू संध्या बहुत. खूबसूरत थी, लेकिन आज ऐसा लग रहा था की शायद आदित्य का अपनी माँ को देखने का नजरिया बदल गया था जिस वजह से वो उससे आज कुछ जयादा hi सुन्दर लग रही थी. उसका मन नहीं हो रहा था की वो अपनी माँ से नज़र हटाए, लेकिन उसके मन में कनिह न कनिह ये दर भी था की उसकी माँ बुरा न मान जाये, इसलिए अपनी नज़रो को न चाहते हुए भी उसके चेहरे से हटा लिया.
संध्या ने आज आलू के परांठे बनाये थे जो उसने प्लेट में डालकर आदित्य को खाने के लिए कहा तू आदित्य को पता नहीं क्या हुआ उसने प्लेट में से परांठे का एक टुकड़ा तोड़कर उसमे दही लगा कर अपनी माँ के मुंह की तरफ ले जाकर बड़े प्यार से खाने के लिए कहा तू संध्या ने पूछा 'क्या बात है, आज बड़ा प्यार आ रहा है'
आदित्य 'आज hi क्योँ, प्यार तू आपसे हमेशा hi है. वो आज आप पहली बार फिर से पढ़ने जा रही है तू मेरे दिल ने कहा की आपको आज अपने हाथ से खिलौन जैसे कभी आप मुझे खिलाती थी' और फिर संध्या को वो टुकड़ा खिला दिया. फिर दूसरा टुकड़ा भी खिला दिया. दूसरा टुकड़ा खिलते हुए आदित्य के हाथ की उँगलियों ने संध्या के होठों को छुआ तू आदित्य को एक करंट लगा जिससे उसकी उत्तेजना बढ़ने लगी और उधर संध्या उससे इस तरह कहते हुए भावुक होने लगी.
आदित्य ने जब देखा की उसकी माँ के आखें नाम हो गयी हैं तू उसने अपनी उँगलियों के पोरों से उसकी नमी को हटते हुए पूछ 'क्या हुआ' तू उसकी माँ ने कहा 'कुछ नहीं, बस ऐसे hi, इतने प्यार से मुझे आज तक कभी किसी ने नहीं खिलाया तू तुम्हारा प्यार देखकर ख़ुशी से मेरी आँखें नाम हो गयी'
उसकी बात सुनकर आदित्य बड़े प्यार से उसके गलो को सहलाते हुए 'अगर ऐसी बात है तू आज से आप को रोज मैं hi खिलाया करूँगा' जिससे सुनकर संध्या और भी भावुक हो गयी और उसकी आँखों से आंसू निकलने लगे तू आदित्य उठकर संध्या की कुर्सी के पास जाकर उसके आंसुओं को अपने हाथों से साफ़ करते हुए उसके नरम नरम गलों को सहलाते हुए कहने लगा 'आप शांत हो जाइये और आज से मैं आपको रोज खिलाऊंगा'
संध्या ने उसकी बाज़ू पकड़ कर कुर्सी पर बैठने के लिए कहा और फिर अपने हाथ से वो भी आदित्य को खिलने लगी, जिससे आदित्य को मज़ा आने लगा और वो संध्या को आज एक अलग hi नज़र से देखने लग जाता. संध्या जैसे hi उससे खिलने लगती तू आदित्य की कोशिश होती की वो अपनी माँ की उँगलियों को अपने मुंह से स्पर्श कर सके और जब वो संध्या को खिलता तू उसका मन करता की उसके होठों को छू सके. इस खेल में वो दोनों तरफ से मज़े ले रहा था. ऐसा करते करते दोनों ने ब्रेकफास्ट ख़तम किया और चलने के लिए बहार आ गए.
आदित्य बाइक ले आया और संध्या आज कुछ अलग hi लग रही थी. उसके पहनावे से कोई नहीं कह सकता था की वो आदित्य की माँ हो सकती है. वो 20 से 25 के बिच की लग रही थी. उसके आत्मविश्वास ने उसके चेहरे पर एक नयी उमंग लेकर उसके चेहरे से एक अलग तरह की आभा का एहसास होता था. आदित्य ने उसे अपनी बाइक पर बिठाया तू वो कुछ ज्यादा hi मस्ती में लग रही थी क्योकि वो आदित्य से काफी सात के बैठी थी और अपनी चूचिया को उसकी पीठ पर लगा ली थी. उसकी चूचियों का आदित्य को जैसे hi अपनी पीठ पर एहसास हुआ तू उसकी उत्तेजना बढ़ने लगी, लेकिन अपनी उत्तेजना पर काबू पते हुए उसने बाइक आगे बढ़ा दी. संध्या का एक हाथ आदित्य के कंधे पर था जिससे बाइक के चलते hi वो आदित्य के ऊपर लड़ सी गयी. आदित्य, जिसके मन में अपनी माँ के प्रति सुबह से hi अलग भाव आ रहे थे, उसके इस तरह लड़ने से उसके मनोभावों को आग देने में कोई कसार बाकि नहीं रह गयी थी.
आदित्य अपने hi ख्यालों में गम था की संध्या ने पूछा 'तुम अब मुझे छोड़कर कॉलेज जाओगे'
आदित्य 'हाँ माँ'
संध्या 'माँ नहीं, संध्या'
आदित्य 'क्योँ माँ'
संध्या 'लगता है भूल गए की मैं अब तुम से उम्र में छोटी हु और तुम्हारी माँ नहीं हो सकती'
आदित्य 'लेकिन हो तू मेरी माँ hi न'
संध्या 'हमने डीडे किया था की मैं तुम्हारी रिश्तेदार हु और मुझे संध्या कहकर पुकारोगे'
आदित्य को उसकी बात सुनकर एक अजीब सी फीलिंग आ रही थी, लेकिन प्रत्यक्ष में उसने कहा 'ठीक है कोशिश करूँगा'
संध्या 'कोई कोशिश नहीं, मुझे संध्या बोलना hi होगा और जब तक मुझे संध्या नहीं बोलोगे मैं आज बाइक से नहीं उतरूंगी'
आदित्य ने बड़ी मुश्किल से अपने को सँभालते हुए 'Sa...aa..n..dh..ya'
संध्या 'अब से मुझे मेरे नाम से hi बुलाओगे'
आदित्य 'कोशिश करूँगा'
ऐसे hi बातें करते करते वो दोनों उस जगह पंहुच गए जंहा पर संध्या को जाना था. वंहा पंहुच कर आदित्य ने अपनी माँ से कहा 'संध्या आपका इंस्टिट्यूट आ गया है, बेस्ट ऑफ़ लक'
संध्या स्माइल करते हुए 'थैंक्स, लेकिन मुझे आप नहीं अब से तुम बोलोगे क्योँकि मैं नहीं चाहती की लोगों को हमारे रिश्ते का पता चले, अब से मैं उम्र में छोटी होने के कारन मुझे संध्या और तुम कहकर hi पुकारोगे'
आदित्य 'कोशिश करूँगा, अभी आप जाओ एंड टेक केयर' संध्या उसकी बात सुनकर मुंह बनाये हुए हंस दी और चली गयी और आदित्य उससे तब तक देखता रहा जब तक वो उसकी नज़रो से ओझल नहीं हो गयी.
उसके बाद वो स्टेशन पर पंहुचकर टैक्सी से घर आ गए. टैक्सी में दोनों बहुत hi करीब बैठे थे और उनकी टंगे आपस में रगड़ खा रही थी. घर पंहुचकर रुचिका अपनी माँ से मिलकर और अपने को थका हुआ बोलकर अपने रूम में चली गयी और मोहनलाल संध्या के साथ अपने रूम में आ गया.
संध्या ने मोहनलाल से खाने के बारे में पूछा तू उसने बताया की खाना ट्रैन में hi खा लिया था. संध्या ने पूछा की 'टूर कैसा रहा' तू मोहनलाल ने कहा की 'मेरे लिए तू नार्मल टूर था, बेटी से पूछना की उससे कैसा लगा'
संध्या ने कहा 'क्योँ आपने उससे नहीं पूछा की उससे टूर कैसा लगा' तब मोहनलाल ने कहा 'मुझे तू वो अच्छा hi बताएगी, हाँ वो तुम्हारे साथ जयादा नज़दीक है तू तुम्हे जयादा अच्छा बताएगी की उससे टूर कैसा लगा, चलो अब सोते हैं, मुझे कल जल्दी निकलना है'
संध्या ने कहा 'ये भी कोई बात हुई, अभी तू आये हो और अब कल जाने की बात कर रहे हो'
मोहनलाल 'क्या करूँ, काम के लिए तू जाना hi पड़ेगा न, वो तू अगर रुचिका साथ नहीं होती तू शायद मैं वंही से hi चला जाता, लेकिन उससे छोड़ने के लिए आ गया'
संध्या 'अब जब आपको जाना hi है तू मई कर भी क्या सकती हु, चलो आप अब आराम करो' ये कहकर उसने लाइट बंद कर दी और वो भी मोहनलाल के पास लेत गयी. मोहनलाल भी सोने की कोशिश करने लगा.
अब कहानी थोड़ा प्रेजेंट में चलेगी
मोहनलाल असल में भी जो रुचिका के साथ पुणे में था, नींद के अघोष में चला गया और रुचिका को गले लगाया लगाए hi सो गया.
चलो इन दोनों को हम यही छोड़कर आदित्य और संध्या के पास चलते हैं.
उसकी बात सुनकर वो दोनों hi हंसने लगे और इधर आदित्य कुछ कुछ अंग्रेजी के वर्ड्स सीखता रहा और घुटने पर इस तरह से मालिश कर रहा तह जिससे संध्या की उत्तेजना को बढ़ावा मिले, ताकि उसके मुंह से सिसकारियां संकर आदित्य को मजा आ रहा था और वो उसकी खूबसूरती में खोया हुआ था. काफी देर के बाद दोनों को नींद आने लगी तू आदित्य अपने कमरे में चला गया और अब वो दोनों सोने की तयारी कर रहे थे.
आदित्य सोते हुए सोच रहा था उसे क्या करना चाहिए क्यूंकि अब वह धीरे धीरे अपनी माँ की तरफ आकर्षित होने लगा था और उसके मन में कुछ कुछ नयी फीलिंग्स जन्म ले रही थी. वह बहुत कुछ सोच रहा था और सोचते सोचते कब नींद के आगोश में चला गया उसी पता hi नहीं चला और उधर संध्या में एक नै ऊर्जा का संचार हो रहा था और उस नयी ऊर्जा के साथ वह भी निद्रादेवी की गॉड में चली गई.
अगली सुबह आदित्य उठकर एक्सरसाइज करने लगा, लेकिन आज उसका एक्सरसाइज से धयान बार बार भांग हो रहा था. एक्सरसाइज करते हुए भी उसका ध्यान बार बार भटक कर अपनी माँ पर चला जाता जिससे एक्सरसाइज करने में दिक्कत होने लगी. थोड़ी देर बाद एक्सरसाइज छोड़कर वापस कमरे में आकर बीएड पैर लेट गया और ऑंखें बंद करके लेटने की कोशिश करने लगा. उसे यहाँ भी सफलता नहीं मिली और लेट कर भी उसके मन में अपनी माँ संध्या का चेहरा सामने नज़र आने लगा और उसे समझ नहीं आ रहा था ऐसा क्यों हो रहा है. काफी देर तक बीएड पर लेता रहा, लेकिन उसके ख्यालों से उसकी माँ नहीं निकली.
आदित्य बाथरूम में जाकर निथ्य करम करने के बाद नहाने के लिए शावर के निचे गया तू जैसे hi उसके शरीर पर पानी पड़ा तू उसे आनंद आने लगा और उसे आनंद में एक बार फिर से अपनी माँ दिखाई देने लगी उसने अपनी आँखें बंद कर ली. आँखे बंद करते hi उसने सोचा की उसकी माँ का चेहरा गायब हो जाएगा लेकिन हुआ कुछ उल्टा hi. उसकी माँ के चेहरे पर कशिश उसे अपनी और खींचने लगी और उसका मन अपने आप hi माँ के चेहरे की कशिश में खोने लगा. उसके दिल में हलचल मचने लगी और उसका मन कर रहा था की उस चेहरे को अपने आप से दूर न जाने दे. वो सोचने लगा की उससे क्या होता जा रहा है और इस चेरे को अपने से दूर नहीं जाने देना चाहता था, लेकिन वो अभी कुछ और सोचता उसकी माँ की आवाज़ आयी 'आदित्य, जल्दी आ जाओ, नाश्ता तैयार है'
आदित्य अपनी सोचो को एक तरफ रखते हुए जल्दी से शावर लेकर बाथरूम से बहार आया और कपडे पहन कर तैयार हो कर कमरे से बहार आया और ड्राइंग रूम में आ गया.
ड्राइंग रूम में आकर वो देखता है की उसकी माँ दिंनिंग टेबल पर ब्रेकफास्ट लगा रही थी. उसने अपनी माँ को देखते hi 'गुड मॉर्निंग' बोलै तू संध्या ने भी स्माइल करते हुए उसे 'गुड मॉर्निंग' कहती है. आज उसकी माँ कुछ जयादा. hi सुन्दर लग रही थी. वैसे तू संध्या बहुत. खूबसूरत थी, लेकिन आज ऐसा लग रहा था की शायद आदित्य का अपनी माँ को देखने का नजरिया बदल गया था जिस वजह से वो उससे आज कुछ जयादा hi सुन्दर लग रही थी. उसका मन नहीं हो रहा था की वो अपनी माँ से नज़र हटाए, लेकिन उसके मन में कनिह न कनिह ये दर भी था की उसकी माँ बुरा न मान जाये, इसलिए अपनी नज़रो को न चाहते हुए भी उसके चेहरे से हटा लिया.
संध्या ने आज आलू के परांठे बनाये थे जो उसने प्लेट में डालकर आदित्य को खाने के लिए कहा तू आदित्य को पता नहीं क्या हुआ उसने प्लेट में से परांठे का एक टुकड़ा तोड़कर उसमे दही लगा कर अपनी माँ के मुंह की तरफ ले जाकर बड़े प्यार से खाने के लिए कहा तू संध्या ने पूछा 'क्या बात है, आज बड़ा प्यार आ रहा है'
आदित्य 'आज hi क्योँ, प्यार तू आपसे हमेशा hi है. वो आज आप पहली बार फिर से पढ़ने जा रही है तू मेरे दिल ने कहा की आपको आज अपने हाथ से खिलौन जैसे कभी आप मुझे खिलाती थी' और फिर संध्या को वो टुकड़ा खिला दिया. फिर दूसरा टुकड़ा भी खिला दिया. दूसरा टुकड़ा खिलते हुए आदित्य के हाथ की उँगलियों ने संध्या के होठों को छुआ तू आदित्य को एक करंट लगा जिससे उसकी उत्तेजना बढ़ने लगी और उधर संध्या उससे इस तरह कहते हुए भावुक होने लगी.
आदित्य ने जब देखा की उसकी माँ के आखें नाम हो गयी हैं तू उसने अपनी उँगलियों के पोरों से उसकी नमी को हटते हुए पूछ 'क्या हुआ' तू उसकी माँ ने कहा 'कुछ नहीं, बस ऐसे hi, इतने प्यार से मुझे आज तक कभी किसी ने नहीं खिलाया तू तुम्हारा प्यार देखकर ख़ुशी से मेरी आँखें नाम हो गयी'
उसकी बात सुनकर आदित्य बड़े प्यार से उसके गलो को सहलाते हुए 'अगर ऐसी बात है तू आज से आप को रोज मैं hi खिलाया करूँगा' जिससे सुनकर संध्या और भी भावुक हो गयी और उसकी आँखों से आंसू निकलने लगे तू आदित्य उठकर संध्या की कुर्सी के पास जाकर उसके आंसुओं को अपने हाथों से साफ़ करते हुए उसके नरम नरम गलों को सहलाते हुए कहने लगा 'आप शांत हो जाइये और आज से मैं आपको रोज खिलाऊंगा'
संध्या ने उसकी बाज़ू पकड़ कर कुर्सी पर बैठने के लिए कहा और फिर अपने हाथ से वो भी आदित्य को खिलने लगी, जिससे आदित्य को मज़ा आने लगा और वो संध्या को आज एक अलग hi नज़र से देखने लग जाता. संध्या जैसे hi उससे खिलने लगती तू आदित्य की कोशिश होती की वो अपनी माँ की उँगलियों को अपने मुंह से स्पर्श कर सके और जब वो संध्या को खिलता तू उसका मन करता की उसके होठों को छू सके. इस खेल में वो दोनों तरफ से मज़े ले रहा था. ऐसा करते करते दोनों ने ब्रेकफास्ट ख़तम किया और चलने के लिए बहार आ गए.
आदित्य बाइक ले आया और संध्या आज कुछ अलग hi लग रही थी. उसके पहनावे से कोई नहीं कह सकता था की वो आदित्य की माँ हो सकती है. वो 20 से 25 के बिच की लग रही थी. उसके आत्मविश्वास ने उसके चेहरे पर एक नयी उमंग लेकर उसके चेहरे से एक अलग तरह की आभा का एहसास होता था. आदित्य ने उसे अपनी बाइक पर बिठाया तू वो कुछ ज्यादा hi मस्ती में लग रही थी क्योकि वो आदित्य से काफी सात के बैठी थी और अपनी चूचिया को उसकी पीठ पर लगा ली थी. उसकी चूचियों का आदित्य को जैसे hi अपनी पीठ पर एहसास हुआ तू उसकी उत्तेजना बढ़ने लगी, लेकिन अपनी उत्तेजना पर काबू पते हुए उसने बाइक आगे बढ़ा दी. संध्या का एक हाथ आदित्य के कंधे पर था जिससे बाइक के चलते hi वो आदित्य के ऊपर लड़ सी गयी. आदित्य, जिसके मन में अपनी माँ के प्रति सुबह से hi अलग भाव आ रहे थे, उसके इस तरह लड़ने से उसके मनोभावों को आग देने में कोई कसार बाकि नहीं रह गयी थी.
आदित्य अपने hi ख्यालों में गम था की संध्या ने पूछा 'तुम अब मुझे छोड़कर कॉलेज जाओगे'
आदित्य 'हाँ माँ'
संध्या 'माँ नहीं, संध्या'
आदित्य 'क्योँ माँ'
संध्या 'लगता है भूल गए की मैं अब तुम से उम्र में छोटी हु और तुम्हारी माँ नहीं हो सकती'
आदित्य 'लेकिन हो तू मेरी माँ hi न'
संध्या 'हमने डीडे किया था की मैं तुम्हारी रिश्तेदार हु और मुझे संध्या कहकर पुकारोगे'
आदित्य को उसकी बात सुनकर एक अजीब सी फीलिंग आ रही थी, लेकिन प्रत्यक्ष में उसने कहा 'ठीक है कोशिश करूँगा'
संध्या 'कोई कोशिश नहीं, मुझे संध्या बोलना hi होगा और जब तक मुझे संध्या नहीं बोलोगे मैं आज बाइक से नहीं उतरूंगी'
आदित्य ने बड़ी मुश्किल से अपने को सँभालते हुए 'Sa...aa..n..dh..ya'
संध्या 'अब से मुझे मेरे नाम से hi बुलाओगे'
आदित्य 'कोशिश करूँगा'
ऐसे hi बातें करते करते वो दोनों उस जगह पंहुच गए जंहा पर संध्या को जाना था. वंहा पंहुच कर आदित्य ने अपनी माँ से कहा 'संध्या आपका इंस्टिट्यूट आ गया है, बेस्ट ऑफ़ लक'
संध्या स्माइल करते हुए 'थैंक्स, लेकिन मुझे आप नहीं अब से तुम बोलोगे क्योँकि मैं नहीं चाहती की लोगों को हमारे रिश्ते का पता चले, अब से मैं उम्र में छोटी होने के कारन मुझे संध्या और तुम कहकर hi पुकारोगे'
आदित्य 'कोशिश करूँगा, अभी आप जाओ एंड टेक केयर' संध्या उसकी बात सुनकर मुंह बनाये हुए हंस दी और चली गयी और आदित्य उससे तब तक देखता रहा जब तक वो उसकी नज़रो से ओझल नहीं हो गयी.