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रुचिका ने मोहनलाल की बाहों में hi रहते हुए कहा, “मैंने भी ऐसा कान्हा सोचा था की आप से इस तरह मेरी शादी हो जाएगी'
फिर दोनों अंदर आ गए तू रुचिका ने कहा 'आप बैठिये, आप के लिए जूस लती हूँ'
मोहनलाल 'हुनहु, मुझे जूस की जरुरत नहीं है, बल्कि मुझे तू अपनी पत्नी के साथ वक़्त बिताना है'
रुचिका 'मैं भी आपके साथ वक़्त बिताना चाहती हूँ, लेकिन हम दोनों hi थके हुए हैं और काफी देर से कुछ पिया भी नहीं है, इसलिए मैं आपके साथ शादी के बाद पानी की बजाये जूस पीना चाहती हूँ ताकि मुंह मीठा करा सकूँ'
मोहनलाल 'मुंह मीठा करने के लिए जूस की क्या जरुरत है, वो तो मैं (उसके होठों की तरफ देखते hue)aise भी कर सकता हूँ'
रुचिका 'क्या आप नहीं चाहते की आपकी पत्नी आपके साथ बैठकर जूस पिए, ताकि उसका भी मुंह मीठा हो सके'
मोहनलाल ने उसकी बात सुनकर चेहरे पर थोड़ा गुस्से वाले भाव लेट हुए उससे छोड़ दिया तू रुचिका वंहा से हँसते हुए वंहा रखे फ्रिज की तरफ जाने लगी. मोहनलाल उसको पीछे से उसके हिलते हुए नितम्बों को देख रहा था और मन hi मन प्रसन्न हो रहा था और थोड़ा बहुत जो बनावटी गुस्सा था वो काफूर हो गया था. रुचिका फ्रिज में से एक जूस की बोतल निकलकर उसमे से जूस गिलास में दाल कर और वो गिलास ट्रे में रखकर वापिस मोहनलाल के पास आ गयी.
मोहनलाल चेहरे पर फिर से बनावटी गुस्सा लेट हुए उसकी तरफ न देखने की एक्टिंग करने लगा तू रुचिका में कहा 'लीजिये न' तू वो सर हिला कर मन करने लगा
रुचिका झुकी हुई थी एक हाथ में ट्रे को पकड़ कर उसमे रखे जूस के गिलास को दूसरे हाथ से उठाकर मोहनलाल की तरफ बढ़ाया. मोहनलाल ने गिलास लेते वक़्त अपने सर को नीचे रखा हुआ था तू सीधे रुचिका के चेहरे की बजाये क्लीवेज को देखा, जिसमे झुकने से उस्सकी ब्रा के स्ट्रैप्स और थोड़ा सा रुचिका के गोआल बूब्स, जो फर्म दिख रहे थे, जिनमे सफ़ेद और गुलाबी रंग की मिलावट थी, मोहनलाल ने गिलास लेते हुए रुचिका को लगातार देखे जा रहे थे और उसकी नज़र वंहा से हटने का नाम hi नहीं ले रही थी
रुचिका ने जब देखा की मोहनलाल उसके क्लीवेज को देखे जा रहा है तू वो सीढ़ी कड़ी हो गयी जिससे मोहनलाल का चेहरा भी उसके साथ साथ ऊपर होम लगा और जब रुचिका सामने पड़ी कुर्सी पर बैठ गयी तू मोहनलाल की नज़र रुचिका के चेहरे पर पड़ी. उस के चहरे में एक खिंचाव ,एक aakarṣaṇ, एक ललक मोहनलाल की नजर उस और से हैṭ hi नहीं पा रही थी. चेहरे का तेज ऐसा की मन मोह ले, चेहरे के ऊपर laṭakate काले बाल, कान में बड़ी बड़ी बलिया देखकर मोहनलाल ने कहा 'मैंने ऐसा रूप - यौवन पहले कभी नहीं देखा था. मेरे लिए तू यह पल जैसे थम चुका है और मैं अपने रूप की देवी को ऐसे hi शांत होकर निहारता रहूं' तभी उसके कान मैं आवाज सुनाई दी.
मोहनलाल उससे देखने में इतना खो गया था की पता नहीं कितनी बार आवाज दी गयी हो, जब ध्यान ṭooṭa तू पता चला की रुचिका उससे आवाज दे रही थी. मोहनलाल कुछ पल के लिए हड़बड़ाया फिर संभालते हुए... 'क्या है रुचिका'
रुचिका हँसते हुए 'क्या हुआ कहाँ खो गए थे'
मोहनलाल thoḍi असहजता के साथ 'कुछ नहीं, मैं कमरे की सजावट देख रहा था'
रुचिका हँसते हुए 'सजावट कमरे की देख रहे थे या कुछ और'
मोहनलाल तो उस की खूबसूरती पर aṭak hi गया था.
मोहनलाल लगातार उससे देखे जा रहा था की तभी रुचिका ने उससे ṭोकते हुए कहा 'फिर से सजावट देखने लगे क्या' मोहनलाल हड़बड़ाते हुए ' ...... कक क्या ...:
रुचिका 'मैंने पूछा फिर से कमरे की सजावट देख रहे थे?'
मोहनलाल झेंपते हुए बोलै 'नहीं मैं तो अपनी रूप की देवी की सुंदरता में खोया हुआ था, तुम तू दुनिया की सबसे खूबसूरत लड़की हो'
रुचिका शरमाते हुए अपनी पलकों को झुका कर 'मैं अब आपकी हूँ और जैसी भी हु आपकी हूँ, अब मैं सुन्दर हूँ की नहीं ये तू आप hi बता सकते हैं, वैसे आप परेशान न होइए, मैं यही हु और कहीं भगजी नहीं जा रही'
मोहनलाल 'तुम मुझसे इतनी दूर बैठी हो और ढंग से देखने भी नहीं दे रही हो. निहारता हूँ तू निहारने पर टोक भी देती हो'
जब मोहनलाल ने यह कहा तू रुचिका वंहा से उठकर मोहनलाल के पास आकर कड़ी हो गयी और शरमाते हुए कहने लगी 'मैं तू आपकी सेवा में हाज़िर हूँ' मोहनलाल ने उससे पकड़कर अपने पास बैठकर जूस का गिलास उठाकर उसके मुंह से लगा दिया तू उसने कहा 'पहले आप' तू उसकी बात सुनकर मोहनलाल ने कहा 'पहले तू ये अच्छी तरह जान लो की तुम मेरी सेवा के लिए पत्नी नहीं बानी हो, दूसरा मैं पहले भी कह चूका हु की पति और पत्नी एक सिक्के के दो पहलु होते हैं. मेरी जान ये जूस पहले लेगी तभी तू मुझे जूस मीठा मिलेगा' रुचिका उसकी बात सुनकर और जयादा शर्मा गयी और बिना हील हुज़्ज़त के एक सिप ले लिया.
मोहनलाल ने उस गिलास से अब सिप लिया तू उसने कहा 'वह क्या मीठा जूस है'
‘अब किआ करूँ मैं’ मोहनलाल ने अपने आप से पूछा. और जूस पीते हुए वो रुचिका को अपने पास बैठी देखे जा रहे थे जो उनके पास सोफे पर बैठी. अब मोहनलाल ने अपने दाएं बाज़ू को रुचिका के कन्धों पर किया क्युओंकी वो उनके दाएं तरफ बैठी थी, और रुचिका ने उनके उस हाथ की उँगलियों को अपने डायन हाथ में पकड़ते हुए एक सुरीली आवाज़ में कहा, 'जूस पि लीजिये न' एक गहरी सांस लेते हुए मोहनलाल रुचिका के क्लीवेज को फिर से देखने लगा और देखे hi जा रहे थे और वंहा से नज़र हटाए बिना कहा, 'तुम भी पीओ न, मैं अकेले थोड़ी न पियूँगा' और गिलास रुचिका के मुंह की तरफ ले गए.
रुचिका ने जूस के गिलास में थोड़े से बचे हुए जूस को सिप करके जैसे hi ख़तम किया उस्सको टेबल पर रख कर मोहनलाल ने रुचिका के टांगों पर अपने बयां हाथ रखा और हलके से अपनी उँगलियों को फरते हुए कहा, “तुम बहोत प्यारी हो और मुझे तुम पर बहुत hi प्यार आता है, तुम इतनी क्यूट हो के तुम से बहुत प्यार करने को मैं करता है चलो एक किश दो मुझे!”
रुचिका ने पहले तू सर हिला कर मन कर दिया तू मोहनलाल ने उसकी टांगों पर रखे हाथ को धीरे धीरे फिरने लगा तू उससे जोश आने लगा और फिर मोहनलाल बोलै 'अभी तू कह रही थी की मेरी सेवा में हाज़िर हो और जब मैं रिक्वेस्ट कर रहा हूँ तू मन कर देती हो'
रुचिका को उसकी बात सुनकर हंसी आ गयी और हँस्ते हुए उनके गाल की तरफ अपने मुंह को बढ़ा कर अपने नाजुक होठों से उसके एक हाल पर एक किश किया जिससे मोहनलाल को मज़ा आ गया और वो इस मज़े को और बढ़ाना चाहता था तू मोहनलाल ने कहा, “इधर भी इस गाल पर भी'
रुचिका ने इंकार में सर हिलाया तब मोहनलाल ने कहा 'प्लीज' तू रुचिका ने कहा 'एक किश की बात हुई थी' तब मोहनलाल ने कहा की 'तुम्हारे 100 किश भी एक से काम है' तू रुचिका बुरी तरह शर्मा गयी.
मोहनलाल ने फिर से उसकी टांगों पर हाथ चलने लगा और दूसरे हाथ से उसकी उँगलियों को सहलाने लगा तू रुचिका को भी मजा आने लगा और उसने अब अपने होठों को दूसरे गाल की तरफ बढ़ाया तू उससे मोहनलाल के और पास जाना पद रहा था जिससे उसके बूब्स मोहनलाल के सीने पर आ गए तू मोहनलाल का एक हाथ उसकी पीठ पर पंहुच गया और उससे पकड़ कर अपने ऊपर करने लगा जिससे रुचिका के होठों को उसका दूर गाल मिल सके और जैसे hi वो वहां पहुंचे तू रु हिला ने किश भी कर दिया और अपने होठों को अलग कर लिया, फिर मोहनलाल ने कहा, “और एक, और एक, और एक करती जाओ बहोत अच्छा लगता है.”
रुचिका ने हँस्ते हुए कहा “कितना किश करूँ आप को! बहोत किया. और मोहनलाल ने कहा, “मगर मैं ने तो अभी नहीं किया न!” तो रुचिका अपनी पलकों को झुकाते हुए बोली, “तो करो न किश ने मन किया है आप को?”
मोहनलाल का एक हाथ को उसकी पीठ से रुचिका के कांधों पर ले आया था और अपने दूसरे हाथ से रुचिका के चेहरे को अपने हाथ में लेते हुए अपने मुंह के पास किया और दायां गाल को बहुत hi प्यार से किश किया और अपने लबों को काफी देर तक उसस्के गाल पर दबाये रखा, फिर दूसरे गाल को भी बिल्कुल उसी तरह किश किया, फिर उसस्के पेशानी को चुम्मा फिर थोड़ी को चूमा फिर हलके से उसस्के गले को चूमा, फिर गर्दन की तरफ बढ़ते हुए उस को चूमते हुए अब धीरे धीरे अपने लबों को निचे के तरफ चूमते जा रहा था यहाँ तक के जैसे रुचिका को थोड़ा पीछे की तरफ होना पड़ा और अपने गर्दन को पीछे करना पड़ा और मोहनलाल ने जंहा उस्सकी क्लीवेज की शुरुवात होती है को हलके से किश करते हुए उस्का बायां हाथ फिर से रुचिका के जाँघों पर पहुँच गया और वंहा हलके से फेरने लगे, तब झट से रुचिका ने उसस्के उस हाथ को अपने ुआंगलियों में थामा और मुस्कुराते हुए रुचिका ने कहा, 'बहोत किश कर लिया आप ने चलो अब पार्टी के लिए तैयार हो जाते हैं'
मोहनलाल ने उसकी बात पर कहा 'हम तू तैयार hi हैं, अब और क्या तैयार होना है' तब रुचिका ने कहा 'मैं तू दुल्हन के जोड़े में हम और अगर हम वंहा पार्टी में ऐसे जायेंगे तू लोग उनकी बजाये हमारी पार्टी समझने लगेंगे, इसलिए मुझे तू चेंज करना hi पड़ेगा'
मोहनलाल खीजते हुए 'क्या यार, लोग मुझे अपनी दुल्हन को अच्छे से उससे दुल्हन के वेश में देखने भी नहीं देते'
रुचिका 'आज मैं दुल्हन के वेश में सूरज भाई साहेब और दिया की वजह से हूँ तू हमें उनको भला बुरा कहने की बजाये उनकी पार्टी में शामिल होना चाहिए, इसलिए हमें जल्दी से तैयार होना चाहिए'
मोहनलाल ने उससे अपने आगोश में लेते हुए 'कोई बात नहीं, चलते हैं लेकिन थोड़ी देर में, पहले अपनी दुल्हन से मिल तू लू' और ये कहकर वो उससे आगोश में लेकर बैठा रहा लेकिन कुछ नहीं किया बस एक दूसरे को महसूस करने लगे.
कुछ समय तक जब वो दोनोंओ hi एक दूसरे के आगोश में lipaṭe रहे फिर मोहनलाल ने आगे baḍh कर रुचिका को एक बार फिर चूमा और चूमे hi जा रहा था . रुचिका के लिए यह अनुभव नया था जब किसी ने इतना जयादा एक साथ चूमा हो. वो इससे अनुभव करके एक अलग hi दुनिया में खींची जा रही थी और उसका काम सागर लगातार baḍhta जा रहा था. काम सागर इतना बढ़ गया की अब रुचिका भी मोहनलाल के चेहरे को जगह जगह चूमे जा रही थी. फिर तू दोनों में एक दूसरे को चूमने की होड़ सी लग गयी. फिर चूमते हुए जब थोड़ा थक गए तू आराम से एक दूसरे को चूमना छोड़कर निहारने लगे तू रुचिका मोहनलाल की नज़रों का सामना न कर पायी और अपनी पलके झुका ली.
जब रुचिका ये कर रही थी तू मोहनलाल को भी जोश तू आ रहा था, लेकिन जोश के साथ साथ उस पर प्यार कुछ जयादा hi आने लगा और उस प्यार में उसने रुचिका को जोर से हुग कर लिया और मोहनलाल अपने हाथ को रुचिका की पीठ पर ले जाकर हलके से फरते हुए पूछा, “तो बताओ किसी है मेरी प्यारी, सी रुचिका?” रुचिका का सर अब मोहनलाल के सीने से आ लगा और वो उसकी बात का जवाब न देकर खामोश रही.
मोहनलाल का हाथ रुचिका के पीठ पर धीरे धीरे ऊपर नीचे हो रहा था और वो उसकी फीठ को सेहला भी रहा था और बीच बीच में थपथपा भी रहा था. जब वो ये कर रहा था तू उस्सकी उँगलियों टेल रुचिका की ब्रा की स्ट्राप फील हुआ और आगे से रुचिका के बूब्स उसस्के छाती पर दबे हुए भी फील किये तू मोहनलाल इस को महसूस करके उससे गरम फील होने लगा और खुद hi रुचिका को अपनी बाहों में कसने लगा और फिर रुचिका के चेहरे को अपने हाथ से ऊपर उठाकर उससे बहुत hi प्यार से चूमने लगा तू रुचिका भी जवाब में उससे यंहा वंहा चूमने लगी.
कुछ देर वो दोनों hi एक दूसरे को चूमते रहे और दोनों इस समय पागल से हो गए थे और उन दोनों को रोकने वाला भी कोई नहीं था.
थोड़ा और आगे baḍh hi रहे थे की रुचिका के फोन की ghnṭee बजी. पहली ghnṭee तो पूरी बज कर काṭ चुकी थी फिर भी उनके पागलपन में कोई फर्क नहीं आया . लेकिन दूसरी ghnṭee के साथ hi रुचिका को अपनी वास्तविक स्थिति अवगत हुई. रुचिका को जैसे 440व् का jhaṭakaa लगा और खुद से मोहनलाल को अलग कर दिया. इस समय उन दोनों की साँसें काफी तेज चल रही थी. धड़कन की आवाज साफ़ सुनाई दे रही थी . मोहनलाल तो अब भी खुमार में था और सवालिया नज़रों से रुचिका को देखने लगा था. कुछ देर बाद फोन पर बात करने के बाद उसने बताया की दिया का फोन था और वो हम दोनों को बुला रही है.
मोहनलाल के कांधों पर सर रखते हुए रुचिका ने कहा 'मुझे समझ नहीं आ रहा की किया करूँ, एक तरफ आप हैं और दूसरी तरफ वो लोग हैं' ये कहकर उसने मोहनलाल को एक ज़ोर का हुग किया.
रुचिका ने मोहनलाल की बाहों में hi रहते हुए कहा, “मैंने भी ऐसा कान्हा सोचा था की आप से इस तरह मेरी शादी हो जाएगी'
फिर दोनों अंदर आ गए तू रुचिका ने कहा 'आप बैठिये, आप के लिए जूस लती हूँ'
मोहनलाल 'हुनहु, मुझे जूस की जरुरत नहीं है, बल्कि मुझे तू अपनी पत्नी के साथ वक़्त बिताना है'
रुचिका 'मैं भी आपके साथ वक़्त बिताना चाहती हूँ, लेकिन हम दोनों hi थके हुए हैं और काफी देर से कुछ पिया भी नहीं है, इसलिए मैं आपके साथ शादी के बाद पानी की बजाये जूस पीना चाहती हूँ ताकि मुंह मीठा करा सकूँ'
मोहनलाल 'मुंह मीठा करने के लिए जूस की क्या जरुरत है, वो तो मैं (उसके होठों की तरफ देखते hue)aise भी कर सकता हूँ'
रुचिका 'क्या आप नहीं चाहते की आपकी पत्नी आपके साथ बैठकर जूस पिए, ताकि उसका भी मुंह मीठा हो सके'
मोहनलाल ने उसकी बात सुनकर चेहरे पर थोड़ा गुस्से वाले भाव लेट हुए उससे छोड़ दिया तू रुचिका वंहा से हँसते हुए वंहा रखे फ्रिज की तरफ जाने लगी. मोहनलाल उसको पीछे से उसके हिलते हुए नितम्बों को देख रहा था और मन hi मन प्रसन्न हो रहा था और थोड़ा बहुत जो बनावटी गुस्सा था वो काफूर हो गया था. रुचिका फ्रिज में से एक जूस की बोतल निकलकर उसमे से जूस गिलास में दाल कर और वो गिलास ट्रे में रखकर वापिस मोहनलाल के पास आ गयी.
मोहनलाल चेहरे पर फिर से बनावटी गुस्सा लेट हुए उसकी तरफ न देखने की एक्टिंग करने लगा तू रुचिका में कहा 'लीजिये न' तू वो सर हिला कर मन करने लगा
रुचिका झुकी हुई थी एक हाथ में ट्रे को पकड़ कर उसमे रखे जूस के गिलास को दूसरे हाथ से उठाकर मोहनलाल की तरफ बढ़ाया. मोहनलाल ने गिलास लेते वक़्त अपने सर को नीचे रखा हुआ था तू सीधे रुचिका के चेहरे की बजाये क्लीवेज को देखा, जिसमे झुकने से उस्सकी ब्रा के स्ट्रैप्स और थोड़ा सा रुचिका के गोआल बूब्स, जो फर्म दिख रहे थे, जिनमे सफ़ेद और गुलाबी रंग की मिलावट थी, मोहनलाल ने गिलास लेते हुए रुचिका को लगातार देखे जा रहे थे और उसकी नज़र वंहा से हटने का नाम hi नहीं ले रही थी
रुचिका ने जब देखा की मोहनलाल उसके क्लीवेज को देखे जा रहा है तू वो सीढ़ी कड़ी हो गयी जिससे मोहनलाल का चेहरा भी उसके साथ साथ ऊपर होम लगा और जब रुचिका सामने पड़ी कुर्सी पर बैठ गयी तू मोहनलाल की नज़र रुचिका के चेहरे पर पड़ी. उस के चहरे में एक खिंचाव ,एक aakarṣaṇ, एक ललक मोहनलाल की नजर उस और से हैṭ hi नहीं पा रही थी. चेहरे का तेज ऐसा की मन मोह ले, चेहरे के ऊपर laṭakate काले बाल, कान में बड़ी बड़ी बलिया देखकर मोहनलाल ने कहा 'मैंने ऐसा रूप - यौवन पहले कभी नहीं देखा था. मेरे लिए तू यह पल जैसे थम चुका है और मैं अपने रूप की देवी को ऐसे hi शांत होकर निहारता रहूं' तभी उसके कान मैं आवाज सुनाई दी.
मोहनलाल उससे देखने में इतना खो गया था की पता नहीं कितनी बार आवाज दी गयी हो, जब ध्यान ṭooṭa तू पता चला की रुचिका उससे आवाज दे रही थी. मोहनलाल कुछ पल के लिए हड़बड़ाया फिर संभालते हुए... 'क्या है रुचिका'
रुचिका हँसते हुए 'क्या हुआ कहाँ खो गए थे'
मोहनलाल thoḍi असहजता के साथ 'कुछ नहीं, मैं कमरे की सजावट देख रहा था'
रुचिका हँसते हुए 'सजावट कमरे की देख रहे थे या कुछ और'
मोहनलाल तो उस की खूबसूरती पर aṭak hi गया था.
मोहनलाल लगातार उससे देखे जा रहा था की तभी रुचिका ने उससे ṭोकते हुए कहा 'फिर से सजावट देखने लगे क्या' मोहनलाल हड़बड़ाते हुए ' ...... कक क्या ...:
रुचिका 'मैंने पूछा फिर से कमरे की सजावट देख रहे थे?'
मोहनलाल झेंपते हुए बोलै 'नहीं मैं तो अपनी रूप की देवी की सुंदरता में खोया हुआ था, तुम तू दुनिया की सबसे खूबसूरत लड़की हो'
रुचिका शरमाते हुए अपनी पलकों को झुका कर 'मैं अब आपकी हूँ और जैसी भी हु आपकी हूँ, अब मैं सुन्दर हूँ की नहीं ये तू आप hi बता सकते हैं, वैसे आप परेशान न होइए, मैं यही हु और कहीं भगजी नहीं जा रही'
मोहनलाल 'तुम मुझसे इतनी दूर बैठी हो और ढंग से देखने भी नहीं दे रही हो. निहारता हूँ तू निहारने पर टोक भी देती हो'
जब मोहनलाल ने यह कहा तू रुचिका वंहा से उठकर मोहनलाल के पास आकर कड़ी हो गयी और शरमाते हुए कहने लगी 'मैं तू आपकी सेवा में हाज़िर हूँ' मोहनलाल ने उससे पकड़कर अपने पास बैठकर जूस का गिलास उठाकर उसके मुंह से लगा दिया तू उसने कहा 'पहले आप' तू उसकी बात सुनकर मोहनलाल ने कहा 'पहले तू ये अच्छी तरह जान लो की तुम मेरी सेवा के लिए पत्नी नहीं बानी हो, दूसरा मैं पहले भी कह चूका हु की पति और पत्नी एक सिक्के के दो पहलु होते हैं. मेरी जान ये जूस पहले लेगी तभी तू मुझे जूस मीठा मिलेगा' रुचिका उसकी बात सुनकर और जयादा शर्मा गयी और बिना हील हुज़्ज़त के एक सिप ले लिया.
मोहनलाल ने उस गिलास से अब सिप लिया तू उसने कहा 'वह क्या मीठा जूस है'
‘अब किआ करूँ मैं’ मोहनलाल ने अपने आप से पूछा. और जूस पीते हुए वो रुचिका को अपने पास बैठी देखे जा रहे थे जो उनके पास सोफे पर बैठी. अब मोहनलाल ने अपने दाएं बाज़ू को रुचिका के कन्धों पर किया क्युओंकी वो उनके दाएं तरफ बैठी थी, और रुचिका ने उनके उस हाथ की उँगलियों को अपने डायन हाथ में पकड़ते हुए एक सुरीली आवाज़ में कहा, 'जूस पि लीजिये न' एक गहरी सांस लेते हुए मोहनलाल रुचिका के क्लीवेज को फिर से देखने लगा और देखे hi जा रहे थे और वंहा से नज़र हटाए बिना कहा, 'तुम भी पीओ न, मैं अकेले थोड़ी न पियूँगा' और गिलास रुचिका के मुंह की तरफ ले गए.
रुचिका ने जूस के गिलास में थोड़े से बचे हुए जूस को सिप करके जैसे hi ख़तम किया उस्सको टेबल पर रख कर मोहनलाल ने रुचिका के टांगों पर अपने बयां हाथ रखा और हलके से अपनी उँगलियों को फरते हुए कहा, “तुम बहोत प्यारी हो और मुझे तुम पर बहुत hi प्यार आता है, तुम इतनी क्यूट हो के तुम से बहुत प्यार करने को मैं करता है चलो एक किश दो मुझे!”
रुचिका ने पहले तू सर हिला कर मन कर दिया तू मोहनलाल ने उसकी टांगों पर रखे हाथ को धीरे धीरे फिरने लगा तू उससे जोश आने लगा और फिर मोहनलाल बोलै 'अभी तू कह रही थी की मेरी सेवा में हाज़िर हो और जब मैं रिक्वेस्ट कर रहा हूँ तू मन कर देती हो'
रुचिका को उसकी बात सुनकर हंसी आ गयी और हँस्ते हुए उनके गाल की तरफ अपने मुंह को बढ़ा कर अपने नाजुक होठों से उसके एक हाल पर एक किश किया जिससे मोहनलाल को मज़ा आ गया और वो इस मज़े को और बढ़ाना चाहता था तू मोहनलाल ने कहा, “इधर भी इस गाल पर भी'
रुचिका ने इंकार में सर हिलाया तब मोहनलाल ने कहा 'प्लीज' तू रुचिका ने कहा 'एक किश की बात हुई थी' तब मोहनलाल ने कहा की 'तुम्हारे 100 किश भी एक से काम है' तू रुचिका बुरी तरह शर्मा गयी.
मोहनलाल ने फिर से उसकी टांगों पर हाथ चलने लगा और दूसरे हाथ से उसकी उँगलियों को सहलाने लगा तू रुचिका को भी मजा आने लगा और उसने अब अपने होठों को दूसरे गाल की तरफ बढ़ाया तू उससे मोहनलाल के और पास जाना पद रहा था जिससे उसके बूब्स मोहनलाल के सीने पर आ गए तू मोहनलाल का एक हाथ उसकी पीठ पर पंहुच गया और उससे पकड़ कर अपने ऊपर करने लगा जिससे रुचिका के होठों को उसका दूर गाल मिल सके और जैसे hi वो वहां पहुंचे तू रु हिला ने किश भी कर दिया और अपने होठों को अलग कर लिया, फिर मोहनलाल ने कहा, “और एक, और एक, और एक करती जाओ बहोत अच्छा लगता है.”
रुचिका ने हँस्ते हुए कहा “कितना किश करूँ आप को! बहोत किया. और मोहनलाल ने कहा, “मगर मैं ने तो अभी नहीं किया न!” तो रुचिका अपनी पलकों को झुकाते हुए बोली, “तो करो न किश ने मन किया है आप को?”
मोहनलाल का एक हाथ को उसकी पीठ से रुचिका के कांधों पर ले आया था और अपने दूसरे हाथ से रुचिका के चेहरे को अपने हाथ में लेते हुए अपने मुंह के पास किया और दायां गाल को बहुत hi प्यार से किश किया और अपने लबों को काफी देर तक उसस्के गाल पर दबाये रखा, फिर दूसरे गाल को भी बिल्कुल उसी तरह किश किया, फिर उसस्के पेशानी को चुम्मा फिर थोड़ी को चूमा फिर हलके से उसस्के गले को चूमा, फिर गर्दन की तरफ बढ़ते हुए उस को चूमते हुए अब धीरे धीरे अपने लबों को निचे के तरफ चूमते जा रहा था यहाँ तक के जैसे रुचिका को थोड़ा पीछे की तरफ होना पड़ा और अपने गर्दन को पीछे करना पड़ा और मोहनलाल ने जंहा उस्सकी क्लीवेज की शुरुवात होती है को हलके से किश करते हुए उस्का बायां हाथ फिर से रुचिका के जाँघों पर पहुँच गया और वंहा हलके से फेरने लगे, तब झट से रुचिका ने उसस्के उस हाथ को अपने ुआंगलियों में थामा और मुस्कुराते हुए रुचिका ने कहा, 'बहोत किश कर लिया आप ने चलो अब पार्टी के लिए तैयार हो जाते हैं'
मोहनलाल ने उसकी बात पर कहा 'हम तू तैयार hi हैं, अब और क्या तैयार होना है' तब रुचिका ने कहा 'मैं तू दुल्हन के जोड़े में हम और अगर हम वंहा पार्टी में ऐसे जायेंगे तू लोग उनकी बजाये हमारी पार्टी समझने लगेंगे, इसलिए मुझे तू चेंज करना hi पड़ेगा'
मोहनलाल खीजते हुए 'क्या यार, लोग मुझे अपनी दुल्हन को अच्छे से उससे दुल्हन के वेश में देखने भी नहीं देते'
रुचिका 'आज मैं दुल्हन के वेश में सूरज भाई साहेब और दिया की वजह से हूँ तू हमें उनको भला बुरा कहने की बजाये उनकी पार्टी में शामिल होना चाहिए, इसलिए हमें जल्दी से तैयार होना चाहिए'
मोहनलाल ने उससे अपने आगोश में लेते हुए 'कोई बात नहीं, चलते हैं लेकिन थोड़ी देर में, पहले अपनी दुल्हन से मिल तू लू' और ये कहकर वो उससे आगोश में लेकर बैठा रहा लेकिन कुछ नहीं किया बस एक दूसरे को महसूस करने लगे.
कुछ समय तक जब वो दोनोंओ hi एक दूसरे के आगोश में lipaṭe रहे फिर मोहनलाल ने आगे baḍh कर रुचिका को एक बार फिर चूमा और चूमे hi जा रहा था . रुचिका के लिए यह अनुभव नया था जब किसी ने इतना जयादा एक साथ चूमा हो. वो इससे अनुभव करके एक अलग hi दुनिया में खींची जा रही थी और उसका काम सागर लगातार baḍhta जा रहा था. काम सागर इतना बढ़ गया की अब रुचिका भी मोहनलाल के चेहरे को जगह जगह चूमे जा रही थी. फिर तू दोनों में एक दूसरे को चूमने की होड़ सी लग गयी. फिर चूमते हुए जब थोड़ा थक गए तू आराम से एक दूसरे को चूमना छोड़कर निहारने लगे तू रुचिका मोहनलाल की नज़रों का सामना न कर पायी और अपनी पलके झुका ली.
जब रुचिका ये कर रही थी तू मोहनलाल को भी जोश तू आ रहा था, लेकिन जोश के साथ साथ उस पर प्यार कुछ जयादा hi आने लगा और उस प्यार में उसने रुचिका को जोर से हुग कर लिया और मोहनलाल अपने हाथ को रुचिका की पीठ पर ले जाकर हलके से फरते हुए पूछा, “तो बताओ किसी है मेरी प्यारी, सी रुचिका?” रुचिका का सर अब मोहनलाल के सीने से आ लगा और वो उसकी बात का जवाब न देकर खामोश रही.
मोहनलाल का हाथ रुचिका के पीठ पर धीरे धीरे ऊपर नीचे हो रहा था और वो उसकी फीठ को सेहला भी रहा था और बीच बीच में थपथपा भी रहा था. जब वो ये कर रहा था तू उस्सकी उँगलियों टेल रुचिका की ब्रा की स्ट्राप फील हुआ और आगे से रुचिका के बूब्स उसस्के छाती पर दबे हुए भी फील किये तू मोहनलाल इस को महसूस करके उससे गरम फील होने लगा और खुद hi रुचिका को अपनी बाहों में कसने लगा और फिर रुचिका के चेहरे को अपने हाथ से ऊपर उठाकर उससे बहुत hi प्यार से चूमने लगा तू रुचिका भी जवाब में उससे यंहा वंहा चूमने लगी.
कुछ देर वो दोनों hi एक दूसरे को चूमते रहे और दोनों इस समय पागल से हो गए थे और उन दोनों को रोकने वाला भी कोई नहीं था.
थोड़ा और आगे baḍh hi रहे थे की रुचिका के फोन की ghnṭee बजी. पहली ghnṭee तो पूरी बज कर काṭ चुकी थी फिर भी उनके पागलपन में कोई फर्क नहीं आया . लेकिन दूसरी ghnṭee के साथ hi रुचिका को अपनी वास्तविक स्थिति अवगत हुई. रुचिका को जैसे 440व् का jhaṭakaa लगा और खुद से मोहनलाल को अलग कर दिया. इस समय उन दोनों की साँसें काफी तेज चल रही थी. धड़कन की आवाज साफ़ सुनाई दे रही थी . मोहनलाल तो अब भी खुमार में था और सवालिया नज़रों से रुचिका को देखने लगा था. कुछ देर बाद फोन पर बात करने के बाद उसने बताया की दिया का फोन था और वो हम दोनों को बुला रही है.
मोहनलाल के कांधों पर सर रखते हुए रुचिका ने कहा 'मुझे समझ नहीं आ रहा की किया करूँ, एक तरफ आप हैं और दूसरी तरफ वो लोग हैं' ये कहकर उसने मोहनलाल को एक ज़ोर का हुग किया.