इन्सेस्ट रिश्ता - Page 13 - SexBaba
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इन्सेस्ट रिश्ता

अपडेट 64

रुचिका ने मोहनलाल की बाहों में hi रहते हुए कहा, “मैंने भी ऐसा कान्हा सोचा था की आप से इस तरह मेरी शादी हो जाएगी'

फिर दोनों अंदर आ गए तू रुचिका ने कहा 'आप बैठिये, आप के लिए जूस लती हूँ'

मोहनलाल 'हुनहु, मुझे जूस की जरुरत नहीं है, बल्कि मुझे तू अपनी पत्नी के साथ वक़्त बिताना है'

रुचिका 'मैं भी आपके साथ वक़्त बिताना चाहती हूँ, लेकिन हम दोनों hi थके हुए हैं और काफी देर से कुछ पिया भी नहीं है, इसलिए मैं आपके साथ शादी के बाद पानी की बजाये जूस पीना चाहती हूँ ताकि मुंह मीठा करा सकूँ'

मोहनलाल 'मुंह मीठा करने के लिए जूस की क्या जरुरत है, वो तो मैं (उसके होठों की तरफ देखते hue)aise भी कर सकता हूँ'

रुचिका 'क्या आप नहीं चाहते की आपकी पत्नी आपके साथ बैठकर जूस पिए, ताकि उसका भी मुंह मीठा हो सके'

मोहनलाल ने उसकी बात सुनकर चेहरे पर थोड़ा गुस्से वाले भाव लेट हुए उससे छोड़ दिया तू रुचिका वंहा से हँसते हुए वंहा रखे फ्रिज की तरफ जाने लगी. मोहनलाल उसको पीछे से उसके हिलते हुए नितम्बों को देख रहा था और मन hi मन प्रसन्न हो रहा था और थोड़ा बहुत जो बनावटी गुस्सा था वो काफूर हो गया था. रुचिका फ्रिज में से एक जूस की बोतल निकलकर उसमे से जूस गिलास में दाल कर और वो गिलास ट्रे में रखकर वापिस मोहनलाल के पास आ गयी.

मोहनलाल चेहरे पर फिर से बनावटी गुस्सा लेट हुए उसकी तरफ न देखने की एक्टिंग करने लगा तू रुचिका में कहा 'लीजिये न' तू वो सर हिला कर मन करने लगा

रुचिका झुकी हुई थी एक हाथ में ट्रे को पकड़ कर उसमे रखे जूस के गिलास को दूसरे हाथ से उठाकर मोहनलाल की तरफ बढ़ाया. मोहनलाल ने गिलास लेते वक़्त अपने सर को नीचे रखा हुआ था तू सीधे रुचिका के चेहरे की बजाये क्लीवेज को देखा, जिसमे झुकने से उस्सकी ब्रा के स्ट्रैप्स और थोड़ा सा रुचिका के गोआल बूब्स, जो फर्म दिख रहे थे, जिनमे सफ़ेद और गुलाबी रंग की मिलावट थी, मोहनलाल ने गिलास लेते हुए रुचिका को लगातार देखे जा रहे थे और उसकी नज़र वंहा से हटने का नाम hi नहीं ले रही थी

रुचिका ने जब देखा की मोहनलाल उसके क्लीवेज को देखे जा रहा है तू वो सीढ़ी कड़ी हो गयी जिससे मोहनलाल का चेहरा भी उसके साथ साथ ऊपर होम लगा और जब रुचिका सामने पड़ी कुर्सी पर बैठ गयी तू मोहनलाल की नज़र रुचिका के चेहरे पर पड़ी. उस के चहरे में एक खिंचाव ,एक aakarṣaṇ, एक ललक मोहनलाल की नजर उस और से हैṭ hi नहीं पा रही थी. चेहरे का तेज ऐसा की मन मोह ले, चेहरे के ऊपर laṭakate काले बाल, कान में बड़ी बड़ी बलिया देखकर मोहनलाल ने कहा 'मैंने ऐसा रूप - यौवन पहले कभी नहीं देखा था. मेरे लिए तू यह पल जैसे थम चुका है और मैं अपने रूप की देवी को ऐसे hi शांत होकर निहारता रहूं' तभी उसके कान मैं आवाज सुनाई दी.

मोहनलाल उससे देखने में इतना खो गया था की पता नहीं कितनी बार आवाज दी गयी हो, जब ध्यान ṭooṭa तू पता चला की रुचिका उससे आवाज दे रही थी. मोहनलाल कुछ पल के लिए हड़बड़ाया फिर संभालते हुए... 'क्या है रुचिका'

रुचिका हँसते हुए 'क्या हुआ कहाँ खो गए थे'

मोहनलाल thoḍi असहजता के साथ 'कुछ नहीं, मैं कमरे की सजावट देख रहा था'

रुचिका हँसते हुए 'सजावट कमरे की देख रहे थे या कुछ और'

मोहनलाल तो उस की खूबसूरती पर aṭak hi गया था.

मोहनलाल लगातार उससे देखे जा रहा था की तभी रुचिका ने उससे ṭोकते हुए कहा 'फिर से सजावट देखने लगे क्या' मोहनलाल हड़बड़ाते हुए ' ...... कक क्या ...:

रुचिका 'मैंने पूछा फिर से कमरे की सजावट देख रहे थे?'

मोहनलाल झेंपते हुए बोलै 'नहीं मैं तो अपनी रूप की देवी की सुंदरता में खोया हुआ था, तुम तू दुनिया की सबसे खूबसूरत लड़की हो'

रुचिका शरमाते हुए अपनी पलकों को झुका कर 'मैं अब आपकी हूँ और जैसी भी हु आपकी हूँ, अब मैं सुन्दर हूँ की नहीं ये तू आप hi बता सकते हैं, वैसे आप परेशान न होइए, मैं यही हु और कहीं भगजी नहीं जा रही'

मोहनलाल 'तुम मुझसे इतनी दूर बैठी हो और ढंग से देखने भी नहीं दे रही हो. निहारता हूँ तू निहारने पर टोक भी देती हो'

जब मोहनलाल ने यह कहा तू रुचिका वंहा से उठकर मोहनलाल के पास आकर कड़ी हो गयी और शरमाते हुए कहने लगी 'मैं तू आपकी सेवा में हाज़िर हूँ' मोहनलाल ने उससे पकड़कर अपने पास बैठकर जूस का गिलास उठाकर उसके मुंह से लगा दिया तू उसने कहा 'पहले आप' तू उसकी बात सुनकर मोहनलाल ने कहा 'पहले तू ये अच्छी तरह जान लो की तुम मेरी सेवा के लिए पत्नी नहीं बानी हो, दूसरा मैं पहले भी कह चूका हु की पति और पत्नी एक सिक्के के दो पहलु होते हैं. मेरी जान ये जूस पहले लेगी तभी तू मुझे जूस मीठा मिलेगा' रुचिका उसकी बात सुनकर और जयादा शर्मा गयी और बिना हील हुज़्ज़त के एक सिप ले लिया.

मोहनलाल ने उस गिलास से अब सिप लिया तू उसने कहा 'वह क्या मीठा जूस है'

‘अब किआ करूँ मैं’ मोहनलाल ने अपने आप से पूछा. और जूस पीते हुए वो रुचिका को अपने पास बैठी देखे जा रहे थे जो उनके पास सोफे पर बैठी. अब मोहनलाल ने अपने दाएं बाज़ू को रुचिका के कन्धों पर किया क्युओंकी वो उनके दाएं तरफ बैठी थी, और रुचिका ने उनके उस हाथ की उँगलियों को अपने डायन हाथ में पकड़ते हुए एक सुरीली आवाज़ में कहा, 'जूस पि लीजिये न' एक गहरी सांस लेते हुए मोहनलाल रुचिका के क्लीवेज को फिर से देखने लगा और देखे hi जा रहे थे और वंहा से नज़र हटाए बिना कहा, 'तुम भी पीओ न, मैं अकेले थोड़ी न पियूँगा' और गिलास रुचिका के मुंह की तरफ ले गए.

रुचिका ने जूस के गिलास में थोड़े से बचे हुए जूस को सिप करके जैसे hi ख़तम किया उस्सको टेबल पर रख कर मोहनलाल ने रुचिका के टांगों पर अपने बयां हाथ रखा और हलके से अपनी उँगलियों को फरते हुए कहा, “तुम बहोत प्यारी हो और मुझे तुम पर बहुत hi प्यार आता है, तुम इतनी क्यूट हो के तुम से बहुत प्यार करने को मैं करता है चलो एक किश दो मुझे!”

रुचिका ने पहले तू सर हिला कर मन कर दिया तू मोहनलाल ने उसकी टांगों पर रखे हाथ को धीरे धीरे फिरने लगा तू उससे जोश आने लगा और फिर मोहनलाल बोलै 'अभी तू कह रही थी की मेरी सेवा में हाज़िर हो और जब मैं रिक्वेस्ट कर रहा हूँ तू मन कर देती हो'

रुचिका को उसकी बात सुनकर हंसी आ गयी और हँस्ते हुए उनके गाल की तरफ अपने मुंह को बढ़ा कर अपने नाजुक होठों से उसके एक हाल पर एक किश किया जिससे मोहनलाल को मज़ा आ गया और वो इस मज़े को और बढ़ाना चाहता था तू मोहनलाल ने कहा, “इधर भी इस गाल पर भी'

रुचिका ने इंकार में सर हिलाया तब मोहनलाल ने कहा 'प्लीज' तू रुचिका ने कहा 'एक किश की बात हुई थी' तब मोहनलाल ने कहा की 'तुम्हारे 100 किश भी एक से काम है' तू रुचिका बुरी तरह शर्मा गयी.

मोहनलाल ने फिर से उसकी टांगों पर हाथ चलने लगा और दूसरे हाथ से उसकी उँगलियों को सहलाने लगा तू रुचिका को भी मजा आने लगा और उसने अब अपने होठों को दूसरे गाल की तरफ बढ़ाया तू उससे मोहनलाल के और पास जाना पद रहा था जिससे उसके बूब्स मोहनलाल के सीने पर आ गए तू मोहनलाल का एक हाथ उसकी पीठ पर पंहुच गया और उससे पकड़ कर अपने ऊपर करने लगा जिससे रुचिका के होठों को उसका दूर गाल मिल सके और जैसे hi वो वहां पहुंचे तू रु हिला ने किश भी कर दिया और अपने होठों को अलग कर लिया, फिर मोहनलाल ने कहा, “और एक, और एक, और एक करती जाओ बहोत अच्छा लगता है.”

रुचिका ने हँस्ते हुए कहा “कितना किश करूँ आप को! बहोत किया. और मोहनलाल ने कहा, “मगर मैं ने तो अभी नहीं किया न!” तो रुचिका अपनी पलकों को झुकाते हुए बोली, “तो करो न किश ने मन किया है आप को?”

मोहनलाल का एक हाथ को उसकी पीठ से रुचिका के कांधों पर ले आया था और अपने दूसरे हाथ से रुचिका के चेहरे को अपने हाथ में लेते हुए अपने मुंह के पास किया और दायां गाल को बहुत hi प्यार से किश किया और अपने लबों को काफी देर तक उसस्के गाल पर दबाये रखा, फिर दूसरे गाल को भी बिल्कुल उसी तरह किश किया, फिर उसस्के पेशानी को चुम्मा फिर थोड़ी को चूमा फिर हलके से उसस्के गले को चूमा, फिर गर्दन की तरफ बढ़ते हुए उस को चूमते हुए अब धीरे धीरे अपने लबों को निचे के तरफ चूमते जा रहा था यहाँ तक के जैसे रुचिका को थोड़ा पीछे की तरफ होना पड़ा और अपने गर्दन को पीछे करना पड़ा और मोहनलाल ने जंहा उस्सकी क्लीवेज की शुरुवात होती है को हलके से किश करते हुए उस्का बायां हाथ फिर से रुचिका के जाँघों पर पहुँच गया और वंहा हलके से फेरने लगे, तब झट से रुचिका ने उसस्के उस हाथ को अपने ुआंगलियों में थामा और मुस्कुराते हुए रुचिका ने कहा, 'बहोत किश कर लिया आप ने चलो अब पार्टी के लिए तैयार हो जाते हैं'

मोहनलाल ने उसकी बात पर कहा 'हम तू तैयार hi हैं, अब और क्या तैयार होना है' तब रुचिका ने कहा 'मैं तू दुल्हन के जोड़े में हम और अगर हम वंहा पार्टी में ऐसे जायेंगे तू लोग उनकी बजाये हमारी पार्टी समझने लगेंगे, इसलिए मुझे तू चेंज करना hi पड़ेगा'

मोहनलाल खीजते हुए 'क्या यार, लोग मुझे अपनी दुल्हन को अच्छे से उससे दुल्हन के वेश में देखने भी नहीं देते'

रुचिका 'आज मैं दुल्हन के वेश में सूरज भाई साहेब और दिया की वजह से हूँ तू हमें उनको भला बुरा कहने की बजाये उनकी पार्टी में शामिल होना चाहिए, इसलिए हमें जल्दी से तैयार होना चाहिए'

मोहनलाल ने उससे अपने आगोश में लेते हुए 'कोई बात नहीं, चलते हैं लेकिन थोड़ी देर में, पहले अपनी दुल्हन से मिल तू लू' और ये कहकर वो उससे आगोश में लेकर बैठा रहा लेकिन कुछ नहीं किया बस एक दूसरे को महसूस करने लगे.

कुछ समय तक जब वो दोनोंओ hi एक दूसरे के आगोश में lipaṭe रहे फिर मोहनलाल ने आगे baḍh कर रुचिका को एक बार फिर चूमा और चूमे hi जा रहा था . रुचिका के लिए यह अनुभव नया था जब किसी ने इतना जयादा एक साथ चूमा हो. वो इससे अनुभव करके एक अलग hi दुनिया में खींची जा रही थी और उसका काम सागर लगातार baḍhta जा रहा था. काम सागर इतना बढ़ गया की अब रुचिका भी मोहनलाल के चेहरे को जगह जगह चूमे जा रही थी. फिर तू दोनों में एक दूसरे को चूमने की होड़ सी लग गयी. फिर चूमते हुए जब थोड़ा थक गए तू आराम से एक दूसरे को चूमना छोड़कर निहारने लगे तू रुचिका मोहनलाल की नज़रों का सामना न कर पायी और अपनी पलके झुका ली.

जब रुचिका ये कर रही थी तू मोहनलाल को भी जोश तू आ रहा था, लेकिन जोश के साथ साथ उस पर प्यार कुछ जयादा hi आने लगा और उस प्यार में उसने रुचिका को जोर से हुग कर लिया और मोहनलाल अपने हाथ को रुचिका की पीठ पर ले जाकर हलके से फरते हुए पूछा, “तो बताओ किसी है मेरी प्यारी, सी रुचिका?” रुचिका का सर अब मोहनलाल के सीने से आ लगा और वो उसकी बात का जवाब न देकर खामोश रही.

मोहनलाल का हाथ रुचिका के पीठ पर धीरे धीरे ऊपर नीचे हो रहा था और वो उसकी फीठ को सेहला भी रहा था और बीच बीच में थपथपा भी रहा था. जब वो ये कर रहा था तू उस्सकी उँगलियों टेल रुचिका की ब्रा की स्ट्राप फील हुआ और आगे से रुचिका के बूब्स उसस्के छाती पर दबे हुए भी फील किये तू मोहनलाल इस को महसूस करके उससे गरम फील होने लगा और खुद hi रुचिका को अपनी बाहों में कसने लगा और फिर रुचिका के चेहरे को अपने हाथ से ऊपर उठाकर उससे बहुत hi प्यार से चूमने लगा तू रुचिका भी जवाब में उससे यंहा वंहा चूमने लगी.

कुछ देर वो दोनों hi एक दूसरे को चूमते रहे और दोनों इस समय पागल से हो गए थे और उन दोनों को रोकने वाला भी कोई नहीं था.

थोड़ा और आगे baḍh hi रहे थे की रुचिका के फोन की ghnṭee बजी. पहली ghnṭee तो पूरी बज कर काṭ चुकी थी फिर भी उनके पागलपन में कोई फर्क नहीं आया . लेकिन दूसरी ghnṭee के साथ hi रुचिका को अपनी वास्तविक स्थिति अवगत हुई. रुचिका को जैसे 440व् का jhaṭakaa लगा और खुद से मोहनलाल को अलग कर दिया. इस समय उन दोनों की साँसें काफी तेज चल रही थी. धड़कन की आवाज साफ़ सुनाई दे रही थी . मोहनलाल तो अब भी खुमार में था और सवालिया नज़रों से रुचिका को देखने लगा था. कुछ देर बाद फोन पर बात करने के बाद उसने बताया की दिया का फोन था और वो हम दोनों को बुला रही है.

मोहनलाल के कांधों पर सर रखते हुए रुचिका ने कहा 'मुझे समझ नहीं आ रहा की किया करूँ, एक तरफ आप हैं और दूसरी तरफ वो लोग हैं' ये कहकर उसने मोहनलाल को एक ज़ोर का हुग किया.
 
अपडेट 65

थोड़ा और आगे baḍh hi रहे थे की रुचिका के फोन की ghnṭee बजी. पहली ghnṭee तो पूरी बज कर काṭ चुकी थी फिर भी उनके पागलपन में कोई फर्क नहीं आया . लेकिन दूसरी ghnṭee के साथ hi रुचिका को अपनी वास्तविक स्थिति अवगत हुई. रुचिका को जैसे 440व् का jhaṭakaa लगा और खुद से मोहनलाल को अलग कर दिया. इस समय उन दोनों की साँसें काफी तेज चल रही थी. धड़कन की आवाज साफ़ सुनाई दे रही थी . मोहनलाल तो अब भी खुमार में था और सवालिया नज़रों से रुचिका को देखने लगा था. कुछ देर बाद फोन पर बात करने के बाद उसने बताया की दिया का फोन था और वो हम दोनों को बुला रही है.

मोहनलाल के कांधों पर सर रखते हुए रुचिका ने कहा 'मुझे समझ नहीं आ रहा की किया करूँ, एक तरफ आप हैं और दूसरी तरफ वो लोग हैं' ये कहकर उसने मोहनलाल को एक ज़ोर का हुग किया.

मोहनलाल ने जिस तरह से रुचिका को हुग किया था वो इतनी जोर से किया था की उसके बूब्स मोहनलाल की छथि में पइसस से गए थे जिससे रुचिका के मुंह से बड़ी जोर से निकला 'aa...aa..h'

मोहनलाल ने पुछा की 'क्या हुआ' तू वो बेचारी अब मोहनलाल को क्या बताती, बस उसने हलके से इतना hi कहा 'जयादा जोर से लग गयी' तू मोहनलाल ने उससे सॉरी बोलै तू रुचिका ने कहा 'पति पत्नी में सॉरी नहीं होता'

मोहनलाल ने उससे बड़े प्यार से उसके माथे पर चूमते हुए कहा 'आगे से ख्याल रखूँगा, चलो अब जल्दी से तैयार हो जाओ'

रुचिका वंहा से उठकर जाने लगी तू मोहनलाल ने उसका हाथ पकड़ कर अपनी तरफ खींच कर अपनी गॉड में बैठा लिया, लेकिन जैसे hi मोहनलाल ने रुचिका को खींचा तू उससे झटका लगा और उसके मुंह से निकला 'आउच'

रुचिका उसकी गॉड में गिरकर उसकी आँखों में देखते हुए 'ये क्या कर रहे हैं' तू मोहनलाल ने उसके चेहरे को पकड़ कर उसके गलों पर एक चुम्मा जड़ दिया तू रुचिका सिहर उठी. मोहनलाल ने कहा 'बस तुम्हे प्यार करने का मन था' तू रुचिका ने कहा 'अब जाऊं तू मोहनलाल ने कहा 'हाँ'

रुचिका जैसे hi उठाने को हुई तू मोहनलाल ने उसकी कमर पकड़ कर फिर से बैठा दिया तू रुचिका ने कहा 'क्या िर्रादा है'

मोहनलाल 'बहुत नेक िर्रादा है'

रुचिका 'लेकिन आपके िर्रादे नेक लग नहीं रहे हैं'

मोहनलाल ने कमर तू पहले से hi पकड़ी हुई थी और अब अपने हाथों को थोड़ा सा आगे करके उसके पेट पर ले जाते हुए फिर से गॉड में बैठा लिया तू रुचिका सिहर उठी क्योँकि मोहनलाल का हाथ उसके नंगे पेट पर स्पर्श कर रहा था और मोहनलाल ने उसके कान के पास अपने मुंह को ले जाकर कहा 'अपनी पत्नी के साथ अगर न करो तब िर्रादे नेक नहीं होते, मैं तू अपनी पत्नी के साथ hi कर रहा हूँ तू मेरे िर्रादे तू बिलकुल नेक हैं'

रुचिका ने उसकी बात पर अपनी पीठ को उसके सीने पर चिपकते हुए कहा 'तू फिर ठीक है, मैं जाती hi नहीं, मेरा क्या है दोस्त तू आपके हैं'

मोहनलाल ने उससे एक डैम छोड़ दिया और कहा 'तुम जल्दी से तैयार हो जाओ, तुम सही कह रही हो, उन्होंने हमारे साथ इतना कुछ किया है तू हमारा भी फ़र्ज़ बनता है उनकी पार्टी में वक़्त से पंहुचे'

रुचिका वंहा से उठकर अपने आप को तैयार करने में लग गयी और मोहनलाल उसके ख्यालों में खोया हुआ था लेकिन वो अभी अपने आप को नियंत्रित किये हुए था. थोड़ी देर में रुचिका तैयार होकर आ गयी और बहुत hi खिली हुई लग रही थी.

रुचिका ने एक नयी सदी और बिना बाजु का blouse(jo दिया ने आज hi दिलाया था), जो बहोत डीप नैक और लग्गहग बैकलेस था, जिसमे पीछे से डोरी बंधी हुई थी. साड़ी रुचिका की सुंडी (नाभि) से करीब 3 इंच नीचे बंधी हुई थी. बाल खुले हुए थे और होठों पर मैचिंग लिपस्टिक बहुत hi अच्छे तरीके से लगी हुई थी.

माथे पर बहुत प्यारी सी छोटी सी क्यूट सी मैचिंग बिंदी लगी हुई थी और वो सिन्दूर की डिब्बी लेकर मोहनलाल के पास आयी. मोहनलाल के तू रुचिका को इस तरह देखते तो होश गायब हो गए और आँखे फाड़ कर उससे एक तक देखने लगा उसकी नज़ारे देख कर रुचिका तो शर्म से पानी हुए जा रही थी और अपनी आँखे नीचे जमीन में गदा ली और मोहनलाल उसके पास आ कर बोलै 'क़यामत धा रही है आज मेरी जान, स्वर्ग की अप्सराये भी तुम्हारे सामने कुछ नहीं'

रुचिका मोहनलाल की बात सुनकर बहुत जयादा शर्मा गयी और धीरे से सिंदूर वाली डब्बी आगे कर दी तू मोहनलाल ने हल्का सा सिंदूर चुटकी में लेकर उसकी मांग के शुरू में दाल दिया, जिससे बड़े ध्यान से देखने पर hi पता चलता था की उसने सिंदूर लगाया हुआ है. रुचिका फिर से पाँव चुने के लिए झुकाने लगी तू मोहनलाल ने उससे झुकने नहीं दिया और कन्धों से पकड़ कर अपने गले से लगा लिया और कहा 'यार तुम ये सब न किया करो, मैं जनता हूँ तुम मेरी इज़्ज़त करती हो इसलिए ये सब करती हो, लेकिन इज़्ज़त दिल से होती है न की पाँव चुने से और दूसरा मैंने तुम्हे पहले भी कहा था की तुम पत्नी हो तू इसका मतलब ये नहीं की तुम मुझसे काम हो और पाँव छू कर ये सब जटाओगी, मुझे बिलकुल पसंद नहीं है. तुम तू मेरे दिल की रानी हो और वही रहो, बस मेरे गले लगा करो जिससे मेरे दिल को सुकून मिले और तुम्हे भी ख़ुशी हो'

रुचिका ने अपने सर को उसके कंधे पर रखकर कहा 'मुझे पत्नी धरम तू निभाने दो'

मोहनलाल 'अरे यार एक बार हो गया, बस चलो पत्नी धरम निभाना है तू एक पापी दे दो'

रुचिका जल्दी से उसकी बांहों से निकलकर 'अभी कुछ नहीं, बस पार्टी में चलो'

मोहनलाल 'अब पत्नी धरम नहीं निभाना' तू रुचिका ने कहा 'वही तू कर रही हूँ, आप को याद दिला रही हूँ की आपको मुझे लेकर पार्टी में जाना है' मोहनलाल ने मायूस सा चेहरा बनाकर 'ठीक है तू चलो'

फिर दोनों वंहा से पार्टी हॉल में आ गए, अभी बहुत hi काम लोग आये थे. दिया और सूरज स्टेज के पास थे तू दोनों वंही चले गए. मोहनलाल तू सूरज से गले मिला और रुचिका दिया से गए मिली और उन दोनों को बहुत बहुत बधाई दी और गिफ्ट पकड़ाया तू सूरज बोलै 'ये क्या भाई साहेब' तू मोहनलाल ने कहा 'बस इस बारे में कोई बात नहीं और चुप चाप रख लो'

दिया आज बहुत खूबसूरत लग रही थी, जैसे की नै काली हो, वो सीधे ब्यूटी पार्लर से तैयार होकर आयी थी. दिया ने एक पारदर्शी सारी, स्लीवलेस और बैकलेस ḍीप नैक ब्लाउज जिसमे से आधे से ज़यादा चूचियां बाहर की तरफ निकली जा रही थी. और उसपे भी वह अतयंत चुम्बकीये aakarṣhaṇ लिए हुई थी. उसकी सुन्दर, गोरी गोरी चूचियां जो ब्लाउज में से झांक रही थी और काम से काम 6 इंच लम्बी क्लीवेज के दर्शन हो रहे थे. गोरी लम्बी नग्न बाहों के हाथों में चूड़ियों की खान खान ... आहा... शायद वंहा मौजूद मर्दो के लिए यह नज़ारा स्वर्ग जैसा था. जब रुचिका ने दिया को इस हालत में देखा तू उसने दिया के कान में कहा 'कुछ जयादा hi रेवेलिंग हो रहे हैं' तू दिया हंस दी और कहने लगी 'अरे यार ये तू आजकल का फैशन है और आज के दिन भी ऐसे कपडे नहीं पहनेगे तू कब पहनेगे, एन्जॉय आईटी यार और वैसे भी तेरी तू आज गोल्डन नाईट है' उसकी बात सुनकर रुचिका शर्मा गयी.

दिया ने उससे एक चिकोटी कटी और कहा 'तू तू ऐसे शर्मा रही है जैसे तेरी गोल्डन नाईट पहली बार हो रही हो, तेरे लिए तू रेपेटिशन है. वैसे एक बात है, मज़ा तू तुझे वैसा hi आएगा जैसे पहली बार आया होगा क्योंकि मोहनलाल भाई साहब तू बहुत फिट हैं और मुझे लगता है की आज तू तुझे बिलकुल सोने नहीं देंगे क्योँकि तुम भी बहुत प्यारी गुड़िया लग रही हो'

रुचिका मन में सोच रही थी की वो उससे क्या बताये उसकी तू वास्तव में hi पहली बार गोल्डन नाईट हो रही थी, लेकिन प्रत्यक्ष में उसने कहा 'आज तू आपकी भी खैर नहीं, आपको कोई इस तरह देखेगा तू छोड़ेगा नहीं'

दिया 'अरे मेरी ऐसी किस्मत कन्हान, अब देखो न मोहनलाल भाई साहेब ने तू मेरी तरफ देखा तक नहीं'

रुचिका को उसकी बात सुनकर थोड़ा सा अजीब लगा, उसकी समझ में नहीं आ रहा था की दिया उसकी खिंचाई कर रही है या कोई आउट बात है. उसने अभी के लिए इन् बातों को अपने दिमाग़ से खटकते हुए उसकी बात को हंसी में उड़ाते हुए 'अरे यार वो तुम्हे बहिन मानते हैं तू कैसे वो तुम पर ऐसी नज़र दाल सकते हैं, तुम पर तू सूरज भाई साहब की नज़र है'

दिया 'हाँ यार वो मुझे ऐसे थोड़ी न देख सकते हैं, मैं तू उनकी बहिन जैसी हूँ' वो कह तू रही थी, लेकिन उसकी नज़रे बार बार मोहनलाल पर चली जाती थी.

तभी वंहा दीपक और अवनि भी आ गए. अवनि भी आज गज़ब ध रही थी और वो खूब चहक रही थी और दिया से किसी सूरत में काम नहीं लग रही थी. वो सब एक दूसरे के गले मिल रहे थे की तभी फोटोग्राफर ने उनसे पोज़ देने के लिए कहा तू सूरज ने उस फोटोग्राफर को समझा दिया की तीनो कपल्स की बहुत अच्छी फोटो निकालनी हैं. वो तीनो जोड़ियां वैसे hi कड़ी हो गयी जैसे की सुबह पूजा में बैठी thi.Beech में सूरज और उसके बांयी तरफ दिया. सूरज के दांयी तरफ दीपक और अवनि. दिया के बांयी तरफ मोहनलाल और रुचिका. अब दिया बिलकुल मोहनलाल के करीब कड़ी थी. उसने जब से मोहनलाल को पूजा में बिना ऊपरी कपडे के देखा तू उसको मोहनलाल को देखते hi कुछ कुछ होने लगता था. पूजा में भी वो मोहनलाल के बिलकुल पास बैठी थी लेकिन वो कुलगुरु की नज़र में थी तू मोहनलाल को जयादा नहीं देख पायी थी, लेकिन यंहा उससे एक बार फिर मौका मिला था की वो मोहनलाल के बिलकुल करीब कड़ी थी और वो मोहनलाल की नजदीकी को महसूस करके मन hi मन में ानादित हो रही थी, लेकिन मोहनलाल का उस पर ध्यान कान्हा था, चाहे वो आज स्वर्ग से उत्तरी पारी लग रही थी, परन्तु मोहनलाल के पास तू पूरा का पूरा स्वर्ग hi बगल में दूसरी तरफ मौजूद था तू इस सब की उससे क्या जरुरत थी. फोटोग्राफर ने कई फोटो खींचे और वो सब सूरज और दिया को वंही छोड़ कर गेट की तरफ जाने लगे क्योँकि सूरज ने उन्हें वेलकम करने के लिए कहा था तू दिया ने मोहनलाल और रुचिका को वंही रोक लिया तू सूरज ने दिया को कहा 'इन्हे जाने दो' तू उसने सूरज से कहा 'आप भी क्या बात करते हो, आज hi तू इनकी शादी हुई है, इन्हे एन्जॉय तू करने दो'

सूरज को दिया की बात समझ में आयी और उसने मोहनलाल से कहा 'भाई साहब, आप यही रुकिए, दीपक वेलकम गेट पर संभल लेगा तू मोहनलाल कहने लगा 'ऐसा करता हूँ रुचिका को यंहा छोड़कर मैं गेट पर चला जाता हूँ'

सूरज के बोलने से पहले hi दिया मोहनलाल को बहुत प्यार से हसरत भरी निगाहों से देखते हुए बोल पड़ी 'भाई साहब आप भी क्या बात करते हैं, आज तू आपको बिलकुल भी रुचिका को अकेले नहीं छोड़ना चाहिए और आप एन्जॉय कीजिये, ये सब काम तू होते रहते हैं'

तभी दिया का पल्लू उसके उरोजों से हटा तू दिया ने झुककर अपने पल्लू को पकड़ कर अपने कंधे पर रखा तब तक वो अपने ख़ज़ाने के दर्शन मोहनलाल को करा चुकी थी. मोहनलाल ने अपने मन में कोई गलत विचार नहीं आने दिया लेकिन उसके पौरुष मन को ऐसा नज़ारा दिखाई दे और वो इस नज़ारे को आखों से आनंद भी न ले ऐसा बहुत काम hi देखा गया है तू मोहनलाल ने मन hi मन दिया के उरोजों की तारीफ की, लेकिन अगले hi पल उससे ग्लानि का अनुभव हुआ और उसने अपनी नज़रे वंहा से हटा ली और अपने चेहरे पर दृढ़ता के भाव ले आया.

वो रुचिका को लेकर एक तरफ जाने लगा तू दिया ने बोलै 'भाई साहब यही रुकिए न' तू मोहनलाल ने कहा 'मैं यही पर हूँ बस तुम्हारी सहेली को जरा यंहा की चकाचोंध दिखा देता हूँ और फिर वंहा से आ गया.

उसने रुचिका का हाथ पकड़ा और एक कार्नर में लगी हुई टेबल पर बैठ गया और अपनी चेयर को रुचिका की चेयर के बिलकुल पास ले आया और अभी वो कुछ रुचिका को कहता, एक वेटर स्नैक्स और दूसरा वेटर जूस ले आया तू उससे बोलै की वंही रख दे. मोहनलाल ने उनमे से एक स्मार्ट से वेटर को बुलाकर टिप दी और उससे समझा दिया की कोई उन्हें डिस्टर्ब न करे और उसने कहा 'सर आप चिंता न करो, आप को कुछ भी चाहिए होगा तू मैं ला दूंगा'

उसके जाने के बाद सबसे पहले मोहनलाल ने वंहा रखे फ्लोवेर्पोट में से एक गुलाब निकलकर रुचिका को देते हुए कहा 'फॉर माय लव'

रुचिका 'मैं आपका लव हूँ या पत्नी'

मोहनलाल 'देखो यार, हम एक नयी जिंदगी शुरू करने जा रहे हैं तू जो बात मैंने तुम्हे आज तक नहीं बताई वो आज बता देता हूँ की यू अरे माय लव' एंड ी लव यू फ्रॉम थे कोर ऑफ़ माय हार्ट मेरी जान रुचिका' और उसकी बात सुनकर रुचिका मन hi मन बहुत खुश हुई की उसके पापा जो अब वाकई में उसके पति बन गए हैं वो भी उससे प्यार करते हैं, ये जानकार उसका दिल बलियोँ उछलने लगा और उसने वो गुलाब मोहनलाल के हाथ से लेकर उससे चूमा और कहने लगी 'ी लव यू तू फ्रॉम थे कोर ऑफ़ माय हार्ट'

मोहनलाल ने अपने एक हाथ से उसका हाथ पकड़ लिया जो इस बात के इज़हार का प्रतीक था की वो उस से बहुत प्यार करता है और करता रहेगा. रुचिका ने उसके हाथ को अपने हाथ से कास कर ये बता दिया की वो भी उससे उतना hi प्यार करती है.

मोहनलाल ने वंही रखे जूस के गिलास को उठाकर उसके मुंह की तरफ ले जाने लगा तू रुचिका बोली 'कोई देख लेगा' तू मोहनलाल ने उसके बालों से अपना चेहरा लगा कर उसके बालों की सुगंध लेते हुए कहा 'जान यंहा पर कोई किसी की परवाह नहीं करता और अगर करता है तू करने दो, अब मुझे किसी बात का दर नहीं है और न hi तुम्हे होना चाहिए'

मोहनलाल की बात सुनकर रुचिका को कॉन्फिडेंस आ गया और उसने बिंदास तरीके से जूस को गिलास से सिप किया लेकिन उसकी आँखों से शर्म की लाली नहीं गयी और उसने अपनी पलके झुका ली थी. रुचिका बेख्याली में आधा गिलास जूस पि गयी तू उससे ध्यान आया की उसने जूस खुद hi पि लिया और मोहनलाल को नहीं दिया तू उसने जल्दी से मोहनलाल के हाथ पर हाथ रखकर गिलास मोहनलाल के मुंह की तरफ लेजाकर उससे पिलाने लगी.

मोहनलाल जूस तू पि रहा था लेकिन उसकी आँखें रुचिका की खूबसूरती को निहारने में लगी हुई थी और उसका मन कर रहा था की जल्दी से पार्टी ख़तम हो और वो रूम में जाकर रुचिका के साथ कुछ प्यार करे, लेकिन मज़बूरी थी और उससे तू आज की पार्टी में लेट तक रहना था तू वो अपना मन मसोस कर रह गया.

थोड़ी देर में वंहा भीड़ बढ़नी शुरू हो गयी और एक से बढ़कर एक कपल थे और हर तरह के रेवेलिंग कपडे पहने हुए थे. फिर वंहा खाना पीना हुआ और डांस फ्लोर पर लोग बीच बीच में जाकर डांस कर रहे थे. जब काफी देर हो गयी और लोग पार्टी से विदा होने लगे तू लास्ट में वो तीनों कपल्स रह गए. वो सब एक टेबल के चरों तरफ बैठकर खाना खाने के लिए बैठे hi थे की एक वेटर ट्रे में बहुत hi खूबसूरत तरीके से शैम्पेन की बोतल लाया हुआ था तू उस बोतल को लेकर सूरज के सामने रख दी.

ने उससे खोला और वेटर ने उससे ग्लासेज में डालकर इन 6 लोगों के सामने एक एक गिलास रख दिया. रुचिका मोहनलाल की तरफ देख रही थी तू अवनि ने उससे समझाया की इससे कुछ नहीं होगा बस थोड़ा हल्कापन लगेगा और आनंद आएगा.

सबने गिलास तू उठा लिया लेकिन मोहनलाल ने कहा 'रुचिका ने कभी ली नहीं है' तब दिया और अवनि ने एक साथ कहा की 'अब हम सब एक फॅमिली हैं और सभी बराबर के बिज़नेस पार्टनर्स भी हैं और आगे जाकर हम सबको इसकी जरुरत पड़ेगी. हमने भी आज तक नहीं ली, लेकिन आज से हम भी इससे लेंगी और आप सब के साथ कंधे से कन्धा मिलकर आपका हाथ बताएंगी'

उनकी बात सुनकर रुचिका ने भी लेने के लिए हामी भरी और सब ने 'चियर्स' करते हुए सिप किया और फिर सूरज और दीपक ने एक एक गिलास और लिया. फिर सबने खाना खाया. खाना कहते हुए अवनि और दिया तू रुचिका को बहुत छेड़ रही थी और तीनों मर्द अपने आगे के बिज़नेस की प्लानिंग कर रहे थे.

खाना कहते हुए रुचिका को थोड़ा सा पेट में दर्द महसूस हुआ तू उसने अवनि को कहा तू उसने कहा की 'कई बार चम्पानगए से पहली बार में पेट में दर्द होता है, एक काम करो थोड़ा सा जयादा पानी पियो और वाशरूम से फ्रेश होकर आ जाओ, आराम मिल जायेगा'

रुचिका 'तुम्हे कैसे पता, तुम तू कह रही थी की तुम भी पहली बार ले रही हो'

अवनि ने हँसते हुए रहसयमयी तरीके से कहा 'अरे यार समझा कर, कॉलेज के ज़माने में कई बार ले चुकी हूँ, अब पति के साथ पहली बार पि रही हूँ'

रुचिका भी उसकी बात सुनकर हंसने लगी और दिया उन दोनों को देखकर सोचने लगी की ये दोनों क्या बातें कर रही हैं तू इशारों में अवनि ने उससे कुछ समझाया. तभी रुचिका ने दो गिलास पानी पिया और वाशरूम चली गयी और कुछ देर में फ्रेश होकर आ गयी.

तभी पार्टी ख़तम हुई और वो सब गले मिलकर एक दूसरे से विदा लेकर सब अपने अपने कमरे की तरफ जाने लगे और दिया और अवनि रुचिका को 'आल थे बेस्ट' बोलकर हंस रही थी तू रुचिका ने उन्हें भी एन्जॉय करने के लिए कहा. मोहनलाल और रुचिका अपने कमरे की तरफ जाने लगे और मोहनलाल ने अब रुचिका का हाथ थमा हुआ था और जब लिफ्ट से कमरे की तरफ जाने लगे तू मोहनलाल ने रुचिका की कमर में हाथ डालकर बिलकुल अपने पास कर लिया और कमरा खोलकर जैसे hi कमरे के अंदर आये तू मोहनलाल ने रुचिका को अपनी बांहों में उठा लिया तू रुचिका ने सवालिया नज़रो से पूछा. मोहनलाल ने कहा 'मैं अपनी जान को आराम देना चाहता हूँ और नहीं चाहता की वो चलकर जाये, बल्कि मेरी बांहों में अंदर जाये और उसको बांहों में लिए हुए अंदर जैसे hi पंहुचे तू दोनों एक डैम चौंक गए
 
एक अच्छे राइटर (जो की आप हैं) की यही इनबिल्ट क्वालिटी होती है की वो अपने दिमाग़ के घोड़ो को दौड़ने के लिए हर दिशा में भेजता है और उसमे काफी सरे ख्याल आते हैं, जिनमे से एक आपने यंहा पारदर्शिता किया है.

अगर मैं कुछ यंहा कहूंगी तू आने वाली कहानी का मज़ा ख़राब हो जायेगा जो की आप भी नहीं चाहेगे.

एनीवे गुड गेस. होप यू अरे राइट.

हैवे पेशेंस फॉर लॉट्स ऑफ़ अपकमिंग फन.

थैंक्स सो मच
 
अपडेट 66

तभी पार्टी ख़तम हुई और वो सब गले मिलकर एक दूसरे से विदा लेकर सब अपने अपने कमरे की तरफ जाने लगे और दिया और अवनि रुचिका को 'आल थे बेस्ट' बोलकर हंस रही थी तू रुचिका ने उन्हें भी एन्जॉय करने के लिए कहा. मोहनलाल और रुचिका अपने कमरे की तरफ जाने लगे और मोहनलाल ने अब रुचिका का हाथ थमा हुआ था और जब लिफ्ट से कमरे की तरफ जाने लगे तू मोहनलाल ने रुचिका की कमर में हाथ डालकर बिलकुल अपने पास कर लिया और कमरा खोलकर जैसे hi कमरे के अंदर आये तू मोहनलाल ने रुचिका को अपनी बांहों में उठा लिया तू रुचिका ने सवालिया नज़रो से पूछा. मोहनलाल ने कहा 'मैं अपनी जान को आराम देना चाहता हूँ और नहीं चाहता की वो चलकर जाये, बल्कि मेरी बांहों में अंदर जाये और उसको बांहों में लिए हुए अंदर जैसे hi पंहुचे तू दोनों एक डैम चौंक गए

मोहन लाल ने रुचिका को बाहों में उठाया हुआ था और रुचिका की बेहेन मोहन लाल के गले में थी और जब वो कमरे के अंदर बीएड के पास पहुंचे तो वहां की सजावट देखकर दोनों एकदम चौंक गए और सोचने लगे की ये कैसे हुआ. मोहनलाल रुचिका को उठाये उठाये बीएड के पास पहुंचकर रुचिका को अपनी बांहों से उतारकर बीएड पर बैठा दिया.

बीएड को बहुत अच्छे फूलों से सजाया गया था और पुरे बीएड पर सफ़ेद फूल थे और बीच में गुलाब के फूलों से दिल का निशान बना हुआ था. बीएड के ऊपर एक तश्तरी में ड्राई फ्रूट्स रखे हुए थे. टेबल पर एक केक, चेररिएस का बाउल, चॉकलेट और चम्पानगए की नयी बोतल राखी हुई थी.

बीएड पर एक पेपर वंहा पड़ी उसी सुन्दर सी तश्तरी (जिस में ड्राई फ्रूट्स थे) के नीचे दबा हुआ था तू मोहनलाल ने उस पेपर को उठाया तू उस पर लिखा हुआ था

हैप्पी मैरिड लाइफ ❤️

राजमोहन

&

रुचिका

विथ लॉट्स ऑफ़ लव ❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️

सूरज & दिया

दीपक & अवनि

मोहनलाल ने वो पेपर रुचिका की तरफ बढ़ा दिया तू रुचिका उस पेपर को पढ़ कर ख़ुशी और शर्म दोनों एक साथ महसूस करने लगी थी और आने वाले पालो को सोचकर अपनी पलके झुका ली.

मोहनलाल ने रुचिका के कंधे पर जैसे hi हाथ रखा तू वो सिहर उठी, लेकिन मोहनलाल ने उससे आँखों के इशारे से दिलासा दी और उससे आरामदायक अवस्था में करते हुए कहा 'आराम से हो जाओ और फ्रेश होना है तू हो आओ'

मोहनलाल की बात सुनकर रुचिका को थोड़ा आराम मिला लेकिन वो वंहा से हिली नहीं तू मोहनलाल वंहा से उठकर सोफे पर जाकर अपने शूज खोलने लगा जो की रुचिका के लिए भी इशारा था की आराम से हो जाओ तू रुचिका ने भी अपने सैंडल्स को खोलने लगी.

रुचिका को ये करने के लिए झुकना पद रहा था. इस तरह झुकने से रुचिका का पल्लू एक तरफ हो गया जिससे उसके बहुत hi छोटे ब्लाउज के बड़े से गले में से उसके बेदाग बूब्स का नज़ारा उजागर हो गया. इतना hi नहीं उसके बूब्स के अंदर तक का नज़ारा दिखने लगा और लगभग उसके बूब्स का तीन चौथाई हिस्सा मोहनलाल की दृष्टि में आ गया जिसने एकदम से उससे उत्तेजित कर दिया.

मोहनलाल सामने बैठा हुआ इस नज़ारे को देखकर पता नहीं किस दुनिया में चला गया. उससे पता hi नहीं चला की इस दृश्ये पर नज़र जमाये हुए उससे एक मिनट बीता या एक घंटा या एक युग. वो तू उस दृश्ये में ऐसे खो गया जैसे की एक योगी साधना में विलीन हो जाता है जिस साधना को आसान भाषा में समाधी कहते हैं. योग में ऐसी hi अवस्था को शायद समाधी कहते होंगे जहां न खुद की खबर होती है और न hi जग की. जहाँ योगी param-aannd में लिप्त रहता है, और उससे किसी की खबर नहीं होती वो चाहे दीं, दुनिया हो या दुःख, सुख हो या आत्मा, परमात्मा हो, जहां सिर्फ आनंद विराजमान होता है, केवल और केवल आनंद!

मोहनलाल को ऐसी अवस्था में देखकर रुचिका ने देखा की वो उससे एकटक बिना पालक झपकाए देखे जा रहे हैं तू उसने ने मुदित भाव से पूछा 'क्या देख रहे हैं?'

मोहनलाल को उसकी आवाज सुनाई hi नहीं दी तू रुचिका ने फिर पूछा लेकिन कोई जवाब नहीं मिला तू रुचिका मोहनलाल के पास आकर उससे हिलाकर बोली 'कान्हा खो गए हैं आप, मैं जरा वाशरूम से होकर आती हूँ'

मोहनलाल जैसे नींद से जगा हो और कहने लगा 'मैं साथ चालू' तू रुचिका ने मुस्कुराते हुए ना में गर्दन हिला दी और कहा 'आप मेरे बाद जाना'

रुचिका वाशरूम से आयी तू मोहनलाल भी वाशरूम से फ्रेश होकर आ गया और उसने देखा की रुचिका बीएड पर टंगे लटका कर बैठी हुई थी. वो रुचिका के पास जाने लगा तू रुचिका को आने वाले पलों को सोचकर फिर से सिहरन सी होने लगी और वो कुछ कुछ घबराई हुई सी लग रही थी. ये घबराहट उसके चेहरे से चालक रही थी. मोहनलाल उसके पास जाकर सिर्फ खड़ा हो गया और बिना कुछ किया खड़ा रहा और रुचिका मन में सोच रही थी की आगे क्या होने वाला है.

रुचिका ने जब देखा की मोहन लाल कुछ भी नहीं कर रहा तो उसने अपनी नजर उठाई और जैसे hi नजर उठाई तो मोहनलाल ने बड़े प्यार से उसकी आँखों में झांकते हुए पूछा 'क्या मेरी जान मेरे साथ हमारे नए जीवन की शुरुआत करने के लिए तैयार है'

रुचिका ने मन में सोचा की क्या जवाब दे लेकिन फिर उसने इत्र कर गर्दन हिला कर हाँ मैं जवाब दिया. मोहनलाल ने अपने हाथों को उसको दोनों कंधो पर रख दिए तू रुचिका के दिल की धड़कन ये सोचकर बढ़ गयी की वो पल अब आने hi वाला है. मोहनलाल ने उसकी सोच के विपरीत उसके कन्धों पर अपने हाथों का थोड़ा सा दबाव बढ़ाया और उससे पकड़ कर खड़ा कर दिया तू रुचिका के दिल की धड़कन और जयादा बढ़ गयी की पता नहीं अब आगे क्या होगा. मोहनलाल झुकने लगा तू रुचिका को लगा की अब उसके लबों को चूमने वाले हैं तू उसने अपने आप को मानसिक तौर पर तैयार करने लगी. मोहनलाल जब थोड़ा सा झुका और उसने अपने एक हाथ को उसकी पीठ पर रहा और दूसरे हाथ से उसकी टांग को पकड़ा तू रुचिका की साँसे अटक सी गयी, लेकिन मोहनलाल ने उससे अपनी बाँहों में उठा लिया और अपने गले से लगा लिया तू रुचिका की साँसे थोड़ी सी संभाली और उसने अपनी बाजुओं को फिर से मोहनलाल के गले में दाल दी जिससे उसके बूब्स मोहनलाल की चाहती पर आ गए और उसका काफी बड़ा हिस्सा नज़र भी आ रहा था तू मोहनलाल फिर से उस दृश्ये में खोने वाला था की उसने थोड़ा अपने ऊपर नियंत्रण रखते हुए रुचिका को उठाकर सोफे की तरफ जाने लगा और वहां पहुँच कर उसने रुचिका को अपनी बांहों से नीचे उतर दिया और खड़ा कर दिया लेकिन उसकी पीठ से अपने हाथ को हटाया नहीं.

मोहनलाल ने वहां टेबल पर राखी हुई एक मोमबत्ती को जलाया और वहां पड़े हुए नाइफ को उठाकर रुचिका को देते हुए कहा 'हमारे नए जीवन की शुरुआत करने के लिए इस केक को काटकर उसका आगाज कर दो'

रुचिका ने नाइफ को लेकर कहा 'यह हमारा जीवन है जिसमें हमें इकट्ठे चलना है और इसलिए हम इससे मिलकर काटेंगे तू जयादा अच्छा होगा'

मोहनलाल ने उसकी बात मान ली और रुचिका के बिलकुल पीछे खड़े होकर रुचिका के दांये हाथ पर अपना द्न्य हाथ रख दिया और रुचिका की पीठ मोहनलाल के सीने से टकरा रही थी. केक काटने के लिए दोनों झुके तू रुचिका के नितम्बों ने मोहनलाल की जांघों को स्पर्श किया तू रुचिका को एक बार तू अजीब सा लगा, फिर याद आया की अब तू ये स्पर्श होते hi रहेगे तू अपने चेहरे पर मुस्कान ले आयी और थोड़ा हल्का फील करने लगी. दोनों ने मिलकर केक की तरफ हाथ बढ़ाया लेकिन उससे पहले मोहनलाल ने उसके कान के पास अपने मुंह को करके उसके कान में कहा 'जान पहले मोमबत्ती को फंक मरकर तू भुझे दो' मोहनलाल ने उससे ऐसे तरीके से कहा था की रुचिका की उत्तेजना बढ़ने लगी और उसने फंक मारकर मोमबत्ती भुझे दी. फिर दोनों मिलकर केक कटाने के लिए झुके तू मोहनलाल की सर रुचिका के कंधे पर आ गया तू रुचिका को कंधे पर गुदगुदी हो रही थी लेकिन रुचिका ने उससे भूलकर जल्दी से केक कटा और रुचिका ने एक टुकड़ा उठाकर मोहनलाल को खिलने के लिए खड़े होने लगी, लेकिन मोहनलाल तब भी झुका हुआ था तू मोहनलाल का चेहरा उसकी पीठ पर आ गया और मोहनलाल ने उसकी पीठ पर अपने होठों के स्पर्श से रुचिका को एकदम गरम कर दिया और उसने कम्कपी में उससे आगे होकर उससे अलग हो गयी और पलट कर केक के टुकड़े को उसके मुंह में देने लगी तू उसका सीना मोहनलाल के सीने से टकरा रहा था और ऐसे hi मोहनलाल ने आधा hi टुकड़ा खाया और बाकि का रुचिका को खाने के लिए दे दिया.

मोहनलाल मन में तू छह रहा था की दोनों उस केक को इक्कठे मुंह लगाकर कहते लेकिन वो अभी जल्दी बजी नहीं करना चाहता था. वह चाहता था की रुचिका एक बार कम्फर्टेबले हो जाए तो फिर वो दोनों मिलकर प्यार का खेल खेलेंगे, इसलिए वह आराम आराम से उसको वक़्त दे रहा था ताकि वह उसकी किसी भी बात का बुरा न मने.

केक खाने के बाद उसने रुचिका से शैम्पेन की तरफ इशारा किया तू रुचिका दुविधा में पद गयी की क्या करे. उसने दुविधा से बहार आने के लिए अपनी पलके झुकाये हुए मोहनलाल से कहा की 'जैसी आपकी मर्जी' तू मोहनलाल ने उससे पलट कर फिर से उससे कर टेबल की तरफ कर दिया और खुद उसके बिलकुल पीछे खड़े होकर रुचिका के कन्धों पैर हाथ रखकर हलके से उन कंधो को दबाते हुए कहा 'जान यह अच्छी तरह जान लो की अगर हम दोनों की मर्जी होगी तभी वो काम होगा नहीं तो बिलकुल भी नहीं होगा'

रुचिका 'मेरी राइ है है की अपने चाहने वालों का सम्मान करते हुए हमारी नयी जिंदगी की शुरुआत के लिए आज हम दोनों को इससे एक साथ लेना चाहिए'

मोहनलाल उस की बात सुनकर बहुत खुश हुआ और और उसके कंधो से पकडे पकडे अपने गले लगा लिया और और उसके कान में कहा 'that's लिखे माय गुड एंड इंटेलीजेंट वाइफ' . उसके बाद मोहनलाल ने उसके पीछे से अपने हाथों को आगे करके बोतल उठा कर रुचिका को दी और और उसे ओपन करने के लिए कहा तू रुचिका ने कहा 'मुझे तू खोलनी आती hi नहीं'

मोहनलाल ने उसके बांये हाथ में बोतल को पकड़े रहने दिया और उसके दांये हाथ को अपने हाथ में लेकर उससे बोतल खिलानी सिखाई और इस क्रिया में रुचिका के बूब्स मोहनलाल की बाजु से डाब भी रहे थे और बाजु की रगड़ से रुचिका के अरमान भी भड़क रहे थे. आख़िरकार बोतल खुल hi गयी तू दोनों ने मिलकर उस बोतल से शैम्पेन को गिलास में डाला और रुचिका ने बोतल को टेबल पर रखकर गिलास उठया और मोहनलाल के मुंह के पास ले जाने लगी तू मोहनलाल ने उसका हाथ पकड़ कर गिलास को उसके मुंह के पास ले जाकर कहा 'मेरी जान पहले लेगी, चियर्स' रुचिका ने सिप लिया और मोहनलाल की तरफ बढ़ा दिया तू उसने भी सिप लिया फिर धीरे धीरे दोनों ने वो गिलास खली कर दिया तू एक गिलास और भरा गया और उसको भी दोनों ने मिलकर खली कर दिया. रुचिका फिर से गिलास भरने लगी तू मोहनलाल ने उससे रोक दिया और कहा 'बस हमने शौक के लिए ले लिया है लेकिन अपने होश नहीं खोने हैं' तू रुचिका ने उसकी बात मान ली और गिलास को टेबल पर रख कर जैसे hi सीढ़ी होने लगी तू थोड़ा लड़खड़ा गयी तू मोहनलाल ने उसकी कमर पकड़ कर उससे संभल लिया.

मोहनलाल ने उससे एक हाथ से कमर से पकड़ा हुआ था और दूसरे हाथ से उसका हाथ पकड़ा और सोफे पर लेजाकर उससे अपनी बगल में बैठा लिया और कहा 'इससे बहुत हल्का सुरूर होता है, चिंता न करो, हाँ कोई परेशानी है तू मुझे बताओ'

रुचिका 'आपके होते मुझे क्या परेशानी हो सकती है'

मोहनलाल 'देखो परेशानी मेरे होने से भी तू हो सकती है'

रुचिका 'आपके होने से कैसे'

मोहनलाल ने जो हाथ कमर पर था उससे कंधे पर लेकर उससे अपनी तरफ घुमाया और दूसरे हाथ से उसका एक हाथ पकड़ते हुए कहने लगा 'रुचिका पहले तू ये बताओ की तुम मेरे साथ खुश तू हो न'

रुचिका 'खुश, मैं तू बहुत खुश हूँ की मुझे आपका प्यार मिल गया और साथ में अब तू आप से मेरी शादी भी हो गयी है'

मोहनलाल उसके कंधे और हाथ को सहलाते हुए 'रुचिका, कहना बहुत आसान है, लेकिन ये भी एक सच्चाई है की मैं तुम्हे अभी दुनिया के सामने खुलकर शायद अपनी पत्नी स्वीकार न कर पौन'

रुचिका ने चेहरा उठाकर उसकी आँखों में बड़े hi प्यार से देकते हुए कहा 'अगर आप मुझे अपनी पत्नी मानते हैं तू मुझे किसी की परवाह नहीं है क्योंकि शास्त्रों के हिसाब से अब आप मेरे पति हैं'

मोहनलाल ने उससे खींच कर अपने गले लगा लिया, उसके सर पर हाथ फेरते हुए और उसके माथे को चुम कर कहा 'तुम मेरी पत्नी हो, इसमें अब कोई दो राइ नहीं हैं और तुम्हे सबके सामने ये दर्जा भी जरूर दूंगा लेकिन अभी तुम्हे दोनों रोले निभाने होंगे, पत्नी का भी और बेटी का भी'

रुचिका 'आप बिलकुल चिंता न करें और अब इस रात को यूँही बेकार न जाने दे'

मोहनलाल ने उसके चेहरे को अपने हाथों में लेकर उसकी आँखों में बहुत अंदर तक देखते हुए कहा 'तुम इस रात का मतलब समझती हो, वैसे तू तुम पढ़ी लिखी मॉडर्न लड़की हो, लेकिन ये जो तुम करने जा रही हो, ओने वे ट्रैफिक है, वापसी का कोई चांस नहीं है'

रुचिका ने शर्म के मरे अपनी पलके झुका ली और अपने हाथ को मोहनलाल के सीने पर रख कर एक उंगली से उसके सीने को कुरेदते हुए 'आप मुझे पत्नी धरम निभाने से न रोकिये'

मोहनलाल ने उसके गाल को सहलाते हुए 'मैं तुम्हे कान्हा मन कर रहा हूँ, मैं भी तू अपना पति धरम निभाउंगा, लेकिन फिर भी कोई जल्दी नहीं है की तुम पत्नी धरम निभाओ, वो तू तुम कभी भी निभा सकती हो'

रुचिका ने मुंह फेर लिया और उठते हुए कहने लगी 'मुझे समझ आ गयी की आप मुझसे प्यार नहीं करते इसलिए आज की रात भी बहाने बना रहे हो'

मोहनलाल ने उसका हाथ पकड़ा और उससे अपनी गॉड में बैठने के लिए कहा तू उससे शर्म आने लगी, तब मोहनलाल ने कहा 'मैं इसलिए कह रहा था की वक़्त ले लो क्योँकि जितना प्यार मैं तुमसे करता हूँ उससे शब्दों में ब्यान नहीं कर सकता, तुम्हे ये बात पहले भी कह चूका हूँ की तुम मेरे दिल की धड़कन हो, बस उसके आगे कुछ नहीं कहूंगा'

रुचिका शरमाते हुए मोहनलाल की गॉड में बैठ गयी लेकिन अपना बोझ मोहनलाल पर जयादा न डाला और उसके दोनों पेअर एक तरफ hi रखे हुए थे, उसने अपनी पलके नीचे hi राखी हुई थी. मोहनलाल ने उससे पकड़कर अपने से सट्टे हुए कहा 'जान तुम बहुत खूबसूरत हो और तुमसे मैं खुलकर प्यार करना चाहता हूँ, लेकिन साथ में ये भी चाहता हूँ की तुम भी उससे एन्जॉय करो न की पत्नी धरम की मज़बूरी समझकर करो'

रुचिका थोड़ी सी मोहनलाल की टांगों पर उससे थोड़ी दूर हुई और मोहनलाल को कहने लगी 'मैं कितनी खुशकिस्मत हूँ की मुझे और मेरी भावनाओं को समझने वाला पुरुष अब मेरा पति बन चूका है'

मोहनलाल ने रुचिका को खींचकर अपने सीने से चिपका लिया. रुचिका ने अपना मुंह मोहनलाल के सीने में छुपा लिया और उसकी peeṭh पर अपनी दोनों बाहों को कसते हुए चिपक गयी. मोहनलाल भी रुचिका की peeṭh को आहिस्ता आहिस्ता सहलाने लगा और कहने लगा 'मैं सबसे भाग्यशाली व्यक्ति हूँ, लोग अपनी बेटी को दुल्हन के रूप में देखने के लिए तरसते हैं और यंहा तू मेरी बेटी तू मेरी hi दुल्हन बन कर आ गयी है, तुम्हारा धन्यवाद की तुम मेरी जिंदगी में आयी' रुचिका ने यह बात सुनी तू अपनी बांहों का घेरा मोहनलाल की पीठ पर कास लिया और उसके बूब्स मोहनलाल की छाती में डाब गए. बहुत देर तक दोनों एक दूसरे के गले से लगे रहे और कोई कुछ नहीं बोल रहा था, बस एक दूसरे को महसूस कर रहे थे.

मोहनलाल के हाथ रुचिका की लगभग नंगी पीठ पर घूम रहे थे और जैसे hi उसका हाथ घूमते हुए ब्लाउज की बहुत hi पतली सी पट्टी से टकराया तू उससे वंहा ब्रा की पट्टी का भी अनुभव हुआ. मोहनलाल अपनी एक उंगली को उस पट्टी के साथ साथ चलने लगा तू रुचिका की भावनाएं फिर से भड़काने लगी और उसकी साँसें तेज होने लगी और उसके बूब्स ऊपर नीचे होने लगे और मोहनलाल की छथि पर रगड़ कहते हुए साफ़ साफ़ दिखाई दे रहे थे. मोहनलाल जब उंगली से वंहा दबाव डालता तू रुचिका थोड़ी सी आगे हो जाती तू उसके बूब्स मोहनलाल की चाहती पर और जयादा डाब जाते. रुचिका उत्तेजित होने लगी थी और उसने अपनी बांहो को मोहनलाल के पीठ पर और जयादा कसने लगी.

मोहनलाल अपने एक हाथ से तू उसकी ब्रा की पट्टी पर छेड़खानी करके रुचिका की भावनाओं को भड़का रहा था और अपने दूसरे हाथ को उसके कंधे पर लेकर हलके हलके से सहलाते हुए गर्दन की तरफ बढ़ने लगा और अपने अंगूठे से उसके गलों को सहलाते हुए उससे रुचिका के होठों पर लेकर धीरे धीरे सहलाने लगा, जिससे रुचिका को बर्दाश्त करना मुश्किल होने लगा और थोड़ा पीछे को होकर एक तरफ झुकी तू उसकी सदी का पल्लू उसके कंधे से नीचे गिर गया. रुचिका को याद आया की वाशरूम में सदी के साथ सेफ्टी पिन लगाना भूल गयी थी, लेकिन अब क्या हो सकता था, उसने झुककर पल्लू को उठाने लगी तू मोहनलाल को उसके बूब्स का बड़ा सा हिस्सा नज़र आने लगा और उसका रक्त परवाह भी बढ़ने लगा.

रुचिका जिस हाथ से पल्लू उठा रही थी उस हाथ को मोहनलाल ने पकड़ लिया और पल्लू को ऊपर नहीं करने दिया तू रुचिका शर्म से लाल हो गयी और उसने अपनी नज़रे नीचे कर ली और उसकी साँसें बहुत तेज चलने लगी जिससे बूब्स ऊपर नीचे होने लगे तू मोहनलाल उस दृश्य को देखकर और जायदा उत्तेजित होने लगा और उसका रक्त परवाह उसके लिंग की तरफ जाने लगा.

मोहनलाल ने जब देखा की रुचिका कुछ घबराई हुई सी है तू उसने उस हाथ को छोड़ दिया जिससे पल्लू को पकड़ा हुआ था उसने अपनी नज़रे उठाकर सावळ्या नज़रों से पूछा तू मोहनलाल का जो हाथ पीठ पर था अपने उस हाथ को पीठ से हटाकर उसके सर पर ले आया और उसके सर को सहलाते हुए कहने लगा 'मुझे मेरी जान रुचिका को डरना नहीं है, बल्कि प्यार करना है' तू रुचिका उसके गले लग गयी और कहने लगी 'दर नहीं शर्म आ रही है'

मोहनलाल ने रुचिका को आराम देते हुए उसके सर को सहलाते हुए केहने लगा 'जान देखो पति और पत्नी एक दूसरे के अंग होते हैं, वो दोनों अलग अलग नहीं बल्कि एक होते हैं. यह जरूर है की उन दोनों को एक दूसरे को समझने में वक़्त जरूर लगता है, इसलिए कोई जल्दी बजी नहीं है और तुम अपना पूरा वक़्त लो और जब दिमाग़ी तौर पर तैयार हो जाओगी तब एक दूसरे को समझ लेंगे, चलो सोते हैं'

रुचिका अपनी गरम गरम साँसें मोहनलाल की छथि पर डालते हुए 'मुझे आज आपकी बांहों में रहना है और अभी सोने का मन नहीं है'

मोहनलाल भी अपने हाथ को उसकी कांख के नीचे से उसकी पीठ पर लेजाकर उससे अपनी बांहों में भर लेता है और कहता है 'अब ये बांहे मेरी नहीं बल्कि मेरी जान की हैं और तुम्हे मुझसे पूछने की जरुरत नहीं है'

रुचिका भी अपनी बाजुओं को मोहनलाल की पीठ पर ले गयी और उससे अपने से कसने लगी क्योँकि वो अभी बिना पल्लू के अपने गले को मोहनलाल को दिखने में शर्मा रही थी. उसके हाथों का दबाव से उसके बूब्स मोहनलाल को उत्तेजित कर रहे थे और मोहनलाल का हाथ उसकी पीठ पर ब्लाउज की पतली सी पट्टी के नीचे नंगी कमर पर था. मोहनलाल अपने हाथ को वंहा चला रहा था की उसका हाथ वंहा पंहुच रहा था जंहा से सदी बंधी होती है तू वो वंहा पर अपनी उंगली सदी की लाइन के साथ साथ फिरने लगा
 
अपडेट 67

रुचिका भी अपनी बाजुओं को मोहनलाल की पीठ पर ले गयी और उससे अपने से कसने लगी क्योँकि वो अभी बिना पल्लू के अपने गले को मोहनलाल को दिखने में शर्मा रही थी. उसके हाथों का दबाव से उसके बूब्स मोहनलाल को उत्तेजित कर रहे थे और मोहनलाल का हाथ उसकी पीठ पर ब्लाउज की पतली सी पट्टी के नीचे नंगी कमर पर था. मोहनलाल अपने हाथ को वंहा चला रहा था की उसका हाथ वंहा पंहुच रहा था जंहा से सदी बंधी होती है तू वो वंहा पर अपनी उंगली सदी की लाइन के साथ साथ फिरने लगा.

रुचिका के दिल में हलचल मची हुई थी की वो क्या करे और क्या न करे. तभी मोहनलाल का एक हाथ उसकी एक टांग पर पहुँच कर उससे सहलाने लगा तू रुचिका की हालत ख़राब होने लगी. उसके दिल की धड़कन और जयादा बढ़ने लगी और उस को काम करने के लिए उसने मोहनलाल के हाथ पर अपना हाथ रख दिया और उसकी उँगलियों में अपनी उँगलियों को दाल दिया जिससे वो अपने हाथ को रुचिका की टांग पर आगे पीछे न कर पाए.

मोहनलाल ने उस हाथ को पकड़ कर अपने मुंह की तरफ लेकर उसने रुचिका के हाथ को चुम लिया तू रुचिका ने चेहरा ऊपर उठाकर मोहनलाल की तरफ देखा और जैसे hi दोनों की आँखें चार हुई तू रुचिका को मोहनलाल की आँखों में अथाह प्यार का सागर दिखाई दिया और वो उसका सामना नहीं कर पायी तू उसने फिर से पलके झुका ली. मोहनलाल ने उसके इस तरह करने को आगे बढ़ने का इशारा समझा तू वो मन hi मन बहुत खुश हुआ.

मोहनलाल ने अब रुचिका के हाथ के पिछली तरफ चूमना शुरू कर दिया तू रुचिका के मुंह से सिसकने की आवाज़े आने लगी. मोहनलाल उसके हाथ को चूमते चूमते अब उसके हाथ से ऊपर की तरफ उसकी बांह की तरफ बढ़ते हुए अब उसकी बांह पर आ गया और उसकी बांह को चूमते हुए धीरे धीरे ऊपर की और बढ़ने लगा. उसका दूसरा हाथ रुचिका की पीठ पर सदी और पेटीकोट की लाइन के साथ साथ उसकी नंगी पीठ को हेक हाथ से फिरने से रुचिका को बर्दाश्त करना मुश्किल हो रहा था. वो एक झटके में मोहनलाल की गॉड से उठ कर कड़ी हो गयी और लम्बी लम्बी साँसें लेने लगी. उसका पल्लू जो उसके कंधे से नीचे आ गया था वो अभी भी नीचे hi गिरा हुआ था.

मोहनलाल भी रुचिका के खड़ा होने पर वो भी उसके पीछे खड़े हो गया और पीछे से उसके कन्धों पैर अपने हाथ रखते हुए 'क्या हुआ जान' रुचिका बेचारी क्या जवाब देती, वो चुप कड़ी रही. मोहनलाल ने उसकी पीठ पर जो बाल लटक रहे थे उन्हें एक साइड में कर दिया तू रुचिका की लगभग नंगी पीठ पर अपने एक हाथ को फेरने लगा तू रुचिका को अच्छा तू लग रहा था लेकिन उसकी उत्तेजना भी बढ़ रही थी.

मोहनलाल ने थोड़ा सा अपने मुंह को आगे लेजाकर उसकी नंगी पीठ पर अपने होठों को रखा. उसके होठों का अपनी पीठ पर स्पर्श होते hi रुचिका को जैसे करंट लग गया. उसकी साँसें जो पहले से hi तेज थी, वो और भी तेज हो गयी और उसके बूब्स ऊपर नीचे होने लगे. मोहनलाल धीरे धीरे उसकी पीठ को चूमते हुए अपने एक हाथ को उसकी बाजु पर फेरते हुए उसकी टांगों पर ले आया तू रुचिका के मुंह से सिसकारी निकलने लगी.

मोहनलाल ने उस हाथ को रुचिका की टांगो के नीचे ले लिया और दूसरे हाथ को उसकी पीठ पर ले आया. रुचिका को उसने अपनी तरफ घूमना चाहा तू रुचिका थोड़ा सा रेसिस्ट कर रही थी, लेकिन मोहनलाल ने उससे जोर लगाकर अपनी तरफ घुमा hi लिया और जैसे hi वो घूमी तू उसका पल्लू नीचे होने के कारन उसने अपने आप को मोहनलाल के सीने में अपने को छुपाने के लिए उसके गले लग गयी. मोहनलाल ने उससे अपनी बांहों में फिर से उठा लिया और बीएड की तरफ चल पड़ा और उससे बीएड के पास जाकर बीएड पर लिटा दिया.

रुचिका को बीएड पर इस तरह से लिटाया की उसकी कमर बीएड पर थी और रुचिका का वक्षस्थाल मोहनलाल की आँखों के सामने उजागर हो गया. रुचिका के बूब्स ऊपर नीचे हो रहे थे और जैसे hi रुचिका ने मोहनलाल की नज़रों को अपने वक्षस्थाल पर पाया तू नारी सुलभ लज्जा से उसने पलटी खायी और अपने सीने को बीएड की तरफ कर लिया और उसकी कमर मोहनलाल की नज़रों में आ गयी.

मोहनलाल उससे निहारता रहा और कुछ नहीं किया तू रुचिका जो पलटी खा चुकी थी वो सोच रही थी की उसके पापा जो अब पति बन चुके थे उसके साथ कुछ करेंगे, लेकिन जब काफी देर तक कुछ नहीं हुआ तू उसने थोड़ा सा अपने चेहरे को उठाया और मोहनलाल को देखने लगी. उसने पाया की मोहनलाल खड़ा हुआ है और बिना कुछ किया उससे निहारे जा रहा है तू उसने धीरे से कहा 'आप ऐसे hi खड़े रहेगा, आप भी बीएड पर आ जाइये न'

मोहनलाल ने शरारत से उससे देखते हुए कहा 'क्या करूँ मेरी जान मुझसे नाराज होकर मुंह फेर कर सो गयी है तू सोच रहा हूँ की उससे कैसे मानों'

रुचिका जल्दी से थोड़ी सी पलटी और कहने लगी 'मैं आपसे क्योँ नाराज होउंगी'

मोहनलाल 'अब ये मुझे पता होता तू मन नहीं लेता'

रुचिका 'मैं आपसे बिलकुल भी नाराज नहीं हूँ'

मोहनलाल ' अगर नाराज नहीं हो तू आ जाओ मेरी बांहों में'

रुचिका बिना कुछ सोचे पलटी और घुटनो के बल होकर उसकी बांहों में आ गयी तू मोहनलाल ने उससे अपनी बांहों में कास लिया तू रुचिका के बूब्स ने मोहनलाल के दिल की धड़कन बढ़ा दी और उसने अपनी उँगलियों को उसकी पीठ पर फेरते हुए एक हाथ को उसके सर पर ले गया. मोहनलाल उसके सर पर हाथ फेरते हुए कहने लगा 'थैंक्स की तुम मुझसे नाराज नहीं हो'

रुचिका 'आप मुझे फिर से थैंक्स कह रहे हैं'

मोहनलाल 'अब अगर सॉरी कहूंगा तू तुम फिर भी नाराज हो जाओगी, इसलिए सॉरी भी नहीं कहता'

रुचिका 'आप अगर सॉरी कहोगे तू पक्का नाराज हो जाउंगी'

मोहनलाल ने उसके सर पर हाथ फेरते हुए उससे पुकारा 'रुचिका अपना चेहरा तू दिखाओ'

रुचिका ने अपने चेहरे को मोहनलाल के सीने में छुपाया हुआ था और कहने लगी 'मुझे शर्म आ रही है'

मोहनलाल 'क्योँ यार तुम इतनी खूबसूरत हो और तुम्हारे चेरे में इतना aakarṣhaṇ है फिर भी शर्मा रही हो'

रुचिका ने अपने चेहरे को ऊपर नहीं उठाया और कहने लगी 'आपसे एक रिक्वेस्ट है की लाइट बंद कर दे'

मोहनलाल 'अरे यार तुम क्या चाहती हो की मैं अपनी जान की खूबसूरती को न देखूं'

रुचिका 'मैं ये कभी नहीं चाहती और मुझे मालूम है की अब हमारे मन मिल चुके हैं तू आप तू मेरी खूबसूरती को मन की आँखों से भी देख सकते हो. प्लीज मेरी बात मान लीजिये, मुझे बहुत जयादा शर्म आ रही है'

मोहनलाल ने कहा ‘ठीक है लाइट बंद कर देते हैं, लेकिन लाइट बंद करने से पहले एक बार तू अपने चेरे को दिखा दो'

रुचिका 'इस चेहरे को आप ने अब जिंदगी भर देखना है, बस एक रिक्वेस्ट है की आप एक बार पलट जाएँ तू मैं अपने चेहरे को ऊपर उठती हूँ’

मोहनलाल ने उससे छोड़ दिया और पलट गया. अब उसकी पीठ रुचिका की तरफ थी तू रुचिका ने जल्दी से अपने पल्लू को ठीक किया और अपने बालो न को जो आगे आ गए थे उन्हें पीछे किया और बीएड से उतर कर मोहनलाल को पीछे से पकड़ लिया तू उसके बूब्स मोहनलाल की पीठ पर गड से गए तू मोहनलाल ने पलटकर रुचिका को अपने से थोड़ा दूर किया और उससे ऊपर से नीचे तक निहारने लगे और उससे बीएड पर बैठा कर खुद खड़े रहे और अपनी जेब से एक बहुत प्यारा नेकलेस निकलकर कहने लगे 'थिस इस फॉर माय पर्फेक्ट्ली ब्यूटीफुल मेरी जान, मेरे दिल की धड़कन'

रुचिका मोहनलाल की बात सुनकर शर्मा भी गयी लेकिन हिरे जड़ित नेकलेस को देखकर हैरान भी रह गयी की ये कब लिया गया. रुचिका ने उस नेकलेस को लेकर उससे चूमा और कहा ‘थैंक्स फॉर सुच ा मर्वेलौस नेकलेस'

मोहनलाल ने हँसते हुए कहा 'अब तुम थैंक्स बोल रही हो'

रुचिका ने ये सुना तू उसकी थोड़ी शर्म काम हुई और मोहनलाल के गलों को चूमकर कहने लगी 'आप hi पहना दीजिये न'

मोहनलाल ने नेकलेस उसके हाथ से लेते हुए उसकी गर्दन में डालकर पहनते हुए 'क्या फायदा, अभी तू फिर उतरना पड़ेगा'

रुचिका उसकी बात सुनकर बहुत जयादा शर्मा गयी और कहने लगी 'थैंक्स नहीं कहूंगी, लेकिन अब लाइट तू बंद कर दो, प्लीज'

मोहनलाल ने कहा 'अरे यार तुम मुझे थोड़ी जगह तू दो, नहीं तू अँधेरे में मैं कंही गिर गिरा जाऊंगा’

रुचिका बीएड पर थोड़ा एक तरफ खिसक गयी तू मोहनलाल भी बीएड पर आ गया और बीएड पर लेत कर उससे निहारने लगा तू रुचिका ने लाइट बंद करने का इशारा किया तू मोहनलाल ने उससे सताने के लिए सर हिला कर न कहा तू रुचिका ने भी पलटी खा ली. उसके पलटी कहते hi मोहनलाल ने साइड टेबल से हाथ बढ़ा कर लाइट बंद कर दी तू कमरे में अँधेरा हो गया.

मोहनलाल ने लाइट बंद करने के बाद चेहरे को घुमक्कड़ रुचिका को देखा तू उसने पलटी खायी हुई थी. मोहनलाल मन में सोच रहा था की क्या करूँ. क्या वो पल आ गया है, जब वो और रुचिका एक हो जायेंगे या उससे रुचिका को अभी वक़्त देना चाहिए. उसके दिमाग़ में बहुत सरे ख्याल आ रहे थे, वो बाकि सभी ख्यालों की इस वक़्त दरकिनार करते हुए अपने और रुचिका के मिलान के बारे में सोच रहा था. उसका एक मन कह रहा था की वो मर्द है और उससे अपनी मर्दानगी दिखते हुए उससे आज hi काली से फूल बना दे, चाहे थोड़ी जबरदस्ती करनी पड़े. उसका दूसरा मन कह रहा था की उससे जबरदस्ती बिलकुल भी नहीं करनी चाहिए क्योंकि एक तू वो उसकी जान से प्यारी बेटी है और दूसरा वो उससे दिल की गहराइयों से प्यार करता है तू उससे प्यार से हासिल काटना चाहिए न की पशु बनकर जबरदस्ती से, अपने ओरिजिनल करैक्टर को ख़राब न करे. मोहनलाल को दूसरी बात समझ में आयी और वो इंतज़ार करने लगा की अगर रुचिका पलटी खायेगी तू उससे प्यार से अपना बनाएगा, जबरदस्ती बिलकुल नहीं करेगा.

उधर रुचिका के मन में भी बहुत कुछ चला रहा था. उसने लाइट तू बंद करा दी थी लेकिन उससे अभी भी बहुत शर्म आ रही थी की कैसे वो आने वाले पलों का सामना करेगी. ठीक आज उसके पापा पति बन गए हैं, लेकिन हैं तू उसके पापा hi न. कहना तू बहुत आसान है की पापा से प्यार करती हूँ, और अब शादी करके उनकी पत्नी भी बन गयी हूँ, लेकिन क्या उनकी नजरों का सामना कर पाऊँगी. अभी तू जब मेरा पल्लू सरका था तू तब भी मुझे शर्म आ रही थी, जबकि मैंने ब्लाउज भी पहना हुआ था. उसके पापा जब एक एक करके उसके कपडे उतरेंगे तू क्या उनकी नजरों का सामना हो पायेगा. सिर्फ नजरों का hi नहीं बल्कि उनके हाथों को अपने शरीर पर महसूस करने से उसकी हालत ख़राब होने लगी तू जब हकीकत में ये सब होगा तब क्या होगा. ये सोचते hi उसकी साँसें बहुत तेज तेज चलने लगी और वो अपने आप को आने वाले पलों के लिए खुद को तैयार करने लगी. उससे बहुत साडी चिंताओं के लिए अपने आप को तैयार करना था. क्या वो अपने पापा को जो अब पति हैं’ उनको पत्नी का प्यार दे पायेगी, जिसपर अब उनका अधिकार है. वो सोचने लगी की उसके पापा बहुत अच्छे हैं क्योंकि उनकी जगह कोई और होता तू उसकी परवाह किया बिना अब तक अपने हक़ को हासिल कर चूका होता. ये ख्याल उसके मन में आते hi उसने अपने आप को मानसिक तौर पर तैयार किया और दृढ निश्चय करके वो पलट गयी तू उसने देखा की कमरे में अँधेरा तू था लेकिन अब कुछ देर हो जाने की वजह से कुछ कुछ दिखाई दे रहा था. उसने देखा की उसके पापा आखें बंद करके लेते हुए हैं और वो इस मुद्रा में बहुत प्यारे लग रहे हैं. उसने हिम्मत करके आवाज़ दी 'आप सो गए क्या'

मोहनलाल जो अपनी सोचों में गम था उसकी आवाज सुनते hi आखें खोल दी और देखने लगे तू उससे रुचिका की हलकी सी परछाई दिखाई दी जो उसकी और पलट गयी थी तू मोहनलाल ने कहा 'नहीं मैं तू नहीं सोया, लेकिन मुझे लगा तुम सो गयी हो तू मैंने तुम्हे परेशान करना ठीक नहीं समझा'

रुचिका उसकी बात सुनकर भावुक हो गयी और मोहनलाल की बांयी बाजु को अपने हाथ से अपनी तरफ किया और खिसक कर उस बाजु पर अपने सर को रखते हुए कहने लगी 'आप इतने अच्छे क्योँ हैं' तू मोहनलाल ने उससे छेड़ते हुए कहा 'अभी तू कह रही हो की मैं अच्छा हूँ कहीं थोड़ी देर बाद यह न कहना की कितने गंदे हो'

रुचिका ने बिना सोचे झोंक में hi कह दिया 'मैं ऐसा क्यों कहूंगी' लेकिन जैसे hi उससे मोहनलाल की बात का मतलब समझ आया तू वो बहुत जयादा शर्मा गयी और थोड़ा और खिसक कर मोहनलाल की चाहती की तरफ अपने सर को करते हुए कहने लगी 'आप बहुत गंदे हैं' उसकी बात सुनकर मोहनलाल हंसने लगा और कहने लगा 'मैंने तू सोचा था की थोड़ी देर बाद कहेगी, लेकिन तुमने तू एक हो पल में मुझे आसमान से धरती पर ला पटका' और ये कहते कहते मोहनलाल ने उससे अपने आगोश में ले लिया और उसके माथे को चुम लिया और फिर उसके चेहरे को चूमने लगे.
 
अपडेट 68

रुचिका ने बिना सोचे झोंक में hi कह दिया 'मैं ऐसा क्यों कहूंगी' लेकिन जैसे hi उससे मोहनलाल की बात का मतलब समझ आया तू वो बहुत जयादा शर्मा गयी और थोड़ा और खिसक कर मोहनलाल की चाहती की तरफ अपने सर को करते हुए कहने लगी 'आप बहुत गंदे हैं' उसकी बात सुनकर मोहनलाल हंसने लगा और कहने लगा 'मैंने तू सोचा था की थोड़ी देर बाद कहेगी, लेकिन तुमने तू एक हो पल में मुझे आसमान से धरती पर ला पटका' और ये कहते कहते मोहनलाल ने उससे अपने आगोश में ले लिया और उसके माथे को चुम लिया और फिर उसके चेहरे को चूमने लगे.

मोहनलाल जैसे जैसे रुचिका को चुम रहा था वैसे वैसे उसकी भावनाओं में उबाल आ रहा था. वो अपनी गरम गरम साँसें मोहनलाल की गर्दन पर छोड़ रही थी, जिससे मोहनलाल भी उत्तेजित होने लगा. मोहनलाल का एक हाथ को रुचिका के सर के नीचे था उससे उसने रुचिका को पकड़ कर अपने ऊपर खींच लिया जिससे रुचिका के बूब्स मोहनलाल की छाती पर पंहुच गए और वंहा पर बूब्स के दबने के एहसास से मोहनलाल की उत्तेजना बढ़ रही थी. उसका हाथ जो पीठ पर था वो पीठ पर घूमकर अपने काम कर रहा था.

मोहनलाल का दूसरा हाथ रुचिका के कंधे से होता हुआ उसकी गर्दन पर आ गया और उसकी गर्दन को हलके हाथ से सहलाते हुए हाथ को उसके गाल पर लेकर उससे सहलाने लगा और अपने अंगूठे से उसके होठों के निचले हिस्से को सहलाते हुए अपने चेहरे को उसके चेहरे के नजदीक लेन लगा तू रुचिका से उसके होठों के निचले हिस्से पर मोहनलाल के अंगूठे का मसलना बर्दाश्त नहीं हो पा रहा था तू रुचिका ने अपने बांयी तरफ पलटी खायी और मोहनलाल की तरफ उसकी पीठ हो गयी. मोहनलाल ने उसके कंधे से पकड़ कर जैसे hi अपनी तरफ घुमाया तू रुचिका ने अपने एक हाथ को मोहनलाल के छथि पर रखकर उस को एक धक्का दे दिया तू वो एक तरफ हो गया. उससे गुस्सा तू आया, लेकिन गुस्से को नियंत्रण में रखते हुए वो रुचिका की तरफ फिर से पलटी खा कर उसको निहारने लगा.

मोहनलाल ने उसकी तरफ शिकायती नजरों से देखा और चुप करके उसको देखता रहा लेकिन न कुछ बोलै और न hi कुछ किया. रुचिका को भी पछतावा होने लगा की क्योँ उसने धक्का दे दिया, वो मन में सोचने लगी की अगर कोई ओर उसका पति होता तू अब तक इस तरह धक्का देने से वो भी सुहागरात को, तू पता नहीं उसकी क्या हालत कर देता. मोहनलाल उसके पति होने से पहले उसके पापा हैं तू हो सकता है इस वजह से देखो किश तरह मुझे कुछ कह भी नहीं कह रहे हैं. उनका न कहना रुचिका को ग्लानि से भर गया.

रुचिका खिसक कर मोहनलाल की तरफ आ गयी और उसकी आँखों में झांकते हुए अपना चेहरा उनके चेहरे के इतने पास ले आयी की उन दोनों की साँसें एक दुसरे से ṭाकरने लगीं.

मोहनलाल भी उसकी आँखों में झांकते हुए ‘देखो मैं समझ सकता हूँ की पहली बार ये सब करने में बेचैनी होती है और अब अगर तुम्हे बेचैनी जयादा हो रही है तू फिर कभी कर लेंगे'

रुचिका ने जवाब न देकर मोहनलाल के गलो को चुम लिया तू मोहनलाल ने कहा 'देख लो अगर अभी करने का मन है तू फिर चाहे जीतनी भी बेचैनी हो इस बार धकेलने की बजाये बस मुझे बता देना, तुम्हारी बेचैनी को दूर कर दूंगा'

रुचिका ने कोई जवाब नहीं दिया, बस मोहनलाल की आँखों में देखती रही और ऐसा लग रहा था की पूछ रही हो की बेचैनी सच में दूर कर डोज या बढ़ा डोज.

मोहनलाल भी अपने honṭhon को उसके honṭho के इतने पास ले आया की वह उनकी गर्मी महसूस कर सके. कुछ देर वह उनकी गर्मी बर्दाश्त करते हुए मोहनलाल की आँखों में देखती रही. मोहनलाल उसकी भारी हो गयी साँसें अपने honṭhon पर महसूस करता रहा. जब मोहनलाल को लगा की रुचिका अब उसके honṭh अपने होठों पर रखकर चुम्बन के लिए बेक़रार हो चुकी है थे तो मोहनलाल ने अपने होठों को थोड़ा और उसके होठों की तरफ बाध्य तू रुचिका की साँसें और तेज हो गयी. उसकी साँसों की गर्मी अब मोहनलाल से भी बर्दाश्त नहीं हो पा रही थी तू उसने अपने होठों को उसके गुलाब की पंखुड़ियों जैसे होठों से स्पर्श किया तू रुचिका के शरीर की कम्पन साफ़ साफ़ महसूस की. अब उसने देर न करते हुए उसके honṭhon से अपने honṭh जोड़ दिए.

रुचिका अब इतनी बेक़रार हो चुकी थी मोहनलाल के होठों को अपने होठों में लेने के लिए, लेकिन एक तू नारी लज्जा और दूसरा सुहागरात, वो भी उसके अपने पापा के साथ, इन सब चीजों ने उससे बांध रखा था और जैसे hi मोहनलाल के होठों ने उसके होठों को जकड़ा तू उसने वाकई गर्मजोशी से उन honṭhon का स्वागत किया, एक गहरी थरथराहाṭ उसके जिस्म से गुज़री थी जिसे बखूभी मोहनलाल ने उसके जिस्म पर महसूस की थी क्योंकि उसने देखा की जैसे किसी नशे के अतिरेक से उसकी आँखें मुंड गयी थी.

मोहनलाल उसके होठों को धीरे धीरे अपने होठों से सहलाते हुए उसके निचले honṭh को चूसने लगा और कुछ देर की झिझक, शर्म और हिचकिचाहैṭ के बाद उसने भी अपने होंठों को थोड़ा सा खोलकर मोहनलाल के ऊपरी honṭh को चूसना शुरू किया. दोनों एक दूसरे के होठों को चूसने में तल्लीन हो गए और जब थोड़ी देर बाद रुके तू एक दूसरे की आँखों में देखने लगे, जंहा सिर्फ और सिर्फ एक दूसरे के लिए प्यार था, हाँ रुचिका की आँखों में प्यार के साथ साथ लज्जा का भी मिश्रण था.

कुछ पलों बाद जब मोहनलाल ने उसके ऊपरी होठों पर अपनी पकड़ बनायी तो रुचिका ने मोहनलाल के निचले honṭh पर पकड़ बना ली और honṭhon के इस ज़बरदस्त मर्दन के बीच hi मोहनलाल ने अपनी जीभ उसके मुंह में डालनी चाही तू रुचिका ने अपने दांत बंद कर लिए और वो उसके मुंह में अपनी जीभ नहीं दाल पाया. मोहनलाल ने एक दो बार फिर से कोशिश की लेकिन वो सफल न हो पाया तू उसने रुचिका की आँखों में देखना चाहा तू पाया की उसकी आँखें बंद हैं.

मोहनलाल उसके होठों को चूसते हुए अपने हाथ को उसकी पीठ पर ले गया और उसकी लगभग नंगी पीठ को सहलाते हुए उसकी ब्लाउज की पट्टी से खेलते हुए अपनी एक उंगली उस पट्टी में दाल दी और जैसे hi उसकी उंगली उस पट्टी के अंदर गयी तू रुचिका के मुंह से निकला 'aa…aa…h' तू मोहनलाल ने थोड़ा और छेड़खानी करते हुए उसके ब्लाउज की पट्टी के हुक को पकड़ कर उसके शरीर से ऊपर करके खिंच कर एक डैम छोड़ दिया जिससे रुचिका के मुंह से निकला 'आउच’ और मोहनलाल के लिए इतना मौका बहुत था और उसने अपनी जीभ को उसके honṭhon को चीरते हुए उसके खुल चुके मुंह में घुसा दी. मोहनलाल ने अपनी जीभ को उसके मुंह में डालकर उसके मुंह में घूमने लगा जिससे रुचिका को नशा चाहने लगा. मोहनलाल ने महसूस किया की रुचिका को बहुत मजा आ रहा है क्योंकि उसने अपने बूब्स भी मोहनलाल की छाती से रगड़ने लगी और अपने हाथों से उसकी कमर को कसने लगी. रुचिका को इतना मजा आ रहा था की इस बार जब मोहनलाल ने जीभ उसके मुंह में डाली तुरुचिका ने उसकी जीभ को भी अस्वीकार नहीं किया बल्कि मस्ती में आकर अब अपनी शर्म को टाक पर रखकर उसने मोहनलाल की जीभ को पकड़ कर उससे चूसने भी लगी. अब रुचिका को इस खेल में मजा आने लगा और कुछ देर बाद उसने भी अपनी जीभ को मोहनलाल के मुंह में दाल दी जिससे वो भी उसकी जीभ को चूसने लगा. अब दोनों hi बहुत उत्तेजित हो रहे थे. मोहनलाल का हाथ उसकी नंगी पीठ पर घूमते हुए कभी सहलाता, कभी मसलने लगता, कभी बीच बीच में उससे चिकोटी भी काटने लगा जिससे रुचिका मोहनलाल से और जयादा चिपक जाती और मोहनलाल को उसके बूब्स का एहसास उसकी उत्तेजना को बढ़ावा दे रहा था.

इस बीच मोहनलाल का जो हाथ पीठ पर था वंहा से नीचे की तरफ जाते हुए उसके नितम्बों पर पंहुच गया और जैसे hi मोहनलाल ने उसके हाथ से रुचिका के मखमली नितम्बों को दबाया तू रुचिका ने एकदम से अपने हाथ को नितम्ब पर ले जाकर मोहनलाल के हाथ को हटाया और उसके होठों को छोड़ कर अलग हो गयी. वो बीएड पर उठकर बैठ गयी और लम्बी लम्बी साँसें लेने लगी.

उसके उठाते hi मोहनलाल भी उठकर बैठ गया तू उसने देखा की उसके गालों पर शर्म की गहरी लालिमा फैली हुई थी और उसने मोहनलाल को इस तरह उठकर अपनी और आते हुए देखा तू अपनी आँखें भींच कर बंद कर ली, जैसे वो मोहनलाल की नज़रों का सामना न करना छह रही हो. मोहनलाल ने उससे कन्धों से थमते हुए लिटा दिया.

मोहनलाल ने उससे लिटा कर उसकी आँखों में झांकना चाह मगर उसने अपनी निगाहें निचे कर ली. उसने फिर घूम कर रुचिका के कंधे पर हाथ रखा तू मोहनलाल को महसूस हुआ की जैसे फिर से उसके जिस्म में एक थरथरत दौड़ गयी हो.

मोहनलाल ने रुचिका को उसके नाम से पुकारकर पूछा की क्या हुआ तू उसने एक नज़र uṭhaa कर मोहनलाल की आँखों में देखा और वापिस नज़रें नीची कर ली वह समझ hi नहीं पायी की क्या बोले, क्या कहे, इसलिए बस चुप hi रही. वो मन में बहुत कुछ सोच रही थी और उसके मन में बहुत दुविधा थी की क्या करे और क्या न करे.

मोहनलाल ने उससे चुप देखकर उसको नारी सुलभ शर्म और पहली बार के दर को सोचकर उसने सोचा की अब और इंतज़ार करना ठीक नहीं है और रुचिका को और जयादा मौका देना उसके दर और बेचैनी को बढ़ा सकता है. ये सब सोचते हुए वो अब पीछे हटना नहीं चाहता था क्योँकि कभी न कभी तू उसकी शर्म को तोडना hi पड़ेगा तू फिर आज और अभी क्योँ नहीं.

मोहनलाल ने यह सोचते hi वो रुचिका की तरफ होकर उसको मौका दिए बिना एकदम से उसके होंठों पर अपने honṭh रख दिए लेकिन रुचिका ने अपने होठों को नहीं खोला और प्रतिरोध करने लगी. रुचिका ने उसकी पकड़ से निकलना चाहा, लेकिन मोहनलाल ने इस बार सोच लिया था की उससे मौका नहीं देना है और ये सोचकर उसकी कमर को अपनी गिरफ्त में ले लिया. रुचिका ने अपना चेहरा haṭana चाहा, मगर मोहनलाल ने इस बार वो भी नहीं करने दिया और उसके ऐतराज़ के सिर्फ चंद पलों बाद उसके honṭh खुल गए और वो खुद से मोहनलाल के honṭhon को, जीभ को चूसने चुभलाने लगी, उसकी ḍहीली बाहें मोहनलाल की कमर पर पंहुच कर सख्त हो गयीं
 
अपडेट 69

मोहनलाल ने यह सोचते hi वो रुचिका की तरफ होकर उसको मौका दिए बिना एकदम से उसके होंठों पर अपने honṭh रख दिए लेकिन रुचिका ने अपने होठों को नहीं खोला और प्रतिरोध करने लगी. रुचिका ने उसकी पकड़ से निकलना चाहा, लेकिन मोहनलाल ने इस बार सोच लिया था की उससे मौका नहीं देना है और ये सोचकर उसकी कमर को अपनी गिरफ्त में ले लिया. रुचिका ने अपना चेहरा haṭana चाहा, मगर मोहनलाल ने इस बार वो भी नहीं करने दिया और उसके ऐतराज़ के सिर्फ चंद पलों बाद उसके honṭh खुल गए और वो खुद से मोहनलाल के honṭhon को, जीभ को चूसने चुभलाने लगी, उसकी ḍहीली बाहें मोहनलाल की कमर पर पंहुच कर सख्त हो गयीं

रुचिका के इस तरह करने से दोनों बहुत नजदीक आ गए थे और दोनों के शरीरों में हिरशन हो रहा था. दोनों पागलो की तरह एक दूसरे के होंठों को अपने होंठों से दबा दबा कर चूसने लगे. फिर रुचिका ने एक दम से मोहनलाल के होंठों से अपने होंठों को हटा लिया और तेजी से लम्बी साँसे लेने लगी.

रुचिका ने मस्ती से भरी नशीली आँखों को खोल कर मोहनलाल की तरफ देखा और फिर से अपनी आंखे बंद कर ली. मोहनलाल ने रुचिका के चहरे को अपने हाथों में भर कर सीधा किया और अपने हाथ के अंगूठे से उसके नीचे वाले होंठों को एक सिरे से दूसरे सिरे तक जोर से मसला तू रुचिका के मुंह से निकला 'àaa....iii...iii' और मोहनलाल ने उसकी मादक आवाज़ को सुना तू उससे जोश आ गया और फिर दुबारा से वही क्रिया दोहराई. रुचिका के मुंह से मादक सिसकारियां निकलती रही तू मोहनलाल ने अब ऊपर वाले होंठों को भी इसी तरह किया. मोहनलाल के ऐसा करने से रुचिका के होंठों से सिसकारियां निकलती रही और उसके होठों पर लगी हुई लिपस्टिक (जो उनके चुम्बन के बाद जितनी भी थोड़ी बहुत बची हुई थी) उसके होंठों के आसपास फेल गयी. लेकिन रुचिका को इस तरह करने से वो बहुत गरम होने लगी और उसने मोहनलाल की पीठ को अपने हाथों से भींचने लगी.

मोहनलाल बिना कुछ बोले रुचिका के गर्दन पर एक तरफ अपने होंठों को रखकर अपने होंठों और जीभ से रुचिका की गर्दन को धीरे धीरे चूसते हुए चाटने लगा. रुचिका एक दम से और मचल उठी और अपने पैरों को आपस में रगड़ने लगी. मोहनलाल अपने दूसरे हाथ को धीरे धीरे उसकी टांगों पर ले गया और जैसे hi टांगों पर अपने हाथ चलने लगा तू रुचिका ने एक बार फिर से जोर लगाकर अपने आप को मोहनलाल से अलग किया और उठ कर बैठ गयी. मोहनलाल को समझ नहीं आया की ये क्या हो रहा है. वो सोचने लगा की जैसे hi उसकी टांगों या नितम्बों पर उससे हाथ लगता ह तू ये प्रतिरोध करने लगती है.

मोहनलाल सोच में पद गया की ये क्योँ हो रहा है. मोहनलाल ने थोड़ी देर कुछ सोचा और फिर रुचिका को बांहों मई भरते हुए कहने लगा 'क्या हो गया मेरी जान को, मुझसे नाराज हो गयी क्या' तू रुचिका ने न में गर्दन हिलायी तू मोहनलाल ने पुछा 'क्या जयादा जोर से कर दिया था?' रुचिका ने कोई जवाब नहीं दिया तू मोहनलाल ने उसके कन्धों को पकड़ कर उससे फिर से लिटा दिया लेकिन इस बार उससे जो नज़ारा दिखाई दिया मोहनलाल का रकत परवाह बढ़ गया.

रुचिका के उठाने से उसका पल्लू जो बार बार सरक जाता था वो अब हैट चूका था और रुचिका का ऊपरी भाग पर एक बहुत hi छोटा बिना बाजु के ब्लाउज था जिसकी क्लीवेज बहुत गहरा था. उसके बूब्स का काफी बड़ा हिस्सा उजागर था और मोहनलाल तू इन बूब्स की सुंदरता में खो hi गया. रुचिका ने जब देखा की मोहनलाल उसके लगभग नंगे हो चुके बूब्स को निहार रहा है तू उसने अपनी सदी के पल्लू से उससे ढकना चाहा. रुचिका ने सदी के पल्लू को पकड़ने के लिए थोड़ा सा उठी और जैसे hi सदी का पल्लू पकड़ा तू मोहनलाल ने उसके हाथ को अपने हाथ में लेकर उससे पल्लू से अपने आप को ढकने नहीं दिया तू वो मोहनलाल के गले लग गयी और पल्लू को छोड़ कर अपने हाथों को उसकी पीठ पर कास्ने लगी तू उसके बूब्स फिर से मोहनलाल की चाहती में दबने लगे तू मोहनलाल का तापमान बढ़ने लगा.

मोहनलाल उससे पकडे हुए पीठ के बल लेत गया जिससे रुचिका का ऊपरी भाग उसके सीने पर था और टंगे बीएड पर. मोहनलाल ने अपने हाथों को उसकी कांखों में लेकर उससे वंहा से पकड़कर अपने ऊपर थोड़ा और ऊपर करने लगा. ऐसा करने से उसके दोनों हाथों के अंगूठे उसके दोनों बूब्स को छू रहे थे और ऊपर खींचने से रुचिका की उत्तेजना बहुत बढ़ गयी क्योँकि एक तू मोहनलाल के दोनों हाथ उसकी कांखों में और उसके अंगूठे ने पहली बार उसके बूब्स को दबाया था, और ऊपर खींचने से उसका चेहरा रुचिका के बूब्स के पास आ गया और वो वंहा पर अपनी गरम गरम साँसें छोड़ ने लगा तू रुचिका को काफी गुदगुदी महसूस हो रही थी और उसकी भावनाएं उबालने लगी. वो बहुत गहरी गहरी साँसें लेने लगी और अपने आप की नीचे की तरफ खिसकने लगी. मोहनलाल ने अपने होठों को उसके गलों को छूटे हुए उसके लबों को अपने होठों में कैद कर लिया और चूसने लगा, कुछ पलों बाद रुचिका भी साथ उसका देने लगी.

मोहनलाल अपने हाथों को उसकी कान्हों से निकलकर उसकी पीठ पर ले गया और उसकी पीठ को सहलाने लगा और उसका दांया हाथ उसकी पीठ से होता हुआ पेट और पीठ की साइड में आ गया. मोहनलाल ने वंहा पर जैसे hi सहलाया तू रुचिका कम्प उठी, लेकिन मोहनलाल ने अपनी पकड़ बनाते हुए उससे अलग नहीं होने दिया.

मोहनलाल ने अब रुचिका को थोड़ा सा साइड में किया और अपनी बांयी बाजु पर ले आया, लेकिन उसके होठों को आजाद नहीं किया. उसका दांया हाथ पीठ से होता हुआ आगे पेट पर आ गया तू रुचिका को नशा सा चाहने लगा. मोहनलाल ने थोड़ी देर अपने हाथ को वंहा पर रखे रहा और कुछ नहीं किया. थोड़ी देर बाद जब रुचिका होठों के चुम्बन में खोयी हुई थी तू मोहनलाल ने उसके पेट पर अपने हाथ की उँगलियों की धीरे धीरे चलने लगा और उसकी नाभि के पास जैसे hi एक उंगली को लेकर गया तू रुचिका ने मोहनलाल के होठों को छोड़ दिया और गहरी गहरी साँसें लेती हुई अपने पेट को बीएड से थोड़ा ऊपर उठा कर अपनी बेचैनी को काम करने लगी. मोहनलाल ने देर न करते हुए अपनी एक उंगली को बहुत धीरे से उसकी नाभि में मामूली सा दाल दिया तू रुचिका के मुंह से सिसकने की आवाज़े आने लगी. मोहनलाल ने अपने हाथ को वंही रखकर उससे थोड़ा अपने से चिपकते हुए उसकी पीठ पर बांये हाथ से सहलाते हुए उससे आराम देने लगा.

जैसे hi मोहनलाल को इस बात का एहसास हुआ की रुचिका अब थोड़ा संयत हो गयी है तू उसने अपने दांये हाथ को फिर से हरकत में लेट हुए उसकी उंगली से रुचिका की गहरी नाभि को कुरेदते हुए उसके गलों और ठोढ़ी को चूमता रहा. रुचिका के लिए ये सब नया था तू उससे बहुत अधिक उत्तेजना का अनुभव हो रहा था. उससे ऐसा लग रहा था की उसकी योनि में कुछ चल रहा है और वो बहुत गहरी गहरी सांसों के साथ साथ सिसकने की आवाज़े निकल रही थी.

मोहनलाल इन् सब से जोश में आ रहा था, लेकिन वो अपने जोश को नियंत्रण में रखे हुए था. वो इस खेल को बहुत प्यार से खेलना छह रहा था, इसलिए अब उसने अपनी उंगली को रुचिका की नाभि से निकल कर अपने हाथ को उसके पेट पर चलने लगा. बीच बीच में वो अपने हाथ को पेट से कमर की तरफ होता हुआ पीठ पर ले जाता. जब वो वापिस पेट पर लता तू रुचिका की हालत ख़राब होने लगाती और वो अपने हाथों से मोहनलाल को कसने लगती जिससे मोहनलाल को उसके पेट पर हाथ चलने का मौका न के बराबर मिले. लेकिन मोहनलाल को कसने से उसका लिंग अब मचलने लगा था और वो अब बीच बीच में झटके मार रहा था.

रुचिका ने मोहनलाल को जैसे hi अपनी बांहों में कैसा तू उसके लिंग ने झटका मारा जो जाकर रुचिका की एक टांग पर प्रहार करने लगा. रुचिका को झटका लगा और वो अपने आप को थोड़ा पीछे करने लगी.

मोहनलाल ने इस मौके का फायदा उठाते हुए अपने दांये हाथ को उसके पेट पर चलते हुए थोड़ा थोड़ा ऊपर की तरफ ले जाने लगा और ब्लाउज के शुरू होने वाली लाइन पर अपनी उंगली को बांये से दांये और दांये से बांये फिरने लगा. रुचिका की हालत ख़राब होने लगी वो अपनी टांगों को एक दूसरे से रगड़ने लगी और अपने पैरों को एक दूसरे से सहलाने लगी और अजीब अजीब सी आवाज़े निकलने लगी. इस बीच मोहनलाल ने अपने दांये हाथ की एक उंगली से उसके बूब को थोड़ा सा दबाया तू रुचिका ने अपने एक हाथ को मोहनलाल के हाथ पर लेकर उससे पकड़ने लगी. मोहनलाल ने उसके हाथ के पकड़ते पकड़ते अपनी उँगलियों को खोलकर रुचिका के बूब पर हलके से रखकर दबाया तू उसने कहने के लिए मुंह खोला hi था की उसके होठों को मोहनलाल ने अपनी गिरफ्त में ले liya.Uske होठों को चूसते हुए अब वो उसके बूब्स को भी प्रेस करने लगा. रुचिका इस उत्तेजना को बर्दाश्त नहीं कर पा रही थी और उसने मोहनलाल के होठों को अपने डेंटन से हलका सा काट लिया. मोहनलाल को इसका एहसास होते hi उसके बूब्स को जोर से दबा दिया तू रुचिका ने इस बार मोहनलाल के होठों को छोड़ कर लम्बी लम्बी साँसें लेने लगी. मोहनलाल अपने काम में व्यस्त था और उसके बांये बूब को छोड़ कर अब दांये बूब को ब्लाउज के ऊपर से hi दबाने लगा तू रुचिका ने फिर से मोहनलाल के होठों को अपने होठों में लेकर उन्हें काट दिया. मोहनलाल भी उसके बूब्स को अब बरी बरी से बदल बदल कर दबाने लगा. रुचिका को अब उसके बूब्स दबाने से एक नशा सा चने लगा.
 
अपडेट 70

मोहनलाल ने इस मौके का फायदा उठाते हुए अपने दांये हाथ को उसके पेट पर चलते हुए थोड़ा थोड़ा ऊपर की तरफ ले जाने लगा और ब्लाउज के शुरू होने वाली लेने पर अपनी उंगली को बांये से दांये और दांये से बांये फिरने लगा. रुचिका की हालत ख़राब होने लगी वो अपनी टांगों को एक दूसरे से रगड़ने लगी और अपने पैरों को एक दूसरे से सहलाने लगी और अजीब अजीब सी आवाज़े निकलने लगी. इस बीच मोहनलाल ने अपने दांये हाथ की एक उंगली से उसके बूब को थोड़ा सा दबाया तू रुचिका ने अपने एक हाथ को मोहनलाल के हाथ पर लेकर उससे पकड़ने लगी. मोहनलाल ने उसके हाथ के पकड़ते पकड़ते अपनी उँगलियों को खोलकर रुचिका के बूब पर हलके से रखकर दबाया तू उसने कहने के लिए मुंह खोला hi था की उसके होठों को मोहनलाल ने अपनी गिरफ्त में ले liya.Uske होठों को चूसते हुए अब वो उसके बूब्स को भी प्रेस करने लगा. रुचिका इस उत्तेजना को बर्दाश्त नहीं कर पा रही थी और उसने मोहनलाल के होठों को अपने डेंटन से हलका सा काट लिया. मोहनलाल को इसका एहसास होते hi उसके बूब्स को जोर से दबा दिया तू रुचिका ने इस बार मोहनलाल के होठों को छोड़ कर लम्बी लम्बी साँसें लेने लगी. मोहनलाल अपने काम में व्यस्त था और उसके बांये बूब को छोड़ कर ान दांये बूब को ब्लाउज के ऊपर से hi दबाने लगा तू रुचिका ने फिर से मोहनलाल के होठों को अपने होठों में लेकर उन्हें काट दिया. मोहनलाल भी उसके बूब्स को अब बरी बरी से बदल बदल कर दबाने लगा. रुचिका को अब उसके बूब्स दबाने से एक नशा सा चने लगा.

मोहनलाल उसके बूब्स दबाते हुए अब अपने दांये हाथ को बूब्स से हटाकर नीचे पेट पर ले गया और अपनी उंगली को नाभि में डालकर वंहा उंगली से दबाने और छेड़ने लगा तू रुचिका को झुरझुरी सी होने लगी और उसने मोहनलाल के होठों को छोड़ दिया और बहुत गहरी साँसें लेने लगी. उसने जल्दी से अपने एक हाथ को नीचे ले जाकर मोहनलाल के हाथ को पकड़ना छह तू मोहनलाल ने उसके हाथ को अपने हाथ के ऊपर से हटाए बिना अपनी उंगली की हरकत को थोड़ी देर के लिए रोक दिया. जब उसने महसूस किया की रुचिका अब थोड़ा उसके हाथ से बेचिंतित हो गयी है तू उसने अपने हाथ को उसके नंगे पेट पर नाभि से नीचे की तरफ ले जाने लगा जिससे रुचिका को एक करंट सा लगने लगा और उसने उस हाथ को रोकने की भरषक चेष्टा करने लगी और दूसरे हाथ से मोहनलाल को अपने से दूर कटे हुए उठाने लगी. इस आपाधापी में उसके गले में पड़ा हुआ मंगलसूत्र मोहनलाल की कमीज के बटन से अटक गया तू रुचिका दूर होने से रुक गयी.

मोहनलाल ने देखा की मंगलसूत्र अच्छे से उसके बटन में अटक गया है और अगर जोर लगाया तू टूटने के चान्सेस थे. उसने महसूस किया की रुचिका मंगलसूत्र की वजह से काफी परेशान लग रही है. मोहनलाल ने उससे दिलासा देते हुए कहा 'चिंता न करो, इससे कुछ नहीं होगा'

मोहनलाल जब मंगलसूत्र को छुड़ाने के लिए अपने हाथों को अपनी कमीज पर लेन लगा तू उससे रुचिका के बेदाग बूब्स ने अपनी तरफ आकर्षित किया तू मोहनलाल उन् बूब्स को चुने और दबाने से अपने आप को रोक नहीं पाया और अपने हाथ को उसके बूब्स पर फिरने लगा तू रुचिका ने कहा 'ऐसे गुदगुदी जो रहो है और हिलने से मंगलसूत्र टूट सकता है' तू मोहनलाल ने अपनी ऊँगली से उसके बूब्स को दबाते हुए कहने लगा की वो चेक कर रहा है की मंगलसूत्र को निकलने के लिए क्या किया जा सकता है. उसकी बात सुनकर रुचिका मुस्करा दी.

मोहनलाल अपने हाथों को उसके बूब्स से अपने बटन पर ले आया और उससे खोलने लगा तू उसके हाथ रुचिका के बूब्स को स्पर्श कर रहे थे और जैसे hi वो बटन खोलने लगता तू रुचिका को काफी गुदगुदी होती और उसके हिलने डुलने से मोहनलाल बटन नहीं खोल पता. उसने रुचिका को बड़े प्यार से देखा और आँखों के इशारे से कहने लगा 'आराम से' मोहनलाल ने उससे पकड़कर उसके होठों का एक चुम्बन लिया और फिर से अपनी कमीज के बटन को खोलने लगा और बटन खोलने में सफल भी हो गया लेकिन मंगलसूत्र अभी भी फंसा हुआ था क्योँकि वो मोहनलाल की कमीज में अंदर जाकर दूसरे बटन में फंसा हुआ था.

मोहनलाल ने अपने हाथ को उस बटन को खोलने के लिए नीचे किया तू उसकी उँगलियों ने रुचिका के बूब्स की घाटी को स्पर्श किया, जिससे रुचिका को झटका लगा और वो पीछे होने लगी तू मोहनलाल ने उससे पकड़कर इशारा किया की मंगलसूत्र टूट जायेगा तू वो पीछे होने से रुक गयी.

मोहनलाल ने अपने होठों की मदद से दूसरा बटन भी खोल दिया, लेकिन बटन खोलने से पहले मोहनलाल ने अपनी उँगलियों से उसके बूब्स के बीच की घाटी को खूब कुरेदा और दबाया जिससे रुचिका के मुंह से 'आह' 'आउच' जैसी आवाज़े नीलकलती रही और जब बटन खुल गया तू मंगलसूत्र वंहा से हैट गया. मोहनलाल ने अब अपनी शर्ट के बाकि सरे बटन खोलकर शर्ट को अपने शरीर से अलग कर दिया. उसने आज बनियान नहीं पहनी हुई थी, इस वजह से उसका ऊपरी शरीर बिलकुल नंगा हो गया.

रुचिका ने जैसे hi मोहनलाल के शरीर के ऊपरी भाग को नग्न देखा तू उससे शर्म भी आने लगी और विस्मय भी होने लगा. मोहनलाल की सख्त बॉडी देखकर उससे गुमान भी होने लगा लेकिन नारी लज्जा ने उसके हाथों को बांध रखा था और वो अपने मन की कर नहीं पा रही थी. उसका मन कर रहा था की वो मोहनलाल के शरीर को छुए और उससे महसूस करे, लेकिन मन में उस बात को रहने दिया और कर नहीं कर पायी.

मोहनलाल ने रुचिका की ठोढ़ी पर उंगली रखकर उसके चेहरे को सीधा काया तोह रुचिका ने मोहनलाल के सीने पर हाथ रख कर उसकी आँखों में देखने लगी. रुचिका का मन कर रहा था की वो उसके सीने पर रखे हाथ को घुमाये और उसके सीने को सेलहाए, लेकिन उसके मन की बात मन में hi रह गयी. रुचिका अभी कुछ और सोचती उससे पहले मोहनलाल ने रुचिका को पकड़ कर अपनी बाँहों में भर लिया और अपने हाथ को जो ठोढ़ी पैर रखा हुआ था उसको सहलाता हुआ उसके कंधे पैर आ गया और धीरे धीरे उसके कंधे को सहलाने लगा. कंधे के नग्न भाग पर जब भी उँगलियों का स्पर्श होता और उनके आगे पीछे चलने से रुचिका के मुंह से सिसकने की आवाज़े आने लगती. मोहनलाल ने अपने चेहरे को रुचिका के चेहरे के पास लेकर उसके गलों को चूमने लगा और एक हाथ उसकी पीठ पर और दूसरा उसके कंधे पर. इस तरह तीन तरफ से रुचिका पर प्रहार हो रहा था. मोहनलाल उसके गलों को चूमते हुए उसकी गर्दन पर आ गया और गर्दन को चूसने लगा.

मोहनलाल ने रुचिका की पीठ पैर अपने हाथ फेरते हुए जैसे hi वह ब्लाउज की पट्टी पैर पहुंचे ब्लाउज के हुक को खोलने की कोशिश करने लगा लेकिन ब्लाउज टाइट होने की वजह से खुल नहीं प् रहा था. मोहनलाल अपने दूसरे हाथ को भी रुचिका की पीठ पैर ले गया और दोनों हाथों की मदद से उसके हुक को खोल दिया. जैसे hi हुक खोला तू रुचिका के मुंह से सिसकने की आवाज़े तेज होने लगी. मोहनलाल अब अपने हाथ को उसके कन्धों की तरफ ले जाने लगा और वहां पैर ब्लाउज को बांधने के लिए जो डोरी थी उसे भी खोल दिया. जैसे hi रुचिका को इस बात का आभास हुआ वो मोहनलाल से और जयादा जोर से चिपक गयी ताकि जब तक हो सके वो अपनी नगन्ता को छुपा सके.

रुचिका जैसे hi मोहनलाल के सीने से चिपकी तू मोहनलाल उससे अपने से दूर करके उससे देखना छह रहा था लेकिन वो अलग होने को रही नहीं थी. मोहनलाल ने अपने होठों को उसकी गर्दन पर लेकर उससे चूमते हुए उसके कन्धों के नग्न भाग को चूमने और चाटने लगा और ब्लाउज के पीछे से खुल जाने से और उनके शरीरों की राहगढ की वजह से उसकी ब्रा का स्ट्राप भी आगे सेनज़र आने लगा तू मोहनलाल ने अपनी जीभ निकल कर उस स्ट्राप के साथ साथ चलते हुए नीचे की तरफ बूब्स के उभरे हुए हिस्से की तरफ बढ़ने लगा और उससे छत्ता रहा तू रुचिका के मुंह से बहुत तेज सिसकने की आवाज़े आने लगी. वो अपने हाथों को मोहनलाल के सर पर ले जाकर उससे अपनी तरफ दबाने लगती और कभी सर को अपने से दूर करने लगती.

रुचिका से जब बर्दास्त नहीं तू हुआ वह उठाकर कड़ी हो गई और बीएड के दूसरी तरफ से निचे उतर गई और यह होश भी नहीं रहा की इस आपाधापी में उसकी साडी उसके शरीर से अलग हो गई है. वो लम्बी लम्बी गहरी साँसें लेने लगी और उसको जैसे hi होश आया की उसकी सदी उतार चुकी है तू वो वंहा से हटकर सोफे की तरफ चली गयी और मोहनलाल की तरफ पीठ करके कड़ी हो गयी.

मोहनलाल उठकर आया और उसके पीछे खड़ा हो गया और उसने पीछे से अपने हाथ आगे ले जाकर उसके पेट पर रख दिए तू रुचिका की हालत ख़राब होने लगी. मोहनलाल ने अपने हाथों को उसके पेट पर चलते हुए उसके कान के पास मुंह ले जाकर पूछा 'क्या हुआ मेरी जान को' रुचिका कुछ नहीं बोली तू मोहनलाल अपने हाथों को उसके पेट से उसकी कमर के दोनों साइड से ऊपर लेट हुए अपने हाथों को उसकी कन्धों में ले आया और अपने हाथ से उसके कंधे पर laṭakate हुए ब्लाउज को अपने हाथों से उसकी बाजुओं से निकलने लगा तू वो अपनी बाजुओं को अपने शरीर से कस्ते हुए प्रतिरोध करने लगी, लेकिन उसकी एक न चली और ब्लाउज उसके शरीर से अलग हो गया. वो शर्म से घडी जा रही थी और अपने बाजुओं को अपने बूब्स पैर लेकर अपनी नग्नता को छुपाने का प्रयास करने लगी.

मोहनलाल उसकी पीठ पैर हाथ चलते हुए उसकी ब्रा के हुक पैर पहुँच कर उससे एकदम से खोल दिया जिससे रुचिका के मुंह से एक सिसकारी निकली और उस सरकारी ने मोहनलाल के अंदर जोश भर दिया. मोहनलाल ने अब देर न करते हुए उसकी ब्रा स्ट्राप को उसके कन्धों से ा अलग करना चाहा लेकिन रुचिका ने ब्रा को अपने बूब्स पैर बहुत जोर से पकड़ कर रखा हुआ था. मोहनलाल अपने हाथों को ुस्कीकी बाजु के निचे से उसके बूब्स पैर ले आया और उसकी बाजुओं को उसके बूब्स से दूर करने लगा, रुचिका ने कोशिश तो बहुत की लेकिन असफल हो गयी. अब रुचिका का ऊपरी भाग भी मोहन लाल की तरह नग्न हो गया और वो शर्म से गाड़ी जा रही थी.

मोहनलाल अभी तक रुचिका के पीछे था और उसने अपने हाथों को पीछे से hi उसके बूब्स को पकड़ लिया और धीरे धीरे सहलाने लगा और अपने चेहरे को रुचिका के कंधे पर रखकर उसके गलों को चूमने लगा तू उससे रुचिका के मुंह से सिसकी सुनाई दी तू उसने जोश में आकर उसके गलों पर ऊपर नपीछे चूमते हुए चाटने लगा तू उससे कुछ नमी महसूस हुई, पहले तू उसने नजरअंदाज किया लेकिन फिर उससे लगा की ये नमी लगातार आ hi नहीं रही बल्कि बढ़ रही है, तू उसने अपने दांये हाथ को उसके बूब्स से हटाकर उसके चेहरे पर लाया तू उससे पता लगा की यह तो रुचिका के आंसू है तू मोहनलाल को झटका लगा और उसने रुचिका को घूमते हुए पूछने लगा 'क्या हुआ है मेरी जान को'

रुचिका जैसे hi पलटी तू वो मोहनलाल के गले लग कर अपनी नगन्ता को छुपाने का अनथक प्रयास कर रही थी, लेकिन इस प्रयास में उन दोनों के नग्न शरीरों ने पहली बार एक दूसरे को स्पर्श किया. सिर्फ स्पर्श hi नहीं किया बल्कि एक दूसरे से गुथे हुए थे तू रुचिका का तू पता नहीं लेकिन मोहनलाल की उत्तेजना इतनी जयादा बढ़ गयी की उसका लिंग अब फुदकने लगा था, जिसका एहसास शायद रुचिका को भी हो रहा था, लेकिन अभी मोहनलाल की चिंता रुचिका की आँखों के आंसू थे.

मोहनलाल उसके आंसू पोंछते हुए 'जान क्या हुआ है बताओ न' रुचिका का ये सुन्ना था की उसकी रुलाई फुट गयी और उसकी आँखों से आसुओं की धरा बहने लगी तू मोहनलाल काफी परेशान हो गया. वो उसको ढांढस बढ़ता रहा और थोड़ी देर बाद जब उसका मन हल्का हुआ तू रुलाई हिचकियों में बदल गयी. मोहनलाल उससे लेकर बीएड के पास आ गया और उससे अपने से अलग करना छह लेकिन उसने मोहनलाल को ऐसे जकड़ा हुआ था की जैसे कभी छोड़ेगी hi नहीं.

मोहनलाल ने बड़े प्यार से पूछा 'क्या हुआ रुचिका'

रुचिका ने हिचकियों के बीच मोहनलाल के कान में कहना शुरू किया 'पापा, ी ऍम सॉरी'

मोहनलाल 'पापा!'

रुचिका 'पापा तू आप मेरे हमेशा hi रहोगे'

मोहनलाल 'लेकिन अब तुम मेरी पत्नी हो'

रुचिका ने फिर एक हिचकी ली और कहने लगी 'पापा, मैंने आपसे शादी भी इसलिए की क्योँकि ी लव यू एंड यू अरे माय लाइफ, अगर आप मेरे पापा नहीं होते तू शायद मैं आपसे शादी नहीं करती'

मोहनलाल 'मैं भी अपनी बेटी से बहुत प्यार करता हु और मैंने भी तुमसे बेटी होने के कारन hi शादी की है, तुम तू मेरे दिल की धड़कन हो'

रुचिका, 'पापा, मुझे आप से कुछ कहना है'

मोहनलाल 'पापा से या पति से'

रुचिका 'पति से जो मेरे पापा हैं'

मोहनलाल उसके चेहरे को पकड़ कर ऊपर उठाकर उसकी आँखों में झांकते हुए 'मेरी जान को मुझसे पूछने की जरुरत नहीं है'

रुचिका उसकी नज़रों का सामना नहीं कर पायी और अपनी पलके झुका ली और कहने लगी 'मैं आज पत्नी धरम नहीं निभा पाऊँगी' और ये कह कर रट हुए अपने चेहरे को मोहनलाल की छाती में छुपा लिया.

मोहनलाल ने भी उससे अपने से लिप्त लिया और उसकी पीठ को सहलाते हुए 'रुचिका पहली बात तू मैंने तुम्हे पहले भी कहा था की पत्नी धरम की मज़बूरी की वजह से अगर तुम करोगी तू वो ठीक नहीं होगा. हाँ दोनों की ख़ुशी हो तभी ये सब करना चाहिए'

रुचिका सुबकने लगी और अपने आसुओं को मोहनलाल की चाहती पर गिरते हुए 'मैं मन से चाहती हूँ की ये सब हो, लेकिन....' और वो चुप हो गयी.

मोहनलाल ने उससे काफी देर तक चुप देखकर पूछा ' लेकिन क्या'

रुचिका हकलाते हुए 'वो आज जब हम डिनर कर रहे थे तू मेरे पेट में दर्द हुआ था तू जब वाशरूम गयी तू पता चला की मुझे men...s..e..es (महीना) शुरू हो गए हैं'

मोहनलाल ने उससे अपने साथ और लिपटा लिया 'ये तू नार्मल है तू इस में इतना परेशान क्योँ होना'

रुचिका 'मैं आज सुहागरात पर अपना धरम निभाने में असमर्थ हो गयी' और वो फिर से सुबकने लगी.

मोहनलाल ने उसके चेहरे को ऊपर उठाया लेकिन उसने अपनी पलकों को नीचे hi रखा तू मोहनलाल ने कहा 'रुचिका आँखें खोलो और मेरी तरफ देखो' तू रुचिका ने न में सर हिलाया. मोहनलाल ने उससे कहा 'अगर मुझसे प्यार करती है तू मेरी तरफ देखो'

रुचिका ने फैट से आँखें खोल दी तू मोहनलाल ने उससे कहा 'पहले तू अपने आप को कसूरवार समझाना बंद करो की तुम पत्नी धरम नहीं निभा पा रही हो. तुम मुझसे इतना प्यार करती हो, इसलिए यह बात अब बता रही हो ताकि मैं अपनी बेटी जो अब मेरी बीवी है के साथ इन् पलों को एन्जॉय कर सकूँ. तुम चाहती तू ये सब शुरू होने से पहले भी बता सकती थी, लेकिन नहीं तुमने सोचा की अपने पति को कुछ सुख तू दे पौन, चाहे पूरा न सही और अपने आप अकेले यह सोच सोच कर कष्ट सेहती रही'

रुचिका 'ो मेरी एक सहेली को ऐसे hi सुहागरात वाले दिन मेंसेस जो गया तह और उसने यह बात अपने पति को क्या बताई की उसकी जिंदगी hi ख़राब हो गयी. उसके पति ने उससे भला बुरा कहा और उसकी सास ने उसकी पिटाई करके घर से निकल दिया और जब अपने पिट के घर गयी तू उन्होंने भी अपनाने से इंकार कर दिया. मैं इस बात को सोच सोचकर बहुत दरी हुई थी और मैंने अपने आप को मानसिक तौर पर तैयार भी कर लिया था, परन्तु मुझे दर है की कहीं आपको कोई बीमारी न लग जाये, इसलिए आप को बता रही हूँ. अब मेरी जिंदगी आप के हाथ है, आप को करोगे मुझे मंजूर होगा' इतना कहकर वो सुबकने लगी.

मोहनलाल को उस पर गुस्सा भी आ रहा था और प्यार भी. उसने कहना शुरू किया 'रुचिका तुम मेरी बेटी पहले हो और तुम्हे पता है की मैं तुम्हारी आँखों में आंसू बर्दाश्त नहीं कर सकता और अब तुम मेरे दिल की धड़कन हो, मेरी जान हो, तुम ने यह कैसे सोच लिया की मैं तुम्हें अपने से अलग कर दूंगा. यह तो मैं सपने में भी नहीं सोच सकता और दूसरी बात पति पत्नी का रिश्ता विश्वास का होता है न की शारीरिक नजदीकी की वजह से' और उसके

रुचिका 'ी लव यू, मुझे कष्ट इस बात से है की मैं आपको आपका हक़ नहीं दे पा रही हूँ'

मोहनलाल 'देखो हक़ तू तुमने मुझे दे hi दिया है तभी तू तुम इस अवस्था में मेरी बांहों में हो'

रुचिका 'लेकिन.....'

मोहनलाल 'अभी भी लेकिन, नहीं रुचिका नहीं बिलकुल भी मत सोचो की तुमने मेरा हक़ नहीं दिया है. पहली बात तू मैं हक़ को नहीं मंटा, मेरी सोच में यह दोनों की सहमति से होता है और दूसरा सुहागरात पर सहवास करना hi सुहागरात का उद्देश्य नहीं होता. सुहागरात का मतलब होता है की नै जिंदगी को शुरू करने के लिए एक दूसरे को अच्छी तरह से जनन्ना ताकि आने वाली जिंदगी खुशाल हो. जनन्ने का मतलब ये बिलकुल नहीं है की 'सहवास'. सहवास करने से दोनों एक दूसरे के शारीरिक तौर पर करीब आते हैं और दो जिस्म एक जान हो जाते हैं. यंहा तू तुम पहले से hi मेरी जान हो और अगर तुम समझती हो की सहवास करने से दिल मिल जाते हैं तू बहुत गलत सोच है. अगर हम दोनों जीवन भर भी सहवास नहीं करें तू भी तुम और मैं अब एक हैं क्योंकि तुम मेरे दिल की धड़कन हो जिससे कोई अलग नहीं कर सकता'

रुचिका ने मोहनलाल के चेहरे को चुम्बनों से भर दिया और जब थक गयी तू कहने लगी 'मैं धन्य हो गयी जो आप मेरे पति बने, आपकी सोच ने मुझे गदगद कर दिया और आपकी ख़ुशी के लिए कुछ भी कर गुजरूंगी'

मोहनलाल उसकी पीठ से हाथ उसके नितम्बों पर ले जाते हुए 'अब मुझे समझ आ गयी है की क्योँ मेरे हाथ लगते hi मुझसे अलग हो जाती थी. जान एक बात समझ लो तुम्हारी ख़ुशी hi मेरी ख़ुशी है और जब तुम मानसिक और शारीरिक तौर पर तैयार हो जाओगी हम सहवास तभी करेंगे अन्यथा कोई बात नहीं, प्यार तू करते hi रहेगे'

रुचिका नज़र झुका कर 'सिर्फ पांच दिन उसके बाद मैं आपकी सेवा में हाज़िर हूँ'

मोहनलाल गुस्सा होते हुए उसके नितम्बों पर चपत लगा देता है और कहता है 'ये सेवा में हाज़िर होउंगी', ये क्या होता है? हम दोनों बराबर हैं और तुम्हे सिर्फ और सिर्फ अपने पति के साथ प्यार करना है और कुछ नहीं. इतना कहकर मोहनलाल ने उसके नितम्बों को पकड़ कर ऊपर हवा में उठा लिया तू उसके बूब्स मोहनलाल के चेहरे पर आ गए और वो उन्हें चूमते हुए रुचिका को बीएड पर ले आया और लिटा कर उसकी बगल में लेत गया और रुचिका को अपनी बांहों में भरकर कहने लगा 'चलो अब सो जाओ अपने पापा की बांहों में.

रुचिका भी उसको गले लगा कर 'Pa....Paa' कहा और अपने होठों को मोहनलाल के होठों पर रख दिया. दोनों एक दूसरे के होठों को चूसते हुए एक दूसरे के शरीरों को चढ़ते हुए महसूस करते रहे और फिर कब दोनों एक दूसरे की बांहों में सो गए पता hi नहीं चला.

सुबह मोहन लाल की नींद पहले खुली तो उसने देखा की रुचिका का सर उसके कंधे पैर और एक हाथ मोहन लाल की छाती पैर था. रुचिका को उस रूप मैं सोता हुआ देखकर मोहनलाल को उस पर बहुत प्यार आने लगा और उसने रुचिका के उस हाथ को जो उसकी छथि पर था उससे हटाकर सीधा किया और वो रुचिका के इस नग्न रूप को देखकर सोचने लगा की ये बहुत सुन्दर है और अपनी किस्मत पर रश्क खाने लगा की ये फूल अब उसकी झोली में है. उससे देखकर उत्तेजित होने लगा और उसने अपने होठों को रुचिका के होठों पर रखकर उससे प्यार से 'गुड मॉर्निंग' बोलै तू रुचिका कुनमुना कर उठ गयी और अपने ऊपर झुके हुए मोहनलाल को देखकर 'गुड मॉर्निंग' कहा और जैसे hi उससे अपनी सिथिति का भान हुआ तू वो शर्मा गयी और वंहा पर पड़ी हुई चादर से खुद को ढकने लगी तू मोहनलाल ने उससे रोक दिया और कहा 'ये तू बहुत नाइंसाफी है की तुम मुझे मेरी बीवी की खूबसूरती को भी देखने नहीं दे रही हो' तू वो उठकर मोहनलाल के गले लग गयी और उसके कान में कहने लगी 'पापा अब मैं आपकी हूँ, बस थोड़ा सा वक़्त दे दो, फिर आप को खूबसूरती सिर्फ देखनी hi नहीं भोगनी भी है'

मोहनलाल 'ठीक है मेरी बेटी, मेरी बीवी, मेरी सबकुछ, मेरी जान, जैसा तुम चाहो तू चलो फिर तैयार हो जाओ' तू रुचिका ने कहा 'पहले आप जाइये, मुझे ऐसे शर्म आती है'

मोहनलाल 'अभी भी शर्म आती है'

रुचिका 'पापा प्लीज क्योँ सत्ता रहे हो'

मोहनलाल उठाने लगा लेकिन उसका लिंग अपने पुरे आकर में तना हुआ था जो मोहनलाल को तंग कर रहा था और जैसे hi वो उठा तू उस दर्द का अनुभव हुआ जिससे रुचिका ने कनखियोँ से देख लिया था. मोहनलाल उठकर बाथरूम चला गया और इधर रुचिका ने जल्दी से एक कुरता निकल कर पहन लिया और मोहनलाल के आने के बाद वो भी बाथरूम में चली गयी और काफी देर लगाने के बाद तैयार होकर वापिस आ गयी तू उसने एक बहुत टाइट फिटिंग का सूट पहना हुआ था. मोहनलाल उससे देखकर होश खोने लगा तू रुचिका ने कहा 'अब आप भी जल्दी से तैयार हो जाइये'

मोहनलाल तैयार होकर आया तू सूरज का फ़ोन आया और वो नाश्ते के लिए कह रहा था. मोहनलाल और रुचिका नाश्ते के लिए हॉल में आ गए और वंहा पर तीनो जोड़ियां आ गयी थी. नाश्ता करते हुए दिया और अवनि के साथ रुचिका की खूब बातें हुई और यह तय हुआ की जैसे hi कंपनी के कागज आ जायेंगे तू फिर एक बार सब मुलाकात करेंगे और कंपनी की तरफ से काम शुरू करेंगे. फिर सब मिलकर जाने की तयारी करने लगे.

मोहनलाल और रुचिका कमरे में आ गए तू मोहनलाल ने रुचिका को अपनी बांहों में भर लिया और उसके होठों पर अपने होठों को रखकर उसका चुम्बन लेने लगा तू रुचिका ने कहा 'लिपिस्टिक ख़राब हो जाएगी' तू मोहनलाल ने उससे कहा 'लिपिस्टिक की चिंता है, मेरी नहीं' और ये सुनते hi रुचिका ने भी उसके होठों को चूमने में साथ देने लगी. मोहनलाल उसकी कमर को पकड़ कर अपने से लिपटते हुए 'यू अरे माय लव' और उसके नितम्बों को दबा दिया तू वो फिर पीछे होने लगी तू मोहनलाल ने उससे पीछे नहीं होने दिया और एक हाथ तू उसका नितम्ब पर था और दूसरे हाथ को रुचिका के बूब्स को प्रेस करने लगा. रुचिका ने अपने हाथ को उसके हाथ पर रखते हुए 'चलें, नहीं तू फ्लाइट मिस हो जाएगी' मोहनलाल ने कहा 'इतनी सुन्दर बीवी बांहों में हो' तू एक क्या सौ फ्लाइट भी छूट जाएँ तू गम नहीं' तब रुचिका ने कहा 'चलते हैं नहीं तू आपके दोस्त पता नहीं क्या क्या सोचेंगे. फिर मोहनलाल ने बेमन से कहा 'ठीक है चलो' और वो दोनों फ्लाइट पकड़कर घर आ गए.
 
ी कनेव फ्रॉम थे बिगनिंग तहत विथ थिस ट्विस्ट माय रीडर्स वोउल्ड रन अवे अस ी शेट्टेरेद थेइर होप्स.

होवेवेर, रियल रीडर वोउल्ड एक्सेप्ट आईटी विथ ग्रेस. मोरेवर यू अरे ा ग्रेट राइटर योरसेल्फ, सो यू कैन अंडरस्टैंड थे डेप्थ ऑफ़ थिस पर्टिकुलर ट्विस्ट. ी एक्सपेक्टेड सुच इंटेलीजेंट रिव्यु फ्रॉम यू एंड it's तेरे, व्हिच इस थे फ्रूट ऑफ़ माय हार्ड वर्क बिहाइंड थिस मेगा अपडेट एंड वोउल्ड एक्सपेक्ट सुच क्रिटिकल रेविएवस फ्रॉम योर एन्ड, नॉट नेसेस्सरिलय अप्प्रेसिअशन राथेर क्रिटिसिज्म इस एक्वाली वेलकम.

थैंक्स सो मच
 
अपडेट 71

मोहनलाल को उसकी यादों में छोड़कर हम चलते हैं आदित्य और संध्या के पास.

अब कहानी वर्तमान में

आदित्य बीच बीच में बर्फ लगाकर अपने मुंह से फूंक भी मार रहा था, जिससे उसकी माँ को एक नशा सा चने लगा था और वो भी जान बुझ कर अब अपने शरीर के भर को आदित्य पर दाल रही थी और मुंह से सिसकारियां निकल रही थी, लेकिन आदित्य का ध्यान तू अपनी माँ की चूचियां देखने में था और नग्न हो चुकी चूचियों की सुंदरता से लगातार उत्तेजित होता जा रहा था और धीरे धीरे उसका लिंग भी तनाव में आता जा रहा था और एक वक़्त ऐसा आया की उसके लिंग ने संध्या के नितम्बों पर प्रहार किया.

आदित्य के लिंग ने जैसे hi उसकी माँ के नितम्बों पर प्रहार किया तू उससे लगा की उसकी माँ उससे बहुत नाराज़ हो गयी होगी लेकिन उसकी माँ ने आदित्य के लिंग के एहसास को महसूस करके थोड़ा आगे झुककर उठाने की कोशिश करने लगी तू उसकी बांयी चुकी फिर से उसके बांये हाथ पर डाब गयी. इस बार संध्या को दोनों चीज़ों का एहसास बहुत अच्छे तरीके से हुआ.

आदित्य अपनी माँ के उठाने से थोड़ा दर सा गया जिससे उसकी उत्तेजना में कमी आ गयी और उसका लिंग थोड़ा सा शांत हो गया. उसने अपनी माँ को पकड़ कर फिर से बैठना चाहा तू उसने कहा 'छोड़ मुझे'

आदित्य 'मैंने आपको पहले भी कहा था की आपको अकेला नहीं छोडूंगा तू कैसे छोड़ दूँ'

संध्या 'मुझे वाशरूम जाना है'

आदित्य ने उसकी कमर से अपने हाथ को हटा लिया तू वो सीढ़ी होकर जाने लगी तू उसने पूछा 'आप मैनेज कर लोगी या मैं साथ आऊं'

संध्या उसकी बात सुनकर शर्मा गयी और कहने लगी 'मैं मैनेज कर लुंगी' और वो अपने कमरे में जाने लगी तू आदित्य ने कहा भी की इस बाथरूम में चली जाये लेकिन वो उसकी बात न मानकर अपने रूम में चली गयी और आदित्य उससे जाते हुए देखता रहा. वो उसकी पतली बलखाती कमर और कैसे हुए नितम्बों को ऊपर नीचे होते हुए देखता रहा और उसकी भावनाएं फिर से भड़काने लगी.

जब काफी देर तक उसकी माँ वापिस नहीं आयी तू आदित्य उठकर माँ के कमरे में गया तू देखा की उसकी माँ बीएड पर लेती हुई है और उसकी निघ्त्य थोड़ी सी उसकी टांगों पर घुटनो की तरफ हो गयी थी, जिससे उनके गोर गोर पाँव और टांगों का कुछ हिस्सा उजागर हो चूका था. इस नज़ारे ने आदित्य की पहले से hi उफान में आयी भावनाओं में और उबाल ला दिया.

आदित्य जैसे hi अपनी माँ की तरफ गया तू देखा की उनकी निघ्त्य का दांया स्ट्राप उनकी बाजु पर आ चूका था या उसकी माँ ने खुद किया होगा ताकि कंधे पर जलन से बचा जा सके. स्ट्राप हटने से उनकी दांयी चुकी लगभग नंगी थी, जिससे देख कर आदित्य के होश उड़द गए, वो तू उनकी खूबसूरती में ऐसा खोया की पूछो मत. लेकिन उससे याद आया की वो अपनी माँ के हाथ के जल जाने के इलाज के लिए आया था तू वो अपनी माँ के बगल में बेथ गया और उनको पुकारा तू उसकी माँ ने कोई जवाब नहीं दिया. दो तीन बार पुकारने पर भी जवाब नहीं मिला

आदित्य ने अपनी माँ के उस हाथ को जंहा जला था को अपने हाथ में लेकर देखने लगा तू उससे सुकून मिला की कुछ जयादा नहीं जला था और ठन्डे पानी की वजह से वो बच गया था और उसने उस हाथ को चुम लिया और कहने लगा 'ी ऍम सॉरी माँ. अगर मैंने आपको हर्ट किया है तोह मुझे माफ़ करना. मेरा आप पर ऐसे जबरदस्ती करने का कोई इरादा नहीं था, और न hi कभी करूँगा, परन्तु मुझे आपके जले हुए हाथ की चिंता थी, इसलिए आपके न चाहते हुए भी जबरदस्ती करनी पड़ी'

संध्या तू गुस्से में आदित्य के रूम से आयी थी और सोने का बहाना कर रही थी, लेकिन असल में वो जाग रही थी और आदित्य की बातों को सुनकर वो भी मन hi मन भावुक हो रही थी, लेकिन वो उसकी बातों का मजा भी ले रही थी.

आदित्य 'माँ, आप सो गयी हो तू आप आराम करो, मैं चलता हूँ' यह कहकर वो बीएड से उठकर जाने लगा तू संध्या ने उसका हाथ अपने बांये हाथ से पकड़ लिया और कहने लगी 'मुझे इस हाल में छोड़ कर जाओगे'

आदित्य ने पलटकर अपनी माँ को देखा जो उससे बड़े प्यार से निहार रही थी. उसने अपनी माँ से कहा 'माँ, मैं तू आपका वंहा वेट कर रहा था और जब आप नहीं आयी तू मैं देखने चला आया. अगर मुझे आपको इस हाल में छोड़ना होता तू मैं आप के साथ जबरदस्ती करके आप को अपने कमरे में क्योँ ले जाता. ये तू आप hi अपने आप यंहा आ गयी और फिर वापिस नहीं आयी'

संध्या 'क्या करूँ, तुमने एक तरफ तू मुझसे वादा किया था की मैं तुम्हारी गर्लफ्रेंड हूँ और तुम मुझे सिर्फ अपनी गर्लफ्रेंड की तरह तरेत् करोगे न की माँ की तरह. लेकिन पहले hi दिन मुझे अपनी माँ बनाकर अपने वाडे को भूल गए'

आदित्य उसकी आँखों में देखते हुए 'मैंने तू आपको गर्लफ्रेंड मान लिया था लेकिन आप के अंदर की माँ जाग गयी तू आप hi बताओ की मैं क्या करूँ? मैं तू आपको हर हाल में खुश देखना चाहता हूँ वो चाहे आप मेरी गर्लफ्रेंड बनो या माँ. लेकिन आप एक बार अच्छे से डीडे कर लो की आप मेरी माँ हो या गर्लफ्रेंड हो या दोनों साथ साथ. आप जो कहेगी मैं उससे मान लूंगा, लेकिन आप से सिर्फ इतना hi कहना है की आप जो भी निर्णय ले सोच समझ कर ले'

संध्या 'मुझे कुछ नहीं सोचना, मैं तुम्हारी गर्लफ्रेंड हूँ'

आदित्य 'कैसी गर्लफ्रेंड'

संध्या 'गर्लफ्रेंड मतलब गर्लफ्रेंड'

आदित्य 'पुराने ज़माने वाली या आजकल के ज़माने वाली'

संध्या आदित्य की आँखों में झांकते हुए 'क्या मैं आजकल के ज़माने की गर्लफ्रेंड नहीं बन सकती'

आदित्य 'ये मैंने कब कहा, मैं तू सिर्फ ये कह रहा हूँ की आजकल के ज़माने की गर्लफ्रेंड बनने के लिए थोड़ा बोल्ड होना पड़ेगा, अगर आपको लगता है की आप बोल्ड हो सकते हो तू फिर कोई प्रॉब्लम नहीं है'

संध्या 'मुझे सिर्फ और सिर्फ गर्लफ्रेंड बनना है और वो भी आजकल की गर्लफ्रेंड'

आदित्य 'ठीक है, जैसी आपकी मर्जी, चलो अब आप कुछ देर सो जाओ, दिन होने वाला है और आपने इंस्टिट्यूट भी जाना है'

संध्या 'अभी अभी तू तुमने मुझे अपनी गर्लफ्रेंड कहा है (आजकल के ज़माने की). उस गर्लफ्रेंड को ऐसे hi सोने के लिए कहकर और उससे अकेला छोड़कर चले जायेगे'

आदित्य 'मैं आपकी बात समझा नहीं'

संध्या बीएड पर उठकर बैठ गयी जिससे उसकी दांयी चुकी जो पहले से hi काफी जयादा नग्न थी (चुकी का हिस्सा लेटने से फ्लैट हो जाता है या फैल जाता है उठकर बैठने से िकखाथा होकर वापिस अपनी शेप में आकर बड़ा लगने लगता है) वो अब आदित्य के सामने और जयादा उजागर हो गया था. आदित्य जो पहले से अपनी माँ की चूचियों का दीवाना थका इस नज़ारे को देखकर उत्तेजित होना स्वाभाविक था और वो बार बार उन चूचियों को निहारने लगा.

संध्या से ये बात छुपी नहीं रही और उसने आदित्य से पूछा 'अगर मेरी जगह कोई ओर लड़की तुम्हारी गर्लफ्रेंड होती तू क्या उससे भी तुम इस तरह ऐसे hi अकेला छोड़ कर चले जाते'

बेचारा आदित्य उनकी बात का क्या जवाब देता. वो मन में सोचने लगा की उसकी माँ सही तू कह रही थी की अगर उसकी माँ की जगह कोई ओर लड़की होती तू वो कभी न जाता, यंहा तू वो इसलिए जा रहा था क्योँकि उसके मन में झिझक थी की पता नहीं उसकी माँ क्या सोचे और क्या न सोचे. पता नहीं किस बात पर गुस्सा हो जाये और अगर गुस्सा हो गयी तू कुछ कह भी नहीं पाउँगा. दूसरी किसी लड़की से तू लड़ भी सकता हूँ, लेकिन अपनी माँ से तू वो भी नहीं कर सकता. उसने अपने आप से पूछा की अगर तुम्हारी माँ है तू क्या हुआ, तुम उनसे क्योँ नहीं लड़ सकते, लोग तू अपनी माँ से सबसे पहले लड़ते हैं. अभी वो कुछ और सोचता उसको एक झटका लगा.

उसकी माँ ने आदित्य का हाथ जो उनके हाथ में था उससे लेजाकर अपनी चुकी पर रख दिया तू आदित्य को झटका लगा और उससे जैसे hi इसका एहसास हुआ तू उसने अपने हाथ को हटाने के लिए प्रयास किया लेकिन संध्या ने उसके हाथ के ऊपर अपने हाथ की पकड़ को मजबूत बनाया हुआ था.

आदित्य ने अपनी माँ की तरफ देखते हुए 'माँ, ये क्या कर रही हैं आप'

संध्या ने अपनी नज़रों को नीचे किया और कहने लगी 'मैं अपनी भूल सुधर रही हूँ. मुझे समझ आ गयी है की सिनेमा हॉल से निकलते हुए तुम्हारी कोई गलती नहीं थी, तुमने तू उल्टा मुझे बचने के लिए पकड़ा और अनजाने में तुम्हारा हाथ यंहा लग गया और मैं गुस्सा हो गयी क्योँकि मैं तुम्हारी माँ भी हूँ, लेकिन मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था क्योँकि मैं तुम्हारी गर्लफ्रेंड हूँ और बॉयफ्रेंड का गर्लफ्रेंड को इस तरह हाथ लगाना नार्मल है'

आदित्य 'माँ मैंने आपको जानभूझकर नहीं छुआ था, लेकिन आप तू जानभूझकर कर रही हो'

संध्या 'मुझे मालूम है और अगर तुम मुझे गर्लफ्रेंड मानते हो तू काम से काम एक बार अच्छे से छू ले'

संध्या को ये कहते और करते हुए बहुत शर्म आयी और उनका चेहरा शर्म से लाल हो चूका था.

आदित्य ने फिर से अपना हाथ हटाने की कोशिश करते हुए कहा 'मैं आप से कह चूका हूँ की आप मेरी गर्लफ्रेंड हैं और आपने कोई गलती नहीं की है और इन्हे चुने की कोई जरुरत नहीं है'

संध्या 'मेरी ख़ुशी और तस्सली के लिए एक बार छू दे ताकि मुझे भी लगे की मैं आजकल की गर्लफ्रेंड बनने लायक हूँ'

आदित्य दुविधा में आ गया और जब वो अपने हाथ हटाने के लिए कोशिश कर रहा था तू उसकी उँगलियों ने अपनी माँ की नरम चूचियों को छुआ था तू उससे करंट लग रहा था और अंदर से तू उसका मन कर रहा था की काम से काम एक बार तू अच्छे से दबा दे लेकिन दर रहा था. अब जब उसकी माँ ने ये सब कहा तू उसका मन कह रहा था की अपनी माँ की बात मान लेनी चाहिए, फिर भी प्रत्यक्ष में उसने कहा 'माँ, आपको बुरा लग जायेगा'

संध्या ने मन में सोचा की उससे hi पहल करनी पड़ेगी. यह सोचते hi उसने आदित्य के हाथ पर रखे हुए हाथ पर दबाव डालकर खुद hi अपनी चुकी को दबाने लगी. आदित्य का हाथ उसकी माँ की चुकी पर था और जैसे hi उसके हाथ ने अपनी माँ की चुकी को दबाया तू उससे ऐसा लगा की उसने किसी नरम नरम रुई के गोले को दबाया हो. वो तू किसी और hi दुनिया में पंहुच गया और उसने एक बार खुद hi दबा कर देखा तू उसके आनंद का ठिकाना न रहा. उसका मन फिर से दबाने का कर रहा था लेकिन मन में अभी भी दर था की उसकी माँ बुरा न मान जाये, इसलिए उसने दुबारा दबाया तू नहीं, लेकिन अपने हाथ को वंहा से हटाया भी नहीं.

जैसे hi आदित्य ने उसकी चुकी को दबाया तू संध्या की धड़कने तेज हो गे थी और उसने अपने हाथ को आदित्य के हाथ से हटा लिया था. आदित्य बहुत hi हलके से एक बार और दबाकर उस आनंद को फिर से पाना चाहा, लेकिन शर्म की वजह से बहुत हल्का दबाया. जैसे hi आदित्य ने ये किया तू संध्या की आँखों का रंग बदल गया था. Honṭh कुछ नशीले से हो गए थे. वह बड़े ही नशीले अदांज से आदित्य की आँखों में झाकने लगी. संध्या के शरीर के स्पर्श से आदित्य भी बहक गया. उसने एक पल के लिए संध्या की नशीली आँखों में देखा और उन आँखों में देखते हुए वो उस प्यार की गहराई को बर्दाश्त नहीं कर पाया और अपनी माँ की चुकी से अपने हाथ को उसकी बाजु के नीचे से निकलकर उससे अपनी बांहों में भर लिया और उसके मुंह से अनायास hi ये निकलने लगा

'chaḍhega जब मेरी चाहत का रंग‚ मेरी बाहों में आकर बिखरोगे आप,

यूं तू खूबसूरत हो आप बहुत‚ मिलकर मुझसे और भी निखरोगे आप
'
 
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