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- Dec 5, 2013
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रस्ते में संध्या ने आदित्य से पूछा की पानी पूरी कैसी थी तू आदित्य जो अपनी सोचो में खोया हुआ था बोलै "माँ आपकी उँगलियाँ बहुत मीठी हैं" संध्या एक बार तू शर्मा गयी लेकिन फिर उसने कहा "मैंने पानी पूरी के बारे में पूछा था" तब आदित्य ने कहा "माँ मुझे तू पानी पूरी का पता hi नहीं चला, मैं तू आपकी उँगलियों की मिठास में खोया हुआ था" उसकी बात सुनकर संध्या एक डैम से शर्मा गयी और उसकी पीठ पर मुक्का मरते हुए "घाट" कहकर चुप होकर बैठ गयी और बिच बिच में ब्रेक लगने पर वो आगे को खिसक जाती थी जिससे उसकी चूचियां आदित्य की पीठ पर डाब कर उसका हाल बुरा कर रही थी. एक बार तो माँ ने झटका लगने पर अपने गाल को भी उसकी गर्दन पर दबा दिया था, जिससे दोनों के साँसों की गति बढ़ गयी थी. फिर वो दोनों घर पहुंच गए. घर में ए तो संध्या आदित्य को अजीब नजर से देख रही थी और मुस्कुरा भी रही थी.
घर पहुँच कर उन दोनों के मन में अजीब सी फीलिंग थी और वो दोनों hi एक दूसरे से नजरे चुराते हुए अपने अपने कमरे में चले गए.
इनको अपने कमरे में जाने देते हैं और हम चलते हैं मोहनलाल और रुचिका का हाल पता करने.
एयरपोर्ट पर पंहुच कर उनोहोने बोर्डिंग पास लिया और सिक्योरिटी चेक के बाद अंदर आ गए तू पता चला की फ्लाइट दो घंटे के लिए डिले कर दी गयी है. रुचिका ने पिज़्ज़ा खाने के लिए ज़िद की तू मोहनलाल मन करने लगा लेकिन वो मान नहीं रही थी तू मोहनलाल ने बहाना किया और कहा "अच्छा तुम बैठो मैं टॉयलेट होकर आता हु"
मोहनलाल वंहा से अलग हुआ और किसी से फ़ोन पर बात करता रहा, उसने रुचिका के हाल चल के बारे में बताया और कुछ पूछा तू उसका जवाब सुनकर मोहनलाल के चेहरे पर मुस्कान आ गयी और फिर वंहा से वो रुचिका के पास आकर बैठ गया.
रुचिका ने फिर से ज़िद की तू उसने कहा "जयादा मत खाना". उसने खुश होकर मोहनलाल के गले लगकर "थैंक्स बोलै" और फिर दोनों वंहा पिज़्ज़ा हूत पर चले गए और रुचिका की पसंद का पिज़्ज़ा आर्डर कर दिया और साथ में दो कॉफ़ी भी बोली.
आर्डर आने से पहले मोहनलाल ने रुचिका को दवाई खाने के लिए कहा तू उसने कहा की बाद में ले लेगी तू मोहनलाल ने उसके सर पर हाथ फेरते हुए बड़े प्यार से कहा "अगर पिज़्ज़ा खाना है तू पहले दवाई खाओ, नहीं तू पिज़्ज़ा कैंसिल"
रुचिका ने थोड़ा सा ृथत्ते हुए कहा "जब देखो आप मुझे ब्लैकमेल करते रहते हो, अच्छी बात नहीं है" तू उसके जवाब में मोहनलाल ने उसके माथे को चूमते हुए कहा "ये तू मेरा प्यार है" उसकी बात सुनकर रुचिका मोहनलाल को बहुत प्यार से देखने लगी और कुछ कहती उससे पहले उनका आर्डर भी आ गया. मोहनलाल अपने हाथों से बड़े प्यार से रुचिका को खिलता है तू रुचिका बहुत खुश होती है और फिर उसके बाद रुचिका और मोहनलाल वंहा से आकर वेटिंग लाउन्ज में आ जाते हैं, जंहा उसे मोहनलाल आराम करने के लिए कहता है तू रुचिका मोहनलाल के कंधे पर सर रख कर आँखे बंद कर लेती है और थोड़ी देर में सो जाती है और मोहनलाल अतीत की यादों में खो जाता है.
ऐसे hi वक़्त बीतता रहा और मोहनलाल के मन में रुचिका की तरफ लगाव दिनों दिन बढ़ता hi जा रहा था लेकिन वो अपने आप से डरने लगा था की कनिह कुछ गलत न हो जाये, इसलिए वो कोशिश करता था की घर पर काम से काम जाये ताकि रुचिका से दूर रहे. दूर रहता था और मन hi मन में कहता था
दूर रह कर करीब रहने की आदत है
याद बनकर आँखों से बहने की आदत है
करीब न होते हुए भी करीब पाओगे
मुझे एहसास बनकर रहने की आदत है
उसकी ये बात वाक़ई में सच होती परतीत हो रही थी क्योंकि अब रुचिका के मन के किसी कोने में भी उससे अपने पापा से मिलाने की चाहत बढ़ रही थी. उससे नहीं पता लग रहा था की ये एहसास क्या है, लेकिन उसकी सहेली के द्वारा उससे बार बार छेड़ने और बीती यादों की वजह से उसका मन करता था की अपने पापा के साथ वक़्त बिताये और वो चाहने लगी थी की उनके साथ घूमे फायर और मस्तियाँ करे. जैसे hi वो पापा को याद करती तू उसके मन में एक मीठी चुभन होने लगती, ये क्योँ था उसकी समझ से परे था हो सकता है की उसके मन में उसकी सहेली के शब्द गूंजते थे "पर्सनल एंड साइकोलॉजिकल अदमीरेर". उससे कभी कभी लगने लगा था की उसके पापा के ऊपर ये डेफिनिशन बिलकुल फिट बैठते है.
वक़्त पंख लगा कर ुध रहा था और रुचिका अब फाइनल ईयर में थी तू एक दिन मोहनलाल को टूर पर फ्री कपल के लिए 3 दिन का पैकेज मिला था तू उसने संध्या को साथ चलने के लिए कहा तू वह मन करने लगी. मोहनलाल ने उसे कहा की बच्चों का ध्यान रखने के लिए उसने एक रिश्तेदार को कह दिया है इसलिए चिंता की कोई बात नहीं है. उसने कहा "बात बच्चों की नहीं है और वैसे भी बच्चे अब बड़े हो गए हैं वह अपना ध्यान खुद कर सकते हैं लेकिन मैं नहीं जाना चाहती क्यूंकि की वहां पैर दूसरे लोग पातर पातर इंग्लिश बोलते हैं और मुझे कुछ समझ नहीं आता जिस वजह से मैं बेवकूफ बन जाती हूँ. बेवकूफ बनने से अच्छा है की मैं जॉन hi नहीं."
मोहनलाल ने उसको बहुत समझाया लेकिन वह तस से मास नहीं हुई. आखिर में हथियार डालते हुए मोहनलाल ने उससे कहा "ठीक है जैसे तुम्हारी मर्जी, चला जाऊंगा अकेले"
उसने कहा "ऐसा करो अपने साथ रूचि को ले जाओ तुम अकेले भी नहीं होंगे और उसको भी घूमने को मिल जाएगा और वैसे भी वो अच्छी खासी इंग्लिश बोल लेती है, इसलिए परेशानी की कोई बात नहीं है"
मोहनलाल ने कहा "तुम समझती क्योँ नहीं हो, मैं उसे नहीं ले जा सकता"
संध्या: क्योँ नहीं ले जा सकते
मोहनलाल: एक तू वो बोआर हो जाएगी
संध्या: क्योँ बोआर होगी, जंहा आप जाओगे वो आपके साथ जाएगी और कुछ सीख भी लेगी
मोहनलाल: उसे कैसे ले जा सकता हु
संध्या: जैसे मुझे ले जा सकता हो
मोहनलाल: ये मुमकिन नहीं है
संध्या: आप असल में अकेले जाना कहते हो और मुझे भी ऐसे hi बोल रहे हो की चलो, वार्ना मन से नहीं चाहते, इसलिए ये सब कह रहे हो
मोहनलाल: तुम समझती क्योँ नहीं हो, अगर उससे ले जाता हु तू उसका खर्चा भी अलग से करना पड़ेगा
संध्या: क्योँ करना पड़ेगा, अभी तू कह रहे थे की कपल के लिए सब फ्री है
मोहनलाल: हाँ 'कपल' के लिए फ्री है
संध्या: मतलब दो के लिए, उन्हें क्या फर्क पड़ता है, वो तू कोई भी दो हो सकते हैं
मोहनलाल: यंहा कपल का मतलब अलग है
संध्या: हाँ मैं सब समझती हु, आप मेरी नासमझी का फायदा उठाकर मुझे बेहला फुसला कर उसे न ले जाने का बहना ढूंढ रहे हैं.
मोहनलाल: अगर तुम्हे मेरी बात का विश्वास नहीं है तू अपनी लाड़ली, पढ़ी लिखी बेटी से पूछ लो की 'कपल' का क्या मतलब होता है
संध्या ने रूचि को आवाज़ देकर बुलाया और उससे कपल का मतलब पूछा तू उसने बताया 'तवो पीपल और थिंग्स ऑफ़ थे शामे सॉर्ट कन्सिडरेड टुगेदर'
संध्या: अरे हिंदी में बता
रुचिका: दो लोग या वस्तुअन जो एक जैसे हो और साथ हो
संध्या: कपल का मतलब दो hi है न तू फिर परेशानी क्या है
मोहनलाल: (परेशान होते हुए) तुम लोगों को समझाना मेरे बस की बात नहीं है, ठीक है तुम जैसा कहोगी मैं करूँगा.
संध्या: रूचि बीटा तुम पापा के साथ घूमने जाना चाहोगी
रुचिका: (मन hi मन में खुश होते हुए, उसके तू मन की मुराद पूरी हो रही थी) हाँ क्योँ नहीं, नेकी और पूछ पूछ
संध्या: फिर तयारी करो, तुम्हे कल hi जाना है पापा के साथ और देखना कुछ अच्छे वाले कपडे रख लेना.
रुचिका: पापा मुझे नए कपडे दिलवा देंगे, क्योँ पापा
मोहनलाल: (परेशानी से) हाँ जो आप दोनों कहोगे मैं करूँगा और चारा क्या है मेरे पास
रुचिका: (उदास होते हुए) पापा, अगर आप को मुझे ले जाने में कोई परेशानी है तो मैं नहीं जाना चाहती. मुझे लगता है की आप मुझे लेजाकर दुखी लग रहे हो. अगर ऐसा है तू आप मुझे ख़ुशी से नहीं ले जाना चाहते तू मैं नहीं जाउंगी, आप परेशान न हो.
मोहनलाल: (रुचिका की उदासी देखकर पिघल गया और अपने चेरे पर मुस्कुरहट लेट हुए) नहीं बेटे ऐसी बात नहीं है, जाओ तुम तयारी कर लो
अगले दिन वे दोनों सुबह सुबह hi कैब करके वंहा से निकलकर स्टेशन पर आये और प्लेटफॉर्म पर ट्रैन की वेट करने लगे. उनकी first-class में टिकट बुक थी और ट्रैन आने पर वे ट्रैन में चढ़े तू देखा की उन्हें एक कूप दिया गया था.
कूप वो होता है जिसमे सिर्फ दो सीट होती हैं ऊपर नीचे और आप दरवाजे को अंदर से बंद भी कर सकते हैं जिससे आप को पूरी प्राइवेसी मिलती है.
रुचिका तू उस ट्रैन और उसके केबिन को देखकर hi खुश हो गयी और कहने लगी "पापा ऐसी ट्रैन भी होती हैं जिसमे अपना अलग कमरा होता है"
मोहनलाल: हाँ बीटा होता है, जैसे की ये है, ऐसे hi चार लोगों के लिए भी होता हैं
फिर वे आराम से सीट पर बैठ गए, मोहनलाल तू ये सोच सोच कर परेशान था की वंहा पर कान्हा रुकेंगे क्योँकि जो रूम कंपनी की तरफ से बुक हुआ है वो कपल के लिए है न की बाप और बेटी के लिए.
कुछ समझ नहीं आ रहा था की क्या करे और उधर रुचिका अपनी ट्रैन जर्नी का मज़ा ले रही थी और बहार के नज़ारे देख देख कर खुश हो रही थी. होती भी क्योँ नहीं, ऐसा सफर तू उसने पहले कभी किया hi नहीं था.
दोपहर में दरवाजे पर नॉक हुआ तू जब मोहनलाल ने खोला तू वहां पैर एक वेटर खड़ा हुआ था जो उनके लिए खाना लाया हुआ था. वहां पैर खाना रखकर बोलै "प्लीज एन्जॉय योर लंच सर एंड मैडम"
रुचिका: पापा यह हमें सर और मैडम क्यों बोल रहा था
मोहनलाल: और क्या बोलता
रुचिका: नहीं पापा बात कुछ और hi है
मोहनलाल: अरे कोई बात नहीं चलो खाना खाओ और और बाकि की सब बातें बाद में करेंगे
उन दोनों ने चुप करके खाने खाया लेकिन मन अशांत था, इसलिए खाना अच्छा होते हुए भी मजा नहीं आ रहा था. जैसे कैसे खाना ख़तम हुआ और थोड़ी देर बाद वही वेटर आया और उन्हें इसक्रीम देकर पूछने लगा "सर और कुछ चाहिए" मोहनलाल ने ना में सर हिलाते हुए उसे टिप दी तू वो "थैंक यू सर, अब आपको कोई डिस्टर्ब नहीं करेगा, आपको कुछ भी जरुरत हो तू मुझे याद कर लेना" इतना बोलकर चला गया. उसके जाने के बाद मोहनलाल ने कूप का दरवाजा बंद कर दिया और जैसे hi पलटा तू रुचिका उससे बड़े hi अजीब नज़रो से देख रही थी और बोली "अब आप बताइये की उसका क्या मतलब है"
मोहनलाल ने अनजान बनते हुए "किसका"
रुचिका: सर और मैडम का
मैं: वैरी सिंपल, सर मीन्स मैं और मैडम मीन्स तुम
रुचिका: वो तू मुझे भी समझ आ रहा है, लेकिन जिस तरह से वो कह रहा था वो हमें कुछ और hi समझ रहा था.
मैं: क्या समझ रहा था
रुचिका: जैसे की हम हस्बैंड वाइफ हो
मोहनलाल: (ठंढी सांस भरते हुए) तू क्या गलत समझ रहा था
रुचिका: मतलब
मोहनलाल: ये टिकट मरस. & मर. मोहन के नाम से है, मतलब की मैं और तुम्हारी माँ
रुचिका: आपने ये बात पहले क्योँ नहीं बताई
मोहनलाल: क्या नहीं बताई
रुचिका: की ये टिकट हस्बैंड और वाइफ के लिए है
मोहनलाल: चीख चीख कर बताया था की ये टूर कपल के लिए फ्री है
रुचिका: लेकिन कपल का मतलब हस्बैंड वाइफ थोड़े hi होता है
मोहनलाल: घर पर तुम दोनों माँ बेटी को बहुत समझाया था, लेकिन तुम्हारी माँ और तुमने अपनी इंटेलिजेंस का इस्तेमाल करके मुझे कपल का मतलब समझा कर चुप करा दिया था. तब तू मेरी बात समझ नहीं आ रही थी.
रुचिका: मैंने कपल का मतलब तू डिक्शनरी से पढ़ कर hi बताय था.
मोहनलाल: मेरी पढ़ी लिखी बेटी कपल के कई मतलब होते है, जिनमे से एक का मतलब तुमने बखूबी बताया, लेकिन इंग्लिश का वर्ड कान्हा उसे होगा उस हिसाब से उसका मतलब बदल जाता है. जैसे कपल का यंहा मतलब है "तवो पीपल हु अरे टुगेदर बिकॉज़ थे अरे मैरिड और इन ा रिलेशनशिप"
हिंदी में मतलब है "विवाहित होने अथवा किसी सम्बन्ध में होने के कारण दो व्यक्तियों का एक साथ रहना, दंपत्ति, pati-patni"
रुचिका: आपका मतलब है की वो हमें पति पत्नी समझ रहा है
मोहनलाल: हाँ
रुचिका: उसे हमारी उम्र का फरक समझ नहीं आया
मोहनलाल: पहली बात तू हमारी उम्र का जयादा फर्क लगता hi नहीं है, याद करो तुम्हारी सहेली ने तू तुम्हारे सच बोलने पर तुम्हारा मजाक उदय था और दूसरी बात अगर किसी को नज़र भी आये तू उम्र के फर्क का कोई मतलब नहीं हैं क्योंकि वो लिस्ट में से देख कर आया है की हम कपल हैं
रुचिका: क्या उम्र के फर्क होने से भी कपल हो सकते हैं.
मोहनलाल: पहली बात कोई नहीं कह सकता की हम दोनों की उम्र में जयादा फर्क है और दूसरा अगर किसी को उम्र का फरक पता भी चला तू वो कभी नहीं कहेगा क्योँकि ये आजकल नार्मल है.
रुचिका: लेकिन मैं तू आपकी बेटी हु
मोहनलाल: क्या हमारे चेरो पर लिखा हुआ है? जब तक हम किसी को नहीं बताएँगे तब तक कोई नहीं जान सकता की हमारा रिश्ता क्या है
रस्ते में संध्या ने आदित्य से पूछा की पानी पूरी कैसी थी तू आदित्य जो अपनी सोचो में खोया हुआ था बोलै "माँ आपकी उँगलियाँ बहुत मीठी हैं" संध्या एक बार तू शर्मा गयी लेकिन फिर उसने कहा "मैंने पानी पूरी के बारे में पूछा था" तब आदित्य ने कहा "माँ मुझे तू पानी पूरी का पता hi नहीं चला, मैं तू आपकी उँगलियों की मिठास में खोया हुआ था" उसकी बात सुनकर संध्या एक डैम से शर्मा गयी और उसकी पीठ पर मुक्का मरते हुए "घाट" कहकर चुप होकर बैठ गयी और बिच बिच में ब्रेक लगने पर वो आगे को खिसक जाती थी जिससे उसकी चूचियां आदित्य की पीठ पर डाब कर उसका हाल बुरा कर रही थी. एक बार तो माँ ने झटका लगने पर अपने गाल को भी उसकी गर्दन पर दबा दिया था, जिससे दोनों के साँसों की गति बढ़ गयी थी. फिर वो दोनों घर पहुंच गए. घर में ए तो संध्या आदित्य को अजीब नजर से देख रही थी और मुस्कुरा भी रही थी.
घर पहुँच कर उन दोनों के मन में अजीब सी फीलिंग थी और वो दोनों hi एक दूसरे से नजरे चुराते हुए अपने अपने कमरे में चले गए.
इनको अपने कमरे में जाने देते हैं और हम चलते हैं मोहनलाल और रुचिका का हाल पता करने.
एयरपोर्ट पर पंहुच कर उनोहोने बोर्डिंग पास लिया और सिक्योरिटी चेक के बाद अंदर आ गए तू पता चला की फ्लाइट दो घंटे के लिए डिले कर दी गयी है. रुचिका ने पिज़्ज़ा खाने के लिए ज़िद की तू मोहनलाल मन करने लगा लेकिन वो मान नहीं रही थी तू मोहनलाल ने बहाना किया और कहा "अच्छा तुम बैठो मैं टॉयलेट होकर आता हु"
मोहनलाल वंहा से अलग हुआ और किसी से फ़ोन पर बात करता रहा, उसने रुचिका के हाल चल के बारे में बताया और कुछ पूछा तू उसका जवाब सुनकर मोहनलाल के चेहरे पर मुस्कान आ गयी और फिर वंहा से वो रुचिका के पास आकर बैठ गया.
रुचिका ने फिर से ज़िद की तू उसने कहा "जयादा मत खाना". उसने खुश होकर मोहनलाल के गले लगकर "थैंक्स बोलै" और फिर दोनों वंहा पिज़्ज़ा हूत पर चले गए और रुचिका की पसंद का पिज़्ज़ा आर्डर कर दिया और साथ में दो कॉफ़ी भी बोली.
आर्डर आने से पहले मोहनलाल ने रुचिका को दवाई खाने के लिए कहा तू उसने कहा की बाद में ले लेगी तू मोहनलाल ने उसके सर पर हाथ फेरते हुए बड़े प्यार से कहा "अगर पिज़्ज़ा खाना है तू पहले दवाई खाओ, नहीं तू पिज़्ज़ा कैंसिल"
रुचिका ने थोड़ा सा ृथत्ते हुए कहा "जब देखो आप मुझे ब्लैकमेल करते रहते हो, अच्छी बात नहीं है" तू उसके जवाब में मोहनलाल ने उसके माथे को चूमते हुए कहा "ये तू मेरा प्यार है" उसकी बात सुनकर रुचिका मोहनलाल को बहुत प्यार से देखने लगी और कुछ कहती उससे पहले उनका आर्डर भी आ गया. मोहनलाल अपने हाथों से बड़े प्यार से रुचिका को खिलता है तू रुचिका बहुत खुश होती है और फिर उसके बाद रुचिका और मोहनलाल वंहा से आकर वेटिंग लाउन्ज में आ जाते हैं, जंहा उसे मोहनलाल आराम करने के लिए कहता है तू रुचिका मोहनलाल के कंधे पर सर रख कर आँखे बंद कर लेती है और थोड़ी देर में सो जाती है और मोहनलाल अतीत की यादों में खो जाता है.
ऐसे hi वक़्त बीतता रहा और मोहनलाल के मन में रुचिका की तरफ लगाव दिनों दिन बढ़ता hi जा रहा था लेकिन वो अपने आप से डरने लगा था की कनिह कुछ गलत न हो जाये, इसलिए वो कोशिश करता था की घर पर काम से काम जाये ताकि रुचिका से दूर रहे. दूर रहता था और मन hi मन में कहता था
दूर रह कर करीब रहने की आदत है
याद बनकर आँखों से बहने की आदत है
करीब न होते हुए भी करीब पाओगे
मुझे एहसास बनकर रहने की आदत है
उसकी ये बात वाक़ई में सच होती परतीत हो रही थी क्योंकि अब रुचिका के मन के किसी कोने में भी उससे अपने पापा से मिलाने की चाहत बढ़ रही थी. उससे नहीं पता लग रहा था की ये एहसास क्या है, लेकिन उसकी सहेली के द्वारा उससे बार बार छेड़ने और बीती यादों की वजह से उसका मन करता था की अपने पापा के साथ वक़्त बिताये और वो चाहने लगी थी की उनके साथ घूमे फायर और मस्तियाँ करे. जैसे hi वो पापा को याद करती तू उसके मन में एक मीठी चुभन होने लगती, ये क्योँ था उसकी समझ से परे था हो सकता है की उसके मन में उसकी सहेली के शब्द गूंजते थे "पर्सनल एंड साइकोलॉजिकल अदमीरेर". उससे कभी कभी लगने लगा था की उसके पापा के ऊपर ये डेफिनिशन बिलकुल फिट बैठते है.
वक़्त पंख लगा कर ुध रहा था और रुचिका अब फाइनल ईयर में थी तू एक दिन मोहनलाल को टूर पर फ्री कपल के लिए 3 दिन का पैकेज मिला था तू उसने संध्या को साथ चलने के लिए कहा तू वह मन करने लगी. मोहनलाल ने उसे कहा की बच्चों का ध्यान रखने के लिए उसने एक रिश्तेदार को कह दिया है इसलिए चिंता की कोई बात नहीं है. उसने कहा "बात बच्चों की नहीं है और वैसे भी बच्चे अब बड़े हो गए हैं वह अपना ध्यान खुद कर सकते हैं लेकिन मैं नहीं जाना चाहती क्यूंकि की वहां पैर दूसरे लोग पातर पातर इंग्लिश बोलते हैं और मुझे कुछ समझ नहीं आता जिस वजह से मैं बेवकूफ बन जाती हूँ. बेवकूफ बनने से अच्छा है की मैं जॉन hi नहीं."
मोहनलाल ने उसको बहुत समझाया लेकिन वह तस से मास नहीं हुई. आखिर में हथियार डालते हुए मोहनलाल ने उससे कहा "ठीक है जैसे तुम्हारी मर्जी, चला जाऊंगा अकेले"
उसने कहा "ऐसा करो अपने साथ रूचि को ले जाओ तुम अकेले भी नहीं होंगे और उसको भी घूमने को मिल जाएगा और वैसे भी वो अच्छी खासी इंग्लिश बोल लेती है, इसलिए परेशानी की कोई बात नहीं है"
मोहनलाल ने कहा "तुम समझती क्योँ नहीं हो, मैं उसे नहीं ले जा सकता"
संध्या: क्योँ नहीं ले जा सकते
मोहनलाल: एक तू वो बोआर हो जाएगी
संध्या: क्योँ बोआर होगी, जंहा आप जाओगे वो आपके साथ जाएगी और कुछ सीख भी लेगी
मोहनलाल: उसे कैसे ले जा सकता हु
संध्या: जैसे मुझे ले जा सकता हो
मोहनलाल: ये मुमकिन नहीं है
संध्या: आप असल में अकेले जाना कहते हो और मुझे भी ऐसे hi बोल रहे हो की चलो, वार्ना मन से नहीं चाहते, इसलिए ये सब कह रहे हो
मोहनलाल: तुम समझती क्योँ नहीं हो, अगर उससे ले जाता हु तू उसका खर्चा भी अलग से करना पड़ेगा
संध्या: क्योँ करना पड़ेगा, अभी तू कह रहे थे की कपल के लिए सब फ्री है
मोहनलाल: हाँ 'कपल' के लिए फ्री है
संध्या: मतलब दो के लिए, उन्हें क्या फर्क पड़ता है, वो तू कोई भी दो हो सकते हैं
मोहनलाल: यंहा कपल का मतलब अलग है
संध्या: हाँ मैं सब समझती हु, आप मेरी नासमझी का फायदा उठाकर मुझे बेहला फुसला कर उसे न ले जाने का बहना ढूंढ रहे हैं.
मोहनलाल: अगर तुम्हे मेरी बात का विश्वास नहीं है तू अपनी लाड़ली, पढ़ी लिखी बेटी से पूछ लो की 'कपल' का क्या मतलब होता है
संध्या ने रूचि को आवाज़ देकर बुलाया और उससे कपल का मतलब पूछा तू उसने बताया 'तवो पीपल और थिंग्स ऑफ़ थे शामे सॉर्ट कन्सिडरेड टुगेदर'
संध्या: अरे हिंदी में बता
रुचिका: दो लोग या वस्तुअन जो एक जैसे हो और साथ हो
संध्या: कपल का मतलब दो hi है न तू फिर परेशानी क्या है
मोहनलाल: (परेशान होते हुए) तुम लोगों को समझाना मेरे बस की बात नहीं है, ठीक है तुम जैसा कहोगी मैं करूँगा.
संध्या: रूचि बीटा तुम पापा के साथ घूमने जाना चाहोगी
रुचिका: (मन hi मन में खुश होते हुए, उसके तू मन की मुराद पूरी हो रही थी) हाँ क्योँ नहीं, नेकी और पूछ पूछ
संध्या: फिर तयारी करो, तुम्हे कल hi जाना है पापा के साथ और देखना कुछ अच्छे वाले कपडे रख लेना.
रुचिका: पापा मुझे नए कपडे दिलवा देंगे, क्योँ पापा
मोहनलाल: (परेशानी से) हाँ जो आप दोनों कहोगे मैं करूँगा और चारा क्या है मेरे पास
रुचिका: (उदास होते हुए) पापा, अगर आप को मुझे ले जाने में कोई परेशानी है तो मैं नहीं जाना चाहती. मुझे लगता है की आप मुझे लेजाकर दुखी लग रहे हो. अगर ऐसा है तू आप मुझे ख़ुशी से नहीं ले जाना चाहते तू मैं नहीं जाउंगी, आप परेशान न हो.
मोहनलाल: (रुचिका की उदासी देखकर पिघल गया और अपने चेरे पर मुस्कुरहट लेट हुए) नहीं बेटे ऐसी बात नहीं है, जाओ तुम तयारी कर लो
अगले दिन वे दोनों सुबह सुबह hi कैब करके वंहा से निकलकर स्टेशन पर आये और प्लेटफॉर्म पर ट्रैन की वेट करने लगे. उनकी first-class में टिकट बुक थी और ट्रैन आने पर वे ट्रैन में चढ़े तू देखा की उन्हें एक कूप दिया गया था.
कूप वो होता है जिसमे सिर्फ दो सीट होती हैं ऊपर नीचे और आप दरवाजे को अंदर से बंद भी कर सकते हैं जिससे आप को पूरी प्राइवेसी मिलती है.
रुचिका तू उस ट्रैन और उसके केबिन को देखकर hi खुश हो गयी और कहने लगी "पापा ऐसी ट्रैन भी होती हैं जिसमे अपना अलग कमरा होता है"
मोहनलाल: हाँ बीटा होता है, जैसे की ये है, ऐसे hi चार लोगों के लिए भी होता हैं
फिर वे आराम से सीट पर बैठ गए, मोहनलाल तू ये सोच सोच कर परेशान था की वंहा पर कान्हा रुकेंगे क्योँकि जो रूम कंपनी की तरफ से बुक हुआ है वो कपल के लिए है न की बाप और बेटी के लिए.
कुछ समझ नहीं आ रहा था की क्या करे और उधर रुचिका अपनी ट्रैन जर्नी का मज़ा ले रही थी और बहार के नज़ारे देख देख कर खुश हो रही थी. होती भी क्योँ नहीं, ऐसा सफर तू उसने पहले कभी किया hi नहीं था.
दोपहर में दरवाजे पर नॉक हुआ तू जब मोहनलाल ने खोला तू वहां पैर एक वेटर खड़ा हुआ था जो उनके लिए खाना लाया हुआ था. वहां पैर खाना रखकर बोलै "प्लीज एन्जॉय योर लंच सर एंड मैडम"
रुचिका: पापा यह हमें सर और मैडम क्यों बोल रहा था
मोहनलाल: और क्या बोलता
रुचिका: नहीं पापा बात कुछ और hi है
मोहनलाल: अरे कोई बात नहीं चलो खाना खाओ और और बाकि की सब बातें बाद में करेंगे
उन दोनों ने चुप करके खाने खाया लेकिन मन अशांत था, इसलिए खाना अच्छा होते हुए भी मजा नहीं आ रहा था. जैसे कैसे खाना ख़तम हुआ और थोड़ी देर बाद वही वेटर आया और उन्हें इसक्रीम देकर पूछने लगा "सर और कुछ चाहिए" मोहनलाल ने ना में सर हिलाते हुए उसे टिप दी तू वो "थैंक यू सर, अब आपको कोई डिस्टर्ब नहीं करेगा, आपको कुछ भी जरुरत हो तू मुझे याद कर लेना" इतना बोलकर चला गया. उसके जाने के बाद मोहनलाल ने कूप का दरवाजा बंद कर दिया और जैसे hi पलटा तू रुचिका उससे बड़े hi अजीब नज़रो से देख रही थी और बोली "अब आप बताइये की उसका क्या मतलब है"
मोहनलाल ने अनजान बनते हुए "किसका"
रुचिका: सर और मैडम का
मैं: वैरी सिंपल, सर मीन्स मैं और मैडम मीन्स तुम
रुचिका: वो तू मुझे भी समझ आ रहा है, लेकिन जिस तरह से वो कह रहा था वो हमें कुछ और hi समझ रहा था.
मैं: क्या समझ रहा था
रुचिका: जैसे की हम हस्बैंड वाइफ हो
मोहनलाल: (ठंढी सांस भरते हुए) तू क्या गलत समझ रहा था
रुचिका: मतलब
मोहनलाल: ये टिकट मरस. & मर. मोहन के नाम से है, मतलब की मैं और तुम्हारी माँ
रुचिका: आपने ये बात पहले क्योँ नहीं बताई
मोहनलाल: क्या नहीं बताई
रुचिका: की ये टिकट हस्बैंड और वाइफ के लिए है
मोहनलाल: चीख चीख कर बताया था की ये टूर कपल के लिए फ्री है
रुचिका: लेकिन कपल का मतलब हस्बैंड वाइफ थोड़े hi होता है
मोहनलाल: घर पर तुम दोनों माँ बेटी को बहुत समझाया था, लेकिन तुम्हारी माँ और तुमने अपनी इंटेलिजेंस का इस्तेमाल करके मुझे कपल का मतलब समझा कर चुप करा दिया था. तब तू मेरी बात समझ नहीं आ रही थी.
रुचिका: मैंने कपल का मतलब तू डिक्शनरी से पढ़ कर hi बताय था.
मोहनलाल: मेरी पढ़ी लिखी बेटी कपल के कई मतलब होते है, जिनमे से एक का मतलब तुमने बखूबी बताया, लेकिन इंग्लिश का वर्ड कान्हा उसे होगा उस हिसाब से उसका मतलब बदल जाता है. जैसे कपल का यंहा मतलब है "तवो पीपल हु अरे टुगेदर बिकॉज़ थे अरे मैरिड और इन ा रिलेशनशिप"
हिंदी में मतलब है "विवाहित होने अथवा किसी सम्बन्ध में होने के कारण दो व्यक्तियों का एक साथ रहना, दंपत्ति, pati-patni"
रुचिका: आपका मतलब है की वो हमें पति पत्नी समझ रहा है
मोहनलाल: हाँ
रुचिका: उसे हमारी उम्र का फरक समझ नहीं आया
मोहनलाल: पहली बात तू हमारी उम्र का जयादा फर्क लगता hi नहीं है, याद करो तुम्हारी सहेली ने तू तुम्हारे सच बोलने पर तुम्हारा मजाक उदय था और दूसरी बात अगर किसी को नज़र भी आये तू उम्र के फर्क का कोई मतलब नहीं हैं क्योंकि वो लिस्ट में से देख कर आया है की हम कपल हैं
रुचिका: क्या उम्र के फर्क होने से भी कपल हो सकते हैं.
मोहनलाल: पहली बात कोई नहीं कह सकता की हम दोनों की उम्र में जयादा फर्क है और दूसरा अगर किसी को उम्र का फरक पता भी चला तू वो कभी नहीं कहेगा क्योँकि ये आजकल नार्मल है.
रुचिका: लेकिन मैं तू आपकी बेटी हु
मोहनलाल: क्या हमारे चेरो पर लिखा हुआ है? जब तक हम किसी को नहीं बताएँगे तब तक कोई नहीं जान सकता की हमारा रिश्ता क्या है