सुप्रिया: एक जवान बीवी की कहानी - Page 16 - SexBaba
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सुप्रिया: एक जवान बीवी की कहानी

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अपडेट 111

सुप्रिया एक छोटी सी रसोई में कड़ी खाना बना रही थी. चार हफ्ते हो चुके थे उसे यहाँ अपनी इस नयी ज़िन्दगी में आये हुए और हर दिन पिछले दिन से काफी अलग लगता था. वह खाना बनाते बनाते इस चार हफ़्तों में जो कुछ हुआ उसे याद करने लगी.

उस दिन, जैसे hi ऑटो ट्रैन स्टेशन पर रुका, वह तेज़ी से भागती हुई अंदर गयी. उसके लिए ये सब किसी फिल्म के सन से काम नहीं था. सामने वाले प्लेटफार्म पर इक़बाल और हिना बैठे हुए थे और उन्होंने उसकी और नहीं देखा था. उसने ज़ोर से हिना को आवाज़ दी और हिना का उदास चेहरा एकदम से बदल गया. वह इधर उधर देखते हुए अपनी चची को ढूंढ़ने लगी. सुप्रिया जल्दी से ब्रिज पर चढ़ते हुए दुसरे प्लेटफार्म पर पहुंची और हिना के गले लग गयी.

इक़बाल उसे वहां देख कर हैरान था पर उसके चेहरे पर भी एक हलकी सी मुस्कान आ गयी थी. वह इस बार उनके साथ अपनी पूरी मर्ज़ी से जा रही थी, किसी मज़बूरी या दबाव में नहीं. शायद आने वाला वक़्त आसान नहीं होने वाला था पर इस बार सुप्रिया ने अपने लिए ये चुना था, न की किसी और को अपने लिए कुछ चुनने दिया था.

अगले चार हफ्ते सब कुछ नया सा hi था. इक़बाल के एक दोस्त ने उन्हें एक पुराने से मोहल्ले में एक कमरा दिलवा दिया था. किसी तरह उन लोगो ने ज़रुरत की चीज़े इखट्टा करनी शुरू करि. बस इतनी की रोज़ का काम चल जाये, पर अभी भी बोहोत साड़ी चीज़ों की कमी थी.

घर में सिर्फ एक कमरा था जिसमे पहले से hi एक पलंग था. और सुप्रिया और हिना उस पलंग पर सोते जबकि इक़बाल वहीँ कमरे में नीचे ज़मीन पर एक दरी बिछा कर सो जाता. पहली रात जब सुप्रिया ने उसे नीचे सोते देखा तोह उसने उसे पलंग पर सोने के लिए कहा था पर इक़बाल ने जगह की कमी बताते हुए मन कर दिया था.

सुप्रिया ने कुछ नहीं कहा था उस वक़्त, पर उसके मैं में कई सवाल घुमते रहे. क्या इक़बाल अब उससे दूर रहना चाहते थे? सुप्रिया तोह अपना घर छोड़ कर उसके साथ आ गयी थी. पर अब उनके बीच क्या रिश्ता था? गाँव में जो कुछ हुआ था, वह शादी, वह साथ बितायीं हुई रातें, क्या वह सब सिर्फ उन दोनों की मजबूरी थी या हवस? या कुछ और?

कभी कभी रात में जब सब सो जाते, तोह सुप्रिया इक़बाल की सांसें सुनती रहती. वह जागता हुआ होता या सोया हुआ, यह पता नहीं चलता था. उनके बीच में एक अजीब सी ख़ामोशी थी जिसमे बोहोत साड़ी बातें अनकही सी लग रही थी.

सुप्रिया घर के काम संभालती और हिना उसकी मदद करती. जबकि इक़बाल सुबह जल्दी उठ कर काम ढूंढ़ने निकल जाता, उसे अभी तक कुछ ाचा काम नहीं मिल पाया था. हिना को भी सब कुछ इतना अलग सा लग रहा था. इतने बड़े से गाँव के घर से निकल कर यहाँ शहर के छोटे से कमरे में रहना आसान नहीं था. गाँव में उसकी सहेलियां थी, घर के aas-paas खेलने की जगह थी. यहाँ सिर्फ दीवारें और शोर था.

पर हिना शिकायत नहीं करती थी, आखिर बहार खिड़की से देखने के लिए एक अलग नयी दुनिया थी. कभी कभी वह सुप्रिया से लखनऊ के बारे में सवाल करती, कभी अपने आगे की पड़े के बारे में. पर सुप्रिया तोह सिर्फ आज में जी रही थी, और वह उसकी बात को प्यार से ताल देती. उसे दिख रहा था की यहाँ कुछ आसान नहीं होने वाला था. उसे महसूस होता की घर के बहार आस पास के लोगो को भी काफी जिज्ञासा थी उन दो जवान लड़कियों के बारे में.

शाम होते hi अक्सर वह तीनो साथ बहार निकल जाते और सब कुछ इतना अच्छा सा लगता. जैसे एक छोटा सा परिवार हो. हिना उस वक़्त सबसे ज़्यादा खुश रहती. शहर की रौशनी, दुकानों की चका चोंध और घाट के पानी में पेअर दाल कर बैठना, उसे सब बोहोत ाचा सा लगता. उसकी आँखों में एक अजीब सा जोश था.

जैसे तैसे एक एक करके दिन kat-ta जा रहा था.

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सुप्रिया खाना बना hi रही थी की इक़बाल के आने की आवाज़ आयी.

हिना चहकते हुए बोली, "अब्बू! आप आ गए. क्या लाये हो."

इक़बाल भी खुश होते हुए बोलै, "ये देख, तेरे लिए कुछ किताबे लाया हु... "

हिना बुक्स को लेकर उन्हें देखने लगी. उनकी हालत इतनी अच्छी नहीं थी, पर फिर भी एक और चीज़ थी मैं बहलाने के लिए.

सुप्रिया ने रसोई से बहार निकलते हुए पुछा - "यह कहाँ से ले आये?

इक़बाल धीरे से फुसफुसाया - मैंने बताया था न, मैं वह रद्दी की दूकान पर थोड़ा काम कर रहा था.

सुप्रिया - और कोई काम नहीं मिल रहा क्या?

इक़बाल - फिलहाल तोह नहीं, और मैं फिर से वह चौकीदार वाली नौकरी नहीं करना चाहता. पर आप फिक्र न कीजिये... सलीम कह रहा था की एक पुराण ऑटो बिक रहा है, जैसे hi उसके लिए थोड़े पैसे जुड़ जायेंगे मैं उसे ले लूंगा.

सलीम इक़बाल का वही दोस्त था जिसने उन्हें ये कमरा दिलवाने में मदद की थी.

सुप्रिया अपने मैं की बात शायद थोड़ा तेज़ सोचते हुए बोली - हाँ... मैं भी नहीं चाहती की आप वॉचमन वाली नौकरी करो. ऑटो चलना ठीक रहेगा मेरे हिसाब से... कितने का है?

इक़बाल - एहि कोई अस्सी हज़ार का... पर तीस पहले देने पड़ेंगे...

सुप्रिया - तीस...? मेरे बैग में कुछ गहने थे जो लखनऊ से मेरे साथ आ गए थे. उन्हें बेच सकते है... मेरे ख्याल से उतने के तोह होंगे.

उन्हें रीलीज़ नहीं हुआ पर हिना भी उनकी बातें गौर से सुन रही थी - अब्बू, और वह अम्मी के भी पुराने गहने है थोड़े से, वह भी बेच सकते हैं.

इक़बाल ने तुरंत मन कर दिया - नहीं नहीं... मुझे गहने नहीं बेचने किसी के भी...

सुप्रिया ने ज़ोर देते हुए कहा - पर उनका हम करेंगे क्या? जब हमे उनकी अभी ज़रुरत है तोह उन्हें इस्तेमाल कर लेते है. आप ऑटो चलने लगोगे तोह आपकी कोई छोटी मोती नौकरी नहीं करनी पड़ेगी. एक तरह से खुद का बिज़नेस हो जायेगा.

इक़बाल सुप्रिया की तरफ देख नहीं पा रहा था - मैं सोचूंगा इस बारे में...

सुप्रिया - और कितने दिन लगाएंगे सोचने में... हिना... जा वह मेरे बैग से गहने ले आ.

हिना जल्दी से सुप्रिया के बैग से उसके और हिना के गहने ले आयी.

सुप्रिया ने सारे गहने इक़बाल के हाथ में रख दिए - कल चल कर इनको बेच देते हैं. मैं आपके साथ चल लुंगी ताकि सही रेट मिल जाये.

इक़बाल को शायद ये बात अच्छी नहीं लगी - आपको मुझ पर भरोसा नहीं है?

सुप्रिया - भरोसा है... पर एक की जगह 2 लोग होंगे तोह अच्छे से बात हो जाएगी न.

इक़बाल - मैं सलीम को साथ ले जायूँगा...

सुप्रिया - ठीक है... जैसी आपकी मर्ज़ी...

इक़बाल गहनों को देखने लगा. उसमे हिना की अम्मी का पूरा मंगलसूत्र भी था, जो उसने सालो पहले सीमा की ज़िद्द पर उसे खरीद के दिया था. उसकी उंगलियां उसे छू रही थी.

हिना ने भी उसकी और देखते हुए कहा - अब्बू... बस हम लोग ये रख सकते हैं क्या...

इक़बाल - हाँ... क्यों नहीं...

हिना ने तुरंत वह इक़बाल के हाथ से उठा लिया. वह उसे हवा में उठा कर देख hi रही थी की उसे सामने सुप्रिया दिखाई दी.

हिना - मेरे ख्याल से ये चची को पेहेनना चाहिए...

सुप्रिया एक डैम चौंक सी गयी और उसने इक़बाल की तरफ देखा.

हिना - चची... आप अपने सारे गहने दे रही तोह, तोह आप ये तोह पेहेन hi सकते हो न...

सुप्रिया - पर... ये तोह तुम्हारी अम्मी का था न...

हिना - हाँ... पर आप hi अब्बू की बीवी हो न... अब्बू, आप पहनाइए न ये इन्हे...

हिना ने ज़िद्द करते हुए इक़बाल के हाथ में मंगलसूत्र दे दिया. इक़बाल ने हिचकते हुए उसे पकड़ा और सुप्रिया की तरफ देखा. उसकी आँखें सुप्रिया से पूछ रही थी की क्या मैं तुम्हे ये पहना सकता हूँ. तुम क्या चाहती हो?

सुप्रिया ने धीरे से अपना सर हाँ में हिलाया और अपनी पीठ इक़बाल की तरफ कर दी.

इक़बाल ने कांपते हाथों से मंगलसूत्र लिया और सुप्रिया के गले में डाला. उसका हाथ सुप्रिया के बालों से होता हुआ निकल रहा था. जब उसने डोरी को बंधा तोह उसकी उंगलियां सुप्रिया की गर्दन को छू गयी और दोनों को जैसे एक बिजली का झटका लगा. सुप्रिया के पूरे शरीर के रोंगटे खड़े से हो गए.

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इक़बाल ने अपने हाथ पीछे किये और सुप्रिया जब मुड़ी तोह उसकी गोरी गर्दन पर एक काले धागे का मंगलसूत्र अलग hi चमक रहा था. उसके चेहरे पर एक मुस्कान सी आ गयी थी. हिना भी मुस्कुरा रही थी.

उस रात जब वह लोग सोने लगे और इक़बाल नीचे गद्दे में पर लेटने लगा तब सुप्रिया ने कहा - पलंग पर hi सो जाइये न... काफी जगह है...

इक़बाल ने धीरे से इंकार करते हुए सर हिलाया - नहीं रहने दीजिये... आप लोगो को दिक्कत होगी...

कमरे की बत्ती बंद हो गयी और सुप्रिया बेसब्री से हिना के सोने का इंतज़ार करने लगी. शायद उसे जागते जागते एक घंटा हो गया था. उसने अँधेरे में हिना की तरफ देखा, उसकी आँखें बंद थी और वह गहरी सांसें ले रही थी.

सुप्रिया धीरे से बिस्तर से सरक कर नीचे गद्दे पर आ गयी, इक़बाल के ठीक साइड में.

इक़बाल जाग hi रहा था और वह एक डैम चौंकते हुए बोलै - क्या हुआ मैडमजी?

सुप्रिया ने उसे गुस्से में घूरा और धीमी आवाज़ में कहा - एक तरफ गले में मंगलसूत्र बांधते हो और दूसरी तरफ मैडमजी बुलाते हो... मुझे कुछ समझ नहीं आता.

सुप्रिया ने अपना हाथ इक़बाल की छाती पर रखा और उससे सात कर लेट गयी. दोनों एक दुसरे की आँखों में देख रहे थे और सांसें तेज़ हो गयी थी.

इक़बाल - मैं... वह...

सुप्रिया - मुझे hi सब कुछ कहना पड़ेगा क्या?

इक़बाल - नहीं... पर... मुझे लगा...

सुप्रिया - क्या मैं ऐसे hi आ गयी आप लोगो के साथ अपना घर छोड़ कर? क्या सोच कर मुझे वहां छोड़ कर आये थे?

आज सुप्रिया के इन गुस्से भरे सवालों को देख कर इक़बाल भी थोड़ा हैरान था.

इक़बाल कुछ पल छुप रहने के बाद बोलै - मैं... मैं तोह बस एक चौकीदार हूँ... मैंने सोचा आपको आपके हिसाब से जिंदगी जीने का मौका मिलना चाहिए.

सुप्रिया ने अपना चेहरा उसके और नज़दीक कर लिया - और अब क्या सोचते हो?

इक़बाल के हाथ काँप से रहे थे - आप हम लोगो के साथ आ गयी... अपनी मर्ज़ी से... आपको कोई पछतावा तोह नहीं?

सुप्रिया से इतने धीरे धीरे बोलै नहीं जा रहा था, उसका पूरा शरीर गरम होता जा रहा था - बिलकुल नहीं! जो कुछ गाँव में हुआ... हमारे बीच... वह सब क्या बस कोई मज़बूरी थी?

इक़बाल ने अंधेरे में सुप्रिया का हाथ ढूँढ़ते हुए कास के पकड़ लिया - नहीं... मैं आपको बोहोत चाहता था... चाहता हूँ...

सुप्रिया - तोह मेरा हक़ है आप पर... और आपका मुझ पर...

इक़बाल ने अपना हाथ सुप्रिया की कमर पर रखते हुए उसे अपने और पास खींच लिया, अपने ठीक ऊपर.

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सुप्रिया ने एक गहरी सांस लेते हुए अपना सर उसकी छाती पर रख दिया. इक़बाल के दिल की तेज़ धड़कन उसके कानो में गूँज रही थी.

सुप्रिया ने धीरे से कहा - कल से मुझे कभी भी मैडमजी नहीं बुलाना...

इक़बाल की छाती में एक हलकी सी हसी गूँज उठी - तोह क्या बोलयूं फिर?

सुप्रिया - मेरा नाम है न... आप जानते है न...

इक़बाल धीरे से बोलै - सुप्रिया...

सुप्रिया - हाँ...

इक़बाल ने सुप्रिया को कास के पकड़ लिया और उसे थोड़ा ऊपर खींचते हुए उसके होंठों को चूमने लगा. सुप्रिया भी तुरंत उसके किश का जवाब देते हुए उसे चूमने लगी. ऐसा लग रहा था दोनों अर्सो बाद एक दुसरे साथ हुए हो.

इक़बाल ने सुप्रिया के होंठों को छोड़कर उसकी गर्दन पर किश करना शुरू किया. सुप्रिया की सांसें बोहोत तेज़ हो गयी थी. पर दोनों को पता था की वह ज़्यादा कुछ नहीं कर सकते थे. हिना वहीँ पलंग पर सो रही थी.

इक़बाल ने सुप्रिया को फिर से अपनी बाहों में भर लिया और उसके बालों में हाथ फेरते हुए धीरे से बोलै - मुझे दर लगता है...

सुप्रिया ने हैरान होते हुए पुछा - किस बात का?

इक़बाल - एहि की... मैं तुम्हे खुश नहीं रख पायूँगा यहाँ... तुम इतनी जिंदगी जी रही थी लखनऊ में...

सुप्रिया - इस सब के बारे में मत सोचिये... हम मिल कर सब ठीक कर लेंगे...

इक़बाल का एक हाथ सुप्रिया की कमर से हट कर ऊपर उसकी छाती तक पहुंच गया और वह उसके बूब्स को कास के दबाने लगा. सुप्रिया के अंदर की आग भड़कती जा रही थी और वह ाँहें भर्ती हुई इक़बाल की छाती पर चूमने लगी.

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तभी ऊपर पलंग पर हिना के करवट लेने की आवाज़ आयी, और सुप्रिया एक झटके में इक़बाल के ऊपर से नीचे आ गयी. उसने इक़बाल की आँखों में देखा, दोनों तरफ बराबर की आग लगी थी, पर वह उसे यहाँ बुझा नहीं सकते थे.

सुप्रिया - हिना जग जाएगी...

इक़बाल ने फिर से सुप्रिया को पकड़ने की कोशिश करि - वह गहरी नींद में सो रही होगी...

सुप्रिया - नहीं... उसकी नींद काफी कच्ची है... मैं ऊपर जा कर लेट रही हूँ... कल से आप भी ऊपर hi सोना... ठीक है न?

इक़बाल ने हाँ में सर हिलाया. उसने सुप्रिया का चेहरा पकड़ते हुए फिर से उसके होंठों को चूमा. वह उसे छोड़ना तोह नहीं चाहता था पर फिलहाल और कोई ऑप्शन नहीं था.

सुप्रिया धीरे से उठा और पलंग पर जाकर लेट गयी. उसकी सांसें अभी भी तेज़ चल रही थी. हिना ने फिर से करवट ली और सुप्रिया के तरफ मुँह कर के सो गयी. सुप्रिया ने गहरी सांस ली और अपनी आँखें बंद कर ली.

नीचे इक़बाल भी जाग रहा था. उसके मैं में अजीब सी बेचैनी थी. आज पहली ऐसा लग रहा था जैसे सुप्रिया ने सच में उसे पूरी तरह से अपना मान लिया था. गाँव में जो हुआ था वह मजबूरी थी, पर आज... आज सुप्रिया खुद उसके पास आयी थी. अपनी मर्ज़ी से.

काफी देर दोनों बेचैनी में जगे रहे और फिर आखिर उन्हें नींद आयी.
 
अपडेट 112

सुबह होते hi सुप्रिया के चेहरे पर एक मुस्कराहट सी थी और बदन में फुर्ती. कल रात जैसे उसके मैं के सारे सवालों का जवाब मिल गया था. उसे अब पता था की वह इस घर में कुछ दिनों की मेहमान नहीं, बल्कि शायद इस घर की सबसे मजबूत कड़ी थी.

इक़बाल भी आज पहले से थोड़ा खुश लग रहा था, और घर का पूरा माहौल hi बदला हुआ सा था. आज इतने दिनों बाद किसी के मैं में कोई टेंशन नहीं थी. जिंदगी शायद अभी भी मुश्किल होने वाली थी, पर एक प्यारी सी आशा थी सब ठीक होने की.

चाय नाश्ता करने के बाद इक़बाल गहनों को एक बैग में अच्छे से छुपा कर अपने साथ ले गया. आज तोह वह घर वापस ऑटो खरीद कर hi आने वाला था.

सुप्रिया उसके जाते hi घर के काम निपटा कर अखबार में निकले नौकरी के इश्तेहारों को पड़ने लगी. काफी जगह जूनियर अकाउंटेंट या ऑफिस टाइप की जॉब्स निकली हुई थी, ऐसी जॉब्स जो वह काफी आराम से कर सकती थी. पर उसे मैं hi मैं पता था की इक़बाल जॉब का सुनते hi बुरा मान जायेगा. वह तोह बस उसे इस चार दीवारी में रख कर पूरी दुनिया से मेहफ़ूज़ रखना चाहता था.

सुप्रिया ने गहरी सांस ली. पर जिंदगी ऐसे तोह नहीं चलती न. वह कोशिश करेगी इक़बाल को मानाने की.

हिना घर में रखे एक पुराने से टीवी पर कोई फिल्म देख रही थी. गाँव में उन लोगो के पास टीवी नहीं था, तोह यहाँ टीवी पर सब कुछ hi देखना नया सा था. वह घंटो घंटो टीवी के आगे बैठी रहती थी. किसी फिल्म का गाना चल रहा था और हिना के हाथ और पेअर खुद hi चल रहे थे, उसकी आँखें स्क्रीन पर जमी हुई थी. सुप्रिया उसे देख कर मुस्कुरायी, कितनी बेफिक्र थी ये लड़की.

शाम होते होते सुप्रिया बेसब्री से इक़बाल के वापस आने का इंतज़ार कर रही थी. बस एहि सोच रही थी की सब कुछ अच्छे से हो गया हो. यहाँ शहर में बहुत कमीने लोग होते है जो इक़बाल जैसे अच्छे इंसान को ठग सकते थे.

बैठे बैठे उसने सोचा की क्यों न आज वह इक़बाल को सरप्राइज देने के लिए साड़ी पेहेन ले. गाँव में बस एक बार उसने साड़ी पहनी थी, और आज जाने क्यों उसका मैं कर रहा था इक़बाल के लिए सजने का.

सुप्रिया ने घर में जो एक अलमारी थी उसमे से एक हरे रंग की साड़ी निकाली और कमरे के दरवाज़े को बंद करते हुए साड़ी पेहेन्ने लगी. साड़ी इतनी महंगी नहीं थी पर सुप्रिया के बदन पर एक डैम लिपट सी गयी. सुप्रिया ने साड़ी के पल्लू को अपने कंधे पर डाला और अपने आप को आईने में देखा.

वह कोई सजी धजी गुड़िया नहीं, बल्कि एक खूबसूरत औरत लग रही थी जो अपने मर्द के लिए तैयार हुई हो. साड़ी के पल्लू को ठीक करते हुए वह मुस्कुरायी. उसने अपने दोनों हाथों में do-do चूड़ियाँ डाली और माथे पर एक बोहोत hi छोटी सी बिंदी लगायी. आज ये बात तोह पक्की थी - जब इक़बाल उसे इस साड़ी में देखेंगे तोह उनके होश उड़ने वाले थे.

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सुप्रिया साड़ी पेहेन कर कमरे से बहार आयी तोह उसकी चूड़ियों से कमरे में एक खनक सी होने लगी. हिना अभी भी टीवी में लगी हुई थी, पर चूड़ियों की आवाज़ से उसका ध्यान सुप्रिया की और गया और उसका मुँह खुला का खुला रह गया.

वह टीवी भूल कर बस सुप्रिया को hi देखने लगी - चची... क्या गज़ब लग रही हो आप... बिलकुल इस फिल्म की हीरोइन जैसे... नहीं नहीं... उससे भी बेहतर.

सुप्रिया शरमाते हुए बोली - चुप्प... कुछ भी बोलती है...

हिना - ारी नहीं चची... मज़ाक नहीं कर रही मैं... अब्बू आपको देखेंगे न तोह ऑटो वोटो सब भूल जायेंगे...

सुप्रिया का चेहरा गुलाबी सा हो गया. उसने आईने में एक आखरी बार अपने आप को देखा. आज इतने दिनों बाद उसने अपनी आँखों में वह डर नहीं, बल्कि एक नया उत्साह सा देखा था.

तभी बहार गली में एक ज़ोर का हॉर्न बजने की आवाज़ आयी.

हिना दरवाज़े की तरफ भागी - लगता है अब्बू ऑटो लेकर आ गए हैं!

सुप्रिया का दिल ज़ोर से धड़कने लगा. उसने जल्दी से अपने बाल ठीक किये और दबी सांस के साथ बहार की और झाँका. उनके घर के ठीक बहार एक काला पीला ऑटो खड़ा था, नया नहीं था, पर फिर फाई अच्छा लग रहा था. इक़बाल ड्राइविंग सीट पर बैठा था, उसके चेहरे पर ऐसी ख़ुशी थी जैसे उसने कोई जुंग जीत ली हो. उसके साथ सलीम भी खड़ा था, जो काफी हक़ से ऑटो की बॉडी पर हाथ फेर रहा था.

सुप्रिया भी हिना के पीछे पीछे घर से थोड़ा बहार निकल आयी.

इक़बाल की नज़रें सुप्रिया पर पड़ी तोह उसके हाथ वहीँ ऑटो के स्टीयरिंग पर जैम गए. इस सस्ती सी साड़ी में भी उसकी बेगम एक डैम नूरानी लग रही थी.

इक़बाल ने ऑटो से बहार निकलते हुए कहा - ये रहा हम लोगो का ऑटो... अब हमें किसी के आगे हाथ नहीं फ़ैलाने पड़ेंगे.

हिना आगे बाद कर ऑटो को छूने लगी, और ड्राइवर सीट में बैठ गयी. सलीम वहीँ खड़ा उससे बात कर रहा था.

इक़बाल ने सुप्रिया के पास आते हुए कहा - कैसा लग रहा है ऑटो मैडमजी...

सुप्रिया ने त्योरियन छेड़ते हुए उसे देखा - मैंने रात को क्या कहा था...

इक़बाल है पड़ा - बस आखरी बार था आज... आखिर तुम्हे पहली सवारी बनाकर पूरा शहर घूमना है...

सुप्रिया ने धीरे से कहा - मैं कैसी लग रही हूँ... आपने कुछ बोलै नहीं...

पर इससे पहले इक़बाल कुछ कहता सलीम भी उस तरफ आ गया - क्या बात है भाभी जी... आप तोह बिलकुल चाँद का टुकड़ा लग रहे हो... लग रहा है ऑटो लेने की ख़ुशी में पूरा शहर रोशन हो गया हो.

सुप्रिया पोलाइट होते हुए बोली - आप भी न... कुछ भी बोलते हो...

सलीम ने एक मिठाई के डब्बे से एक पीेछे बर्फी का निकालते हुए सुप्रिया के आगे किया - ये लीजिये... मुँह मीठा कीजिये...

सलीम ने जबरदस्ती मिठाई सुप्रिया के मुँह में ठूस दी, उसकी उंगलियां सुप्रिया के होंठों से टकराती हुई पीछे गयी. जैसे hi उंगलियां उसके होंठों से टकराई, सुप्रिया के बदन में एक करंट सा दौड़ गया, एक्ससिटेमेंट का नहीं, बल्कि एक गहरी घिन्न का. उसने सलीम की और देखा, उसकी आँखें सुप्रिया के जिस्म के उतर चाडव पर घूम रही थी.

भले hi वह उसे भाभी भाभी कह रहा हो, सुप्रिया अब उतनी नादान नहीं थी. उसने अपनी जिंदगी में अब कई ऐसे मर्द देख लिए थे, और उनकी आँखों की भूक को पड़ना उसे अच्छे से आ गया था. राहुल से लेकर विक्रम तक, वह प्यार और हवस के कई रंग देख चुकी थी.

उसने इक़बाल की और देखा, समझने के लिए की उसने भी सलीम की उस नज़र को देख लिया था या नहीं. पर इक़बाल की नज़रें तोह बहार अपने ऑटो पर तिकी थी, जैसे अचानक से वह इस पल में सुप्रिया से भी ज्यादा कीमती हो गया हो.

सुप्रिया ने इक़बाल का ध्यान खींचते हुए पुछा - कितने का मिला? कितने के बाइक गहने?

इक़बाल - सलीम ने बात करके 80 में बात करवा दी... और गहनों के भी 40 मिल गए... सोना महंगा हो गया है न आजकल...

सुप्रिया - और बाकी चालीस?

इक़बाल - लोन ले लिया... वह भी सलीम ने दिलवा दिया...

सुप्रिया सवाल पूछे जा रही थी - कितने ब्याज पर?

सलीम मुस्कुराते हुए बोलै - ारी भाभी आप क्यों परेशान हो रही हो इस सब के बारे में...

सुप्रिया थोड़ी सख्त आवाज़ में बोली - क्यूंकि ये सब काफी ज़रूरी चीज़े है पता होना...

इक़बाल - 20 ताका पर...

सुप्रिया - 20%?

सलीम - हाँ... अब इससे काम क्या hi मिलता... ये भी मैंने hi करवाया है...

सुप्रिया को यकीं सा नहीं हो रहा था, ये काफी महंगा सा लग रहा था - इसका मतलब समझते हो न आप... 40 का 20% यानी की 8 हज़ार तोह साल का ब्याज hi भरना पड़ेगा...

सलीम ने इक़बाल की और देखा जैसे बोल रहा हो की भाभी इस सब पचड़े में क्यों पद रही है.

इक़बाल की शकल पर भी थोड़ी इर्रिटेशन आ गयी थी - चलो अंदर चलो... हो जायेगा सब... 15-20 तोह महीने के hi आराम से कमा लूंगा... जल्दी चूका दूंगा पूरा लोन...

सलीम - सही है भाई जान.... खूबसूरत होने के साथ साथ... भाभी कितनी समझदार और होशियार भी हैं...

सुप्रिया ने उसका कोई जवाब नहीं दिया, बस सीधे अंदर आ गयी. पता नहीं ये मर्दो को क्या हो जाता था की उन्हें अपने दोस्त की गन्दी नज़र नहीं दिखाई देती थी.

हिना जैसे hi चहकते हुए अंदर आयी, सलीम ने उसके सर पर हाथ फेरते हुए कहा - हिना... कैसा लगा अपने अब्बू का ऑटो...

हिना - बोहोत hi बढ़िया... मैं तोह आज hi इसमें घूमने जयुंगी...

इक़बाल - हाँ हाँ... बस खाना खा ले फिर चलते हैं...

हिना - और सलीम चाचू... आपने कहा था न आप मुझे यहाँ के बड़े से मेले ले जायेंगे...

सलीम - ले जायेंगे बीटा... बिलकुल... कल से आपके अब्बू ऑटो चलाएंगे और हम लोग मेले चलेंगे... क्यों भाभी जी... आप भी चलोगे न?

किचन से सुप्रिया की सख्त आवाज़ आयी - नहीं, मुझे घर के बहुत काम हैं. और हिना भी अपने अब्बू के साथ hi मेला जाएगी जब उनके पास टाइम होगा.

सलीम की मुस्कराहट थोड़ी काम हो गयी. उसे समझ आ गया था की सुप्रिया को फसाना इतना आसान नहीं होगा. पर इक़बाल ने बीच में बोल दिया - अरे मेरे टाइम का तोह अब पता नहीं होगा, जाने दो न इसे सलीम के साथ.

सुप्रिया किचन में कड़ी मुट्ठी बीचे रह गयी. उसे रुबीना की बात याद आने लगी. दो जवान लड़कियों का एक शहर में उस तरह रहना आसान नहीं था. उसे काफी स्ट्रांग बनना पड़ेगा उन दोनों के लिए.

कुछ देर बाद सलीम और इक़बाल बातें करते हुए खाना खाने बैठ गए और सुप्रिया और हिना ने उन्हें दाल चावल सब्जी और रोटी परोस दी.

खाने को देख कर सलीम बोलै - क्या मियाँ... आज के दिन भी एहि घास फूस खा रहे हो. आज तोह दावत बनती थी... शाही गोश्त की...

इक़बाल - हाँ हाँ... खाएंगे न... पर वह सब घर में सुप्रिया को नहीं पसंद तोह...

सलीम - ारी भाभी को क्या पसंद है क्या नहीं... ये तोह वक़्त बताएगा... शायद आज तक उन्होंने कोई बढ़िया गोश्त न खाया हो. वैसे भी... गोश्त खाने से hi बदन में जान आती है... आखिर इतना ऑटो चलाओगे तोह उसके लिए भी तोह जान चाहिए...

इक़बाल ने उसको आवाज़ नीचे करने का इशारा किया - रहने दे सलीम... जो है एहि बढ़िया है...

सलीम - अरे इक़बाल भाई, तुम तोह ऐसे डर रहे हो जैसे भाभी जी ने कोई पाबंदी लगा राखी हो. मर्द की कमाई और उसकी थाली, दोनों का फैसला मर्द को hi करना चाहिए. खैर, तुम्हारी मर्ज़ी.

सुप्रिया ने शायद उनकी बात सुन ली थी - सलीम भाई, बहार की दुनिया में भले hi मर्द सारे फैसले ले, पर घर में तोह औरतों की hi हुकूमत चलती है. आज hi साड़ी दावत कर लेंगे तोह लोन की किश्त कैसे चुकाएंगे.

कमरे में एक पल के लिए सन्नाटा छ गया. सलीम का निवाला हाथ में hi रुक गया. उसने उम्मीद नहीं की थी की सुप्रिया इतनी सीढ़ी और सख्त बात करेगी. उसने इक़बाल की तरफ देखा, पर इक़बाल भी ख़ामोशी से सुप्रिया की बात सुन रहा था.

सलीम मुस्कुराता हुआ बोलै - मान गया भाभी जी... आप तोह सच में काफी होशियार है. जितनी सीढ़ी दिखती है उतनी है नहीं.

पर उसकी बात में मुस्कराहट काम और चीड़ चिड़ापन ज्यादा था.

इक़बाल भी पहली बार सुप्रिया को इतने हक़ से सब कुछ बोलते सुन कर थोड़ा हैरान था, शायद कल रात ने सब कुछ बदल दिया था - छोड़ न ये सब... ये बता की कहाँ से शुरू करू?

सलीम - स्टेशन के बहार से बोहोत सवारी मिलती है...

इक़बाल - आज रात hi शुरू कर लू क्या?

सलीम - हाँ हाँ बिलकुल... जितनी जल्दी शुरू करेगा उतनी जल्दी लोन चुकाएगा... और घर की फिक्र मत करियो... मैं सब संभाल लूंगा यहाँ...

उसने सुप्रिया की और एक तीखी नज़र से देखा, जैसे बोल रहा हो की अब क्या जवाब देगी वह, अब तोह वह भी उसी की भाषा बोल रहा था.

सुप्रिया की आवाज़ थोड़ी सी लड़खड़ाई - आप... कल सुबह से शुरू कर लेना... आज काफी थक गए होंगे...

इक़बाल - नहीं... इसमें थकना क्या... बैठ कर गाडी hi तोह चलनी है...

सुप्रिया - हम आपस में बात कर ले पहले? मेहमानो के सामने नहीं...

मेहमान शब्द सलीम को किसी तलवार की तरह चुभा. उसने बर्फी का टुकड़ा थाली में रखा और उसकी मुस्कराहट बिलकुल गायब थी - सही कह रही है भाभी जी... तुम मियां बीवी तय कर लो कब से शुरू करना है... मैं चलता हूँ अभी... कुछ काम तोह फ़ोन कर लेना...

इक़बाल थोड़ा शर्मिंदा सा हो गया और सुप्रिया को टोकने hi वाला था की सलीम ने उसका कन्धा थपथपाया - चलो मैं अभी चलता हूँ... कल मिलते है...

सलीम के जाते hi घर में एक सन्नाटा सा हो गया. सुप्रिया प्लेट समेत रही थी तोह इक़बाल ने गुस्से में पर धीरे से कहा - तुमने उसे ऐसे क्यों कहा... बुरा मान गया वह... इतनी मदद करि है उसने मेरी... पता तोह है तुम्हे...

सुप्रिया झुनकी हुई थी और थोड़ा सा रुक गयी, प्लेट पर उसकी पकड़ मज़बूत हो गयी. वह चीख कर कहना चाहती की इक़बाल सलीम की नियत को नहीं समझ पा रहा है. पर उसकी आवाज़ नहीं निकल पा रही थी. ऐसा लग रहा था आज काफी दिनों बाद इक़बाल और उसकी लड़ाई हो रही हो, या शायद एक दुसरे को पूरी तरह पति पत्नी मैंने के बाद पहली बार.

उसकी आँखें भर आयी और वह गुस्से में थाली उठाते हुए वहां से हट गयी. वह किचन में कड़ी रो रही थी.

हिना जो फिर से टीवी देख रही थी वह भी समझ गयी थी की उसके अब्बू और सुप्रिया के बीच लड़ाई हुई है, पर वह समझ नहीं पा रही थी उसकी वजह क्या था.

बहार इक़बाल भी मुँह लटकाये बैठा था. आज उसने पहली बार सुप्रिया का ऐसा रूप देखा था, इतनी ज़िद्दी होते हुए, उसके दोस्त को ऐसे hi कुछ भी बोलते हुए. और फिर अब उनके बीच ये झगड़ा. कुछ समझ नहीं आ रहा था की इतना अच्छा दिन एकदम से कैसे बदल सा गया था.

जैसे तैसे उन दोनों के बीच के सन्नाटे में रात हुई और सोने की बारी आयी. कल रात जो सब ठीक हुआ था अब सब उन दोनों को बिगड़ा हुआ सा लग रहा था. इक़बाल को लगा उसे आज भी नीचे hi सोना चाहिए और जैसे hi उसने अपना गद्दा बिछाया, सुप्रिया बोल पड़ी.

सुप्रिया - क्या हुआ? आपने बोलै था न ऊपर सोयोगे आज से...

इक़बाल थोड़ा हैरान था - हाँ पर...

सुप्रिया एक ऐडा के साथ बीएड पर let-te हुए इक़बाल की और देखते हुए बोली - बाकी आपकी मर्ज़ी... आपको वैसे भी मेरी कहाँ सुन्नी है...

वह जिस आकर्षक पोज़ में अपने पेट के बल बीएड पर लेती थी उसे होश hi नहीं था की पीछे से उसकी टाँगे हवा में ऊपर होते हुए नंगी हो गयी थी.

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इक़बाल ने उसे टोकते हुए कहा - सुप्रिया... तुम्हारी टाँगे...

सुप्रिया को एकदम रीलीज़ हुआ की वह किस पोज़ में लेती थी. वह गुस्से में सीढ़ी हुई और तकिये पर पेट के बल लेट गयी. बिस्तर के बिलकुल बीच में, दोनों साइड जगह थी हिना और इक़बाल के लेटने के लिए.

हिना जल्दी से आकर सुप्रिया के लेफ्ट में लेट गयी - अब्बू... आप भी ऊपर hi सो जायो... नीचे पीठ दर्द करने लगेगी आपकी... और फिर कल से पूरा दिन ऑटो भी तोह चलाओगे...

इक़बाल - हाँ बेटी... ठीक है...

इक़बाल धीरे से बिस्तर पर आते हुए लेट गया, कोशिश करते हुए की सुप्रिया को न छुए. जगह काफी काम लग रही थी ऐसे सोने के लिए. इक़बाल सीधा लेता रहा और अपनी आँखें बंद कर ली. पर उसे नींद नहीं आ रही थी, पास में लेती सुप्रिया की बदन की खुशबू उसके अंदर कुछ भड़का सा रही थी.

सुप्रिया ज़रा सा हिली और हिना की तरफ और ज्यादा सरक गयी. इक़बाल ने उस तरफ देखा, सुप्रिया की पीठ उसकी तरफ थी, और उसका ब्लाउज और गोरी पीठ उसके बालों से ढकी हुई थी. इक़बाल की नज़र ज़रा सी नीचे सुप्रिया की गांड पर गयी. साड़ी में उसकी गांड एक डैम कास के बंधी हुई सी लग रही थी, और उसके शरीर के मोड़ साफ़ दिख रहे थे.

इक़बाल के लुंड ने हरकत करनी शुरू कर दी, और उसने हलके से अपने लुंड को सहलाया. यहाँ हिना के रहते हुए कुछ कर पाना काफी मुश्किल था, और ऊपर से सुप्रिया उससे गुस्सा भी तोह थी. जाने क्यों उसे भी सुप्रिया पर और भी गुस्सा आने लगा. आज का दिन मिला था उसे ऐसी साड़ी पेहेन्ने के लिए और फिर उससे लड़ने के लिए भी.

थोड़ी देर बीत गयी पर इक़बाल को नींद नहीं आ रही थी. उसका लुंड उसके पयजामे के अंदर बार बार उछाल सा रहा था. उसने दुबारा सुप्रिया की तरफ देखा, कमरे में अँधेरा था, पर बहार से आती हलकी सी रौशनी से सब कुछ साफ़ दिख रहा था. सुप्रिया की साड़ी उसके पैरो से थोड़ा ऊपर हो गयी थी और उसके गोर पतले पेअर बेहद नरम लग रहे थे. उसका मैं कर रहा था वह बस उन्हें अपने मज़बूत हाथों से जकड ले और हवा में उठा ले.

रात के सन्नाटे में हिना की तेज़ सांस लेने की आवाज़ आ रही थी. ज़रूर वह सो गयी थी, पर सुप्रिया अभी शायद जग रही थी. इक़बाल से अब और रहा नहीं गया, उसने सुप्रिया के बाल अपने हाथ से हलके से साइड करते हुए उसकी पीठ का नज़ारा लिया. और फिर आखिर उसकी पीठ पर अपना सख्त हाथ रखा.

सुप्रिया एक डैम जैसे बुरी तरह सिहर गयी और उसने पीठ और कंधे हिलाते हुए इक़बाल के हाथ को झटक दिया. इक़बाल का गुस्सा और तेज़ हो गया, एक तोह सुप्रिया ने उसे ऊपर सोने के लिए कहा था और अब अपने आप को छूने भी नहीं दे रही थी. आज तोह वह उसे छू कर hi मानेगा, उसने सोच लिया.

इक़बाल ने अपना हाथ आराम से सुप्रिया की पतली कमर पर रखा. सुप्रिया ने तुरंत अपना हाथ नीचे लाते हुए उसके हाथ को दूर झटक दिया. पर इस बार इक़बाल ने अपने दोनों हाथ सुप्रिया की और करते हुए उसे अपनी और खींचा.

सुप्रिया ने हलके से अपना चेहरा पीछे किया और कहा - चुप चाप सो जायो... मुझे छुओ नहीं...

लेकिन इक़बाल का जिस्म बुरी तरह मचल रहा था, उसने अपनी बाहें सुप्रिया की कमर पर लपेटी और उसके मुलायम पेट को सहलाने लगा. सुप्रिया ने अपनी आहों को रोकने के लिए अपने होंठ को ज़ोर से काँटा.

सुप्रिया ने फिर से उसके हाथों को हटाने की कोशिश करि - मैंने कहा न.. सो जायो...

इक़बाल ने अपनी ऊँगली उसके होंठों पर रख दी और अपना मुँह उसके कान के पास लाते हुए बेहद धीमी आवाज़ में बोलै - शहहह.... हिना जग जाएगी... बस थोड़ी देर करने दो न...

सुप्रिया का जिस्म उसका साथ छोड़ रहा था, पर उसने अपने चेहरे पर गुस्सा बनाये रखा. इक़बाल ने धीरे से सुप्रिया के पल्लू को अपने दांतों से पकड़ते हुए नीचे सरकाया और अपने हाथ उसके ब्लाउज के ऊपर पंहुचा दिया.

सुप्रिया ने अपनी आँखें बंद कर ली और अपने होंठ ज़ोर के भींच लिए ताकि उसके मुँह से ज़रा भी आवाज़ न निकले. इक़बाल उसके मम्मो को अपने बड़े हाथों से हलके हलके राउंड रहा था. उसने सुप्रिया को पकडे हुए अपनी और खींच लिया था और सुप्रिया की गांड इक़बाल के लुंड के उभर को महसूस कर पा रही थी.

उसको कुछ न बोलते देख इक़बाल ने उसकी चुप्पी को हाँ समझा और अपना एक हाथ नीचे लाते हुए उसकी साड़ी और पेटीकोट को थोड़ा नीचे सरका दिया, उसकी नंगी पीठ और हिप्स को महसूस करते हुए. सुप्रिया बुरी तरह मचल रही थी, पर इक़बाल ने उसे कास के पकड़ा रखा.

साड़ी और पेटीकोट नीचे सरकते हुए इतने नीचे हो गए थे की सुप्रिया की पंतय थोड़ी सी नज़र आने लगी थी.

सुप्रिया का बदन अब भी अकड़ रहा था, लेकिन उसकी साँसे तेज़ हो गयी थी. इक़बाल ने अपना एक हाथ सुप्रिया की कमर से आगे ले जाते हुए उसकी छूट की तरफ बढ़ाया. उसने सुप्रिया की पंतय के ऊपर से उसकी छूट पर अपनी ऊँगली से थपथपाया. सुप्रिया ने एक हलकी सी सिसकारी ली और अपनी टांगें कास ली.

इक़बाल ने अपनी ऊँगली से सुप्रिया की पंतय के ऊपर से hi उसकी छूट पर एक तेज़ का झटका दिया. सुप्रिया का बदन एक डैम करंट सा लगा और वह कांप उठी. इक़बाल ने उसकी पंतय को अपनी ऊँगली से रगड़ना शुरू कर दिया. सुप्रिया ने अपने होंठों अपने हाथ रख लिए ताकि आवाज़ न निकले.

इक़बाल ने सुप्रिया की छूट में ऊँगली डालने के लिए टांगें अलग करने की कोशिश की, लेकिन सुप्रिया ने टांगें ज़ोर के कास ली. इक़बाल ने अपनी टांगें सुप्रिया की टांगों के बीच घुसते हुए उन्हें ज़ोर से अलग कर दिया. सुप्रिया की टांगें एक डैम से खुल गयी और इक़बाल की ऊँगली तुरंत उसकी गीली पंतय के बीच में से उसकी छूट के छेड़ को महसूस करने लगा.

सुप्रिया ने कांपती हुई आवाज़ में कहा - क्या कर रहे है आप... हिना जाग जाएगी...

इक़बाल ने सुप्रिया के गर्दन पर अपना हाथ रख दिया और उसका चेहरा ज़ोर से अपनी तरफ पलटा - तोह छुप रह न बिलकुल... करने दे जो कर रहा हूँ...

सुप्रिया इक़बाल के इस रूप को अच्छी तरह जान चुकी थी गाँव में. दिन में जो आदमी उससे दूर कतराता था, रात में उसके बदन की खुस्भु से पागल हो कर एक जानवर सा बन जाता था. पर यहाँ ऐसे सब कुछ करना खतरे से खली नहीं था.

इक़बाल ने सुप्रिया की छूट को पंतय के ऊपर से तेज़ी से रगड़ना शुरू कर दिया. सुप्रिया ने अपनी आँखें बंद कर ली और उसकी साँसे तेज़ हो गयी. उसने अपने उँगलियों से चद्दर को पकड़ने के कोशिश करि पर वह उसके हाथ में नहीं आ रही थी. इक़बाल सुप्रिया की छूट को पंतय के ऊपर से hi baar-baar अपनी ऊँगली से रगड़ रहा था. सुप्रिया ने एक हलकी सी सिसकारी ली.

इक़बाल ने अपना हाथ वापिस पीछे लाते हुए उसकी पंतय को नीचे सरकाया और उसकी गोरी चिकनी गांड को बहार कर दिया. वह अपने पजामा में कैद अपने लुंड को सुप्रिया की गांड पर दबाने लगा.

सुप्रिया के पूरे बदन में जैसे करंट लगा. उसकी नंगी गांड और इक़बाल के लुंड के बीच अब सिर्फ एक पतला सा कपडा था. इक़बाल ने अपनी सख्त उँगलियों से सुप्रिया की गांड को मसला, उसकी गोल गोल गुम्बदों को मसलते हुए जकड लिया. सुप्रिया अपनी आँख बंद करके और अपनी सांस रोके लेती रही. उसका पूरा शरीर बेचैन होता जा रहा था. पर वह न तोह इक़बाल को रोक पा रही थी, न पूरी तरह अपने आप को उसको सौंप पा रही थी.

इक़बाल ने सुप्रिया की गांड को मसलते हुए अपनी ऊँगली सुप्रिया की गांड के दरार के बीच में घुसा दी. सुप्रिया एकदम उछाल सी पड़ी और उसने अपनी टांगें कास ली.

इक़बाल ने सुप्रिया का चेहरा अपनी और मोड़ा - क्या हुआ... अब मज़ा आ रहा है न...

सुप्रिया ने अपनी आँखें खोल कर इक़बाल को देखा. उसकी आँखों में गुस्सा और वासना दोनों साथ साथ चमक रही थी. इक़बाल ने फिर से धीरे से सुप्रिया की गांड की दरार में अपनी ऊँगली घुसाई और उसे धीरे से अंदर बहार करने लगा. सुप्रिया अपना मुँह पकडे हलके हलके सिसकियाँ लेती रही.

सुप्रिया ने धीरे से कहा - अब बस भी करो न... नहीं तोह मैं हिना को जगा दूंगी...

इक़बाल ने सुप्रिया की गांड से अपनी ऊँगली निकली और सुप्रिया के होंठों पर अपने होंठों रख दिए. सुप्रिया ने भी उसका साथ दिया. वह एक दूसरे के होंठों को चूसते रहे, हिना की तेज़ साँसों के बीच.

इक़बाल - मुझे झाड़ा दो न... ऐसे नहीं सो पायूँगा खड़े लुंड के साथ...

इक़बाल ने सुप्रिया का मुलायम हाथ पीछे अपने पयजामे की तरफ खींचा.

सुप्रिया ने अपनी बड़ी बड़ी आँखों से इक़बाल की और देखा, वह सच में सीरियस था क्या - पागल हो गए हो क्या... यहाँ...

इक़बाल ने उसका हाथ अपने लुंड पर रखते हुए ज़ोर के दबा दिया - सुप्रिया... बस थोड़ा सा... देखो न कितना तड़प रहा है... बस थोड़ा सा सेहला दो.

सुप्रिया ने कुछ देर तक सोचा, फिर धीरे से अपना हाथ से पयजामे के ऊपर से उसके लुंड पर घुमाया. इक़बाल ने अपनी पयजामे की नाडा खोल दिया और जल्दी से सुप्रिया के हाथ को अपने नंगे, गरम और सख्त लुंड पर रख था. इक़बाल ने सुप्रिया का हाथ को पकडे हुए अपना लुंड सेहलवा रहा था.

इक़बाल ने फुंकार भरी - सेहलायो न...

सुप्रिया ने अपनी आँखें बंद कर ली. उसने धीरे से इक़बाल के लुंड को सहलाना शुरू कर दिया. इक़बाल ने सुप्रिया के मम्मो को अपने हाथों से मसला और सुप्रिया को चूमने लगा. सुप्रिया ने भी इक़बाल के लुंड को तेज़ी से सहलाने लगी.

इक़बाल ने उसके कान में कहा - हाँ... ऐसे hi... और तेज़...

सुप्रिया ने अपनी स्पीड और तेज़ कर दी. इक़बाल ने भी अपनी ऊँगली सुप्रिया की छूट पर लगते हुए अंदर घुसा दी और उसे अंदर बहार करने लगा. सुप्रिया ने एक ज़ोर की सिसकारी ली.

इक़बाल ने फिर से उससे बोलै - क्या कर रही हो... हिना जग जाएगी...

सुप्रिया ने भी घूर कर देखा - मैंने क्या किया... आप कर रहे हो जो कर रहे हो...

सुप्रिया का हाथ लुंड पर और तेज़ी से घूम रहा था, ऐसा लग रहा था लुंड की नसे फूले जा रही थी और किसी भी पल फट सकती थी. इक़बाल ने सुप्रिया के होंठों पर अपना हाथ रख दिया ताके उसकी आवाज़ काम कर सके.

इक़बाल - चल अब जल्दी से झाड़ा दे मुझे...

सुप्रिया की आँखों में एक अजीब सी चमक थी, गुस्से और वासना का एक अजब मेल. वह इक़बाल के लुंड को अब सेहला नहीं रही थी, बल्कि पूरे जोश से हिला रही थी. उसके हाथ की रफ़्तार देख कर इक़बाल का बुरा हाल हो गया था. उसकी साँसे फूलने लगी, वह सुप्रिया के कान में धीरे से कराहने लगा - हाँ... ऐसे hi... बस थोड़ा सा और... और तेज़... मज़ा आ गया...

सुप्रिया ने अपनी स्पीड और बढ़ा दी. इक़बाल का लुंड उसके हाथों में एक गरम लोहे की तरह मचल रहा था. इक़बाल ने अपनी आँखें बंद कर ली और सुप्रिया की कमर को अपने हाथों से कास के पकड़ लिया. उसके शरीर में एक गजब के एहसास की लहर दौड़ रही थी.

अंदर से गरम लावा निकलने का एहसास होते hi उसने सुप्रिया के कान में ज़ोर से कहा - सुप्रियाआ....

और फिर उसका लुंड एक डैम झटके से फूल कर सुप्रिया के हाथों में बहक गया. उसका गरम माल सुप्रिया की उँगलियों और उसकी गांड पर तेज़ी से जाकर निकला. सुप्रिया ने अपना हाथ तुरंत रोक दिया और हटाने की कोशिस करि. पर इक़बाल ने उसकी कलाई को पकडे रखा, अपने लुंड पर थोड़ी और देर, उसे सहलाते हुए.

सुप्रिया ने कुछ नहीं कहा. जैसे hi इक़बाल ने अपनी पकड़ ढीली करि, उसके अपने हाथ पर लगा सारा माल उसकी शर्ट से पॉच दिया. वह धीरे से अपना अपनी तरफ पलट गयी और अपनी पंतय और पेटीकोट को ऊपर खींचने लगी. उसका सारा माल उसके कपड़ो पर लग चूका था, पर उसे जैसे फिक्र hi नहीं थी.

इक़बाल ने सुप्रिया की गांड पर एक हाथ रख दिया और उसे अपनी तरफ खींच लिया. सुप्रिया ने अपनी आँखें बंद कर ली, उसके चेहरे पर एक मुस्कराहट वापिस आ गयी थी. इक़बाल ने सुप्रिया की गर्दन पर एक छोटा सा किश किया. सुप्रिया ने भी उसका साथ दिया और अपनी गांड उसकी तरफ खिसका दी, बिलकुल उससे चिपकते हुए.

वह एक दुसरे से चिपके रहे, रात भर, जैसे पहली बार कर रहे हो ये सब. शाम का गुस्सा जैसे ख़तम सा हो गया था, वह दोनों भूल गए थे की वह गुस्सा भी किस बात पर थे, बस महसूस हो रही थी तोह एक दुसरे के जिस्म की गर्मी.
 
थैंक यू मोर्बियस. ी मिस्ड योर एनालिसिस. गुड तो सी यू सुमरीज़े थे चरक्टेर्स. सम डेज बैक ी पूत थे के थिंग्स इन माय स्टोरी इन ा ै चाट एंड आईटी गावे में ा गुड समरी ऑफ़ थे स्टोरी. ी विल आल्सो शेयर तहत अस वेल.

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ी आल्सो रोट अबाउट टेकिंग ा ब्रेक फ्रॉम थिस स्टोरी इन जनुअरी.

ी होप तो के बैक एंड व्रिठे मोरे इन मई एंड कंटिन्यू थे स्टोरीज.
 
हैवे स्टार्टेड राइटिंग थे अपडेट टुडे, होपफ़ुल्ली विल पोस्ट बी टुमारो. लास्ट मंथ एंड ा हाफ वास् वैरी क्रेजी फॉर वर्क विथ हार्डली अन्य टाइम.

ी होप तो व्रिठे ा बिट मोरे फॉर थिस स्टोरी बूत मय्बे नॉट अस रेगुलर अस बिफोर. ी हद स्टार्टेड राइटिंग ानोथेर स्टोरी ऑफलाइन बैक इन फेब्रुअरी एंड मार्च एंड विल तरय तो कंटिन्यू विथ तहत. तहत स्टोरी इस टर्निंग आउट तो बे रियली गुड एंड इतस नॉट वैरी सेक्सुअल बूत ा ग्रेट स्टोरी. होप तो पोस्ट आईटी इन थिस फोरम सम डे.

तो अवॉयड स्क्रूटिनी फ्रॉम एवरीवन, ी हद आल्सो स्टार्टेड ा नई अकाउंट बैक इन जान / फेब तो व्रिठे सम डिफरेंट स्टोरीज. ी आल्सो वांट तो कंटिन्यू ठोस स्टोरीज. थे अरे ा बिट डिफरेंट स्टोरीज एंड नॉट मान्य पीपल रीड थम बूत that's फाइन. थे हैवे माय डिस्टिंक्टिवे राइटिंग स्टाइल.

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अपडेट 113

सुबह हुई और इक़बाल की आँख खुली तोह बिस्तर पर न तोह सुप्रिया थी और न hi हिना. उसकी नज़र कड़ी की तरफ गयी तोह 8 बज चुके थे. उसे समझ नहीं आया की वह इतनी देर कैसे सो गया. तभी अचानक पिछली रात की बातें उसके अंदर एक आग लगाने लगी.

कल रात को जो हुआ, वह किसी सपने से काम नहीं था. एक हसीं सा सपना जो अधूरा सा रह गया था. सुप्रिया के कोमल कोमल हाथ उसके लुंड को घिसते हुए, उसके जिस्म की नर्माहट, उसके गुलाब जैसे होंठ, सब कुछ सोचते hi इक़बाल का लुंड फिर से फूलता जा रहा था.

पर बहार से आ रही रौशनी और शोर उसे उसकी जिम्मेदारी का एहसास करा रहा था. आज उसका काम का पहला दिन था और वह अभी से लेट हो चूका था. इक़बाल तेज़ी से खड़ा हुआ और उस कमरे बहार की तरफ निकला.

बहार नीचे ज़मीन पर सुप्रिया बैठी सब्जी काट कर रही थी. इक़बाल को देखते hi उसके चेहरे पर एक बड़ी सी मुस्कान आ गयी.

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इक़बाल ने उसकी तरफ देखा, वह बेहद खूबसूरत लग रही थी. बाल हलके से गीले जैसे थोड़ी देर पहले hi नाहा कर आयी हो. एक टाइट सी सलवार कमीज में फसे हुए उसके मम्मी. कमीज की बाहें काफी ऊपर तक थी, जिससे उसके गोर मुलायम हाथ साफ़ दिखाई दे रहा थे. उसे इस तरह बैठे देख कर इक़बाल एक पल के लिए सब कुछ भूल गया.

सुप्रिया ने अपना गाला साफ़ करते हुए कहा - हम्म्म... उठ गए आप?

इक़बाल ने उसकी तरफ ललचायी नज़रों से देखा, पर फिर अपनी आवाज़ थोड़ी सख्त करते हुए बोलै - हाँ... तुमने उठाया क्यों नहीं... इतनी देर हो चुकी है.

उसकी सख्त आवाज़ सुन कर सुप्रिया का मुँह थोड़ा उतर सा गया और आवाज़ लड़खड़ा सी गयी - मुझे लगा... मुझे लगा... आपको सोना होगा अभी... रात को... जगे हुए थे... काफी देर तक... थके हुए होंगे....... आज रात से नहीं करने दूंगी कुछ.

सुप्रिया ने नाराज़ होते हुए अपना मुँह नीचे कर लिया.

सुप्रिया की नाराज़गी देखते हुए इक़बाल ने अपनी आवाज़ थोड़ी सॉफ्ट की और सुप्रिया की तरफ बड़ा - थकने कहाँ दिया तुमने कल रात... सब कुछ अधूरा सा लग रहा था, शायद वही पूरा कर रहा था सपने में.

सुप्रिया ने शरमाते हुए अपनी आँखें नीचे hi राखी.

इक़बाल ने इधर उधर देखा, आज घर इतना खाली से कैसे था - हिना... हिना कहाँ गयी? नाहा रही है क्या?

सुप्रिया - नहीं... मैंने उसे दूध ब्रेड लेने पास की दुकान पर भेजा है...

इक़बाल - उसे क्यों भेजा?

सुप्रिया - आप सो रहे थे, और या तोह वह जाती या मैं... अगली बार मैं चली जयुंगी...

इक़बाल - नहीं नहीं... तुम नहीं...

इक़बाल ने बहार के दरवाज़े की तरफ देखा, वह अभी भी बंद था. उसकी सांसें तेज़ हो गयी और पूरा शरीर हिलने लगा, जैसे पूरे शरीर को पता चल गया हो की अभी एक बेहतरीन मौका मिला था कुछ करने का.

इक़बाल - सुप्रिया... सुनो ज़रा... एक बार अंदर कमरे में आना?

सुप्रिया ने इक़बाल की तरफ देखते हुए कहा - क्यों? मैं अभी काम कर रही हूँ...

इक़बाल - बस एक बार कपडे निकालने में मदद कर दो... आज पहला दिन है न मेरा...

सुप्रिया मुस्कुराते हुए कड़ी हुई, और इक़बाल को उसकी कमीज के अंदर उसके गोर मम्मो की एक झलक दिखाई दी. कितनी दिन हो गए थे उनको देखे हुए, और अब तक तोह उसका मैं के सारे अरमान भी पूरे नहीं हुए थे उनको लेकर.

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सुप्रिया आगे आगे और इक़बाल उसके पीछे पीछे कमरे में दाखिल हुए इक़बाल ने जल्दी से कमरे का दरवाज़ा ढाल दिया.

सुप्रिया तेज़ी से पलटी और इक़बाल की तरफ सवाल भरी आँखों से देखा - क्या हुआ? दरवाज़ा क्यों बंद कर दिया?

सुप्रिया की आँखों की चमक उसके ऊपर बिजलियाँ गिरा रही थी. कितना खुशकिस्मत था वह की दुनिया की सबसे खूबसूरत लड़की उसकी थी.

इक़बाल तेज़ी से सुप्रिया के ऊपर झपटा और अपना हाथ उसके कमीज में घुसते हुए, उसकी ब्रा को थोड़ा सा नीचे धकेलते हुए, सीधा उसके उसके मम्मो पर रख दिया.

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सुप्रिया के मुँह से एक ज़ोर की चीख निकल गयी - अह्ह्ह्ह... ये क्या कर रहे हो आप... छोडो न...

इक़बाल की उँगलियों में सुप्रिया की नरम चूची आ गयी और उसने उसे हलके से मसला. चूची एक अंगूर के दाने की तरह एक डैम नरम थी, जैसे अभी नींद से जाएगी न हो. अपनी सॉफ्ट सी चूची पर इक़बाल की उंगलियां जैसे hi ठहरी, सुप्रिया की सिसकियाँ निकलने लगी. वह सिसकियाँ इक़बाल के कानो में पड़ते hi उसे बुरी तरह मदहोश करने लगी. सुप्रिया के चेहरे पर शर्म और ख़ुशी का एक अजीब सा मिश्रण था और उसने अपने होंठ अपने दांतों में भींच लिया.

इक़बाल ने अपनी पूरी मुट्ठी मम्मी पर रखते हुए उसे ज़ोर से दबाया.

सुप्रिया ने सिसकी लेते हुए इक़बाल के कंधे पर हाथ रखा - उफ्फ्फ... अह्ह्ह्ह... क्या कर रहे हो... हिना आने hi वाली होगी... जाने दीजिये न...

उसके शब्द उसके शरीर का साथ नहीं दे रहे थे, और वह बुरी तरह मचलने लगी.

इक़बाल ने अपना मुँह उसके कान के पास ले जाके कहा - ऐसा मौका काम hi मिलता है, ऐसे कैसे जाने दू... जब वह आएगी तब देखेंगे.

उसकी आवाज़ में एक अजीब सा जादू था जिसे सुप्रिया को अपनी आँखें बंद करने मजबूर कर दिया.

इक़बाल ने सुप्रिया को अपनी तरफ खींचा और उसकी गर्दन को चूमने लगा. उसके अंदर का जानवर कह रहा था की वह अभी सुप्रिया को पूरी तरह नंगा करके छोड़ना शुरू कर दे. पर वह जानता था की यह अभी मुमकिन नहीं था. जितना मुमकिन था, वह किसी चोरी से काम नहीं लग रहा था.

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उसका बदन गरम हो रहा था और उसने अपने हाथ को इक़बाल के बालों में घूमते हुए उसे अपने पास खींचना शुरू किया. इक़बाल ने सुप्रिया को कास कर अपनी बाहों में भर लिया. उसकी साँसों की गर्मी सुप्रिया के गालों पर महसूस हो रही थी. दोनों की धड़कने एक साथ तेज चल रही थी.

तभी बहार से दरवाज़ा खुलने की और साथ hi हिना की ज़ोर की आवाज़ आयी - चची! लो मैं सामान लेकर आ गयी!

यह सुनकर दोनों के बदन से जान निकल गयी. सुप्रिया झटके से इक़बाल से अलग हुई और अपने कपडे ठीक करने लगी. इक़बाल ने भी अपने आप को संभाला और पीछे होता हुआ पलंग पर बैठ गया.

हिना सुप्रिया को ढूँढ़ते हुए आवाज़ देने लगी - चची.... चची... कहाँ हो...

उसने एक झटके से कमरे का दरवाज़ा खोला और पाया की सुप्रिया कमरे में राखी अलमारी में कुछ ढूंढ रही थी और इक़बाल अभी भी बिस्तर पर लेता हुआ था, उसकी आँखें बंद थी.

हिना - चची... यहाँ हो आप. क्या हुआ दरवाज़ा कैसे बंद कर लिया आपने? और अब्बू अभी भी सो रहे हैं?

सुप्रिया - हाँ... वह मैं... कपडे बदल रही थी... इसलिए...

हिना - पर आपने तोह एहि कपडे पहने थे जब मैं गयी थी... और यह तोह सुबह hi नए पहने थे...

सुप्रिया - ारी कुछ गिर गया था, पर चल ठीक है... अभी नहीं बदलती... तू भी सब कुछ इतने गौर से देखती है न...

हिना सुप्रिया के थोड़ा पास आयी और धीरे से फुसफुसाई - वैसे आप कपडे न hi बदलो... आज इन कपड़ों में बोहोत hi कमाल की लग रही हो...

सुप्रिया शरमाते हुए मुस्कुरायी - अच्छा जी... और कुछ?

हिना हिचकिचाते हुए बोली - हाँ... और आप... वैसे... अब्बू के सामने... कपडे बदल लेते क्या?

सुप्रिया ने उसके शरारत भरे चेहरे की तरफ देखा और हलके से उसका कान पकड़ा - यह सब बातें कैसे सूझती है तुझे... चल नाश्ता बनाना है न...

इक़बाल को लेते हुए सब सुनाई दे रहा था और उसके चेहरे पर एक हलकी सी मुस्कान आ गयी. उसने आँखें मलते हुए उठने का नाटक किया.

इक़बाल - हिना... बीटा... क्या वक़्त हो गया...

हिना - अब्बू... सुबह हो गयी... लगभग 8.30...

इक़बाल - उफ्फ्फ... जगाया क्यों नहीं मुझे...

इक़बाल जल्दी से खड़ा होता हुआ घर के छोटे से ग़ुसलख़ाने में घुस गया. उसका लुंड अभी भी पूरी तरह खड़ा था और वह उसे बहार निकालते हुए मसलने लगा. उसने दिलो दिमाग में अभी भी सुप्रिया की खुशबू hi छायी हुई थी. जब तक वह अपने लुंड को शांत नहीं कर लेता, तब तक उसे पता था की वह किसी और बारे में सोच भी नहीं पायेगा.

वह अपने लुंड को ज़ोर ज़ोर से रगड़ने लगा, मैं में बस एक hi ख्याल की काश इस वक़्त ये लुंड सुप्रिया के मुँह में होता न की खाली हवा में झूलता हुआ. सुप्रिया के गरम मुँह में अपना गरम माल निकालने में एक अलग hi मज़ा आता.

उसे ज्यादा म्हणत नहीं करनी पड़ी और यह ख्याल आते hi उसके अंदर का माल ज़ोर से बहार फट कर निकला. इक़बाल ने एक सुकून बड़ी सांस ली, उसका शरीर ढीला पड़ता जा रहा था और अंदर की कैद गर्माहट बहार निकल रही थी. इक़बाल ने अपने तत्तो को पकड़ते हुए अपना लुंड पूरी तरह खाली कर दिया.

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इक़बाल नाहा कर बहार निकला तोह देखा की बिस्तर पर एक पंत शर्ट उसके लिए तैयार राखी थी. वह उसे पेहेन कर बहार आया तोह हिना नीचे बैठी नाश्ता कर रही थी. सुप्रिया शायद रसोई में थी.

इक़बाल ने हिना की तरफ देखते हुए पुछा - तेरी चची कहाँ है?

हिना ने भरे हुए मुँह से कहा - रसोई में... चाय बन रही है...

इक़बाल - और तू क्या पी रही है?

हिना - मैं चाय नहीं पीती... मैं तोह ढूढ़ पी रही हु...

इक़बाल - अच्छा... देखु ज़रा... की मुझे दूध क्यों नहीं मिल सकता...

इक़बाल उसके सामने से निकलता हुआ रसोई में आया, सुप्रिया की पीठ उसकी तरफ थी और उसका पूरा ध्यान स्टोव की तरफ था. इक़बाल पीछे से आते हुए सुप्रिया के ठीक पीछे खड़ा हो गया. आज तक उसने कभी ऐसा नहीं किया था. सुप्रिया उसकी बीवी थी, और इस छोरी छुपे के खेल में कितना मज़ा सा आ रहा था. सुप्रिया इक़बाल को अपने ठीक पीछे महसूस कर चुकी थी पर वह मुड़ी नहीं.

तभी इक़बाल ने हिम्मत करते हुए उसे कास के अपने हाथों में जकड लिया.

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सुप्रिया बहार की तरफ देखते हुए तेज़ी से पीछे मुड़ी. इक़बाल ने एकदम से अपना हाथ उसके मुँह पर रख दिया और उसके माथे पर हल्का सा चूमा. और फिर अपने होंठों पर ऊँगली रखते हुए उसे चुप रहने का इशारा किया. सुप्रिया की घभराहट बाद रही थी, और उसकी निगाहें रसोई के बहार थी की कहीं हिना उन्हें ऐसे न देख ले.

इक़बाल ने धीरे से अपना हाथ उसके मुँह से हटाया.

सुप्रिया फुसफुसाते हुए गुस्से में बोली - आप बहार जायो न... मैं लाती हूँ नाश्ता... हिना वहीँ बैठी है... क्या सोचेगी...

इक़बाल - एहि की उसके अब्बू अंदर ढूढ़ लेने गयी है. मुझे भी चाय नहीं... दूध चाहिए... और वह भी ख़ास वाला....

इक़बाल ने सुप्रिया के मम्मो की तरह हाथ बढ़ाया पर इस सब सुप्रिया ने हाथ अपने तक पहुंचने से पहले hi झिड़क दिया.

सुप्रिया अपनी बौहें चढ़ाते हुए बोली - पता भी क्या बोल रहे हो. हिना एक जवान लड़की है... उस पर गलत असर पड़ेगा इस सब का... आप जायो अब...

इक़बाल ने अपना हाथ सुप्रिया की कमर पर रखा - कुछ पूरा नहीं हो पा रहा. जाने तुम्हारे साथ अकेले में वक़्त कैसे मिलेगा. गाँव में बस हम वह सब 2-3 बार hi तोह कर पाए थे. मुझे वही सब करना है तुम्हारे साथ... एक बार नहीं... हज़ार बार... हर रात... रोज़ रात... तुम.. और मैं...

सुप्रिया के चेहरे की शर्म बढ़ती जा रही थी - शठ.... बस कीजिये न...

इक़बाल - ऐसा करते है तुम मेरे साथ चलो... एक कमरे में 2-3 घंटे वही सब करेंगे... अच्छे से... तब जाकर सब शांत होगा मेरे अंदर...

सुप्रिया गुस्से में झल्लायी - पागल हो क्या! अभी कोई आमदनी तोह है नहीं... और हम बहार जाकर कमरे पर खर्च करेंगे ये सब... आप अभी बस अपने नए काम पर ध्यान दो... एक बार वह सब हो अच्छे से शुरू हो गया... तब जहाँ कहोगे वहां चल लुंगी आपके साथ.

तभी पीछे स्टोव पर चाय निकलने की आवाज़ आयी. चाय पतीले से बहार निकलते हुए स्टोव पर फ़ैल गयी थी.

सुप्रिया तुरंत मुड़ी और पतीले को स्टोव से उठा लिया - उफ्फ्फ.... देख no क्या किया आपने... सारा काम बड़ा दिया...

इक़बाल ने पीछे से उसके कंधे को पकड़ना चाहा पर सुप्रिया ने उसके हाथ को झिड़क दिया, और इक़बाल को घूर कर देखा. इक़बाल उसका गुस्सा और नहीं बढ़ाना चाहता था और वह रसोई से बहार आ गया.

हिना मुस्कुराते हुए बोली - क्या हुआ अब्बू? चची को गुस्सा क्यों दिला दिया आपने?

हिना शायद कान लगा कर उनकी बातें सुन रही थी.

इक़बाल - कुछ नहीं... मन कर दिया तेरी चची ने... लगता है चाय hi पीनी पड़ेगी...

कुछ पल बाद सुप्रिया तेज़ कदमो से रसोई से बहार निकली. उसके चेहरे पर नाराज़गी साफ़ दिख रही थी. उसने जल्दी से झुकते हुए इक़बाल के सामने चाय का कप और नाश्ता का प्लेट रख दी और अपने सीने को अपने हाथ से छुपाते हुए उसी तेज़ी से वापिस रसोई में चली गयी. इक़बाल को इस सब में कुछ तोह दिखा था, पर बस इतना की वह और बेकरार हो जाये.

हिना ने इक़बाल की तरफ देखते हस्ते हुए कहा - अब्बू... आपने तोह कल शाम की तरह चची को अच्छे से गुस्सा कर दिया... आज तोह मुझे उनका गुस्सा झेलना पड़ेगा.

इक़बाल ने हिना की तरफ देखा और मुस्कुराते हुए कहा - ऐसा कुछ नहीं... मेरे जाते hi सारा गुस्सा में चला जायेगा... चल तू अपना नाश्ता पूरा कर जल्दी से... और फिर टीवी देख ले...

हिना खुश होते हुए बोली - सच... सुबह सुबह टीवी!

टीवी के लालच से हिना की खाने की स्पीड तेज़ हो गयी. इक़बाल की नज़रें रसोई की तरफ hi तिकी हुई थी पर वह बहार नहीं आयी.

कुछ देर बाद अंदर से आवाज़ आयी - हिना... जब तुम्हारे अब्बू का नाश्ता हो जाये तोह उनकी प्लेट ले आना और यह टिफ़िन उन्हें दे देना...

इक़बाल को लग रहा था की शायद सुप्रिया अभी बहार hi नहीं आने वाली थी. इक़बाल थोड़ा सा मायूस होता हुआ खड़ा हुआ. उसने अंदर से अपना पर्स लिया और बहार आते हुए चप्पल पहनी. इतने में हिना अंदर से लंच का डब्बा ले आयी थी.

हिना उसके हाथ में डब्बा थमते hi तुरंत टीवी की तरफ लपकी और वही बॉलीवुड वाले गाने चला लिए.

बुझे मैं से बहार निकलते हुए इक़बाल ने एक आखरी बार रसोई की तरफ देखा. आज अपने नए काम के पहले दिन, वह जाने से पहले सुप्रिया को देखना चाहता था. नहीं तोह शायद आज उसका सारा दिन ख़राब होने वाला था.

सुप्रिया जैसे उसके मैं की बात को पढ़ते हुए धीरे से अंदर से रसोई की चौखट तक आयी. उसके चेहरे पर अब नाराज़गी नहीं, बल्कि एक दबी हुई सी मुस्कान साफ़ दिखाई दे रही थी. इक़बाल से आँखें मिलते hi उनसे अपनी आँखें शर्म से झुका ली.

इक़बाल उसे देख कर मुस्कुरा उठा और अब तस्सली से बहार की तरफ निकल पड़ा. उसने अपना ऑटो शुरू किया और स्टेशन की तरफ बड़ा लिया. आज पहले hi दिन वह काफी लेट हो चूका था, पता नहीं आज उसे कितना काम मिलने वाला था.
 
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इक़बाल के इंतज़ार में सुप्रिया की बेचैनी बढ़ती जा रही थी. बहार काफी रात हो चुकी थी और हिना भी सो चुकी थी. पर उसकी आँखों से नींद कोसों दूर थी. वह बार बार घर के छोटे से झरोखे से बहार की तरफ झांकती. पता नहीं क्यों उसका दिल घबरा सा रहा था. मैं में एहि ख्याल आ रहा था की अगर इक़बाल वापस नहीं आया तोह उनका क्या होगा.

तभी घर के सामने एक ऑटो के रुकने की आवाज़ आयी. दरवाज़े पर दस्तक होने से पहले hi सुप्रिया ने लपक कर घर का दरवाज़ा खोल दिया.

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सामने इक़बाल खड़ा था. उसके चेहरे पर दिन भर की थकान साफ़ थी, पर आँखों में एक अजीब सी चमक और मुस्कराहट भी थी. सुप्रिया को देखते hi उसने अपनी पीठ के पीछे छुपा हुआ एक छोटा सा मिठाई का डब्बा आगे कर दिया.

इक़बाल एक्ससिटेड होता हुआ बोलै - मेरा पहला दिन काफी अच्छा गया. यह लो, मुँह मीठा करो.

इक़बाल ने डब्बे में से एक बर्फी का टुकड़ा निकालते हुए सुप्रिया के होंठों के बीच में घुसा दिया. सुप्रिया ने जल्दी से बर्फी को अपने हाथ से पकड़ा और एक छोटी सी बाईट लेते हुए बाकी अपने मुट्ठी में भर ली.

इक़बाल - हिना कहाँ है... उसे भी तोह बुलायो?

दोनों घर के अंदर आ गए थे और सुप्रिया ने बहार के दरवाज़े की कुण्डी लगा दी - शहहह... वह सो गयी है...

इक़बाल की आँखों की चमक और तेज़ हो गयी - और भी बढ़िया हुआ...

इक़बाल की नज़रें सुप्रिया के पूरे शरीर को ऊपर से नीचे तक देख रही थी, और उसकी पंत में उसका लुंड कसने लगा था. उसने अपना एक हाथ सुप्रिया की ब्याह पर रखते हुए उसे कास के पकड़ लिया.

सुप्रिया ने जल्दी से अपने आप को छुड़ाते हुए कहा - मैं पानी लेकर आती हूँ...

सुप्रिया रसोई में गयी और कुछ पल वहां अपनी साँसों को काबू करने के बार पानी का एक गिलास लेकर बहार आयी. तब तक इक़बाल अपनी जेब खाली कर के नोट और सिक्के निकाल रहा था.

इक़बाल - पूरे शहर का चक्कर काटा है मैंने आज.

सुप्रिया ने पानी का गिलास इक़बाल के हाथ में दिया और उसकी नज़रें सीधे तख़्त पर बिखरे उन नोटों और सिक्को पर टिक गयी. उसके अंदर का अकाउंटेंट तुरंत जाग उठा था. उसने धीरे से पूछा - सब मिलकर कितना हुआ आज?

इक़बाल ने बड़े नाज़ से मुस्कुराते हुए कहा - पूरे दो सौ रुपये हैं! पहले दिन के हिसाब से बढ़िया है न?

यह सुनकर सुप्रिया के चेहरे की मुस्कराहट एकदम गायब हो गयी. उसने नोटों को ध्यान से देखते हुए कहा - दो सौ रूपए? पेट्रोल या संग भी भरवाया था क्या आपने आज?

सुप्रिया के उतरे हुए चेहरे को देख कर इक़बाल का जोश थोड़ा काम हो गया - नहीं... संग तोह सुबह सलीम ने भरवा दी थी, उसके पैसे तोह अभी देने है. क्या हुआ? तुम्हे काम लग रहा है क्या?

सुप्रिया गहरी सोच लिए वहीँ तख़्त पर बैठ गयी और नोटों को हलके से छूने लगी - मैं बस सोच रही थी की... इतनी कमाई से हम वह उधार कैसे चूका पाएंगे? यह तोह घर चलने के लिए भी काफी नहीं होंगे.

इक़बाल के चेहरे पर अब ख़ुशी पूरी तरह गायब हो गयी और उसकी जगह एक चिढ ने ले ली - मैंने कहा न, पहला दिन था... अब पहले hi दिन में हज़ार रूपए ले आता क्या?

सुप्रिया - इक़बाल जी... मैं तोह बस...

कमरे में तनाव इतना गहरा हो गया की मिठाई की मिठास फीकी हो चुकी थी. इक़बाल का चेहरा उतरा हुआ था, पर तभी उसने सुप्रिया की तरफ देखा. उसके जिस्म पर एक प्यारी सी साड़ी लिपटी हुई थी. सुप्रिया के जिस्म को देखते hi उसका मिज़ाज़ बदलने लगा. उसने मर्दानगी के साथ सुप्रिया का हाथ पकड़ लिया, और उसे अपनी तरफ खींचे लगा.

इक़बाल - इस सब के बारे में बात नहीं करते न अभी. जो सुबह अधूरा रह गया था, वही पूरा करते है न.

पर सुप्रिया का मैं इस समय कहीं और hi उलझा हुआ था. दिमाग में बहुत कुछ घूम रहा था - ऑटो का क़र्ज़, कमरे में गर्मी, सुबह से रात तक यूँ इक़बाल का इंतज़ार करना, सलीम की उस पर वह गन्दी नज़र... इस सब के बीच उसका बिलकुल मूड नहीं था कुछ करने का.

सुप्रिया ने हलके से इक़बाल का हाथ पकड़ा और अपने हाथ के ऊपर से हटा दिया - नहीं इक़बाल जी... इस वक़्त नहीं... मेरा दिमाग बहुत परेशान है अभी.

उसकी न सुनते hi इक़बाल के चेहरे पर गुस्सा और नाराज़गी साफ़ झलकने लगी - पूरा दिन म्हणत करके, थक कर आया हूँ... और तुम्हे यह पैसे काम लग रहे है तोह तुम मुझे मन कर रही हो? साफ़ साफ़ क्यों नहीं कहती की मैं तुम्हे अब छोटा लग रहा हूँ. तुम्हे पता था मैं कौन हूँ और क्या कमाता हूँ... मैंने तुमसे कोई जबरदस्ती नहीं की अपने साथ आने की.

यह कहते hi इक़बाल के अंदर की नाकामी का एहसास उसके गुस्से को और भड़काने लगा, और वह अपने होश ो हवास खोने लगा. उसने गुस्से में सुप्रिया का दूसरा हाथ भी कास के पकड़ लिया और उसके झटके से अपने पास खींचा, जैसे वह अपनी मर्दानगी उसे दिखाना चाहता हो. उसका चेहरा सुप्रिया के चेहरे के बिलकुल करीब था. उसने अपना एक हाथ सुप्रिया के कोमल से गालों पर रखते हुए उसे दबाया.

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सुप्रिया उसके शरीर से दिन भर के पसीने के बदबू को साफ़ सूंघ पा रही थी. उसके नरम हाथों पर इक़बाल की उँगलियों के निशाँ छपने लगे थे. एक पल के लिए उसे लगा की इक़बाल अपना आप खो कर उसे पर हाथ उठा देगा या फिर उसके साथ जबरदस्ती कुछ कर डालेगा. सुप्रिया बिलकुल सुन्न पद गयी, न तोह उसने अपना हाथ छुड़ाने की कोशिश की और न hi चीखने की. बस अपनी आँखें बंद कर ली.

इक़बाल ने उसके डरे हुए चेहरे की तरफ देखते हुए उसे एक धक्का देते हुए अपने से दूर किया. सुप्रिया लड़खड़ाती हुई तख़्त से हट कर कड़ी हो गयी.

सुप्रिया ने अपनी आँखें खोली तोह इक़बाल की गुस्से भरी आँखें अभी भी उसे घूर रही थी. इससे पहले वह अपनी सफाई में कुछ कहती, इक़बाल ने झटके से अपना मुँह दूसरी तरफ कर लिया. उसने तख़्त पर राखी एक चद्दर खींची और दीवार की तरफ मुँह करके लेट गया. उसके सांस लेने की भरी आवाज़ कमरे में गूँज रही थी.

सुप्रिया कुछ पल वहीँ कड़ी रही, इक़बाल की तरफ देखते हुए. उसकी हिम्मत hi नहीं हो रही थी की वह कुछ कहे या वहां से अंदर भी चली जाये. इक़बाल की पीठ उसके सामने किसी सख्त दीवार की तरह थी. उसके मैं में आया की वह इक़बाल के कंधे पर हाथ रख कर उसे बताये की वह उसकी म्हणत को छोटा नहीं समझती थी. पर इक़बाल के दिए हुए धक्के और भड़कती आँखों ने उसे पीछे हटने के लिए मजबूर कर दिया.

वह धीरे से मुड़ी और दबे पाँव अंदर के कमरे के पलंग पर जा लेती. उसने अपना हाथ अपने मुँह पर रख लिया ताकि वह अपनी सिसकी को दबा सके और साथ में सो रही हिना की नींद न खुले.

वह लेती हुई अपने आंसू पोंछते हुए अपना अतीत याद करने लगी. एक वह वक़्त था जब उसने ज़िन्दगी में कभी पैसे की चिंता नहीं की थी. उसका परिवार भले hi लोअर मिडिल क्लास hi था, पर उन्होंने कभी उसे इस बार का एहसास नहीं होने दिया था. उसकी कही हर चीज़ लाकर दी थी. और फिर अतुल, उसका पहला पति, एक बेहद सीधा साधा, शरीफ और अच्छा इंसान, जिसने उसे हर ढंग का आराम, इज़्ज़त और सुकून दिया था. यहाँ तक की इक़बाल के गाँव वाले घर में भी उसे कभी इस सब के बारे सोचना भी नहीं पढ़ा था.

पर बात शायद पैसो से ज्यादा कुछ और थी. इतना सब कुछ हो जाने के बाद भी इक़बाल उसे यह सब कैसे बोल सकता था. वह तोह शायद बस वह चीज़ें देख पा रही थी जो इक़बाल नहीं देख पा रहा था. पर शायद... गलती उसकी भी थी... आज इक़बाल का पहला hi तोह दिन था. उसे अपने बर्ताव में थोड़ी नरमी बरतनी चाहिए थी.

सुप्रिया ने सिसकियाँ रोकते हुए उन यादों को झटका और अपने आंसू साफ किये. उसने उन ख्यालों को दिमाग से किसी तरह निकाला, क्यूंकि अब उसकी हकीकत बदल चुकी थी और उसे इन्ही नए हालातो से लड़ना था.

अगले दिन भी सुबह सुबह उन दोनों के बीच बातचीत बिलकुल बंद hi थी. हिना अपने अब्बू से कल के बारे में सब कुछ पूछ रही थी, और सुप्रिया फुर्ती से किचन के अंदर बहार आ जा रही थी. इक़बाल का चेहरा थोड़ा लटका हुआ था, शायद रात की शर्मिंदगी और अपने आप पर गुस्सा आ रहा हो.

इक़बाल बार बार किसी बहाने से रसोई की तरफ देखता. सुप्रिया का बुझा हुआ चेहरा देख कर वह और भी परेशान होता जा रहा था. कल रात उसने सुप्रिया की आँखों में अपने लिए जो डर और नफरत देखि थी, वह उसे फिर कभी नहीं देखना चाहता था.

जैसे hi हिना नहाने के लिए घुसी, इक़बाल धीरे से रसोई की चौखट के बहार आ कर खड़ा हो गया. सुप्रिया बहार निकलना छह रही थी पर उसने उसका रास्ता रोक लिया. सुप्रिया ने अपनी आँखें ज़मीन पर टिकाये राखी.

इक़बाल ने थोड़ा रुक कर, अपनी भारी आवाज़ को थोड़ा नरम करते हुए कहा - सुप्रिया...

सुप्रिया का मुँह वैसे का वैसे hi नीचे देखता रहा.

इक़बाल ने एक कदम आगे बढ़ाया और धीरे से कहा - मुझे माफ़ नहीं करोगी क्या कल रात के लिए. पूरे दिन की थकान के बाद मेरा दिमाग काम नहीं कर रहा था. पर मुझे तुम्हारे साथ ऐसे पेश नहीं आना चाहिए था.

सुप्रिया ने धीरे से अपना सर उठाया. इक़बाल के चेहरे पर अब रात वाला गुस्सा बिलकुल नहीं था, वहां सिर्फ एक डर था, कुछ खो देने का डर. सुप्रिया भी बात को आगे नहीं खींचना चाहती थी.

सुप्रिया - मैं आपकी म्हणत को छोटा नहीं समझ रही थी. मैं बस आगे के हालत के बारे में सोच कर थोड़ा डर गयी थी.

उसकी नरम आवाज़ सुनते hi इक़बाल ने आगे बढ़ते हुए उसके नरम हाथों को अपने हाथों में ले लिया, और अपनी उंगलियां उसकी उँगलियों में फसा ली - मैं जानता हूँ, तुम्हारी बात गलत नहीं थी. मैं और म्हणत करूँगा, सब ठीक कर दूंगा. बस तुम परेशान मत हो.

सुप्रिया ने हलके से हाँ में सर हिलाया. इक़बाल ने उसके हाथ को एक बार हलके से दबाया, जैसे वह उसे भरोसा दिला रहा हो. सुप्रिया अपने आप को संभाले हुए थी की फिलहाल कुछ और न कहे.

उसने इक़बाल से अलग होते हुए उसके झोले में उसका खाना रखा और उसे पकड़ा दिया. इक़बाल धीरे से दरवाज़े की तरफ बढ़ गया. हिना तभी बाथरूम से बाल पोंछती हुई बहार निकली और इक़बाल को जाता देख दौड़ कर उनसे लिपट गयी.

इक़बाल ने अपनी जेब से कुछ पैसे निकालते हुए उसे दिए - यह लो... अपने लिए कुछ ले लेना... और अपनी चची के लिए भी.

उसने एक गहरी सांस ली और सुप्रिया की तरफ एक बार दुबारा देखते हुए घर से बहार निकल गया.

इक़बाल के जाने के बाद, घर में फिर वही खालीपन वापस आ गया था जिसे सुप्रिया पिछले एक महीने से महसूस कर रही थी. कुछ hi देर में हिना का टीवी चालू हो गया था और सुप्रिया भी काम करते हुए हलके हलके गाने गुनगुना रही थी.

यह एक छोटा सा पुराण कमरा था जो एक तंग गली के आखरी हिस्से में एक 3 मंजिला बिल्डिंग के ग्राउंड फ्लोर पर था. घर में घुसते hi एक छोटी सी जगह थी जहाँ एक लकड़ी का तख़्त रखा हुआ था. और ऊपर छत पर एक पुराण सा पंखा काफी आवाज़ करके धीरे धीरे चलता था. तभी यहाँ बहार कोई सो नहीं पाटा था, पर जाने कल रात कैसे इक़बाल ने यहाँ काट ली.

कमरे के एक हिस्से पर एक पर्दा लगा कर रसोई बना दी गयी थी. दूसरी और एक छोटा सा कमरा था जिसमे बस एक पलंग जितनी जगह थी, और साथ hi लगा हुआ एक पुराण सा टॉयलेट और बाथरूम.

हालाँकि जगह काफी छोटी थी और भीड़ भाड़ वाले जगह पर होने के कारन दिन रात शोर होता रहता था, पर सुप्रिया जितना हो सके इस छोटे से घर को रोज़ साफ़ करके सलीक़े से रखने की कोशिश करती थी.

सुप्रिया ने सफाई करते हुए अपने चेहरे को आईने में देखा. बिलकुल इस घर के उखड़ते हुए प्लास्टर की तरह, ऐसा लग रहा था जैसे उसके चेहरे का रंग और रौनक भी कहीं खो सी रही थी.

वह खोयी हुई अपने आप को देख hi रही थी की बहार की सीढ़ियों से किसी की तेज़ी से उतरने की आवाज़ आयी. सुप्रिया ने झरोखे से देखा तोह कोई आदमी बहार की तरफ जा रहा था.

उन्हें अब तक सही से पता नहीं चल पाया था की ऊपर और आजु बाजू कौन रहता था. इक़बाल ने उन लोगो को साफ़ बोल रखा था की वह दोनों घर में hi रहे और दरवाज़ा उसके इलावा किसी के लिए न खोले. कभी एक दूर बार जब उन्होंने इक़बाल के लिए दरवाज़ा खोला था या उसके साथ बहार गए थे, तोह सब शक्ल अजीब और अनजानी सी hi लगती थी.

सुप्रिया काम ख़तम होने के बाद एक कॉपी लेकर बैठ गयी और फिर से पैसों का हिसाब लगाने लगी. लोन के इंटरेस्ट और घर का किराया और बाकी सब खर्चे, वह फिर से सब लिखने लगी. उसने हिना की तरफ देखा, जिसके बराबर में hi इक़बाल का दिया हुआ 20 का नोट रखा था. मैं में एहि ख्याल आया की इक़बाल को उसे यह देने की क्या ज़रुरत थी.

वह कड़ी हो कर किचन तक आयी hi थी की हिना भी उसके पीछे पीछे आते हुए बोली - चची... अब्बू ने मुझे यह पैसे दिए हैं. मैं नुक्कड़ वाली दूकान से कुछ ले आयु?

सुप्रिया - तुम्हारे अब्बू ने बहार जाने के लिए भी तोह मन किया है? और वैसे भी क्या लायेगी वहां से?

हिना ने हाथ से इशारा करते हुए कहा - मैं बस यूँ जयुंगी और यूँ आयूंगी. बस एक चिप्स का पैकेट, उस दिन अब्बू लाये थे, बड़ा अच्छा लगा था, और कुछ टॉफ़ी गोली. आपको भी कुछ चाहिए क्या?

सुप्रिया ने मन करने का सोचा, पर हिना के मासूम और तरसे हुआ चेहरे को देख कर उसका दिल थोड़ा पिघल सा गया. वैसे भी इक़बाल तोह काफी लेट hi आने वाला था, तब तक तोह दुकाने भी बंद हो जाती थी - ठीक है, पर जल्दी से आ जाना. बीच में कहीं मत रुकना, और किसी से ज्यादा बात नहीं करना.

हिना खुश होते हुए जल्दी से दौड़ती हुई घर से बहार निकली. घर के बहार निकलते hi ऐसा लग रहा था जैसे वह किसी पिंजरे से रिहा हुई हो. उसने अपनी मुट्ठी में इक़बाल का दिया हुआ बीस का नोट कास के पकड़ा और दूकान की तरफ देखा.

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गली बेहद तंग और भीड़ भाड़ वाली थी. दोनों तरफ पुराने से दिखने वाले मकान ऊपर से गली को घेरे हुए थे. बची हुई कसार बिजली की तारो ने कर दी थी. हिना अपनी hi धुन में चल रही थी, बिना ये जाने की उसके बहार निकलते hi कितनी साड़ी निगाहें उस पर पर आ तिकी थी.

गली के मोड़ पर hi किराना की दूकान थी जहाँ इस वक़्त इतनी ज्यादा भीड़ नहीं थी. दूकान पर एक अधेड़ उम्र का आदमी बैठा हुआ था. जैसे hi हिना वहां पहुंची उसके पीछे do-teen और आवारा से दिखने वाले लड़के दूकान पर पहुंच गए. वह हिना से थोड़ा दूर दूकान के दुसरे छोर पर खड़े हुए उसे घूर रहे थे.

हिना को समझ नहीं आ रहा था वह उसे क्यों घूर रहे थे, क्या उसके कपड़ों पर कुछ लगा था. हिना ने अपने हाथ से अपने कपड़ों को झाड़ा.

तभी दूकानदार की कड़क आवाज़ आयी - ए... यहाँ क्या भीड़ जमा कर राखी है, कुछ लेना है या नहीं.

हिना एक पल के लिए सकपका सी गयी, पर फिर दुकानदार ने मुस्कुराते हुए उसकी तरफ देखा - अरे... बड़े दिनों बाद बहार निकली है तू. कहाँ रहती है? वह आखरी वाले मकान में न?

हिना ने दुकानदार की तरफ देखते हुए डरते डरते हाँ में सर हिला दिया. दुकानदार ऊपर सिर्फ एक बनियान पहने हुए था और उसका पेट भी काफी निकला हुआ था.

उसने धीरे से बीस का नोट दुकानदार की तरफ बढ़ा दिया - एक चिप्स का पैकेट देना, और वह 2 मीठी वाली गोली.

दूसरी तरफ एक लड़का ज़ोर से हँसा और बोलै - जग्गू चाचा... अभी से मीठी गोली चूसने की प्रैक्टिस कर रही है... इसको दो और दे दो मेरी तरफ से.

जग्गू ने उसे गुस्से से घूरा - कुछ भी बकवास करता है... चल फुट यहाँ से.

पर वह लड़का वहीँ खड़ा रहा.

हिना ने परेशान होते हुए अपनी आँख के कोने से उस लड़के की तरफ देखा. वह काफी गन्दी तरह से उसकी तरफ देख रहा था.

हिना को चुप देख उस लड़के की हिम्मत बढ़ सी गयी - अरे छोटी... चिप्स के पैकेट से क्या होगा. घर में जो भाभी रहती है... उनके लिए कुछ बड़ा और लम्बा सामान ले कर जा. उन्हें देख कर तोह लगता है की उन्हें बड़ा सामन hi पसंद आएगा.

हिना को उन सब का हसना और ऐसी बातें करना बिलकुल अच्छा नहीं लग रहा था. उसे समझ नहीं आ रहा था की घर में बंद रहने के बाद भी वह लोग सुप्रिया को कैसे जानते थे. हिना पसीने पसीने होने लगी और उसका दिल तेज़ी से धड़कने लगा था.

दूकानदार ने आखिर एक डंडा निकाला और उन लड़को की तरफ घूमते हुए उन्हें अपनीक दूकान से दूर किया. वह फिर अपने काउंटर पर हाथ टिकते हुए हिना की तरफ झुका.

उसके लड़कों को भागने से हिना के चेहरे पर एक पल के लिए ख़ुशी वापस आ गयी थी.

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हिना - थैंक यू चाचा जी...

जग्गू - कोई नहीं बिटियन... साले आवारा लड़के है. जगन नाम है मेरा... पर सब जग्गू चाचा बुलाते है... और तेरा?

हिना ने धीरे से कहा - हिना...

जग्गू - हिनाआ.... बड़ा प्यारा नाम है... इक़बाल की बेटी है न तू... जिसने अभी अभी वह नया ऑटो लिया है.

हिना ने धीरे से हाँ में सर हिला दिया.

जग्गू ने हिना को ऊपर से नीचे घूरते हुए देखा - और कौन कौन है घर में... एक और लड़की भी तोह रहती है तेरे घर में... तेरी बड़ी बेहेन है क्या?

हिना थोड़ा घबरा गयी. उसे याद आया की चची ने किसी से ज़्यादा बात करने को मन किया था. पर जग्गू की नज़र उस पर तिकी हुई थी, उसने बिना सोचे समझे कह दिया - नहीं... वह मेरी चची हैं...

जग्गू के होठों पर जमी मुस्कराहट थोड़ी और गहरा गयी. उसने दुकान के काउंटर पर लगे लकड़ी के फटते पर थोड़ा और आगे झुकते हुए हिना के सामने चिप्स का पैकेट और वह टॉफ़ी लहराई - अच्छा... चची है तेरी? बड़ी अलग सी लगती है तेरी चची. काम hi देखा है उन्हें, पर काफी टाइट सी साड़ी पहनती है, और किसी बड़े शहर की लगती है. बिलकुल गोरी सी, पड़ी लिखी. चची यहाँ अकेले क्यों रहती है? चाचा कहाँ है? शहर में?

हिना का जिस्म बिलकुल ठंडा पड़ने लगा था. उसे समझ नहीं आ रहा था की यह आदमी सुप्रिया के बारे में इतने सवाल क्यों कर था. उसे सुप्रिया की कही बात फिर से याद आ गयी और उसने जल्दी से जग्गू के हाथ से सामान ले लिया.

हिना जल्दी से मुड़ते हुए बोली - मुझे नहीं पता... मुझे जाना है...

जग्गू ने तुरंत हाथ आगे करके हिना के कंधे पर हाथ रख दिया - अच्छा सुना तोह... बुरा क्यों मान रही है... मैं तोह बस ऐसे hi पूछ रहा था. अपनी चची से कहना की यहाँ हर तरह का सामन मिलता है. किसी चीज़ की ज़रुरत हो तोह बता दे, मैं खुद आ कर दे जायूँगा. और तुझे भी कुछ चाहिए तोह मुझे बता दियो.

हिना बिना उसकी तरफ देखा जल्दी से वहां से निकल गयी. पीछे शायद वह आवारा लड़के फिर से दूकान पर पहुंच गए थे. उसके कानो में अभी भी उनकी बातें पद रही थी.

लड़का - लगता है इस बाप इसकी चची को भगा लाया है...

दूसरा लड़का एक कदम और आगे बढ़ कर बोलै - ऐसी चची को तोह मैं भी भगा लाता... क्या किस्मत है उस ऑटो वाले की... मस्त चुदाई चल रही होगी रोज़ रात इनके घर में तोह... काश हमारी ऐसी किस्मत होती.

लड़का - मुझे तोह यह भी चलेगी... इसकी गांड को बड़ा करने में काफी मज़ा आएगा.

हिना तेज़ क़दमों से अपने घर की तरफ जा रही थी. उनकी यह अश्लील और गन्दी बातें हवा में तैरती हुई हिना के कानो में पद रही थी. उसके अंदर एक अजीब सी घिन्न सी भर रही थी. उसका पूरा चेहरा लाल पद चूका था.

घर के दरवाज़े पर पहुन्ग्ते hi उसने पूरे ज़ोर से दरवाज़ा अंदर की तरफ धकेला और जल्दी से अंदर घुस कर कुण्डी लगा दी.

सुप्रिया सामने hi तख़्त पर बैठी थी और हिना का उखड़ा हुआ चेहरा देख कर उसने पूछा - हिना? क्या हुआ? इतना घबराई हुई सी क्यों लग रही है?

हिना ने कुछ नहीं कहा, उसने बस झटके से वह चिप्स का पैकेट और बचे हुए पैसे तख़्त पर फेके और दौड़ कर सुप्रिया के पेट से लिपट गयी. उसकी छोटी सी जान डर के मारे बुरी तरह कांप रही थी.

सुप्रिया ने उसे बाहों में भरते हुए उसकी पीठ को थपथपाया - ारी क्या हुआ? कुछ बोलोगी भी...

हिना हलके से सुबकते हुए बोली - अब्बू... अब्बू... हमें... यहाँ क्यों लेकर आये? इससे तोह अच्छा हम अपने घर पर hi थे... गाँव में...

सुप्रिया उसकी पीठ को मसलते हुए उसे दिलासा देने में लग गयी, पर शायद उसे भी बिलकुल वैसा hi लग रहा था, की वह यहाँ क़ैद से hi हो चुके थे.
 
अपडेट 115

हिना जब से दूकान से लौटी थी, एक कोने में सिमटी हुई बैठी हुई थी. सुप्रिया ने काफी देर उसे तक उसे अपने से चिपकाये रखा, पर उसका दिल फिर भी शांत नहीं हो रहा था. हिना की मासूमियत पर इस मोहल्ले की गन्दी नज़र पद चुकी थी, और यह चीज़ सुप्रिया को और भी परेशान किये जा रही थी. उसने मैं hi मैं ठान लिया था की उसे अब क्या करना था.

रात के करीब 10 बजे, बहार ऑटो के रुकने की आवाज़ आयी. इक़बाल वापस आ गया था.

दरवाज़ा खोलने से पहले सुप्रिया ने एक बार फिर हिना की तरफ देखा, जैसे उसे याद दिला रही हो की उन लोगो ने दिन में क्या बात करि थी. वह नहीं चाहती थी की हिना इक़बाल को इस बारे में कुछ भी बताये. वह दोनों उसके गुस्से से अच्छे से वाक़िफ़ थे, और नहीं चाहते थे की एक बार फिर उसके गुस्से की वजह से उन्हें यहाँ से भागना पड़े.

दरवाज़ा खुला और इक़बाल अंदर आया. आज उसके चेहरे पर कल जैसा गुस्सा नहीं था, बल्कि एक थकी हुई ठंडक थी. उसने आते hi झोले को मेज़ पर रखा और तख़्त पर बैठ गया. सुप्रिया ने कल से अपनी पिछली गलती से सीख ली थी. उसने मुस्कुराते हुए इक़बाल को पानी दिया और फिर उसके लिए खाना लगा दिया.

तब तक हिना भी अंदर कमरे में जाकर लेट चुकी थी.

इक़बाल ने जल्दी से खाना खाया, और सुप्रिया मुस्कुराते हुए चुप बैठी रही, जैसे इंतज़ार कर रही हो इक़बाल खुद hi आज के दिन की बात छेड़ेगा.

इक़बाल ने खाने के बाद अपने कपड़ों से पैसे निकाल कर सुप्रिया के आगे कर दिया - कल से थोड़ा बेहतर था आज. आज पूरे चार सौ की कमाई हुई है. इसमें से 100 सलीम को देने है.

सुप्रिया ने एक हलकी मुस्कराहट के इलावा कोई रिएक्शन नहीं दिखाया. अभी भी कुछ काम सा लग रहा था. वह पहले से hi सोच चुकी थी की उसे इस बारे में कैसे बात करनी है.

उसने इक़बाल के पास बैठते हुए उसके कंधे पर हलके से हाथ रखा और उसकी तरफ देखते हुए पुछा - इक़बाल जी... आप शहर में कौन सा रास्ता ले रहे हैं. किस तरफ ऑटो चलते हैं?

इक़बाल को उसका सवाल सुन कर शायद अच्छा लगा और वह थोड़ा एक्ससिटेड होते हुए बोलै - वही जो सलीम ने बताया है... सुबह सिविल लाइन्स के बहार से शुरू करता हूँ... वहां से जहाँ भी सवारी ले जाये... जैसे आज झलवा तक, और फिर वहां से संगम तक जा कर वहां की सवारी.

सुप्रिया दिन भर में पहले hi थोड़ी रिसर्च कर चुकी थी - आप स्टेशन से क्यों नहीं शुरू करते?

इक़बाल - सलीम कह रहा था वहां पहले से hi काफी ऑटो होते हैं, और लोग काफी मोल भाव करते है...

सुप्रिया ने परेशान होते हुए इक़बाल की तरफ देखा, पर उसकी बोलने की हिम्मत नहीं हो रही थी. ऐसा लग रहा था सलीम jaan-bujhkar इक़बाल को उन रास्तों पर भेज रहा था जहाँ कमाई काम हो. पर वह ऐसा क्यों करेगा? क्या वह चाहता है की इक़बाल अपना क़र्ज़ न चूका पाए? या फिर उसका कोई और मक़सद है?

इक़बाल ने सुप्रिया को परेशान होते देख कहा - क्या हुआ? तुम परेशान मत हो, बोल दो जो बोलना है? मैं बुरा नहीं मानूंगा आज. क्या काम लग रहा है? मैं और 4 घंटे ऑटो चला लूंगा.

सुप्रिया - नहीं नहीं... ऐसा मत करना. मैं बस सोच रही थी की... अगर... अगर एक दिन के लिए मैं भी आपके साथ ऑटो पर चलूँ तोह? मैं शहर और रास्तों को और बेहतर समझ लुंगी. हम दोनों मिल कर शायद बेहतर समझ पाएंगे.

इक़बाल ने झटके में अपना सर उठाया, शायद वह फिर से गुस्सा होने वाला था पर उसने किसी तरह से अपने आप को कण्ट्रोल किया - तुम मेरे साथ ऑटो में बैठोगी? पता भी क्या कह रही हो सुप्रिया?

सुप्रिया - क्यों? इसमें गलत क्या है?

इक़बाल खीजते हुए बोलै - पहले तोह आगे बैठनी की सिर्फ एक hi जगह होती है. दूसरा तुम्हे अंदाज़ा भी है की तुम मेरे साथ आयोगी तोह लोग तुम्हे किस नज़र से देखेंगे. मुझे किस नज़र से देखेंगे? लोग बोलेंगे की अपनी औरत की नुमाइश कर रहा है.

सुप्रिया - सीट की बात है तोह साइड में एक छोटी सीट लग जाती है, मैंने देखि है. और लोगों से क्या डरना?

इक़बाल ने अपना सर न में हिलाया - नहीं... और वैसे भी तुम मेरे साथ जायेगी तोह हिना को कौन देखेगा. उसे यूँ अकेले घर में भी तोह नहीं छोड़ सकते.

हिना का नाम सुनते hi सुप्रिया के होंठ सील गए. आज जो हुआ था उसके बाद तोह वह भी हिना को अकेले नहीं छोड़ना चाहती थी.

पर उसके दिमाग में एक और बात थी - ठीक है मैं नहीं जयुंगी, पर हिना का क्या? उसकी पड़े बीच में hi छूट गयी थी. उसे अपनी पड़े पूरी करनी चाहिए. और मैं ऑटो न सही, पर कुछ और काम तोह ढून्ढ hi सकती हूँ न. हम दोनों मिल कर कमाएंगे तोह यहाँ से जल्दी निकल पाएंगे.

इक़बाल का मरदाना घमंड फिर से जाग उठा - नहीं! मैंने कहा न, घर की औरतें बहार काम नहीं करेंगी. मैं मर्द हूँ, कमा रहा हूँ. धीरे धीरे सब ठीक हो जायेगा. आपको याद नहीं, आप एक बार पहले अपने घर से कमाने के लिए निकली थी, और फिर क्या हुआ था?

सुप्रिया ने उसकी बात सुन कर शर्म से अपनी आँखें झुका ली. पर वह जो हुआ था, जिस लड़की के साथ हुआ था, वह कोई और लड़की थी, वह यह सुप्रिया नहीं थी, उसे तोह वह शायद अब पहचानती भी नहीं थी.

सुप्रिया - ठीक है आप सो जायो...

इक़बाल की आँखों में साफ़ दिख रहा था की उसे नींद नहीं आ रही थी, उसे किसी चीज़ की भूक थी जो उसे अंदर hi अंदर तड़पा सा रही थी. पर कल की हुई लड़ाई के बाद वह भी उस चीज़ को माँगना नहीं चाहता था.

अगले चार पांच दिन कुछ ख़ास नहीं बदला. संग के खर्चे के बाद रोज़ कुल दो सौ तीन सौ घर में आ रहे थे. यह देख कर सुप्रिया की बेचैनी बढ़ती जा रही थी. ऐसा लग रहा था जैसे वह तीनो किसी गहरे दलदल में धीरे धीरे उतर रहे हो, जिसका इक़बाल को एहसास तक नहीं था.

पांचवें दिन की रात जब इक़बाल वापस लौटा, तोह उसकी थकान उसके bache-khuche मरदाना गुरूर को निचोड़ चुकी थी. खाना खाने के बाद वह चुपचाप तख़्त पर लेट गया, पर उसकी बेचैन आँखें लगातार रसोई के परदे के पीछे काम करती सुप्रिया का पीछा कर रही थी. सुप्रिया जब बर्तन रख कर परदे से बहार आयी, तोह उसने इक़बाल की आँखों में वही पुराणी, भूखी और बेचैनी देखि. पर आज उसमे थोड़ी सी गिडगिडाडाहट नज़र आ रही थी.

सुप्रिया ने अंदर के कमरे का दरवाज़ा बंद कर दिया ताकि हिना के कमरे की तरफ अँधेरा रहे. वह dheere-dheere चलते हुए तख़्त के पास आयी. आज उसके चेहरे पर कोई बेरुखी नहीं थी, बल्कि एक ऐसी गरम सी सुलगी हुई मुस्कराहट थी जिसने इक़बाल के सारे सब्र को एक झटके में पिघला दिया.

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वह जैसे hi तख़्त के किनारे बैठी, इक़बाल ने बिना एक पल गवाए उसका हाथ पकड़ कर उसे अपनी तरफ खींचा. उसके जिस्म से दिन भर का पसीना, मिटटी और ऑटो का धुआं महक रहा था, पर उसकी सांसें बिलकुल गरम और तेज़ थी.

इक़बाल ने गहरी, कांपती हुई आवाज़ में कहा, उसका हाथ सुप्रिया की कमर पर कसने लगा - सुप्रिया, मुझसे अब और नहीं रुका जाता... मैं पूरे दिन सड़क पर होता हूँ, पर दिमाग में सिर्फ तुम रहती हो. उस दिन की बात को भूल जाओ... मुझे अपने से दूर मत करो.

इक़बाल की आवाज़ में वह तड़प साफ़ सुनाई दे रही थी, एक आदमी की भूख जो दिन भर की म्हणत के बाद भी बुझती नहीं थी, बल्कि और भड़क उठती थी.

सुप्रिया ने उसे दूर नहीं धकेला. इसके बजाये, वह धीरे से उसके ऊपर झुकी, और अपना सर उसके कंधे पर रख दिया. वह अपने नरम हाथों से इक़बाल के तनाव भरे हाथों को हलके से दबाने लगी. उसका यह नरम स्पर्श इक़बाल के लिए किसी नशे की तरह था.

सुप्रिया अपने होंठ इक़बाल के गाल के बेहद पास ले आयी और एक फुसफुसाती हुई आवाज़ में कहा - मैं कहीं नहीं जा रही... मैं तोह बस आप hi की हूँ.

इक़बाल ने उसकी मीठी सी आवाज़ सुनते hi बेचैन होकर उसके चेहरे को अपने दोनों हाथों में भरा और उसके होंठों को चूमने के लिए आगे बड़ा. पर सुप्रिया ने तुरंत hi अपना चेहरा थोड़ा पीछे कर लिया, सिर्फ इतना की इक़बाल उसे पाने के लिए और भी तड़प उठे. उसने अपना हाथ इक़बाल के सीने पर रखा जहाँ उसकी धड़कन तेज़ चल रही थी.

सुप्रिया - मुझे आपकी बहुत फिक्र होती है... आप अकेले सब कुछ संभाल रहे हैं. अगर आपको कुछ हो गया है, तोह पता नहीं हिना और मेरा क्या होगा. आपको पता hi है की यह ज़माना कैसा है.

इक़बाल ने सुप्रिया की नरम सांस अपने चेहरे पर महसूस की, पर उसके पीछे hat-te hi उसकी बेचैनी और बढ़ गयी. सुप्रिया की उँगलियाँ उसके सीने पर हल्का सा दबाव बना रही थी, उसे रोकते हुए भी अपने बेहद करीब रखने के लिए. अजीब सा खेल था यह आज.

इक़बाल की आवाज़ थोड़ी दबी हुई बहार निकली, जैसे अंदर कोई क़ैद जानवर गुर्रा रहा हो - सुप्रिया... आज तुम कुछ ज्यादा hi बोल रही हो... यहाँ आयो न... मेरी बात सुनो...

सुप्रिया थोड़ा सा और पीछे सरकते हुए एक गहरी आवाज़ में कहा. उसकी आवाज़ में एक ऐसी धार थी जो इक़बाल के होश उदा रही थी - सुन तोह रही हूँ... आपकी hi बात तोह सुनने के लिए बैठी हूँ यहाँ.

इक़बाल उसके पीछे पीछे थोड़ा आगे सरका. उसकी पंत में उसका लुंड पूरी तरह खड़ा हो चूका था.

सुप्रिया सरकते हुए कड़ी हो गयी - मुझे बुरा लगता है जब आप पूरे दिन म्हणत करते हो पर आपको उसका सही हक़ नहीं मिलता.

इक़बाल - वही तोह मैं कह रहा हूँ... मुझे मेरा हक़ दे दो आज रात...

सुप्रिया - अगर आपको कुछ हो गया तोह... इस मोहल्ले के... इस शहर के... गंदे लोग मुझे और आपकी बेटी को ज़िंदा चबा जायेंगे... मुझे बस इसका डर है...

इक़बाल सुप्रिया के पीछे लपकता हुआ खड़ा हो गया. इस वक़्त तोह वह सुप्रिया को चबाना चाहता था, उसके जिस्म के हर हिस्से को - मेरे रहते... कोई तुम लोगो को छू भी नहीं पायेगा.

इक़बाल ने आगे बढ़ते हुए फिर से सुप्रिया की कमर को पकड़ लिया.

सुप्रिया ने एक हलकी सी सिसकी ली, वह भी अंदर से बुरी तरह बेचैन हो रही थी - मैं बस यह चाहती हूँ... की हिना अपने पैरों पर कड़ी हो सके... और अगर मैं भी किसी तरह कोई काम करके आपका बोझ हल्का कर सकूँ तोह इसमें बुराई hi क्या है. क्या आप नहीं चाहते की आपका बोझ काम हो ताकि आप मुझे और वक़्त दे पाए.

सुप्रिया ने अपना चेहरा ऊपर करते हुए इक़बाल की आँखों में देखा. उसकी साँसें इक़बाल के होंठों के नज़दीक आयी पर उसने उन्हें मिलने नहीं दिया.

इक़बाल का दिमाग काम करना बंद कर चूका था, उसे कुछ होश नहीं था की सुप्रिया उससे क्या कह रही थी. उसे बस सुप्रिया का जिस्म चाहिए था, अपने जिस्म के नीचे.

उसने हाँफते हुए सुप्रिया की कमर पर अपनी पकड़ बनाये राखी और अपने हाथ कस्ते हुए दीवानो की तरह कहा - हाँ... हाँ... जो तुम कहोगी... वही होगा. मैं कल hi हिना की पड़े की बात करता हूँ... और तुम्हारे लिए भी कुछ... बस अब और दूर मत रहो न मुझसे. तुम मुझे पागल कर रही हो.

सुप्रिया ने हलकी सी मुस्कान दी, पर उसने अपना चेहरा फिर से मोड़ लिया. वह जानती थी की इस खेल में जीत उसकी हो चुकी थी - तोह क्या करें... आपको पागल करना hi तोह मेरा काम है...

इक़बाल ने एक झटके में सुप्रिया को घुमा दिया और उसे दीवार की तरफ धकेलते हुए उसके गले को पकड़ लिया और फिर उसके गर्दन को चूमने लगा. सुप्रिया भी अब अपने आप को खो चुकी थी.

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इक़बाल ने पीछे से सुप्रिया के ब्लाउज की डोरी खोल दी और उसकी पीठ को चूमने लगा. इक़बाल के होंठ सुप्रिया की पीठ पर निचे की तरफ बढ़ रहे थे, उसकी गर्दन से लेकर उसकी कमर तक, हलके दांतों के निशाँ छोड़ते हुए. सुप्रिया ने अपने हाथों से दीवार पकड़ ली, उसकी सांसें तेज़ हो रही थी, और वह अपने होंठों को काट कर आवाज़ दबाने की कोशिश कर रही थी.

उसकी आवाज़ सिसकी में बदल गयी थी - इक़बाल जी.... हिना... हिना जग न जाए...

इक़बाल ने उसकी बात का कोई जवाब नहीं दिया. उसने अपने दोनों हाथों से सुप्रिया की साडी का पल्लू हटा दिया, और आगे से उसके पेटीकोट में अपना हाथ दाल दिया. सुप्रिया तुरंत मुड़ी और उसने इक़बाल की गर्दन को कास के पकड़ लिया. वह दोनों एक दुसरे से लिपट गए और इक़बाल उसे वापस तख़्त की तरफ खींचता हुआ ले गया, जहाँ सुप्रिया अपनी पीठ पर जा गिरी और इक़बाल ठीक उसके ऊपर.

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इक़बाल उसके ऊपर छढ़ता हुआ उसके मम्मो को ज़ोर से दबाने लगा - कसम से, कितने सख्त हो रखे है तुम्हारे मम्मी... ममममम....

सुप्रिया ने अपने होंठों को और ज़ोर से काट लिया, पर इक़बाल के हाथ उसके ब्लाउज के ऊपर से hi उसके बूब्स को मसल रहे थे. उसने अपनी कमर ऊपर उठाई, जैसे इक़बाल को और पास बुलाना चाहती हो.

इक़बाल की आँखें भूक से लाल हो चुकी थी - चुप क्यों हो गयी? अभी तोह बहुत बोल रही थी... अब जब मैं ऊपर चढ़ गया हूँ तोह आवाज़ निकल गयी साड़ी.

सुप्रिया ने शर्म से अपना चेहरा एक तरफ कर लिया, पर उसकी जांघें अपने आप फैलने लगी थी, और इक़बाल के उसकी जाँघों के बीच में आने से साड़ी अपने आप hi ऊपर हो गयी थी - आप... आप तोह बस... जल्दी करो न... हिना जग जाएगी...

इक़बाल ने एक ज़ोर की हंसी ली, और जल्दी से सुप्रिया के ब्लाउज के हुक खोलने शुरू कर दिए - हिना की फिक्र करना छोडो... अब मेरी फिक्र करो... कितना तड़पाया है तुमने मुझे... तुम्हारे इंतज़ार में देखो कितना बड़ा हो गया है तुम्हारे लिए.

उसने अपनी पंत की ज़िप खोल दी, और अपना गरम, सख्त लुंड निकाल कर सुप्रिया की जांघों के बीच में रगड़ने लगा. सुप्रिया महसूस कर सकती थी उसकी गर्मी और सख्ती, उसकी पंतय हलकी सी गीली हो चुकी.

सुप्रिया की सिसकारी निकल गयी - उफ्फ्फ... कितना गरम है.

इक़बाल ने अपने एक हाथ से सुप्रिया की साड़ी और पेटीकोट को नीचे खींच दिया जिससे वह सिर्फ पंतय में रह गयी थी - गरम तोह होगा hi... पूरे दिन सड़क पर तुम्हे सोच सोच कर इसका यह हाल है... जब भी सड़क पर कोई साड़ी में लड़की नज़र आती तोह ऐसा लगता जैसे तुम hi कड़ी हो... अब देखो इसका असर.

इक़बाल ने अपने हाथ सुप्रिया की पंतय की तरफ बढ़ाये और एक hi झटके में खींचते हुए उसे उतार फेका.

सुप्रिया ने अपनी आँखें बंद कर ली, उसकी सांसें रुक सी गयी थी. इक़बाल ने अपने लुंड का टोपा उसकी छूट के द्वार पर रख दिया, और ज़ोर से रगड़ना शुरू कर दिया. सुप्रिया के अंदर की बेचैनी भी जवाब दे रही थी.

सुप्रिया मिन्नतें करते हुए बोली - अह्ह्ह्ह.. ाःह... दाल दो न..

इक़बाल ने उसे सताते हुए पूछा - क्या डालूं... साफ़ साफ़ बोलो... मुझे सुन्ना है...

सुप्रिया ने शर्म से अपना मुंह हाथों में छुपा लिया, पर उसकी आवाज़ दबी हुई थी - वही... आपका... जो पकड़ रखा है...

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सुप्रिया ने अपना हाथ लुंड पर रखते हुए उसे महसूस किया, जिससे लुंड और भी कड़क होने लगा.

इक़बाल ने ज़ोर से धक्का दिया, पर अंदर नहीं घुसाया - बोलो न क्या डालूं? मेरा लुंड? तुम्हारे शौहर का लुंड... दाल दू अंदर?

सुप्रिया ने हाँ में सर हिलाया, उसकी आँखें नाम हो गयी थी. इक़बाल ने धीरे से उसकी छूट में अपना बड़ा सा लुंड घुसना शुरू किया.

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सुप्रिया की ज़ोर से चीख निकल गयी पर उसने तुरंत अपने मुँह पर हाथ रख लिया. उसका पूरा जिस्म पर पसीने छूटने लगे थे, ऐसा लग रहा था उसके छोट के मुँह में किसी ने जलता हुआ अंगारा घुसा दिया हो. जैसे जैसे लुंड अंदर घुस रहा था छूट की धारियां खुलती हुई सी महसूस हो रही थी जैसे उसका लुंड उसकी छूट को अंदर से फाड़ रहा हो.

इक़बाल ने अपने एक हाथ से अपना लुंड और दुसरे हाथ से सुप्रिया की एक टांग को कास के पकड़ लिया - उफ्फ्फ... कितनी टाइट है तुम्हारी... जैसी किसी दर्ज़ी से सिल्वा के आयी हो... इसको एक तोह बार पहले मार चूका हूँ मैं... फिर भी ढीली नहीं हुई है...

सुप्रिया ने ज़ोर से सिसकारी ली, उसकी पीठ पर पसीने की लकीरें बन गयी थी, और उसकी सांसें अटक रही थी. उसके छूट के अंदर दर्द और मज़ा दोनों एक साथ हो रहे थे, पर दर्द ज़्यादा था. वह कांपते हुए बोली - आह... नहीं जायेगा और अंदर... बहुत मोटा है... दर्द हो रहा है... रुको न...

इक़बाल ने मुस्कुराते हुए कहा - कैसे नहीं जायेगा... आज तुम लो इसका असली मज़ा...

उसने अपने दोनों हाथों से सुप्रिया की कमर पकड़ी, जो अब पसीने से भीगी हुई थी और एक ज़ोर का धक्का अंदर की तरफ मारा. सुप्रिया का बदन हिलते हुए ऊपर की तरफ हो गया और वह बुरी तरह झटपटा उठी. उसके होंठों से चीख निकलने वाली थी पर उसने ज़ोर से अपना मुंह दबाया. उसकी छूट पूरी तरह फैल गयी थी, जैसे कोई गरम लोहे की डंडा अंदर घुसा हो.

इक़बाल ने पूरा ज़ोर लगाया, और अपना लुंड सुप्रिया के अंदर घुसा दिया. सुप्रिया की आँखें पहात गयी, और उसके आँखों दर्द के मारे आंसू आ गए. इक़बाल का लुंड पूरी तरह अंदर था, सुप्रिया को ऐसा महसूस हो रहा था की लुंड ने अंदर से उसकी छूट का नक्शा hi बदल दिया था.

इक़बाल ने हाँफते हुए कहा, उसकी आँखें भूख से लाल थी, वह दांत भीचते हुए बोलै - इतने दिन इंतज़ार कराया है... आज मैं तुम्हे पूरा छोडूंगा...

उसने अपनी कमर उठाई, और ज़ोर ज़ोर से धक्के माने शुरू कर दिए. हर धक्के पर सुप्रिया की छूट में दर्द और मज़ा दोनों बढ़ रहे थे. उसके बूब्स ऊपर नीचे हिल रहे थे पसीने से भीगी हुई ब्लाउज में. तख़्त दीवार से टकराता हुआ आवाज़ कर रहा था, छत छत छत छत, जैसे कोई मशीन चल रही हो.

इक़बाल ने अपने हाथों से सुप्रिया के ब्लाउज के बटन खोल दिए, और उसके मम्मी बहार निकाल लिए. वह उसे छोड़ते हुए उन्हें ज़ोर ज़ोर से दबाने लगा.

सुप्रिया के मम्मी बुरी तरह दर्द करने लगे थे, और उसकी कमर में एक लचक सी आ गयी थी इतनी तेज़ धक्के खाने की वजह से. उसकी छूट बिलकुल गीली हो चुकी थी, जिससे हर धक्के पर छाप छाप की आवाज़ आ रही थी. लुंड हर झटके में सुप्रिया के छूट और भी फैलती जा रही थी. सुप्रिया ने अपने होंठों को kaat-te हुए किसी तरह दर्द को सहा, उसकी आँखें बंद थी पर आंसू अभी भी बह रहे थे. जब इक़बाल ने उसके साथ यह सब पहली बार किया था तब तोह वह अपना होश hi खो बैठी थी, पर आज वह जगी हुई थी, पूरे होश में थी.

इक़बाल ने भारी सांसें लेते हुए पुछा - अह्ह्ह... मज़ा आ रहा है... मुझसे छुड़वाने में...

सुप्रिया ने अपनी आँखें बंद कर ली, उसकी कमर ऊपर उठी हुई थी, उसकी पतली सी आवाज़ बहार निकली - उम्म्म्म... आअह्ह्ह... उफ्फ्फ्फ़.... दर्द हो रहा है... बहुत ज़्यादा... पर... और ज़ोर से करो न... और तेज़... धीरे क्यों हो रहे हो...

सुप्रिया के शब्दों ने तोह जैसे इक़बाल के अंदर और भी जान दाल दी. उसने आगे झुकते हुए एक हाथ से सुप्रिया के बाल पकड़ लिए और दूसरा हाथ उसके गले पर रख दिया. वह सुप्रिया को पकडे हुए और तेज़ी से अपना लुंड अंदर बहार करने लगा.

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इक़बाल - ले न... और अच्छे से ले... कब से प्यासी थी तू भी मेरे लुंड के लिए... बस न न करती रहती है हमेशा...

सुप्रिया के गले बस इतना प्रेशर था की वह कुछ बोल न पाए, बस सिसकारियां लेती जाए - अह्ह्ह... उम्म्म.... ुहफ्फ्फ्फ़...

इक़बाल ने एक और ज़ोर का धक्का दिया और अपनी पकड़ हलकी करि - आज रात भर छोडूंगा तुझे... हिना के उठने तक... बीच में सो मत जइयो.

सुप्रिया ने उसकी पकड़ ढीली होते hi अपने पेअर हवा में ऊपर कर लिए इक़बाल को और अच्छे से अपनी छूट लेने के लिए. इक़बाल ने भी आगे झुक कर और तेज़ी से धक्के मारना जारी रखा.

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इक़बाल ने अपना मुँह उसके मम्मो में घुसा लिया - कितने प्यारे मम्मी है तेरे... न ज्यादा बड़े... न ज्यादा छोटे... मैं दिन भर बस इनके बारे में hi सोचता रहता हूँ... कब घर आयउँ और इन्हे मसलो.... पर तू मुझे इन्हे छूने भी नहीं देती...

सुप्रिया ने अपने हाथों से इक़बाल के बालों में उँगलियाँ दाल दी, और थोड़ा सा उचकते हुए अपने बूब्स उसके मुँह की तरफ बढ़ा दिए - हाँ... मसलिये... और ज़ोर से... अह्ह्ह्ह.... उफ़.... ोुछः....

इक़बाल ने मुंह हटाकर सुप्रिया की आँखों में देखा – अब घूम जाओ... पीछे से छोडूंगा...

सुप्रिया ने शर्म भरी आँखों से इक़बाल की तरफ देखा - नहीं वहां नहीं... पिछली बार याद है न क्या हुआ था...

इक़बाल थोड़ा सा झल्लाया - अच्छा ठीक है... गांड में नहीं डालूंगा... पर पीछे से कुटिया बना कर तोह छोड़ने दे...

इक़बाल की मुँह से यह गालियां सुन कर सुप्रिया और भी एक्ससिटेड होती जा रही थी. वह इक़बाल के हाथ का सहारा लेते हुए पेट के बल लेट गयी. सुप्रिया ने तैयार होते हुए तख़्त के कोने को अपने हाथ से कास के पकड़ लिया. इक़बाल ने फिर से उसकी कमर पकड़ी और उसे थोड़ा सा ऊपर किया.

इक़बाल - सोचा था आज तेरी छूट के साथ साथ गांड और मुँह भी अच्छे से भरूंगा... पर चल कोई न... हाँ बिलकुल ऐसे... बन गयी न तू मेरी कुटिया...

सुप्रिया की शर्म काम होती जा रही थी - या घोड़ी... जो आप चाहो...

इक़बाल ने अपना लुंड फिर से सुप्रिया की छूट के द्वार पर रख दिया. उसके लुंड के टोपे से थोड़ा सा पानी नीचे टपक रहा था, गीला और एक डैम गरम. पसीने और pre-cum की तेज़ सी स्मेल सुप्रिया की नाक में भरी जा रही थी. उसने अपना चेहरा तख़्त से एकदम चिपका लिया और ज़ोर ज़ोर से सिसकारियां लेने लगी, जैसे वह जानती हो की पीछे से तोह और भी दर्द होने वाला था.

इक़बाल का लुंड सुप्रिया और उसके रास से भीग चूका था. उसने एक hi झटके में अपना लुंड उसकी छूट में घुसा दिया.

सुप्रिया की ज़ोर से चीख निकल गयी, पर उसने अपना मुँह चद्दर में दबा लिया. पर इस बार दर्द के साथ एक अजीब सी गर्माहट भी थी, उसकी छूट के अंदर जैसे कोई बटन डाब गया हो. पीछे से लुंड और भी गहराई तक अंदर जा रहा था. उसके हाथों की उँगलियाँ ने तख़्त की लकड़ी को कास के पकड़ लिया. सुप्रिया ने अपनी टाँगे और फैला दी, उसकी जांघें काँप रही थी, पर अब दर्द काम और मज़ा ज़्यादा होने लगा था.

सुप्रिया की पूरी कमर एक रदम में हिलने लगी थी, इक़बाल के हर धक्के का जवाब देने लगी थी.

सुप्रिया की बेचैन कांपती हुई आवाज़ निकली - अह्ह्ह... वहीँ... और अंदर...

इक़बाल ने ज़ोर ज़ोर से पीछे से सुप्रिया को पेलना शुरू किया. उसके जांघ सुप्रिया की गांड से टकरा रही थी, थप थप थप की आवाज़ के साथ उसके अंदर का मॉस पूरा हिल रहा था. सुप्रिया महसूस कर रही थी की इक़बाल का लुंड उसकी छूट की दीवारों से रगड़ खा रहा था, हर जगह छू रहा था, और उसकी छूट पूरी तरह तानी हुआ थी.

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इक़बाल की सांसें तेज़ हो गयी थी, और उसके सीने से पसीना सुप्रिया की पीठ पर टपक रहा था. एहि तोह था जो वह कबसे चाहता था की उसकी मैडमजी को भी उसके जितना hi मज़ा आये. उसने हाँफते हुए पुछा - कैसा लग रहा है, कुटिया बन कर छुड़वाने में...?

सुप्रिया ने अपना चेहरा दूसरी तरफ मोड़ लिया, उसकी आँखें अब एक अलग मस्ती में बंद थी. क्या एहि था असली सेक्स का सुख, जिसे वह आज तक बस दर्द समझती रही, आज उसे एक अलग hi एहसास दिला रहा था. मैं कर था बस वह यह करती hi जाए

सुप्रिया - अह्हह्ह्ह्ह... हाँ... और ज़ोर से... और तेज़...

सुप्रिया ने यह कहते हुए अपनी गांड हवा में थोड़ी और उठा दी, उसकी कमर ने अपने आप एक आर्च बनाया, जैसे इक़बाल को और गहराई देने की कोशिश कर रही हो. सुप्रिया ने पीछे मुड़ते हुए इक़बाल की तरफ देखा.

सुप्रिया ने जैसे hi अपर सर थोड़ा सा पीछे घुमाया, इक़बाल ने उसे काबू में करते हुए फिर से नीचे दबा दिया. उसने सुप्रिया का पसीने से भीगा हुआ एक हाथ पीछे खींचा, और अब बिना रुके अंदर धक्के मारने लगा.

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इक़बाल ने अपना एक हाथ नीचे किया, और सुप्रिया की छूट के बहार के हिस्से को अपनी ऊँगली से मसलने लगा. इससे सुप्रिया का पूरा जिस्म एक झटके में काँप उठा, और उसे और भी ज्यादा मज़ा आने लगा.

सुप्रिया की कमज़ोर सी आवाज़ निकली - नहीं... वहां नहीं...

पर उसकी कमर थोड़ा सा आगे पीछे होते हुए सब सच बता रही थी.

इक़बाल ने मुस्कुराते हुए उसकी छूट को रगड़ना शुरू कर दिया, और साथ में अपना लुंड अंदर बहार करना जारी रखा, एक रदम सा बन गया था, अंदर और बहार दोनों को एक साथ मज़ा मिल रहा था. उसे बहुत एक्सपीरियंस था एक औरत को खुश करने का.

सुप्रिया की सांसें तेज़ चल रही थी, उसके निप्पल्स पूरी तरह सख्त हो गए थे, और वह अपने बूब्स को सख्त से तख़्त पर रगड़ते हुए अपने आप को हर तरह से स्टिमुलते कर रही थी. हर धक्के पर वह और ज़्यादा गरम होती जा रही थी, उसकी छूट एक अब जगह बनाते हुए इक़बाल के लुंड को पूरी तरह जकड़ना शुरू कर दिया.

एक पल के लिए उसे ऐसा लगा जैसे उनके अंदर की आग बस बहार निकलने hi वाली है, और वह कराहते हुए बोली - मैं.... मैं... इक़बाल...

इक़बाल ने तुरंत अपनी स्पीड थोड़ी धीमी कर दी, वह नहीं चाहता था सुप्रिया अभी झाड़ जाये.

इक़बाल उसकी गांड के गोलों को दबाते हुए बोलै - अभी नहीं... साथ में झड़ेंगे दोनों...

दोनों बुरी तरह थक गए थे पर कोई भी ख़तम होने का नाम नहीं ले रहा था. इक़बाल कुछ सेकंड के लिए धीरे हुआ, उसकी कमर में भी बुरी तरह दर्द होने लगा था, वह कितनी देर से सुप्रिया के अंदर धक्के पर धक्का मारे जा रहा था. वह चाहता था की अब वह लेट जाए और सुप्रिया उस के ऊपर चढ़ कर सारा काम करे.

इक़बाल ने सुप्रिया के बाल पकड़ते हुए उसे उठाया. सुप्रिया भी अब पूरी तरह थक चुकी थी, उसका अंग अंग दर्द से चीख रहा था.

इक़बाल उसे बालों से पकडे हुए ऊपर उठाया और उसके पसीने से गीली हो चुकी चादर पर लेट गया - अब तू ऊपर आजा... मुझे बहुत मज़ा आएगा तेरी शकल देखने में...

सुप्रिया ने थोड़ी देर तक सांस ली, उसकी टाँगे अभी भी काँप रही थी दर्द से, पर उसकी छूट में वह गर्माहट अब एक आग बन चुकी थी जिसे वह बुझने नहीं देना चाहती थी. वह धीरे से तख़्त पर चढ़ी, और इक़बाल की टांगों के ऊपर बैठ गयी.

जैसे hi सुप्रिया की नंगी गांड इक़बाल की टांगों पर पड़ी, उसे ऐसा लगा जैसे किसी ने कोई मुलायम सी चीज़ उसके पेअर पर रख दी हो. इक़बाल ने सुप्रिया की आँखों में झाँका. कितना मस्त सुडोल बदन था उसका, वह कभी सोच भी नहीं सकता की यह जिस्म कभी उसका होगा. पर क्यों न हो, इसे उससे बेहतर कोई नहीं छोड़ सकता था.

इक़बाल ने उसकी तरफ मुस्कुराते हुए देखा - अपनी मर्ज़ी से दाल अब अंदर... जितना सह सके...

सुप्रिया के चेहरे पर शर्म के साथ साथ एक अलग hi आग सी भी थी. इतनी देर से तोह वह इक़बाल का पूरा लुंड सेह रही थी, अब क्यों नहीं कर पाएगी.

वह अपने आप को सहारा देते हुए थोड़ा ऊपर उचकी और लुंड को हाथ से पकड़ लिया. पहली बार वह खुद कण्ट्रोल में थी, और अब इक़बाल ने अपनी चाबी भी उसे सौंप दी थी. उसने आँखें बंद करते हुए धीरे धीरे नीचे बैठना शुरू किया. हाथ से एडजस्ट करते हुए उसने लुंड से ठीक छूट का निशाना लगा लिया.

वह कराहते हुए थोड़ा और नीचे हुई. इस पोजीशन में तोह जैसे और भी दर्द हो रहा था, इससे तोह पहली वाली hi बेहतर थी. इक़बाल ने सुप्रिया को सहारा देने के लिए उसकी कमर को जकड लिया और उसे नीचे धकेलने लगा. लुंड का टोपा तिरछा होता हुआ उसकी छूट की दीवारों को अलग अलग जगह छू रहा था. पर दोनों लुंड और छूट गीले होने की वजह से वह अंदर जाए जा रहा था. वह धीरे धीरे नीचे होती गयी, और फिर पूरा बैठ गयी, इक़बाल का लुंड पूरी तरह उसके अंदर था, और उसे अपने अंदर के अंगो से टकराता हुआ महसूस हो रहा था.

इक़बाल ने अपनी कमर थोड़ी सी ऊपर करते हुए उसे एक हल्का सा झटका दिया जिससे सुप्रिया का पूरा जिस्म बुरी तरह हिल गया - अब तू hi चल... अपनी रफ़्तार से...

सुप्रिया ने अपने हाथों को इक़बाल के सीने पर रखे, उसकी उँगलियाँ उसके घिसे हुए निप्पल्स पर रगड़ गयी, जिससे इक़बाल का बदन काँप उठा. वह अपनी कमर को नीचे करने लगी, पहले धीरे, फिर तेज़, और फिर पूरी ताक़त से. उसकी छूट पूरी तरह खोल गयी थी अब, और हर बार नीचे बैठने पर इक़बाल का लुंड उसकी छूट के किसी न किसी हिस्से को छेड़ रहा था.

इक़बाल ने भी उसे सहारा देते हुए अपने हाथ उसकी गांड पर रख दिए और उसे ऊपर नीचे उछलने लगा.

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इक़बाल की आँखें सुप्रिया के उछलते हुए बूब्स पर तिकी हुई थी - कितनी मस्त लग रही तू... बिलकुल वैसी जैसे सोचा था मैंने कई बार अपने सपनो में... शर्म तोह नहीं आ रही अब मुझसे छोड़ने में...

सुप्रिया की धीमी सी आवाज़ बहार निकली - शर्म कैसी..... आप... आप मेरे शौहर हो...

इक़बाल के चेहरे पर एक बड़ी सी मुस्कान आ गयी और उसने भी अपनी रफ़्तार डबल कर दी. दोनों के शरीर अब छाप छाप करते हुए ऊपर नीचे हो रहे थे, और दोनों की सांसें तेज़ होती चली गयी. शायद दोनों hi अपने शिखर पर पहुंचने वाले थे.

सुप्रिया की सिसकियाँ अचानक उसके गले में hi अटक गयी और उसकी कमर ऊपर उठी हुई वहीँ जैम गयी. बस अब इक़बाल hi ज़ोर ज़ोर से ऊपर नीचे हिल रहा था.

इक़बाल भी समझ गया था, अब वह पहुंच गयी, वह झड़ना चाहती थी. वह भी अपने आप को और नहीं रोक सकता था. उसने अपना पूरा दम लगते हुए एक आखरी ज़ोर का झटका दिया और तेज़ी से अपना गरम माल उसकी छूट में निकाल दिया. सुप्रिया का पूरा जिस्म उसके गरम माल को महसूस करते hi काँप उठा और फिर फड़कते हुए उसके सारे माल को जैसे अपने अंदर खींचने लगा. पर फिर अचानक एक अलग hi कंपन हुई और उसने अंदर भरा पानी का सैलाब बहार निकलने लगा.

उसने एक ज़ोर की सिसकारी ली और आगे झुकते हुए इक़बाल से पूरी तरह चिपक गयी. दोनों एक दुसरे से चिपक कर कांपते हुए झाड़ रहे थे. सुप्रिया के सुडोल मम्मी इक़बाल के सीने से रगड़ खा रहे थे, और दोनों के शरीर का पसीना आपस में मिल रहा था. इक़बाल का लुंड अभी भी सुप्रिया की कांपती हुई छूट में हिल रहा था.

कुछ देर तक वह वैसे hi रहे, सुप्रिया इक़बाल के ऊपर झुकी हुई थी, उसका मुंह उसके कंधे पर था, और दोनों की सांसें धीरे धीरे नार्मल हो रही थी. इक़बाल ने अपना लुंड धीरे से बहार निकला, और दोनों का मिला हुआ बहार निकलने लगा, गरम और गधा, चादर पर गिरते हुए.

इक़बाल ने सुप्रिया को कास के दबाते हुए कहा - तुम सही कह रही थी... कल से... मैं स्टेशन से hi शुरुवात करूँगा...

सुप्रिया हलके से मुस्कुरायी, शायद यह सब हो जाने के बाद इक़बाल का दिमाग हल्का हो गया था - और वह बाकी सब भी भूल मत जाना जो मैंने कहा था... नहीं तोह फिर कभी नहीं करने दूंगी...

इक़बाल ने सुप्रिया का काँपता हुआ हाथ ज़ोर से पकड़ लिया और उसे अपनी तरफ खींच कर उसके मम्मो को चूमने लगा. उसकी मैडमजी आखिर आज पूरी तरह से उसकी हो गयी थी. अब उसे किस बात की फिक्र थी.

दोनों अपने आप में खोये हुए इस बात से अनजान थे की अंदर कमरे से, दरवाज़े के बीच के एक क्रैक से हिना छिप कर उन्हें यह सब करता देख रही थी.

उसकी छोटी सी छाती तेज़ धड़क रही थी और उसकी सांसें अटक सी गयी थी. वह समझ नहीं पा रही थी की वह क्या देख रही है, पर वह उनसे अपनी आँखें हटा भी नहीं पा रही थी.
 
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