#208.
अष्टकोणीय सत्य: (24.01.2002, गुरुवार, मैनहट्टन, न्यूयार्क, अमेरिका)
आर्केडिया न्यूयार्क पहुंच चुका था। आर्ची ने अदृश्य करके आर्केडिया को 'हडसन नदी' में उतार लिया था।
मैनहट्टन का वह क्षेत्र, जहां महेन्द्र शर्मा का घर था, वहां से ज्यादा दूर नहीं था। शलाका और जेम्स आर्केडिया से निकलकर मैनहट्टन की 6 स्ट्रीट पर पहुच गये।
कुछ ही देर में दोनों उस पते पर खड़े थे, जो कि शारदा ने दिया था। शलाका, देवोम को जल्द से जल्द देखना चाहती थी। इसलिये शलाका ने आगे बढ़कर घर की घंटी बजा दी।
कुछ देर के बाद लगभग एक 70 वर्षीय बूढ़े ने घर का दरवाजा खोला, जिसके चेहरे पर एक चश्मा लगा हुआ था, लेकिन इस उम्र में भी वह किसी आर्मी के जवान की तरह से फिट दिखाई दे रहा था।
“जी, हमें महेन्द्र शर्मा जी से मिलना है।” शलाका ने उस बूढ़े को देखते हुए हिंदी भाषा में कहा।
“कहिये, क्या कहना है आपको? मैं ही हूॅ महेन्द्र शर्मा।” महेन्द्र ने शलाका और जेम्स को ऊपर से नीचे तक देखते हुए कहा।
“मुझे आपसे भारत में मिले अष्टकोण के बारे में बात करनी है।” शलाका ने बिना ज्यादा कुछ घुमाये-फिराये महेन्द्र से कहा।
“अष्टकोण!" अब महेन्द्र के चेहरे पर आश्चर्य के भाव उभरे, जिसे शलाका ने तुरंत पहचान लिया- “कौन हैं आप लोग?"
“क्या हम अंदर बैठकर बात कर सकते हैं?" शलाका ने इधर-उधर देखते हुए कहा।
शलाका की बात सुन महेन्द्र एक पल को सोच में पड़ गया, फिर जाने क्या सोचकर उसने शलाका और जेम्स को अंदर आने को कह दिया।
शलाका और जेम्स अंदर आकर बैठ गये। तभी शलाका की नजर, सामने टेबल पर रखे एक फोटो फ्रेम पर गई। उस फोटो फ्रेम में महेन्द्र, उनकी पत्नी और उनका बेटा देवोम, तीनों दिख रहे थे।
इस फोटो में देवोम काफी छोटा था। परंतु शलाका की तेज आँखों ने देवोम को तुरंत पहचान लिया, वह वही दिव्य बालक था....आर्यन और आकृति का पुत्र जिसकी आँखों में सूर्य के समान तेज दिखाई दे रहा था।
महेन्द्र ने शलाका की आँखों का पीछा करके, यह देख लिया कि शलाका उस फोटो फ्रेम को देख रही है। अतः वह बोल उठा- “ये फोटो देव के बचपन की है, तब वह मात्र …वर्ष का था।"
शलाका ने धीरे से सिर हिलाया और आगे बढ़कर उस फोटो फ्रेम को उठा लिया।
“आर्ची, इस फोटो को अपने डेटा में सेव कर लो।" शलाका ने अपने मन में आर्ची से कहा।
“कर लिया।" आर्ची ने शलाका की आँखों का प्रयोग करके, उस तस्वीर को अपने डेटा में सेव कर लिया।
अब शलाका ने एक बार और ध्यान से उस अद्भुत बालक को देखा और फिर उस फोटो फ्रेम को वापस टेबल पर रखकर, महेन्द्र के सामने आकर बैठ गई।
"महेन्द्र जी,... मेरा नाम शलाका है....मैं पिछले 25 वर्षों से उस अष्टकोण को ढूंढ रही हूं इसलिये अब आप मुझसे कुछ ना छिपाएं और मुझे सारी बातें सचसच बता दें कि आप उस अष्टकोण के बारे में क्या-क्या जानते हैं?” शलाका ने तीखी निगाहों से महेन्द्र को देखते हुए कहा।
शलाका की बात सुन महेन्द्र ने कसमसाकर, अपने शरीर के बैठने के अंदाज को ठीक किया और फिर बोलना शुरु कर दिया- “आज से लगभग 22 वर्ष पहले, जब हम भारत के उज्जैन शहर में रहते थे, उस समय एक रात, जब मैं और मेरी पत्नी गायत्री, अपने बेडरुम में सो रहे थे कि तभी हमें अपने बेड के नीचे से एक अजीब सी ‘धम्-धम्' की आवाज आती हुई सुनाई दी। धीरे-धीरे वह आवाज थोड़ी तेज हो गई। हमने अपने बेड के नीचे झांक कर देखा, पर बेड के नीचे कोई नहीं था। जब हमने जमीन से कान लगाकर सुना, तो हमें वह आवाज जमीन के नीचे से आती हुई प्रतीत हुई। हमने उस रात कुदाल से अपने कमरे की पूरी जमीन को खोद डाला। हमें उस समय जमीन के नीचे से एक काँच का अष्टकोण मिला, जिसमें एक दिव्य बालक लेटा हुआ, मुस्कुरा रहा था।
“हमें बहुत आश्चर्य हुआ कि यह दिव्य बालक, बिना साँस लिये, उस जमीन के अंदर जिंदा कैसे था? हमने उस काँच के अष्टकोण को जमीन के अंदर से निकाल लिया। अब हमने उस अष्टकोण को तोड़ने के लिये हर प्रकार के औजार का प्रयोग किया, पर वह नहीं टूटा। इस प्रकार धीरे-धीरे पूरी रात बीत गई, पर हम उस अष्टकोण को किसी भी प्रकार से नहीं खोल पाये? अब थक कर हमने उस अष्टकोण को वहीं कमरे की खिड़की के पास रख दिया और सो गये। पूरी रात जगे होने के कारण हमें तुरंत नींद आ गई। सुबह किसी बच्चे की किलकारी की आवाज ने हमें जगा दिया। जब उठकर हमने देखा, तो हमें सूर्य की रोशनी खिड़की से निकलकर, उस काँच के अष्टकोण पर पड़ती दिखाई दी।
“सूर्य की किरणें पड़ने के बाद ना जाने कैसे वह अष्टकोण स्वतः ही खुल गया था और वह नन्हा दिव्य बालक, उस सूर्य की रोशनी में रोने की जगह, हंसता हुआ ऐसे खेल रहा था, मानो वह सूर्य की रोशनी में नहीं, बल्कि अपने पिता की गोद में हो। गायत्री ने उस दिव्य बालक को उठाकर अपनी गोद में ले लिया। तभी मेरी नजर उस अष्टकोण में उपस्थित एक सुनहरी रंग की धातु की शीशी पर गई, जिस पर एक 'ॐ' का निशान बना था, मैंने उस शीशी को उठाकर देखा, पर उसमें कुछ नहीं था।
"मैंने उस शीशी को अलमारी में उठाकर रख दिया और गायत्री को उस दिव्य बालक से खेलते देखता रहा। चूंकि हमारे कोई बच्चा नहीं था, इसलिये हमने सभी को यही बताया कि यह हमारा ही पुत्र है। उस बालक के चेहरे पर देवताओं सा तेज था और उस दिव्य शीशी पर 'ऊँ' लिखा था, इसलिये हमने अपने बालक का नाम 'देवोम' रख दिया। देवोम बहुत ही विलक्षण बालक था, वह बचपन से ही हर चीज को जल्दी सीख जाता था। कुछ समय बाद जब देवोम बड़ा हो गया, तो हम भारत छोड़कर अमेरिका में आकर बस गये।” इतना कहकर महेन्द्र चुप हो गया।
"इस समय देवोम कहां है? मुझे उससे मिलना है।" शलाका ने बेसब्र होते हुए कहा।
“नहीं मिल सकते वह पिछले 15 दिनों से कहीं गायब हो गया है?” महेन्द्र ने कहा।
महेन्द्र के शब्द सुन शलाका पर तो जैसे बिजली ही गिर गई- “क्याऽऽऽऽ?...कहां गायब हो गया?"
“आज से 15 दिन पहले, वह यह कहकर घर से गया था कि उसे कहीं नौकरी मिल गई है, जिसकी 5 दिन की ट्रेनिंग के लिये वह फ्लोरिडा जा रहा है, 5 दिन बाद वह वापस आ जायेगा।” महेन्द्र ने रोने वाले अंदाज में कहा “पर आज 5 तो क्या 15 दिन भी बाद भी उसकी खबर नहीं है। मुझे लगा था कि वह बुढ़ापे में हमारा सहारा बनेगा, पर वह जिस रहस्यमय अंदाज में हमें मिला था, उसी रहस्यमय अंदाज में गायब भी हो गया। मैंने अभी आपको इसलिये भी अंदर आने दिया कि मुझे लगा आपके पास देवोम की कोई खबर है?"
यह सुनकर एक पल के लिये शलाका का चेहरा थोड़ा मुर्झा सा गया, पर तुरंत ही उसने अपने पर नियंत्रण करते हुए कहा- “आप देवोम की कोई नई फोटो मुझे दे दीजिये, मैं उसे अवश्य ढूंढ लूंगी।
"नहीं है देवोम की एक भी नई फोटो हमारे पास नहीं है।” महेन्द्र ने सिर झुकाते हुए कहा।
"ऐसा कैसे हो सकता है?” शलाका ने आश्चर्य से महेन्द्र की ओर देखते हुए कहा- “मेरा मतलब है कि आज के समय में तो सभी लोग फोटोज रखते हैं... फिर आपके पास उसकी कोई फोटो क्यों नहीं है?... और आपने घर में बिना चेक किये एकदम से कैसे बोल दिया कि उसकी कोई फोटो आपके पास नहीं है?"
“क्यों कि जब उसको गायब हुए 10 दिन हो गये, तो मैंने पुलिस में कम्प्लेन लिखवा दी। कम्प्लेन लिखवाने पर जब पुलिस ने उसकी फोटो मांगी, तो हमने अपना पूरा घर छान मारा, पर उसके बचपन की इस फोटो को छोड़कर, उसकी सारी फोटो कहीं गायब हो गईं? हमने बहुत ढूंढा, पर उसकी कोई फोटो नहीं मिली?"
“यह कैसे हो सकता है? इसका मतलब वह जानबूझकर कहीं गया है? और उसी ने जाने से पहले अपनी सारी फोटो भी गायब कर दी हैं।” जेम्स ने काफी देर बाद कुछ कहा।
"पर वो ऐसा क्यों करेगा?" महेन्द्र ने कहा।
“शायद उसे पता हो कि कोई उसे ढूंढने आने वाला है?" जेम्स ने कहा।
“यह संभव नहीं हो सकता।” महेन्द्र ने जेम्स को देखते हुए कहा- “हमने आज तक उसे नहीं बताया कि वह हमें कहां से मिला था? या फिर वह कौन है? वैसे क्या आप यह बता सकती हैं कि वह कौन है? और हमारे कमरे में जमीन के नीचे कैसे आया?"
“यह बहुत लंबी कहानी है।” शलाका ने महेन्द्र से कहा- “बस आप इतना जान लीजिये कि वह एक देवपुत्र है, जिसे किसी कारणवश उस अष्टकोण में छिपाया गया था, पर अब उसकी तलाश देवताओं को भी है।“
शलाका की बात सुन महेन्द्र खुश होते हुए बोला "मुझे पता था कि वह कोई दिव्य बालक है। अगर वह आपको मिल जाता है, तो मुझे भी अवश्य बताइयेगा।"
“ठीक है।” शलाका ने कहा- “अब जरा मुझे उस सुनहरी दिव्य शीशी और अष्टकोण के बारे में भी बता दीजिये कि वह कहां है? वह भी आपके पास है या फिर वह भी कहीं खो गया?"
शलाका के कटाक्ष सुन महेन्द्र ने अपना सिर झुकाते हुए कहा- “वह दोनों चीजें, मैंने एक आर्कियोलॉजिस्ट को दे दिया था, जो कि अब न्यूयार्क के मशहूर ‘दि मेट क्लाएस्टर म्यूजियम' में रखी हैं। वह म्यूजियम यहां से मात्र 30 मिनट की दूरी पर है।"
यह सुन शलाका को महेन्द्र पर गुस्सा तो बहुत आया, पर उसने कुछ महेन्द्र को कुछ कहा नहीं।
"तो फिर अब हम चलते हैं अगर हमें देवोम की कोई जानकारी मिली, तो आपको अवश्य बतायेंगे।" यह कहकर शलाका खड़ी हुई और जेम्स को लेकर वहां से बाहर निकल गई।
“आपको क्या लगता है कि यह बूढ़ा सही बोल रहा था?" जेम्स ने शलाका से पूछा।
“यह पता करना तो बहुत आसान है, पर इसके लिये हमें पहले किसी शांत जगह पर बैठना होगा।” शलाका ने कहा।
"तो फिर क्यों ना ‘दि मेट क्लाएस्टर म्यूजियम' की ओर ही चलें, वहां पर एक ‘मामा सूशी' रेस्टोरेंट है, जहां पर जापानी -मैक्सिकन फ्यूजन फूड मिलता है। वहां पर बैठने के लिये काफी शांत जगह है।” जेम्स ने कहा।
“तुम्हें बहुत पता है न्यूयार्क के बारे में?” शलाका ने मुस्कुराते हुए कहा।
“हे देवी शलाका, आप भूल रही हैं कि मैं इसी शहर का हूं।" जेम्स अपना दाहिना हाथ अपने पेट से टच कराते हुए, अदब से झुकते हुए कहा।
“अच्छा, तो अब तुम मेरे कार्य के बीच अपना पर्सनल फूड भी खाना चाहते हो?” शलाका ने कहा।
“एक खाने का ही तो शौक है, जो बचपन से अभी तक चल रहा है।” जेम्स ने दुखी होते हुए कहा- “पर क्या आपके पास अमेरिकन डॉलर हैं, क्यों कि मैं खाने के बाद बर्तन नहीं धोना चाहता?"
“अब उदास मत हो, हम उधर ही चल रहे हैं और आर्ची के रहते किसी भी टाइप की करेंसी की जरुरत नहीं पड़ेगी।" यह कहकर शलाका ने अपने बैग से निकालकर, जेम्स को एक क्रेडिट कार्ड दिखाया।
“वाह, मानना पड़ेगा आपकी आर्ची को।” जेम्स ने कहा और एक टैक्सी को हाथ देकर रोक लिया।
कुछ ही देर में जेम्स और शलाका ‘मामा सूशी' रेस्टोरेंट में बैठे थे। जेम्स ने अपनी पसंद का खाना आर्डर कर दिया।
“आर्ची, जरा कम्प्यूटर पर देख कर बताओ कि क्या अष्टकोण और अमृत की शीशी अभी भी ‘दि मेट क्लाएस्टर म्यूजियम' में है या उसे कहीं और शिफ्ट कर दिया गया है?" शलाका ने आर्ची से कहा।
थोड़ी ही देर के बाद शलाका के दिमाग में आर्ची की आवाज उभरी- “अष्टकोण अभी भी म्यूजियम में है, पर अमृत की शीशी आज से 4 दिन पहले ही म्यूजियम से गायब हो चुकी है।"
"क्याऽऽऽऽ? कैसे?” शलाका ने तेज आवाज में कहा- “मुझे तुरंत उसके बारे में सारी जानकारी चेक करके बताओ।
“क्या हुआ? जेम्स ने शलाका से पूछा। शलाका ने सारी बात जेम्स को बता दी।
“इसका मतलब कि किसी को अमृत की शीशी के बारे में सबकुछ पता चल गया है?" जेम्स ने कहा।
तभी फिर शलाका के दिमाग में आर्ची की आवाज उभरी- “म्यूजियम को भी अभी उस चोरी के बारे में ज्यादा कुछ नहीं पता, पर 4 दिन पहले ही एक स्कूल के बच्चों का ग्रुप म्यूजियम में घूमने आया था, उसी के बाद से उस अमृत की शीशी का कुछ पता नहीं है।"
इस बार आर्ची की आवाज, जेम्स को भी सुनाई दे रही थी, शायद शलाका ने जेम्स को भी उन बातों में शामिल कर लिया था।
यह जेम्स के लिये अच्छा ही था। अब बार-बार उसे शलाका से पूछने की जरुरत नहीं पड़नी थी कि उसकी आर्ची से क्या बात हो रही थी?
“आर्ची, उस दिन के म्यूजियम के सभी सी.सी.टी.वी. कैमरे को चेक करो और यह देखो कि कौन सा बच्चा उस दिन अमृत की शीशी के पास था?"
शलाका की बात सुन आर्ची काम पर लग गई। इधर रेस्टोरेंट में खाना भी सर्व हो चुका था, जिसे जेम्स ने प्लेट में निकालना शुरु कर दिया था।
कुछ देर बाद फिर से आर्ची की आवाज उभरी “शलाका, एक बच्चा बार-बार उस अमृत की शीशी को देख रहा था। किसी भी फुटेज में उसे अमृत की शीशी को निकालते तो नहीं देखा गया, पर म्यूजियम से निकलते समय, उसकी जेब थोड़ी फूली हुई थी और म्यूजियम से निकलते समय, वह बच्चा स्कैनर के बगल से निकला था, जिसकी वजह से किसी भी प्रकार का अलार्म नहीं बजा। बच्चा होने की वजह से सिक्योरिटी वालों ने इस बात पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया था।"
“वेरी गुड आर्ची अब जरा उस स्कूल के डेटा को सर्च करके, उस बच्चे का पता निकालो और मुझे दो।" यह कहकर शलाका फिर से अपना खाना खाने लगी।
कुछ देर बाद आर्ची की आवाज पुनः आई- “उस बच्चे का डेटा, हमें स्कूल के रिकार्ड में नहीं मिला शायद वह बच्चा उस स्कूल का था ही नहीं... वह उनके बीच किसी तरह से घुस गया था?"
“मुझे ऐसी ही कुछ आशा थी।” शलाका ने जोर से साँस लेते हुए कहा- “शायद वह कोई बहुरुपिया है, जो बच्चे का भेष बनाकर घूम रहा है आर्ची, तुम तुरंत उस बच्चे का फोटो, पूरे न्यूयार्क के कैमरे में स्कैन करो और पता करो कि क्या वह बच्चा अब भी न्यूयार्क में ही है या फिर कहीं चला गया?
“वह बच्चा, अब भी न्यूयार्क में है, इस समय वह म्यूजियम के पास ही, ‘फोर्ट ट्रायन पार्क' में सूर्य नमस्कार कर रहा है।” आर्ची ने कहा।
“वेरी गुड आर्ची, तुम उस पर नजर रखो, हम अभी वहां पहुंचते हैं।” यह कहकर शलाका अपनी कुर्सी से खड़ी हो गई।
तब तक जेम्स ने भी अपना खाना खत्म कर लिया था, इसलिये वह भी शलाका के पीछे उठकर भागा।
शलाका ने कैश काउंटर पर जाकर अपना बिल पे किया, पर जैसे ही वह वहां से निकलने लगी, उसका रास्ता रोककर विक्रम खड़ा हो गया।
“वारुणी, तुम यहां हो और मैं कब से वहां टेबल पर बैठकर तुम्हारा इंतजार कर रहा हूं।” विक्रम ने कहा।
विक्रम को वहां देख शलाका हैरान हो गई।
“अरे विक्रम तुम यहां न्यूयार्क में क्या कर रहे हो? और...और तुम मुझे वारुणि कहकर क्यों संबोधित कर रहे हो? मैं तो शलाका हूं तुम भूल गये क्या?"
"शलाका?” विक्रम ने ना समझने वाले अंदाज में कहा- “ये तुम कैसी बातें कर रही हो वारुणि अभी कुछ देर पहले ही तो तुम मुझे उस टेबल पर बैठाकर, इधर आई थी। इतनी जल्दी तुम यह बात कैसे भूल सकती हो?"
“शलाका, वह बालक अब पार्क के अंदर की ओर जा रहा है और पार्क के उस स्थान पर कोई कैमरा नहीं है, तुम्हें जल्दी उसके पास पहुंचना होगा।” आर्ची ने शलाका को कहा।
आर्ची की बात सुन शलाका तेजी से रेस्टोरेंट के बाहर की ओर निकलती हुई बोली- “तुम यहीं रुको विक्रम। मैं अभी वापस आकर तुमसे बात करती हूं..कहीं जाना नहीं?"
विक्रम ठगा सा वहां खड़ा, दूर जा रही शलाका...म....मेरा मतलब है कि वारुणि को देख रहा था।
जारी रहेगा_____
