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- Dec 5, 2013
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जुनैद और उसके घरवालों के जाने के बाद पूरे घर में हंगामा सा हो रखा था. हिना foot-foot कर रट हुए रुबीना से लिपटी हुई थी, और अब्बास गुस्से में तेज़ आवाज़ में चिल्ला रहा था. सुप्रिया मुँह लटकाये रुबीना के पास hi कड़ी थी, और इक़बाल छुप चाप चारपाई पर बैठा था. पिछले दो घंटो से चल रही बहस ने सबको बुरी तरह से थका दिया था, पर बात ख़तम होने का नाम नहीं ले रही थी.
हिना अपनी रोटी हुई आवाज़ में, सर हिलाते हुए चीख पड़ी - मैं नहीं करुँगी उससे शादी... मैं नहीं छोडूंगी अपनी पड़े!
पता नहीं ये बात वह अब तक कितनी बार दोहरा चुकी थी. पर इस बार उसकी आवाज़ बदली हुई सी थी, जैसे इतनी देर की बहस के बाद और भी बुलंद हो गयी हो.
अब्बास भी और ज्यादा भड़क उठा - शादी तोह हो कर रहेगी! कल से ये कॉलेज वोल्लेगे जाना सब बंद!! मैं देखता हूँ कैसी जाती है ये कॉलेज... साड़ी किताबे फाड़ दूंगा!
हिना भी पूरी बग़ावत पर उतर आयी - मैं देखती हु कैसे रोकते हो आप मुझे... मैं घर से भाग जयुंगी!
यह सुनते hi अब्बास गुस्से में उसकी तरफ लपका, शायद उसे मारने के लिए. हिना डर के मारे जल्दी से रुबीना और सुप्रिया के पीछे छुप गयी. उसकी सिसकती हुई चीखें पूरे घर में गूँज रही थी.
रुबीना कांपते हुए बोली - अभी गुस्से में है... इसे नहीं पता क्या बोल रही है...
हिना पीछे से बोली - मुझे अच्छे से पता है मैं क्या बोल रही हूँ...
रुबीना बात को और बिगड़ने नहीं देना चाहती थी और वह झुंझलाते हुए बोली - बस कर अब! सुप्रिया... इसे ऊपर लेकर जायो...
सुप्रिया खुद भी काफी दरी हुई थी, फिर भी उसने हिना के कंधे पर हाथ रख कर उसे संभाला और अपनी और खींचते हुए उसे ऊपर की और ले जाने लगी. हिना jaate-jaate भी रोटी और चिल्लाती रही.
अब्बास ने तीखी नज़रो से रुबीना को घूरते हुए देखा - तुमने hi इसे सर पर छडा दिया है... हर बात पर इसकी हिमायत करती हो. अब तोह घर से भागने की भी हिम्मत आ गयी है इसमें.
रुबीना ने धीरे से कहा - अभी बस गुस्से में बोल रही है... आप भी जानते है वह कुछ गलत नहीं करेगी...
अब्बास ने इक़बाल को घूरा - क्यों नहीं करेगी... ये भी तोह भगा के लाया था न किसी को... तोह क्यों नहीं भागेगी ये भी?
रुबीना छुप चाप ज़मीन पर देख रही थी. वह इस बात को आगे नहीं बढ़ाना चाहती थी.
अब्बास ने कड़वाहट के साथ कहा - इससे तोह ाचा होता तू वापिस hi नहीं आता यहाँ...
इक़बाल के होंठ गुस्से में बहार की और निकले हुए थे. वह गुस्से में उठा - आप नहीं चाहते मैं यहाँ राहु... तोह मैं चला जायूँगा यहाँ से...
रुबीना के होंठ से बस एक बोहोत hi धीमी सी आवाज़ निकली - नहीं...
अब्बास ने अपना फैसला सुनते हुए कहा - ये शादी तोह हो कर रहेगी! कोई यहाँ रहे या न रहे.
रुबीना - आप एक बार फिर सोच लो... आप जानते तोह हो उन लोगो को... कोई ाचा न बोले उनके बारे में. कुछ गलत न हो जाये वहां... हिना का सोचिये...
अब्बास - क्या गलत होगा?? खान साब खुद उठ कर यहाँ आये थे न हिना का रिश्ता मांगने... मैं उनको मन न कर सकू. और तुम लोग जो भी कहलो... मैं जहाँ कहूंगा वहीँ शादी होगी हिना की.
रुबीना ने बेचैनी से इक़बाल की तरफ देखा, जैसे चाहती हो वह भी कुछ बोले. लेकिन इक़बाल चुपचाप ज़मीन को घूरता रहा. अचानक से वह तेज़ी से कदम लेता हुआ घर से बहार निकल गया. पीछे रुबीना रह गयी, अब्बास की कड़वी बातें सुनने के लिए.
सुबह कब शाम हो गयी, किसी को पता hi नहीं चला. ऊपर कमरे में हिना सुप्रिया की गोदी में सर रख कर subakte-subakte सो चुकी थी. उसके सारे ख्वाब जैसे dheere-dheere बिखर रहे थे… उड़ते हुए, कहीं बहुत दूर.
नींद में भी हिना के होंठ काँप रहे थे, जैसे कोई बुरा सपना उसका पीछा कर रहा हो. कभी कभी वह सिसक कर रो पड़ती और सुप्रिया हलके से उसे माथे पर हाथ फेर देती.
तभी कमरे का दरवाज़ा हल्का सा खुला, रुबीना कमरे में अंदर आयी थी. उसकी नज़र पहले हिना पर गयी और फिर सुप्रिया की और. सुप्रिया को देखते hi उसके चेहरे पर एक गहरी नाराज़गी साफ़ दिख रही थी, जैसे वह उससे बोल रही हो की - देख लिया नतीजा इस सब का!
हिना दरवाज़ा खुलने की आवाज़ से हड़बड़ा कर नींद से जाग गयी और बेचैनी से रोने लगी. रुबीना और सुप्रिया तुरंत हिना को शांत करने की कोशिश करने लगे.
सुप्रिया - शहहह... सब ठीक हो जायेगा...
शायद उसे भी नहीं पता नहीं की कुछ ठीक होगा या नहीं. कैसे होगा, ऐसा लग नहीं रहा था की यहाँ किसी और की बात सुनी जाएगी. हिना ने फिर से अपनी आँखें बंद कर ली.
रुबीना - मैं इसे नीचे ले जाती हु... वहां सो जाएगी...
सुप्रिया - नहीं... यहीं लेते रहने दीजिये... यहीं सो जाएगी मेरे साथ...
रुबीना - और इक़बाल?
सुप्रिया - वह नीचे सो जायेंगे?
रुबीना - ठीक है... मैं उसे बोल देती हूँ... तुम अंदर से कुण्डी लगा लेना...
रात सुप्रिया और हिना साथ में ऊपर के कमरे में सोये रहे. हिना तोह जैसे बेहोश hi पड़ी थी.
सुप्रिया के दिमाग में बस आज का पूरा दिन hi चल रहा था और उसे नींद नहीं आ रही थी.
आज उसके पीरियड भी ख़तम हो गए थे, और जाने क्यों उसकी छूट बुरी तरह फड़क रही थी. इस ठण्ड भरी रात में उसका जिस्म इतना अकेला और अधूरा सा क्यों महसूस हो रहा था. इक़बाल जिस बेदर्दी से उसके साथ वह सब करता था, जाने क्यों उस सब के बारे में सोचते hi उसके पूरे जिस्म में एक आग सी लग गयी थी.
उफ्फ्फ... उसे क्या होने लगा था. उस इन सबसे चीज़ो से नफरत की जगह एक अजीब सा एहसास होने लगा था, जैसे वह अभी जाकर उस से लिपट जाये और अपने आप को उसके हवाले कर दे. पिछले कुछ दिनों के पीरियड्स ने उसके नीचे एक अलग hi प्यास जगा दी थी.
सुप्रिया का हाथ अपनी छूट पर गया और वह बहार से धीरे धीरे मसलने लगी. उसे अपने ऊपर गुस्सा सा आ रहा था, और वह गुस्से में धीरे धीरे कुछ गालियां बुदबुदाने लगी - कुत्ता... साला... बहनचोद... हरामज़ादा... एहि सब सुन्ना चाहता है न वह मेरे मुँह से....
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अगले दिन भी जैसे घर में एक मायूसी का माहौल बना रहा. हिना कॉलेज नहीं गयी थी और उसकी चहकती हुई आवाज़ भी अब गायब हो चुकी थी. कल जैसी चीख चिल्लाहट तोह नहीं थी, पर इस ख़ामोशी में भी एक तूफ़ान सा महसूस हो रहा था.
सुबह से रात तक अब्बास और इक़बाल तोह काम पर hi रहे, पर अब्बास घर बहार से ताला लगा गया था. आखिर रात हुई और सब अपने अपने कमरों में पहुंचे.
सुप्रिया अपने आप को इक़बाल के साथ अकेला पा कर शर्म सी महसूस कर रही थी, पर जल्द hi इक़बाल और सुप्रिया बिस्तर पर लेट गए और सार्ड रात के अँधेरे में एक दुसरे से लिपटे हुए एक दुसरे को हलके चूम रहे थे. इक़बाल की बाहों में जो गर्मी मिल रही थी वह कल से हो रही टेंशन को थोड़ा हल्का कर रही.
जो हो रहा था उसके बारे में सोचते हुए सुप्रिया के आंसू बहते हुए उसके गालों पर आये और इक़बाल को उसकी सिसकी से महसूस हुआ की वह रो रही है.
इक़बाल - क्या हुआ सुप्रिया... तुम रो क्यों रही हो...
सुप्रिया - बस ऐसे hi...
इक़बाल - बताया न...
सुप्रिया - बस... जो कुछ भी हो रहा है... ऐसा लग रहा है... सब मेरी गलती है. न मैं आपको उस दिन कुछ बताती... न hi ये सब होता. मैं जहाँ जाती हूँ... वहीँ कुछ न कुछ गलत हो जाता है.
इक़बाल - ऐसा बिलकुल मत सोचो... इसमें तुम्हारी कोई गलती नहीं है... हिना की शादी तोह होनी hi है न एक दिन...
सुप्रिया ने अपने आंसू पोछते हुए पूछा - पर वह खुश नहीं है इससे. क्या आप कुछ नहीं कर सकते इस सब के बारे में?
इक़बाल धीरे से बोलै - नहीं... ये उनका फैसला है... मैं क्या hi कर सकता हूँ.
सुप्रिया सोचने लगी, शायद इक़बाल गलत तोह नहीं कह रहा था. गाँव की लड़कियों की शादी तोह काम उम्र में hi हो जाती है - हम्म्म्म.... पर एक बार हिना की शादी हो गयी... तोह इस घर में रहना कितना अजीब सा लगेगा...
इक़बाल - हाँ....
सुप्रिया - आप उन दिन कह रहे थे न... हम यहाँ से कहीं दूर चले जाते है. क्या हम यहाँ से सच में कहीं जा सकते है...
इक़बाल थोड़ा हैरान होते हुए बोलै - तुम सच में मेरे साथ यहाँ से चलना चाहोगी?
सुप्रिया की आवाज़ में थोड़ी सी उदासी थी - अब तोह शायद आपके इलावा मेरा और कोई ठिकाना भी नहीं है... मैं कहाँ जयुंगी... मैं शायद अपने घर भी नहीं जा सकती अब.
इक़बाल - तुम्हे लगता है तुम मेरे साथ यहाँ फास गयी हो? मैं तुम्हे मेहफ़ूज़ रखने के लिए यहाँ लाया था... और सोचा है अब तोह ज़िन्दगी भर तुम्हे मेहफ़ूज़ रखूँगा. पर अगर तुम जाना चाहती हो तोह मैं तुम्हे वहां छोड़ ायूँगा.
सुप्रिया - नहीं... ऐसा नहीं है. बस... कभी कभी... मुझे भी अपने घर की याद आती है... अपने परिवार की. पर शायद हिना की तरह... वहां मेरी भी किसी को फिक्र नहीं है...
इक़बाल - तुम ऐसा मत सोचो... मैं हूँ न. मैं ले जायूँगा तुम्हे उनके पास... शायद बोहोत पहले hi ले जाना चाहिए था...
सुप्रिया सोचने लगी, पता नहीं वह अब क्या मुँह लेकर जाएगी अपने घरवालों के पास. क्या बताएगी वह उन्हें... की उसने एक और शादी कर ली है... और वह एक ऐसे इंसान से? वह शायद कभी इस बात को नहीं समझ पाएंगे. कई बार तोह उसे खुद भी समझ नहीं आता था वह यहाँ क्यों थी. पर फिर न जाने क्यों उसका मैं में एहि ख्याल आता, जो भी हो इक़बाल से उसने शादी की थी, वह उसका पति था अब. और अब तोह वह पूरी तरह से उसकी हो चुकी थी.
उसके नीचे फिर एक मीठी सी तीस उठी और उसे महसूस हुआ की इक़बाल ने अपना पेअर उसके पेअर पर रख दिया था.
इक़बाल - हिना की शादी के बाद मैं तुम्हे वहां ले जायूँगा... और उसके बाद हम लोग यहाँ कभी वापिस नहीं आएंगे... कहीं दूर अपनी एक नयी ज़िन्दगी बसा लेंगे... तुम अगर मेरे साथ चलोगी तोह. मैं तुम्हारा हाथ कभी नहीं छोड़ना चाहता.
सुप्रिया ने हलके से मुस्कुरा के इक़बाल का हाथ पकड़ लिया. क्या इतना भरोसा हो गया था उसे इक़बाल पर. इक़बाल की गरम हथेली ने उसका हाथ कास के पकड़ लिया. इक़बाल उसके मुलायम हथेलियों को आराम से मसल रहा था.
इक़बाल धीरे से बोलै - मैं अगर अपने दिल की बात बतायु तोह...
सुप्रिया - हाँ... बोलिये न...
इक़बाल - मैं चाहता हूँ... तुम्हारे साथ... मतलब हमारे... बच्चे हो. तुम्हारी तरह बेहद खूबसूरत होंगे वह. मैं हमेशा से एहि चाहता था... पर शायद किस्मत को मंज़ूर नहीं था...
सुप्रिया ने शरमाते हुए अपनी आँखें झुका ली. इस सब के बारे में उसने कभी ज्यादा सोचा नहीं था, पर आखिर हर औरत चाहती की वह एक दिन माँ बने. इक़बाल के साथ... उफ्फ्फ... पर उसके साथ नहीं तोह किसके साथ... वह hi तोह उसका शौहर था. सोचते hi उसके मैं में एक अजीब सी बेचैनी होने लगी थी.
इक़बाल ने उसका हाथ थोड़ा और कास के पकड़ लिया - मैंने बोहोत दिनों से अपने आप को रोका हुआ है. आज मुझे दिल खोल कर तुम्हे प्यार करने देना. मुझे रोकना मत कुछ करने से.
सुप्रिया ने कांपते हुए धीरे से हाँ में सर हिलाया. इक़बाल ने तुरंत hi सुप्रिया की कमर पर हाथ रखते हुए उसे अपनी और खींचा और उसकी टांगो को अपनी टांगो के नीचे दबा लिया. वह उसकी पीठ पर अपने हाथ फेरने लगा. उसके स्पर्श से hi सुप्रिया का पूरा शरीर अकड़ने सा लगा था. इक़बाल हलके हलके सुप्रिया के माथे को चूम रहा था.
इक़बाल का हाथ सरकता हुआ था थोड़ा नीचे उसकी पयजामि तक पंहुचा. और उसकी उंगलियां उसकी गांड की दरार को हलके हलके कुरेदने लगी.
सुप्रिया की सांसें तेज़ होनी शुरू हो गयी और उसकी हलकी सी सिसकी निकल गयी.
सुप्रिया - सससससस.... अह्ह्ह....
इक़बाल धीरे से सुप्रिया के कान में बोलै - अगर मैं आज वह करू.... जो काफी दिनों से मेरा मैं था करने का... तोह करने डौगी न...
सुप्रिया समझ गयी की उसका इशारा किस तरफ था. इक़बाल की उंगलियां उसकी गांड को पयजामि के ऊपर से hi उसकी दरार में घुसते हुए वह हिस्सा अच्छे से महसूस कर रही थी.
सुप्रिया ने घबराते हुए पुछा - वहां... वहां करना ज़रूरी है क्या?
इक़बाल - हाँ... हम दोनों को बोहोत मज़ा आएगा. हर मर्द की ख्वाइश होती है... की वह अपनी औरत को वहां चोदे. लाभ किसी मर्द ने तुम्हारे साथ भी ये सब करना चाहा होगा. कभी किसी की गोदी में बैठी हो और ये महसूस किया हो की वह नीचे से तुम्हारे कपडे फाड़ कर तुम्हारी गोल मटोल गांड में अपना लुंड घुसेड़ना चाहता हो...
इक़बाल की बातें सुप्रिया को बुरी तरह गरम कर रही थी. सुप्रिया ने हलकी सी सिसकी ली. उसे याद आया, विक्रम भी तोह कई बार वहां करने को कहता था, पर वह हर बार मन कर देती थी.
उसे अभी से अपनी गांड का छेड़ ज़ोर से बंद होता हुआ महसूस हुआ - नहीं... कभी नहीं...
इक़बाल हलके से मुस्कुराया और सुप्रिया की गांड को कास के दबाया - तब तोह शायद तुम्हे कोई असली मर्द मिला hi नहीं तुम्हारी ज़िन्दगी में. मैं बेहद खुशनसीब हूँ जिसे पहली बार तुम्हारी गांड मारने का मौका मिलेगा... शायद इसे मेरा hi इंतज़ार था...
सुप्रिया हलके से कसमसाई - पर वहां करने से... बच्चे नहीं होते... आप जानते है न...
इक़बाल एकदम से खुश होते हुए बोलै - यानी तुम भी मेरे साथ बच्चे करना चाहती हो! वह तोह हम करेंगे hi... बिफिकर रहो. बस आज की यात ये करने दो... एक बार कर लोगी न... तोह बार बार मैं करेगा की मैं तुम्हारी छूट की जगह तुम्हारी गांड में दालु...
इक़बाल ने आगे हाथ करते हुए सुप्रिया की पयजामि का नाडा ढीला किया और फिर उसकी पयजामि और पंतय को नीचे सरकाया. रजाई उन दोनों के पैरो पर आ गयी थी और सुप्रिया को अपनी गांड पर ठंडी हवा का एक झोका सा महसूस हो रहा था.
इक़बाल अपने बड़े हाथ से उसकी नरम ठंडी गांड सेहला रहा था. सुप्रिया को ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने जलते हुए अंगारे उसकी गांड पर लगा दिए हो. सुप्रिया ने हलके से हिलते हुए अपनी आँखें बंद कर ली, और एक गहरी सिसकी ली.
सुप्रिया - Ssssssssss.........
इक़बाल ने हलके से सुप्रिया की गांड को अपनी मुट्ठी में भरते हुए दबाया. सुप्रिया की पतली कमर पर उसकी गोल गांड बोहोत hi मजेदार लगती थी. बोहोत मोती तोह नहीं थी, पर काफी अच्छी गोल मटोल सी थी. उसे यकीन नहीं हो रहा था की वह पहला इंसान होने वाला था जो इस गांड में घुसने वाला था. आज के बाद सुप्रिया के जिस्म का हर हिस्से पर उसका hi नाम और निशाँ होगा.
इक़बाल - अह्ह्ह्ह.... सुप्रिया... कितनी मुलायम गांड है तुम्हारी... उफ्फ्फ.. बिलकुल किसी नरम गद्दे की तरह...
सुप्रिया सिसकते हुए हल्का सा हिल रही थी, पर नीचे से उन दोनों हाथों ने उसकी गांड को कास के पकडे हुआ था - उम्म्म्म... अह्ह्ह्हह.... इक़बाल जी.... मुझे बोहोत डर लग रहा है...
इक़बाल ने हलके से गांड पर हाथ फेरा, उसका लुंड गांड पर हाथ रखते hi अचे से खड़ा हो चूका था - तुम फिक्र मत करो. मैं धीरे से करूँगा. पर पूरा अंदर डालूंगा... तुम बस गहरी सांसें लेती रहना मेरी जान.
सुप्रिया ने बेचैनी में अपने पैरो की उँगलियों को बिस्तर पर रगड़ा. उस दिन कितनी मुश्किल से तोह वह उसके लुंड को झेल पायी थी, पता नहीं अब वह इस लुंड को कैसे ले पाएगी अपनी गांड में.
इक़बाल ने अपना हाथ टेढ़ा करके सुप्रिया की गांड में हलके से घिसा. हाथ ने दरार में घुसते हुए दोनों गोलों को थोड़ा अलग कर दिया. सुप्रिया तुरंत थोड़ा पीछे की और खिसक गयी.
सुप्रिया - ुह्ह्ह्ह... नहीं नहीं नहीं.... नहीं हो पायेगा वहां... मुझे बोहोत दर्द होगा...
इक़बाल - एक बार सब हो जाने दो... फिर पूछूंगा की दर्द ज्यादा बड़ा था या मज़ा...
इक़बाल ने सुप्रिया की कुर्ती को थोड़ा ऊपर सरकाया और सुप्रिया की गांड की गोलियां को आराम से मसलने लगा. किसी भी लड़की का इस हालत में डरना लाज़मी था, वह भी अच्छे से समझता था.
इक़बाल ने अपना पायजामा और अंडरवियर नीचे सरकाया और उसका मोटा लम्बा लुंड तन्न से खड़ा हो कर बहार निकला और सुप्रिया की तरफ लहराने लगा.
सुप्रिया ने नीचे उस पर एक नज़र डाली और उसके पसीने छूट गए - Uhhhh....sssss.... अंदर डालने से पहले तेल लगा लो उस पर... अंदर नहीं जायेगा ऐसे ये...
इक़बाल मुस्कुराया, काम से काम वह लुंड को अंदर लेने के बारे में सोचने तोह लगी थी - कहाँ नहीं जायेगा अंदर?
सुप्रिया का छाती ऊपर नीचे हो रही थी, इक़बाल का सर उसके सर के ठीक ऊपर था और वह उसकी आँखों में देख रहा था - वहीँ... जहाँ आप...
इक़बाल - क्या नाम है उस जगह का...
सुप्रिया के मुँह से वह शब्द नहीं निकल रहा था - मममम.....
इक़बाल ने उसके चेहरे को आराम से अपनी हाथ में पकड़ा. उसके बड़े से हाथ में सुप्रिया को पूरा चेहरा समां गया - बोलो... क्या नाम है उस जगह है... और क्या जायेगा उसके अंदर... बोल पाओगी तुम...
इक़बाल ने उसका चेहरा पकडे रखा ताकि वह उसकी आँखों में देखती रहे. चेहरे पर उसकी पकड़ और मज़बूत हो रही थी, जैसे वह उस पर पूरी तरह से हावी हो रहा हो. इक़बाल का दूसरा हाथ अभी भी सुप्रिया की गांड से खेल रहा था.
सुप्रिया धीरे से बुदबुदायी - मेरी... मेरी... गांड... आपका लुंड...
इक़बाल ने तुरंत सुप्रिया के चेहरे पर अपनी पकड़ ढीली करि और सुप्रिया ने अपना चेहरा नीचे कर लिया.
इक़बाल - आज रात के बाद तुम्हे कोई दिक्कत नहीं होगी इस शब्द को बोलने में... अब ज़रा मेरे लुंड को गीला कर दो, ताकि वह आराम से अंदर जा पाए.
इक़बाल ने सुप्रिया की कुर्ती को खींचते हुए ऊपर किया और उसकी ब्रा का हुक खोल कर उसे ऊपर से पूरा नंगा कर दिया. वह अपने पेअर छोड़े करके सुप्रिया के ऊपर आया और धीरे से अपना लुंड उसके मुँह में घुसाने लगा.
दोनों हाथ से पकड़ा हुआ इक़बाल के मोठे लुंड का सिर्फ ऊपर का हिस्सा सुप्रिया के मुँह में जा रहा था. अब तोह जैसे सुप्रिया को उसके लुंड को चूसने की आदत सी पद गयी थी, और इक़बाल को रोज़ रात को चुसवाने के.
इक़बाल थोड़ा आगे खिसका - पूरा गीला कर दो... अपने थूक से...
सुप्रिया ने लुंड पर हलके से थूका और और अपने हाथ से उसके लुंड पर मसलने लगी.
सुप्रिया ने रूठते हुए कहा - मुँह में नहीं लुंगी अब... मैं थक जयुंगी...
इक़बाल - ठीक है मेरी जान... जैसे तुम कहो... मुझे तोह बस वहां नीचे करना है.
इक़बाल सुप्रिया के ऊपर से हटा और एक हाथ में hi उसे पूरा घुमा दिया. सुप्रिया बिस्तर पर उलटी लेती हुई थी और सुप्रिया की गोरी गद्देदार गांड को देखते hi उसका लुंड अपने आप हिलने लगा. गांड और जांघें जहाँ मिल रही थी वहां एक हलकी सी रेखा बन रही थी जो गांड को बेहद आकर्षक बना रही थी.
इक़बाल - अपनी ज़िन्दगी में बोहोत साड़ी गांड देखि है... पर तुम्ह जैसी कभी नहीं... और तुमने कभी मेरे जैसा लुंड नहीं महसूस किया होगा... और न कभी करोगी...
सुप्रिया ने अपनी आँखें बंद कर ली, जो होने वाला था वह उसे रोक नहीं सकती थी. उसने अपने आप को पूरी तरह इक़बाल को सौंप दिया था.
इक़बाल ने सुप्रिया की कमर पर हाथ रखते हुए उसकी गांड को थोड़ा ऊपर किया. और फिर अपने दोनों हाथ उसकी गांड पर रखते हुए अचे से जकड लिया. वह उसके गांड के गोलों को कास के पकडे हुए हिलने लगा और फिर उन्हें एक दुसरे से थोड़ा अलग किया.
उसे सुप्रिया का छोटा सा गांड का छेड़ दिखा. बिलकुल साफ़.. न उस पर कोई बाल थे... न कालिख. इस छोटे से छेड़ को आज बड़ा करने में बोहोत मज़ा आने वाला था उसे.
जुनैद और उसके घरवालों के जाने के बाद पूरे घर में हंगामा सा हो रखा था. हिना foot-foot कर रट हुए रुबीना से लिपटी हुई थी, और अब्बास गुस्से में तेज़ आवाज़ में चिल्ला रहा था. सुप्रिया मुँह लटकाये रुबीना के पास hi कड़ी थी, और इक़बाल छुप चाप चारपाई पर बैठा था. पिछले दो घंटो से चल रही बहस ने सबको बुरी तरह से थका दिया था, पर बात ख़तम होने का नाम नहीं ले रही थी.
हिना अपनी रोटी हुई आवाज़ में, सर हिलाते हुए चीख पड़ी - मैं नहीं करुँगी उससे शादी... मैं नहीं छोडूंगी अपनी पड़े!
पता नहीं ये बात वह अब तक कितनी बार दोहरा चुकी थी. पर इस बार उसकी आवाज़ बदली हुई सी थी, जैसे इतनी देर की बहस के बाद और भी बुलंद हो गयी हो.
अब्बास भी और ज्यादा भड़क उठा - शादी तोह हो कर रहेगी! कल से ये कॉलेज वोल्लेगे जाना सब बंद!! मैं देखता हूँ कैसी जाती है ये कॉलेज... साड़ी किताबे फाड़ दूंगा!
हिना भी पूरी बग़ावत पर उतर आयी - मैं देखती हु कैसे रोकते हो आप मुझे... मैं घर से भाग जयुंगी!
यह सुनते hi अब्बास गुस्से में उसकी तरफ लपका, शायद उसे मारने के लिए. हिना डर के मारे जल्दी से रुबीना और सुप्रिया के पीछे छुप गयी. उसकी सिसकती हुई चीखें पूरे घर में गूँज रही थी.
रुबीना कांपते हुए बोली - अभी गुस्से में है... इसे नहीं पता क्या बोल रही है...
हिना पीछे से बोली - मुझे अच्छे से पता है मैं क्या बोल रही हूँ...
रुबीना बात को और बिगड़ने नहीं देना चाहती थी और वह झुंझलाते हुए बोली - बस कर अब! सुप्रिया... इसे ऊपर लेकर जायो...
सुप्रिया खुद भी काफी दरी हुई थी, फिर भी उसने हिना के कंधे पर हाथ रख कर उसे संभाला और अपनी और खींचते हुए उसे ऊपर की और ले जाने लगी. हिना jaate-jaate भी रोटी और चिल्लाती रही.
अब्बास ने तीखी नज़रो से रुबीना को घूरते हुए देखा - तुमने hi इसे सर पर छडा दिया है... हर बात पर इसकी हिमायत करती हो. अब तोह घर से भागने की भी हिम्मत आ गयी है इसमें.
रुबीना ने धीरे से कहा - अभी बस गुस्से में बोल रही है... आप भी जानते है वह कुछ गलत नहीं करेगी...
अब्बास ने इक़बाल को घूरा - क्यों नहीं करेगी... ये भी तोह भगा के लाया था न किसी को... तोह क्यों नहीं भागेगी ये भी?
रुबीना छुप चाप ज़मीन पर देख रही थी. वह इस बात को आगे नहीं बढ़ाना चाहती थी.
अब्बास ने कड़वाहट के साथ कहा - इससे तोह ाचा होता तू वापिस hi नहीं आता यहाँ...
इक़बाल के होंठ गुस्से में बहार की और निकले हुए थे. वह गुस्से में उठा - आप नहीं चाहते मैं यहाँ राहु... तोह मैं चला जायूँगा यहाँ से...
रुबीना के होंठ से बस एक बोहोत hi धीमी सी आवाज़ निकली - नहीं...
अब्बास ने अपना फैसला सुनते हुए कहा - ये शादी तोह हो कर रहेगी! कोई यहाँ रहे या न रहे.
रुबीना - आप एक बार फिर सोच लो... आप जानते तोह हो उन लोगो को... कोई ाचा न बोले उनके बारे में. कुछ गलत न हो जाये वहां... हिना का सोचिये...
अब्बास - क्या गलत होगा?? खान साब खुद उठ कर यहाँ आये थे न हिना का रिश्ता मांगने... मैं उनको मन न कर सकू. और तुम लोग जो भी कहलो... मैं जहाँ कहूंगा वहीँ शादी होगी हिना की.
रुबीना ने बेचैनी से इक़बाल की तरफ देखा, जैसे चाहती हो वह भी कुछ बोले. लेकिन इक़बाल चुपचाप ज़मीन को घूरता रहा. अचानक से वह तेज़ी से कदम लेता हुआ घर से बहार निकल गया. पीछे रुबीना रह गयी, अब्बास की कड़वी बातें सुनने के लिए.
सुबह कब शाम हो गयी, किसी को पता hi नहीं चला. ऊपर कमरे में हिना सुप्रिया की गोदी में सर रख कर subakte-subakte सो चुकी थी. उसके सारे ख्वाब जैसे dheere-dheere बिखर रहे थे… उड़ते हुए, कहीं बहुत दूर.
नींद में भी हिना के होंठ काँप रहे थे, जैसे कोई बुरा सपना उसका पीछा कर रहा हो. कभी कभी वह सिसक कर रो पड़ती और सुप्रिया हलके से उसे माथे पर हाथ फेर देती.
तभी कमरे का दरवाज़ा हल्का सा खुला, रुबीना कमरे में अंदर आयी थी. उसकी नज़र पहले हिना पर गयी और फिर सुप्रिया की और. सुप्रिया को देखते hi उसके चेहरे पर एक गहरी नाराज़गी साफ़ दिख रही थी, जैसे वह उससे बोल रही हो की - देख लिया नतीजा इस सब का!
हिना दरवाज़ा खुलने की आवाज़ से हड़बड़ा कर नींद से जाग गयी और बेचैनी से रोने लगी. रुबीना और सुप्रिया तुरंत हिना को शांत करने की कोशिश करने लगे.
सुप्रिया - शहहह... सब ठीक हो जायेगा...
शायद उसे भी नहीं पता नहीं की कुछ ठीक होगा या नहीं. कैसे होगा, ऐसा लग नहीं रहा था की यहाँ किसी और की बात सुनी जाएगी. हिना ने फिर से अपनी आँखें बंद कर ली.
रुबीना - मैं इसे नीचे ले जाती हु... वहां सो जाएगी...
सुप्रिया - नहीं... यहीं लेते रहने दीजिये... यहीं सो जाएगी मेरे साथ...
रुबीना - और इक़बाल?
सुप्रिया - वह नीचे सो जायेंगे?
रुबीना - ठीक है... मैं उसे बोल देती हूँ... तुम अंदर से कुण्डी लगा लेना...
रात सुप्रिया और हिना साथ में ऊपर के कमरे में सोये रहे. हिना तोह जैसे बेहोश hi पड़ी थी.
सुप्रिया के दिमाग में बस आज का पूरा दिन hi चल रहा था और उसे नींद नहीं आ रही थी.
आज उसके पीरियड भी ख़तम हो गए थे, और जाने क्यों उसकी छूट बुरी तरह फड़क रही थी. इस ठण्ड भरी रात में उसका जिस्म इतना अकेला और अधूरा सा क्यों महसूस हो रहा था. इक़बाल जिस बेदर्दी से उसके साथ वह सब करता था, जाने क्यों उस सब के बारे में सोचते hi उसके पूरे जिस्म में एक आग सी लग गयी थी.
उफ्फ्फ... उसे क्या होने लगा था. उस इन सबसे चीज़ो से नफरत की जगह एक अजीब सा एहसास होने लगा था, जैसे वह अभी जाकर उस से लिपट जाये और अपने आप को उसके हवाले कर दे. पिछले कुछ दिनों के पीरियड्स ने उसके नीचे एक अलग hi प्यास जगा दी थी.
सुप्रिया का हाथ अपनी छूट पर गया और वह बहार से धीरे धीरे मसलने लगी. उसे अपने ऊपर गुस्सा सा आ रहा था, और वह गुस्से में धीरे धीरे कुछ गालियां बुदबुदाने लगी - कुत्ता... साला... बहनचोद... हरामज़ादा... एहि सब सुन्ना चाहता है न वह मेरे मुँह से....
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अगले दिन भी जैसे घर में एक मायूसी का माहौल बना रहा. हिना कॉलेज नहीं गयी थी और उसकी चहकती हुई आवाज़ भी अब गायब हो चुकी थी. कल जैसी चीख चिल्लाहट तोह नहीं थी, पर इस ख़ामोशी में भी एक तूफ़ान सा महसूस हो रहा था.
सुबह से रात तक अब्बास और इक़बाल तोह काम पर hi रहे, पर अब्बास घर बहार से ताला लगा गया था. आखिर रात हुई और सब अपने अपने कमरों में पहुंचे.
सुप्रिया अपने आप को इक़बाल के साथ अकेला पा कर शर्म सी महसूस कर रही थी, पर जल्द hi इक़बाल और सुप्रिया बिस्तर पर लेट गए और सार्ड रात के अँधेरे में एक दुसरे से लिपटे हुए एक दुसरे को हलके चूम रहे थे. इक़बाल की बाहों में जो गर्मी मिल रही थी वह कल से हो रही टेंशन को थोड़ा हल्का कर रही.
जो हो रहा था उसके बारे में सोचते हुए सुप्रिया के आंसू बहते हुए उसके गालों पर आये और इक़बाल को उसकी सिसकी से महसूस हुआ की वह रो रही है.
इक़बाल - क्या हुआ सुप्रिया... तुम रो क्यों रही हो...
सुप्रिया - बस ऐसे hi...
इक़बाल - बताया न...
सुप्रिया - बस... जो कुछ भी हो रहा है... ऐसा लग रहा है... सब मेरी गलती है. न मैं आपको उस दिन कुछ बताती... न hi ये सब होता. मैं जहाँ जाती हूँ... वहीँ कुछ न कुछ गलत हो जाता है.
इक़बाल - ऐसा बिलकुल मत सोचो... इसमें तुम्हारी कोई गलती नहीं है... हिना की शादी तोह होनी hi है न एक दिन...
सुप्रिया ने अपने आंसू पोछते हुए पूछा - पर वह खुश नहीं है इससे. क्या आप कुछ नहीं कर सकते इस सब के बारे में?
इक़बाल धीरे से बोलै - नहीं... ये उनका फैसला है... मैं क्या hi कर सकता हूँ.
सुप्रिया सोचने लगी, शायद इक़बाल गलत तोह नहीं कह रहा था. गाँव की लड़कियों की शादी तोह काम उम्र में hi हो जाती है - हम्म्म्म.... पर एक बार हिना की शादी हो गयी... तोह इस घर में रहना कितना अजीब सा लगेगा...
इक़बाल - हाँ....
सुप्रिया - आप उन दिन कह रहे थे न... हम यहाँ से कहीं दूर चले जाते है. क्या हम यहाँ से सच में कहीं जा सकते है...
इक़बाल थोड़ा हैरान होते हुए बोलै - तुम सच में मेरे साथ यहाँ से चलना चाहोगी?
सुप्रिया की आवाज़ में थोड़ी सी उदासी थी - अब तोह शायद आपके इलावा मेरा और कोई ठिकाना भी नहीं है... मैं कहाँ जयुंगी... मैं शायद अपने घर भी नहीं जा सकती अब.
इक़बाल - तुम्हे लगता है तुम मेरे साथ यहाँ फास गयी हो? मैं तुम्हे मेहफ़ूज़ रखने के लिए यहाँ लाया था... और सोचा है अब तोह ज़िन्दगी भर तुम्हे मेहफ़ूज़ रखूँगा. पर अगर तुम जाना चाहती हो तोह मैं तुम्हे वहां छोड़ ायूँगा.
सुप्रिया - नहीं... ऐसा नहीं है. बस... कभी कभी... मुझे भी अपने घर की याद आती है... अपने परिवार की. पर शायद हिना की तरह... वहां मेरी भी किसी को फिक्र नहीं है...
इक़बाल - तुम ऐसा मत सोचो... मैं हूँ न. मैं ले जायूँगा तुम्हे उनके पास... शायद बोहोत पहले hi ले जाना चाहिए था...
सुप्रिया सोचने लगी, पता नहीं वह अब क्या मुँह लेकर जाएगी अपने घरवालों के पास. क्या बताएगी वह उन्हें... की उसने एक और शादी कर ली है... और वह एक ऐसे इंसान से? वह शायद कभी इस बात को नहीं समझ पाएंगे. कई बार तोह उसे खुद भी समझ नहीं आता था वह यहाँ क्यों थी. पर फिर न जाने क्यों उसका मैं में एहि ख्याल आता, जो भी हो इक़बाल से उसने शादी की थी, वह उसका पति था अब. और अब तोह वह पूरी तरह से उसकी हो चुकी थी.
उसके नीचे फिर एक मीठी सी तीस उठी और उसे महसूस हुआ की इक़बाल ने अपना पेअर उसके पेअर पर रख दिया था.
इक़बाल - हिना की शादी के बाद मैं तुम्हे वहां ले जायूँगा... और उसके बाद हम लोग यहाँ कभी वापिस नहीं आएंगे... कहीं दूर अपनी एक नयी ज़िन्दगी बसा लेंगे... तुम अगर मेरे साथ चलोगी तोह. मैं तुम्हारा हाथ कभी नहीं छोड़ना चाहता.
सुप्रिया ने हलके से मुस्कुरा के इक़बाल का हाथ पकड़ लिया. क्या इतना भरोसा हो गया था उसे इक़बाल पर. इक़बाल की गरम हथेली ने उसका हाथ कास के पकड़ लिया. इक़बाल उसके मुलायम हथेलियों को आराम से मसल रहा था.
इक़बाल धीरे से बोलै - मैं अगर अपने दिल की बात बतायु तोह...
सुप्रिया - हाँ... बोलिये न...
इक़बाल - मैं चाहता हूँ... तुम्हारे साथ... मतलब हमारे... बच्चे हो. तुम्हारी तरह बेहद खूबसूरत होंगे वह. मैं हमेशा से एहि चाहता था... पर शायद किस्मत को मंज़ूर नहीं था...
सुप्रिया ने शरमाते हुए अपनी आँखें झुका ली. इस सब के बारे में उसने कभी ज्यादा सोचा नहीं था, पर आखिर हर औरत चाहती की वह एक दिन माँ बने. इक़बाल के साथ... उफ्फ्फ... पर उसके साथ नहीं तोह किसके साथ... वह hi तोह उसका शौहर था. सोचते hi उसके मैं में एक अजीब सी बेचैनी होने लगी थी.
इक़बाल ने उसका हाथ थोड़ा और कास के पकड़ लिया - मैंने बोहोत दिनों से अपने आप को रोका हुआ है. आज मुझे दिल खोल कर तुम्हे प्यार करने देना. मुझे रोकना मत कुछ करने से.
सुप्रिया ने कांपते हुए धीरे से हाँ में सर हिलाया. इक़बाल ने तुरंत hi सुप्रिया की कमर पर हाथ रखते हुए उसे अपनी और खींचा और उसकी टांगो को अपनी टांगो के नीचे दबा लिया. वह उसकी पीठ पर अपने हाथ फेरने लगा. उसके स्पर्श से hi सुप्रिया का पूरा शरीर अकड़ने सा लगा था. इक़बाल हलके हलके सुप्रिया के माथे को चूम रहा था.
इक़बाल का हाथ सरकता हुआ था थोड़ा नीचे उसकी पयजामि तक पंहुचा. और उसकी उंगलियां उसकी गांड की दरार को हलके हलके कुरेदने लगी.
सुप्रिया की सांसें तेज़ होनी शुरू हो गयी और उसकी हलकी सी सिसकी निकल गयी.
सुप्रिया - सससससस.... अह्ह्ह....
इक़बाल धीरे से सुप्रिया के कान में बोलै - अगर मैं आज वह करू.... जो काफी दिनों से मेरा मैं था करने का... तोह करने डौगी न...
सुप्रिया समझ गयी की उसका इशारा किस तरफ था. इक़बाल की उंगलियां उसकी गांड को पयजामि के ऊपर से hi उसकी दरार में घुसते हुए वह हिस्सा अच्छे से महसूस कर रही थी.
सुप्रिया ने घबराते हुए पुछा - वहां... वहां करना ज़रूरी है क्या?
इक़बाल - हाँ... हम दोनों को बोहोत मज़ा आएगा. हर मर्द की ख्वाइश होती है... की वह अपनी औरत को वहां चोदे. लाभ किसी मर्द ने तुम्हारे साथ भी ये सब करना चाहा होगा. कभी किसी की गोदी में बैठी हो और ये महसूस किया हो की वह नीचे से तुम्हारे कपडे फाड़ कर तुम्हारी गोल मटोल गांड में अपना लुंड घुसेड़ना चाहता हो...
इक़बाल की बातें सुप्रिया को बुरी तरह गरम कर रही थी. सुप्रिया ने हलकी सी सिसकी ली. उसे याद आया, विक्रम भी तोह कई बार वहां करने को कहता था, पर वह हर बार मन कर देती थी.
उसे अभी से अपनी गांड का छेड़ ज़ोर से बंद होता हुआ महसूस हुआ - नहीं... कभी नहीं...
इक़बाल हलके से मुस्कुराया और सुप्रिया की गांड को कास के दबाया - तब तोह शायद तुम्हे कोई असली मर्द मिला hi नहीं तुम्हारी ज़िन्दगी में. मैं बेहद खुशनसीब हूँ जिसे पहली बार तुम्हारी गांड मारने का मौका मिलेगा... शायद इसे मेरा hi इंतज़ार था...
सुप्रिया हलके से कसमसाई - पर वहां करने से... बच्चे नहीं होते... आप जानते है न...
इक़बाल एकदम से खुश होते हुए बोलै - यानी तुम भी मेरे साथ बच्चे करना चाहती हो! वह तोह हम करेंगे hi... बिफिकर रहो. बस आज की यात ये करने दो... एक बार कर लोगी न... तोह बार बार मैं करेगा की मैं तुम्हारी छूट की जगह तुम्हारी गांड में दालु...
इक़बाल ने आगे हाथ करते हुए सुप्रिया की पयजामि का नाडा ढीला किया और फिर उसकी पयजामि और पंतय को नीचे सरकाया. रजाई उन दोनों के पैरो पर आ गयी थी और सुप्रिया को अपनी गांड पर ठंडी हवा का एक झोका सा महसूस हो रहा था.
इक़बाल अपने बड़े हाथ से उसकी नरम ठंडी गांड सेहला रहा था. सुप्रिया को ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने जलते हुए अंगारे उसकी गांड पर लगा दिए हो. सुप्रिया ने हलके से हिलते हुए अपनी आँखें बंद कर ली, और एक गहरी सिसकी ली.
सुप्रिया - Ssssssssss.........
इक़बाल ने हलके से सुप्रिया की गांड को अपनी मुट्ठी में भरते हुए दबाया. सुप्रिया की पतली कमर पर उसकी गोल गांड बोहोत hi मजेदार लगती थी. बोहोत मोती तोह नहीं थी, पर काफी अच्छी गोल मटोल सी थी. उसे यकीन नहीं हो रहा था की वह पहला इंसान होने वाला था जो इस गांड में घुसने वाला था. आज के बाद सुप्रिया के जिस्म का हर हिस्से पर उसका hi नाम और निशाँ होगा.
इक़बाल - अह्ह्ह्ह.... सुप्रिया... कितनी मुलायम गांड है तुम्हारी... उफ्फ्फ.. बिलकुल किसी नरम गद्दे की तरह...
सुप्रिया सिसकते हुए हल्का सा हिल रही थी, पर नीचे से उन दोनों हाथों ने उसकी गांड को कास के पकडे हुआ था - उम्म्म्म... अह्ह्ह्हह.... इक़बाल जी.... मुझे बोहोत डर लग रहा है...
इक़बाल ने हलके से गांड पर हाथ फेरा, उसका लुंड गांड पर हाथ रखते hi अचे से खड़ा हो चूका था - तुम फिक्र मत करो. मैं धीरे से करूँगा. पर पूरा अंदर डालूंगा... तुम बस गहरी सांसें लेती रहना मेरी जान.
सुप्रिया ने बेचैनी में अपने पैरो की उँगलियों को बिस्तर पर रगड़ा. उस दिन कितनी मुश्किल से तोह वह उसके लुंड को झेल पायी थी, पता नहीं अब वह इस लुंड को कैसे ले पाएगी अपनी गांड में.
इक़बाल ने अपना हाथ टेढ़ा करके सुप्रिया की गांड में हलके से घिसा. हाथ ने दरार में घुसते हुए दोनों गोलों को थोड़ा अलग कर दिया. सुप्रिया तुरंत थोड़ा पीछे की और खिसक गयी.
सुप्रिया - ुह्ह्ह्ह... नहीं नहीं नहीं.... नहीं हो पायेगा वहां... मुझे बोहोत दर्द होगा...
इक़बाल - एक बार सब हो जाने दो... फिर पूछूंगा की दर्द ज्यादा बड़ा था या मज़ा...
इक़बाल ने सुप्रिया की कुर्ती को थोड़ा ऊपर सरकाया और सुप्रिया की गांड की गोलियां को आराम से मसलने लगा. किसी भी लड़की का इस हालत में डरना लाज़मी था, वह भी अच्छे से समझता था.
इक़बाल ने अपना पायजामा और अंडरवियर नीचे सरकाया और उसका मोटा लम्बा लुंड तन्न से खड़ा हो कर बहार निकला और सुप्रिया की तरफ लहराने लगा.
सुप्रिया ने नीचे उस पर एक नज़र डाली और उसके पसीने छूट गए - Uhhhh....sssss.... अंदर डालने से पहले तेल लगा लो उस पर... अंदर नहीं जायेगा ऐसे ये...
इक़बाल मुस्कुराया, काम से काम वह लुंड को अंदर लेने के बारे में सोचने तोह लगी थी - कहाँ नहीं जायेगा अंदर?
सुप्रिया का छाती ऊपर नीचे हो रही थी, इक़बाल का सर उसके सर के ठीक ऊपर था और वह उसकी आँखों में देख रहा था - वहीँ... जहाँ आप...
इक़बाल - क्या नाम है उस जगह का...
सुप्रिया के मुँह से वह शब्द नहीं निकल रहा था - मममम.....
इक़बाल ने उसके चेहरे को आराम से अपनी हाथ में पकड़ा. उसके बड़े से हाथ में सुप्रिया को पूरा चेहरा समां गया - बोलो... क्या नाम है उस जगह है... और क्या जायेगा उसके अंदर... बोल पाओगी तुम...
इक़बाल ने उसका चेहरा पकडे रखा ताकि वह उसकी आँखों में देखती रहे. चेहरे पर उसकी पकड़ और मज़बूत हो रही थी, जैसे वह उस पर पूरी तरह से हावी हो रहा हो. इक़बाल का दूसरा हाथ अभी भी सुप्रिया की गांड से खेल रहा था.
सुप्रिया धीरे से बुदबुदायी - मेरी... मेरी... गांड... आपका लुंड...
इक़बाल ने तुरंत सुप्रिया के चेहरे पर अपनी पकड़ ढीली करि और सुप्रिया ने अपना चेहरा नीचे कर लिया.
इक़बाल - आज रात के बाद तुम्हे कोई दिक्कत नहीं होगी इस शब्द को बोलने में... अब ज़रा मेरे लुंड को गीला कर दो, ताकि वह आराम से अंदर जा पाए.
इक़बाल ने सुप्रिया की कुर्ती को खींचते हुए ऊपर किया और उसकी ब्रा का हुक खोल कर उसे ऊपर से पूरा नंगा कर दिया. वह अपने पेअर छोड़े करके सुप्रिया के ऊपर आया और धीरे से अपना लुंड उसके मुँह में घुसाने लगा.
दोनों हाथ से पकड़ा हुआ इक़बाल के मोठे लुंड का सिर्फ ऊपर का हिस्सा सुप्रिया के मुँह में जा रहा था. अब तोह जैसे सुप्रिया को उसके लुंड को चूसने की आदत सी पद गयी थी, और इक़बाल को रोज़ रात को चुसवाने के.
इक़बाल थोड़ा आगे खिसका - पूरा गीला कर दो... अपने थूक से...
सुप्रिया ने लुंड पर हलके से थूका और और अपने हाथ से उसके लुंड पर मसलने लगी.
सुप्रिया ने रूठते हुए कहा - मुँह में नहीं लुंगी अब... मैं थक जयुंगी...
इक़बाल - ठीक है मेरी जान... जैसे तुम कहो... मुझे तोह बस वहां नीचे करना है.
इक़बाल सुप्रिया के ऊपर से हटा और एक हाथ में hi उसे पूरा घुमा दिया. सुप्रिया बिस्तर पर उलटी लेती हुई थी और सुप्रिया की गोरी गद्देदार गांड को देखते hi उसका लुंड अपने आप हिलने लगा. गांड और जांघें जहाँ मिल रही थी वहां एक हलकी सी रेखा बन रही थी जो गांड को बेहद आकर्षक बना रही थी.
इक़बाल - अपनी ज़िन्दगी में बोहोत साड़ी गांड देखि है... पर तुम्ह जैसी कभी नहीं... और तुमने कभी मेरे जैसा लुंड नहीं महसूस किया होगा... और न कभी करोगी...
सुप्रिया ने अपनी आँखें बंद कर ली, जो होने वाला था वह उसे रोक नहीं सकती थी. उसने अपने आप को पूरी तरह इक़बाल को सौंप दिया था.
इक़बाल ने सुप्रिया की कमर पर हाथ रखते हुए उसकी गांड को थोड़ा ऊपर किया. और फिर अपने दोनों हाथ उसकी गांड पर रखते हुए अचे से जकड लिया. वह उसके गांड के गोलों को कास के पकडे हुए हिलने लगा और फिर उन्हें एक दुसरे से थोड़ा अलग किया.
उसे सुप्रिया का छोटा सा गांड का छेड़ दिखा. बिलकुल साफ़.. न उस पर कोई बाल थे... न कालिख. इस छोटे से छेड़ को आज बड़ा करने में बोहोत मज़ा आने वाला था उसे.