A wedding ceremony in village - Page 11 - SexBaba
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A wedding ceremony in village

सूर्य पूजा स्थल

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आश्रम में एक बार फिर एक दुल्हन का परिधान विनीता के सामने था. यु तो वो पहले भी लखन से शादी कर चुकी थी पर इस बार उसे पुरे मन से लखन को अपने पति के रूप में स्वीकार करना था. जब कुछ दिन पहले लखन सिंह के साथ उसकी शादी हुई तब उसके मन में अनेको सवाल थे की पता नहीं एक अनजान आदमी के साथ एक एकांत जगह पर वो सुरक्षित रहेगी की नहीं कही इतने सालो से अपने पति के बिना रह रहे लखन सिंह उसे देखकर बहक तो नहीं जाएंगे. पर पिछले कुछ दिनों में उसने लखन सिंह को जितना जाना जितना समझा अब उसके मन में ऐसे कोई सवाल नहीं थे बल्कि इन कुछ दिनों में वो जितना करीब अपनी इस 7 दिन के पति के आ गई थी उतना तो अपने असली पति के भी नहीं आई थी. पर करीब आना एक अलग बात है और पति के रूप स्वीकार कर लेना अलग. करीब हम कई लोगो के होते है पर सबको अपना सब कुछ नहीं मान लेते.

पर पिछले कुछ दिन में उसके और लखन सिंह के बीच जो हुआ वो करीब से कुछ ज्यादा था. उसने लखन सिंह की गोड़ में बैठ कर अपने नितम्ब पर उनके लिंग को महसूस करा पूरी रात उनके आलिंगन में गुज़री उनके सामने तरह तरह के आकर्षक और उत्तेजक वस्त्र पहने और कल रात कल रात तो उसने उनका लिंग अपने मुँह में लिया उनका वीर्य पिया उनके मूत्र से स्नान करा. इन सब बातो ने लखन सिंह के प्रति विनीता के मन के विचारो में बहुत बड़ा बदलाव ला दिया था और लखन सिंह विनीता के लिए सिर्फ उसकी सहेली के ससुर नहीं रह गए थे बल्कि उससे कही आगे बाद गए थे. पहली बार लखन सिंह के बारे में सोचते हुए विनीता को अपनी जांघो के बीच गीला गीला महसूस हो रहा था जो इस बात का सबूत था की कही न कही वो भी इस शादी को असली जमा पहनना चाहती है पर समाज मर्यादा और उम्र का अंतर उसे ऐसा करने से रोक रहा है पर आज फिलहाल उस पर कोई रोक नहीं है आज वो पुरे मन से लखन सिंह को अपना पति मान सकती है और बचे हुए दो दिन के लिए hi सही उसे एक सच्चे और अच्छे पति का साथ तो मिलेगा जिससे वो पुरे मन से अपना पति मानती है.

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यही सोचते हुए विनीता के हाथ उस शादी के जोड़े पर पहुंच गए और उसने एक बार फिर खुद को लखन सिंह की दुल्हन के रूप में तैयार करना शुरू कर दिया. पर पिछली बार तैयार होते वक़्त विनीता के मन में दुविधा थी पर इस बार ख़ुशी इस बात की उसे एक सच्चा पति कैसा होता है वो अनुभव करने का मौका मिला पर साथ hi ये गम भी था की अनुभव सिर्फ दो दिन का hi और है. विनीता ने एक बार फिर खुद को एक दुल्हन के बार में तैयार कर लिया और इस बार विनीता पहले से भी ज्यादा सुन्दर लग रही थी क्युकी इस बार के श्रृंगार में मजबूरी नहीं बल्कि प्रेम था सच्चा प्रेम.

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दूसरी तरफ लखन सिंह का मन अब भी दुविधा में था की क्या विनीता जी आज की शादी को पुरे मन से कर पाएगी. भला मई उनसे ऐसी उम्मीद कर भी कैसे सकता हु की वो मुझे सच्चे मन से अपना पति मान ले वो मेरी बेटी से भी उम्र में छोटी है. वो इतना कुछ कर रही है मेरे परिवार के लिए यही बहुत इससे ज्यादा न मई डेसेर्वे करता हु न मुझे उम्मीद करनी चाहिए. बेशक उनकी अपनी शादीशुदा ज़िन्दगी में अनेको परेशानिया है उनकी शादी टूटने की कगार पर है पर इसका ये मतलब नहीं की मई उनसे उम्मीद करू की वो मुझे अपना पति मान ले. अभी उनकी उम्र hi क्या है उनकी शादी टूट भी जाए तब भी उन्हें अपना हमउम्र हमसफ़र मिल hi जाएगा. मई उनसे ये उम्मीद नहीं कर सकता की वो अपने से उम्र में दुगने इंसान को अपना पति मान कर उसके साथ अपनी ज़िन्दगी गुज़ार दे अपनी जवानी एक बुड्ढे पर क़ुर्बान करदे.

नहीं मई ऐसा सोच भी नहीं सकता पर यहाँ सवाल इस बात का है की क्या मई उन्हें सच्चे मन से अपनी पत्नी मान सकता हु. सच में अपने दिल से पूछू तो मई तो उन्हें अपनी पत्नी उसी दिन मान बैठा था जिस दिन हमने जंगल में खुले आकाश के नीचे वो रात बीते थी और उन्होंने मुझे अपनी शादी की सच्चाई से रूबरू करवाया था. उसी दिन मेरे दिल में उनके लिए एक सॉफ्ट कार्नर बन गया था जिसे मई चहु भी तो भी नहीं नकार सकता इसलिए अगर मई अपने साइड से देखु तो मई सच्चे मन से उन्हें अपनी पत्नी मान कर hi आज की शादी में बैठूंगा. पर मई उनके सामने अपने मन के भाव ज़ाहिर नहीं कर सकता वर्ण वो मेरे बारे में क्या सोचेगी वो तो इंसानियत और दोस्ती का फ़र्ज़ निभाते हुए ये साडी रस्मे पूरी कर रही है अगर मई उनसे ये केहड़ू की मुझे उनसे प्यार हो गया है तो शायद उन्हें मुझसे नज़रे मिलाने में झिझक महसूस होने लगे. वो मुझे ठरकी बुद्धा समझने लगे जो मौके का फायदा उठाते हुए अपने से उम्र में आधी अपनी hi बहु की सहेली पर चांस मार रहा है. वो ये सोचेंगी की उनकी शादीशुदा ज़िन्दगी की सच्चाई जान कर उनकी ज़िन्दगी में एक मर्द की कुमी का सच जान कर मई उन्हें हासिल करने की कोशिश कर रहा हु, उनकी मजबूरी का फायदा उठा रहा हु.

नहीं मई ऐसा कटाई नहीं करूँगा मई इस शादी में बैठूंगा ज़रूर पर उनसे यही कहूंगा की मेरे मन में ऐसा कुछ नहीं है और उन्हें भी ज़बरदस्ती ऐसा कुछ सोचने की ज़रूरत नहीं है. जैसे हमने पहले मजबूरी में शादी की रस्मे पूरी कर्ली थी वैसे hi आज भी कर लेंगे. वो निश्चित hi इस बात पर गिल्ट महसूस करेंगी की उनके मन में मेरे लिए कुछ नहीं है पर फिर भी उन्हें ऐसा सोचने के लिए विवश करा जा रहा है जब उन्हें पता चलेगा की मेरे मन में भी उनके लिए ऐसा कुछ नहीं है तो उनके अंदर का गिल्ट कम हो जाएगा. दोनों के मन में एक दुसरे के लिए शामे फीलिंग्स थी पर दोनों hi एक दुसरे की भावनाओ को हर्ट न करने के लिए अपनी अपनी फीलिंग्स छुपाने का ढोंग कर रहे थे.

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दोनों दूल्हा दुल्हन के रूप में तैयार हो गए जब विनीता दुल्हन के लिबास में तैयार होकर लखन सिंह के सामने आई तो इस बार विनीता के रूप की सुंदरता से लखन सिंह की नज़रे नहीं हैट रही थी. दुल्हन तो वो पहले भी बानी थी पर लखन की आँखों में उसके लिए जो प्यार था उसने उसे और भी सुन्दर बना दिया था सूर्य सी दमकती सुनहरी साडी और उसपर बेहद हल्का मेकअप जिस वजह से वह मौजूद सभी दुल्हनों में विनीता सबसे अलग और सुन्दर लग रही थी.

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विनीता का ये अनुपम सौंदर्य देख लखन का मन कर रहा था की वक़्त की रफ़्तार धीमी हो जाए और दो दिन बेहद धीमे बीते ताकि वो विनीता के साथ ज्यादा से ज्यादा समय बिता सके पर वक़्त तो अपनी गति से hi चलता है. कुछ यही स्थिति विनीता की थी पर वो दोनों अपने अपने मन के भावो को एक दुसरे से छुपकर ऐसे दिखा रहे थे जैसे उनके मन में एक दुसरे के लिए कोई प्रेमभाव नहीं है.

लखन सिंह विनीता के करीब आकर उन्हें दुबारा शादी के बारे में विचलित न होने के लिए समझने लगे.

लखन: आप चिंतित न हो पुजारी जी ने जो कहा उसके बारे में ज्यादा मत सोचिये मई जनता हु आपके मन में ऐसे कोई विचार नहीं है और लाए भी नहीं जा सकते क्युकी विचार पर किसीका ज़ोर नहीं चलता. और यकीन मानिये मेरे मन में भी आपके लिया ऐसा कोई भाव नहीं है. जैसे हमने उस दिन शादी की रस्मो को पूरा करा वैसे hi आज भी कर देंगे. किसी को कोई सफाई देने की ज़रूरत नहीं है.

लखन सिंह की बाते सुन कर विनीता को थोड़ी मायूसी हुई क्युकी उसे थोड़ी उम्मीद थी की शायद लखन सिंह के मन में भी उसके लिए थोड़ा बहुत प्रेम भाव उतपन्न हो गया हो पर लखन सिंह की बातो ने उसकी ग़लतफहमी को दूर कर दिया. वो अंदर से तो मायूस थी पर उसने इस मायूसी को अपने चेहरे पर नहीं आने दिया.

विनीता: आपकी बातो ने तो मेरी साडी चिंता दूर करदी मई भी यही सोच रही की ये दिल से शादी वाली रस्म कैसे पूरी करुँगी.

विनीता कज बातो ने लखन सिंह का दिक् तोड़ दिया और यकीन दिला दिया की विनीता के मन में उनके लिए न कभी कुछ था न कभी कुछ हो सकता है उसने अच्छा करा जो विनीता को इस ज़बरदस्ती की शर्त से आज़ाद कर दिया.

पुजारी: आप दोनों तैयार हो तो विवाह की रस्मो को पूरा करा जाए.

लखन विनीता- जी

पुजारी: पहले आप दोनों का विवाह आर्य रीति से हुआ पूरे रीति रिवाज़ो से पर यहाँ आपका और बाकि सभी जोड़ो का गंधर्व रीति से विवाह कराया जाएगा जिसे हम प्रेम विवाह भी कह सकते इसलिए इस विवाह से पहले पति पत्नी में प्रेम होना ज़रूरी है. गन्धर्व विवाह में आपके लिए शारीरिक सम्बन्ध बनाने की बाध्यता नहीं है पर रिश्ते में प्रेम है तो आप गन्धर्व विवाह के लिए पत्र है. अगर इतने दिनों में आप दोनों के मन में एक दुसरे के लिए थोड़ा प्रेम भी उत्पन्न हुआ है तो आप गन्धर्व विवाह के पत्र है. तो बोलिये क्या आप दोनों खुद को इस विवाह का पत्र समझते है.

विनीता ने लखन सिंह की तरफ देखा और लखन सिंह ने उन्हें आँख से हामी भर देने का इशारा करा और दोनों ने सम्मिलित रूप से हामी भर दी. हलाकि सत्य तो यही था की प्रेम उन दोनों के मन में था इसलिए एक दुसरे से छुपाते हुए भी वो इस विवाह के पूरी तरह पत्र थे.

पुजारी: उत्तम तो अब इस विवाह की रस्मे बता दू इसकी रस्मे आर्य विवाह की तरह लुम्बी और जटिल नहीं है. इसमें आप को अग्नि के सात नहीं केवल तीन फेरे लेने है वो भी बस एक दुसरे का हाथ थाम कर. एक दुसरे को ये वचन देते हुए की आप सदा एक दुसरे के लिए ऐसे hi प्रेम बनाए रखेंगे, हर सुख दुःख का सामना मिल कर करेंगे, और कभी भी भौतिक वस्तुओ सुख सुविधाओं को अपने प्रेम पर हावी नहीं होने देंगे. बस इसके बाद आपको एक दुसरे को माला पहनकर एक दुसरे को पति पत्नी के रूप में स्वीकार करना है. और पुरुष को स्त्री की मांग में सिन्दूर भर देना है बस ये विवाह संपन्न हो जाएगा.

विनीता: इस विवाह की रस्मे तो बहुत छोटी है.

पुजारी: इसीलिए इसे प्रेम विवाह कहा जाता है और आजकल तो ये बहुत प्रचलन में है पुराने समय में भी इस विवाह के अनेको उदाहरण देखने को मिल जाते है भीष्म के पिता शांतनु और सत्यवती का विवाह, राजा दुष्यंत और शकुंतला का विवाह, भीम और हिडम्बा का विवाह, अर्जुन और नागकन्या उलूपी का विवाह और भी न जाने कितनी बार इस तरह का विवाह किया गया है. तो अब सभी 101 जोड़ो से अनुरोध है की वो अपने अपने हवन कुंड के सामने खड़े हो जाए.

विनीता और बाकी 100 जोड़े हवन कुंडो के पास खड़े हो गए और पुजारी के कहने पर सबने अपने अपने जोड़ो का हाथ थम लिया विनीता और लखन ने भी. और अग्नि के फेरे लेना आरम्भ कर दिया. विनीता और लखन सच्चे मन से एक दुसरे से छुपाते हुए ये रस्मे पूरी कर रहे थे और मन hi मन एक दुसरे को वचन दे रहे थे.

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लखन मन में: आपने मेरे दिल में जो प्रेम का बीज बो दिया है वो आपके जाने के बाद भी मेरे दिल से कभी ख़तम नहीं होगा.

विनीता मन में: मई जानती हु हमारे बीच उम्र और रिश्तो की जो दीवार है वो कभी नहीं टूटेगी पर मेरा प्रेम उम्र की सीमा से परे है.

लखन मन में: आप भले hi यहाँ से चली जाओ पर आपके जीवन की हर परेशानी अब मेरी परेशानी है जिसे मई हर कीमत पर दूर करके रहूँगा. आपको ज़िन्दगी में कभी भी मेरी ज़रुरत पड़ी तो मई हर मदद पर आपका साथ दूंगा.

विनीता मन में: अब इस पूजा की रस्म कुछ भी हो वादा करती हु हर रस्म पुरे दिल से पूरी करुँगी खुद को न्योछावर भी करना पड़ा तो पीछे नहीं हटूंगी ये वादा करती हु.

लखन मन में: कोई भौतिक सुविधा मेरे दिल में आपके लिए प्रेम को ख़तम नहीं कर सकती.

विनीता मन में: आपकी उम्र भी मुझे आपको प्यार करने से नहीं रोक सकती.

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तीन फेरो के बाद सभी जोड़ो ने एक दुसरे को माला पहनकर एक दुसरे के प्रति अपने प्रेम पर मोहर लगा दी. और लखन सहित सभी पुरुषो अपनी अपनी पत्नियों की मांग में सिन्दूर भर दिया. और भगवान् सूर्य को साक्षी मान कर एक दुसरे को पति पत्नी के रूप में स्वीकार करा. फिर सभी शादीशुदा जोड़ो ने सूर्य की प्रतिमा का आशीर्वाद लिया.

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और ढोल नगाड़े वालो ने ढोल बजाना शुरू कर दिया सभी शादी शुदा जोड़ो ने भगवान् सूर्य की प्रतिमा के चारो और नाचना गण शुरू कर दिया. विनीता ने भी नृत्य की एक सुन्दर प्रस्तुति दी. पर लखन जरूर नृत्य में थोड़े कच्चे थे पर उनके इस कच्चे नृत्य पर भी विनीता को प्यार hi आ रहा था. सूर्यास्त होने को था और सूर्यास्त के साथ hi ये उत्सव एयर सूर्य पूजा के सातो चरण पुरे हो गए थे और इस तरह विनीता लखन की गृह पूजा में एक और गृह की पूजा संपन्न हो चुकी थी.

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पुजारी: अंदर आश्रम में सबके भोजन का प्रबंध करा गया है आप दोनों भी अंदर चलकर भोजन करले उसके बाद अघोरी बाबा आपको चंद्र पूजा की सभी विधियों के बारे में सूचित कर देंगे जिसके बाद आप रथ द्वारा अपनी चंद्र पूजा वाली जगह के लिए प्रस्थान कर लीजियेगा.

सूर्य पूजा पूरी हो चुकी थी यु तो इस पूजा में विनीता लखन के बीच ऐसी कोई इंटिमेट चीज़ नहीं हुई न विनीता को बदन दिखाऊ कपडे पेहेन्ने पड़े पर कुछ मैने में ये पूजा काफी विशेष थी क्युकी इस पूजा ने उनके मन में एक दुसरे के लिए जो प्रेम था उससे खुद को परिचित करा दिया था. अब तक पूजा की जो रस्मे उनकी मजबूरी बानी हुई थी जिन्हे जल्द से जल्द पूरा होने के बारे में वो सोचते थे अब वो उन्ही रस्मो के धीमे धीमे बीतने की प्रार्थना कर रहे थे. ये प्रेम उनकी आने वाली पूजा को आसान बनाने वाला था या मुश्किल ये तो समय hi जनता था. सूरज लाल आभा के साथ दूर छितिज में डूब रहा था और आसमान में छंद का हल्का हल्का अक्सा उभर कर आ रहा था ये संकेत था की तपिश के सौदागर सूर्य का समय ख़तम हो गया और अब समय था शीतलता के वाहक चंद्र का.

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नियर शिव टेम्पल

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सूरज के डूबने और चाँद के निकलने के साथ hi बेसब्री से एक एक पल को काट रहे अजय ने बिना देर किये उस सीमारेखा को लांघ दिया जो आदिवासियों के इलाके में जाती थी. उन आदिवासियों से मदद की उम्मीद में अजय उनकी बस्ती की तरफ बड़ा जा रहा था की तभी एक आदिवासी महिला जो एक हाथ में मटके में पानी और दुसरे हाथ में छड़ी लिए थी से अजय का आमना सामना हो गया.

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महिला: तोको सुका ाकीटो

अजय: क्या आप मुझे देख सकती है

महिला: तोको सुका ाकीटो

अजय: मुझे समझ नहीं आ रहा आप क्या कह रही है

महिला: तोको सुका ाकीटो

अजय: देखिये मुझे आपके महागुरु से मिलना है मुझे अघोरी ने भेजा है मुझे उनकी मदद चाहिए.

महिला: ाकीटो तोको सुका ाकीटो ाकीटो

अजय: क्या ाकीटो ाकीटो कर रही है मुझे कुछ नहीं समझ आ रहा चलो हटो मेरे रास्ते से मई खुद अपना रास्ता ढून्ढ लूंगा.

अजय आगे बढ़ने को हुआ पर महिला ने अपना मटका नीचे रखा और छड़ी से अजय का रास्ता रोक लिया. अजय ने गुस्से में अपनी मुट्ठी भींच ली.

महिला: ाकीटो

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अजय: देखो मई एक आत्मा हु बहुत रूद्र आत्मा 200 सालो की कैद से आज़ाद होकर आया हु मेरे गुस्से को मत भड़काऊ मई एक औरत को नुक्सान नहीं pahuchanaaaaaaaaaaaa.........

अजय अपना सेंटेंस पूरा भी नहीं कर पाया था था की उस महिला ने अपनी छड़ी घुमा कर अजय के दे मारी जिसके आखिरी सिरे पर एक रुद्राक्ष बंधा था जिसके स्पर्श मात्रा से अजय को बिजली का वो ज़ोरदार झटका लगा की उसका सारा गुस्सा ठंडा हो गया और चाँद के साथ तारे भी नज़र आ गए और वो फड़फड़ाता हुआ ज़मीन पर गिर पड़ा और उसकी मुट्ठी खुल गई. महिला ने फिर अजय को मारने के लिए अपनी छड़ी उठाई पर तभी उसकी नज़र अजय की खुली मुट्ठी में पड़े उस खंडित रुद्राक्ष पर पड़ी और उसने वो रुद्राक्ष उठ कर देखा जिसे देख वो सोच में पद गई.

कुछ सोच कर उसने वही एक पेड़ से एक लता तोड़ी और कुछ मंत्र बुदबुदा कर उसे अजय के दे पेअर की छोटी ऊँगली में बाँध दिया. उसके बांधते hi अजय को ऐसा महसूस होने लगा जैसे उसका पूरा शरीर बड़ी भरी भरी ज़ंजीरो में जकड दिया गया हो उससे हिला तक नहीं जा रहा था. उसके बाद उस महिला ने उस लता का दूसरा सिरा अपनी छड़ी में बाँध लिया और अजय को अपनी छड़ी में उल्टा लटका लिया और अपनी मटकी उठा कर वापस अपने कबीले की तरफ चल दी. कुछ देर पहले उस महिला को अपना ज़बरदस्त गुस्सा दिखने वाले अजय स्टार अब उसकी छड़ी में उलटे लटके चले जा रहे थे.

अजय मन में: साला जिस कबीले की पानी भरने वाली एक औरत बस एक डंडे के दम पे एक शक्तिशाली आत्मा को उल्टा टांग देती है उस कबीले के महागुरु क्या बाला होंगे. लगता है अघोरी बाबा ने मुझे सही जगह भेजा है. पर फिलहाल ये डंडे वाली मैया मुझे कहा लिया जा रही है.

अजय बुदबुदात्तर हुए: ाकीटो ू मैया ाकीटो

अजय को अपने डंडे पर टाँगे हुए वो एक बस्ती में दाखिल हुई जहा चारो तरफ आदिवासी नज़र आ रहे थे. उसके डंडे में एक आत्मा को टेंगा देख सब उसे देख कर आपस में कानाफूसी कर रहे था. जजस तरह हलाल करने से मुर्गे को उल्टा लटका कर ले जाया जाता है कुछ वैसी hi फीलिंग इस वक़्त अजय स्टार को हो रही थी क्युकी आड़ पास का माहौल काफी डेंजरस था. वो महिला एक हट्टे काटते आदिवासी के सामने जाकर रुक गई जो देखने में यहाँ का कोई पावरफुल व्यक्ति लग रहा था जीके दो आदिवासी हाथ दबा रहे थे.

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आदिवासी: ासुका पीपलिमो

महिला: जसिका नअकिहारा रूद्र सका

इतना कह कर उसने वो खंडित रुद्राक्ष उसके सामने कर दिया. जिसे देख वो आदिवासी भी सोच में पद गया.

आदिवासी: सिराह

ये सुनकर उस महिला ने उस लता को अपने डंडे से खोल दिया अजय धम्म से ज़मीन पर आ गिरा फिर कुछ मंत्र बुदबुदाते हुए उसने अजय के पेअर में बंधी लता भी खोल दी. जैसे तनो भरी ज़ंजीर से अजय को आज़ादी मिल गई. उस आदिवासी ने हाथ दिखाकर अजय को उठने का इशारा किया और अजय भी इसे एक फ्रेंडली जेस्चर मान कर उठ खड़ा हुआ. पैट अजय को समझ नहीं आ रहा था की वो उनकी बात कैसे समझे और अपनी बात उन्हें कैसे समझाए.

अजय: देखिये कैसे कहु

अजय अपने हाथ के ईशर से उसे समझने की कोशिश करने लगा. वो हाथ हिला हिला कर समझने की भरसक कोशिश कर रहा था.

आदिवासी: तुम चाहो तो मुँह से बोल कर भी समझा सकते है.

अजय शॉकेड होते हुए: ओह ु अंडरस्टैंड हिंदी ओह थैंक गॉड no मोरे ाकीटो ाकीटो.

आदिवासी: तुम्हे अघोरी ने भेजा है.

अजय: या या है है अघोरी ने मुझे अघोरी ने hi भेजा है और ये रुद्राक्ष दिया था और कहा था की ये देखते hi आप समझ जाएंगे की मुझे उन्होंने भेजा है.

आदिवासी: ये रुद्राक्ष सिर्फ तुम्हारी पहचान के लिया नहीं तुम्हारी रक्षा के लिए भी था यदि ये रुद्राक्ष तुम्हारे पास न होता तो बिना अनुमति हमारे छेत्र में घुसने के दंड में मेरी पत्नी तुम्हारी आत्मा रूप को भी नष्ट कर देती.

अजय: ओह तो वो लेडी डरा सिंह आपकी बीवी थी. खैर अब जब साडी ग़लतफहमी दूर हो गई है तो क्या मई आपके महागुरु से मिल सकता हु.

आदिवासी: नहीं अभी नहीं अभी वो साधना में बैठे है जब तो तक वो साधना से नहीं जागते कोई उनसे नहीं मिल सकता.

अजय: देखिये मेरा उनसे अभी मिलना बहुत ज़रूरी है किसी के प्राण संकट में है मुझे उनकी मदद चाहिए.

आदिवासी: वो साधना में रहते हुए भी इस छेत्र और इसमें प्रवेश करने वालो पर पूरी नज़र रखते है और तुम्हारी समस्या से वो भी वो अब तक अवगत हो गए होंगे यदि ज़रूरी होता तो वो अब तक साधना से जाग जाते पर वो अब भी साधना में है मतलब जिसकी तुम बात कर रहे हो उसके प्राण फिलहाल सुरक्षित है और हो सकता है तुम्हारी समस्या का हल hi ढून्ढ रहे हो इसलिए उनके जागने का इंतज़ार करो.

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इंतज़ार करने के अलावा अजय के पास कोई चारा नहीं था.
 
Lalu's फार्महाउस

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चांदनी की कार लालू के फार्महाउस के बहार रुकी और चांदनी कार में से उतर गई.

चांदनी: तू क्या अंदर hi बैठी रहेगी मेरी रानी. आ जा तेरी ट्रेनिंग का वक़्त हो गया है.

शबाना भी कार से उतर कर चांदनी के पीछे पीछे फार्महाउस में दाखिल हो गए. फार्महाउस में दो 70-72 साल के उम्रदराज़ नौकर थे जो शबाना को ऊपर से नीचे तक घूर घूर रहे थे शबाना की इशारे करते हुए आपस में फुसफुसा रहे थे. शबाना को समझ आ रहा था की शायद वो सब उसे भी एक तवायफ धंदे वाली समझ रहे थे. शायद लालू और उसके दोस्त यहाँ ऐसी hi औरतो को लेट रहते होंगे. वैसे आज तो मई भी यहाँ उसी रूप में आई हु एक नाचने वाली की तरह. चांदनी उसे लेकर एक बड़े हालनुमा कमरे में दाखिल हुई जहा ज़मीन पर दज लगा था काफी बड़े बड़े स्पीकर रखे थे.

चांदनी: तू यही इंतज़ार कर मई अभी आई.

चांदनी उस हाल से लगे एक दुसरे कमरे में चली गई और शबाना नर्वस होते हुए वही अकेली कड़ी उसका इंतज़ार करने लगी. कुछ देर बाद चांदनी वापस आई और इस बार उसकी पोषक बदली हुई वो एक सेक्सी सी मुजरे वाली ड्रेस पहने थी जिसमे उसका अंग प्रत्यंग साफ़ नज़र आ रहा था.

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और उसके हाथ में वैसी hi एक और पोषक थी जो उसने शबाना की तरफ उछाल दी.

चांदनी: चल जा तू भी ये पेहेन कर आ जा फिर तेरी ट्रेनिंग शुरू होगी.

शबाना: जी ये पेहेनना ज़रूरी है.

चांदनी: तो क्या मुजरा अपना बुरका पेहेन कर करेगी. चल टाइम खोटी न कर जल्दी तैयार होकर आ. और है अंदर मेकअप का सामन भी रखा है थोड़ा मेकअप भी कर लेना रात में सेठ लोगो के लिए तो मई तुझे तैयार कर दूंगी अभी खुद तैयार होजा.

शबाना वो पोषक लेकर उसी कमरे में चली गई और वो पोषक पेहेन्ने लगी. जीवन में पहली बार उसने ऐसे तवायफों वाले कपडे पहने थे. वो कपडे पेहेनते हुए उसका दिल धक् धक् कर रहा था बार बार उसे यही ख्याल आ रहा था की पता नहीं आज रात उसके साथ क्या होगा. वैसे लालू ने वडा करा है और अब तो वो बदल गया है.

शबाना जब वो पोषक पहनकर और हल्का मेकअप करके बहार आई तो चांदनी उसे देखती hi रह गई.

चांदनी: कसम बनाने वाली क्या खूब फुर्सत में बनाया है ऊपर वाले ने तुझे. आस पास के कई गाँवों में चांदनी से ज्यादा मस्त धनदेवाली कोई नहीं पर आज तुझे देखकर मेरा सारा घमंड चूर हो गया कसम से अगर तू धंदे में उतर आए तो इस इलाके की सभी तवायफों का धंदा बंद करवा दे. शबाना को समझ नहीं आ रहा था की इसे वो अपने लिए एक कॉम्पलिमेंट मने या ज़िल्लत की उसकी खूबसूरती की तारीफ तो हो रही है पर तवायफों के कपरिसों में. चांदनी ने आगे बाद स्पीकर्स पर गण बजा दिया और गण भी ऐसा जिसे सुनकर hi तवायफों वाली फीलिंग आती है.

यु तो प्रेमी पचहत्तर हमारे

ले जा तू कर सत्ततर इशारे

दिल मेरा आआआ मुफ्त डा

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गण बजते hi चांदनी दज फ्लोर पर आ गई पर शबाना अब भी नर्वस सी कड़ी थी.

चंडी: तुझे क्या लिख कर इनविटेशन भेजू आने का चल आ यहाँ सुना है बड़ा कटीला नाचती है तू ज़रा दिखा तो सही अपने लचके धचके. हिचकिचाते हुए शबाना भी दज फ्लोर पर आ गई और चांदनी की रदम के साथ साथ नाचना शुरू कर दिया.

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चांदनी: वाह नाचना तो तुझे मुझसे अच्छा आता है तो उसमे तुझे क्या ट्रेनिंग दू पर तुझे सिर्फ नाचना नहीं है कपडे उतारते हुए नाचना है. चल अब नाचते नाचते अपना घाघरा उतर.

शबाना: जी

चांदनी: अबे ऐसे क्या चौंक रही है तुझे बताया नहीं गया था की तुझे स्ट्रिप मुजरा करना है.

शबाना: जी बताया गया था.

चांदनी: तो उतर अपने कपडे.

शबाना को ऐसा करते हुए बहुत शर्म आ रही थी उससे अपने हाथ हिलाए नहीं जा रहे थे घाघरा उतरना तो दूर की बात.

चांदनी: रुक मई करके दिखती हु.

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चांदनी ने गाने के साथ साथ अपनी कमर मटकते हुए अपने घाघरे के हुक खोल दिए और हुक खुलते hi घाघरा उसके पैरो से नीचे आ गिरा जिसे उसने अपने पैरो से दूर उछाल दिया. अब चांदनी नीचे केवल पंतय में थी फिर नाचते नाचते hi उसने अपनी चोली की गाँठ खोली और बड़ी मादक अंगड़िया लेते हुए अपनी चोली को अपनी बहो से निकल कर दूर फ़ेंक दिया. अब चांदनी केवल ब्रा पंतय में थी और इन कपड़ो में भी वो अपने कूल्हे मटका कर नाच रही थी.

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शबाना की तो ये देख कर hi हालत ख़राब हो गई की क्या उसे भी लालू के दोस्तों के सामने ऐसे नाच करना होगा.

चांदनी: चल अब तू शुरू हो जा. चल उतर अपने कपडे और वो भी सेक्सी अंदाज़ में सेठ लोगो को मज़ा आना चाहिए वर्ण तू जानती है न वो क्या करेंगे. इसलिए ज्यादा सोच मत तेरे भले के लिए कह रही जो बोल रही हु वो कर.

चांदनी ने शबाना को लालू के दोस्तों की धमकी याद दिला दी और न चाहते हुए उसके हाथ अपने घाघरे के हुक पर पहुंच गए और उसे वो हुक खोलना पड़ा. हुक खुलते hi शबाना का घाघरा भी उसकर कदमो पर जा गिरा.

चांदनी: चल इसे पैरो से दूर फ़ेंक दे जैदी मैंने फेंका था.

शबाना ने भी वो घाघरा अपने पैरो से दूर उछाल दिया. अब बुर्के में अपना बदन धक् कर रखने वाली शबाना भी उस नाचने वाली के सामने नीचे बस टाइट पंतय में थी.

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चांदनी: माँ की छूट साली क्या मस्त जाँघे है तेरी और पंतय के अंदर से झक्ति तेरी फूली हुई छूट तो किसी कमजोर दिल वाले को हार्ट अटैक देदे. तभी मई कहु सेठ लोग इतना क्यों फ़िदा है तुझपर. ज़रा घूम कर अपना पिछवाड़ा तो दिखा जब कमर इतनी चौड़ी है तो गांड भी केहर होगी तेरी. घूम

शबाना पीछे घूम गई और चांदनी ने आगे बाद शबाना के दोनों चूतड़ों को अपने हाथो में थम लिया.

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चांदनी: साली तेरा भोसड़ा भी ज़बरदस्त है अगर मई लड़का होती तो अभी तेरी कच्ची नीचे करके तेरी गांड मार लेती. चल वापस सीढ़ी होजा.

शबाना वापस सीढ़ी घूम गई.

चांदनी: कसम से मस्त जवानी है तेरी.

इससे पहले शबाना कुछ चांदनी आगे बड़ी और शबाना के होंठो को अपने होंठो में भर लिया. शबाना तो इस अचानक हुई हरकत से शॉक रह गई.

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चांदनी: चल तेरा कमर के नीचे का नक्शा तो देख लिया अब कमर के ऊपर का भी दिखा. सुना है तेरे आम बहुत बड़े बड़े और रसभरे है. चल ज़रा अपनी चोली उतर कर मुझे भी तो दिखा.

शबाना हिचकिचाते हुए अपने हाथ पीछे ले गई वो अपनी गाँठ खोलने वाली hi थी की उसकी नज़र हाल में लगी एक खिड़की पर पड़ी जिसमे वो दो बुड्ढे नौकर झाँक कर अंदर के नज़ारे देख रहे थे. उन्हें अंदर देखते देख शबाना ने अचानक अपने हाथो से अपनी पंतय को धक् लिया. शबाना को अचानक से खुद को छुपाते देख चांदनी को कुछ समझ नहीं आया.

चांदनी: अबे क्या हुआ मुझसे भी इतना शर्मा रही अरे मई तो तेरी तरह लड़की hi हु मुझसे भी इतनी शर्म.

शबाना: जी आपसे नहीं वो दोनों नौकर अंदर झाँक रहे है.

चांदनी ने पीछे घूमकर देखा तो खिड़की से झांकते वो नौकर उसे दिख गए.

चांदनी: अच्छा वो बुझते दिए तू उनसे शर्मा रही है और ये वो दिए है जिनके अंदर का तेल पूरी तरह ख़तम हो गया है उनसे क्यों घबराती है बेचारे देखने के अलावा कुछ कर भी नहीं सकती. वैसे इवन बेटर रात में तुझे मर्दो के सामने hi ऐसे मुजरा करना है तो मेरे सामने कपडे उतरने से तेरे अंदर की झिझक दूर नहीं होगी. वो तभी मिटेगी जब तू मर्दो के सामने hi कपडे उतरे.

चांदनी ने उन दोनों नौकरो को आवाज़ लगाई.

चांदनी: अरे ू बुझते चिरागो खिड़की की दरारों से झाकना बंद करो और अंदर आकर पूरी पिक्चर का खुलकर मज़ा लो.

चांदनी से है मिलते hi वो दोनों बुड्ढे बिना देर करे दांत दिखते हुए अंदर आकर खड़े हो गए. उनके सामने यु चड्डी में खड़े हुए शबाना शर्म से गाड़ी जा रही थी उसने उम्मीद भी नहीं की थी की इस ट्रेनिंग के दौरान दो अनजान बुड्ढे नौकरो के सामने अधनंगा होना पड़ेगा. शबाना अब भी अपने बदन को ढके कड़ी थी.

चांदनी: चल तू कंटिन्यू कर.

शबाना: पहले इन्हे बहार भेजो इन्हे अंदर क्यों बुलाया.

चांदनी: देख तेरे भले के लिए hi बुलाया है ये तेरे साथ वो सब नहीं करेंगे जो वो सेठ लोग कर सकते है अगर उनके सामने कपडे उतरने में तूने इतना वक़्त लगाया तो वो तुझसे कपडे उतरने की रिक्वेस्ट नहीं करेंगे बल्कि आगे बढ़कर तेरे कपडे फाड़कर तुझे पूरा नंगा कर देंगे. मई उनका वो रूप देख चुकी है इसलिए तुझे समझा रही हु.

चांदनी की बातो शबाना को वो रात आ गई जब लालू ने उसका बंग करा था उस रात भी लालू ने उसके कपडे उतरे नहीं थे बल्कि पहाड़ दिए थे. इसलिए चांदनी की बातो में शबाना को सच्चाई नज़र आ रही थी.

चांदनी: देख अगर तू इन बुड्ढे नौकरो के आगे कपडे उतरने में इतना झिझक रही है तो रात में उन सेठ लोगो के सामने कैसे उतारेगी और जब तू ज्यादा नखरे करेगी तो उन्हें गुस्सा आएगा और फिर वो खुद तेरे कपडे पहाड़ देंगे. तू वो सब देखना चाहती है तो रुक मई इन बुद्धो से कहती हु तुझे वो सब एक्सपीरियंस करा दे.

शबाना: नहीं

चंडी: नहीं न मई भी तेरे साथ ये सब नहीं करना चाहती इसीलिए चल अपनी चोली उतर.

वो बुड्ढे वही कुर्सी पर बैठ गए और शबाना ने न चाहते हुए भी अपने हाथ अपनी पंतय के ऊपर से हटा लिए और बेमन से अपने हाथ अपनी चोली की दूर तक ले गई और चोली की गाँठ खोल दी.

चांदनी: शाबाश चल अब जल्दी से अपनी चोली उतर और उसे उन बुद्धो के मुँह की तरफ उछाल दे. औरते जब अपने कपडे उतर उसे मर्दो को तरफ उछाल देती है तो उन्हें बड़ी इरोटिक फीलिंग होती है. चल उतर

शबाना ने अपनी चोली को अपनी बहो से निकल दिया और अपनी नज़रे नीचे करे करे hi उसे उन बुद्धो की तरफ उछाल दिया. एक बुड्ढे ने उसे हवा में hi कैच कर लिया पर दुसरे बुड्ढे ने उसे पकड़ लिया और वो दोनों उसे अपनी अपनी तरफ खींचने लगे जैसे वो चोली न होकर कोई अनमोल खज़ाना हो. दोनों की खींचतान में वो चोली बीच से दो हिस्सों में पहात गई जिसे देख चांदनी की हसी छोट गई.

चांदनी: देख तेरे बदन से उत्तरी चोली ने इन बुद्धो में वापस जवानी भर दी. कैसे बावले हो रहे है तेरी चोली को हासिल करने के लिए.

अब शबाना बस चड्डी ब्रा में उन बुद्धो के सामने थी. अब दो हसीं कमसिन जवान औरते उन बुसधो के सामने चड्डी ब्रा में कड़ी थी हलाकि चांदनी तो खुलकर अपने हुस्न के जलवे ु बुद्धो को दिखा रही थी पर शबाना अब भी अपनी झिझक से बहार नहीं निकल प् रही थी.

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चांदनी: वाह तेरे बदन के गेओग्रफिए तो सच ऊपर से नीचे तक बड़ा कमल का है और तेरे ये आम तो सच में बहुत बड़े बड़े है कितने मर्दो से चुसवा चुकी है अब तक. देख देख कितने मचल रागे है ये बुड्ढे तुझे इन कपड़ो में में देखकर मुझे तो ये पहले भी नंगा देख चुके है इसलिए आज इनकी ये मचलाहट सिर्फ तेरे लिए है कही आज ये हार्ट अटैक से न मर जाए. चल अब जरा मेरे साथ इन कपड़ो में मुजरा दिखा कर इनका मन बेहला और अपनी झिझक को दूर कर.

चांदनी वापस दज पर आ गई और उसने इस अधनंगी हालत में hi बलखाते हुए नाचना शुरू कर दिया. शबाना को तो यहाँ ऐसे खड़े रहने में भी शर्म आ रही थी और चांदनी किसी नागिन की तरह यहाँ डांस कर रही थी. शबाना को कुछ न करते देख अब चांदनी को भी खीज आ गई.

चांदनी: देख मई बस तुझे समझा सकती हु तुझे क्या करना है क्या नहीं वो तू खुद सोच ले. सोच ले अगर उन लोगो को गुस्सा आ गया या जैसे वो चाहते वैसे तूने उनके सामने मुजरा न करा तो तू खुद सोच लेंगे वो लोग क्या करेंगे. मैंने गाँव के कई कमसिन कलियों जो ढंग से फूल भी नहीं बन पाई थी उनके पैरो टेल कुचलते मसलते बर्बाद होते देखा है. तू तो यहाँ की है भी नहीं इसलिए जैसे तैसे अपने बचे खुचे दिन यहाँ काट और यहाँ से हमेशा हमेशा के लिए चली जा पलट कर दुबारा इधर देखना भी नहीं. इसलिए मान ले मेरी बात आज की रात उनके सामने मुजरा करके इस किस्से को यही ख़तम करदे क्यों बात को बिगड़ने पर तुली है.

शबाना को भी अब चांदनी उतनी बुरी नहीं लग रही थी क्युकी कोई भी औरत अपनी मर्ज़ी से ये पेशा नहीं चुनती. शायद उसकी भी अपनी कोई मजबूरी हो. और फिलहाल मेरे पास दूसरा कोई चारा भी नहीं है तो जैसा वो कहती है चुपचाप करते जाऊ. आखिरकार परिस्थितियों से समझौता करके फाइनली शबाना ने भी चांदनी के साथ कदम से कदम मिलते हुए नाचना शुरू कर दिया.

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दो दो अधनंगी लड़कियों को अपने सामने यु मुजरा करते देख उन बुद्धो के तो खून में गर्मी आ गई थी. नाचते नाचते चांदनी दज से उतर गई और हाल में राखी एक मेज के पास गई जिसपर शराब की कुछ बोतल राखी थी. नाचते नाचते उसने उनमे से एक बोतल और दो गिलास उठाए और कमर बलखाते हुए उन बुद्धो के करीब जाकर उनमे से एक की गोड़ में जाकर बैठ गई.

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चांदनी को ये सब करते देख शबाना के पेअर थम गए और उसके दिल की धड़कने बाद गई. चांदनी उस बोतल में से शराब को गिलासों में डालने लगी और वो बुड्ढे चांदनी के बदन को यहाँ वह टच कर रहे थे उसे गर्डर और बहो कमर पर चूम रहे थे. शराब के गिलास भर कर चांदनी ने पहले खुद एक सिप ली और फिर वो गिलास उन बुद्धो की तरफ बड़ा दिए. बुद्धो वो शराब पीने लगे बलखाती हुई उनकी गोड़ से उठकर उनके सामने कुलजे मटका मटका कर नाचने लगी. वो बुड्ढे एक हाथ से शराब के घुट पी रहे थे और दुसरे हाथ से चांदनी के कूल्हों को सेहला रहे थे. चांदनी की ऐसी हरकते देख शबाना अंदर hi अंदर काँप रही थी की क्या उसे भी ये सब करना होगा.

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शबाना को शॉकेड सा अपने सामने खड़ा देख नाचते नाचते hi चांदनी उससे बात करने लगी.

चांदनी: क्या हुआ ऐसे घूर घूर कर क्या देख रही है पहले कभी पिक्चर में ऐसा नाच नहीं देखा क्या.

शबाना: क्या मुझे भी ये सब करना होगा मुझसे तो उन्होंने केवल मुजरा दिखने को कहा था.

चांदनी: अरे मेरी भोली भला कोई मुजरा बिना शराब के पूरा हो सकता है शराब और मुजरे का तो चोली दमन का साथ है.

शबाना: तो क्या मुझे भी उन्हें इस तरह शराब पिलानी होगी.

चांदनी: है जब तक नाचने वाली उन्हें इस तरह शराब नहीं पिलाती उनके खून में गर्मी नहीं आती उन्हें मज़ा नहीं अत. और तेरे लिए ज़रूरी है की तेरे मुजरे में उन्हें भरपूर मज़ा आए.

शबना के लिए तो अपना थूक गटकना भी मुश्किल हो रहा था उसने सोचा भी नहीं था की स्ट्रिप मुजरे से उन लोगो का मतलब ये सब था. पर अब ये सब करने के अलावा उसके पास दूसरा कोई चारा था भी नहीं. पर अब भी शबाना को इस बात का सुकून था की कम से कम लालू उसके फवौर में है और उसने वडा करा है की वो अपने दोस्तों को लिमिट से आगे नहीं बढ़ने देगा.

उन बुद्धो के सामने नाचते नाचते चांदनी अपने हाथ पीछे ले गई और शबाना के देखते देखते उसने अपनी ब्रा के हुक भी खोल दिया और अपनी ब्रा भी उतर कर उनमे से एक बुड्ढे के गले में दाल दी.

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वो बुद्धा शराब पीते हुए उस ब्रा को अपनी नाक से लगाकर सूंघने लगा. चांदनी को अपनी ब्रा उतरता देख शबाना को एक और शॉक लगा क्युकी लालू ने बोलै था की उसे पूरा नंगा नहीं होना है ब्रा पंतय नहीं उतरनी है फिर ये सब. चांदनी बिना ब्रा अपने स्तन उन बुड्ढे को दिखते हुए वही कुर्सी पर बैठी थी.

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शबाना: आपने अपनी ब्रा क्यों उतर दी.

चांदनी: स्ट्रिप मुजरा में सारे कपडे उतरे जाते है तो सारे उतरूंगी न.

शबाना: नहीं मुझे सारे कपडे नहीं उतरने है लालू ने मुझे कहा की मुझे ब्रा पंतय नहीं उतरनी होगी.

चांदनी को अब शबाना के भोलेपन पर तरस आ रहा था उसे समझ आ गया था की ये भोली भली भेंड़ उन भूके खूंखार भेडियो के चंगुल में फस गई है और वो इसकी बहुत बुरी हालत करने वाले है. और वो उसे बचने के लिए कुछ नहीं कर सकती थी. आज रात फिर वो एक सुंदर खुशबूदार फूल को अपने पैरो टेल मसल कर बर्बाद कर देंगे और हमेशा की तरह वो देखने के सिवा कुछ नहीं कर पीजी. आज इस बेचारी का ये भोलापन ये मासूमियत इससे हमेशा हमेशा के लिए चीन लिए जाएगा.

चांदनी ने एक और शराब की बोतल उन बुद्धो को दी और उन्हें कमरे से बहार जाने का इशारा करा. वो बुड्ढे चुपचाप शराब के नशे में लड़खड़ाते हुए कमरे से बहार चले गए.

चांदनी: अच्छा है तुझे पूरा नंगा नहीं होना है पर अब तक जो सिखाया है वैसे hi करना उन्हें गुस्सा होने का एक मौका भी मत देना. जा जाकर अपने कपडे पेहेन ले और कुछ देर आराम कर ले. जब वो हवेली से निकलेंगे तो मुझे फ़ोन करेंगे तब मई खुद तुझे आज रात के मुजरे के लिए सजा धजकर तैयार कर दूंगी. जा आराम कर

शबाना उस कमरे में चली गई जहा उसने कपडे बदले थे. बहार चांदनी भगवान् से दुआ कर रही थी की हे भगवान् उस मासूम की रक्षा करना. मई जानती हु की वो इसके साथ क्या करने वाले है पर मई छह कर भी इसे कुछ नहीं बता सकती. बस इतनी विनती करती हु की इसे इतनी हिम्मत देना की ये आज रात की उस बर्बरता को झेल जाए. और इस कदर न टूट जाए की गांव की कई लड़कियों की तरह इसे भी अपनी ज़िन्दगी से नफरत हो जाए और मौत में इसे अपने सरे दर्दो का इलाज़ मिले. हे भगवान् हिम्मत देना इसे.

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अंदर शबाना को अब भी लालू पर भरोसा था की उसने जो वडा किया है उसे पूरा करेगा. अब देखना ये था की क्या शबाना का भरोसा जीतेगा या चांदनी का दर. क्रूरता की कौनसी इबारत लिखी जाने वाले थी आज शबाना के साथ जिसे सोच कर चांदनी इतनी ख़ौफ़ज़दा थी.
 
आश्रम

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सूर्य पूजा की साडी विधिया पूर्ण हो चुकी थी और अब समय था चंद्र पूजा का. चंद्रोदय के साथ hi लखन के मोबाइल पर अघोरी की कॉल आ गई.

अघोरी: आपकी गृह पूजा के सफर में अगले गृह चंद्र का समय आ गया है. आश्रम के बहार आप दोनों के लिए रथ खड़ा है जो आपको चंद्र पूजा वाले स्थान पर पंहुचा देगा. वह पहुंच कर आपको क्या करना है वो मई आपको वह पहुंचने के बाद बताऊंगा. अब आप लोग आश्रम के साधुओ को प्रणाम कर यहाँ से प्रस्थान करे.

लखन: जी

लखन आश्रम से बहार आ गया जहा आश्रम के पुजारी और विनीता पहले से मौजूद थे. और एक रथ खड़ा था जिसमे इस बार घोड़ो के स्थान पर दो बैल लगे थे.

पुजारी: आपको अघोरी जी का सन्देश मिल गया होगा की आपके यहाँ से जाने का वक़्त हो गया है.

लखन: जी इस आश्रम में कुछ वक़्त बिताकर बहुत अच्छा लगा. मौका मिला तो दुबारा आऊंगा.

पुजारी: ज़रूर जब यहाँ सूर्य मंदिर का उद्घाटन होगा तब अपनी धर्मपत्नी के साथ अवश्य आइयेगा.

लखन पुजारी की इस बात पर चौंक गया क्युकी पुजारी जानते थे की विनीता उसकी असल पत्नी नहीं है फिर उन्होंने ऐसा क्यों कहा शायद गलती से कह गए होंगे.

लखन: जी बाबा अब हम चलते है.

विनीता लखन ने वह मौजूद सभी पुजारियों को प्रणाम करा.

पुजारी: आयुष्मान भाव ासः करते है आपकी पूजा की साडी विधिया कुशलतापूर्वक संपन्न हो.

लखन: धन्यवाद पुजारी जी.

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इसके साथ लखन विनीता रथ पर सवार हो गए और रथवाहक उन्हें लेकर उनकी अगली मंज़िल की तरफ बाद चला. रथ वापस उन्हें उनके घर नहीं ले जा रहा था यानि चंद्र पूजा के लिए एक अलग hi स्थान निश्चित किया गया था. और आधे घंटे के सफर के बाद hi वो उस नियत स्थान पर पहुंच गए. वो एक तालाब था जो पूरी तरह कमल पुष्पों से भरा हुआ था

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कुछ दूर पर एक सफ़ेद शामियाना बना था जहा शायद उनके रात में रहने की व्यस्था की गई थी.

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शामियाने के पीछे रजनीगंधा के सुन्दर पुष्प से भरे पौधे लगे थे. लखन विनीता रथ से उतर आए.

रथवाहक: आप दोनों को आज रात यही बितानी है अघोरी बाबा आपको साडी विधिया समझा देंगे. मई कल सुबह सूरज की पहली किरण के साथ यहाँ पहुंच जाऊंगा और आपको आपके निवास जहा से मई आपको लाया था वह वापस छोड़ दूंगा. अब मुझे आज्ञा दे कल सुबह मिलते है आपकी रात्रि शुभ हो.

लखन: जी

उन्हें वही छोड़ रथ वह से वापस लौट गया. लखन विनीता उस स्थान की सुंदरता को निहारने लगे. बेहद शांत और सुरम्य वातावरण था तालाब से आती कमलपुष्पों को मनमोहक खुशबू चाँद को दूधिया रौशनी में उन कमलपुष्पों की आभा और भी बाद गई थी. लखन विनीता उस शामियाने में दाखिल हुए जहा एक सफ़ेद गद्दे का बिस्तर बिछा था उस बिस्तर पर एक मोठे कपडे का सफ़ेद लंगोट और मर्दो द्वारा कमर के नीचे पहनी जाने वाली धोती थी

और उसके बगल में एक दूधिया सफ़ेद सूती साडी थी और उसके साथ पीछे से गाँठ मार कर पहना जाना वाला सफ़ेद ब्लाउज था जिसके ऊपर एक रजनीगंधा का पुष्प और एक सुई धागा भी रखा था इसके अलावा एक सफ़ेद लुम्बा तौलियानुमा कपडा भी रखा था.

बिस्तर के एक तरफ एक मजे राखी थी जिस पर एक मिटटी का बड़ा सा मटका रखा था जिसमे से पानी निकलने के लिए एक गिलास उसके ऊपर hi रखा था, इसके अलावा वह एक पूजा की थल भी राखी थी. पूरा शामियाना सफ़ेद रजनीगंधा के पुष्पों से महक रहा था. कमरे को पूरी तरह सफ़ेद रंग से hi सजाया गया था बिस्तर कपडे शामियाना सजावट पुष्प हर चीज़ सफ़ेद शायद चन्द्रमा के सफ़ेद रंग के कारन.

विनीता लखन वह का अवलोकन कर hi रहे थे की तभी लखन के मोबाइल पर अघोरी की कॉल आ गई.

अघोरी: आप लोग चंद्र पूजा स्थल पर पहुंच गए.

लखन: जी

अघोरी: आप जानते है सुबह आपके रथ में घोड़े लगे थे पर अभी बैल लगे थे क्यों.

लखन: नहीं क्यों

अघोरी: क्युकी चंद्र देव को भी रथ पर आसीन दर्शाया जाता है पर उनके रथ में घोड़े नहीं लगे होते बल्कि बैल लगे होते है इसिलए आपके रथ में में घोड़े के स्थान पर बैल का प्रयोग किया गया.

अघोरी: तो अब समय है आपको आपके आज के पूज्य देव या देवी से अवगत करने का.

लखन: देव या देवी मतलब

अघोरी: बताता हु चन्द्रमा के वास्तविक स्वरुप के विषय में विभिन्न धर्मो में विरोधभास है. जिस तरह का आकर हर दिन बदलता रहता है उसी तरह उसका मानव स्वरुप भी अलग अलग धर्मो में अलग अलग है. ***** धर्म में चंद्र को पुरुष स्वरुप में पूजा जाता है जबकि ग्रीक और रोमन माइथोलॉजी में इन्हे स्त्री रूप में पूजा जाता है जिनके समरूप को सेलेना और लूना नाम से बुलाया जाता है.

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***** धर्म में च्नद्र को सोम नाम से भी बुलाया जाता है इस शब्द के भी कई अर्थ है कोई सोम को सोमरस से जोड़ता है यानि शराब तो कोई इसे सोम यानि अमृत कहता है गए के दूध को भी अमृत तुल्य मन जाता है इसलिए कोई इनकी पूजा में सोम यानि शराब का प्रयोग करता है तो कोई सोम यानि अमृत (जिसके स्थान पर गए के दूध) का प्रयोग करता है. हम यहाँ चंद्र के शीतल स्त्री रूप की उपासना करने वाले है इसलिए केवल दूध का प्रयोग करेंगे. चंद्र की पूजा में विशेष रूप से श्वेता वस्त्रो को धारण करा जाता क्युकी सफ़ेद रंग चंद्र की शीतलता का प्रतीक है, रात में खिलने वाला श्वेत रजनीगंधा का पुष्प चंद्र को विशेष प्रिय है जिसको अपने श्रृंगार में प्रयोग करके स्तरीय चंद्र के पुरुष स्वरुप को मोहित करती है. चंद्र के स्त्री स्वरुप को सफ़ेद मोतियों के बने आभूषण पहने दर्शाया जाता है यानि उन्हें मोती के बने आभूषण अति प्रिय है. और कई जगह चंद्र के स्त्री स्वरुप की पूजा में सीधे तालाब से निकले गए शुद्ध मोतियों के आभूषण बनाकर उन्हें ापित करे जाते है. इनके अलावा चंद्र को कमल पुष्प भी अति प्रिय है. आज आपकी चंद्र पूजा भी इन्ही पांच चीज़ो पर आधारित है दूध श्वेता वस्त्र रजनीगंधा पुष्प कमल पुष्प और सफ़ेद मोती.

अघोरी ने उन्हें ये तो बता दिया आज की पूजा में उन्हें किन वस्तुओ को प्रयोग करना है पर उन्हें करना क्या है ये बताना बाकि था.

अघोरी: ये पाछो वस्तुए आपको यही मिल जाएंगी. आप दोनों के पेहेन्ने के लिए श्वेता वस्त्र शामियाने में बिस्तर पर रखे है. सबसे पहला चरण है श्वेता वस्त्रम जिसमे आपको अपने ये वस्त्र उतर कर वह रखा वो सफ़ेद लंगोट पेहेनना है और विनीता जी को वो सफ़ेद कपडा से अपने बदन को ढकना है शेष वस्त्रो को वही छोड़ दे. पूजा का अगला चरण है कमल वन्दनं वही शामियाने में एक पूजा की थल राखी है और पूरा तालाब कमल पुष्पों से भरा है, ये वस्त्र धारण करने के बाद तालाब से एक कमलपुष्प लेकर पूजा की थल से आसमान में चमकते चाँद की आरती उतरनी है और उसका इस पूजा में आवाहन करना है. तीसरा चरण है पुष्प सुगंधम रजनीगंधा के पुषो का शामियाने के पीछे पूरा बगीचा है.

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इसके बाद विनीता जी को वह खिले रजनीगंधा पुषो को तोड़ कर उनसे स्त्री द्वारा पुरुषो को रिझाने के लिए पहना जाने वाला एक सुन्दर सा गजरा बनान है गजरा बनाने के लिए धागा और सुई भी आपके कपड़ो के साथ रखे है. पूजा का चौथा चरण है मोती अर्पणम जिसमे लखन जी को तालाब के अंदर जाना है वह तैरते कमल पुष्पों में से 101 कमल पुष्पों में पवित्र श्वेता मोती रखे है.

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आपको वो सारे मोती एक पोटली में इकठे करने है पोटली आपके वस्त्रो के साथ राखी है. मोती इकट्ट्जी करने के बाद आपको उन मोतियों को धागे में पिरो कर उनसे एक मोतियों की सुन्दर माला और दो मोती की चूडिया बनानी. धागा पिरोने के लिए मोती में पहले से छेड़ कर दिया गया है.

पूजा के चार चरण बताने के अघोरी कुछ देर के लिए मौन हो गया. और अघोरी का ये मौन संकेत था की पूजा का अगला चरण थोड़ा उत्तेजक है जो लखन विनीता के लिए थोड़ा मुश्किल हो और ये बात लखन विनीता भी थोड़ा थोड़ा समझ गए क्युकी अब तक इतने दिनों में अघोरी के बोलने के अंदाज़ से वो समझने लगे की कब उनकी कठिनाइया बढ़ने वाली है. अघोरी श्वेता वस्त्र कमलपुष्प रजनीगंधा पुष्प और मोतियों के बारे में बता चुके थे और अब सिर्फ दूध वाले चरण के बारे में बताना बाकि था.

लखन: आप चुप क्यों हो गए बाबा

दूसरी तरफ दूध वाले चरण के बारे बाटने से पहले अघोरी में मन आज सुबह नीतू का झील में नहाने वाला दृश्य ताज़ा हो गए थे जब नीतू के पानी में भीगे बदन में कपड़ो के चिपक जाने की वजह से स्तनों में चूचक एकदम उभर आए थे. अघोरी के दिलो दिमाग में नीतू का पानी में भीगा बदन hi घूम रहा था जिसने उन्हें मौन कर दिया था. लखन ने उन्हें दुबारा पुकारा.

लखन: बाबा आप मौन क्यों हो गए कुछ बोल क्यों नहीं रहे बाबा अघोरी बाबा.

लखन के यु बार बार पुकारने पर अघोरी अपने खयालो से बहार आए.

अघोरी: ओह हां माफ़ करियेगा मई कुछ सोचने लगा था. पूजा के चार चरण के बाद अब आते है पांचवे और अंतिम चरण पर दूध स्नानं एवं दूध पानं. पूजा के ये चरण भी थोड़ा उत्तेजना पूर्ण जिसे करते हुए आप उत्तेजित हो सकते है. इस चरण के लिए दूध से भरा एक मटका शामियाने में आपके बिस्तर के सिरहाने की तरफ रखा है. जिसमे भरे दूध से विनीता जी को स्नान करना है दूधस्नान. और आपको उस दूध का ज्यादा से ज्यादा पान करना है अर्थात उस दूध को पीना है. और दूधपान आपको उनके अमृत कलश के माध्यम से करना है.

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लखन: अमृत कलश मतलब शामियाने में कोई कलश नहीं रखा है.

अघोरी: मई कलश नहीं अमृत कलश की बात कर रहा हु. अमृत कलश वो होता है जिसमे अमृत को संचित करा जाता है. और स्त्री का दूध भी अमृत सामान होता है और उस दूध के संचित होने का स्थान अमृत कलश. अर्थात स्त्री के स्तन hi वो कलश है और आपको वो दूधपान सीधे वही से करना है.

अघोरी के इन शब्दों से एक बार फिर लखन विनीता के मन उत्तेजना का संचार कर दिया पर आज की उत्तेजना कल की उत्तेजना से अलग थी. कल विनीता और लखन के मन में एक दुसरे के लिए सम्मान था और उस सम्मान ने उनके मन में गिल्ट का भाव पैदा कर दिया था पर आज उनके मन एक एक कोने प्यार का अंकुर फूट चूका था और जहा प्यार का हल्का सा भी अंश हो वह कही न कही एक दुसरे को पाने की इच्छा भी जनम ले hi लेती है और उस इच्छा से उत्तजेना का भाव आना लाज़मी है. यही उत्तेजना इस वक़्त उनके ज़हन में थी. अब तक अघोरी ने जब भी उन्हें ऐसी कोई उनुसाल इंटिमेट क्रिया बताई उसे सुन कर उनमे हेसिताशन आती थी पर आज उस हेसिताशन की जगह एक्ससिटेमेंट ने लेली थी. और सिर्फ अघोरी के शब्दों ने उनके मन एक्ससिटेमेंट पैदा कर दिया था तो क्रिया करते वक़्त उनका क्या हाल होने वाला था. वो खुद तो अंदर से एक्ससिटेड थे पर एक दुसरे की फीलिंग से वो अब भी अनजान थे जिस वजह से अपना एक्ससिटेमेंट एक दुसरे पैट जाहिर भी नहीं कर सकते थे.

अघोरी: मई जनता हु ये क्रिया आपके लिए कठिन हो सकती है पर हर बार की तरह मई मजबूर हु. विनीता जी को गिलास की सहायता से मटके से दूध निकल कर उससे स्नान करना है और जब वो दूध बह कर उनके स्तनों तक आए तब लखन जी को उस सफ़ेद कपडे के ऊपर से hi उनके स्तनों को अपनी जीभ से चाट कर या चूस कर ज्यादा से ज्यादा दूध का पान करना है. इस पूरी क्रिया के दौरान लखन जी को पुरे समय अपनी जीभ का उनके स्तनों से स्पर्श कराए रखना है और विनीता जी को तब तक दूध से नहाना बंद नहीं करना है जब तक उस मटके में दूध पूरा समाप्त न हो जाए.

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अघोरी: चन्द्रमा प्रजनन का स्वामी है और स्त्री के के स्तनों में दूध आना उसके प्रजनन का लक्षण इसिलए चन्द्रमा के प्रकाश के टेल ये क्रिया की जा रही है ताकि आपके कुल की स्त्रीयो पर जो प्रजनन का श्राप लगा है वो दूर हो और जैसे अभी आप ये नकली दूध उनके स्तनों के माध्यम से पी रहे है जल्द hi वास्तव में उनके स्तनों में दूध आए अर्थात उन्हें माँ बनने का सौभाग्य मिले. इसलिए आपके वंश की आने वाली सन्तानो के लिए ये चंद्र पूजा बहुत ज़रूरी है.

सिर्फ अघोरी की बातो ने विनीता की जांघो के बीच नमी ला दी थी वही लखन की धड़कने भी ये सब सोच सोच कर hi तेज़ तेज़ चल रही थी. पर फिर भी दोनों एकदम खामोश थे.

अघोरी: पूजा का ये चरण पूरा होने के बाद बस एक अंतिम काम बाकि रह जाता है अपने गीले वस्त्रो को उतर कर सूखे और शुद्ध वस्त्र धारण करना जो शामियाने में बिस्तर पर रखे है. पर इन वस्त्रो को धारण करने की भी एक शर्त है ये वस्त्र आपको खुद नहीं पेहेन्ने है बल्कि एक दुसरे को पहनाने है. यानि विनीता जी को लखन जी को उनकी धोती पहननी है और लखन जी को विनीता को साडी और ब्लाउज पहननें है उनके बालो में वो रजनीगंधा पुष्पों का गजरा लगाना है उन्हें मोतियों के बने वो आभूषण जो लखन जी ने उनके लिए बनाए है. है अगर आपको एक दुसरे को निर्वस्त्र देखने में शर्म महसूस हो रही हो तो ये काम आप बरी बाटी से आँख बंद करके भी करके भी कर सकते है पर पेहेनना आपको एक दुसरे के हाथो hi होगा. वस्त्र धारण करके आप अंतिम बार चंद्र देव को प्रणाम करेंगे और उनसे अपने वंश के लिए प्रजनन का आशीर्वाद मांगेंगे और उनकी छात्र छाया में उस शंकयने में आज की रात विश्राम करेंगे सूर्योदय की पहली किरण के साथ ये पूजा समाप्त हो जाएगी और वो रथवाहक आपको वह लेने पहुंच जाएगा और आपको आपके घर पर छोड़ देगा. आशा है आप लोग पूजा की सभी विधियों और उनके महत्व को समझ गए होंगे और हर बार की तरह ये विधिया भी बेहद कुशलतापूर्वक पूरी करेंगे.

लखन विनीता ने एक दुसरे को देखते हुए एक स्वर में सहमति भर दी.

अघोरी: आप दोनों का कल्याण हो.

इसके साथ अघोरी ने फ़ोन रख दिया पर अपनी बातो से वो लखन विनीता के अंदर उत्तेजना की चिंगारी को हवा दे गया था जो पता नहीं कब अग्नि का रूप ले ले. कल विनीता जी ने लखन सिंह के लिंग को अपने मुँह में लिया था तो आज बरी लखन सिंह की थी आज उन्हें एक स्त्री के बदन के सबसे उत्तेजक अंग उसे स्तनों अपनी जीभ से स्पर्श करना था कल तो विनीता के होंठो की गर्माहट ने उनकी उत्तेजना की आग को ठंडा कर दिया पर आज जब वो उसके स्तनों को अपनी जीभ से स्पर्श करेंगे तो क्या वो अपनी उत्तेजना को काबू में रख पाएंगे जिस प्रेम को वो दोनों एक दुसरे से छुपा रही थे क्या उनके सयम का बाँध उस प्रेम को रोक पाएगा या उत्तेजना भीषड़ प्रवाह उस सयम की दीवार को तोड़ने में सफल हो जाएगा आसमान में दमकता चंद्र इस बात का साक्षी बनने वाला था.

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लखन की कोठी में

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शाम से गरिमा लगातार काका पर नज़र रखे थी खासकर जब वो रात का खाना बना रहे थे क्युकी वो जानती थी की आज रात वो खाने में नींद की गोली ज़रूर मिलेंगे. और जब वो खाने में नींद की गोली मिला रहे थे गरिमा ने दरवाज़े की ूत से छुपकर किचन में राखी वो डब्बी देख ली जिसमे नींद की गोली राखी थी.

रात ढल आई थी और बिहारी काका रात का खाना बना रहे थे और रोज की तरह गरिमा के खाने में नींद की गोली मिला रहे थे ताकि वो हर रात की तरह आज रात भी उसके ऊपर मुठ मार कर अपनी गर्मी को शांत कर ले क्युकी आज किचन में जबसे काका ने गरिमा के स्तनों के बीच की दरार को देखा है तबसे उनके दिलो दिमाग में बस वही घूम रही थी. पर आज रात ये बात गरिमा को भी पता थी की उसके खाने में नींद की गोली है पर हरिया के जाने के बाद से दो दिन से यहाँ का कामुक माहौल में जहा हर मर्द गरिमा के बदन के किसी न किसी अंग को देख कर मुठ मार रहा था वह गरिमा भी एक मर्द का लुंड अपने अंदर लेने के लिए तड़प रही थी और वो भी ऐसे की दुनिया के सामने उसके चैरेक्टर बेदाग़ रहे. और इसका तरीका उसे आज किचन में उस फ्रिज के अंदर मिल गया था. वो भांग के लाडू.

नीचे से काका ने गरिमा को खाने के लिए आवाज़ लगाई. पर आज गरिमा का इरादा ये नींद की गोली मिला खाना खाकर नींद में सोने का तो बिलकुल नहीं था. वो तो आज रात के हर लम्हे को खुल कर एन्जॉय करना चाहती थी. और इसके लिए ज़रूरी था की आज रात की कमान वो अपने हाथ में रखे क्युकी बिहारी काका तो इतने फत्तू थे की उसके गहरी नींद में होने पर भी अब तक उसके साथ कुछ करने की हिम्मत न कर पाए. तो अगर रात को रंगीन करना है तो उसे खुद िनितीयते करना होगा. काका के बुलाने पर गरिमा नीचे आ गई काका टेबल पर खाना लगा रहा थे. गरिमा ने कोठी के बहार का मौसम देखा आसमान में घने बदल छाए थे और तेज़ बारिश के आसार नज़र आ रहा थे. गरिमा ने ऊपर वाले से प्रार्थना करि की कल की तरह आज भी तेज़ बारिश करवाए क्युकी ये बारिश उसके प्लान में बूस्टअप का काम करती. कल इसी बारिश ने बेटे को सडके करने में मदद करि थी आज ये बारिश बाप को बोतल में उतरने में मदद करेगी.

काका: बिटिया खाना लग गया है खाना खा लो.

गरिमा मन में: साला ठरकी बूठा बात तो इतने प्यार से कर रहा है बिटिया बिटिया कर रहा है और ठरकी ने पक्का इस खाने में नींद की गोली मिले होगी ताकि रात में अपनी ठरक पूरी कर सके. पर साला ढंग से कुछ करता भी तो नहीं बस मुठ मार कर चला जाता है. मुझे hi कुछ करना होगा.

गरिमा: काका आज भूक नहीं लग रही पेट भरा भरा सा लग रहा है.

गरिमा की ये बात सुनकर काका का मुँह ऐसे उतर गया जैसे उसकी जान निकल रही हो.

काका: भूक नहीं लगी ऐसा क्यों शाम तो हल्का नाश्ता hi करा था.

गरिमा: है पर फिर भी मन नहीं कर रहा है.

काका उम्मीद भरी नज़रो से: थोड़ा hi खा लो अच्छा ये दाल hi पी लो बहुत अच्छी बनाई है तड़का लगा कर.

गरिमा मन में: अच्छा मतलब नींद की गोली इस दाल में मिले गई है.

गरिमा: नहीं काका आज बिलकुल मन नहीं कर रहा आज रहने दीजिये सॉरी मुझे पहले hi बता देना चाहिए था आपको बेकार खाना बनाना पड़ा.

काका बुझे मन से: नहीं कोई बात नहीं.

गरिमा: वैसे काका आज भी मौसम बारिश वाला हो रहा है लगता रात में तेज़ बारिश होगी जीतू ने खेतो में मेड तो बना दी होगी न.

काका खिसियाहट के साथ: है काम हो गया था कल 11-12 बजे तक आ जाएगा.

गरिमा: अच्छा वैसे काका वो फ्रिज में जो भांग के लाडू है वो यहाँ कौन खता है.

काका: छोटे मालिक विक्रम और बड़े मालिक लखन दोनों hi भांग के लाडू खाने के शौक़ीन है.

गरिमा: Ok वैसे काका आपने कभी भांग के लाडू खाए है.

काका: है खाए है कई बार खाए है हर होली में कहते है.

गरिमा: उन्हें खा कर कैसा लगता है.

काका: हाहाहा इंसान दूसरी दुनिया में पहुंच जाता है और जिस बात की उसे धुन लग जाती है वही करता जाता है. जैसे कोई रोटी खाने बैठता है तो अपनी भूक से तीन गुना ज्यादा खा जाता है किसी को हसने की धुन लग गई तो वो हस्ता hi जाता है कोई गाना गण शुरू कर दे तो कई घंटो तक नॉनस्टॉप गता जाता है.

गरिमा: तब तो ये बड़े मस्त लाडू है.

काका: है वो तो है.

गरिमा: काका मेरी बड़ी इच्छा है लाइफ में एक बार भांग के लाडू खाने की टास्ते करके देखु.

काका: बिटिया वो बड़े हैवी भांग के लाडू है तुम शहर की हो झेल नहीं पाओगी.

गरिमा: शहर की हु तभी तो खाना चाहती हु शहर में ससुराल में तो ये सब खाने को मिलेगा नहीं अब यहाँ कोई कहने सुनने वाला नहीं है तो यहाँ भी तरय नहीं करा तो फिर कहा करुँगी. अगर आपको दिक्कत हो तो कोई बात नहीं.

काका: नहीं बिटिया मुझे क्यों दिक्कत होगी.

गरिमा ने अपना पास फ़ेंक दिया अब बरी थी काका के रिस्पांस की. गरिमा अंदर किचन म गई और फ्रिज में से तीन लाडू उठा लिए पर लड्डू के साथ साथ उसने किचन शेल्फ में राखी नींद की गोली वाली डब्बी में से दो नींद की गोली निकल कर अपनी मुट्ठी में छुपा ली और बहार आ गई. गरिमा के हाथ में तीन लाडू देख काका चौंक पड़े.

काका: अरे अरे बिटिया ये क्या कर रही हो तीन लाडू खाओगी. पहली बार खा रही हो तीन लाडू नहीं झेल पाओगी.

गरिमा: क्यों इससे तबियत ख़राब हो जाएगी क्या.

काका: नहीं तबियत पर तो ख़राब नहीं होगी पर दिमाग बुरी तरह घूम जाएगा तुम कल सुबह तक अपनी होश में नहीं रहोगी. और भांग के नशे में जाने क्या क्या हरकते करो.

गरिमा: अरे पहली बार एक्सपीरियंस कर रही हु उसमे भी एक खो तो क्या फायदा वैसे भी अभी तो बस आप हो यहाँ कौन देखेगा. लाडू खाकर अपने कमरे में जाकर सो जाउंगी सीधा कल सुबह उठूंगी.

काका के मन में भी उम्मीद की एक किरण जगी की भले hi गरिमा ने नींद की गोली न खाई पर खुद अपनी मर्ज़ी से ये भांग के लाडू खा रही है अगर इसे खाने के बाद अपने सेंस में नहीं रही तब भी उसके ऊपर मुठ मार सकता है.

काका: ठीक है बिटिया खा लो.

पर गरिमा का इरादा तो कुछ और hi था उसने अपनी अगली चल चल दी. जैसे hi काका का ध्यान उससे हटा उसने एक भांग का लाडू वही सोफे के बगल में रखे एक गुलदस्ते में अंदर दाल दिया और दिखने के लिए मुँह चलने लगी जैसे लाडू उसके मुँह में है ऐसा करते हुए उसने वो तीनो लाडू बिना खाए hi गुलदस्ते के अंदर दाल दिए पर काका की नज़रो में ऐसे दिखाया जैसर वो तीन भांग के लाडू खा चुकी है.

गरिमा: काका सच में लाडू तो ज़बरदस्त थे कहते hi सर हल्का हल्का घूमता सा नज़र आ रहा है. मई अपने कमरे में जाती हु यहाँ रही तो पता नहीं क्या हरकते करुँगी.

काका: ठीक है बिटिया जाओ आराम करो और अच्छे से सो लेना जितना सो लोगी उतना सर कम घूमेगा.

गरिमा चुपचाप अपने कमरे में चली गई. गरिमा के कमरे में जाने के कुछ hi देर बाद तेज़ बारिश शुरू हो गई. गरिमा ने खिड़की से बहार देखा तो बारिश काफी तेज़ थी गरिमा ने उपरवाले को शुक्रिया करा इस बारिश के लिए. क्युकी ये बारिश उसे आज सेक्स का नया मज़ा देने में मदद करने वाली थी.

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गरिमा ने अपने कमरे में रखे पानी के जग से एक गिलास पानी लेकर वो नींद की गोली उसमे मिला दी और गिलास धक् कर रख दिया फिर उसने अपना पहना हुआ घाघरा चोली उतर दिया घाघरे के नीचे पहनी अपनी चड्डी भी उतर कर वही कमरे में रख दी और वो बैग खोला जिसे वो शोभा के घर से लाइ थी जिसमे उसके कॉलेज टाइम के कुछ कपडे थे उसके सलवार सूट जीन्स कुर्ते हलाकि उनमे से कुछ भी गरिमा के नाप का नहीं था पर उन्ही कपड़ो के बीच कुछ ऐसा था जो गरिमा पेहेन सकती थी. शोभा की हिघ्कोल्लेगे की ड्रेस जो एक स्कर्ट और शर्ट थी. कॉलेज डेज में शोभा थोड़ी हेअल्थी थी इसलिए वो शर्ट थोड़ा कसकर हो सही पर गरिमा के बदन पर पहनी जा सकती थी और स्कर्ट हाई कॉलेज में तो वो स्कर्ट शोभा के घुटनो से कुछ नीचे तक जाती थी पर गरिमा जैसी एक भरे पुरे बदन की औरत के लिए वो स्कर्ट अब एक मिनी स्कर्ट थी जो उसके घुटो से कुछ ुपत hi ख़तम हो जाती थी पर इलास्टिक होने की वजह से उसे भी पहना जा सकता था. इसलिए गरिमा ने शोभा की वो कॉलेज टाइम की ड्रेस पेहेन ली और खुद को आईने में निहारने में लगी. जब गरिमा जैसी भरे पुरे बदन की औरत एक कॉलेज यूनिफार्म पहनती तो और भी ज्यादा हॉट लगने लगती है. पर अभी भी इस गेटउप में एक कुमी थी बालो का स्टाइल. गरिमा ने अपने बालो में बंधा जुड़ा खोला और एक कॉलेज गर्ल की तरफ दो छोटी बनाकर रबर बंद से बांड लिया.

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कॉलेज गर्ल गरिमा अपने नए अवतार में रेडी थी उस बुड्ढे रसोइये के दिल पर बिजली गिराने के लिए. शर्ट के कैसे हुए बटन जिन्हे देख कर साफ़ पता चल रहा था की उन्हें बड़ी ताकत लगा कर बंद किया गया है और ब्रा की गैरमौजूदगी में उनके अंदर दबे उभर बहार आने को पूरा ज़ोर लगा रहे थे पता नहीं शर्ट के वो कमज़ोर बटन कितनी देर उन विशाल स्तनों को रोक पाएंगे. और गरिमा की स्कर्ट जिनमे से गरिमा की चिकनी गदराई जाँघे आधे से ज़ादा साफ़ नज़र आ रही थी और उस शार्ट स्कर्ट के नीचे पंतय का कोई पर्दा भी न था और हवा का एक तेज़ झोका भी गरिमा के ख़ज़ाने के द्वार को बिहारी काका के सामने उजागर करने के लिए काफी था. और अब समय था गरिमा के अपनी फाइनल चल चलने का. गरिमा ने अपने कमरे की सिटकनी खोली और भांग के नशे में झूमने की एक्टिंग करते हुए ज़ोर ज़ोर से हस्ते और गाते हुए सीढ़ियों से नीचे आने लगी.

गरिमा: मुझे कॉलेज जाना है.

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गरिमा का ये रूप देख बिहारी काका का खून हॉर्स पावर की रफ़्तार से उनकी नसों में दौड़ने लगा. काका तो एकदम शॉक रह गए उन्होंने एक्सपेक्ट भी नहीं करा था की गरिमा भांग के नशे में ऐसा कुछ करेगी उन्हें समझ hi नहीं आ रहा था की वो कैसे रियेक्ट करे. काका ये तो समझ गए थे की गरिमा पर भांग का असर होना शुरू हो गया है और इसीलिए वो इस उम्र में कॉलेज जाने की ज़िद्द लगाए है पर कॉलेज ड्रेस में उसका ये बदन तो केहर ध रहा था. गरिमा ने नीचे एते hi काका को कास कर हुग कर लिया.

गरिमा: शम्बू काका आप मुझे कॉलेज ले जाने आए हो न देखो मई खुद तैयार हो गई अपने आप.

काका: शम्भू काका कौन शम्भू काका.

गरिमा: आप शम्भू काका और कौन मेरे रिक्शा वाले भैया. आप hi तो रोज मुझे कॉलेज ले जाते हो.

अचानक गरिमा की नज़र बहार होती बारिश पर पड़ी और वो पागलो की तरह बारिश बारिश चिल्लाने लगी.

गरिमा: ये बारिश बारिश मई तो बारिश में नहाउंगी.

काका: नहीं बिटिया आप भीग जाओगी बहार मत जाओ.

पर गरिमा तो पूरी तरह डीडे कर चुकी थी उसे क्या करना और कैसे करना है और जो कुछ वो कर रही थी वो पुरे होशो हवस में सोच समझ कर रही थी. काका के लाख रोकने पर भी गरिमा कोठी के बहार खुले मैदान में आ गई और बारिश में भीग भीग कर नाचने लगी. बारिश की बूंदे गरिमा के बदन पर गिर कर उसके उभारो से बहते हुए उसकी मांसल कमर तक जा रही थी. उसकी पहले से कासी शर्ट बारिश में इस कदर भीग चुकी थी की उसके बदन से पूरी तरह चिपक गई थी उसके स्तनों के ऊपर के निप्पल तक उसमे से साफ़ नज़र आ रहे थे. बिहारी काका कोठी के गेट पर खड़े गरिमा को बारिश में भीगते नहाते देख रहे थे. जब गरिमा का सीना उनकी तरफ होता तो उनकी नज़रे उसके स्तनों के विशाल अकार पर ठहर जाती और ज्योही गरिमा उलटी तरफ घूमती उनकी नज़रे गरमा के बदन के सबसे आकर्षक हिस्से उसके बड़े सुडौल नितम्बो पर पहुंच जाती जिनके ऊपर बस एक छोटी सी स्कर्ट थी जो किसी तरह उन्हें छुपाए हुए थी. पर जब भी गरिमा बारिश में इठलाते बलखाते नाचते हुए उछलती तो उसकी स्कर्ट भी ऊपर उठ जाती और छड़ भर के लिए hi सही गरिमा के नंगे कूल्हों काका को दिख जाते.

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नाचते नाचते अचानक गरिमा का पेअर फिसला और वो ज़मीन पर गिर पड़ी. गरिमा को गिरा देख काका ने दरवाज़े के पास hi टेंगा अपना छत उतःया और उसे खोल कर गरिमा को उठाने बहार आ गए.

काका: अरे अरे बिटिया क्या हुआ.

गरिमा: मई गिर पड़ी.

काका: बिटिया मैंने पहले hi कहा था बारिश में मत जाओ गिर गई न. औ उठो मई सहारा देता हु.

काका ने जैसे hi गरिमा को सहारा देकर गरिमा को उठाने की कोशिश की गरिमा ने हाथ का झटका देकर बिहारी काका को अपने साथ ज़मीन पर गिरा लिया. काका को गिरा कर गरिमा खुद उठ कर कड़ी हो गई और उनके सामने hi उछाल उछाल कर हसने लगी.

गरिमा: काका गिर गए शम्भू काका गिर गए.

एक 60 साल का बुद्धा ज़मीन पर गिरा हुआ था और एक 30 साल की औरत 15 साल की बच्ची बनकर बारिश में भीगते हुए उसके सामने उछाल रही थी वो भी तब जबकि वो जानती है की उसने नीचे चड्डी नहीं पहनी है. ऐसे में काका की नज़रे वह जाना लाज़मी था. जैसे hi गरिमा उछली उसकी स्कर्ट उसके सामने से थोड़ा उठ गई और काका की नज़रे सीधा उस औरत के ख़ज़ाने के दरवाज़े पर पहुंच गई. काका के ज़मीन पर गिरा होने और गरिमा के यु उछलने की वजह से स्कर्ट के नीचे से गरिमा की फूली हुई छूट काका को साफ़ नज़र आ रही थी. या यु कहे की गरिमा खुद जानबूझ कर काका को अपनी छूट के दर्शन करा रही थी.

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काका को अच्छी तरह से अपनी जवानी के दर्शन करने के बाद उसने काका को उठाने के लिए अपना हाथ बड़ा दिया. काका भी उसका हाथ पकड़ कर उठ कर खड़े हो गए वो अब भी यही समझ रहे थे की गरिमा भांग के नशे में ऐसा बच्चो जैसा व्यवहार कर रही है पर उसका ये बच्चो जैसा बिहेवियर भी उनके सीने पर छुरिया चला रहा था.

काका: बिटिया अंदर चलो बारिश में भीगने से बीमार हो जाओगी.

गरिमा: नहीं मुझे तो बारिश में डांस करना और वो भी आपके साथ के ों शेक ुर बूटी फ्रॉम ुर धोती.

गरिमा ने आगे बाद कर अपनी बहे काका की कमर में दाल दी और काका को भी अपने साथ बारिश में नाचने लगी. बेचारे काका ने आज तक कभी किसी की शादी में भी कमर न हिलाई थी और आज उन्हें यु बच्चा बानी एक 32 साल की गद्रे बदन वाली औरत के साथ अपने कूल्हों को मटकाना पद रहा था. अचानक आसमान में ज़ोर की बिजली कड़की और एकदम फिल्मी सन की तरह कॉलेज गर्ल गरिमा दर कर बिहारी काका के सीने से लग गई. गरिमा के भरी भरी स्तन बिहारी काका की बालो से भरी छाती में गड़े जा रहे थे. काका को समझ नहीं आ रहा था की वो गरिमा को अपनी बहो में भरे की नहीं पर गरिमा पूरी तरह से काका को अपनी बाहो में भरे हुए थी.

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काका को अपनी बाहो में भरे भरे hi गरिमा ने अपने चेहरे को ऊपर उठाया. गरिमा की आँखों में वासना के लाल डोरे साफ़ नज़र आ रहे थे. और काका भी एकटक बस गरिमा को hi देखे जा रहे थे. ऐसा लग रहा था राजा हिंदुस्तानी मूवी का बारिश में पेड़ के नीचे वाला सीने यहाँ दुबारा शूट हो रहा हो. कुछ इसी तरह करिश्मा कपूर भी बिजली की कड़क से दर कर आमिर के सीने से लग गई थी और फिर जब करिश्मा का चेहरा ऊपर उठा तो उसकी नशीली आँखों के लाल डोरो ने hi कई लुंड से वीर्य निकलवा दिया था. फिर उसके बाद जो कुछ उस मूवी में हुआ था वही यहाँ होने जा रहा था, गरिमा के होठ काका के होंठो के तरफ बढ़ते जा रहे थे और काका की धड़कने तेज़ तेज़ चल रही थी उनके मन में दर तो था की कही कोई देख न ले पर फिर भी उनके अंदर की हवस उन्हें पीछे हटने या गरिमा को आगे बढ़ने से रोक रही थी. फिर वही हुआ हुआ जो मूवी में हुआ था गरिमा और काका के होंठ एक दुसरे से मिल गए.

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और जैसे मूवी में करिश्मा आमिर के होंठो पर टूट पड़ी थी और काफी देर बेतहाशा उन्हें चूमती रही उसी तरह यहाँ गरिमा ने काका के होंठो को अपने होंठो में भर लिया और काका के खुरदुरे रूखे होंठो को चूस चूस कर गीला करती रही.

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गरिमा का ये उन्माद ये जूनून देख काका का ईमान भी आखिरकार डगमगा hi गया और उनके हाथ भी गरिमा की कमर पर पहुंच गए पर जैसे hi काका ने गरिमा की कमर को अपनी बहो में भरा गरिमा ने अपने होंठ काका के होंठो से हटाकर अपना सर निढाल सा काका के कंधो पर लुढ़का दिया. जैसे वो पूरी तरह सेंसलेस हो चुकी है. गरिमा के यु अचानक से बेहोश हो जाने से काका की हवस की आग भी थोड़ी ठंडी हुई और वो अपने सेंस में वापस आए और उन्हें समझ आया की वो अब भी कोठी में बहार खुले में खड़े है जहा कोई भी सड़क से निकलने वाला उन्हें देख सकता है. गरिमा को अंदर ले जाना जरूरी था पर एक बूढ़े में इतनी ताकत कहा की वो गरिमा जैसे भरे पूरे शरीर की महिला को बाहो में उठाकर अंदर उसके कमरे तक ले जाए. पर फिर भी काका किसी तरह गरिमा को सहारा देकर चलते हुए कोठी के अंदर ले आए. गरिमा भी कौंसा बेहोश थी इसलिए वो भी उनके सहारे के साथ चलती हुई कोठी के अंदर आ गई.
 
बिहारी काका और गरिमा बारिश में पूरी तरह भीग चुके थे और उनके कपडे भी मिटटी में सं गए थे.

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बिहारी काका सीढ़ियों पर गरिमा को सहारा देते हुए ऊपर उसके कमरे की तरफ ले जा रहे थे. गरिमा भी बेहद शातिर तरीके से भांग के नशे में डूबे होने की एक्टिंग करते हुए काका के साथ बढ़ती चली जा रही थी. सब कुछ गरिमा की योजना के अनुसार हो रहा था उसने काका के सामने बेहद छोटे कपडे पहनकर उनकी उत्तेजना को बड़ा दिया उनके होंठो पर बेहद हॉट सेडक्टिव स्मूच भी कर लिया पर इतना कुछ करने के बाद भी उसका चैरेक्टर बेदाग़ था क्युकी ये सब तो उसने भांग के नशे में करा और नशे में तो इंसान कुछ भी कर सकता है. काका कॉलेज गर्ल गरिमा को सहारा देकर उसके कमरे में ले आए और ले जाकर गरिमा को गीला hi उसके बिस्तर पर लिटा दिया. लेटते वक़्त गरिमा ने जानबूझ कर अपने सीने पर ज़ोर लगाया की पहले से काफी कासी शर्ट के ऊपर के दो बटन टूट गए और जब गरिमा ने अपना सीना काका की तरफ करा तो काका की आँखे फटी और मुँह खुला का खुला रह गया क्युकी गरिमा के आधे से ज़ादा उभर उसकी शर्ट के अंदर से नज़र आ रहे थे.

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काका का मन तो कर रहा था की अभी उसकी शर्ट को पूरा खोल दे और गरिमा के स्तनों को पूरा नंगा कर दे पर गरिमा नशे में थी बेहोश नहीं इसलिए उसे हिम्मत नहीं हो रही थी. गरिमा को लिटाकर काका सीधे खड़े हो गए गरिमा का उत्तेजक कामुक रूप देख उनके लुंड में तनाव आना शुरू हो फाय था. उन्हें कुछ देर में एक ज़बरदस्त मुठ की ज़रूरत पड़ने वाली थी पर आज रात के लिए गरिमा का इरादा तो कुछ और hi था. अगर काका यही खड़े रहते तो पता नहीं कब तक वो अपनी उत्तेजना को काबू में रख पाते इसलिए उन्होंने यहाँ से जाना hi ठीक समझा. वो जाने को पालते पर अचानक गरिमा ने उनका हाथ पकड़ कर उन्हें रोक लिया.

गरिमा: कहा जा रहे हो दाद्दु.

काका: दाद्दु कौन दाद्दु

गरिमा: आप दाद्दु आप तो मेरे दाद्दु हो न.

काका मन में: पहले शम्भू काका अब दाद्दु पता नहीं ये मुझे आज रात और क्या क्या बनाएगी.

काका: है बिटिया मई तुम्हारा दाद्दु हु और अब मुझे नींद आ रही है तो मई सोने जा रहा हु तुम्हे भी सोना है न कल तुम्हे कॉलेज भी जाना है.

गरिमा: पर कल तो संडे है छूती है.

काका: अच्छा कल संडे है मुझे पता hi नहीं था.

गरिमा: है तो दाद्दु मुझे नींद नहीं आ रही मुझे कहानी सुनाओ न.

काका: कहानी, बिटिया मुझे कहानी नहीं आती. और मई मिटटी में गन्दा भी हो गया हु न.

गरिमा: आप झूट बोल रहे हो दाद्दु आपको तो बहुत अच्छी अच्छी कहानी आती है आप सुनना नहीं चाहते और मिटटी तो मेरे भी लगी है.

गरिमा बिस्तर पर एक बच्चे की तरह हाथ पेअर पटकने लगी और कहानी सुनाने की ज़िद्द करने लगी.

गरिमा: मुझे कहानी सुन्नी है कहानी सुन्नी है कहानी सुन्नी है.

काका: अच्छा अच्छा ठीक है सुनाऊंगा कहानी. सुनाता हु.

काका भी उन गीले कपड़ो में hi बिस्तर पर आकर बैठ गए और कहानी सुनना शुरू hi करा था की गरिमा ने उन्हें टोक दिया.

गरिमा: ऐसे बैठ कर क्यों सुना रहे हो आप तो हमेशा मेरे बगल में लेट कर मुझे अपनी बाहो में लिटाकर कहानी सुणतर हो यहाँ आकर लेटो न मेरे बगल में.

काका ने अपना थूक गतका और चुपचाप बिस्तर पर गरिमा के बगल में आकर लेट गए. गरिमा भी बिना देर करे उनकी ब्याह पर आकर लेट गई.

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आज से पहले काका ने गरिमा के पेट पर कई बार अपना माल निकला पर उसके बदन के इतना करीब वो आज तक नहीं आए थे. वो तो आज रात भी बस गरिमा को नींद की गोली खिलाकर उसके ऊपर मुठ मार कर hi खुद को ठंडा करने की उम्मीद लगाए थे पर इस वक़्त जो हो रहा था वो तो उनकी उम्मीद से भी कही ज्यादा था. गरिमा काका के जिस्म से पूरी तरह चिपक कर लेती थी उसके मोठे मोठे उभर बिहारी की काका की बालो से भरी छाती में डाब रहे थे. काका की नज़रे बार बार शर्ट में से झाकते गरिमा के स्तन और उनमे नज़र आती पानी की बूंदो पर ठहर जाती. पर फिर भी कुछ भी कहानी सुनाए जा रहे थे. हक़ीक़त में तो न उन्हें कहानी सुनाने में इंटरेस्ट था न गरिमा को सुनने में पर फॉर्मेलिटी तो निभाना hi था. गरिमा के जिस्म को अपने इतना करीब पाकर उनके लुंड में कम्पन होना तो लाज़मी था. इसीलिए उनका लुंड बार धोती के अंदर से झटके खा रहा था. और धोती का यु बार बार ऊपर नीचे होना ज्यादा देर गरिमा की नज़रो से छुपा नहीं रहा. काका की धोती को यु बार बार ऊपर नीचे होता देख गरिमा को समझ आ गया की काका अंदर से कितना ज्यादा उत्तेजित है.

पर गरिमा ने भांग की गोली के रूप में जो करैक्टर शील्ड पेहेन राखी उसमे उसे खुली छूट थी कुछ भी करने की. और उस कॉलेज ड्रेस ने उसकी हर हरकत को अबोध बना देती थी. बिहारी काका की धोती को यु ऊपर नीचे होता देख सब कुछ जानते हुए भी गरिमा ने एक अबोध बच्ची की तरह बेहवे करना शुरू कर दिया.

गरिमा: दाद्दु ये आप की धोती में क्या है ये इतना उछाल क्यों रही है.

काका को तो काटो खून नहीं अब वो इसका क्या जवाब दे उन्हें समझ नहीं आ रहा था.

काका: कुछ नहीं बिटिया वो कुछ नहीं है उसे रहने दो.

गरिमा: नहीं नहीं बताओ न मुझे जानना है क्या छुप रखा है आपने अपनी धोती में. कही मेरे लिए कोई खिलौना तो नहीं लाए हो.

अब काका क्या बताते की खिलौना तो उसके लिए hi है पर वो खिलौना वो कैसे दिखाए उन्हें समझ नहीं आ रहा था. पर जितना वो अपने लुंड के झटको को काबू करने की कोशिश कर रहे थे उतना hi वो और ज्यादा झटके खा रहा था.

काका: नहीं नहीं बिटिया इसमें कोई खिलौना नहीं है ये तो हवा से हिल रहा है.

गरिमा: नहीं मुझे देखना है मुझे दिखाओ ये क्या है.

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इतना कह कर गरिमा ने सीधा अपना हाथ धोती के ऊपर से काका के लुंड पर रख दिए और काका को लुंड को अपनी मुट्ठी में भर लिया. गरिमा के नरम कोमल हाथो को अपने लुंड पर महसूस होते hi उनके लुंड की नसे और ज्यादा फूलने लगी. लुंड में इतना ज्यादा तनाव तो कभी खुद मुठ मारते हुए भी उन्हें नहीं महसूस हुआ था जितना इस वक़्त हो रहा था. काका ने गरिमा का हाथ अपने लुंड से हटाने की कोशिश की पर गरिमा तो उसे इतना कास कर पकडे थी जैस छोड़ने को तैयार hi न हो. गरिमा तो उस खिलोने को देखने की ज़िद्द पर अड़ सी गई थी.

गरिमा: मुझे देखना है देखना है देखना है.

काका: बिटिया ज़िद्द न करो समझा करो.

गरिमा: नहीं मुझे कुछ नहीं सुन्ना मुझे देखना है.

गरिमा काका की ढलती खोलने के लिए पीरा ज़ोर लगाने लगी. काका ने उसे रोकने की उसका हाथ हटाने की पूरी कोशिश की पर हटा न सके या शायद उनके अंदर लगातार भड़कती जा रही उत्तेजना ने उन्हें पूरा ज़ोर लगाने नहीं दिया. और इसी के फलस्वरूप जल्द hi उनकी धोती उनके शरीर से जुड़ा होकर गरिमा के हाथो मा गई. अंदर काका पटरे वाला अंडरवियर पहने थे जिसमे से लुंड के झटके अब भी बदस्तूर जारी थे.

गरिमा काका की बहो से उठ गई और इससे पहले की काका खुद उठते ये खुद को सँभालते झीना झपटी में पहले से ढीले हो चुके उनके अंडरवियर को गरिमा ने खींच कर घुटनो तक नीचे कर दिया. अंडरवियर नीचे होते hi उनका घने भलो से भरा कला फूला हुआ लुंड उछाल कर सीधा खड़ा हो गया.

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काका को यकीन नहीं हो रहा था की जिस औरत के बदन को सोच सोच कर उन्होंने इतनी बार अपना लुंड झाड़ा था आज उसी औरत ने उनके लुंड को नंगा कर दिया था. गरिमा को अपना लुंड निहारते देख वो और भी ज्यादा उत्तेजित हो रहा था जिस वजह से उनका लुंड और झटके खा रहा था. अंडरवियर नीचे होने के बाद काका ने भी उसे दुबारा ऊपर करने की कोशिश नहीं की और जो हो रहा था उसे अब भगवान् भरोसे छोड़ दिया की पता नहीं आज उनकी किस्मत सोने की कलम से लिखी हो और आज उन्हें क्या खज़ाना मिलने वाला हो. कुछ देर यही काका के लुंड को निहारने के बाद गरिमा ने उसके टोपे को अपनी ऊँगली से टच करा. गरिमा की ऊँगली के हलके से स्पर्श से काका के पुरे बदन में करंट दौड़ गया.

शायद इसी करंट को महसूस करके hi किसी महान कवी ने ये कविता लिखी है. "लग गए 440 वाल्ट छूने से तेरे" शायद उसको भी उसकी प्रेयसी ने इसी तरह इसी जगह पर छुआ होगा.

स्पर्श करते करते गरिमा ने उसे अपनी मुट्ठी में भर लिया.

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गरिमा: दाद्दु ये क्या है. ये कैसा खिलौना है.

काका: बिटिया अब मई क्या बताऊ ये क्या खिलौना है.

गरिमा: बताओ न ये आपके चिपका क्यों है. इससे क्या होता है.

काका: इससे मई सुसु करता हु.

गरिमा हस्ते हुए: क्यों मज़ाक करते हो इससे कही सुसु करते है मेरे तो ऐसा कुछ नहीं लगा.

काका: औरतो के ये नहीं होता ये बस आदमियों के होता है.

गरिमा: अच्छा, और इस पर इतनी दादी क्यों निकली है.

काका: ये दादी नहीं है इसकी झाते है सुसु वाली जगह पर ऐसे बाल आ जाते है.

गरिमा: नहीं तो मेरी सुसु वाली जगह पर तो एक भी बाल नहीं है. और ये इतना उछाल क्यों रहा है.

काका: वो इसकी आदत है जब ये ज्यादा जोश में होता है तो घोड़े की तरह उछालना शुरू कर देता है.

गरिमा: अच्छा तब मेरेको इस घोड़े की सवारी करनी है.

काका को यकीन नहीं हो रहा था की गरिमा क्या कह रही है. पर साथ hi उन्हें दर भी था की कही उनका पानी गरिमा के अंदर निकल गया और सुबह उसे ये पता चल गया तो क्या होगा.

काका: नहीं बिटिया बड़ी लड़किया इसकी सवारी नहीं करती.

गरिमा: पर मई तो अभी बच्ची हु न. मुझे इसकी सवारी करनी है करनी है करनी है.

काका: समझा करो.
 
पर गरिमा अपने इस नए अवतार में कहा कुछ सुनने वाली थी वो अपने दोनों पेअर काका के आजु बाजू करके अपने कूल्हे सीधा काका के लुंड पर रख कर बैठ गई. अंदर चड्डी न पहने होने की वजह से गरिमा की छूट सीधा काका के लुंड से टच हो रही थी. पर सिर्फ बैठ कर गरिमा शांत नहीं रही उसने काका के लुंड पर बैठ कर छोटे बच्चे की तरह घोडा चलना शुरू कर दिया.

गरिमा: चल मेरे घोड़े टिक टिक टिक.

गरिमा काका के लुंड पर आगे पीछे हिली जा रही थी जिस वजह उसकी छूट उनके लुंड पर रगड़ खा रही थी और गरिमा के भरी वजन की वजह से काका के लुंड की खाल भी आगे पीछे हो रही थी.

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काका का तो उत्तेजना के मरे बुरा हाल हो आया था. उनकी आँखे बंद हो गई थी मुँह से तेज़ तेज़ ाः निकल रही थी और हाथ खुद बा खुद गरिमा की कमर पर पहुंच गए थे. वो झड़ने के जरीब थे उन्होंने गरिमा की कमर को कास कर पकड़ लिया था और उनकी इस पकड़ से गरिमा को भी एहसास हो गया था की काका का लुंड अपने माल निकलने वाला है पर उसे तो वो अपने अंदर लेना था. इसलिए को अचानक से क्लाइमेक्स पर पंहुचा कर गरिमा अचानक से शांत हो गई और एकदम आँखे बंद करके चुपचाप वैसे hi बैठी रही.

अचानक से क्लाइमेक्स के इतने करीब पहुंच कर गरिमा के यु रुक जाने से काका का तो जैसे कलपद हो गया. उन्होंने अपनी आँखे खोली तो गरिमा को अपनी छाती पर आँख बंद करके बैठा पाया. गरिमा बिना किसी हरकत के बस चुपचाप बैठी थी. काका को समझ नहीं आ रहा था की गरिमा ऐसे क्यों बैठी है उन्हें हल्का हल्का दर भी लगा की कही उत्तेजना की वजह से भांग का नशा कम तो नहीं हो गया पर इस वक़्त गरिमा जैसी हष्ट पुष्ट औरत उनके ऊपर बैठी थी वो कुछ कर भी नहीं सकते थे सिवाय गरिमा को वापस सेंस में लाने के.

काका: बिटिया, ो बिटिया क्या हुआ सो गई क्या, बिटिया.

काका के बार बार पुकारने पर गरिमा ने हौले हौले अपनी आँखे खोली पर अब उसकी आँखों से एक बच्चे वाला भोलापन गायब सा नज़र आ रहा था और उसमे वासना के लाल डोरे नज़र आ रहे थे और गरिमा ने काका को एक नाम से पुकारा.

गरिमा: रमेश

काका: कौन रमेश

गरिमा: ओह जणू माय लव ी मिस ु सो मच

इतना कह कर गरिमा अपना चेहरा सीधा काका के चेहरे के करीब ले आई और कुछ समझते उससे पहले काका के होंठो को अपने होंठो में भर लिया.

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गरिमा काका के होंठो को बेतहाशा चूसे जा रही थी पर काका के मन में यही सवाल चल रहा था की अब ये रमेश कौन है. अचानक काका का याद आया की गरिमा ने बातो बातो में ज़िक्र करा था की उसके पति का नाम रमेश है. मतलब अब ये मुझे अपना पति समझ रही है एक रात में और क्या क्या बनाएगी मुझे. यानि इस वक़्त ये मुझे अपना पति समझ रही है और इसलिए मेरे साथ ये सब कर रही है. हलाकि गरिमा ये सब जानबूझ कर रही थी पर काका को यही लग रहा था की भांग के नशे में वो उन्हें अपना पति समझ रही है. काका के होंठो को छंटे चूमते गरिमा अपना एक हाथ नीचे अपने और काका के बीच ले गई और नीचे ले जाकर काका के लुंड को अपने हाथो में थम लिया. और अपने कूल्हों को उचका कर लुंड को एकदम सीधा कर के उसे अपनी छूट के मुहाने पर रख दिया.

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काका तो उत्तेजना में सब कुछ भूल गए थे और बस आँखे बंद करे हुए हर पल ला मज़ा ले रहे थे. उनकी खुमारी तब टूटी जब उन्हें अपना लुंड किसी तंग जगह में दाखिल होता महसूस हुआ. जैसे hi उन्होंने आँखे खोली उनका दिल धक् कर गया क्युकी गरिमा उनकी छाती पर बैठी उनके लुंड को अपनी छूट में दाखिल करती जा रही थी. जब तक काका कुछ समझते या करते गरिमा पूरा नीचे हो चुकी थी और काका का झाटो से भरा झुर्रीदार लुंड अपने आखिरी छोर तक गरिमा की छूट में दाखिल हो चूका था.

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आज अपनी बीवी के मरने के बरसो बाद उन्हें अपने लुंड के इर्द गिर्द एक औरत की छूट की गर्माहट महसूस हुई थी वो भी शहर की इतनी कामुक महिला की जो उनसे उम्र में 25 साल से भी ज्यादा छोटी थी. काका भूल चुके थे की जो वो करने जा रहे उसका परिणाम क्या होगा वो गरिमा की छूट की गर्मी में सब कुछ भूल गए थे. उत्तेजना ने उनकी सोच को शुन्य कर दिया था और इसी उत्तेजना में उन्होंने ने भी गरिमा को अपनी बाहो में जकड लिया और इस बार खुद पहल करते हुए गरिमा के होंठो को अपने होंठो में भर लिया. और गरिमा को होंठो को अपनी जीभ से चेतना शुरू कर दिया. गरिमा को भी काका की इन हरकतों में एक अलग hi मज़ा आ रहा था. काका की हरकते गरिमा की उत्तेजना भी ढुंगणी कर रही थी अपने से उम्र में इतने बड़े एक बुद्ध के साथ इस तरह छोड़ने में उसे एक अलग hi मज़ा आ रहा था जो उसे अपने पति और हरिया या जीतू के साथ भी नहीं आया. गरिमा अपनी कमर को ऊपर नीचे करके काका के लुंड को अपनी छूट में अंदर बहार कर रही थी.

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पहले से अपने समक्ष के करीब पहुंच रहे काका ने भी नीचे से धक्के लगाना शुरू कर दिया. काका को भी नीचे से धक्के लगता देख गरिमा भी एक्ससिटेमेंट में भर गई और उसने कामुक आवाज़े निकलना शुरू कर दिया.

गरिमा: ओह रमेश एस ओह गॉड ममममम ओह फ़क में आआह्ह्ह फ़क में.

काका को हलाकि उसके अंग्रेजी शब्द तो समझ नहीं आ रहे थे पर उसके मुँह से निकलती उन कामुक आवाज़ों उन करहो उन मरमराहतो से वो साफ़ महसूस कर रहे थे की गरिमा को कितना मज़ा आ रहा है. गरिमा की इन सिसकारियों ने काका को अंदर से और जोश से भर दिया और उन्होंने नीचे से दुगनी तेज़ी से धक्के मारने शुरू कर दिया. हर धक्के में काका का लुंड गरिमा के अंदर जड़ तक उतर जाता और गरिमा को उचकने पर महबूर कर देता पर काका को कास कर अपनी गिरफ्त में जकड़े थे इसलिए गरिमा छह कर भी ऊपर नहीं हो सकती थी इसलिए काका का लुंड अपने झांट के बाली के साथ गरिमा की छूट की दीवारों में तेज़ तेज़ घर्ष कर रहा था. और ये घर्षण गरिमा और काका दोनों को उनके क्लाइमेक्स पॉइंट के करीब ले जा रहा था. और दस बारह धक्को के साथ hi गरिमा ने अपनी क्लाइमेक्स को प् लिया और उसके कुछ पल बाद hi गरिमा की छूट के पानी का एहसास होते hi काका ने भी अपना गाड़ा वीर्य गरिमा की छूट के अंदर hi निकल दिया.

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अपने क्लाइमेक्स के बाद बिहारी काका और गरिमा दोनों गहरी गहरी सासे ले रहे थे. बरसो बाद आज काका को एक औरत के जिस्म का असली सुख मिला था उनके लुंड को एक छूट में दाखिल होने का मौका मिला था वही सेडक्टिव के संसार में पूरी तरह उतर चुकी उस हाउसवाइफ गरिमा को सेक्स का एक नया एक्सपीरियंस मिला था. अपने पति के अलावा हरिया के बाद ये तीसरा लुंड था जो उसकी छूट के अंदर दाखिल होकर उसमे अपने वीर्य निकल कर शांत हुआ था. चाहती तो वो जीतू का लुंड भी अंदर ले सकती थी पर वो बहार उस माहौल में उस एक्सपीरियंस को स्पोइल नहीं करना चाहती थी इसलिए उसने जीतू को अभी बचा रखा था उस स्वीटडिश की तरह जिसे खाने के बाद खाया जाता है. पर गाँव में दो मर्दो से चुदाई का अनुभव तो उसे मिल hi चूका था जिसने उसकी भूक को और बड़ा दिया था और पता नहीं ये भूक उसकी शादीशुदा ज़िन्दगी में क्या तूफ़ान लाने वाली थी.

क्लाइमेक्स के बाद काका तेज़ तेज़ सासे ले रहे थी उनके होंठ सूख रहे थे. उनका दिमाग अभी भी सेक्स की खुमारी में था जिस वजह से उन्हें अंदाजा भी नहीं था वो क्या कर गए है. प्यास के मारे वो बार बार अपनी जीभ बहार निकल रहे थे. और गरिमा इस पल के लिए पूरी तरह तैयार थी गरिमा जानती थी की काका जैसे उम्रदराज़ आदमी को इतनी ज़बरदस्त चुदाई के बाद ज़ोर की प्यास लगेगी और इसी पल के लिए उसने उनके पीने के लिए पानी का इंतज़ाम पहले से कर रखा था. गरिमा ने बिस्तर के सिराहने रखा वो पानी का गिलास उठाकर उसको बस नाम के लिए दिखने के लिए अपने होंठो से लगाया और फिर वो गिलास काका के होंठो से लगा दिया. पानी के लिए प्यासे ने बिहारी काका ने वो नींद की गोली मिला पानी का पूरा गिलास पल भर में खली कर दिया. पानी में घुलने के बाद दवाई ज्यादा जल्दी असर करती है और उन नींद की गोलियों ने भी अपना असर दिखाना शुरू कर दिया. इतने दिन से वो जो पैतरा गरिमा पर आजमा रहे थे आज वो खुद उसका शिकार बन चुके थे. उम्र की वजह और शरीर के अंदर से इतना गरम होने की वजह से भी दवाई का असर जल्दी हो रहा था. काका का सर घूम रहा था उनकी पलके भरी हो रही थी उन्हें गहरी नींद आ रही थी. और कुछ hi पल में बिहारी काका गरिमा के कमरे में उसीके बिस्तर पर अपना लुंड उसकी छूट में दाखिल करे करे नींद ने आगोश में समां चुके थे.

काका के खर्राटों की आवाज़ से कमरा गूंजने लगा. काका के पूरी तरह गहरी नींद में सो जाने का आश्वासन होते hi गरिमा ने काका अपना चेहरा उठा लिया और काका के गालो में को अपने हथेली से दबाने लगी.

गरिमा: कई रातो से मुझे नींद की गोलिया खिला खिला कर मेरा फ़ायदा उठाया और फायदा उठया भी तो वो भी ढंग से नहीं उठाया. नाउ इतस पेबैक टाइम अब मई बताती हु की फायदा कैसे उठाया जाता है. काका जी आज रात इत्मीनान से चैन की नींद सो लो क्युकी कल जब आप नींद से जागोगे और आपको पता चलेगा की आपने मेरे भांग के नशे में होने का किस तरह फयफा उठाया तब देखती हु आप कैसे रियेक्ट करते है.

गरिमा काका के सीने से उतर कर उनके बगल में उन्हें अपनी बाहो में भर कर लेट गई.

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पहले खुद गरिमा ने बिना एक भी भांग का लाडू खाए खुद के भांग के नशे में होने का नाटक करा फिर उत्तेजक कपडे पहनकर बारिश में अपना भीगा बदन दिखा कर उन्हें होंठो पर चुम्बन देकर काका को उत्तेजित करा फिर बड़े hi शातिर तरीके से उन्हें अपने कमरे में लाइ नशे का नाटक करते हुए कामुक हरकते करके उन्हें उत्तेजित करा और फिर खुद hi अपने नशे में होने का फायदा उठा कर काका से खुद को छुड़वाया और फिर काका को नींद की गोली मिला पानी पीला कर अपने बगल में hi बेहोश कर दिया अब जब काका सुबह जागेंगे तब उनका क्या रिएक्शन होगा ये तो सुबह hi पता चलेगा.

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काकातुआ के जंगल

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अघोरी के निर्देशानुसार विनीता और लखन ने वो सफ़ेद वस्त्र पेहेन लिए लखन ने वो लंगोट और विनीता ने वो सफ़ेद कपडा लपेट लिया और पूजा की थाल लेकर तम्बू से बहार आ गए. अब उन्हें चंद्र पूजा का पहला चरण कमल वन्दनं पूरा करना था. लखन जी सामने कमल पुष्पों से भरे तालाब से किनारे से दो सुन्दर कमल पुष्प ले आए और उन्हें पूजा की थाल में रख दिया. जिसके बाद विनीता और लखन ने मिलकर प्रातः काल में की गई सूर्य पूजा की hi तरह चंद्र की भी आरती की, ॐ चन्द्रय नमः मंत्र का जाप करा और जिस तरह सूर्य को जल समर्पित करा जाता है उसी तरह चंद्र को कमल पुष्प अर्पित करे. कमल पुष्प के अर्पण के साथ पूजा का प्रथम चरण पूरा हो गया.

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अब पूजा के अगले दो चरण पुरे करने थे मोती अर्पणम और पुष्प सुगंधम जो लखन और विनीता को अलग अलग पुरे करने थे जिसमे लखन को उस तालाब के अंदर जाकर वह मौजूद अनेको कमल पुष्पों में वो 101 कमल पुष्प ढूंढ़ने थे जिनमे श्वेत मोती रखे थे और उन 101 मोतियों को इकठा करके किनारे लेकर चंद्र के स्त्री स्वरुप को प्रसन्न करने के लिए पुरुषो द्वारा अर्पित किये जाने मोतियों के आभूषण को सुई धागे की मदद से बनाना था. वही विनीता को तम्बू के पीछे बने रजनीगंधा पुषो के बगीचे से 101 सुन्दर सुगन्धित पुष्प चुन कर लाने थे और उनसे चंद्र के पुरुष स्वरुप को आकर्षित करने हेतु स्त्रियों द्वारा पहना जाने वाला गजरा उसी सुई धागे की सहायता से तैयार करना था.

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तो पूजा की विधि के अनुसार लखन मोती इकठे करने के लिए एक पोटली लेकर उस तालाब में उतर गए और विनीता तम्बू के पीछे उस बगीचे में चली गई और वह लगे रजनीगंधा पुषो में से सुन्दर सुन्दर पुष्प चुनने लगी. पूरा बगीचा रजनीगंधा पुषो से भरा था और विनीता के लिए किसी विशेष पुष्प को चुनने की बाध्यता भी नहीं थी इसलिए वो शीघ्रता के साथ पुषो को चुनती जा रही थी. पर लखन जी को उन अनेको कमल पुषो में से वो 101 विशेष मोती वाले कमल पुष्प ढूंढ़ने में काफी दिक्कत हो रही थी. तालाब ज्यादा गहरा नहीं था पर कमल पुष्पों से भरा होने की वजह से उन्हें आगे बढ़ने में दिक्कत हो रही थी, और रात्रि की वजह से मोती ढूँढा भी मुश्किल था. ये तो अच्छा था चाँद अपने पुरे शबाब पर था जिसकी रौशनी उन्हें मदद कर रही थी.

विनीता ने तो 101 रजनीगंधा पुष्प इकठे कर भी लिए और उनका गजरा बनाना भी आरम्भ कर दिया.

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पर लखन अभी उन कमल पुषो में उलझे हुए थे. काफी देर की जद्दोजहद के बाद आखिरकार लखन उन मोतियों को इकठा करने में सफल रहे. और उन्हें बहार लेकर उनका धागे में पिरो पिरो कर उनकी माला बनाना आरम्भ कर दिया. अपना गजरा बना चुकी विनीता ने भी इस काम में लखन की मदद की. और दोनों ने मिलकर चंद्र पूजा के दुसरे और तीसरे चरण पुरे कर लिया एक सुन्दर गजरे का निर्माण करा और मोतियों की माला भी बना दी और उन्हें उसी पूजा की थाली में रख दिया. अब समय था पूजा के चौथे और सबसे मुश्किल चरण का दूध SNANAM/DOODH पणाम जिसमे विनीता को दूध से स्नान करना था और लखन को उस दूध का ज्यादा से ज्यादा पान करना था वो भी सीधे विनीता के स्तनों से.

विनीता जानती थी की लखन सिंह को खुद से आगे बढ़ने में हिचक होगी इसीलिए उसने खुद hi पूजा को आगे बढ़ाने की बात कही.

विनीता: लखन जी अंदर से दूध का मटका ले आइये.

लखन को बहुत ावक्वार्ड लग रहा था उनसे अपनी जगह से हिला भी नहीं जा रहा था. उन्हें बट बना खड़ा देख विनीता ने दुबारा अपनी बात दोहराई.

विनीता: लखन जी दूध का मटका भरी होगा इसलिए आप ले आइये वर्ण मई hi ले आती.

लखन: जी मुझे बहुत बुरा लग रहा है...

विनीता: आप बुरा मत मानिये मई जो भी कर रही hi अपनी मर्ज़ी से कर रही हु अपनी सहेली के लिए कर रही हु और वैसे भी कल रात जो कुछ हुआ उसके सामने आज की ये विधि तो कुछ भी नहीं है.

विनीता की बात से लखन के सामने कल रात का ब्लोजॉब वाला दृश्य सजीव हो उठा. कही न कही विनीता सही थी कल रात की विधि के सामने आज की विधि कुछ भी नहीं थी. पर कल जो कुछ करना था विनीता को करना था पर आज काम लखन सिंह को करना था वो भी खुद पर संयम रखते हुए. स्तन किसी भी औरत के जिस्म का सबसे आकर्षक अंग होता है और सालो से एक विदुर का जीवन जी रहे लखन सिंह एक इतनी सुन्दर आकर्षक स्त्री के स्तनों को अपने इतना करीब पाकर खुद पर संयम रख पाएंगे या उनकी उत्तेजना उन्हें मर्यादा की दीवार लांघने पर विवश कर देगी.

लखन सिंह संकुचाते हुए तम्बू के अंदर गए और वो दूध से भरा मटका ले आए और विनीता में समीप लेकर रख दिया. विनीता उस मटके के बगल में पालथी मार कर बैठ गई. विनीता ने मटके के ऊपर रखा गिलास उठा कर उसे मटके के अंदर दाल कर उसे पूरा दूध से भर लिया. विनीता दूध स्नान आरम्भ करने वाली थी पर लखन सिंह अब भी विनीता की तरफ पीठ करे दूर खड़े थे. शायद उन्हें विनीता से नज़रे मिलाने में भी शर्म आ रही थी. या शायद उन्हें खुद पर hi भरोसा नहीं रहा था की आज जो उनके मन में विनीता के प्रति प्रेम का अंकुर फूटा था वो उन्हें बहका न दे. विनीता के प्रति प्रेम के बीजारोपण के बाद उनके मन में उसके रूप सौंदर्य के प्रति आकर्षण भी उत्पन्न हो चूका था ऐसे में इस कामुक अवस्था में उसके इतना करीब जाने पर बहकने का दर सतना स्वाभाविक था.

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वही विनीता के मन की दुविधा आज कल रात से कुछ अलग थी. कल रात उस मुख मैथुन की विधि से पहले विनीता का मन बहुत विचलित था उसने बड़ी मुश्किल से खुद को उस काम के लिए तैयार करा था. पर आज लखन सिंह के प्रति अपने मन में पनपे इस प्रेम के प्रथम एहसास की वजह से अपने स्तनों पर लखन सिंह के अधरों के एहसास के ख्याल ने विनीता को अंदर से रोमांच से भर दिया था. बेशक उसका दिमाग उसे मैंने नहीं दे रहा था पर असलियत यही थी की उसका दिल भी लखन सिंह के अधरों को अपने स्तनों पर महसूस करने के लिए व्याकुल था. पर लखन सिंह के यु अपनी ततफ पीठ करके खड़े होने ने विनीता को अंदर से मायूसी से भर दिया था. विनीता को समझ आ गया था की लखन सिंह के मन उसके प्रति किसी तरह का कोई अकाटशन नहीं है उनके लिए ये सिर्फ पूजा की एक सामान्य सी विधि भर है इसलिए इस विधि मेरे स्तनों को अपने अधरों से स्पर्श करने की बात ने उन्हें विचलित कर रखा है इसलिए वो ग्लानि की वजह से मुझसे नज़रे भी नहीं मिला रहे.

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विनीता इस बात से अनजान थी की जिसे वो लखन सिंह की ग्लानि समझ रही है वो वास्तव में उनका दर है बहक जाने का दर. और लखन सिंह इस बात से बेखबर थे की वो जिस बात से इतना दर रहे है विनीता खुद दिल से वही चाहती है. यदि उनको एक दुसरे के मन के भावो का हल्का सा भी एहसास होता तो दोनों के मन की दुविधा पल भर में दूर हो जाती. पर अफ़सोस ऐसा नहीं था और अब समय था पूजा इस चरण को आगे बढ़ाने का और यु पीठ करके खड़े रहने से तो ये होने वाला नहीं था. इसलके लिए लखन सिंह को विनीता को करीब आना था और जब तक विनीता खुद उन्हें इसकी इज़ाज़त नहीं देती उनके जैसे सज्जन इंसान से इसकी उम्मीद नहीं की जा सकती थी और विनीता भी ये बात जानती थी. हुए हर बार की तरह इस बार भी विनीता ने खुद िनितीयते करा.

विनीता: लखन जी आप वह क्यों खड़े है पीठ करे.

विनीता के पुकारने पर लखन सिंह को पलटना hi पड़ा.

लखन: नहीं कुछ नहीं बस ऐसे hi.

विनीता: हमे पूजा को आगे बढ़ाना चाहिए.

विनीता के मुँह से आगे बढ़ने की बात सुन कर लखन सिंह के दिल की धड़कने बाद गई क्युकी वो जानते थे की आगे बढ़ने से उसका क्या मतलब है. उसने समझ नहीं आ रहा था क्या करे क्या कहे. कल तो विनीता ने सब खुद कर लिया था वो बस खड़े रहे थे पर आज तो सब कुछ उन्हें करना है. लखन सिंह को यु पशोपेश में खड़ा देख विनीता उनके मन के हालत को समझ गई.

विनीता: मई आपकी हालत समझ सकती हु पर रोज इस तरह की चुनौती हमारे सामने आ रही है अब जैसे कल की चुनौती पूरी करि है ये भी कर लेंगे. आप रिलैक्स रहिये और बिना किसी झिझक या गिल्ट के ये करिये ये मई आपसे कह रही हु.

विनीता के खुद बुलाने पर लखन की झिझक भी कुछ कम हुई और धीमे धीमे विनीता के करीब आकर उसके सामने आकर बैठ गए.

विनीता: मई दूध स्नान शुरू कर रही हु आप तैयार है.

लखन: ज ज ज जज्जीीी

विनीता ने बड़े कॉन्फिडेंस के साथ लखन को अपने करीब बुला तो लिया पर अब जब वो उसके करीब थे और दूध से भरा उसके हाथ में था तो ये सोच कर hi उसके गूसबम्प्स खड़े हो गए थे की अगले कुछ पल में लखन सिंह के होंठ उसके स्तनों पर होंगे. एक्ससिटेमेंट में विनीता ने अपनी आँखे बंद कर ली और दूध का वो पहला गिलास अपने ऊपर डाला.

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दूध की धरा उसके सर से होते हुए उसकी आँखों होंठो को स्पर्श करते हुए गर्दन से नीचे आ रही थी और उसके बहाव के साथ उसकी धड़कने बढ़ती जा रही थी. पर दूध की धरा स्तनों को पार करके नीचे चली गई और उसे अपने स्तनों पर किसी तरह की हरकत महसूस नहीं हुई.

उसने आँखे बंद करे करे hi मटके में गिलास डालकर दूसरा गिलास भरा और एक बार फिर पिछली प्रक्रिया को दोहराया पर इस बार भी नतीजा पहले की hi तरह रहा. उसे अपने स्तनों पर किसी तरह कोई स्पर्श महसूस नहीं हुआ. इसलिए उसे अपनी आँखे खोलने को मजबूर होना पड़ा. सामने लखन जी नज़रे झुकाए बैठे थे उन्होंने विनीता के स्तनों को स्पर्श करने का प्रयास भी नहीं किया था. उन्हें यु बैठा देख विनीता को यकीन हो गया की उनके मन में उसके प्रति सिर्फ और सिर्फ आदर का भाव है और कुछ नहीं. पर इस पूजा के पुरे होने के लिए उनका मेंटली प्रेपर होना ज़रूरी था और ये काम विनीता को hi करना था. इसलिए विनीता ने उन्हें समझने की कोशिश की.

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विनीता: क्या हुआ लखन जी आप ऐसे क्यों बैठे है.

लखन: मुझसे नहीं हो पाएगा ये मई नहीं कर पाउँगा.

विनीता: मई जानती हु ये सब हम दोनों के लिए मुश्किल है पर आप खुद से पहले विक्रम और शोभा के बारे में सोचिये. शायद पहले जब हमारी शादी हुई थी तब अघोरी बाबा ने देख लिया था की हमारे मन में एक दुसरे के लिए कोई भाव नहीं है इसीलिए आज हमारी दुबारा शादी करवाई गई ताकि आगे की पूजा हमारे लिए आसान हो जाए. ी क्नोव की हम दोनों क्र मन में एक दुसरे के लिए उस टाइप का प्यार नहीं है बूत इसे एक रसम एक टास्क की तरह पूरा कर लीजिये जैसे मैंने कल करा था. मेरे लिए भी कल वो सब करना बेहद मुश्किल था पर मैंने करा अपनी दोस्त के लिए करा. आप भी यही सोचिये और किसी तरह का कोई गिल्ट मन में मत रखिये की मई आपके बारे में क्या सोचूंगी. इतने दिन में आपको इतना समझ hi गई हु की आप कैसे हो इसलिए मई आपको इज़ाज़त देती वो सं करने की. मई हिमायत के साथ इस पूजा में आने वाली हर चुनती को पूरा कर रही हु इस उम्मीद में की जो ख़ुशी मेरी शादीशुदा ज़िन्दगी में नहीं मिली वो मेरी सहेली को मिले पर ये सब मई अकेले नहीं कर पाऊँगी आपको मेरा साथ देना होगा. आपको को खुद को इसके लिए तैयार करना होगा. प्लीज, क्या आप तैयार है और इस बार हां तभी बोलियेगा जब आप वाकई तैयार हो. क्या आप तैयार है.

विनीता के इतने प्यार से समझने पर लखन ने फाइनली अपनी नज़रे ऊपर उठाई और एक गहरी सास लेते हुए हां में सर हिला दिया.

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विनीता: तो मई तीसरा गिलास अपने सर पर डालने जा रही हु और इस बार कमज़ोर मत पदियेगा.

लखन ने हां में सर हिला दिया.

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विनीता ने आँखे बंद करि और तीसरी बार दूध का गिलास अपने सर पर डाला. लखन सिंह ने एक नज़र कपड़ो के अंदर से ऊपर नीचे होते विनीता के उभारो को देखा जिनके ऊपर का कपडा दो बार में पहले से भीग चूका था और विनीता के स्तनों से चिपक गया था जिस वजह विनीता के स्तनों का आकर साफ़ नज़र आ रहा था और उनके ऊपर छोटे छोटे चूचक भी.

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इतने दिनों में पहली बार शायद लखन सिंह ने विनीता के स्तनों को इतने ध्यान से देखा था वो भी इस कामुक अवस्था में. सिर्फ देखने मात्रा से लखन का लिंग उनके लंगोट के अंदर अकड़ना शुरू हो गया और उन्हें अपनी उत्तेजना का एहसा हो गया. और यही उनकी सबसे बड़ी चुनौती भी थी इस उत्तेजना को काबू में रखना.

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दूध की धरा नीचे को आ रही थी और फाइनली लखन सिंह ने एक गहरी सास ली और अपना चेहरा झुकाते हुए विनीता के स्तनों के बेहद करीब ले आए इतना करीब की विनीता को कपडे के ऊपर से अपने स्तनों पर लखन सिंह की साँसों की गर्माहट महसूस हो रही थी. दूध की धरा गर्दन से नीचे को आ रही थी और विनीता का उत्तेजना और रोमांच से सराबोर था. दूध की धरा ने जो hi विनीता के स्तनों को स्पर्श करा उसे अपने दे चूचक पर लखन जी के निचले होंठ का हल्का सा स्पर्श महसूस हुआ. विनीता के तो तन बदन में करंट की लेहेर दौड़ गई. जीवन में पहली बार किसी पुरुष ने उसके स्तनों को अपने होंठो से स्पर्श करा था. उसने अपनी उत्तेजना को काबू करने के लिए अपने खली हाथ से ज़मीन की घास को कास कर पकड़ लिया.

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लखन ने अपनी जीभ को हल्का सा बहार निकला और कपडे के ऊपर से विनीता के स्तनों से नीचे बहकर जाते दूध को चेतना शुरू कर दिया पर इस क्रम में उनकी जीभ विनीता के स्तनों को भी चाट रही थी जिस वजह से लखन सिंह का लिंग उनके लंगोट के अंदर उधम मचा रहा था वही विनीता को अपनी जांघो के बीच गुदगुदी सी महसूस हो रही थी. जीवन में पहली बार किसी मर्द ने उसके स्तनों को अपनी जीभ से स्पर्श करा था और स्तन किसी भी औरत की काम उत्तेजना बढ़ाने वाले एक महत्वपूर्ण अंग है इसलिए विनीता का उत्तेजित होना स्वाभाविक था. लखन की जीभ के हलके से स्पर्श से विनीता का पूरा बदन काँप गया. मटके से दुबारा दूध निकलने में भी उसके हाथ काँप रहे थे. पर फिर भी विनीता ने फिर गिलास को मटके में डाला और एक बार फिर दूध से भरा गिलास बहार निकला.

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लखन के होंठ अब भी विनीता के स्तनों पर थे और विनीता ने एक बार फिर दूध को अपने ऊपर उड़ेल दिया. लखन ने विनीता के चूचक के माध्यम से उस दूध का पान आरम्भ कर दिया. विनीता ने उत्तेजना में थोड़ी और घास ज़मीन से उखड दी. उत्तेजना के बावजूद लखन सिंह विनीता के पुरे स्तन को अपने मुँह में नहीं भर रहे थे वो सिर्फ उसके चूचक के इर्द गिर्द बह कर आ रहे दूध को hi चाट रहे थे. पर कई सालो से पत्नी के बिना जी रहे विधुर आदमी और अब तक अपने स्तनों पर आदमी के होंठो की गर्माहट से भी महरूम रही औरत के लिए इतना भी बहुत था उत्तेजित करने के लिए. विनीता का मन कर रहा था की वो लखन सिंह के सर को अपने हाथो में कास कर जकड ले और ज़ोर से उनका सर अपने स्तनों में दबा दे और अपने पूरा स्तन उनके मुँह में ठूस दे. पर लखन जी के कहे हुए शब्द और मर्यादा की दीवार ने उसे रोक दिया था शायद इसी लिए उसने ज़मीन की घास को इतना कास कर पकड़ रखा था की कही गलती से भी उसके हाथ लखन सिंह के सर तक न पहुंच जाए.

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वही लखन सिंह का भी कुछ कुछ यही हाल था उनकी पत्नी को मरे 25 साल से भी ज्यादा हो गया था. जब वो 25-26 साल के थे तब hi उनकी पत्नी गुज़र गई थी इसलिए उन्हें अपनी पत्नी का साथ बस 4-5 साल hi मिल पाया जिनमे भी आधे समय वो बीमार रही. और पत्नी के गुजरने के बाद अपने अच्छे करैक्टर की वजह से उन्होंने बहार किसी और औरत के साथ सम्बन्ध भी नहीं बनाया. तो ऐसे में विनीता के बदन की खुशबू उन्हें उत्तेजित करने को काफी थी और यहाँ तो उसके स्तन के चूचक उनके होंठो में थे. उनका भी मन कर रहा था की उन स्तनों को पूरा अपने मुँह में लेले और दबा कर उन्हें चूस चूस कर लाल कर दे. पर विनीता के शब्द और उम्र का लिहाज़ उन्हें ऐसा करने से रोक रहा था.

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विनीता बदस्तूर दूध अपने ऊपर डाले जा रही थी और लखन सिंह की जीभ लगातार उसके चूचक से उस दूध का पान करने में लगी थी. ये उत्तेजना उन दोनों के hi बर्दाश्त से बहार हो रही थी विनीता के पेट में मरोड़ सी उठ रही थी वही लखन सिंह का लिंग भी लंगोट अपने पूर्ण आकर में आ चूका था. दोनों की उत्तेजना का बहाव सयम का बाँध तोड़ने को व्याकुल था और विनीता को ये समझ आ गया था उसने बैठे बैठे hi अपनी जांघो को कास कर भींच लिया. और जांघो को भीचते hi उसकी संयम का बाँध टूट गया और उसकी छूट का आगे का हिस्सा उसके प्रेमरस से सराबोर हो गया. बैठे बैथे hi उसने अपना चरमसुख प्राप्त कर लिया. इसके कुछ पल बाद hi लखन सिंह का लंगोट भी उनके लिंग को शांत नहीं रख पाया और लंगोट उनके वीर्य से गीला हो गया.

झड़ने के बाद दोनों कुछ पल के लिए रुक गए, दोनों गहरी गहरी सासे ले रहे थे और दोनों की hi आँखे बंद थी वर्ण वो दोनों एक दुसरे के चेहरे के भावो को देख कर hi एक दुसरे के दिल का हाल समझ जाते पर ऐसा हो न सका. थोड़ा शांत होने के बाद उन्होंने वापस वो प्रक्रिया आरम्भ कर दी. मटके का दूध भी अब ख़तम होने को आया था चरमसुख के बाद उनकी उत्तेजना भी कुछ शांत हो चुकी थी. उस आखरी गिलास के साथ मटके का दूध समाप्त हो गया. दूध समाप्त होते hi लखन सिंह बिमा विनीता से नज़रे मिलाए वह से हैट गए और तम्बू के अंदर चले गए. वो शायद उसे अपने चेहरा के भाव नहीं दिखाना चाहते थे या शायद उन्हें अपने गीले लंगोट के देखे जाने का भी भय था.

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अंदर लखन ने बिना देर किये बिस्तर पर राखी वो सफ़ेद धोती उठाई और उसे लेकर तम्बू से बहार आकर झाड़ियों के पीछे चले गए. वह उन्होंने अपना लंगोट उतरा अपनी कमर पर लगा अपना वीर्य साफ़ करा और उस धोती को अपनी कमर में लपेट लिया. लखन को अब भी अपने होंठो पर विनीता के स्तनों का एहसास हो रहा था. वही उनके झाड़ियों के बीच जाने के बाद विनीता भी उठ कड़ी हुई और कपडे बदलने तम्बू की तरफ चल दी. उसे अपने जांघो पर चिपचिपा चिपचिपा सा एहसास हो रहा था, तम्बू की तरफ जाते हुए भी उसके पेअर काँप रहे थे उसे अब भी अपने स्तनों लखन के जीभ फिरती सी महसूस हो रही थी.

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तम्बू के अंदर आकर विनीता no वो सफ़ेद कपडा खोल दिया. उसी कपडे से अपने जांघो के बीच से अपना चिपचिपा जूस साफ़ करा और जल्दी जल्दी बिस्तर पर राखी वो श्वेता साडी पेहेन ली. साडी पेहेन कर वो तम्बू से बहार आ गई बहार लखन सिंह एक कोने पर चुपचाप नज़रे झुकाए खड़े थे जैसे अपने किये पर शर्मिंदा हो. विनीता ने एक गहरी सास ली और मटके के पास राखी पूजा की थल के पास गई जिसमे वो गजरा और मोतियों की माला राखी थी. विनीता ने वो थल उठा ली पर वो खुद से गजरा नहीं पेहेन सकती थी इसलिए उसने लखन सिंह को आवाज़ दी.

विनीता: जी मुझे गजरा बांधना नहीं अत और यहाँ कोई शीशा भी नहीं है क्या आप मेरी मदद कर देंगे.

विनीता के इस नार्मल बिहेवियर से लखन सिंह का अंदरूनी गिल्ट भी थोड़ा कम हुआ. वो विनीता के पीछे आए और पूजा की थल से वो गजरा उठा कर विनीता के बालो में लगाने लगे. विनीता के बालो में गजरा लगते हुए उन्हें अपनी सुहागरात का दिन याद आ रहा था, उस रात भी वो अपनी पत्नी के लिए उपहार के रूप में गजरा ले गए थे और उसे खुद अपने हाथो से उसके बालो में लगाया था. आज जीवन में दूसरी बार वो किसी स्त्री के बालो में यु गजरा लगा रहे थे और कहने को वो भी उनकी पत्नी है पर बस नाम के लिए.

पर गजरा लगते है भी उन्हें यही ख्याल आ रहा था की- काह हमारे बीच उम्र हुए समाज का ये बंधन न होता काश आपके मन में भी मेरे लिए थोड़ा सा भी प्यार होता तो मई कभी आपको खुद से दूर न जाने देता. समाज से तो मई लड़ भी जाता पर जब आपके मन में hi मेरे लिए प्यार नहीं तो फिर मेरे प्यार का कोई मतलब नहीं रह जाता.

गजरा पेहेन कर विनीता ने चंद्र देव को प्रणाम करा.

विनीता: हे चंद्र के पुरुष स्वरुप ये गजरा मैंने आपके लिए बनाया है और इसे आपके लिए hi धारण करा है. आपके प्रिय पुष्पों से बना ये गजरा पेहेन कर मैंने आपको प्रसन्न करने का एक छोटा सा प्रयास करा है मेरे इस प्रयास को स्वीकार करे और मुझे अपनी कृपा प्रदान करे.

इसके बाद विनीता ने मोतियों की माला लखन सिंह की तरफ बड़ा दी.

विनीता: आप अपने हाथो से बनाई गई ये माला खुद चंद्र के स्त्री स्वरुप को अर्पित करिये.

लखन ने वो माला विनीता के हाथ से लेली और ये माला चंद्र देव की और करते हुए उन्हें प्रणाम करा.

लखन: हे चंद्र के स्त्री स्वरुप सेलेना मैंने आपके प्रिय श्वेता मोतियों की ये माला खास आपके श्रृंगार हेतु तैयार की है पर मई ये आपको तो नहीं पहना सकता इसलिए मई श्वेता वस्त्र पहने कड़ी विनीता जी को hi आपका स्वरुप मानकर ये माला उन्हें पहना रहा हु. मेरी ये तुच्छ भेट स्वीकार करे और मुझे विनीता जे और हमारे परिवार को अपना आशीर्वाद प्रदान करे.

इतना कह कर लखन ने वो माला विनीता के गले में पहना दी. बालो में गजरा गले में माला और सफ़ेद वस्त्रो स्वर्ग की अप्सरा से कम नहीं लग रही थी.

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इस श्वेता वस्त्रम विधि के साथ चंद्र पूजा का आखिरी चरण भी संपन्न हुआ. विनीत अंदर से खुद कितना भी व्याकुल थी पर जितना हो सके लखन सिंह के सामने नार्मल रहने की कोशिश कर रही थी क्युकी वो उन्हें गुइलतु फील नहीं करना चाहती थी.

विनीता: लीजिये एक और गृह की पूजा संपन्न हुई अब बस दो दिन शेष है इस पूजा के पूरा होने में.

लखन: जी आपका सहयोग न होता तो हम यहाँ तक कभी न पहुंचते मई आज के लिए बहुत शर्मिंदा हु.

विनीता: छोड़िये ये सब आपको शर्मिंदा होने की कोई ज़रूरत नहीं कल के मुक़ाबले ये कुछ भी नहीं अभी तो हमे दो दिन और इस हिम्मत को बनाए रखना पता नहीं कल की सुबह क्या नै चुनौती लेकर आए.

विनीता मन में: काश आप शरमीना होने की बजाए कुछ और होते मेरे प्रेम को समझ पते उसे पहचान पते तो ये नकली शादी असली रूप भी ले सकती थी. दुनिया कुछ भी कहती हमारे उम्र के अंतर पर लाख ताने देती पर मई आपका साथ कभी नहीं छोड़ती. पर अफ़सोस जब आपके दिल में hi मेरे लिए प्यार नहीं है तो इसका कोई मतलब नहीं और मई भी अपना प्यार आप पर जाहिर करके आपको शर्मिदा फील नहीं करना चाहती. बस दो दिन है हमारे पास अच्छा होगा उन्हें अच्छे से काट दे.

पूजा संपन्न होनेबके बाद दोनों तम्बू में आ गए और वह पड़े बिस्तर बिना एक दुसरे से कुछ बोले एक दुसरे की पीठ करके लेट गए. शायद दोनों एक दुसरे से अपनी आँखे छुपाना चाहते थे जो गम के आसुओ से भर आई. अपने नीरस अंधकार भरे जीवन में प्रेम की एक हलकी सी लौ के दिखने और फिर उसके बुझ जाने के गम के आंसुओ से. पता नहीं क्या अंजाम होना था इस अनकही प्रेम कहानी का जहा प्यार तो है पर शब्द नहीं. और कही ऐसा न हो की जब शब्द तो हो पर उन्हें बोलने का वक़्त न बचे.

पास आए

दूरिया फिर भी कम न हुई

एक अधूरी

सी हमारी कहानी रही

आसमा को ज़मी

ये ज़रूरी नहीं

जा मिले जा मिले

इश्क़ सच्चा वही

जिसको मिलती नहीं

मंज़िले मंज़िले

रंग है रूप है

जब करीब तू है

एक जन्नत सा है ये जहा

वक़्त की रेट पे

कुछ मेरे नाम सा

लिख के छोड़ चला

तू कहा

हमारी अधूरी कहानी

हमारी अधूरी कहानी
 
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