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- Dec 5, 2013
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अपडेट - 29
अब तक आपने देखा .....ा1 ने
मानसरोवर झील से अपनी तलवार
.....और वरुणस्रता प्राप्त किया ...
गक क शक्तियों द्वारा आश्रम में अपने मित्रो को देखा .....
और शालू से भी संपर्क किया
अब आगे......
गक - अब बताये आपको किस और जाना है
में - मित्र अब मुज़हे ज्वालामुखी पर्वत जाना है......
गक - आप यदि मेरी बात मानोगे तोह कुछ कहु.....
में - हां ..है क्यों नहीं इस्स्में संकोच kaisa......kaho
गक - मित्र आज आप यही आराम कर ले तोह अच्छा है .....जिस जहा आप जा रहे हो वह तोह आपको अपनी बहुत ऊर्जा लगनी padegi.......isiliye आप यही पर
अपनी ऊर्जा को और नियंत्रित और सटीक उपयोग करने का अभ्यास ..
और अपने प्राप्त हुए ास्त्रो क सञ्चालन का अभ्यास कीजिये है.....
में - बिलकुल सही कहा है मित्र....
इस सफर में मेरी बहुत ऊर्जा का प्रय्ग हुआ है .....और मुज़हे भी थकन सी महसूस हो रही है....
फिर गक ने अपनी शाक्यों द्वारा एक सूंदर कुटिया का निर्माण किया ...उसस्के अंदर .....भोजन जल और आरामदायक शैया का प्रबंध....
में - वह मित्र बहुत अच्छा प्रबध किया hai......abhi तोह सुबह क सिर्फ 9 बज रहे है....
थोड़ा युद्ध कला का अभ्यास हो जाए
पीहर में वही गक क साथ युद्ध कला का अभ्यास करने laga....talwar बाजी
kushti.....aadi ....लेकिन इस बात का भी ध्यान रहक रहे थे क किसी को चोट न
आये ....
आज में पहले से बहुत बहुत बेहतर और तककटवार अपने आपको महसूस कर रहा था .....शायद मेरे भीतर सम्माए इन् ास्त्रो क कारण हो...
गक - बस ...अब मुजह्से आपका सामना नहीं होगा .....आप तोह मेरे जैसे कइयों को बिना शक्तियों क सिर्फ युद्ध कला में परास्त कर सकते हो....
फिर - हमने साथ में खाना खाया
और आराम काने लगा...
गक भी कल आने का कहकर चला गया था .....में अब रक् क अपने सफर क बारे में सोचते सोचते सो गया
मेरी नींद जब खुली तब देखा की सूर्य अस्त होनेवाला है ....में फिर सतलज नदी क किनारे जाकर स्नान किया और ध्यान करने लगा.....
ध्यान में अपने भीतर मुज़हे आपने शास्त्र दिखने ... lage.....aur उनकी ऊर्जा
तभी मुज़हे मेरे भीतर से आवाज आयी
अरे क्यों इतना ध्यान साधना और शक्तियों क पीछे पड़ा है......
क्या करना तुज़हे िंनशक्तियों का
जीवन बार बार नहीं मिलता ...खूब मज़े करो आपनो का प्रेम पाओ ...और संसार क भोगो का खूब आनंद उठावो एहि जीवन है...
तभी दूसरी आवाज -- अरे ..अरे यह क्या कह रहा है ....तुम इस्सकी बातें बिलकुल मत सुंनना यह सब गलत बोल रहा hai......bina उद्देस्य क जीवन भी कोई जीवन hai......aur मानव जीवन की सार्थकता तोह तभी है जब वह लोककल्याण और आत्मकल्याण करे....
पहली आवाज - नहीं यह गलत है ....ऐसा जीवन किस काम का जिसमे हम hi आनंद न उठा सके
दूसरी आवाज -- तुम इस्सकी बातें बिकुल न sunnana.....shaktiya सभी को प्राप्त नहीं hoti......tumhe हो रही है िस्डका अर्थ है की स्वयं परमात्मा ने तुम्हे चुना है .....
कितने भाग्यशाली हो तुम
दोनों का शोर सुनकर में बड़ा हैरान था की अब यह क्या बाला है..
में - कौन हो तुम दोनों ..और मेरे भीतर क्या कर रहे हो....
दूसरी आवाज - हम आपके hi अंतकरण का हिस्सा है.....
आपका मनोमय कोष पूरी तरह जागृत हो गया hai....jiske दो रूप है में अंतर्मनन हु और यर्ह बहिरमसं है
अंतर्मन व्यक्ति को अच्छे कार्य क लिए प्रेरित करता है ......और बाहिर मैं व्यक्तल को वासना और भोगो की तरफ ले जाता है.....
पहली आवाज - तुम क्यों इससे सारे भेद बता रहे हो मेरा दम घुट रहा है मुज़हे bachao......mein अंदर गम हो रहा हु.......
तभी में ध्यान में और गहरा उतरा तोह मुज़हे अपने भीतर एक दिव्या श्वेत प्रकाश का अनुभव हुआ ...और असीम आनंद की अनुभूति हुई...
फिर अंतर्मनन से आवाज आयी...
धन्य हो तुम ...आज तुमने अपने बाहिर मन पर विजय प्राप्त ki....jisse बड़े बड़े योगी भी वश में नहीं कर paate......ab से तुम्हे संसार की कोई बुराई छू भी नहीं पाएंगे...
अब हर प्रकार की माया की वास्तविक ता तुम अंतर्मन में ध्यान लगाकर देख सकते हो...
रात को फिर थोड़ा इधर उधर प्रकृति का आनंद लिया ...और सुबह फिर चल दिया गक क साथ ज्वाला मुखी पर्वत
गक मुज़हे जहा लेकर गया वह से थोड़ी दूर मुज़हे बड़ा hi सूंदर बर्फ से ढाका हुआ चंडी की तरह चमकता
हुआ एक पर्वत दिखाई दिया.....
में और गक हैरान हो गया
में - यह कहा लाये हो मित्र यहाँ तोह चारो तरफ बर्फ क पर्वत है ....जवालामुखी पर्वत कहा है...
गक -मुज़हे खुद पता नहीं काल रहा है ...मैंने तोह अपनी भ्रमण शक्ति
को ज्वालामुखी पर्वत का hi आदेश दिया tha.....phir हम यहाँ कैसे आकर पहुंचे....
मुज़हे कुछ संशय हुआ की हो न हो यह किसी की माया है....... में आगे बड़ा थोड़ी hi दूर जाकर मुज़हे बहुत ज्यादा गरम हवाओ का ाशस हुआ ..जैसे की चारो तरफ आग लगी हो ...
तब मैंने अपने अंतर्मन का सहारा लेने का सोचा और भीतर ध्यान लगाया.
अंतर्मनन का ध्यान करते hi उसकी ऊर्जा मेरे नेत्रों में समां गयी और मैंने अस्प्ने असंकें खोली तोह सामने बड़ा hi हैरान कर देने वाला दृश्य देखा
जहा में खड़ा हु उससे थोड़ा hi आगे पिग्ले हुए लाल लावे का जैसे बहुत बड़ा कोई सरोवर हो ...और उससे आगे सरोवर क अंत में एक धधकता हुआ ज्वालामुखी पर्वत
आश्चर्य की बात यह थी की इस गरम लावे क पास यह बर्फीली जगह कैसे
गक को कुछ समाज में नहीं आरहा था में क्या देख रहा हु....
अब प्रश्न यह था की सत्य तोह मुज़हे दिख रहा है अब इस माया का आंत कैसे करू.....
तभी मुज़हे कुछ सुज़हा और मैंने अपनी पृथ्वी तत्त्व की ऊर्जा को एकत्रित किया और आगे लावा की तरफ फेंकी
और देख देखते वह की माया समाप्त हो गयी ...चारो तरफ बहता लावा ..
गक - देखो मित्र यह रहा ज्वालामुखी पर्वत
में - हां मित्र
अब प्रश्न यह था की कैसे इस भयंकर जवालामुखी क सरोवर को पार करके उस पर्वत पर पहुंचा जाए......
अभी क लिए इतना hi.....
अगला अपडेट रात को ......
अब तक आपने देखा .....ा1 ने
मानसरोवर झील से अपनी तलवार
.....और वरुणस्रता प्राप्त किया ...
गक क शक्तियों द्वारा आश्रम में अपने मित्रो को देखा .....
और शालू से भी संपर्क किया
अब आगे......
गक - अब बताये आपको किस और जाना है
में - मित्र अब मुज़हे ज्वालामुखी पर्वत जाना है......
गक - आप यदि मेरी बात मानोगे तोह कुछ कहु.....
में - हां ..है क्यों नहीं इस्स्में संकोच kaisa......kaho
गक - मित्र आज आप यही आराम कर ले तोह अच्छा है .....जिस जहा आप जा रहे हो वह तोह आपको अपनी बहुत ऊर्जा लगनी padegi.......isiliye आप यही पर
अपनी ऊर्जा को और नियंत्रित और सटीक उपयोग करने का अभ्यास ..
और अपने प्राप्त हुए ास्त्रो क सञ्चालन का अभ्यास कीजिये है.....
में - बिलकुल सही कहा है मित्र....
इस सफर में मेरी बहुत ऊर्जा का प्रय्ग हुआ है .....और मुज़हे भी थकन सी महसूस हो रही है....
फिर गक ने अपनी शाक्यों द्वारा एक सूंदर कुटिया का निर्माण किया ...उसस्के अंदर .....भोजन जल और आरामदायक शैया का प्रबंध....
में - वह मित्र बहुत अच्छा प्रबध किया hai......abhi तोह सुबह क सिर्फ 9 बज रहे है....
थोड़ा युद्ध कला का अभ्यास हो जाए
पीहर में वही गक क साथ युद्ध कला का अभ्यास करने laga....talwar बाजी
kushti.....aadi ....लेकिन इस बात का भी ध्यान रहक रहे थे क किसी को चोट न
आये ....
आज में पहले से बहुत बहुत बेहतर और तककटवार अपने आपको महसूस कर रहा था .....शायद मेरे भीतर सम्माए इन् ास्त्रो क कारण हो...
गक - बस ...अब मुजह्से आपका सामना नहीं होगा .....आप तोह मेरे जैसे कइयों को बिना शक्तियों क सिर्फ युद्ध कला में परास्त कर सकते हो....
फिर - हमने साथ में खाना खाया
और आराम काने लगा...
गक भी कल आने का कहकर चला गया था .....में अब रक् क अपने सफर क बारे में सोचते सोचते सो गया
मेरी नींद जब खुली तब देखा की सूर्य अस्त होनेवाला है ....में फिर सतलज नदी क किनारे जाकर स्नान किया और ध्यान करने लगा.....
ध्यान में अपने भीतर मुज़हे आपने शास्त्र दिखने ... lage.....aur उनकी ऊर्जा
तभी मुज़हे मेरे भीतर से आवाज आयी
अरे क्यों इतना ध्यान साधना और शक्तियों क पीछे पड़ा है......
क्या करना तुज़हे िंनशक्तियों का
जीवन बार बार नहीं मिलता ...खूब मज़े करो आपनो का प्रेम पाओ ...और संसार क भोगो का खूब आनंद उठावो एहि जीवन है...
तभी दूसरी आवाज -- अरे ..अरे यह क्या कह रहा है ....तुम इस्सकी बातें बिलकुल मत सुंनना यह सब गलत बोल रहा hai......bina उद्देस्य क जीवन भी कोई जीवन hai......aur मानव जीवन की सार्थकता तोह तभी है जब वह लोककल्याण और आत्मकल्याण करे....
पहली आवाज - नहीं यह गलत है ....ऐसा जीवन किस काम का जिसमे हम hi आनंद न उठा सके
दूसरी आवाज -- तुम इस्सकी बातें बिकुल न sunnana.....shaktiya सभी को प्राप्त नहीं hoti......tumhe हो रही है िस्डका अर्थ है की स्वयं परमात्मा ने तुम्हे चुना है .....
कितने भाग्यशाली हो तुम
दोनों का शोर सुनकर में बड़ा हैरान था की अब यह क्या बाला है..
में - कौन हो तुम दोनों ..और मेरे भीतर क्या कर रहे हो....
दूसरी आवाज - हम आपके hi अंतकरण का हिस्सा है.....
आपका मनोमय कोष पूरी तरह जागृत हो गया hai....jiske दो रूप है में अंतर्मनन हु और यर्ह बहिरमसं है
अंतर्मन व्यक्ति को अच्छे कार्य क लिए प्रेरित करता है ......और बाहिर मैं व्यक्तल को वासना और भोगो की तरफ ले जाता है.....
पहली आवाज - तुम क्यों इससे सारे भेद बता रहे हो मेरा दम घुट रहा है मुज़हे bachao......mein अंदर गम हो रहा हु.......
तभी में ध्यान में और गहरा उतरा तोह मुज़हे अपने भीतर एक दिव्या श्वेत प्रकाश का अनुभव हुआ ...और असीम आनंद की अनुभूति हुई...
फिर अंतर्मनन से आवाज आयी...
धन्य हो तुम ...आज तुमने अपने बाहिर मन पर विजय प्राप्त ki....jisse बड़े बड़े योगी भी वश में नहीं कर paate......ab से तुम्हे संसार की कोई बुराई छू भी नहीं पाएंगे...
अब हर प्रकार की माया की वास्तविक ता तुम अंतर्मन में ध्यान लगाकर देख सकते हो...
रात को फिर थोड़ा इधर उधर प्रकृति का आनंद लिया ...और सुबह फिर चल दिया गक क साथ ज्वाला मुखी पर्वत
गक मुज़हे जहा लेकर गया वह से थोड़ी दूर मुज़हे बड़ा hi सूंदर बर्फ से ढाका हुआ चंडी की तरह चमकता
हुआ एक पर्वत दिखाई दिया.....
में और गक हैरान हो गया
में - यह कहा लाये हो मित्र यहाँ तोह चारो तरफ बर्फ क पर्वत है ....जवालामुखी पर्वत कहा है...
गक -मुज़हे खुद पता नहीं काल रहा है ...मैंने तोह अपनी भ्रमण शक्ति
को ज्वालामुखी पर्वत का hi आदेश दिया tha.....phir हम यहाँ कैसे आकर पहुंचे....
मुज़हे कुछ संशय हुआ की हो न हो यह किसी की माया है....... में आगे बड़ा थोड़ी hi दूर जाकर मुज़हे बहुत ज्यादा गरम हवाओ का ाशस हुआ ..जैसे की चारो तरफ आग लगी हो ...
तब मैंने अपने अंतर्मन का सहारा लेने का सोचा और भीतर ध्यान लगाया.
अंतर्मनन का ध्यान करते hi उसकी ऊर्जा मेरे नेत्रों में समां गयी और मैंने अस्प्ने असंकें खोली तोह सामने बड़ा hi हैरान कर देने वाला दृश्य देखा
जहा में खड़ा हु उससे थोड़ा hi आगे पिग्ले हुए लाल लावे का जैसे बहुत बड़ा कोई सरोवर हो ...और उससे आगे सरोवर क अंत में एक धधकता हुआ ज्वालामुखी पर्वत
आश्चर्य की बात यह थी की इस गरम लावे क पास यह बर्फीली जगह कैसे
गक को कुछ समाज में नहीं आरहा था में क्या देख रहा हु....
अब प्रश्न यह था की सत्य तोह मुज़हे दिख रहा है अब इस माया का आंत कैसे करू.....
तभी मुज़हे कुछ सुज़हा और मैंने अपनी पृथ्वी तत्त्व की ऊर्जा को एकत्रित किया और आगे लावा की तरफ फेंकी
और देख देखते वह की माया समाप्त हो गयी ...चारो तरफ बहता लावा ..
गक - देखो मित्र यह रहा ज्वालामुखी पर्वत
में - हां मित्र
अब प्रश्न यह था की कैसे इस भयंकर जवालामुखी क सरोवर को पार करके उस पर्वत पर पहुंचा जाए......
अभी क लिए इतना hi.....
अगला अपडेट रात को ......