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- Dec 5, 2013
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और

मैं देख रही थी, लेकिन समझ कुछ पा नहीं रही थी, जैसे सुहाग रात की सुबह दुल्हन की देह, सुहाग के सेज पर कुचले गए फूलों से भी ज्यादा कुचली हो जाए, जिसे दूल्हे ने रात भर रगड़ा हो , और सुबह दो दो ननदें पकड़ के किसी तरह सहारा देकर उठायें,...
आधे पौन घंटे में में वो हालत हो गयी थी, एकदम थेथर,... हिल भी नहीं पा रही थी,...
लगभग संज्ञा शून्य,...
तब तक माँ ने कुछ देखा और एकदम अलफ़, और मुझसे ज्यादा भैया पे, ...
वो तो बाद में समझ आया मेरी बुर से बहती चासनी को कुछ उन्होंने अपनी ऊँगली से फैला के,मेरे पिछवाड़े के छेद पे,

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और उनकी अनुभवी आँखों ने भांप लिया, अभी वो छेद इतना टाइट है,... मेरी चासनी से गीली अपनी ऊँगली को उन्होंने पूरी ताकत से उस छेद में ठेलने की कोशिश की ,
और वो नहीं घुसी,... एकदम टाइट, ..
दरार पर रगड़ा, उन्होने, दोनों अंगूठों से फैलाया,

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एकदम टाइट,...
और गुस्से से अपने बेटे की ओर देखा उन्होंने,..

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उस बेचारे ने सर झुका लिया,
गलती उसकी ज़रा भी नहीं थी , वो तो पहले दिन से पिछवाड़े के पीछे पड़ा था, लेकिन मैं ही उसे डपट देती थी, ...किसी गाँव की भौजी ने ही बोला था बहुत दर्द होता है,...

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उसने बहुत समझाया था मुझे , खूब तेल लगा लेगा, ... ज़रा भी दर्द होगा तो बाहर निकाल लेगा , फिर दुबारा बोलेगा भी नहीं पिछवाड़े के बारे में,.. सुने कई लड़कियों की मारी है , मेरी समौरियों की भी,
लेकिन मुड़ के मैंने गुस्से भर के कहा,...
"अगर उधर देखा भी न तो मैं पास भी नहीं फटकने दूंगी,..."

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बेचारा,... सर झुका लिया , ये भी न समझ पाया की मेरा गुस्सा कितना असली, कितना नकली है. और मैं दूसरी ओर मुंह कर के मुस्कराने लगी. शायद जबरदस्ती करता जो उसने दूसरी लड़कियों के साथ की होगी, पर
परेशानी ये थी की वो मुझे चाहता भी बहुत था, जितना मज़े लेना चाहता था, उससे ज्यादा, ... मुझे हल्की सी ठेस भी लग जाए,... तो मुझसे ज्यादा दर्द उसे होता था जब तक मैं नहीं मुस्कराती थी वो भी गुमसुम मुंह बना के,...
तो बस मेरा झूठा गुस्सा भी,....
लेकिन माँ सब समझती थी और उस का गुस्सा भी सच्चा होता था, हम दोनों डरते थे , बिना मारे उसकी ठंडी आवाज ही,...
और उसी आवाज में वो मुझसे बोली,
चल निहुर, चूतड़ खूब ऊपर उठा के,....

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और जा के अपने बेटे की सब गांठे खोल दीं.
मैं चुपचाप निहुरी, पिछवाड़ा ऊपर किये,..

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माँ ने झाड़ झाड़ के मुझे इत्ता थेथर कर दिया था की मुझे कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था, बस मैं देख रही थी, उन्होंने अपने बेटे की गांठे खोल दी, उसे बहुत धीरे धीरे से कुछ समझाया और बेटे का खूंटा तो वैसे ही खड़ा था, माँ की बातें सुन के,... लगता है और,...
बस मैं गुटुर गुटुर देख रही, धीरे धीरे कुछ ताकत लौट रही थी मेरी, कुछ सोचने समझने की शक्ति,...
तबतक माँ मेरे पास आ गयीं,शायद उन्हें लगा की उन्होंने कुछ ज्यादा ही जोर से हड़का दिया,...
बड़े प्यार से मेरे उठे पेट के नीचे ढेर सारे मोटे मोटे तकिये कुशन यहाँ वहां से लाकर लगा दिए, लेकिन सब मेरी नाभि के आस पास या ऊपर ही, अपने हाथ से ही मेरी टांगों को और फैला दिया,..
बहुत दुलार से मेरे गोरे गोरे मुलायम छोटे छोटे चूतड़ों को सहलाया और एक बहुत हलकी सी दुलार वाली चपत लगा दी,....

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मैं निहाल की माँ अब गुस्से में नहीं है,... और दूसरे अब मेरी कमर का प्रेशर थोड़ा तो कम हो गया, तकियों से बहुत सहारा मिल गया,
तब तक मुझे नहीं अंदाजा था की क्या होने वाला है,
" हे मेरी दुलारी रानी बेटी, अपनी रानी बेटी को बहुत दिन से दुद्धू नहीं पिलाया, ... मुंह खोल खूब बड़ा सा , हाँ और बड़ा जैसे लड्डू खाने के लिए खोलती है न हाँ, खोले रहना,.. "

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मैं देख रही थी, लेकिन समझ कुछ पा नहीं रही थी, जैसे सुहाग रात की सुबह दुल्हन की देह, सुहाग के सेज पर कुचले गए फूलों से भी ज्यादा कुचली हो जाए, जिसे दूल्हे ने रात भर रगड़ा हो , और सुबह दो दो ननदें पकड़ के किसी तरह सहारा देकर उठायें,...
आधे पौन घंटे में में वो हालत हो गयी थी, एकदम थेथर,... हिल भी नहीं पा रही थी,...
लगभग संज्ञा शून्य,...
तब तक माँ ने कुछ देखा और एकदम अलफ़, और मुझसे ज्यादा भैया पे, ...
वो तो बाद में समझ आया मेरी बुर से बहती चासनी को कुछ उन्होंने अपनी ऊँगली से फैला के,मेरे पिछवाड़े के छेद पे,

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और उनकी अनुभवी आँखों ने भांप लिया, अभी वो छेद इतना टाइट है,... मेरी चासनी से गीली अपनी ऊँगली को उन्होंने पूरी ताकत से उस छेद में ठेलने की कोशिश की ,
और वो नहीं घुसी,... एकदम टाइट, ..
दरार पर रगड़ा, उन्होने, दोनों अंगूठों से फैलाया,

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और गुस्से से अपने बेटे की ओर देखा उन्होंने,..

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उस बेचारे ने सर झुका लिया,
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लेकिन मुड़ के मैंने गुस्से भर के कहा,...
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तो बस मेरा झूठा गुस्सा भी,....
लेकिन माँ सब समझती थी और उस का गुस्सा भी सच्चा होता था, हम दोनों डरते थे , बिना मारे उसकी ठंडी आवाज ही,...
और उसी आवाज में वो मुझसे बोली,
चल निहुर, चूतड़ खूब ऊपर उठा के,....

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और जा के अपने बेटे की सब गांठे खोल दीं.
मैं चुपचाप निहुरी, पिछवाड़ा ऊपर किये,..

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माँ ने झाड़ झाड़ के मुझे इत्ता थेथर कर दिया था की मुझे कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था, बस मैं देख रही थी, उन्होंने अपने बेटे की गांठे खोल दी, उसे बहुत धीरे धीरे से कुछ समझाया और बेटे का खूंटा तो वैसे ही खड़ा था, माँ की बातें सुन के,... लगता है और,...
बस मैं गुटुर गुटुर देख रही, धीरे धीरे कुछ ताकत लौट रही थी मेरी, कुछ सोचने समझने की शक्ति,...
तबतक माँ मेरे पास आ गयीं,शायद उन्हें लगा की उन्होंने कुछ ज्यादा ही जोर से हड़का दिया,...
बड़े प्यार से मेरे उठे पेट के नीचे ढेर सारे मोटे मोटे तकिये कुशन यहाँ वहां से लाकर लगा दिए, लेकिन सब मेरी नाभि के आस पास या ऊपर ही, अपने हाथ से ही मेरी टांगों को और फैला दिया,..
बहुत दुलार से मेरे गोरे गोरे मुलायम छोटे छोटे चूतड़ों को सहलाया और एक बहुत हलकी सी दुलार वाली चपत लगा दी,....

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मैं निहाल की माँ अब गुस्से में नहीं है,... और दूसरे अब मेरी कमर का प्रेशर थोड़ा तो कम हो गया, तकियों से बहुत सहारा मिल गया,
तब तक मुझे नहीं अंदाजा था की क्या होने वाला है,
" हे मेरी दुलारी रानी बेटी, अपनी रानी बेटी को बहुत दिन से दुद्धू नहीं पिलाया, ... मुंह खोल खूब बड़ा सा , हाँ और बड़ा जैसे लड्डू खाने के लिए खोलती है न हाँ, खोले रहना,.. "

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