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11 दिन पहले.. सुबह क करीब 8:25 पे
महेंद्र हर रोज़ की तरह आज सुबह भी गाओं की पगडंडियों को नापने चला गया था, जहा वैसे तोह ठण्ड और कोहरे ने बदन में ठिठुरन भर राखी थी पर इतनी लम्बी सैर क बाद महेंद्र क अंदर जल्दी hi गर्मी का प्रवाह बाद चूका था, ऐसे में खेतों की और प्रस्थान करते हुए किसानों से मिलता हु वो अपने घर की और वापस लौट चला था.. जहा गाओं का लगभग हर किशन और अपनी माटी से प्रेम करने वाला व्यक्ति महेंद्र को भली भांति पहचानता था
महेंद्र गाओं क लिए उस व्यक्ति जैसा था जिसके पास लोग अक्सर अपनी समस्याएं लेके आना पसंद करते थे ककी उन्हें पूरा यकीन था की महेंद्र अपनी सूझ भुज से जो भी सुझाव या फैसला करेगा वो उनके भले क लिए hi होगा.. वैसे उसका यहॉ व्यव्हार गाओं क सबसे आलीशान हवेली में रहने वाले ठाकुर को पसंद नहीं थी ककी जो सम्मान उसे मिलना चाहिए था वो एक गरीब किशन को मिल रहा था पर 'ठाकुर बलवंत प्रताप सिंह' च क भी महेंद्र का कुछ बिगड़ नहीं सकता था ककी उसे अचे से पता था की महेंद्र क सामने हमेशा उसकी ढाल बना हुआ 'कुंदन' खड़ा रहता है.. बल्कि ये बात 'ठाकुर जी' किया गाओं का हर वो इंसान अचे से जनता था जिसे महेंद्र की अछि से नफरत थी.. पर ऐसे लोग कुंदन क बारे में सिर्फ सोच क hi काँप उठते थे और आगे बढ़ने का अपने मनसूबे अपने अंदर hi कही दफ़न कर लेते थे
जल्दी hi ऐसी ठण्ड में भी पसीने से पूरा भीग चूका 'कुंदन का बड़ा भाई' अपने घर पहुंच चूका था जहा उसका सबसे छोटा भाई 'वीरू' और उसके घर का दामाद 'भानु' subha-subha hi अपने अपने खेतों की और जा चुके थे पर महेंद्र की अनुपस्थिति में कुंदन इस समय घर क बहार किसी पेहरि की तरह बैठा हुआ था.. जो सामने से आते हुए अपने बड़े भाई को देखते hi पुरे सम्मान में खड़ा हो जाता है और महेंद्र इस प्रेम और सम्मान से gad-gad होते हुए मुस्कुरा क उसके कंधे पे हाथ रखते हुए सीधा घर क पिछले हिस्से में बने शौचालय की और बढ़ता चला जाता है
असल में वैसे तोह ज्यादातर महेंद्र तालाब पे hi हल्का होने क बाद घर आता था पर आज जब वो तालाब पे पंहुचा तोह उसे वह पहले से hi गाओं की कुछ जवान लड़किया पानी में खेलते हुए नज़र आयी और ऐसी कारन उसने रास्ता बदल लिया था.. इस समय सत्तू का बाप लम्बे लम्बे कदमो से घर क पिछले हिस्से में पहुंच चूका था पर अभी वो शौचालय की और अपना अगला कदम hi बढ़ाता है की ठीक तभी शौचालय क बगल में बने हुए स्नानघर का द्वार खुल पड़ता है और एक सलोनी काया बहार निकलते हुए महेंद्र को मिल जाती है
सूरज की पहली किरणों ने अभी घने कोहरे को पार करके जमीन को चूमने की सुरुवात hi की थी और ऐसे में भीगे बदन की वो स्त्री जैसे hi बहार अपने कदम रखती है मानो सुबह की साडी hi सुनहरे किरणों ने उसके यौवन पे अपना नया ठिकाना ढूंढ लिया हो.. महेंद्र तोह जैसे की पत्तर में बदल चूका था मानो जैसे कोई निर्जीव वास्तु को जो बस एकटुक स्नानघर से बहार आयी उस कामुक सलोनी स्त्री से अपनी नज़रें hi नहीं हटा प् रहा हो और उसके ऐसे करने का कारन भी साफ़ था ककी स्नानघर से निकलने वाली वो सलोनी सूरत की मलिका उसके छोटे भाई की पत्नी 'हर्षिता' थी
जिसने कामुक सलोने जिस्म पे इस समय सिर्फ एक पेटीकोट बंधा हुआ था और एक हाथ में उसके भीगे हुए सायद धुले गए कपडे थे तोह दूसरे में उसकी साड़ी जिसे सायद उसने वह स्नानघर में किसी कारन पहनना जरुरी नहीं समझा था.. पर जिस चीज़ ने अपने नाड़े क पक्के महेंद्र क जिस्म में चीटिया चलवा दी थी वो था हर्षिता का वो भीगा हुआ पेटीकोट जिसका रंग गाड़ा नीला था और इस समय उसके कामुक सरीर पे ऊपर तक चढ़ा हुआ था
पर सायद हर्षिता आज कुछ ज्यादा hi जल्दी में थी ककी उसने वो पेटीकोट अपने भीगे बदन पे hi बंद लिया था तभी तोह इस समय महेंद्र को उसकी 'चुकती बहु' क पेटीकोट से उसके काले तने हुए निप्पल्स और उसके पास का पूरा गोला काला हिस्सा पेटीकोट क ऊपर से साफ़ साफ़ नज़र सा आ रहा था.. अब आपके सामने कोई स्त्री ऐसी अवस्था में आके कड़ी हो जाये जो बस नाहा क आयी हो जिसके बालों से अब भी पानी की कामुक बंधे टपक रही हो और जिस्म पे मोतियों सामान पानी जमा हुआ हो, तोह आप समाज hi सकते है की आपका हाल किया होगा और फिर ये कामुक सरीर तोह हर्षिता का था
पेटीकोट की लम्बाई कुछ ऐसी थी की वो हर्षिता क घुटनो तक hi आ रही थी और उचाई यानि ऊपर वो ऐसी जगह बंधा हुआ था जहा अगर वो 1" भी और निचे होता तोह सायद 'सोनू की माँ' की दोनों चूचियों क काले गुलाबजामुन इस समय महेंद्र को पूर्ण रूप से दिख जाते.. बेचारे महेंद्र जो च क भी अपनी नज़रों को अपनी बहु क भीगे हुए सरीर से हटा नहीं प् रही थी वही जैसे hi स्नानघर से हर्षिता बहार आती है तोह उसके सामने मजबूत जिस्म वाला महेंद्र यानि उसका जेठ खड़ा हुआ दिख जाता है
हर्षिता ने आज जल्दबाजी क चक्कर में नहाने क बाद ऐसे hi पेटीकोट चढ़ा लिया था और ये सोचा था की वो जल्दी से कमरे में जेक आराम से कपडे बदल लेगी..
महेंद्र की जो बहु आज तक उसके सामने बिना पल्लू न आयी थी आज वो उसके सामने भीगे बदन एक ऐसे पेटीकोट में कड़ी थी जिसमें से उसके सरीर का हर अंग और हर कटाव महेंद्र को ऐसे नज़र आ रहा था मानो वो पूर्ण नंगी अवस्था में कड़ी हो.. बेचारा 'सविता का पति' तोह जैसे सांस लेना hi भूल गया था वही हर्षिता का भी हाल ऐसा था जैसे किसी ने उसके सरे संस्कारों को एक hi दिन में उससे चीन लिए हो
हर्षिता- (मारे लाज क उसके मुंह से निकलने वाले सब्द टूट से जा रहे थे) जेठ जी.. आप.. वो में.. बस.. मैंने सोचा अभी.. है.. नहीं तोह.. वो.. मैं..
हर्षिता क इन टूटे शब्दों क चलते महेंद्र को कही जेक होश आया और बिना एक भी पल गवाए वो तुरंत की दूसरी और मुंह करके मुद जाता है.. और अपनी गरम हो चुकी साँसों को सँभालते हुए धीरे से कहता है
"कोई.. कोई बात नहीं बहु.. वो मैं बस.. आज थोड़ा जल्दी आ गया न.. तुम.. तुम.. जाओ.. जाओ.."
ठीक हर्षिता की hi भांति उसके जेठ क मुख से निकलने वाले सब्द भी उसका साथ नहीं दे रहे थे.. वीरू की पत्नी हर्षिता अब वह और नहीं रुक पाती ककी ऐसे अपने जेठ क सामने आने की तोह उसने कल्पना भी नहीं की और आज जो नहीं सोचा था वो हो चूका था
हर्षिता लगभग भागती हुई सी अंदर की और चल पड़ती है और इस पल न जाने क्यू महेंद्र क मन में ये विचार सा आता है की.. किया वो मुद क अपनी बहु को पीछे से देखे, पर बड़ी मुश्किल से hi सही उसने अपने इन विचारों पे विजय प्राप्त की थी और ऐसा कुछ भी उसने नहीं किया था
पर ये पहली घटना जरूर थी जिसने महेंद्र की आँखों क सामने उसकी बहु हर्षिता का कामुक यौवन ला दिया था पर ये अंतिम बार नहीं था..
कंटिन्यू...
महेंद्र हर रोज़ की तरह आज सुबह भी गाओं की पगडंडियों को नापने चला गया था, जहा वैसे तोह ठण्ड और कोहरे ने बदन में ठिठुरन भर राखी थी पर इतनी लम्बी सैर क बाद महेंद्र क अंदर जल्दी hi गर्मी का प्रवाह बाद चूका था, ऐसे में खेतों की और प्रस्थान करते हुए किसानों से मिलता हु वो अपने घर की और वापस लौट चला था.. जहा गाओं का लगभग हर किशन और अपनी माटी से प्रेम करने वाला व्यक्ति महेंद्र को भली भांति पहचानता था
महेंद्र गाओं क लिए उस व्यक्ति जैसा था जिसके पास लोग अक्सर अपनी समस्याएं लेके आना पसंद करते थे ककी उन्हें पूरा यकीन था की महेंद्र अपनी सूझ भुज से जो भी सुझाव या फैसला करेगा वो उनके भले क लिए hi होगा.. वैसे उसका यहॉ व्यव्हार गाओं क सबसे आलीशान हवेली में रहने वाले ठाकुर को पसंद नहीं थी ककी जो सम्मान उसे मिलना चाहिए था वो एक गरीब किशन को मिल रहा था पर 'ठाकुर बलवंत प्रताप सिंह' च क भी महेंद्र का कुछ बिगड़ नहीं सकता था ककी उसे अचे से पता था की महेंद्र क सामने हमेशा उसकी ढाल बना हुआ 'कुंदन' खड़ा रहता है.. बल्कि ये बात 'ठाकुर जी' किया गाओं का हर वो इंसान अचे से जनता था जिसे महेंद्र की अछि से नफरत थी.. पर ऐसे लोग कुंदन क बारे में सिर्फ सोच क hi काँप उठते थे और आगे बढ़ने का अपने मनसूबे अपने अंदर hi कही दफ़न कर लेते थे
जल्दी hi ऐसी ठण्ड में भी पसीने से पूरा भीग चूका 'कुंदन का बड़ा भाई' अपने घर पहुंच चूका था जहा उसका सबसे छोटा भाई 'वीरू' और उसके घर का दामाद 'भानु' subha-subha hi अपने अपने खेतों की और जा चुके थे पर महेंद्र की अनुपस्थिति में कुंदन इस समय घर क बहार किसी पेहरि की तरह बैठा हुआ था.. जो सामने से आते हुए अपने बड़े भाई को देखते hi पुरे सम्मान में खड़ा हो जाता है और महेंद्र इस प्रेम और सम्मान से gad-gad होते हुए मुस्कुरा क उसके कंधे पे हाथ रखते हुए सीधा घर क पिछले हिस्से में बने शौचालय की और बढ़ता चला जाता है
असल में वैसे तोह ज्यादातर महेंद्र तालाब पे hi हल्का होने क बाद घर आता था पर आज जब वो तालाब पे पंहुचा तोह उसे वह पहले से hi गाओं की कुछ जवान लड़किया पानी में खेलते हुए नज़र आयी और ऐसी कारन उसने रास्ता बदल लिया था.. इस समय सत्तू का बाप लम्बे लम्बे कदमो से घर क पिछले हिस्से में पहुंच चूका था पर अभी वो शौचालय की और अपना अगला कदम hi बढ़ाता है की ठीक तभी शौचालय क बगल में बने हुए स्नानघर का द्वार खुल पड़ता है और एक सलोनी काया बहार निकलते हुए महेंद्र को मिल जाती है
सूरज की पहली किरणों ने अभी घने कोहरे को पार करके जमीन को चूमने की सुरुवात hi की थी और ऐसे में भीगे बदन की वो स्त्री जैसे hi बहार अपने कदम रखती है मानो सुबह की साडी hi सुनहरे किरणों ने उसके यौवन पे अपना नया ठिकाना ढूंढ लिया हो.. महेंद्र तोह जैसे की पत्तर में बदल चूका था मानो जैसे कोई निर्जीव वास्तु को जो बस एकटुक स्नानघर से बहार आयी उस कामुक सलोनी स्त्री से अपनी नज़रें hi नहीं हटा प् रहा हो और उसके ऐसे करने का कारन भी साफ़ था ककी स्नानघर से निकलने वाली वो सलोनी सूरत की मलिका उसके छोटे भाई की पत्नी 'हर्षिता' थी
जिसने कामुक सलोने जिस्म पे इस समय सिर्फ एक पेटीकोट बंधा हुआ था और एक हाथ में उसके भीगे हुए सायद धुले गए कपडे थे तोह दूसरे में उसकी साड़ी जिसे सायद उसने वह स्नानघर में किसी कारन पहनना जरुरी नहीं समझा था.. पर जिस चीज़ ने अपने नाड़े क पक्के महेंद्र क जिस्म में चीटिया चलवा दी थी वो था हर्षिता का वो भीगा हुआ पेटीकोट जिसका रंग गाड़ा नीला था और इस समय उसके कामुक सरीर पे ऊपर तक चढ़ा हुआ था
पर सायद हर्षिता आज कुछ ज्यादा hi जल्दी में थी ककी उसने वो पेटीकोट अपने भीगे बदन पे hi बंद लिया था तभी तोह इस समय महेंद्र को उसकी 'चुकती बहु' क पेटीकोट से उसके काले तने हुए निप्पल्स और उसके पास का पूरा गोला काला हिस्सा पेटीकोट क ऊपर से साफ़ साफ़ नज़र सा आ रहा था.. अब आपके सामने कोई स्त्री ऐसी अवस्था में आके कड़ी हो जाये जो बस नाहा क आयी हो जिसके बालों से अब भी पानी की कामुक बंधे टपक रही हो और जिस्म पे मोतियों सामान पानी जमा हुआ हो, तोह आप समाज hi सकते है की आपका हाल किया होगा और फिर ये कामुक सरीर तोह हर्षिता का था
पेटीकोट की लम्बाई कुछ ऐसी थी की वो हर्षिता क घुटनो तक hi आ रही थी और उचाई यानि ऊपर वो ऐसी जगह बंधा हुआ था जहा अगर वो 1" भी और निचे होता तोह सायद 'सोनू की माँ' की दोनों चूचियों क काले गुलाबजामुन इस समय महेंद्र को पूर्ण रूप से दिख जाते.. बेचारे महेंद्र जो च क भी अपनी नज़रों को अपनी बहु क भीगे हुए सरीर से हटा नहीं प् रही थी वही जैसे hi स्नानघर से हर्षिता बहार आती है तोह उसके सामने मजबूत जिस्म वाला महेंद्र यानि उसका जेठ खड़ा हुआ दिख जाता है
हर्षिता ने आज जल्दबाजी क चक्कर में नहाने क बाद ऐसे hi पेटीकोट चढ़ा लिया था और ये सोचा था की वो जल्दी से कमरे में जेक आराम से कपडे बदल लेगी..
महेंद्र की जो बहु आज तक उसके सामने बिना पल्लू न आयी थी आज वो उसके सामने भीगे बदन एक ऐसे पेटीकोट में कड़ी थी जिसमें से उसके सरीर का हर अंग और हर कटाव महेंद्र को ऐसे नज़र आ रहा था मानो वो पूर्ण नंगी अवस्था में कड़ी हो.. बेचारा 'सविता का पति' तोह जैसे सांस लेना hi भूल गया था वही हर्षिता का भी हाल ऐसा था जैसे किसी ने उसके सरे संस्कारों को एक hi दिन में उससे चीन लिए हो
हर्षिता- (मारे लाज क उसके मुंह से निकलने वाले सब्द टूट से जा रहे थे) जेठ जी.. आप.. वो में.. बस.. मैंने सोचा अभी.. है.. नहीं तोह.. वो.. मैं..
हर्षिता क इन टूटे शब्दों क चलते महेंद्र को कही जेक होश आया और बिना एक भी पल गवाए वो तुरंत की दूसरी और मुंह करके मुद जाता है.. और अपनी गरम हो चुकी साँसों को सँभालते हुए धीरे से कहता है
"कोई.. कोई बात नहीं बहु.. वो मैं बस.. आज थोड़ा जल्दी आ गया न.. तुम.. तुम.. जाओ.. जाओ.."
ठीक हर्षिता की hi भांति उसके जेठ क मुख से निकलने वाले सब्द भी उसका साथ नहीं दे रहे थे.. वीरू की पत्नी हर्षिता अब वह और नहीं रुक पाती ककी ऐसे अपने जेठ क सामने आने की तोह उसने कल्पना भी नहीं की और आज जो नहीं सोचा था वो हो चूका था
हर्षिता लगभग भागती हुई सी अंदर की और चल पड़ती है और इस पल न जाने क्यू महेंद्र क मन में ये विचार सा आता है की.. किया वो मुद क अपनी बहु को पीछे से देखे, पर बड़ी मुश्किल से hi सही उसने अपने इन विचारों पे विजय प्राप्त की थी और ऐसा कुछ भी उसने नहीं किया था
पर ये पहली घटना जरूर थी जिसने महेंद्र की आँखों क सामने उसकी बहु हर्षिता का कामुक यौवन ला दिया था पर ये अंतिम बार नहीं था..
कंटिन्यू...