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अध्याय 22
तीनों दोस्त दौड़ते तो बेहद जोश में हैं पर आगे जाकर उनका जोश ठंडा हो जाता है जब सामने से देखते हैं उनकी माएं और बाकी औरतें सब साथ में खेत से वापिस आ रही हैं, जिन्हें देखते ही तीनों के चेहरे पर निराशा आ जाती है,
लल्लू: अरे यार आज देर हो गई,
भूरा: किस्मत ही खराब है भेंचो।
छोटू: कोई नहीं आज नहीं मिला मौका कल फिर मिलेगा, इतने दिन रुके एक दिन और सही।
भूरा: सही कह रहा है, चलो फिर घर चलते हैं, आगे सोचते हैं क्या करना है,
तीनों बापिस आते हैं तो देखते हैं छोटू के घर के बाहर चबूतरे पर उसके और लल्लू के दादा, यानि सोमपाल और कुंवर पाल खटिया पर बैठे हैं, उनके बगल में ही राजकुमार, भूरा का बाप और छोटू के चाचा संजय, और पापा सुभाष खड़े हैं, लल्लू का बाप मगन भी वहीं था, सब को साथ देख के वो तीनों भी वहीं पहुंच जाते हैं वहां पहले से ही कुछ बात चल रही थी,
सोमपाल: वैसे सही तो यही रहेगा कुंवर, अपने लंगोटिया को आखिरी विदाई दे आते हैं इसी बहाने गंगा भी नहा लेंगे।
कुंवरपाल: मेरा भी यही मत है,
राजकुमार: तो चलो चाचा तुम दोनों भी, मुझे तो जाना है ही अस्थियों को सिराने,
सुभाष: तो ऐसा करो न, कल मैं नाव निकाल रहा हूं सुबह, सब्जियां इकट्ठी हो गई हैं बहुत चाचा के जाने के बाद गए ही कहां हैं तो उसी में तुम लोग भी चल लेना।
संजय: पर एक नाव में सब लोग और सब्जियां कैसे जा पाएंगी।
सुभाष: अरे नहीं सत्तू भी जा रहा है अपनी नांव लेकर।
सोमपाल: वो सब ठीक है पर इतनी सब्जियों को वहां बाज़ार में लगाना और संभालना अकेले कैसे करोगे, संजय को भी ले जाओ।
सुभाष: नहीं बाबा, आज तो मैं ये मिलकर कोने वाले खेत में जुताई कर देंगे पर कल धान वाले खेत में पानी लगाना है वैसे भी देर हो गई है, तो संजय को वो करना जरूरी है,
संजय: पर भैया बाबा सही कह रहे हैं वहां संभालोगे कैसे?
सुभाष:अरे एक काम करता हूं छुटुआ और राजेश को ले जाता हूं ये लोग काम भी संभालेंगे और थोड़ा सीख भी जाएंगे।
राजकुमार: ये सही रहेगा।
ये सुनते ही छोटू का मुंह उतर गया कहां उसने क्या सोचा था और क्या हुआ, वैसे बेचारे के लिए लल्लू और भूरा को भी बुरा लगा पर कर क्या सकते थे, फैसला हो गया था, फिर पूरे दिन अगले दिन की तैयारियां होती रहीं छोटू और राजेश ने सब्जियां नाव पर लगाईं, नाव तैयार की और फिर सत्तू की नाव में भी सब्जियां चढ़ाई, पूरा दिन इसी मेहनत में बीत गया,
दूसरी ओर लल्लू चबूतरे से सीधा घर आया, तब तक उसकी मां लता भी आ चुकी थी, लता ने आते ही चूल्हे पर चाय चढ़ाई,
लता: ए लल्ला, तू तब तक भैंसों के नीचे से गोबर उठा कर डाल आ तब तक चाय भी उबल जाएगी।
लल्लू: ठीक है मां,
नंदिनी आंगन में झाड़ू लगा रही थी, इसी बीच लल्लू की नज़र नंदिनी से मिली और दोनों को ही वो पल याद आ गया जब नंदिनी नंगी लेटी थी और लल्लू उसे देख अपना लंड हिला रहा था, नंदिनी ने तुरंत अपनी नजरें फेर लीं हालांकि उसे भी ये सोच कर थोड़ा सा अजीब लगता था और थोड़ी उत्तेजना भी होती थी क्योंकि काफी समय से वो सत्तू से भी नहीं मिल पाई थी ऊपर से उसकी मां के बीच भी कुछ नहीं हुआ थापर वो उस पर ध्यान नहीं देती थी वहीं लल्लू का तो पेंट में तंबू बन जाता था पर उसे अपनी बहन के गुस्से से भी डर लगता था इसलिए उसने भी नज़र हटाई और काम पर लग गया, कुछ ही पलों में कुंवर पाल और मगन भी आ गए तो नंदिनी ने कुंवर पाल को अलग खाट पर चाय और परांठा दे दिया, जल्दी ही पूरा परिवार चाय नाश्ता कर रहा था,
लल्लू अपनी मां को चूल्हे पर चाय बनाते देख रहा था, उसका पल्लू कसा हुआ था जिससे उसका पेट और नाभी दिख रही थी उसके ब्लाउज़ में कसी हुई चूचियां, लता का बदन पसीने से चमक रहा था और उसे देख लल्लू की पेंट में हलचल हो रही थी।

हालांकि लता हमेशा से ही ऐसे ही रहती थी पर अब लल्लू की नज़र अपनी मां के लिए बदल जो गई थी,
अपनी मां को देखते हुए लल्लू के मन में बस यही खयाल चल रहे थे कि वो कैसे अपनी मां के करीब आए।
पर उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था उसे पता था कि उसे धीरे धीरे ही आगे बढ़ना होगा। नंदिनी भी आज अपनी मां को ऐसे देख थोड़ा उत्तेजित हो रही थी, वैसे भी उन दोनों के बीच अब तक जो कुछ हुआ था उसके बाद ये स्वाभाविक था।
दूसरी ओर भूरा के यहां भी कुछ ऐसा ही हाल था, उसके जीजा उसकी बहन रानी को कुछ दिनों के लिए छोड़ गए थे। रानी भी अपनी मां की तरह ही सुंदर थी, शादी के बाद उसका बदन और भर गया था और अब तो दोनों मां बेटी में थोड़ा ही फर्क रह गया था, रत्ना को भी रानी के रुकने से आराम मिला था और अच्छा भी लग रहा था परिवार धीरे धीरे शोक से उभर रहा था। भूरा घर पहुंचा तो उसने देखा कि उसकी मां सिर्फ पेटीकोट और ब्लाउज़ में आंगन में नल चला रही है, भूरा मां को इस हाल में देख थोड़ा ठहर गया उसके कदम धीमे हो गए, वो धीरे धीरे आगे बढ़ने लगा उसकी नजर कभी अपनी मां की कमर तो कभी उसके उभरे हुए चूतड़ों पर फिसल रही थी, उसके पैंट में तंबू बनने लगा था,

इसी बीच रानी उसकी बहन पीछे से आ रही थी और उसने भूरा को इस तरह मां को देखते हुए पाया तो उसने कुछ पल उसे ध्यान से देखा, उसे भूरा का मां को यूं देखना बहुत अजीब लगा, इसलिए वो बोल पड़ी,
रानी: अरे भूरा क्या कर रहा है खड़े खड़े?
भूरा रानी की आवाज़ से चौंक गया, और तभी रत्ना भी उनकी ओर पलट गई।
भूरा: कुछ कुछ नहीं दीदी, मैं तो अभी आया था घर बस।
रत्ना: अरे रानी जा सबके लिए चाय तो रखदे बिटिया तब तक मैं नहा लेती हूं,
ये कह कर रत्ना अपना ब्लाउज़ के हुक खोलने लगी तो भूरा की नज़र उस पर ही जम गई, तो रानी ने उसे फिर टोका,
रानी: अरे अब जा बैठ जा कर अंदर भूरा, चाय बन जायेगी तो बुला लूंगी, मां को नहाना है।
भूरा के आगे अब और चारा नहीं था, वो हां दीदी बोल कर अंदर चला गया, और सोचने लगा आज दीदी ने सब खराब कर दिया अच्छा खासा मां को नहाना देखने को मिल सकता था, पर वो ये भी जानता की उसे संभाल कर रहना होगा नहीं तो लेने के देने पढ़ सकते हैं।
दिन बीत जाता है रात होती है, खाना खाने के बाद छोटू, राजेश, सुभाष और सोमपाल तैयारी कर के सब चबूतरे पर ही सोने चले जाते हैं क्योंकि रात में जल्दी ही निकलना था तो जिस जिस को जाना था सब चबूतरे पर ही सो रहे थे उधर राजकुमार और कुंवरपाल भी चबूतरे पर ही आ गए थे अपना समान लेकर,
बेचारा छोटू का मुंह छोटा सा होकर रह जाता है उसे लगा था कि आज कुछ मां के साथ हो सकता था पर आज तो उसे मौका ही नहीं दिया,
पुष्पा आज अकेली बिस्तर पर लेटी थी और करवटें बदल रही थी, वो छुपा रही थी पर छोटू की कमी उसे भी खल रही थी, उसकी उत्तेजना उसके बदन की प्यास दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही थी, पर वो जानती थी आज भी उसकी प्यास मिटने वाली नहीं थी, वैसे लगता था आज पूरे घर में ही सूखा था क्योंकि आज सुधा भी ऐसे ही सो रही थी, संजय को भी जल्दी उठ कर खेत में पानी लगाना था तो वो भी बाहर ही सबके साथ सो रहा था।
दूसरी ओर लता के लिए तो जैसे ये सब फायदे वाला हुआ क्योंकि कुंवरपाल के न होने से जैसे ही बच्चों के सोने का एहसास हुआ मगन कमरे में आ गया था और उसके साथ बिस्तर पर था, मगन ने धीरे धीरे लता के कपड़े उतारने शुरू किए कमरे में दिए की पीली रोशनी में लता का भरा बदन चमकने लगा, लता का ब्लाउज़ खोल कर मगन ने उसकी चूचियों को बाहर निकाल लिया और उन्हें मुंह लगा कर चूसने लगा, लता के मुंह से एक हल्की आह निकल गई।
आंगन में सो रहे लल्लू को अच्छे अच्छे सपने आ रहे थे पर तभी किसी कीड़े के काटने से उसकी आंख खुली, कीड़े ने जांघ पर काटा तो लल्लू उठ कर बैठ गया और जांघ को खुजलाने लगा, धीरे से उसकी आँखें खुली उसने अपने अगल बगल पड़े बिस्तर पर देखा तो उसे कुछ अजीब लगा क्योंकि बिस्तर तो खाली थे, तुरंत उसका माथा ठनका, उसे इतना तो समझ आता ही था कि उसके पापा मां के पास अंदर होंगे पर हैरानी वाली बात ये थी कि उसकी बहन नंदिनी का भी बिस्तर खाली था,
लल्लू को थोड़ा अजीब लगता है क्योंकि इस समय उसकी बहन कहां गई होगी, वो सोचता है शायद पेशाब करने गई होगी और ये सोच कर थोड़ी देर यूं ही आंखों को मलते हुए बैठा रहता है पर कुछ देर बाद भी जब नंदिनी नहीं आती तो लल्लू सोचने लगता है, और बिस्तर से उठ खड़ा होता है पर सावधानी से ताकि कोई आवाज़ न हो जिससे अंदर उसके मां पापा को कोई शक हो। वो उठ कर पहले दरवाजे के पास वाली नाली की ओर जाकर देखता है क्योंकि रात को पेशाब करने की जगह वही थी, पर वहां भी कोई नहीं होता उसका दिमाग जोरों से चलने लगता है वो बापिस आंगन में आता है और छप्पर की ओर बढ़ता है, छप्पर की टेक और रसोई की आड़ के लिए छप्पर के आगे एक कच्ची दीवार थी जिससे अंदर के कमरे का दरवाजा नहीं दिखता था, लल्लू आगे बढ़ता है और दीवार की ओट से देखता है तो उसकी आँखें चौड़ी हो जाती हैं वो देखता है उसकी बहन नंदिनी किवाड़ की एक ओर झिरी में मतलब जहां दरवाज़ा जुड़ा होता है उसके ऊपर नीचे की जगह दरवाज़ा पुराना होने से खाली हो गई थी तो उसमें आंख लगा कर देख रही थी और उसका एक हाथ सलवार के ऊपर से ही उसकी जांघों के बीच चल रहा था, लल्लू का ये देख बुरा हाल हो जाता है,
कुछ देर तो वो यूं ही जम जाता है फिर सोचता है दीदी अंदर क्यों देख रही हैं वहां तो मां पापा चुदाई... इतना कह कर वो रुक जाता है, और धीरे धीरे आगे बढ़ता है, और दरवाज़े के पास पहुंच जाता है, नंदिनी को तो इसकी खबर भी नहीं होती उसका पूरा ध्यान अंदर होता है, लल्लू भी दरवाज़े के दूसरी ओर से बनी झिरी में झांक कर देखने लगा और उसने जो देखा उसे देख कर उसकी आँखें खुली की खुली रह गईं, सामने कमरे में नीचे एक चादर बिछी थी कमरे में पीली रोशनी फैली थी दिए की और उस रोशनी में लल्लू ने देखा कि उसके पापा नीचे लेटे हुए हैं नीचे से पूरे नंगे होकर और उनके ऊपर उसकी मां लता बैठी है लता की साड़ी और पेटीकोट कमर पर इकट्ठा हैं और उसके गोल गोल मटके जैसे चूतड़ नंगे उसके सामने हैं चूतड़ों के बीच उसके पापा का काला मोटा लंड घुसा हुआ है और उसकी मां लता अपने चूतड़ों को उछाल उछाल कर पापा के लंड पर पटक रही है,

लल्लू को ठीक से उसकी मां के चूतड़ और उसकी चूत में अंदर बाहर होता लंड दिख रहा है क्योंकी उसके मां और पापा के पैर और पीठ दरवाज़े की ओर ही थे,
लल्लू ने हालांकि अपनी मां के चूतड़ों को देखा था और उन्हें सोच कर हिलाया भी था पर अभी उन्हें इस तरह से चुदवाते देख तो उसके होश ही उड़ गए थे, उसका बदन गर्मी से भरने लगा उसका लंड बिल्कुल कड़क हो गया उसके अंगोछे में, पहली बार अपनी मां और पापा की चुदाई देख रहा था, उसकी उत्तेजना की अभी कोई सीमा नहीं थी।
दूसरी तरफ नंदिनी का भी यही हाल था वो भी पहले से ही मां पापा की चुदाई देखते हुए उत्तेजित हो रही थी और अपनी चूत को सलवार के ऊपर से ही सहला रही थी, लल्लू ने कुछ देर अंदर देखा और फिर उसे अपनी बहन का खयाल आया जो अब भी उसके बगल में थी, उसने कमरे के अंदर से नज़र हटाई और अपनी बहन पर लगा दी, चांद की हल्की सी रोशनी में वो देख पा रहा था नंदिनी क्या कर रही है, लल्लू पर अब उत्तेजना का नशा चढ़ने लगा था वो अब सही गलत और मर्यादाओं के बारे में नहीं सोच रहा था, वो नंदिनी की ओर आगे बढ़ा और उसके बिल्कुल पास जाकर उसने एक गहरी सांस ली जैसे आखिर बार सोच रहा हो आगे बढ़ने से पहले और फिर एक हाथ बढ़ाकर धीरे से नंदिनी की छाती पर रख दिया और बहुत हल्के से नंदिनी की भरी हुई चूची को सहलाने लगा।
नंदिनी को जैसे ही ये आभास हुआ तो उसने तुरंत पलट कर देखा और सामने देख कर अब वो चौंक गई, उसका दिल जोरों से धड़कने लगा वो जानती थी वो पकड़ी गई है पर फिर उसे यह जैसे ही एहसास हुआ कि लल्लू का हाथ उसकी छाती पर है उसने तुरंत उसे झटक दिया, लल्लू को नंदिनी की इस हरकत से हैरानी हुई और घबराहट भी, नंदिनी तुरंत दरवाजे के बाहर से अपने बिस्तर पर आ जाती है और तुरंत अपनी चादर से अपने आप को ढंक लेती है वो लल्लू का सामना नहीं करना चाहती थी वो जानती थी वो आज बुरी फंसी है उसके मां बाप की चुदाई देखते हुए उसके भाई ने उसे रंगे हाथों पकड़ लिया है, अब तक जिस पर वो धौंस दिखाती आई थी आज पहली बार उसका पलड़ा भारी था वो बस किसी तरह से उसका सामना नहीं करना चाहती थी।
लल्लू भी पीछे पीछे आया और उसने नंदिनी को चादर ओढ कर लेते देखा तो उसे हैरानी हुई उसने सोचा अभी उठाता हूं पर फिर उसने सोचा कि नहीं मुझे दिमाग से काम लेना होगा अभी मां पापा कभी भी बाहर आ सकते हैं और वो आ गए तो गड़बड़ हो जाएगी मुझे दीदी से अकेले में बात करनी होगी, लेकिन तब तक इस खड़े लंड का क्या करूं? उसने सोचा मुठिया लेता हूं पर न जाने क्यों उसने एक बार नंदिनी पर नज़र डाली और ये खयाल मुस्कुराते हुए दिमाग से निकाल दिया और लेट गया और कुछ सोचते हुए सो गया।
दूसरी भूरा के घर में भी सब सो रहे थे आज राजकुमार बाहर चबूतरे पर थे तो रत्ना अकेली सो रही थी उसके बगल के बिस्तर पर रानी सो रही थी बाकी दोनों लड़के आंगन में सो रहे थे, अचानक से रत्ना की नींद खुलती है और वो हांफते हुए उठ कर बैठ जाती है, उसने एक सपना देखा था उसका चेहरा पसीने से लतपथ था, वो नीचे से लोटा उठा कर पानी पीती है, पानी पी कर वो सोचने की कोशिश करती है उस बारे में जो उसने अभी सपने में देखा, क्या था ये, ये सब क्या हो रहा है, फिर वो खुद के सिर को झटक कर बापिस लेट जाती है और आंखें बंद करती है, पर उसे बापिस सपने के दृश्य दिखाई देने पड़ते हैं सपने में वो अपने घर के चबूतरे पर ठीक उसी खाट पर नंगी है और उसे फिर से उसी रात की तरह तीन लोग चोद रहे हैं पर इस बार ये तीन लोग उसके ससुर और उनके दोस्त नहीं हैं बल्कि भूरा और उसके दोस्त लल्लू और छोटू हैं रत्ना का मन सवालों से भर रहा है क्यों अपने ही बेटे और उसके दोस्तों के बारे में उसे ये सपना आ रहा है, क्या हो गया है मुझे इतना गंदा सपना,
ये सब सोचते हुए सो करवट बदलती है तो उसे अपनी जांघों के बीच थोड़ी चिकनाहट महसूस होती है वो तुरंत हाथ साड़ी और पेटीकोट के अंदर डाल कर देखती है तो पाती है कि उसकी चूत ओर जांघें उसके रस से गीली है, उसे खुद पर और गुस्सा आता है, कि उसने इतना बुरा सपना देखा और साथ ही उसे देख कर स्खलित भी हो गई, वो भी इतना रस तो शायद कभी नहीं निकला था उसका, उसके मन में सवाल ही सवाल घूमने लगते हैं वो लेट कर काफी देर इसी बारे में सोचने लगती है, काफी देर बाद उसकी नींद लगती है,

और नींद में उसे फिर से सपना आता है कि वो एक जगह बैठी है फिर उसे अपनी चूत में कुछ एहसास होता है तो वो नीचे देखती है और पाती है वो बिलकुल नंगी है और उसकी चूत में एक मोटा लंड घुसा हुआ है और जब वो चेहरा पीछे करके उसका चेहरा देखती है तो और हैरान रह जाती है वो और कोई नहीं बल्कि उसका बड़ा बेटा राजू था, तभी उसके कानो में एक आवाज पड़ती है जो रानी की है जो उसे बार बार मां मां कह के बुला रही है, वो इधर उधर देखती है तो पाती है कि उससे थोड़ी दूर उसे अपनी बेटी दिखती है पर ऐसी हालत में वो बिल्कुल नंगी है और अब तीन लोग उस एक साथ चोद रहे हैं, और वो तीनों रानी को चोदते हुए रत्ना की ओर देख मुस्कुरा रहे हैं, तीनों लोग उसके छोटू के पापा, चाचा और लल्लू के पापा हैं, रानी के मुंह से मां मां की आवाज़ निकल रही है, रत्ना अपनी बेटी को बचाने के लिए अपने बेटे के लंड से उठने की कोशिश करती है और उसकी आंख खुल जाती है, तो देखती है उसके सामने रानी है जो उसे मां मां करके बुला रही है।
रानी: अरे मां क्या हुआ, उठ जाओ सुबह हो गई, देखो कबसे आवाज लगा रही हूं।
रत्ना: हां आवाज क्या,
रत्ना को तब समझ आता है वो सपना देख रही थी।
रानी: लो मां चाय पिलो नींद खुल जाएगी
रत्ना: हां दे।
वो उठ कर चाय पीते हुए अपने सपनो के बारे में सोचने लगी।
जारी रहेगी
तीनों दोस्त दौड़ते तो बेहद जोश में हैं पर आगे जाकर उनका जोश ठंडा हो जाता है जब सामने से देखते हैं उनकी माएं और बाकी औरतें सब साथ में खेत से वापिस आ रही हैं, जिन्हें देखते ही तीनों के चेहरे पर निराशा आ जाती है,
लल्लू: अरे यार आज देर हो गई,
भूरा: किस्मत ही खराब है भेंचो।
छोटू: कोई नहीं आज नहीं मिला मौका कल फिर मिलेगा, इतने दिन रुके एक दिन और सही।
भूरा: सही कह रहा है, चलो फिर घर चलते हैं, आगे सोचते हैं क्या करना है,
तीनों बापिस आते हैं तो देखते हैं छोटू के घर के बाहर चबूतरे पर उसके और लल्लू के दादा, यानि सोमपाल और कुंवर पाल खटिया पर बैठे हैं, उनके बगल में ही राजकुमार, भूरा का बाप और छोटू के चाचा संजय, और पापा सुभाष खड़े हैं, लल्लू का बाप मगन भी वहीं था, सब को साथ देख के वो तीनों भी वहीं पहुंच जाते हैं वहां पहले से ही कुछ बात चल रही थी,
सोमपाल: वैसे सही तो यही रहेगा कुंवर, अपने लंगोटिया को आखिरी विदाई दे आते हैं इसी बहाने गंगा भी नहा लेंगे।
कुंवरपाल: मेरा भी यही मत है,
राजकुमार: तो चलो चाचा तुम दोनों भी, मुझे तो जाना है ही अस्थियों को सिराने,
सुभाष: तो ऐसा करो न, कल मैं नाव निकाल रहा हूं सुबह, सब्जियां इकट्ठी हो गई हैं बहुत चाचा के जाने के बाद गए ही कहां हैं तो उसी में तुम लोग भी चल लेना।
संजय: पर एक नाव में सब लोग और सब्जियां कैसे जा पाएंगी।
सुभाष: अरे नहीं सत्तू भी जा रहा है अपनी नांव लेकर।
सोमपाल: वो सब ठीक है पर इतनी सब्जियों को वहां बाज़ार में लगाना और संभालना अकेले कैसे करोगे, संजय को भी ले जाओ।
सुभाष: नहीं बाबा, आज तो मैं ये मिलकर कोने वाले खेत में जुताई कर देंगे पर कल धान वाले खेत में पानी लगाना है वैसे भी देर हो गई है, तो संजय को वो करना जरूरी है,
संजय: पर भैया बाबा सही कह रहे हैं वहां संभालोगे कैसे?
सुभाष:अरे एक काम करता हूं छुटुआ और राजेश को ले जाता हूं ये लोग काम भी संभालेंगे और थोड़ा सीख भी जाएंगे।
राजकुमार: ये सही रहेगा।
ये सुनते ही छोटू का मुंह उतर गया कहां उसने क्या सोचा था और क्या हुआ, वैसे बेचारे के लिए लल्लू और भूरा को भी बुरा लगा पर कर क्या सकते थे, फैसला हो गया था, फिर पूरे दिन अगले दिन की तैयारियां होती रहीं छोटू और राजेश ने सब्जियां नाव पर लगाईं, नाव तैयार की और फिर सत्तू की नाव में भी सब्जियां चढ़ाई, पूरा दिन इसी मेहनत में बीत गया,
दूसरी ओर लल्लू चबूतरे से सीधा घर आया, तब तक उसकी मां लता भी आ चुकी थी, लता ने आते ही चूल्हे पर चाय चढ़ाई,
लता: ए लल्ला, तू तब तक भैंसों के नीचे से गोबर उठा कर डाल आ तब तक चाय भी उबल जाएगी।
लल्लू: ठीक है मां,
नंदिनी आंगन में झाड़ू लगा रही थी, इसी बीच लल्लू की नज़र नंदिनी से मिली और दोनों को ही वो पल याद आ गया जब नंदिनी नंगी लेटी थी और लल्लू उसे देख अपना लंड हिला रहा था, नंदिनी ने तुरंत अपनी नजरें फेर लीं हालांकि उसे भी ये सोच कर थोड़ा सा अजीब लगता था और थोड़ी उत्तेजना भी होती थी क्योंकि काफी समय से वो सत्तू से भी नहीं मिल पाई थी ऊपर से उसकी मां के बीच भी कुछ नहीं हुआ थापर वो उस पर ध्यान नहीं देती थी वहीं लल्लू का तो पेंट में तंबू बन जाता था पर उसे अपनी बहन के गुस्से से भी डर लगता था इसलिए उसने भी नज़र हटाई और काम पर लग गया, कुछ ही पलों में कुंवर पाल और मगन भी आ गए तो नंदिनी ने कुंवर पाल को अलग खाट पर चाय और परांठा दे दिया, जल्दी ही पूरा परिवार चाय नाश्ता कर रहा था,
लल्लू अपनी मां को चूल्हे पर चाय बनाते देख रहा था, उसका पल्लू कसा हुआ था जिससे उसका पेट और नाभी दिख रही थी उसके ब्लाउज़ में कसी हुई चूचियां, लता का बदन पसीने से चमक रहा था और उसे देख लल्लू की पेंट में हलचल हो रही थी।

हालांकि लता हमेशा से ही ऐसे ही रहती थी पर अब लल्लू की नज़र अपनी मां के लिए बदल जो गई थी,
अपनी मां को देखते हुए लल्लू के मन में बस यही खयाल चल रहे थे कि वो कैसे अपनी मां के करीब आए।
पर उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था उसे पता था कि उसे धीरे धीरे ही आगे बढ़ना होगा। नंदिनी भी आज अपनी मां को ऐसे देख थोड़ा उत्तेजित हो रही थी, वैसे भी उन दोनों के बीच अब तक जो कुछ हुआ था उसके बाद ये स्वाभाविक था।
दूसरी ओर भूरा के यहां भी कुछ ऐसा ही हाल था, उसके जीजा उसकी बहन रानी को कुछ दिनों के लिए छोड़ गए थे। रानी भी अपनी मां की तरह ही सुंदर थी, शादी के बाद उसका बदन और भर गया था और अब तो दोनों मां बेटी में थोड़ा ही फर्क रह गया था, रत्ना को भी रानी के रुकने से आराम मिला था और अच्छा भी लग रहा था परिवार धीरे धीरे शोक से उभर रहा था। भूरा घर पहुंचा तो उसने देखा कि उसकी मां सिर्फ पेटीकोट और ब्लाउज़ में आंगन में नल चला रही है, भूरा मां को इस हाल में देख थोड़ा ठहर गया उसके कदम धीमे हो गए, वो धीरे धीरे आगे बढ़ने लगा उसकी नजर कभी अपनी मां की कमर तो कभी उसके उभरे हुए चूतड़ों पर फिसल रही थी, उसके पैंट में तंबू बनने लगा था,

इसी बीच रानी उसकी बहन पीछे से आ रही थी और उसने भूरा को इस तरह मां को देखते हुए पाया तो उसने कुछ पल उसे ध्यान से देखा, उसे भूरा का मां को यूं देखना बहुत अजीब लगा, इसलिए वो बोल पड़ी,
रानी: अरे भूरा क्या कर रहा है खड़े खड़े?
भूरा रानी की आवाज़ से चौंक गया, और तभी रत्ना भी उनकी ओर पलट गई।
भूरा: कुछ कुछ नहीं दीदी, मैं तो अभी आया था घर बस।
रत्ना: अरे रानी जा सबके लिए चाय तो रखदे बिटिया तब तक मैं नहा लेती हूं,
ये कह कर रत्ना अपना ब्लाउज़ के हुक खोलने लगी तो भूरा की नज़र उस पर ही जम गई, तो रानी ने उसे फिर टोका,
रानी: अरे अब जा बैठ जा कर अंदर भूरा, चाय बन जायेगी तो बुला लूंगी, मां को नहाना है।
भूरा के आगे अब और चारा नहीं था, वो हां दीदी बोल कर अंदर चला गया, और सोचने लगा आज दीदी ने सब खराब कर दिया अच्छा खासा मां को नहाना देखने को मिल सकता था, पर वो ये भी जानता की उसे संभाल कर रहना होगा नहीं तो लेने के देने पढ़ सकते हैं।
दिन बीत जाता है रात होती है, खाना खाने के बाद छोटू, राजेश, सुभाष और सोमपाल तैयारी कर के सब चबूतरे पर ही सोने चले जाते हैं क्योंकि रात में जल्दी ही निकलना था तो जिस जिस को जाना था सब चबूतरे पर ही सो रहे थे उधर राजकुमार और कुंवरपाल भी चबूतरे पर ही आ गए थे अपना समान लेकर,
बेचारा छोटू का मुंह छोटा सा होकर रह जाता है उसे लगा था कि आज कुछ मां के साथ हो सकता था पर आज तो उसे मौका ही नहीं दिया,
पुष्पा आज अकेली बिस्तर पर लेटी थी और करवटें बदल रही थी, वो छुपा रही थी पर छोटू की कमी उसे भी खल रही थी, उसकी उत्तेजना उसके बदन की प्यास दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही थी, पर वो जानती थी आज भी उसकी प्यास मिटने वाली नहीं थी, वैसे लगता था आज पूरे घर में ही सूखा था क्योंकि आज सुधा भी ऐसे ही सो रही थी, संजय को भी जल्दी उठ कर खेत में पानी लगाना था तो वो भी बाहर ही सबके साथ सो रहा था।
दूसरी ओर लता के लिए तो जैसे ये सब फायदे वाला हुआ क्योंकि कुंवरपाल के न होने से जैसे ही बच्चों के सोने का एहसास हुआ मगन कमरे में आ गया था और उसके साथ बिस्तर पर था, मगन ने धीरे धीरे लता के कपड़े उतारने शुरू किए कमरे में दिए की पीली रोशनी में लता का भरा बदन चमकने लगा, लता का ब्लाउज़ खोल कर मगन ने उसकी चूचियों को बाहर निकाल लिया और उन्हें मुंह लगा कर चूसने लगा, लता के मुंह से एक हल्की आह निकल गई।
आंगन में सो रहे लल्लू को अच्छे अच्छे सपने आ रहे थे पर तभी किसी कीड़े के काटने से उसकी आंख खुली, कीड़े ने जांघ पर काटा तो लल्लू उठ कर बैठ गया और जांघ को खुजलाने लगा, धीरे से उसकी आँखें खुली उसने अपने अगल बगल पड़े बिस्तर पर देखा तो उसे कुछ अजीब लगा क्योंकि बिस्तर तो खाली थे, तुरंत उसका माथा ठनका, उसे इतना तो समझ आता ही था कि उसके पापा मां के पास अंदर होंगे पर हैरानी वाली बात ये थी कि उसकी बहन नंदिनी का भी बिस्तर खाली था,
लल्लू को थोड़ा अजीब लगता है क्योंकि इस समय उसकी बहन कहां गई होगी, वो सोचता है शायद पेशाब करने गई होगी और ये सोच कर थोड़ी देर यूं ही आंखों को मलते हुए बैठा रहता है पर कुछ देर बाद भी जब नंदिनी नहीं आती तो लल्लू सोचने लगता है, और बिस्तर से उठ खड़ा होता है पर सावधानी से ताकि कोई आवाज़ न हो जिससे अंदर उसके मां पापा को कोई शक हो। वो उठ कर पहले दरवाजे के पास वाली नाली की ओर जाकर देखता है क्योंकि रात को पेशाब करने की जगह वही थी, पर वहां भी कोई नहीं होता उसका दिमाग जोरों से चलने लगता है वो बापिस आंगन में आता है और छप्पर की ओर बढ़ता है, छप्पर की टेक और रसोई की आड़ के लिए छप्पर के आगे एक कच्ची दीवार थी जिससे अंदर के कमरे का दरवाजा नहीं दिखता था, लल्लू आगे बढ़ता है और दीवार की ओट से देखता है तो उसकी आँखें चौड़ी हो जाती हैं वो देखता है उसकी बहन नंदिनी किवाड़ की एक ओर झिरी में मतलब जहां दरवाज़ा जुड़ा होता है उसके ऊपर नीचे की जगह दरवाज़ा पुराना होने से खाली हो गई थी तो उसमें आंख लगा कर देख रही थी और उसका एक हाथ सलवार के ऊपर से ही उसकी जांघों के बीच चल रहा था, लल्लू का ये देख बुरा हाल हो जाता है,
कुछ देर तो वो यूं ही जम जाता है फिर सोचता है दीदी अंदर क्यों देख रही हैं वहां तो मां पापा चुदाई... इतना कह कर वो रुक जाता है, और धीरे धीरे आगे बढ़ता है, और दरवाज़े के पास पहुंच जाता है, नंदिनी को तो इसकी खबर भी नहीं होती उसका पूरा ध्यान अंदर होता है, लल्लू भी दरवाज़े के दूसरी ओर से बनी झिरी में झांक कर देखने लगा और उसने जो देखा उसे देख कर उसकी आँखें खुली की खुली रह गईं, सामने कमरे में नीचे एक चादर बिछी थी कमरे में पीली रोशनी फैली थी दिए की और उस रोशनी में लल्लू ने देखा कि उसके पापा नीचे लेटे हुए हैं नीचे से पूरे नंगे होकर और उनके ऊपर उसकी मां लता बैठी है लता की साड़ी और पेटीकोट कमर पर इकट्ठा हैं और उसके गोल गोल मटके जैसे चूतड़ नंगे उसके सामने हैं चूतड़ों के बीच उसके पापा का काला मोटा लंड घुसा हुआ है और उसकी मां लता अपने चूतड़ों को उछाल उछाल कर पापा के लंड पर पटक रही है,

लल्लू को ठीक से उसकी मां के चूतड़ और उसकी चूत में अंदर बाहर होता लंड दिख रहा है क्योंकी उसके मां और पापा के पैर और पीठ दरवाज़े की ओर ही थे,
लल्लू ने हालांकि अपनी मां के चूतड़ों को देखा था और उन्हें सोच कर हिलाया भी था पर अभी उन्हें इस तरह से चुदवाते देख तो उसके होश ही उड़ गए थे, उसका बदन गर्मी से भरने लगा उसका लंड बिल्कुल कड़क हो गया उसके अंगोछे में, पहली बार अपनी मां और पापा की चुदाई देख रहा था, उसकी उत्तेजना की अभी कोई सीमा नहीं थी।
दूसरी तरफ नंदिनी का भी यही हाल था वो भी पहले से ही मां पापा की चुदाई देखते हुए उत्तेजित हो रही थी और अपनी चूत को सलवार के ऊपर से ही सहला रही थी, लल्लू ने कुछ देर अंदर देखा और फिर उसे अपनी बहन का खयाल आया जो अब भी उसके बगल में थी, उसने कमरे के अंदर से नज़र हटाई और अपनी बहन पर लगा दी, चांद की हल्की सी रोशनी में वो देख पा रहा था नंदिनी क्या कर रही है, लल्लू पर अब उत्तेजना का नशा चढ़ने लगा था वो अब सही गलत और मर्यादाओं के बारे में नहीं सोच रहा था, वो नंदिनी की ओर आगे बढ़ा और उसके बिल्कुल पास जाकर उसने एक गहरी सांस ली जैसे आखिर बार सोच रहा हो आगे बढ़ने से पहले और फिर एक हाथ बढ़ाकर धीरे से नंदिनी की छाती पर रख दिया और बहुत हल्के से नंदिनी की भरी हुई चूची को सहलाने लगा।
नंदिनी को जैसे ही ये आभास हुआ तो उसने तुरंत पलट कर देखा और सामने देख कर अब वो चौंक गई, उसका दिल जोरों से धड़कने लगा वो जानती थी वो पकड़ी गई है पर फिर उसे यह जैसे ही एहसास हुआ कि लल्लू का हाथ उसकी छाती पर है उसने तुरंत उसे झटक दिया, लल्लू को नंदिनी की इस हरकत से हैरानी हुई और घबराहट भी, नंदिनी तुरंत दरवाजे के बाहर से अपने बिस्तर पर आ जाती है और तुरंत अपनी चादर से अपने आप को ढंक लेती है वो लल्लू का सामना नहीं करना चाहती थी वो जानती थी वो आज बुरी फंसी है उसके मां बाप की चुदाई देखते हुए उसके भाई ने उसे रंगे हाथों पकड़ लिया है, अब तक जिस पर वो धौंस दिखाती आई थी आज पहली बार उसका पलड़ा भारी था वो बस किसी तरह से उसका सामना नहीं करना चाहती थी।
लल्लू भी पीछे पीछे आया और उसने नंदिनी को चादर ओढ कर लेते देखा तो उसे हैरानी हुई उसने सोचा अभी उठाता हूं पर फिर उसने सोचा कि नहीं मुझे दिमाग से काम लेना होगा अभी मां पापा कभी भी बाहर आ सकते हैं और वो आ गए तो गड़बड़ हो जाएगी मुझे दीदी से अकेले में बात करनी होगी, लेकिन तब तक इस खड़े लंड का क्या करूं? उसने सोचा मुठिया लेता हूं पर न जाने क्यों उसने एक बार नंदिनी पर नज़र डाली और ये खयाल मुस्कुराते हुए दिमाग से निकाल दिया और लेट गया और कुछ सोचते हुए सो गया।
दूसरी भूरा के घर में भी सब सो रहे थे आज राजकुमार बाहर चबूतरे पर थे तो रत्ना अकेली सो रही थी उसके बगल के बिस्तर पर रानी सो रही थी बाकी दोनों लड़के आंगन में सो रहे थे, अचानक से रत्ना की नींद खुलती है और वो हांफते हुए उठ कर बैठ जाती है, उसने एक सपना देखा था उसका चेहरा पसीने से लतपथ था, वो नीचे से लोटा उठा कर पानी पीती है, पानी पी कर वो सोचने की कोशिश करती है उस बारे में जो उसने अभी सपने में देखा, क्या था ये, ये सब क्या हो रहा है, फिर वो खुद के सिर को झटक कर बापिस लेट जाती है और आंखें बंद करती है, पर उसे बापिस सपने के दृश्य दिखाई देने पड़ते हैं सपने में वो अपने घर के चबूतरे पर ठीक उसी खाट पर नंगी है और उसे फिर से उसी रात की तरह तीन लोग चोद रहे हैं पर इस बार ये तीन लोग उसके ससुर और उनके दोस्त नहीं हैं बल्कि भूरा और उसके दोस्त लल्लू और छोटू हैं रत्ना का मन सवालों से भर रहा है क्यों अपने ही बेटे और उसके दोस्तों के बारे में उसे ये सपना आ रहा है, क्या हो गया है मुझे इतना गंदा सपना,
ये सब सोचते हुए सो करवट बदलती है तो उसे अपनी जांघों के बीच थोड़ी चिकनाहट महसूस होती है वो तुरंत हाथ साड़ी और पेटीकोट के अंदर डाल कर देखती है तो पाती है कि उसकी चूत ओर जांघें उसके रस से गीली है, उसे खुद पर और गुस्सा आता है, कि उसने इतना बुरा सपना देखा और साथ ही उसे देख कर स्खलित भी हो गई, वो भी इतना रस तो शायद कभी नहीं निकला था उसका, उसके मन में सवाल ही सवाल घूमने लगते हैं वो लेट कर काफी देर इसी बारे में सोचने लगती है, काफी देर बाद उसकी नींद लगती है,

और नींद में उसे फिर से सपना आता है कि वो एक जगह बैठी है फिर उसे अपनी चूत में कुछ एहसास होता है तो वो नीचे देखती है और पाती है वो बिलकुल नंगी है और उसकी चूत में एक मोटा लंड घुसा हुआ है और जब वो चेहरा पीछे करके उसका चेहरा देखती है तो और हैरान रह जाती है वो और कोई नहीं बल्कि उसका बड़ा बेटा राजू था, तभी उसके कानो में एक आवाज पड़ती है जो रानी की है जो उसे बार बार मां मां कह के बुला रही है, वो इधर उधर देखती है तो पाती है कि उससे थोड़ी दूर उसे अपनी बेटी दिखती है पर ऐसी हालत में वो बिल्कुल नंगी है और अब तीन लोग उस एक साथ चोद रहे हैं, और वो तीनों रानी को चोदते हुए रत्ना की ओर देख मुस्कुरा रहे हैं, तीनों लोग उसके छोटू के पापा, चाचा और लल्लू के पापा हैं, रानी के मुंह से मां मां की आवाज़ निकल रही है, रत्ना अपनी बेटी को बचाने के लिए अपने बेटे के लंड से उठने की कोशिश करती है और उसकी आंख खुल जाती है, तो देखती है उसके सामने रानी है जो उसे मां मां करके बुला रही है।
रानी: अरे मां क्या हुआ, उठ जाओ सुबह हो गई, देखो कबसे आवाज लगा रही हूं।
रत्ना: हां आवाज क्या,
रत्ना को तब समझ आता है वो सपना देख रही थी।
रानी: लो मां चाय पिलो नींद खुल जाएगी
रत्ना: हां दे।
वो उठ कर चाय पीते हुए अपने सपनो के बारे में सोचने लगी।
जारी रहेगी















































