Adultery उल्टा सीधा - Page 6 - SexBaba
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Adultery उल्टा सीधा

रत्ना खेत से हो आई थी उसका मन किसी भी चीज़ में नहीं लग रहा था, बार बात उसे बस वो ही रात के सपने याद आ रहे थे, रानी के आने से उसे इतना सुकून मिल गया था कि घर के काम में हाथ बंट गया था, रानी अधिकतर काम सम्भाल लेती थी नहीं तो रत्ना से इस मनोदशा में क्या ही हो पाता।

अध्याय 29


रत्ना के लिए हर दिन मुश्किल होता जा रहा था, उन कामुक सपनों से वो परेशान होती जा रही थी, अभी भी चूल्हे के पास बैठी थी चाय चढ़ा कर अपने ही खयालों में डूबी हुई थी, इतने में पीछे से रानी चिल्लाई: अरे मां चाय निकल गई,

रानी की आवाज सुनकर रत्ना चौंकी और खयालों से निकली हड़बड़ा के और घबराहट के मारे उसने गर्म भगौना नंगे हाथों से ही पकड़ लिया और उसकी एक तेज़ चीख निकली, रानी दौड़ कर आई,

रानी: क्या हुआ मां, अरे दय्या मां तुम्हारा ध्यान कहां रहता है? नंगे हाथ से गरम भगोना पकड़ लिया देखो हाथ जला लिए। हे दैय्या।

रानी ने तुरंत दोनों हाथ पकड़ लिए रत्ना के वहीं रत्ना के हाथों में जलन से उसके आंसू निकल रहे थे, इतने में भूरा भी शोर सुनकर अंदर आया, और पूछा क्या हुआ?

रानी: मां ने गरम भगोना पकड़ लिया हाथ से उंगलियां जल गई हैं वो तो अच्छा हुआ भगोना गिरा नहीं, नहीं तो चाय गिर जाती तो और जल जाती।

भूरा: रुको मैं ठंडा पानी लाता हूं।

भूरा तुरंत भाग कर जाता है और ठंडा पानी लेकर आता है बाल्टी में,

भूरा: लो मां इसमें अपने हाथ डूबा कर रखो।

रत्ना बेटी और बेटे के कहे अनुसार ही तुरंत हाथ पानी में डाल लेती है उसे तो समझ ही नहीं आ रहा था क्या हुआ है वो कुछ बोल नहीं पा रही थी ऊपर से हाथ में जलन और उसे परेशान कर रही थी, सभी उंगलियों में ऊपर की तरफ छाले पड़ गए थे,

कुछ देर बाद रानी बोली मां छाले बढ़ गए हैं, कुटिया में जाकर केलालाल को दिखा देते है दवाई लेनी पड़ेगी।

रत्ना: अरे इतना कुछ नहीं हुआ है हो जाएगा ठीक।

भूरा: नहीं मां जीजी सही कह रही है चलो दिखा लेते हैं।

रानी: भूरा तू यहीं रुक मैं लेकर जाती हूं मां को, चलो मां उठो जल्दी।

भूरा: ठीक है जीजी ले जाओ तुम।


रानी ने थोड़ा जोर जबरदस्ती की तो रत्ना को मानना ही पड़ा और दोनों घर से निकल गई, वहीं भूरा भी चिंतित था कि आए दिन उसके घर में किस तरह का संकट छाता जा रहा है,

रानी जल्दी ही रत्ना को लेकर केलालाल की कुटिया के बाहर पहुंच गई और आवाज़ लगाकर केलालाल को पुकारा,

रानी: बाबा ओह बाबा कहां हो,

केलालाल जो औषधि बनाने में व्यस्त थे तुरंत उठे और उस औषधि को एक ओर सरका दिया और उठ कर कुटिया के बाहर निकले उन्हें बाहर आते देख रत्ना ने रानी से अपने मुंह पर पल्लू करवा लिया।

केलालाल: अरे रानी बिटिया आई है, और बहू भी है, सब ठीक तो है न बिटिया?

रानी: कहां बाबा देखो न मां ने कैसे अपने हाथ जला लिए हैं,

रानी ने रत्ना के हाथ दिखाते हुए कहा,

केलालाल: अरे अरे ये तो छाले पड़ गए हैं, चलो जल्दी कुटिया में चल कर बैठो, अभी दवाई लगा देता हूं।

तीनों अंदर पहुंचे जहां रत्ना और रानी बैठ गए वहीं केलालाल डिब्बों में से कुछ निकालने लगे और निकालते हुए बोले:अरे पर ये हुआ कैसे बिटिया?

रानी: वो मां चाय बना रही थी, पर इनका ध्यान पता नहीं कहां था, मैने इन्हें दूर से बोला कि चाय निकल रही है तो इन्होंने बिना सोचे समझे ही नंगे हाथों से भगौना पकड़ लिया।

कैलालाल: अरे अरे बहू ध्यान रखना चाहिए न बेकार में इतना जला लिया। अब दिखा तो सही कितना जला है

केलालाल ने बैठते हुए कहा,

रानी: हाथ दिखाओ मां,

रत्ना ने अपने दोनों हाथ आगे कर केलालाल को दिखाए।






केलालाल: रानी बिटिया जरा बाहर से लोटा में पानी भर ले आ, और सुन शुद्ध पानी चाहिए लोटा धो लियो।

रानी: अभी लाई।

वो तुरंत उठ कर गई और केलालाल दो चूर्ण को मिश्रित करते हुए रत्ना की ओर देख कर बोला: बहू क्या अब भी तुझे वो सपने परेशान कर रहे हैं।

रत्ना ये बात सुन हैरान भी हुई पर उसे अच्छा भी लगा कि कोई उसकी परेशानी जानता है, रत्ना ने हां में सिर हिला दिया।

केलालाल: मतलब समस्या जितनी सोची थी उससे कहीं ज़्यादा गम्भीर है,

रत्ना का मन ये सुन कर घबराने लगता है।

रत्ना: फिर क्या करें अब बाबा हम तो परेशान हैं।

रत्ना सिर झुकाए हुए ही बोली,

केलालाल: घबराने की आवश्यकता नहीं है बहू, पर किस तरह के सपने आते हैं तू बता तो हम उसका उपाय ढूंढें।

रत्ना ये सुन कर सहम गई और कुछ नहीं कह पाई,

केला: बिना जाने हम कुछ नहीं कर पाएंगे बहू।

रत्ना: बाबा बहुत गंदे सपने आते हैं मैं बता नहीं सकती।

ये सुनकर केलालाल के कान खड़े हो गए और तुरंत अपना दिमाग दौड़ाने लगे,

केला: सुन बहू अभी बिटिया है तो तू मैं जानता हूं नहीं बता पाएगी ऐसा कर सूरज ढलने के समय आना अकेले तब आराम से तेरी परेशानी सुन लूंगा और उसका उपाय भी खोज लूंगा।

रत्ना ने ये सुना तो थोड़ी घबराई तो पर सिर्फ सिर हिला दिया इतने में ही रानी भी आ गई थी लोटा लेकर, जिसे केलालाल ने लिया और उसका पानी मिला कर एक गाढ़ा मिश्रण बनाया और रानी को एक डिब्बे में दे दिया और कहा कि ये उंगलियों पर लगाती रहे, दवाई लेकर मां बेटी वहां से चल दी वहीं उन्हें जाते देखते हुए केला के मुंह पर मुस्कान थी और उसकी नज़र रत्ना के मोटे चूतड़ों पर थी।




सुबह जब से खेत से झुमरी घर आई थी उसके मन में बहुत से विचार घूम रहे थे, जो कुछ राजेश के साथ हुआ उसे लेकर उसके मन में चिंता थी, कैसे एक उसके बेटे से भी छोटे लड़के ने उसे मजबूर कर दिया था और कैसे वो उसके बदन के साथ खेला था, एक ओर जहां उसे इस बात से बुरा लग रहा था वहीं यही बात उसे कहीं न कहीं उत्तेजित भी कर रहा था, की बेटे से छोटे लड़के के हाथों अपना बदन मसलवाना और उसका वो उसके होंठों को चूसना और अंत में वो उसका लड़क गर्म लंड ये सोच कर वो उत्तेजित हो रही थी, उसकी चूत नम हो रही थी, पर वो बार बार इन विचारों को सिर से झटक कर काम में लगने की कोशिश कर रही थी, दूसरी वजह ये भी थी कि राजेश के साथ ने उसे गरम तो कर दिया था पर उसे ठंडा होने का मौका नहीं मिला था, सुभाष की चुदाई उसे संतुष्ट कर देती थी इसलिए उसका बदन और प्यासा था,

वहीं उसका बेटा सत्तू अभी भी घोड़े बेच कर सो रहा था, उसकी यही दिनचर्या होती थी शहर में खूब मेहनत करके आता था फिर अगले दो तीन दिन अपनी नींद पूरी करता था, झुमरी भी बेटे का परिश्रम देखती थी और इसलिए उसे खूब सोने देती थी। झुमरी ने घर का काम निपटा लिया था अब नहाने की तैयारी कर रही थी झाड़ू को एक ओर रख कर उसने कमरे में झांका तो सत्तू अभी भी सो रहा था, झुमरी बाहर आई और अपनी साड़ी को उतार कर एक ओर टांग दिया और फिर नल चला कर बाल्टी भर ली फिर अपना ब्लाउज़ भी उतार दिया और सिर्फ पेटीकोट में बैठ गई, नल के पास और ठंडे पानी से अपने गरम बदन को शांत करने लगी,

इसी दौरान सत्तू की नींद अचानक खुल गई। रात भर की थकान उतर चुकी थी, लेकिन शरीर अभी भी भारी था। उसने आँखें मलीं, एक लंबी जम्हाई ली और बिस्तर से उठकर कमरे के बाहर आया।

जैसे ही वो दरवाज़े से बाहर निकला, उसके पैर वहीं ठिठक गए।

सामने नल के पास उसकी माँ झुमरी पीठ करके बैठी हुई थी। सिर्फ एक पतला सा सफेद पेटीकोट उसके निचले बदन पर लिपटा हुआ था — वो भी पानी से इतना भीग चुका था कि अब वो कपड़ा उसके मोटे, भारी-भारी चूतड़ों से चिपककर दूसरी त्वचा बन गया था। दोनों गोल-गोल, मांसल नितंब साफ़-साफ़ उभरे हुए थे, जैसे दो तरबूज उसके पेटीकोट में बंधे हो। झुमरी लोटे से अपने गरम बदन पर ठंडा पानी डाल रही थी जो पेटीकोट के पतले कपड़े को और भी पारदर्शी बना रहा था। वहीं झुमरी अपना हाथ पीछे लाकर अपनी पीठ मल रही थी।



ये दृश्य देख कर सत्तू का मुंह सूख गया। दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा।

पहले तो उसका दिमाग पूरी तरह से चक्कर में आ गया। वो एक कदम पीछे हट गया, दीवार से लगकर खड़ा हो गया। उसके सीने में तेज तेज धक धक होने लगी,

“अरे... ये... ये मेरी माँ है...धत्त क्या देख रहा हूँ मैं...?”

मन में ग्लानि की लहर उठी। “नहीं... नहीं देखना चाहिए... ये गलत है... बहुत गलत...” उसने आँखें बंद कर लीं, सिर हिलाया, जैसे खुद को रोकना चाह रहा हो।

पर... उसका मन न माना।

लंड तो पहले ही पैंट के अंदर सख्त होकर तन गया था।

धीरे-धीरे उसकी आँखें फिर से खुल गईं। सिर हल्का-हल्का बाहर निकालकर वो फिर से उसी दृश्य को घूरने लगा।

गीले पेटीकोट में लिपटे हुए उसके चूतड़, पानी की बूँदों से चमकता हुआ उसका बदन, हर बार जब झुमरी हाथ हिलाती तो वो मोटे चूतड़ हल्के-हल्के लहराते। जैसे कोई नरम, रसीला मांस का पहाड़ हो,

सत्तू के दिमाग में द्वंद्व चल रहा था।

एक तरफ ग्लानि चीख रही थी — “ये तेरी माँ है रे हरामी... तू क्या सोच रहा है?”

दूसरी तरफ कामुकता का शैतान फुसफुसा रहा था — “फिर भी... कितनी लजीज... कितनी मोटी... कितनी रसीली गांड है माँ की... देख... पानी कैसे उसके चूतड़ों के बीच से बह रहा है... पेटीकोट भी ज़्यादा कुछ छिपा नहीं पा रहा है...

उसकी साँसें भारी हो गईं। लंड अब पूरी तरह खड़ा होकर पैंट में तनाव महसूस करा रहा था। हाथ खुद-ब-खुद पैंट के ऊपर चला गया, लेकिन उसने रोका। फिर भी नजर हट नहीं पा रही थी।

झुमरी अभी भी अनजान थी। वो बस ठंडे पानी से अपना गरम-गरम बदन शांत कर रही थी... और उसके बेटे का लंड उसके मोटे गीले चूतड़ों को देखकर और भी ज़्यादा सख्त होता जा रहा था।

सत्तू वहीं खड़ा रहा... ग्लानि और लालच के बीच फँसा हुआ... लेकिन आँखें माँ के उस नंग-धड़ंग, गीले, मांसल बदन से हट ही नहीं पा रही थीं। तभी झुमरी के हाथ से लोटा फिसल कर गिर गया और सत्तू तुरंत अंदर की ओर भागा और बिस्तर पर लेट गया और सोने का नाटक करने लगा, उसका लंड बिलकुल तन कर खड़ा था जिसे उसने एक ओर करवट लेकर ढंक लिया आंखें बंद होते ही उसके सामने उसकी मां का दृश्य आने लगा। और वो बेचारा उन विचारों से लड़कर उन्हें बाहर निकालने की कोशिश करने लगा। झुमरी नहा कर धुला हुआ पेटीकोट और ब्लाउज पहन कर कमरे में घुसी तो अपने बेटे को अब भी सोता हुआ पाया, वो साड़ी निकाल कर लपेटने लगी, और साड़ी पहन कर उसे आवाज़ दी।

दूसरी ओर फुलवा के यहां भी नहाने धोने का कार्यक्रम चल रहा था मर्द लोग नाश्ता करके नहा धोकर निकल गए थे वहीं अब औरतों की बारी थी, फुलवा भी कहीं बाहर ही गांव में किसी के यहां गई थी, नीलम घर पर ही थी और उसकी नज़र बार बार अपनी मां और ताई पर घूम रही थी जो काम करते हुए बातें कर रही थी, खैर बातें करते हुए काम निपटा कर पुष्पा नल के पास जा बैठी नहाने के लिए, उसने अपना पेटीकोट और ब्लाउज खोल दिया और पटिया पर बैठ कर अपनी एड़ी घिसने लगी,

पुष्पा: मेरी तो एड़ी भी फटने लगी हैं री सुधा।

सुधा: अरे कोई बात नहीं जीजी मैं घी से मालिश कर दूंगी तो सही हो जाएगी,

पुष्पा: वाह कितनी अच्छी है तू, तेरे जैसी देवरानी किसी को न दे।

सुधा: अरे ऐसा क्यों बोल रही हो जीजी,

पुष्पा: अरे मुझे दे दी है तो और किसी को क्यों मिले?

सुधा: जीजी तुम भी न कुछ भी बोलती हो।

नीलम बैठी हुई अपनी ताई और मां की बातें सुन रही थी, अब उनके बीच का राज पता लगने के बाद नीलम को भी अपनी मां और ताई की जोड़ी अलग और अच्छी लगने लगी थी, तभी उसे पुष्पा ने पुकार,

पुष्पा: अरे बिटिया सुन इधर आ पीठ मल दे थोड़ी।

नीलम ये सुन कर उठी पर उसके मन में हिचकिचाहट और एक अजीब सी घबराहट हो रही थी, ऐसा नहीं था कि पहली बार उसे उसकी ताई, मां या अम्मा ने ऐसा करने को बोला था पर आज जब वो सब जानती थी और उसकी नज़र बदल गई थी तो उसे अपनी ताई की नंगी पीठ को छूना थोड़ा अजीब लग रहा था

पुष्पा: अरे खड़ी क्या है बिटिया जल्दी आ।

नीलम: हां ताई आई,

ये कह नीलम आगे बढ़ी और पुष्पा के पीछे जा कर बैठ गई और झिझकते हुए अपना हाथ पुष्पा की नंगी पीठ पर रखा, और पुष्पा के नंगे बदन को छूते ही उसे बदन में एक सिहरन सी महसूस हुई, उसका हाथ धीरे धीरे पुष्पा की पीठ पर चलने लगा,



पुष्पा लगातार सुधा से बातों में लगी हुई थी, वहीं नीलम सोच रही थी कि उसकी ताई की पीठ कितनी चिकनी है, कितनी मुलायम और मखमली, तभी उसकी नजर गीले पेटीकोट में से झांकते हुए पुष्पा के चूतड़ों पर भी पड़ी जो पेटीकोट के गीले होने से हल्के हल्के नज़र आ रहे थे, उन्हें देख नीलम के बदन में कुछ होने लगा जिसे उसके लिए शब्दों में बताना मुश्किल था,

नीलम सोचने लगी कि ताई के चूतड़ कितने भरे भरे हैं इन्हें दबाने में कितना मज़ा आएगा, वो ये सोच कर रोमांचित होने लगी, पर साथ ही झिझकने भी लगी,

इसी बीच उसके कानों में नंदिनी के शब्द गूंजने लगे कि उसे खुद को बदलना होगा अगर सच में जीवन में मजे लेना चाहती है तो उसे खुद के बनाए इस कवच से बाहर निकलना होगा, नीलम सोचने लगी वैसे भी यूं दबे दबे रहने से भी क्या फायदा? आज उसने थोड़ी हिम्मत दिखाई थी तो उसे अपनी सहेली के साथ कितना मज़ा आया था और क्या पता वैसा ही मज़ा उसे घर में मिल जाए तो? ये सोच कर ही उसका बदन मचलने लगा, वहीं वो सोचने लगी ताई और मां भी बहुत कामुक है ये तो मैं देख चुकी हूं बस मुझे भी उनकी इसी कामुकता को इसी गर्मी को हवा देनी होगी। ये सोचते हुए नीलम अपने अंदर एक आत्मविश्वास महसूस करने लगी। उसने अपने हाथ को पुष्पा की पीठ पर नीचे की ओर बढ़ाने लगी, वो हाथ पीठ पर फिराते हुए थोड़ा नीचे ले जाने लगी और पेटीकोट के ऊपर से ही अपनी ताई के चूतड़ों का माप लेने लगी



पुष्पा को भी नीलम का स्पर्श आज थोड़ा अलग लग रहा था पर वो सुधा से बातचीत में इतना ध्यान नहीं दे रही थी, पर नीलम के हाथ जब उसे पेटीकोट के ऊपर से अपने चूतड़ों पर फिसलते हुए महसूस हुए तो उसे थोड़ा अजीब तो लगा पर उसने कुछ कहा नहीं, वहीं नीलम आज पहली बार हिम्मत कर रही थी और उस हिम्मत के फल के रूप में उसकी ताई के मोटे मोटे तरबूज उसके हाथ में थे, पर कुछ देर बाद ही उसे हटना पड़ा क्योंकि उसकी मां भी नहाने के लिए आ गई थी, और वो उठकर एक ओर को जा कर बैठ गई, पर उसकी नज़रें बार बार पुष्पा और सुधा के बदन को देख रही थी,

एक पेड़ के नीचे बैठ कर सोमपाल और कुंवरपाल बातें कर रहे थे, कुंवरपाल ने तंबाकू बनाई और सोमपाल की ओर हाथ बढ़ाते हुए कहा: भेंचोद समझ नहीं आता आखिर प्यारे के साथ हुआ क्या?

सोमपाल ने तंबाकू उठाकर दांतों के नीचे दबाई और मुंह बनाते हुए बोला: मुझे तो लगता है ग्लानि भाव में आकर आत्महत्या तो नहीं करली उसने, धतूरा वगैरह खा लिया हो क्या पता?

कुंवरपाल: हो सकता है, वैसे बुरा तो मुझे भी बहुत लगा था कि रत्ना बहू के साथ वो सब किया।

सोमपाल: बुरा मैं तो आजतक तबसे उसके सामने नहीं गया हूं। डर भी लगा रहता है कि कहीं उसने किसी को बता दिया तो हमारा क्या होगा?

कुंवरपाल: धत्त वो किसी को नहीं बताएगी।

सोमपाल: तुझे ऐसा क्यों लगता है?

कुंवरपाल: अरे सोच अगर हमें मर्द होते हुए इतना डर है तो वो तो बहू है उसका क्या होगा। दूसरी बात कि उसके खुद के ससुर के साथ संबंध होना और फिर ससुर का अचानक गुजर जाना, बहुत सवाल उठेंगे उस पर।

सोमपाल: अरे हां यार तभी वो भी बिल्कुल चुप है।

कुंवरपाल: बोलने में उसका ही नुकसान है।

सोमपाल: वैसे अब जब सोचता हूं और ईमानदारी से कहूं तो है बड़ी कमसिन, उस रात मज़ा तो बहुत आया था।

कुंवरपाल: अरे बुढ़ापे में उल्टी ही बात करियो तू।

सोमपाल: अच्छा सही सही बता तुझे मज़ा नहीं आया?

इस बात पर कुंवर पाल चुप हो गया,

सोमपाल: बालपन से जानता हूं तुझे बुड्ढे, तेरी ठरक कितनी है सब जानता हूं,

कुंवरपाल: अरे है तो क्या करूं? साले तेरे पास तो जुगाड़ है हम तो खाली हैं।

सोमपाल: जुगाड़ है कैसा जुगाड़ है?

कुंवरपाल: क्यों भौजी नहीं है?

सोमपाल: वो इस उमर में हाथ भी नहीं लगाने देती एक बार कोशिश की तो बरस पड़ी उल्टा बोली इस उमर में ये सब हरकतें अच्छी लगती हैं क्या।

कुंवरपाल: अरे ये भेंचोद सब उमर के पीछे पड़े रहते हैं उमर हो गई तो क्या हुआ लोड़ा तो अब भी खड़ा होता है।

सोमपाल: वही तो पर ये बात तेरी भौजी माने तो।

कुंवरपाल: वैसे अगर सोचा जाए तो एक जगह काम बन सकता है पर खतरा भी है

सोमपाल: कहां? और क्या खतरा है?

कुंवरपाल: वहीं रत्ना बहू।

सोमपाल: ससुरे बावरा हो गया है तू? बड़ी मुश्किल से एक बार फंद छूटा और तू चूतियों वाली बात कर रहा है।

कुंवरपाल: अरे अभी समझाया तो कि वो किसी को कहेगी नहीं तो अपना फायदा ही है, और उसे भी डर होगा कि हम लोग किसी को न कुछ कहें तो मानेगी भी जल्दी।

सोमपाल: जो भी हो मुझे फिर भी ठीक नहीं लग रहा!

कुंवरपाल: अभी थोड़ी देर पहले खुद ही बोल रहा था न कि मज़ा तो आया था पर जरा सा खतरा दिखा तो गांड लुप लुप करने लगी तेरी।

सोमपाल: बात वो नहीं है देख उसके साथ एक बार किया और प्यारे चल बसा, मुझे तो लगता है हमें उससे दूर ही रहना चाहिए।

कुंवरपाल को भी सोमपाल की ये बात सही लगी और बोला: फिर और क्या करें हिलाते रहें बस।

सोमपाल: अरे तालाब में और भी मछलियां हैं ये नहीं तो कोई और सही।

कुंवरपाल: पर अब स्वाद तो किसी बहू का ही चखना है, गरम बहू में जो मज़ा है वो किसी में नहीं।

सोमपाल: फिर किस पर नज़र है तेरी?

कुंवरपाल: अरे कितनी बहुएं हैं गांव में कोई भी मिल जाए।

कुंवरपाल ने बात पलटते हुए कहा,

सोमपाल: हां ये भी सही कहा।

दोनों कुछ देर यूं ही बैठ कर बातें करते रहे वहीं उनके मन में बहुत से विचार घूम रहे थे।

आज तीनों दोस्तों की तिगड़ी एक साथ निकली थी पशुओं को चराने। पशु जहां एक ओर चर रहे थे वहीं ये तीनों पेड़ की छांव में बैठ कर गप्पें मार रहे थे, छोटू शहर की कहानियां बताने में लगा हुआ था और भूरा और लल्लू ध्यान से सुन भी रहे थे, भूरा के चेहरे पर थोड़ी चिंता नज़र आ रही थी,

लल्लू: अरे तुझे क्या हुआ तेरा मुंह क्यों बना है?

भूरा: अरे यार सुबह ही मां के हाथ जल गए,

छोटू: हैं? कैसे?

फिर भूरा उन्हें सारी बात बताता है,

लल्लू: भेंचो कुछ तो है तेरे घर में एक के बाद एक कांड हो रहे हैं।

भूरा: वही तो यार कुछ समझ नहीं आ रहा क्या करूं

छोटू: मैं बताऊं क्या करना है?



जारी रहेगी
 
सज्जनपुर की कहानी का अगला अध्याय संख्या 16 पेज नंबर 27 पर पोस्ट की है उसे पढ़ कर रिव्यू ज़रूर लिखें और लाइक करें।

बहुत बहुत धन्यवाद
 
भूरा: अरे यार सुबह ही मां के हाथ जल गए,

छोटू: हैं? कैसे?

फिर भूरा उन्हें सारी बात बताता है,

लल्लू: भेंचो कुछ तो है तेरे घर में एक के बाद एक कांड हो रहे हैं।

भूरा: वही तो यार कुछ समझ नहीं आ रहा क्या करूं

छोटू: मैं बताऊं क्या करना है?



अध्याय 30


भूरा ने सिर खुजाते हुए कहा, “बता यार, क्या करना है? तेरे पास कोई उपाय है तो बोल न।”

छोटू मुस्कुराया, आँखों में शरारत चमक रही थी, “उपाय तो है, लेकिन थोड़ी हिम्मत दिखानी पड़ेगी तुझे।”

भूरा अधीर हो गया, “अरे बता न क्या करना है, घुमा-फिरा के मत बोल!”

छोटू ने धीरे से आगे झुककर फुसफुसाया, “देख, ताई का हाथ जला है ना? अभी सही मौका है। उनके पास जा, सेवा कर, पास बैठ। मौका मिले तो धीरे-धीरे हाथ लगाना शुरू कर। पहले कंधे पर, फिर कमर पर… और आगे बढ़ता जा।”

भूरा चौंककर बोला, “अरे तू भी चूतिया है क्या? अभी उन्हें इतनी तकलीफ है और तुझे चुदाई की योजना सूझ रही है?”

लल्लू तुरंत बीच में पड़ा, “नहीं भूरा, ये बिल्कुल सही कह रहा है। ये सबसे सही समय है। दोनों का फायदा होगा।”

भूरा ने भौंहें चढ़ाईं, “कैसा फायदा?”

छोटू ने आँख मारते हुए कहा, “देख, तुझे ताई के बदन को छूने का मौका मिलेगा। और तूने खुद कहा था ना कि ताई का ध्यान हमेशा भटका रहता है, सोच में डूबी रहती है। तो उनका ध्यान भटकेगा तो अपने बदन पर आएगा।”

भूरा थोड़ा सोच में पड़ गया, “वो सब ठीक है… लेकिन माँ गुस्सा हो गई तो?”

लल्लू हँसा, “अरे बावरे, तू सामने से तो बोल रहा नहीं है ना। तू तो सेवा कर रहा होगा। हाथ कहीं लग जाए तो कौन गुस्सा करता है? बस हल्के-हल्के बढ़ता जा।”

भूरा ने एक गहरी साँस ली और धीरे से बोला, “कह तो ठीक रहे हो तुम दोनों…”

छोटू ने उसकी पीठ थपथपाई, “बस बेफिक्र होकर आगे बढ़। कब कितना करना है, ये तू खुद देख लेना।”

उसी जंगल के दूसरे कोने में, घने पेड़ों के बीच एक मजबूत, हट्टा-कट्टा आदमी कुल्हाड़ी चला रहा था। उसकी धोती कमर पर लिपटी हुई थी, ऊपर का बदन नंगा, पसीने से चमकता हुआ चौड़ा सीना और तारदार कंधे लकड़ियों पर बेरहमी से वार कर रहे थे।

थोड़ी दूर पर, आग के चूल्हे के पास एक पतला-दुबला सा आदमी था जो ईंटों के बनाए चूल्हे पर भगोने में कुछ उबाल रहा था।

आदमी ने खाँसते हुए कहा, “क्या से क्या हो गया उस्ताद… जीवन में कहाँ अपनी ऐश थी। लोग डर से काँपते थे, सेवा करने के लिए लाइन लगाते थे। और आज देखो भेंचोद… जंगल में लकड़ियाँ काट रहे हैं।”

आदमी ने कुल्हाड़ी एक जोरदार वार से लकड़ी चीरते हुए गहरी आवाज़ में कहा, “समय समय की बात है झींगुर। वो भी अपना समय था, ये भी अपना समय है।”

झींगुर ने चूल्हे में फूँक मारते हुए कड़वाहट से बोला, “कैसा झांटों जैसा समय है उस्ताद! महान डाकू कालराज… जिसके नाम से लोगों की पजामी गीली हो जाती थी। पुलिस वाले भी थर-थर काँपते थे। सरकार ने लाखों का इनाम रखा था तुम्हारे सिर पर!”

कालराज ने पसीना पोंछते हुए ठंडी साँस ली, “पच्चीस लाख… पूरा पच्चीस लाख।”

झींगुर ने गुस्से में भगोना हिलाते हुए कहा, “बताओ न… पच्चीस लाख का इनाम! पर वो साला मंत्री नरक में जाए, जिसने पूरी पुलिस की फौज हमारे पीछे लगा दी। एक-एक आदमी मर गया हमारा। सारा खजाना गया, बचे तो हम दोनों… और भागकर आ फँसे इस सुनसान जंगल में।”

कालराज ने कुल्हाड़ी एक तरफ रख दी और बैठते हुए बोला, “तू ऐसे ही रोता रहेगा?”

झींगुर ने कंधे उचकाए, “और क्या करूँ उस्ताद? पर तुमने भी सही नहीं किया। मंत्री को तो बदला लेना ही था… तुमने उसकी बहन और पत्नी दोनों को एक साथ चोद दिया!”

कालराज की आँखों में पुरानी चमक लौट आई। वो हँसा, “अब तू तो जानता है झींगुर… तेरे उस्ताद की बस एक ही कमज़ोरी है — औरत। और तूने खुद देखा था न… दोनों कितनी मस्त थीं। चलती-फिरती मलाई की दुकान।”

झींगुर हिहीहा कर हँसा, “सही कहा उस्ताद… दोनों ही मलाई की दुकान थीं।”

फिर उसने भगोना उतारते हुए कहा, “चलो उस्ताद, खा लो। खाना पक गया है।”

कालराज ने एक गहरी साँस ली, “पेट की भूख तो मिट जाएगी झींगुर… पर ये बदन की भूख… बहुत दिन हो गए कुछ भी चखे हुए।”

झींगुर ने उदासी से सिर हिलाया, “यही तो रोना है उस्ताद। तुम चखते थे तो झूठन मुझे भी मिल जाती थी। अब क्या करें… यहाँ से निकलें तो बाहर मंत्री और उसकी फौज खड़ी है। देखते ही हमारी गांड छलनी कर देंगे।”

कालराज ने आँखें सिकोड़ीं और शांत लेकिन खतरनाक स्वर में बोला, “कोई बात नहीं झींगुर… थोड़ा संयम रख। कुछ न कुछ जुगाड़ ज़रूर निकलेगा।”

शाम ढल चुकी थी। सूरज लाल होकर डूब रहा था। रत्ना घूंघट निकाले केलालाल की कुटिया की ओर बढ़ रही थी।

केलालाल ने उसे आते देखा तो चेहरे पर मुस्कान आ गई। उसने उसे अंदर ले जाकर बिठा दिया। रत्ना अभी भी घूंघट किए सिर झुकाए बैठी थी।

केलालाल ने धीरे से पूछा, “अब बता बहू, क्या बात है? खुलकर बोल।”

रत्ना ने हिचकिचाते हुए कहा, “बाबा… आप तो जानते हैं, कुछ समय से मुझे अजीब-अजीब से सपने आ रहे हैं। बहुत परेशान कर रहे हैं।”

केलालाल: “कैसे सपने? खुलकर बता बहू।”

रत्ना और भी घबरा गई। वो खुद के सामने भी उन सपनों के बारे में बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी।

“जी बाबा… वो… गलत तरह के सपने हैं। गलत-गलत चीजें… करते हुए।”

केलालाल ने मुस्कुराते हुए पूछा, “गलत चीजें मतलब… पति-पत्नी के बीच जो होता है वो?”

रत्ना शर्म से लाल हो गई और सिर्फ सिर हिला दिया।

केलालाल: “इसमें गलत कुछ नहीं बहू। ये सब जीवन का हिस्सा है। सपने तो आएंगे ही।”

रत्ना: “पर बाबाजी… वो सपने गलत लोगों के साथ आते हैं।”

केलालाल के कान खड़े हो गए, “गलत मतलब… राजकुमार के अलावा किसी और के साथ?”

रत्ना ने चुपचाप सिर हिला दिया।

केलालाल ने सोचने का नाटक किया और बोला, “थोड़ी विचित्र समस्या है बहू। अच्छा… ये सपने तुझे तभी से आने शुरू हुए हैं न, जबसे प्यारेलाल की मृत्यु हुई?”

रत्ना: “जी बाबा।”

केलालाल: “मुझे तो लगता है तेरे ससुर की आत्मा को शांति नहीं मिल रही, इसलिए तुझे ऐसे सपने आ रहे हैं।”

रत्ना और घबरा गई, “तो फिर बाबा… अब क्या होगा? उनकी आत्मा को शांति कैसे मिलेगी?”

केलालाल: “घबरा मत। वो अकेले थे, तेरी सास बहुत पहले गुजर गई। उनकी अधूरी इच्छाएँ… खासकर आखिरी समय की… वही सपनों में तुझे दिख रही होंगी।”

रत्ना को अचानक वो दोनों रातें याद आ गईं, जब उसके और ससुर के बीच जो कुछ हुआ था।

रत्ना: “तो बाबा… कोई उपाय बताइए न।”

केलालाल: “एक उपाय है। तुझे एक टोटका करना होगा।”

रत्ना राहत की साँस लेते हुए बोली, “बताइए बाबा, मैं सब करूँगी।”

केलालाल: “कल सुबह भोर में उठकर जंगल में उस पुराने बरगद के पेड़ के पास चली जाना। ध्यान रहे, कोई तुझे आते हुए न देखे। बहुत सावधानी से करना है।”

रत्ना: “वहाँ पहुँचकर क्या करना होगा?”

केलालाल के चेहरे पर शैतानी मुस्कान फैल गई। वो मन-ही-मन सोच रहा था — ‘सुबह अकेले आने को तैयार है, तो काम बन गया।’

“चिंता मत कर, मैं भी वहीं मिलूँगा। आगे की सारी प्रक्रिया समझा दूँगा।”

रत्ना: “ठीक है बाबा, मैं समय पर आ जाऊँगी।”

वो उठने लगी तो केलालाल ने रोका, “अरे बहू, सुन तो।”

उसने एक पुड़िया निकाली और बोला, “ये चूर्ण पानी में मिलाकर लेप बना लेना। सोने से पहले पूरे बदन पर लगा लेना। कोई हिस्सा न छूटे।”

रत्ना: “ठीक है बाबा।”

रत्ना पुड़िया लेकर चली गई। केलालाल के चेहरे पर पूरी शैतानी मुस्कान फैल गई। उसकी धोती में लंड फड़फड़ा उठा। मन-ही-मन बोला, “अरे बहू, तेल लगा तो सही… फिर देख तू रात भर कैसे तड़पेगी। सुबह तेरी तड़प मैं बुझाऊँगा।”

शाम हो चुकी थी। सत्तू उदास मन से घर लौट रहा था। आज फिर उसने आम के बाग में नंदिनी का घंटा भर इंतजार किया, लेकिन वो नहीं आई। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वो उसे अनदेखा क्यों कर रही है।

उसकी आँखों के सामने बार-बार सुबह का वो दृश्य घूम रहा था — माँ का नंगा, मादक बदन। वो चाहकर भी उसे भूल नहीं पा रहा था। घर पहुँचकर उसने कोशिश की कि अपनी नजर माँ झुमरी के बदन से दूर ही रखे।

अंधेरा हो चुका था। रत्ना के घर सब खा-पीकर बिस्तरों पर जा चुके थे। राजकुमार चबूतरे पर, राजू छत पर और बाकी — रानी, रत्ना और भूरा — आंगन में सो रहे थे।

रानी आंगन में बिस्तर लगा रही थी। जैसे ही भूरा का बिस्तर लगा, वो उछलकर उस पर पसर गया।

रानी: “मदद तो करनी नहीं, बस उछलकर पसर जाना है!”

भूरा: “अरे जीजी, बहुत थक गया हूँ मैं।”

रानी: “हाँ थकेगा ही… पूरे दिन हांडने में लगा रहता है दोस्तों के साथ।”

भूरा ने ताने अनसुना कर आँखें बंद कर लीं।

इधर रत्ना कमरे में थी। उसने साड़ी और सारे कपड़े उतार दिए थे। सिर्फ एक पुरानी धोती कमर पर लपेट रखी थी और ऊपर से पूरी नंगी होकर केलालाल वाले तेल को अपने बदन पर लगा रही थी। हाथों को बदन पर फेरते हुए उसे एक अजीब सा सुकून और उत्तेजना दोनों महसूस हो रही थी।



इतने में किवाड़ खुला और रानी अंदर आ गई। अपनी माँ को इस हाल में देखकर वो थोड़ी हैरान रह गई। हालांकि उसने माँ की नंगी छाती पहले भी कई बार देखी थी, लेकिन तेल मलते हुए देखकर जिज्ञासा हो गई।

रानी ने पीछे से किवाड़ बंद करते हुए पूछा, “ये क्या कर रही हो माँ? ये तेल क्यों लगा रही हो?”

रत्ना चौंक गई, थोड़ा घबरा भी गई, “वो… तेरे पापा लाए थे शहर से। कहते थे इससे दिन भर की थकान दूर हो जाती है।”

रानी: “अच्छा! फिर तो बढ़िया तेल है। लाओ, मैं लगा देती हूँ।”

रत्ना: “अरे मैं लगा लूंगी, तू क्यों हाथ खराब करेगी।”

रानी नहीं मानी। उसने माँ को खाट पर बिठाया और तेल लेकर उनके कंधों, कमर और छाती पर मलने लगी।

रानी के नरम हाथ रत्ना के बदन पर फिसल रहे थे। रत्ना को अंदर से गर्मी और उत्तेजना का सिलसिला शुरू हो गया। वो आँखें बंद करके बेटी के हाथों का स्पर्श महसूस करने लगी।



रानी को भी अपनी माँ के नंगे बदन को छूते हुए एक अजीब सी सिहरन हो रही थी।

रानी: “आराम मिल रहा है माँ?”

रत्ना आह भरते हुए बोली, “आह… बहुत अच्छा लग रहा है बिटिया… तेरे हाथों में जादू है।”

रानी: “अरे जादू हो या न हो, आराम तो मिलना चाहिए… ओहो!”

रत्ना: “क्या हुआ?”

रानी: “साड़ी पर तेल लग रहा है।”

रत्ना: “इसीलिए तो कहा था रहने दे…”

रानी: “कोई बात नहीं। रुको, साड़ी निकाल देती हूँ।”

रानी ने अपनी साड़ी उतार दी। फिर ब्लाउज़ भी उतार दिया और सिर्फ पेटिकोट में रह गई। अब दोनों माँ-बेटी लगभग नंगी थीं।

रानी: “लाओ माँ, अब पैरों की मालिश कर दूँ।”

रत्ना ने थोड़ी ऊपरी मन से ना नुकूर की पर फिर चुपचाप बैठ गई और पैर फैला दिए, रानी सामने बैठ गई और रत्ना की धोती थोड़ी ऊपर सरकाकर पैरों पर तेल मलने लगी।



तेल का असर दोनों पर होने लगा। रत्ना की उत्तेजना बढ़ती जा रही थी। उसकी नजर अनजाने में अपनी बेटी की नंगी छाती पर रुक रही थी। रत्ना के बदन पर ज्यों ज्यों तेल लग रहा था उसकी गर्मी और उत्तेजना बढ़ती जा रही थी साथ ही उसके अंदर एक प्यास उठ रही थी कि उसके बदन को कोई छुए, उसे अपनी बेटी का स्पर्श अपने बदन पर बहुत भा रहा था उसकी आँखें अनजाने में ही बेटी के नंगे ऊपरी बदन खासकर उसकी छाती पर घूम रही थी, वहीं रत्ना के हाथ रानी के हाथों को सहला रहे थे,

रानी ने जब ये देखा तो बोली: अरे मां तुम तो मेरी भी मालिश करने लगी, वैसे लगा दो थकान तो मुझे भी लग रही है।

रत्ना ये सुनते ही मन ही मन खुश हो गई उसे भी नहीं पता क्यों वो तुरंत अपनी बेटी के बदन पर तेल भरे हाथ फिराने लगी, वो मानो भूल ही गई कि ये तेल उसे केलालाल ने दिया था अभी तो उसके लिए उसके बदन की इच्छा सबसे जरूरी लग रही थी, रत्ना तुरंत रानी के बदन पर तेल लगाने लगी,



रानी को पहले तो कुछ इतना अजीब नहीं लगा पर जब उसके भी बदन पर तेल का असर होने लगा तो वो भी मचलने लगी, क्योंकि रानी जवान थी अधिक कामुकता उसके अंदर थी इसलिए उसका असर भी रानी पर अधिक हो रहा था, रानी के बदन में एक गर्मी और एक बेचैनी सी होने लगी उसे एक प्यास सी जागने लगी कि उसके बदन को अच्छे से मसला जाए।

दोनों ही मां बेटी अपनी अपनी उत्तेजना से अंदर ही अंदर संघर्ष कर रही थी, पर अपनी अपनी उत्तेजना से लड़ रही थी,

रानी: मां पैर तो हो गए, और कहीं भी करनी है,

रत्ना कहना तो बहुत कुछ चाहती थी पर खुद को संभालते हुए उसने कहा: नहीं रहने दे अब मैं लगा लूंगी बिटिया बस पीछे कूल्हे पर बचा है,

रानी के मुंह से अनजाने ही निकल गया: अरे तो क्या हुआ मैं लगा देती हूं,

रानी बोलकर सोच में खुद पड़ गई कि उसने क्या बोल दिया,

रत्ना जो खुद इतनी उत्तेजित थी ऐसे निमंत्रण को कैसे नकारती,

रानी ने जो खुद हैरान थी पर उसे ये सब भा रहा था वो नहीं जानती थी क्यों,

रानी: मां ऐसा करो खटिया पर ही लेट जाओ पेट के बल।

रत्ना: ठीक है बिटिया,

रत्ना जैसे ही खड़ी हुई उसकी पुरानी धोती जो ढीली हो चुकी थी कमर से खुल गई और नीचे सरक गई और रत्ना पूरी नंगी हो गई अपनी बेटी के सामने, उसे भी आभास हुआ धोती के गिरने का और रानी को भी पर न उसने अपनी धोती को उठाने की कोशिश की और न ही रानी ने उसे कुछ बोला उसकी नजरें तो अपनी मां के नंगे बदन पर थी हर बढ़ते पल के साथ दोनों की उत्तेजना बढ़ती जा रही थी,

रत्ना खाट पर पेट के बल लेट गई तो रत्ना भी अपनी मां के नंगे बदन को देखते हुए खाट पर बैठ गई, धीरे से उसने हाथ बढ़ा कर अपनी मां के चूतड़ों पर रखे, और मालिश करने लगी, उसकी मां केेभरे हुए चूतड़ों को हाथों से मसलने में उसे अलग ही आनंद मिल रहा था,



उसकी थोड़ी सी खुली जांघों के बीच लालटेन की हल्की दी रोशनी में उसे हल्की दरार नज़र आ रही थी जिसे देख उसकी खुद की जांघों के बीच नमी हो रही थी, ये वही दरार थी जिसमें से वो निकली थी, उसने दोनों हाथों से चूतड़ों को मसलते हुए उन्हें फैलाया तो उसकी मां की गांड का वो भूरा और कसा हुआ छेद भी उस हल्का हल्का नज़र आया जिसे देख कर रानी के पूरे बदन में आग सी लग गई अब उसके लिए रुकना मुश्किल हो गया, उसका पूरा बदन उत्तेजना में जलने लगा, फिर भी किसी तरह वो खुद को संभालते हुए अपनी मां के चूतड़ों से खेलती रही। पर कुछ पल बाद उसके लिए सहना मुश्किल हो गया और वो तुरंत ऊपर खाट पर चढ़ कर रत्ना की पीठ पर लेट गई। उसकी गहरी सांसे रत्ना को अपनी पीठ पर महसूस हो रही थी, और रत्ना पागल होती जा रही थी,

रानी : आह मां तुम बहुत सुंदर हो आह तुम्हे देख कर मुझे कुछ हो रहा है,

रत्ना: ओह बिटिया मुझे भी बहुत कुछ हो रहा है तेरे साथ से, तेरे छूने से।

रानी: मां मन कर रहा है मैं तुम्हें खा जाऊं आह्ह्ह्ह उम्ह।

ये कहते हुए रानी अपनी मां की पीठ को चूमने लगी, चाटने लगी, और रत्ना उसके चूमने से बिल्कुल पागल सी होने लगी,



रत्ना: ओह बिटिया आह ऐसे ही आह्ह्ह्ह चाट अपनी मां को आह मां ओह्ह्ह्ह बिटिया आह्ह्ह्ह,

रानी तो अपनी मां की पूरी पीठ को पागलों की तरह चाट रही थी, वो मानो बदन के हर हिस्से का स्वाद अपनी जीभ से चखना चाह रही थी, उसके हाथ रत्ना की कमर से लेकर उसके चूतड़ों तक पहुंच रहे थे और फिर वो आगे घूम कर उसकी चूचियों तक पहुंच गए, रानी ने अपनी मां की चूचियों को हाथों में भर लिया तो रत्ना की छाती ऊपर उठ गई, रानी बिना उसकी पीठ से होंठों को हटाए उसकी चूचियों को मसलने लगी।

रत्ना के लिए अब सहना मुश्किल होता जा रहा था वो गहरी सांसे भरते हुए बोली: आह बिटिया उठ तो थोड़ा सा मुझे पलटने दे। मुझे तुझे देखना है,

रानी ये सुन फुर्ती से खड़ी हुई और जब तक रत्ना पलटती रानी ने अपना पेटीकोट भी बिजली की रफ्तार से उतार फेंका, रत्ना जैसे ही सीधी हुई उसकी मोटी चूचियां, पेट और पूरा बदन तेल से भीगा हुआ चमक रहा था, रानी से और सब्र नहीं हुआ वो फिर से अपनी मां के ऊपर लेट गई और इस बार दोनों के होंठ आपस में मिल गए और दोनों मां बेटी एक दूसरे के होंठों को पागलों की तरह चूसने लगी,



रानी के हाथ अपनी मां के पेट और फिर पेट से नीचे होते हुए उसकी मां की गीली रसभरी चूत तक पहुंच चुके थे, जैसे ही रानी की उंगलियों में रत्ना की चूत के होंठों को छुआ रत्ना के पूरे बदन में बिजली दौड़ गई उसका बदन अकड़ने लगा, इसके होंठों की कसावट और बढ़ गई, रत्ना के ऊपर लेटने और नंगे बदन के रगड़ने से रानी के भी अब पूरे बदन पर तेल लग चुका था, और अब उसकी उत्तेजना भी नियंतण से बाहर हो रही थी,

दोनों के मुंह एक दूसरे से चिपके हुए थे,

और फिर अचानक से रत्ना का मुंह खुला का खुला रह गया, क्योंकि रानी की उंगलियां उसकी चूत में घुस चुकी थी, रानी ने अपनी मां को ऐसे देखा तो उसके खुले मुंह में अपनी जीभ घुसा दी, उसे समझ नहीं आ रहा था कि इतनी हिम्मत और ऐसा कुछ करने की प्रेरणा उसे कहां से आ रही थी मानो लग रहा था कि कोई उससे सब करवा रहा था,

वहीं रानी की उंगलियां रत्ना की चूत में अंदर बाहर होने लगी और रत्ना पागलों की तरह आहें भरने लगी, रानी सीधी हो गई और अपनी मां की चूत में उंगलियां चलाने लगी,



रत्ना की हालत हर बढ़ते पल के साथ बिगड़ती जा रही थी ऐसी उत्तेजना ऐसा आनंद उसने कभी महसूस नहीं किया था, रानी तो एक नशे में थी और अपनी मां के कामुक बदन का आनंद उठा रही थी, उसकी चूत में उंगली कर रही थी जिस चूत से बरसों पहले वो निकली थी,

रत्ना: ओह ओह ओह बिटिया आह आह आह बिटिया आह ओह्ह्ह्ह,

रानी: मज़ा आ रहा ह ना मां आह ओह मां ओह्ह्ह्ह कितनी गरम चूत है तुम्हारी आह आह ओह आह आज सारा रस निकाल लूंगी आह चोद चोद कर।

रानी खुद को हैरान कर रही थी क्योंकि शायद ही कभी उसने खुद से कभी इतने गंदे शब्दों को अपने मुंह से नहीं निकाला था और आज अपनी मां के सामने उसकी चूत को उंगलियों से चोदते हुए वो ऐसे बोल रही थी और सोच कर उत्तेजित भी हो रही थी।

इसी बीच बाहर अचानक से भूरा की नींद खुली जैसे एक हवा झोंका उसे जगाकर गया हो, वो तुरंत उठ कर बैठ गया, उसने हल्की सी आंखें खोल कर इधर उधर देखा तो उसकी नज़र अपने बगल में बिछे हुए खाली बिस्तरों पर गई, वो सोचने लगा इस समाय पर उसकी मां और जीजी कहां जा सकती है, और फिर हल्की सी आवाज़ कमरे से सुनाई दी उसने मूड कर देखा तो लालटेन की रोशनी किवाड़ के नीचे से चमक रही थी, वो सोचने लगा कि इस समय मां और जीजी जाग कर क्या कर रहे हैं, वो सोचते हुए उठा कमरे की ओर कदम बढ़ाया और फिर रुक गया, और बापिस बाहर की तरफ मुड़ गया, और चबूतरे पर बनी मोरी के पास जाकर मूतने लगा और फिर घर के अंदर आया और फिर कमरे की ओर बढ़ा। ज्यों ज्यों करीब जा रहा था आवाजें और तेज होती जा रही थी उसकी मां की आवाजें थी जैसे वो किसी परेशानी में थी ये सोच उसके सीने में धक धक होने लगी दो कदम आगे बढ़ा कर उसने किवाड़ों को हल्का सा धकेला और कमरे के भीतर का नज़ारा उसके सामने आ गया, उसकी आँखें फैल गई, मानो उसके नीचे की ज़मीन खिसक गई अन्दर का नज़ारा देख कर,

कमरे के अंदर उसकी मां और बहन एक दूसरे के ऊपर बिल्कुल नंगी तेल में नहाई हुई घोड़ी बनी हुई थी नीचे उसकी मां थी और ऊपर उसकी जीजी, और एक बिल्कुल नंगा लड़का उनके पीछे था और अपना लंड उसकी जीजी की चूत में घुसा रहा था,



ये देख कर तो भूरा के होश उड़ गए ऐसा दृश्य तो उसने सपने में भी नहीं सोचा था कि तभी वो जो लड़का उन्हें चोद रहा था उसने अपना चेहरा घुमा कर भूरा की ओर देखा और उसका चेहरा देखते ही भूरा के होश उड़ गए और मानो उसका सिर चकराने लगा।।।



जारी रहेगी
 
ये देख कर तो भूरा के होश उड़ गए ऐसा दृश्य तो उसने सपने में भी नहीं सोचा था कि तभी वो जो लड़का उन्हें चोद रहा था उसने अपना चेहरा घुमा कर भूरा की ओर देखा और उसका चेहरा देखते ही भूरा के होश उड़ गए और मानो उसका सिर चकराने लगा।।।

अध्याय 31


भूरा उस लड़के की ओर देख रहा था जो उसकी मां और बहन को एक साथ चोद रहा था और उसका सिर इसलिए चकरा गया क्योंकि वो कोई और नहीं वो चेहरा उसके मृतक दादा प्यारेलाल का था शरीर एक जवान लड़के का और चेहरा उसके दादा का वो ये देख हैरान रह गया और तभी जैसे उसके दादा का चेहरा उसकी ओर आया भयानक तरीके से हंसते हुए और डर से भूरा की आँखें बंद हो गईं, और उसकी नींद खुल गई, उसका चेहरा पसीने से भीगा हुआ था, वो हांफ रहा था, उसने इधर से देखा और उसे अंदाज़ा हुआ कि ये मात्र एक सपना था, वो सोचने लगा कितना अजीब सा सपना था तभी उसकी नजर अपने बगल में पड़े खाली बिस्तरों पर गई, वो तुरंत उठ कर बैठ गया दोनों ही बिस्तर खाली थे, ये तो बिल्कुल उसके सपने जैसा था उसका सीना तेजी से धड़कने लगा, मन को संभालते हुए वो बिस्तर से खड़ा हुआ और कदम बढ़ाते हुए कमरे की ओर चलने लगा, हर कदम पर उसके मन में ढेरों विचार घूम रहे थे, उसका दिमाग आगे क्या होगा ये सोच कर पागल हो रहा था कहीं वही तो नहीं जो उसने अभी सपने में देखा था, वो कमरे के द्वार के पास पहुंचा किवाड़ के नीचे से लालटेन की रोशनी आ रही थी, जिसे देख उसके सीने में धक से हुई, उसने ऊपरवाले को याद करते हुए तुरंत आगे किवाड़ के बीच में से झाँका तो सामने देख कर उसकी आँखें फैल गईं सामने उसकी मां और बहन बिल्कुल नंगी एक दूसरे के बदन से लिपटी हुई थी, होंठ आपस में मिले हुए थे उनके बदन तेल से लालटेन की रोशनी में चमक रहे थे



ये देख तो भूरा का पूरा दिमाग ही हिल गया, उसकी मां और बहन उस हालत में इस तरह से एक दूसरे के साथ ये सब कर रही हैं, उसे लग रहा था उसे चक्कर आ जायेगें, उसका हाथ किवाड़ पर लग गया, और अचानक किवाड़ थोड़ा सा खुल गया, दोनों रत्ना और रानी की नज़र भूरा पर पड़ी और दोनों ही ज्यों की त्यों जम गईं, सब एक दूसरे को देख रहे थे, पर तेल के कारण दोनों की उत्तेजना इतनी बढ़ी हुई थी कि वो चाह कर भी रोक नहीं सकती थी खुद को, भूरा को देख रानी अपनी मां के ऊपर से उठ गई और बिलकुल नंगी चलती हुई भूरा की ओर आई, भूरा तो हैरान रह गया उसकी नंगी बहन उसकी ओर बढ़ रही थी, चेहरे पर प्यास और आंखों में एक नशीला एहसास था, भूरा को समझ नहीं आ रहा था वो क्या करे, वो ज्यों का त्यों खड़ा हुआ अपनी नंगी बहन को अपनी ओर आते हुए देख रहा था, रानी भूरा के पास आई, उसने नशीली आंखों से भूरा की आंखों में देखा और फिर जैसे वो किसी नशे में हो आगे बढ़ कर उसने अपने होंठ भूरा के होंठो से मिला दिए, और अपनी बहन के होंठों का स्पर्श पाते ही भूरा के बदन में मानो बिजली दौड़ गई, उसे ऐसा लग रहा था मानो उत्तेजना का तूफान उसके बदन में समाता जा रहा है, ऐसी उत्तेजना ऐसी हवस जो आज तक उसने महसूस नहीं की थी, अगले ही पल वो सब भूल कर रानी के होंठो जो चूसने लगा, रानी भी पूरी आक्रामकता के साथ अपने भाई के होंठों को चूस रही थी, वहीं रत्ना बिस्तर पर नंगी लेटी हुई अपने बेटे और बेटी को इस पाप भरे मिलन में लिपटे हुए देख रही थी, पर उसके मन में अभी कोई और भावना नहीं थी न सही गलती की न पाप की, अभी उसे सिर्फ अपने बदन की चिंता थी जो उत्तेजना में जल रहा था, उसकी खुद की उंगलियां उसकी रसभरी चूत को सहला रही थी वहीं रानी और भूरा बिस्तर के पास आ चुके थे दोनों के होंठ अभी भी अलग नहीं हुए थे, रत्ना भी अपने जवान बेटे को पास देख कर उठ गई और उठकर पीछे से उससे चिपक गई अपनी माँ की चूचियों को पीठ पर महसूस कर भूरा के होंठ रानी के होंठों पर और कस गए, वहीं रत्ना ने तो पीछे से भूरा के कपड़ों को उतारना शुरू कर दिया, पहले उसकी शर्ट गई और फिर उसका निक्कर, और फिर रत्ना बेटे के पीछे बैठ गई, अपनी उंगलियों को उसके कच्छे में फंसाया और नीचे खिसका दिया, वहीं भूरा और रानी के होंठ अलग हो चुके थे पर भूरा का मुँह तुरंत रानी की एक चूची से भर गया था। जिसे वो प्यासों की तरह चूस रहा था और रानी उसके सिर को अपने सीने में दवाए हुए मचल रही थी,

रत्ना ने भूरा के कच्छे को उतार उसे पूरा नंगा कर दिया था उसके सामने उसके बेटे के चूतड़ थे, छोटे छोटे कसे हुए जिन्हें देख कर रत्ना खुद को रोक नहीं पाई और पागलों की तरह उसके चूतड़ों को चूमने लगी चाटने लगी।

भूरा ने ऐसा कभी महसूस नहीं किया था वो अपनी बहन की चूचियां चूस रहा था वहीं उसकी मां उसके चूतड़ों को चूम रही थी, भूरा का लंड बिलकुल पत्थर जैसा कड़क हो चुका था, वहीं रानी ने भूरा के मुंह को एक चूची से हटाकर दूसरी पर लगा दिया

वहीं उसने जब अपनी मां को अपने भाई के चूतड़ों को चाटते चूमते देखा तो उसने हाथ लेजाकर अपनी मां के सिर के पीछे लगाया और उसे भूरा के चूतड़ों में घुसा दिया, रत्ना भी बिना किसी परेशानी के जीभ निकाल कर भूरा के चूतड़ों की मांग को चाटने लगी उसकी जीभ भूरा की गांड के छेद से लेकर नीचे तक फिसल रही थी वहीं भूरा तो ये एहसास पाकर बिल्कुल मचल उठा उसका मुंह खुल गया चेहरा ऊपर की ओर उठ गया, रानी की चूची से जैसे ही उसका मुंह हटा वो भी नीचे बैठ गई, उसके चेहरे के सामने उसके भाई का कड़क पत्थर जैसा गरम लंड था और उसे देखते ही वो तुरंत उस पर टूट पड़ी उसे हाथ में पकड़ कर प्यार से और आक्रामक होकर सहलाने लगी, उसके पूरे लंड और गोलियों पर अपने तेल से सने हाथों को चलाते हुए उसे भी बिल्कुल चिकना कर दिया और फिर उसके लंड को चूमने लगी चाटने लगी, और फिर टोपे को मुंह में भर कर चूसने लगी।

भूरा तो जैसे अलग दुनिया में बह रहा था उसकी मां उसकी गांड चाट रही थी और उसकी बहन का मुंह उसके लंड पर था, भूरा उत्तेजना में पागल हुआ जा रहा था एक हाथ से वो अपनी बहन के चेहरे को अपने लंड पर दबा रहा था वहीं रत्ना तो अपने बेटे के गांड के छेद को जीभ से साफ करने पर तुली थी।

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पिछले दिन तक ये एक सामान्य मां और भाई बहन थे पर एक रात में उनका रिश्ता इतना बदल गया था कि कोई सोच भी नहीं सकता था, इस पल में उन तीनों के लिए और कुछ था ही नहीं उन्हें सिर्फ़ अपनी उत्तेजना और बदन का सुख दिखाई दे रहा था, भूरा के लिए इस दोहरे आनन्द को सहना मुश्किल हो गया और वो गुर्राते हुए अपनी बहन के चेहरे को अपने लंड पर दबाते हुए झड़ने लगा, उसने अपने लंड को रानी के गले तक उतार दिया और फिर धार के बाद धार उसके मुंह में छोड़ने लगा,

रानी जिसने आज तक अपने पति के लंड को भी मुंह तक नहीं आने दिया था आज अपने भाई का लंड गले तक ले कर तड़प रही थी उसकी आंखों से आंसू बह रहे थे, लग रहा था उसका दम घुट रहा है होंठो से थूक बह कर लटक रहा था, पर इन सब के बाद भी वो रुकना नहीं चाहती थी, रत्ना ने जब भूरा को थरथराते हुए झड़ते देखा तो वो पीछे से हट कर सामने आ गई और भूरा का लंड पकड़ कर रानी के मुंह से निकाल लिया और रानी की जान में जान आई रानी वहीं हांफते हुए लेट गई, पर रत्ना ने ऐसा अपनी बेटी की हालत पर तरस खा कर नहीं किया था बल्कि अपनी उत्तेजना के लिये किया था और भूरा के लंड को उसके मुंह से निकाल कर अपने मुंह में ले लिया था, भूरा ने झड़ते हुए एक दो धार अपनी मां के मुंह में भी छोड़ी और फिर जाकर उसका झड़ना बंद हुआ, पर झड़ना बंद हुआ वो शांत नहीं हुआ उसकी उत्तेजना और बढ़ रही थी, उसका लंड ज्यों का त्यों था झड़ने के बाद भी, भूरा ने कुछ पल अपनी मां को अपना लंड चूसने दिया फिर उसे उठाया और बिना किसी सोच विचार के या रुके उसे पीछे धकेल कर बिस्तर पर लिटा दिया और उसके पैरों के बीच आकर अपना लंड अगले ही पल अपनी मां की चूत के द्वार पर रखा, उसकी मां की चूत की गर्मी को अपने लंड पर पाकर भूरा का लंड ठुमके मारने लगा, वहीं रत्ना भी बेटे के लंड को चूत के द्वार पर पाकर बिलबिला रही थी भूरा ने खुद को और मां को और तड़पाना ठीक नहीं समझा और एक धक्का लगा कर अपना लंड अपनी मां की चूत में अंदर घुसा दिया, रत्ना का मुंह खुला और फिर खुला का खुला रह गया, उसके बेटे का लंड उसकी चूत में घुसा हुआ था, भूरा का भी मुंह खुला था आंखों में उत्तेजना का नशा था दांत पीस कर वो अपनी मां की कमर को थामे हुए था और फिर उसकी कमर अपने आप चलने लगी धीरे धीरे उसका लंड उसकी मां की चूत में अंदर बाहर होने लगा,



और उसे अहसास हुआ वो अपनी मां को चोद रहा था, उसका लंड उसकी मां की चूत में था उस चूत में जिससे कभी वो निकला था, ये एहसास होते ही उसके धक्के और तेज हो गए वहीं रत्ना जिसकी चूत एक लंड के लिए प्यासी थी वो बेटे का लंड पाकर हवस के आनंद में डूबी हुई थी, रानी भी अपनी मां को अपने भाई से चुदवाते हुए देख उनके पास आ गई थी

रत्ना: आह्ह्ह अह्ह्ह्ह सीईईईईई ओह्ह्ह्ह आह्ह्ह्ह लल्ला ओह्ह्ह्ह बेटा,

रानी बगल में बैठे हुए मां बेटे के बीच हो रहे इस वर्जित पर आनंद भरने वाले प्रेम को, इस अदभुत और कामुक दृश्य को देखते हुए अपनी गीली चूत में उंगली कर रही थी, ये मां बेटे कोई और नहीं उसके सगे भाई और मां थे, ये सोच उसकी उत्तेजना को और बढ़ा रही थी,

रानी: ओह्ह्ह्ह भूरा चोद मां को आह्ह अपने मोटे लंड से मां की चूत की प्यास बुझा दे, आह मादरचोद बन जा मेरे भाई।

शायद ही कभी रानी के मुंह से इतने गंदे शब्द निकले हों पर आज उसे ये सब सामान्य लग रहा था, यहां तक कि रत्ना और भूरा को भी।

भूरा: ओह्ह्ह्ह मां तुम्हारी चूत अह्ह्ह बहुत मस्त है और गरम भी ओह्ह्ह्ह कब से इस चूत का आनंद लेना चाहता था आज मिली है, अह्ह्ह्ह अब नहीं छोडूंगा।

रत्ना: ओह्ह्ह्ह बेटा मत छोड़ और तेज चोद, जितनी बेरहमी से चाहे चोद।

भूरा भी रत्ना की बात सुन कर उसके ऊपर आ गया और उसके पैरों को पीछे की ओर मोड़ कर अपने लंड को उसकी चूत में ठोंकने लगा



हर झटके पर रत्ना का मुंह खुल रहा था और वो आहें भर रही थी, वहीं रानी दोनों की चुदाई देख मचल रही थी, उसकी चूत की प्यास बढ़ती जा रही थी,

रानी: ओह्ह्ह्ह मां अह्ह्ह्ह भूरा ओह्ह्ह्ह मेरी चूत भी तेरे लंड के लिए तड़प रही है, आह्ह्ह्ह कब तक मां को चोदेगा अह्ह्ह्ह अपनी बहन की चूत को भी चोद भाई, अह्ह्ह्ह बहन चोद बन जा भाई।

रानी अपनी चूत में उंगली करते हुए बड़बड़ा रही थी।

भूरा: अह्ह्ह्ह अभी चोदूंगा जीजी अह्ह्ह तुम्हारी प्यासी चूत की भी तुम्हारे भाई का लंड सेवा करेगा अह्ह्ह बस पहले मां की चूत की प्यास मिटा दूं।

रानी: ओह्ह्ह्ह भाई इस रंडी की प्यास नहीं बुझेगी, अह्ह्ह्ह कितने भी लंड ले ले ये, अजग इसकी चूत प्यासी ही रहेगी पूछ ले क्यों रांड कितने लंड से तेरी प्यास बुझेगी।

रानी ने रत्ना के बालों को पकड़ कर उसकी चूची को बेरहमी से मसलते हुए कहा।

रत्ना: अह्ह्ह हां रंडी हूं मैं अह्ह्ह्ह लल्ला आह बिटिया तेरी मां रंडी है, अह्ह्ह्ह कितना भी चुद लूं मेरी प्यास नहीं बुझेगी, एक साथ तीन तीन लंड लेकर भी नहीं बुझती आह्ह्ह्ह।

रत्ना उत्तेजना में वो बोल गई जो उसे नहीं बोलना चाहिए था पर इस समय न भूरा ने इतना गौर किया न ही रानी ने,

रानी ने बस भूरा को पकड़ कर रत्ना के ऊपर से हटा दिया और उसे नीचे लिटा कर तुरंत उसके ऊपर आ गई, लंड को तुरंत अपनी चूत पर सटाया और बाकी का काम भूरा ने कर दिया और अपना लंड धक्का लगाकर नीचे से अपनी बहन की चूत में घुसा दिया और फिर बिना रुके उसे चोदने लगा,



तेल की वजह से चिकना होने के कारण लंड सटासट चूत को भेद रहा था और रानी आहें भरने लगी, अभी उसकी चूत में उसके पति के अलावा किसी का लंड घुसा था वो भी उसके सगे भाई का, रानी आहें भरते हुए सिसकने लगी।

रत्ना भी नीचे लेट तड़प रही थी, उसकी चूत से उसकी बेटी ने लंड छीन लिया था वो उसे और अपने बेटे को चुदाई करते देख रही थी, बेटे का लंड कैसे बेटी की चूत में लगातार अंदर बाहर हो रहा था,

रानी भी नीचे लगातार अपने भाई के लंड को अपनी चूत में गायब होते हुए देख रही थी,

रानी: आह्ह्ह्ह बहनचोद भाई ओह्ह्ह्ह चोद अपनी बहन को अह्ह्ह्ह कितना मोटा लंड है तेरा अह्ह्ह मेरी चूत को अंदर तक फैला रहा है, अह्ह्ह्ह

भूरा: ओह्ह्ह जीजी मुझसे ज़्यादा नसीब वाला कोई नहीं होगा अह्ह्ह्ह अह्ह्ह्ह पहले मां और अब बहन की चूत मिल गई अह्ह्ह्ह और क्या चाहिए अह्ह्ह्ह।

रत्ना: अह्ह्ह्ह अह्ह्ह्ह बेटा मुझे भी तेरा लंड चाहिए।

भूरा: मिलेगा मां बस आह्ह्ह थोड़ी देर और अह्ह्ह्ह अह्ह्ह्ह बस जीजी की चूत को अच्छे से शांत कर दूं।

रानी: अह्ह्ह्ह अह्ह्ह्ह भाई ओह्ह्ह्ह भूरा ऐसे ही आह्ह्ह्ह क्या चोदता है तू, अह्ह्ह्ह सीईईईईई ओह्ह्ह्ह ऐसा मज़ा तो तेरे जीजा ने भी नहीं दिया कभी।

भूरा: अह्ह्ह्ह जीजी आज अघ अह्ह् से मैं ही तुम्हारा खसम हूं, अह्ह्ह्ह मैं ही तुम्हारा मर्द बन कर चोदूंगा तुम्हे।

रानी: अह्ह्ह्ह भाई अह्ह्ह्ह हां तू ही मेरा खसम है अह्ह्ह्ह अब से तुझसे ही रोज़ चुदवाऊंगी अपनी प्यासी चूत ओह्ह्ह मेरा बहनचोद भाई ओह्ह्ह्ह अह्ह्ह्ह ऐसे ही आह्ह्ह्ह मैं आ रही हूं भूरा आआआह्ह्ह।

भूरा: अह्ह्ह्ह अह्ह्ह्ह जीजी अह्ह्ह्ह मज़ाआ आ रहा है झड़ जाओ अपने भाई के लंड पर।

रानी काँपते हुए अपने छोटे भाई से चुदवाते हुए झड़ने लगती उसका बदन कांपने लगता है, उसे झड़ता देख रत्ना तुरंत उठ कर उसे भूरा के ऊपर से एक ओर धकेल देती है रानी एक ओर लुढ़क जाती है रत्ना तुरंत रानी को हटा कर अपने बेटे के ऊपर आती है और उसका लंड अपनी चूत में लेकर बिना एक पल भी रुके उछलने लगती है

रानी भी झड़कर तुरंत उठ कर बैठ जाती है और अपनी मां को अपने भाई के लंड पर उछलते हुए देखती है, तेल के असर के कारण झड़ने के बाद भी उसकी उत्तेजना कम होने की जगह बढ़ ही रही थी, वो अपने बदन को हाथों से मसलते हुए अपनी मां और भाई की चुदाई देखने लगती है।

रत्ना: ओह्ह्ह अह्ह्ह्ह सीईईईईई ओह्ह्ह्ह मेरे भूरा अह्ह्ह्ह अह्ह्ह्ह मेरे बेटे ओह्ह्ह मेरे सइयां अह्ह्ह्ह तूने तो अह्ह्ह अपनी मां अह्ह्ह चोद दी आह्ह्ह्ह क्या मूसल है तेरा आह्ह ओह्ह्ह्ह पूरी चूत को भर रहा है!

भूरा: अह्ह्ह्ह मां ओह्ह्ह्ह तुम्हारी चूत भी कितनी गरम आह्ह्ह्ह और अह्ह्ह मस्त है आह्ह्ह्ह कितनी कसी हुई ओह्ह्ह है।

रानी दोनों की बातें सुनकर आगे को हुई और अपनी मां के होंठों को चूसने लगी, उसकी चूचियों को मसलते हुए कुछ पल बाद दोनों के होंठ अलग हुए तो रानी ने अपनी मां की चूचियों को बारी बारी से चूसा, नीचे से भूरा लगातार अपनी मां की चूत में धक्के लगा रहा था, अब तो उसका बदन भी तेल से सना हुआ था और उत्तेजना बढ़ती जा रही थी,



रानी ने अपनी मां की चूचियों को छोड़ा और फिर उसकी चूत के ऊपर के हिस्से को सहलाते हुए बोली: अह्ह्ह्ह मां तुम्हारी चूत में भूरा का लंड घुसता हुआ कितना अच्छा लग रहा है अह्ह्ह्ह इतना सुंदर नज़ारा मैने कभी नहीं देखा।

रत्ना: अह्ह्ह्ह हा बिटिया मैंने भी आह्ह ऐसा कभी महसूस नहीं किया अह्ह्ह्ह अपने ही बेटे के मोटे लंड को अपनी चूत में लेकर आह्ह्ह्ह मैने सुख पा लिया अह्ह्ह्ह अह्ह्ह्ह बिटिया आह्ह्ह्ह आह्ह्ह्ह आह्ह्ह्ह।

रत्ना उत्तेजित होते हुए बोली,

भूरा: ओह्ह्ह मां तुम्हारी आह्ह्ह्ह और जीजी की चूत पाकर आह्ह्ह्ह सुखी तो मैं हो गया अह्ह्ह्ह सीईईईईई ओह्ह्ह्ह।

रत्ना: अह्ह्ह्ह अह्ह्ह्ह लल्ला ऐसे ही ओह्ह्ह्ह चोदता रह अपनी मां को ओह्ह्ह्ह मैं आ रही हूं।

रत्ना की उत्तेजना हर पल के साथ बढ़ रही थी और उसी ने फिर से उसे चरम पर पहुंचा दिया, रत्ना अपने बेटे के लंड पर झड़ने लगी, थरथराते हुए, कांपते हुए उसके पैर कांप रहे थे, झड़ते हुए वो एक ओर गिर गई भूरा का लंड उसकी चूत से निकल गया, अपनी मां के हटते ही रानी ने मौका देखा और भूरा से बोली: आह भूरा आजा मुझे चोद घोड़ी बना कर अपनी बहन को,

ये कह रानी तुरंत बिस्तर के किनारे खड़ी हो कर झुक गई, भूरा ऐसी बात के लिए कैसे मना कर सकता था उसने तुरंत ही रानी के पीछे जगह ली और चोदने लगा, रत्ना झड़ने के बाद उठ कर बिस्तर पर लेट गई और जान कर अपनी टांग फैला कर अपनी बेटी के सामने अपनी रसीली चूत परोस दी, जिसे देखते ही रानी समझ गई और अपनी मां की चूत चाटने लगी, भूरा पीछे से लगातार उसे चोद रहा था,



रत्ना की आँखें भूरा से मिली हुई थी, भूरा भी अपनी बहन को चोदते हुए अपनी मां की कामुक और नशीली उत्तेजना से भरी आंखों में देख रहा था,

रत्ना: ओह्ह्ह्ह बेटा ऐसे ही चोद अपनी बहन को अह्ह्ह्ह आज दिखा दे कि तू अपनी मर्दानगी अह्ह्ह आज अपनी मां और बहन को चोद चोद कर उन्हें थका दे हमारी चूतों की प्यास बुझा दे लल्ला।

भूरा: अह्ह्ह्ह हां मां अह्ह्ह्ह अब ऐसे ही अह्ह्ह चोदूंगा तुम दोनों को अह्ह्ह्ह बिना तुम्हारी प्यासी चूतों की प्यास बुझाए नहीं रुकूंगा।

रानी ने अपनी मां की चूत से मुंह हटाया और बोली: ये इतना आसान नहीं है भाई, अह्ह्ह्ह अपनी रंडी मां और बहन को शांत करना।

रत्ना: आह्ह्ह्ह हाँ सही बोली बिटिया, अह्ह्ह्ह आसान नहीं होगा अह्ह्ह्ह तेरी मां तो तीन तीन लंड एक साथ निगल कर भी शांत नहीं होती।

भूरा के ये सुन कर कान खड़े हो गए रानी के भी पर उसने चूत चाटना जारी रखा,

भूरा: आह्ह्ह्ह्ह कौन से तीन तीन लंड मां अह्ह्ह्ह किस किस से चुदी हो तुम।

रत्ना ये सुन थोड़ी सोच में पड़ी कि सच्चाई बताए या न बताये पर वो इतनी उत्तेजित थी कि अभी उसे सच झूठ, सही गलत से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ रहा था,

रत्ना: तू अह्ह्ह्ह मां के राज जानना चाहता है, अह्ह्ह्ह पर आह्ह्ह्ह ये मैं तब बताऊंगी आह्ह्ह्ह्ह जब तीन लंड मेरे अंदर होंगे अह्ह्ह्ह, बोल घुसवाएगा तीन लंड अपनी मां के छेदों में?

भूरा तो ये सुन और उत्तेजित हो गया अपनी मां के अंदर एक साथ तीन लंड घुसते सोचना ही बहुत था, और उसका असर उसके धक्कों पर दिखने लगा, वो तेजी से रानी को चोदने लगा, उसके धक्के इतने तेज हो गए कि तेल की वजह से चिकनी रानी नीचे फिसल गई, पर भूरा नहीं रुक तुरंत उसने फिर से उसके नीचे जगह ली और तेजी से चोदने लगा, रानी के मुंह से सिसकियां निकल रही थी, रानी ने उसके सिर को उठाकर अपनी गोद में रख लिया, वहीं भूरा ने धक्के लगाना जारी रखा,



हर बढ़ते पल के साथ भूरा के धक्के तेज होते गए उसकी आंखों के सामने वो दृश्य आ रहा था जब उसकी मां एक साथ तीन लंड से चुद रही होगी, कौन होंगे वो तीन लंड क्या मैं और कोई और दो लोग? ये सब सोचते हुए ही उसके धक्के इतनी तेज और तूफानी हो गए कि रानी एक बार फिर से झड़ने लगी और आहें भरते हुए लगभग रोते हुए झड़ गई और शांत हो गई। वहीं भूरा भी अपने आप को रोक नहीं पाया और अपना रस उसने अपनी बहन की चूत में अंदर तक भर दिया, एक के बाद एक धार से पूरी चूत को भर दिया फिर जाकर उसका लंड निकला, रानी इतनी थक गई थी कि ज्यों की त्यों ही पड़ी और उसकी आँखें बंद हो गई, उसका बदन झनझना रहा था उसे अपनी चूत में अब भी ऐसा लग रहा था कि उसके भाई का लंड अंदर बाहर हो रहा है, उसकी चूत जो सुन्न लग रही थी अभी भी लंड की इच्छा कर रही थी पर उसका बदन पूरा थक चुका था, उसके अंदर आंखें खोलने की भी ताकत नहीं बची थी, वो ऐसे ही पड़ी रही उसकी आंखों के आगे अलग अलग दृश्य आ रहे थे, कभी मां का नंगा बदन तो कभी भूरा का लंड उसकी चूत में घुसता हुआ तो फिर कभी उसकी माँ की चूत में घुसता हुआ, फिर कुछ देर बाद उसे उसका बदन हल्का सा महसूस हुआ जैसे वो किसी बादल पर लेटी है सफेद बादलों के बीच लेटी है और फिर एक बादल लंड का आकार लेकर उसकी चूत में घुस जाता है और उसे चोदने लगता है वो फिर से चूत में लंड पाकर मस्त होती जा रही है,



वो सपनों की दुनिया में एक मोटे लंड से चुद रही है जो उसकी चूत को पूरा भर रहा है तभी उसे एक ओर से अपनी मां की आवाज़ सुनाई देती है जो आहें भर रही होती है और फिर उसके गले से घुटी हुई आवाजें आती हैं रानी इधर उधर देखती है तो उसे दूर एक बादल पर उसकी मां दिखती है पूरी नंगी पर वो अकेली नहीं होती, उसके साथ तीन आदमी होते हैं बिल्कुल बादल से बने हुए न उनका चेहरा पूरा बदन बादलों से बना है, और वो तीनों मिलकर एक साथ उसकी मां को चोद रहे होते हैं, एक का लंड उसकी मां की चूत में था एक का गांड में और एक का मुंह में, तीनों ही बेरहमी से उसकी मां को एक साथ चोद रहे होते हैं और उसकी मां कुछ नहीं कर पा रही होती,

तभी वो देखती है जो लंड उसे चोद रहा था उसके आस पास पूरा शरीर बनने लगता है बादल का ही धीरे धीरे पूरा शरीर हो जाता है उसके हाथ रानी के कमर पर कस जाते हैं और धक्के गहरे हो जाते हैं फिर अचानक से धीरे धीरे उस आदमी के चेहरे से बादल का धुआं हटने लगता है और किसी इंसान का चेहरा सामने आने लगता है वो ध्यान से देख कर पहचानने की कोशिश करती है और कुछ पल बाद वो चेहरा बिल्कुल साफ हो जाता है और उसे देख रानी हैरान रह जाती है, वो चेहरा उसके मृतक दादाजी का होता है जो उसे चोद रहे होते हैं और एक शैतानी मुस्कान के साथ कहते हैं: अरे मेरी भोली बिटिया तेरे बाबा को बहुत इंतज़ार था तेरी चूत का आज जी भर के मज़ा लूंगा।

ये कह कर वो तेजी से धक्का लगाते हैं और रानी की आंख खुल जाती है वो उठकर देखती है वो कमरे में थी सामने उसकी मां और भाई अब भी चुदाई कर रहे थे, रत्ना अपने चूतड़ों को अपने बेटे के लंड पर पटक रही थी



रानी उनकी ओर देखते हुए अपने सपने के बारे में सोचने लगती है, की आज ही उसे ऐसा सपना क्यों आया, वो भी कितना असली लग रहा था, भोली बिटिया, यही कहके उसे उसके बाबा हमेशा बुलाते थे।

रत्ना: अह्ह्ह्ह अह्ह्ह्ह हां लल्ला ओह्ह्ह्ह आह्ह्ह्ह ऐसे ही आह्ह्ह्ह झड़ जा अपनी मां की चूत में, अह्ह्ह्ह भर दे अपनी मां की चूत को अपने रस से आगाह,

रत्ना अपने बेटे के लंड पर उछलते हुए कह रही थी

भूरा भी नीचे से धक्के लगाते हुए मां का पूरा साथ दे रहा था

भूरा: अह्ह्ह्ह मां ओह्ह्ह्ह तुम्हारा बेटा अह्ह्ह्ह तुम्हारी चूत की प्यास बुझाएगा अपने रस से ओह्ह्ह्ह मां अब और नहीं रुक पा रहा अह्ह्ह्ह आ मां मैं अह्ह्ह्ह

भूरा ने दो तीन धक्के तेज रत्ना की चूत में लगाये और फिर अपना रस अपनी मां की चूत में भरने लगा, रत्ना भी अपने बेटे का रस चूत में भरता पाकर खुद को झड़ने से रोक नहीं पाई, झड़ कर आगे गिर गई भूरा पर और उसके सीने पर ही आंखें बंद कर के लेट गई, भूरा भी झड़ कर हांफते हुए अपनी मां को सीने से लगाए आँखे मूंद कर आराम करने लगा, रानी अपने सपने और बाबा के बारे में सोचते हुए फिर से सोने लगी थी, तीनों अभी तो आंखें बंद करके सोने लगे थे इस बात से अनजान कि ये रात जिसने उनके जीवनों को बदल दिया उसकी आने वाली सुबह कैसी होगी।

सुबह होने से पहले ही केलालाल जंगल में बढ़ते जा रहे थे मन में एक उत्साह था कि आज सब ठीक रहा तो मुंह मीठा और लंड गीला हो ही जाएगा। रत्ना को बताई हुई जगह पर पेड़ के पीछे जाकर छुपकर केलालाल प्रतीक्षा करने लगा, उसे भरोसा था आज कामाग्नि में जलती हुई रत्ना ज़रूर आएगी और उसके बदन को जी भर के मसलूंगा। थोड़ी देर हुई पर रत्ना का कोई नामोनिशान नहीं था,

केला के मुंह पर शिकन आने लगी उन्हें अपनी योजना एक बार फिर से विफल होती नज़र आ रही थी, तभी अचानक से उसे कुछ आवाजें आई, कदमों के पास आने की और वो प्रसन्न हो गया कि आखिर रत्ना आ ही गई तुरंत पेड़ के पीछे से निकल कर सामने आए तो अचानक ऐसे लगा जैसे किसी चट्टान से टकरा गए हो और गिर गया।

केला ने नज़र ऊपर करके देखा तो एक काला सा तगड़ा आदमी उसके ऊपर खड़ा था चेहरे पर एक शैतानी मुस्कान थी, उसकी कद काठी ही ऐसी थी कि केलालाल का हलक सूख गया, केला ने तुरंत आगे होकर उठना चाहा तो उस आदमी ने उसे एक हाथ से धान के बोझ की तरह उठा लिया,

कालराज: कहां जा रहा है बुढ़ऊ?

इतने में उसके पीछे से झींगुर भी आ गया

झींगुर: उस्ताद यार किस्मत ही खराब है अपनी सोचा था कोई मदमस्त औरत मिलेगी पर मिला ये बुढ़ऊ।

कालराज ने केला की ओर देखा, केला का डर के मारे मूट निकलने वाली हालत थी,

कालराज: क्यों बुढ़ऊ क्या कर रहा है इतनी सुबह जंगल में?

केला: कक्कुछ कुछ नहीं मैं मैं तो बस सुबह सुबह घूमने निकलता हूं,

कालराज: तो फिर बुढ़ऊ आज तू आखिरी बार घूमने निकला है, क्यों बे झींगुर कैसे मारें इसको? गर्दन तोड़ दूँ या पुराना तरीका पत्थर से कुचल दूं?

ये सुन तो केला का दिमाग सुन्न हो गया अपनी मौत सामने देख वो थर थर कांपने लगा,

केला: अरे नहीं नहीं मालिक मूझे मार कर तुम्हे क्या मिलेगा, मुझे मत मारो दया करो।

झींगुर: अरे बुढ़ऊ दया तो उस्ताद ने कभी सीखी ही नहीं, और तुझे छोड़ के भी क्या मिलेगा? तू कोई औरत तो है नहीं जो छोड़ दें तो काम चलता रहे।

केला को अब अपना आखिरी समय निकट दिख रहा था, शायद प्यारेलाल को मारने की सज़ा ऐसे ही उसे मिलनी थी, मेरी इच्छा ही मेरा अंत बनेंगी, फिर भी कोशिश करते हुए केला बोला: मैं औरत न सही पर मैं तुम्हे गाँव में ले चल सकता हूं, जहां एक से बढ़कर एक औरत हैं जिन्हें देख कर तुम मस्त हो जाओगे।

झींगुर: साले चूतिया समझा है क्या? गांव लेकर जायेगा फिर वहां हमें गांव वालों से पिटवा देगा, हम दो गांव वालों का सामना थोड़े ही कर पाएंगे।

केला: नहीं मेरा भरोसा करो मैं तुम्हें नहीं पिटवाऊंगा, मैं बस तुम्हे गांव दिखा कर ले आऊंगा।

झींगुर: अरे उस्ताद इसका काम खत्म करो बहुत बोलता है,

कालराज ने कुछ सोचा और बोला: सुन बुढ़ऊ हम तेरे साथ गांव चलेंगे पर कोई चालाकी नहीं होगी और ऐसे नहीं तू हमें अपना रिश्तेदार बताएगा, बोल देना कि हम तेरी बहन के बेटे हैं और तू हमारा मामा।

केला के आगे और उपाय ही क्या था जीवित रहना था तो उनकी बात माननी थी,

केला: ठीक ठीक है, जैसा तुम कहो मालिक, मेरा मतलब मेरे भांजे।

कालराज: समझदार है मामू।

झींगुर: पर मामू पहले ही बता रहा हूं अगर कुछ भी चालाकी की तो हमारे साथ चाहे जो भी हो पर तेरे जीवन का वो आखिरी पल होगा।

केला: समझ गया मेरे भांजे, भरोसा करो अपने मामू पर।

कालराज: चलें फिर मामू अपने घर अपने गांव।

केला: हां हां चलो चलो।

केला अपने दिमाग का शुक्र मनाते हुए चलने लगा उन दोनों के साथ ये सोचते हुए कि अभी तो खुद को बचा लिया पर गाँव वालों के लिए वो एक मुसीबत अपने साथ लेकर जा रहा था, केला ने दोनों के ले जाकर अपनी कुटिया दिखाई, जिसे देख झींगुर खुशी से बोला: उस्ताद पेड़ के नीचे रहने के बाद तो ये कुटिया भी महल जैसी लग रही है।

केला: अह अब इसे अपनी ही मानो भांजो।

झींगुर: मानना क्या है अपनी ही है मामू।

कालराज: कुटिया तो देख ली मामू अब गाँव के चक्कर भी लगवा दे मामू, बहुत दिन हो गये हरियाली देखे।

केला: हां चलो ना भांजों, मैं तुम्हारा परिचय भी करा दूंगा गांव वालों से?

कालराज: देख बुढ़ऊ मामा तो बन रहा है पर तेरी एक चालाकी और तेरी गर्दन वहीं तोड़ दूंगा,

केला: अरे नहीं नहीं भैया, कोई चालाकी नहीं करूंगा भरोसा करो मेरा।

झींगुर: चलो उस्ताद गांव घूम कर आते हैं। देखते हैं ये गांव हमारे लायक है भी कि नहीं।

केलालाल दोनों को लेकर गांव में निकलता है गांव के लोग केलालाल को रुक रुक कर बाबा प्रणाम करते थे जिसे देखकर झींगुर कालराज के कान में फुसफुसाते हुए बोला: उस्ताद इस बुढ़ऊ ने सही इज़्ज़त बना रखी है गांव में, हमारे काफी काम आ सकता है ये,

कालराज ने हां में सिर हिलाया वो गांव को अच्छे से देख रहा था खासकर गांव की औरतों को, आगे चलते हुए एक खेत में औरत की ओर इशारा करते हुए झींगुर हौले से बोला: क्या मादक बदन वाली औरत है उस्ताद बिल्कुल मलाई है।

कालराज की आंखों में भी उस ओर देख चमक आ गई।

केला समझ गया ये किसकी बात कर रहे हैं। और खुद ही बोला: ये ये झुमरी है अपने बेटे सत्तू के साथ रहती है, बस यही दोनों हैं इनके परिवार में,

वो तीनों खेत के पास पहुंचे तो झुमरी ने भी केला को दो लोगों के साथ आते हुए देखा



झुमरी: बाबा प्रणाम।

केला: खुश रहो बहू, सब ठीक हैं?

झुमरी: हां बाबा सब ठीक है तुम्हारे आशीर्वाद से।

केला: चलो खुश रहो, खुश रहो।

ये कहते हुए केला दोनों के साथ आगे बढ़ गया,

झींगुर: हाय इसे देख कर तो मैं ठीक नहीं रहा उस्ताद।

कालराज: मेरा भी यही हाल है झींगुर, इतने दिनों सूखे में रहने के बाद औरतों की हरियाली ही पागल कर रही है।

केला: अगर तुम लोग इस हरियाली को पसंद करते हो तो इस गांव में हरियाली ही हरियाली है, वो भी एक से बढ़ कर एक।

झींगुर: सच में बुढ़ऊ, मेरा मतलब मामू।

केला: अरे सच में भांजे आओ तुम्हे कुछ झलकियां और दिखा लाता हूं।

झींगुर: हां चलो चलो,

केला दोनों के साथ आगे बढ़ता है और एक गली में आकर धीरे से फुसफुसाते हुए कहता है, ये आगे जो झाड़ू लगा रही है ये रजनी है, विचारी परेशान है संतान नहीं होने के कारण, घर में बस ये और इसका पति मनोज है।



झींगुर और कालराज दोनों ने चलते हुए रजनी के बदन को, उसकी पसीने में चमकती कमर को साथ ही साड़ी में लिपटे उसके नितंबों को ध्यान से अंत तक देखा, जब तक आगे मुड़ नहीं गए।

झींगुर: अरे ये मौका दे तो हमारे उस्ताद एक बार में ही इसकी सूनी गोद भर देंगे क्यों उस्ताद।

कालराज: मौका बनाना पड़ता है झींगुर और इसके लिए तो बनाना जरूरी भी है, वैसे भी तेरा एक भतीजा होना चाहिए न।

झींगुर: क्या बात कही है उस्ताद बिल्कुल सही।

केला: पर सम्भल कर भांजों यहां की औरतें संस्कारी बहुत हैं ज़रा भी नजर का फेर पता चल गया तो लेने के देने पड़ जाएंगे।

झींगुर: तो हम लोग भी कौन सा कम संस्कारी हैं, अच्छे खासे घरानों से हैं।

झींगुर हंसते हुए बोला।

केला: ये गली मेरी सबसे पसंद की गली है भांजों, यहां तो हर घर में हरियाली ही हरियाली है, और पहली झलक देख लो नल पर ही है।

केला ने एक ओर मुड़ते हुए कहा,

और दोनों की नज़रें नल पर गईं जहां एक भरे पूरे बदन की कामुक औरत एक छोटा बर्तन धो रही थी, ये औरत और कोई नहीं बल्कि लता थी, लल्लू और नंदिनी की मां, दोनों लोग आगे बढ़े और लता ने केला को देखा तो प्रणाम किया,

केला: प्रणाम बहू, सब ठीक है?

लता: हां बाबा सब आपकी कृपा है।



वहीं झींगुर और कालराज की तो आँखें लता के बदन से नहीं हट रहीं थीं, वहीं लता ने भी दोनों को अपनी ओर देखते पाया तो बोली: बाबा ये दोनों भैया कौन हैं।

केला: ये दोनों मेरे भांजे है बहू, मेरी स्वर्गीय बहन की निशानियाँ हैं दोनों अपने मामा से मिलने आए हैं।

लता ने दोनों की ओर प्रणाम किया तो दोनों ने ही शराफ़त का नाटक करते हुए प्रणाम किया।

लता: आओ न बाबाजी चाय बना देती हूं आप सब के लिए।

केला: आएंगे बहू शाम को चाय तेरे यहां पक्की, अभी थोड़ा गांव दिखा दूं

लता: जैसे तुम्हें सही लगे बाबाजी।

केला दोनों के साथ आगे बढ़ जाता है,

झींगुर: अरे मामू चाय पीने देते न, इसका तो दूध कितना मीठा होगा।

केला: सब्र कर भांजे चाय ही तो पीनी है अभी पिला देते हैं।

केला ने आगे एक दरवाज़े की ओर इशारा करते हुए कहा और फिर दरवाज़े की ओर बढ़ गए,

केला: अरे सुभाष है क्या?

केला ने आवाज़ लगाई तो कुछ पल बाद ही फुलवा ने किवाड़ खोले,

फुलवा: अरे प्रणाम बाबा, सुभाष तो खेत में हैं।

केला: अच्छा चलो कोई बात नहीं माई, इनसे मिलो ये दोनों मेरे भांजे हैं, आज ही आए हैं गांव घुमा रहा था तो सोचा बहू के हाथ की चाय पिला दूं।

फुलवा: अरे क्यों नहीं हमारे धन्य भाग, आओ न, आओ आओ बेटा तुम लोग भी आओ।

फुलवा सबको अंदर ले गई और आंगन में पड़ी खाट पर सबको बिठाया फिर बहुओं को चाय का आदेश देकर खुद नीचे बैठ कर बातें करने लगी।

जहां केला और फुलवा बातें कर रहे थे वहीं झींगुर और कालराज की नज़र रसोई में काम करती दोनों बहुओं यानि पुष्पा और सुधा के कामुक बदन पर थी,



दोनों ही सोच रहे थे सच में यहां एक से बढ़कर एक कामुकता का भंडार है, दोनों की नाजरें पुष्पा और सुधा के चिकने बदन पर फिसल रही थी, उनकी कमर में कामुक सिलवटों को देख दोनों के ही बदन में सिहरन हो रही थी।

बातों के बीच चाय खत्म हुई तो केलालाल ने फुलवा से बिदा ली और बाहर चले, गली में आकर एक नजर रत्ना के घर पर डाली जहां कोई दिखाई नहीं दे रहा था, वहीं केला के खुद के मन में सवाल थे कि रत्ना आज क्यों नहीं आई सुबह, खैर अभी वो इन दोनों को रत्ना के घर से दूर रखना चाहता था इसलिए कुटिया पर वापिस ले आया,

वहां आते ही झींगुर बैठ गया पैंट सरका कर और अपना लंड बाहर निकाल कर हिलाने लगा,

केला: अरे अरे ये क्या कर रहे हो।

झींगुर: इतनी औरतों देखने के बाद मुझसे नहीं रुका जा रहा, अह्ह्ह्ह अह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्ह क्या बदन था सबका।


केला ने कलराज को देखा जो मुस्कुरा रहा था केला लाल सोचने लगा अपने साथ क्या मुसीबत ले आया हूं मैं गांव वालों के लिए।
 
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