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अध्याय - 167
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"क्या हुआ?" रागिनी को कुछ सोचते देख मैंने पूछा____"आप ठीक तो हैं? कोई समस्या तो नहीं है ना?"
"न..नहीं।" उन्होंने कहा____"ऐसी कोई बात नहीं है। मैं ठीक हूं।"
"ठीक है।" मैंने धड़कते दिल से कहा____"तो फिर आप अब आराम कीजिए। कल रात से आपको ठीक से आराम करने को नहीं मिला है अतः आप अब आराम से लेट जाइए।"
"ह...हां पर।" वो झिझकते हुए बोलीं____"मैं ऐसे नहीं सो पाऊंगी। मे...मेरा मतलब है कि इतने सारे ये गहने पहने और ये भारी सी साड़ी पहने सोना मुश्किल है।"
"ओह! हां।" मैंने उनके पूरे बदन को देखते हुए कहा____"तो ठीक है आप इन्हें उतार दीजिए। मेरा मतलब है कि आपको जैसे ठीक लगे वैसे आराम से सो जाइए।"
रागिनी मेरी बात सुन कर असमंजस जैसी हालत में बैठी कभी मुझे एक नज़र देखती तो कभी नज़रें घुमा कर कहीं और देखने लगतीं। मुझे समझ ना आया कि आख़िर अब उन्हें क्या समस्या थी?
"क्या हुआ?" मैं बेचैनी से पूछ बैठा____"देखिए अगर कोई बात है तो आप बेझिझक बता दीजिए मुझे। आप जानती हैं ना कि मैं आपको किसी भी तरह की परेशानी में नहीं देख सकता। आपको खुश रखना पहले भी मेरी प्राथमिकता थी और अब तो और भी हो गई है। आपको पता है आपकी छोटी बहन कामिनी ने मुझसे जूता चुराई के नेग में मुझसे क्या मांगा था?"
"क...क्या मांगा था उसने?" भाभी ने मेरी तरफ उत्सुकता से देखा।
"यही कि मैं हमेशा उनकी दीदी को खुश रखूं।" मैंने अधीरता से कहा____"उनको कभी दुखी न होने दूं और हमेशा उन्हें प्यार करूं।"
"क...क्या???" रागिनी के चेहरे पर हैरत के भाव उभरे____"उसने ऐसा कहा आपसे?"
"हां।" मैंने हल्के से मुस्कुरा कर कहा____"और जवाब में मैंने ऐसा करने का उन्हें वचन भी दिया। मुझे बिल्कुल भी उम्मीद नहीं थी कि कामिनी मुझसे नेग के रूप में ऐसा करने का वचन लेंगी। पर मैं खुश हूं कि उन्होंने चंद रुपयों की जगह आपकी खुशियों को ज़्यादा महत्व दिया। ज़ाहिर है उन्हें आपसे बहुत प्यार है।"
"हां।" रागिनी ने गहरी सांस ली____"वो मुझसे बहुत प्यार करती है। हालाकि उसका स्वभाव शुरू से ही शांत और गंभीर रहा था लेकिन मुझसे हमेशा लगाव था उसे। जब उसे पता चला कि मेरा आपसे विवाह करने की बात चली है तब उसे इस बात से बड़ा झटका लगा था। वो फ़ौरन ही मेरे पास आई थी और कहने लगी कि मैं इस रिश्ते के लिए साफ इंकार कर दूं। मैं जानती थी कि वो आपको पसंद नहीं करती थी इसी लिए इंकार करने को कह रही थी लेकिन मैं उस समय कोई भी फ़ैसला लेने की हालत में नहीं थी। मैं तो कल्पना भी नहीं कर सकती थी कि ऐसा भी कुछ होगा।"
"मैंने भी कल्पना नहीं की थी।" मैंने कहा____"मुझे तो किसी ने पता ही नहीं चलने दिया था। अगर मैं आपको लेने चंदनपुर न जाता तो शायद पता भी न चलता।"
"एक बात पूछूं आपसे?" रागिनी ने धीमें से कहा।
"आपको किसी बात के लिए इजाज़त लेने की ज़रूरत नहीं है।" मैंने कहा____"आप बेझिझक हो कर मुझसे कुछ भी पूछ सकती हैं और मुझे कुछ भी कह सकती हैं।"
"मैं ये पूछना चाहती हूं कि क्या आपने ये रिश्ता मजबूरी में स्वीकार किया था?" रागिनी ने अपलक मेरी तरफ देखते हुए पूछा____"अगर आपके बस में होता तो क्या आप इस रिश्ते से इंकार कर देते?"
"मैं नहीं जानता कि आप क्या सोच कर ये पूछ रहीं हैं।" मैंने कहा____"फिर भी अगर आप जानना चाहती हैं तो सुनिए, सच ये है कि आपकी खुशी के लिए अगर मुझे कुछ भी करना पड़ता तो मैं बेझिझक करता। इस रिश्ते को मैंने मजबूरी में नहीं बल्कि ये सोच कर स्वीकार किया था कि ऐसे में पूरे हक के साथ मैं अपनी भाभी को खुश रखने का प्रयास कर सकूंगा। सवाल आपका था रागिनी। सवाल आपके जीवन को संवारने का था और सवाल आपकी खुशियों का था। मैं ये हर्गिज़ नहीं चाह सकता था कि आपके चेहरे पर कभी दुख की परछाईं भी पड़े। पहले मेरे बस में नहीं था लेकिन अब है। हां रागिनी, अब मैं हर वो कोशिश करूंगा जिसके चलते आप अपना हर दुख भूल जाएं और खुश रहने लगें। जब मुझे इस रिश्ते के बारे में पता चला था तो शुरू में बड़ा आश्चर्य हुआ था मुझे लेकिन धीरे धीरे एहसास हुआ कि एक तरह से ये अच्छा ही हुआ। कम से कम ऐसा होने से आपका जीवन फिर से तो संवर जाएगा। आपको जीवन भर विधवा के रूप में कोई कष्ट तो नहीं उठाना पड़ेगा। हां ये सोच कर ज़रूर मन व्यथित हो उठता था कि जाने आप क्या सोचती होंगी मेरे बारे में? आख़िर पता तो आपको भी था कि मेरा चरित्र कितने निम्न दर्जे का था। यही सब सोच कर आपसे मिलने चंदनपुर गया था। मैं आपसे अपने दिल की सच्चाई बताना चाहता था। मैं बताना चाहता था कि भले ही हमारे माता पिता ने हमारे बीच ये रिश्ता बनाने का सोच लिया है लेकिन इसके बाद भी मेरे मन में आपके लिए कोई ग़लत ख़याल नहीं आए हैं। अपने दामन पर हर तरह के दाग़ लग जाना स्वीकार कर सकता था लेकिन आपके ऊपर कोई दाग़ लग जाए ये हर्गिज़ मंजूर नहीं था मुझे।"
"हां मैं जानती हूं।" रागिनी ने अधीरता से कहा____"आपको ये सब कहने की ज़रूरत नहीं है। सच कहूं तो मुझे भी इसी बात की खुशी है कि इस बारे में मेरी शंका और बेचैनी बेवजह थी। मुझे यकीन था कि आप सिर्फ मेरी खुशियों के चलते ही इस रिश्ते को स्वीकार करेंगे।"
"सच सच बताइए।" मैंने अधीरता से पूछा____"आप इस रिश्ते से खुश तो हैं ना? आपके मन में जो भी हो बता दीजिए मुझे। मैं हर सूरत में आपको खुश रखूंगा। आपके जैसी गुणवान पत्नी मिलना मेरे लिए सौभाग्य की बात है किंतु ये भी सोचता हूं कि क्या मेरे जैसे इंसान का पति के रूप में मिलना आपके लिए अच्छी बात है या नहीं?"
"ऐसा मत कहिए।" रागिनी का स्वर लड़खड़ा गया____"आपको पति के रूप में पाना मेरे लिए भी सौभाग्य की बात है।"
"क्या सच में???" मैंने आश्चर्य से उन्हें देखा।
"पहले कभी हिम्मत ही नहीं जुटा पाई थी।" रागिनी ने अधीरता से कहा____"लेकिन आज शायद इस लिए जुटा पा रही हूं क्योंकि अब मैं आपकी पत्नी बन चुकी हूं।"
"आप ये क्या कह रही हैं?" मैं चकरा सा गया____"मुझे कुछ समझ नहीं आया।"
"क्या आप इस बात की कल्पना कर सकते हैं कि अनुराधा और रूपा की तरह मैं भी आपसे प्रेम करती होऊंगी?" रागिनी ने ये कह कर मानों धमाका किया____"क्या आप कल्पना कर सकते हैं आपकी ये पत्नी आपको पहले से ही प्रेम करती थी?"
"ये....ये आप क्या कह रहीं हैं???" मेरे मस्तिष्क में सचमुच धमाका हो गया____"अ...आप मुझसे पहले से ही प्रेम करती हैं? ये...ये कैसे हो सकता है?"
"मैं भी अपने आपसे यही सवाल किया करती थी?" रागिनी ने कहा____"जवाब तो नहीं मिलता था लेकिन हां शर्म से पानी पानी ज़रूर हो जाती थी। अपने आपको ये कह कर धिक्कारने लगती थी कि रागिनी तू अपने ही देवर से प्रेम करने का सोच भी कैसे सकती है? ये ग़लत है, ये पाप है।"
मैं भौचक्का सा उन्हें ही देखे जा रहा था। कानों में सांय सांय होने लगा था। दिल की धड़कनें हथौड़े जैसा चोट करने लगीं थी।
"अ...आप तो बड़ी ही आश्चर्यजनक बात कर रहीं हैं।" मैंने खुद को सम्हालते हुए कहा____"यकीन नहीं हो रहा मुझे।"
"जब मुझे ही यकीन नहीं हो रहा था तो आपको भला कैसे इतना जल्दी यकीन हो जाएगा?" रागिनी ने कहा____"अपने देवर के रूप में तो आपको मैं पहले ही पसंद करती थी। हमेशा गर्व होता था कि आपके जैसा लड़का मेरा देवर है। आगे चल कर ये पसंद कब रिश्ते की मर्यादा को लांघ गई मुझे आभास ही नहीं हुआ। फिर जब मैं विधवा हो गई और जिस तरह से आपने मुझे सम्हाला तथा मुझे खुश करने के प्रयास किए उससे मेरे हृदय में फिर से पहले वाले जज़्बात उभरने लगे लेकिन मैं उन्हें दबाती रही। खुद पर ये सोच कर क्रोध भी आता कि ये कैसी नीचतापूर्ण सोच हो गई है मेरी? अगर किसी को भनक भी लग गई तो क्या सोचेंगे सब मेरे बारे में? सच कहूं तो जितना विधवा हो जाने का दुख था उतना ही इस बात का भी था। अकेले में बहुत समझाती थी खुद को मगर आपको देखते ही बावरा मन फिर से आपकी तरफ खिंचने लगता था। ऊपर से जब आप मुझे इतना मान सम्मान देते और मेरा ख़याल रखते तो मैं और भी ज़्यादा आप पर आकर्षित होने लगती। मन करता कि आपके सीने से लिपट जाऊं मगर रिश्ते का ख़याल आते ही खुद को रोक लेती और फिर से खुद को कोसने लगती। ये सोच कर शर्म भी आती कि हवेली का हर सदस्य मुझे कितना चाहता है और मैं अपने ही देवर के प्रेम में पड़ गई हूं। मैंने कभी कल्पना नहीं की थी कि ऊपर वाला मेरे जीवन में मुझे ऐसे दिन भी दिखाएगा और मेरे हृदय में मेरे अपने ही देवर के प्रति प्रेम के अंकुर पैदा कर देगा।"
रागिनी एकाएक चुप हो गईं तो कमरे में सन्नाटा छा गया। मैं जो उनकी बातों के चलते किसी और ही दुनिया ने पहुंच गया था फ़ौरन ही उस दुनिया से बाहर आ गया।
"प्रेम का अंकुर फूटना ग़लत नहीं है क्योंकि ये तो एक पवित्र एहसास होता है।" रागिनी ने एक लंबी सांस ले कर कहा____"लेकिन प्रेम अगर उचित व्यक्ति से न हो कर किसी ऐसे व्यक्ति से हो जाए जो रिश्ते में देवर लगता हो तो फिर उस प्रेम के मायने बदल जाते हैं। लोगों की नज़र में वो प्रेम पवित्र नहीं बल्कि एक निम्न दर्ज़े का नाम प्राप्त कर लेता है जिसके चलते उस औरत का चरित्र भी निम्न दर्ज़े का हो जाता है। यही सब सोचती रहती थी मैं और अकेले में दुखी होती रहती थी। हर रोज़ फ़ैसला करती कि अब से आपके प्रति ऐसे जज़्बात अपने दिल में नहीं रखूंगी लेकिन आपको देखते ही जज़्बात मचल उठते। मैं सब कुछ भूल जाती और आपके साथ हंसी खुशी से नोक झोंक करने लगती। आपको छेड़ती, आपकी टांगें खींचती तो मुझे बड़ा आनंद आता। आप जब नज़रें चुराने लगते तो मुझे अपने आप पर गर्व तो होता लेकिन ये देख कर खुश भी होती कि आप कितना मानते हैं मुझे। मैं खुद ही ये सोच लेती कि शायद आप मुझे बहुत चाहते हैं इसी लिए मेरी हर बात मानते हैं और हर तरह से मुझे खुश रखने की कोशिश करते रहते हैं। कोई पुरुष जब किसी औरत के लिए इतना कुछ करने लगता है तो उस औरत के हृदय में उसके प्रति कोमल भावनाएं पैदा हो ही जाती हैं। अकेले में भले ही मैं इस प्रेम की भावना को सोच कर खुद को कोसती और दुखी होती थी लेकिन आपके साथ होने पर जो खुशियां मिलती उनसे जुदा भी नहीं कर पाती थी। यूं समझिए कि जान बूझ कर हर रोज़ यही गुनाह करती थी क्योंकि दिल नहीं मानता था। क्योंकि दिल मजबूर करता था। क्योंकि आपके साथ दो पल की खुशी पाने की ललक होती थी।"
"अगर आप सच में मुझसे प्रेम करने लगीं थी।" मैंने अपने अंदर के तूफ़ान को काबू करते हुए कहा____"तो आपको मुझे बताना चाहिए था।"
"आपके लिए ये बात बताना आसान हो सकता था ठाकुर साहब।" रागिनी ने फीकी सी मुस्कान के साथ कहा____"लेकिन मेरे लिए कतई आसान नहीं हो सकता था। मैं एक बड़े खानदान की बहू थी। एक ऐसी बहू जिसके सास ससुर को इस बात का गुमान था कि उनकी बहू दुनिया की सबसे गुणवान बहू है। एक ऐसी बहू जिसे उसके सास ससुर अपनी हवेली की शान समझते थे। एक ऐसी बहू जिसे हर किसी ने अपनी पलकों पर बिठा रखा था। एक ऐसी बहू जिसका पति ईश्वर के घर में था और वो एक विधवा थी। सोचिए ठाकुर साहब, अगर ऐसी बहू के बारे में किसी को पता चल जाता कि वो अपने ही देवर से प्रेम करती है तो क्या होता? अरे! उनका तो जो होता वो होता ही लेकिन मेरा क्या होता? इतना तो यकीन था मुझे कि ये बात जानने के बाद भी मेरे पूज्यनीय सास ससुर मुझे कुछ न कहते लेकिन क्या मैं उनके सामने खड़े होने की स्थिति में रहती? सच तो ये है कि उस सूरत में मेरे लिए सिर्फ एक ही रास्ता होता...शर्म से डूब मरने का रास्ता। आप कहते हैं कि मुझे आपको बताना चाहिए था तो खुद बताइए कि कैसे बताती आपको? आप भले ही मेरे बारे में ग़लत न सोच बैठते लेकिन मेरे मन में तो यह होता ही न कि आप यही सोचेंगे कि पति के गुज़र जाने के बाद मैं आपसे प्रेम करने का स्वांग सिर्फ इसी लिए कर रही हूं क्योंकि इसके पीछे मेरी अपनी कुत्सित मानसिकता है।"
"मैं आपके बारे में ऐसा ख़वाब में भी नहीं सोच सकता था।" मैंने अधीरता से कहा।
"मानती हूं।" रागिनी ने कहा____"लेकिन मैं अपने मन का क्या करती? उस समय मन में ऐसी ही बातें उभर रहीं थी जिसके चलते मैं ये तक सोच बैठी थी कि कितनी बुरी हूं मैं जो अपने अंदर की भावनाओं को काबू ही नहीं रख पा रही हूं। कितनी निर्लज्ज हूं जो अपने ही देवर से प्रेम करने लगी हूं।"
"ईश्वर के लिए ऐसी बातें कर के खुद की तौहीन मत कीजिए।" मैं बोल पड़ा____"मैं समझ सकता हूं कि इस सबके चलते आपके मन में कैसे कैसे विचार उभरे रहे होंगे। मैं ये भी समझ सकता हूं कि आपने इसके लिए क्या क्या सहा होगा। सच कहूं तो इसमें आपकी कोई ग़लती नहीं है इस लिए आप ये सब कह कर खुद को दुखी मत कीजिए।"
"आपको पता है।" रागिनी ने उसी अधीरता से कहा____"जब आपके साथ मेरा विवाह कर देने की बात चली थी तो मुझे यकीन ही नहीं हुआ था। ऐसा लगा था जैसे मैं दिन में ही कोई ख़्वाब देखने लगी हूं। फिर जब यकीन हो गया कि यही हकीक़त है तो उस दिन पहली बार सच्ची खुशी का एहसास हुआ था मुझे। अकेले में अपने सामने यही सोच कर चकित होती थी कि ये कैसा विचित्र संयोग बना बैठा है ऊपर वाला। हालाकि आपसे मेरा विवाह होने की मैंने कभी कल्पना नहीं की थी लेकिन हां ये ज़रूर सोचा करती थी कि काश! मेरी भी किस्मत में ऐसे असंभव प्रेम का मिल जाना लिखा होता। कई दिन तो इस हकीक़त को यकीन करने में ही निकल गए। मेरी मां, मेरी भाभियां और मेरी बहन सब इस बारे में मुझसे बातें करती लेकिन मुझे कुछ समझ ही न आता कि क्या कहूं? उनमें से किसी को बता भी नहीं सकती थी कि मेरे अंदर का सच क्या है? बताने का मतलब था उनका भी यही सोच बैठना कि कितनी निर्लज्ज हूं मैं जो पहले से ही अपने देवर को प्रेम करती आ रही हूं। इस लिए कभी किसी को अपने अंदर के सच का आभास तक नहीं होने दिया। दिखावे के लिए उनसे ऐसी ऐसी बातें कहती जिससे उन्हें यही लगे कि मैं इस रिश्ते के लिए बहुत ज़्यादा परेशान हूं। दूसरी तरफ मैं ये भी सोचने लगी थी कि इस रिश्ते के बारे में अब आप क्या सोच रहे होंगे? कहीं आप भी तो सबकी तरह मुझे ग़लत नहीं सोचने लगे होंगे? हालाकि मुझे यकीन था कि आप ऐसा कभी सोच ही नहीं सकते थे लेकिन मन था कि जाने कैसी कैसी शंकाएं करता ही रहता था। मां, भाभी, कामिनी और शालिनी जब मुझे समझाने आतीं तो उनसे भी दिखावे के रूप में अपनी परेशानी ही ज़ाहिर करती और ये परखने की कोशिश करती कि वो सब इस रिश्ते के बारे में अपने क्या विचार प्रस्तुत करती हैं? आख़िर वो सब क्या सोचती हैं इस संबंध के बारे में? अकेले में मैं अपने नाटक और नासमझी के बारे में सोचती तो मुझे ये सोच कर दुख होता कि सबको कैसे उलझाए हुए हूं मैं। कैसे सबके साथ छल कर रही हूं मैं। वो सब मुझे इतना समझाती हैं और मैं नाटक किए जा रही हूं? सच तो ये था कि किसी से सच बताने की हिम्मत ही नहीं होती थी। मुझे ऐसा लगता था कि अगर मैं किसी से अपने अंदर का सच बता दूंगी तो जाने वो मेरे बारे में क्या क्या सोच बैठेंगी? फिर मैं कैसे उनकी शक भरी नज़रों का सामना कर सकूंगी?"
रागिनी इतना सब बोल कर चुप हुईं तो एक बार फिर से कमरे में सन्नाटा छा गया। मेरे ज़हन में अब भी धमाके हो रहे थे। मैं सोचने लगा था कि क्या अभी और भी ऐसा कोई सच मुझे जानने को मिलने वाला है जिसकी मैं कल्पना भी नहीं कर सकता हूं?
"आप ये सब सुन कर परेशान मत होइए।" फिर रागिनी ने कहा____"मैं तो ये सब आपको भी न बताती लेकिन इस लिए बताया क्योंकि अब आप मेरे पति हैं और मैं आपकी पत्नी। आपको अपने बारे में और अपने दिल की बातें छुपाना मेरा धर्म है। मैं आपसे कभी नहीं कहूंगी कि आप ये सब जानने के बाद मुझे प्रेम करें। आप पर अनुराधा का हक़ था, उसके बाद रूपा का हक़ है और मैं उस मासूम का हक़ छीनने का सोच भी नहीं सकती कभी।"
"मुझे समझ नहीं आ रहा कि इस संबंध में आपसे क्या कहूं?" मैंने गहरी सांस ले कर कहा____"आप पहले से मुझे पसंद करती थीं या मुझसे प्रेम करने लगीं थी ये मेरे लिए ऐसी बात है जिसकी मैं कल्पना तक नहीं कर सकता था। अपने दिल का सच बताऊं तो वो यही है कि मैंने हमेशा आपको आदर सम्मान की भावना से ही देखा है। ये सच है कि कभी कभी मेरे मन में आपको देख कर ये ख़याल उभर आता था कि काश! आपके जैसी खूबसूरत और नेकदिल औरत मेरे भी नसीब में होती। आप पर हमेशा आकर्षित होता था मैं। डरता था कि कहीं इस आकर्षण के चलते किसी दिन मुझसे कोई गुनाह न हो जाए इस लिए हमेशा आपसे दूर दूर ही रहता था। आपकी पवित्रता पर किसी कीमत में दाग़ नहीं लगा सकता था मैं। आप हर तरह से हमारे लिए अनोखी थीं। ख़ैर छोड़िए इन बातों को। मुझे आपका सच जान कर आश्चर्य तो हुआ है लेकिन कहीं न कहीं खुशी भी हो रही है कि आपके दिल में मेरे प्रति प्रेम की भावना है। एक बार फिर से ऊपर वाले को धन्यवाद देता हूं कि उसने मुझ जैसे इंसान के जीवन में अनुराधा, रूपा और आपके जैसी नेकदिल औरतों को भेजा। अनुराधा के जाने का दुख तो हमेशा रहेगा क्योंकि उसी की वजह से मैं प्रेम के मार्ग पर चला था किंतु आप दोनों का अद्भुत प्रेम पा कर भी मैं अपने आपको खुश किस्मत समझता हूं। अच्छा अब बातें बंद करते हैं। रात ज़्यादा हो गई है। आपको सो जाना चाहिए।"
मेरी बात सुन कर रागिनी ने सिर हिलाया और फिर झिझकते हुए पलंग से नीचे उतरीं। मेरे देखते ही देखते उन्होंने झिझकते हुए अपने गहनें निकाल कर एक तरफ रख दिए। फिर वो मेरी तरफ पलटीं। मेरी धड़कनें फिर से तेज़ हो गईं थी। मैं जानता था कि विवाह के बाद पति पत्नी सुहागरात भी मनाते हैं लेकिन हमारे बीच ऐसा होना कितना संभव था ये हम दोनों ही जानते थे।
"वो आप उधर घूम जाइए ना।" उन्होंने झिझकते हुए कहा तो मैंने फ़ौरन ही लेट कर दूसरी तरफ करवट ले ली। मैं सोचने लगा कि अब वो अपने कपड़े उतारने लगेंगी, उसके बाद वो मेरे पास आ कर मेरे साथ लेट जाएंगी।
कुछ देर बाद पलंग में हलचल हुई। मैं समझ गया कि वो अपने कपड़े उतार कर या फिर दूसरे कपड़े पहन कर पलंग पर सोने के लिए आ गईं हैं। मैंने महसूस किया कि हमारे बीच कुछ फांसला था। मैं सोचने लगा कि क्या मुझे उनसे कुछ कहना चाहिए? मेरा मतलब है कि क्या मुझे उनसे सुहागरात के बारे में कोई बात करनी चाहिए? मेरा दिल धाड़ धाड़ कर के बजने लगा।
"स...सुनिए।" काफी देर की ख़ामोशी के बाद सहसा रागिनी ने धीमें से मुझे पुकारा____"सो गए क्या आप?"
"न...नहीं तो।" मैं फ़ौरन ही बोल पड़ा किंतु फिर अचानक ही मुझे एहसास हुआ कि मुझे फ़ौरन नहीं बोल पड़ना चाहिए था। क्या सोचेंगी अब वो कि जाने क्या सोचते हुए जग रहा हूं मैं?
"वो...मैंने दिन में सो लिया था न।" फिर मैंने उनकी तरफ पलटते हुए कहा____"इस लिए इतना जल्दी नींद नहीं आएगी मुझे लेकिन आप सो जाइए।"
"हम्म्म्म।" उन्होंने धीमें से कहा____"वैसे रूपा को कब ब्याह कर लाएंगे आप?"
"आज का दिन तो गुज़र ही गया है।" मैंने कहा____"तो इस हिसाब से चौथे दिन जाना होगा।"
"त...तो फिर जब मेरी छोटी बहन आपकी पत्नी बन कर यहां आ जाएगी।" रागिनी ने जैसे उत्सुकता से पूछा____"तो क्या वो भी इसी कमरे में हमारे साथ रहेगी या फिर...?"
"इस बारे में क्या कहूं मैं?" मैं उनकी इस बात से खुद भी सोच में पड़ गया था, फिर सहसा मुझे शरारत सी सूझी तो मुस्कुराते हुए बोला____"वैसे तो शायद मां उसे दूसरे कमरे में रहने की व्यवस्था करवा सकती हैं लेकिन अगर आपकी इच्छा हो तो उसको अपने साथ ही इस कमरे में सुला लेंगे। मुझे तो कोई समस्या नहीं है, क्या आपको है?"
"धत्त।" रागिनी एकदम से सिमट गईं____"ये क्या कह रहे हैं?"
"बस पूछ ही तो रहा हूं आपसे।" मैं मुस्कुराया____"जैसे आप मेरी पत्नी हैं वैसे ही वो भी तो मेरी पत्नी ही होगी और पत्नी तो अपने पति के साथ ही कमरे में रहती हैं।"
"हां ये तो है।" रागिनी ने कहा____"लेकिन वो भी अगर साथ में रहेगी तो कितना अजीब लगेगा मुझे। मुझे तो बहुत ज़्यादा शर्म आएगी।"
"शर्म किस बात की भला?" मैंने पूछा।
"व...वो...मुझे नहीं पता।" रागिनी को जैसे जवाब न सूझा।
"अब ये क्या बात हुई?" मैं मुस्कुरा उठा। मेरा हौंसला धीरे धीरे बढ़ने लगा____"आपको उसके साथ रहने से शर्म तो आएगी लेकिन क्यों आएगी यही नहीं पता आपको? ऐसा कैसे हो सकता है?"
"क्योंकि ये अच्छी बात नहीं होगी इस लिए।" उन्होंने झिझकते हुए कहा____"वो आपकी पत्नी बन कर आएगी तो उसे आपके साथ अकेले में रहने का अवसर मिलना चाहिए। मेरे सामने वो बेचारी आपसे कुछ कह भी नहीं पाएगी। उसका कुछ कहने और करने का मन होगा तो वो कर भी नहीं पाएगी। इस लिए उसका आपके साथ दूसरे कमरे में रहना ही ठीक होगा।"
"वैसे क्या नहीं कर पाएगी वो?" मैंने ध्यान से उनकी तरफ देखते हुए पूछा____"क्या कुछ करना भी होता है?"
"ह...हां...नहीं...मतलब।" वो एकदम से हकलाने लगीं____"क...क्या आपको नहीं पता?"
"कैसे पता होगा भला?" मैं मुस्कुराया____"पहली बार तो विवाह हुआ है मेरा। मुझे क्या पता विवाह के बाद क्या क्या होता है? आपको तो पता होगा ना तो आप ही बताइए।"
मेरी इस बात से रागिनी इस बार कुछ न बोलीं। मैंने महसूस किया कि एकदम से ही उनके चेहरे पर संजीदगी के भाव उभर आए थे। मैं समझ गया कि मेरी इस बात से उन्हें अपने पूर्व विवाह की याद आ गई थी जिसके चलते यकीनन उन्हें बड़े भैया का भी ख़याल आ गया होगा। मुझे खुद पर गुस्सा आया कि मैंने ऐसी बात कही ही क्यों उनसे?
मैं हिम्मत कर के उनके पास खिसक कर आया और फिर हाथ बढ़ा कर उन्हें अपनी तरफ खींच लिया। वो मेरी इस क्रिया से पहले तो चौंकी, थोड़ी घबराई भी लेकिन फिर जैसे खुद को मेरे हवाले कर दिया। हालत तो मेरी भी ख़राब हो गई थी लेकिन मैंने भी सोचा कि अब जो होगा देखा जाएगा। वैसे भी मैं उन्हें इस वक्त किसी बात से दुखी नहीं करना चाहता था।
मैंने रागिनी को थोड़ा और अपने पास खींचा और खुद से छुपका लिया। मैंने महसूस किया कि उनका नाज़ुक बदन हल्के हल्के कांप सा रहा था।
"माफ़ कर दीजिए मुझे।" फिर मैंने उनके मन का विकार दूर करने के इरादे से कहा____"मेरा इरादा आपको ठेस पहुंचाने का या दुखी करने का नहीं था। मैं तो बस आपको छेड़ रहा था, ये सोच कर कि शायद आपको भी इससे हल्का महसूस हो।"
"आ...आप माफ़ी मत मांगिए।" उन्होंने मुझसे छुपके हुए ही कहा____"मैं जानती हूं कि आप मुझे दुखी नहीं कर सकते।"
"चलिए इसी बहाने कम से कम आप मेरे इतना पास तो आ गईं।" मैं हल्के से मुस्कुराया____"आपको इस तरह खुद से छुपका लिया तो एक अलग ही एहसास हो रहा है मुझे। क्या आपको भी हो रहा है?"
"हम्म्म्म।" उन्होंने धीमें से कहा।
"तो बताइए ना कि विवाह के बाद क्या होता है?" मैंने धड़कते दिल से पूछा।
"वो तो आपको पता ही होगा।" उन्होंने मेरे सीने में खुद को सिमटाते हुए कहा____"मुझे कुछ नहीं मालूम।"
"वाह! तो आप झूठ भी बोलती हैं?" मैं मुस्कुरा उठा____"वो भी इतने मधुर अंदाज़ में, जवाब नहीं आपका।"
मेरी बात सुन कर वो और भी ज़्यादा सिमट गईं। मैं समझ सकता था कि उन्हें इस बारे में बात करने से शर्म आ रही थी। मैं ये भी समझ सकता था कि वो चाहती थीं कि मैं ही पहल करूं। अगर ऐसा न होता तो वो इस वक्त मुझसे छुपकी लेटी ना होती।
"ठीक है।" मैंने बड़ी हिम्मत के साथ कहा____"अगर आप बताना नहीं चाहती तो मैं भी आपको परेशान नहीं करूंगा। अच्छा एक बात पूछूं आपसे?"
"हम्म्म्म।"
"मैंने सुना है कि विवाह के बाद पति पत्नी सुहागरात की अनोखी रस्म निभाते हैं।" मैंने धड़कते दिल से कहा____"उस रस्म में वो दोनों एक दूसरे से प्रेम करते हैं और फिर दोनों एकाकार हो जाते हैं। मैं आपसे पूछना चाहता हूं कि क्या आप चाहती हैं कि हम भी ये रस्म निभाएं और फिर एकाकार हो जाएं?"
"आ...आपको जो ठ..ठीक लगे कीजिए।" रागिनी ने अटकते हुए धीमें से कहा।
"मैं आपकी इच्छा के बिना कोई कार्य नहीं करूंगा।" मैंने कहा____"आपकी इच्छाओं का और आपकी भावनाओं का सम्मान करना मेरी सबसे पहली प्राथमिकता है। आपको हर दुख से दूर करना और आपको खुश रखना मेरा कर्तव्य है। अतः जब तक आपकी इच्छा नहीं होगी तब तक मैं कुछ नहीं करूंगा।"
मेरी बातें सुन कर रागिनी ने एकदम से अपने हाथ बढ़ाए और मुझे पकड़ कर खुद से जकड़ लिया। शायद मेरी बातें उनके दिल को छू गईं थी। अचानक ही उनकी सिसकियां फूट पड़ीं।
"अरे! क्या हुआ आपको?" मैं एकदम से घबरा गया____"क्या मुझसे कोई ग़लती हो गई है?"
"न..नहीं।" उन्होंने और भी जोरों से मुझे जकड़ लिया, रुंधे गले से बोलीं_____"बस मुझे प्यार कीजिए। मुझे खुद में समा लीजिए।"
"क...क्या आप सच कह रही हैं?" मैं बेयकीनी से पूछ बैठा____"क्या सच में आप चाहती हैं कि मैं आपको प्रेम करूं और हम दोनों एकाकार हो जाएं?"
"ह...हां म...मैं चाहती हूं।" रागिनी कहने के साथ ही मुझसे अलग हुईं, फिर बोलीं____"मैं आपका प्रेम पाना चाहती हूं। पूरी तरह आपकी हो जाना चाहती हूं।"
मैंने देखा उनकी आंखों में आंसू थे। चेहरे पर दुख के भाव नाच रहे थे। मेरे एकदम पास ही थीं वो। उनकी तेज़ चलती गर्म सांसें मेरे चेहरे पर पड़ रहीं थी। तभी जाने उन्हें क्या हुआ कि वो ऊपर को खिसकीं और इससे पहले कि मैं कुछ समझ पाता उन्होंने मेरे सूखे होठों को झट से चूम लिया।
मेरे होठों को चूमने के बाद वो फ़ौरन ही नीचे आ कर मेरे सीने में शर्म के मारे छुपक गईं। मैं भौचक्का सा किसी और ही दुनिया में पहुंच गया था। फिर जैसे मुझे होश आया तो मैंने उनकी तरफ देखा।
"ये...ये क्या था रागिनी?" मैंने उत्सुकता से पूछा।
"मे...मेरे प्यार का सबूत।" उन्होंने धीमें स्वर में कहा____"इससे आगे अब कुछ मत पूछिएगा मुझसे। बाकी आपकी पत्नी अब आपकी बाहों में है।"
"क्या सच में?" मैं मुस्कुरा उठा।
सारा डर, सारी घबराहट न जाने कहां गायब हो गई थी। ऐसा लगने लगा था जैसे अब कुछ भी मुश्किल नहीं रह गया था। मैंने बड़े प्यार से उनके चेहरे को अपनी हथेलियों में लिया। रागिनी ने शर्म से अपनी पलकें बंद कर ली। उनके गुलाब की पंखुड़ियों जैसे होठ थोड़ा सा खुले हुए थे और थोड़ा थोड़ा कांप भी रहे थे। मैं आगे बढ़ा और गुलाब की पंखुड़ियों पर अपने होठ रख दिया। मेरे ऐसा करते ही उनका पूरा बदन कांप उठा। उन्होंने पूरी तरह से खुद को जैसे मेरे हवाले कर दिया था। उनका बदन कांप रहा था लेकिन वो कोई विरोध नहीं कर रहीं थी। खुद से कुछ कर भी नहीं रहीं थी। ऐसा लग रहा था जैसे वो मेरे साथ किसी और ही दुनिया में खोने लगीं थी।
सुहागरात की रस्म बड़े प्रेम के साथ रफ़्ता रफ़्ता आगे बढ़ती रही और हम दोनों कुछ ही समय में दो जिस्म एक जान होते चले गए। रागिनी अब पूर्ण रूप से मेरी पत्नी बन चुकीं थी।
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"क्या हुआ?" रागिनी को कुछ सोचते देख मैंने पूछा____"आप ठीक तो हैं? कोई समस्या तो नहीं है ना?"
"न..नहीं।" उन्होंने कहा____"ऐसी कोई बात नहीं है। मैं ठीक हूं।"
"ठीक है।" मैंने धड़कते दिल से कहा____"तो फिर आप अब आराम कीजिए। कल रात से आपको ठीक से आराम करने को नहीं मिला है अतः आप अब आराम से लेट जाइए।"
"ह...हां पर।" वो झिझकते हुए बोलीं____"मैं ऐसे नहीं सो पाऊंगी। मे...मेरा मतलब है कि इतने सारे ये गहने पहने और ये भारी सी साड़ी पहने सोना मुश्किल है।"
"ओह! हां।" मैंने उनके पूरे बदन को देखते हुए कहा____"तो ठीक है आप इन्हें उतार दीजिए। मेरा मतलब है कि आपको जैसे ठीक लगे वैसे आराम से सो जाइए।"
रागिनी मेरी बात सुन कर असमंजस जैसी हालत में बैठी कभी मुझे एक नज़र देखती तो कभी नज़रें घुमा कर कहीं और देखने लगतीं। मुझे समझ ना आया कि आख़िर अब उन्हें क्या समस्या थी?
"क्या हुआ?" मैं बेचैनी से पूछ बैठा____"देखिए अगर कोई बात है तो आप बेझिझक बता दीजिए मुझे। आप जानती हैं ना कि मैं आपको किसी भी तरह की परेशानी में नहीं देख सकता। आपको खुश रखना पहले भी मेरी प्राथमिकता थी और अब तो और भी हो गई है। आपको पता है आपकी छोटी बहन कामिनी ने मुझसे जूता चुराई के नेग में मुझसे क्या मांगा था?"
"क...क्या मांगा था उसने?" भाभी ने मेरी तरफ उत्सुकता से देखा।
"यही कि मैं हमेशा उनकी दीदी को खुश रखूं।" मैंने अधीरता से कहा____"उनको कभी दुखी न होने दूं और हमेशा उन्हें प्यार करूं।"
"क...क्या???" रागिनी के चेहरे पर हैरत के भाव उभरे____"उसने ऐसा कहा आपसे?"
"हां।" मैंने हल्के से मुस्कुरा कर कहा____"और जवाब में मैंने ऐसा करने का उन्हें वचन भी दिया। मुझे बिल्कुल भी उम्मीद नहीं थी कि कामिनी मुझसे नेग के रूप में ऐसा करने का वचन लेंगी। पर मैं खुश हूं कि उन्होंने चंद रुपयों की जगह आपकी खुशियों को ज़्यादा महत्व दिया। ज़ाहिर है उन्हें आपसे बहुत प्यार है।"
"हां।" रागिनी ने गहरी सांस ली____"वो मुझसे बहुत प्यार करती है। हालाकि उसका स्वभाव शुरू से ही शांत और गंभीर रहा था लेकिन मुझसे हमेशा लगाव था उसे। जब उसे पता चला कि मेरा आपसे विवाह करने की बात चली है तब उसे इस बात से बड़ा झटका लगा था। वो फ़ौरन ही मेरे पास आई थी और कहने लगी कि मैं इस रिश्ते के लिए साफ इंकार कर दूं। मैं जानती थी कि वो आपको पसंद नहीं करती थी इसी लिए इंकार करने को कह रही थी लेकिन मैं उस समय कोई भी फ़ैसला लेने की हालत में नहीं थी। मैं तो कल्पना भी नहीं कर सकती थी कि ऐसा भी कुछ होगा।"
"मैंने भी कल्पना नहीं की थी।" मैंने कहा____"मुझे तो किसी ने पता ही नहीं चलने दिया था। अगर मैं आपको लेने चंदनपुर न जाता तो शायद पता भी न चलता।"
"एक बात पूछूं आपसे?" रागिनी ने धीमें से कहा।
"आपको किसी बात के लिए इजाज़त लेने की ज़रूरत नहीं है।" मैंने कहा____"आप बेझिझक हो कर मुझसे कुछ भी पूछ सकती हैं और मुझे कुछ भी कह सकती हैं।"
"मैं ये पूछना चाहती हूं कि क्या आपने ये रिश्ता मजबूरी में स्वीकार किया था?" रागिनी ने अपलक मेरी तरफ देखते हुए पूछा____"अगर आपके बस में होता तो क्या आप इस रिश्ते से इंकार कर देते?"
"मैं नहीं जानता कि आप क्या सोच कर ये पूछ रहीं हैं।" मैंने कहा____"फिर भी अगर आप जानना चाहती हैं तो सुनिए, सच ये है कि आपकी खुशी के लिए अगर मुझे कुछ भी करना पड़ता तो मैं बेझिझक करता। इस रिश्ते को मैंने मजबूरी में नहीं बल्कि ये सोच कर स्वीकार किया था कि ऐसे में पूरे हक के साथ मैं अपनी भाभी को खुश रखने का प्रयास कर सकूंगा। सवाल आपका था रागिनी। सवाल आपके जीवन को संवारने का था और सवाल आपकी खुशियों का था। मैं ये हर्गिज़ नहीं चाह सकता था कि आपके चेहरे पर कभी दुख की परछाईं भी पड़े। पहले मेरे बस में नहीं था लेकिन अब है। हां रागिनी, अब मैं हर वो कोशिश करूंगा जिसके चलते आप अपना हर दुख भूल जाएं और खुश रहने लगें। जब मुझे इस रिश्ते के बारे में पता चला था तो शुरू में बड़ा आश्चर्य हुआ था मुझे लेकिन धीरे धीरे एहसास हुआ कि एक तरह से ये अच्छा ही हुआ। कम से कम ऐसा होने से आपका जीवन फिर से तो संवर जाएगा। आपको जीवन भर विधवा के रूप में कोई कष्ट तो नहीं उठाना पड़ेगा। हां ये सोच कर ज़रूर मन व्यथित हो उठता था कि जाने आप क्या सोचती होंगी मेरे बारे में? आख़िर पता तो आपको भी था कि मेरा चरित्र कितने निम्न दर्जे का था। यही सब सोच कर आपसे मिलने चंदनपुर गया था। मैं आपसे अपने दिल की सच्चाई बताना चाहता था। मैं बताना चाहता था कि भले ही हमारे माता पिता ने हमारे बीच ये रिश्ता बनाने का सोच लिया है लेकिन इसके बाद भी मेरे मन में आपके लिए कोई ग़लत ख़याल नहीं आए हैं। अपने दामन पर हर तरह के दाग़ लग जाना स्वीकार कर सकता था लेकिन आपके ऊपर कोई दाग़ लग जाए ये हर्गिज़ मंजूर नहीं था मुझे।"
"हां मैं जानती हूं।" रागिनी ने अधीरता से कहा____"आपको ये सब कहने की ज़रूरत नहीं है। सच कहूं तो मुझे भी इसी बात की खुशी है कि इस बारे में मेरी शंका और बेचैनी बेवजह थी। मुझे यकीन था कि आप सिर्फ मेरी खुशियों के चलते ही इस रिश्ते को स्वीकार करेंगे।"
"सच सच बताइए।" मैंने अधीरता से पूछा____"आप इस रिश्ते से खुश तो हैं ना? आपके मन में जो भी हो बता दीजिए मुझे। मैं हर सूरत में आपको खुश रखूंगा। आपके जैसी गुणवान पत्नी मिलना मेरे लिए सौभाग्य की बात है किंतु ये भी सोचता हूं कि क्या मेरे जैसे इंसान का पति के रूप में मिलना आपके लिए अच्छी बात है या नहीं?"
"ऐसा मत कहिए।" रागिनी का स्वर लड़खड़ा गया____"आपको पति के रूप में पाना मेरे लिए भी सौभाग्य की बात है।"
"क्या सच में???" मैंने आश्चर्य से उन्हें देखा।
"पहले कभी हिम्मत ही नहीं जुटा पाई थी।" रागिनी ने अधीरता से कहा____"लेकिन आज शायद इस लिए जुटा पा रही हूं क्योंकि अब मैं आपकी पत्नी बन चुकी हूं।"
"आप ये क्या कह रही हैं?" मैं चकरा सा गया____"मुझे कुछ समझ नहीं आया।"
"क्या आप इस बात की कल्पना कर सकते हैं कि अनुराधा और रूपा की तरह मैं भी आपसे प्रेम करती होऊंगी?" रागिनी ने ये कह कर मानों धमाका किया____"क्या आप कल्पना कर सकते हैं आपकी ये पत्नी आपको पहले से ही प्रेम करती थी?"
"ये....ये आप क्या कह रहीं हैं???" मेरे मस्तिष्क में सचमुच धमाका हो गया____"अ...आप मुझसे पहले से ही प्रेम करती हैं? ये...ये कैसे हो सकता है?"
"मैं भी अपने आपसे यही सवाल किया करती थी?" रागिनी ने कहा____"जवाब तो नहीं मिलता था लेकिन हां शर्म से पानी पानी ज़रूर हो जाती थी। अपने आपको ये कह कर धिक्कारने लगती थी कि रागिनी तू अपने ही देवर से प्रेम करने का सोच भी कैसे सकती है? ये ग़लत है, ये पाप है।"
मैं भौचक्का सा उन्हें ही देखे जा रहा था। कानों में सांय सांय होने लगा था। दिल की धड़कनें हथौड़े जैसा चोट करने लगीं थी।
"अ...आप तो बड़ी ही आश्चर्यजनक बात कर रहीं हैं।" मैंने खुद को सम्हालते हुए कहा____"यकीन नहीं हो रहा मुझे।"
"जब मुझे ही यकीन नहीं हो रहा था तो आपको भला कैसे इतना जल्दी यकीन हो जाएगा?" रागिनी ने कहा____"अपने देवर के रूप में तो आपको मैं पहले ही पसंद करती थी। हमेशा गर्व होता था कि आपके जैसा लड़का मेरा देवर है। आगे चल कर ये पसंद कब रिश्ते की मर्यादा को लांघ गई मुझे आभास ही नहीं हुआ। फिर जब मैं विधवा हो गई और जिस तरह से आपने मुझे सम्हाला तथा मुझे खुश करने के प्रयास किए उससे मेरे हृदय में फिर से पहले वाले जज़्बात उभरने लगे लेकिन मैं उन्हें दबाती रही। खुद पर ये सोच कर क्रोध भी आता कि ये कैसी नीचतापूर्ण सोच हो गई है मेरी? अगर किसी को भनक भी लग गई तो क्या सोचेंगे सब मेरे बारे में? सच कहूं तो जितना विधवा हो जाने का दुख था उतना ही इस बात का भी था। अकेले में बहुत समझाती थी खुद को मगर आपको देखते ही बावरा मन फिर से आपकी तरफ खिंचने लगता था। ऊपर से जब आप मुझे इतना मान सम्मान देते और मेरा ख़याल रखते तो मैं और भी ज़्यादा आप पर आकर्षित होने लगती। मन करता कि आपके सीने से लिपट जाऊं मगर रिश्ते का ख़याल आते ही खुद को रोक लेती और फिर से खुद को कोसने लगती। ये सोच कर शर्म भी आती कि हवेली का हर सदस्य मुझे कितना चाहता है और मैं अपने ही देवर के प्रेम में पड़ गई हूं। मैंने कभी कल्पना नहीं की थी कि ऊपर वाला मेरे जीवन में मुझे ऐसे दिन भी दिखाएगा और मेरे हृदय में मेरे अपने ही देवर के प्रति प्रेम के अंकुर पैदा कर देगा।"
रागिनी एकाएक चुप हो गईं तो कमरे में सन्नाटा छा गया। मैं जो उनकी बातों के चलते किसी और ही दुनिया ने पहुंच गया था फ़ौरन ही उस दुनिया से बाहर आ गया।
"प्रेम का अंकुर फूटना ग़लत नहीं है क्योंकि ये तो एक पवित्र एहसास होता है।" रागिनी ने एक लंबी सांस ले कर कहा____"लेकिन प्रेम अगर उचित व्यक्ति से न हो कर किसी ऐसे व्यक्ति से हो जाए जो रिश्ते में देवर लगता हो तो फिर उस प्रेम के मायने बदल जाते हैं। लोगों की नज़र में वो प्रेम पवित्र नहीं बल्कि एक निम्न दर्ज़े का नाम प्राप्त कर लेता है जिसके चलते उस औरत का चरित्र भी निम्न दर्ज़े का हो जाता है। यही सब सोचती रहती थी मैं और अकेले में दुखी होती रहती थी। हर रोज़ फ़ैसला करती कि अब से आपके प्रति ऐसे जज़्बात अपने दिल में नहीं रखूंगी लेकिन आपको देखते ही जज़्बात मचल उठते। मैं सब कुछ भूल जाती और आपके साथ हंसी खुशी से नोक झोंक करने लगती। आपको छेड़ती, आपकी टांगें खींचती तो मुझे बड़ा आनंद आता। आप जब नज़रें चुराने लगते तो मुझे अपने आप पर गर्व तो होता लेकिन ये देख कर खुश भी होती कि आप कितना मानते हैं मुझे। मैं खुद ही ये सोच लेती कि शायद आप मुझे बहुत चाहते हैं इसी लिए मेरी हर बात मानते हैं और हर तरह से मुझे खुश रखने की कोशिश करते रहते हैं। कोई पुरुष जब किसी औरत के लिए इतना कुछ करने लगता है तो उस औरत के हृदय में उसके प्रति कोमल भावनाएं पैदा हो ही जाती हैं। अकेले में भले ही मैं इस प्रेम की भावना को सोच कर खुद को कोसती और दुखी होती थी लेकिन आपके साथ होने पर जो खुशियां मिलती उनसे जुदा भी नहीं कर पाती थी। यूं समझिए कि जान बूझ कर हर रोज़ यही गुनाह करती थी क्योंकि दिल नहीं मानता था। क्योंकि दिल मजबूर करता था। क्योंकि आपके साथ दो पल की खुशी पाने की ललक होती थी।"
"अगर आप सच में मुझसे प्रेम करने लगीं थी।" मैंने अपने अंदर के तूफ़ान को काबू करते हुए कहा____"तो आपको मुझे बताना चाहिए था।"
"आपके लिए ये बात बताना आसान हो सकता था ठाकुर साहब।" रागिनी ने फीकी सी मुस्कान के साथ कहा____"लेकिन मेरे लिए कतई आसान नहीं हो सकता था। मैं एक बड़े खानदान की बहू थी। एक ऐसी बहू जिसके सास ससुर को इस बात का गुमान था कि उनकी बहू दुनिया की सबसे गुणवान बहू है। एक ऐसी बहू जिसे उसके सास ससुर अपनी हवेली की शान समझते थे। एक ऐसी बहू जिसे हर किसी ने अपनी पलकों पर बिठा रखा था। एक ऐसी बहू जिसका पति ईश्वर के घर में था और वो एक विधवा थी। सोचिए ठाकुर साहब, अगर ऐसी बहू के बारे में किसी को पता चल जाता कि वो अपने ही देवर से प्रेम करती है तो क्या होता? अरे! उनका तो जो होता वो होता ही लेकिन मेरा क्या होता? इतना तो यकीन था मुझे कि ये बात जानने के बाद भी मेरे पूज्यनीय सास ससुर मुझे कुछ न कहते लेकिन क्या मैं उनके सामने खड़े होने की स्थिति में रहती? सच तो ये है कि उस सूरत में मेरे लिए सिर्फ एक ही रास्ता होता...शर्म से डूब मरने का रास्ता। आप कहते हैं कि मुझे आपको बताना चाहिए था तो खुद बताइए कि कैसे बताती आपको? आप भले ही मेरे बारे में ग़लत न सोच बैठते लेकिन मेरे मन में तो यह होता ही न कि आप यही सोचेंगे कि पति के गुज़र जाने के बाद मैं आपसे प्रेम करने का स्वांग सिर्फ इसी लिए कर रही हूं क्योंकि इसके पीछे मेरी अपनी कुत्सित मानसिकता है।"
"मैं आपके बारे में ऐसा ख़वाब में भी नहीं सोच सकता था।" मैंने अधीरता से कहा।
"मानती हूं।" रागिनी ने कहा____"लेकिन मैं अपने मन का क्या करती? उस समय मन में ऐसी ही बातें उभर रहीं थी जिसके चलते मैं ये तक सोच बैठी थी कि कितनी बुरी हूं मैं जो अपने अंदर की भावनाओं को काबू ही नहीं रख पा रही हूं। कितनी निर्लज्ज हूं जो अपने ही देवर से प्रेम करने लगी हूं।"
"ईश्वर के लिए ऐसी बातें कर के खुद की तौहीन मत कीजिए।" मैं बोल पड़ा____"मैं समझ सकता हूं कि इस सबके चलते आपके मन में कैसे कैसे विचार उभरे रहे होंगे। मैं ये भी समझ सकता हूं कि आपने इसके लिए क्या क्या सहा होगा। सच कहूं तो इसमें आपकी कोई ग़लती नहीं है इस लिए आप ये सब कह कर खुद को दुखी मत कीजिए।"
"आपको पता है।" रागिनी ने उसी अधीरता से कहा____"जब आपके साथ मेरा विवाह कर देने की बात चली थी तो मुझे यकीन ही नहीं हुआ था। ऐसा लगा था जैसे मैं दिन में ही कोई ख़्वाब देखने लगी हूं। फिर जब यकीन हो गया कि यही हकीक़त है तो उस दिन पहली बार सच्ची खुशी का एहसास हुआ था मुझे। अकेले में अपने सामने यही सोच कर चकित होती थी कि ये कैसा विचित्र संयोग बना बैठा है ऊपर वाला। हालाकि आपसे मेरा विवाह होने की मैंने कभी कल्पना नहीं की थी लेकिन हां ये ज़रूर सोचा करती थी कि काश! मेरी भी किस्मत में ऐसे असंभव प्रेम का मिल जाना लिखा होता। कई दिन तो इस हकीक़त को यकीन करने में ही निकल गए। मेरी मां, मेरी भाभियां और मेरी बहन सब इस बारे में मुझसे बातें करती लेकिन मुझे कुछ समझ ही न आता कि क्या कहूं? उनमें से किसी को बता भी नहीं सकती थी कि मेरे अंदर का सच क्या है? बताने का मतलब था उनका भी यही सोच बैठना कि कितनी निर्लज्ज हूं मैं जो पहले से ही अपने देवर को प्रेम करती आ रही हूं। इस लिए कभी किसी को अपने अंदर के सच का आभास तक नहीं होने दिया। दिखावे के लिए उनसे ऐसी ऐसी बातें कहती जिससे उन्हें यही लगे कि मैं इस रिश्ते के लिए बहुत ज़्यादा परेशान हूं। दूसरी तरफ मैं ये भी सोचने लगी थी कि इस रिश्ते के बारे में अब आप क्या सोच रहे होंगे? कहीं आप भी तो सबकी तरह मुझे ग़लत नहीं सोचने लगे होंगे? हालाकि मुझे यकीन था कि आप ऐसा कभी सोच ही नहीं सकते थे लेकिन मन था कि जाने कैसी कैसी शंकाएं करता ही रहता था। मां, भाभी, कामिनी और शालिनी जब मुझे समझाने आतीं तो उनसे भी दिखावे के रूप में अपनी परेशानी ही ज़ाहिर करती और ये परखने की कोशिश करती कि वो सब इस रिश्ते के बारे में अपने क्या विचार प्रस्तुत करती हैं? आख़िर वो सब क्या सोचती हैं इस संबंध के बारे में? अकेले में मैं अपने नाटक और नासमझी के बारे में सोचती तो मुझे ये सोच कर दुख होता कि सबको कैसे उलझाए हुए हूं मैं। कैसे सबके साथ छल कर रही हूं मैं। वो सब मुझे इतना समझाती हैं और मैं नाटक किए जा रही हूं? सच तो ये था कि किसी से सच बताने की हिम्मत ही नहीं होती थी। मुझे ऐसा लगता था कि अगर मैं किसी से अपने अंदर का सच बता दूंगी तो जाने वो मेरे बारे में क्या क्या सोच बैठेंगी? फिर मैं कैसे उनकी शक भरी नज़रों का सामना कर सकूंगी?"
रागिनी इतना सब बोल कर चुप हुईं तो एक बार फिर से कमरे में सन्नाटा छा गया। मेरे ज़हन में अब भी धमाके हो रहे थे। मैं सोचने लगा था कि क्या अभी और भी ऐसा कोई सच मुझे जानने को मिलने वाला है जिसकी मैं कल्पना भी नहीं कर सकता हूं?
"आप ये सब सुन कर परेशान मत होइए।" फिर रागिनी ने कहा____"मैं तो ये सब आपको भी न बताती लेकिन इस लिए बताया क्योंकि अब आप मेरे पति हैं और मैं आपकी पत्नी। आपको अपने बारे में और अपने दिल की बातें छुपाना मेरा धर्म है। मैं आपसे कभी नहीं कहूंगी कि आप ये सब जानने के बाद मुझे प्रेम करें। आप पर अनुराधा का हक़ था, उसके बाद रूपा का हक़ है और मैं उस मासूम का हक़ छीनने का सोच भी नहीं सकती कभी।"
"मुझे समझ नहीं आ रहा कि इस संबंध में आपसे क्या कहूं?" मैंने गहरी सांस ले कर कहा____"आप पहले से मुझे पसंद करती थीं या मुझसे प्रेम करने लगीं थी ये मेरे लिए ऐसी बात है जिसकी मैं कल्पना तक नहीं कर सकता था। अपने दिल का सच बताऊं तो वो यही है कि मैंने हमेशा आपको आदर सम्मान की भावना से ही देखा है। ये सच है कि कभी कभी मेरे मन में आपको देख कर ये ख़याल उभर आता था कि काश! आपके जैसी खूबसूरत और नेकदिल औरत मेरे भी नसीब में होती। आप पर हमेशा आकर्षित होता था मैं। डरता था कि कहीं इस आकर्षण के चलते किसी दिन मुझसे कोई गुनाह न हो जाए इस लिए हमेशा आपसे दूर दूर ही रहता था। आपकी पवित्रता पर किसी कीमत में दाग़ नहीं लगा सकता था मैं। आप हर तरह से हमारे लिए अनोखी थीं। ख़ैर छोड़िए इन बातों को। मुझे आपका सच जान कर आश्चर्य तो हुआ है लेकिन कहीं न कहीं खुशी भी हो रही है कि आपके दिल में मेरे प्रति प्रेम की भावना है। एक बार फिर से ऊपर वाले को धन्यवाद देता हूं कि उसने मुझ जैसे इंसान के जीवन में अनुराधा, रूपा और आपके जैसी नेकदिल औरतों को भेजा। अनुराधा के जाने का दुख तो हमेशा रहेगा क्योंकि उसी की वजह से मैं प्रेम के मार्ग पर चला था किंतु आप दोनों का अद्भुत प्रेम पा कर भी मैं अपने आपको खुश किस्मत समझता हूं। अच्छा अब बातें बंद करते हैं। रात ज़्यादा हो गई है। आपको सो जाना चाहिए।"
मेरी बात सुन कर रागिनी ने सिर हिलाया और फिर झिझकते हुए पलंग से नीचे उतरीं। मेरे देखते ही देखते उन्होंने झिझकते हुए अपने गहनें निकाल कर एक तरफ रख दिए। फिर वो मेरी तरफ पलटीं। मेरी धड़कनें फिर से तेज़ हो गईं थी। मैं जानता था कि विवाह के बाद पति पत्नी सुहागरात भी मनाते हैं लेकिन हमारे बीच ऐसा होना कितना संभव था ये हम दोनों ही जानते थे।
"वो आप उधर घूम जाइए ना।" उन्होंने झिझकते हुए कहा तो मैंने फ़ौरन ही लेट कर दूसरी तरफ करवट ले ली। मैं सोचने लगा कि अब वो अपने कपड़े उतारने लगेंगी, उसके बाद वो मेरे पास आ कर मेरे साथ लेट जाएंगी।
कुछ देर बाद पलंग में हलचल हुई। मैं समझ गया कि वो अपने कपड़े उतार कर या फिर दूसरे कपड़े पहन कर पलंग पर सोने के लिए आ गईं हैं। मैंने महसूस किया कि हमारे बीच कुछ फांसला था। मैं सोचने लगा कि क्या मुझे उनसे कुछ कहना चाहिए? मेरा मतलब है कि क्या मुझे उनसे सुहागरात के बारे में कोई बात करनी चाहिए? मेरा दिल धाड़ धाड़ कर के बजने लगा।
"स...सुनिए।" काफी देर की ख़ामोशी के बाद सहसा रागिनी ने धीमें से मुझे पुकारा____"सो गए क्या आप?"
"न...नहीं तो।" मैं फ़ौरन ही बोल पड़ा किंतु फिर अचानक ही मुझे एहसास हुआ कि मुझे फ़ौरन नहीं बोल पड़ना चाहिए था। क्या सोचेंगी अब वो कि जाने क्या सोचते हुए जग रहा हूं मैं?
"वो...मैंने दिन में सो लिया था न।" फिर मैंने उनकी तरफ पलटते हुए कहा____"इस लिए इतना जल्दी नींद नहीं आएगी मुझे लेकिन आप सो जाइए।"
"हम्म्म्म।" उन्होंने धीमें से कहा____"वैसे रूपा को कब ब्याह कर लाएंगे आप?"
"आज का दिन तो गुज़र ही गया है।" मैंने कहा____"तो इस हिसाब से चौथे दिन जाना होगा।"
"त...तो फिर जब मेरी छोटी बहन आपकी पत्नी बन कर यहां आ जाएगी।" रागिनी ने जैसे उत्सुकता से पूछा____"तो क्या वो भी इसी कमरे में हमारे साथ रहेगी या फिर...?"
"इस बारे में क्या कहूं मैं?" मैं उनकी इस बात से खुद भी सोच में पड़ गया था, फिर सहसा मुझे शरारत सी सूझी तो मुस्कुराते हुए बोला____"वैसे तो शायद मां उसे दूसरे कमरे में रहने की व्यवस्था करवा सकती हैं लेकिन अगर आपकी इच्छा हो तो उसको अपने साथ ही इस कमरे में सुला लेंगे। मुझे तो कोई समस्या नहीं है, क्या आपको है?"
"धत्त।" रागिनी एकदम से सिमट गईं____"ये क्या कह रहे हैं?"
"बस पूछ ही तो रहा हूं आपसे।" मैं मुस्कुराया____"जैसे आप मेरी पत्नी हैं वैसे ही वो भी तो मेरी पत्नी ही होगी और पत्नी तो अपने पति के साथ ही कमरे में रहती हैं।"
"हां ये तो है।" रागिनी ने कहा____"लेकिन वो भी अगर साथ में रहेगी तो कितना अजीब लगेगा मुझे। मुझे तो बहुत ज़्यादा शर्म आएगी।"
"शर्म किस बात की भला?" मैंने पूछा।
"व...वो...मुझे नहीं पता।" रागिनी को जैसे जवाब न सूझा।
"अब ये क्या बात हुई?" मैं मुस्कुरा उठा। मेरा हौंसला धीरे धीरे बढ़ने लगा____"आपको उसके साथ रहने से शर्म तो आएगी लेकिन क्यों आएगी यही नहीं पता आपको? ऐसा कैसे हो सकता है?"
"क्योंकि ये अच्छी बात नहीं होगी इस लिए।" उन्होंने झिझकते हुए कहा____"वो आपकी पत्नी बन कर आएगी तो उसे आपके साथ अकेले में रहने का अवसर मिलना चाहिए। मेरे सामने वो बेचारी आपसे कुछ कह भी नहीं पाएगी। उसका कुछ कहने और करने का मन होगा तो वो कर भी नहीं पाएगी। इस लिए उसका आपके साथ दूसरे कमरे में रहना ही ठीक होगा।"
"वैसे क्या नहीं कर पाएगी वो?" मैंने ध्यान से उनकी तरफ देखते हुए पूछा____"क्या कुछ करना भी होता है?"
"ह...हां...नहीं...मतलब।" वो एकदम से हकलाने लगीं____"क...क्या आपको नहीं पता?"
"कैसे पता होगा भला?" मैं मुस्कुराया____"पहली बार तो विवाह हुआ है मेरा। मुझे क्या पता विवाह के बाद क्या क्या होता है? आपको तो पता होगा ना तो आप ही बताइए।"
मेरी इस बात से रागिनी इस बार कुछ न बोलीं। मैंने महसूस किया कि एकदम से ही उनके चेहरे पर संजीदगी के भाव उभर आए थे। मैं समझ गया कि मेरी इस बात से उन्हें अपने पूर्व विवाह की याद आ गई थी जिसके चलते यकीनन उन्हें बड़े भैया का भी ख़याल आ गया होगा। मुझे खुद पर गुस्सा आया कि मैंने ऐसी बात कही ही क्यों उनसे?
मैं हिम्मत कर के उनके पास खिसक कर आया और फिर हाथ बढ़ा कर उन्हें अपनी तरफ खींच लिया। वो मेरी इस क्रिया से पहले तो चौंकी, थोड़ी घबराई भी लेकिन फिर जैसे खुद को मेरे हवाले कर दिया। हालत तो मेरी भी ख़राब हो गई थी लेकिन मैंने भी सोचा कि अब जो होगा देखा जाएगा। वैसे भी मैं उन्हें इस वक्त किसी बात से दुखी नहीं करना चाहता था।
मैंने रागिनी को थोड़ा और अपने पास खींचा और खुद से छुपका लिया। मैंने महसूस किया कि उनका नाज़ुक बदन हल्के हल्के कांप सा रहा था।
"माफ़ कर दीजिए मुझे।" फिर मैंने उनके मन का विकार दूर करने के इरादे से कहा____"मेरा इरादा आपको ठेस पहुंचाने का या दुखी करने का नहीं था। मैं तो बस आपको छेड़ रहा था, ये सोच कर कि शायद आपको भी इससे हल्का महसूस हो।"
"आ...आप माफ़ी मत मांगिए।" उन्होंने मुझसे छुपके हुए ही कहा____"मैं जानती हूं कि आप मुझे दुखी नहीं कर सकते।"
"चलिए इसी बहाने कम से कम आप मेरे इतना पास तो आ गईं।" मैं हल्के से मुस्कुराया____"आपको इस तरह खुद से छुपका लिया तो एक अलग ही एहसास हो रहा है मुझे। क्या आपको भी हो रहा है?"
"हम्म्म्म।" उन्होंने धीमें से कहा।
"तो बताइए ना कि विवाह के बाद क्या होता है?" मैंने धड़कते दिल से पूछा।
"वो तो आपको पता ही होगा।" उन्होंने मेरे सीने में खुद को सिमटाते हुए कहा____"मुझे कुछ नहीं मालूम।"
"वाह! तो आप झूठ भी बोलती हैं?" मैं मुस्कुरा उठा____"वो भी इतने मधुर अंदाज़ में, जवाब नहीं आपका।"
मेरी बात सुन कर वो और भी ज़्यादा सिमट गईं। मैं समझ सकता था कि उन्हें इस बारे में बात करने से शर्म आ रही थी। मैं ये भी समझ सकता था कि वो चाहती थीं कि मैं ही पहल करूं। अगर ऐसा न होता तो वो इस वक्त मुझसे छुपकी लेटी ना होती।
"ठीक है।" मैंने बड़ी हिम्मत के साथ कहा____"अगर आप बताना नहीं चाहती तो मैं भी आपको परेशान नहीं करूंगा। अच्छा एक बात पूछूं आपसे?"
"हम्म्म्म।"
"मैंने सुना है कि विवाह के बाद पति पत्नी सुहागरात की अनोखी रस्म निभाते हैं।" मैंने धड़कते दिल से कहा____"उस रस्म में वो दोनों एक दूसरे से प्रेम करते हैं और फिर दोनों एकाकार हो जाते हैं। मैं आपसे पूछना चाहता हूं कि क्या आप चाहती हैं कि हम भी ये रस्म निभाएं और फिर एकाकार हो जाएं?"
"आ...आपको जो ठ..ठीक लगे कीजिए।" रागिनी ने अटकते हुए धीमें से कहा।
"मैं आपकी इच्छा के बिना कोई कार्य नहीं करूंगा।" मैंने कहा____"आपकी इच्छाओं का और आपकी भावनाओं का सम्मान करना मेरी सबसे पहली प्राथमिकता है। आपको हर दुख से दूर करना और आपको खुश रखना मेरा कर्तव्य है। अतः जब तक आपकी इच्छा नहीं होगी तब तक मैं कुछ नहीं करूंगा।"
मेरी बातें सुन कर रागिनी ने एकदम से अपने हाथ बढ़ाए और मुझे पकड़ कर खुद से जकड़ लिया। शायद मेरी बातें उनके दिल को छू गईं थी। अचानक ही उनकी सिसकियां फूट पड़ीं।
"अरे! क्या हुआ आपको?" मैं एकदम से घबरा गया____"क्या मुझसे कोई ग़लती हो गई है?"
"न..नहीं।" उन्होंने और भी जोरों से मुझे जकड़ लिया, रुंधे गले से बोलीं_____"बस मुझे प्यार कीजिए। मुझे खुद में समा लीजिए।"
"क...क्या आप सच कह रही हैं?" मैं बेयकीनी से पूछ बैठा____"क्या सच में आप चाहती हैं कि मैं आपको प्रेम करूं और हम दोनों एकाकार हो जाएं?"
"ह...हां म...मैं चाहती हूं।" रागिनी कहने के साथ ही मुझसे अलग हुईं, फिर बोलीं____"मैं आपका प्रेम पाना चाहती हूं। पूरी तरह आपकी हो जाना चाहती हूं।"
मैंने देखा उनकी आंखों में आंसू थे। चेहरे पर दुख के भाव नाच रहे थे। मेरे एकदम पास ही थीं वो। उनकी तेज़ चलती गर्म सांसें मेरे चेहरे पर पड़ रहीं थी। तभी जाने उन्हें क्या हुआ कि वो ऊपर को खिसकीं और इससे पहले कि मैं कुछ समझ पाता उन्होंने मेरे सूखे होठों को झट से चूम लिया।
मेरे होठों को चूमने के बाद वो फ़ौरन ही नीचे आ कर मेरे सीने में शर्म के मारे छुपक गईं। मैं भौचक्का सा किसी और ही दुनिया में पहुंच गया था। फिर जैसे मुझे होश आया तो मैंने उनकी तरफ देखा।
"ये...ये क्या था रागिनी?" मैंने उत्सुकता से पूछा।
"मे...मेरे प्यार का सबूत।" उन्होंने धीमें स्वर में कहा____"इससे आगे अब कुछ मत पूछिएगा मुझसे। बाकी आपकी पत्नी अब आपकी बाहों में है।"
"क्या सच में?" मैं मुस्कुरा उठा।
सारा डर, सारी घबराहट न जाने कहां गायब हो गई थी। ऐसा लगने लगा था जैसे अब कुछ भी मुश्किल नहीं रह गया था। मैंने बड़े प्यार से उनके चेहरे को अपनी हथेलियों में लिया। रागिनी ने शर्म से अपनी पलकें बंद कर ली। उनके गुलाब की पंखुड़ियों जैसे होठ थोड़ा सा खुले हुए थे और थोड़ा थोड़ा कांप भी रहे थे। मैं आगे बढ़ा और गुलाब की पंखुड़ियों पर अपने होठ रख दिया। मेरे ऐसा करते ही उनका पूरा बदन कांप उठा। उन्होंने पूरी तरह से खुद को जैसे मेरे हवाले कर दिया था। उनका बदन कांप रहा था लेकिन वो कोई विरोध नहीं कर रहीं थी। खुद से कुछ कर भी नहीं रहीं थी। ऐसा लग रहा था जैसे वो मेरे साथ किसी और ही दुनिया में खोने लगीं थी।
सुहागरात की रस्म बड़े प्रेम के साथ रफ़्ता रफ़्ता आगे बढ़ती रही और हम दोनों कुछ ही समय में दो जिस्म एक जान होते चले गए। रागिनी अब पूर्ण रूप से मेरी पत्नी बन चुकीं थी।
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