Adultery शीला की लीला (५५ साल की शीला की जवानी) - Page 2 - SexBaba
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Adultery शीला की लीला (५५ साल की शीला की जवानी)

बिस्तर तो पहले से ही शराब गिरने से गीला था.. जीवा ने शीला के होंठों पर अपने होंठ रख दिए और जबरदस्त उत्तेजित होकर चूसने लगा.. शीला भी इस चुंबन का प्रति-उत्तर देते हुए... जीवा के होंठ चूसने लगी.. शीला को चूमते हुए जीवा अब भी उसके भोसड़े में शराब की बोतल अंदर बाहर किए जा रहा था.. शीला भी उत्तेजित होकर अपनी गांड को गोलाकार में घुमाते हुए बोतल से चुदने का मज़ा ले रही थी...





"आहहह.. ऊँहह.. हाय जीवा... अब रहा नही जाता... घुसेड़ दे बोतल पूरी की पूरी अंदर...फाड़ दो इसे" शीला बेकाबू होकर बकवास किए जा रही थी।

बोतल से चुदवाते हुए शीला रघु का लोडा पूरी हवस के साथ चूसने लगी... अब वह अपने आप पर आपा खो रही थी..

"जल्दी मूत बोतल के अंदर बहनचोद.. तेरी माँ को चोदू" जीवा ने हिंसक होकर शीला के स्तनों पर थूक दिया और बड़ी ही आक्रामकता से उसका गला दबा दिया... शीला की आँखें फट गई.. एक पल के लिए उसे लगा जैसे उसकी जान ही निकल जाएगी.. दूसरी तरफ रघु अपनी ओलिम्पिक की मशाल जैसा साढ़े दस इंच लंबा लंड, शीला के मुंह के अंदर तेजी से अंदर बाहर करते हुए चुसवा रहा था और साथ ही साथ उसकी निप्पलों को अपने नाखून से कुरेद भी रहा था










शीला से अपने मूत्राशय का दबाव और बर्दाश्त न हुआ.. वह अपनी चुत में घुसी बोतल में मूतने लगी.. ५५ साल की शीला की भोस से मूत ऐसे निकल रहा था जैसे ४ हॉर्सपावर के सबमर्सीबल पंप से पानी निकल रहा हो... भख भख मूत निकलने लगा और कुछ ही पल में बोतल भर गई..

"अब बस भी कर मादरजात... इतना सारा मूत!! यार रघु.. इसका भोसड़ा है या ९ इंच का बोर..!! कितना मूत रही है ये तो!! " पर शीला अपना मूत रोक ही नही पाई






जीवा का लंड अभी भी पतलून में ही था और शीला ने देखा नही था.. उसे रघु के लंड से फुरसत मिले तो जीवा का लंड देखें!! शराब की बोतल शीला की चुत से निकालकर जीवा ने कमरे में चारों ओर उस मूत्र-मदिरा के मिक्स्चर को छिड़क दिया.. अब जिस तरह की गंध कमरे से आ रही थी उसने इन तीनों की कामवासना को भड़का दिया.. आहहह... चुत से बोतल निकल जाने पर शीला को राहत मिली

पर यह कमीना रघु.. शीला के मुंह से लंड बाहर निकालने ही नही दे रहा था.. जीवा शीला की चुत पर उंगली फेरकर उसकी गांड के छेद तक ले गया और फिर गुर्राया "चल बे कुत्तिया... उलटी लेट जा.. तुझे तो आज मैं पीछे से ठोंकूँगा.. ओ रघु.. तू जा और अपनी वाली देसी दारू लेकर आ.. यह मूत जैसा दारू तो अंग्रेजों के लिये है.. अपुन को तो चाहिए असली देसी माल.."

शीला दो घड़ी जीवा को देखकर सोच रही थी "साले ये बंदर क्या जाने अदरख का स्वाद!! माँ चुदाये ये दोनों.. मुझे क्या!! मुझे तो इनके लंड मिल गए बस... भला हो रूखी का.. की वो मेरे घर आई.. और यह दो लंड मिल गए.. वरना मूठ मार मारकर मेरी तो चुत ही छील जाती.. "

रघु तुरंत बाइक की डिकी से ५-६ प्लास्टिक की थैली में भरी देसी दारू लेकर आ गया.. और दोनों एक के बाद एक ३-४ थैलियाँ पी गए!!

"अब मज़ा आएगा जीवा.. " दारू लगा हुआ मुंह पोंछते हुए रघु ने कहा

"हाँ यार रघु... असली मज़ा तो देसी पीने में ही आता है" कहते हुए जीवा खड़ा हो गया और अपनी पतलून उतार दी..

अरी मोरी अम्मा...!! जीवा का लंड देखकर शीला के पसीने छूट गए.. क्रिकेट के स्टम्प जैसा जीवा का लंड देखकर वह सोच रही थी की रूखी ऐसे लंड से चुदवाकर गदरा गई थी... ऐसे लंड से चुदवाने की आदत लगने के बाद अगर चुदाई बंद हो जाए तो औरत पराए लंड ढूँढे वह लाजमी ही था..






"शीला, चल उलटी होकर कुत्तिया बन जा.." शीला के मस्त मखमली चूतड़ों पर थप्पड़ मारते हुए जीवा ने कहा





रघु ने ५०१ पताका बीड़ी सुलगाई.. और दम मारते हुए अपना लोडा शीला के हाथ में थमा दिया.. शीला को ऐसा लगा मानो लोहे का गरम सरिया हाथ में पकड़ लिया हो

"बाप रे.. इतना बड़ा मेरी चुत में कैसे जाएगा!!"

"सिर्फ चुत में ही नही.. गांड में भी जाएगा मेरी रानी.. एकाध देसी दारू की थैली पी ले.. तो ताकत आ जाएगी मरवाने की.. नहीं तो गांड फट जाएगी हमारा लेते लेते.. समझी!!"

"मैं शराब नही पीती.. " शीला ने कहा

"बहनचोद... ज़बान लड़ाती है.. आज तो जो हम कहेंगे वही तुझे करना पड़ेगा, समझी कुत्तिया.. " कहते हुए रघु ने शीला के गालों पर सटाक से एक तमाचा धर दिया.. रघु ने तुरंत देसी दारू की थैली खोली और जबरन शीला के मुंह को पकड़कर उसे पीला दिया...

आक थू.. इतना गंदा स्वाद.. !! शीला ने जीवन में पहली बार शराब चखी.. और वो भी देसी.. पूरा मुंह कड़वा हो गया... उसे उलटी आने लगी..

"वाह शीला वाह... ले अब इस बीड़ी के दो दम लगा.. " हँसते हुए रघु ने शीला को जबरदस्ती बीड़ी का दम खींचने पर मजबूर किया

खाँसती हुई शीला इस सदमे से उभरती उससे पहले जीवा ने शीला को धक्का देकर उल्टा सुला दिया और उसके कूल्हों को पकड़कर ऊंचा कर दिया.. शीला थरथर कांप रही थी.. अपने पूरे जीवन में उसने इतने लंबे और तगड़े लंड की कल्पना नही की थी.. कभी कभार बीपी फिल्मों में कल्लुओ के विकराल लंड से गोरी राँडों को ठुकवाते देखा जरूर था.. तब वह सोचती की कैसा लगता होगा ऐसे मूसल लंड से चुदवाकर!! और अब जब वैसे ही विकराल लंड उसे चोदने की तैयारी में थे तब उसकी गांड फट गई!!

शीला की कमर को कसकर पकड़कर जीवा ने अपना अजगर जैसा लंड शीला की चुत के सुराख पर रखा..

"ऊई माँ.. " शीला की क्लिटोरिस को जैसे अंगारे ने छु लिया.. उसके चूतड़ थरथराने लगे.. चुत में गजब की चूल मचनी शुरू हो गई.. जीवा उसे तड़पा रहा था.. शीला इंतज़ार में थी की कब एक दमदार धक्का लगे और उसकी चुत चौड़ी हो जाएँ!! पर जीवा भी जैसे शीला को अपने लंड की अहमियत समझाना चाहता हो वैसे शीला की पुत्ती और जामुन पर अपना देसी सुपाड़ा रगड़े जा रहा था.. उसके लोडे का यह घर्षण शीला की चुत को ओर दीवाना और गीला बना रहा था। शीला अब बेकाबू सी होने लगी थी

"जीवा... आहहह.. ऐसे तड़पा मत मुझे.. जल्दी डाल दे अंदर.. जीवा!!" जीवा ने अपनी जलती हुई बीड़ी शीला के चूतड़ पर लगा दी और जोर जोर से हंसने लगा.. शीला की आँख में आँसू आ गए.. पर भोसड़े की भूख इतनी तीव्र थी की बीड़ी की जलन को अनदेखा कर उसने अपनी गांड को और ऊपर कर लिया

"प्लीज.. जल्दी डाल.. क्यों तड़पा रहा है मुझे.. मुझसे नही रहा जाता.. जीवा कब तक अपने लंड को यूँ ही घिसता रहेगा!! मेरी चुत में हाहाकार मचा हुआ है... जल्दी कर भड़वे.. " झुमर की तरह लटक रही अपनी चूचियों को शीला खुद ही मसलते हुए दर्द भरी विनती की.. और अपनी उंगलियों से अपना भगोष्ठ रगड़ने लगी..

"आह्हहह... " चिल्लाते हुए जीवा ने एक जबरदस्त धक्का लगाया.. उस धक्के से शीला एक फुट जितनी आगे चली गई.. ये तो अच्छा हुआ की जीवा ने उसे कमर से पकड़कर रखा था.. वरना वो बिस्तर से नीचे गिर जाती.. एक धक्के में जीवा ने अपना पूरा लंड शीला के भोसड़े में दे मारा..!!






शीला की आँखों के सामने अंधेरा छा गया.। "ऊई माँ... जीवा मादरचोद... जरा धीरे से.. दीवार में कील ठोक रहा है क्या? ऐसे भला कौन डालता है!!"

"ऐसे ही मज़ा आता है... शीलू मेरी जान.. अब देख.. मैं तुझे कैसे कैसे चोदता हूँ... " कहते हुए जीवा ने अपने डीजल इंजन का पिस्टन चलाना शुरू किया। हरएक धक्के पर शीला का शरीर उत्तेजना से उछलने लगा.. "आहहह आहहह जीवा.. चोद मुझे.. बहोत भूखी हूँ.. ओह जीवा.. जबरदस्त है लंड तेरा... रूखी सच कहती थी.. बड़ा दमदार है तेरा लोडा.. भोसडा फाड़ दिया आज तो... तेरे बाप ने कीस चक्की का आटा खाकर तुझे पैदा किया था..!! हरामी साले!! क्या मस्त ठुकाई करता है रे तू!! माँ चुदाने गया मदन.. आज से तू ही मेरा पति है.. कुत्तिया बनाकर पूरी रात चोद मुझे.. आहहह आहहह आहहह...डाल जोर से... और जोर से घुसा.. " कमर को कसकर पकड़कर जीवा शीला के ईवीएम में धड़ाधड़ मतदान करने लगा.. शीला भी अनुभवी रांड की तरह अपनी हवस मिटाने के लिए इस बोगस मतदान में सहयोग देने लगी..

उनके सामने रघु शराब पीते हुए तले हुए काजू खा रहा था.. और ५५५ सिगरेट के कश लगा रहा था.. उसका लंड, मस्त कलंदर की तरह सख्त खड़ा हुआ था.. जिसे मुठ्ठी में पकड़कर संतुलित रख रहा था वोह..

शीला की चुत उस दौरान कई बार झड़ गई.. मदमस्त हथनी की तरह जीवा और रघु के बीच सेन्डविच बनकर मजे लेने लगी।

घड़ी में रात के २ बज चुके थे.. और अभी तो रसिक का आना बाकी था.. उसे आना में अभी दो घंटे थे.. इसलिए शीला निश्चिंत थी..

लगातार मूसल चुदाई के कारण शीला को पेट में थोड़ा दर्द होने लगा.. इन मर्दों को ये डॉगी स्टाइल क्यों इतनी पसंद है? पूरा लंड बच्चेदानी तक जाके टकरा रहा है.. लंड का सुपाड़ा ऐसे टकरा रहा है जैसे आरसीसी से बनी छत तोड़ रहा हो..

रघु खड़ा होकर शीला के पास आया.. और उसके मुंह के आगे अपना लंड धर दिया.. क्या मदमस्त काले नाग जैसा लंड था रघु का!! अद्भुत.. !! शीला की आँखों से बस ६ इंच की दूरी पर.. ठुमकते हुए ऊपर नीचे हो रहा था। शीला उस लंड को देखकर जैसे खो ही गई.. सोच रही थी.. क्या रघु का लंड मदन से बड़ा है?? नही.. लगभग उतना ही है.. क्या पता... मदन के लंड को देखे हुए दो साल हो गए थे.. कमीने के लंड की साइज़ भी भूल गई।

झूलते मिनारे जैसे रघु के लंड को देखकर वह रघु की हिंसक ठुकाई का दर्द भूल गई.. और धीरे से रघु के टमाटर जीतने बड़े सुपाड़े को चूम लिया.. रघु के लंड ने भी ठुमका लगाकर शीला के चुंबन का अभिवादन किया.. जिस तरह कुल्फी को देखकर छोटा बच्चा लार टपकाता है बिल्कुल वैसे ही रघु के लंड की नोक पर वीर्य की एक बूंद उभर आई..






रघु अपना लंड शीला के मुंह के ओर करीब ले गया.. और शीला के होंठों पर.. उस वीर्य की बूंद को पोंछ दिया.. कुत्ति बनकर जीवा के हथोड़ाछाप लंड से चुदती हुई शीला अब रघु के लंड को मुंह में लेकर चूसने लगी। जिस तरह उसने बीपी फिल्मों में देखा था उस तरह हर नए तरीके से उसने रघु के लंड को चूसते हुए... उसके पानी-पूरी की पूरी जैसे अंडकोशों के साथ खेलने लगी।

"आहाहाहा.. जीवा देख तो जरा.. क्या मस्त चूस रही है ये तो.. साली पूरा का पूरा निगल गई.. आहहह" रघु ने जीवा से कहा






शीला अपने मुंह और चुत दोनों को एक साथ बड़ी ही मस्ती से चुदवा रही थी। दो दो मस्ताने मर्द शीला को काबू में करने के लिए जैसे असमर्थ से दिख रहे थे.. उनके विकराल लंड को अब वह इतनी आसानी से झेल रही थी जैसे मलिंगा के यॉर्कर को सचिन एक झटके में बाउंड्री के पार फेंक देता है..

जीवा भी शीला की अदाओं से बेहद उत्तेजित हो रहा था.. इस गंवार अनपढ़ ने आजतक शहर की फैशनेबल स्त्री को चोदने के बारे में सपने में भी नही सोचा था.. रूखी को चोदते चोदते उसे शीला मिल गई थी.. अंधा मांगे एक आँख और मिल जाए दो..!! रघु ने तो बीवी की मौत के बाद चुदाई के सपने देखना तक छोड़ दिया था.. पर अब शीला ने उसका लंड चूसचूस कर उसे अपना गुलाम बना दिया था।

इस दुनिया में अगर किसी भी मर्द को गुलाम बनाना हो तो रोज उसका लंड अच्छे से चूसना चाहिए.. और अगर स्त्री को पूरा जीवन अपनी गिरफ्त में रखना हो तो उसकी चुत को रोज चाटकर उसे मस्त करना चाहिए

अधिकतर शादीशुदा जोड़े मुख-मैथुन से दूर रहते है.. मर्द कभी चुत नही चाटता.. ऐसी बेतुकी बातें करते है.. पर हकीकत तो यह है की रात के १० बजे के बाद यही सारे शूरवीर, अपनी बीवी के घाघरे में घुस जाते है और उसकी चुत चाटते है.. बीवी की चुत की गर्मी के आगे, अच्छे अच्छे मर्द ठंडे पड़ जाते है!!

अब जीवा ने शीला की चुत से लंड बाहर निकाला.. और उसके नितंबों को अपने लंड से ठोककर झटकाया.. अचानक चुत में से लंड निकल जाने से शीला बावरी हो गई.. और उसकी भूखी चुत के होंठ खुलना-बंद होना शुरू हो गए.. साथ ही साथ वह अपने कूल्हे भी थीरकाने लगी...






जीवा ने शीला के गोरे गोरे चूतड़ों को दोनों हाथों से चौड़ा किया.. जैसे किसी किले के मजबूत द्वार को खोल रहा हो.. मन ही मन खुश हो गया जीवा.. शीला की गांड के बादामी रंग के छेद को देखकर जीवा के अंदर का जानवर बाहर आने लगा.. उस टाइट छेद में अपनी छोटी उंगली डालकर उसने शीला को बेबस बना दिया.. एक तो चुत से लंड बाहर निकल गया था.. ऊपर से ये जीवा गांड के छेद पर नाखून मार रहा था..

शीला ने रघु का लंड अपने मुंह से निकाला और बोली

"जीवा.. इतनी ही देर में झड़ गया क्या तू?? भड़वे.. लंड क्यों निकाल लिया बाहर.. डाल दे अंदर.. घुसेड़ फिर से.. आहहह!!"






जीवा ने शीला की गांड में अपनी आधी उंगली घुसेड़ दी और उसके गोरे चूतड़ पर जोर से चपत लगाई... स..टा..कक!!





"चुप बे भोंसड़ीवाली.. " जीवा चिल्लाया

"ऊईईई माँ... मर गई.. साले जीवा, तुझे जो चाहिए वो करने तो दे रही हूँ तुझे.. मार क्यों रहा है साले भड़वे?" चपत के दर्द से शीला भी तप गई

जीवा ने जवाब नही दिया। शीला की गांड के छेद को उंगली से चौड़ा करते हुए उसने अपने मुंह से थूक निकाला और छेद पर लगा दिया। गरम थूक का अनुभव गांड पर होते ही शीला सहम गई.. उसने फिरसे रघु का लंड मुंह से निकाला और हाथों से हिलाते हुए बोली

"देख जीवा.. और जो भी करना है कर... पर गांड के साथ मस्ती नही। तेरा बहोत ही मोटा है... तू समझ यार.. नही जाएगा अंदर.. तू मेरे छेद की साइज़ तो देख!! और अपने गधे जैसे लंड को देख... " शीला ने घबराते हुए कहा

शीला की विनती को अनसुना कर जीवा ने अपने सुपाड़े को गांड के छेद पर टेक दिया.. और धीरे से दबाया.. उसका मोटा सुपाड़ा शीला की गांड के अंदर घुस गया... और शीला को तारे नजर आने लगे...

"जीवा प्लीज... ऐसा मत कर.. इतना बड़ा लंड किसी भी सूरत में अंदर नही जाएगा.. रघु.. तू जीवा को समझा जरा.. मेरी गांड फट जाएगी.. खुजली चुत में हो रही है तो वहाँ घुसा ना... !! गांड पर क्यों जुल्म कर रहा है!! तू समज जरा.. जियो के सिमकार्ड पर एयरटेल का रिचार्ज मत कर... ऊईईई माँ...मर गई !!!" बिलखते हुए शीला ने कहा






जीवा ने एक झटके में उसका ६ इंच जितना लंड गांड के छेद में घुसेड़ दिया.. शीला के मुंह से चीख निकल गई... उसकी चीख सुनकर रघु डर गया.. कहीं अगल बगल में किसी पड़ोसी ने शीला की चीख सुन ली तो!! उसने तुरंत अपना महाकाय लंड शीला के खुले मुंह में डालकर उसके मुंह का ढक्कन बंद कर दिया..

शीला की आवाज बंद होते ही जीवा ने दूसरा दमदार धक्का लगाया.. और शीला की गांड में अपना पूरा लोडा कील की तरह ठोक दिया..

"अममम... अघहगहह.. उम्ममम.. " शीला के लंड ठूँसे मुंह से ऐसी विचित्र आवाज़ें निकल रही थी। जीवा ने शीला की गांड में लगातार फटके लगाने शुरू कर दिए.. एक तरफ रघु का लंड मुंह में.. और जीवा का लंड गांड में.. दोनों ने शीला को दो हिस्सों में बाँट लिया था और अंधाधुन चोद रहे थे..

शीला के भोसड़े में जबरदस्त खुली हो रही थी.. जीवा ने शीला की गांड में अंदर बाहर करते हुए.. उसके लटकते हुए खरबूजों जैसे स्तनों को पकड़ लिया.. और उसकी निप्पलों को मसलते हुए... धक्कों की गति बढ़ा दी.. हर धक्के के साथ जीवा के आँड शीला की चुत को जाकर टकराने लगे.. और इसी कारण शीला को थोड़ा बहुत आनंद मिल रहा था..






जीवा की मर्दानगी पर शीला फिदा हो गई.. उसकी गाँड़ अचानक जीवा के गरमागरम वीर्य से भर गई.. और गांड के छेद से छलक कर वीर्य की धाराए, चुत के होंठों के बीच से गुजरते हुए नीचे बिस्तर पर नीचे टपकने लगी.. जीवा थककर शीला की पीठ के ऊपर ढह गया.. और हांफने लगा.. पर रघु अब भी शीला के मुंह से लंड निकालने को तैयार न था.. अब शीला ने अपना सारा ध्यान रघु के लंड को चूसने पर केंद्रित किया..

जैसे ही शीला ने अपनी जीभ का जादू शुरू किया, रघु के लंड ने भी अपना त्यागपत्र दे दिया.. शीला के मुंह से लेकर कंठ तक वीर्य का सैलाब सा फैला हुआ था.. रघु ने लंड बाहर निकाला और वही फर्श पर बैठ गया.. जीवा ने शीला की गांड से लंड बाहर निकाल लिया.. दो दो योद्धाओं को पराजित कर विजयी मुस्कान के साथ शीला नंगे बदन बिस्तर पर लेटी रही.. और अपना हाथ पीछे ले जाकर गांड के छेद को हुए नुकसान का जायजा लेने लगी..






घड़ी में तीन बज रहे थे.. थकान के उतरते ही वह तीनों फिर से एक दूसरे को छेड़ने लगे.. शीला सिगरेट के कश लगाते हुए धुएं को जीवा और रघु के मुंह पर छोड़ रही थी... सिगरेट की राख को जीवा के लंड पर गिराते हुए उसने कहा "मुझे अब मेरी चुत और गांड में एक साथ लंड डलवाना है.. चलो आ जाओ दोनों.. और लग जाओ काम पर.. अब ज्यादा समय नही है हमारे पास.. जल्दी करो"

पड़ोस में रहती अनु मौसी... रात के इस समय.. शीला के घर की दीवार पर कान रखकर.. सारी बातें सुन रही थी..

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घड़ी में तीन बज रहे थे.. थकान के उतरते ही वह तीनों फिर से एक दूसरे को छेड़ने लगे.. शीला सिगरेट के कश लगाते हुए धुएं को जीवा और रघु के मुंह पर छोड़ रही थी... सिगरेट की राख को जीवा के लंड पर गिराते हुए उसने कहा "मुझे अब मेरी चुत और गांड में एक साथ लंड डलवाना है.. चलो आ जाओ दोनों.. और लग जाओ काम पर.. अब ज्यादा समय नही है हमारे पास.. जल्दी करो"





पड़ोस में रहती अनु मौसी... रात के इस समय.. शीला के घर की दीवार पर कान रखकर.. सारी बातें सुन रही थी..

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शीला के गले से हल्की सी चीख निकल गई.. "आह्हहहह... !!" पर रघु ने जरा सा भी दयाभाव नही दिखाया.. और एक जोरदार धक्के के साथ अपना पूरा लंड शीला की गांड में घुसा दिया.. शीला की सेन्डविच बन गई.. और वह तीनों बड़ी ही मस्ती से चोदने लगे.. शीला के मुंह से सिसकियाँ निकल रही थी... और अपने दोनों सुराखों में चुदवाते वक्त उसका सारा ध्यान घड़ी के काँटों पर ही था..






दो दो विकराल लंड के भीषण धक्के खा खा कर शीला की गांड और भोस दोनों ही थक चुके थे.. शीला पसीने से तरबतर हो गई थी.. फिर भी उछल उछल कर चुदवा रही थी.. उसकी उछलने की गति बढ़ने के साथ ही जीवा समझ गया की शीला झड़ने की कगार पर थी.. इसलिए.. जिस तरह धोनी ने २०११ की वर्ल्डकप फाइनल की मेच में सिक्सर लगाई थी... वैसे ही जीवा ने अपने लंड से एक जोरदार शॉट लगाया..





शीला को कमर से कसकर पकड़कर जीवा ने अपने ताकतवर हाथों से शीला को हवा में उठा लिया.. लगभग एक फुट ऊपर.. और वैसे ही उसे हवा में पकड़े रख.. नीचे से जबरदस्त धक्का लगाया शीला की भोसड़े में.. "ओह.. ह.. ह.. ह.. ले मेरी शीला रानी.. आहहहहहह..!!" कहते हुए जीवा ने पिचकारी मार दी.. शीला की चुत में गरम गरम वीर्य गिरते ही वह ठंडी होने लगी.. शीला ने अपनी गांड की मांसपेशियों को बेहद कस लिया और उसी के साथ रघु का लंड भी उसकी गांड के अंदर बर्बाद होते हुए झड़ गया...

तीनों ऐसे हांफ रहे थे जैसे मेरेथॉन दौड़कर आयें हों.. शीला की गांड और चुत दोनों में से वीर्य टपक रहा था.. गांड में अभी भी दर्द हो रहा था फिर भी शीला बहुत खुश थी.. आखिरकार उसका दो मर्दों से चुदने का सपना सच हो गया था..






चार बजने में सिर्फ पाँच मिनट की देरी थी.. और तभी शीला के घर की डोरबेल बजी..

"इसकी माँ का.. रसिक ही होगा, जीवा.. अब क्या करेंगे?" शीला डर गई.. पूरे घर की हालत उसके भोसड़े जैसी ही थी.. सब तहस नहस हो रखा था... अब क्या होगा?

शीला ने तुरंत रघु और जीवा को कहा " तुम दोनों किचन में छुप जाओ.. में रसिक को लेकर बेडरूम में जाऊँगी तब तुम लोग धीरे से निकल जाना.. और हाँ.. बाइक को बिना चालू किए थोड़े दूर ले जाना.. और फिर स्टार्ट करना.. नही तो उस रंडवे को पता चल जाएगा.. जाओ जल्दी से.. "

शीला ने बेडरूम से जीवा और रघु को भगाया.. वह दोनों अपने कपड़े काँख में दबाकर किचन की ओर भागे.. उन दोनों के मुरझाए लटकते लंड देखकर शीला की हंसी निकल गई..

कपड़े पहनने का समय नही था.. और वैसे भी रसिक के अंदर आते ही फिर से उतारने थे.. ऐसा सोचकर शीला ने बिना ब्लाउस और घाघरे के.. अपने नंगे जिस्म पर सिर्फ साड़ी लपेट ली.. और अपने बबलों को साड़ी के नीचे दबाते हुए दरवाजा खोला...

"अरे, कविता तू... ??" शीला बोखला गई.. कपड़ों को ठीक करते हुए उसने पूछा

कविता पड़ोस में रहते अनु मौसी के बेटे पीयूष की पत्नी थी.. ४ महीनों पहले ही उनकी शादी हुई थी। अच्छा हुआ की बहुत अंधेरा था.. नही तो शीला को इस तरह देखकर, पता नही कविता क्या सोचती!!

"शीला भाभी, मेरे मामाजी ससुर को हार्ट-अटेक आया है.. और पीयूष मेरे सास ससुर के साथ उनके शहर गए है.. मम्मीजी ने मुझ से कहा था की अगर अकेले में डर लगे तो आपके घर आकर सो जाऊँ.. २ घंटों की ही बात है.. आपको अगर एतराज न हो तो क्या में आपके घर सो जाऊँ??" निर्दोष भाव से कविता ने इजाजत मांगी

शीला मन ही मन कांप उठी.. आज तो इज्जत का जनाज़ा निकल जाएगा.. माँ चुद जाने वाली थी..

"हाँ हाँ.. क्यों नही.. मैं हूँ ना तेरे साथ.. चिंता मत कर!!" शीला का शैतानी दिमाग काम पर लग गया... अब इस समस्या का कोई हल तो निकालना ही पड़ेगा.. वह सोचने लगी... क्या करूँ!!!!

"कविता, एक काम करते है.. " शीला ने अपने पत्ते बिछाना शुरू किया

"हाँ कहिए ना भाभी!!"

"मेरा बिस्तर हम दोनों के लिए छोटा पड़ेगा.. एक साथ सो नही पाएंगे... ऐसा करते है की तेरे ही घर हम दोनों सो जाते है"

"मैं आपको वही कहने वाली थी पर संकोच हो रहा था की कैसे कहूँ... वैसे भी मुझे अपने बिस्तर के बगैर नींद नही आती.. " कविता ने कहा

"तू अपने घर जा... मैं बाथरूम होकर अभी आती हूँ.. "

"जल्दी आना भाभी... मुझे अकेले में बहोत डर लगता है.. " कविता बोली

"हाँ.. हाँ.. तू जा.. मैं तुरंत पहुँचती हूँ.. "

बच गए!! शीला ने राहत की सांस ली.. वह तुरंत किचन में गई.. जीव और रघु को कहा "जल्दी निकलो तुम दोनों... रसिक नही था.. मेरी पड़ोसन थी.. "

"हाँ... वो तो हमने आप दोनों की बातें सुनी.. हम जा रहे है.. फिर किसी दिन.. बुलाते रहना.. भूल मत जाना" जीवा ने कहा

"कैसे भूल सकती हूँ!! जरूर बुलाऊँगी.. आप दोनों निकलों.. और वह देसी दारू की थैलियाँ लेते जाना.."

रघु वो थैलियाँ लेने अंदर गया तब जीवा ने शीला को बाहों में भरकर चूम लिया.. उसके आगोश में शीला दबकर रह गई.. उसने पतलून के ऊपर से जीवा लंड पकड़ लिया... "गजब का लंड है रे तेरा जीवा.. " जीवा ने शीला के साड़ी में लिपटे स्तनों को मसल दिया और उसके गाल पर हल्के से काटते हुए अपने प्रेम से उसे सराबोर कर दिया.. वापिस आए रघु भी शीला को पीछे से लिपट पड़ा.. शीला ने उसके लंड को भी प्यार से सहलाया..






दोनों गए.. शीला की धड़कनें शांत हो गई.. अब दूसरी समस्या यह थी की रसिक का क्या करें!!

तभी रसिक की साइकिल की घंटी बजने की आवाज आई.. हाथ के इशारे से उसे घर के अंदर आने के लिए कहते हुए शीला अंदर आई.. जैसे ही रसिक घर के अंदर आया.. शीला उससे लिपट पड़ी.. और अपने स्तनों को रसिक की छाती पर रगड़ने लगी..

रसिक का लंड तुरंत ही सख्त हो गया. शीला ने घुटनों पर बैठकर उसका लंड पतलून से निकाला और चूसने लग गई.. काले डंडे जैसा उसका पूरा लंड शीला की लार से लसलसित होकर चमकने लगा..






"रसिक, मुझे आज बहोत ही जल्दी है.. बगल वाले अनु मौसी के घर उसके बेटे की बीवी अकेली है.. उन्हे अचानक शहर के बाहर जाना पड़ा.. तू फटाफट मुझे चोदे दे.. और निकल.. फिर में घर बंद कर भागूँ.. वहाँ कविता मेरा इंतज़ार कर रही है"

"ठीक है भाभी, पर बिस्तर पर चलते है ना!! यहाँ कोई देख लेगा!!" रसिक ने कहा

रसिक का लंड मुठ्ठी में भरकर आगे पीछे करते हुए शीला ने कहा "उतना टाइम नही है रसिक.. जल्दी कर.. पेल दे फटाफट" कहते हुए शीला ने दीवार पर अपने हाथ टेक दिए और साड़ी को ऊपर उठा लिया.. रसिक उसके पीछे आ गया और शीला की जांघों को थोड़ा सा चौड़ा कर अपने लंड को उसकी चुत में घुसाकर धक्के लगाने लगा.. उसे मज़ा तो नही आ रहा था पर क्या करता!!






"देख रसिक.. जल्दी कर.. और हाँ.. तुरंत घर मत पहुँच जाना वरना रूखी को शक हो जाएगा" शीला का गणित रसिक समझ नही पाया और वह बिना समझे हाँ हाँ करता जा रहा था.. उसके घर पर उसकी बीवी जीवा और रघु से चुदवा रही होगी.. और यहाँ वह शीला की हाँ में हाँ मिलाते चोदे जा रहा था

अपने कूल्हों को ऊपर उठाते हुए शीला ने कहा "अरे जल्दी कर न रसिक!! कितनी देर लगा रहा है तू? क्या टेस्ट मेच की तरह खेल रहा है!! देख आज तो में फंसी हुई हूँ.. इसलिए जल्दी करना पड़ रहा है.. पर कल तू जल्दी आ जाना.. फिर इत्मीनान से मजे करेंगे.. ठीक है.. कल चार बजे आ जाना"

"ठीक है भाभी.. " शीला की चुत में लंड अंदर बाहर करते हुए रसिक ने कहा

रसिक ने धक्के लगाने की गति बढ़ा दी.. "वाहह... आह्हह.. मज़ा आ रहा है.. घुसा अंदर तक.. ईशश.. " शीला की सिसकियाँ सुनकर रसिक झड़ गया.. शीला ने तुरंत उसका लंड अपनी चुत से बाहर निकाला.. और रसिक के सामने ही ब्लाउस और घाघरा पहनने लगी..

"भाभी आपने कपड़े नही पहने थे?" रसिक के मन में सवाल उठा

"कितनी गर्मी है.. और वैसे भी तू आने वाला था इसलिए कपड़े उतारकर तैयार बैठी थी.. तू बेकार की बातें बंद कर और निकल यहाँ से!!" शीला ने अपने जूठ को छिपाते हुए कहा

रसिक के निकलते ही शीला ने अपने घर को ताला लगाया.. और अनु मौसी के घर की तरफ दौड़ते हुए गई..


पर तब तक बहोत देर हो गई थी.. कविता ने यह सारा द्रश्य देख लिया था.. !! भाभी अब तक क्यों नही आए!! देखने के लिए वह शीला के घर के तरफ आई.. और शीला को खुले दरवाजे के पास रसिक से चुदवाते हुए देख लिया.. और अपने घर में वापिस आकर अचरज से सोचने लगी.. उसने जो देखा था वह अकल्पनीय था.. शीला भाभी?? एक दूधवाले के साथ? बाप रे.. विश्वास ही नही होता..."

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रसिक के निकलते ही शीला ने अपने घर को ताला लगाया.. और अनु मौसी के घर की तरफ दौड़ते हुए गई..

पर तब तक बहोत देर हो गई थी.. कविता ने यह सारा द्रश्य देख लिया था.. !! भाभी अब तक क्यों नही आए!! देखने के लिए वह शीला के घर के तरफ आई.. और शीला को खुले दरवाजे के पास रसिक से चुदवाते हुए देख लिया.. वह भागकर अपने घर वापिस आई और अचरज से सोचने लगी.. उसने जो देखा था वह अकल्पनीय था.. शीला भाभी?? एक दूधवाले के साथ? बाप रे.. विश्वास ही नही होता..."





तभी शीला कविता के घर आ पहुंची.. "अरे मुझे ताला ही नही मिल रहा था... इसलिए देर लग गई मुझे.. " शीला ने सफाई देते हुए कहा

यह सुनकर कविता मन ही मन में मुस्कुराने लगी..

"चलिए भाभी... अब सो जाते है.. " शीला और कविता बेडरूम में गए और बिस्तर पर लेटे लेटे बातें करने लगे

"कब से बारिश हो रही है.. रुक ही नही रही!!" कविता ने कहा

"अब बारिश की सीजन है.. पानी तो बरसेगा ही.. तुम लोगों को तो बारिश पसंद होनी चाहिए.. नए शादीशुदा जोड़ों को तो बारिश में बहुत मज़ा आता है.. हमारे जैसे पुराने चावलों को जरुर बारिश में परेशानी होती है.. " शीला ने कहा

कविता २४ साल की जवान छोकरी थी.. एकदम कोरा माल.. ३४ इंच के स्तन.. मस्त कडक संतरे जैसे.. पतली सी कमर.. सीधी सी लड़की... चुदाई के मामले में जिसे नौसिखिया कहा जा सकता है.. वही श्रेणी में थी कविता.. थोड़ी दुबली पतली.. अब तक उसके कूल्हे बड़े नही हुए थे.. प्रायः चुदाई के एकाद साल के बाद नितंबों का विकास होता है.. जो अब तक कविता का नही हुआ था.. एकदम गोरी त्वचा.. देखते ही पसंद आ जाएँ ऐसा रूप.. नई नई शादी हुई थी इसलिए सब बातें जानने की बेहद जिज्ञासा थी कविता में..






घर में बूढ़े सास और ससुर.. पड़ोस में उसकी उम्र की अन्य लड़कियां थी पर कविता का उनसे ज्यादा परिचय नही हुआ था.. कविता का पति पीयूष.. कविता को "गरीबों की बचत" की तरह इस्तेमाल करता था.. कविता को कभी कभी ही चोदता था.. कभी कभी मोबाइल पर व्हाट्सएप पर आई हुई पॉर्न क्लिपिंग कविता को दिखाकर उत्तेजित करता.. उन विडिओ को कविता बड़े ही ध्यान से देखती.. और उसका अनुकरण करने का प्रयत्न करती..

कुछ दिन पहले ही उसने विडिओ में देखकर पीयूष का लँड चूसना शुरू किया था.. वैसे कविता को इसमे ज्यादा मज़ा नही आता था.. वह सोचती थी की लंड जैसी चीज को क्यों चूसना चाहिए?? इसमें भला क्या मज़ा? कोई स्वाद तो आता नही.. पर पीयूष जब उसकी चुत को चूमता था तब उसे ऐसा लगता था जैसे उसका जीवन सफल हो गया.. चुत चटवाना उसे इतना पसंद था की उसके लिए वह पीयूष का लंड चूसने के लिए तैयार हो जाती। वह चाहती थी की पीयूष पूरी रात उसकी चुत चाटता रहे.. पर पूरे दिन की थकान के बाद पीयूष, कविता पर चढ़कर थोड़ी बहोत उछलकूद करके सो जाता.. वैसे तो कविता भी पूरा दिन घर का काम कर थक जाती थी.. पर जिस्म की भूख सब हिसाब मांगती है.. दो तीन दिन बिना चुदे निकल जाने के बाद कविता ऐसी ऐसी जगहों पर छेड़ती की पीयूष उत्तेजित होकर उसे चोद देता.. कविता के लिए पीयूष ही उसका सर्वस्व था..

शीला और कविता आज अच्छा खासा समय साथ बिताने वाले थे.. शीला के शरीर से वीर्य की गंध आ रही थी.. और इस गंध से कविता भलीभाँति वाकिफ थी.. शीला को रात के अंधेरे में खुले दरवाजे के पास खड़े खड़े रसिक से जिस तरह चुदवाते देखा था.. वह द्रश्य कविता की आँखों से हट ही नही रहा था...








शीला कविता के बदन को अहोभाव से देखने लगी.. दिवाली में बेंक से मिले १०० रुपये के नए नोट के बंडल जैसी दिख रही थी कविता..

"एक बार नींद उड़ जाएँ तो वापिस जल्दी आती ही नही" कविता बोली

"हाँ कविता.. कभी कभी मेरी नींद भी आधी रात को उड़ जाती है.. फिर सुबह तक करवटें बदलती रहती हूँ" शीला ने अपना दुख सुनाया

"फिर आपको ताला मिला की नही?" कविता ने पूछा

"हाँ मिला आखिर.. घर में ही था.. थोड़ा ढूँढना पड़ा.. "शीला ने कहा

"मुझे तो ऐसा लगा की आप चाबी ढूंढ रही थी.. ताला तो आपके पास पहले से ही है" कविता ने गूढ भाषा में सिक्सर लगाई

"नही नही.. ताला ही नही मिल रहा था.. चाबी तो थी मेरे पास" कविता की द्विअर्थी बात का भावार्थ नही समझ पाई शीला

"भाभी, एक बात पूछूँ?"

"पूछ ना... जो भी पूछना है.. " शीला ने कहा

"जब हम पिरियड्स में हो... तब कर सकते है?" कविता ने थोड़ी सी शर्म के साथ कहा

"क्यों? तेरा पीयूष बहुत जिद करता है क्या?" शीला ने शरारत करते हुए कहा

"नही भाभी.. पर मुझे ही उस दौरान बहुत मन करता है करवाने का.. पर में अगर ज्यादा फोर्स करती हूँ तो पीयूष नाराज हो जाता है " कविता ने कहा

कविता की कमर पर चिमटी काटते हुए शीला ने कहा "तू तो जोरदार खिलाड़ी निकली कविता.. हमारी जवानी में तो पति जिद करता और हम मना करते थे.. फिर आखिर वह हाथ से हिलाकर... छातियों पर झड़कर शांत हो जाते.. पर अब तो पूरा माहोल ही बदल चुका है"

कविता: "अब मेरा मन करता है तो में क्या करूँ भाभी!! पीयूष तो उन दिनों में मुझसे दूर ही रहता है"

शीला: "हम्म.. इसका एक इलाज है मेरा पास, कविता"

कविता: "वो क्या भाभी?"

शीला: "तुझे अपनी उंगली से ही काम चलाना होगा.. जब भी तू अपना सैनिटेरी पेड़ बदलने जाएँ.. तब नीचे पानी से बराबर साफ करके.. उंगली से कर लेने के बाद.. नया सैनिटेरी पेड़ लगा लेना"

कविता: "पर भाभी, उसमें असली चीज जैसा मज़ा तो नही आएगा ना!!"

शीला: "ओहो.. अब तुझे उंगली से असली मर्द वाला मज़ा लेना है.. वो तो मुमकिन नही है.... एक बात समझ ले कविता.. उंगली में लंड जैसा मज़ा तो आने से रहा.." शीला को अचानक एहसास हुआ की सामने रघु या जीवा नही थे.. वह शरमा गई "माफ करना.. मेरे मुंह से ऐसे शब्द निकल गए"

कविता: "अरे, उसमें क्या है भाभी.. अभी तो हम दोनों अकेले ही है ना.. रात को बेडरूम में पीयूष भी बहुत गालियां बकता है.. अच्छा भाभी.. मदन भाई कब वापिस लौटने वाले है?"

शीला ने एक भारी सांस छोड़कर कहा "अभी और चार महीने बाकी है उसे आने को कविता"

शीला के बायें स्तन पर कविता की कुहनी छु रही थी.. शीला ने जानबूझकर अपने शरीर को कविता की दिशा में ओर झुकाया.. उसका स्तन अब कविता की कुहनी से ओर ज्यादा दब गया.. कविता ने अपनी टांगें चौड़ी की और शीला की ओर करवट करते हुए शीला के स्तनों के बिल्कुल सामने आ गई.. शीला के पर्वत जैसे दोनों स्तनों को वह एकटक देखने लगी..

अपनी एक टांग शीला की जांघ पर रखते हुए कविता ने पूछा "भाभी.. आपको भी मन तो करता होगा ना"

शीला: "मन तो बड़ा करता है.. पर क्या कर सकती हूँ?"

कविता: "तो आप फिर उंगली का सहारा नही लेती?"

शीला: "उम्र हो गई है कविता.. अब उंगली से काम नही बनता मेरा.. "

कविता: "तो फिर आप क्या करती है?"

शीला: "तू क्या करेगी जानकर? बड़ी मुश्किल से अपनी इच्छाओं को दबाकर रखा है मैंने.. तू तो ये सब बातें करते हुए मेरी आग भड़का देगी.. तेरा क्या है.. तू तो अपने पीयूष के नीचे घुसकर अपनी आग बुझा लेगी.. तड़पना तो फिर मुझे ही पड़ेगा ना!!"

कविता: "तो फिर आप अपनी आग बुझाने के लिए रसिक को क्यों नही बुला लेती?" आखिर उसने बॉम्ब फोड़ ही दिया

शीला स्तब्ध होकर बोली "कौन... वो दूधवाला?? वो कैसे बुझाएगा मेरी आग भला?"

कविता: "कैसे बुझाएगा?? दरवाजे पर हाथ रखकर.. पीछे से करते हुए.. और कैसे?" उसने शरारती मुस्कान के साथ शीला का भंडाफोड़ कर दिया

शीला के पैरों तले से जमीन खिसक गई। कविता के मुंह पर अपनी हथेली रखते हुए उसने कहा

"बस बस.. चुप हो जा तू.. और किसी को बताना मत.. समझी!!" कहकर शीला ने कविता को अपने आगोश में भर लिया और पूरा जोर लगाकर मसल दिया..

शीला का शातिर दिमाग काम पर लग गया.... अब कविता को पटाकर अपने वश में रखना पड़ेगा.. ताकि यह कमीनी किसी को बता न दे..

कविता: "ये क्या कर रही हो भाभी? ओह्ह.. "

शीला ने करीब आकर कविता के होंठों पर अपने गरम होंठ रखकर एक जबरदस्त चुंबन रसीद कर दिया.. और फिर कविता का मुंह अपने दोनों स्तनों के बीच दबा दिया






शीला की मखमल के तकिये जैसी नरम छातियों से चिपक कर कविता ने भी शीला को अपनी बाहों में भर लिया.. और फिर शीला के गालों को चूमते हुए उसके मम्मे दबाने लगी... "भाभी, मेरे बॉल इतने बड़े कब होंगे? पीयूष को बड़े बॉल बहोत पसंद है"

यह सुनते ही शीला ने अपने ब्लाउस के सारे हुक खोल दिए.. और अपनी जायदाद कविता के सामने खोल दी.. कविता की आँखें फट गई








"देख क्या रही है कविता? चूसना शुरू कर.. "

कविता शीला के गोरे गोरे स्तनों की निप्पल को चूमकर बोली "भाभी.. क्या आप मेरी नीचे चाटोगे? कल रात को पीयूष को कितनी बार कहा.. पर वो इतना थका हुआ था की उसने चाटने से मना कर दिया.. कल रात से खुजली हो रही है मुझे.. प्लीज भाभी"

कविता का हाथ हटाकर शीला ने उसके दोनों संतरों को मसल दिया और कहा






"कविता, तेरे स्तन भी मेरी तरह बड़े बड़े हो जाएंगे.. तू रोज मेरे घर आकर तिल के तेल से मालिश करवा लेना.. फिर देखना तेरे बॉल कितने बड़े बन जाते है"

कविता: "वो छोड़ो भाभी... आप मेरी चाटिए ना!!"

कविता के गाउन में हाथ डालकर शीला ने उसकी चुत में दो उंगली घुसा दी.. और अंदर बाहर करने लगी






कविता अब शीला के मदमस्त स्तनों को चूमकर गीली हो चुकी थी.. उससे रहा न गया.. वह खड़ी हो गई.. अपने गाउन को कमर तक उठा लिया.. और अपनी चुत को शीला के मुंह पर रखकर बैठ गई.. उसके कूल्हे शीला के स्तनों से रगड़ खा रहे थे.. वह शीला के होंठों पर.. गालों पर.. अपनी चुत घिसने लगी.. शीला ने कविता के गुलाबी छेद को चौड़ा किया और अंदर अपनी जीभ डाल दी..





कविता अब बावरी बन गई.. शीला के मुंह पर दबाव बनाकर घिसने लगी.. अब उसने अपनी हथेलियों से शीला के बालों को पकड़ लिया और उसके मुँह पर अपनी चुत दबाते हुए झड़ गई.. !!

"आहहह आहहह... आह्हह!!" कविता बड़बड़ा रही थी.. सांसें नियंत्रित होने तक वह कुछ बोल नही पाई। कविता की चुत ठंडी हो जाने के बावजूद शीला उसे चाटती रही.. चाटती ही रही...

थोड़ी देर बाद कविता शीला के ऊपर से उतर गई.. और फिर अपने गाउन से शीला का गीला मुंह पोंछकर बोली

"ओह भाभी... आपने तो... अब क्या कहूँ आपसे? इस तरह तो पीयूष ने भी मुझे मज़ा नही दिया है आज तक.. बहोत मज़ा आया भाभी"

स्खलन से थकी कविता की आँखें बंद होने लगी.. जबरदस्त ऑर्गजम का आनंद लेकर, शीला के बोबलों को सहलाते हुए, कविता गहरी नींद सो गई..






शीला भी पूरी रात की भीषण चुदाईयों से बहोत थक चुकी थी.. कविता के नाजुक स्तनों को मसलते हुए वह भी सो गई।

सुबह होते ही कविता और शीला दोनों जाग गए.. पर बिस्तर में ही पड़े पड़े एक दूसरे के अंगों से खेलते रहे






"भाभी, रसिक के साथ सेटिंग कैसे की आपने?" कविता ने पूछा

"कविता, मैं दो सालों से बिना लंड के तड़प रही थी.. अब इस उम्र में कहाँ लंड ढूँढने जाती!! ये तो अच्छा हुआ की रसिक की बीवी रूखी के साथ मेरी दोस्ती हो गई.. और मेरी तकलीफों का अंत आया.. नहीं तो पता नही क्या होता" कविता बड़े ही ध्यान से शीला की बातें सुन रही थी और शीला के स्तनों के साथ खेल रही थी






कविता: "भाभी, आप मेरी एक मदद करोगी?"

शीला: "बता ना.. क्या चाहिए तुझे?"

कविता: "बात दरअसल ऐसी है की मेरे मायके में मेरा एक बॉयफ्रेंड है.. पिंटू.. मुझसे ६ साल छोटा है.. "

शीला ने आश्चर्य से पूछा.. "तुझसे ६ साल छोटा बॉयफ्रेंड है तेरा??"

कविता: "वो हमारे पड़ोस में रहता है.. कई बार मेरे घर आता था.. और पढ़ाई में मेरी मदद भी करता था.. पढ़ते पढ़ते मैं उसके प्यार में कब पड़ गई मुझे पता ही नही चला.. "

शीला: "तूने चुदवाया है उस लड़के से?"

कविता: "ऊपर ऊपर से सब किया है.. वो मेरे बॉल दबाता.. होंठ चूमता.. पर उससे चुदवा नही पाई.. मैंने उसे कई बार कहा चोदने को.. पर उसने ही मना कर दिया.. वो कहता था की पहली चुदाई तो मुझे मेरी पति के साथ ही करनी है.. उसके बाद ही वो मुझे चोदेगा"

शीला: "बड़ा अच्छा लड़का है.. वरना लड़की सामने से टांगें खोल रही हो तब कौन मना करता है भला?? लोग चोदने के लिए कितने पैसे भी खर्च कर देते है"

कविता: "इसी लिए तो मुझे बहोत पसंद है पिंटू"

शीला: "तू अभी भी चाहती है उसे? तो फिर शादी के बाद चुदवाया क्यों नही उस लड़के से!!"

कविता: "उसकी याद तो मुझे रोज आती है भाभी.. पर मायके जाना नसीब ही नही हुआ अब तक.. वो मुझे कभी फोन भी नही करता.. मैं ही फोन करती रहती हूँ उसे.. जब भी टाइम मिले.. मुझे पिंटू से चुदवाने का बहोत मन है.. पर कुछ सेटिंग ही नही हो रहा"

शीला: "क्या कभी तूने उसका लंड पकड़ा था?"

कविता: "हाँ.. वैसे एक बार मुंह में लेकर चूसा भी था.. अब मुझे बहोत जोर से मन कर रहा है पिंटू से चुदने का.. "

शीला: "चिंता मत कर पगली.. बुला ले उसे मेरे घर.. दोपहर को जब तेरी सास सो जाएँ तब मेरे घर आ जाना.. और अपना काम निपटाकर निकल जाना"

कविता: "बस यही मदद चाहती थी मैं भाभी.. आप कितनी अच्छी हो!! आप कहों तो आज ही बुला लूँ पिंटू को? अभी सुबह के ६:३० बजे है.. अपने रूम में सो रहा होगा.. फोन कर देती हूँ.. आठ बजे निकलेगा तो भी डेढ़ घंटे में यहाँ पहुँच जाएगा" कविता बड़े ही उत्साह से कह रही थी.. अपने प्रेमी से मिलने के लिए वह उतावली हो रही थी.. शीला ने कविता की बिना झांटों वाली बुर को सहला सहला कर गीली कर दी।

शीला: कविता.. प्रेमीओ को मदद करना तो बड़े पुण्य का काम है.. तू बुला ले उसे.. आज तो तेरे सास-ससुर और पति तीनों बाहर है.. ऐसा मौका फिर नही मिलेगा.. तू पूरा दिन आराम से पिंटू के संग मजे करना.. तुम दोनों का खाना मेरे घर पर बना दूँगी.. अब खुश!!"

कविता ने खुश होकर शीला को गले लगा लिया.. शीला ने कविता का सिर पकड़कर अपने जिस्म पर दबा दिया..

"चल इसी बात पर मेरी चुत चाट दे.. कब से मेरे बबले मसल मसल कर गरम कर दिया मुझे.. "

कविता ने पालतू कुत्तिया की तरह शीला के आदेश अनुसार उसकी चुत चुत चाटना शुरू कर दिया.. शीला अब वासना के समंदर में गोते खाने लगी.. बिस्तर से १ फुट ऊपर अपने चूतड़ उठाकर वह कविता से अपनी चुत चटवाने लगी.. थोड़ी ही देर में सिसकियाँ भरते हुए शीला झड़ गई.. और कविता के सिर को अपनी दोनों जांघों के बीच दबा दिया.. शीला की चुत चाटते हुए कविता भी अपनी चुत को गुदगुदाते हुए स्खलित हो गई.. पिंटू के साथ.. रंगरेलियाँ मनाने का अवसर मिलने के खयाल मात्र से, कविता का रोम रोम रोमांचित हो उठाया.. उसने पिंटू को मोबाइल पर कॉल लगाया।

"पिंटू आ रहा है भाभी" खुशी से उछलते हुए कविता ने कहा.. ६ महीने बाद मिलूँगी.. कविता के चेहरे पर छलकती खुशी को देखकर शीला को भी अच्छा लगा..

"मैं घर पहुंचकर थोड़ी सफाई कर लेटी हूँ.. पिंटू और तेरे लिए बिस्तर भी ठीक-ठाक करना होगा.."

"ठीक है भाभी... मैं भी नहाकर फ्रेश हो जाती हूँ.."

"पिंटू यहाँ पहुंचे तब मुझे फोन कर देना.. और मैं जब कहूँ तभी तू आना.. ठीक है!!"

"ओके भाभी.. पर भाभी.. मुझे डर लग रहा है.. ऐसे ससुराल में अपने प्रेमी को मिलने बुलाना.. कितना रिस्की है!!" कविता थोड़ी सी सहमी हुई थी


"अरे तू फिकर मत कर.. मजे करने हो.. प्रेमी से चुदवाना हो तो थोड़ा जोखिम तो उठाना ही पड़ेगा.." कहते हुए शीला अपने घर की ओर निकल गई

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"पिंटू यहाँ पहुंचे तब मुझे फोन कर देना.. और मैं जब कहूँ तभी तू आना.. ठीक है!!"

"ओके भाभी.. पर भाभी.. मुझे डर लग रहा है.. ऐसे ससुराल में अपने प्रेमी को मिलने बुलाना.. कितना रिस्की है!!" कविता थोड़ी सी सहमी हुई थी

"अरे तू फिकर मत कर.. मजे करने हो.. प्रेमी से चुदवाना हो तो थोड़ा जोखिम तो उठाना ही पड़ेगा.." कहते हुए शीला अपने घर की ओर निकल गई

पूरा घर अस्त-व्यस्त पड़ा था.. अभी भी देसी दारू की बदबू आ रही थी.. शीला ने तुरंत ही अगरबत्ती जलाई.. जन्नत-ए-फ़िरदौस का इत्र छिड़का.. पूरा कमरा सुगंधित हो गया..

किचन में जीवा और रघु के कारनामों की निशानी हर जगह दिख रही थी.. शीला ने सफाई करके सब ठीक-ठाक कर दिया.. मेहमानों के लिए नाश्ता भी तैयार कर दिया.. और सब कुछ फिर से चेक कर लिया.. कल रात की कोई निशानी कहीं छूट न गई हो!!

अब तक कविता का फोन क्यों नही आया? शीला सोच रही थी.. काफी देर लगा दी पिंटू ने आने में.. पता नही वो चूतिया कहाँ गांड मरवा रहा होगा? ऐसा मौका जब हाथ लगने वाला हो तब कौन बेवकूफ देर करता है!! लोग कब समय का महत्व समझेंगे!! शीला मन ही मन पिंटू को गालियां दे रही थी..

तभी फोन बजा.. कविता का ही फोन था..

"भाभी, पिंटू आ गया.. में उसे सीधे आपके घर ही भेज रही हूँ" कविता की आवाज में घबराहट थी

"तू चिंता मत कर.. भेज दे उसे.. मैं हूँ ना.. कुछ नही होगा" शीला ने ढाढ़स बांधते हुए कविता से कहा

थोड़ी ही देर में.. एक अठारह उन्नीस साल का.. हल्की हल्की मुछ वाला जवान लड़का, शीला के घर की डोरबेल बजाकर खड़ा रहा.. शीला ने अपने बड़े बोबलों को साड़ी से ठीक से ढंका और दरवाजा खोला.. उसे डर था की कहीं पिंटू ने उसकी शॉपिंग मॉल जैसी उन्नत चूचियाँ देख ली तो कविता के छोटे स्तन उसे रास्ते की रेहड़ी जैसे लगेंगे..

"आ जाओ.. तुम ही हो ना पिंटू?" जानते हुए भी अनजान बन रही थी शीला

"जी हाँ.. मैं ही हूँ पिंटू" शरमाते हुए उस लड़के ने कहा.. वह अंदर आकर सोफ़े के कोने पर बैठ गया

शीला उसके लिए पानी लेकर आई.. थोड़ा सा पानी पीकर उसने ग्लास वापिस दिया.. शरारती शीला ने ग्लास लेटे वक्त पिंटू का हाथ पकड़कर दबा दिया..

"इतना शरमा क्यों रहा है? जरा आराम से बैठ.. मैंने बिस्तर भी सजा दिया है.. तुम दोनों के लिए" अनुभवी रंडी की अदा से साड़ी के पल्लू को छाती में दबाते हुए शीला ने कहा.. सफेद रंग के ब्लाउस के अंदर उसने ब्रा नही पहनी थी.. अरवल्ली की पर्वत शृंखला के दो पहाड़ों जैसे स्तनों को पिंटू हतप्रभ होकर देखता ही रह गया.. उसका गला सूखने लगा

"तू आराम से बैठ.. अपना ही घर समझ इसे.. " कातिल मुस्कान के साथ, भारी कूल्हे मटकाती हुई शीला किचन की ओर चली गई। उसके नितंबों की लचक देखकर पिंटू के होश उड़ गए






किचन में ग्लास रखकर शीला वापिस आई और सामने रखी कुर्सी पर बैठ गई.. उसने अपने हाथों को इस तरह जोड़ रखा था की उसके दोनों स्तन उभरकर बाहर झांक रहे थे..

"आज से पहले तूने कभी ये किया है पिंटू?" शीला ने पूछा

गर्दन घुमाकर पिंटू ने "नही" का इशारा किया

तभी कविता आ गई.. शीला को बात अधूरी छोड़नी पड़ी यह उसे अच्छा नही लगा.. कविता अगर थोड़ी देर से आती तो वह इस शर्मीले लड़के के साथ कुछ गरमागरम बातें कर पाती

कविता और पिंटू को एकांत देने के हेतु से शीला घर के बाहर निकल गई। दूध या सब्जी कुछ लेना तो था नही.. सिर्फ कुछ लेने के बहाने वह घर से बाहर निकल गई.. अब क्या करूँ?? कहाँ जाऊँ? कैसे टाइम पास करूँ?? शीला सोच रही थी... तभी उसके करीब से कोई गुजरा और शीला की कमर पर चिमटी काटते हुए कहा

"किसके खयालों में यहाँ रास्ते के बीच खड़ी हुई है!! मदन भैया के बारे में ज्यादा मत सोच.. वो तो विदेश में किसी गोरी के साथ मजे कर रहे होंगे"

शीला ने चोंककर पीछे देखा.. वह चेतना थी.. उसकी पुरानी पड़ोसन

"अरे चेतना तू ?? कितने साल हो गए तुझे देखे हुए.. कितनी मोटी हो गई है तू.. लगता है तेरा पति बड़ा अच्छे से रोज इंजेक्शन दे रहा है"

चेतन ने हँसते हुए कहा "हाँ.. इंजेक्शन का ही कमाल है ... पर तू बिना इंजेक्शन की इतनी खुश कैसे लग रही है!! कहीं किसी पराये इंजेक्शन का सहारा तो नही ले रही हो ना!! कमीनी हरामखोर.. मैं सालों से जानती हूँ तुझे.. तू इतने लंबे समय तक बिना कुछ किए रह ही नही सकती.. सच सच बता मुझे"

चेतना और शीला पुरानी सहेलियाँ थी.. दोनों बहुत अच्छी मित्रता थी.. उन दोनों के पति भी दोस्त थे.. शीला और चेतन एक दूसरे के साथ बीपी की सी.डी. की लेन-देन भी चलती रहती थी.. और जब दोनों के पति ऑफिस जाते थे तब दोनों एक दूसरे के साथ खूब मस्ती भी किया करती थी। कुछ समय बाद चेतना और उसका पति, नए घर में शिफ्ट हो गए.. फिर मिलना बहुत काम हो गया.. आज काफी सालों के बाद दोनों मिलकर खुश हो गए

चेतना: "अब मुझे यहीं बीच रास्ते खड़ा ही रखेगी या घर ले जाकर चाय भी पिलाएगी!!"

शीला अब फंस गई.. घर में तो कविता और पिंटू.. ना जाने क्या कर रहे होंगे.. पर शीला और चेतना के संबंध काफी घनिष्ठ थे.. शीला उसे कोने में ले गई और कहा

"यार चेतना.. अभी मेरे घर नहीं जा सकते"

चेतना: "क्यों? कीसे घुसाकर रखा है घर पर?"

शीला ने हँसते हँसते कहा "घुसाकर तो रखा है.. पर मेरे लिए नही.. मेरे पड़ोस में एक नवविवाहित लड़की रहती है.. कविता.. उसका प्रेमी उसे मिलने आया है.. वो दोनों बैठकर बातें कर रहे है मेरे घर पर"

चेतना: "साली बहनचोद.. तू अब दल्ली भी बन गई?"

शीला: "नही यार.. अब हालात ही ऐसे थे की मुझे मदद करनी पड़ी"

चेतना: "हम्म.. तब तो जरूर तेरा कोई राज जान लिया होगा उस लड़की ने.. सच सच बता !!"

शीला: "तू थोड़ा इत्मीनान रख.. सब बताती हूँ तुझे"

शीला ने शुरुआत से लेकर अंत तक.. रूखी, जीवा, रघु औ रसिक की सारी कहानी चेतना को विस्तारपूर्वक बताई..

बातें करते करते अचानक शीला की नजर उनकी गली के नाके पर गई.. और उसके पैरों तले से जमीन खिसक गई

"बाप रे.. ये लोग अभी कहाँ से टपक पड़े??!!" सामने से कविता का पति पीयूष और उसके सास ससुर आते दिखाई दिए..

"मुझे अभी के अभी उस कविता को खबर करनी पड़ेगी..वरना लोड़े लग जाएंगे.. चेतना, तू घर चल.. फिर आराम से बाकी की बातें करते है.. "

दोनों सहेलियाँ दौड़कर शीला के घर पहुंची.. अपनी चाबी से लेच-लोक खोलकर शीला ने दरवाजा खोल दिया..

इन दोनों को देखकर, कविता और पीयूष चोंक पड़े.. कविता नंग-धड़ंग पिंटू की गोद में बैठकर ऊपर नीचे करते हुए सोफ़े पर ही चुदवा रही थी। पिंटू की पतलून घुटनों तक उतरी हुई थी.. और कविता के ब्लाउस से उसके सफेद कबूतर जैसे गोरे स्तन बाहर निकले हुए थे।












कविता को शीला भाभी के सामने नग्न होने में कोई शर्म नही थी.. पर पिंटू की हालत खराब हो गई.. वह बिचारा दो अनजान औरतों के सामने नंगे चुदाई करते हुए देख लिया गया था। एक ही पल में उसका लंड मुरझाकर पिचक गया..

शीला ने कविता की तरफ देखकर कहा "तेरे सास ससुर और पीयूष घर पहुँच रहे है.. तू भाग यहाँ से.. जल्दी घर जा"

"अरे बाप रे!! इतनी देर में वापिस भी आ गए!!" कविता ने अपने कपड़े ठीक किए और पीछे के रास्ते बाहर भागी.. पिंटू उल्टा घूम गया और अपनी पतलून पहनने लगा..

शर्मसार होते हुए पिंटू ने कहा "सॉरी भाभी.. आप लोग ऐसे अचानक आ जाएंगे इसका मुझे अंदाजा नही था"

"हम नही.. वो लोग अचानक आ टपके.. इसमें कोई क्या कर सकता है?? कोई बात नही.. तू आराम से बैठ और ये बता.. मज़ा आया की नही?"

"अरे भाभी.. क्या कहूँ आप से!! मेरे लिए तो ये पहली बार था.. और कविता मुझे कुछ सिखाती ही नहीं की कैसे करना है..!! मैं कुंवारा हूँ.. पर वो तो शादीशुदा है ना!! उसे तो मुझे सिखाना चाहिए ना!!"

शीला: "मतलब? तुम लोगों ने ज्यादा कुछ नही किया??"

चेतना: "शीला, बेचारा नादान है.. अभी तो.. उसका छोटा सा है.. नून्नी जैसा.." अपनी उंगली से पिंटू के लंड की साइज़ का इशारा करते हुए चेतन ने कहा

शीला: "तूने देख भी लिया इतनी देर में? मैं ही देख नही पाई.. पिंटू.. तू चिंता मत कर.. मैं तुझे सब सीखा दूँगी.. बता.. सीखेगा मुझसे??"

चेतना: "मैं भी मदद करूंगी सिखाने में.. "

चेतना के स्तन देखकर पिंटू ललचा गया..

शीला: "देख पिंटू.. कविता तुझसे चुदवाने आई.. तो क्या वह अपने पति को बता कर आई थी क्या!! नहीं ना!! बस वैसे ही तू भी कविता को मत बताना.. की तू हमसे सिख रहा है"

पिंटू के चेहरे पर अब भी झिझक थी..

चेतना: "अबे चूतिये.. इतनी दूर से आया है.. और बिना चोदे वापिस लौट जाएगा?? ना तुझे चोदना आता है.. और ना ही तेरी छोटी सी पूपली में कोई दम.. बेटा.. इतनी छोटी नून्नी से किसी लड़की को कैसे खुश कर पाएगा!!"

पिंटू शर्म से लाल लाल हो गया.. उस बेचारे नादान लड़के को ऐसी अभद्र भाषा सुनकर बुरा लग गया.. आँख से आँसू टपकने लगे..

शीला: "चेतना बेवकूफ.. तुझे बात करने का तरीका नही आता क्या!! पिंटू का लंड छोटा है तो क्या हुआ??"

शीला पिंटू के पास आकर बैठ गई.. उसकी जांघ पर हाथ फेरते हुए उसने पिंटू का हाथ अपने गुंबज जैसे स्तनों पर रख दिया और बोली

"चिंता मत कर पिंटू.. चेतना तो पागल है.. देख.. छोटी उम्र में सब के अंग छोटे छोटे ही होते है.. तू कविता के स्तन के मुकाबले मेरे स्तन देख.. कितना फरक है!! ये तो होता ही है.. इसमे चिंता करने लायक कोई बात नही है"






सुनकर पिंटू को थोड़ा अच्छा लगा.. उसने शीला की छातियों से अपना हाथ हटा लिया..

"भाभी, मैं आपसे ये सब सीखूँगा तो कविता बुरा मान जाएगी.. "

पिंटू की दूसरी तरफ चेतना आकर बैठ गई.. और शीला का अनुकरण करते हुए वह भी पिंटू की दूसरी जांघ को सहलाने लगी.. धीरे से उसने अपने ब्लाउस की एक तरफ की कटोरी खोल दी.. पिंटू बेचारा हक्का बक्का रह गया.. !!

शीला: "अरे पिंटू, तुझे कहाँ कुछ गलत करना है.. तुझे तो बस सीखना है.. है ना!! और तू यहाँ कविता की लेने आया है.. तो क्या ये कविता के पति को पसंद आएगा!! नहीं ना!!"

पिंटू: "पर भाभी, कविता के पति को ये कहाँ पता चलने वाला है??"

शीला: "वही तो कह रही हूँ.. तू हम दोनों के पास ट्यूशन ले रहा है.. ये बात कविता को कहाँ पता चलने वाली है!! देख बेटा.. हर कोई ऐसे ही सीखता है.. अगर तुझे भी सीखना हो तो बताया.. हमारी कोई जबरदस्ती नहीं है तुझ पर.."

शीला और पिंटू के बीच इस संवाद के दौरान चेतना ने अपने ब्लाउस के दो हुक खोल दिए.. और अपने स्तनों को बाहर निकाल दिया.. पिंटू तो चेतना के बड़ी निप्पलों वाले स्तन देखकर उत्तेजित हो गया.. और उसके अंदर का किशोर विद्यार्थी जाग उठा..उसकी छोटी सी नुन्नी में जान आने लगी।






चेतना ने पिंटू के लंड पर हाथ सहलाते हुए शीला से कहा "ये तो मस्त हो गया शीला.. देख तो जरा.. पतला है तो क्या हुआ!!"

शीला ने भी पिंटू का लंड हाथ में लेकर दबाकर देखा

"आह आहह भाभी.." कहते हुए पिंटू चेतना के नग्न स्तनों को पकड़कर मसलने लगा.. शीला ने पिंटू की आधी उतरी पतलून को पूरी उतार दी.. और पिंटू का लंड पकड़कर हिलाने लगी.. पिंटू सिसकियाँ भरता गया और चेतना के स्तनों को दबाता गया.. शीला ने भी अपने ब्लाउस के बटन खोल दिए और अपनी गुलाबी निप्पल को पिंटू के मुंह में देते हुए कहा










"थोड़ा चूस ले बेटा.. तो चोदने की ताकत आ जाएगी"

पिंटू छोटे बच्चे की तरह शीला की निप्पल चूसने लगा.. "बच बच" की आवाज करते हुए कभी वह शीला की निप्पल चूसता तो कभी चेतना की.. चेतना ने अपनी निप्पल छुड़वाई.. और उसका लंड चूसना शुरू कर दिया








शीला: "अबे चूतिये.. तुझे चोदना तो नहीं आता.. लेकिन चूसना भी नहीं आता क्या!! चूसते हुए ऐसे काट रहा है जैसे पपीता खा रहा हो.. ठीक से चूस"

पिंटू बेचारा.. नादान था.. ज्यादा देर अखाड़े में इन दोनों पहलवानों के सामने टीक पाने की उसकी हैसियत नहीं थी.. चेतना के मुंह में ही उसका लंड वीर्य-स्त्राव कर बैठा.. चेतना बड़ी मस्ती से.. अनुभवी रांड की तरह.. पिंटू के लंड को चाट चाट कर साफ करने लगी। पिंटू तो शीला के मदमस्त खरबूजे जैसे स्तनों में खो सा गया था.. कविता के छोटे छोटे कबूतर जैसे स्तनों के मुकाबले शीला के उभारों ने उसका दिल जीत लिया था।

चेतना: "छोकरा नादान है.. पर तैयार हो जाएगा.. थोड़ा सा ट्रेन करना पड़ेगा"

शीला: "कितना माल निकला उसके लंड से?"

चेतना: "एक चम्मच जितना.. पर मेरे पति के वीर्य के मुकाबले स्वाद में बड़ा ही रसीला था" अपनी उँगलियाँ चाटते हुए चेतना ने कहा

शीला: "हम्म.. बच्चा बोर्नवीटा पीता होगा तभी उसका माल इतना स्वादिष्ट है!!" कहते हुए शीला हंस दी.. "लंड पतला जरूर है.. पर है मजबूत.. अंबुजा सीमेंट जैसा.. देख देख.. झड़ने के बाद भी पूरी तरह से नरम भी नहीं हुआ"

चेतन ने झुककर पिंटू के अर्ध जागृत लंड की पप्पी ले ली..

"अरे पिंटू, तूने कविता की चुत चाटी है कभी?" अपना घाघरा उतारते हुए शीला ने पिंटू से पूछा.. शीला की गोरी गोरी मदमस्त जांघों को देखकर पिंटू का लंड उछलने लगा..

पिंटू: "एकाध बार किस किया है.. पर अंदर से चाटकर नहीं देखा कभी"

शीला: "देख पिंटू, अगर औरत को खुश करना है तो सब से पहला पाठ यह सिख ले.. चुत को चौड़ी करके अंदर तक जीभ डालते हुए चाटना सीखना पड़ेगा.. "

पिंटू बड़े ही अहोभाव से इन दोनों मादरजात नंगी स्त्रीओं को देखता रहा.. जैसे स्कूल के मैडम से अभ्यास की बातें सिख रहा हो.. शीला और चेतना पिंटू को प्रेम, कामवासना, चुदाई, मुख मैथुन वगैरह के पाठ पढ़ाने लगे.. तीनों एक दूसरे के सामने पूरी तरह नंगी अवस्था में थे.. उत्तेजित होकर शीला और चेतना, पिंटू के जिस्म को जगह जगह पर चूमते हुए उसके शरीर से खेलने लगे। पिंटू का लंड अब सख्त होकर झूलने लगा..

शीला: "देख ले ठीक से पिंटू.. इस तरह चुत को चाटते है" कहते हुए शीला ने चेतना को लिटा दिया और उसकी चुत पर अपनी जीभ फेरने लगी






चेतना: "ओह्ह शीला.. बहोत मज़ा आ रहा है यार.. "

चेतना की निप्पल उत्तेजना के मारे सख्त कंकर जैसी हो गई थी। पिंटू एकटक शीला और चेतना की इन हरकतों को देख रहा था।






चेतना: "ठीक से देख ले पिंटू.. आह्ह.. बिल्कुल इसी तरह कविता की पुच्ची को चाटना.. नहीं तो तेरी कविता किसी और से सेटिंग करके अपनी चटवा लेगी"

काफी देर तक शीला ने चेतना के भोसड़े के हर हिस्से को चाटा.. अब उसने एक साथ चार उँगलियाँ अंदर घुसेड़ दी और चाटती रही






चेतना ने थोड़े गुस्से से कहा "बहनचोद.. क्या देख रहा है!! कम से कम मेरी चूचियाँ तो मसल दे.. ऐसे ही निठल्ले की तरह बैठा रहेगा तो कुछ नहीं होगा तेरा.. !!"

सुनते ही पिंटू ने तुरंत चेतना के स्तनों को पकड़कर दबाना शुरू कर दिया.. शीला की चुत चटाई से आनंदित होते हुए.. अपने चूतड़ों को उछाल उछाल कर चेतना झड गई.. पिंटू सब कुछ बड़े ही ध्यान से देख रहा था।

चेतना की चुत से मुंह हटाते हुए शीला ने कहा "देखा पिंटू!! लंड छोटा हो या बड़ा.. पतला हो या मोटा.. कुछ फरक नहीं पड़ता.. अगर अच्छे से चुत चाटने की कला सिख ली..तो अपनी पत्नी या गर्लफ्रेंड को खुश रख पाएगा"

पिंटू: "पर भाभी.. लड़की को असली मज़ा तो तब ही आता है ना अगर लंड लंबा और मोटा हो!!" बड़ी ही निर्दोषता से पिंटू ने पूछा

चेतना: "बात तो तेरी सही है बेटा.. मुझे यह बता.. की तुझे ५ रुपये वाली कुल्फी पसंद है या १० रुपये वाली?"

पिंटू: "जाहीर सी बात है.. १० रुपये वाली"

शीला: "बिल्कुल वैसे ही.. हम औरतों को भी १० रुपये वाली कुल्फी ज्यादा पसंद है.. पर उसका यह मतलब बिल्कुल भी नहीं है की हमें ५ रुपये वाली कुल्फी से मज़ा नहीं आता.. कुल्फी छोटी हो तो उसे धीरे धीरे चूसकर मज़ा लेना भी आता है.. और कई बिनअनुभवी औरतों को १० रुपये वाली कुल्फी भी ठीक से खाना नहीं आता.. पिघलाकर नीचे गिरा देती है"

पिंटू: "पर भाभी.. अगर मुझे अपना लंड मोटा और तगड़ा बनाना हो तो क्या करू?"

इतना समझाने के बावजूद पिंटू घूम फिर कर वहीं आ गया.. शीला ने अपना सिर पीट लिया..

शीला: "अबे लोडुचंद.. जैसे जैसे तू बड़ा होगा वैसे वैसे तेरा वो भी बड़ा हो जाएगा.. चिंता मत कर.. देख.. अब जिस तरह मैंने चेतना की चुत चाटी थी वैसे ही तू मेरी चाटकर दिखा.. देखूँ तो सही तूने कितना सिख लिया.. समज ले की यह तेरी परीक्षा है.. अगर ठीक से नहीं चाटी तो मैं कविता को सबकुछ बताया दूँगी"

कविता का नाम सुनते ही पिंटू भड़क गया.. और शीला की जांघें चौड़ी करके बीच में बैठ गया.. शीला का फैला हुआ भोसड़ा देखकर पिंटू सोच रहा था.. कहाँ मेरी कविता की मोगरे के फूल जैसी नाजुक चुत.. और कहाँ ये धतूरे के फूल जैसा शीला भाभी का भोसड़ा !!

शीला: "यही सोच रहा है ना की कविता के मुकाबले कितनी बड़ी है मेरी!! जब मैं कविता की उम्र की थी तब मेरी भी कविता की तरह मस्त संकरी सी थी.. पर मेरे पति ने ठोक ठोक कर ऐसे रानीबाई की बावरी जैसा बना दिया.. वो तो कविता की चुत भी उसका पति चोद चोद कर चौड़ी कर ही देगा.. तू चाटना शुरू कर.. जल्दी कर बहनचोद.. इतना गुस्सा आ रहा है की तेरी गांड पर एक लात मारकर तुझे गली के नुक्कड़ पर फेंक दूँ.. " कहते हुए शीला ने अपने गुफा जैसे भोसड़े पर पिंटू को मुंह दबा दिया..

पिंटू भी शीला को खुश करने के इरादे से.. चुत चटाई की नेट-प्रेक्टिस करते हुए.. चब चब चाटने लगा.. शीला के तानों ने अपना काम कर दिया.. पिंटू कोई कसर छोड़ना नहीं चाहता था.. अपनी जीभ को अंदर तक घुसेड़कर उसने शीला के भोसड़े को धन्य कर दिया.. कराहते हुए शीला अपनी गदराई जांघों को आपस में घिसने लगी..

बगल में बैठी चेतना अपने स्तनों को शीला के बबलों से रगड़ने लगी.. और शीला ने उसे खींचकर अपने होंठ चेतना के होंठों पर रखते हुए चूम लिया..








शीला ने अपनी दोनों विशाल जांघों के बीच पिंटू को दबोच लिया.. अपना स्खलन हासिल करने के बाद ही उसने पिंटू को जांघों की मजबूत पकड़ से मुक्त किया.. शीला की पकड़ से छूटते ही पिंटू दूर खड़ा होकर हांफने लगा.. बाप रे!! ये तो औरत है या फांसी का फंदा.. जान निकल जाती अभी.. पिंटू कोने में जाकर बैठ गया..

उसे बैठा हुआ देखकर चेतना उसके पास आई.. और उसे कंधे से पकड़कर खड़ा किया


चेतना: "बेटा.. डरने की जरूरत नहीं है.. देख कितनी मस्त गीली हो गई है शीला की चुत!! जा.. उसके छेद में अपना लंड पेल दे.. और धीरे धीरे अंदर बाहर करना शुरू कर.. और सुन.. पूरा जोर लगाना.. ठीक है.. तुझे बस ऐसा सोचना है की ट्यूशन पहुँचने में देर हो गई है और तू तेज गति से साइकिल के पेडल लगा रहा है.. जा जल्दी कर"

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चेतना: "बेटा.. डरने की जरूरत नहीं है.. देख कितनी मस्त गीली हो गई है शीला की चुत!! जा.. उसके छेद में अपना लंड पेल दे.. और धीरे धीरे अंदर बाहर करना शुरू कर.. और सुन.. पूरा जोर लगाना.. ठीक है.. तुझे बस ऐसा सोचना है की ट्यूशन पहुँचने में देर हो गई है और तू तेज गति से साइकिल के पेडल लगा रहा है.. जा जल्दी कर"

चेतना की बात सुनकर पिंटू खड़ा हुआ.. और शीला के दो पैरों के बीच सटकर.. लंड घुसाते हुए अंदर बाहर करने लगा.. शीला को पिंटू के चोदने से कोई फरक नहीं पड़ा.. उसकी चुत में अब तक काफी लोग निवेश कर चुके थे.. और ये तो अग्रीमन्ट भी घबराते हुए कर रहा था.. बिना हिले डुले लाश की तरह पड़ी रही शीला.. और पिंटू उस पर कूदता रहा.. जैसे बिना हवा के पतंग उड़ाने का प्रयत्न कर रहा हो!!





दो तीन मिनट तक ऐसे ही बेजान धक्के लगाकर.. वह बेचारा छोकरा थक गया.. चेतन कमरे के कोने में नंगी बैठी हुई चुत में उंगली कर रही थी.. शीला बिस्तर पर नंगी पड़ी थी.. और नंगा पिंटू झड़कर शीला के जिस्म के ऊपर गिरा हुआ था.. तीनों स्खलित होकर तंद्रावस्था में पहुँच गए थे..







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तभी डोरबेल बजने की आवाज आई.. डींग डोंगगगग.. !!

तीनों नंगे थे.. तेजी से कपड़े पहनने लगे.. शीला ने भागकर दरवाजा खोल दिया.. दरवाजे पर अनुमौसी थी.. कविता की सास..

अनुमौसी: "इतनी देर क्यों लगा दी दरवाजा खोलने में?" शक की निगाह से देखते हुए वह बोली

शीला: "अरे मौसी.. मेरी सहेली आई है.. हम दोनों बातों में ऐसी उलझ गई थी की डोरबेल की आवाज ही नहीं सुनी मैंने.. आइए ना अंदर"

अनुमौसी अंदर आ गई.. "दूध फट गया था.. थोड़ा सा मिलेगा तेरे पास?"

शीला ने फ्रिज से पतीली निकाली और अनुमौसी को दूध दिया.. अनुमौसी से उनके बीमार भाई की तबीयत के बारे में भी पूछा.. थोड़ी देर यहाँ वहाँ की बातें करने के बाद अनुमौसी निकल गई.. पर सोफ़े पर कुशन के पीछे पड़ी हुई गीली पेन्टी.. उनकी नज़रों से बच ना सकी.. वह कुछ बोली नहीं.. और चुपचाप वहाँ से चली गई..

पिछले ६० सालों में मौसी ने भी की खेल खेले थे.. वह इतनी नादान तो थी नहीं की चुत के स्खलन की और पुरुष के वीर्य की गंध को पहचान ना सके.. शीला के घर में जरूर कुछ पक रहा था.. पर अनुभवी मौसी फिलहाल बिना कुछ कहे दूध लेकर चली गई.. डोरबेल बजते ही चेतना और पिंटू बाथरूम में छुप गए थे.. जब तक अनुमौसी शीला से बातें कर रही थी.. तब तक वह दोनों चुपचाप अंदर खड़े रहे..

चेतना ने इस मौके का फायदा उठाया.. पिंटू को बाहों में लेकर अपने स्तनों को उसकी छाती पर रगड़कर.. उस नादान लड़के को उत्तेजित कर दिया.. पिंटू भी चेतना की छातियाँ दबाते हुए उसके होंठ चूस रहा था.. चेतना ने पिंटू के पेंट में हाथ डालकर उसका लंड मसलना शुरू किया.. पिंटू भी चेतना के पेटीकोट में हाथ डालकर उसकी गरम चुत में उंगली अंदर बाहर करने लगा.. कामरस से गीली हो रखी चुत में बड़े ही आराम से उंगली जा रही थी।






शीला ने बाथरूम को दरवाजा खटखटाकर खोलने के लिए हरी झंडी दिखाई.. चेतना ने पिंटू को चूमते हुए दरवाजे की कुंडी खोल दी.. इन दोनों को लिपटे हुए देखकर शीला ने कहा

शीला: "क्या बात है!! तुम दोनों तो बाथरूम में ही शुरू हो गए!! बड़ी जल्दी सिख गया तू पिंटू.. औरत को खुश रखने का दूसरा नियम जान ले.. जहां और जब मौका मिले.. चोद देना.. "

चेतना: "देख शीला.. तूने अभी अभी चटवा ली है.. और झड भी चुकी है.. अब मुझे अपनी चटवाने दे.. फिर मैं घर के लिए निकलूँ.. मुझे देर हो रही है"

शीला: "अरे, पर मेरा अभी भी बाकी है.. उसका क्या?? तेरे घर तो तेरा पति भी है.. मेरे वाला तो चार महीने बाद आने वाला है"

चेतना: "वो सब मैं नहीं जानती.. पिंटू अब मेरी चुत चाटेगा.. बस.. !! बड़ी लालची है तू शीला.. एक बार पानी निकलवा लिया फिर भी तसल्ली नहीं हुई तुझे.."

पिंटू के छोटे से लंड के लिए दोनों झगड़ने लगी..

चेतना: "क्या बताऊँ तुझे शीला!! मेरे पति को डायाबीटीस है.. काफी समय हो गया.. वो बेचारे अब पहले की तरह.. नहीं कर पाते है"

शीला: "मतलब? उनका खड़ा नहीं होता क्या?"

चेतना: "बड़ी मुश्किल से खड़ा होता है.. वो भी काफी देर तक चूसने के बाद.. अब क्या करू मैं.. किससे कहूँ? रोज मुझे बाहों में भरकर चूम चूम कर गरम कर देते है.. पर उनका लोंडा साथ ही नहीं देता.. इसलिए करवट बदलकर सो जाते है बेचारे.. प्लीज.. अभी मुझे चटवा लेने दे" कहकर चेतना ने बाथरूम में ही अपना घाघरा ऊपर कर लिया.. और अपने एक पैर को कमोड पर रख दिया.. अपनी चुत खुजाते हुए उसने पिंटू को गिरहबान से पकड़कर खींचा और नीचे बैठा दिया.. पिंटू पालतू कुत्ते की तरह चेतना की बुर की फाँकें चाटने लगा.. शीला ने चेतना के बाहर लटक रहे पपीते जैसे स्तनों को मसलते हुए.. उसकी बादामी रंग की निप्पल को दांतों के बीच दबाते हुए काट लिया..






दर्द से कराह उठी चेतना.. फिर भी शीला और पिंटू ने अपना काम जारी रखा.. शीला अपने दूसरे हाथ से अपनी बुर खुजाने लगी.. पिंटू ने भी शीला की गुफा को सहला दिया.. "आह्ह.. शाबाश पिंटू मेरे लाल.. बिना कहे ही समझ गया तू मेरे बेटे.. सहला और सहला वहाँ.. आह्ह.. "

शीला भी अपनी चुत खुजाते हुए आनंद के महासागर में गोते खाने लगी.. और डूब गई.. शीला ने चेतना के होंठों पर कामुक चुंबन जड़ दिया.. चेतना भी वासना के सागर में अपनी पतवार चलाते हुए किसी दूसरी दुनिया में पहुँच गई.. पिंटू को अपनी दोनों जांघों के बीच दबोच कर.. शीला के चुचे दबाते हुए.. जोर से हांफने लगी.. पिंटू का पूरा मुंह.. चेतना के चिपचिपे चुत-रस से भर गया। उस छोटे लड़के ने अपने छोटे लंड के उपयोग के बिना ही चेतना को ठंडी कर दिया..






स्खलित हुई चेतना की सांसें बड़ी ही तेज चल रही थी.. उसकी हांफती हुई बड़ी बड़ी छाती.. और बिखरे हुए बाल.. बड़े ही सुंदर लग रहे थे। उसका काम निपट गया था.. उसने अपने कपड़े उठाए और बाथरूम के बाहर निकली तब शीला.. कोने में पड़ी कपड़े धोने की थप्पी का मोटा हेंडल तेजी से अपनी चुत में घुसेड़कर मूठ मार रही थी।

पिंटू बड़े ही आश्चर्य से शीला के भोसड़े में उस मोटे डंडे को अंदर बाहर होते हुए देखता रहा.. इतना मोटा डंडा भी बड़े आराम से अंदर ले रही शीला को देखकर पिंटू को अपने छोटे से औज़ार की मर्यादा का एहसास हुआ.. फिर भी बिना निराश हुए.. उसने शीला के हाथ से उस थप्पी को खींचकर बगल में रख दिया.. शीला को पलटा कर झुका दिया.. शीला कमोड पर हाथ टिकाते हुए झुक गई.. उसके नरम गोल बड़े बड़े उरोज बड़ी सुंदरता से लटक रहे थे.. जैसे खुद के स्तनों का ही भार लग रहा हो.. शीला ने अपने एक स्तन को हाथों में पकड़ लिया और फ्लश टँक पर हाथ टेक कर अपने चूतड़ उठाकर खड़ी हो गई।








अब पिंटू.. उकड़ूँ होकर नीचे बैठ गया.. शीला के भव्य कूल्हों को दोनों हाथों से अलग करते ही.. उसे शीला का गुलाबी रंग का गांड का छेद दिखने लगा.. शीला को खुश करने के लिए पिंटू के पास उस थप्पी के हेंडल जैसा मोटा हथियार तो नहीं था.. उसे अपने छोटे से मर्यादित कद के हथियार से ही युद्ध लड़ना था.. और जीतना भी था.. हालांकि.. इस युद्ध मैं पिंटू की दशा.. अमरीका के सामने बांग्लादेश जैसी थी..

बिना एक पल का विलंब किए.. पिंटू ने शीला की गांड के छेद को उत्तेजना से चूम लिया.. और अपनी जीभ की नोक उस छेद पर फेर दी.. फिर उसने थोड़ा सा नीचे जाकर.. शीला की लसलसित चुत की लकीर पर आक्रमण शुरू किया.. उस दौरान उसने शीला के दोनों चूतड़ों को फैलाकर पकड़ रखा था.. जैसे किसी मोटे ग्रंथ की किताब को खोलकर पढ़ रहा हो..






चुत की लकीर चौड़ी होते ही.. अंदर का लाल गुलाबी विश्व द्रश्यमान होने लगा.. देखते ही पिंटू की सांसें फूल गई.. पिंटू चुत पर जीभ फेरने लगा और शीला तड़पने लगी.. और वासना से बेबस हो गई.. उत्तेजना के कारण शीला के पैर कांप रहे थे.. और वह बड़ी हिंसक तरीके से अपने स्तन मसल रही थी.. निप्पल तो ऐसे खींच रही थी मानों उसे अपने स्तन से अलग कर देना चाहती हो..





तीन घंटे पहले.. शीला के घर आया ये नादान छोकरा.. अब किसी अनुभवी मर्द की अदा से शीला की रसभरी.. स्ट्रॉबेरी जैसी चुत को चाट रहा था। शीला के स्तन उत्तेजना के कारण कठोर हो गए थे.. और निप्पल सख्त होकर बेर जैसी हो गई थी.. पिंटू को इतना तो पता चल गया की उसकी छिपकली जैसी लोड़ी से शीला के किले को फतह कर पाना नामुमकिन सा था.. इसी लिए वो उसे चाट चाटकर शांत करने का प्रयास कर रहा था।

वो कहावत तो सुनी ही होगी "काम ही काम को सिखाता है" बस उसी तर्ज पर.. पिंटू के दिमाग में कुछ आया.. और उसने शीला की गांड में अपनी उंगली घुसा दी.. शीला को अपनी गांड में जबरदस्त खुजली हो रही थी.. बिना सिखाए की गई इस हरकत से शीला खुश हो गई.. और खुद ही अपनी गांड को आगे पीछे करते हुए पिंटू की उंगली को चोदने लगी..






"आह्ह.. ओह्ह.. ओह्ह.. चाट पिंटू.. अंदर तक जीभ डाल दे.. ऊईई..मर गई.. मज़ा आ रहा है.. उईई माँ.. तेज तेज डाल.. जीभ फेर जल्दी.. मैं झड़नेवाली हूँ.. आह्ह आह्ह आह्ह.. मैं गईईईईईई......!!!!!!!!" कहते ही शीला का शरीर ऐसे कांपने लगा जैसे उसे बिजली का झटका लगा हो.. उसका पूरा शरीर खींचकर तन गया.. और दूसरे ही पल एकदम ढीला हो गया.. शीला वहीं फर्श पर ढेर होकर गिर गई.. पिंटू भी चाट चाट कर थक गया था.. शीला के अनुभवी भोसड़े को शांत करना मतलब.. शातिर गुनेहगार से अपने जुर्म का इकरार करवाने जितना कठिन काम था.. पर पिंटू की महेनत रंग लाई.. शीला और चेतना.. दोनों को मज़ा आया..

चेतना तो कपड़े पहनकर कब से ड्रॉइंगरूम में इन दोनों का इंतज़ार कर रही थी.. उसकी चुत मस्त ठंडी हो चुकी थी.. वह जानती थी की शीला तब तक बाहर नहीं निकलेगी जब तक की उसके भोसड़े को ठंडक नहीं मिल जाती!!

"पिंटू.. मेरे हुक बंद कर दे.. मुझे ओर भी काम है बेटा.. " कहते हुए शीला घूम गई.. पिंटू उनकी संगेमरमर जैसी पीठ को देखतय ही रह गया.. उस चिकनी पीठ पर हाथ फेरते हुए उसने ब्रा के दोनों छोर को पकड़कर खींचा ताकि हुक बंद कर सकें.. ब्रा के पट्टों को खींचकर करीब लाते हुए ऐसा महसूस हो रहा था जैसे रस्साकशी का खेल चल रहा हो!! पिंटू को हंसी आ गई.. आईने में पिंटू को देख रही शीला ने पूछा..






"क्यों रे छोकरे? हंस क्यों रहा है?"

"भाभी, मैं ये सोचकर हंस रहा था की इतनी छोटी सी ब्रा में इतने बड़े बड़े गोले कैसे समाएंगे भला??"






शीला: "भोसडी के..मादरचोद.. उसमें हसने वाली क्या बात है!!"

पिंटू: "भाभी.. ऐसे ही बड़े बड़े बबलों ने मुझे हिन्दी की परीक्षा में १५ मार्क दिलवाए थे.. "

शीला (आश्चर्य से): "वो कैसे?"

पिंटू: "बोर्ड की परीक्षा में हिन्दी के पेपर में एक निबंध पूछा गया था "बढ़ती हुई आबादी से होते नुकसान".. क्या लिखूँ कुछ सूझ ही नहीं रहा था.. इतने में मेरी नजर सुपरवाइज़र मैडम पर पड़ी.. उनके स्तन भी आपकी तरह बड़े बड़े थे और ब्लाउस मैं संभल नहीं रहे थे.. उन्हे देखकर मैंने निबंध लिखना शुरू कर दिया.. आबादी के बढ़ने से लोगों को होती परेशानियाँ.. दो तीन वाक्य लिखने के बाद.. मैंने दूसरा अनुच्छेद छोटे से घर में ज्यादा लोगों को रहने पर पड़ती तकलीफ की ऊपर लिख दिया.. और उपसंहार आबादी के चलते जरूरत की चीजों की किल्लत पर लिख दिया.. सब कुछ उस सुपरवाइज़र मैडम के मम्मों की प्रेरणा की वजह से.. वो बात याद आ गई.. इसलिए हंसी आई.. वो बात छोड़िए.. आप ये बताइए की अब ब्रा के हुक को बंद कैसे करू? ज्यादा खिचूँगा तो टूट जाएंगे.."

पिंटू की बकवास सुनकर बोर हो चुकी शीला ने अपनी दोनों कटोरियों में से स्तनों को निकाल दिया.. उसके उरोज ब्रा के नीचे झूलने लगे.. स्टेशन आते ही जैसे लोकल ट्रेन में जगह हो जाती है वैसे ही अब जगह हो गई और हुक आसानी से बंद हो गए.. शीला के स्तन अभी भी ब्रा के बाहर झूल रहे थे।

शीला: "चल पिंटू.. अब इन दोनों को अंदर डाल दे.. "

पिंटू ने शीला का दोनों स्तनों को पकड़कर पहले तो थोड़ी देर दबाया.. शीला आँखें बंद करके स्तन मर्दन का आनद लेने लगी

शीला: "जरा जोर से मसल.. आह्ह!!"






पिंटू ने शीला को अपनी ओर खींच लिया.. और उसके गालों को चूम कर अपने होंठों को शीला के कान के करीब ले गया और फुसफुसाते हुए बोला

पिंटू: "आप का तो हो गया भाभी.. पर मेरा अभी बाकी है.. मेरा पानी निकलवाने का भी कोई जुगाड़ लगाइए.."

शीला अपना हाथ नीचे ले गई और पिंटू का लंड पकड़कर बोली " सच कहूँ पिंटू?? तू मेरे बच्चों से भी छोटा है.. तेरी नुन्नी से छेड़खानी करते हुए भी मुझे शर्म आ रही है.. पर क्या करती? ये सब इतना अचानक हो गया की.. वरना तेरे ये सीटी जैसे लंड से मेरा क्या भला होगा!! अभी देखा था ना तूने.. उस थप्पी का हेंडल कैसे अंदर समा गया था!! अब तू ही बता.. तेरी छोटी सी लोड़ी से मुझे कैसे संतोष मिलेगा??"

पिंटू: "पर उसमें मेरी क्या गलती है? मैंने आपको और चेतना भाभी को.. मुझे जितना आता था वह सब कर के दिया ना!! और ठंडा भी कर दिया!!"

शीला: "तेरी बात सही है पिंटू.. पर तेरा छोटा सा लंड पकड़ने में मुझे शर्म आती है.. तू खुद ही इसे हिला ले.. क्यों की अगर मैं गरम हो गई.. तो फिर तुझे चूस लूँगी पूरा.. इससे अच्छा तो तू मेरे स्तनों को चूसते हुए अपना लंड हिलाते हुए पानी गिरा दे" कहते ही शीला ने अपना एक स्तन पिंटू के मुंह में दे दिया.. बेचारा पिंटू!! शीला की निप्पल चूसते हुए अपना लंड हिलाए जा रहा था..






शीला: "जल्दी जल्दी कर.. मेरी चुत में फिर से खाज होनी शुरू हो गई है"

"उहह भाभी.. आह्ह.. ओह्ह.. " पिंटू स्खलित हो गया.. शीला बड़े ताज्जुब से देखती रही.. इतने छोटे लंड की पिचकारी दो फुट दूर जाकर गिरी!! उस फेविकोल जैसे वीर्य को देखकर शीला की चुत में झटका लगा.. अंदर दलवाया होता तो मज़ा आता.. कितने फोर्स से पिचकारी लगाई इसने!! अंदर बच्चेदानी तक जाकर लगती.. मज़ा आ जाता.. पर उसके ये सिगरेट जैसे लंड से वह कहाँ ठंडी होने वाली थी!! चलो, जो हुआ अच्छा ही हुआ!!






शीला और पिंटू कपड़े पहनकर ड्रॉइंगरूम में आए.. चेतना सोफ़े पर बैठे बैठे आराम से अखबार पढ़ रही थी..

शीला: "आप दोनों बातें करो.. मैं अभी कुछ नाश्ता बना कर लाती हूँ.. बेचारे पिंटू को भूख लगी होगी"

पिंटू: "नहीं नहीं.. मुझे भूख नहीं लगी.. मैं अब निकलता हूँ.. घर पहुँचने में देर होगी तो मम्मी डाँटेगी.. "

शीला: "अब आधे घंटे में कोई देरी नहीं हो जाने वाली.. आराम से बैठ.. नाश्ता कर के ही जा.. आज तो तुझे पूरा निचोड़ दिया हमने!!"

चेतना जिस अखबार को पढ़ रही थी उसमें एक इश्तिहार छपा हुआ था.. जिसमें एक मॉडल छोटी सी ब्रा पहने अपने बड़े बड़े उभार दिखा रही थी..

चेतना: "ये अखबार वाले भी कैसी कैसी अधनंगी एडवर्टाइज़मेंट छापते है!! फिर खुद ही बीभत्सता के खिलाफ लंबे लंबे आर्टिकल लिखते है.. और इन मॉडलों को तो देखो.. कैसे अपने बबले दिखाकर फ़ोटो खिंचवाई है!! इन्हे देखकर तो मर्दों के लंड पतलून फाड़कर बाहर निकल जाते होंगे!! खुद ही आधे कपड़ों में घूमेगी.. फिर कुछ उंच-नीच हो जाए तो चिल्लाएगी.. "

पिंटू आराम से सुनता रहा.. अखबार पढ़ रही चेतना का पल्लू नीचे गिर गया था.. उसकी ओर इशारा करते हुए उसने कहा

पिंटू: "भाभी.. पहले तो आप अपनी दोनों हेडलाइट को ढँक लो.. कहीं मैं ही कुछ कर बैठा तो यहीं पर उंच-नीच हो जाएगी और आप चिल्लाएगी"

चेतना: "तुझे जो मन में आए वो कर इनके साथ... मैं कहाँ मना कर रही हूँ!!" कहते हुए चेतना ने पिंटू की जांघ को सहलाया और उसके करीब आ गई.. अपने आप को थोड़ा सा ऊपर किया.. और अपनी छाती से पल्लू गिरा दिया.. कमर के ऊपर अब केवल ब्लाउस के अंदर कैद स्तनों का उभार देखकर कोई भी बेकाबू बन जाता.. चेतना ने बड़ी ही कातिल अदा से अंगड़ाई ली.. और मदहोश कामुक नज़रों से.. अपने निचले होंठ को दांतों तले दबाया,. होंठों पर अपनी जीभ फेर ली.. और अपने स्लीवलेसस ब्लाउस में से पसीनेदार काँखों को दिखाकर.. पिंटू की मर्दानगी को.. एक ही पल में नीलाम कर दीया।

अखबार को सोफ़े पर फेंककर चेतना पिंटू की जांघों पर सवार हो गई.. और उसके बिल्कुल सामने की तरफ हो गई। पिंटू के मासूम चेहरे को अपनी दोनों हथेलियों में भरते हुए उसके गालों को सहलाने लगी और बड़ी ही कामुक अदा से बोली






चेतना: "हाय रे पिंटू.. कितना चिकना है रे तू!! तुझे कच्चा चबा जाने का मन कर रहा है मेरा" कहते हुए चेतना ने पिंटू के होंठों को चूम लिया.. चिंटू ने अपने दोनों हाथों से चेतना के कूल्हें पकड़ लिए.. और उन्हे सहलाने लगा..

चेतना ने पिंटू के पतलून की चैन खोली और उसके सख्त लंड को बाहर निकाला.. बिना वक्त गँवाए उसने अपना घाघरा उठाया और अपनी रसीली चुत की दरार पर पिंटू के सुपाड़े को सेट करते हुए अपने जिस्म का वज़न पिंटू की जांघों पर रख दिया.. पिंटू का लंड चेतना की चुत में ऐसे गायब हो गया जैसे गधे के सर से सिंग!!






शीला एक प्लेट में गरमागरम पकोड़े लेकर बाहर आई तब इन दोनों को चुदाई करते हुए देखकर हंस पड़ी.. और मन ही मन बोली.. साली ये चेतना भी.. इस बेचारे बच्चे की जान ही ले लेगी आज.. शीला ने एक गरम पकोड़ा लिया और चेतना के खुले नितंब पर दबा दिया

चेतना: "उईई माँ.. क्या कर रही है हरामी साली!!!" बोलते हुए चेतन उछल पड़ी.. उसके उछलते ही पिंटू का लंड उसकी चुत से बाहर निकल गया.. वह उत्तेजना से थर-थर कांप रही थी.. पिंटू का लंड भी झूल रहा था..

शीला ने पकोड़े की डिश को टेबल पर रखा और पिंटू के लंड को मुंह में लेकर चूसने लगी.. शीला के मुंह की गर्मी.. पिंटू और बर्दाश्त न कर सका.. और बस दस सेकंड में उसके लंड ने इस्तीफा दे दिया.. पिंटू का वीर्य मुंह में भरकर शीला किचन में चली गई। चेतन से अब और रहा न गया.. अपना घाघरा ऊपर करते हुए वह क्लिटोरिस को रगड़ने लगी.. अपनी चुत की आग को बुझाने की भरसक कोशिश कारणे लगी.. पर उसकी चुत झड़ने का नाम ही नहीं ले रही थी।

आखिरकार उसने पिंटू को सोफ़े पर लिटा दिया और उसके मुंह पर सवार हो गई.. और इससे पहले की पिंटू कुछ कर पाता.. वह उसके मुंह पर अपनी चुत रगड़ने लगी.. करीब पाँच मिनट तक असहाय पिंटू के मुंह पर चुत रगड़ते रहने के बाद.. उसकी चुत का फव्वारा निकल गया.. बेचारा पिंटू.. चेतना के इस अचानक हमले से हतप्रभ सा रह गया..






थोड़ी देर यूं ही लेते रहने के बाद वह उठा और कपड़े ठीक किए.. उसकी हालत खराब हो गई थी.. वह बुरी तरह थक चुका था.. अपने लंड को पेंट में डालकर उसने चैन बंद की और बिना कुछ कहे वह दरवाजा खोलकार चला गया.. नाश्ता करने भी नहीं रुका.. इन दोनों भूखे भोसड़ों की कामवासना ने उसे डरा दिया था... वह दुम दबाकर भाग गया

शीला और चेतना ने उसे रोकने की कोशिश भी नहीं की.. क्यों करती!! उनका काम तो हो गया था.. अनमोल ऑर्गैज़म प्राप्त कर दोनों सहेलियाँ पकोड़े खाते हुए बातों में मशरूफ़ हो गई।

चेतना: "मस्त पकोड़े बनाए है तूने" खाते हुए बोली

शीला: "चेतना.. क्या सच में तेरे पति का खड़ा नहीं होता?"

चेतना: "इतना निकम्मा भी नहीं हुआ है अब तक.. पर हाँ.. पहले की तरह जल्दी सख्त नहीं होता.. और होता भी है तो एकाध मिनट में बैठ जाता है"

कहते हुए चेतना उदास हो गई.. शीला ने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा.. "मैं समझ सकती हूँ की तुझ पर क्या बीत रही होगी.. मैंने भी मदन की गैरमौजूदगी में दो साल बिताए है.. तू अब से मेरे घर आया कर.. तुझे तड़पना नहीं पड़ेगा.. "

चेतना: "इसी लिए तो मैं घर पर आकर बात करने के लिए बोल रही थी.. ऐसी बातें बाहर खुले में करना ठीक नहीं"

शीला: "सच कहा तूने चेतना.. इस उम्र में जब जिस्म की भूख सताती है तब ऐसी स्थिति होती है की ना सहा जाता है और ना कहा जाता है"

चेतना: "एक बात पूछूँ शीला? सच सच बताना.. मदन भाई दो साल से गए हुए.. इतने समय तू बिना कुछ किए रह पाई यह बात मैं मान नहीं सकती"

शीला: "सच कह रही है तू.. मैंने तो अपने दूधवाले को जुगाड़ लिया है.. रोज सुबह सुबह तगड़ा लंड मिल जाता है"

चेतना: "मेरा भी उसके साथ कुछ चक्कर चला दे शीला.. " विनती करते हुए चेतना ने कहा.. तगड़े लंड का नाम सुनकर उसके दो पैरों के बीच के तंदूर से धुआँ निकलने लगा






शीला: "अरे तू भी ना.. ऐसे कैसे सेटिंग करवा दूँ.. मैंने भी अभी अभी शुरू किया है उसके साथ!!"

थोड़ी देर के लिए दोनों में से कोई कुछ नहीं बोला

चेतना एकदम धीमी आवाज में बोली "बेटे से तो बाप अच्छा है"

"मतलब??" शीला समझ नहीं पाई

"कुछ नहीं.. जाने दे यार.. चलती हूँ.. वरना मेरी सास फिर से चिल्लाएगी... जैसे मैं किसी के साथ भाग जाने वाली हूँ" चेतना ने एक भारी सांस छोड़कर कहा

"तो बोल दे अपनी सास को.. की अपने बेटे से कहे की तुझे ठीक से चोदे.. वरना सचमुच भाग जाऊँगी.. एक औरत बिना आटे के जीवन गुजार लेगी पर बिना खूँटे के तो एक पल नहीं चलेगा" शीला ने कहा

"बिना खूँटे के तो मेरी सास को भी नहीं चलता.. दिन में दो दो बार अपनी चुत चटवाती है मेरे ससुर से.. "






"बाप रे!! क्या बात कर रही है तू!! तुझे कैसे पता चला?" शीला आश्चर्यसह चेतन की ओर देखती रही

"कई बार रात को उनके कमरे में चल रही गुसपुस सुनती हूँ.. मेरा ससुर भी कुछ काम नहीं है.. खड़े हुए ऊंट की गांड मार ले ऐसा वाला हरामी है कुत्ता.. साला" चेतना ने कहा

"कमाल है यार!! इस उम्र में भी!! तेरा ससुर रंगीला तो था ही.. याद है.. तेरे देवर की शादी में मेरे बूब्स को कैसे घूर घूर कर देख रहा था" शीला ने कहा

"हाँ यार.. चल अब मैं चलती हूँ.. बहोत देर हो गई.. घर पर सब इंतज़ार कर रहे होंगे मेरा.. "

"ठीक है.. पर आती रहना.. "

"तू बुलाएगी तो जरूर आऊँगी.. और ऐसा कुछ भी मौका मिले तो मुझे याद करना.. अकेली अकेली मजे करती रहेगी तो एड्स से मर जाएगी.. मिल बांटकर खाने में ही मज़ा है.. मेरी चुत का भला करेगी तो उपरवाला तेरा भी ध्यान रखेगा" हँसते हुए चेतना ने कहा और चली गई


शीला फिर से अकेली हो गई.. उसे चेतना पर बहोत दया आ रही थी.. बेचारी.. कैसे मदद करू चेतना की?? शीला सोचती रही

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शीला फिर से अकेली हो गई.. उसे चेतना पर बहोत दया आ रही थी.. बेचारी.. कैसे मदद करू चेतना की?? शीला सोचती रही

शीला का शातिर तेज दिमाग दौड़ने लगा.. उसका दिमाग हर तरह के हलकट विचार करने के लिए सक्षम था.. और जब वह अपने दिमाग और चुत, दोनों का उपयोग कर सोचती.. तब उसे कोई न कोई तरकीब सूझ ही जाती।

उस रात को शीला ने पिंटू को फोन लगाया और उससे गरमागरम बातें करते हुए अपनी चुत में उंगली घिसकर उसे शांत कर दिया।






रसिक अब हर रोज थोड़ा जल्दी आ जाता और पंद्रह मिनट में शीला को चोदकर दूध देने निकल जाता.. पर शीला को इस जल्दबाजी वाली ठुकाई में ज्यादा मज़ा नहीं आता था। पर बिना सेक्स के रहने से तो ये अच्छा ही था..कम से कम खेलने, चूसने और चुदवाने के लिए एक तगड़ा लंड तो मिला.. यही सोचकर वह समय व्यतीत कर रही थी।

एक दिन सवेरे सवेरे मंदिर जाते हुए उसे अनुमौसी मिल गई। शीला को देखते ही उससे बातें करने रुक गई।

अनुमौसी: "अगले रविवार को हमारा महिला मण्डल यात्रा पर जा रहा है... तुझे चलना है?"

शीला: "हाँ मौसी.. मेरा नाम भी लिखवा देना.. मैं जरूर चलूँगी"

अनुमौसी: "ठीक है.. सुबह सात बजे निकलना है.. तू तैयार रहना.. फिर से वो दूधवाले के साथ उलझ मत जाना.. वरना देर हो जाएगी तो बस छूट जाएगी"

रसिक का जिक्र होते ही शीला के कान चार हो गए.. जिस तरह सवार की एडी लगते ही घोड़े के कान चौकन्ने हो जाते है.. बिल्कुल उसी तरह

शीला: "अरे नहीं नहीं मौसी.. मैं आपसे पहले तैयार हो जाऊँगी.. आप देखना!!"

अनुमौसी: "कितना बोलती है रे तू!! ठीक है.. तू तैयार हो जाएँ फिर हम साथ में निकलेंगे" कहते हुए अनुमौसी मंदिर की ओर चल दी

शीला पूरे दिन सोचती रही.. मौसी ने रसिक का जिक्र क्यों किया!!! कुछ तो राज था.. वरना अनुमौसी ऐसे ही उसका नाम नहीं लेती.. कल रसिक को पूछती हूँ इसके बारे में

जैसे तैसे शीला ने दोपहर तक का समय निकाल ही दिया.. पर फिर उससे रहा नहीं गया.. दोपहर के तीन बजे उसने रसिक को फोन किया.. पर उस चूतिये ने फोन उठाया ही नहीं। पक्का खेत में किसी मज़दूरन की टांगें चौड़ी कर उसकी चुत को पावन कर रहा होगा!!

शीला ने रूखी को फोन मिलाया..

रूखी: "अरे भाभी आप?? कैसे है? आप तो मुझे भूल ही गए!!"

शीला: "नहीं भूली हूँ तुझे.. पर लगता है तू मुझे भूल गई है शायद.. जीवा का डंडा क्या मिल गया तू तो मुझे याद ही नहीं करती!!"

रूखी: "सच कहूँ तो भाभी मैं आपको ही याद कर रही थी.. आप अभी फ्री हो?"

शीला: "हाँ बता.. कुछ खास काम था क्या?"

रूखी: "हाँ भाभी.. आपको एक चीज दिखानी थी.. पर उसके लिए आपको यहाँ मेरे घर पर आना पड़ेगा"

शीला: "तेरे घर?? पर किस बहाने आऊँ तेरे घर रूखी??"

रूखी: "आप एक काम कीजिए.. साथ में एक पतीली लेकर आइए.. कोई पूछे तो कहना की दूध लेने आई हो"

शीला: "ठीक है फिर"

रूखी: "कितनी देर में आओगी भाभी?"

शीला: "१५-२० मिनट में पहुँचती हूँ"

रूखी: "ठीक है.. पर जल्दी आना"

शीला मोबाइल कट करते हुए सोचने लगी.. ऐसा क्या होगा जो रूखी मुझे दिखाना चाहती है!! और जल्दी आने के लिए क्यों कहा!! क्या पता!! जाकर देखती हूँ तब सब पता चल जाएगा..

शीला झटपट तैयार हो गई.. और हात में पतीली लेकर निकल पड़ी.. वैसे तो अगर चल कर जाएंग तो २५-३० मिनट में रूखी के घर पहुँच सकती थी पर शीला ने ऑटो बुला ली.. कमीना ऑटो वाला मिरर सेट करके उसके स्तनों को अपनी नज़रो से ही चूस रहा था.. इस उम्र में भी उसके स्तन पुरुषों का ध्यान आकर्षित कर रहे थे ये देखकर शीला को अच्छा लगा.. उसने जानबूझकर अपना पल्लू गिरा दिया.. और विंध्य पर्वतों के बीच जैसी खाई होती है वैसी अपने स्तनों के बीच की खाई को उजागर कर दिया..






स्त्री के स्तनों को देखकर मर्द लोग सदियों से उत्तेजित होते आए है.. स्त्री कितनी भी भद्दी क्यों न हो.. उसके उरोज हमेशा आकर्षक होते है। और हर स्त्री को यह पता होता है की इस अमोघ शस्त्र का उपयोग कर कैसे अपने काम निकलवाए जा सकते है

रिक्शा वाला भी सीटी बजाते हुए शीला के दोनों गुंबजों को ताक रहा था.. जान बूझकर वो रिक्शा को धीमी गति पर चला रहा था ताकि ज्यादा से ज्यादा समय तक शीला के स्तनों को देख सकें.. जानबूझकर खड्डे वाले रास्ते पर ऑटो चलाता था ताकि उन स्तनों को उछलते हुए देख सकें। अब वह गीत भी गुनगुनाने लगा था "चोली के पीछे क्या है.. चुनरी के नीचे"

शीला समझ गई की वह क्या देखकर गाना गा रहा था.. १० मिनट के रास्ते में भी कमीने ने २० मिनट लगा दिए.. पहुंचकर जब शीला ने भाड़ा देने के लिए अपने ब्लाउस से पर्स निकाला तब रिक्शा वाले ने पैसे लेने से माना क्या और कहा "मैडम, आपके जैसे ग्राहक मिल जाएँ तो पूरा दिन अच्छा जाता है" आँख मारते हुए वह रिक्शा लेकर चला गया..

शीला रूखी के घर पहुंची.. और दरवाजा खटखटाया.. रूखी ने दरवाजा खोलकर शीला को हाथ से खींचकर अंदर लिया और दरवाजा बंद कर लिया।

"इतनी देर क्यों लगा दी भाभी?" प्यार से शीला के उभारों पर चिमटी काटते हुए रूखी ने कहा

"अरी जल्दी आने के लिए मैंने ऑटो ली थी.. पर वह हरामी रिक्शा वाला मेरे ये दूध के कनस्तर देखकर पागल हो गया.. और जानबूझकर ऑटो आराम से चला रहा था.. क्या करती!! भाड़ा भी नहीं लिया उसने.. सोच तू.. कितना पागल हो गया होगा इन्हे देखकर!!"

रूखी: "बेचारे की बीवी के छोटे छोटे होंगे.. तभी इन्हे देखकर पागल हो गया.. आपके तो पैसे बच गए ना!! वो सब छोड़िए.. भाभी, अब आप उस कोने में छुपकर खड़े हो जाइए.. अभी आपको बढ़िया वाला पिक्चर दिखाती हूँ.. अभी शुरू होगा.. देखकर आप मुझे बताना की मुझे क्या करना चाहिए"

शीला रूखी के दूध भरे स्तनों को देखकर उत्तेजित हो गई.. उसने रूखी से कहा "तेरा दूध पिए कितने दिन हो गए यार.. पहले थोड़ा सा दूध पी लेने दे मुझे.. "






रूखी: " भाभी.. वो रसिक भी मुझे कितने दिनों से हाथ नहीं लगाता.. मेरा भी बड़ा मन कर रहा है.. पर क्या करू!!"

शीला ने रूखी का हाथ पकड़कर अपने करीब खींच लिया और कोने में ले जाकर पूछा "फिर कैसा रहा उस रात रघु और जीवा के साथ??"

जवाब देने से पहली रूखी ने अपनी तंग चोली के दो हुक खोल दिए और नारियल जैसी चूचियों में से एक बाहर निकालकर शीला के हाथ में थमा दी..

रूखी: "जीवा की तो क्या ही बात करू मैं भाभी.. पूरी रात चोदा था मुझे.. और रघु भी कुछ कम नहीं था.. वो भी मुआ पीछे से उंगली करता रहा"

रूखी की चुची को मसलते हुए शीला ने कहा "तेरे बोबे तो वाकई जबरदस्त है रूखी.." शीला रूखी की निप्पल से खेलते हुए बोली






रूखी ने शीला का सर पकड़कर अपनी निप्पल के करीब खींचा और बोली "जो भी करना है जल्दी करो भाभी.. अभी पिक्चर बस शुरू होने ही वाला है.. फिर मौका हाथ से निकल जाएगा.. फटाफट चूस लो जितना चाहिए.. फिर घर पर आऊँगी तब इत्मीनान से पीना मेरा दूध.. "

शीला ने रूखी के स्तन को पकड़कर उठाने की कोशिश की.. कम से कम ढाई किलो का वज़न था एक स्तन का!!

"जल्दी कीजिए भाभी.. इसे बाद में नाप लेना.. " रूखी ने बेसब्री से कहा

"रूखी मुझे ये तो बता की आखिर तूने मुझे यहाँ पर किस लिए बुलाया है??"

"सब बताऊँगी भाभी.. थोड़ी शांति रखिए.. आप खुद ही देख पाओगी.. मुझे बताने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी" कहते हुए रूखी ने शीला को अपनी बाहो में भर लिया..

शीला ने रूखी की निप्पल को दबाकर दूध की एक चुस्की लगाई.. और फिर भागकर पिलर के पीछे छुप गई.. और पीछे से देखने लगी की आखिर वो क्या था जो रूखी उसे दिखाना चाहती थी।






थोड़ी देर के बाद.. ६० साल का एक बूढ़ा घर के अंदर आया.. उम्र भले ही ज्यादा था पर दिलडोल काफी चुस्त और तंदूरस्त था.. उसकी खुली छाती पर घुँघराले सफेद बाल नजर आ रहे थे और कमर के नीचे उसने धोती बांध रखी थी..

पास में रूखी खटिया पर बैठे हुए अपने बच्चे को दूध पीला रही थी

"बहु, क्या कर रहा है मेरा लल्ला?? तुझे तंग तो नहीं करता है ना!! " कहते हुए वह बूढ़ा रूखी के करीब जा पहुंचा और झुककर उस दूध पीते बच्चे के गाल को सहलाने लगा.. रूखी का एक स्तन बाहर लटक रहा था.. यह पूरा द्रश्य शीला पिलर के पीछे छुपकर देख रही थी.. उसे सबकुछ साफ साफ दिखाई दे रहा था.. रूखी के स्तन से बस आधे फुट की दूरी पर था वो बूढ़ा..

शीला समझ गई की वह बूढ़ा.. रूखी का ससुर था..

"तेरी सास जब मंदिर जाती है.. तभी में शांति से इसे देख पाता हूँ.. " कहते हुए वह बूढ़ा खटिया पर रूखी के बगल में बैठ गया

"बहु, मुझे हमारा लल्ला बहोत प्यारा है.. वो कहते है ना.. पूंजी से ज्यादा ब्याज की किंमत होती है.. बस वैसे ही.. " कहते हुए वह रूखी के बेहद आकर्षक दूध टपकाते स्तन को घूरने लगा.. उस बूढ़े की आँखों में बालक की भूख और मर्द की हवस का जलद मिश्रण था..

रूखी: "बापू, अभी माँ लौट आएगी और ऐसे देखेगी तो उन्हे गलतफहमी हो जाएगी.. आप अपने कमरे में चले जाइए.. लल्ला का पेट भर जाए बाद में उसे आप को सौंप दूँगी.. जितना मर्जी खेल लेना फिर"

रूखी का एक स्तन बाहर और एक चोली के अंदर था.. उस १००० वॉल्ट के एलईडी बल्ब जैसे स्तन को देखकर रूखी का ससुर पागल सा हो रहा था.. उस छोटे बच्चे के सिर के बालों को सहलाने के बहाने वो बार बार रूखी के स्तन को छु रहा था.. तभी उस दूध पीते बच्चे के मुंह से निप्पल छूट गई.. वह पीते पीते सो गया था.. रूखी की गुलाबी निप्पल से दूध की तीन चार बूंदें बच्चे के गाल पर गिर गई.. और आखिरी बूंद निप्पल पर अभी भी चिपकी हुई थी..

"अरे अरे बहु.. ऐसे तो कपड़े खराब हो जाएंगे.. साथ में एक रुमाल रखा करो तुम.. " ससुर ने रूखी की निप्पल के नीचे उंगली रख दी






रूखी के पूरी शरीर में झुनजूनाहट होने लगी.. अपनी सख्त निप्पल पर ससुर के हाथ का स्पर्श होती ही उसका दूसरा स्तन कठोर होकर चोली को फाड़कर बाहर निकलने की धमकी देने लगा.. जो स्तन पहले से बाहर था वो भी सख्त हो गया.. मानों बम की तरह फटने वाला हो

रूखी की निप्पल के नीचे उंगली रखकर ससुर ने दूध की उस बूंद को उंगली पर ले लिया और फिर उसे रूखी के चेहरे के पास लेजकर बोला

"लल्ला को तो रोज दूध पिलाती हो.. कभी खुद भी चखकर देखा है क्या??"

रूखी शर्म से पानी पानी हो गई

"मुझे भला क्या जरूरत है इसे चखने की.. " रूखी ने सिर झुकाकर जवाब दिया

"अरे बेटा.. तुम्हें रोज सबसे पहली बूंद खुद ही चख लेनी चाहिए.. उसके बाद ही लल्ला को पिलाना चाहिए.. क्या पता हमें कोई बीमारी हो और दूध खराब हो गया हो तो लल्ला बेचारा बीमार हो सकता है.. ये ले.. चख कर देख" कहते हुए ससुर ने उस दूध वाली उंगली का स्पर्श रूखी के होंठों से करवाया। रूखी ने अपना मुंह खोला.. ससुर ने अपनी उंगली अंदर डाल दी और थोड़ी देर तक वैसे ही रहने दी.. उंगली को चूसते हुए रूखी की आँखें बंद हो गई.. वह गहरी सांसें लेने लगी.. हर सांस के साथ उसके मादक उन्नत उरोज ऊपर नीचे होने लगे..

अनजाने में रूखी ने अपने ससुर की उंगली को ऐसे चूस लिया जैसे जीवा के लंड को चूस रही हो.. अपने ससुर को उंगली को उसने चाट चाट कर साफ किया.. अब उस बुढ़ऊ ने अपनी दूसरी उंगली भी रूखी के मुंह के अंदर डाली और अंदर बाहर करने लगा.. जैसे अपने लंड को रूखी के मुंह में दे रहा हो.. रूखी की आँखें अभी भी बंद थी..






रूखी: "बापू.. फिर से दूध की बूंदें टपकने की तैयारी में है.. जल्दी से अपनी उंगली से पोंछ लीजिए वरना मेरे कपड़े गीले हो जाएंगे" रूखी ने अपने ससुर को सेक्स के शतरंज में अप्रत्यक्ष रूप से आमंत्रित कर ही दिया

रूखी ने नजर झुकाकर देखा तो उसके ससुर का लंड धोती के अंदर खड़ा हो चुका था.. भला हो उसकी लंगोट का जिसने उस थिरकते हुए घोड़े जैसे लंड को बांध कर रखा था..






बूढ़े ने आगे बढ़ने का फैसला किया.. और निप्पल को हल्के से दबाकर अपनी उंगली पर दूध लेकर खुद के मुंह तक ले गया और बोला

"बहु.. मैं चखकर देखूँ एक बार???"

रूखी का यह नया रूप देखकर शीला अचंभित रह गई.. खटिया पर बैठी रूखी का बदन इतना सुंदर लग रहा था.. कुछ ही महीनों पहले हुई डिलीवरी के कारण उसका मांसल शरीर और गदरा गया था..

बूढ़े ससुर ने खुद की उंगली चूसकर रूखी का दूध चख लिया... रूखी शर्म से लाल लाल हो गई..

"बापू.. आपने तो पहले चखा ही होगा ना!! अम्मा का दूध.. जब लल्ला के पापा का जनम हुआ तब.. " रूखी ने धीरे से कहा

"बेटा.. क्या बताऊँ तुझे.. जब रसिक पैदा हुआ था तब तेरी सास के बोब्बे भी तेरी ही तरह सुंदर और रसीले थे.. रसिक ज्यादा दूध नहीं पी पाता था.. इसलिए तेरी सास की छाती दूध से भर जाती.. रात को जब उसकी छाती दर्द करने लगती.. तब वो मुझे आधी रात को जगा देती.. मैं चूस चूस कर उसके बबले खाली कर देता तब जाकर बेचारी को नींद आती थी..

"बापू, लल्ला के पापा तो अब भी ज्यादा नहीं पी पाते.. मुझे भी कभी कभी रात को दर्द होने लगता है.. पर वो पीते ही नहीं है.. पूरी रात मैं दर्द के मारे तड़पती रहती हूँ.. और क्या कर सकती हूँ मैं.. तड़पने के अलावा.. " रूखी ने अपने पत्ते बिछाने शुरू कर दिए

"अरे बहु.. अब मैं मेरे बेटे से ये तो नहीं कह सकता ना.. की अपनी बीवी का दूध चूस दे.. पर हाँ.. एक काम हो सकता है.. रात को जब दूध से तेरी छाती फटने लगे तब मुझे जगा देना.. मैं सारा दूध चूसकर तेरा दर्द कम कर दूंगा.. ठीक है!!"

"आप कितने अच्छे है.. बापू!! देखिए ना.. मेरी छाती दूध से फटी जा रही है.. और लल्ला भी थोड़ा सा ही पीकर सो गया.. अब पता नहीं ये कब जागेगा और दूध पिएगा.. "

"अरे बेटा.. क्यों चिंता कर रही हो!! मैं हूँ ना.. ला मैं तेरा दूध चूसकर तेरी छातियाँ हल्की कर देता हूँ"

"पर बापू.. मुझे बड़ी लाज आती है.. " शरमाते हुए रूखी ने कहा

"अब शर्म करोगी तो फिर दर्द भुगतना पड़ेगा.. और तो मैं कुछ नहीं कर सकता!!"

"नहीं नहीं बापू.. ये लीजिए.. चूस लीजिए.. बहोत दर्द हो रहा है.. " रूखी ने तोप के नाले जैसे दोनों स्तन खोलकर अपने ससुर के सामने पेश कर दिए


रूखी के मदमस्त स्तनों को देखकर उसका ससुर पानी पानी हो गया.. यौवन के कलश जैसे बेहद सुंदर चरबीदार बोब्बे.. बड़े सुंदर लग रहे थे





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"आप कितने अच्छे है.. बापू!! देखिए ना.. मेरी छाती दूध से फटी जा रही है.. और लल्ला भी थोड़ा सा ही पीकर सो गया.. अब पता नहीं ये कब जागेगा और दूध पिएगा.. "

"अरे बेटा.. क्यों चिंता कर रही हो!! मैं हूँ ना.. ला मैं तेरा दूध चूसकर तेरी छातियाँ हल्की कर देता हूँ"

"पर बापू.. मुझे बड़ी लाज आती है.. " शरमाते हुए रूखी ने कहा

"अब शर्म करोगी तो फिर दर्द भुगतना पड़ेगा.. और तो मैं कुछ नहीं कर सकता!!"

"नहीं नहीं बापू.. ये लीजिए.. चूस लीजिए.. बहोत दर्द हो रहा है.. " रूखी ने तोप के नाले जैसे दोनों स्तन खोलकर अपने ससुर के सामने पेश कर दिए

रूखी के मदमस्त स्तनों को देखकर उसका ससुर पानी पानी हो गया.. यौवन के कलश जैसे बेहद सुंदर चरबीदार बोब्बे.. बड़े सुंदर लग रहे थे

बूढ़े ससुर ने दोनों स्तनों को पकड़कर दबाया

"आह्ह.. दुख रहा है बापू.. " कामातुर रूखी ने कहा

"अपनी भेस के थन जैसे है तेरे चुचे.. " ससुर लार टपकाते हुए बोला.. रूखी ने अपने चेहरे को घूँघट से ढँक लिया.. देखिए इस नारी का चरित्र.. स्तन खुले हुए है और चेहरा ढँक रही है..!! संस्कारी होने का दिखावा करती रूखी का अगर घाघरा उठाया जाएँ.. तो उसकी बिना पेन्टी वाली चुत से.. कल रात जीवा और रघु के साथ हुई चुदाई के अवशेष मिल जाते..

जरा सा ही दबाने पर.. रूखी की निप्पलों से दूध की धार बरसने लगी.. रूखी का दूध उसकी गोद में ही गिरने लगा..

"बेटा.. एक काम करो.. लल्ला को पालने में सुला दो.. नहीं तो हलचल से वो जाग जाएगा.. " ससुर ने अपने होंठों पर जीभ फेरते हुए कहा

अपने ब्लाउस से लटक रही दो खुली चूचियों के साथ रूखी खटिया से खड़ी हुई.. और बच्चे को उठाकर बगल के कमरे में पालने के अंदर सुला दिया.. वापिस लौटते वक्त उसकी नजर पिलर के पीछे खड़ी शीला पर गई.. दोनों की नजरे मिली और चेहरे पर शैतानी मुस्कान आ गई..

चलकर आ रही रूखी का अर्धनग्न सौन्दर्य देखकर बूढ़े ससुर का जबड़ा लटक गया.. क्या अद्भुत सौन्दर्य था रूखी का!! पूनम के चाँद जैसे गोरे गोरे दो स्तन देखकर शीला के भोसड़े में भी आग लग गई.. रूखी चलते चलते खटिया तक आई और ससुर के सामने जाकर खड़ी हो गई।

रूखी को देखकर उस बूढ़े की जवानी फूटने लगी.. बिना अपना घूँघट हटाए रूखी ने अपना दाया स्तन ऊपर किया.. उसका ससुर उस स्तन को देखता ही रह गया..

"जल्दी कीजिए बापू.. अम्मा कभी भी वापिस आ जाएगी.. " कहते हुए रूखी ने अपने ससुर का सिर पकड़कर उनके मुंह में अपनी निप्पल दे दी

"ओह बहुरानी.. अमम.. " ६० साल के बूढ़े का लंड धोती के अंदर फुँकारने लगा.. अपने बेटे की जवान बीवी के स्तनों से दूध चूसने की समाजसेवा शुरू कर दी बूढ़े ने....






"आह्ह.. बापू.. आप तो कैसे चूस रहे है.. ऊईई.. ओह्ह" रूखी ने अपनी निप्पल को ससुर के मुंह में दबा दिया.. वो बूढ़ा भी ऐसे चूस रहा था जैसे दुनिया का सबसे बढ़िया हेल्थ ड्रिंक पी रहा हो.. थोड़ी देर तक चूसने के बाद वह बोला

"बेटा.. गाय के थन जैसी छाती है तेरी.. थोड़ा सा ही चूसने पर पूरा मुंह दूध से भर गया मेरा.. बेचारा लल्ला इतना सारा दूध कहाँ से पी पाएगा!! इतना दूध है की पूरे घर के लिए काफी है.. काश हमारे खेत भी तेरी इन छातियों जीतने उपजाऊ होते"

"ओह्ह बापू.. क्या कर दिया आपने!! मुझे तो कुछ कुछ हो रहा है.. आह्ह.. " रूखी का पूरा जिस्म हवस की आग में झुलसने लगा था। उसका एक हाथ ससुर के सिर पर था और दूसरे हाथ से उसने अपनी भोस सहलाना शुरू कर दिया..






"आह्ह बापू.. धीरे धीरे.. काटिए मत.. ऊईई माँ.. बस बस बहुत हो गया.. थोड़ा सा लल्ला के लिए भी छोड़ दीजिए.. अभी वो जाग गया तो उसे क्या पिलाऊँगी.. " रूखी और उसके ससुर का यह कामुक मिलन देखते हुए.. शीला ने अपने दोनों स्तन ब्लाउस से बाहर निकाल लिए थे और पागलों की तरह अपनी निप्पलों को मसल रही थी। शीला ने पास पड़े हँसिये को उठाकर उसके लकड़े से बने हेंडल को अपनी चुत पर रगड़ना शुरू कर दिया था। उन दोनों का खेल देखकर शीला का मन कर रहा था की वो भी उस खटिया में जाकर उस बूढ़े से लिपट पड़े.. पर फिलहाल ऐसा करना मुमकिन नहीं था

"तेरी छातियाँ तो रसिक की अम्मा से भी बड़ी बड़ी है.. " आखिर ससुर ने रूखी की निप्पलों को छोड़ दिया






"आपने तो सारा दूध खतम कर दिया बापू" उस बूढ़े के पीठ पर हाथ पसारते हुए रूखी ने कहा.. वह अपने ससुर को ऐसे सहला रही थी जैसे कसाई हलाल करने से पहले बकरे को सहलाता है..

ससुर ने रूखी की लचकदार चर्बी वाली कमर पर अपना खुरदरा हाथ फेरा.. रूखी के भोसड़े से कामरस की धारा बह रही थी.. बूढ़े ने रूखी के घाघरे में हाथ डालकर उसके गोल मटके जैसे दोनों कूल्हों को पकड़ लिया..






रूखी को बहोत गुस्सा आ रहा था.. ये बहनचोद हर जगह हाथ फेर रहा है पर मेरी चुत को क्यों नहीं छु रहा!! कैसे कहूँ.. शर्म आ रही है.. और अभी वो बुढ़िया भी आ टपकेगी..

रूखी ने बूढ़े को अपनी छातियों से दूर कर दिया..

"क्या हुआ बहु?" ससुर आश्चर्य से रूखी को देखने लगा

"अब दूसरे वाले की बारी.. दोनों तरफ एक सा वजन होना चाहिए ना.. " कहते हुए रूखी ने अनुभवी रंडी की अदा से अपना दूसरा भारी स्तन ससुर के हाथों में थमा दिया

"बहु.. इतनी भारी छातियों का वज़न नहीं लगता तुझे.. ?? कम से कम ३-४ किलो का होगा एक.. "

बिना जवाब दिए रूखी खटिया पर लेट गई.. और अपने ससुर को बगल में लिटा दिया.. अपना बाँया उरोज मुंह में देते हुए बोली

"बातें बाद में करेंगे.. पहले जो काम करने बैठे है उसे तो खतम कर लो.. कब से बस बोलें ही जा रहे हो..!!" रूखी ने अपने पैर को घुटने से मोड़ा और ऐसी स्थिति में लेकर आई की उसका घुटना सीधा बूढ़े के लंड से जा टकराए..

ससुर की लंगोट.. मधुमक्खी के छत्ते की तरह उभर गई थी.. रूखी के भोसड़े में आग लग गई थी.. उसने ससुर के लंड को अपने घुटने से छूते हुए उसे अपने पास खींचा

"ये क्या कर रही हो बेटा.. नहीं नहीं.. ये ठीक नहीं है"

रूखी ने अपने घुटनों से एक जोरदार धक्का लगा दिया ससुर के लंड पर.. बूढ़े की चीख निकल गई..

"अब चुपचाप जो कहती हूँ वो करो.. दूध तो पी लिया है मेरा.. अब वसूल भी तो करने दो मुझे.. खबरदार जो किसी को एक शब्द भी बताया है तो" अपने ससुर को बाहों में दबाते हुए रूखी ने कहा.. गुस्साई शेरनी जैसी रूखी उस बूढ़े पर टूट पड़ी.. ससुर को नीचे लिटाकर वह उसके ऊपर चढ़ गई.. दोनों के वज़न से खटिया का एक पैर टूट गया.. खटिया के टूटते ही दोनों फर्श पर आ गिरे.. ऐसे गिरे जैसे बुमराह के बाउन्सर के सामने झिम्बाब्वे का बेट्समेन गिर जाता है.. दोनों को मुंह से एक साथ चीख निकल गई.. ससुर इसलिए चीखा की उसकी पीठ नीचे फर्श पर टकराई और रूखी का पूरा वज़न उस पर गया.. रूखी इसलिए चिल्लाई क्योंकी नीचे गिरने के कारण उसकी निप्पलें बूढ़े के मुंह के साथ बड़े जोर से दब गई।

रूखी के वज़न तले लाचार ससुर ऐसे दबा था जैसे महंगाई के बोज तले प्रजा दबी हुई है.. दोनों के जिस्म एक दूसरे में उलझे हुए थे तभी.. बाहर दरवाजा खुलने की आवाज आई.. मर गए.. जिसका डर था वही हुआ.. बुढ़िया आ गई!!

"अरे.. इतनी देर में रसिक की अम्मा वापिस भी आ गई.. !! उसे तो मंदिर में भी चैन नहीं है" कहते हुए ससुर रूखी को अपने शरीर के ऊपर से हटाते हुए खड़ा हुआ और भागकर अपने कमरे में चला गया

रूखी उठकर शीला के पास आई.. शीला हँसिये के हेंडल को अपनी चुत में घुसेड़कर खड़ी खड़ी मुस्कुरा रही थी।






"कमिनी.. तूने तो अपने ससुर को ही सेट कर लिया" रूखी की कमर पर चिमटी काटते हुए शीला ने कहा

"भाभी.. मुझे शक है की मेरे ससुर ने मुझे जीवा के साथ देख लिया है.. जिस रात रघु और जीवा मुझे चोद कर गए थे.. तब से इस बूढ़े ने मुझे सताना शुरू कर दिया था.. मेरे साथ रोज अश्लील बातें करता है और छातियों को घूरता रहता है"

"अच्छा.. तो ये बात है!!" शीला ने कहा

रूखी: "हाँ भाभी.. पर बूढ़ा है बड़े काम की चीज.. छाती तो ऐसे चूस रहा था.. मेरे छेद में से नलके की तरह पानी बहने लगा था.. सब गीला गीला हो गया"

शीला: "साली, एक नंबर की हरामी है तू ..."

रूखी ने शीला के ब्लाउस के बटन बंद करते हुए कहा "इसीलिए तो मुझे हँसिये को अंदर डालने की जरूरत नहीं पड़ती है भाभी" कहते हुए उसने शीला की चुत से हँसिये को खींचकर बाहर निकाला..

तभी शीला के मोबाइल पर कविता का फोन आया.. शीला ने उसके साथ कुछ बात की और फोन रख दिया

रूखी की सास.. कमरे में अंदर आई.. और बोली "अरे रूखी.. शीला बहन को ताज़ा मक्खन जरूर देना"

"हाँ अम्मा.. बस निकालने ही जा रही थी.. "

"और बताइए शीला बहन.. हालचाल ठीक है सब? भैया कैसे है?" शीला के ब्लाउस के दो खुले बटनों को देखते हुए रूखी के सास ने बड़े विचित्र ढंग से पूछा






शीला: "सब ठीक ही है माजी.. विदेश में भला क्या तकलीफ़ होगी उन्हे!! सारी तकलीफ तो हमे यहाँ ही उठानी पड़ती है"

रूखी की सास भी आखिर एक स्त्री थी.. शीला की आवाज का दर्द और छुपा अर्थ वह समझ सकती थी.. इतने सालों का अनुभव जो था.. रूखी को भी वह बड़े अच्छे से रखती थी.. सास-बहु वाली कोई कड़वाहट नहीं थी। वैसे भी हर सास अपनी बहु का थोड़ा बहुत ऊपर नीचे चला ही लेती है। क्योंकी सास भी कभी बहु थी..

शीला और रूखी के सामने रहस्यमयी मुस्कान के साथ वह कमरे में चली गई। '

शीला: "तेरी सास भी बड़ी खिलाड़ी लगती है मुझे"

रूखी ने हँसकर कहा "सबकुछ आराम से बताऊँगी कभी.. मेरी सास का इतिहास भी बड़ा ही रसीला है"

"ठीक है रूखी, मैं चलती हूँ" रूखी के हाथ से मक्खन का डिब्बा लेते हुए शीला ने कहा

"मैं शाम को आऊँगी भाभी.. फिर आराम से बातें करेंगे"

जाते जाते शीला ने रूखी के ससुर के कमरे के दरवाजे को हल्का सा खोलकर एक नजर डाली.. अंदर का द्रश्य देखकर वह चोंक गई.. वह तुरंत भागकर वापिस आई.. और रूखी को खींचकर ससुर के कमरे के दरवाजे पर ले आई.. दोनों ने छुपकर देखा.. उसका ससुर धोती से लंड निकालकर हिंसक तरीके से हिला रहा था.. देखकर शीला और रूखी दोनों पानी पानी हो गए..

"मेरी सास कहाँ है ?" रूखी ने पूछा.. अर्धखुले दरवाजे से कमरे का पूरा द्रश्य नहीं दिख रहा था रूखी को

"तेरी सास भी अंदर ही है" शीला ने कहा

"तब तो आज पक्का चुदाई का प्रोग्राम होगा अंदर.. मेरा ससुर खिलाड़ी है.. मेरी सास को रंडी बनाकर पेलेगा.. रुको थोड़ी देर.. देखकर जाओ.. मज़ा आएगा" रूखी ने कहा

शीला उत्तेजित हो गई.. उसके लिए ये नया अनुभव था.. उसने पहले कभी किसी अन्य जोड़े को इस तरह चोदते हुए नहीं देखा था.. शीला की मुनिया कामरस से एकदम गीली हो गई.. रूखी के सास और ससुर बातें कर रहे थे.. अपना लंड ढीला न पड़ जाए इसलिए वह बूढ़ा उसे हिलाए जा रहा था.. थोड़ी देर के बाद रूखी की सास अपने पति के बगल में लेट गई.. और रूखी के ससुर को अपने ऊपर खींच लिया..

"अरे वो दोनों बातें करने में लगी हुई है.. अभी कोई नहीं आएगा.. तुम शांति से करो.. काफी दिन हो गए है किए हुए.. पर आज दिन के समय ये तुम्हारा डंडा कैसे खड़ा हो गया आज?? कहीं वो शीला बहन को देखकर तो.. !!! अभी मैं उससे मिली तब उसके ब्लाउस के दो हुक खुले हुए थी.. तुमने कुछ छेड़खानी तो नहीं की ना उसके साथ.. !! वैसे भी वो दो सालों से बिना पति के तरस रही है.. कहीं तुमने तो उसे पानी पिलाने की कोशिश नहीं की है ना?? " रूखी के सास ने अपने पति से पूछा

"पागल हो गई है क्या तू?? मैंने ऐसा वैसा कुछ नहीं किया.. " ससुर ने अपना बचाव करते हुए कहा

"कुछ भी कहो.. आज तुम्हारा लंड कुछ ज्यादा ही सख्त लग रहा था.. इतना सख्त तो हमारी सुहागरात पर भी नहीं हुआ था... " रूखी के सास ने अपने पति का लाई डिटेकटर टेस्ट जारी रखा

"हे ईश्वर.. इन औरतों को कभी भी अपने पति की बात का विश्वास क्यों नहीं होता!! जब देखो तब एक ही बात.. !! चल.. अब मुंह में लेकर चूस.. और इसे एकदम सख्त कर.. फिर से नरम होने लगा... " ससुर ने अपने पत्नी के बाउन्सर के सामने झुककर अपना सिर बचा लिया

"अब इतना कडक तो हो गया है.. और कितना सख्त करना है तुम्हें..!! चोदना है या दीवार में छेद करना है!! चलो.. अब जल्दी से डाल दो.. तुम्हारे ये देखकर मुझे भी कुछ कुछ हो रहा है.. "

रूखी का ससुर तुरंत ऊपर चढ़ गया.. और अपनी पत्नी के ढीले-ढाले भोसड़े को ठोंकने लगा..






"आह्ह.. जरा धीरे से.. दर्द होता है अंदर.. आहह आह्ह.. !!" सिसकारते हुए रूखी की सास भी ताव में आकर चुदने लगी और उसने भी इस काम-उत्सव में अपना नामांकन करवा दिया

"बाप रे भाभी.. !! देखो तो सही.. इस उम्र में भी ये बूढ़ा कितना जोर लगा रहा है... !! सच ही कहते है.. मर्द और घोडा कभी बूढ़ा नहीं होता!!" रूखी ने शीला से कहा

शीला रूखी के पीछे खड़ी थी.. उसने अपने दोनों हाथों से रूखी की गदराई कमर को सहलाना शुरू कर दिया.. और शीला के मुलायम तकिये जैसे स्तन रूखी की पीठ पर दब रहे थे। दोनों की आँखों के सामने रूखी के सास और ससुर की घमासान चुदाई चल रही थी।






शीला ने रूखी के चेहरे को पीछे की तरफ खींचा और उसके होंठों को एक गरमागरम चुंबन रसीद कर दिया.. रूखी भी घूमकर शीला के सामने आ गई और दोनों पागल प्रेमियों की तरह एक दूसरे से लिपट गए.. सास-ससुर का कामुक वृद्ध सेक्स देखकर दोनों सखियों की पूत्तियाँ कामरस टपकाने लगी.. शीला ने रूखी की चोली में हाथ डालकर उसके भरावदार स्तनों को मसलन शुरू किया जबकि उसके दूसरे हाथ ने रूखी के घाघरे में घुसकर उसकी चुत का हवाला संभाल लिया था..







अपने ससुर का मस्त खूंटा देखकर उकसाई हुई रूखी अपनी बेकाबू वासना को शांत करने के लिए शीला के होंठों को चूसने लगी.. कभी शीला रूखी के होंठ चूमती तो कभी रूखी शीला की जीभ को रसगुल्ले की तरह चूसती.. उनकी नज़रों के सामने ही रूखी के सास-ससुर कामक्रीड़ा में इतने मशरूफ़ थे की उन्हे आसपास का कोई ज्ञान न था.. वह दोनों केवल अपनी हवस शांत करने की कोशिश कर रहे थे





शीला और रूखी.. एक दूसरे के अंगों को सहलाकर.. मसलकर.. बिना लंड के अपनी चूतों की आग को शांत करने के निरर्थक प्रयत्न कर रहे थे। रूखी के भोंसड़े में चार उँगलियाँ अंदर बाहर करते हुए शीला ने कमरे में अंदर नजर डाली.. रूखी की सास.. अपने पति के लंड पर सवार होकर कूद रही थी.. ससुर ने उसकी कमर पकड़कर उसे संतुलित कर रखा था.. और सास गांड उछाल उछाल कर जबरदस्त धक्के लगा रही थी.. काफी जद्दोजहत के आड़ चारों झड़ने में कामयाब हो गए।





जैसे ही वह बूढ़ी सास अपना रस झड़वाकर लंड से नीचे उतरी.. शीला और रूखी दोनों को जबड़े आश्चर्य से लटक गए.. बाप रे!! ससुर का विकराल लोडा वीर्य से लसलसित होकर अपनी बीवी की चुत से निकलकर ऐसे झटके खा रहा था जैसे को योद्धा युद्ध लड़ने के बाद हांफ रहा हो!!





"चल रूखी.. मैं अब निकलती हूँ.. अभी तेरी सास बाहर आएगी.. "

"ठीक है भाभी.. आप जाइए.. मैं बाद में आती हूँ आपके घर.. "रूखी ने कहा


शीला अपने ब्लाउस के बटन बंद करते हुए निकल गई.. इस बार वह चलते चलते अपने घर पहुंची।

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शीला अपने ब्लाउस के बटन बंद करते हुए निकल गई.. इस बार वह चलते चलते अपने घर पहुंची।

शीला सोच रही थी.. क्या काम होगा कविता को? तभी कविता खुद उसके घर पर आ पहुंची.. बहोत खुश लग रही थी कविता.. शीला जानती थी की बिना लंड से झटके खाए.. किसी स्त्री के चेहरे पर ऐसी मुस्कान खिल ही नहीं सकती..

"सच सच बता कविता.. कल पीयूष ने बराबार चोदा है ना तुझे?" शीला ने पूछा

"पीयूष ने नहीं.. मेरे प्यारे पिंटू ने.. ये सब मेरे पिंटू का ही कमाल है" कहते हुए कविता शीला से लिपट पड़ी

"अच्छा.. !! ये भला कब हुआ?? वो तो कल चला गया था मेरे घर से.. तुम दोनों मिले कब??" शीला ने आश्चर्यसह पूछा

"कल रात पीयूष अपने दोस्तों के साथ मूवी देखने गया था.. मैंने पिंटू को फोन करके बुला तो लिया.. पर सवाल ये था की हम दोनों मिले कैसे!! रात को दस बजे पीयूष हमारी सोसायटी में आ चुका था.. उसने मुझे पीछे वाली गली में मिलने के लिए बुलाया.. पर कमबख्त मेरी सास.. देर तक जागती रहती है.. टीवी पर बकवास सीरियलों ने दिमाग खराब कर रखा है उनका.. बुढ़िया बस टीवी से चिपकी रहती है.. कैसे निकलती बाहर!!"

कविता सारा घटनाक्रम बता रही थी उस दौरान शीला ने उसे बेड पर बिठाया और उसका स्कर्ट घुटनों तक ऊपर करते हुए.. हाथ डालकर उसकी पेन्टी खींच निकाली.. कविता ने कोई प्रतिरोध नहीं किया और वह बोलती ही रही.. शीला की हरकतों से उसके पतले गोरे बदन में सुरसुरी सी होने लगी.. शीला ने कविता को हल्के से धक्का दिया और उसकी पीठ दीवार के साथ सट गई.. और दीवार के सहारे वह आधी लेटी हुई पोजीशन में आ गई.. शीला ने उसके घुटने मोड़कर पैर चौड़े किए.. कविता की बिना झांटों वाली चिकनी पूत्ती देखकर शीला एक पल के लिए ईर्ष्या से जल उठी.. सफाचट नाजुक मोगरे की कली जैसी कविता की जवान चुत के दोनों होंठ फड़फड़ाने लगे..

शीला ने झुककर कविता की पुच्ची की चूम लिया..

"आह्हहह भाभी.. " कविता कराह उठी

"तू बोलना जारी रख.. फिर किस तरह निकली घर से और कैसे मिले तेरे पिंटू से.. ?"

"ओह्ह भाभी.. क्या कहूँ!! मुझे आपकी याद आ गई.. मैं आपके घर आने के बहाने, छाता लेकर बाहर निकली.. और आपके घर के पीछे जो सुमसान गली है ना.. वहाँ पिंटू को बुला लिया.. हल्की हल्की बारिश हो रही थी.. और उस गली में घर के बाहर को नहीं था.. काफी अंधेरा भी था.. वहीं बिजली के खंभे के पास पिंटू ने मुझे खड़े खड़े पीछे से चोद दिया..पर भाभी.. पिंटू अब पहले के मुकाबले काफी कुछ सीख चुका है.. पहले तो उस अनाड़ी को मेरे छेद के अंदर घुसाना भी ठीक से नहीं आता था.. पर पता नहीं कैसे.. कल रात को उसने किसी अनुभवी मर्द की तरह मेरी ठुकाई की.. पहले पहले तो उसे चुत चाटना भी नहीं आता था..और चुदाई भी ठीक से नहीं कर पाता था.. पर कल रात को उसने मुझे जो चोदा है.. आहाहाहा.. मेरी चुत में दर्द होने लगा तब तक धक्के लगाए उसने.. और जमीन पर बैठकर मेरी चुत भी चाटी.. कुछ समझ में नहीं आ रहा.. मेरा अनाड़ी पिंटू ऑलराउंडर कैसे बन गया?? कहीं किसी बाजारू औरत के पास तो नहीं गया होगा ना!! कुछ तो गड़बड़ है!!"








शीला ने कविता की बात का कोई जवाब नहीं दिया और मुसकुराते हुए कविता की टाइट चुत पर अपना मुंह चिपका दिया.. कविता ने "ओह्ह.. ओह्ह" सिसकते हुए अपने चूतड़ ऊपर उठा दिए और शीला के सिर को अपने दोनों हाथों से पकड़ लिया.. उसकी उत्तेजित चुत में शीला ने दो उँगलियाँ घुसेड़ कर अंदर बाहर करते हुए चाटना शुरू कर दिया.. इस दोहरे हमले के आगे कविता निसहाय थी.. उसे याद आया की पिंटू ने भी पिछली रात बिल्कुल इसी तरह किया था.. पर शीला ने कविता के दिमाग को ज्यादा सोचने की स्थिति में ही नहीं रहने दिया.. अद्भुत, कामुक और शृंगारिक तरीके से हो रही चुत चटाई ने कविता के दिमाग पर ताला लगा दिया..

अपने अमूल्य खजाने को शीला के हाथों में सौंपकर कविता अपने नागपुरी संतरों जैसे उरोजों को मसलकर अपनी आग को बुझाने के निरर्थक प्रयत्न करने लगी.. पर शीला की उंगलियों में असली लंड जैसा मज़ा कहाँ से मिलता !!! कल रात को पिंटू ने बिजली का खंभा पकड़ाकर जिस तरह उसे पीछे से धमाधम शॉट मारे थे उसके झटके कविता की चुत में अब तक लग रहे थे।

"आह्हह भाभी.. अब ओर नहीं रहा जाता मुझसे.. कुछ कीजिए प्लीज.. " शीला ने कविता की पूत्ती को चाटते हुए अपनी उंगलियों को तेजी से अंदर बाहर करना शुरू किया.. कविता के सुंदर स्तनों को देखकर शीला भी गरमा गई.. उसने कविता की चुत से अपनी उँगलियाँ निकाली.. और अपने सारे कपड़े उतार दिए.. कविता तो इस नग्न रूप के ताजमहल की सुंदरता देखकर चकाचौंध हो गई..

"हाय भाभी.. कितना गदराया शरीर है आपका !! ये गोरी गोरी चिकनी मांसल जांघें.. और मदमस्त मोटी गांड.. में लड़की होकर भी ललचा गई देखके.. तो मर्दों की क्या हालत होती होगी.. !!" कहते हुए कविता ने शीला के खरबूजों जैसे स्तनों के साथ खेलना शुरू कर दिया..

शीला ने कविता का मुंह अपने बबलों पर दबा दिया.. गुलाबी रंग की निप्पल को थोड़ी देर चूसते रहने के बाद कविता ने कहा "अगर इसमें दूध आता होता तो कितना मज़ा आता!!! पीयूष कई बार मुझसे कहता है.. उसे दूध भरे मम्मे चूसने की बड़ी इच्छा है.. और हाँ भाभी.. आपसे एक और बात भी पुछनी है"

शीला: "हाँ पूछ ना"

कविता: "कैसे कहूँ.. अमममम.. मेरे पति पीयूष को एक बार आपके बॉल दबाने है.. उसे बहोत पसंद है आपके.. रोज रात को मेरी छाती दबाते हुए वो आपका ही नाम लेता है.. "

सुनते ही शीला के भोसड़े में दस्तक सी लगने लगी.. एक नए लंड की संभावना नजर आते ही उसकी चुत छटपटाने लगी..

"बेशरम.. कैसी गंदी गंदी बातें कर रही है तू कविता.. !! बोलने से पहले सोचती भी नहीं तू.. कुछ भी बोल रही है.. पीयूष को तो में कितने आदर की नजर से देखती हूँ.. वो कभी ऐसी बात नहीं कर सकता!!"

"सच बोल रही हूँ भाभी..मेरे तो छोटे छोटे है.. पीयूष को बड़े बबले पसंद है.. जब देखों तब बड़ी छातियों वाली औरतों की तारीफ करता रहता है.. और जब मौका मिले तब उन्हे ताड़ता रहता है.. "

सुनते ही शीला का भोसड़ा पानी पानी हो गया.. उसने कविता को अपनी बाहों में भर लिया और उसके रसभरे होंठों को एक लंबा चुंबान किया

"अगर तेरा पति मेरे बबले दबाएगा तो तुझे कोई एतराज नहीं होगा ना?? बोलने तक तो बात ठीक है पर कोई भी पत्नी ये बर्दाश्त नहीं कर पाती.. पर तू ध्यान रखना कविता.. कहीं तेरा पति पीयूष किसी गदराई छाती वाली के साथ उलझ ना जाएँ.. नहीं तो तेरा सुखी संसार तहस नहस हो जाएगा.. इन मर्दों का और उनके लोडों का कोई भरोसा नहीं.." शीला ने कहा

ये सुनकर कविता बॉखला गई..

शीला की चुत में शकुनि का दिमाग था.. नई संभावना जागृत होते ही उसकी चुत और दिमाग दोनों पासे फेंकने लगे

कविता की क्लिटोरिस को अपने अंगूठे और उंगली के बीच पकड़कर शीला ने ऐसा दबाया की कविता अपनी कमर उठाते हुए उछल पड़ी.. और बिस्तर पर पटक गई..






"हाईईई भाभी.. मर गई.. आहहहह.. निकल गया मेरा.. !! क्या किया आपने.. कहाँ छु लिया था.. !! मुझे तो मज़ा आ गया भाभी.. ईशशश"

शीला दो घड़ी के लिए थम गई.. जब तक की कविता की सांसें नियंत्रित न हो गई फिर उसने कविता से पूछा

"वैसे पीयूष देखने में तो बड़ा हेंडसम है.. !!"

"हाँ, वो तो है.. " कविता ने जवाब दिया

शीला: "तो तुझे पिंटू से चुदवाना ज्यादा पसंद है या अपने पति पीयूष से??"

कविता: "सच कहूँ भाभी.. तो मुझे पिंटू से चुदना ज्यादा पसंद है.. पिंटू एकदम मस्त है.. और मेरा बचपन का प्रेमी है.. इसलिए उसके साथ ज्यादा मज़ा आता है मुझे.. "

शीला: "ठीक है.. में तुझे एक रास्ता दिखाती हूँ.. तुझे बिल्कुल वैसे ही करना है.. देख.. वैसे मुझे पीयूष से अपने बबले दबवाने का कोई शौक नहीं है.. पर बड़ी छातियों के चक्कर में कहीं वो किसी रंडी से ना उलझ जाएँ ये भी हमें देखना पड़ेगा.. नहीं तो तेरा संसार तबाह हो जाएगा.. समझी!!"

कविता: "ठीक है भाभी.. आप जैसा कहेंगी वैसा ही में करूंगी.. "

शीला: "एक काम कर.. आज गुरुवार है.. कल शुक्रवार को कोई न कोई नया मूवी आएगा.. पीयूष को मूवी देखना पसंद है क्या?"

कविता: "अरे भाभी.. अभी दो दिन पहले ही वो कह रहा था.. की कोई नई मूवी देखने चलते है"

शीला: "वाह.. फिर तो हमारा काम आसान हो गया.. आज रात को तू पीयूष को बोलना की शीला भाभी को मूवी देखने जाना है पर किसी की कंपनी ढूंढ रही है.. तो क्या हम साथ चलें उनके साथ मूवी देखने के लिए..!! और कहना की मुझे शीला भाभी को जल्दी जवाब देना है" कविता को कुछ समझ में नहीं आया पर वह सुनती रही

शीला: "अगर वो आनाकानी करे तो उसे कहना की शायद भीड़ में उसे शीला भाभी के स्तनों को छूने का मौका मिल जाएँ.. ऐसे लालच देगी तो वो तुरंत तैयार हो जाएगा.. समझी..!! में मूवी की चार टिकट बुक करवा देती हूँ.. रात के शो की.. !!"

कविता: "चार टिकट क्यों भाभी??" हम तो सिर्फ तीन ही है ना!!"

शीला: "अरे पगली.. जब पीयूष मेरे मम्मे मसल रहा होगा तब तेरे इन संतरों का रस चुसनेवाला भी कोई चाहिए ना !! तू फोन करके पिंटू को बुलाया लेना.. वहाँ मल्टीप्लेक्स पर हम पीयूष की नजर बचाकर, पिंटू को टिकट थमा देंगे.. और बता देंगे की हॉल में जब पूरा अंधेरा हो तब वो चुपके से आकार तेरे बगल की सीट पर बैठ जाएँ.. तू अपने यार के संग मजे मारना तब तक में तेरे पति का खयाल रखूंगी.. "

शीला की यह योजना सुनकर कविता उछल पड़ी.. प्रेमी को मिलने के लिए वो अपने पति को शीला के पास गिरवी रखने को तैयार थी.. उसकी आँखों में ऐसी चमक आ गई जैसे अभी अभी पिंटू से चुदकर आई हो..

"पर भाभी.. पीयूष को पता चल गया तो?? वो पिंटू को मेरे बॉल मसलते देख लेगा तो क्या करेंगे??" कवर के ऊपर से शॉट खेलने का प्रयास करती शीला के सामने कविता ने एल.बी.डब्ल्यू की अपील की..

जवाब में शीला ने अपने दोनों मस्त स्तनों को आपस में दबा दिया.. और उन दोनों के बीच की दरार दिखाते हुए बोली

"कविता.. इस खाई में आजतक जो भी गिरा है ना.. वो कभी वापिस नहीं लौटा.. तेरे पीयूष को भी इस खाई में ऐसे धकेल दूँगी.. की मूवी के तीन घंटों के दौरान पीयूष ये भी भूल जाएगा की वो शादीशुदा है.. तू चिंता मत कर.. और देख.. प्रेमी के संग रंगरेलियाँ मनानी हो तो रिस्क लेना पड़ेगा.. हाथ पर हाथ धरे बैठी रहेगी तो प्रेमी और पति, दोनों को गंवा बैठेगी.. "

कप्तान द्वारा टीम से निकाले जाने की धमकी मिलने के बाद प्लेयर की जो हालत होती है.. वही हालत कविता की हो गई..

कविता ने मन में ठान ली.. "कुछ भी हो जाए भाभी.. इस योजना को हम सफल बनाके ही रहेंगे.. आप बस टिकट का बंदोबस्त कीजिए.. बाकी काम काम मुझपर छोड़ दीजिए"

शीला: "तू टिकट की चिंता मत कर.. पहेले पीयूष को राजी कर.. और पिंटू को मेसेज पर पूरा प्लान बता देना.. और उस चोदू को बोलना की मोबाइल हाथ में ही रखे.. आज कल के लौंडे जीन्स की पिछली पॉकेट में फोन रखकर भूल जाते है.. मल्टीप्लेक्स पर ऐसा कुछ हुआ तो सारे किए कराए पर पानी फिर जाएगा.. उसे कहना की लेडिज टॉइलेट के पास हमारा इंतज़ार करें.. समझ गई ना तू??"

कविता: "हाँ भाभी.. में पिंटू को सब कुछ समझ दूँगी.. और पीयूष को भी माना लूँगी" अपने टॉप के बटन बंद करते हुए कविता ने इस शैतानी प्लान पर अपनी महोर लगा दी.. और अपने घर चली गई..


शीला ने मुसकुराते हुए अपनी चुत को थपथपाया.. जैसे उसे शाबासी दे रही हो.. अब पीयूष नाम के बकरे को हलाल करने का वक्त आ चुका था

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कविता: "हाँ भाभी.. में पिंटू को सब कुछ समझा दूँगी.. और पीयूष को भी मना लूँगी" अपने टॉप के बटन बंद करते हुए कविता ने इस शैतानी प्लान पर अपनी महोर लगा दी.. और अपने घर चली गई..

शीला ने मुसकुराते हुए अपनी चुत को थपथपाया.. जैसे उसे शाबासी दे रही हो.. अब पीयूष नाम के बकरे को हलाल करने का वक्त आ चुका था

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सुबह ४:४५ को रसिक दूध देने आया.. शीला ने दरवाजा खोला और आजूबाजू नजर डालकर देखा.. चारों तरफ घोर अंधकार था..

शीला ने रसिक की धोती के लंगोट के ऊपर से ही उसके लंड को सहलाते हुए पूछा

"मुझसे नाराज है क्या रसिक??"

"नहीं नहीं भाभी.. " कहते हुए रसिक ने अपनी लंगोट को हटाकर काले अजगर जैसा अर्ध जागृत लंड बाहर निकालकर शीला के हाथ में थमा दिया

"बाप रे बाप.. कितना बड़ा है ये रसिक.. " कहते हुए शीला उसके काले लंड को ऐसे आगे पीछे करने लगी जैसे भेस के काले थन को दुह रही हो.. काफी भारी था रसिक का लंड!! दरवाजे पर खड़े खड़े ही शीला ने उसे बड़े ही उत्तेजक ढंग से सहलाया.. परीकथा के राजकुमार की तरह रसिक का लंड पलक झपकाते है बड़ा हो गया..

रसिक ने गाउन के ऊपर से ही शीला के थनों को मसलते हुए उसे अपनी ओर खींच लिया.. शीला रसिक से ऐसे चिपक गई जैसे चुंबक से लोहा चिपक जाता है.. अपने कोमल हाथों से रसिक के सम्पूर्ण उत्तेजित.. मर्दानगी से भरपूर लोड़े की चमड़ी को थोड़ा सा पीछे करते ही.. लाल एल.ई.डी बल्ब की तरह रसिक का टमाटर जैसा बड़ा सुपाड़ा टिमटिमा उठा..

"आह रसिक.. भोसड़ी के.. कितना मोटा है तेरा ये.. " कहते ही शीला घुटनों के बल बैठ गई.. और लावारस से भरपूर उस विकराल लंड को थोड़ा थोड़ा करके पूरा मुंह में ले लिया.. रसिक ऐसे स्थिर हो गया जैसे समाधि में खड़ा हो.. उसका पूरा शरीर तंबूरे के तार की तरह तंग हो गया.. शीला रसिक के लोड़े पर इस तरह टूट पड़ी जैसे वो उससे आखिरी बार मिल रही हो.. !! सबक-सबक की आवाज़ें करते हुए वह रसिक का लंड चूसने लगी.. पूरा लंड मुंह से बाहर निकालकर जब वापिस अपने मुंह मे अंदर लेती तब बेबस रसिक अपनी कमर से हल्का सा धक्का देकर शीला को जवाब देने की निरर्थक कोशिश करता..

लस्सेदार वीर्य से भरे हुए बड़े बड़े अंडकोशों को सहलाते हुए शीला ने मुख-मैथुन जारी रखा.. उसने अंदाजा लगाया की रसिक के टट्टों में कम से कम आधे कप जितना वीर्य भरा होगा.. रसिक के अमरूद जीतने बड़े आँड़ों को हथेली में भरते हुए शीला उनका वज़न नाप रही थी.. रसिक अब छटपटाने लगा था..

"ओह्ह भाभी.. !!" शीला ने एक पल के लिए उसका लंड मुंह से बाहर निकाला.. थोड़ी देर के लिए रुकी.. और एक गहरी सांस लेकर रसिक की बालों वाली जांघों को चाटने लगी.. अपनी लार से उसने रसिक की दायें ओर की जांघ को गीला कर दिया.. उस दौरान शीला की मुठ्ठी रसिक के लंड पर लगातार चल रही थी.. इस हलचल से शीला के दोनों अमृतकुंभ रसिक के घुटनों से ऐसे टकरा रहे थे जैसे समंदर की लहरें किनारे पर पड़े पत्थर से टकरा रही हो..

थोड़ा सा और झुककर शीला ने रसिक को अंडकोशों को अपने मुंह में लेकर चूसना शुरू किया.. शीला की इस हरकत ने रसिक को अचंभित कर दिया.. शीला उसके आँड ऐसे चूस रही थी जैसे बर्फ का गोला चूस रही हो.. शीला के मुख की गर्मी से रसिक का लंड और सख्त हो गया.. शीला अपनी जीभ से रसिक की पिंग-पोंग गेंदों को हल्के से दबा रही थी.. जैसे अंदर भरे वीर्य को बाहर आने के लिए उकसा रही हो.. शीला के हाथ रसिक के पीछे पहुँच गए और उसके मर्दाना कूल्हों को सहलाने लगी..

थोड़ी देर रसिक के गोटों को चूसने के बाद शीला ने उन्हे जमानत पर छोड़ दिया और उसके लंड को फिरसे अपने मुंह की हिरासत में ले लिया.. लंड की सख्ती का स्पर्श अपने मुंह में होते ही शीला ज्यादा उत्तेजित हो कर रसिक के कूल्हों से खेलने लगी.. जब स्त्री पुरुष के कूल्हों से खिलवाड़ करती है तब मर्द को बड़ा अच्छा लगता है.. और फिर वह उत्तेजित मर्द, उस स्त्री के सारे अरमान पूरे कर देता है!!

रसिक का लंड शीला के मुंह में ऐसे ठुमकने लगा जैसे मुजरा कर रहा हो.. दो तीन ऐसे ही ठुमके लगाकर उसके सुपाड़े के छेद से गरम गरम वीर्य की पिचकारी निकल गई.. शीला के लिए वीर्य का स्वाद नया नहीं था.. उसने काफी बार अपने पति मदन के लंड का रस चखा हुआ था.. बिना किसी हिचकिचाहट के शीला ने रसिक के उपजाऊ रस की आखिरी बूंद तक चूस ली.. इतना ही नहीं.. रसिक के आँड का सारा माल निगल लेने के बाद भी शीला उसके लंड के लाल सुपाड़े को मुंह में दबाकर ऐसे चूस रही थी जैसे स्ट्रॉ से लस्सी पी रही हो.. बड़ी ही धीरज से वो तब तक चूसती रही जब तक की रसिक के लंड का दिवाला नहीं निकल गया..

इस अद्भुत मुख-मैथुन के बाद अपने होंठों को पोंछते हुए शीला खड़ी हुई.. बिखरे हुए बालों में उत्तेजित शीला को देखकर एक पल के लिए रसिक डर सा गया.. कामातुर स्त्री कभी कभी शृंगारिक होने के साथ साथ आक्रामक भी बन जाती है.. शीला ने रसिक के बालों को मजबूती से पकड़कर नीचे बैठा दिया.. और अपना एक पैर रसिक के कंधे पर रख दिया.. हवस के कारण शीला ने अब थोड़ा सा हिंसक रूप धारण कर लिया था.. दूसरी तरफ बेचारे रसिक का तो काम तमाम हो चुका था इसलिए शीला की हरकतों का विरोध करने की उसमे ताकत ही नहीं बची थी.. पर फिर भी वो समझ गया की शीला उससे क्या करवाना चाहती थी..

शीला ने अपना गाउन ऊपर किया.. और उसके कामातुर शरीर में हो रहे भूकंप का केंद्र ढूंढ निकाला.. और भूकंप के कारणों का अभ्यास करने लगी..

उसी दौरान बगल के घर (बगल का घर मतलब.. अनुमौसी का घर) का दरवाजा खुलने की आवाज आई.. शीला ने तुरंत अपना गाउन नीचे किया और रसिक को उसके अंदर छुपा दिया.. दरवाजे खुलते ही अनुमौसी बाहर निकली.. दोनों के बीच ४ फिट की दीवार थी और काफी अंधेरा भी था इसलिए शीला के नीचे का द्रश्य अनुमौसी को नजर नहीं आ रहा था.. पर ये अनुमौसी भी पक्की खिलाड़ी थी.. वह दरवाजे से चलते चलते शीला के घर की दीवार की ओर आई .. जिसकी दूसरी तरफ शीला अपने गाउन के अंदर रसिक को छुपाकर खड़ी थी..

"कैसी हो शीला?? " अनुमौसी की आवाज ने शीला को झकझोर दिया

"एकदम बढ़िया हूँ मौसी" शीला ने भी अपने झूठ का व्यापार चलने दिया

"अभी तक वो कमबख्त रसिक नहीं आया दूध लेकर.. दूध देर से आता है तो चाय भी देर से ही पीने मिलती है.. और चाय टाइम पर न मिले तो पूरा दिन खराब हो जाता है" अनुमौसी ने रसिक की शिकायत करते हुए कहा

"हाँ मौसी.. दिन ब दिन रसिक बिगड़ता ही जा रहा है.. अब तो दूध भी पहले जैसा नहीं देता.. मुझे तो लगता है की कमीना पानी मिलाता होगा.. " कहते हुए शीला ने अपनी दोनों जांघों के बीच रसिक को दबा दिया

अपने बारे में चल रही इस बातचीत को सुनकर रसिक को बड़ा गुस्सा आया.. उसने शीला की क्लिटोरिस पर हल्के से काट लिया

"ऊईई माँ.. "शीला चीख पड़ी..

अनुमौसी: "क्या हुआ तुझे शीला?? तू ठीक तो है ना?"

"कुछ नहीं मौसी.. कुछ दिन से पौधों में चींटियाँ बढ़ गई है.. लगता है चींटी ने ही काट लिया.. मौसी। में भी रसिक का इंतज़ार करते हुए खड़ी हूँ.. अब आता ही होगा.. " अनुमौसी का पीछा छुड़ाने के लिए शीला ने कहा

अनुमौसी और शीला की बातें चल रही थी उस दौरान रसिक ने शीला की चुत की फांक को फैलाकर उसमें जीभ फेरना शुरू कर दिया था। शीला ने अपने गाउन के अंदर रसिक को ऐसे छुपाकर रखा था मानों खुले में स्तनपान करवा रही कोई स्त्री पल्लू में अपनी गरिमा को छुपाये बैठी हो।

"ये कमबख्त मौसी जाएँ तो में रसिक को गाउन से बाहर निकालूँ.. " शीला फंस गई थी.. और रसिक चटखारे लगाते हुए उसके भोसड़े को चाट रहा था.. मौसी से बात करते हुए शीला गाउन के ऊपर से ही रसिक का सिर सहला रही थी..

"ओह.. मैंने पानी गरम करने के लिए रखा.. और गैस चालू करना तो भूल ही गई.. " कहते हुए अनुमौसी अपने दरवाजे के अंदर गई.. और तभी शीला ने रसिक के बालों को खींचकर अपने गाउन से बाहर निकाला.. और उसे बाहों में लेकर चूम लिया..

शीला रसिक के कानों में फुसफुसाई.. "जल्दी भाग रसिक.. कहीं वो बुढ़िया फिर से टपक पड़ी तो मेरी इज्जत की नीलामी कर देगी.. और तेरा भी सोसायटी में घुसना बंद करवा देगी" रसिक तुरंत अपना मुंह पूछकर धोती ठीक करने लगा.. और कंपाउंड का दरवाजा खोलकर चलते चलते गली के नुक्कड़ पर पहुँच गया जहां पर उसकी साइकल रखी हुई थी.. शीला भी घर के अंदर चली गई..

इस सारे द्रश्य को किचन की खिड़की से छुपकर देखकर अनुमौसी मुस्कुरा रही थी..

शीला ड्रॉइंग रूम में सोफ़े पर आकार बैठी ही थी की तभी उसे अनुमौसी की आवाज सुनाई दी.. "अरे शीला.. रसिक आ गया है दूध लेकर.. !!"

"अभी आई मौसी.. " शीला पतीली लेकर बाहर आई और दूध लेकर तुरंत अंदर चली गई.. उसने मस्त मसालेदार चाय बनाई और नाश्ते के साथ चाय की चुस्की लगाते हुए अपनी चुत को सहलाने लगी.. रसिक ने आज जबरदस्त चटाई करते हुए उसकी चुत को शांत कर दिया था.. शीला बहुत खुश थी आज..

नहाकर उसने गुलाबी रंग की साड़ी पहनी अपने बरामदे में लगे झूले पर बैठकर सब्जी काटने लगी.. लगभग ११ बजे के आसपास कविता उसके घर के कंपाउंड में झाड़ू लगाने आई.. पतली सी कविता के शरीर में काफी चपलता थी,.. उसकी स्फूर्ति को देखकर शीला सोचने लगी... "कितनी नाजुक और छुईमुई सी है कविता.. " उकड़ूँ बैठकर झाड़ू लगा रही कविता का स्कर्ट घुटनों के ऊपर तक चढ़ गया था.. और उसकी दूध जैसी गोरी जांघें बेहद आकर्षक लग रही थी.. कविता की पतली कमर देखकर शीला की आहह निकल गई.. वाकई में पीयूष को कविता के रूप में जेकपोट मिल गया था.. वैसे पीयूष भी काफी हेंडसम था.. ज्यादा गोरा तो नहीं था अपर ठीकठाक दिखता था.. हाँ उसके कंधे थोड़े और चौड़े होते तो ज्यादा आकर्षक लगता.. मर्द के कंधे ऐसे चौड़े होने चाहिए की जब वो स्त्री को आगोश में भरे तब उस स्त्री को कंधों पर सिर रखकर जनम जनम तक उसी अवस्था में रहने की इच्छा हो .. जीवा और रसिक के कंधों जैसे..

रसिक की तो छाती भी एकदम चौड़ी थी.. गाँव के रहन-सहन और शुद्ध आहार के कारण वो दोनों ऐसे मजबूत थे.. इन शहरी जवानों में वो वाली बात नजर ही नहीं आती.. जीवा का तो जिस्म भी ऐसा भारी था की ऊपर चढ़कर जब शॉट लगाएं तो नीचे लेटी औरत को पूरे ब्रह्मांड के दर्शन एक ही पल में हो जाएँ.. गजब का था जीवा.. उस रात उसने जिस तरह चुदाई की थी वह बड़ी ही यादगार थी.. उसके विकराल लंड के भयानक धक्कों से शीला की बच्चेदानी तक हिल गई थी.. और फिर रघु ने जिस तरह उसकी गांड मारी थी.. आहहाहाहाहा.. मज़ा ही आ गया था.. शीला के दिमाग में ये सारे फितूर चल रहे थे

झुककर झाड़ू लगाती हुई कविता के टॉप से उसके दोनों संतरे नजर आ रहे थे शीला को.. सुबह का वक्त था इसलिए उसने ब्रा नहीं पहनी हुई थी.. कविता के गुलाबी चूचुक इतने प्यारे लग रहे थे की उन्हे देखने में शीला सब्जी काटना भी भूल गई.. झुकी हुई कविता के स्तन के बीच की दरार देखने में इतनी सुंदर लग रही थी की क्या कहें!!! कविता के बिखरे हुए बाल.. झुकने के कारण पीछे से ऊपर चढ़ जाते टॉप के कारण दिख रही उसकी गोरी खुली कमर.. अपने हुस्न के जलवे बिखेर कर घर के अंदर चली गई कविता!! और इसी के साथ शीला की समाधि भी टूट गई..

शीला घर के अंदर आई और सब्जी को कढ़ाई में डालकर तड़का लगाया.. और रोटी के लिए आटा गूँदने लगी.. आटा गूँदते गूँदते उसे रूखी के दूधभरे खरबूजों की याद आ गई.. रूखी और उसके ससुर के बीच जो कुछ भी हुआ था.. शीला की आँखों के सामने चलचित्र की तरह चलने लगा.. अच्छा हुआ ये रसिक हाथ लग गया.. वरना अभी भी चुत खुजाते हुए तड़प रही होती!! एक मर्द के स्पर्श और उसके सख्त लंड के लिए वो कितना तड़प रही थी!! जिस तरह मैं अपने पति की गैरमौजूदगी में.. मर्द के स्पर्श, उसके लिंग और उसकी गर्माहट के लिए तड़प रही थी.. वैसे ही कई मर्द अपनी पत्नी की गैरहाजरी में चूचियाँ और चुत के लिए तड़प रहे होंगे.. शीला के दिमाग में ये सारे विचार अविरत चल रहे थे

आटा गूँदकर तैयार हो गया था.. शीला ने रोटी बनाई और प्लेट में खाना लेकर टीवी के सामने बैठ गई.. टीवी पर कोई बाबाजी प्रवचन दे रहे थे.. और सारी महिलायें उन्हे एकटक होकर सुन रही थी.. शीला को मज़ा नहीं आया.. उसने चैनल बदलकर देखा.. एक चैनल पर ठीकठाक अंग्रेजी पिक्चर चल रही थी.. देखते देखते उसने खाना खतम किया और बिस्तर पर लेट गई।

चुदाई के सुकून और काम की थकान के बाद हमेशा अच्छी नींद आती है.. यही सोचते हुए शीला ने अपनी दोनों जांघों के बीच तकिया दबाया.. और सोने का प्रयास करने लगी। जब तक तकिये को अपने भोसड़े से सटाकर ना रखे.. तब तक उसे नींद ही नहीं आती थी। जैसे छोटे बच्चों को अंगूठा चूसते हुए सोने की आदत होती है वैसे ही शीला को चुत के पास तकिये के दबाव से ही नींद आती थी।

सोते सोते कब शाम के पाँच बज गए.. पता ही नहीं चला.. कविता ने जब दरवाजा खटखटाया तब शीला की नींद खुली

कविता: "भाभी.. पाँच बज गए.. आप अब तक तैयार नहीं हुई? ६ बजे पहुंचना है.. पीयूष तो तैयार भी हो गया.. जल्दी कीजिए"

शीला: "मेरी चिंता मत कर.. मुझे तैयार होने में देर नहीं लगेगी.. और मेरी बात ध्यान से सुन" कविता का हाथ पकड़कर उसे बिस्तर पर खींच लिया शीला ने "देख.. आज तू ब्रा या पेन्टी मत पहनना.. और अपने ढीले इलास्टिक वाली स्कर्ट पहनना.. " कविता को ज्ञान देते हुए शीला ने कहा

"क्यों भाभी??" कविता को समझ में नहीं आया

शीला: "बिल्कुल अनाड़ी है तू कविता.. मूवी के दौरान पिंटू जब तेरे टॉप में हाथ डाले तब सीधे तेरी चुची हाथ में आनी चाहिए.. ब्रा के चक्कर में मज़ा किरकिरा हो जाएगा उसका.. और स्कर्ट में हाथ डालेगा तब पेन्टी बीच में आएगी तो कैसे मज़ा आएगा!! बेचारे को ऐसा लगेगा की किला फतेह कर लिया पर खजाने की चाबी नहीं मिली.. "

कविता: "वाह भाभी.. आपका दिमाग तो बड़ा ही तेज चलता है.." कविता ने ब्लाउस के ऊपर से ही शीला के खजाने को मसलते हुए कहा "मैं चलती हूँ भाभी.. और हाँ.. आप भी ब्रा-पेन्टी मत पहनना.. वरना पीयूष को मज़ा नहीं आएगा" आँख मारते हुए कविता ने कहा और चली गई

चंचल, खिलखिलाती, सुंदर झरने जैसी कविता जब जा रहे थे तब उसके मटकते कूल्हे तक लटक रही चोटी को देखती रही शीला!!!

शीला ने अलमारी खोली और सोचने लगी की क्या पहनूँ !! काफी सारे कपड़े रिजेक्ट करने के बाद उसने मदन की भिजवाई हुई सिल्क की साड़ी और ब्लाउस पहन लिया.. आईने में अपने स्तनों को थोड़ा सा एडजस्ट करते हुए सोचने लगी.. कुदरत ने क्या जादू छुपाया है उसके स्तनों में!! सारे मर्द देखते ही रहते है हमेशा.. ब्लाउस के हुक को ऊपर से बंद किया तो उसके स्तन नीचे से बाहर निकल गए.. बड़ी मुश्किल से उन दोनों लफंगों को ब्लाउस के अंदर दबाकर उसने हुक बंद किए.. सिल्क के ब्लाउस और साड़ी में शीला किसी अप्सरा जितनी सुंदर लग रही थी..






कविता का फिरसे फोन आ गया था। शीला घर को ताला लगा रही थी तभी उसे पीयूष की आवाज सुनाई दी "क्या लग रही है??" शीला समझ गई की पीयूष कविता से उसके बारे में ही कह रहा था

पीयूष नुक्कड़ से ऑटो ले आया.. और तीनों रिक्शा में बैठ गए.. ट्राफिक को चीरते हुए, गड्ढों पर कूदते फाँदते रिक्शा आगे बढ़ने लगी.. शीला और पीयूष के बीच में कविता बैठी हुई थी। कविता की जांघ से अपनी जांघ दबते ही शीला रोमांचित हो गई.. कविता को एक तरफ शीला और दूसरी तरफ पीयूष का स्पर्श मिलते ही वह भी सिहर उठी.. मरून कलर के टॉप और काले स्कर्ट में कविता बेहद सुंदर लग रही थी। शीला तिरछी निगाहों से पीयूष को देखती रही और आगे की योजना बनाने में जुट गई।

लगभग २० मिनट के सफर के बाद वह तीनों मल्टीप्लेक्स पर पहुँच गए.. पीयूष ऑटो वाले को पैसे दे रहा था तब तक शीला ने बुकिंग काउन्टर से एडवांस बुकिंग करवाई हुई चार टिकट ले ली.. शीला ने कविता को वहीं काउन्टर पर रुकने को कहा और खुद लेडिज टॉइलेट की ओर चली गई.. पिंटू कहीं नजार नहीं आ रहा था.. शीला को गुस्सा आया.. वह समय की बड़ी पाबंद थी.. कोई देर से आए और उससे इंतज़ार करवाए वह उसे बिल्कुल पसंद नहीं था..

"कहाँ मर गया ये हरामखोर!! में यहाँ कितने सेटिंग कर रही हूँ और इसे तो कुछ पड़ी ही नहीं है!! साला चोदने और मजे मारने भी जो वक्त पर ना पहुँच पाएं उससे और क्या उम्मीद की जा सकती है!!" शीला का पारा चढ़ता जा रहा था

"कैसी हो शीला भाभी?" पीछे से पिंटू की आवाज आई

"कब से तेरा इंतज़ार कर रही हूँ.. कहाँ मरवा रहा था तू? " शीला बरस पड़ी

"मैं तो टाइम पर ही आया हूँ.. आप ही जल्दी आ गए तो मैं क्या करू!!.." पिंटू ने सफाई देते हुए कहा

"ठीक है.. ठीक है.. ज्यादा होशियारी मत कर.. ये पकड़ टिकट.. और मूवी शुरू हो जाए उसके बाद अंधेरा होने पर ही अंदर आना... समझा..!!"

"भाभी.. आज तो आप बड़ी कातिल लग रही हो.. लगे हाथों आपके भी दबा दूँ तो दिक्कत तो नहीं होगी ना!!"

"मैं सेटिंग करती हूँ उसका भी.. मैं चलती हु अब.. वो दोनों मेरा इंतज़ार कर रहे होंगे"

"ठीक है भाभी"

शीला तेजी से चलते हुए कविता और पीयूष के पास जा पहुंची।

"चलो कुछ खाते है" कविता ने कहा

"हाँ.. अभी कुछ खा लेते है.. बाद में भीड़ हो जाएगी" तीनों मल्टीप्लेक्स के अंदर बने रेस्टोरेंट में पहुँच गए। शो शुरू होने में अभी देर थी..

पीयूष तो शीला के गुंबज जैसे स्तन देखकर पागल सो हो गया था.. पीयूष को यूं घूरते हुए देखकर शीला ने मुस्कुराकर अपने पल्लू को इस तरह एडजस्ट किया की जिससे उनके उभार आसानी से नजर आ सके.. पीयूष गरम गरम सांसें छोड़ रहा था

रेस्टोरेंट में खाने का ऑर्डर देने के बाद तीनों बातें करने लगे..

शीला: "पीयूष, कैसा चल रहा है तेरा काम?"

पीयूष: "ठीक ही चल रहा है भाभी.. वैसे कविता आपसे काफी घुलमिल गई है.. बहोत तारीफ करती है आपकी"

कविता: "मैं नहीं भाभी.. ये पीयूष ही हर वक्त आपकी तारीफ करता रहता है.." कहते हुए कविता पीयूष के सामने देखकर हंसने लगी

पीयूष बेचारा शर्म से लाल हो गया

शीला: "मेरी तारीफ?? किस बात की तारीफ करते हो पीयूष.. जरा मुझे भी तो कहो"

पीयूष: "वो.. कुछ नहीं भाभी.. ये कविता भी ऐसे ही मज़ाक कर रही है"

कविता: "अच्छा बच्चू.. उस दिन तो बोल रहे थे की शीला भाभी बहोत सुंदर है.. कितने मस्त लगते है.. झूठ क्यों बोल रहे हो!!"

पीयूष ने जवाब नहीं दिया और अपनी नजरें झुका ली

शीला: "पीयूष.. ऐसा तो क्या पसंद आ गया मुझ में??"

कविता के सामने कुछ भी बोलने से शर्मा रहा था पीयूष..

पीयूष: "अरे भाभी.. आप हो ही ऐसी.. आप भला किसे पसंद नहीं आएगी.. !!!"

इसी तरह की शरारती बातों में तीनों उलझे रहे.. खाना आ गया और तीनों ने खा भी लिया.. पीयूष बिल देने के लिए रुक तब तक शीला और कविता रेस्टोरेंट के बाहर निकल गए.. शीला कविता को और एक-दो बातें समझा रही थी तभी पीयूष उनके पास आया.. और तीनों चलते हुए हॉल के बाहर बेंच पर बैठ गए।

नया मूवी था इसलिए काफी भीड़ थी.. एक १९-२० साल की लड़की, ब्लू जीन्स और सफेद टाइट टीशर्ट में घूम रही थी.. स्किन टाइट टीशर्ट से नजर आ रहे उसके मध्यम कद के गोल मटोल स्तनों को पीयूष घूर रहा था.. हाईहिल के सेंडल पहन वह लड़की मटकते हुए.. अपने स्तनों को उछलते हुए वहाँ से चली गई






शीला ने धीमी आवाज में कहा "मस्त लग रही है ना.. !!"

पीयूष: "हाँ भाभी.. एकदम धांसू लड़की थी"

शीला: "कविता, तू टीशर्ट क्यों नहीं पहनती?? कितनी सुंदर लगेगी तू टीशर्ट में?"

कविता: "मेरी सास को पसंद नहीं है भाभी.. इसलिए नहीं पहनती.. मेरे मायके में तो मैं रोज टीशर्ट ही पहनती थी.. पर शादी के बाद सब छूट गया"

पीयूष: "फिगर भरा भरा हो तो ही टाइट टीशर्ट जचती है..!!" इशारा उसके छोटे कद के स्तनों पर था ये समझ गई कविता

कविता: "अब कुदरत ने जिसे जैसा फिगर दिया उसमें थोड़े ही कोई बदलाव किया जा सकता है!!" पीयूष की कही बात से कविता अपमानित महसूस करने लगी।

शीला ने बात को घुमाने के इरादे से कहा "पीयूष, फिगर बड़ा हो या पतला.. सुंदरता तो देखने वाले की आँखों में होनी चाहिए"

शीला के अति-विकसित स्तनों की तरफ देखते हुए पीयूष ने कहा "फिर भी भाभी.. फरक तो पड़ता ही है" पीयूष की आँखों में शीला के स्तनों को दबाने की इच्छा साफ झलक रही थी। जिस लाचारी से भूखा भिखारी हलवाई की दुकान में पड़े गुलाबजामुन को देखता है.. बिल्कुल वही दशा पीयूष की भी थी..

शीला: "जैसे जैसे स्त्री की उम्र बढ़ती है.. वैसे वैसे ही जिस्मानी बदलाव होते रहते है.. मैं जब कविता की उम्र की थी तब मेरा फिगर भी कविता जैसा ही था" पीयूष को दिलासा देते हुए शीला ने कहा

आग बुझाने के बजाए उसमें पेट्रोल डाल रही थी शीला.. !!

शीला: "कविता, तू एक बार टीशर्ट पहन कर तो देख.. बहोत जाचेगा तुझ पर.. और तेरा फिगर इतना छोटा भी नहीं है.. ३६ की साइज़ तो होगी ही तेरी.. !!"

कविता: "३४ की साइज़ है मेरी, भाभी"

कविता का मन अब पिंटू को मिलने व्याकुल हो रहा था इसलिए पीयूष का ध्यान शीला की ओर आकर्षित करने के लिए उसने कहा "आपकी साइज़ क्या है भाभी??"

शीला: "४२ की साइज़ है मेरी"

ये सुनते ही पीयूष ने गहरी सांस ली.. शीला झुककर अपना सेंडल ठीक करने लगी.. और उसके ब्लाउस के ऊपर से दिख रहे नज़ारे से पीयूष को पसीना आने लगा..

शीला: "पीयूष, तुझे कैसा फिगर पसंद है? पतला या मोटा?"

पीयूष शरमाते हुए नीचे देखने लगा.. शीला और कविता हंस पड़े..

कविता: "पीयूष को तो सब बड़ा बड़ा ही अच्छा लगता है भाभी.. इसे तो मेरी फिगर पसंद ही नहीं है" रूठने का अभिनय करते हुए कविता ने कहा

अभिनय का गुण स्त्रीओं में जन्मजात होता है.. पर पीयूष इसे परख नहीं पाया.. और सकपका गया

पीयूष: "अरे कविता.. किसने कहा तू मुझे पसंद नहीं है!! बहोत पसंद है तू मुझे"

कविता: "लेकिन अगर मेरा फिगर शीला भाभी जैसा होता तो ज्यादा पसंद आता.. हैं ना!!"

शीला के सिखाने के अनुसार कविता बहुत बढ़िया तरीके से आगे बढ़ रही थी.. शीला भी बड़ी शांति से पति-पत्नी की इस मीठी नोक-झोंक को सुन रही थी

कविता: "आप से एक बात करनी थी.. आप बुरा मत मानना"

शीला: "बोल ना.. क्या बात है?"

कविता: "ऐसे नहीं.. पहले आप मुझे वचन दीजिए की आप बुरा नहीं मानोगी.. और मेरे बारे में बुरा नहीं सोचोगी"

शीला: "प्रोमिस.. अब बता मुझे.. "

कविता: "कैसे कहूँ.. मुझे तो शर्म आती है"

पीयूष: "अब पूछ भी ले.. एकता कपूर की तरह सस्पेंस खड़ा मत कर!!"

शीला हंस पड़ी..

कविता: "अभी नहीं भाभी.. अंदर हॉल में मूवी शुरू होने के बाद में कहूँगी"

पीयूष: "क्यों? पिक्चर शुरू हो जाने के बाद पूछने में शर्म नहीं आएगी तुझे?"

कविता: "ऐसा नहीं है पीयूष.. हॉल में अंधेरा होगा तो पूछने में शर्म नहीं आएगी.. चेहरा ही नहीं दिखेगा फिर शर्म कैसी!!"

शीला: "अंधेरे में तो बहोत कुछ हो सकता है.. जो कुछ भी उजाले में नहीं हो सकता वो सब कुछ अंधेरे में हो सकता है"

ये सुनते ही पीयूष की आँखों में चमक आ गई

कविता: "पीयूष, अभी वो सफेद टीशर्ट वाली लड़की की सीट, गलती से तेरी बगल में आ गई तो तू उसका फिगर दबाने में.. बड़े फिगर का मज़ा लेना मत भूल जाना"

पीयूष: "और अगर फिगर दबाने के चक्कर में सर पर जूते पड़ेंगे तो!!"

शीला: "तेरे सर पर जूते नहीं पड़ेंगे.. मेरी गारंटी है.. "

कविता और शीला दोनों हंस पड़े.. तभी शो का टाइम हो गया और हॉल का गेट खुल गया.. ऑडियंस अंदर जाने लगी..


पीयूष: "चलिए भाभी.. चलते है अंदर"

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