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- Dec 5, 2013
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कांती बूआ
और तबतक कांती बूआ आ गयीं, छनमन करतीं, पायल छनकाती, चूड़ी खनकाती, रेशमी साडी मक्खन सी देह से सरक रही थी, लाल चोली में कसे बंधे जोबन इस उम्र में भी जान मार रहे थे, और आज लग रहा था अकेले ही सब भौजाइयों पे भारी पड़ेंगी,
ढोलक फिर तेज हो गयी, अबकी सूरजु की मामियों और मौसी ने मोर्चा सम्हाला और उनका साथ सुशीला चाची और गाँव की बाकी भाभियाँ भी दे रही थीं, एक से एक खुल के गारियाँ, नाम ले ले के सब मर्दों का, अब सीधे मरदो का नाम तो लेते नहीं तो बच्चो से जोड़ के, सुशीला चाची ने तो अपनी बेटी का ही नाम लेकर अपने मर्द का फायदा करा दिया,
लावा भूजे बैठीं, दूल्हे की बूआ, अरे दूल्हे की बूआ,
पीछे से चढ़ गए, मीना के पापा,
अरे हमरी मीना के पापा, गपागप चोदे हैं
पिछवां से चढ़ गए मीना के मामा, गपागप चोदे हैं
सुशीला चाची के बगल में ही चंदौली वाली बैठी थीं, गाँव के रिश्ते में उनकी देवरानी, उमर बराबर ही होगी, ३४-३५ की, एक ही अगहन में गौने आयी थीं, भी एक ही बेटी थी रीना, मीना से चार पांच महीना छोट। चंदौली वाली का मायका चदौली में था, लेकिन मरद उनके दरोगा थे, चोलापुर थाने में, तो और गाँव के रिश्ते से कांती बुआ के वो भी भाई ही लगे तो सुशीला चाची ने चंदौली वाली के मर्द का, अपने देवर का भी फायदा करा दिया और गाना आगे बढ़ाया
लावा भूजे बैठीं, दूल्हे की बूआ, अरे दूल्हे की बूआ, अरे ननदी हमारी,
पिछवां से चढ़ गए रीना के पापा , गपागप चोदे हैं
चंदौली वाली ने अपने भाई का फायदा करते हुए जोड़ा
पिछवां से चढ़ गए रीना के मामा, गपागप चोदे हैं
रीना और मीना दोनों शहर से आयी किशोरियां, एक दूसरे को देख के मुस्कराने लगीं, ऐसी खुली गारियाँ शहर में उन्होंने कभी बहुत कम सुनी थीं, लेकिन जैसे कांती बूआ की भौजाई आज अपनी नन्द का पेटकोट का नाडा तोड़ने पे जुटी थीं तो इन दोनों की भौजाइयां भी कौन कम थीं। उन दोनों की मुस्कराहट उनकी भौजाइयों से नहीं बची, और मुन्ना बहू बोलीं,
" अरे का मुस्कियात हो, तुम दोनों के भाई भी तुम दोनों को छोड़ेंगे नहीं "
" और हम लोगों के भाई भी नहीं " भरौटी वाली भी आज बहुत गरमाई थीं।
लेकिन सबसे ज्यादा गरमाई थीं, दूल्हे की माई, बड़की ठकुराइन, रिश्ता उमर भूल के खुल के मजाक कर रही थीं, वो दोनों को देख के बोलीं
" तो ये दोनों कौन गलत करेंगी , अरे हैं तो इसी गाँव की बिटिया, और पूरे बाइस पुरवा में आसीर्बाद है इस गाँव क लौंडियों को, कि जबतक अपने भाई का लंड नहीं घोंटेंगी, झांटे ठीक से नहीं आएँगी।"
कांती बूआ भी मजे से चूल्हे के सामने बैठी गारियों का रस ले रही थीं, इस दिन का वो कब से इन्तजार कर रही थीं, और भौजाइयों को चिढ़ाते हुए उन्होंने कोई काम धाम नहीं शुरू किया,
और अहिराने वाली जो उनकी भौजाइयां लगती थीं वो तो और आगे,
" हे दूल्हे क बूआ, ढेर छिनरपन मत करा, नहीं तो चुल्हवा क लकडिया तोहरी बुरिया में डाल देबे,
और बूआ भी मार नखड़ा कर रही थीं, भुजियाइन ( भाड़ झोंकने वाली ) वो भी उनकी गाँव के रिश्ते से बड़ी भौजाई लगती थी, उसे भी चिढ़ा रही थीं, हड़का रही थीं,
" हे, भुजियाइन भौजी, आपन भोंसड़ा अस चौड़ा चूल्हा बना दी हो, खपड़ा कैसे रखा जाएगा,, देखो लपट केतना ऊपर उठ रही है "
" अच्छा ननद रानी, उठो, अभी मैं ठीक कर देती हूँ "
भुजियाइन बोलीं और आँख मार के पीछे बैठी भरौटी और अहिराने की दो तीन औरतों को इशारा किया, और जैसे ही कांती बूआ उठीं, एक भरौटी वाली ने एक हाथ पकड़ा और अहिराने वाली उनकी भौजी ने दूसरा और भुजियाइन खड़ी हुयी, उसने आराम से कांती बूआ की साडी पेटीकोट से खोल दी, बस सुशीला चाची को मौका मिला और सरररर साडी उनके हाथ में,
कांती बूआ उनकी ओर लपकी, लेकिन तब तक सुशीला चाची ने अपनी ननद की साडी, गोल गोल बनाकर,चंदौली वाली को और चंदौली वाली ने साडी हाथ में लेकर अपनी बेटी, रीना के कंधे हाथ रख के कहा,
" साडी चाहे तो पहले कबूला, बरात जाए के पहले इसके ( रीना के ) बाबू जी और मामा दोनों का घोंटेंगी आप,... और हमारे सामने "
और जब कांती बूआ उनकी ओर लपकी तो चंदौली वाली ने रमा की माँ, शीतल मौसी की ओर उछाल दी।
आखिर बड़की ठकुराइन क छोट बहिन तो उनकी भी बहन लगेंगी और एक बार साडी दूल्हे के ननिहाल वालों के पास पहुँच गयी तो, ऊपर से मंझली मामी बोली,
" अरे दूल्हे क बूआ, काम शुरू करो नहीं तो पेटीकोट और ब्लाउज भी नहीं बचेगा, निसुती लावा भुजाइ होगी आज "
गाने फिर तेज हो गए थे,
केथुवा क चूल्हा पतकी, केथुवा क चलौना जी
केकरा दुलारी बहिनी, लावा भूजे आयीं जी, केकरा दुलारी बहिनी, लावा भूजे आयीं जी,
मटिया क चूल्हा पतकी, मटिया क चूल्हा पतकी, मूजी क चलौना जी,
भैया की दुलारी बहिनी, लावा भूजे आयीं जी, भैया की दुलारी बहिनी, लावा भूजे आयीं जी,
फूटी गयले चुल्ही पतकी, फूटी गयले चुल्ही पतकी, मूजी क चलौना जी,
भैया की दुलारी बहिनी, लाजो न लजयली जी, लाजो न लजयली जी,
ढोलक चंदौली वाली के हाथ में थी और गाने में उनका साथ उनकी बेटी रीना, सुशीला चाची की मीना के अलावा बाकी लड़कियां, अहिराने की पूनम, शीतल मौसी की रमा, भरौटी की लीला, रामपुर वाले की छोटी बहन चुनिया सब साथ दे रहे थे। शीतल मौसी और मंझली मामी ने अगला गाना शुरू किया
हंसी हंसी बोलेली, नन्दो हमारी जी, क्या क्या देबू भउजी, लावा क भुजाइ जी ,
गांव क गदहवा देब, मोटका संड़वा जी, गांव क गदहवा देब, मोटका संड़वा जी,
आपन भैया बिदाई देब, दूल्हे क मामा बिदाई देब, लावा क भुजाइ जी
और बूआ की भरौटी वाली भौजाई और सुशीला चाची ने मिल के बूआ का पेटीकोट भी पिछवाड़े तक उठा दिया,
गाने फिर तेज हो गए थे,
बूआ ठनगन कर रही थीं, पर सूरजु की माई नेग देने में, चिढ़ा चिढ़ा के ही सही कंजूसी नहीं कर रही थीं, सतरंगी चुनरी, जड़ाऊ कंगना,चांदी की पायल और साथ में चिढ़ा भी भी रही थी,
" जब दूल्हे के मामा के साथ दूल्हे क बूआ सोयेंगी तो ये पायल छम छम बाजेगी, आज रात भर "
" तो का दूल्हे क मामा,.... खाली अपने बहिनिया के साथ सोयेंगे " लावा भूजते हुए, कांती बूआ ने पलट के जवाब दिया।
ढोलक अब लड़कियों ने सम्हाल ली थी और रस्म के गानों में रिश्ते नहीं देखे जाते तो अब पूनम, चननिया, भरौटी वाली लीला, शीतल मौसी की बेटी, रमा, और बड़ी मामी की बेटी रीनू , रामपुर वाली की छोटी बहन , चुनिया यहाँ तक की सुशीला चाची की बिटिया रीना और चंदौली वाली की बेटी मीना, जो बहुत दिन बाद गाँव आयी थी, बूआ का नाम ले ले के एक से एक गाने गा रही थी,
का लेबू ननदी लावा भुजैया अरे का लेबू ननदी लावा भुजैया
सोना चांदी छोड़ा, तू ले ला आपन भैया, अरे तू ले आपन भैया
अरे का लेबू ननदी लावा भुजैया
बटुली लेबू की बटुला लेबू, अरे बटुली लेबू की बटुला लेबू
गदही लेबू की गदहा लेबू अरे गदही लेबू की गदहा लेबू
बटुली, बटुला छोड़ा तू ले ला हमार सैंया, अरे ले ला आपन भैया,
अरे का लेबू ननदी लावा भुजैया
झुमका लेबू की झुलनी लेबू, अरे झुमका लेबू की झुलनी लेबू
अरे ठनगन छोड़ा, अरे ठनगन छोड़ा तू ले ला हमार भैया,
अरे का लेबू ननदी लावा भुजैया
थरिया लेबू की लुटिया लेबू, अरे थरिया लेबू की लुटिया लेबू
अरे गहना गुरिया छोड़ा, तू ले ला हमार भैया,
अरे तू ले ला हमार भैया, दिन रात तोहरा करेंगे चोदेया,
अरे का लेबू ननदी लावा भुजैया
सोना लेबू की रुपया लेबू की अपने भैया संग सोइबू सेजरिया
अरे सोना रूपया तू छोड़ा, अरे अपने भैया को बनाय लाय सैंया।
अरे का लेबू ननदी लावा भुजैया
नेग अब दूल्हे की बाकी चाचियां और मामी लोग भी दे रही थी और ढोलक सुरजू के ननिहाल के पास थी और गारियाँ भी तेज हो गयीं थी , ननद की ननद तो गरियाई ही जाएंगी
भूजा भूजा ननद रानी लावा,अरे भूजा भूजा ननद रानी लावा बीच मंड़वा में,
अरे भूजा भूजा ननद रानी लावा,अरे भूजा भूजा ननद रानी लावा बीच मंड़वा में,
तोहका हम देबे ननदी सोने के कंगनवा,अरे सथवा में सोनरा भतार बीच मंड़वा में,
अरे सथवा में सोनरा भतार बीच मंड़वा में,
--
ननद हो भूजा आज मोरे लउवा, ननद हो भूजा आज मोरे लउवा,
तोहंका हम देबे, सोने के कँगनवा, सोने के कंगनवा, संग में देबे सोनरवा, आपन भैया
हचक के चोदी, अरे हचक के चोदी, ननद तोहार बुरिया
ननद हो भूजा आज मोरे लउवा, ननद हो भूजा आज मोरे लउवा
तोहंका हम देबे, हंडा और लोटा , तोहंका हम देबे, हंडा और लोटा ,संग में देबे ठठेरवा , आपन भैया
हचक के चोदी, अरे हचक के चोदी, ननद तोहार बुरिया
ननद हो भूजा आज मोरे लउवा, ननद हो भूजा आज मोरे लउवा
तोहका मैं देबुँ दूध पिए के धेनू गैया, धेनू गैया , संगवा में देबुँ आपन गाँव क सांड़वा,
ननद हो भुजा आज मोरे लउवा।
बूआ चूल्हा फूंक रही थी, भुजाईन भी साथ दे रही थी, पर लावा फुट नहीं रहा था, और सुशीला चाची, दूल्हे की मामी और दुखे की माई, बड़की ठकुराइन सब बूआ को चिढ़ा रही थी
" अगर लावा नहीं फूटा, तो दुनो मुट्ठी तोहरी बुरिया और गंडिया में डाल दूंगी, "
एक बार फिर से ढोलक चंदौली वाली चाची ने सम्हाल ली थी और साथ उनका सुशीला चाची दे रही थीं और बाकी लड़कियां, भौजाइयां भी
कहंवा से बूआ आयीं, लावा न फूटे जी, कहंवा से ननदी आयीं, लावा न फूटे जी
ससुरे से बुआ आयीं, ससुरे से ननदी आयीं, लावा न फूटे जी,
तोहको मैं चोली देबुँ, संगवा में साड़ी जी, संगवा दरजिया देबुँ, लावा भूजा जल्दी जी।
---
कौने छैलवा क बहिनी हो, लावा भूजबे न जाने, कौने छैलवा क बहिनी हो, लावा भूजबे न जाने,
जो हमरे लावा फटाफट न फुटिहें, जो हमरे लावा फटाफट न फूटिहें, सोवाइबे कहरा क सेजरिया हो, लावा भूजबे न जाने
कौने छैलवा क बहिनी हो, लावा भूजबे न जाने, कौने छैलवा क बहिनी हो, लावा भूजबे न जाने,
जो हमरे लावा फटाफट न फुटिहें, जो हमरे लावा फटाफट न फूटिहें, सोवाइबे दूल्हा क सेजरिया हो, लावा भूजबे न जाने
कौने छैलवा क बहिनी हो, लावा भूजबे न जाने, कौने छैलवा क बहिनी हो, लावा भूजबे न जाने,
जो हमरे लावा फटाफट न फुटिहें, जो हमरे लावा फटाफट न फूटिहें, सोवाइबे गदहवा क सेजरिया हो, लावा भूजबे न जाने
धुंए से बूआ परेशान थीं, हँसते हुए बोलीं, " लेकिन हे सूरजु क माई अगर लावा फुट गया तो एक नेग मैं मागूंगी, देना पड़ेगा, "
" अरे ननद छिनार, अगवाड़ा पिछवाड़ा दोनों खोल के मांग ला, आज दिल खोल के दूंगी, एकलौते बेटवा क बियाह है " सूरजु की मैं मान गयीं, लेकिन बूआ इतनी आसानी से नहीं मानने वाली थीं, और भले बहुये सास का साथ देती बूआ को गरियाने में, लेकिन गाँव की लड़कियां उनके साथ रहती थीं तो उन्होंने पूनम, लीला, मीना को गवाह बनाया,
" हे पूनम सुन ला, और मीना तुम भी, बाद में तोहार काकी मारे डर के भाग न जाएँ, "
लेकिन जवाब सूरजु के ननिहाल की ओर से आया, दूल्हे की मामी बोलीं, " अरे हमार ननद भले बचपन क छिनार हैं, आजकत कभी खड़े लंड को मना नहीं की, चाहे जिसका हो, सबका मन राखीं, लेकिन बात कह के मुकरती नहीं है "
तीन बार सूरजु की माई ने हाँ भरी, और सूरजु की बूआ ने खूब जोर मारा,
लावा फूट गया, रस्म पूरी हुयी और खूब जोर से हो हो हुआ,
सूरज पश्चिम में डूब रहा था,
और बूआ ने अपना नेग मांग लिया,
" हे सूरजु क माई दूल्हे क महतारी, अपने भैया के साथ सोई बियाहे के पहले और बाद, बियाहे के बाद हमरे भैया के साथ, देवर नन्दोई के साथ, दूल्हे के चाचा, फूफा, मौसा सब का मन रखा, तो बारात बिदा होने के पहले, हमरे भतीजा का सूरजु दूल्हे का, मन रखना होगा, उहो कुल बिटिया लोगन क, हम सब लोगन क सामने, तभी बरात बिदा होगी, और देखो पूनमिया, मीना, लीला तुम सबके सामने हाँ बोली हैं ,
सूरजु क माई का चेहरा नयी दुल्हिन की तरह सिंदूरी हो गया, लेकिन अब नयी बहुओं को मौका मिला गया,
दूल्हे की दो दो भाभी, मंजू भाभी और रामपुर वाली एक साथ बोलीं,
"अरे तो कौन बात है, हमार देवर, बहनचोद होने के साथ मादरचोद भी हो जाएगा, उहो सबके सामने "
ऊपर कमरे में सूरजु दुलहा अपनी सगी समान, फुफेरी बहन, दर्जा नौ वाली, कांती बूआ की सगी छोटी बहिनिया की बिटिया को, रगड़ रगड़ कर निहुरा के चोद रहे थे, चुद चुद कर बहिनिया की बुरिया लाल हो गयी थी, अंदर तक चमड़ी छिल गयी थी, एक बार की भैया की मलाई अंदर तक थी, तब भी छोटी बहन की जान निकल रही थी,
नीचे मैदान में लावा भूजने की रस्म ख़तम हो गयी थी, अब ननद भौजाई की ठनगन चल रही थी,
" अब का मुंहे में सूरजु के मामा क लंड घुसा है का, अरे खुल के हाँ बोला, लजाने की कौन बात है "
कांती बूआ ने चिढ़ाया और कहा, " मन तो कर रहा होगा, गप्प से घोंट लू "
" अरे तो हमरी ननद को समझ का रही हो, पक्की बेटा चोद हैं, एक बार का दस बार घोंटेंगी, और हम सब के सामने घोंटेंगी "
बड़की ठकुराइन की भाभी, सूरजु दूल्हे की छोटी मामी बोलीं।
सूरज पछिम में गाँव से सटी चांदी की हँसुली ऐसी, मगही नदी बहती थी, बस गप्प से उसमे डूब गया
पूरे मैदान में बस एक सिन्दूरी आभा सी थी, चिड़िया चींगूर चह चह करते पेड़ों पर लौट रहे थे,
ऊपर कमरे में सूरजु दूल्हे ने ढेर सारी मलाई अपनी बहिन की, बुच्ची की बुर में छोड़ दी थी, झड़ते हुए कचकचा के कुतिया की तरह निहुरी बुच्ची के मालपुआ अस गाल को सूरजु ने काट लिया और नाख़ून दोनों चूँचियों में गड़ा दिए, और ये निशान बरात बिदा होने तक तो नहीं जाने वाले थे।
नीचे मैदान में लड़कियों, बहुओं, नन्दो, भाभियों के हल्ले के बीच सूरजु की माई ने हाँ बोल दिया, लेकिन कांती बूआ ने छोड़ा नहीं,
" अरे साफ़ साफ़ बोला भौजी की हमरे भतीजे से, सूरजु दूल्हे से पेलवाओगी, उसका मोटा मूसल घोटगी, तभी लावा मिलेगा, रस्म पूरी होगी "
और हँसते हुए सूरजु की माई ने न सिर्फ माना बल्कि जो जो उनकी ननद ने कहलवाया, कहा और लावा ले लिया और नन्द भौजाई भेंटने लगी ,
तब तक किसी बड़ी बूढी पंडिताइन ने याद दिलाया और डांटा भी, गाँव के रिश्ते में वो सूरजु की दादी और बड़की ठकुराइन की सास लगती थीं
" अरे चलो सब जन, सांझ हो गयी है , दिया बत्ती का जून हो गया है, संझा माई को जगाना है,
थोड़ी देर में कांती बूआ, उनकी भाभी, दूल्हे की माई, बड़की ठकुराइन, उनके बगल में मुन्ना बहु शीतल मौसी, गाँव की सब बहुएं , मंजू भाभी , रामपुर वाली और सब लड़कियां, पूनम, लीला, मीना, रमा, चनिया, सांझ जगाने का गीत गा रहे थे,
लेकिन उसके पहले सूरजु की माई ने इशारे से पूनम ग्वालिन को बुला के समझा दिया,
"सुन पूनमिया, तोहार और सूरजु क बचपन क दोस्ती, भाई बहिन का रिश्ता, तो अभी सांझ जगाने के बाद, ये लीलवा को ले के चली जाना , ऊपर दूल्हे के कमरे में, बुच्ची और इमरतिया होंगीं वहां। दूल्हे को अब अकेला नहीं छोड़ा जाता और बुच्ची सबेरे से लगी है, इमरतिया भी, तो उन दोनों को छुड़ा के, तुम और लीलवा रहना और दूल्हे को खाना वाना भी खिला देना, गाना शुरू होने के पहले बुच्ची और इमरतिया पहुँच जाएंगी।
" अरे अरे संझा गुसाईं,
आँगन में रात उतर रही थी, संझा जगाने के गाने चल रहे थे अँधेरा भी पूरा नहीं हुआ था।
और तबतक कांती बूआ आ गयीं, छनमन करतीं, पायल छनकाती, चूड़ी खनकाती, रेशमी साडी मक्खन सी देह से सरक रही थी, लाल चोली में कसे बंधे जोबन इस उम्र में भी जान मार रहे थे, और आज लग रहा था अकेले ही सब भौजाइयों पे भारी पड़ेंगी,
ढोलक फिर तेज हो गयी, अबकी सूरजु की मामियों और मौसी ने मोर्चा सम्हाला और उनका साथ सुशीला चाची और गाँव की बाकी भाभियाँ भी दे रही थीं, एक से एक खुल के गारियाँ, नाम ले ले के सब मर्दों का, अब सीधे मरदो का नाम तो लेते नहीं तो बच्चो से जोड़ के, सुशीला चाची ने तो अपनी बेटी का ही नाम लेकर अपने मर्द का फायदा करा दिया,
लावा भूजे बैठीं, दूल्हे की बूआ, अरे दूल्हे की बूआ,
पीछे से चढ़ गए, मीना के पापा,
अरे हमरी मीना के पापा, गपागप चोदे हैं
पिछवां से चढ़ गए मीना के मामा, गपागप चोदे हैं
सुशीला चाची के बगल में ही चंदौली वाली बैठी थीं, गाँव के रिश्ते में उनकी देवरानी, उमर बराबर ही होगी, ३४-३५ की, एक ही अगहन में गौने आयी थीं, भी एक ही बेटी थी रीना, मीना से चार पांच महीना छोट। चंदौली वाली का मायका चदौली में था, लेकिन मरद उनके दरोगा थे, चोलापुर थाने में, तो और गाँव के रिश्ते से कांती बुआ के वो भी भाई ही लगे तो सुशीला चाची ने चंदौली वाली के मर्द का, अपने देवर का भी फायदा करा दिया और गाना आगे बढ़ाया
लावा भूजे बैठीं, दूल्हे की बूआ, अरे दूल्हे की बूआ, अरे ननदी हमारी,
पिछवां से चढ़ गए रीना के पापा , गपागप चोदे हैं
चंदौली वाली ने अपने भाई का फायदा करते हुए जोड़ा
पिछवां से चढ़ गए रीना के मामा, गपागप चोदे हैं
रीना और मीना दोनों शहर से आयी किशोरियां, एक दूसरे को देख के मुस्कराने लगीं, ऐसी खुली गारियाँ शहर में उन्होंने कभी बहुत कम सुनी थीं, लेकिन जैसे कांती बूआ की भौजाई आज अपनी नन्द का पेटकोट का नाडा तोड़ने पे जुटी थीं तो इन दोनों की भौजाइयां भी कौन कम थीं। उन दोनों की मुस्कराहट उनकी भौजाइयों से नहीं बची, और मुन्ना बहू बोलीं,
" अरे का मुस्कियात हो, तुम दोनों के भाई भी तुम दोनों को छोड़ेंगे नहीं "
" और हम लोगों के भाई भी नहीं " भरौटी वाली भी आज बहुत गरमाई थीं।
लेकिन सबसे ज्यादा गरमाई थीं, दूल्हे की माई, बड़की ठकुराइन, रिश्ता उमर भूल के खुल के मजाक कर रही थीं, वो दोनों को देख के बोलीं
" तो ये दोनों कौन गलत करेंगी , अरे हैं तो इसी गाँव की बिटिया, और पूरे बाइस पुरवा में आसीर्बाद है इस गाँव क लौंडियों को, कि जबतक अपने भाई का लंड नहीं घोंटेंगी, झांटे ठीक से नहीं आएँगी।"
कांती बूआ भी मजे से चूल्हे के सामने बैठी गारियों का रस ले रही थीं, इस दिन का वो कब से इन्तजार कर रही थीं, और भौजाइयों को चिढ़ाते हुए उन्होंने कोई काम धाम नहीं शुरू किया,
और अहिराने वाली जो उनकी भौजाइयां लगती थीं वो तो और आगे,
" हे दूल्हे क बूआ, ढेर छिनरपन मत करा, नहीं तो चुल्हवा क लकडिया तोहरी बुरिया में डाल देबे,
और बूआ भी मार नखड़ा कर रही थीं, भुजियाइन ( भाड़ झोंकने वाली ) वो भी उनकी गाँव के रिश्ते से बड़ी भौजाई लगती थी, उसे भी चिढ़ा रही थीं, हड़का रही थीं,
" हे, भुजियाइन भौजी, आपन भोंसड़ा अस चौड़ा चूल्हा बना दी हो, खपड़ा कैसे रखा जाएगा,, देखो लपट केतना ऊपर उठ रही है "
" अच्छा ननद रानी, उठो, अभी मैं ठीक कर देती हूँ "
भुजियाइन बोलीं और आँख मार के पीछे बैठी भरौटी और अहिराने की दो तीन औरतों को इशारा किया, और जैसे ही कांती बूआ उठीं, एक भरौटी वाली ने एक हाथ पकड़ा और अहिराने वाली उनकी भौजी ने दूसरा और भुजियाइन खड़ी हुयी, उसने आराम से कांती बूआ की साडी पेटीकोट से खोल दी, बस सुशीला चाची को मौका मिला और सरररर साडी उनके हाथ में,
कांती बूआ उनकी ओर लपकी, लेकिन तब तक सुशीला चाची ने अपनी ननद की साडी, गोल गोल बनाकर,चंदौली वाली को और चंदौली वाली ने साडी हाथ में लेकर अपनी बेटी, रीना के कंधे हाथ रख के कहा,
" साडी चाहे तो पहले कबूला, बरात जाए के पहले इसके ( रीना के ) बाबू जी और मामा दोनों का घोंटेंगी आप,... और हमारे सामने "
और जब कांती बूआ उनकी ओर लपकी तो चंदौली वाली ने रमा की माँ, शीतल मौसी की ओर उछाल दी।
आखिर बड़की ठकुराइन क छोट बहिन तो उनकी भी बहन लगेंगी और एक बार साडी दूल्हे के ननिहाल वालों के पास पहुँच गयी तो, ऊपर से मंझली मामी बोली,
" अरे दूल्हे क बूआ, काम शुरू करो नहीं तो पेटीकोट और ब्लाउज भी नहीं बचेगा, निसुती लावा भुजाइ होगी आज "
गाने फिर तेज हो गए थे,
केथुवा क चूल्हा पतकी, केथुवा क चलौना जी
केकरा दुलारी बहिनी, लावा भूजे आयीं जी, केकरा दुलारी बहिनी, लावा भूजे आयीं जी,
मटिया क चूल्हा पतकी, मटिया क चूल्हा पतकी, मूजी क चलौना जी,
भैया की दुलारी बहिनी, लावा भूजे आयीं जी, भैया की दुलारी बहिनी, लावा भूजे आयीं जी,
फूटी गयले चुल्ही पतकी, फूटी गयले चुल्ही पतकी, मूजी क चलौना जी,
भैया की दुलारी बहिनी, लाजो न लजयली जी, लाजो न लजयली जी,
ढोलक चंदौली वाली के हाथ में थी और गाने में उनका साथ उनकी बेटी रीना, सुशीला चाची की मीना के अलावा बाकी लड़कियां, अहिराने की पूनम, शीतल मौसी की रमा, भरौटी की लीला, रामपुर वाले की छोटी बहन चुनिया सब साथ दे रहे थे। शीतल मौसी और मंझली मामी ने अगला गाना शुरू किया
हंसी हंसी बोलेली, नन्दो हमारी जी, क्या क्या देबू भउजी, लावा क भुजाइ जी ,
गांव क गदहवा देब, मोटका संड़वा जी, गांव क गदहवा देब, मोटका संड़वा जी,
आपन भैया बिदाई देब, दूल्हे क मामा बिदाई देब, लावा क भुजाइ जी
और बूआ की भरौटी वाली भौजाई और सुशीला चाची ने मिल के बूआ का पेटीकोट भी पिछवाड़े तक उठा दिया,
गाने फिर तेज हो गए थे,
बूआ ठनगन कर रही थीं, पर सूरजु की माई नेग देने में, चिढ़ा चिढ़ा के ही सही कंजूसी नहीं कर रही थीं, सतरंगी चुनरी, जड़ाऊ कंगना,चांदी की पायल और साथ में चिढ़ा भी भी रही थी,
" जब दूल्हे के मामा के साथ दूल्हे क बूआ सोयेंगी तो ये पायल छम छम बाजेगी, आज रात भर "
" तो का दूल्हे क मामा,.... खाली अपने बहिनिया के साथ सोयेंगे " लावा भूजते हुए, कांती बूआ ने पलट के जवाब दिया।
ढोलक अब लड़कियों ने सम्हाल ली थी और रस्म के गानों में रिश्ते नहीं देखे जाते तो अब पूनम, चननिया, भरौटी वाली लीला, शीतल मौसी की बेटी, रमा, और बड़ी मामी की बेटी रीनू , रामपुर वाली की छोटी बहन , चुनिया यहाँ तक की सुशीला चाची की बिटिया रीना और चंदौली वाली की बेटी मीना, जो बहुत दिन बाद गाँव आयी थी, बूआ का नाम ले ले के एक से एक गाने गा रही थी,
का लेबू ननदी लावा भुजैया अरे का लेबू ननदी लावा भुजैया
सोना चांदी छोड़ा, तू ले ला आपन भैया, अरे तू ले आपन भैया
अरे का लेबू ननदी लावा भुजैया
बटुली लेबू की बटुला लेबू, अरे बटुली लेबू की बटुला लेबू
गदही लेबू की गदहा लेबू अरे गदही लेबू की गदहा लेबू
बटुली, बटुला छोड़ा तू ले ला हमार सैंया, अरे ले ला आपन भैया,
अरे का लेबू ननदी लावा भुजैया
झुमका लेबू की झुलनी लेबू, अरे झुमका लेबू की झुलनी लेबू
अरे ठनगन छोड़ा, अरे ठनगन छोड़ा तू ले ला हमार भैया,
अरे का लेबू ननदी लावा भुजैया
थरिया लेबू की लुटिया लेबू, अरे थरिया लेबू की लुटिया लेबू
अरे गहना गुरिया छोड़ा, तू ले ला हमार भैया,
अरे तू ले ला हमार भैया, दिन रात तोहरा करेंगे चोदेया,
अरे का लेबू ननदी लावा भुजैया
सोना लेबू की रुपया लेबू की अपने भैया संग सोइबू सेजरिया
अरे सोना रूपया तू छोड़ा, अरे अपने भैया को बनाय लाय सैंया।
अरे का लेबू ननदी लावा भुजैया
नेग अब दूल्हे की बाकी चाचियां और मामी लोग भी दे रही थी और ढोलक सुरजू के ननिहाल के पास थी और गारियाँ भी तेज हो गयीं थी , ननद की ननद तो गरियाई ही जाएंगी
भूजा भूजा ननद रानी लावा,अरे भूजा भूजा ननद रानी लावा बीच मंड़वा में,
अरे भूजा भूजा ननद रानी लावा,अरे भूजा भूजा ननद रानी लावा बीच मंड़वा में,
तोहका हम देबे ननदी सोने के कंगनवा,अरे सथवा में सोनरा भतार बीच मंड़वा में,
अरे सथवा में सोनरा भतार बीच मंड़वा में,
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ननद हो भूजा आज मोरे लउवा, ननद हो भूजा आज मोरे लउवा,
तोहंका हम देबे, सोने के कँगनवा, सोने के कंगनवा, संग में देबे सोनरवा, आपन भैया
हचक के चोदी, अरे हचक के चोदी, ननद तोहार बुरिया
ननद हो भूजा आज मोरे लउवा, ननद हो भूजा आज मोरे लउवा
तोहंका हम देबे, हंडा और लोटा , तोहंका हम देबे, हंडा और लोटा ,संग में देबे ठठेरवा , आपन भैया
हचक के चोदी, अरे हचक के चोदी, ननद तोहार बुरिया
ननद हो भूजा आज मोरे लउवा, ननद हो भूजा आज मोरे लउवा
तोहका मैं देबुँ दूध पिए के धेनू गैया, धेनू गैया , संगवा में देबुँ आपन गाँव क सांड़वा,
ननद हो भुजा आज मोरे लउवा।
बूआ चूल्हा फूंक रही थी, भुजाईन भी साथ दे रही थी, पर लावा फुट नहीं रहा था, और सुशीला चाची, दूल्हे की मामी और दुखे की माई, बड़की ठकुराइन सब बूआ को चिढ़ा रही थी
" अगर लावा नहीं फूटा, तो दुनो मुट्ठी तोहरी बुरिया और गंडिया में डाल दूंगी, "
एक बार फिर से ढोलक चंदौली वाली चाची ने सम्हाल ली थी और साथ उनका सुशीला चाची दे रही थीं और बाकी लड़कियां, भौजाइयां भी
कहंवा से बूआ आयीं, लावा न फूटे जी, कहंवा से ननदी आयीं, लावा न फूटे जी
ससुरे से बुआ आयीं, ससुरे से ननदी आयीं, लावा न फूटे जी,
तोहको मैं चोली देबुँ, संगवा में साड़ी जी, संगवा दरजिया देबुँ, लावा भूजा जल्दी जी।
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कौने छैलवा क बहिनी हो, लावा भूजबे न जाने, कौने छैलवा क बहिनी हो, लावा भूजबे न जाने,
जो हमरे लावा फटाफट न फुटिहें, जो हमरे लावा फटाफट न फूटिहें, सोवाइबे कहरा क सेजरिया हो, लावा भूजबे न जाने
कौने छैलवा क बहिनी हो, लावा भूजबे न जाने, कौने छैलवा क बहिनी हो, लावा भूजबे न जाने,
जो हमरे लावा फटाफट न फुटिहें, जो हमरे लावा फटाफट न फूटिहें, सोवाइबे दूल्हा क सेजरिया हो, लावा भूजबे न जाने
कौने छैलवा क बहिनी हो, लावा भूजबे न जाने, कौने छैलवा क बहिनी हो, लावा भूजबे न जाने,
जो हमरे लावा फटाफट न फुटिहें, जो हमरे लावा फटाफट न फूटिहें, सोवाइबे गदहवा क सेजरिया हो, लावा भूजबे न जाने
धुंए से बूआ परेशान थीं, हँसते हुए बोलीं, " लेकिन हे सूरजु क माई अगर लावा फुट गया तो एक नेग मैं मागूंगी, देना पड़ेगा, "
" अरे ननद छिनार, अगवाड़ा पिछवाड़ा दोनों खोल के मांग ला, आज दिल खोल के दूंगी, एकलौते बेटवा क बियाह है " सूरजु की मैं मान गयीं, लेकिन बूआ इतनी आसानी से नहीं मानने वाली थीं, और भले बहुये सास का साथ देती बूआ को गरियाने में, लेकिन गाँव की लड़कियां उनके साथ रहती थीं तो उन्होंने पूनम, लीला, मीना को गवाह बनाया,
" हे पूनम सुन ला, और मीना तुम भी, बाद में तोहार काकी मारे डर के भाग न जाएँ, "
लेकिन जवाब सूरजु के ननिहाल की ओर से आया, दूल्हे की मामी बोलीं, " अरे हमार ननद भले बचपन क छिनार हैं, आजकत कभी खड़े लंड को मना नहीं की, चाहे जिसका हो, सबका मन राखीं, लेकिन बात कह के मुकरती नहीं है "
तीन बार सूरजु की माई ने हाँ भरी, और सूरजु की बूआ ने खूब जोर मारा,
लावा फूट गया, रस्म पूरी हुयी और खूब जोर से हो हो हुआ,
सूरज पश्चिम में डूब रहा था,
और बूआ ने अपना नेग मांग लिया,
" हे सूरजु क माई दूल्हे क महतारी, अपने भैया के साथ सोई बियाहे के पहले और बाद, बियाहे के बाद हमरे भैया के साथ, देवर नन्दोई के साथ, दूल्हे के चाचा, फूफा, मौसा सब का मन रखा, तो बारात बिदा होने के पहले, हमरे भतीजा का सूरजु दूल्हे का, मन रखना होगा, उहो कुल बिटिया लोगन क, हम सब लोगन क सामने, तभी बरात बिदा होगी, और देखो पूनमिया, मीना, लीला तुम सबके सामने हाँ बोली हैं ,
सूरजु क माई का चेहरा नयी दुल्हिन की तरह सिंदूरी हो गया, लेकिन अब नयी बहुओं को मौका मिला गया,
दूल्हे की दो दो भाभी, मंजू भाभी और रामपुर वाली एक साथ बोलीं,
"अरे तो कौन बात है, हमार देवर, बहनचोद होने के साथ मादरचोद भी हो जाएगा, उहो सबके सामने "
ऊपर कमरे में सूरजु दुलहा अपनी सगी समान, फुफेरी बहन, दर्जा नौ वाली, कांती बूआ की सगी छोटी बहिनिया की बिटिया को, रगड़ रगड़ कर निहुरा के चोद रहे थे, चुद चुद कर बहिनिया की बुरिया लाल हो गयी थी, अंदर तक चमड़ी छिल गयी थी, एक बार की भैया की मलाई अंदर तक थी, तब भी छोटी बहन की जान निकल रही थी,
नीचे मैदान में लावा भूजने की रस्म ख़तम हो गयी थी, अब ननद भौजाई की ठनगन चल रही थी,
" अब का मुंहे में सूरजु के मामा क लंड घुसा है का, अरे खुल के हाँ बोला, लजाने की कौन बात है "
कांती बूआ ने चिढ़ाया और कहा, " मन तो कर रहा होगा, गप्प से घोंट लू "
" अरे तो हमरी ननद को समझ का रही हो, पक्की बेटा चोद हैं, एक बार का दस बार घोंटेंगी, और हम सब के सामने घोंटेंगी "
बड़की ठकुराइन की भाभी, सूरजु दूल्हे की छोटी मामी बोलीं।
सूरज पछिम में गाँव से सटी चांदी की हँसुली ऐसी, मगही नदी बहती थी, बस गप्प से उसमे डूब गया
पूरे मैदान में बस एक सिन्दूरी आभा सी थी, चिड़िया चींगूर चह चह करते पेड़ों पर लौट रहे थे,
ऊपर कमरे में सूरजु दूल्हे ने ढेर सारी मलाई अपनी बहिन की, बुच्ची की बुर में छोड़ दी थी, झड़ते हुए कचकचा के कुतिया की तरह निहुरी बुच्ची के मालपुआ अस गाल को सूरजु ने काट लिया और नाख़ून दोनों चूँचियों में गड़ा दिए, और ये निशान बरात बिदा होने तक तो नहीं जाने वाले थे।
नीचे मैदान में लड़कियों, बहुओं, नन्दो, भाभियों के हल्ले के बीच सूरजु की माई ने हाँ बोल दिया, लेकिन कांती बूआ ने छोड़ा नहीं,
" अरे साफ़ साफ़ बोला भौजी की हमरे भतीजे से, सूरजु दूल्हे से पेलवाओगी, उसका मोटा मूसल घोटगी, तभी लावा मिलेगा, रस्म पूरी होगी "
और हँसते हुए सूरजु की माई ने न सिर्फ माना बल्कि जो जो उनकी ननद ने कहलवाया, कहा और लावा ले लिया और नन्द भौजाई भेंटने लगी ,
तब तक किसी बड़ी बूढी पंडिताइन ने याद दिलाया और डांटा भी, गाँव के रिश्ते में वो सूरजु की दादी और बड़की ठकुराइन की सास लगती थीं
" अरे चलो सब जन, सांझ हो गयी है , दिया बत्ती का जून हो गया है, संझा माई को जगाना है,
थोड़ी देर में कांती बूआ, उनकी भाभी, दूल्हे की माई, बड़की ठकुराइन, उनके बगल में मुन्ना बहु शीतल मौसी, गाँव की सब बहुएं , मंजू भाभी , रामपुर वाली और सब लड़कियां, पूनम, लीला, मीना, रमा, चनिया, सांझ जगाने का गीत गा रहे थे,
लेकिन उसके पहले सूरजु की माई ने इशारे से पूनम ग्वालिन को बुला के समझा दिया,
"सुन पूनमिया, तोहार और सूरजु क बचपन क दोस्ती, भाई बहिन का रिश्ता, तो अभी सांझ जगाने के बाद, ये लीलवा को ले के चली जाना , ऊपर दूल्हे के कमरे में, बुच्ची और इमरतिया होंगीं वहां। दूल्हे को अब अकेला नहीं छोड़ा जाता और बुच्ची सबेरे से लगी है, इमरतिया भी, तो उन दोनों को छुड़ा के, तुम और लीलवा रहना और दूल्हे को खाना वाना भी खिला देना, गाना शुरू होने के पहले बुच्ची और इमरतिया पहुँच जाएंगी।
" अरे अरे संझा गुसाईं,
आँगन में रात उतर रही थी, संझा जगाने के गाने चल रहे थे अँधेरा भी पूरा नहीं हुआ था।