Adultery शीला की लीला (५५ साल की शीला की जवानी) - Page 8 - SexBaba
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Adultery शीला की लीला (५५ साल की शीला की जवानी)

हवालदार ड्राइवर और गाड़ी लेकर शीला तथा मदन को उनके घर छोड़ आया.. इस बार हवालदार ने शीला के पैरों को छूने की हिम्मत नही की.. बड़ी ही शालीनता से बर्ताव करने लगा..

घर के अंदर पहुंचकर.. दरवाजा बंद कर.. शीला मदन के गले लगकर रोने लगी.. इतना रोई.. इतना रोई की मदन को भी ताज्जुब हो रहा था

रात के तीन बज रहे थे.. चुदाई के कार्यक्रम का सत्यानाश हो चुका था.. दोनों का मूड ऑफ हो गया था.. मदन शीला को सांत्वना देते देते थक गया पर शीला का रोना अब भी बंद नही हुआ था..

आखिर शीला को शांत करने के लिए मदन अपनी अलमारी से इंपोर्टेड जोहनी वॉकर ब्लैक लेबल की बोतल ले आया.. दो पटियाला पेग बनाकर उसमें आइसक्यूब डालकर.. उसने शीला के सामने रख दिए.. साथ ही साथ अपनी बेग से उसने सिगार का बॉक्स भी निकाला.. ये कोई पार्टी करने का समय नही था.. पर शीला को शांत करने के लीये.. और इस गहरे सदमे से उसे बाहर निकालने के लिए जरूरी था..

मदन को सिगार जलाते देख.. शीला को जॉन और चार्ली की याद आ गई.. जलती हुई सिगार को एश-ट्रे में रखकर मदन खड़ा हो गया और अपने कपड़े उतार दिए "जो भी हुआ सब भूल जा शीला.. और अपने कपड़े उतार दे.. इस स्ट्रेस को भूलने के लिए यही सब से बेहतरीन इलाज है"

मदन के नरम लंड को देखकर.. बिना उसके साथ "चीयर्स" कीये उसने ग्लास उठाया और बड़ा घूंट गले के नीचे उतार दिया.. उसके पूरे शरीर में गर्माहट का एहसास होने लगा.. एश-ट्रे से सिगार उठाकर एक लंबा कश खींचकर वो आराम से बैठ गई.. मदन को शीला का ये स्वरूप बेहद पसंद था.. जब शीला शर्म छोड़कर बिंदास बन जाती थी.. और खुली नंगी बातें करने लगती थी तब मदन को बहोत अच्छा लगता था..








"ये अच्छा किया तूने मदन.. इसके अलावा हमारा टेंशन दूर नही होने वाला.. लव यू डार्लिंग!!" शीला ने पास खड़े नंगे मदन का नरम लंड दारू के ग्लास में डुबोया.. और फिर ग्लास हटाकर उसके लंड पर लगी शराब को जीभ से चाट गई..







"ओह्ह शीला.. मज़ा आ गया यार.. !!" आखिर रात के चार बजे.. मदन और शीला का हनीमून.. शराब और सिगार के साथ शुरू हो गया

शीला की जीभ छूते ही मदन का लंड सरसराने लगा.. शीला बार बार उसका लंड शराब में डुबोती थी और फिर चूसती थी.. मदन शीला के इस कामुक स्वरूप के बड़े ही अहोभाव से देखता रहा.. वो सोच रहा था की इतनी कामुक स्त्री.. दो साल तक बिना लंड के कैसे रही होगी??

शीला ने खड़े होकर अपनी साड़ी निकाल दी.. ब्लाउस और घाघरे में बड़ी ही कातिल लग रही थी.. उसने शराब की बोतल उठाई और ढक्कन खोलकर थोड़ी थोड़ी दारू स्तनों की निप्पल पर गिरा दी.. कॉटन का ब्लाउस गीला होते ही निप्पल उभरकर आरपार दिखने लगी.. बोतल वापिस टेबल पर रखकर शीला ने कहा








"मदन.. ले मेरे बॉल चूस ले.. दूध तो नही निकलेगा पर शराब का मज़ा जरूर मिलेगा.. !!"

मदन ने शीला के दोनों स्तनों को बारी बारी ब्लाउस के उपर से चाट लिया और बोला "ये जबरदस्त है.. अगर औरतों को बच्चा बड़ा हो जाने पर स्तनों से शराब निकलती होती तो कितना मज़ा आता.. !! ओह शीला मेरी जान.. " एक स्तन को चूसते हुए वो दूसरे स्तन को दबा रहा था.. तो शीला ने भी मदन के फुले हुए लोड़े को पकड़कर उसके आँड दबा दिए.. मदन शीला के गाल पर शराब की धार करते हुए उसके गोरे गालों को चाटने लगा.. अब शीला के ब्लाउस के हुक खोलकर मदन ने उन मांस के गोलों को बाहर निकाला.. और उन्हें दोनों हाथों से मसलने लगा..

शीला: "मदन, मेरे बबलों पर शराब गिरा.. " मदन शराब गिराता रहा और चाटता रहा.. शराब की धारा नीचे उतरते हुए चूत तक पहुँच गई.. मदन की जीभ वहाँ भी पहुँच गई.. जोहनी वॉकर से भी कीमती चूत का रस और शराब चाटकर मदन मस्त हो गया.. उसकी जीभ शीला की चूत पर रगड़ रही थी.. इस हरकत का पूर्ण आनंद उठाते हुए शीला मदन के बालों में उँगलियाँ फेर रही थी.. मदन शीला के जिस्म के अलग अलग हिस्सों को चाट रहा था.. शीला की कमर की चर्बी के बीच अपना लाल सुपाड़ा रखकर वो रगड़ने लगा..

"आह्ह बहोत गरम लग रहा है, मदन!! ईसे यहाँ वहाँ रगड़ने छोड़ और अंदर डाल दे जान" अब सही अर्थ में उनका हनीमून शुरू हुआ था

मदन की गैर-मौजूदगी में यही बात शीला सब से ज्यादा मिस करती थी.. लंड दिखाकर अलग अलग हरकतें करते हुए वो जिस तरह उसे तड़पाता था वो शीला को बहोत पसंद था.. मदन के लंड को शराब में डुबोकर चूसते हुए शीला को रघु और जीव के संग की चुदाई याद आ रही थी.. उन दोनों ने भी ऐसे ही शराब के साथ उसकी चुदाई की थी.. !! बाप रे.. !! कितना मोटा था जीवा का लंड.. !! सिर्फ रूखी ही बर्दाश्त कर सकती है उसका.. !! मुझे तो उसके धक्कों से ही दर्द हो रहा था.. निर्दयी होकर चोदता था.. ऐसे धक्के लगाता था जैसे शरीर के अंगों को अलग कर देना चाहता हो..

मदन को बेड पर लैटाकर उसकी गांड के छेद को चूम लिया.. शीला को ऐसा करना पसंद था.. जरा भी घिन नही आती थी उसे.. अपने पसंदीदा मर्द के साथ.. !! मदन के लटक रहे अंडकोशों को मुंह में भरकर मस्ती से चूसने लगी.. उस पर लगी हुई शराब शीला की उत्तेजना को ओर बढ़ा रही थी.. मदन बेड पर पैर चौड़े कर लेट गया.. और शीला के इस रंभा स्वरूप को चकित होकर देखता रहा.. उसके बदन के हर मरोड़ में कामुकता छुपी हुई थी.. मदन के लंड को काफी देर तक चूसते रहने के बाद जब उसने मुंह से बाहर निकाला तब शीला के थूक से पूर्णतः गीला हो चुका था..








बिना समय गँवाएं शीला मदन पर सवार हो गई.. और उसके लंड को अपने भोसड़े की गहराई में उतार दिया.. उत्तेजना से चिपचिपी चूत में लंड ऐसे सरक गया जैसे पानी में सांप सरक रहा हो.. मिलन के आनंद से शीला की आँखें और चूत के होंठ एक साथ बंद हो गए.. मदन के दोनों हाथ शीला के नग्न उरोजों पर पहुँच गए.. अभी भी उसकी निप्पलों पर शराब लगी हुई थी..

मदन के लंड को अपनी चूत के काफी अंदर उतारकर अंदर बाहर करते हुए शीला हल्के हल्के अपनी पतवार चला रही थी क्योंकि उसे किनारे पर पहुँचने की कोई जल्दी नही थी.. और क्यों होती?? अब तक तो उसे जल्दी इसलीये होती थी क्योंकी किसी के आने का डर रहता था.. अपने पति के साथ उसे यह दिक्कत नही थी.. इसलिए वो धीरे धीरे अपना काम कर रही थी






शीला की निप्पल को मसलते हुए मदन बोला "आह्ह शीला.. कितनी सेक्सी है तू.. !! तुझे इतनी बार चोदने के बाद भी मेरा आवेग काम नही हुआ.. इतनी मदमस्त जवानी को भोगने का अवसर किसी किस्मत वाले को ही मिल सकता है.. तुझे पाकर मैं वाकई धन्य हो गया.. "

चूत की मांसपेशियों को और टाइट करते हुए शीला ने अपने अनोखे अंदाज में मदन की प्रशंसा का उत्तर दिया.. मदन के लंड पर दबाव बढ़ते ही उसकी "आह्ह" निकल गई..

"ऐसी भूखी कामुक जवानी को तू दो सालों के लिए छोड़कर चला गया था.. कभी ये नही सोचा की बिना लंड के मैं कैसे रह पाऊँगी?? तुझे ये अंदाजा नही है मदन.. तेरे इस लंड की याद में मैंने कैसे अपनी रातें काटी है.. !! कितना तड़पी हूँ.. सिर्फ मेरा मन जानता है.. अब तो मुझे छोड़कर कहीं नही जाएगा ना.. ??"

"शीला तुझे छोड़कर जाना मुझे भी अच्छा नही लगा था.. पर जाना मेरी मजबूरी थी.. वरना तुझे यहाँ छोड़कर जाने में.. मुझे कितना दुख हुआ था ये तू नही जानती.. कितने महीनों तक ये लंड तड़पता रहा.. फिर किस्मत से मेरी के साथ सेक्स करने का मौका मिला.. बाकी मैं उसे सामने से पटाने नही गया था" मदन ने कहा

शीला: "क्या नाम बताया तूने अपने मकान मालिक की पत्नी का??"

मदन: "मेरी था उसका नाम"

शीला: "हम्म अच्छा नाम है मेरी.. कैसी लगती थी वो? तुम दोनों की सेटिंग कैसे हुई?"

मदन: "क्या कहूँ यार..!! उसकी चार महीने की बेटी थी.. रोजी.. बड़ी ही क्यूट सी थी.. उसे देखकर ही मुझे वैशाली का बचपन याद आ जाता.. शीला.. तुझे पता है ना मेरी कमजोरी??"

मदन के लंड प आर ऊपर नीचे होते हुए शीला ने झुककर अपने स्तन प्रदेश से मदन का मुंह ढँकते हुए कहा "हाँ मदन.. जानती हूँ.. दूध भरे स्तनों को देखकर तेरा क्या हाल हो जाता है, मुझे पता है"

शीला के उन्नत पयोधरों को बारी बारी चूसते हुए मदन ने शीला की पीठ को अपने नाखूनों से कुरेद दिया.. उस वक्त शीला को महसूस हुआ की उसके भोसड़े के अंदर मदन का लंड और कठोर हो गया.. शीला समझ गई की मदन को मेरी के दूध भरे स्तनों की याद आ रही थी.. मदन पागलों की तरह शीला की निप्पलों को चूस रहा था

"मदन.. तू चाहे जितना चूस ले.. फिर भी दूध नही निकलने वाला"

"बस यही बात मुझे मेरी के पास घसीटकर ले गई.. वरना मैं तुझे कभी धोखा नही दे सकता.. " मदन ने अपना कुबुलातनामा फिर से शुरू कर दिया

"शीला, मैं तेरे इन बबलों को याद करते हुए.. दूरबीन से आती जाती विदेशी लड़कियों और औरतों को देखते हुए मूठ मार रहा था.. तभी मेरी ने मुझे देख लिया.. वो बहोत ही सुंदर और गोरी थी.. डिलीवरी के बाद उसका पूरा बदन गदराया हुआ था.. और ये बड़े बड़े स्तन.. उसके टॉप की स्तन वाली नोक हमेशा दूध से गीली रहती थी.. वो ब्रा भी नही पहनती थी"

"अच्छा.. मतलब उसके दूध भरे स्तनों को दिखाकर उसने तुझे पटा लिया.. " मदन की छाती के बाल खींचते हुए शीला ने कहा

"हाँ शीला.. एक दिन उसने मुझे कहा "मदन.. तुम्हें रोड पर जा रही लड़कियों को देखने में बहोत मज़ा आता है?" तब मैंने जवाब दिया की नही.. मैं तो केवल उन लड़कियों को देखकर.. अपनी बीवी को याद करते हुए खुद को शांत करने की बस कोशिश कर रहा हूँ.. फिर मेरी ने पूछा की क्या मुझे अपनी पत्नी की बहोत याद आ रही है? जिसके जवाब में मैंने कहा की हाँ.. बहोत याद आती है.. उसकी भी और उसके संग बिताए समय की भी"

शीला मदन के लंड पर उछलते हुए उसकी बातें बड़े चाव से सुन रही थी

मदन: "फिर मेरी ने मुझसे कहा.. 'देखो.. तुम एक अच्छे आदमी हो.. तुमने मुझे कभी गलत नजर से नही देखा.. इसलिए मैं तुम्हारी मदद कर सकती हूँ पर बदले में तुम्हें भी मेरी मदद करनी होगी'.. शीला.. विश्वास करो.. मैंने तब तक मेरी को कभी गलत नज़रों से नही देखा था.. पर मेरी ने जिस तरह मुझसे बात की थी.. मेरा दिल कर रहा था की उसे एक रीक्वेस्ट करूँ.. जिससे मेरा लंड भी शांत हो जाए और तेरा विश्वासघात भी न हो.. "

शीला: "अच्छा? फिर क्या किया तूने?" शीला को बहोत मज़ा आ रहा था.. वो हौले हौले मदन के लंड पर ऊपर नीचे हो रही थी






मदन: "मेरी ने अपनी कहानी सुनाई..

"एक लड़का था जिसका नाम था पीटर.. हम दोनों एक दूसरे को बहोत चाहते थे.. हम लोग शादी करने ही वाले थे की अचानक वो गायब हो गया.. मैंने उसे बहोत खोजा पर काफी समय तक ना वो मुझे मिला और ना ही उसका कोई फोन आया.. एक साल तक जब उसका कोई पता न चला तब मैंने अपने ऑफिस के साथी से शादी कर ली.. तुम देख ही रहे हो की वो मुझे और रोजी को कितना चाहता है.. !! पर रोजी के जनम के बाद उसके बर्ताव में काफी परिवर्तन आया है.. खैर वो बात फिर कभी.. कल मुझे पीटर मिला मार्केट में.. मैं उसे देखकर चोंक गई.. उसने मुझे अपना नंबर दिया और चला गया.. मैं बड़ी उलझन में हूँ.. कॉल करूँ या ना करूँ!! क्या तुम उसे कॉल करके सारी बात जान सकते हो?? मैं उसे बेहद प्यार करती हूँ पर अब मेरी शादी हो गई है इसलिए मेरा उससे संपर्क करना उचित नही होगा.. पर मैं सिर्फ इतना जानना चाहती हूँ की वो आखिर कहा चला गया था मुझे बिना कुछ बताएं.. जाते जाते उसने कहा था की वो मुझे मिलना चाहता है.. मैं भी उससे मिलना चाहती हूँ मगर मेरे पति के डर से ऐसा नही कर पा रही हूँ.. आपको मित्रभाव से ये बता दूँ.. रोजी के जनम के बाद उसे मेरे में कोई रुचि ही नही रही है.. मैं बहोत असन्तुष्ट हूँ.. पता नही क्यों मेरे साथ ठीक से बात भी नही करते.. ऐसे में अगर मैं पीटर से मिलने गई और कहीं पुरानी बातों की याद आ गई तो मैं अपने आप को रोक नही पाऊँगी.. मैं अपने पति से बहोत प्यार करती हूँ पर मेरे प्यार को भी ठुकरा नही सकती.. और उसे अभी तक भूल नही पाई.. जैसे आप अपनी पत्नी को नही भूल पाए बिल्कुल वैसे ही.. मेरे दिल की कशमकश को आप समझ सकेंगे.. मिस्टर मदन.. वो एक हफ्ते में चला जाने वाला है.. मेरा उससे मिलना जरूरी है.. अगर अभी नही मिली तो उसके सारे राज, राज बनकर ही रह जाएंगे.. प्लीज तुम मेरी हेल्प करो..' "

मदन की बात को शीला बड़े ध्यान से सुन रही थी.. उसे ये जानने में दिलचस्पी थी की आखिर दोनों के बीच चुदाई शुरू कैसे हुई!! अभी तो उसकी चूत में मजेदार खुजली हो रही थी और मदन का सख्त लंड अंदर बाहर करते हुए वो अपनी खुजाल मिटा रही थी.. सुकून से चुदवाने में शीला को बहोत मज़ा आ रहा था..

वैसे देखा जाएँ तो शीला और मदन के बीच आदर्श संभोग हो रहा था.. परिपक्व उम्र के संभोग और नादान उम्र के संभोग में यही फरक होता है.. अनुभवी संभोग में दोनों पात्र इतने मेच्योर होते है.. की किसी पराए पात्र संग हुए संभोग को भी बड़ी निखालसता से याद कर सकते है.. और विकृतियों का भी आनंद ले सकते है.. जब की नादान उम्र का संभोग.. रस्सी पर बिना सहारे चलने जितना कठिन काम होता है.. नादान पात्रों को संभोग के दौरान कब किस बात का बुरा लग जाएँ.. पता ही नही चलता.. एक छोटी से गलतफहमी ही काफी होती है पूरे संभोग की माँ चोद देने के लिए.. दोनों पात्र करवट बदलकर सो जाते है और एक रात कम हो जाती है






शीला के भव्य कूल्हों को हाथों से दबाते हुए मदन ने बात आगे बढ़ाई

"शीला, उस दिन वो पहली बार मेरी नजदीक आकर खड़ी हुई.. उसके दूध से भरे हुए सुंदर रसीले बबलों को इतने करीब से मैंने पहली बार देखा था.. और तुझे पता है.. ये एक ऐसा आकर्षण है जिसके लिए मैं कुछ भी कर सकता हूँ.. मैंने हिम्मत की और मेरी से कहा 'मैं आपकी हेल्प कर सकता हूँ पर बदले में आपको मेरी एक हेल्प करनी होगी.. मैं अपनी बीवी को याद करते हुए मास्टरबेट कर रहा था कल.. तब तुमने देख लिया था.. मुझे दूरबीन से देखते हुए ये सब क्यों करना पड़ता है ये जानती हो तुम? वैसे चाहता तो ब्लू फिल्म भी देख सकता हूँ' तब मेरी ने मुझे जवाब दिया की 'हाँ.. मुझे पता है.. तुम्हें असली चीज देखकर ही मज़ा आता है.. ' मेरी बात को अच्छे से समझती थी.. मैंने कहा 'बिल्कुल सही कहा मेरी.. आप अपनी बेटी रोजी को फीडिंग कराने के लिए किचन में बैठती हो.. और मैं यहाँ बालकनी में काम करता हूँ.. तो क्यों न ऐसा किया जाए की तुम ड्रॉइंग रूम में बैठकर ही बच्ची को दूध पिलाओ और तुम्हारी बॉडी को देखकर मैं अपना काम निपटा लूँ?? मैं प्रोमिस करता हूँ.. तुम्हें टच नही करूंगा' "

शीला: "अरे वाह मदन.. जबरदस्त दांव खेला तूने.. तुझे पता था की तेरे इस खूँटे जैसे लंड को एक बार देख लेने के बाद मेरी तो क्या.. उसकी माँ भी तुझसे चुदवाने में मना नही करती.. खिलाड़ी है तू तो.. " शीला धीरे धीरे लय में आकर अपनी गांड को मदन के लंड पर गोल गोल घुमा रही थी और अपनी चूत का मक्खन गिरा रही थी






मदन: "अरे यार.. तीन महीनों से मैं उसे दूध पिलाते देखने के लिए छुप छुपकर कोशिश करता था.. अब ऐसा मौका मिल गया तो मैंने पूछ लिया.. इसमें गलत क्या है.. !!"

शीला: "हाँ हाँ साले कमीने.. मेरी की चूत में लंड डाल आया और कहता है की गलत क्या है.. !! मैं भी तेरी तरह ऐसा कुछ करूँ और कहूँ की इसमे गलत क्या है, तो चलेगा?"

मदन: "हाँ उसमें भी कुछ गलत नही होगा.. बस किसी के साथ जबरदस्ती करना गलत है.. बाकी सब चलता है.. जब मियां बीवी राजी तो क्या करेगा काजी.. !!"

शीला ने मदन के होंठों पर एक कातिल किस की और जबरदस्त दस-पंद्रह धक्के लगाए.. मदन की बातें सुनकर उसकी चूत में जो भूकंप आया था वो थोड़ा सा शांत हुआ.. और वो फिर से अपनी रिधम में आ गई.. शीला चाहती थी की उसका ऑर्गैज़म तभी हो जब मदन अपनी बात खतम करे.. नही तो चुदाई के अंतिम क्षणों में इतनी रसीली कथा अधूरी रह जाएगी.. साथ ही साथ वह ये सावधानी भी रख रही थी की कहीं मदन उत्तेजित होकर बीच में ही झड़ न जाएँ

शीला: "फिर क्या जवाब दिया मेरी ने?"

मदन: "अपने पुराने प्रेमी पीटर से मिलने के लिए वह इतनी बेचैन थी की अगर मैंने उसे चोदने के लिए कहा होता तो वो भी मान जाती.. पर मैं तुझसे धोखा करना नही चाहता था शीला.. इसीलिए मैंने मेरी को दूध पिलाते देखकर मूठ मारने की पेशकश की.. अगर चाहता तो उसके बॉल दबाने की डिमांड भी कर सकता था और वो मान भी जाती.. "

शीला: "तो रखनी थी ना डिमांड? क्यों नही रखी?" शीला भी मदन के सुर में साथ दे रही थी "मदन, सच सच बताना.. वैशाली के जनम के बाद जैसे तू बार बार मेरी छातियाँ चूसने की जिद करता था वैसे ही मेरी के पीछे पड़ गया था क्या?? आखिर थककर उसने तुझसे चुदवा लिया होगा"

मदन: "अरे मेरी रानी.. ऐसा कुछ नही हुआ था.. " शराब के ग्लास का आखिरी घूंट हलक के नीचे उतारते हुए मदन ने कहा

शीला और मदन एक ही ग्लास में से पी रहे थे.. और दूसरा ग्लास भरा हुआ पड़ा था.. खाली ग्लास को दूर धकेलकर शीला ने मदन के नग्न शरीर पर सवारी करते हुए भरा हुआ ग्लास उठाया.. एक घूंट भरा और सिगार का एक कश लिया.. एक के बाद एक.. दोनों ने तीन सिगार खतम कर दी थी अब तक.. सिगार खतम हो जाती थी पर पति पत्नी के बीच का रोमांस अभी भी प्रज्वलित था.. मदन के लंड को अपने तरीके से आराम पूर्वक भोग रही थी शीला.. पिछले पौने घंटे से उसकी लंड सवारी चल रही थी.. जाहीर था की मदन को उसके शरीर का वज़न महसूस हो रहा था.. भारी भरकम थी शीला.. पर लंड को इतना आनंद मिल रहा था की उसके सामने ये तकलीफ तो कुछ भी नही थी.. शीला की सुंदर बड़ी छातियों में मेरी के स्तन नजर आ रहे थे मदन को






मदन ने शीला का सिगार वाला हाथ अपने मुंह तक खींचा और एक जबरदस्त दम भर लिया.. मुंह से धुआँ छोड़ते ही उस धुएं की चादर के पीछे शीला के स्तन छुप गए.. दो-तीन सेकंड में ही धुआँ फैल गया और उसके पसंदीदा स्तन वापिस नजर आने लगे..

मदन: "मेरी के कहने के मुताबिक मैंने उसके प्रेमी पीटर को फोन किया.. और उसे मेरी ऑफिस पर मिलने बुलाया.. मैंने उसे सब बता दिया की मैं मेरी का पेइंग गेस्ट हूँ और उसके पति से छुपकर उनके मिलने का सेटिंग कर रहा हूँ.. उसने आभार प्रकट किया.. ऑफिस में मेरी कैबिन सब से आखिर में थी.. और जब तक बेल दबाकर बुलाऊँ नही तब तक पयुन आता भी नही था.. इसलिए मुझे कोई चिंता नही थी.. मेरी ने मुझे ये भी कहा था की उनकी मीटिंग के वक्त अगर मैं मौजूद रहूँगा तो पीटर मेरे साथ कोई हरकत नही करेगा..वरना एक बार अगर पीटर ने मुझे छु लिया तो मैं अपने आप को रोक नही पाऊँगी.."

शराब के घूंट भरते हुए शीला बड़े ध्यान से सुन रही थी.. शीला को इतनी मस्ती से सुनते हुए देखकर मदन खुल गया और सारी बातें बताने लगा.. उसे यकीन हो गया था की शीला इस बात को धोखा नही समझ रही.. उल्टा मजे लेकर सुन रही है..

"शाम को लगभग साढ़े पाँच बजे सारा स्टाफ जाने की तैयारी में था.. तभी मेरी अपनी बेटी रोजी के साथ ऑफिस पहुंची.. उसके पीछे पीछे पीटर भी आ पहुंचा.. बहोत समय के बाद मिल रहे दो प्रेमियों को कभी देखा है तूने शीला?"

शीला ने गर्दन हिलाकर "ना" कहा

"बड़ा अनोखा होता ही वो द्रश्य.. इतना प्रेम.. इतने जज़्बात.. मेरी पीटर को देखकर जो रोई थी.. जो रोई थी.. तुझे क्या बताऊँ यार.. !! देखकर मेरी आँखों में आँसू आ गए.. मैं सोच रहा था की इतना प्यार करने वाले को ऊपर वाला क्यों जुड़ा करता होगा.. !! मेरी कैबिन में आकर वो दोनों एक दूसरे को किस करने लगे.. गले लगाने लगे.. फिर अचानक मेरी ने पीटर के लंड पर हाथ रख दिया.. फिर दोनों ने अंग्रेजी में क्या गुसपुस की ये तो पता नही चला पर मैं इतना समझ पाया की मेरी पीटर से एक आखिरी बार चुदना चाहती थी.. मैं समझ गया.. और रोजी को गोद में उठाकर बाहर चला गया.. उस दौरान दोनों ने अपना काम खतम कर लिया.. फिर पीटर तुरंत चला गया.. और उसके जाने के बाद मेरी हालत खराब हो गई.. पीटर ने चोदते हुए मेरी के बबलों को जोर से दबाया होगा.. सारा दूध निकल रहा था..






उसका पूरा टॉप भीग गया था.. ये देखते ही मेरा लंड खड़ा हो गया.. बार बार उसके स्तनों पर नजर जाती.. मेरी शरमा रही थी.. और बोली 'जो काम में नही करना चाहती थी वो मुझसे हो गया.. आई एम सॉरी.. तुमने अपना काम कर लिया और अब मैं आज शाम को तुम्हारी इच्छा पूरी कर दूँगी.. जब तुम कहोगे.. ठीक है.. अब मैं चलूँ?'"

"तो फिर तूने अपने खड़े लंड का क्या किया? उसे जाने क्यों दिया?"

"अरे मैं पागल थोड़ी न हूँ.. मैंने मेरी से कहा..जब तुम अपने आप पर कंट्रोल न कर पाई तो मैं अपने आप पर अब कंट्रोल कैसे कर सकता हूँ? प्लीज तुम यहीं पर रोजी को दूध पिलाओ.. मैं देखते हुए अपना काम निपटा लूँगा.. मेरी बड़े ही संकोच के साथ कैबिन के सोफ़े पर बैठ गई और टॉप को ऊपर करने लगी.. मैंने पेंट से अपना लंड बाहर निकाल लिया.. मेरी को मेरा लंड नही दिख रहा था क्योंकि बीच में मेरा ऑफिस टेबल था.. जैसे ही मेरी ने अपना एक बबला बाहर निकाला.. और मेरे लंड ने पिचकारी मार दी.. पूरे इक्कीस महीनों के बाद मैंने खुला स्तन देखा था.. मैं इतनी जल्दी झड गया ये देखकर मेरी को ताज्जुब हुआ.. पर उसने मुझसे कोई सवाल नही किया और वहाँ से चली गई"






इस रोचक कहानी को सुनकर शीला सिहर उठी.. मदन के लंड पर उसके भारी कूल्हें पटक पटककर उसके लंड की चटनी बनाने लगी.. मदन भी मेरी के स्तनों का वर्णन करते हुए उत्तेजित होकर शीला के मदमस्त उरोजों का मसल मसलकर नीचे से अपनी गांड उछालकर शीला को सहयोग दे रहा था.. मेरी की सूक्ष्म हाजरी को दोनों उस कमरे में महसूस कर रहे थे.. सिगार जैसे जैसे खतम हो रही थी.. वैसे ही शराब और शीला की उत्तेजना भी अपने अंतिम चरण पर पहुँच रही थी.. ज्यादातर पुरुष हमेशा एक्टिव पार्टनर होता है और स्त्री पेसिव रहती है.. पर काफी पुरुषों के ये अंदाजा नही होगा की पेसिव पार्टनर बनकर स्त्री के सामने घुटने टेक देने में कितना मज़ा आता है

संभोग.. !!! कितना सुंदर शब्द है.. आह.. !!

इस एक ही शब्द में अपने साथी को तृप्त करने का भाव छुपा हुआ है.. सम + भोग = संभोग.. जिसमे दोनों पात्रा समान तरीके से भोग का आनंद ले उसे संभोग कहते ही.. अत्यंत प्रेम हो तो ही अपने साथी की भूख को.. केवल चेहरा देखकर पहचान सकते है.. वरना ऐसे लोगों की भी कमी नही है जिनके सामने पत्नी दांतों तले होंठ दबाते हुए इशारा करे फिर भी वो पागल इंस्टाग्राम की रील्स ही देखता रहे..

शीला की हवस अब सारी हदें पार कर चुकी थी.. मेरी के दूध भरे स्तनों की बात.. शराब और सिगार का संग.. और साथ में मदन का कडक लंड.. सब से ऊपर था.. उन दोनों के बीच का प्रगाढ़ प्रेम.. और संवादों का सेतू.. एक आदर्श जोड़ी थी शीला और मदन की

आदर्श जोड़ी कीसे कहते है?

दोनों आपस में जो मन में हो वो बेझिझक कह सके.. गलतफहमियों के लिए कोई स्थान न हो.. बिना कहें बहुत कुछ समझ ले.. वही होती है आदर्श जोड़ी.. इस आदर्शता को प्राप्त करने के लिए अगर कोई चीज सब से जरूरी होती है तो वो है.. एक दूसरे के प्रति अंधा विश्वास.. बदनसीबी से आजकल के जोड़ों के बीच जो विश्वास होता है वो नकली घी जैसा.. देखने में तो पौष्टिक होता है पर अंत में हार्ट अटैक ही देता है.. शुरू शुरू में जो कपल.. Made for each other नजर आता है.. वो थोड़े समय के बाद.. अपेक्षाओं के बोझ के तले दबकर.. एक दूजे से असन्तुष्ट रहने लगता है.. विश्वास डगमगा जाता है और अविश्वास की खाई में गिर पड़ते है..

सुबह के साढ़े चार बजे तक शीला और मदन.. मेरी की बातें करते हुए संभोग और शराब की महफ़िल में मशरूफ़ थे.. शीला ने मदन के लंड को अपने भोसड़े में दबोच रखा था.. उसका सारा वीर्य निचोड़ लिया था.. मदन शीला के जिस्म को अपनी भुजाओं में जकड़कर थोड़ी देर सो गया.. और उसी के साथ शीला के शरीर पर भी निंद्रा का असर होने लगा था.. शराब का नशा.. सिगार का नशा और सब से बड़ा.. संभोग की पराकाष्ठा का नशा..






संभोग की पराकाष्ठा का अर्थ क्या होता है?

योगी पुरुष सालों की तपस्या के बाद समाधि में जिस अवस्था को महसूस करते है उसी अनुभूति को स्त्री और पुरुष भी ऑर्गजम के वक्त महसूस करते है.. प्राणायाम का शिखर, समाधि होती है.. वैसे ही संभोग का शिखर उसकी पराकाष्ठा होती है.. पराकाष्ठा.. !! संसार को त्यागकर सिर्फ आत्मकेंद्री बनकर.. सामाजिक जिम्मेदारियों से डर कर जो सन्यास लेते हुए उसे पलायनवाद कहते है..

असल सन्यासी तो वो होता है जो संसार में रहकर अपनी पत्नी और बच्चों की एक मुस्कान के लिए.. उनके सुख चैन के लिए रात दिन काम करता है.. लोन की किश्तें भरता है.. इसीलिए ऊपर वाले ने.. बड़ी ही ईमानदारी से सांसारिक जीवन जी रहे स्त्री और पुरुषों को ऑर्गजम रूपी समाधि अवस्था की भेंट दी.. जो किसी पलायनवादी को सालों की तपस्या के बाद भी प्राप्त नही होती.. किसी दंभी सन्यासी के मुकाबले.. हर रात पति के सर में प्यार से उँगलियाँ फेरती.. उसके लंड पर चूत दबाती पत्नी.. या पत्नी की चूत में आखिरी धक्के लगाकर परम सुख पाता हुआ पति.. कुदरत को शायद ज्यादा प्रिय होते है.. क्यों की उनकी प्रजोत्पति के कारण ही तो सृष्टि इतनी आगे तक पहुंची है.. अगर हर कोई सन्यास लेकर संसार त्याग दे तो प्रजोत्पति का क्या होगा? नसलें आगे कैसे बढ़ेगी? जिसका व्यवहार शुद्ध होता है उसे ही परमार्थ प्राप्त होता है.. बाकी सारा भ्रम ही है

इतना उत्तम कामसुख भोगने के बाद नींद आने में ज्यादा देर नही लगती.. दोनों गाढ़ी नींद सो रहे थे तभी डोरबेल बजी.. शीला को डोरबेल की आवाज बड़ी सुहानी लगी.. और क्यों न लगती.. मदन की गैर-मौजूदगी में इसी आवाज के सहारे तो उसने दिन और रात काटे थे.. !! लड़खड़ाते हुए आधी नींद में.. और पूरे नशे में शीला नंगी ही खड़ी हुई.. अगर सारे कपड़े पहन ने जाती तो रसिक डोरबेल बजा बजा कर मदन की नींद खराब करता.. इसलिए उसने कल रात का.. संजय वाला टॉप पहन लिया.. और जाकर दरवाजा खोला.. सामने रसिक खड़ा था.. हाथ में दूध का कनस्तर लेकर खड़ा रसिक.. शीला के दूध के कनस्तर देखकर चकित हो गया.. उसने शीला को इस रूप में देखने की कभी कल्पना भी नही की थी.. असल में पिछले काफी दिनों से उसने शीला को देखा ही नही था..

"अरे भाभी.. आप कहाँ थे इतने दिनों से?? और ये क्या पहना है? जबरदस्त लग रही हो.. " रसिक ने होंठों पर अपनी जीभ फेरते हुए कहा






"चुप मर रसिक.. अब मैं अकेली नही हूँ.. तेरा बाप आ गया है.. अंदर सो रहा है.. इसलिए तू लिमिट में रहना.. और अपने लोड़े को भी रोज रोज घुसाने की जिद मत करना.. वरना तकलीफ हो जाएगी.. एक लीटर दूध दे और चलता बन.. और सुन.. मैं जल्द ही कुछ सेटिंग करती हूँ.. उतावला होकर कोई गलती मत करना.. समझा.. !! मेरी इशारे का इंतज़ार करना.. जब तक मैं ना कहूँ तब तक तू मुझसे बात करने की भी कोशिश मत करना "

उदास होकर रसिक ने कहा "ठीक है भाभी.. जैसा आप कहो" इतना जबरदस्त माल ऐसे ही हाथ से चला जाएगा ये सोचा नही था रसिक ने.. इतने दिनों के बाद आज भाभी नजर आई.. और ऐसे सेक्सी टॉप में.. उसे आशा थी की आज कुछ तो होगा.. पर ये तो सब कुछ खोने की नोबत आन पड़ी थी.. रसिक का मुंह लटक गया.. शीला से ये देखा न गया.. उसने रसिक के पाजामे में हाथ डालकर उसका लंड पकड़ लिया और थोड़ी देर सहलाते हुए उसके बगल में खड़ी रही.. रसिक का हाथ पकड़कर अपने बोबले पर रखते हुए बोली

"क्या तू छोटे बच्चों की तरह रूठ गया?? मैंने कहा ना की कुछ सेटिंग करूंगी जल्दी है.. ले अब दबा ले थोड़ी देर और फिर निकल.. मेरा पति विदेश से लौट चुका है.. अंदर सो रहा है" शीला ने एक सांस में ही बोल दिया..

रसिक शीला के बबलों को टॉप के ऊपर से ही दबाकर बोला "आह्ह भाभी.. आपको क्या पता.. मुझे क्या क्या हो रहा है.. !! आप तो मुझे बीच रेगिस्तान में भूखा प्यासा छोड़कर चले जाने की बात कर रही हो.. फिर मेरे इस लोड़े का क्या होगा??"








"तो तेरी बीवी रूखी है ना.. तेरे इस लोड़े के धक्के खाने के लिए.. उसे चोदता नही है क्या? मना करती है क्या तुझे? वो वहाँ भूखी प्यासी बिलखती रहती है और तू यहाँ मेरे चक्कर में पड़ा है"

"नही भाभी.. उसे गरम करके संभालना मेरे बस की बात नही है.. उसे तो उसका मायके वाला दोस्त जीवा ही शांत कर सकता है"

शीला चोंक गई.. "मतलब? तू जानता है सब कुछ?" तभी उसे बेडरूम से मदन के उठने की आवाज आई.. शीला ने रसिक का लंड छोड़ दिया और अपने स्तनों से उसका हाथ हटा दिया.. उसे धकेलकर बाहर करते हुए उसने दरवाजा बंद कर दिया..

सच में.. मदन जाग गया था.. अच्छा हुआ जो रसिक चला गया..

मदन नंगा ही शीला की तरफ आया और बोला "गुड मॉर्निंग मेरी जान.. !! किसके साथ बात कर रही थी सुबह सुबह?"

"लगता है कल रात की तुझे उतरी नही अब तक.. देख रहा है ना.. दरवाजा बंद है.. तुझे क्या लगा.. ये बंद दरवाजे से मैं किसी का लंड पकड़कर हिला रही थी?? पागल.. मैं तो ऐसे ही गाना गा रही थी"

"मज़ाक कर रहा हूँ यार.. मैं तो पेशाब करने के लिए उठा था.. देख.. क्या हालत कर दी तूने मेरे लंड की? सुखी भिंडी जैसा हो गया है.. दो साल की कसर एक रात में निकाल दी तूने.. " शीला के स्तन पर चिमटी काटते हुए प्यार से मदन ने कहा और बाथरूम की तरफ चला गया..

शीला सोच रही थी.. मेरी के दूध भरे स्तनों को याद कर के मेरे बबलों की माँ चोद दी कल रात.. जरा सा चांस मिला नही की मेरे बॉल पर टूट पड़ता है.. जब इतने पसंद थे तो दो साल तक छोड़कर क्यों गया था??

शीला दूध की पतीली लेकर किचन में आई.. गेस जलाकर उसने दूध गरम करने के लिए रख दिया.. किचन की खिड़की खोलते ही उसने देखा.. अनुमौसी और रसिक हंस हँसकर बातें कर रहे थे.. रसिक उनकी पतीली में दूध भर रहा था..

अनुमौसी को देखकर.. उनकी की हुई अरज याद आ गई शीला को.. और उसके दिमाग में एक चिनगारी हुई

रसिक रोज अपनी साइकिल शीला के घर के पास रखकर अनुमौसी के घर दूध देने जाता था.. फिर दूध देकर वापिस शीला के घर से साइकिल लेकर आगे निकल जाता.. शीला ने सोचा.. रसिक के लोड़े के चक्कर में.. मुख्य बात तो बताना भूल ही गई.. मदन जल्दी बाथरूम से निकलकर सो जाए तो अच्छा.. रसिक साइकिल लेने आएगा तब उसे बता दूँगी.. और वैसा ही हुआ.. बाथरूम से निकलकर मदन वापिस बिस्तर पर लेट गया. शीला किचन के दरवाजे से बाहर आई और अपने घर के मैन गेट पर खड़ी हो गई.. अभी भी काफी अंधेरा था.. रसिक की साइकिल के पास जाकर वो उसका इंतज़ार करने लगी.. जैसे ही रसिक आया.. सब से पहले तो शीला ने उसे पकड़कर किस कर दी.. और लंड को पकड़कर खेल लिया.. रसिक के लंड को शीला कभी भूल नही सकती थी.. इसी लंड ने ही अकेलेपन में उसकी खुजली मिटाई थी.. !!

"भाभी, आप यहाँ क्यों आई? वो भी मेरी साइकिल के पास?" रसिक को आश्चर्य हुआ

"रसिक, तुझे एक बात बताना भूल गई थी इसलिए आई हूँ"

"हाँ बताओ ना भाभी"

"रूखी को बोलना की कल दोपहर से पहले मुझे मिलने आए.. मुझे कुछ काम है उसका"

"हाँ हाँ जरूर भेज दूंगा.. आज ही भेज दूँ?.. आप कहों तो मैं आ जाऊँ.. आपका जो भी काम होगा, निपटा दूंगा" नटखट अंदाज में हँसते हुए रसिक ने कहा

"अरे बेवकूफ, तेरा काम तो मुझे पड़ेगा ही.. पर अभी नही.. जब जरूरत पड़ेगी और मौका मिलेगा तब बुलाऊँगी.. आ जाना.. वैसे तो मैं रूखी को आज ही बुलाने वाली थी पर आज हम शहर से बाहर जाने वाले है.. इसलिए उसे कल भेजना.. "

"ठीक है भाभी.. " शीला वापिस घर के अंदर जाने लगी..

रसिक: "एक मिनट भाभी!!"

शीला ने पलटकर पूछा "अब क्या है?"

रसिक: "भाभी, अभी भी काफी अंधेरा है.. थोड़ी देर चूस देती तो.. कितने दिन हो गए!! आप को तो याद नही आती होगी पर मैं रोज याद करता हूँ"

शीला: "जा जा नालायक.. यहाँ बीच सड़क पर मैं पागल हूँ जो तेरा लोडा चुसूँगी?? भड़वे, एक दिन तू भी मरेगा और मुझे भी मरवाएगा.. "

रसिक का चेहरा उतर गया.. शीला वापिस जाने लगी.. और फिर से पलटकर रसिक की ओर आई

"तेरा उतरा हुआ चेहरा मुझसे देखा नही जाता " घुटनों पर बैठकर उसने कहा "बात बात पर लड़कियों की तरह रूठ जाता है तू.. " एक ही पल में उसने पाजामे से रसिक का लंड बाहर निकाला और तेजी से मुंह में डालकर अंदर बाहर करने लगी..








रसिक को मज़ा आ गया.. एक ही मिनट में उसका लंड मूसल सा हो गया.. खड़े लंड को देख शीला से रहा न गया.. रसिक के आँड मुठ्ठी में पकड़कर मसलते हुए वो ऐसे चूसने लगी की रसिक की आँखों का आगे अंधेरा छा गया.. पर मदन के डर से शीला झड़ने तक चूस नही पाई.. रसिक का स्खलन होने ही वाला था तभी मुंह में से लंड निकालकर घर भाग गई.. चकराया हुआ रसिक देखता ही रह गया.. डंडे जैसा लंड हाथ में लिए हुए!!

किचन में आकर शीला ने धीरे से अपने बेडरूम में देखा.. मदन अभी भी शराब के नशे में सो रहा था.. शीला को देखकर राहत हुई.. चलो सब कुछ ठीक तरीके से हो गया.. बुरे समय में रसिक ने ही मेरे जिस्म की आग बुझाकर बाहर मुंह मारने के जोखिम से बचाया था.. उसे नाराज कैसे करती!!

चाय को गेस की धीमी आंच पर उबालने के लिए रखकर वो बाथरूम में नहाने के लिए चली गई.. नहा-धो कर एकदम टंच माल बनकर आईने के सामने खड़ी हो गई.. मांग में सिंदूर भरते वक्त वो सोच रही थी.. किसके नाम का सिंदूर अपनी मांग में भरूँ ?? मदन के नाम का.. या पीयूष के.. या जीवा के.. या रघु के.. या रूखी के ससुर के नाम का.. या पिंटू के नाम का.. या संजय कुमार के नाम का.. या फिर उस हाफ़िज़ के नाम का.. हम्म या फिर जॉन के नाम का??? जॉन की गिनती ना करे तो चलता क्योंकि वो तो सिर्फ मेहमान था..






तभी रेडियो पर गाना बजा...

♬⋆.˚ "यूं ही कोई.. मिल गया था.. ♫♫ सरे राह चलते चलते.. सरे राह चलते चलते..𝄞⨾𓍢ִ໋♬⋆.˚𝄢ᡣ𐭩 "



सुनकर अपनी हंसी रोक न पाई शीला.. !!
 
चाय को गेस की धीमी आंच पर उबालने के लिए रखकर वो बाथरूम में नहाने के लिए चली गई.. नहा-धो कर एकदम टंच माल बनकर आईने के सामने खड़ी हो गई.. मांग में सिंदूर भरते वक्त वो सोच रही थी.. किसके नाम का सिंदूर अपनी मांग में भरूँ ?? मदन के नाम का.. या पीयूष के.. या जीवा के.. या रघु के.. या रूखी के ससुर के नाम का.. या पिंटू के नाम का.. या संजय कुमार के नाम का.. या फिर उस हाफ़िज़ के नाम का.. हम्म या फिर जॉन के नाम का??? जॉन की गिनती ना करे तो चलता क्योंकि वो तो सिर्फ मेहमान था..



"यूं ही कोई.. मिल गया था.. सरे राह चलते चलते.. सरे राह चलते चलते.. "

अपनी हंसी रोक न पाई शीला..

"अकेले अकेले हंस क्यों रही है, शीला?" मदन ने जागकर रिमोट से टीवी चालू किया और म्यूज़िक चेनल लगाई.. टीवी पर कोई गाना बजने लगा

"ये गाना सुनकर मुझे वो विदेशी मेरी और तेरी पौष्टिक चुदाई याद आ गई" शीला ने कहा

"पौष्टिक चुदाई?? वो भला कैसे होती है?" मदन ने आश्चर्य से पूछा

"अरे पागल.. दूध का आहार तो पौष्टिक ही होता है ना.. मेरी का दूध चूसते हुए तूने चोदा था.. तो हो गई ना पौष्टिक चुदाई.. !!" कहते हुए हंसने लगी शीला

शीला ने चालाकी से मदन का ध्यान भटका दिया.. औरतें अपने पतियों को कितनी आसानी से चोदू बना सकती है.. !! दुनिया भर के सारे पति यही सोचते है की उनकी पत्नी सती-सावित्री है.. और वो उनके अलावा किसी और के बारे में नही सोचती.. वैसे पिछली सदी तक ये बात सच भी थी.. पर जैसे ही पश्चिमी हवा का रंग चढ़ने लगा.. तबसे माहोल में तबदीली आ गई है.. और बाकी की कसर मोबाइल ने पूरी कर दी.. एक जमाने में नग्नता चार दीवारों के बीच.. बंद कमरे में देखी जाती थी.. अब तो खुलेआम देखी जा सकती है.. हाईवे पर पार्क गाड़ी के अंदर.. बाग-बगीचे में.. सिनेमा हॉल के अंदर.. हॉटेलों में.. घूमने फिरने की जगहों पर.. पहले के जमाने में स्त्री अपने पति के सामने घूँघट उठाने में भी शरमाती थी.. और आज कल की मॉडर्न लड़कियां.. अपना टॉप उतारने में भी झिझकती नही है.. नौजवान पीढ़ी अपनी उत्तेजना को भी बड़ी ही आसानी से व्यक्त कर लेती है.. वैसे पहले के समय में भी ये सब था पर काफी सीमित मात्रा में.. आज कल जो काम हाईवे पर पार्क गाड़ियों में होता है.. वह पहले खेत की झाड़ियों में होता था.. समय बदला है.. पर हवस वैसे की वैसी ही है.. !!

शीला: "मदन, हमें कविता के मायके जाना है.. वैशाली को लेने.. याद है ना.. !! अगर नही जाएंगे तो लड़की कोहराम मचा देगी.. कविता भी हमारे साथ आने वाली है"

मदन: "कविता कल ही क्यों नही चली गई?? उसे उनके साथ ही जाना चाहिए था.. "

शीला: "अरे पागल.. हमने कविता का घर देखा नही है.. इसलिए वो हमारे साथ आने वाली है.. अकेले जाने में हमें संकोच भी होता.. वो तो बेचारी हमारे भले के लिए रुक गई थी.. अच्छा हुआ.. इस बहाने गाड़ी में उसके और पीयूष के प्रॉब्लेम के बारे में डिस्कस भी कर लेंगे"

मदन: "हाँ, वो भी सही है.. कितने बजे निकलना है? दस बजे निकलें??"

शीला: "अब मुझे क्या पता यार.. की कविता का मायका कितना दूर है? मैं तो दस सालों से अपने खुद के मायके नही गई हूँ.. !!"

"वैसे तेरे मायके में, है भी कौन, जाने के लिए?" शेविंग ब्रश पर क्रीम लगाते हुए मदन ने कहा

शीला: "क्यों नही है.. !! माँ बाप मर गए मतलब सब से रिश्ता कट गया क्या मेरा?? मेरी सगी बहन तो है ना.. !! जब तू विदेश में उस मेरी की चूत में घुसा हुआ था तब उसने ही मेरा खयाल रखा था.. समझा.. !! तुम्हें तो उसे शुक्रिया कहना चाहिए"

मदन: "तेरी बहन मोहिनी को तो मैं गले लगाकर पर्सनली थेंक्स कहूँगा.. आखिर मेरी साली है.. उसके साथ तो मुझे भी ढेर सारी बातें करनी है"

शीला और मदन बातों में व्यस्त थे तभी कविता आई.. उसके हाथ में गरमागरम पकोड़े की प्लेट थी.. "अंकल, मम्मी जी ने खास आपके लिए भिजवाएं है.. एकदम गरम है.. अभी खा लीजिए.. ठंडे हो जाएंगे फिर मज़ा नही आएगा" एकदम सीधे मतलब से कविता ने कही हुई बात का उल्टा अर्थ निकालकर शीला और मदन दोनों हंसने लगे.. उनको हँसता देख कविता को भी एकदम से खयाल आया की उसकी बात का कौनसा मतलब निकाला गया था.. वो भी शरमा गई..

वैसे शीला के साथ तो वो हर किस्म की बात कर सकती थी.. पर मदन के सामने ऐसा करना मुमकिन नही था.. वो मदन को अभी अभी ही तो मिली थी.. जब वो शादी करके आई तब से मदन विदेश था..

शीला ने कविता को आँख मारकर हँसते हुए कहा "हाँ सही बात है.. कोई भी चीज गरम हो तभी मज़ा आता है.. एक बार ठंडी हो जाएँ फिर कोई मतलब नही रहता.."

अब कविता की हालत खराब हो गई.. बेचारी मदन की मौजूदगी में बहोत ही शरमा गई.. एक तो मदन अनजान भी था.. और उससे उम्र में काफी बड़ा भी..

उसने तुरंत बात बदल दी.. "मैँ चलूँ भाभी?? आप खा लेना" शर्म से लाल चेहरे के साथ वो बाहर जाने लगी तभी शीला ने उसे आवाज दी "कहाँ जा रही है.. !! सुन तो ले मेरी बात"

रुक गई कविता.. और मुड़कर शीला की तरफ देखते हुए बोली "हाँ भाभी बताइए.. क्या बात है ?"

"यहाँ आ.. और बैठ जा.. मुझे एक काम है तुझसे " आदेशात्मक आवाज में शीला ने कहा

"भाभी.. गैस पर सब्जी रखकर आई हूँ.. अभी नही बैठ सकती" कविता ने कहा

"नही.. तू बैठ.. मैं फोन कर देती हूँ अनुमौसी को.. वो गेस बंद कर देगी.. यहाँ बैठ जा शांति से.. जब भी आती है, भागी-भागी ही आती है!! " शीला ने हाथ पकड़कर कविता को सोफ़े पर बैठा दिया..

मदन ने शेविंग कर ली थी.. मुंह धोकर वो भी कविता के सामने बैठ गया..

"अब ये पकोड़े खाने में, तू भी हमें कंपनी दे.. " एक पकोड़ा कविता के हाथ में देते हुए शीला ने कहा

शीला: "तेरा मायका यहाँ से कितना दूर है? कितने बजे निकलना चाहिए?"

कविता: "डेढ़-सौ किलोमीटर दूर है.. साढ़े नौ को निकलें तो साढ़े बारह तक पहुँच जाएंगे.. और वहाँ से शाम के ६ बजे निकलेंगे.. तो साढ़े नौ बजे तक घर वापिस.. "

मदन: "हाँ.. वैसे ही ठीक रहेगा "

कविता: 'ठीक है.. तो आप लोग तैयार हो जाइए अंकल.. मैं नौ बजे आ जाऊँगी.. पीयूष ने अपने एक दोस्त की कार मँगवाई है.. आप ड्राइव कर लोगे ना अंकल?"

मदन: "हाँ हाँ.. बड़े आराम से.. विदेश जाकर सब सिख गया हूँ.. कोई भी गाड़ी हो.. चला लेता हूँ"

शीला: "हाँ कविता.. मदन विदेश जाकर सब तरह की गाड़ियां चलाना सिख गया है.. है ना मदन!!" अपने पैर से मदन के पैर के अंगूठे को दबाते हुए शीला ने मदन को आँख मारी.. उसका इशारा उस विदेश मेरी पर था..

कविता शीला की इस द्विअर्थी बात को समझ नही पाई.. उसने कहा "अरे वाह अंकल.. मुझे भी गाड़ी चलाना सीखना है.. आप सिखाओगे मुझे?? पीयूष को बोल बोलकर थक गई पर वो सुनता ही नही है"

मदन: "अच्छा? क्यों नही सिखाता? मना करता है क्या?"

कविता: "अरे, उसे मेरे लिए टाइम ही कहाँ है !! आप भाभी से पूछिए.. जब भी कहूँ तो कहता है की टाइम नही है"

मदन: "ये तो गलत बात है.. अपनी पत्नी को कार चलाना सिखाने का टाइम न हो.. ऐसा कैसे चलेगा??"

शीला: "वो नही सिखाएगा तो कोई और सीखा देगा.. क्यों चिंता करती है?? पर तुझे सीखकर काम क्या है? गाड़ी चलाकर कहाँ जाना है तुझे?"

कविता: "ऐसा नही भाभी.. गाड़ी चलाना आना तो चाहिए.. भले जरूरत हो या ना हो.. कभी भी काम आ सकता है.. वैसे स्टियरिंग और क्लच-ब्रेक के बारे में सब जानती हूँ.. बस गियर चलाना नही आता"

मदन: "गियर चेंज करना सीखना तो काफी आसान है.. और सब गाड़ियों में थोड़ा बहोत ऊपर नीचे होता है.. बाकी गियर सब का एक जैसा ही होता है"

ये आखिरी वाक्य सुनकर शीला के फिर शरारत सूझी.. " समझ गई ना कविता.. !! गियर सब का एक जैसा ही होता है.. सिर्फ हिलाना आना चाहिए" और हंसने लगी

शीला की बात का मतलब कविता समझ गई.. वो गियर की तुलना लंड से कर रही थी.. कविता नाम की नाजुक कली फिर से शरमा गई.. उसने तीरछी नज़रों से मदन की ओर देखा.. मदन ये जानता था की जब दो औरतें बात करती है तब उनके बीच द्विअर्थी संवाद हमेशा होते है.. घर के काम के बोझ तले दबी औरतें.. ऐसी हंसी-ठिठोली से अपना मन हल्का कर लेती है..

कविता: "आप और अंकल तैयार हो जाइए.. मैं तो तैयार ही हूँ.. बस कपड़े बदलने है.. भाभी, मौसम को देखने जो लड़का आने वाला है वो सी.ए. है.. बहोत ही अच्छे खानदान से है.. मौसम के नखरे बहोत है.. देखते है, उसे पसंद आता है या नही.. भगवान करें की दोनों एक दूसरे को पसंद कर लें.. और ये रिश्ता हो जाएँ.. पापा के सर से एक बड़ा टेंशन उतर जाएगा"

मदन: "अरे कविता.. रिश्ता होने पर टेंशन कम नही होता.. बल्कि शुरू होता है.. "

कविता ने हँसकर कहा "हाँ अंकल, आपकी बात बिल्कुल सही है.. "

कविता चली गई और शीला तथा मदन तैयार होकर बाहर निकले.. पीयूष के दोस्त की गाड़ी में मदन ड्राइवर सीट पर बैठ गया.. कविता को अकेला न लगे इसलिए शीला उसके साथ पीछे बैठ गई.. मदन ड्राइव करने लगा.. मस्त म्यूज़िक भी बज रहा था.. तीनों फ्रेश मूड में बातें कर रहे थे.. शीला ने अपने अंदाज में नॉन-वेज बातें करते हुए कविता की पेन्टी गीली कर दी थी.. कविता हंस हँसकर पागल हो गई थी.. इस मज़ाक मस्ती में वो पीयूष के साथ हुए झगड़े को भी भूल गई थी.. मदन भी बीच बीच में जोक सुनाकर हँसाता.. उसका सेंस ऑफ ह्यूमर कविता को पसंद आ गया

"आपका स्वभाव बड़ा ही मशखरा है मदन भैया" अपने शहरे में गाड़ी का प्रवेश होते ही कविता खिल उठी.. और क्यों न खिलती!! मायके की बात सुनकर ही हर स्त्री रोमांचित हो जाती है.. यहाँ तो कविता खुद अपने मायके पहुँचने वाली थी.. जाहीर सी बात है की वो बहोत खुश थी.. शहर के अंदर प्रवेश होते ही मदन ने कविता से कहा

"कविता, तू आगे आजा.. ताकि मुझे रास्ता ढूँढने में मदद कर सके"

मदन के साथ बैठना कविता को थोड़ा सा अटपटा तो लगा पर फिर भी वो आगे की सीट पर आ गई और रास्ता दिखाने लगी.. मदन धीरे धीरे कविता के घर की ओर गाड़ी चलाने लगा.. तभी उसकी नजर रीअर व्यू मिरर पर गई.. पीछे बैठी शीला ने अपना पल्लू गिरा दिया था और अपने दोनों दूध के कनस्तर उजागर कर रखे थे.. देखकर ही मदन को खांसी आ गई.. दोनों की नजर मिरर में एक होते ही शीला ने आँख मारते हुए एक कामुक मुस्कान दी.. मदन भी मुस्कुरा उठा.. शीला मदन को चिढ़ा रही थी

"हम पहुँच गए भैया.. गाड़ी यहाँ साइड में लगा दीजिए.. भाभी.. वो दो मंज़िली इमारत देख रही है?? वही है मेरा घर.. चलिए !!" कहते हुए कविता गाड़ी का दरवाजा खोलकर अपने घर की ओर दौड़ी..

मदन और शीला, कविता के पीछे पीछे घर के अंदर गए

"आइए.. आइए" कविता के माता पिता ने दोनों का स्वागत किया.. कविता ने सबकी पहचान करवाई.. मौसम और फाल्गुनी कहीं नजर नही आ रहे थे.. शीला को कविता के पापा की नजर कुछ ठीक नही लगी.. वह अपने कपड़ों को ठीक करके सोफ़े पर कोने में बैठ गई.. मौसम के पापा सुबोध ने मदन को सोफ़े पर बैठाया और किचन में चले गए..

थोड़ी ही देर में मौसम की माँ, रमिला पानी लेकर आई.. कविता ने अपने आने की खबर पहले ही फोन पर दे दी थी इसलिए उसकी माँ ने खाना तैयार रखा था.. तब तक चाय पानी पीकर सब बातें करने लगे.. तभी मौसम और फाल्गुनी वहाँ आ पहुंची.. उनके पीछे वैशाली और पीयूष ने भी प्रवेश किया.. वो दोनों किसी बात को लेकर हंस रहे थे.. कविता भी अपने कमरे से दौड़ी चली आई.. मौसम को देखने जो लड़का आ रहा था उसे देखने के लिए वो बड़ी उत्सुक थी

मौसम: "अरे दीदी!! आप लोग कब आए?? आइए आइए भाभी.. कैसे हो भैया?" मौसम के चेहरे पर जवानी छलक रही थी..

कविता ने इशारे से मौसम से पूछा.. की वो लड़के से मिली या नही? जवाब में मौसम ने शरमाकर अपनी आँखें झुका ली.. मतलब मीटिंग हो चुकी थी.. वैशाली का ध्यान बार बार मौसम के पापा की ओर जा रहा था.. करीब ५० की उम्र के सुबोधकांत दिखने में प्रभावशाली और हेंडसम थे.. उनके चेहरे पर बेफिक्री साफ नजर आ रही थी.. जब की उनकी पत्नी रमिला बहन, गोरी और भारी कदकाठी वाली.. धीर गंभीर औरत थी.. देखने से ही पता चलता था की रमिला बहन काफी शांत और धार्मिक स्वभाव की थी..

सुबोधकांत की नजर बार बार शीला के मदमस्त जिस्म और चुंबकीय व्यक्तित्व की ओर खींची चली आती.. भँवरा कितना भी खुद को रोक क्यों न ले.. खुश्बूदार फूल देखकर वह आकर्षित हो ही जाता है.. सुबोधकांत काफी रंगीन मिजाज थे और आए दिन बिजनेस टूर के नाम पर अपनी रंगरेलियाँ मना ही लेते थे.. जो आनंद उसकी शांत बीवी उसे कभी न दे पाती.. वह वो बाहर से प्राप्त कर लेते.. ऐसा रंगीन इंसान, शीला को देखकर कैसे कंट्रोल में रहता?? किसी गंभीर या शांत स्वभाव के इंसान का भी, अपनी हरकतों से, एक सेकंड में लंड टाइट करने की शक्ति थी शीला के गदराए जिस्म में.. सुबोधकांत हतप्रभ होकर शीला के सौन्दर्य का रसपान कर रहे थे..






शीला के बिल्कुल पीछे, वैशाली और फाल्गुनी खड़े थे.. सुबोधकांत जब भी शीला की ओर देखते.. उनकी आँखें कम पड़ जाती.. इतना जबरदस्त सौन्दर्य सिर्फ दो आँखों से ही कैसे देखें?? एक तो शीला बैठी थी.. पीछे बड़े स्तनों वाली वैशाली.. और कमसिन बदन वाली फाल्गुनी.. आहाहा

शीला जिस कोने में बैठी थी उस कोने पर, सारे पुष्प, जैसे एक साथ इकठ्ठा हो गए थे.. सामने खड़ी मौसम, अपने बाप की रसीली नजर देखकर शरमा गई.. उसे पता था की उसके पापा शीला भाभी, वैशाली और फाल्गुनी को ताड़ रहे थे.. अब ये बात तो वैशाली को भी नही पता थी की मौसम को अपने पापा की असलियत का पता चल चुका था.. मौसम अपने पापा की हर नजर को बड़ी ही विचित्रता से देख रही थी

शीला समझ गई.. की बाकी सारे मर्दों की तरह, सुबोधकांत भी उसके दोनों स्तनों के बीच की खाई में धँसते जा रहे थे.. उसे ऐसा महसूस हो रहा था जैसे वो सिर्फ अपनी नज़रों से ही उसके स्तनों को चूस रहे थे.. जैसे भँवरा फूल से रस चूस रहा हो..






मौसम ये सोच रही थी की पापा देख कीसे रहे है? फाल्गुनी को, वैशाली को या शीला भाभी को? इन सारी बातों से बेखबर होकर पीयूष कोने में बैठकर अखबार के पीछे मुंह छुपाकर सोच रहा था.. अरे यार.. मेरी कच्ची कुंवारी साली को चोदने की इच्छा, ख्वाब बनकर ही रह गई.. किनारे पर आते आते मेरी नाव डूब गई.. जवानी में पहला कदम रख रही मौसम ने इतनी जल्दी अपने मांझी को ढूंढ लिया.. !! काश वो ओर थोड़ा तड़पी होती तो पके हुए फल की तरह, मेरी गोद में आ गिरती.. माउंट आबू की उस दुकान के बाहर.. बंद रेहड़ी के पीछे.. कैसे मौसम ने मेरा लोडा पकड़ लिया था..!! आह्ह..

मस्त काले बादल छाए हो.. और बारिश की अपेक्षा में.. छत पर नहाने की तैयारी के साथ पहुंचे.. और तभी चमचमाती धूप निकल आए..तब जो हालत होती है.. वही हालत पीयूष की थी.. और मजे की बात तो यह थी.. की अभी कमरे में मौजूद.. मौसम, शीला, वैशाली और कविता.. सब के स्तनों को वो दबा चुका था.. फाल्गुनी को कभी पीयूष ने उस नजर से देखा नही था.. या यूं कह सकते है की फाल्गुनी के बारे में इस तरह से सोचने का उसे मौका ही नही मिला था.. माउंट आबू के आह्लादक वातावरण में.. उसके हाथों मौसम जैसा जेकपोट लग जाने के बाद.. जाहीर सी बात थी की उसे और किसी में दिलचस्पी नही रही थी.. पर मौसम नाम का प्याला.. लबों से लगने से पहले ही छीन गया था.. इस बात से लगा सदमा.. पीयूष के चेहरे पर साफ दिखाई दे रहा था और उसी भाव को छुपाने के लिए वो अखबार खोलकर बैठ गया था..

कविता, वैशाली, फाल्गुनी और मौसम.. बगल के कमरे में घुस गए.. चारों लड़कियां अपनी प्राइवेट बातें करने के लिए चली गई.. अब पीयूष के सामने केवल शीला थी.. अखबार को साइड में रखकर उसने शीला की ओर देखा.. आसपास कोई देख तो नही रहा.. ये चेक करने के शीला ने चुपके से पीयूष को आँख मारी.. इस शरारत से पीयूष अपनी सीट पर सीधा हो गया.. यार.. ये कैसी गजब स्त्री है!! शांत बैठे आदमी को एक पल में उत्तेजित करने की अनोखी कला थी शीला में..

मदन और सुबोधकांत, बिजनेस और राजनीति से जुड़ी बातें कर रहे थे.. एक बात मदन के ध्यान में आई.. बातों के बीच में.. सुबोधकांत बार बार शीला की ओर देख लेते थे.. मदन मन ही मन में हंस पड़ा.. हाय मेरी शीला.. तेरे जादू से बच पाना नामुमकिन है.. अपनी खुशकिस्मती पर आनंद प्रकट करते हुए मदन वापिस सुबोधकांत को बातों में उलझा देता..

पीयूष बेचैन हो रहा था.. बार बार पूछने के बावजूद मौसम ने उसे ये नही बताया था की जिस लड़के से उसकी मीटिंग हुई थी, वो उसे कैसा लगा था!!! आखिर परेशान होकर वो उस कमरे की ओर गया जहां वो चारों लड़कियां बैठी हुई थी.. तभी शीला भी किचन में जाने के लिए खड़ी हुई और बीच पेसेज में उसने चुपके से पीयूष का लंड दबा दिया और किचन में चली गई.. पीयूष को पता नहीं चल रहा था की शीला भाभी उसे क्यों उकसा रही थी.. उनके विचार को दिमाग से झटक कर वो कमरे की तरफ गया.. कमरे में प्रवेश करते ही उसके कानों ने सुना..

कविता मौसम को सब कुछ पूछ रही थी और मौसम शरमाते हुए धीमी आवाज में उत्तर दे रही थी..

"आइए जीजू" पीयूष को देखते ही फाल्गुनी ने कहा.. इन चारों ने पूरे बेड पर कब्जा जमाया हुआ था.. बैठने की जगह नही थी.. फाल्गुनी खड़ी होकर बोली "मैं आंटी को किचन में मदद करने जा रही हूँ.. आप यहाँ बैठिए जीजू.. " पीयूष वहाँ बैठ गया

फाल्गुनी ने किचन में जाते हुए सुबोधकांत की तरफ देखा... सुबोधकांत ने भी मदन के साथ बातों में व्यस्त होने के बावजूद फाल्गुनी को एक हल्की सी स्माइल दी..

उधर कमरे में.. चर्चा-विचार के बाद.. मौसम अपना निर्णय सब को बताने के लिए तैयार थी.. पीयूष अपने नाखून चबा रहा था..

कविता: "मौसम, जल्दी जल्दी बता.. क्या क्या बातें हुई उसके साथ? तुझे कैसे लगा? पसंद आया? क्या सोचा तूने फिर?"

पीयूष के दिल की धड़कनें तेज हो गई.. अब क्या कहेगी मौसम? वो जो कहने वाली थी उसकी अपेक्षा से ही पीयूष का दिल बैठा जा रहा था ..

पीयूष मौसम के तंदूरस्त उभारों को ऊपर नीचे होते हुए देखता रहा.. उसके ड्रेस से छोटी सी क्लीवेज भी नजर आ रही थी.. यार.. सिर्फ एक रात के लिए इस जोबन का लुत्फ उठाने का मौका मिल जाए, बस.. !! ये दोनों सुंदर नाजुक स्तनों के बीच की लकीर में लंड घिसने का अवसर मिलें तो जीवन सफल हो जाएगा.. ये हाथ से चली जाएँ इससे पहले सिर्फ एक मौका मिल जाएँ.. बस.. !! मौसम उस चूतिये को रिजेक्ट कर दे तो मज़ा ही आ जाएँ.. !!

जब फाल्गुनी कमरे से बाहर निकली तब वैशाली भी उसके पीछे गई.. फाल्गुनी को किचन में जाते देख वो वापिस लौट आई और बेड पर पीयूष के पीछे ऐसे बैठ गई की उसके घुटनें पीयूष को छुने लगे.. पर इस स्पर्श से पीयूष को कोई फरक नही पड़ा.. कहाँ से पड़ता?? मस्त रसगुल्ले की चासनी को वो चूस पाता इससे पहले ही हाथ से गिर गया.. !!

"लड़का तो अच्छा है, दीदी!!" मौसम ने कहा "सी.ए. की परीक्षा पास कर ली है.. एकाध महीने में डिग्री भी आ जाएगी.. बहोत ही समझदार है"

"दिखने में कैसा है? क्या नाम है उसका?" कविता ने पूछा

मौसम: "दिखने में तो बड़ा हेंडसम है यार!!" मौसम के एक एक शब्द से पीयूष के दिल पर आरी चल रही थी..

कविता: "जरा खुलकर बता.. मुझे सब कुछ जानना है उसके बारे में"

वैशाली अपने घुटने को पीयूष की पीठ पर रगड़ रही थी.. इस बात से अनजान के पीयूष को आज उसके हरकतों से कोई फरक नही पड़ रहा था.. कविता का सारा ध्यान मौसम की ओर था इसलिए उसे वैशाली की छेड़खानियाँ दिख नही रही थी.. वो तो मौसम के आने वाले सुनहरे कल के सपने देख रही थी..

वैशाली: "हाँ यार.. जरा विस्तार से बता.. हेंडसम है.. पर पर्सनालिटी कैसी है? तेरे साथ उसकी जोड़ी कैसी लगती थी?"

वैशाली जैसे जानबूझकर पीयूष के घावों पर नमक छिड़क रही थी.. उसने खुद पीयूष की मौसम के लिए लट्टूगिरी देख रखी थी माउंट आबू में.. इसीलिए वो चाहती थी की मौसम नाम का कांटा.. उसके और पीयूष के बीच से जल्द से जल्द हट जाए.. और पीयूष का ध्यान फिर से उसकी ओर आकर्षित हो.. कितनी ईर्ष्या होती है औरतों में.. !!

मौसम: "दीदी.. उसका नाम तरुण है.. जीजू जैसा ही दिखता है.. उनके जैसी ही पर्सनालिटी है.. कद काठी में भी सैम टू सैम.. मुझे तो वो पसंद है.. अब प्रश्न ये है की क्या मैं भी उसे पसंद आती हूँ या नही.. !! अगर उसे पसंद हो तो मेरी तरफ से हाँ है.. !!"

पीयूष का सारा शरीर एकदम ठंडा पड़ गया.. काटो तो खून ना निकले.. पीयूष के प्रेम की छत्री का कौवा बन गया था

वैशाली: "कैसी बात करती है तू मौसम? तुझ जैसी सुंदर लड़की को भला कौन रिजेक्ट कर सकता है?? क्यों ठीक कहा ना मैंने पीयूष!! बोलता क्यों नही है.. क्या तू ये नही चाहता की मौसम का रिश्ता किसी अच्छे लड़के से हो जाए!!"

"अरे.. नही नही.. ऐसा कुछ नही है.. मैं कोई उसका दुश्मन थोड़े ही हूँ.. !! पर मुझे विश्वास है.. की अगर उस लड़के ने रिजेक्ट किया भी तो मौसम को उससे कई गुना अच्छा लड़का मिल जाएगा.. मौसम तो लाखों में एक है.. " अपने सारे गम को छुपाकर.. कृत्रिम मुस्कुराहट धारण करते हुए पीयूष ने कहा.. एक एक शब्द बोलते हुए, कितना कष्ट हो रहा था, वो सिर्फ पीयूष ही जानता था..

कविता: "तुम दोनों की मीटिंग कितने वक्त तक चली? कहाँ मिले थे तुम दोनों?"

मौसम: "वो मुझे सुबह दस बजे लेने आया था.. फिर हम होटल रंगोली में गए और कॉफी पी.. करीब दो घंटों तक हम वहीं थे.. बहोत सारी बातें की.. आप लोग आए उससे कुछ देर पहले ही वो मुझे छोड़ गया.. वो उनके किसी रिश्तेदार के घर रुके है.. शायद दोपहर के बाद फिर से मिलना होगा.. "

रमिला बहन ने कमरे में आकर कहा "खाना तैयार है.. चलिए सब.. !!"

उस आनंद भरे वातावरण में सब डाइनिंग टेबल पर जा बैठे.. पूरा घर उन लड़कियों की किलकीलारियों से गूंज रहा था..

रमिला बहन और सुबोधकांत ने सब को आग्रह कर खिलाया.. सब खुश थे.. सिवाय पीयूष के.. !! खाना खतम हुआ और सब खड़े हुए

तभी एक फोन आया और बात करके सुबोधकांत ने कविता से कहा "अरे कविता बेटा.. लड़के वालों का फोन था.. वह एक बार ओर मीटिंग करना चाहते है.. उनके रिश्तेदार के घर बुलाया है.. आप सब में से कौन कौन जाएगा मौसम के साथ?"

रमिला बहन: "अरे कविता है ना.. वो और फाल्गुनी साथ जाएंगे"

सुबोधकांत: "अरे.. सब चले जाएंगे तो यहाँ मेहमानों को अकेला महसूस होगा.. एक काम करते है.. पीयूषकुमार को गाड़ी लेकर भेज देते है.. साथ में कविता और मौसम.. फाल्गुनी को यही रहने दो.. " फाल्गुनी का चेहरा शर्म से लाल हो गया.. उसका चेहरा देखकर मौसम और वैशाली समझ गए की सुबोधकांत अपनी नजर से फाल्गुनी को दूर रखना नही चाहते थे.. लेकिन किसी और को इस बारे में कुछ पता नही चला

"आप चिंता मत कीजिए पापा.. मैं मौसम के साथ चला जाऊंगा.. और उसे वापिस भी सही सलामत ले आऊँगा.. मेरे होते हुए आपको किसी चिंता करने की कोई जरूरत नही है" पीयूष ने कहा

ये सब सुन रही वैशाली सोच रही थी.. की यहाँ इतनी भीड़ भाड़ में सुबोधकांत के बारे में कुछ पता तो चलने वाला था नही

वैशाली: "एक काम करें?? अगर आपको प्रॉब्लेम न हो तो मैं भी मौसम के साथ जाऊँ? हो सकता है की मौसम को मेरी सलाह की जरूरत पड़ जाए.. !!"

मौसम: "हाँ हाँ वैशाली.. तुम साथ चलो.. फाल्गुनी को यही रहने दो.. तुम साथ रहोगी तो अच्छा रहेगा"

मौसम, वैशाली और कविता को गाड़ी में बिठाकर पीयूष ले चला..

गाड़ी चलाते हुए पीयूष.. मिरर से अपनी दोनों प्रेमिकाएं.. मौसम और वैशाली को बेबस नज़रों से देख रहा था.. पर फिलहाल देखने के अलावा वो और कुछ कर पाने की स्थिति में नही थी.. कविता जो उसके बगल में बैठी थी..

जिस गति से कार दौड़ रही थी उससे दोगुनी गति से पीयूष का दिल धडक रहा था.. क्या होगा.. !!! जो होगा देखा जाएगा.. !!

गाड़ी तरुण के रिश्तेदार के घर के पास आ पहुंची.. मौसम के गाल कश्मीरी सेब की तरह लाल हो गए.. कविता और वैशाली भी बेहद उत्सुक थे.. तरुण को देखते ही कविता और वैशाली तो ऐसा ही मान बैठे की यही है मौसम का होने वाला पति.. सपनों का राजकुमार.. !!

वैशाली ने कुहनी मारकर कविता को कहा "कितना हेंडसम है यार!! एकदम डैशिंग है.." कविता ने भी मौसम की आँखों में देखकर हामी भरी.. की वो जैसा बता रही थी.. लड़का वैसा ही था

तरुण दिखने में सौम्य.. और स्वभाव से शांत था.. उसके चेहरे पर चार्टर्ड अकाउन्टन्ट वाली गंभीरता भी थी.. कविता ने कुछ सवाल पूछे.. वैशाली ने भी दो-तीन सवाल पूछ लिए.. अब बारी पीयूष की थी.. पर वो बेचारा क्या पूछता..!! उसकी हालत बस वही जानता था.. विनेश फोगाट जैसी हालत थी उसकी.. १०० ग्राम वज़न के कारण मेडल गंवाना पड़ रहा था.. एक-दो सवाल पूछकर पीयूष कमरे से बाहर चला गया.. बेचैनी बर्दाश्त के बाहर हो रही थी.. कविता और वैशाली भी दोनों को बातें करने अकेला छोड़कर कमरे से बाहर निकले..

मौसम और तरुण की मीटिंग चल रही थी.. उस दौरान.. कविता, मौसम और पीयूष बाहर सड़क पर टहलने लगे.. तीनों की बातों का टोपिक एक ही था.. मौसम.. !! काफी देर हो गई और फिर भी मौसम घर के बाहर नही निकली थी

पीयूष का मन प्रेशर कुकर की तरह सीटियाँ बजा रहा था.. भेनचोद चूतिया तरुण.. क्या कर रहा होगा अंदर मौसम के साथ?? मन ही मन तरुण को गालियां देते हुए.. ना चाहते हुए भी वैशाली और कविता की बातों में शामिल हो रहा था..

वैशाली: "यार लगता है इन्हें और देर लगेगी.. यहाँ खड़े खड़े क्या करेंगे हम लोग? पीयूष, तू एक काम कर.. तू हम दोनों को वापिस घर छोड़ दे.. और फिर मौसम को लेने आ जाना.. पता नही मीटिंग और कितनी देर तक चलेगी.. मैं तो बोर हो रही हूँ"

कविता: "यार उसकी ज़िंदगी का सवाल है.. पूछ लेने दे.. कर लेने दे दोनों को बातें.. शादी करना कोई मज़ाक तो है नही.. चलने दे उनकी मीटिंग.. पीयूष, तू हमें घर छोड़ दे.. और फिर मौसम को लेने आ जाना.. तब तक शायद उनकी मीटिंग खतम हो जाएगी.. "

दोनों को लेकर पीयूष ने गाड़ी घुमाई और उन्हें कविता के घर ड्रॉप करने के बाद वापिस आ गया..

वो बरामदे में लगे झूले पर बैठे बैठे सोच रहा था.. कैसी ड्यूटी आ गई सर पर? जिस सेक्सी जिस्म को मैं चोदने के ख्वाब देख रहा था.. वो अंदर बंद कमरे में अनजान लड़के के साथ बैठी है.. और मैं यहाँ इंतज़ार करते हुए अपनी गांड मरवा रहा हूँ.. इससे तो मर जाना बेहतर होगा.. अपने आप पर गुस्सा आ रहा था पीयूष को.. प्रेमी बनने के चक्कर में अपनी साली का चौकीदार बन गया था वोह.. पर करता भी क्या!! मौसम अब उससे बहोत दूर चली जाने वाली थी.. !!

"कहाँ गए दीदी और वैशाली? चलिए जीजू.. चलते है.. बहोत देर हो गई.. मम्मी पापा चिंता कर रहे होंगे.. !!"

पीयूष: "उन दोनों को तो मैं घर छोड़ आया.. बहोत देर हो गई इसलिए.. फिर तुझे लेने वापिस आया.. चल चलते है घर.. !!"

दोनों फटाफट कार में बैठ गए.. कविता का घर पहुँचने में लगभग बीस मिनट का समय लगता था.. तभी मौसम पर उसके पापा का फोन आया और वो पूछने लगे की और कितनी देर होगी..!! जवाब में मौसम ने कहा की बस आधे घंटे में पहुँच जाएंगे..

थोड़ी देर तक पीयूष और मौसम दोनों मौन ही रहे.. मौसम जानती थी अपने जीजू के दिल का हाल.. !!

आखिरी मौसम ने चुप्पी तोड़ी.. "जीजू.. उस गार्डन के पास गाड़ी रोकिए"

रोड के उस तरफ सुंदर बगीचा था.. कार खड़ी होते ही मौसम उतर गई.. और साथ में पीयूष भी.. !!

गार्डन के अंदर जाकर एक कोने में खड़े होकर मौसम ने कहा "जीजू, उस दिन माउंट आबू में हम दोनों के बीच जो कुछ भी हुआ उसके बाद मैं आपकी और जबरदस्त आकर्षण महसूस कर रही हूँ.. एक तरफ आपकी ओर ये खिंचाव.. दूसरी ओर दीदी के साथ धोखा करने का अपराधभाव.. और तीसरी ओर ये तरुण.. !!! मैं क्या करूँ मुझे कुछ समझ में नही आता.. !!"

पीयूष: "मौसम, दिल पर किसी का जोर नही चलता.. दिल को कितना भी समझा लो पर वो नही मानता.. मैं भी क्या करूँ? मेरी हालत भी खराब है.. क्या मैं तुझे कभी पा नही सकूँगा?? ये रिश्ता हो गया तो तू तरुण की होकर रह जाएगी.. हमारी लव स्टोरी बस यही तक थी " बोलते बोलते पीयूष की आँखों से आँसू गिरने लगे.. अब तक जिस दर्द को वो छुपा रहा था.. व्यक्त हो गया

मौसम ने अपने रुमाल से पीयूष की आँखें पोंछ ली.. पूरा रुमाल गीला हो गया.. पीयूष की इस स्थिति में दोनों घर जाते को सब को पता चल जाने का डर था..

बड़े भारी दिल से उसने पीयूष के हाथ को अपने हाथ में लेकर कहा "जीजू.. मैं भी तो इस कशमकश से गुजर रही हूँ.. !! पर वास्तविकता को सवेकार्ने के अलावा और कोई चारा भी तो नही है.. मैं आप से शादी तो कर नही सकती.. आप को चाहे कितना भी प्यार करूँ.. ब्याह तो मुझे किसी और के साथ.. कभी ना कभी तो करना ही होगा.. !! तो फिर तरुण से बेहतर और कौन हो सकता है.. !! प्लीज आप मेरी हालत को समझने की कोशिश कीजिए.. !!"

पीयूष: "तेरी बात मैं समझ रहा हूँ.. मैं ही बेकार में हवा को मुठ्ठी में कैद करने की जिद ले बैठा.. बट आई लव यू मौसम.. बस यही बात मुझे खाए जा रही है की तू मुझे एक बार भी नही मिली.. "

मौसम: "जीजू प्लीज.. आप उदास मत हो.. मैं आपको प्रोमिस करती हूँ.. आप से मैं एक बार एकांत में जरूर मिलूँगी.. पर सिर्फ एक बार.. !! और वो भी मेरी सगाई से पहले.. ताकि मुझे तरुण को धोखा देने का दुख न हो.. आई ऑलसों लव यू जीजू.. अब हम घर जाए उससे पहले आप नॉर्मल हो जाओ ताकि किसी को शक न हो.. अब इससे ज्यादा मैं आपकी उदासी के लिए कुछ नही कर सकती.. प्लीज" कहते हुए मौसम रोने लगी.. उसे रोती देख पीयूष अपनी उदासी भूल गया

पीयूष: 'मौसम, तू रो मत यार.. मुझे तेरी बात मंजूर है.. मुझे पता है की शादी तो तुझे किसी ओर से करनी ही होगी.. और तू मुझे इससे ज्यादा कुछ दे नही पाएगी, ये भी समझता हूँ.. चल रोना छोड़.. अब चलते है वापिस"

दोनों बाहर निकलें.. स्टोर से मिनरल वॉटर की बोतल लेकर उन्होंने मुंह साफ किया.. और फ्रेश होकर घर की ओर निकल गए.. पीयूष मन ही मन खुश हो रहा था की आखिर मौसम ने उसके प्यार की लाज रख ली.. एक बार के लिए हाथ में आएगी जरूर..

गाड़ी कविता के घर पास पहुंची.. गाड़ी से उतरने से पहले मौसम ने आसपास देखा.. फिर उसने पीयूष के होंठों पर किस कर दी..और उसका हाथ अपने मस्त स्तनों पर रख दिया.. कडक मांसल गोले हाथ में आते ही पीयूष के अंदर का पुरुष जाग उठा.. जोर से स्तनों को मसलते हुए पीयूष ने मौसम के होंठों पर एक मजबूत चुंबन दिया.. एक पल के लिए गाड़ी के अंदर हवस और उत्तेजना की तेज आंधी से उठने लगी..








किस तोड़कर पीयूष ने अपने लंड का उभार मौसम को दिखाया और बोला "ये देख मौसम.. तेरी चूत में घुसने के लिए कितना उतावला हो रहा है.. और तू मुझे रोता छोड़कर शादी करने चली है.. !!"

पीयूष के लंड के उभार को प्यार से अपनी हथेली से दबा दिया.. "सब्र का फल मीठा होता है.. थोड़ा इंतज़ार कीजिए जनाब" शायराना अंदाज मे मौसम ने कहा

पीयूष: "मौसम, मुझे तेरे बूब्स चूसने है.. यहाँ आसपास कोई नही है.. अपना टॉप थोड़ा सा ऊपर कर.. मैं फटाफट चूस लूँगा"

मौसम ने शरमाते हुए अपना टॉप ऊपर कर दिया.. मदमस्त दूधरंगी कडक स्तन बाहर निकल आए.. एक स्तन को हाथ से मसलते हुए दूसरे स्तन को झुककर चूसने लगा पीयूष.. निप्पल पर जीभ का स्पर्श होते ही मौसम बेकाबू हो गई.. और पीयूष का सर अपनी छाती से दबाकर आहें भरने लगी..








एक दो मिनट तक ये खेल चला.. मौसम ने अपने स्तनों को फिर से टॉप के अंदर पेक कर दिया.. पीयूष ने भी अपने बाल और चेहरे को ठीक कर लिया.. पीयूष अब गाड़ी का दरवाजा खोलकर बाहर निकलने ही जा रहा था तभी मौसम ने उसका हाथ पकड़कर रोक लिया




मौसम: "जीजू मुझे आपका वो.. देखना है एक बार.. दिखाइए ना प्लीज!!"

पीयूष: "ओह माय गॉड मौसम.. तेरी ये बातें सुनकर.. मन करता है की अभी गाड़ी में तुझे भगा ले चलूँ.. कहीं दूर ले जाकर घंटों तक बस प्यार करता रहूँ.. फिर आगे जो होना हो सो हो.. !!"

पीयूष की जांघ पर हाथ फेरते हुए मौसम ने कहा "प्लीज जीजू.. वक्त बर्बाद मत कीजिए.. जल्दी बाहर निकालिए.. मुझे देखना है.. इससे पहले कोई आ जाए यहाँ.. !!"

ड्राइवर सीट पर बैठे हुए खड़े लंड को टाइट जीन्स से बाहर निकालना बड़ा मुश्किल काम है.. बड़ी मुसीबत से पीयूष ने अपना विकराल लंड बाहर निकाला.. लंड को देखकर मौसम कांपने लगी.. "बाप रे.. जीजू.. ये तो कितना बड़ा है.. !!" कहते हुए उसने लंड को मुठ्ठी में लेकर पकड़ा और चमड़ी को नीचे उतारते ही लाल सुपाड़ा बाहर निकल आया "इशशशश.. जीजू, कितना कडक है ये यार" मौसम का हाथ अब और मजबूती से लंड को जकड़े हुए था.. दिन के उजाले में ये सारा खेल चल रहा था






तभी पीछे से ऑटो-रिक्शा के आने की आवाज आई.. मौसम ने लंड छोड़ दिया.. और पीयूष ने अपने सांप को फिर से पेंट के अंदर डाल दिया.. फटाफट गाड़ी से निकलकर दोनों घर के अंदर घुस गए

घर पहुंचते ही मौसम ने चरण स्पर्श करके सब बड़ों का आशीर्वाद लेते हुए कहा "मुझे लड़का पसंद है और उसकी भी हाँ है.. " सुनते ही मौसम के पापा सुबोधकांत ने कहा "बहोत अच्छा हुआ.. " उनकी आँखें भर आई.. बेटी अब पराये घर जाने वाली थी इस बात का दर्द उनके चेहरे पर साफ झलक रहा था.. ये देखते ही रमिला बहन की आँखों से भी आँसू छलकने लगे..

"अरे मम्मी, अभी तो केवल शुरुआत है.. आप तो अभी से रोने लगे?? मौसम को बिदा करते वक्त क्या होगा फिर??" अपनी माँ की पीठ को सहलाकर उन्हें सांत्वना देते हुए कविता ने कहा.. उसकी आँखें भी नम हो गई थी

तभी फलगुगनी सब के लिए चाय लेकर आई.. सब अपनी जगह बैठ गए.. फाल्गुनी ने सुबोधकांत के हाथ में चाय का कप दिया तब सुबोधकांत ने उसका हाथ छु लिया और ये वैशाली और मौसम दोनों ने नोटिस किया..

सुबोधकांत: "मदन जी, आप हमारे घर पहली बार पधारे है.. अब वापिस जाने की जल्दी मत करना.. !! मैं आपको रात में ड्राइविंग करके जाने नही दूंगा.. मैं अभी ऑफिस जा रहा हूँ.. आप सब पीयूष कुमार के साथ शहर घूम लीजिए.. शाम को खाना खाकर आप रात को यहीं रुक जाना.. इसी बहाने कविता भी एक पूरा दिन हमारे साथ रहेगी.. !!"

मदन ने बहोत आनाकानी की पर रमिला बहन और सुबोधकांत ने एक न सुनी.. आखिर उन्हें मानना पड़ा.. तय ये हुआ की पीयूष गाड़ी में कविता, मदन, शीला और फाल्गुनी के साथ घूमने जाएगा.. मौसम नही जाने वाली थी.. शायद शाम को फिर से तरुण का कॉल आ जाए.. !! पर तभी फाल्गुनी ने कहा "मैं साथ नही चलूँगी.. मुझे घर जाना होगा"

सुबोधकांत के पीछे पीछे फाल्गुनी भी बाहर निकल गई.. ये देखते ही वैशाली के दिमाग में शक का कीड़ा जाग गया.. कहीं दोनों साथ तो नही गए?!! जो विचार वैशाली को आया वही बात मौसम के दिमाग में भी आ गई.. उसने तुरंत एक आइडिया आया॥

"जीजू, हम सब एक गाड़ी में नही आ पाएंगे.. आप एक काम कीजिए.. आप कविता दीदी, मदन भैया और शीला भाभी को घूमने ले जाइए.. वैशाली यहाँ मेरे साथ ही रुकेगी"

सुनते ही वैशाली की आँखों में चमक आ गई.. मौका मिले तो वो फाल्गुनी का पीछा करना चाहती थी.. पर उसने इस शहर में कुछ देखा नही था.. अगर मौसम से पूछती तो उसे शक हो जाता.. क्या करूँ? मस्त चांस था दोनों को रंगेहाथों पकड़ने का.. पर इस अनजान शहर में वो कहाँ जाती?

कविता, मदन और शीला को लेकर जैसे ही पीयूष की गाड़ी निकली.. मौसम ने अपनी स्कूटी बाहर निकाली "मम्मी, मैं और वैशाली थोड़ा सा घूम कर आते है"

मौसम ने स्कूटी को स्टार्ट किया और वैशाली को पीछे बैठ जाने का इशारा किया.. माउंट आबू में लेस्बियन सेक्स के बाद, मौसम वैशाली के साथ काफी खुल चुकी थी.. वैशाली ने अपने मस्त बबले मौसम की पीठ के साथ दबा दिए..

"अरे यार, तूने तो ऐसे अपनी छाती चिपका दी, जैसे किसी मर्द के पीछे बैठी हो" स्कूटी को मेइन रोड पर लेते हुए मौसम ने कहा.. जवाब में वैशाली ने मौसम को कमर से पकड़कर दबाते हुए कहा "फाल्गुनी को भी साथ ले लेते तो और मज़ा आता.. है ना मौसम?"

वैशाली के दिमाग से फाल्गुनी और सुबोधकांत हट ही नही रहे थे.. इधर मौसम का दिमाग भी घूम रहा था..

मौसम तेजी से स्कूटी दौड़ा रही थी.. शहर से बाहर जाते हाइवे की ओर चलाने लगी..

वैशाली: "कहाँ लेकर जा रही है? हाइवे पर कौन सा काम है तुझे? कहीं बाजार में ले चल.. थोड़ी शॉपिंग कर लेते.. यहाँ क्या देखना है?"

मौसम: "तू चुप बैठ वैशाली.. मुझे कुछ चेक करना है"

सुनकर वैशाली चोंक गई.. ईसे क्या चेक करना है? कहाँ ले जा रही है ये?

मौसम: "हाँ वैशाली.. जरा गंभीर और सीक्रेट बात है"



वैशाली को बड़ा आश्चर्य हो रहा था.. कहीं मौसम को फाल्गुनी और उसके पापा के बारे में पता तो नही चल गया होगा.. !! उस दिन जब फाल्गुनी के साथ बाथरूम में बातें हुई थी तब कहीं मौसम ने सुन तो नही ली थी!! या फिर मौसम किसी और काम से ले जा रही हो?? पर किसी और काम के लिए वो मुझे क्यों साथ ले जा रही है?? पर लगता तो यही है की मौसम को पता चल गया है.. और वो ये भी जान चुकी है की मुझे इस बात का पता पहले से है.. इसीलिए तो मुझे साथ लिया है..!!
 
वैशाली को बड़ा आश्चर्य हो रहा था.. कहीं मौसम को फाल्गुनी और उसके पापा के बारे में पता तो नही चल गया होगा.. !! उस दिन जब फाल्गुनी के साथ बाथरूम में बातें हुई थी तब कहीं मौसम ने सुन तो नही ली थी!! या फिर मौसम किसी और काम से ले जा रही हो?? पर किसी और काम के लिए वो मुझे क्यों साथ ले जा रही है?? पर लगता तो यही है की मौसम को पता चल गया है.. और वो ये भी जान चुकी है की मुझे इस बात का पता पहले से है.. इसीलिए तो मुझे साथ लिया है..



वैशाली का दिमाग स्कूटी के पहियों से भी तेज चल रहा था.. स्कूटी को एक कोने पर ले जाकर एक गली के पास खड़ा कर दिया मौसम ने और फिर कहा "वैशाली, तू यहाँ रुक.. मैं थोड़ी देर में आती हूँ.. दस मिनट से ज्यादा टाइम नही लगेगा.. तुझे साथ ले जाने में रिस्क है वरना तुझे साथ ले जाती.. जैसा मैंने कहा.. बात गंभीर है और सीक्रेट भी"

वैशाली: "हाँ हाँ.. मुझे कोई प्रॉब्लेम नही है.. पर जल्दी आना.. इस अनजान रास्ते पर अकेले खड़े रहने में मुझे डर लगता है"

मौसम: "चिंता मत कर.. मैं जल्दी वापिस आ जाऊँगी" कहते हुए मौसम उस गली के अंदर चली गई..

वैशाली का दिमाग चकरा रहा था.. कहाँ गई होगी? ऐसा क्या सीक्रेट होगा उसका? इस गली के अंदर क्या होगा?? वैशाली ने गली के अंदर थोड़ा सा अंदर जाकर देखा.. गली के आखिरी छोर पर एक गाड़ी पार्क थी.. कार का मॉडल और कलर देखकर वैशाली चोंक गई.. ये तो मौसम के पापा, सुबोधकांत की कार थी.. !! मतलब उनकी ऑफिस यहाँ थी.. तो मौसम जरूर फाल्गुनी और सुबोधकांत के बारे में जान गई होगी.. और इसी बात की तहकीकात करने आई है.. अब जब मौसम सब जान ही गई है.. तो फिर मुझे जाने में क्या दिक्कत!!

वैशाली के कदम अपने आप ही गली के अंदर चले गए.. और चलते मुसाफिर को मंजिल तक पहुँचने में देर नही लगती.. मुश्किल से थोड़ा आगे गई होगी और एक दरवाजे पर उसे मौसम के सेंडल पड़े नजर आए.. वैशाली की धड़कन तेज हो गई.. दरवाजे के ऊपर एक बोर्ड लगा था जिस पर लिखा था.. एस.के. एंटरप्राइज़.. धीरे से दरवाजा खोलकर वैशाली ने अंदर देखा.. उसे मौसम का हरा दुपट्टा नजर आया.. उसे यकीन हो गया की यही था सुबोधकांत का ऑफिस और मौसम का दुपट्टा भी इस बात का सबूत दे रहा था.. पक्का मौसम अपने बाप की लीला के दर्शन करने ऑफिस दौड़ी चली आई थी.. अब सवाल ये था.. की मौसम के रहते, वैशाली अंदर जाए कैसे??

ऑफिस के अंदर एक आगे की केबिन थी जहां मौसम खड़ी थी.. और पीछे वाली केबिन में शायद सुबोधकांत थे.. जिसे मौसम देख रही थी.. वैशाली ने बड़े ही आराम से मेइन दरवाजा खोला और लपककर मौसम के पीछे खड़ी हो गई.. सुबोधकांत की केबिन का दरवाजा आधे इंच जितना खुला हुआ था.. और अंदर का द्रश्य देखते ही मौसम और वैशाली दोनों दंग रह गए.. सुबोधकांत फाल्गुनी का टॉप ऊपर करके उसके स्तनों को चूस रहे थे.. !!








वैशाली ने धीरे से मौसम के कंधे पर अपना हाथ रख दिया.. घबराई मौसम ने एकदम से पीछे देखा.. वैशाली पर नजर पड़ते ही वो शरमा गई.. दोनों ने आँखों आँखों में सारी बात कर ली.. वैशाली ने मौसम के पीछे से अपने दोनों हाथ डालकर उसके स्तनों को पकड़ लिया.. और उन्हे दबाते हुए मौसम की गर्दन के पीछे किस करने लगी.. अपने बाप के कारनामे देखकर मौसम भी अपनी चूत को खुजाते हुए वैशाली के बालों में उँगलियाँ फेरने लगी.. पीठ पर चुभ रहे वैशाली के उन्नत स्तनों की गर्माहट और साथ ही साथ स्तनों का मर्दन.. मौसम किसी अलौकिक दुनिया में पहुँच गई.. उसकी सांसें बेहद भारी हो गई थी..







जैसे जैसे उसके पापा फाल्गुनी के जवान शरीर के साथ खिलवाड़ करते.. उसके स्तनों को चूसते देखती गई.. वैसे वैसे मौसम और उत्तेजित होती गई.. सुबोधकांत ने फाल्गुनी का हाथ अपने लंड पर रख दिया.. और ये सीन देखकर मौसम के स्तनों पर वैशाली की पकड़ और मजबूत हो गई..

"आह्ह.. जरा धीरे कर वैशाली.. दर्द हो रहा है.. अगर बहुत चूल मची हो तो तू भी अंदर चली जा.. मेरे बूब्स को क्यों दबोच रही है? " एकदम फुसफुसाते हुए मौसम ने वैशाली के कान में कहा..

जवाब में वैशाली ने मौसम के ड्रेस के अंदर हाथ डालने की कोशिश की पर ड्रेस इतना टाइट था की हाथ अंदर गया ही नही.. ऊपर से मौसम के स्तन उत्तेजित होकर और फूल गए थे.. और इतना दबाव बना रहे थे की देखकर लगता था जैसे मौसम की ड्रेस अभी फट जाएगी.. वैशाली अंदर हाथ न डाल पाई पर उसने खुद के स्तनों को मौसम की पीठ पर रगड़कर कसर निकाली.. उसका दूसरा हाथ मौसम की चूत तक ले जाकर.. हौले हौले सलवार के ऊपर से उसकी रसीली कुंवारी चूत को सहला रहा था..






वैशाली ने मौसम के ड्रेस की चैन को पीछे से खींचकर.. उसकी सुंदर गोरी पीठ को खुला कर दिया.. अब वैशाली का हाथ बड़ी ही आसानी से मौसम के स्तनों तक जा पहुंचा.. ब्रा को ऊपर करके उसने मौसम के स्तनों पर अपने हथेली से स्पर्श करते ही एक जबरदस्त स्पार्क हुआ.. और दोनों की हवस प्रखरता से प्रज्वलित हो गई

सुबोधकांत फाल्गुनी की निप्पलों को मसल रहा था और उसी वक्त वैशाली मौसम की निप्पलों को भी मसलने लगी.. मौसम की आँखें बंद सी होने लगी.. मन ही मन में वो ऐसा महसूस कर रही थी जैसे उसकी निप्पल वैशाली नही पर उसके पापा मसल रहे थे.. मौसम की चूत रस छोड़ते हुए उसकी पेन्टी को गीला कर रही थी.. सलवार के ऊपर से हाथ फेर रही वैशाली भी गीली हो रही पेन्टी को महसूस कर रही थी.. वैशाली ने आपा खोकर मौसम की पूरी चुत को कपड़े के ऊपर से ही अपनी मुठ्ठी में भरकर दबा दिया.. चूत पर दबाव आते ही मौसम को थोड़ी सी राहत हुई.. अपने बाप को अपनी खास सहेली के होंठों को बेताबी से चूसते हुए देखकर उसकी चुत में जबरदस्त खुजली होने लगी थी.. उससे अब रहा नही जा रहा था..

वैशाली और मौसम केबिन के अंदर का द्रश्य देखकर उत्तेजना और हवस से झुलसने लगे.. वैशाली मौसम के जिस्म को पीछे से दबोचे जा रही थी.. कमर के ऊपर सम्पूर्ण नग्न फाल्गुनी के स्तनों पर सुबोधकांत टूट पड़े.. दोनों हाथों से बेरहमी से उसने फाल्गुनी के बबलों को इतनी जोर से मसला की फाल्गुनी की आँखों में पानी आ गया.. वो दोनों धीरे से कुछ बात भी कर रहे थे पर मौसम या वैशाली को सुनाई नही दे रहा था..






मौसम अपने अंगों पर हो रही वैशाली की हरकतों का मज़ा लेते हुए अपने बाप और सहेली के गुलछर्रों को देख रही थी.. फाल्गुनी की पेन्टी के अंदर हाथ डालकर सुबोधकांत उसकी चूत से खेलने लगे.. चूत पर मर्दाना हाथ का स्पर्श होते ही फाल्गुनी सुबोधकांत से लिपट गई.. और उनके चेहरे को चूमने लगी.. चूमते हुए वह सुबोधकांत के शर्ट के बटन खोलने लगी और शर्ट को उतार दिया.. हेंडसम पर्सनालिटी वाले सुबोधकांत की चौड़ी छाती पर बालों के जंगल को देखकर वैशाली और मौसम भी गरम हो गए..

फाल्गुनी ने सुबोधकांत के पेंट की चैन खोली और उनका लंड बाहर निकाला.. अपने बाप का खुला लंड देखकर मौसम स्तब्ध हो गई.. ये वही अंग था जिसके रस से मौसम का जन्म हुआ था.. पुरुष का ये सख्त अंग.. किसी कुंवारी लड़की के मन में शर्म या हया को जन्म दे सकता है.. पर किसी अनुभवी स्त्री के लिए.. चूत की गहराई तक जाकर.. बच्चेदानी पर चोट करने वाला उपकरण था.. वैशाली काफी समय से लंड के लिए तरस रही थी.. उससे दोगुनी उम्र के पुरुष का लंड पकड़ने में शरमा रही फाल्गुनी पर वैशाली को गुस्सा आ रहा था.. उसके मुंह से निकल गया

"ये मादरचोद शरमा क्यूँ रही है? कितना मस्त लंड है यार.. !! मौसम, मैं तो उसे एक घंटे तक चुस्ती रहूँ फिर भी मेरा मन न भरें.. अंदर घुसाने पर कितना मज़ा आएगा यार.. !! ये सारी खुजली एकदम शांत हो जाए.. बाप रे.. काफी बड़ा है.. मन कर रहा है की अभी अंदर चली जाऊ और फाल्गुनी को धकेलकर तेरे पापा का लंड पकड़ लू.. "






मौसम: "तो चली जा अंदर.. और बुझा ले अपने जिस्म की प्यास.. !!"

वैशाली: "सही में यार.. बहोत मस्त लंड है तेरे पापा का.. इस उम्र में भी उनकी फिटनेस गजब की है.. मुझे तो सच में उनसे चुदवाने का मन कर रहा है.. यार, देख ना.. कैसे ऊपर नीचे झटके खा रहा है.. ये फाल्गुनी बेकार में समय बर्बाद कर रही है.. "

वैशाली ने अपना एक स्तन बाहर निकाला.. और मौसम को अपनी ओर घुमा दिया.. उसे नीचे झुकाकर अपनी निप्पल मौसम के मुंह में दे दी.. बिना शरमाये मौसम चूसने लगी क्योंकि वह खुद भी बहोत गरम थी.. वैशाली मौसम की सलवार के अंदर हाथ डालकर उसकी चूत में उंगली आगे पीछे करने लगी.. गीली पुच्ची में उंगली पुच-पुच की आवाज करते अंदर बाहर हो रही थी.. मौसम की चूत में फिंगर-फकिंग करते हुए वैशाली की हवस बेकाबू हो गई थी






वैशाली की कामुक बातें.. मुंह में उसकी निप्पल.. चूत में उसकी उंगली और सामने चल रही पापा और फाल्गुनी की रंगीन चुदाई.. इन सब के संयोजन से मौसम की चूत ने पानी छोड़ दिया.. किसी दूसरी दुनिया में पहुँच गई वो.. उसकी आँखें ऊपर चढ़ गई.. आह्ह आह्ह के उद्गार करते हुए वो वैशाली के शरीर पर ढल गई.. अचानक वज़न आने से दोनों असंतुलित होकर पास पड़े टेबल से टकराए और उसकी आवाज से सब चोंक उठे.. घबराकर मौसम खड़ी हुई.. अपने जिस्म को दुपट्टे से ढँकते हुए वो ऑफिस से बाहर भाग गई.. उधर आवाज सुनकर चोंके हुए सुबोधकांत ने अपनी केबिन का दरवाजा खोला.. वो अपना लंड भी पेंट के अंदर डालना भूल गए थे.. इस अचानक हरकत से सुबोधकांत का लंड सिकुड़ गया..

वैशाली अपने आप को संभाल पाती उससे पहले ही सुबोधकांत अपनी केबिन से लंड लटकाए हुए बाहर निकले.. बाहर वैशाली को खुले हुए स्तन के साथ खड़ी देखकर उनके आश्चर्य का कोई ठिकाना नही रहा

सुबोधकांत: "अरे तुम?? यहाँ कैसे.. ?? यहाँ का पता किसने दिया तुम्हें?"

वो आगे कुछ बोलते उससे पहले ही वैशाली उनसे लिपट गई और चूमने लगी.. सुबोधकांत को पता नही चल रहा था की ये सब अचानक क्या हो रहा था.. !!! पर फाल्गुनी से बड़े स्तन को खुला देख उनके लंड ने एक झटका जरूर लिया..

"इन सब बातों का टाइम नही है अभी अंकल.. मैं अभी बहोत गरम हूँ"

फाल्गुनी डरते हुए बाहर निकली और उसने देखा की सुबोधकांत और वैशाली एक दूसरे से लिपटे हुए थे.. वैशाली का चेहरा फाल्गुनी की तरफ था.. सुबोधकांत को पता नही था की फाल्गुनी बाहर आ चुकी है.. वैशाली ने फाल्गुनी को आँख मारी.. फाल्गुनी शरमाकर केबिन के अंदर चली गई..

तुरंत घुटनों पर बैठकर वैशाली ने सुबोधकांत का लंड मुंह मे ले लिया.. उसके मुंह की गर्मी से लंड पल भर में सख्त होकर लहराने लगा.. बाहर खड़ी मौसम, दरवाजे को हल्का सा खोलकर अपने बाप का लंड चूस रही वैशाली को देख रही थी.. वो अभी भी कांप रही थी..






जिस तरह वैशाली लंड चूस रही थी उससे साफ जाहीर हो रहा था की उसकी तड़प कितनी तीव्र थी.. मौसम बाहर खड़े ये देखकर घबरा रही थी की कहीं उसके पापा को पता न चल जाए की वो वैशाली के साथ थी और उनकी रंगरेलियों को देख चुकी थी.. !! दरवाजे से छुपकर देख रही मौसम पकड़े जाने के डर से थर थर कांप रही थी.. लेकिन वो चाहकर भी वहाँ से जा न सकी.. इतने करीब से वैशाली और पापा की हवस-लीला को देख रही मौसम को डर के साथ साथ चूत की खुजली भी सता रही थी जो उसे वहाँ से जाने से रोक रही थी.. उसकी कुंवारी जवान चूत लंड लेने के लिए बेचैन हो रही थी.. वैशाली ने साहस किया तो उसे लंड मिल गया.. मौसम ने आज एक महत्वपूर्ण पाठ सिख लिया था.. मजे करने के लिए साहस करना बेहद जरूरी था.. बिना साहस, सिद्धि नही मिलती.. और लंड भी नही मिलता.. !!

ऑफिस के बाहर सुमसान गली में खड़ी मौसम कपड़ों के ऊपर से ही अपने स्तनों को भींच रही थी.. मन ही मन उसने तय कर लिया था की एक बार तो जीजू के साथ चुदवाना ही पड़ेगा.. चाहे कुछ भी हो जाए.. अब मौका मिले तो शरमाकर वक्त बर्बाद नही करना है.. उस समय का भरपूर उपयोग कर पूरा मज़ा लेना है.. नही तो जीजू और मेरी दोनों की इच्छाएं अधूरी रह जाएगी..

शर्म से पानी पानी हो रही मौसम की नज़रों के सामने वैशाली अपने दोनों स्तनों को बेशर्मी से सुबोधकांत के हवाले करते हुए निप्पल चुसवा रही थी.. वैशाली के बड़े बड़े बबले देखकर सुबोधकांत का लंड लोहे की पाइप जैसा सख्त होकर ऊपर नीचे हो रहा था.. मौसम ने अपने पापा का विकराल लंड देखकर आँखें बंद कर ली.. और करती भी क्या.. !!






अपनी सहेली के उरोजों को मसल रहे पापा को देखकर मौसम के दिमाग में एकदम गंदा खयाल आया.. छी.. छी.. अपने सगे बाप के बारे में ऐसा सोचना कितना गलत है.. !! अपने आप पर ही घृणा होने लगी मौसम को.. दूसरी तरफ फाल्गुनी अंदर ऑफिस में बैठकर वैशाली और सुबोधकांत की कामुक हरकतों को देखकर ज्यादा गरम हो रही थी.. वैसे जब सुबोधकांत उसे छोड़कर बाहर निकलें तब उसका ऑर्गजम बाकी था.. बीच राह में छोड़कर गए लंड का वो बेसब्री से इंतज़ार कर रही थी.. टेबल पर पड़ी पेन लेकर फाल्गुनी अपनी चूत पर रगड़ने लगी..

वैशाली की हरकतें सुबोधकांत को पागल बना रही थी.. फाल्गुनी के मुकाबले वो अनुभवी थी इसलिए जिस तरह वो सहयोग दे रही थी उससे सुबोधकांत हतप्रभ थे.. उसके प्रत्येक स्पर्श में अनुभवी स्त्री की झलक थी.. चाहे सुबोधकांत के लंड को सहलाने की बात हो या उसके अंडकोशों को दबाने की.. सुबोधकांत वैशाली के अर्धनग्न शरीर पर भूखे भेड़िये की तरह टूट पड़ा था.. इतना गदराया बदन.. आहाहा.. वैशाली के जिस्म के मुकाबले फाल्गुनी का जिस्म काफी साधारण लगने लगा सुबोधकांत को.. अक्सर पुरुषों को सेक्स करते वक्त बेशर्म औरतें ज्यादा पसंद होती है.. वैशाली आखिर थी तो शीला की ही बेटी.. हवस और उत्तेजना में उसका कोई सानी नही था.. वो भी सुबोधकांत पर ऐसे टूट पड़ी जैसे आज के बंद उसे लंड मिलने वाला ही न हो.. और यहाँ किसी बात का कोई डर नही था.. फाल्गुनी और मौसम से तो वो खुल ही चुकी थी.. अब यहाँ उसे चुदवाने से कोई रोक नही सकता था..

जैसे जैसे वैशाली सोचती गई वैसे वैसे उसे महसूस हुआ की सुबोधकांत से चुदवाने में कोई खतरा नही था.. उसका सहयोग और बढ़ने लगा और उसके अंदर की भूखी स्त्री खिलने लगी.. जिसका सीधा फायदा सुबोधकांत को मिल रहा था.. वैशाली जवान थी.. खूबसूरत थी.. गदराए जिस्म वाली थी.. उसका भरा हुआ शरीर किसी भी मर्द को आकर्षित करने के काबिल था.. उसके स्तन बड़े बड़े थे और दो स्तनों के बीच की खाई इतनी नशीली थी किसी भी पुरुष को देखकर ही बीच में लंड डालने का मन हो जाए..

अब तक फाल्गुनी ने मौसम को देखा नही था इसलिए उसकी मौजूदगी के बारे में उसे पता नही चला था.. और सामने जब इतना बड़ा कांड चल रहा हो.. साथ में खुद की चूत में भी आग लगी हो.. तब और कहीं ध्यान जाता भी कैसे??

अपनी उत्तेजक हरकतों से वैशाली.. न केवल सुबोधकांत को मजे दे रही थी.. बल्कि साथ साथ फाल्गुनी और मौसम को प्रेक्टिकल ट्यूशन भी दे रही थी.. आज की इस क्लास के बाद मौसम और फाल्गुनी को सेक्स का पाठ कहीं और सीखने जाने की जरूरत नही पड़ने वाली थी.. वह दोनों परीक्षा में बैठकर उत्तीर्ण होने जीतने तैयार हो जाने वाले थे..

मौसम ने आज जीवन में पहली दफा किसी को लंड चूसते देखा था.. जिस अंग को वो मुंह में लेने लायक नही मानती थी.. वही अंग अभी उसे महंगी लोलिपोप जैसा लग रहा था.. जैसे जैसे मौसम वैशाली को अपने पापा का लंड चूसते देखती रही उसके मन में पीयूष जीजू का लंड चूसने की इच्छा और अधिक तीव्र होने लगी.. कभी कभी बेहद उत्तेजित होकर वैशाली पूरा लंड निगल जाती.. और कुछ सेकंडों के लिए वैसे ही स्थिर रहती तब मौसम को ताज्जुब होता की इतने लंबे समय तक वैशाली किस तरह इतना बड़ा लंड अंदर ले पा रही है.. !! एक पल के लिए तो मौसम को उलटी करने का मन होने लगा






अब तक के कार्यक्रम देखकर मौसम और फाल्गुनी ने लंड चूसना सीख लिया था.. लंड चूसते हुए अचानक वैशाली की नजर.. दरवाजे के पीछे से देख रही मौसम पर पड़ी.. उसने बड़ी ही चालाकी से सुबोधकांत को घुमाकर उनकी पीठ मौसम की ओर कर दी ताकि वो पकड़ी न जाए.. मौसम का डर अब चला गया..

अब मौसम को अपने पापा के कूल्हें नजर आ रहे थे.. लंड छोड़कर वैशाली खड़ी हुई और सुबोधकांत के गले लग गई.. उनकी बालों वाली छाती से अपने स्तनों को रगड़ते हुए वो उन्हे उनकी केबिन में खींच गई.. जहां फाल्गुनी कोने में पड़े सोफ़े पर पैर चौड़े कर अपनी चूत पर पेन रगड़ रही थी.. फाल्गुनी की आँखें बंद होने के कारण उसे पता नही चला की वैशाली और सुबोधकांत अंदर केबिन में आ चुके थे.. जब वैशाली ने फाल्गुनी के एक स्तन को दबाया तब उसने अचानक आँख खोली और शरमा गई..

वैशाली: "साली हरामजादी.. अपने बाप के उम्र के अंकल से चुदवाते वक्त तो शर्म नही आई थी तुझे.. तो अब क्यों शरमा रही है?"

फाल्गुनी को अब शर्म छोड़नी ही पड़ी क्योंकि उसका एक स्तन वैशाली चूस रही थी और दूसरा स्तन सुबोधकांत ने मुंह में ले रखा था.. साथ साथ दोनों फाल्गुनी की चूत में भी बारी बारी उंगली करने लगे.. एक साथ दो लोगों का स्पर्श पाकर फाल्गुनी की बची-कूची शर्म भी हवा हो गई.. और उसने सुबोधकांत के लंड को मुठ्ठी में पकड़ लिया.. वैशाली की लार से पूरा लंड गीला और चिपचिपा था.. फाल्गुनी का शरीर तब अकड़ कर सख्त हो गया जब वैशाली की जीभ उसकी चूत पर चलने लगी..








धीरे धीरे तीनों ने अपने सारे कपड़े उतार दिए.. और मादरजात नंगे हो गए.. कौन क्या कर रहा था उसकी परवाह कीये बगैर सब अपनी इच्छाओं को संतुष्ट करने में लग गए.. वैशाली सुबोधकांत का लंड अपनी चूत मे लेने के लिए तड़प रही थी.. सांप जैसे अपने शिकार को सूंघ रहा हो वैसे ही सुबोधकांत का सुपाड़ा वैशाली के चूत के होंठों को सूंघ रहा था..

अपने आप को अनुकूल पोजीशन में सेट करके वैशाली ने सुबोधकांत के लंड को अपनी चूत के छेद पर रखकर एक धक्का दिया.. आधा लंड अंदर घुस गया और वैशाली आनंद से नाच उठी.. हररोज चुदवाने की आदत वाली वैशाली को अपने पति से अनबन के बाद लंड के लाले पड़ गए थे.. अपने ससुराल में वो कहीं मुंह मार न सकी.. और बगैर लंड लिए उसे चलता नही था.. अच्छा हुआ की वो अपने मायके आ गई.. और उसे हिम्मत, पीयूष, राजेश सर और सुबोधकांत का लंड मिला.. वरना वो पागल हो जाती..

हिम्मत के साथ रोज रोज कर पाना मुमकिन नही था इसलिए उसने पीयूष को पटाया.. लेकिन पीयूष पड़ोस में ही रहता था.. किसी को पता चल जाने का डर था.. और आज कल तो वो भी मौसम में डूबा रहता था और उसकी तरफ देखता नही था.. राजेश सर के साथ उस छोटे से संभोग में मज़ा आया था पर तब बड़े टेंशन में उसने चुदवाया था.. वैशाली बड़े आराम से बिना किसी चिंता के चुदवाना चाहती थी और वो मौका आज उसे मिल ही गया..

वैशाली की चूत में सुबोधकांत का आधा लंड घुसा ही था तब फाल्गुनी ने कहा "वैशाली, पहले मेरा तो खतम हो जाने दे.. फिर तू करवा लेना.. तुझे देखकर अंकल बाहर भागे और मेरा अधूरा रह गया.. मैं तब से बैठी तड़प रही हूँ.. नीचे चुनचुनी हो रही है कब से.. अगर अंकल जल्दी अंदर डालेंगे नही तो मैं पागल हो जाऊँगी.. ओह्ह.. देख ना.. कब से इस पेन को घिसे जा रही हूँ.. अंकल प्लीज पहले मुझे करो फिर वैशाली के साथ करना"






अपने दोनों स्तनों को विजातीय और सजातीय दोनों पात्रों से चुसाई होते देख फाल्गुनी की हवस पराकाष्ठा पर पहुँच गई थी.. वैशाली ने फाल्गुनी की चिपचिपी चूत में दो उँगलियाँ डालकर अंदर बाहर किया.. और फिर फाल्गुनी को सोफ़े पर उलटे होकर डॉगी स्टाइल में हो जाने को कहा.. सुबोधकांत का लंड पकड़कर वैशाली ने उसे फाल्गुनी की चूत की तरफ खींच और उसके सुराख पर सुपाड़ा रख दिया.. जानी पहचानी चूत पर सुपाड़े ने वीर्य की एक बूंद गिराकर चुंबन किया.. उत्तेजना के कारण और पेन से घिसाई करने के बाद चिपचिपी चूत में सुबोधकांत का लंड एक धक्के में घुस गया.. फाल्गुनी के चूतड़ों को दोनों हाथों से फैलाकर लंड के शानदार योनि-प्रवेश का नजारा बिल्कुल करीब से देखने लगी वैशाली..





सोफ़े पर घोड़ी बनी फाल्गुनी अपनी चूत में सुबोधकांत के लंड के धक्के खा रही थी.. तभी वैशाली उसकी पीठ पर इस तरह सवार हो गई की उसके दोनों स्तन सुबोधकांत के बिल्कुल सामने आ जाए.. और अपनी नंगी चूत को फाल्गुनी की कमर पर रगड़ते हुए.. सुबोधकांत का सर अपने भव्य स्तनों के बीच दबा दिया..

लंड पर महसूस होती फाल्गुनी की चूत की गर्मी.. और चेहरे पर वैशाली के स्तनों की गर्माहट का एहसास.. सुबोधकांत की तो जैसे लॉटरी लग गई थी.. लयबद्ध तरीके से कमर को हिलाते हुए फाल्गुनी ने पूरा लंड अंदर ले लिया था.. फुला हुआ लोडा पूरा अंदर तक घुसते ही उसकी नाजुक चूत सहम गई.. उसे दर्द होने लगा

"आह्ह.. मर गई.. ऊई माँ.. थोड़ा सा बाहर निकालिए अंकल.. !!" फाल्गुनी चीख रही थी.. पर उसका कोई विरोध नही था.. ये तो आनंद भरी चीखें थी.. कुछ पीड़ाएं ऐसी होती है जिसमे अद्वितीय आनंद छुपा होता है.. अपने प्रियतम के हाथों स्तन मर्दन से होती पीड़ा का अनुभव करने के लिए हर माशूका दुनिया से छुपकर.. अपने चेहरे को दुपट्टे से ढँककर.. गली गली फिरती नजर आती है.. उस पीड़ा में जो आनंद की अनुभूति होती है वैसा ही कुछ फाल्गुनी को भी महसूस हो रहा था.. वैशाली भी सुबोधकांत के लंड को अंदर बाहर होते देखकर अपने स्तनों को जोर से मसलवाते हुए उसी पीड़ा भरे आनंद के मजे लूट रही थी..






सुबोधकांत वैशाली के स्तनों की साइज़ पर फ़ीदा हो चुके थे.. इतने बड़े होने के बावजूद एकदम सख्त थे वैशाली के स्तन.. वैशाली के होंठों पर किस करते हुए सुबोधकांत ने कहा

"लगता है ज्यादा इस्तेमाल नही हुए है.. इसीलिए इतने टाइट है"

वैशाली: "हाँ अंकल.. मेरे पति से मेरी जमती नही है इसलिए जिस्मानी सुख के लिए तड़प रही हूँ.. फाल्गुनी ने मुझे माउंट आबू में आप दोनों के संबंधों के बारे में बताया तब से दिल कर रहा था की कब मुझे भी आप के साथ करने का मौका मिलें.. !! फाल्गुनी का हो जाए बाद में मेरे साथ भी करोगे ना अंकल, प्लीज??"

ये एक ऐसी रीक्वेस्ट थी जिसे दुनिया का कोई मर्द मना नही कर सकता.. सुबोधकांत हवस से पागल हो रहा था.. वैशाली जैसा कडक माल सामने से चुदने के लिए विनती कर रहा हो तब कौन भला इनकार करेगा?? वैशाली के दोनों स्तनों को तहसनहस करते हुए सुबोधकांत ने कहा

"तेरे साथ भी करूंगा मेरी जान.. तेरी चूत चाटकर पहले गरम करूंगा और फिर तसल्ली से चोदूँगा.. और ऐसा चोदूँगा की तेरे पति की कमी तुझे महसूस नही होगी.. जब मन करें मेरी ऑफिस पर चली आना.. तुझे रानी बनाकर चोदूँगा.. !!" उत्तेजक बातें करते हुए सुबोधकांत ने फाल्गुनी की चूत का फ़ालूदा बना दिया.. उनके दमदार लंड के हर धक्के पर फाल्गुनी आह-आह कर रही थी..

"डॉन्ट वरी फाल्गुनी.. अभी दर्द सहन कर ले.. अंकल का मोटा है इसलिए दर्द हो रहा है.. पर शादी के बाद बिल्कुल तकलीफ नही होगी तुझे और तेरे पति का बड़ी आसानी से अंदर चला जाएगा.. " संकरी चूत में लंड अंदर बाहर होने से कराह रही फाल्गुनी के लटक रहे बबलों को दबाते हुए वैशाली ने कहा

"वैशाली यार.. तेरे बोल बड़े मस्त है.. मेरे इतने बड़े होते तो कितना अच्छा होता.. ?? वैसे तेरे इतने बड़े बड़े हुए कैसे?" फाल्गुनी ने पूछा.. वह देख सकती थी की सुबोधकांत का सारा ध्यान वैशाली के बड़े स्तनों पर था और उसे स्त्री सहज ईर्ष्या हो रही थी

फाल्गुनी के लटकते स्तनों को पकड़कर मसलते हुए वैशाली ने कहा "ओह फाल्गुनी.. तू रोज अंकल से बॉल दबवाना और चुदवाते रहना.. वो जीतने ज्यादा दबाएंगे उतने ही बड़े होते जाएंगे तेरे.. और रोज चूत में अंकल के लंड का पानी जाएगा तो उससे पोषण पाकर तेरे स्तन मुझ जैसे बड़े हो जाएंगे.. जितना ज्यादा चुदवाएगी उतने बड़े होंगे " खिलखिलाकर हँसते हुए मज़ाक करने लगी वैशाली

जितना मज़ा सुबोधकांत को फाल्गुनी के साथ संभोग करने में आ रहा था उतना ही मज़ा उन्हें वैशाली की कामुक बातों में भी आ रहा था.. सुबोधकांत ने जीवन में पहली बार किसी जवान लड़की को इस तरह खुली भाषा का प्रयोग करते हुए सुना था.. इन नंगी बातों को सुनकर उनका लंड.. फाल्गुनी की चूत के अंदर और सख्त हो रहा था.. और ये फाल्गुनी भी महसूस कर रही थी.. पहले के मुकाबले आज उसे कुछ ज्यादा ही दर्द हो रहा था.. वो यही सोचकर परेशान हो रही थी की अंकल आज पिछली बार के मुकाबले ज्यादा आक्रामक क्यों लग रहे थे.. !! वैसे इतनी बार चुदने के बाद तो दर्द कम होना चाहिए.. फिर आज क्यों इतना दर्द हुआ? क्या हर बार के मुकाबले आज उनका लंड ज्यादा मोटा था?

हकीकत तो यह थी.. फाल्गुनी की कमसिन जवानी के साथ वैशाली का जोबन साथ मिलते ही.. सुबोधकांत का लंड उत्तेजना से फूल गया था.. दो लड़कियों को एक साथ भोगने का सुबोधकांत के लिए भी पहला मौका था.. वह भी एक कारण था.. !!

सुबोधकांत ने अपने धक्कों की गति बढ़ा दी और फाल्गुनी की चूत में हाहाकार मच गया.. उनकी केबिन का दरवाजा खुला ही था इसलिए मौसम भी एकदम बाहर खड़े हुए यह सारा नजारा देख पा रही थी.. अपनी दोनों सहेलियों को पापा से चुदते हुए देख वो बेकाबू होकर अपने स्तन मसल रही थी..

उसी वक्त मौसम के मोबाइल की रिंग बजी.. अब तक छुपकर बैठी मौसम की पोल खुलने वाली थी.. हड़बड़ाते हुए मौसम ने फोन काट दिया.. और दरवाजे से दूर डस्टबिन के पीछे छुप गई..

"किसका फोन बजा??" सुबोधकांत ने वैशाली से पूछा.. वैशाली ने जवाब नही दिया पर सुबोधकांत को पक्का यकीन हो गया की बाहर जरूर कोई था.. सुबोधकांत के चेहरे के हावभाव देख वैशाली भी चौकन्ना हो गई.. अगर अंकल को डाउट गया और वो बाहर गए तो मौसम पकड़ी जाएगी..

"अरे अंकल, वो तो बाहर से कोई गुजरा होगा और उसका मोबाइल बजा होगा.. " कहते हुए वैशाली ने अपने अमोघ-शस्त्र जैसे स्तनों के बीच सुबोधकांत का सर दबा दिया.. वैशाली के भरपूर स्तनों को मुंह में लेकर चूसते हुए सुबोधकांत मोबाइल की रिंग को भूल गए.. और उस स्वर्गीय आनंद का लुत्फ उठाने लगे






अब मौसम ने अपने कपड़े ठीक कीये.. और मोबाइल स्विच ऑफ कर दिया.. और चुपके से अपनी स्कूटी की ओर चल दी.. उसके हर कदम के साथ उसकी चूचियाँ ऊपर नीचे हो रही थी.. आते जाते लोगों की नजर उस जवान स्तन-युग्म पर चिपक गई थी.. मौसम गली के बाहर जाकर स्कूटी के पास खड़ी रहकर वैशाली का इंतज़ार करने लगी.. आते जाते लोगों की नज़रों से परेशान होकर उसने स्कूटी स्टार्ट किया और पास के एक गार्डन की बैठक पर जा बैठी.. आज उसने जो कुछ भी देखा था वो उसे ज़िंदगी भर याद रहने वाला था.. उम्र के ऐसे मुकाम पर उसने यह द्रश्य देखा था जब की वह खुद जवानी के महासागर की उन्मादक लहरों में गोते खा रही थी.. पापा इतने कामुक होंगे उसका उसे अंदाजा नही था.. अपने पापा का जितना सन्मान उसकी नज़रों में था वह सब एक ही पल में खाक हो कर रह गया.. मेरे पापा ऐसे ??? छी..छी..छी.. क्या पापा को मेरी मौजूदगी के बारे में पता चल गया होगा? क्या उन्होंने मेरे मोबाइल की रिंग सुन ली होगी?

मौसम ने तुरंत अपनी ब्रा में दबाए मोबाइल को बाहर निकाला और स्विच ऑन किया.. सब से पहला काम उसने अपना रिंगटोन बदलने का किया.. ताकि फिर कभी सुबोधकांत उस रिंगटोन को सुनकर शक न करें..

मौसम विचार कर रही थी की वैशाली को कैसे बताऊँ की मैं यहाँ गार्डन में बैठी हूँ?? अभी क्या कर रही होगी वो? बहोत ही हॉट है वैशाली.. पापा के साथ सब काम पूरा करके ही आएगी.. फाल्गुनी भी हरामी छुपी रुस्तम निकली.. जितनी भोली लगती है वैसी है नही.. कितनी मस्ती से पापा से चुदवा रही थी.. !! फिर वो सेक्स की बातें करते वक्त इतना डरती क्यों थी?? अभी तो उसके चेहरे पर कोई डर नही था.. या फिर मेरे साथ नाटक करती थी?? अब तक तो उसने फाल्गुनी और पापा के कारनामों के बारे में सिर्फ सुना ही था.. आज अपनी सगी आँखों से देख भी लिया.. सारे भेद आज खुल चुके थे.. पापा को अपनी बेटी की उम्र की लड़की के साथ ये सब करने में शर्म नही आई होगी?? दोनों के बीच ये प्रेम प्रकरण की शुरुआत कैसे हुई होगी? पहल पापा ने की होगी या फाल्गुनी ने? अनगिनत सवालों से मौसम का दिमाग घिर चुका था पर जवाब नही थे

लगभग एक घंटा बीत चुका था पर वैशाली लौटी नही थी.. मौसम को अपनी जगह पर ना देखकर वो फोन तो जरूर करती.. बैठे बैठे मौसम बोर हो रही थी.. कितनी देर लगा दी वैशाली ने?? अब तक उसकी आग नही बुझी?? क्या करूँ? फोन करूँ उसे? पर पापा को पता चल जाएगा.. फोन तो नही कर सकती..



बिल्कुल उसी वक्त पीयूष, कविता, शीला और मदन ने उसी बागीचे में प्रवेश किया जहां मौसम बैठी हुई थी.. मौसम उनको देखकर घबरा गई और झाड़ियों के पीछे छुपने जा ही रही थी की तब शीला ने उसे देख लिया..
 
लगभग एक घंटा बीत चुका था पर वैशाली लौटी नही.. मौसम को अपनी जगह पर ना देखकर वो फोन तो जरूर करती.. बैठे बैठे मौसम बोर हो रही थी.. कितनी देर लगा दी वैशाली ने?? अब तक उसकी आग नही बुझी?? क्या करूँ? फोन करूँ उसे? पर पापा को पता चल जाएगा.. फोन तो नही कर सकती..

बिल्कुल उसी वक्त पीयूष, कविता, शीला और मदन ने उसी बागीचे में प्रवेश किया जहां मौसम बैठी हुई थी.. मौसम उनको देखकर घबरा गई और झाड़ियों के पीछे छुपने जा ही रही थी की तब शीला ने उसे देख लिया..

"अरे मौसम.. तू यहाँ कैसे?? अकेली बैठी क्या कर रही थी?" शीला ने पूछा.. कविता और पीयूष भी चोंक गए थे मौसम को यहाँ देखकर

मौसम के दिमाग में तुरंत कोई जवाब नही आया.. क्या बहाना बनाउ??

"वैशाली बाथरूम गई है.. उसके वापिस आते ही हम घर जा रहे थे.. आप सब जगह घूम आए? कैसा लगा मेरा शहर?" मौसम ने अपने चेहरे पर जूठी मुस्कान लाकर कहा

मौसम कितनी भी होशियारी क्यों न कर ले.. आखिर वो नादान थी.. अनुभवहीन थी.. प्रपंचों की कला उसे आती नही थी.. उसके सुंदर चेहरे पर कुछ छुपाने का भाव स्पष्ट नजर आ रहा था.. शीला की शातिर नजर ने ये बखूबी पकड़ लिया

जवान लड़कियों के निजी मामलों में दखल नही देनी चाहिए ऐसा शीला मानती थी.. मौसम के झूठ को तो उसके दिमाग ने पकड़ लिया था पर वो उसे परेशान करना नही चाहती थी..

"चलो सब.. ये तो गार्डन ही है.. यहाँ कुछ खास देखने लायक नही है.. पीयूष, हमें किसी मॉल में ले चल.. यहाँ तक आए है तो थोड़ी शॉपिंग भी कर लेते है" कहते हुए शीला बाकी सब को लेकर गार्डन से निकल गई

मन ही मन शीला भाभी के प्रति आभार प्रकट करते हुए मौसम ने चैन की सांस ली.. अब उसके पास कोई चारा नही था.. डरते डरते उसने वैशाली को फोन लगाया

"हैलो, कहाँ है तू यार.. मैं तो कब से तुझे ढूंढ रही हूँ" वैशाली ने उल्टा सवाल किया

चिढ़ी हुई मौसम ने कहा "अरे बेवकूफ.. कितनी देर तक खड़ी रहती वहाँ? आते जाते सब लोग मुझे शक की निगाह से देख रहे थे.. और तू तो बाहर निकलने का नाम ही नही ले रही थी? क्या किया इतनी देर तक? तेरा मन भरा की नही? चल छोड़.. जहां मैंने स्कूटी पार्क किया था वहीं इंतज़ार कर.. मैं दो मिनट में पहुँचती हूँ"

फोन काटकर मौसम ने स्कूटी दौड़ा दी.. वैशाली को देखकर आज पहली बार मौसम शरमा गई.. जो लड़की उसके सामने खड़ी थी वो अभी अभी उसके पापा से चुदवाकर आई थी.. ये बात मौसम को शर्माने के लिए काफी थी

मौसम की स्कूटी वैशाली के करीब आते ही दोनों की आँखें चार हुई और वैशाली ने शरारती मुस्कान के साथ मौसम को देखा.. वैशाली के शरीर और चेहरे की चमक देखते ही पता लगता था की वो पूर्णतः संतुष्ट होकर आई थी.. जब वो अंदर गई तब निस्तेज थी.. चेहरे पर नूर नही था.. और अब एक घंटे के बाद उसका चेहरा गुलाब के पौधे की तरह खिला खिला लग रहा था.. मौसम समझ गई की पापा के संग सेक्स भोगकर वैशाली इतनी संतुष्ट हो गई थी की उसका चेहरा चमक रहा था..

पेट की भूख के लिए होटल या रेस्टोरेंट आसानी से मिल जाते है पर जिस्म की भूख के लिए?? उसके लिए तो मन को मनाकर तड़पना पड़ता है.. पुरुष तो फिर भी रेड-लाइट एरिया में जाकर अपनी भूख मिटा सकते है पर औरतों के लिए ऐसी कोई व्यवस्था नही है.. विधवा, तलाक-शुदा औरतें.. या फिर ऐसी औरतें जिनका पति अब उन्हें संतुष्ट नही कर पाता.. ये सब बेचारी कैसे अपनी आग बुझाएं.. !! हर जगह सामाजिक बंधन अड़ंगा जमाएं उन्हें रोक लेते है.. ऐसी कोई व्यवस्था होनी ही चाहिए जहां कोई भी लड़की या औरत बेफिक्री से और गर्व के साथ अपनी भूख संतुष्ट कर सकें.. पर नही.. पुरुष प्रधान समाज इसकी कभी इजाजत नही देगा..

कई पुरुष सिर्फ यही समझते है की स्त्री, जब चाहे इस्तेमाल करने का और भोगने का साधन मात्र है.. पर स्त्री की जरूरतों के बारे में पूछने का खयाल उनके दिमाग में कभी नही आता.. सामाजिक शर्म के कारण शारीरिक रूप से असन्तुष्ट स्त्री बेचारी इज्जत को बचाने के चक्कर में सेक्स के परम आनंद को भोग नही पाती.. आखिर उस भूख से तड़प तड़पकर.. अयोग्य पुरुषों को अपना जिस्म सौंप बैठती है और फिर वही पुरुष उसके विश्वास का भंग करके.. पान की दुकान या चाय की टपरी पर.. अपने दोस्तों के बीच.. उस स्त्री के शरीर को कैसे भोगा.. उसका विवरण देकर वाह-वाही बटोरते है.. जैसे शिकारी शेर मारकर आया हो.. !!

स्त्री वाकई इन मामलों में अबला है.. क्यों की जिस मर्द पर वो पूरा विश्वास रखकर अपना सर्वस्व अर्पण करती है.. वही पुरुष दुःशासन बनकर पब्लिक में उनके जिस्म का वर्णन कर, सरेआम वस्त्राहरण कर देते है.. इन सारी बातों से अनजान वह स्त्री उस मर्द को प्यार कीये जाती है और उल्लू बनती रहती है.. जब उसे पता चलता है तब तक बहोत देर हो चुकी होती है और वो कुछ नही कर पाती.. ऐसे लोफ़रों से प्यार करना चक्करखिली की सवारी जैसा होता है.. सिर्फ गोल गोल घूमते है पर मंजिल पर कभी नही पहुंचते..

खैर, अब वक्त बदल रहा है.. स्त्री सशक्तिकरण पूरे ज़ोरों से चल रहा है.. और कई स्त्रीयां इसका गलत लाभ भी भरपूर उठा रही है.. जरूरत है.. सोच बदलने की.. पुरुषों को और स्त्रीयों को भी.. !!

वैशाली मौसम के पीछे उसके काँधें पर हाथ रखकर स्कूटी पर बैठ गई.. फिर से एक बार वैशाली के मदमस्त स्तन मौसम की पीठ से दबकर चपटे हो गए.. मौसम को बहोत कुछ पूछना था पर स्कूटी चलाते वक्त ये सब बातें करना उसे ठीक नही लगा.. वैशाली के तमाम जवाबों में उसके पापा शामिल थे और उसे आखिर ये सब सुनकर शर्म ही आनेवाली थी.. पर स्त्री का मन ही ऐसा होता है.. वो कोई बात छुपा ही नही सकती.. कोई भी गुप्त या गोपनीय बात किसी औरत से कहें तो उसके थोड़े ही वक्त में पूरे मोहल्ले को वो बात पता चल जाती है.. अगर वाकई में आप किसी बात को गुप्त रखना चाहते है तो वो बतानी ही नही चाहिए..

कुदरत ने स्त्री का मन बड़ा ही भोला बनाया है.. जिसके साथ बात करती है उस पर पूर्ण विश्वास रखकर अपनी सबसे गुप्त बातें भी शेर कर देती है.. अनजान स्त्रीयां आपस में इसीलिए तो बड़ी ही आसानी से घुलमिल जाती है.. लड़की अपने बॉयफ्रेंड से पहली किस करे तब उसे तब तक चैन नही पड़ता जब तक वो इस बारे में अपनी खास सहेली को बता नही देती.. उसकी किस तब तक पूर्ण ही नही होती.. इसी लिए तो जब वो लड़की अपने परिवार से छुपकर किसी लोफ़र के साथ भाग जाती है तब पुलिस सब से पहले उसकी सहेली से पूछताछ करती है.. पुलिस भी जानती है की लड़कियां अपने कारनामों के बारे में किसी न किसी सहेली की जरूर बताती है.. सहेली को सारी बात बताकर कहती है की किसीको बताना मत.. अरे, जब बात छुपानी ही है तो बताना क्यों?? फिर जब वो दोनों पुलिस के हाथों पकड़े जाते है.. तब उसके बॉयफ्रेंड को इतने डंडे पड़ते है.. की चुदाई का सारा मज़ा एक पल में गायब हो जाता है.. आखिर तक उस लड़के के दिमाग में यहीं विचार आता रहता है की आखिर उनके बारे में पुलिस को बताया किसने??

वैशाली भी सारी बातें बताने से खुद को रोक नही पाई.. एक के बाद एक रोमांचक अनुभव वो मौसम को बताती गई..

मौसम ने सिर्फ इतना ही पूछा.. "आखिर इतनी देर क्यों हुई तुझे? एकाध बार करवाने में इतना वक्त लगता है क्या?"

वैशाली: "अरे यार.. पहले अंकल ने फाल्गुनी को चोदा.. अब मर्द का एक बार निकल जाए फिर तुरंत तैयार नही होता.. "

मौसम के निर्दोष दिमाग को ये समझ में नही आया... उसने पूछा "मतलब.. ??"

वैशाली: "एक बार मर्द चोद ले और उसकी पिचकारी निकल जाए.. फिर उसके लंड को टाइट होने में थोड़ा वक्त लगता है.. ऐसे तुरंत ही खड़ा नही हो सकता.. !!"

"ओह.. !! अब समझी" स्कूटी को रोड पर मोड़ते हुए मौसम ने कहा

रास्ते के गड्ढों पर स्कूटी ऐसे उछल रही थी की अगर वैशाली को लंड होता तो अब तक उसने मौसम को दो-तीन बार स्खलित कर दिया होता.. वैशाली की कामुक बातों से और पीठ पर दब रहे स्तनों से मौसम तो उत्तेजित तो हो ही चुकी थी.. ऊपर से गड्ढों में ऊपर नीचे होकर पटखनी खाती स्कूटी की सीट पर चूत के घर्षण से बहोत मज़ा भी आ रहा था.. कुछ गड्ढों पर तो मौसम ने जानबूझकर स्कूटी डाल दी थी.. जो काम वो अपने जीजू से करवाना चाहती थी वही काम स्कूटी पर बैठे बैठे हो रहा था.. वो सोच रही थी.. जीजू को प्रोमिस तो कर दिया है पर अब उसे निभाऊँ कैसे?? अकेले मिलने का वादा तो कर लिया पर मिलेंगे कहाँ? और कब? बड़ा ही पेचीदा सवाल था.. तरुण के साथ सगाई से पहले जीजू के साथ मौका मिल जाए तो सब कुछ संभल जाएगा..

काफी अंधेरा हो चुका था.. साढ़े सात का समय हो रहा था..

वैशाली ने बात आगे बढ़ाई "थोड़ी देर बाद तेरे पापा का फिर से खड़ा हुआ.. फिर मैंने करवाया.. पर अंकल को मेरे साथ इतना मज़ा आया की जब मैं निकल रही थी तब मेरा हाथ पकड़ लिया और कहा की उन्हें एक बार ओर मेरे साथ करना था.. अब तू बाहर मेरा इंतज़ार कर रही थी.. इसलिए मैं जाना चाहती थी पर क्या करती!! मैं अंकल को मना नही कर सकी.. असल में मुझे ही एक बार करवाने में संतोष नही हुआ था.. और दूसरी बार ऑर्गजम आने में हमेशा थोड़ी देर लगती है.. सॉरी बेबी.. तुझे इतना इंतज़ार करवाने के लिए.. पर यार आज तो मज़ा ही आ गया.. आई फ़ील सो हैप्पी.. ऐसा मज़ा ज़िंदगी में कभी नही आया.. मस्त और तंदूरस्त है तेरे पापा.. और शक्तिशाली भी.. ऐसे करारे शॉट मारे है.. आह्ह.. नीचे तो सब बाग बाग हो गया.. बहोत मज़ा आया.. !!"

ऊबड़खाबड़ रास्तों पर अपनी चूत रगड़ते हुए मौसम का जिस्म सख्त हो गया.. उसकी चूचियाँ टाइट हो गई..

"वैशाली.. यार.. मेरे बॉल दबा दे.. प्लीज.. !! तेरी बातों ने मुझे पागल बना दिया है.. ओह्ह.. अब मुझे आगे कुछ नही सुनना.. नहीं तो जिस तरह तू मेरे पापा के पास गई वैसे मुझे तेरे पापा के पास जाना पड़ेगा" मौसम ने सिसकियाँ लेते हुए कहा










"तो जा ना.. किसने रोका है.. !! हाँ, मेरी मम्मी को पता नही चलना चाहिए.. वरना वो तेरी गांड फाड़कर रख देगी.. " अंधेरे का लाभ उठाते हुए वैशाली मौसम के स्तनों को दबाने लगी..

"आह्ह.. आह्ह.. मज़ा आ रहा है यार.. जोर से दबा.. मसल दे जोर से.. ओह्ह"

"जैसे तेरे पापा मेरे दबा रहे थे वैसे ही दबाऊ? या ओर जोर से?" वैशाली ने मौसम की गर्दन को पीछे से चूमते हुए कहा..

मौसम: "वैशाली.. मेरा बहोत मन कर रहा है यार.. की तुझसे अपनी चुत चटवाऊँ.. !!"

वैशाली: "तू फिकर मत कर.. रात को हम दोनों एक ही कमरे के सो जाएंगे.. तब तेरी ये इच्छा पूरी कर दूँगी.. और लगभग ये हमारी आखिरी मुलाकात होगी.. मैं तो फिर कलकत्ता लौट जाऊँगी.. कौन जाने फिर कब मिलना होगा हमारा.. !!"

मौसम: "क्यों? मेरी सगाई और शादी में नही आएगी तू?"

वैशाली: "अरे पगली.. तब हम एक दूसरे की चूत थोड़ी न चाट पाएंगे..!! तब तो तू तरुण के सपनों में और उसके लंड की याद में खो गई होगी.. " तभी स्कूटी मौसम के घर के नजदीक पहुँच गई..

मौसम: "मेरी छाती से हाथ हटा ले.. घर आ गया.. अब बाकी सब रात को करेंगे"

मौसम और वैशाली ने घर में प्रवेश किया.. सुबोधकांत को आराम से टीवी देखते हुए देखकर दोनों चकित हो गए.. मजे की बात तो ये थी की सुबोधकांत ने वैशाली और मौसम की ओर देखा तक नही.. और वैसे अच्छा ही हुआ.. वो देखते तो भी मौसम उनसे नजरें मिला नही पाती.. थोड़ी ही देर पहले अपने पापा को नंगा.. चुदाई करते हुए देखा था.. वो द्रश्य उसकी आँखों के सामने से हट ही नही रहा था.. सदमा, उत्तेजना और ईर्ष्या.. ये सारे भाव.. एक साथ परेशान कर रहे थे मौसम को.. !!

मौसम को उसके पापा की ओर देखती हुई देख.. वैशाली ने उसके हाथों को दबाया.. और मस्ती भरी मुस्कान के साथ आँख मारी..

भोजन के बाद.. सुबोधकांत, मदन और पीयूष के साथ पान की दुकान पर गए.. राजनीति से लेकर ओलिंपिक्स तक ढेर सारी बातें हुई.. पर पीयूष को उन बातों में जरा भी दिलचस्पी नही थी.. उसका दिमाग तो बस मौसम के दो खुले स्तन और उसके नीचे के टाइट छेद के बारे में सोच रहा था.. उसे तो घर से बाहर निकलना ही नही था.. पर क्या करता.. सारी लड़किया और औरतें.. शॉपिंग, ज्वेलरी और साड़ियों की बातें कर रही थी.. वहाँ बैठकर करता भी क्या??

थोड़ी देर बाद वो तीनों घर वापिस लौटे.. तब मौसम की शादी की बातें पूरे जोर-शोर से हो रही थी.. थोड़ी थोड़ी देर पर पीयूष वैशाली और शीला के स्तनों को देखकर उनके बीच साम्यता ढूँढने की निरर्थक कोशिश कर रहा था..

रमिला बहन: "दामाद जी, आपको और कविता को शादी के दो हफ्तों पहले से यहाँ आ जाना होगा.. सारी तैयारियां आप लोगों को ही तो करनी है.. अब हमारी उम्र हो चली है.. भाग-दौड़ के सारे काम आप को ही करने होंगे.. " ये सुनकर वैशाली मन ही मन हँसकर सोच रही थी.. आंटी, उम्र तो आपकी होगई है.. आपके पति में तो अभी बहोत जान बाकी है.. !!

तभी मदन के फोन की घंटी बजी.. पोलिस स्टेशन से उसके दोस्त का फोन था.. वो उठकर छत पर चला गया.. शीला बेहद डर गई.. अब क्या हुआ होगा?? कहीं पूछताछ में संजय या हाफ़िज़ ने कुछ बता तो नही दिया होगा?? बाप रे.. अब मैं क्या करूँ?? मन ही मन वो प्रार्थना करने लगी

इंस्पेक्टर: "मदन, तेरे दामाद को मैंने बराबर खर्चा-पानी दे दिया है.. बता अब क्या करूँ उसके साथ?? तेरा दामाद है इसलिए मैंने अब तक केस नही बनाया है"

मदन: "अभी तो मैं एक काम से शहर से बाहर हूँ.. कल शाम तक वापिस आऊँगा.. फिर मैं आकर उसे ले जाऊंगा.. आज रात वहीं लोकअप में मेहमान-नवाजी कर उसकी.. वैसे भी वो काफी टाइम से मेरी बेटी को परेशान कर रहा है"

मदन गंभीर चेहरे के साथ लौटा

वैशाली: "पापा, सब ठीक तो है ना?? पुलिस स्टेशन से क्यों फोन आया था?" मदन के चेहरे की उदासी देखकर पता चल रहा था की सब ठीक तो नही था.. मदन ने शीला की आँखों में देखा और दोनों इस बात से सहमत हुए की सुबोधकांत को ये बात बताने में कुछ गलत नही था

शीला ने अपनी बेटी की अस्तव्यस्त ज़िंदगी के बारे में सब को बताया और साथ ये भी कहा की अपने दामाद को कहीं सेट करने के बारे में वो लोग कितने चिंतित थे.. हालांकि संजय जैल में बंद है ये बात नहीं बताई.. ये बात तो वैशाली को भी पता नहीं थी.. सिर्फ शीला और मदन ही इस बात को जानते थे.. वैशाली की आँखों से आँसू टपकने लगे.. सारा वातावरण गंभीर हो गया.. ये सारी बातें सुनकर सुबोधकांत के दिमाग में एक प्लान आकार लेने लगा था..

सुबोधकांत ने वैशाली की ओर देखकर कहा "बेटा.. अगर तुम लोगों को कोई प्रॉब्लेम न हो तो इस शहर में शिफ्ट हो जाइए.. मेरा बिजनेस बहोत बड़ा है.. और अच्छे काम करने वाले लोगों की मुझे हमेशा जरूरत पड़ती है.. मेरे लिए तो जैसे कविता मेरी बेटी है वैसी है है तू.. दोनों एक बराबर"

मौसम ये सुनकर सोचने लगी.. ये मेरा बाप तो वक्त आने पर कविता दीदी को भी चोद ले ऐसा हरामी है..पता नही क्या प्लान बनाया है साले ने.. लगता है मेरे बाप ने एक तीर से दो शिकार करने का तय किया है.. पहला शिकार वैशाली और दूसरा शीला भाभी का.. बड़ा लंबा सोचा था.. !!

वैशाली की गृहस्थी की बात आते ही वातावरण काफी शांत और गंभीर हो गया.. शीला और मदन की मानसिक स्थिति समझी जा सकती थी.. उनका दामाद जैल में बंद था.. ऐसी सूरत में उनकी मायुषी और उदासी देखते ही बनती थी..

वातावरण की गंभीरता कम करने के इरादे से मौसम की माँ, रमिला बहन ने कहा "आज मौसम ने लड़का पसंद कर लिया है.. सब का मुंह मीठा कराना होगा.. पीयूष कुमार.. जरा सुनिए तो.. !!"

"हाँ मम्मी जी.. कहिए क्या करना है?"

तभी सुबोधकांत ने कहा "आप और कविता बाजार जाइए.. और सब के लिए आइसक्रीम लेकर आइए"

पीयूष क्या बोलता.. !! सास और ससुर की इच्छा को तो पूरा करना ही था.. पर सुबोधकांत को कहाँ पता था की पीयूष और कविता एक दूसरे से सीधे मुंह बात भी नही करते थे.. !!

पीयूष ने कविता के सामने देखा.. कविता भी अपने माँ बाप की बात को टाल न सकी.. पीयूष के प्रति अपनी नफरत को छुपाकर उसने हँसते हुए चेहरे से हामी भरी और खड़ी हो गई..

पीयूष सोच रहा था की अगर कविता के साथ सारे झगड़े खतम करने हो तो ये अच्छा मौका था..

पीयूष घर से बाहर निकल ही रहा था की पीछे से मौसम ने आवाज दी.. "जीजू, ये स्कूटी की चाबी तो लेते जाइए.." चाबी देते वक्त मौसम ने पीयूष की हथेली को छु लिया पर पीयूष का दिमाग अभी कविता के विचारों से घिरा हुआ था.. मौसम भी सोचती रही.. जीजू ने मेरी तरफ देखा क्यों नही?? आबू की ट्रिप के बाद उसे जीजू और दीदी की अनबन की बात तो मालूम ही थी.. इसलिए उन दोनों के हावभाव देखने के लिए वो भी उनके पीछे घर के बाहर निकली..

बाहर जाकर पीयूष ने स्कूटी स्टार्ट की.. और कविता उसके पीछे बैठ गई.. दोनों में से किसी ने भी मौसम की तरफ देखा तक नही.. दोनों के दिमाग में विचारों का तुमुलयुद्ध चल रहा था.. वो स्कूटी लेकर निकले और मौसम वापिस घर के अंदर जा ही रही थी तभी उसने दूर से फाल्गुनी को आता हुआ देखा.. मौसम वही खड़ी रही.. फाल्गुनी ने उसके पास आकर कहा "मौसम, मेरे मामी का फोन था.. उनका बेटा हॉस्टल से आया है.. तो वो मुझे लेने आ रहा है.. मुझे उसके साथ जाना होगा"

मौसम समझ गई की फाल्गुनी अब घर नही आएगी.. उसने भी उसे रोका नही.. फाल्गुनी चलकर बाहर निकली.. एक पल्सर बाइक आकर खड़ी हो गई.. फाल्गुनी के मामा के बेटे की.. दोनों भाई-बहन, मौसम को "बाय" कहकर चले गए

मौसम बाहर झूले पर बैठ गई.. वैसे भी अंदर चल रही गंभीर बातों में उसे दिलचस्पी नही थी.. उससे अच्छा यहीं बैठकर आइसक्रीम आने का इंतज़ार किया जाए..

झूले पर झूलते हुए मौसम के विचार चलने लगे.. आज का दिन कितना महत्वपूर्ण था उसकी ज़िंदगी के लिए.. !! क्यों की आज उसने अपना जीवन साथ चुन लिया था.. अब तक जो सारी कल्पनाएं थी वो अब हकीकत बनने वाली थी.. उसे अपने सपनों का राजकुमार मिल गया था.. और वो था तरुण.. वो तरुण के साथ बिताएं पल याद करने लगी.. और उसकी और तरुण की जोड़ी कैसी लगेगी वो भी मन ही मन सोचने लगी.. और शर्माने लगी.. आज का दिन किसी और कारण से भी खास था.. आज पहली बार उसने अपने पिता और सहेली को नंगा.. चोदते हुए देखा.. बाप और बेटी के बीच जो मर्यादा की दीवार होती है वो आज हवस की बाढ़ में बह चुकी थी.. मौसम ने कभी भी नही सोचा था की सभ्य और संस्कारी दिखने वाले उसके पिता.. इतने बेशर्म होंगे.. !!

झूले पर बैठे बैठे उसने झुककर ड्रॉइंगरूम के अंदर देखा.. उसे वहाँ से अपने पिता सुबोधकांत सोफ़े पर बैठे हुए नजर आ रहे थे.. उनकी शक्ल में उसे अपने पापा नही.. पर फाल्गुनी और वैशाली को चोदनेवाला सुबोधकांत नजर आ रहा था.. उसकी आँखों के सामने वह द्रश्य फिर आ गया.. फाल्गुनी कैसे बेशर्मों की तरह अपने स्तन खोलकर पापा से चुसवा रही थी.. !! और वैशाली भी कम नही थी.. कैसे पकड़कर पापा का लंड चूस रही थी.. !!! मौसम ने अपना सर झटकाया.. ये सब मैं क्या सोच रही हूँ..!! जिसके लंड को देखकर उसकी चूत गीली हो गई थी वो और कोई नही पर उसका सगा बाप था.. !!

मौसम को अपनी सोच पर शर्म आने लगी.. तभी मौसम की नजर किचन की खिड़की से दिख रही उसकी माँ की तरफ गई.. रमिला बहन काम में इतनी व्यस्त थी की उनका पल्लू कब गिर गया उन्हें पता ही नही चला.. मौसम अपने मन पर काबू न रख पाई और अपनी मम्मी के जिस्म की गोलाइयों को देखने लगी.. सोचने लगी.. मम्मी भी देखने में कितनी सुंदर है.. !! क्या पापा मम्मी को भी ऐसे ही पीछे से चोदते होंगे? मम्मी जब झुककर चुदवाती होंगी तब उनके ये बड़े बड़े स्तन कैसे झूलते होंगे..!! मौसम सोच रही थी की अगर इस उम्र में उनके स्तन इतने बड़े है तो जब मेरा जन्म हुआ तब कितने बड़े होंगे.. दूध से भरे हुए.. !! क्या पापा और मम्मी इतनी ही उत्तेजना से चोदते होंगे?? सोचते सोचते मौसम की पेन्टी गीली हो गई

अपने इन हीन विचारों से शर्माकर वो सोचने लगे.. बाप रे.. ये सब मैं क्या सोच रही हूँ? क्यूँ इतने गंदे गंदे खयाल आ रहे है मन में?? मैं कितने संस्कारी खानदान की बेटी हूँ.. आज से एक महीने पहले मैंने किसी पराये मर्द के बारे में सोचा भी नही था.. और आज अपने सगे माँ बाप के बारे में.... !!!

मौसम का दिमाग दो हिस्सों में विभाजित हो गया था.. एक पक्ष अपने पापा की हरकतों का विरोध कर रहा था तो दूसरा उन्हें जायज ठहरा रहा था.. जैसे मौसम के दिमाग में ही सुबोधकांत का केस चलने लगा था..

एक तरफ.. बेहद प्यार करने वाले, जज्बाती और वात्सल्य से भरा हुआ बाप था तो दूसरी तरफ फाल्गुनी और वैशाली को चोदने वाला कामी पुरुष.. कौनसा स्वरूप असली था ये पता नही चल रहा था.. उनकी हकीकत आखिर क्या थी? आज मौसम का अपने विचारों पर काबू नही था.. अब इन विचारों का बोझ महसूस हो रहा था उसे.. काफी देर तक वो यूं ही विचारों में खोई बैठी रही.. उसकी विचार शृंखला तब टूटी जब बहोत सारे कुत्ते एक साथ भोंकने लगे..

मौसम ने देखा.. ५-६ कुत्ते.. एक कुत्तिया के पीछे पड़े थे.. भादों का महिना चल रहा था और कुत्तों को भी अपना टारगेट अचीव करना था.. सारे कुत्तों की एक ही मंजिल थी.. उस कुत्तिया की पूत्ती.. एक अनार और सो बीमार वाला हिसाब था..

अब तक तो दीदी और जीजू को आ जाना चाहिए था.. मौसम उनका इंतज़ार कर रही थी..

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दूसरी तरफ स्कूटी पर सवार होकर पीयूष और कविता बाजार की तरफ जा रहे थे.. प्री-मॉनसून प्लान की कार्यवाही में रिजेक्ट हुए रास्तों के गड्ढों की महरबानी से पीयूष और कविता के जीवन की वसंत खिलने की तैयारी पर थी.. जब शरीरों की निकटता बढ़ती है तब दिमाग और मन का अहंकार पिघलना शुरू हो जाता है.. शारीरिक स्पर्श मन के घावों पर मरहम का काम करता है.. पीयूष और कविता दोनों ही ये बात जानते थे की वो बाहर कितना भी मुंह क्यों न मार ले.. आखिर उन्हें एक दूसरे के पास ही लौटकर आना होगा.. मनोचिकित्सकों का भी ये कहना है की पति और पत्नी के बीच चाहें कितना भी बड़ा झगड़ा क्यों न हो जाए.. उन्हे संवाद को बरकरार रखना चाहिए.. जिससे की अहंकार की जमी हुई बर्फ पिघल सके.. उससे थोड़ा आगे सोचे तो.. बातें या संवाद चाहें बंद हो जाएँ.. पर शारीरिक निकटता कम नहीं होनी चाहिए ताकि दोनों के बीच अहंकार की दीवार बन न जाएँ..

बात की शुरुआत कविता ने की..

कविता: "तुझे याद है पीयूष? तुम जब सगाई के बाद पहली बार मिलने आए थे तब हमने इसी दुकान पर आइसक्रीम खाया था.. !! हम दोनों अकेले साथ न जाए इसलीये मम्मी ने मौसम को भी साथ भेजा था.. याद है या भूल गए!!"

पीयूष का मन भी अब पिघलने लगा और वो अतीत की यादों में खो गया

"हाँ हाँ.. बराबर याद है.. सारे फ्लेवर्स ट्राय करने के बाद मुझे तो पिस्ता वाला आइसक्रीम ही पसंद आया था.. ३ दिन तक रोज वो आइसक्रीम खाने के बाद भी मन नही भरा था.. और तेरा फेवरिट कौन सा था?? अरे हाँ.. याद आया.. तू हमेशा चॉकोबार खाती थी.. कैसे हाथ में लेकर चूसती थी"

कविता ने शरमाकर पीयूष की पीठ पर प्यार भरी थपकी लगाते हुए कहा "क्या तू भी.. कुछ भी बोलता है.. !! बेचारी छोटी सी मौसम को हम आइसक्रीम दिलाकर सामने कुर्सी पर बीठा देते थे.. और तुम चुपके से मेरे बॉल दबा देते थे.. हा हा हा.. !! पर सच कहूँ पीयूष.. आज भी उस स्पर्श की याद आती है तो मेरे रोंगटे खड़े हो जाते है.. थोड़ी सी घबराहट.. थोड़ा सा हक का भाव.. जज़्बातों के उस संमिश्रण को मैं कभी भूल नही पाऊँगी"

सगाई से लेकर शादी तक का समय.. हर जोड़ी के लिए बड़ा ही यादगार होता है.. सब से सुंदर समय.. दिमाग साथ बैठकर नए नए सपने बुनता है.. और शरीर नए नए अंगों की खोज करता है

पीयूष भी अब धीरे धीरे मूड में आने लगा..

पीयूष: "कविता.. चल फिर से वो यादें ताज़ा करते है.. घर के लिए आइसक्रीम लेने से पहले एक एक कप पिस्ता का आइसक्रीम हो जाए.. जब से तूने मेरे साथ बोलना छोड़ दिया है तब से ऐसा महसूस कर रहा हूँ जैसे किसी नेता की कुर्सी चली गई हो.. लंड तो बेचारा ऐसे दुबक के छुप गया है की ढूँढने पर भी नजर नही आता.. "

कविता: "चल झूठे.. कितना ड्रामा करता है रे तू.. !! ये देख.. तेरा मिनी-चॉकोबार धीरे धीरे बड़ा हो रहा है"

पीयूष और कविता अपनी पसंदीदा आइसक्रीम की दुकान पर पहुँच गए.. आइसक्रीम के कप लेकर दोनों अंधेरे पार्किंग में साथ बैठकर खाते हुए एक दूसरे को छेड़ने लगे.. जवान जोड़ियों की तरह हरकतें करने लगे.. थोड़ी ही देर में दोनों लय में आ गए.. दोनों को पता था की यहाँ कुछ भी खुल कर कर पाना मुमकिन नही था.. फिर भी पार्किंग के अंधेरे में जितनी छूट ली जा सकती थी उन्हों ने ले ली.. साथ ही साथ आस पास के लोगों का भी ध्यान रखना पड़ता था

पीयूष: "यार, स्कूटी के बदले गाड़ी लेकर आए होते तो अच्छा रहता.. ये तो ऐसा हाल हो गया की सूप पीने को मिला.. भूख तेज हो गई अब खाने के लिए कुछ नही है"

यहाँ वहाँ देखकर पीयूष के मन में एक तरकीब सूझी..

पीयूष: "कविता, वो देख सामने के कॉम्प्लेक्स के साइड में जो अंधेरी गली दिख रही है.. वहाँ पर एक पुरानी मारुति ८०० पार्क की है.. हाल देखकर लगता है की पिछले कई महीनों से किसी ने इस्तेमाल नही की है.. कॉम्प्लेक्स की सारी दुकानें भी बंद है.. मैं वहाँ जाकर कुछ सेटिंग करता हूँ.. जैसे ही मैं इशारा करूँ, तुम वहाँ आ जाना"

नीचे पड़ी चॉकोबार की स्टिक लेकर पीयूष गाड़ी की तरफ गया.. दरवाजे के कांच पर लगी धूल साफ करके उसने साइड ग्लास के रबर को ऊपर किया और स्टिक अंदर डाली.. थोड़ी मेहनत के बाद लोक खुल गया.. शतक बनाकर जिस तरह विराट कोहली अपना बेट ऊपर करता है बिल्कुल वैसे ही पीयूष ने स्टिक ऊपर करके कविता को वहाँ आने का इशारा किया.. गाड़ी में घुसते ही दोनों एक दूसरे पर ऐसे टूट पड़े जैसे जनम जनम से भूखे हो.. कोई देख न ले इसलिए जल्दी जल्दी में पीयूष ने चैन खोलकर लंड बाहर निकाला.. कविता ने अपना स्कर्ट ऊपर कर पेन्टी को घुटनों तक सरका लिया था.. उसका छेद पीयूष के लंड को ग्रहण करने के लिए आतुर था.. पार्किंग में फॉरप्ले पहले ही हो चुका था इसलिए पीयूष का लंड तैयार था और कविता की चुत गीली हो रखी थी.. सिर्फ ५ मिनट में उन्होंने अपना काम खतम कर लिया








और तभी पीयूष के मोबाइल पर वैशाली का फोन आया..

पीयूष के फोन उठाते ही वैशाली ने कहा "तुम दोनों आइसक्रीम लेने गए हो या बनाने? जल्दी आओ यार.. सब यहाँ वेइट कर रहे है" वैशाली ने जिस मज़ाकिया अंदाज में बात की उससे ये मालूम हो रहा था की घर का वातावरण भी नॉर्मल हो चुका था.. दोनों ने अपने कपड़े ठीक कीये.. गाड़ी से बाहर निकले और आइसक्रीम लेकर घर की ओर रवाना हुए..

जब गए तब दो अलग अलग इंसान थे.. वापिस लौट रहे थे दो जिस्म और एक जान बनकर.. कितने समय के बाद दोनों के बीच की कड़वाहट दूर हुई थी.. वाकई.. संवाद करने से.. बात करने से.. बड़े से बड़े प्रॉब्लेम का हल मिल ही जाता है.. जरूरत होती है सिर्फ पहल करने की.. दोनों का पेट आइसक्रीम खाने से ठंडा हो गया था और गाड़ी में बिताएं उस समय ने उनके मन को भी शांत कर दिया था

हल्की हल्की बारिश हो रही थी.. मिट्टी की मीठी खुश्बू सारे माहोल को सुगंधित कर रही थी.. आबोहवा की ठंडक अब कविता और पीयूष के कामागनी को भड़का रही थी..

घर पहुंचते ही सब ने आइसक्रीम खाया और सोने की तैयारी करने लगे.. दामाद होने के नाते.. पीयूष और कविता के लिए ऊपर का मास्टर बेडरूम आरक्षित रखा गया था..

कविता ने पीयूष से कहा "तुम नहाकर फ्रेश हो जाओ.. मैं अभी नीचे जाकर आती हूँ"

थोड़ी देर बाद जब कविता कमरे में आई तब उसके हाथ में दूध का ग्लास था.. पीयूष अभी भी बाथरूम में था.. उसने ग्लास टेबल पर रखकर लाइट को बुझा दिया और नाइट-लैम्प ऑन कर दिया.. बेडरूम का माहोल रोमेन्टीक बन गया..

पीयूष के बाहर आते ही कविता बाथरूम में घुस गई..

लगभग पंद्रह मिनट बाद बाथरूम का दरवाजा खुला.. और पीयूष का ध्यान उस तरफ गया.. देखकर उसके होश उड़ गए

उसने देखा.. कविता पिंक कलर की पारदर्शक लॉन्जरी पहन कर बड़ी ही मस्ती भरी अदा में खड़ी थी.. जालीदार लॉन्जरी से कविता के सारे अंग दिख रहे थे.. सिर्फ निप्पल और चूत की लकीर पर कपड़े की पट्टी उसकी इज्जत को ढँक रही थी.. कविता साक्षात अप्सरा जैसी लग रही थी.. लाइट कलर की लिपस्टिक और हल्का सा मेकअप लगाकर तैयार कविता ने बड़े ही मादक अंदाज में अपने जिस्म पर हाथ फेरा और कातिल शृंगारिक अदा से पीयूष के दिल को घायल कर दिया..







साथ ही साथ पीयूष को विचारों ने घेर लिया.. ये वही लॉन्जरी थी जो उसने शादी के एक महीने पहले खरीदी थी.. कविता को सुहागरात पर गिफ्ट देने के लिए.. शादी के एक महीने पहले वो दोनॉ ओयो-रूम में मिले थे तब उसने जिद की थी की घर जाकर कविता इस लॉन्जरी को पहने और विडिओ-कॉल पर उसे दिखाए.. इस बात पर दोनों के बीच काफी कहा-सुनी हो गई थी.. और उसके बाद इस लॉन्जरी को उसने कभी देखा नही था..

पर आज वही लॉन्जरी पहन कर कविता ने पीयूष को इशारे से कह दिया की माउंट आबू के झगड़े के बाद.. आज की रात उनके लिए सुहाग रात से कम नही थी.. शादी के बाद कविता का शरीर काफी गदराया था इसलिए ये नाइटी उसके जिस्म पर एकदम टाइट चिपक गई थी.. पर उससे तो वो और ज्यादा खूबसूरत लग रही थी

पीयूष खड़ा हुआ और कविता को घूर घूरकर देखने लगा.. उसकी तीक्ष्ण नजर और हवस युक्त मुस्कान से कविता शरमा गई.. पीयूष ने कविता को अपने बाहुपाश में जकड़ लिया और उसके सुलगते होंठों पर अपने होंठ रख दिए.. कविता अब पीयूष की जीभ चाटने लगी.. पीयूष ने कविता के रेशमी लहराते बालों को पकड़कर अपनी ओर झुकाया और उसके गाल, गर्दन और कान के पीछे चूमने लगा.. कविता का हाथ पीयूष की मर्दाना पीठ को सहला रहा था






उस दौरान दोनों एक दूसरे के होंठों का रस पान कर रहे थे और पीयूष की छाती से दबे हुए कविता के उन्नत स्तन अब वासना की आग में तप कर सख्त और कड़े बन गए थे.. कविता ने पीयूष को धक्का देकर बेड पर सुला दिया.. और उसकी टी-शर्ट निकाल फेंकी.. इस तरफ पीयूष ने लेटकर कविता के स्तनों पर हल्ला-बोल कर दिया.. पीयूष की शॉर्ट्स में खड़ा सख्त लंड बार बार कविता की चूत को छु रहा था.. और अंदर घुसने की अनुमति मांग रहा था.. कविता ने अपनी नाइटी की डोर को खींचकर खोल दिया और उसे हटा फेंका.. अब वो पीयूष की शॉर्ट्स को खींचकर निकालने की कोशिश कर रही थी.. इशारा समझकर पीयूष ने अपनी शॉर्ट्स और अन्डरवेयर उतार दी और नंगा हो गया.. अब उसने कविता को बेड पर लेटा दिया और उसकी पिंक पेन्टी में उंगली डालकर उतार दी..

होंठ और मुख की कशमकश से विमुख होकर भूखे भेड़िये की तरह पीयूष कविता की छातियों को मसल रहा था.. उसकी निप्पल को दांतों के बीच दबाकर उसने हल्के से काट लिया.. कविता के मुख से तीखी "आह्ह" निकल गई.. और उस आह्ह ने पीयूष की वासना की आग में घी का काम किया.. और वो दोगुने जोश के साथ कविता के स्तनों पर टूट पड़ा.. कविता ने भी अपने एक हाथ के नाखून पीयूष की पीठ पर गाड़ दिए और दूसरे हाथ से उसका लंड पकड़ लिया








दोनों हाथों से स्तनों को मसलते हुए पीयूष.. कविता के पेट, नाभी और जांघ पर अविरत चूमता जा रहा था.. कविता भी किसी नागिन की तरह बल खाती हुई अपने जिस्म को आधे फिट जितना ऊपर कर पीयूष को अपनी चूत चाटने के लिए आमंत्रित कर रही थी.. पीयूष ने अपने दांतों से कविता की चूत के होंठों को बड़ी ही नाजुकता से काट लिया.. उसके पैरों को चौड़ा करके चूत को खुली कर अपनी जीभ उसके गरम छेद में घोंप दी.. उसकी इस हरकत ने कविता को इतना उत्तेजित कर दिया की उसका बदन सिहरने लगा..





चूत के होंठों को उंगलियों से अलग करते ही.. अंदर का लाल गुलाबी हिस्सा दिखने लगा.. देखकर पीयूष ने आपा खो दिया और पागलों की तरह अंदर जीभ डालकर चाटने लगा.. कविता ने अपने दोनों पैर पीयूष के कंधों पर जमाकर उसे जकड़ लिया.. पीयूष के चाटने से उसकी चूत इतनी गीली हो गई थी की चूत का अमृत रस बहते हुए उसकी गांड के छेद तक पहुँच गया था.. छेद के अंदर तक जीभ घुसाकर.. पीयूष अपने अंगूठे से कविता की क्लिटोरिस पर गोल गोल घुमा रहा था.. कविता का शरीर कांपने लगा.. उसने अपनी चूत को पीयूष के चेहरे पर दबा दिया और पैरों से दबाकर बराबर सिकंजे में कस लिया..







पीयूष का लंड अब झटके खा रहा था.. पीयूष तुरंत ६९ की पोजीशन मे आ गया.. अपना लंड कविता के मुँह में देकर उसने फिर से कविता की चूत को चाटना शुरू कर दिया.. दोनों एक दूसरे के जननांगों को खुश करने में व्यस्त हो गए..





पीयूष का लोडा अब चरम पर था.. उसने कविता के मुंह से बाहर निकाला और कविता की दोनों जांघों के बीच बैठकर.. सुपाड़े को कविता की ज्वालामुखी जैसी चूत पर रख दिया.. एक धक्के में आधा लंड अंदर घुसा दिया.. रस से गीली चुत.. लंड प्रवेश के लिए इतनी आतुर थी.. के कविता ने कमर उठाकर बाकी का आधा लंड भी निगल लिया..

"पचाक.. !!" की आवाज के लोडा कविता की चूत में घुस गया.. कविता के गले से "आह्ह" निकल गई.. पीयूष की कमर पर अपने दोनों पैर लिपटा कर वो उसके लंड को अपनी चूत की तरफ धकेलती रही








पीयूष ने एक जबरदस्त धक्का लगाया और उसका लंड कविता की बच्चेदानी के मुख पर जा टकराया.. कविता की आनंद भरी किलकारी निकल गई

"पीयूष.. मज़ा आ गया यार.. चोद मुझे.. जी भर कर चोद.. आह्ह आह्ह.. !!"

पीयूष का पूरा जिस्म दोगुने जोश के साथ कविता की जांघों के बीच.. इंजन के पिस्टन की तरह अंदर बाहर करने लगा.. बीच बीच में वो कविता के स्तनों को दांतों से काट लेता.. कभी निप्पल चूसता.. कभी हाथ नीचे डालकर कविता की क्लिटोरिस को मसल देता.. कविता की कोल्हू जैसी चूत में पीयूष का गन्ने जैसा लंड पिसता गया.. पिसता गया और दोनों का रस निकलता गया.. कविता की लाल गरम चूत भांप छोड़ रही थी.. और लंड उसपर पानी की बूंदें बरसा रहा था








पीयूष ने धक्कों की गति बढ़ाई और उसके साथ कविता भी उछल उछल कर लंड लेती रही.. और उसी क्षण.. एक जबरदस्त धक्के के साथ.. दोनों आलिंगन में लिप्त होकर.. तृप्त हो गए.. और एक दूसरे के बाहों में स्खलित होकर गिर गए..







पसीने की चमकती बूंदें दोनों के शरीर पर ओस की तरह जम गई थी.. पिछले कई हफ्तों से कविता की सारी अतृप्त इच्छाएं आज संतुष्ट होकर शांत हो चुकी थी.. अपनी चूत और शरीर की दहकती भड़कती अदम्य इच्छाओं का शमन होते ही.. परमानन्द में डूबकर वो पीयूष की बाहों में सो गई..

तो दूसरी तरफ वैशाली और मौसम भी एक दुसरें की चूत चाटकर तृप्त हो चुकी थी और बाहों में बाहें डालकर सो रही थी..





 
दूसरी सुबह करीब साढ़े पाँच बजे.. रोज की तरह शीला की आँख खुल गई.. मदन को सोता हुआ छोड़कर वो उतरकर नीचे आई.. नाइट-गाउन में ही वो घर के आँगन में बने झूले पर बैठकर झूलने लगी.. अभी घर में कोई जागा नहीं था.. थोड़ी ही देर में अखबार वाला पेपर फेंक कर गया.. शीला उसे उठाकर पढ़ते हुए झूल रही थी..





अखबार की खबरों में डूबी हुई शीला को पता ही नहीं चला की कब सुबोधकांत उसके सामने आकर कुर्सी लगाकर बैठ गए..

"अरे आप कब आए??" शीला ने चोंक कर पूछा

"अभी अभी.. वैसे मुझे जल्दी उठ जाने की आदत है.. सुबह सुबह आसपास की खूबसूरती देखने का मज़ा ही कुछ ओर होता है.. और आज तो आपको देखकर मेरी सुबह और भी मस्त हो गई" शीला शर्मा गई.. सुबोधकांत उसके साथ खुलेआम फ़्लर्ट कर रहे थे

शीला एकदम से अपने कपड़ों को लेकर जागरूक हो गई.. उसने गाउन के अंदर ब्रा नहीं पहनी थी.. और उसके दोनों स्तन.. बिगड़ी हुई औलादों की तरह.. उसका कहा मान नहीं रहे थे.. और उभरकर मस्त आकार बना रहे थे.. सुबोधकांत उन उभारों को देखते हुए अपने होंठों पर जीभ फेर रहा था..

टी-शर्ट और ट्रेक पेंट पहने सुबोधकांत काफी हेंडसम लग रहे थे.. शीला ने उन्हें कनखियों से देखा.. उनके स्वस्थ शरीर की झलक टी-शर्ट से भलीभाँति नजर आ रही थी.. ऐसे पुरुष के साथ थोड़ा बहोत फ़्लर्ट करने में शीला को कोई दिक्कत नहीं थी

"अच्छा.. !! ऐसा तो क्या नजर आ गया आपको.. जो आपकी सुबह सुधर गई..??" शरारती मुस्कान के साथ शीला ने सुबोधकांत से कहा

"अब क्या कहूँ.. कहाँ से शुरू करू.. कुदरत ने आपको बड़े ही इत्मीनान से बनाया है.. क्या आपको कभी किसी ने कहा है की आप दुनिया की सब से सुंदर महिला हो??" सुबोधकांत ने अपनी गाड़ी चौथे गियर में डालकर दौड़ा दी

ये झूठ है.. जानते हुए भी शीला ने शरमाते हुए अपनी आँखें झुका दी.. ऐसी कौन सी स्त्री होगी जिसे अपनी तारीफ पसंद न हो? चाहे फिर झूठी ही क्यों न हो.. !!

"क्या आप भी.. !!! जो बात आपको रमिला बहन से करनी चाहिए वो आप मुझसे कर रहे है.. !!" शीला ने शरमाते हुए कहा

जवाब देने के बजाए.. सुबोधकांत अपनी कुर्सी से उठे और झूले पर शीला की बगल में बैठ गए.. झूला इतना चौड़ा नहीं था की दो लोगों को साथ समा सकें.. शीला और सुबोधकांत की जांघें एक दूसरे से सट कर रह गई.. शीला का चेहरा शर्म से लाल हो गया.. पर अपनी जांघों पर इस मजबूत पुरुष का स्पर्श उसे बड़ा ही लुभावना लगा.. वो बिना कुछ बोलें बैठी रही

"अजी क्या बताएं आपको.. तारीफ तो उसकी की जाती है जिसे कदर हो.. अब बंदर क्या जाने अदरख का स्वाद.. !! और मैं झूठ नहीं बोल रहा हूँ.. आप के जितनी खूबसूरत महिला मैंने आज तक नहीं देखी.. " कहते ही सुबोधकांत अपना चेहरा शीला के कानों के नजदीक लाए.. जैसे उसे सूंघ रहे हो..

शीला सहम गई.. !! सुबोधकांत की इतनी हिम्मत का वो कैसे जवाब दे, उसे पता नहीं चल रहा था.. वो वहाँ से खड़ी होकर चली जा सकती थी.. पर पता नहीं ऐसा कौन सा आकर्षण था जो उसे वहाँ से उठने ही नहीं दे रहा था..जैसे उसके कूल्हें झूले से चिपक गए थे..

"रमिला बहन भी कितनी सुंदर है.. गोरी गोरी.. " शीला ने वापिस बात को सुबोधकांत की पत्नी पर ला खड़ा किया

"शीला जी.. आप तो जानती हो.. हर चमकने वाली चीज सोना नहीं होती.. और कुछ हीरे ऐसे होते है जिसकी परख, मुझ जैसे जोहरी के अलावा और कोई नहीं कर सकता.. !!" सुबोधकांत अपनी हरकतों से बाज नहीं आया

"देखिए सुबोधकांत जी.. मैं आपकी बहोत इज्जत करती हूँ.. अच्छा यही होगा की हम दोनों हमारी मर्यादा का उल्लंघन न करें.. !!" शीला ने थोड़ी सी नाराजगी के साथ कहा..

ये सुनते ही.. सुबोधकांत झूले से खड़े हो गए.. मस्त अंगड़ाई लेकर वो शीला के सामने ही खड़े रहे..

"अरे आप तो बुरा मान गई.. अब मुझे नहीं पता था की आपको तारीफ पसंद नहीं है.. "

"ऐसी बात नहीं है सुबोधकांत जी.. पर जैसा मैंने कहा.. हम दोनों अपनी मर्यादा में रहे वही बेहतर होगा" शीला ने कहा

"आपको नहीं पसंद तो मैं आगे कुछ नहीं कहूँगा.. लेकिन.. ये मर्यादा की बातें आपके मुंह से अच्छी नहीं लगती, शीला जी.. !!" बेशर्मी से सुबोधकांत ने कहा.. सुनकर शीला चकित हो गई.. ऐसी कौन सी बात इन्हें पता थी जो इतने आत्मविश्वास के साथ बोल रहे थे ये?? अभी कल ही तो पहली बार मिले है.. ऐसा कौन सा राज जानते थे सुबोधकांत.. शीला के बारे में.. !!

"आप क्या कहना चाहते है, मैं समझ नहीं पाई" शीला ने पूछा

"देखिए शीला जी.. अब घुमा फिराकर बात करने की आदत मुझे ही नहीं.. और दूसरों की ज़िंदगी में दखल देने की आदत भी नहीं है.. चाहे वो कोई भी क्यों न हो.. ये तो आपने मर्यादा की बात छेड़ दी तो मैंने सोचा की आप को याद दिला दूँ.. कल आप मेरे दामाद के प्राइवेट पार्ट को दबाकर कौन सी मर्यादा का पालन कर रही थी??" शैतानी मुस्कान के साथ सुबोधकांत ने शीला की ओर देखकर कहा

शीला को चक्कर आने लगे.. कल जब वो लोग ड्रॉइंगरूम में बैठे थे ,तब चारों लड़कियां बगल वाले कमरे में थी.. पीयूष जब उठकर उस कमरे की ओर जा रहा था तब शीला भी किचन में जाने के बहाने उठी थी और बीच रास्ते पीयूष का लंड दबा दिया था.. सुबोधकांत की शातिर नजर ने ये देख लिया था इसका उसे पता भी नहीं था..

शीला ने आँखें झुका ली और दुबक कर झूले पर बैठी रही.. उसके हाथ से अखबार भी छूटकर नीचे गिर गया.. मुसकुराती हुए सुबोधकांत ने अखबार उठाया और शीला के हाथों में थमाते हुए वापिस झूले पर उसके साथ बैठ गया

"अरे पढिए पढिए.. अखबार पढ़ना जरूरी है.. पता तो चले की दुनिया में क्या हो रहा है.. पर उससे भी ज्यादा जरूरी है अपने आसपास क्या हो रहा है उस पर नजर रखना.. !!"

अब शीला के पास बोलने के लिए कुछ बचा नहीं था.. डर के मारे उसकी बोलती बंद हो गई थी.. कल रात वैसे भी संजय और हाफ़िज़ को लेकर काफी टेंशन था.. वो खतम हुआ नहीं की एक नई चिंता जुड़ गई.. वो अखबार को पकड़कर नीचे देखते हुए बैठी रही

"घबराइए मत शीला जी.. मैं ये बात किसी को नहीं बताऊँगा.. जैसा मैंने पहले ही कहा.. मुझे किसी के जीवन में दखल अंदाजी करना पसंद नहीं है" कहते हुए इस बार सुबोधकांत अपना चेहरा शीला के गालों के इतने करीब ले आए की उनकी गरम साँसों को अपने गालों पर महसूस कर रही थी शीला.. उफ्फ़.. मर्दानी गरम सांसें.. शीला की आँखें बंद हो गई..

शीला की ओर से कोई विरोध न दिखा तब सुबोधकांत ने हिम्मत करके शीला के कान को धीरे से चूम लिया.. शीला स्तब्ध हो गई.. पर वो जानती थी की उसकी दुखती नस को दबाकर ये इंसान अपनी मनमानी कर रहा था.. वो सोचने लगी.. अगर मैं इसे हड़का कर भगा दूँ तो क्या होगा?? उसने पीयूष के साथ जो हरकत की थी उसका पता अगर सब को लग गया तो कोहराम मच जाएगा.. मदन और उसके जीवन में भूकंप आ जाएगा.. कविता उससे बात नहीं करेगी कभी.. और अनुमौसी को पता चला मतलब पूरे मोहल्ले को पता चल जाएगा.. पूरी ज़िंदगी वो किसी को मुंह दिखाने के काबिल नहीं रहेगी.. गनीमत इसी में थी की वो उनका सहयोग करे और देखें की वो आगे कहाँ तक जाने की हिम्मत करते है

शीला ने शरमाकर अपना चेहरा दूर कर लिया..

"क्या मदमस्त खुशबू है आपकी.. जितना सुंदर तन उतनी ही मादक महक आ रही है.. " सुबोधकांत ने धीरे से अपना हाथ शीला की जांघों पर फेरना शुरू कर दिया.. शीला उसके स्पर्श से ऐसे सिहरने लगी.. न चाहते हुए भी उसका जिस्म उत्तेजित होने लगा.. अजीब सी उत्तेजना होने लगी उसे..






शीला बस अब आँखें बंद कर.. झूले पर सर पीछे टेककर बैठी रही.. और सुबोधकांत उसकी गर्दन पर चूमते हुए उसके होंठों पर कब पहुँच गए पता ही नहीं चला.. उनका एक हाथ शीला के खरबूजे जैसे बड़े स्तनों पर घूमने लगा.. बिना ब्रा के सिर्फ गाउन के अंदर कैद स्तनों की निप्पल.. बड़ी ही आसानी से सुबोधकांत के हाथ में आ गई.. शीला के होंठों को चूमते हुए जैसे ही सुबोधकांत ने निप्पल को पकड़कर दबाया.. शीला की आह्ह निकल गई.. और दोनों जांघों के बीच सुरसुरी होने के साथ गिलेपन का एहसास भी होने लगा..







शीला के बदन में खून तेजी से दौड़ने लगा.. उसका चेहरा सुर्ख लाल हो गया.. सुबोधकांत के चुंबनों से वह इतनी उत्तेजित हो गई की खुद ही अपनी निप्पल को मरोड़ने लगी.. सुबोधकांत ने शीला का गाउन नीचे से उठाना शुरू करते ही शीला संभल गई और अपना गाउन पकड़ कर उसे रोक दिया..

"सुबोधकांत जी.. ये बड़ा ही खतरनाक हो सकता है.. मुझे लगता है की हमें अब इससे आगे नहीं बढ़ना चाहिए.. !!"

"शीला जी.. आगे बढ़ना चाहिए की नहीं ये इम्पॉर्टन्ट नहीं है.. आप ये बताइए.. क्या आप आगे बढ़ना चाहती है?" बड़ा शातिर था ये बंदा.. ऐसे हिम्मत वाले पुरुष शीला को बेहद पसंद थे.. उसने कोई जवाब नहीं दिया.. और पलके झुकाकर बैठी रही..

पर सुबोधकांत को अपना जवाब मिल गया था.. उसने शीला को हाथ पकड़कर उठाया.. और घर के पिछवाड़े में बने गराज तक ले गए.. गराज का दरवाजा खोलकर दोनों अंदर गए और फिर सुबोधकांत ने उसे बंद कर दिया..

दरवाजा बंद होते ही सुबोधकांत ने शीला को दीवार से दबा दिया और उसके स्तनों को दोनों हाथों से मसलने लगे.. शीला बस आह्ह आह्ह करती रह गई.. उन्हों ने शीला के होंठों को चूसते हुए अपना एक हाथ गाउन के ऊपर से ही शीला के गरम भोसड़े पर दबा दिया.. रात को सोते वक्त शीला कभी गाउन के नीचे पेन्टी नहीं पहनती थी.. उसका भोसड़ा सुबोधकांत के हाथों चढ़ गया..








नीचे स्पर्श होते ही शीला के सब्र का बांध टूट गया.. और उसने दोनों हाथों से सुबोधकांत का चेहरा पकड़कर चूम लिया.. सुबोधकांत ने शीला का गाउन एक झटके में ही ऊपर कर दिया और उसकी लसलसित दरार में अपनी उंगली डाल दी..





गरम गरम भोसड़े में उंगली घुसते ही शीला ने अपने सारे हथियार डाल दीये.. उसने दोनों हाथों से सुबोधकांत के कंधों को दबाकर उन्हे नीचे बैठा दिया और अपनी टांगें खड़े खड़े ही चौड़ी कर दी.. इशारा स्पष्ट था और सुबोधकांत को समझने में देर भी नहीं लगी.. उसने एक ही पल में अपनी जीभ शीला की गुफा के अंदर डालकर चाटना शुरू कर दिया..





शीला की योनि विपुल मात्रा में कामरस बहाने लगी और सुबोधकांत बिना किसी घिन के उस रस को चाट रहे थे.. शीला दोनों हाथों से अपनी निप्पलों को खींचकर मरोड़ रही थी.. अब उसका जिस्म लिंग प्रवेश चाहता था.. उसने आजूबाजू देखा.. इतना कचरा पड़ा हुआ था की लेटना नामुमकिन था..





उसने धीरे से सुबोधकांत का चेहरा अपनी चूत से अलग किया और उन्हे खड़ा कर दिया.. अब वह पलट गई.. अपना गाउन कमर तक उठा लीया और अपने भोसड़े को चुदाई के लिए पेश कर दिया..

सुबोधकांत ने तुरंत ही अपना पेंट नीचे उतारा और अपना डंडा बाहर निकालकर.. मुंह से थोड़ा थूक लेकर सुपाड़े पर मल दिया.. उसका औज़ार अब शीला के किले को फतह करने के लिए तैयार हो गया था..

शीला को झुकाकर उसने अपने सुपाड़े को उसकी दोनों जांघों के बीच घुसेड़ा.. चूत की खुशबू सूंघते हुए लंड ने तुरंत ही छेड़ ढूंढ निकाला.. एक ही धक्के में लंड ऐसा घुस गया जैसे मक्खन के अंदर गरम छुरी घुस गई हो..








शीला सिसकने लगी.. और सुबोधकांत ने हौले हौले धक्के लगाने शुरू कर दीये.. दोनों हाथ आगे ले जाकर वो शीला के मदमस्त खरबूजों को मसल भी रहे थे.. दोनों उत्तेजना की पराकाष्ठा पर थे लेकिन साथ ही साथ वह जानते थे की उनके पास ज्यादा समय नहीं था..

शीला खुद ही हाथ नीचे ले जाकर अपनी क्लिटोरिस को कुरेदने लगी.. वो भी जल्द से जल्द स्खलित होना चाहती थी.. पीछे सुबोधकांत ने अपने धक्के तेज कर दीये.. शीला के विशाल चूतड़ों को अपने दोनों हाथ से पकड़कर वो धनाधन पेल रहे थे..








शीला का बदन अब थरथराने लगा.. अपनी मंजिल नजदीक नजर आते ही उसने अपनी क्लिटोरिस को दबा दिया.. उसका शरीर एकदम तंग हो गया.. और भोसड़े की मांसपेशियों ने सुबोधकांत के लंड को अंदर मजबूती से जकड़ लिया.. दोनों एक साथ झड़ गए.. वीर्य की तीन चार बड़ी पिचकारियों से सुबोधकांत ने शीला के भोसड़े को पावन कर दिया..







थोड़ी देर तक दोनों हांफते रहे.. सांसें नॉर्मल होते ही पहले सुबोधकांत ने दरवाजा खोलकर बाहर देखकर तसल्ली कर ली और फिर इशारे से शीला को बाहर जाने के लिए कहा.. शीला भागकर घर के अंदर चली गई.. अपने कमरे में जाकर देखा तो मदन अभी भी सो रहा था.. उसने चैन की सांस ली और बाथरूम में चली गई.. सुबोधकांत ने जो निशानी उसके भोसड़े में छोड़ रखी थी उसे साफ करने..





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मदन और शीला जब कविता के घर गए तब सब से अनजान थे.. आज जाते हुए सब की अच्छी दोस्ती हो चुकी थी.. सब ऐसे बातें कर रहे थे जैसे एक दूसरे को सालों से जानते हो..

शीला को बाय कहते वक्त सुबोधकांत मुस्कुराये.. पिछले चौबीस घंटों में उन्हों ने माँ और बेटी दोनों को चोद लिया था.. दोनों एक से बढ़कर एक थी.. दोनों के संग की चुदाई, सुबोधकांत को पूरी ज़िंदगी याद रहने वाली थी..

वैशाली, मौसम और फाल्गुनी के साथ कुछ गुसपुस कर रही थी.. मौसम के चेहरे पर शर्म और उदासी दोनों के भाव थे.. अब वो पहले वाली नादान लड़की नहीं रही थी.. काफी तब्दीलियाँ आ चुकी थी.. चेहरे पर गंभीरता के भाव भी थे.. कविता मौसम को गले लगाकर खूब रोई.. सुबोधकांत भी भावुक हो गए.. इंसान कितना भी नीच और हलक्त क्यों न हो.. आखिर एक बाप था.. कविता को खुश देखकर उनके दिल को ठंडक मिल रही थी और वे चाहते थे की मौसम भी ऐसे ही खुश रहे..

सब ने एक दूसरे को अलविदा कहा.. रमिला बहन की आँखों से भी आँसू निकल रहे थे.. कल तक जो घर भरा भरा सा था.. आज वो एकदम खाली हो रहा था.. सब लोग कार में बैठे.. मौसम और फाल्गुनी ने गले मिलकर वैशाली को बाय कहा..

जुदाई.. बड़ा ही पीड़ादायक शब्द है.. हर मिलन में जुदाई समाई होती है..

कार चल पड़ी और साथ कितने संबंध अपनी मंजिल पर पहुंचे बिना ही अधूरे रह गए.. ?? सुबोधकांत और रमिला बहन घर के अंदर आए.. मौसम बड़ी देर तक रास्ते को देखती रही.. जा रही कार को अंत तक ऐसे देखती रही जैसे वो अभी वापस आने वाली हो.. उसके अलावा कोई नहीं जानता था की उस कार के साथ ओर क्या क्या चला गया था.. !!

जीजू.. !! जिनके साथ उसने जीवन का प्रथम प्रेम-मिलन किया था.. जिन्होंने उसे जवानी का लुत्फ लेना सिखाया था.. काम इच्छा क्या होती है.. पुरुष और स्त्री का उसमें क्या भाग होता है.. पुरुष का प्रथम स्पर्श.. जीजू मौसम को छोड़कर जा चुके थे.. साथ ही कविता दीदी भी चली गई थी.. शीला भाभी और मदन भैया भी.. वैशाली जैसी सहेली भी जा चुकी थी.. वैशाली तो अब कब मिलेगी, क्या पता.. ?? मुझे भी एक दिन वैशाली की तरह सब को छोड़कर दूर जाना होगा.. मौसम का दिल बेचैन हो गया.. इस सामाजिक व्यवस्था के विरुद्ध आंदोलन करने का मन कर रहा था.. पर नियति को भला कौन बदल सकता है.. !! और उसकी नियति भी यही थी की उसे बाप का घर छोड़ना ही था..

"कब तक धूप में खड़ी रहेगी बेटा? अंदर नहीं आना? वो सब तो चले गए.. तू अंदर आ जा.." प्यार से रमिला बहन ने मौसम को कहा

पिछले एक महीने से मौसम उन लोगों के साथ थी.. इसलिए ये जुदाई का पल उससे बर्दाश्त नहीं हो रहा था.. मौसम की इस स्थिति को समझकर रमिला बहन उसे पीठ सहलाते हुए सांत्वना दे रहे थे.. मौसम उनके गले लगकर खूब रोई.. रमिला बहन का दिल भी भर आया.. फिर दोनों घर के अंदर आए.. मौसम पानी पीकर शांत हुई.. रमिला बहन तुरंत अंदर से बोर्नविटा वाला दूध लेकर आए जो मौसम को बेहद पसंद था.. कितने अच्छे से समझते है माँ बाप अपनी औलाद को!! उन्हें कब क्या चाहिए होगा, उन्हें सब पता होता है..

स्त्री जाती कितनी आसानी से रोकर अपना दिल हल्का कर सकती है.. !! इसीलिए शायद उनको ह्रदयरोग की समस्या कम होती है.. वे अपने दिल पर कोई बोझ रहने नहीं देती.. रोकर हल्का कर देती है.. इसकी तुलना में अगर पुरुषों को देखें.. कितने दंभी होते है.. दिल रो रहा हो फिर भी चेहरे पर मुस्कान ही होती है.. हाँ, पुरुष बिना आँसू के भी रो लेने की अद्भुत क्षमता जरूर रखते है..

मौसम घर के अंदर आई तब सुबोधकांत किसी से फोन पर बात कर रहे थे.. मौसम उदास होकर सोफ़े पर बैठी रही.. इस खलिश भरे माहोल में एक ही अच्छी बात थी और वो थी फाल्गुनी.. फाल्गुनी मौसम के लिए ए.टी.एम के बराबर थी.. जब भी बुलाओ वो हाजिर हो जाती थी.. यही तो होती है सच्चे मित्र की व्याख्या.. मौसम ने तुरंत फाल्गुनी को फोन लगाया पर उसने फोन काट दिया.. और पीछे से आकर हँसते हुए मौसम की आँखों पर अपने हाथ रख दीये.. उसके हाथ हटाते हुए मौसम मुड़कर बोली "लो, शैतान का नाम लो और हाजिर.. !!"

मौसम का मुरझाया हुआ चेहरा देखकर फाल्गुनी ने पूछा "क्या हुआ?? तरुण की बहोत याद आ रही है क्या?" सुनकर मौसम हंस पड़ी

यहाँ वहाँ की बातें कर फाल्गुनी ने मौसम को नॉर्मल कर दिया.. फिर दोनों मौसम के कमरे में गए तब साढ़े दस बजे थे.. एक बजे तक दोनों कमरे के अंदर है बैठे रहे और तब बाहर निकले जब रमिला बहन ने खाने के लिए बुलाया.. मौसम ने उस दौरान फाल्गुनी को जरा सी भी भनक नहीं लगने दी की उसने कल अपने पापा के साथ उसकी चुदाई को अपनी आँखों से देख लिया था.. मौसम मानती थी की फाल्गुनी को उसके वहाँ होने के बारे में पता नहीं था.. पर हकीकत ये थी की वैशाली ने फोन करके फाल्गुनी को सब कुछ बता दिया था.. उसने ये भी बता दिया था की मौसम खुद ही उसे पापा की ऑफिस तक लेकर आई थी और उसने बाहर खड़े खड़े सब कुछ देख लिया था..


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मदन कार ड्राइव कर रहा था और शीला उसके बगल में बैठी थी.. कविता, पीयूष और वैशाली पीछे बैठे हुए थे.. कार फूल स्पीड पर चल रही थी.. और सबके दिमाग भी उतनी ही तेजी से चल रहे थे..




मदन का दिमाग संजय की बात को लेकर खराब हो रहा था.. अच्छा हुआ जो इंस्पेक्टर उसका दोस्त निकला.. नहीं तो बड़ी मुसीबत हो जाती.. नकली पुलिस बनकर लोगों से पैसे लेना.. कितना बड़ा जुर्म होता है.. !! जो इंसान एक गुनाह कर सकता है.. वो दुसरें भी कर सकता है.. ये संजय कब सुधरेगा? क्या करें उसे सुधारने के लिए? वैशाली के भविष्य का क्या होगा??

अचानक सामने से एक ट्रक आ गई और गाड़ी के एकदम करीब से निकल गई.. एक्सीडेंट होते होते रह गया..

"तेरा ध्यान कहाँ है मदन? अभी एक्सीडेंट हो जाता.. !!" शीला ने उसे हड़काते हुए कहा

मदन ने अपना सर झटकते हुए कहा "सही बात है यार.. विचार करते करते ड्राइविंग नहीं करना चाहिए.. " मदन ने कहा

शीला समझ गई की मदन को किस बात का टेंशन था.. कल पुलिस स्टेशन से फोन आया तब से मदन उलझा हुआ सा लग रहा था.. अब शीला को भी चिंता होने लगी.. संजय की चिंता तो थी ही पर उससे ज्यादा चिंता इस बात की थी की कहीं संजय या हाफ़िज़ ने सब कुछ बक न दिया हो.. वरना उसका भंडाफोड़ होना तय था.. अब क्या करू?? अगर सच में उन दोनों ने सब बक दिया होगा तो?? मैं मदन को क्या मुंह दिखाऊँगी?? अगर मदन को मेरे और संजय की गोवा की ट्रिप के बारे में पता चला तो उसकी नज़रों में, मैं हमेशा के लिए गिर जाऊँगी.. !!!

शीला के चेहरे का नूर उड़ गया.. चिंता उसे दीमक की तरह खाए जा रही थी.. अगर संजय ने पुलिस को दोनों के संबंधों के बारे में कुछ भी बताया होगा तो मदन को पता चलने में देर नहीं लगेगी..

पीयूष के साथ समाधान हो जाने के बाद कविता बेहद खुश थी.. अच्छा हुआ की पीयूष के साथ सारे प्रॉब्लेम एक साथ खतम हो गए.. पिछली रात के हसीन संभोग को याद करते हुए कविता की पेन्टी गीली हो रही थी.. कितने दिनों के बाद हम-बिस्तर हुए थे दोनों.. !! पीयूष के उत्तेजित लंड को याद करते हुए कविता ने अपनी जांघें आपस में दबा दी..

दूसरी तरफ पीयूष के सर पर मौसम सवार थी.. हर आती जाती लड़की में उसे मौसम नजर आ रही थी.. मौसम ने वादा तो किया था की सगाई से पहले के बार अकेले में मिलेगी.. पर ऐसा मौका क्या जाने कब मिलेगा?? मिलेगा भी या नहीं? तरुण थोड़ी देर बाद मौसम की ज़िंदगी में आया होता तो सब सही से हो जाता.. तरुण पर उसे बहोत गुस्सा आ रहा था पर क्या करता??

वैशाली को चिंता हो रही थी.. अब वापिस कलकत्ता जाना पड़ेगा.. कितने दिन हो गए.. ससुराल से किसी का एक फोन तक नहीं आया था.. बेचारे बूढ़े सास ससुर.. फोन करते तो भी किस मुंह से?? उनका बेटा ही जब हरामी निकला हो.. रखैलों के साथ भटकता रहता हो और कुछ कमाई न हो.. ऐसे पति के साथ जीने से तो अच्छा है की जिंदगी अकेले ही गुजारी जाए..

वैशाली को सुबोधकांत के संग बिताएं हसीन पल याद आ गए.. ५२-५५ की उम्र के होने के बावजूद कितनी ताकत थी उनमें.. !! दिखने में भी हेंडसम थे.. उनके मुकाबले रमिला बहन तो बेचारी बहोत सीधी थी.. अगर उनकी मेरे जैसी पत्नी होती तो रोज रात को चुदाई महोत्सव मनाती.. एक बार में ही उन्होंने मुझे पिघला दिया.. फिर बेचारी फाल्गुनी का क्या दोष?? वैसे पर्सनालिटी तो संजय की भी अच्छी है पर साला है एक नंबर का कमीना.. सुबोधकांत तो इतने बड़े बिजनेसमेन है फिर भी पैसों का घमंड नहीं है.. अच्छा हुआ जो उसने मौका देखकर उनसे चुदवा लिया.. पर एक बार करने से कभी मन संतुष्ट कहाँ होता है कभी?? आह्ह फाल्गुनी.. तेरी गलती नहीं है.. सुबोधकांत बूढ़ा है.. पर है कोहिनूर हीरा.. ओल्ड इस गोल्ड.. फिर से एक बार मौका मिले तो मज़ा आ जाएँ.. पर अब कहाँ मौका मिलने वाला था..!! मन ही मन वैशाली मुस्कुरा रही थी

मदन रियर व्यू मिरर से वैशाली को मुसकुराते हुए देखता रहा..इस बेचारी को कहाँ पता ही की उसका पति अभी जैल में बंद है.. !!

रास्ते में एक बढ़िया होटल के बाहर मदन ने गाड़ी रोकी.. सब ने चाय-नाश्ता किया.. नाश्ते के बाद पीयूष और मदन सब के लिए मीठा पान लेने के लिए गए.. शीला, वैशाली और कविता लेडिज बाथरूम की तरफ गए.. बाथरूम तो एक बहाना था इसी बहाने पैरों को रीलैक्स कर रहे थे.. कार में बैठे बैठे पैरों में जकड़न हो गई थी सब को..

जब वैशाली और कविता कुछ गुसपुस कर रहे थे तब शीला वहाँ से दूर चली गई.. उसका मानना था की जवान लड़कियों की बातों में दखलअंदाजी नहीं करने चाहिए.. और उन्हें उनके हिसाब से जीने देना चाहिए.. वैशाली को ये देखकर अपनी मम्मी की परिपक्वता पर गर्व हुआ.. कविता और वैशाली बातें करते करते टॉइलेट में पहुंचे

बाहर निकलकर कविता ने एक जोरदार सिक्सर लगाई.. "वैशाली, टॉइलेट देखकर कुछ याद आया की नहीं?"

वैशाली को समझ नहीं आया "टॉइलेट देखकर भला क्या याद आएगा!!"

"क्यों? माउंट आबू में राजेश सर के साथ.. टॉइलेट ट्रिप.. भूल गई क्या?" शरारती मुस्कुराहट के साथ कविता ने कहा

स्तब्ध रह गई वैशाली.. काटो तो खून न निकले ऐसी दशा हो गई उसकी.. पर पलट कर वार करने में वो भी कम नहीं थी.. आखिर थी तो वो शीला की ही बेटी..

"तू भी ज्यादा होशियार मत बन.. मुझे भी तेरी सारे राज पता है"

कविता: "मेरे कौन से राज.. ज्यादा से ज्यादा पिंटू को इशारे करते हुए देख लिया होगा.. और क्या.. !!"

वैशाली को इस बारे में कुछ मालूम नहीं था.. उसने तो ऐसे ही अंधेरे में तीर चला दिया था.. पर कविता ने पिंटू का नाम लेकर उसे बड़ा हिंट दे दिया था.. उसने मन में ही बात जोड़ दी..

"हाँ.. मुझे मौसम ने बताया था की तुझे पिंटू बहोत पसंद है"

कविता: "तो उसमें कौन सी बड़ी बात है.. !! सब शादी से पहले की बात थी.. और काफी सालों के बाद जब हमें कोई अपनी पहचान का मिल जाएँ तब पुरानी यादें तो ताज़ा हो ही जाती है.. !!"

वैशाली: "सही बात है.. पुरानी यादें ताज़ा हो जाती है.. और रिपिट भी हो जाती है.. बस मौका मिलना चाहिए.. हैं ना..!!"

वैशाली और कविता बातें कर रहे थे तब शीला को वो बात याद आ रही थी जब ऐसे ही किसी हाइवे होटल पर रात को हाफ़िज़ ने उसे खड़े खड़े चोद दिया था.. गोवा से लौटते वक्त जब वो लोग खाना खाने रुके थे और संजय टॉइलेट गया था तब.. साला कितना हरामी था.. बिना शरमाये अपना लंड निकालकर मेरे मुँह में दे दिया था.. और मेरी छातियाँ तो ऐसे दबाता था जैसे अपनी बीवी की दबा रहा हो..

वैशाली और कविता को करीब आते देख शीला ने अपनी यादों का पिटारा बंद कर दीया.. ये ऐसा प्रकरण था जिसे याद करते ही शीला के चेहरे पर चमक आ जाती थी.. और छुपायें छुपती नहीं थी.. संजय पाँच मिनट के लिए दूर क्या गया.. उस मामूली ड्राइवर ने कितनी हिम्मत दिखाई थी.. और उस दिन जब मदन को छोड़ने आया था तब मुझे आँख मार रहा था.. साला, रंडी समझता था मुझे..!!

"घर पहुंचकर आराम से सारी बातें करेंगे.. अभी देर हो रही है" कहते हुए कविता ने वैशाली को हाथ से खींचकर जल्दी चलने पर मजबूर कर दिया..

मदन एक कोने में खड़े खड़े सिगरेट फूँक रहा था और पीयूष से बातें कर रहा था..

जैसे ही शीला, कविता और वैशाली गाड़ी में बैठे.. मदन ने कार की चाबी पीयूष को थमा दी..

"ले भाई.. मैं तो थक गया.. वैसे भी मुझे कुछ खाने के बाद नींद आ जाती है.. कल भी मैंने ड्राइव किया था.. अब तू ही चला ले" मदन ने कहा

"कोई बात नहीं मदन भैया.. मैं चला लेता हूँ.. आप आराम से शीला भाभी की गोद में सर रखकर सो जाइए" हँसते हुए पीयूष ने कहा

"अरे पागल.. जवान बेटी के सामने ऐसा सब करना ठीक नहीं.. वो नहीं होती तो सो जाता.. " मदन ने गाड़ी में बैठते हुए कहा

पीयूष के ड्राइवर सीट पर बैठते ही कविता भी आगे आ गया.. पीछे मदन का छोटा सा परिवार बैठ गया..

गाड़ी चल पड़ी.. बार बार गियर बदलने पर पीयूष का हाथ कविता की जांघों से टच हो जाता.. और दोनों के जिस्म में अजीब सी सुरसुरी होने लगती थी.. पिछली रात आइसक्रीम लेने गए तब मारुति ८०० में जो संभोग हुआ था वो तो नाश्ते के बराबर था.. फिर रात को जो हुआ वो बड़ा ही मजेदार था.. अब दोनों की भूख जाग चुकी थी.. जल्दी से जल्दी घर पहुंचकर कपड़े उतारकर एक दूसरे में समा जाने की दोनों की चाह थी..

ड्राइव करते करते.. कविता को छेड़ते छेड़ते.. पीयूष बार बार मिरर से वैशाली की ओर देख लेता था और आँखों से इशारे भी कर रहा था.. पर फिलहाल मदन और शीला के बीच बैठी वैशाली उसकी किसी भी हरकत का जवाब नहीं दे पा रही थी.. पीयूष की नजर वैशाली के उछलते स्तनों पर टिकी हुई थी.. गड्ढे में गाड़ी उछलते ही वैशाली के स्तन ऐसे कूदते थे जैसे उसने अपने टॉप में खरगोश के बच्चे छुपाये हो..

तभी पीयूष के मोबाइल पर मेसेज आया.. ड्राइव करते करते उसने मोबाइल को अनलॉक किया और देखा.. मौसम ने ब्लेन्क मेसेज भेजा था.. उसने बिना शब्दों के ही अपने जीजू को यादें भेजी थी.. मौसम का मेसेज देखकर पीयूष फिर से उसकी यादों में खो गया.. कविता के संग संबंधों का जो रिपेर काम चल रहा था उसमे फिर से डेमेज हो गया.. दंगों के वक्त जब कर्फ्यू लगा हो.. और उसमे थोड़े समय के लिए मुक्ति मिले.. उसी दौरान छुरेबाज़ी हो जाए और शांति जिस तरह चकनाचूर हो जाती है.. वैसा ही हाल पीयूष के दिल का भी हो रहा था.. आग लगाने के लिए माचिस की एक तीली ही काफी होती है.. बड़ी मुश्किल से तैरकर वो कविता नाम के किनारे पर पहुँचने ही वाला था तब मौसम नाम की बाढ़ ने उसे फिर से तहसनहस कर दिया.. जैसे ही मौसम के विचारों ने उसके दिमाग पर कब्जा कर लिया.. वैसे ही उसने कविता को छेड़ना बंद कर दिया.. मानों कविता का स्पर्श करके वो मौसम को धोखा दे रहा हो ऐसा उसे लग रहा था

इंसान अपने नाजायज प्यार के प्रति जितना वफादार होता है उतनी ही वफादारी अपनी पत्नी की ओर क्यों नहीं दिखाता??

चार घंटों के सफर के बाद.. गाड़ी घर पहुँच गई.. एक के बाद एक सब गाड़ी से उतरें.. पिछले दिन ही तो वो सब वहाँ गए थे.. फिर भी ऐसा लग रहा था की जैसे घर छोड़े हुए अरसा हो गया हो..



बड़ी मुश्किल से पटरी पर आई हुई उसकी और कविता की प्रेम-गाड़ी को दूसरा कोई अवरोध न आए इसलिए पीयूष ने अपने दिमाग से मौसम के खयालों को फिलहाल निकाल फेंका.. और कविता के साथ बातें और मस्ती करते हुए घर की ओर जाने लगा..
 
बड़ी मुश्किल से पटरी पर आई हुई उसकी और कविता की प्रेम-गाड़ी को दूसरा कोई अवरोध न आए इसलिए पीयूष ने अपने दिमाग से मौसम के खयालों को फिलहाल निकाल फेंका.. और कविता के साथ बातें और मस्ती करते हुए घर की ओर जाने लगा..



कविता और पीयूष की हंसी खुशी घर के अंदर प्रवेश करता देख अनुमौसी के दिल को चैन मिला.. वो सोच रही थी.. शीला को कोई भी केस हाथ में दो तो वो उसका हल निकाल ही लेती है.. कितने अच्छे लग रहे है ये दोनों.. इसी कारण वश मौसी ने कविता को शीला और मदन के साथ मौसम के घर भेजा था.. उसे यकीन था की शीला कुछ न कुछ करके दोनों का मिलाप करवा ही देगी.. वैसे शीला का तो इसमें कोई हाथ नहीं था.. पर मौसी को ये कहाँ पता था.. !! बिना कुछ किए ही शीला को क्रेडिट मिल गया..

अनुमौसी ने मस्त कडक चाय बनाई सब के लिए.. चाय पीकर वैशाली, शीला और मदन अपने घर चले गए.. कविता किचन में बर्तन माँजने चली गई और पीयूष सीधा अपने बेडरूम मे आ गया..

बेडरूम में पहुंचते ही उसने सब से पहला काम मौसम को मेसेज करने का किया "ब्लेन्क मेसेज क्यों भेजा था जान.. !! हम बस अभी अभी घर पहुंचे.. !!" काफी देर तक मौसम का रिप्लाइ नहीं आया और पीयूष परेशान होकर बैठा रहा

फिर उसने अपने ससुराल की लेंडलाइन पर फोन किया.. फोन रमिला बहन ने उठाया.. पीयूष ने उन सब के पहुँच जाने की खबर दी.. उसका इरादा तो मौसम के बारे में जानने का था.. पर वो पूछ नहीं पाया और फोन रख दिया.. एक महीने के बाद जब पीयूष बेड पर पड़ा तो उसे मौसम की जुदाई का एहसास हुआ.. पिछले के महीने से.. वो किसी न किसी बहाने मौसम के आसपास ही रहता.. और उसके सुंदर चेहरे को देखकर खुश रहता.. पर अब मौसम नहीं थी.. पीयूष ने मोबाइल फोन की गॅलरी खोली और मौसम की तस्वीरों को देखता ही रहा.. उसे ऐसा लग रहा था जैसे तस्वीर से भी मौसम उसकी उदासी का मज़ाक उड़ा रही हो.. गुस्से में पीयूष ने फ़ोटो डिलीट कर दिया..

और तभी मौसम का रिप्लाइ आया.. "जीजू.. आई मिस यू अ लॉट.. आप के जाने के बाद मुझे कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा.. !!" मौसम का मेसेज पढ़ते ही पीयूष खुश हो गया.. एक मिनट पहले जो उदासी के बादल उसके चेहरे पर छाए थे वह सारे छट गए.. वो खड़ा होकर बाहर निकल रहा था तभी मौसी ने उसे टोका.. "कहाँ जा रहा है? सफर कर के आया है.. थोड़ा सा आराम कर ले"

"अभी आया मम्मी.. एक दोस्त का फोन था.. उसे कुछ काम है इसलिए मिलने बुलाया है.. " कहते हुए तेजी से बाहर निकल गया.. गली के नुक्कड़ पर आकार उसने मौसम को फोन किया

"हैलो.. " आहहहा.. मौसम की सुरीली आवाज को सुनकर पीयूष के मन का मोर नाचने लगा..

"मौसम.. आई लव यू यार.. तेरे बिना एक पल भी मेरा दिल नहीं लगता.. कैसी है तू?"

जीजू के मुंह से "आई लव यू" सुनकर मौसम के रोंगटे खड़े हो गए.. उसका रोम रोम पुलकित हो उठा

"मौसम.. मैं बस थोड़े समय के लिए ही बाहर निकला हूँ.. कविता मुझे ढूंढ रही होगी.. अभी ज्यादा बातें नहीं हो पाएगी.. कल ऑफिस जाने से पहले मैं तुझे कॉल करूंगा.. और तुझे अपना वादा तो याद है ना.. !! भूल मत जाना" पीयूष ने एक ही सांस में बहुत कुछ कह दिया

"याद है जीजू.. आप अभी घर जाइए.. कल बात करेंगे.. बाय जीजू"

"बाय जान.. लव यू.. " पियूँ ने फोन कट कर दिया और कॉल-लॉग से मेसेज और कॉल को डिलीट कर दिया और घर आ गया..

साढ़े सात बजे के करीब पीयूष को मदन का फोन आया "खाना खा लिया हो तो वॉक पर चलें??"

पीयूष: "हाँ चलना तो है.. पर अभी खाना बाकी है.. थोड़ी देर रुकिए.. मैं अभी खाकर आता हूँ" मदन के साथ संबंध आगे बड़ाने का ये अच्छा मौका दिखा पीयूष को

"ठीक है.. मैं गली के नुक्कड़ पर तेरा इंतज़ार करता हूँ.. जल्दी आना" मदन ने फोन काट दिया..

थोड़ी देर बाद दोनों साथ चलते चलते एक लंबा राउंड लगाकर लौटे.. मदन का घर पहला आता था इसलिए वो अंदर चला गया.. पीयूष की नजर शीला भाभी के दर्शन के लिए तरस रही थी.. छत पर बैठे बैठे शीला ये देखकर मुस्कुरा रही थी.. पीयूष बेचारा पागल हो गया है मेरे पीछे.. कैसे ढूंढ रहा है.. !!

शीला पीयूष को घर के अंदर जाने तक देखती रही..

रात के साढ़े आठ बज गए थे.. शीला छत से नीचे उतरी.. ड्रॉइंग रूम में वैशाली और मदन टीवी पर "तारक मेहता का उल्टा चश्मा" धारावाहिक देख रहे थे..

"मम्मी.. ये जेठालाल कितना क्यूट है ना.. जेठा-दया की जोड़ी देखकर मुझे तुम और पापा ही नजर आते हो.. "

"मुझे तो बबीता बहोत पसंद है.. " मदन के सामने देखकर मज़ाक करते हुए शीला ने कहा.. बबीता का जिक्र हमेशा उसके बड़े बड़े स्तनों के लिए ही होता है.. बाकी उसमें और कुछ खास तो है नहीं..






"मुझे तो माधवी भाभी बहोत पसंद है.. इतनी स्वीट स्माइल है उनकी.. " मदन ने एकमेव सेक्रेटरी की बीवी को लपेट लिया..

तीनों मस्ती भरी बातें कर रहे थे तभी घर की डोरबेल बजी.. शीला ने दरवाजा खोला और देखा तो इंस्पेक्टर तपन और उनके साथ संजय था.. मदन और शीला के साथ साथ वैशाली भी ये देखकर डर गई.. घबराहट के मारे वो भागकर किचन में चली गई..

मदन: "अरे इंस्पेक्टर साहब आप.. अभी, इस वक्त? क्या बात है?"

शीला भी पुलिस के साथ संजय को देखकर बहोत डर गई थी.. पता नहीं संजय ने क्या क्या बता दिया होगा.. !!

शीला ने घबराते हुए कहा "कहिए तपन जी.. कैसे आना हुआ?"

किचन के अंदर खड़ी वैशाली को ये सुनकर बेहद आश्चर्य हुआ.. भला मम्मी इंपेक्टर को नाम से कैसे जानती है.. !! हो सकता है की उनकी पहचान का हो.. वैशाली का डर थोड़ा कम हो गया.. उसने चुपके से किचन से बाहर देखा..

इंस्पेक्टर तपन ने मज़ाक किया "ये बहनजी बार बार किचन से क्यों झांक रही है?" वैशाली डर गई और अपना चेहरा वापिस खींच लिया

मदन ने कहा "वैशाली बेटा.. ये तपन अंकल है.. डरने की कोई बात नहीं है.. बाहर आजा.. मैं तेरी पहचान कराता हूँ.. "

बड़े ही संकोच के साथ वैशाली बाहर आई.. साथ ही ट्रे में पानी के ग्लास भरकर.. पानी सिर्फ मदन, इंस्पेक्टर और शीला को दिया.. संजय को नहीं.. इससे इन्स्पेक्टर तपन को भी साफ तौर पर पता चल गया की मियां बीवी के बीच सब कुछ ठीक नहीं था.. इस अपमान के बाद भी संजय चुप बैठा रहा क्योंकि इन्स्पेक्टर सामने खड़ा था

पानी पीकर ग्लास ट्रे में रखते हुए इंस्पेक्टर तपन ने कहा "मदन, बात दरअसल ये है की अभी एकाध घंटे पहले इन महाशय के मोबाइल पर फोन आया.. कलकत्ता से.. उनके पापा को हार्ट एटेक आया है और उनकी हालत गंभीर है.. मैंने सोच तुम्हें बता दूँ.. अब बोल.. क्या करना है? वरना जो गुनाह इसने किया है उसका अगर केस बनाऊँगा तो ये दस साल तक सलाखों के पीछे से बाहर नहीं आएगा"

वैशाली स्तब्ध हो कर सुनती ही रही.. इस संजय ने तो मायके में भी मेरी इज्जत की धज्जियां उड़ा दी.. अब ऐसा तो कौन सा गुनाह कर दिया इसने? कहीं रोज का मर्डर तो नहीं कर दिया??

धीमी आवाज में वैशाली ने शीला से पूछा.. शीला ने उसे सारी हकीकत बताई..

शीला: "तपन भैया.. आप बैठिए.. मैं चाय बनाकर लाती हूँ"

वैशाली का हाथ पकड़कर शीला उसे किचन में ले गई..

शीला: "देख बेटा.. तेरे और संजय कुमार के बीच जो कुछ भी तकलीफें हो.. पर तेरे ससुर की इस हालत के वक्त.. एक बहु होने के नाते तेरा वहाँ जाना जरूरी है.. !!"

वैशाली: "मैं इस नालायक के साथ कहीं नहीं जाने वाली.. मुझे अब उसके साथ रहना ही नहीं है.. इतना सब कुछ तो तुम देख ही रही हो.. देखे ना उसके कारनामे!! फिर भी उसके साथ जाने के लिए कह रही हो.. ?? तुझे मेरी जरा सी भी फिक्र नहीं है.. एकदम थर्ड क्लास आदमी है.. प्लीज मम्मी.. मुझे यहीं रहने दो.. " हाथ जोड़कर रो पड़ी वैशाली

शीला: "बेटा.. ये घर तेरा ही है.. तू एक बार वहाँ जा.. अपने ससुरजी की तबीयत ठीक होने तक रहना.. फिर आ जाना वापिस.. !!"

वैशाली: "मुझे बहोत डर लग रहा है मम्मी.. तुझे पता है ना.. कलकत्ता कितना दूर है? वहाँ मेरा अपना कोई है भी नहीं.. और ये संजय वहाँ मेरे साथ क्या क्या करेगा कुछ कह नहीं सकते.. प्लीज मम्मी.. तुम भी चलो मेरे साथ.. मैं अकेली नहीं जाऊँगी"

शीला: "बेटा.. मैं जरूर तेरे साथ चलती.. पर वहाँ कितने दिनों तक रुकना पड़े.. क्या पता.. !! तू पहले वहाँ जा.. थोड़े दिनों बाद मैं और तेरे पापा वहाँ आएंगे.. और लौटते वक्त तुझे साथ यहीं वापिस ले आएंगे.. ठीक है.. !!"

शीला ने वैशाली को समझा ही लिया

चाय पीकर इंस्पेक्टर तपन जाने के लिए खड़े हुए.. जाने से पहले उन्हों ने संजय का गिरहबान पकड़कर धमकाया "कुछ भी उल्टा सीधा किया ना.. तो कहीं से भी ढूंढ निकालूँगा तुझे.. इतना याद रखना.. मदन के कारण आज तुझे छोड़ रहा हूँ.. दूसरी बार हाथ में आया तो उल्टा लटकाकर डंडा घुसा दूंगा.. समझा.. !!"

संजय कुछ भी नहीं बोला..

इंस्पेक्टर तपन निकल गए.. मदन ने तुरंत अपने ट्रैवल एजेंट को फोन लगाया और कलकत्ता की फ्लाइट की दो टिकट बुक करवा दी.. साढ़े बारह की फ्लाइट थी.. वैशाली और संजय को तुरंत निकलना था..

शीला ने तुरंत वैशाली को सामान पेक करने में मदद की.. संजय बेशर्म होकर टेबल पर पैर पसारकर सिगरेट फूँक रहा था.. पुलिस की मार खाकर उसका चेहरा सूझ गया था.. शीला उसके करीब से एक बार गुजरी पर संजय ने उसकी तरफ देखा तक नहीं.. रोज क्लीन शेवड और चकाचक होकर घूमता संजय.. ४-५ दिन की बढ़ी हुई दाढ़ी और गंदे बदबूदार कपड़ों के साथ बड़ा ही घिनौना लग रहा था

शीला ने वैशाली को इशारा करते हुए कहा की वो संजय से नहाने के लिए कहे.. पर वैशाली ने उससे बात करने से साफ इनकार कर दिया

आखिर मदन ने कहा "संजय कुमार.. आप जरा नहा-धोकर फ्रेश हो जाइए.. "

गुस्से से तिमिलाते हुए संजय खड़ा होकर बाथरूम चला गया.. और थोड़ी देर में तैयार होकर बाहर निकला..

घर से निकलते वक्त वैशाली खूब रोई.. घर की एक एक चीज को जैसे आखिरी बार देख रही हो वैसी व्यथा थी उसकी आँखों में.. सामान लेकर टेकसी में सब बैठ गए.. एयरपोर्ट पहुंचते ही, वैशाली और संजय अंदर गए.. शीला और मदन बाहर इंतज़ार करते रहे.. जैसे ही उनकी फ्लाइट छूती.. मदन के सब्र का बांध टूट गया.. वो फुटफुटकर रोने लगा.. शीला ने सांत्वना देते हुए उसे बिठाया.. उसे शांत करने के बाद दोनों घर वापिस लौटे

अब फिर से मदन और शीला अकेले थे.. पर आज का एकांत न शीला को उत्तेजित कर रहा था और ना ही मदन को.. वैशाली के भविष्य की चिंता दोनों को खाए जा रही थी..

बेटी ससुराल में दुखी हो तो माँ बाप बेचारे कैसे खुश रह सकते है.. !!

रात के एक बजे शीला गाउन पहनकर मदन की बगल में सो गई.. उसका हाथ सीधा मदन की शॉर्ट्स के अंदर चला गया.. पर दोनों में से किसी को भी सेक्स का मूड नहीं था.. ये तो बस सोने के लिए एक आरामदायक पोजीशन थी.. मदन शीला के स्तनों को सहलाते हुए सो गया.. मदन हमेशा से ऐसे ही सोता था.. जब से उन दोनों की शादी हुई थी, तब से.. !!

सुबह दोनों काफी देर से जागे.. शीला ने घड़ी में समय देखा और चोंक गई.. अरे बाप रे.. आठ बज गए.. !!! रसिक ने आज डोरबेल भी नहीं बजाई.. ?? अब बिना दूध के चाय कैसे बनाउ?? शीला उठकर बाहर गई और चारों तरफ देखा.. फिर जल्दबाजी में दरवाजा बंद तो किया पर लोक करना भूल गई.. बेडरूम मे आकर उसने मदन को सोते हुए देखा और सोचा.. अच्छा हुआ जो आज रसिक से मुलाकात नहीं हुई.. वैसे भी कल रात की घटना के बाद आज उसका मूड नहीं था.. अब संजय कुमार कलकत्ता जा कर कोई नया गुल ना खिलाए तो अच्छा..

मदन ने आँखें मलते हुए कहा "अब शहर में एक रसिक अकेला तो नहीं है दूध देने वाला.. मैं अभी दुकान से दूध लेकर आता हूँ.. हम दो दिन से घर पर थे नहीं.. तो बेचारे ने दरवाजा नहीं खटखटाया होगा.. लगता है तुझे रसिक का दूध पसंद आ गया है" मदन ने मज़ाक करते हुए कहा

शीला ने भी जवाब में सिक्सर लगाई.. "हाँ.. जैसे तुझे उस अंग्रेजी मेरी का दूध पसंद आ गया था.. " मदन के गाल खींचकर शीला ने कहा "उस फिरंगी का दूध पीकर तेरे गाल फूल गए है.. " रसिक वाली बात को बदलने के लिए शीला ने ये चाल चली

"इतनी सुबह सुबह तुझे मेरी की याद कहाँ से आई?" शीला के गोलमटोल स्तनों से खेलते हुए मदन ने कहा

"अभी तूने पूरी बात बताई कहाँ है.. उसके बॉयफ्रेंड से मिलने का सेटिंग करवाया था तूने अपनी ऑफिस में.. फिर अपना ये बाम्बू उस गोरी की चूत में कैसे घुसा दिया वो कहानी अभी बाकी है.. " कहते हुए शीला ने मदन की शॉर्ट्स में हाथ डालकर उसका लंड पकड़ लिया..








शीला ने ये महसूस किया था की जब जब वो मेरी की बात करती थी तब मदन की पकड़ उसके स्तनों पर और सख्त हो जाती थी.. मतलब मदन मेरी को अब तक भुला नहीं था.. वैसे तो शीला भी.. जीवा, रघु और रसिक को कहाँ भूल पाई थी.. !!

शॉर्ट्स से निकले लंड को एक प्रेमभरा स्पर्श देकर उसने जीवित कर दिया.. जैसे गहरी नींद से जाग रहा हो.. वैसे अंगड़ाई भरकर मदन का लंड खड़ा हो गया.. शीला मदन के लंड से खेल रही थी और मदन शीला के स्तनों को मसल रहा था..










तभी घर के अंदर अनुमौसी ने, दूध की पतीली हाथ में लेकर, प्रवेश किया और सीधे बेडरूम में घुस आई.. ये तो अच्छा हुआ की दोनों की हरकतें चादर के भीतर चल रही थी.. वरना अनुमौसी के सामने अनर्थ हो जाता



अनुमौसी: "शीला, ये ले.. रसिक आज दूध मेरे घर देकर गया था.. रसिक बेचारा बेल बजा बजाकर थक गया.. पर आप दोनों में से कोई जागा ही नहीं.. आखिर वो मेरे घर ही तुम्हारा दूध देकर चला गया.. "

"मौसी, आप बैठिए शीला के साथ" संभालकर अपने खड़े लंड को छुपाते हुए मदन खड़ा हुआ और ब्रश करने चला गया.. अनुमौसी भी रुकी नहीं

"ढेर सारे काम है घर पर.. मैं चलती हूँ शीला" कहते हुए मौसी भी चली गई

चलो, अच्छा हुआ.. दूध का प्रॉब्लेम तो सॉल्व हो गया.. शीला ने किचन मे जाकर चाय बनाई..

चाय पीकर मदन अखबार पढ़ रहा था और शीला किचन में मशरूफ़ हो गई..

दोपहर के एक बजे वैशाली का शीला पर फोन आया..

वैशाली: "मम्मी.. मेरे ससुरजी का देहांत हो गया.. यहाँ का वातावरण बिल्कुल भी ठीक नहीं है.. संजय मुझे बहोत परेशान कर रहा है.. तुम जल्दी यहाँ आओ और मुझे यहाँ से ले जाओ.. !!"

शीला और मदन स्तब्ध हो गए.. उनके समधीजी की मृत्यु हुई थी.. इसलिए उनका कलकत्ता जाना जरूरी था.. मदन ने वैशाली को फोन पर आश्वासन देते हुए कहा की वो दोनों जल्द से जल्द वहाँ पहुँच जाएंगे.. ऐसे मौकों पर क्या किया जाए उसका मदन को भी ज्ञान नहीं था.. आखिर उन्होंने अनुभवी अनुमौसी को बुलाया.. बुजुर्गों को इस बारे में सारी जानकारी होती है.. जब बेटी के ससुराल में इस तरह की घटना हो तो क्या करना चाहिए.. कोई धार्मिक विधि होती है या नहीं.. वैशाली को वहाँ नहीं रहना है.. तो इस परिस्थिति में उसे यहाँ लेकर आना चाहिए या नहीं..

सारी चर्चाओ के बाद ये तय हुआ की शीला और मदन परसों कलकत्ता जाने के लिए निकलेंगे.. पर ससुर की तेरहवीं खतम होने तक वैशाली का वहाँ रहना जरूरी था.. उसके बाद मदन वापिस कलकत्ता जाकर उसे यहाँ ले आएगा..

मदन के एजेंट का फोन नहीं लग रहा था इसलिए उसने पीयूष से फोन करके टिकट बुक करवाने के लिए कहा.. पीयूष ने अपने दोस्तों की मदद से दूसरे दिन की दो टिकट बुक करवा भी दी..

मदन: "मौसी, एक विनती है.. आजकल चोरियाँ बहोत हो रही है.. हमें आते आते शायद दो-तीन दिन लग जाए.. तब तक पीयूष या तो चिमनलाल क्या मेरे घर पर सोएंगे रात को?"

अनुमौसी: "तुम दोनों निश्चिंत होकर जाओ.. यहाँ की कोई चिंता मत करो.. हम सब है ना.. !! सब कुछ देख लेंगे"

शीला और मदन जाने की तैयारी में जुट गए.. पूरा दिन दोनों ने एक दूसरे से कोई ओर बात तक नहीं की.. दूसरे दिन सुबह पाँच बजे की फ्लाइट थी.. इसलिए घर से रात के तीन बजे निकले.. जाने से पहले शीला ने अपने घर की चाबी देने के लिए मौसी को जगाया.. चाबी देते वक्त उसने मौसी के कानों में कुछ कहा.. सुनते ही मौसी की आँखें चमकने लगी..

जैसे ही शीला और मदन, ऑटो में बैठकर निकले.. मौसी भी घर के अंदर घुस गई.. थोड़ी देर बाद वो बाहर आई.. और शीला के घर चली गई.. मदन और शीला के बेड पर टांगें फैलाकर लेट गई.. इतनी रात को शीला ने जब उन्हें नींद से जगाया तब उनका थोड़ा गुस्सा आया था.. पर जब शीला ने उनके कान में वो बात कही.. सुनकर उनका सारा क्रोध हवा हो गया.. लेटी हुई अनुमौसी को नींद नहीं आ रही थी.. साढ़े तीन बज रहे थे फिर भी उनकी आँख में अब नींद का नामोनिशान नहीं था.. हर थोड़ी देर में वो घड़ी देख रही थी.. उन्हें लग रहा था जैसे समय थम सा गया था.. शीला की बात सुनने के बाद उनका जिस्म तापने लगा था.. शीला ने उसे फोन करके बता तो दिया होगा ना.. !!

शीला के घर की लेंडलाइन से अनुमौसी ने शीला को मोबाइल पर फोन लगाया.. शीला के फोन की घंटी बजी.. मदन बिल्कुल उसके बगल में खड़ा था.. शीला थोड़ी दूर चली गई और फोन पर बात करने लगी.. फिर फोन काटकर उसने दूसरा फोन मिलाया.. और बात करने के बाद वो वापिस लौटी.. शीला को सुबह चार बजे किसी से फोन पर बातें करते देख मदन को आश्चर्य हुआ..

मदन: "किसका फोन था शीला??"

शीला: "अनुमौसी का फोन था.. तुमने कहा था इसलिए वो आज से ही हमारे घर सोने चली आई.. "

मदन: "अच्छा.. अच्छा.. फिर ठीक है.. इतनी सुबह फोन आया ये देखकर मुझे चिंता होने लगी.. "

फोन खतम करके शीला वापिस लौट रही थी तब उसने कॉल-लॉग से आखिरी फोन की एंट्री डिलीट कर दी थी.. दोनों कुर्सी पर बैठे बैठे बोर्डिंग की राह देखने लगे..

सुबह के साढ़े चार बजे भी एयरपोर्ट पर काफी भीड़ थी.. छोटे तंग वस्त्रों में एयर-होस्टेस भी अपनी जिस्म का जादू बिखेरते हुए मदन के दिल को बाग बाग कर रही थी.. खूबसूरती और खुशबू.. कभी छुपाये नहीं छुपती..

मदन की नजर बचाकर शीला ने अनुमौसी को फोन करके बता दिया "मैंने बात कर ली है" और फोन काट दिया

मदन को थोड़ा आश्चर्य जरूर हुआ.. फिर उसने सोचा.. होगी कोई औरतों की अपनी बात.. !! मदन फिर से एयर-होस्टेस के जलवों को देखने में मशरूफ़ हो गया.. खूबसूरती को ताड़ना मदन का पुराना शोख था.. मदन सोच रहा था.. ये एयरपोर्ट वाले.. मेरी शीला जैसी गदराई एयर-होस्टेस क्यों नहीं रखते.. !! इन पतली लड़कियों को देखकर तो फ्लाइट के पैसे भी वसूल नहीं होते.. भरे भरे जिस्म और मदमस्त जोबन वाली एयर-होस्टेस हो तो देखने वालों का भी दिल लगा रहें.. !! बड़े स्तनों वाली को देखकर सफर करने का मज़ा ही अलग होता.. !! बाकी इन सुखी भिंडियों की तो सिर्फ शक्ल ही अच्छी होती है.. बाकी उनकी हड्डियाँ देखने में कोई मज़ा नहीं आता..

फ्लाइट का टाइम हो गया.. और शीला तथा मदन बैठकर निकल भी गए

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इस तरफ अनुमौसी की आँखों में इंतज़ार था.. और वो घड़ी आखिर आ ही पहुंची.. डोरबेल बजते ही उन्होंने तुरंत दरवाजा खोला.. सामने रसिक खड़ा था

"अरे मौसी आप यहाँ कैसे? भाभी जी कहाँ गई?" जल्दबाजी में शीला रसिक को ये बताना भूल गई थी की अनुमौसी को इस आयोजन के बारे में पहले से पता था..

अनुमौसी चोंक गई.. अरे बाप रे.. इस मुए को तो कुछ पता ही नहीं है.. अब क्या करूँ!! बेहद इंतज़ार के बाद जब आखिर भारत-पाकिस्तान का मैच होने वाला हो और उसी दिन बरसात गिर जाएँ तब जैसा महसूस होता है वैसा ही कुछ हो रहा था मौसी को.. एक ही पल में न जाने कितने विचार आ गए मौसी के मन में..

"तुझे शीला का कॉल नहीं आया था क्या?? अंदर आ.. बैठकर बात करते है" रसिक का हाथ पकड़कर अंदर खींच लिया मौसी ने

"मुझे फोन तो आया था भाभी का.. पर उन्होंने ये नहीं कहा था की आप यहाँ होंगे.. !!"

"तू वो सब बातें छोड़.. और शीला ने जो करने के लिए कहा है वो कर.. समय मत बिगाड़.. !!"

रसिक के जलवों की बातें मौसी ने शीला से सुन रखी थी.. बस सामने से पहल करने में घबरा रही थी.. उनके पति चिमनलाल ने जब से सेक्स में रिटाइरमेंट ले लिया था तब से मौसी की हालत खराब हो गई थी.. पिछले पाँच सालों से मौसी तड़प रही थी.. पति के होते हुए ये दिन देखने पड़ रहे थे इस बात का मलाल था उन्हें.. उनकी उम्र के चलते वो किसी और से मुंह मारने की सोच भी नहीं सकती थी.. लेकिन आज शीला की बदौलत उन्हें ये मौका मिला था.. अगर आज ये मौका गंवाया तो न जाने फिर कब लंड नसीब होगा.. !!

रसिक की चौड़ी छाती पर हाथ फेरते हुए उन्होंने कहा

"रसिक, तू शीला के साथ जो कुछ करता है.. वो सब आज मेरे साथ कर.. शीला शहर से बाहर गई है और मैं यहाँ उसके घर का खयाल रख रही हूँ.. अब शीला ने तुझे फोन करके बता तो दिया है सब.. फिर क्यों टाइम-पास कर रहा है??"

सुबह के पाँच बजे.. जब लगभग सारे लोग.. चैन की नींद सो रहे होते है.. तब अनुमौसी अपने जिस्म की भूख मिटाने के चक्कर में रसिक के सामने गिड़गिड़ा रहे थे.. वैसे रसिक ने मौसी को कभी उस नजर से पहले देखा नहीं था.. इसलिए उसे भी संकोच हो रहा था..

अनुमौसी ने रसिक को रिझाने की सारी तरकीबें आजमा ली.. रसिक बेचारा.. खाने आया था रसगुल्ला.. अब चीनी चाटनी पड़ेगी.. अनुमौसी की बूढ़ी छातियों में वो शीला के गदराएं स्तनों का अंदाज तराश रहा था.. उत्तेजना के कारण ऊपर नीचे हो रही मौसी की छातियों को देखकर रसिक को कुछ खास मज़ा नहीं आया.. पर अनुमौसी आज तय कर चुके थे.. उन्होंने रसिक का हाथ पकड़कर अपने स्तनों पर रख दिया.. और उसके हाथों को दबाते हुए बोली

"ओह्ह रसिक.. जल्दी जल्दी कुछ कर न यार.. " ऐसा कौन सा मर्द होगा जो स्त्री की इन हरकतों के बाद भी अड़ग रह पाए.. !! नरम मांस के गोले हाथ में आते ही उसका लंड फुदकने लगा.. शरमाते हुए रसिक ने अनुमौसी को अपनी ताकतवर भुजाओं में जकड़ लिया.. और उनकी पीठ पर हाथ सहलाने लगा..

मर्द के शरीर का स्पर्श होते ही मौसी के जिस्म में भूचाल सा आ गया.. स्त्री और पुरुष के शरीर जब एक दूजे के साथ कामुक स्पर्श करते है तब दोनों पात्रों के लिए दुनिया की सारी बातें गौण हो जाती है.. काम-वासना का इतना जबरदस्त प्रभाव होता है.. देखते ही देखते अनुमौसी के जिस्म पर हवस ने कब्जा कर लिया

अनुमौसी का हाथ पकड़कर रसिक ने अपने लंड पर रख दिया.. रसिक का मूसल पकड़कर अनुमौसी धन्य हो गई.. उनकी आँखों में आँसू आ गए.. रसिक के लंड की सख्ती को महसूस करते हुए वो सिसकने लगी.. मन ही मन अपने पति चिमनलाल को गालियां देते हुए अनुमौसी ने रसिक के लंड को हिलाना शुरू कर दिया..









उनके अनुभवी भोंसड़े से काम-रस टपकने लगा.. और पूरे कमरे में चूत-रस की विचित्र गंध फैल गई..

चूत की मांसल गंध को सूंघकर सांड की तरह उत्तेजित हो गया रसिक.. अपना पाजामा उतारते हुए उसने अनुमौसी के कानों में कुछ कहा.. सुनकर अनुमौसी तुरंत ही घुटनों के बल बैठ गई.. और रसिक के फुँकारते लंड को बड़े ही अहोभाव से देखने लगी.. जैसे छोटा बच्चा किसी नए खिलौने को कुतूहल से देखता है.. बिल्कुल वैसे ही.. !! गजब की उत्तेजना थी अनुमौसी के चेहरे पर.. अपने भोसड़े को खुजाते हुए वो बिना पलक झपकाए इस लंड की भव्यता और सख्ती को देखती ही रह गई.. एक ही पल में उनके दिमाग में अनगिनत विचार आ गए.. इस लंड से क्या क्या काम लिया जा सकता है वह सारी संभावनाएं सोचने लगा उनका दिमाग.. !! कहाँ चिमनलाल का मेले में मिलती पाँच रुपये की बाँसुरी जैसा लंड..और कहाँ रसिक का विकराल मूसल.. कोई मुकाबला ही नहीं था..!!

हतप्रभ होकर देख रही अनुमौसी के सामने रसिक अपना लंड थोड़ा सा आगे की ओर ले गया और उसके सुपाड़े ने अनुमौसी को होंठों का स्पर्श किया.. अनुमौसी ने अपना मुख खोला और उसी के साथ नो-एंट्री का बोर्ड हट गया.. एक ही धक्के में रसिक ने अपना अंगारे जैसा लाल सुपाड़ा मौसी के मुंह में डाल दिया..

अब मौसी की तकलीफ ये थी की उन्हें लंड ठीक से चूसना आता ही नहीं था.. पर शीला को उन्होंने जिस तरह लंड चूसते देखा था उसका अनुकरण करने लगी.. रसिक के लंड को स्त्री के कोमल होंठों का स्पर्श मिलते ही वो खिलने लगा.. उत्तेजित रसिक "आह्ह-आह्ह" करते हुए मौसी के मुंह को पेलने लगा.. सेक्स के अभाव से तड़प रही अनुमौसी ने जैसा समझ में आया वैसा चूसना चालू कर दिया.. इस अनोखे लंड को प्यार करना.. वो चूसते चूसते सीख गई.. और रसिक के काले चूतड़ों को अपनी हथेलियों से दबाते हुए वो लंड का ज्यादा से ज्यादा हिस्सा अपने मुंह मे लेने लगी..






वह रोमांचक क्षण आ गई जब रसिक का मोटे डंडे जैसा लंड और अनुमौसी का भूखा मुंह.. दोनों एकाकार हो गए.. हवा जाने की भी जगह नहीं थी.. परिणाम स्वरूप.. अनुमौसी का दम घूँटने लगा.. वो गॉन्गियाने लगी.. उन्होंने लंड को अपने कंठ से निकालने की भरसक कोशिश की.. पर वो भूल गई थी की अब उनकी मर्जी चलने नहीं वाली थी..

पिछले कई दिनों से रोज सुबह.. रसिक शीला के जिस्म से खिलवाड़ करने के इरादे से आ रहा था.. पर उसके हाथों सिर्फ निराशा ही लग रही थी.. आज शीला नहीं तो कोई और सही.. इसी सोच के साथ उसने अनुमौसी पर हमला कर दिया था.. अनुमौसी के अंदर सालों से कैद रति..और रसिक का काम देव.. दोनों पूर्णतः जागृत हो चुके थे..

अब तक खामोश रहकर कमर हिला रहा रसिक.. अनुमौसी के अपरिपक्व मुख-मैथुन से जबरदस्त उत्तेजित हो कर मौसी का हाथ पकड़कर उन्हें शीला के बिस्तर तक खींच गया.. वही बिस्तर पर जहां वो अनगिनत बार शीला को चोद चुका था.. लगभग हररोज पाँच बजे रसिक और शीला का काम उत्सव शुरू हो जाता और साढ़े पाँच तक चलता रहता.. और रसिक के सहारे ही शीला ने मदन की जुदाई को बर्दाश्त किया था.. वरना कभी कभी शीला को डर लगा रहता की चूत की आग की वजह से वो कहीं कोई गलत कदम न उठा ले.. अच्छा हुआ जो शीला को रसिक मिल गया.. किसी को शक भी नहीं हुआ और शीला की भूख भी मिटती रही..

शीला को याद करते हुए रसिक ने अनुमौसी को बेड पर पटक दिया और उन पर सवार हो गया.. भूखे भेड़िये की तरह वो मौसी पर टूट पड़ा.. हवस से पागल हुआ रसिक, मौसी के घाघरे के अंदर घुस गया और उनके चिपचिपे भोसड़े को चूमकर चाटने लगा.. रसिक की जीभ छेद में घुसते ही.. मौसी सिहरने लगी.. सातवे आसमान पर पहुँच गई..






"आह रसिक.. बड़ा मज़ा आ रहा है यार.. एक बार और जोर से चाट.. आह्ह.. चौड़ी करके चाट नीचे.. ओह्ह कितने दिनों से तड़प रही थी मैं.. आह्ह.. जैसे शीला की चाटता है बिल्कुल वैसे ही मेरी चाट.. ऊईईई.. !!"

मौसी की बातों से रसिक को ये पता चल गया.. की उसके और शीला भाभी के कारनामों के बारे में मौसी को सब कुछ पता था.. तो उसमे क्या हो गया.. !! इस हमाम में तो सब नंगे थे.. मौसी भी.. !! तू भी चोर और मैं भी चोर.. !! अब न तो रसिक को किसी बात की फिक्र था और ना ही मौसी को कोई चिंता.. !! चिमनलाल के साथ मौसी को इतने सालों में ये सुख कभी नहीं मिला था.. उस चूतिये को ये नहीं पता था की संभोग का मतलब सिर्फ चूत में लंड डालकर हिलाना नहीं होता.. उसके अलावा भी की सारी हरकतें होती है जो स्त्री को तृप्त करने के लिए करनी जरूरी होती है.. अगर चिमनलाल को ये सब आता तो.. इस उम्र में अनुमौसी को एक मामूली दूधवाले के सामने टांगें फैलाने की नोबत नहीं आती..

रसिक की जीभ जैसे जैसे अनुमौसी के भोसड़े पर घूमती गई.. मौसी के मन में चिमनलाल के प्रति नफरत और तीव्र होती गई.. उन्हें यही मलाल था की शादी के पचास सालों तक उस कमीने चिमनलाल ने मुझे चूत-चटाई की इस अद्भुत सुख से वंचित क्यों रखा.. !!

कामदेव के अद्वितीय रूप से अभिभूत होकर अनुमौसी बिस्तर पर टांगें खोलकर अपना भोसड़ा चटवा रही थी.. दो उंगलियों से मौसी की चूत के होंठों को चौड़ा करके रसिक अंदर के लाल गुलाबी भाग पर अपनी खुरदरी जीभ रगड़ रहा था.. बीच बीच में वो अनुमौसी की जामुन जैसी बड़ी क्लिटोरिस में मुख में लेकर दबा देता था..






"ओह्ह रसिक.. ये तूने अभी क्या किया?? एक बार फिर से कर.. आह्ह आज तो मार ही देगा मुझे तू.. बहोत मज़ा आ रहा है.. रसिक.. इतनी तेज खाज हो रही है अंदर.. तू जितना चाट रहा है उतनी ही खुजली तेज होती जा रही है.. ओह्ह माँ.. " अपने चूतड़ों को उछाल उछलकर मौसी अपनी क्लिटोरिस को रसिक के चेहरे से रगड़ने लगी

रसिक के पास अब ज्यादा समय नहीं था.. उसने दो-तीन मिनट में ही अनुमौसी के तरसते भोसड़े को अपने थूक से सींच दिया.. फिर मौसी की दोनों जांघों को चौड़ा कर बीच में बाइओथ गया.. पैरों के बीच उस विकराल लंड को देखकर अनुमौसी को बेहद प्यार आ गया.. तेज हवा में जैसे पतंग लहराती है बिल्कुल वैसे ही रसिक का मजबूत लोडा लहरा रहा था.. उत्तेजना के कारण खंभे जैसे लंड को अनुमौसी देखती ही रह गई.. लाल सुपाड़े की नोक पर वीर्य की एक बूंद भी प्रकट हो चुकी थी..

"ओह्ह रसिक.. कितना मस्त है रे तेरा.. !!! इसे कहते है असली लंड.. पीयूष के पापा का तो इसकी तुलना में नुन्नी जैसा लगेगा.. अब मुझे समझ में आया की वो शीला तेरे पीछे क्यों इतनी पागल है.. ऐसा सांड जैसा मर्द मिल जाए.. और साथ में मूसल जैसा लंड.. आह्ह.. फिर जीवन में और चाहिए ही क्या.. !!" चूतड़ उठाकर अनुमौसी ने अपनी भोस का स्पर्श करवाया लंड से.. जैसे दो अनजान लोगों की पहचान करा रही हो..

रसिक का लंड अब फुँकारने लगा..

"सोच क्या रहा है.. डाल दे अंदर जल्दी.. नहीं तो तेरे लंड को मेरी ही नजर लग जाएगी.. " अनुमौसी के इस रूप को देखकर रसिक भी स्तब्ध था.. रोज भजन करती मौसी का कौन सा रूप असली था??

वैसे देखने जाए तो हर व्यक्ति के कितने अलग अलग रूप होते है.. !!

चाय की टपरी पर पॉलिटिक्स या क्रिकेट की चर्चा करते वक्त हम विवेचक होते है..

मंदिर में पूजा करते वक्त हम भक्त बन जाते है

बच्चों को उनकी गलतियों के लिए डांटते वक्त हम सर्वगुण सम्पन्न महसूस करते है..

ग्राहक को मीठी जबान से फुलसाकर माल बेचते वक्त हम होशियार होने का दावा करते है..

और बीवी या गर्लफ्रेंड की चूत चाटते वक्त हम उनके वफादार प्रेमी होने का ढोंग भी कर लेते है..

एक ही व्यक्ति.. और उसके ढेर सारे व्यक्तित्व.. कौन सा सही.. कौन सा गलत.. कीसे पता.. !!

रसिक ने मौसी के दोनों स्वरूप देखे हुए थे.. एक तो पूरे दिन भक्तिभाव में डूबी रहती स्त्री का और आज उसके सामने भोसड़ा चौड़ा कर लेटी.. चुदने के लिए बेकरार एक भूखी औरत का..

अपने लंड को टकटकी लगाकर देखती हुई मौसी को देख रहा था रसिक.. मौसी के ढल चुके स्तन देखकर उसे शीला के मदमस्त बबलों की याद आ गई.. पता नहीं क्यों.. शीला का खयाल आते ही लंड की सख्ती दोगुनी हो जाती थी.. शीला के साथ हुए संबंधों के बाद ऐसा हो रहा था.. ऐसा नहीं था.. पहली बार जब वो दूध देने आया और शीला को देखा तब से वो उसके दिमाग में बस गई थी.. उसे तब सपने में भी अंदाजा नहीं था की दूध लेते वक्त झुककर अपने स्तनों को दिखाती भाभी के दोनों बबलों के बीच लंड घुसाने का मौका मिलेगा..

शीला के विचारों में सख्त हुए लंड को देखकर अनुमौसी को ये गलतफहमी हो गई की रसिक उनको देखकर इतना उत्तेजित हो रहा था.. गर्व से उन्होंने अपने जिस्म को थोड़ा और ऊपर किया और रसिक को याद दिलाया की सिर्फ देखते रहने से काम नहीं बनेगा..

रसिक ने नीचे झुककर मौसी के दोनों पिचके स्तनों को पकड़ लिया और एक जबरदस्त धक्का लगाया..

"ओह माँ.." अनुमौसी की चीख निकल गई.. एक ही धक्के ने उन्हे अपनी जवानी की दिनों की याद दिला दी.. अनुभवी चौड़े भोसड़े वाली अनुमौसी को दर्द होने का कोई सवाल ही नहीं था.. पर रसिक का लंड काफी तगड़ा और मोटा था.. इसलिए उनके भोसड़े की दीवारों को खुरेचते हुए वो अंदर जाकर फिट हो गया.. मौसी के भोंसड़े और दिल दोनों को ठंडक मिली..






रसिक अपने विशाल जिस्म के बोझ तले अनुमौसी को कुचले जा रहा था.. और पूरी ताकत लगाकर लंड को अंदर बाहर करने लगा.. कामरस से चिपचिपी हो चुकी अनुमौसी की बूढ़ी भोस.. उत्तेजना के कारण खुल रही थी और बंद हो रही थी.. रसिक बेरहमी से पेलने लगा.. और काफी समय से बिना चुदे तड़प रही मौसी को स्खलित होने में देर नहीं लगी..

पर रसिक को मौसी के ढले हुए बदन में जरा भी दिलचस्पी नहीं थी.. काफी धक्के लगाने के बावजूद उसका लंड झड़ने से इनकार कर रहा था.. बेचारा रसिक.. लंड का जहर निकालने के लिए.. वो मन मे शीला और रूखी को याद करते हुए तेजी से धक्के लगा रहा था.. पर लगातार दस मिनट तक चोदने पर भी रसिक के लंड ने वीर्य नहीं निकाला.. बूढ़ी फैली हुई चूत में वो दम कहाँ जो रसिक के लंड को दबोचकर उसका पानी निकाल दे.. !!

आखिर रसिक धक्के लगा लगा कर परेशान हो गया.. मौसी तो अब तक खुश हो ही चुकी थी.. उसने अपना लंड बाहर निकाल लिया

"मौसी, मज़ा आ गया आज तो.. ऐसा मज़ा मुझे कभी नहीं आया पहले.. " रसिक ने झूठी तारीफ की

"पर तेरा पानी क्यों नहीं निकल??" मौसी ने पूछा

"बात दरअसल ये है की जब शीला भाभी का फोन आया तब मैं रूखी को चोद रहा था.. उसने मेरा सारा रस चूस लिया.. इसलिए अभी पानी नहीं निकला.. वैसे आपको तो मज़ा आया ना.. ??"

रसिक के विकराल चमकते लंड को अहोभाव से देखते हुए मौसी ने कहा "मुझे पता है रसिक.. की ये सब तू मुझे खुश करने के लिए बोल रहा है.. पर मैं इतनी मतलबी भी नहीं हूँ.. की मेरा काम हो जाए और मैं तुझे भूल जाऊ.." ये कहते ही अनुमौसी घूमकर घोड़ी बन गई और अपनी गांड रसिक के सामने पेश कर दी

उत्तेजित रसिक को मज़ा आ गया.. मौसी की टाइट गांड में अब उसका लंड जरूर झड़ जाएगा.. लंड तो उसका पहले से ही गीला था.. अपनी हथेली में मुंह से लार निकालकर उसने अनुमौसी की गांड के छेद पर लगा दी.. फिर अपनी एक उंगली डालकर छेद के कसाव को चेक करने लगा.. जैसे मुख्यमंत्री के आने से पहले उनके सिक्योरिटी वाले स्थल का मुआयना करते है बिल्कुल वैसे ही..

अनुमौसी के कूल्हों पर अपना सुपाड़ा रगड़कर छेद पर रख दिया.. और हल्के से दबाया.. थोड़ा और दबाव बनाते ही उसका सुपाड़ा मौसी की गांड के अंदर चला गया.. अब उसने एक जोर का धक्का लगाकर मौसी की गांड में आधा लंड घुसा दिया.. अनुमौसी का बूढ़ा चेहरा पीड़ा के कारण लाल हो गया






"मर गई.. जरा धीरे धीरे डाल रसिक.. फट जाएगी मेरी.. !!" अनुमौसी की सिसकियों में दर्द से ज्यादा आनंद का भाव था.. इसलिए अब रसिक ने बिना कुछ ज्यादा सोचें दूसरा धक्का लगाया और अनुमौसी की गांड की भूगोल बदल दी..

"दर्द तो बहोत हो रहा है रसिक.. पर तू चिंता मत कर.. और अपना काम निपटा ले.. फिकर मत कर और अपना पानी निकाल.. आह्ह बहुत तगड़ा है रे तेरा तो.. "

इस पल का महीनों से इंतज़ार कर रही थी अनुमौसी.. जब से उन्हें पता चला था की शीला मदन की जुदाई का गम रसिक के साथ हल्का कर रही थी.. तब से उनकी बड़ी इच्छा थी.. पर ऐसी बातों में जल्दबाजी करना योग्य न था.. इसलिए जब तक उन्होंने अपनी सगी आँखों से रसिक और शीला के गुलछर्रों को देख नहीं लिया तब तक उन्हों ने शीला से इस बारे में कोई बात नहीं की थी.. अपने हिसाब से ही छानबीन करती रही और जब उन्हें पूरी तसल्ली हो गई तब ही उन्हों ने शीला से इस बारे में बात की.. हालांकि शीला ने पहले तो काफी शर्म और संकोच दिखाया था.. और बात को टाल दी थी.. पर उसके ध्यान में सारी बातें थी.. मौका मिलते ही शीला ने अनुमौसी के भोसड़े की भूख शांत करने का प्रबंध कर ही दिया..

मन ही मन शीला का आभार मान रही अनुमौसी की गांड में रसिक के लंड ने गरमागरम वीर्य की पिचकारी छोड़ दी.. सालों बाद अपने जिस्म के अंदर ये गुनगुना एहसास महसूस करते हुए अनुमौसी चिहुँक उठी..








रसिक के चेहरे पर तृप्ति के भाव देखकर वो और खुश हो गई.. दोनों पात्रों को संतुष्टि मिलें वहीं सम्पूर्ण संभोग कहलाता है.. अभी भी उत्तेजित रसिक अपने लंड से मौसी की गांड को ड्रिल कर रहा था.. उसका निकल गया होने के बावजूद.. टाइट गांड में धक्के लगाने मे उसे मज़ा आ रहा था..

थोड़ा सा नरम हुआ लंड अभी भी गांड के अंदर था और अप-डाउन हो रहा था.. और उसके ऊपर नीचे होने के कारण अनुमौसी के भोसड़े में कुछ कुछ होने लगा था.. मौसी के जीवन का ये एक यादगार दिवस था.. वो तो चाहती थी की ऐसा मौका उन्हें बार-बार मिले पर उसकी संभावना काफी कम थी.. वैसे रसिक को भी कहाँ अनुमौसी में ज्यादा दिलचस्पी थी.. !!! पर चूत ढीली हो या टाइट.. चेहरा सुंदर हो या कुरूप.. मर्द कभी भी अपनी हवस को संतुष्ट करने से पीछे नहीं हटता.. वो तो आँखें बंद कर अपने मनपसंद फिगर को याद करते हुए.. चूत के अंदर लंड के नृत्य का आनंद प्राप्त कर लेता है.. दोनों जिस्म शांत होने के बाद लगभग दस मिनट पश्चात.. रसिक ने हथियार डाल दीये..

दोनों के अवयव ढीले पड़ते ही.. कमरे में ऐसा सन्नाटा छा गया जैसा युद्ध-समाप्ति की घोषणा के बाद हो जाता है.. वासना का उफान उतरते ही मौसी को अपने जिस्म पर रसिक का शरीर बोझ सा लगने लगा.. मौसी की गांड से लंड बाहर निकलते ही रसिक उनके शरीर से नीचे उतरा और फटाफट कपड़े पहनने लगा.. पाजामा चढ़ा रहे रसिक का हाफ-टाइट लंड देखकर मौसी सोच रही थी.. कितना अच्छा होता अगर वो जब चाहे तब रसिक के लंड का आनंद ले सकती.. !! अनुमौसी ने भी कपड़े पहने और रसिक को गले लगा लिया

"मौसी.. अब मुझे जाना होगा.. सब जगह दूध देने जाना है.. उजाला होने से पहले मुझे निकल जाना चाहिए.. " रसिक ने कहा

"ठीक है रसिक.. आज तो मुझे बड़ा मज़ा आया.. फिर कभी मौका मिले तो जरूर आना.. पीयूष का बाप तो मुझे खुश करने से रहा.. और शीला को अब उसका पति मिल गया है.. उसकी तरफ थोड़ा कम ध्यान देगा तो भी चलेगा.. पर मुझे मत तड़पाना.. तेरा कुछ भी काम हो मैं कर दूँगी.. पर तू मुझे खुश करते रहना.. भले ही मेरा जिस्म शीला जितना सुंदर न हो.. पर मेरी भूख शीला से भी ज्यादा है.. " भावुक होकर मौसी ने फिर से रसिक को गले से लगा लिया..

"कोई बात नहीं मौसी.. आप चिंता मत कीजिए.. जब भी मौका मिलेगा मैं आपको खुश करूंगा.. चलिए मैं अब चलता हूँ.. !!"



रसिक के जाते ही मौसी ने दरवाजा बंद किया और बिस्तर को ठीक करने लगी.. मौसी का हाथ अनायास ही उनकी गांड पर चला गया.. अभी भी दर्द हो रहा था.. मौसी बिस्तर पर लेट गई.. सुबह के छह बजे थे.. रोज जल्दी जागकर घर के काम निपटाने वाली मौसी का जिस्म आज सुस्त था.. थोड़ी देर तक सो कर अपनी थकान उतारकर वो घर चली गई..
 
रसिक के जाते ही मौसी ने दरवाजा बंद किया और बिस्तर को ठीक करने लगी.. मौसी का हाथ अनायास ही उनकी गांड पर चला गया.. अभी भी दर्द हो रहा था.. मौसी बिस्तर पर लेट गई.. सुबह के छह बजे थे.. रोज जल्दी जागकर घर के काम निपटाने वाली मौसी का जिस्म आज सुस्त था.. थोड़ी देर तक सो कर अपनी थकान उतारी और फिर वो घर चली गई..



घर के अंदर प्रवेश करते हुए.. सामने बैठे चिमनलाल से नजरें नहीं मिला पा रही थी मौसी.. उनके लिए चाय बनाकर वो वापिस घर के कामों में व्यस्त हो गई.. चाय नाश्ता करके चिमनलाल बाहर चले गए.. फिर पीयूष भी ऑफिस चला गया.. अब कविता और मौसी दोनों घर पर अकेले थे

कविता आज बहोत खुश दिख रही थी.. ये देखकर मौसी के दिल को चैन मिला.. चलो अच्छा हुआ जो पति-पत्नी में सुलह हो गई.. अनुमौसी भी आज रोज के मुकाबले काफी फ्रेश लग रही थी.. रसिक से चुदवाकर उनके जिस्म की आग ठंडी जो हो गई थी.. वो नहाने के लिए बाथरूम मे गई तब अपने भोसड़े को सहलाते हुए उन्हें रसिक का मूसल याद आ गया.. फिर उनकी चूत ने संतुष्टि का डकार लिया.. उसे सहलाकर मौसी ने शांत किया और तैयार होकर बाहर निकली

शाम को जब पीयूष आया तब कविता ने उसे कहा की उसके पापा का फोन आया था.. पंद्रह दिनों में ही मौसम की शादी होनी थी.. तरुण को बेंगलोर की एक बड़ी कंपनी में जॉब मिल गई थी.. बहोत अच्छी तनख्वाह मिलने वाली थी.. इसलिए उनकी इच्छा थी की तरुण के बेंगलोर जाने से पहले ही शादी निपटा ली जाए..

सुनकर पीयूष बेहद निराश हो गया.. सिर्फ पंद्रह दिन??

"अरे.. इतने दिनों में कैसे सारी तैयारियां होंगी? कपड़े, साड़ियाँ, जेवर और बहोत सारी चीजें लेनी होगी.. हॉल बुक करना पड़ेगा.. और भी ढेर सारी तैयारियां करनी होगी.. कैसे होगा सब??"

कविता: "पापा कह रहे थे की शॉपिंग में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा.. जेवर खरीदना भी सिर्फ एक दिन का काम है.. पर सब से जरूरी है मौसम को इस के लिए मनाना.. मम्मी पापा तो तैयार है.. वो कह रहे थे की सब को थोड़ी सी दौड़-भाग होगी पर इतना अच्छा लड़का हाथ से चला जाएँ उससे तो अच्छा है की हम सब इस बात के लिए राजी हो जाए.. "

पीयूष: "मैं समझ गया कविता, लेकिन.... !!!"

कविता: "लेकिन-वेकीन कुछ नहीं.. हम सब है ना पापा मम्मी की मदद के लिए.. सब साथ मिलकर जुट जाएंगे तो हो जाएगा.. कोई बड़ी बात नहीं है"

पीयूष उदास हो गया.. इतने काम वक्त में तैयारियां तो हो जाएगी.. पर उसका और मौसम को मिलने का वक्त मिलना अब असंभव था

रात के खाने के बाद, कविता और पीयूष छत पर अंधेरे में बैठे हुए थे.. कविता ने पीयूष की शॉर्ट्स में हाथ डालकर उसके लंड को मसाज देते हुए ये चर्चा छेड़ी थी.. कविता के हाथों का स्पर्श और उसके सुंदर स्तनों का शरीर पर दबाव महसूस करते ही पीयूष का जवान लंड सरसराने लगा.. रोज तो कविता के छूते ही खड़ा हो जाने वाला लंड अभी भी अर्ध-जागृत अवस्था में था.. कविता का हाथ पीयूष के लंड को नरम नहीं होने दे रहा था और मौसम की याद उसे ठीक से सख्त नहीं होने दे रही थी..








मौसम के प्रति पीयूष के आकर्षण से बेखबर कविता बेचारी अपने पापा के दृष्टिकोण से सोचकर बातें कीये जा रही थी.. और पीयूष का दिमाग बातों में कम और मौसम के विचारों में ज्यादा उलझा हुआ था.. मौसम की जल्द शादी होने की बात से उसे गहरा सदमा पहुंचा था.. अगर इस बारे में पहले पता चला होता तो वो मौसम से फोन पर बात करता.. उस बेचारी ने तो आज तीन बार फोन कीये थे.. पर काम में व्यस्त होने के कारण वो बात नहीं कर पाया था.. और जब फ्री होकर पीयूष ने फोन किया तब मौसम ने कट कर दिया था.. शायद उसने इसी बात के लिए फोन किया होगा.. वरना मौसम उसे ऑफिस के टाइम पर कॉल नहीं करती थी

ये सब क्या हो गया अचानक?? पीयूष को अपनी किस्मत पर गुस्सा आ रहा था.. पीयूष के लंड को सहलाते हुए कविता मौसम को मनाने के तरीके सोच रही थी.. पर न कोई उपाय मिला और ना ही पीयूष का लंड सख्त हुआ.. आखिर थककर दोनों बेडरूम में आकर सो गए.. कविता बार बार पीयूष के शरीर को छेड़ती रही.. पर पीयूष के दिल के शेयर की किंमतें इतनी गिर चुकी थी की कितनी कोशिशों के बावजूद उसके लंड का सेंसेक्स ऊपर नहीं आया..








आखिर कविता भी थककर दुसरें विचारों में खो गई.. और इसी विचारों में ही तो कविता की सब से बड़ी दौलत छुपी हुई थी.. पिंटू को मिलने का बड़ा मन कर रहा था कविता को.. माउंट आबू से लौटने के बाद एक बार भी बात नहीं हुई थी पिंटू से.. पहले तो जब कविता का मन करता वो पिंटू से बात कर लेती..पर अब पिंटू को काम की ज़िम्मेदारियाँ बढ़ गई थी.. और जब वो फ्री होता तब पीयूष उसके साथ होता.. इसलिए बात करना मुश्किल हो जाता.. पिंटू जब ऑफिस से निकलता तब कविता घर के काम में बिजी हो जाती और फिर पीयूष के घर आ जाने के बाद सब कुछ ब्लॉक.. !!

कविता सोच रही थी की मौसम की शादी के बहाने जब वो मायके जाएगी तब पिंटू से मिलने का मौका जरूर मिल जाएगा.. इस विचार मात्र से उसकी जांघें भीड़ गई.. उसकी बगल में पीयूष ऐसे निश्चेतन होकर पड़ा था जैसे उसकी सारी दुनिया लूट चुकी हो.. पर कविता का जिस्म हवस की आग में तपने लगा था.. ये ऐसी हवस थी जिसमे केवल जिस्म की भूख ही नहीं पर अपने प्रेमी से मिलने की तड़प भी शामिल थी..

कविता का हाथ उसकी चूत पर पहुँच गया.. एक हाथ से नाइटड्रेस से उसने अपना स्तन बाहर निकाला.. और पिंटू को याद करते हुए दबाने लगी..










मज़ा तो आया पर जितना आना चाहिए था उतना नहीं आया.. प्रेमी के हाथ से स्तन दबने पर जो मज़ा आता है वो तो अभी आना मुमकिन नहीं था.. और वो ये नहीं चाहती थी की इस वक्त पीयूष का हाथ उसके जिस्म को छूए.. फिलहाल वो अपने सपनों की दुनिया में.. अपने प्रेमी के संग मस्त थी.. ऐसी दुनिया जहां समाज का डर नहीं था.. ज़िम्मेदारियाँ नहीं थी.. कोई रोक-टॉक नहीं थी.. सिर्फ वो और पिंटू दोनों थे.. जैसे कविता की अपनी सपनों की अनोखी दुनिया थी.. वैसी ही अपनी दुनिया पीयूष की भी थी ही.. !! ये बात ओर थी की फिलहाल वो मौसम के बारे में रोमेन्टीक विचार करने की स्थिति में नहीं था.. अभी कुछ दिनों पहले ही वो मौसम के प्यार में सराबोर था और कविता पिंटू के नजदीक होते हुए भी दूर थी.. और दुखी भी.. कविता के लिए माउंट आबू की यात्रा एक दुःखद याद बनकर रह गई थी.. लेकिन पीयूष के लिए माउंट आबू की यादें अनमोल थी.. ऐसी याद जो भुलाएं नहीं भूलती थी.. आबू में ही तो उसे मौसम के जबरदस्त आकर्षक कच्चे कुँवारे उरोजों को दबाने का मौका मिला था.. उसके गुलाबी अधरों को चूमने का अहोभाग्य भी प्राप्त हुआ था.. पर अभी वो यादें उसके किसी काम की नहीं थी..

पर कविता आज फूल-फॉर्म में थी.. अपने स्तनों को दबाते हुए वो पिंटू को याद करने लगी.. उसका मन अब लंड चूसने का कर रहा था.. कविता की इच्छा इतनी तीव्र थी की अगर उसे पंख होते तो अभी उड़कर पिंटू के पास चली जाती.. कुछ भी हो जाए.. बस एक बार.. पिंटू के साथ मन भरकर ज़िंदगी जी लेनी है.. मौसम की शादी के बहाने कम से कम एक हफ्ते के लिए मायके जाना होगा.. उस समय का भरपूर लाभ उठाने का मन बना लिया कविता ने.. मिलना तो हो जाएगा.. पर पिंटू के साथ वक्त बिताऊँ कहाँ? कोई घर तो होना चाहिए अकेले मिलने के लिए.. !! पर किसी के घर पिंटू से मिलना खतरे से खाली नहीं था.. कुछ तो सेटिंग करना पड़ेगा

कविता के हाथ लगातार उसके शरीर पर चल रहे थे.. वो ऐसा महसूस कर रही थी जैसे पिंटू उसके जिस्म को मसल रहा हो.. एक साथ दो उँगलियाँ उसने अंदर डाल दी थी.. आगे पीछे करते हुए वो झड़कर ठंडी हो गई.. और दो मिनट में गहरी नींद सो गई








अनुमौसी की किस्मत चमक गई थी.. चिमनलाल अपने दोस्त की बेटी की शादी में शहर से बाहर गए थे.. कविता और पीयूष को बताकर मौसी शीला के घर सोने चली गई.. जैसे ही शीला के घर का दरवाजा बंद किया.. उन्हें रसिक के लंड की याद सताने लगी.. एकांत कितना भयानक होता है.. !! सज्जन से सज्जन आदमी अकेला होते ही विचारों में बह जाता है.. हकीकत में चारित्रवान उसे ही कहा जा सकता है जो अकेले में मौका होने के बावजूद भी ईमानदार रह सके.. बाकी ५० की उम्र में ड़ायाबिटिस के कारण लंड खड़ा ही न होता हो.. वैसे लोग अगर चारित्रवान होने का दावा करें तो उसका कोई अर्थ नहीं होता.. वो तो मजबूरी के मारे धारण की हुई सज्जनता कहलाएगी.. जिसका लंड दिन में दस बार टाइट होता हो.. वो इंसान अकेले में किसी सुंदर स्त्री को भोगने के बजाए उसे अपनी बहन मान सके.. वही सच्चा सज्जन.. !!

मौसी ने टीवी चालू किया.. खाना तो वो घर से खाकर आई थी.. बैठे बैठे वो "अनुपमा" के जीवन की समस्याओं को देख रही थी.. तभी लेंडलाइन की घंटी बजी.. मौसी ने फोन उठाया.. शीला का कॉल था

"कैसी हो मौसी? सब ठीक ठाक??"

मौसी: "हाँ शीला.. सब ठीक है.. तू कैसी है? वहाँ सब ठीक है? तुम्हारे समधी की अंतिम विधि हो गई? "

शीला: "हाँ मौसी.. अंतिम विधि तो हो गई.. अब बाकी सारी विधियाँ चल रही है.. वैशाली का प्रश्न बार बार परेशान कर रहा है.. समझ में नहीं आता की क्या करें.. कोई हाल सूझ नहीं रहा था तो सोचा आपसे बात करूँ और आपकी राय ले लूँ.. !!"

"क्यों? अब क्या हुआ वैशाली को?"

शीला: "होना क्या था मौसी.. मेरी वैशाली को वो नालायक बहोत परेशान कर रहा है.. उसके बाप की मौत हुई है.. ऐसे गंभीर वातावरण में भी घर में झगड़े कर रहा है.. "

अनुमौसी: "क्या बात कर रही है.. !! ये तो एक नंबर का कमीना निकला.. !!"

शीला: "हम यहाँ पहुंचे तब वैशाली उसके पापा के गले लगकर इतना रोई की क्या बताऊँ.. मेरा तो दिल ही बैठ गया.. मैंने बेटी को ससुराल भेजा है या कसाई के पास.. यही पता नहीं चल रहा.. !!"

अनुमौसी: "देख शीला.. अगर वैशाली को वहाँ नहीं रहना हो तो सारी विधि खतम होने के बाद उसे यहाँ वापिस ले आओ.. जो होगा देखा जाएगा..बेटी को ऐसी हालत में उस दरिंदे के पास छोड़ना ठीक नहीं.. "

शीला: "पर उनकी तेरहवीं को तो अभी बहोत दिन बाकी है.. तब तक हम यहाँ क्या करें?? यहाँ तो एक दिन रहना भी मुश्किल है.. मदन तो कब से वापिस जाने के लिए उतावला हो रहा है.. यहाँ संजय तो अपने बाप को जलाकर कहाँ गायब हो गया पता नहीं.. कौन जाने कहाँ भटक रहा होगा साला!!"

अनुमौसी: "गया होगा अपने लफंगे दोस्तों के साथ या फिर कहीं रंगरेलियाँ मनाने.. कुछ भी हो जाए तुम लोग वैशाली को वहाँ उस हेवान के साथ अकेला मत छोड़ना.. तुम एक काम करो.. मदन चाहे वापिस लौट जाएँ.. तुम वैशाली के साथ ही रहो.. तेरहवीं खतम होने के बाद मदन वहाँ आएगा और तुम दोनों को साथ लेकर वापिस.. "

मौसी का ये सुझाव शीला के गले उतर गया.. वो इस बारे में सोचेगी.. ऐसा कहकर फोन काट दिया.. फोन रखकर मौसी भी वैशाली के बारे में सोच में पड़ गई थी.. चेनल बदलते बदलते एक अंग्रेजी सेक्सी सीन पर आकर वो रुक गई.. वैशाली के सारे विचार दिमाग से निकल गए.. आधे नंगे कपड़ों में एक अंग्रेज लड़की उसके बॉयफ्रेंड के होंठों पर किस कर रही थी.. उसके मस्त स्तनों को देखकर मौसी को ईर्ष्या होने लगी.. अपने ब्लाउस के बटन खोलकर.. लटके हुए स्तनों को दोनों हाथों से जोड़कर अपने जवानी के दिनों को याद करने लगी मौसी..






यही स्तन.. जवानी में कितने सख्त और मस्त थे!! ब्याह कर ससुराल आई तब वो कुंवारी थी.. उसके अक्षत कौमार्य को चिमनलाल ने भंग किया था और फिर बड़े मजे से उसके जिस्म का आनंद लिया था.. पर चिमनलाल सेक्स के मामले में काफी ठंडे थे.. जिस आक्रामकता की उम्मीद मौसी को थी वो कभी दिखा नहीं पाए.. जो आखिरकार मौसी को रसिक से मिली.. शादी के शुरुआती सालों में चिमनलाल ने मौसी की भरपूर चुदाई की थी.. और तब वह संतुष्ट भी थी.. पर आज जो ताकत रसिक ने दिखाई थी वो तो चिमनलाल में कभी नहीं थी.. जब चिमनलल से बेहतर कुछ मिला तब उसे ज्ञात हुआ की अब तक जिस तरह का सेक्स उन्होंने किया वो तो कुछ भी नहीं था.. आज जाकर उन्हें पता चला की जिस अभाव से अबतक वो झुझ रही थी.. वो कमी थी आक्रामक सेक्स की.. कभी कभी औरतों की ऐसी इच्छा होती है की मर्द उन्हें बेरहमी से भोगें.. गालियां बकते हुए.. उनके जिस्म को रौंदते हुए.. उसके जिस्म के साथ ऐसे ऐसे खिलवाड़ हो जो उसकी कल्पना के परे हो.. एक कुंवारी लड़की का.. और एक परिपक्व अनुभवी ढलती उम्र वाली स्त्री का.. रोमांस का खयाल अलग अलग होता है.. उम्र के साथ साथ अपेक्षा और व्याख्या बदलती रहती है..

नई नवेली दुल्हन की रोमांस की व्याख्या कुछ ऐसी होती है.. की उसका पति ऑफिस के टाइम पर उसे फोन करे.. घर पर मेहमान आए हो तब कैसे भी साथ सोने का सेटिंग करे.. सब की मौजूदगी में उसे छेड़े.. एक कोल्डड्रिंक में दो स्ट्रॉ डालकर साथ पियें.. आस पास कोई न हो तब चुपके से उसके स्तन दबा दे.. बस यही अपेक्षा और उम्मीद रहती है.. पर उम्र के अनुभवी मकाम पर पहुंची हुई औरतों के लिए रोमांस का मतलब होता है.. साहचर्य, विचारों का तालमेल और आक्रामक सेक्स.. ऐसा सेक्स जो उनके हड्डियों को झकझोर कर रख दे.. और उनके ढीले भोसड़े को सख्त लंड से चोदकर छील दे.. चुदाई के दौरान बेहद कामुक होकर नए नए आसन करे.. ऐसा सेक्स करे की दो दिन तक उसकी थकान महसूस हो.. ये सारी बातें एक वयस्क स्त्री की रोमांस की व्याख्या हो सकती है..

अनुमौसी को खुद की किस्मत पर गर्व हो रहा था क्योंकि आज उनके मन में छुपी हुई उस गहरी इच्छा को बाहर लाकर रसिक ने संतुष्ट किया था..

एकांत.. टीवी पर चल रहा रोमेन्टीक द्रश्य.. और सुबह के संभोग का सुरूर.. ये सब मिल जाएँ तो नतीजा क्या हो सकता है? देखते ही देखते अनुमौसी के सारे कपड़े उतर गए.. भोसड़े में चार उँगलियाँ एक साथ डालकर ऐसे आगे पीछे कर रही थी जैसे गीले गड्ढे से मिट्टी खोद रही हो.. उँगलियाँ डाल डालकर वो रसिक का दिया हुआ ऑर्गजम ढूंढ रही थी.. ढीले भोसड़े को उंगलियों से ठंडा करना संभव नहीं था.. थोड़ी देर कोशिश करने के बाद वो थक गई.. हारकर वो खड़ी हो गई.. और यहाँ वहाँ देखने लगी.. उनकी नजर किसी ऐसी वस्तु की खोज कर रही थी जो आसानी से उपलब्ध नहीं थी.. भोसड़े में आग लगी हुई थी.. रसिक तो दूसरे दिन सुबह आने वाला था.. बीच में पड़ी इस पूरी रात को इस सुलगते हुए बदन के साथ गुजारना उनके लिए नामुमकिन था..

मौसी की नजर सब जगह दौड़ने लगी.. वो कुछ ऐसा ढूंढ रही थी जो उनके भोसड़े में फिट बैठे और रसिक के मोटे लोड़े की कमी पूरी कर सके.. पर उन्हें ऐसा कुछ नहीं मिला.. आखिर वो वापिस बिस्तर पर लेट गई.. और गोल तकिये को अपनी दोनों जांघों के बीच दबाकर पड़ी रही.. भड़कते भोसड़े को थोड़ी राहत जरूर मिली पर सिर्फ ऊपर ऊपर से.. अंदर जो ज्वालामुखी सक्रिय हो चुका था उसका क्या करें???






अनजाने में ही वो कमर हिलाने लगी और सिसकियाँ भरते हुए रसिक के कसरती मजबूत बदन को याद करते हुए तकिये पर जोर-जबरदस्ती करने लगी.. जैसे जैसे वो तकिये से भोस रगड़ती गई वैसे वैसे परिस्थिति बद से बदतर होने लगी.. एक समय तो ऐसा आया की हताश होकर उन्होंने तकिये को उठाकर दूर फेंक दिया.. निर्जीव तकिया बेचारा दीवार से टकराकर फर्श पर गिर गया..

अब अनुमौसी ने टीवी का रिमोट ही अपने भोसड़े में घुसेड़ दिया.. और अंदर तक घुसाकर फिर बाहर खींचा.. और वैसे ही अंदर बाहर करती रही.. रिमोट पर लगे खुरदरे प्लास्टिक के घर्षण से उनके भोसड़े में बहार आ गई.. रिमोट के बटनों को अपनी क्लिटोरिस पर रगड़ते ही उन्हें यकीन हो गया की यही उनकी आग बुझाएगा.. उन्होंने अंदर बाहर करने की गति ओर तेज कर दी.. उनका हाथ इस परिश्रम से थक चुका था पर उस थकान की परवाह किए बिना.. वो इस चरमोत्कर्ष प्राप्त करने के आंदोलन में डटी रही.. आखिर घिसते रगड़ते उनके भोसड़े का कल्याण हो गया.. बेहद थक चुकी थी मौसी.. उनका सारा बदन कांप रहा था.. रिमोट को भोसड़े से निकालने तक का होश नहीं रहा और उनकी आँख लग गई..






करीब दो बजे उनकी आँख खुली.. आँखें मलते हुए उन्हों ने अपने नग्न शरीर को देखा और शर्मा गई.. लाइट भी चालू थी और टीवी भी.. टीवी बंद करने के लिए यहाँ वहाँ रिमोट ढूंढती रही पर आसपास कहीं नहीं दिखा.. ढूँढने के लिए वो खड़ी होने लगी तो एकदम से भोसड़े में रिमोट घुसे होने का एहसास हुआ.. मौसी बहोत ही शर्मा गई.. उन्हों ने रिमोट बाहर निकाला.. रिमोट पर चूत के सफेद रस का लेमिनेशन हो चुका था

अरे बाप रे.. इतनी देर तक ये अंदर ही था.. !! सोचते हुए उन्होंने टीवी बंद करने के लिए लाल बटन दबाया पर बंद नहीं हुआ.. रिमोट को किसी काम का नहीं छोड़ा था मौसी ने.. मन ही मन हंसने लगी मौसी.. ये चूत चीज ही ऐसी है.. अंदर जो भी जाता है.. बाहर निकलने के बाद किसी काम का नहीं रहता.. फिर वो रिमोट हो या लोडा.. रिमोट को टेबल पर रखते हुए टीवी की स्विच बंद कर दी और कपड़े पहन लिए.. लाइट ऑफ करके वो फिर से बिस्तर पर लेट गई

थोड़ी ही देर में उन्हें फिर से नींद आ गई.. कहते है की नींद आने की पूर्वशर्त होती है थकान.. और आज मौसी पूरी तरह से थक चुकी थी.. बूढ़ी घोड़ी जब रेस जीत जाए तब कितनी थक जाती है.. !!

रोज की तरह आज भी सुबह पाँच बजे डोरबेल बजी.. चीते की फुर्ती से अनुमौसी बिस्तर से भागकर गई और दरवाजा खोला.. रसिक को देखते ही वो सहम गई.. नई दुल्हन की तरह.. पर रसिक ने काजू की गैरमौजूदगी में मूंगफली से काम चला लेने का मन बना लिया था.. वो सीधे घर में घुस गया और दरवाजा बंद कर मौसी के होंठों को चूसने लग गया.. उनके गालों पर काटते हुए रसिक जंगली बन गया.. और जैसे वो दूध बेचने के लिए नहीं पर मौसी को छोड़ने आया हो उतना उतावला हो गया.. मौसी रसिक की इसी अदा की तो दीवानी थी.. चिमनलाल की लोकल ट्रेन उन्हें मंजिल पर बहोत देर से पहुंचाती थी.. और कभी कभी तो बीच रास्ते ही खराब हो जाती और मौसी को खुद के बलबूते पर ही मंजिल तक जाना पड़ता.. लेकिन रसिक के साथ ये प्रॉब्लेम नहीं थी.. वो तो बुलेट ट्रेन की गति से ऐसे शुरू हो जाता.. की एक ही सफर में मौसी तीन तीन मंज़िलें हासिल कर लेती..

रसिक के लोड़े को तुरंत पकड़ लिया मौसी ने.. पाजामे के बाहर निकालते हुए वो ऐसे हिलाने लगी जैसे थन से दूध दुह रही हो.. लंड से खेलने के लिए वो इतनी उतावली हो गई थी की प्राकृतिक रूप से लंड को खड़ा होने में जितना वक्त लगता है तब तक भी उनसे इंतज़ार नहीं हो रहा था.. चेहरे पर बेसब्री साफ झलक रही थी






"मौसी, आपको इतना पसंद है मेरा??" जवान घोड़ी की तरह उछल रही मौसी के ढीले स्तनों को ब्लाउस के ऊपर से दबाते हुए रसिक ने पूछा

"रसिक, मैंने अपनी पूरी ज़िंदगी में ऐसे सुख का अनुभव नहीं किया है.. पीयूष के पापा इस मामले में शून्य बंटा सन्नाटा जैसे है.. अगर तू मुझे मेरी जवानी में मिल गया होता तो क्या बात होती.. तेरा ये बड़ा ही मस्त है रसिक.. एक बार तेरे नीचे लेटी हुई औरत तुझे कभी भूल नहीं सकती.. आह्ह!!"

अपने लंड की तारीफ सुनते ही रसिक का लंड कडक हो गया बल्कि होना चाहिए उससे भी ज्यादा सख्त हो गया.. हवस और अहंकार दोनों की सहायता से.. मौसी की शादी जिस समय हुई थी उस समय स्त्रीयां लज्जा का अतिरेक करती थी.. वो समय ऐसा था जब पत्नी अपने पति का नाम भी नहीं लेती थी.. ऐसे में वो कैसे भला अपने पति से कह पाती की मेरी चूत चाटिए.. !! पुरुष को जैसे आता वैसे चोदकर अपना पानी छोड़कर बगल में खर्राटे भरने लगता था.. और औरत भी समझती थी की.. बस यही था, जो था.. !! औरतों का जीवन बस यही था की जब उसका पति कहे तब घाघरा उठा कर लंड लेने के लिए तैयार रहना.. और पति बस इतना ही समझता था की रोज रात होते ही अपनी पत्नी की चूत में लंड डालकर धक्के लगाना और जब पानी निकल जाए तब सो जाना..

शायद वात्स्यायन ने ऐसे पुरुषों के लिए ही संभोग पर पूरा ग्रंथ लिखना पड़ा.. उन्हें स्त्रीयों की इस दशा पर रहम आ गया होगा.. उन्हों ने सोचा होगा की अगर मैं इन तोतों को नहीं सिखाऊँगा तो कोयलें बेचारी कुंजना भूल जाएगी.. उनकी ज़िंदगी की जीवंतता कहीं खो जाएगी और वो पूरे जीवन में एक बार भी चरमोत्कर्ष को प्राप्त नहीं कर पाएगी.. हँसते हुए अपने मर्द की सारी इच्छाओं को पूरी करती रहेगी..

भला हो उस क्रांतिकारी वात्स्यायन का.. जिसने मानवजात को इस अनमोल ग्रंथ की भेंट दी.. और चोदना सिखाया.. ये भी सिखाया की संभोग के दौरान पहले स्त्री को उसकी चरमसीमा तक पहुंचाना चाहिए और उसके पश्चात ही पुरुष को झड़ना चाहिए.. नहीं तो आज भी पुरुष स्त्री को केवल भोगने का और बच्चे पैदा करने का साधन ही मान रहा होता.. चूत के थोड़े से ऊपर दो सुंदर स्तन होते है.. और उस स्तनों के पीछे एक नाजुक ह्रदय होता है.. और उस ह्रदय में कोमल भावनाएं बसी होती है.. जिन्हें समझना पुरुष के लिए बेहद जरूरी होता है.. शर्मीली प्रकृति वाली स्त्री उसे कभी खुद जाहीर नहीं कर पाती

आज के मुक्त समाज में किसी भी धर्म या संलग्न व्यक्ति को सेक्स की बात करते हुए देख समाज बर्दाश्त नहीं कर सकता.. तो सोचिए की इतनी सदियों पहले, एक महात्मा ने सेक्स के बारे में इतना विस्तृत ग्रंथ लिखा तब समाज ने उसे कैसे स्वीकार किया होगा.. !! कितनी आलोचना सहनी पड़ी होगी?? फिर भी उस ग्रंथ की रचना हुई और वो अब तक यथार्थ है इसका मतलब तो यही होता है की आज के मुकाबले उस समय का समाज ज्यादा मुक्त विचारों वाला था..

मौसी सोच रही थी की काश उनकी शादी रसिक से हुई होती तो कितना अच्छा होता.. !!! गरीबी में जीना पड़ता.. कपड़े धोने पड़ते.. दूध दुहना पड़ता.. पर जीवन के इस सर्वोच्च आनंद से वो वंचित तो न रहती.. !!! रसिक भी हिंसक होकर मौसी के विविध अंगों को मसलने मरोड़ने लगा था..

मौसी की निप्पलों को खींचते हुए रसिक ने कहा "चलिए मौसी.. जल्दी कीजिए.. फिर दूध देने भी जाना है"






रसिक के लोड़े को तैयार देखकर मौसी खुश हो गई.. नीचे झुककर उन्हों ने टोपे को चूम लिया और बोली "कितना मस्त है.. मन तो करता है की टांगें फैलाकर पूरी रात डलवाती रहूँ"





रसिक ने सोचा.. मौसी इतनी बूढ़ी है फिर भी मेरा लंड उन्हें खुश कर देता है.. तो मेरी रूखी को क्यों ये लंड छोटा पड़ता है? साली जब देखो तब ताने मारती रहती है की और धक्के लगाओ.. मज़ा नहीं आ रहा.. क्या नामर्दों की तरह चोद रहे हो.. !!! उससे तो शीला भाभी अच्छी.. कभी मेरे लंड से नाखुश नहीं होती.. जब से रूखी ने नामर्द कहा है तब से उसे रांड को छूने का मन ही नहीं करता.. पर ये कमबख्त लोडा मेरा.. रूखी के बबलों को देखते ही डोलने लगता है.. शीला भाभी मिल गई उसके बाद तो मैंने रूखी की तरफ देखा ही कहाँ है.. !! पर शीला भाभी के साथ सब बंद होने के बाद वापिस उस रूखी की शरण में जाना पड़ा.. हरामजादी को इससे बड़ा कैसा लंड चाहिए?? इतना मोटा और लंबा घुसाता हूँ फिर भी उसे कम पड़ता है.. कम ही पड़ेगा ना.. उसके वो यार जीवा का तगड़ा लंड लेने की आदत जो पड़ गई है उसे.. माँ चुदाने जाए रूखी.. अब तो यहाँ मौसी भी तैयार हो गई है.. शीला भाभी या तो मौसी.. दोनों में से एक तो जब चाहे मिल ही जाएगी मुझे.. पर जब तक शीला भाभी मिल रही हो तब तक मौसी को देखने का मतलब नहीं.. शीला भाभी के बॉल भी रूखी जैसे है.. बड़े बड़े.. और भाभी कितना मस्त चूसती है.. !! उस मामले में रूखी को कुछ नहीं आता.. साली को बस अपने भोसड़ा चटवाकर चुदवाना ही आता है.. शीला भाभी का पति और दो साल विदेश रुक गया होता तो कितना अच्छा होता..

"आह्ह रसिक.. तेरी याद में मुझे पूरी रात ठीक से नींद भी नहीं आई.. " मौसी पर अब हवस का बुखार चढ़ चुका था..

"मौसी, आज आपकी चाटूँ या सीधा घुसा दूँ?"

"चाटनी तो पड़ेगी बेटा.. वही तो सबसे बड़ा सुख है.. ले मेरी.. और आजा.. चाट चाटकर लाल कर दे मेरी.. आह रसिक.. मुझे तो तेरे साथ करवाने पर पता चला की यहाँ भी चाटते है.. मुझे सब से ज्यादा मज़ा उसी में आता है.. !!"

फर्श पर दोनों जांघें फैलाकर जितनी हो सके चौड़ी कर, मौसी ने अपनी झांटों वाले भोसड़े का नजारा दिखाया.. इस घनघोर जंगल में भोसड़े का प्रवेशद्वार ढूँढना मतलब समंदर में घुसकर मोती ढूँढने जैसा कठिन काम था.. रसिक ने डुबकी लगाई और मौसी के भोसड़े में खो गया.. जैसे ही उसकी जीभ मौसी की क्लिटोरिस पर जा टकराई.. मौसी का शरीर तंग हो गया..








"आह्ह रसिक.. बस वहीं पर.. ओह्ह.. चाट वहाँ पर.. बहोत मज़ा आ रहा है मुझे" पैर ऊपर उठाते हुए भोसड़े को पूर्णतः चौड़ा कर वो कराहने लगी

मौसी की चूत के अंदर अपनी जीभ की कारीगरी दिखाते हुए रसिक ने उन्हें इतना नचाया.. इतना नचाया.. की अनुमौसी "ओह्ह--उहह--आह्ह" करते हुए झड़ गए.. उनका पानी रिस गया था और वो बेहद आनंदित थी.. उनको एक बार ठंडा करने के बाद भी रसिक ने चाटना नहीं छोड़ा.. और मौसी ने भी उसे रोका नहीं.. अब वो भोस के साथ जांघों को और क्लिटोरिस को चाट रहा था.. पर जब रसिक की जीभ भोसड़े की सरहद लांघ कर गांड के छेद पर जा पहुंची तब अनुमौसी की चूत नए सिरे से पानी बहाने लगी.. मौसी को ये क्रिया बेहद घिनौनी लग रही थी पर पुरुषों की अमर्याद कामुक क्रियाएं ही आखिर औरतों को तेजी से ऑर्गजम प्रदान करती है..

जितनी बार रसिक की जीभ अति उत्तेजना ने मौसी की गांड के छेद पर पहुँचती उतनी बार उनकी चूत संकुचित होकर रस छोड़ती.. पाँच से छह बार मौसी गरम होकर झड़ गई.. तब जाकर रसिक ने उनकी जांघों के बीच से अपना मुंह हटाया.. मौसी के चिपचिपे अमृतरस से लिप्त रसिक का मुंह ऐसा लग रहा था जैसे जंगल का राजा शेर, अभी शिकार को खाकर बैठा हो..

"मौसी, आपको तो मैंने खुश कर दिया.. अब आप मेरी एक इच्छा पूरी करेगी?" रसिक ने मौसी के बबले दबाते हुए कहा

"पहले तेरे इस मूसल की इच्छा पूरी कर रसिक.. देख कैसा तड़प रहा है.. मैं तो पाँच-छह बार ठंडी हो गई.. बता.. कौनसे छेद में डालेगा?? उस हिसाब से मैं तैयार रहूँ.. !!"

"आपकी भोस तो चाटकर तृप्त कर दिया आपको.. अब मेरी बारी है.. अब आप मेरा मुंह में लेकर चुसिए.. आज आपके मुंह में पानी निकालने का मन कर रहा है.. निकालने दोगे ना.. ??"

"छी छी.. ऐसा गंदा गंदा कोई करता है भला?? मुझे तो उलटी आ जाएगी.. मैं मुंह में तो नहीं निकालने दूँगी.. हाँ तेरा चूस सकती हूँ" कहते हुए मौसी पूरी तन्मयता और समर्पण के भाव से घुटनों के बल बैठ गई और चूसने लगी.. उन्हें चूसते हुए देख रसिक सोच रहा था.. दो ही दिन में मौसी लंड चूसने में एक्सपर्ट हो गई.. रसिक को मज़ा तो आ रहा था पर एक ही तकलीफ हो रही थी.. जब भी वो मौसी के मुंह में धक्का लगाता और उनके कंठ तक लंड घुसेड़ने की कोशिश करता.. तब मौसी अपना सर पीछे खींच लेती और रसिक का मूड ऑफ हो जाता..






इसलिए रसिक ने अब दोनों हाथों से मौसी का सर जकड़ लिया.. और धक्के लगाने लगा.. अब मौसी हिल भी नहीं पा रही थी और उसे जबरदस्त मज़ा आना शुरू हो गया था.. जब वह अपने उत्तेजित लंड को पूरी ताकत से अंदर धकेलता तब मौसी के गले तक लंड उतर जाता..मौसी का दम घुटने लगा.. वो बिलबिलाने लगी.. वो रसिक की पकड़ से छूटने के लिए जोर लगाती रही.. पर कसरती शरीर वाले रसिक के आगे भला मौसी का जोर कैसे चलता.. !! रसिक दोनों हाथों से उनके बालों को पकड़ कर धमाधम धक्के लगा रही था और उसके आँड मौसी की ठुड्डी से टकरा रहे थे.. मौसी का नाक रसिक के झांटों के बीच आक्सिजन तलाश रहा था.. और तभी उन्हें एहसास हुआ की कुछ गरम तरल प्रवाही उनके कंठ से होते हुए पेट तक जाने लगा..







अब तक जिस प्रवाही की गंध भी उन्होंने नहीं परखी थी वो चीज सीधे उनके मुंह के अंदर होते हुए पेट में जा रही थी.. मौसी को उलटी आ रही थी.. वो रसिक की पकड़ से छूटने के लिए मचल रही थी.. पर उत्तेजित मर्द को स्खलन की आखिरी पलों में अंकुश में करना बड़ा मुश्किल होता है..

मौसी की छटपटाहट की परवाह किए बिना रसिक अपने वीर्य के फव्वारे उनके गले के अंदर मारे जा रहा था.. जैसे विरोध पक्ष विरोध करते रहते है और शासक पक्ष विधेयक पास करवा लेते है.. वैसे ही अपना सारा लोड मौसी के हलक के नीचे उतार दिया और तब तक उन्हें नहीं छोड़ा जब तक उसके लंड की आखिरी बूंद अंदर उतर नहीं गई..

रसिक की पकड़ से छूटते ही मौसी अपना सर झटकते हुए मुंह के वीर्य के स्वाद को हटाने की व्यर्थ कोशिशें करती रही.. उनकी सांस फूल गई और वो वहीं फर्श पर ढल पड़ी.. देखकर रसिक घबरा गया.. कहीं बुढ़िया टपक तो नहीं गई.. !! बाप रे.. !! वो लेटी हुई मौसी के शरीर के आजूबाजू पैर रखकर खड़ा हो गया.. नंगी निश्चेतन मौसी उसकी दोनों टांगों के बीच लाश की तरह पड़ी हुई थी.. उसके लटकते हुए लंड से कुछ आखिरी बूंदें मौसी के स्तनों पर टपक पड़ी.. छाती पर गरम गरम एहसास होते ही मौसी ने अपनी आँखें खोली और नज़रों के सामने रसिक के विकराल लंड को ठुमकते हुए देखती रही.. घबराकर उन्होंने फिर से आँखें बंद कर ली..

थोड़ी देर बाद होश आते ही वो बैठ गई और रसिक पर गुस्सा करने लगी.. "नालायक.. ऐसे भी कोई करता है क्या?? अभी मेरी जान निकल जाती.. जा.. अब मुझे तेरे साथ नहीं करवाना.. " कहते हुए वो करवट बदल कर सो गई.. बात को बिगड़ता देख चिंतित रसिक उनकी जंघाओं को चौड़ी कर लेट गया और फिरसे मौसी की चूत चाटने लगा.. उन्हें रिझाने के लिए..

"छोड़ दे रसिक.. मुझे नहीं चटवानी.. तू जा यहाँ से.. " पर रसिक ने मौसी को रिझाने के प्रयास जारी रखें.. जैसे जैसे रसिक की जीभ मौसी की चूत की परतों को चाटती गई.. वैसे वैसे मौसी का गुस्सा, उत्तेजना में परिवर्तित होने लगा.. पर नाराज तो वो अब भी थी.. "मेरा हो चुका है.. अब मुझे कुछ नहीं करवाना तुझसे.. छोड़ मुझे.. और जा यहाँ से.. !!"

रसिक ने एक न सुनी.. और चाटता ही गया.. अब मौसी के दिमाग पर सुरूर छाने लगा था "आह्ह रसिक.. छोड़ दे.. पर चले मत जाना.. तू चला जाएगा तो फिर मैं क्या करूंगी? जो शुरू किया है वो पहले खतम कर.. !!" सारांश सिर्फ इतना था की मौसी फिर से उत्तेजित हो गई थी "साले फिर से क्यों ये सब शुरू किया? मैं ठंडी हो गई थी और तेरा भी निकल चुका था.. अब वापिस मुझे गरम कर दिया.. अब ये आग कौन बुझाएगा?? चल चाट अब इसे " उत्तेजित होकर मौसी अब खूंखार स्वरूप धारण करने लगी थी.. लेटे हुए रसिक की छाती पर सवार होकर वो हिंसक रूप से रसिक के होंठों पर अपनी भोस रगड़ने लगी..






मौसी के भोसड़े के भीतर तक जीभ डालते हुए रसिक चाटता रहा और थोड़ी ही देर में मौसी फिर से झड़ गई.. जैसी जबरदस्ती रसिक ने उनके साथ की वैसा ही कुछ उन्होंने भी रसिक के साथ किया.. इस एहसास ने उनका गुस्सा कम कर दिया.. हिसाब बराबर हो चुका था.. मुसकुराते हुए मौसी ने रसिक से कहा "देखा कैसा होता है जब कोई जबरदस्ती कुछ करता है तब"

मौसी की दोनों निप्पलों को खींचते हुए रसिक ने कहा "मुझे तो इसमे भी बहोत मज़ा आया.. आपको भी मज़ा आया.. बेकार में हंगामा कर दिया उस वक्त आपने "

मौसी: "अरे कमीने, उस वक्त तो ऐसा लग रहा था की जैसे मेरे प्राण ही निकल जाएंगे.. तू इसी इच्छा की बात कर रहा था ?"

रसिक: "हाँ मौसी.. आपके मुंह में पानी गिराने में तो बहोत मज़ा आया.. पर मेरा मन कर रहा है किसी जवान छातियों को दबाने का.. बहोत समय से इच्छा है.. पर कीसे कहूँ? आपके ध्यान में अगर कोई इसी जवान चूत हो तो मुझे बताना.. "

मौसी: "मर जा मुएं बेशर्म.. अब मैं तेरे दबाने के लिए जवान छातियाँ ढूँढने बैठूँ.. !! ये शीला के तो रोज दबाता है तू.. मैं सब जानती हूँ.. मेरे मुकाबले तो वो काफी जवान है.. और सख्त भी.. और रूखी भी उससे बढ़कर है.. एक एक स्तन दो लीटर दूध समा सकें उतने बड़े है उसके.. फिर तू क्यों बाहर ढूँढता रहता है? इससे बेहतर और कौनसी छातियाँ चाहिए तुझे? घर पर रूखी के दबाता है और यहाँ शीला के.. मन नहीं भरता क्या?"

रसिक: "उस हरामजादी रूखी का नाम मत लो मेरे सामने.. मादरचोद ने मुझे नामर्द कहा था.. "

मौसी चोंक उठी "क्या बात कर रहा है? इतना बड़ा अजगर जैसा लंड है तेरा और फिर भी उसने तुझे नामर्द कहा??"

रसिक: "ये लंड आपको अजगर जैसा लगता है.. पर उसे तो ये भी छोटा पड़ता है.. और कहती है की मुझे ठीक से धक्के लगाना नहीं आता.. अब आप ही बताइए.. दो दिन से आपको चोद रहा हूँ.. आप को कोई कमी महसूस हुई क्या??"

मौसी: 'क्या बात कर रहा है, रसिक!! तेरे लंड के धक्के तो मुझे छातियों तक महसूस होते है.. मैं बूढ़ी हूँ फिर भी मेरी चीखें निकल जाती है.. कोई छोटी उम्र वाली की तो तू जान ही निकाल दे.. !!"

रसिक: 'और उस कमीनी को ये छोटा पड़ता है.. इसलिए साली किसी और का लंड लेती है"

अनुमौसी की आँखों में एक अजीब सी चमक आ गई.. रूखी को किसी गैर-मर्द के गधे जैसे लंड से चुदते हुए देखने की कल्पना करते हुए..

मौसी: "मुझे पता है वो किसका डलवाती है.. वो जिस से चुदवाती है उसका तुझसे भी बड़ा है रसिक.. पर तेरा भी कुछ कम नहीं है.. पीयूष के पापा से तो बड़ा ही है.. "

रसिक सुनता रहा.. वैसे उसे रूखी और जीवा के छक्का के बारे में मालूम ही था.. पर आश्चर्य इस बात से था की अनुमौसी को इस बारे में कैसे पता चला.. !!

"कौन है वो, मौसी?"

"रूखी के मायके का दोस्त है.. जीवा.. मैं और शीला, दोनों उसको जानते है" अनुमौसी ने अपने साथ साथ शीला का पेपर भी लीक कर दिया

"पर मौसी, आप को कैसे पता चला की उसका मुझसे भी बड़ा और मोटा है? इसका मतलब ये हुआ की आपने उसका देखा है"

मौसी ने बात टालने की कोशिश तो की पर अब रसिक को पता चल ही चुका था तो छुपाने का कोई मतलब नहीं था..और वो रसिक को अपने राज की बातें बता कर.. अपनी ओर खींचना चाहती थी.. इसलिए उन्होंने बता दिया

मौसी की नंगी भोस में रसिक ने दो उँगलियाँ अंदर बाहर करते हुए कहा "सच सच बता दो मौसी.. आप ने उस मादरचोद जीवा का सिर्फ देखा है या फिर अंदर लिया भी है? वो हरामखोर जब घर आता है तब तो रूखी उसे "मेरा भाई मेरा भाई" कहकर बुलाती है"






"देख बेटा.. अब जमाना बदल गया है.. बहन बहन कहकर लॉग भांजे पैदा कर देते है.. आज कल के मर्द और औरत.. अपना पाप छुपाने के लिए मुंह बोली बहन या भाई का रिश्ता बनाकर इस पवित्र संबंध का दुरुपयोग करते है.. मैंने और शीला ने जीवा के साथ सब कुछ किया हुआ है.. तेरी बीवी ही उसे यहाँ लेकर आई थी.. जीवा उसके मायके का यार है और वो कुंवारी थी तब से उन दोनों का चक्कर चल रहा है.. रूखी को तो उसका लिए बिना चलता ही नहीं है.. तू शहर से बाहर था तब रूखी, जीवा का लंड लेने के लिए तरस रही थी.. घर पर तो तेरे माँ बाप रहते है इसलिए वहाँ तो बात बन न पाई.. आखिर रूखी ने शीला को बताया.. फिर शीला ने उन दोनों के मिलने का सेटिंग यहीं करवा दिया.. इसी बिस्तर पर जीवा ने तेरी बीवी की टांगें चौड़ी कर अपने गधे जैसे लंड से चोद दीया था.. मैंने और शीला ने जब जीवा का तगड़ा लंड देखा तब हम से भी रहा नहीं गया.. इसलिए मैंने और शीला ने जीवा और उसके दोस्त रघु से करवाया था.. बोल, और कुछ जानना है तुझे?"

"और तो कुछ नहीं जानना मौसी.. पर जैसे आप जीवा का लंड देखकर खुद को रोक नहीं पाई.. वैसे ही जवान छोटी छोटी छातियाँ देखकर मुझसे भी रहा नहीं जाता.. एक बार मुझे जवान बबलों की सेटिंग करवा दीजिए मौसी.. बदले में.. मैं सारी ज़िंदगी आपकी सेवा करूंगा.. !!"

अनुमौसी: "पर मैं कहाँ ढूँढने जाऊ तेरे लिए जवान छातियाँ?"

रसिक: 'कहीं ढूँढने जाने की जरूरत नहीं है.. आप के घर पर ही तो है.. कविता.. आपकी बहु.. !!"

अनुमौसी: "चुप हो जा कमीने.. कुछ पता भी है तू क्या बक रहा है?? सास होकर क्या मैं अपनी बहु से कहूँ की किसी अनजान मर्द के सामने अपनी छातियाँ खोल दे.. ?? वो क्या सोचेगी मेरे बारे में.. ??"

रसिक: "आप समझ नहीं रही है मौसी.. मैंने ये कब कहा की आप कविता से इस बारे में कहिए.. आपको तो बस मुझे आशीर्वाद देना है.. और बीच में टांग नहीं अड़ानी है.. बाकी सब मैं देख लूँगा.. आप देखकर अनदेखा तो कर सकती हो ना.. !!"

अनुमौसी: "अरे पर पीयूष को पता चल गया तो गजब हो जाएगा.. मैं माँ होकर अपने बेटे की ज़िंदगी में जहर नहीं घोल सकती.. ऐसा तो मैं होने नहीं दूँगी.. तू मुझे आज के बात कभी नहीं करेगा तो भी मुझे चलेगा.. पर फिर कभी ऐसी बात की ना तो तेरी खैर नहीं.. याद रखना तू.. !! हाँ अगर कोई बिन-ब्याही या विधवा होगी तो उसके साथ मैं तेरा सेटिंग करवा दूँगी.. ठीक है.. !!"

रसिक ने उदास होकर कहा "ठीक है मौसी.. चलो मैं अब चलता हूँ.. बहोत देर हो गई आज तो.. " मुंह फुलाकर नाराज होते हुए रसिक खड़ा हुआ.. मौसी सोच रही थी की जाते जाते रसिक उन्हें बाहों में भरकर चूमेगा.. पर रसिक ने ऐसा कुछ नहीं किया और गुस्से में चला गया.. मौसी का भी मूड ऑफ हो गया.. रसिक के जाने के बाद मौसी ने सोचा.. शीला का खाली घर अभी कुछ दिनों तक उनके कब्जे में थे.. रसिक को झूठ-मूठ की आशा देकर मना लेती तो तीन-चार दिन तक चुदाई का भरपूर लाभ मिल जाता.. बेकार में रसिक को नाराज कर दिया.. शीला होती तो यही करती.. मुझ में और शीला में यही तो फरक है.. शीला ने कलकत्ता बैठे बैठे मेरी यहाँ सेटिंग कर दी.. और मैं यहाँ रहते हुई भी उसे संभाल नहीं पाई.. अपने आप पर गुस्सा आ रहा था.. निराश होकर वह उठी और कपड़े पहन कर घर जाने लगी..



दरवाजा खोलते ही उन्हों ने देखा की उनके घर के बाहर रसिक कविता को दूध दे रहा था.. दोनों हंस हंस कर बातें कर रहे थे.. इतनी सुबह सुबह कविता क्या बात कर रही होगी इस दूधवाले से.. !! और ऐसा तो क्या कहा होगा रसिक ने जो कविता इतना हंस रही थी.. ?? रोज के मुकाबले रसिक आज कुछ ज्यादा ही समय ले रहा था दूध देने में.. मौसी के दिमाग में हजार खयाल आने लगे.. मौसी को यकीन हो गया की रसिक कविता को दाने डालकर पटाने की कोशिश कर रहा होगा..
 
दरवाजा खोलते ही उन्हों ने देखा की उनके घर के बाहर रसिक कविता को दूध दे रहा था.. दोनों हंस हंस कर बातें कर रहे थे.. इतनी सुबह सुबह कविता क्या बात कर रही होगी इस दूधवाले से.. !! और ऐसा तो क्या कहा होगा रसिक ने जो कविता इतना हंस रही थी.. ?? रोज के मुकाबले रसिक आज कुछ ज्यादा ही समय ले रहा था दूध देने में.. मौसी के दिमाग में हजार खयाल आने लगे.. मौसी को यकीन हो गया की रसिक कविता को दाने डालकर पटाने की कोशिश कर रहा होगा..



वैसे तो उन्हें इस परिस्थिति में तुरंत घर पहुंचकर दोनों को अलग करना चाहिए था.. पर पता नहीं उन्हें क्या हुआ की वो दरवाजा बंद कर अंदर गई.. और शीला के किचन की खिड़की से दोनों को देखने लगी.. रसिक दूध देकर चला गया और कविता शरमाते हुए घर के अंदर चली गई.. उसके बाद अनुमौसी ने शीला के घर को ताला लगाया और अपने घर पहुंची.. कविता को इतना खुश देखकर उन्हें पक्का संदेह हुआ की जरूर रसिक ने कुछ कहा होगा कविता से.. पर पूछती कैसे??"

हकीकत में कविता ने सिर्फ निर्दोष बातचीत ही की थी रसिक से.. उस बेचारी को क्या दिलचस्पी होगी एक मामूली से दूधवाले में.. ?? वैसे रसिक का ये सौभाग्य था की उसके धंधे में सारी ग्राहक औरतें और भाभीयां ही थी.. सुबह सुबह बिना मेकअप के अस्तव्यस्त कपड़ों में.. ज्यादातर बिना ब्रा के सिर्फ गाउन पहने औरतें मिलती थी.. रोज नई नई साइज़ और आकार के स्तनों को प्राकृतिक अवस्था में देखने का मौका मिलता.. हाँ उन स्तनों को नंगे देखने की ख्वाहिश सिर्फ मन में ही रह जाती.. और इसीलिए उन औरतों के पीछे रसिक भागता नहीं था.. हाँ, उसका मन जरूर करता की ऐसी मॉडर्न फेशनेबल भाभियों और लड़कियों के मस्त स्तनों को एक बार रगड़ने का मौका मिल जाएँ..

रसिक साइकिल लेकर घूमता तब एक्टिवा पर लटक-मटक तैयार होकर.. टाइट टीशर्ट और जीन्स पहनकर आती जाती लड़कियों को देखकर उसका दिल डोल जाता.. जैसे कोई गरीब आदमी, मर्सिडीज के शोरूम के बाहर खड़ा रहकर अहोभाव से महंगी गाड़ियों को देखता है.. वैसे ही रसिक देखता रहता.. और सोचता की ये लड़कियां नंगी हो तब कैसी दिखती होगी!! कितनी गोरी और सुंदर है.. टाइट जीन्स से साफ दिखते कूल्हों वाली इन लड़कियों की चूत कितनी टाइट होगी.. !! उस बेचारे को एहसास भी नहीं था की असली सुंदरता तो उसके घर पर बैठे बैठे उसके बेटे को अपने तड़बुच जैसे स्तनों से दूध पीला रही थी.. रूखी के पाँच लीटर वाले मदमस्त स्तन थे.. पेड़ के तने जैसी मस्त मोटी चिकनी जांघें थी.. गदराई गांड थी.. और चेहरे के नक्शा भी काफी सुंदर था.. सही अर्थ में वह पूर्ण रूपसुन्दरी थी.. और उसका देसी स्टाइल उस रूप में चार चाँद लगा देता था.. पर इंसान का स्वभाव ही ऐसा है.. घर की मुर्गी दाल बराबर लगती है..






बड़े बड़े स्तनों वाली और थोड़े भारी भरकम शरीर वाली.. रूखी या शीला जैसी पत्नियों के पतिदेवों को.. नोरा फतेही जैसी ज़ीरो फिगर वाली लड़कियों में स्वर्ग नजर आता है.. वो अपनी गदराई पत्नियों को ताने मारते है.. कितनी मोटी है तू.. ऊपर चढ़ती है तब वज़न लगता है.. हर वक्त तेरे बदन पर पसीना रहता है.. तेरा पेट कितना बाहर आ गया है.. चूत तक लंड पहुंचाने के लिए मुझे एक्सटेंशन लगाना पड़ेगा.. वगैरह वगैरह.. और जिसकी पत्नी एकदम पतली होती है उनके पति की ये शिकायतें होती है की.. यार तुझसे ज्यादा बड़े बॉल तो मेरे है.. कितने छोटे है तेरे.. कुछ हाथ में ही नहीं आता.. तेरे ऊपर चढ़कर शॉट लगाता हूँ तब हड्डियाँ टकराती है मेरे शरीर से.. तेरा तो शरीर है या चलता फिरता कंकाल.. !! पतली पत्नियों के चूतिये पति.. गदराई औरतों को देखकर आहें भरते है.. और भारी शरीर वाली पत्नियों के पति.. जीरो फिगर को देखकर भद्दे शरीर वाली अपनी बीवी को मन ही मन कोसते है.. सब को दूसरे का माल ही बेहतर लगता है..

जब कविता रसिक से दूध ले रही थी.. तब उसके पतले नाइट ड्रेस से दिख रहे अद्भुत बिना ब्रा के स्तनों को देखकर रसिक स्तब्ध रह गया..








सोच रहा था.. काश एक बार दबाने मिल जाएँ!! कितने मस्त है.. मेरी एक हथेली से मैं इसके दोनों स्तन साथ में दबा दूँ.. रूखी का तो एक स्तन मेरी दोनों हथेलियों में भी नहीं समाता.. उसका तो सब कुछ बड़ा बड़ा ही है.. छातियाँ बड़ी.. गांड बड़ी.. जांघें भी बड़ी.. इसलिए साली को लोडा भी बड़ा चाहिए.. जिस तरह शीला भाभी ने मुझे करने दिया.. उस तरह क्या इसे भी पता लूँ तो मज़ा आ जाए.. कितनी नाजुक है!! आह्ह.. इसे तो मेरे लंड पर बिठाकर गली गली घूमता फिरूँ फिर भी मुझे इसका वज़न न लगे.. और इसकी चूत कैसी होगी.. छोटी सी.. टाइट टाइट.. मोगरे के ताजे खिले हुए फूल जैसी.. पर क्या उसके अंदर मेरा जाएगा??

जैसे जैसे रसिक, कविता के कमसिन जोबन के बारे में सोचता गया वैसे वैसे उसकी बेसब्री बढ़ती गई.. आज रसिक ने काफी घरों में दूध दिया और हर दूध लेने वाली स्त्री में वो कविता को खोज रहा था.. अनुमौसी के साथ वो जानबूझकर नाराज होकर निकला था.. वो जानता था की उसे नाराज देखकर मौसी बेचैन हो जाएगी.. और मेरे लिए कुछ न कुछ जरूर करेगी.. कविता की चूत तक पहुँचने के लिए मौसी की गटर में लंड डालना ही होगा.. मौसी को भी मेरे जैसा लंड कहाँ मिलेगा!! वो मुझे छोड़ तो पाएगी नहीं.. मुझे मनाने आएगी तब मैं अपनी मनमानी करूंगा..

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जब से कविता ने मौसम की शादी की बात सुनी थी तब से वो हवा में उड़ने लगी थी.. शादी में वो क्या पहनेगी.. मौसम को क्या गिफ्ट देगी.. संगीत संध्या में कौनसे रंग की चोली पहनेगी.. !! किचन में चाय बनाने गेस पर रखकर.. बिना नहाए धोए कविता चाय उबलने का इंतज़ार कर रही थी.. तभी उसने अपनी सास को घर में आते देखा.. मम्मीजी इस उम्र में भी कितनी फिट है.. !! वैसे कहने को दोनों सास-बहु थे पर दोनों में बहोत प्यार था.. अनुमौसी ने हमेशा से कविता को अपनी बेटी समान माना था.. वो कभी उसपर गुस्सा नहीं करती थी और गलती करने पर भी प्यार से समझाती थी..

"कैसी है बेटा? नींद आई थी ठीक से?" कविता को पूछकर.. उसके उत्तर का इंतेज़ार कीये बिना ही मौसी बाथरूम में घुस गई.. तभी पीयूष नींद से जागकर आँखें मलते हुए बाहर निकला.. रोज की तरह सब से पहले उसकी नजर शीला के घर की तरफ गई.. दरवाजा पर ताला देखकर उसका मुंह उतर गया.. वरना रोज सुबह शीला भाभी का चाँद जैसा चेहरा देखकर उसका मन प्रफुल्लित हो जाता.. आखिर उसने कविता को पीछे से पकड़ लिया और उसके गोलमटोल स्तनों को दबाते हुए कहा "गुड मॉर्निंग डार्लिंग.. !!"

"छोड़ नालायक.. मम्मीजी बाथरूम में है.. कभी भी बाहर आ जाएंगे.. " कविता ने अपने आप को छुड़ाने की कोशिश करते हुए कहा.. कविता की गर्दन को चूमते हुए पीयूष उससे अपनी मतलब की बात जानने के लिए पूछने लगा "मदन भैया के बगैर कितना सूना सुना लग रहा है.. कब लौटने वाले है वो लोग?"

कविता ने भी मौका देखकर चौका लगा दिया "मदन भैया के बगैर सूना सुना लग रहा है या शीला भाभी के बगैर? या फिर वैशाली की याद आ रही है?"

पीयूष ने स्तनों को जोर से दबाते हुए कहा "अब इसमें शीला भाभी और वैशाली कहाँ से आ गई बीच में.. ये तो मदन भैया की कंपनी में मज़ा आ रहा था इसलिए पूछा.. भाभी और वैशाली का नाम लेकर तू कहना क्या चाहती है?" कविता की निप्पल मरोड़ दी गुस्से में पीयूष ने

"छोड़ दे.. वरना में चीख दूँगी.. और मम्मी नहाते नहाते बाहर आ जाएगी.. छोड़ साले" दोनों के बीच मज़ाक मस्ती चल रही थी तभी मौसी बाथरूम से बाहर आए.. और पीयूष ने कविता को छोड़ दिया.. और टॉइलेट में घुस गया..

चाय पीते पीते कविता ने मौसम की जल्द होने वाली शादी के बारे में अनुमौसी को बताया

अनुमौसी: "देख बेटा.. तेरे पापा को भागदौड़ तो होगी.. पर सब साथ मिलकर करेंगे तो सब कुछ हो जाएगा.. पापा से कहना की वो चिंता न करें.. हम सब मिलकर मौसम की शादी बड़ी धूमधाम से करेंगे"

वॉश-बेज़ीन पर ब्रश कर रहा पीयूष बड़े ध्यान से सास-बहु की बातचीत को सुन रहा था.. जिस बात को वो भूलने की कोशिश कर रहा था उसका जिक्र सुबह सुबह ही हो गया.. उसका मूड खराब हो गया.. मौसम के साथ आज बात करनी ही होगी.. ऐसा सोचते हुए वो जैसे तैसे नहाकर, बिना नाश्ता कीये.. ऑफिस के लिए निकल गया..

घर से बाहर निकलते ही पीयूष ने मौसम को फोन किया..

मौसम: "हैलो जीजू.. पापा अभी यहीं है.. वो बस ऑफिस जा रहे है.. उनके जाते ही पाँच मिनट में कॉल करती हूँ.. ठीक है!!"

पीयूष: "ओके.. पर जल्दी करना.. एक बार ऑफिस पहुँच गया फिर बात करना मुश्किल हो जाएगा"

मौसम: "हाँ जीजू.. तुरंत करूंगी.. "

पीयूष: "लव यू मौसम"

मौसम: "ठीक है, रखती हूँ"

मौसम ने उसके "लव यू" का जवाब नहीं दिया इस बात का बुरा लगा पीयूष को.. पर फिर उसने अपने मन को मनाया.. हो सकता है की पापा आजूबाजू ही हो.. इसलिए बेचारी मौसम चाह कर भी बोल न पाई हो.. अपनी नादानी पर हँसते हुए वो बाइक चलाते हुए मुख्य सड़क पर आ गया.. आगे जाकर उसने बाइक रोक दी और मौसम के फोन की राह देखने लगा.. आधा घंटा बीत गया पर मौसम का फोन नहीं आया.. आखिर पीयूष थक कर ऑफिस की ओर निकल गया.. ऑफिस के दरवाजे पर पहुँचने पर भी फोन नहीं आया.. जैसे ही उसने अंदर प्रवेश किया.. मौसम का फोन आ गया.. पीयूष को बड़ा गुस्सा आया.. पाँच मिनट का बोलकर एक घंटे बाद फोन किया मौसम ने.. उसने सोचा की फोन कट कर दूँ.. पर फिर फोन उठा ही लिया..

मौसम: "हाँ जीजू.. "

पीयूष: "यार, तेरे फोन का इंतज़ार करते करते मैं ऑफिस पहुँच गया.. कितनी देर लगा दी तूने?? जल्दी बात कर.. मुझे अंदर जाना होगा.. सब देख रहे है मुझे"

मौसम: "सॉरी जीजू.. पर मैं क्या करती? पापा ऑफिस गए और तरुण का फोन आ गया.. उसी से अब तक बात कर रही थी इसलिए देर हो गई.. बताइए क्यों फोन किया था?"

तरुण का नाम सुनते ही पीयूष का खून घोलने लगा.. तरुण का फोन आ गया इसलिए मौसम ने मुझे होल्ड पर रख दिया.. !! प्रेमियों को नजरंदाजी बिल्कुल पसंद नहीं होती.. खासकर अपने साथी से.. कभी कभी तो वो अपने साथी की मजबूरी को भी उपेक्षा मानकर रूठ जाते है..गुस्से से पीयूष ने फोन काट दिया.. मौसम को लगा की नेटवर्क प्रॉब्लेम के कारण फोन कट गया.. मौसम ने फिर से फोन किया

गुस्से से पीयूष स्क्रीन पर मौसम का नाम देखकर कांप रहा था..

"क्यों भाई?? क्या हुआ? किस टेंशन में है??" पीछे से कंधे पर हाथ रखते हुए पिंटू ने कहा

"कुछ नहीं यार.. ऐसे ही थोड़ा सा टेंशन चल रहा है"

"घर पर कुछ हुआ? या राजेश सर ने कुछ बोल दिया?" पिंटू को ये जानना था की कहीं पीयूष और कविता के बीच तो कुछ नहीं हुआ ना.. !! पीयूष का जो होना हो सो हो.. पर कविता डिस्टर्ब नहीं होनी चाहिए.. पीयूष के टेंशन का कारण जानने के लिए पिंटू बेसब्र हो गया

पर पीयूष की समस्या ये थी की वो असली कारण पिंटू को बता नहीं पाएगा.. बात टालने के लिए उसने कहा "यार वही कविता के साथ का प्रॉब्लेम.. अभी सॉल्व कहाँ हुआ है.. !! बहोत तंग करती है वो मुझे.. जो मन में आए वो बोलती है.. सुबह सुबह मम्मी के साथ झगड़ पड़ी.. इसलिए टेंशन में था" पीयूष ने अपनी बात छुपाने के लिए कविता को बलि चढ़ा दिया

सुनकर पिंटू सोच में पड़ गया.. मेरी कविता ऐसा तो नहीं कर सकती.. जरूर पीयूष ने ही कुछ किया होगा पर बता नहीं रहा.. कविता को पिंटू इतना चाहता था की हर वक्त उसकी फिक्र लगी रहती.. पीयूष से बात करके वो बाहर निकल गया.. पीयूष ने भी चैन की सांस ली.. वो थोड़ी देर अकेला रहना चाहता था..

उदास होकर पीयूष कुर्सी पर बैठ गया.. चपरासी ने पानी का ग्लास उसके टेबल पर रखा और चला गया..

पिंटू ने बाहर जाकर कविता को फोन किया और उससे पूछा.. कविता का जवाब सुनकर वो चकित रह गया.. कविता ने कहा की उसके और पीयूष के बीच सब सही चल रहा था.. और घर पर आज कोई झगड़ा भी नहीं हुआ था.. फिर पीयूष झूठ क्यों बोला? शातिर दिमाग वाले पिंटू को ये शक होने लगा की पीयूष जरूर कोई ऐसे कारणवश परेशान था जो अनैतिक या असामाजिक हो.. पर आखिर कारण होगा क्या? पिंटू उसके ऑफिस का साथी और दोस्त भी था.. पर जब तक पीयूष असली कारण नहीं बताता उसकी मदद कर पाना मुमकिन नहीं था.. पिंटू ऑफिस में अपने काम में व्यस्त हो गया..

मौसम से बात करने के बाद बहोत उदास था पीयूष.. उसका किसी काम में मन नहीं लग रहा था.. दोपहर के बाद उसने राजेश सर से आधे दिन की छुट्टी मांग ली और ऑफिस से निकल गया..

ऑफिस के बाहर निकल तो गया पर कहाँ जाए ये तय नहीं कर पा रहा था.. बाइक को ऑफिस पर ही छोड़कर वो सड़क पर चलता गया.. घर तो जाना नहीं था.. क्या करता इतनी जल्दी जाकर?? मौसम के खयालों में खोया हुआ वो चलता जा रहा था और उसे पता भी नहीं चला की कब रेणुका की गाड़ी उसके करीब से होकर गुजर गई..

गाड़ी थोड़ी सी आगे जाने पर रेणुका ने रिवर्स ली और पीयूष को रोकते हुए कहा "हाई हेंडसम.. कहाँ भटक रहा है मजनू की तरह?? "

पीयूष चोंक गया "अरे मैडम आप? मैंने आज ऑफिस से आधे दिन की छुट्टी ली है.. थोड़ा सा काम था इसलिए.. वैसे आप यहाँ कैसे?"

"बातें बंद कर और गाड़ी में बैठ जा.. फिर मैं बताती हूँ की कहाँ जा रही हूँ.. कार में बैठकर भी तो बात हो सकती है"

पीयूष थोड़े संकोच के साथ रेणुका की गाड़ी में बैठ गया.. जैसे ही वो बगल में बैठ रेणुका ने पीयूष की जांघ पर हाथ रखते हुए कहा "दरअसल में ऐसे ही सैर-सपाटे के लिए निकली हूँ.. घर पर बैठे बोर हो रही थी.. तू मानेगा नहीं.. मैंने आज ही तुझे याद किया था"

"क्या बात है.. !! चलो अच्छा हुआ.. कोई तो है जो मुझे याद कर रहा है.. वैसे याद क्यों आई थी मेरी?" पीयूष के दिमाग में अभी भी मौसम को लेकर कड़वाहट थी..

रेणुका ने पीयूष की जांघ को सहलाते हुए कहा "अरे यार.. दोपहर बैठे बैठे इतनी बोर हो गई थी.. तभी मुझे विचार आया की जैसे उस दिन राजेश ने तुझे पैसे लेने घर भेजा था वैसा ही कुछ आज भी हो जाए तो मज़ा आ जाए"

पीयूष हंसने लगा "अच्छा अच्छा.. उस दिन आपके घर पचास हजार लेने आया तब जो हुआ था उसकी बात कर रही है आप"

धीरे धीरे रेणुका ने पीयूष की जांघ को दबाना शुरू कर दिया.. कार के ए.सी. की ठंडी हवा.. और साथ में रेणुका के जिस्म से आ रही परफ्यूम की मादक खुशबू.. पीयूष एक ही पल में मौसम को भूल गया

"बोल.. गाड़ी किस तरफ घुमाऊ?? कहाँ जाना है तुझे? तूने अभी कहा ना की किसी काम के लिए निकला है!!" निर्दोष भाव से रेणुका ने पूछा.. रेणुका को पता नहीं था की पीयूष ऐसे ही भटक रहा था और उसे कहीं जाना नहीं था.. दोनों बिना मंजिल के मुसाफिर थे.. अजीब बात यह थी की ऐसे दो मुसाफिरों के मिलने से अब उनकी मंजिल तय हो रही थी

"अब बोल भी दे.. कहाँ जाना है तुझे?" रेणुका रोमांचित हो गई थी.. पीयूष की कंपनी यूं अचानक मिल जाने से.. शरारती अंदाज मे रेणुका ने अपना पल्लू थोड़ा सा हटा दिया.. इस तरह हटाया की साइड से पीयूष को उसके स्तनों की गोलाई नजर आ सके..

"दरअसल मुझे कोई काम नहीं था.. ऑफिस में बोर हो रहा था तो बाहर टहलने निकल गया.. आपको गाड़ी जहां लेनी हो ले जाइए"

"ये आप-आप क्या लगा रखा है?? याद है ना.. उस दिन जब तू पैसे लेने घर आया तब हम कितने करीब आ गए थे!! जब हम अकेले हो तब मुझे "तू" कहकर ही पुकारा कर.. आप-आप कहता है तो ऐसा लगता है जैसे मैं कोई बूढ़ी हूँ.. " रेणुका ने पीयूष को रिझाना शुरू कर दिया.

पीयूष रास्ते से गुजर रही गाड़ियों को देख रहा था.. उसने रेणुका की बात का कोई जवाब नहीं दिया..

रास्ते पर इधर उधर देख रहे पीयूष की जांघ पर चिमटी काटते हुए रेणुका ने कहा "कहाँ देख रहा है तू? पहले कभी गाड़ियां देखी नहीं है क्या? यहाँ तेरे बगल में, मैं बैठी हूँ और तू मुझे देख नहीं रहा.. !! देख.. तेरी पसंदीदा चीज दिखाने के लिए मैंने पल्लू भी सरका दिया है.. "

पीयूष ने रेणुका के स्तनों की तरफ देखा.. ब्लाउस में कैद उन अद्भुत गोलाइयों को वो देखता ही रह गया.. उसके चेहरे पर अब शैतानी मुस्कुराहट आ गई..

"याद है वो दिन.. तेरे घर के पीछे.. जब तू मेरे स्तन को चूसने के लिए गिड़गिड़ा रहा था.. " रेणुका ये सब बातें करते हुए पीयूष को उत्तेजित करना चाहती थी.. "अब आज मैं सामने से तुझे कह रही हूँ तो इंतज़ार क्यों कर रहा है!! अभी हम दोनों अकेले है.. चल आज गाड़ी में ही दोपहर को रंगीन बना देते है" खुला आमंत्रण दे दिया रेणुका ने.. पीयूष की जांघ पर घूमते हुए उसके हाथ ने उसका लंड पकड़ लिया..

शीला भाभी की सहेली होने के नाते पीयूष से पहचान हुई थी.. तब से लेकर बेडरूम तक का सफर पीयूष याद करने लगा.. मौसम के नाम की उदासी मन से हटाते हुए उसने रेणुका पर अपना सारा ध्यान केंद्रित किया.. अपने लंड पर रेणुका के हाथ को पीयूष ने दबा दिया.. लंड का टोपा हाथ में आते ही गाड़ी ड्राइव कर रही रेणुका ने पीयूष को तिरछी नज़रों से देखा.. "वाह.. इसे कहते है असली हथियार.. !! जो एक बार छूते ही तैयार हो जाए.. !!" हँसते हुए रेणुका ने वापिस ड्राइविंग पर अपना ध्यान केंद्रित किया..

गाड़ी धीरे धीरे सरकती हुई शहर से बाहर निकलकर हाइवे पर आ पहुंची.. दोपहर का समय था.. इक्का-दुक्का ट्रक के सिवा.. रोड पर कोई नजर नहीं आ रहा था.. पीयूष ने चैन खोलकर अपना लंड बाहर निकाला..और रेणुका के हाथों में उसे थमाते हुए.. ब्लाउस के ऊपर से उसके गोल स्तनों को मींजने लगा..








"आह्ह.. बेशर्म.. इसे अंदर रख.. भरी दोपहर में.. खुली सड़क पर बाहर निकाल कर बैठा है.. गाड़ी को बेडरूम समझ रखा है क्या?? और छाती से हाथ हटा.. " औरतों की ये बड़ी तकलीफ है.. जब से उन्हें पता चल गया है की सेक्स की दौरान उनकी आनाकानी करना मर्दों को बेहद पसंद है.. तब से वो हर ऐसे मौके पर झूठी झिझक का प्रदर्शन करती रहती है.. पैसों के लिए अपनी चूत फड़वाती रंडियाँ भी लंड चूसने के नाम पर पहले तो मना ही करती है.. फिर थोड़ी सी आनाकानी के बाद लोलिपोप की तरह चुसेगी भी और गांड भी मरवाएगी.. नखरे करना स्त्री जाती का जन्मसिद्ध हक होता है.. वेश्या का तो सिर्फ उदाहरण दिया है.. ये बात सब पर लागू होती है..

चौड़े हाइवे पर नकली शर्म का झण्डा पकड़कर रेणुका ने पीयूष को धमका तो दिया पर हाथ से उसका लंड नहीं छोड़ा.. सख्त लकड़े जैसा हो गया था पीयूष का लंड.. जैसे जैसे उसकी कोमल हथेली उसके साथ खेलती गई.. वैसे वैसे पीयूष का लंड इस्तेमाल के लिए तैयार होने लगा.. रास्ते पर एक सुमसान जगह पर रेणुका ने पेड़ की छाँव में गाड़ी रोक दी..

गाड़ी को रोककर रेणुका ने पीयूष को गिरहबान से पकड़कर चूम लिया.. और फिर नीचे झुककर उसके लंड को मुंह में लेकर चूसने लगी..डर डर कर ये सब करने में मज़ा नहीं आया.. वो बोली "ओह्ह पीयूष.. देख तो यार.. ये तेरा डंडा.. इसे देखकर मुझे नीचे मीठी खुजली होने लगी है.. यहाँ और कुछ तो हो नहीं सकता.. क्या करें? मेरे घर चलें?"








पीयूष: "मैं ऑफिस से बहाना बनाकर निकला हूँ.. आपके घर कोई देख लेगा तो प्रॉब्लेम हो जाएगा.. कहीं और चलें?"

रेणुका: "और तो कहाँ जा सकते है? गेस्टहाउस में जाने से मुझे डर लगता है.. कहीं पुलिस की रेड पड़ गई तो लेने के देने पड़ जाएंगे.. मेरे घर जैसी सेफ जगह और कोई नहीं है"

थोड़ा सोचने के बाद पीयूष मान गया "ठीक है.. चलो तुम्हारे घर ही चलते है.. मुझसे भी अब रहा नहीं जाता"

रेणुका ने तुरंत यु-टर्न लिया और घर के तरफ गाड़ी घुमाई.. शहर के अंदर गाड़ी घुसते ही दोनों संभल संभलकर एक दूसरे को छेद रहे थे.. पर जैसे ही ट्राफिक बढ़ा.. दोनों शरीफ बनकर चुपचाप बैठ गए..

गाड़ी रेणुका के घर के पास पहुँच ही गई थी की तब..

रेणुका: "मर गए.. !! राजेश की गाड़ी घर पर.. !!! इस वक्त.. !!" दोनों की उत्तेजना एक ही पल में हवा बन कर उड़ गई

"पीयूष, तू यहीं उतर जा.. मैं तुझे फोन करूँ उसके बाद ही घर आना.. आधे घंटे में अगर मेरा फोन न आए तो घर चले जाना.. किसी और दिन करेंगे" कहते हुए रेणुका ने पीयूष को घर से थोड़े दूर ड्रॉप किया

अपने घर के पार्किंग में गाड़ी लगाकर रेणुका ने सब से पहले साड़ी और ब्लाउस को ठीक किया.. मिरर में देखकर ये तसल्ली कर ली की सब ठीक था या नहीं.. पीयूष से किस करने के कारण खराब हो चुकी लिपस्टिक को फिर से लगा दिया..

पल्लू को ठीक करते हुए जब वो घर के अंदर पहुंची तब राजेश बैठकर पैसे गिन रहा था..

"अरे राजेश तू यहाँ? इस वक्त? सब ठीक तो है ना..!! मैं अकेले बोर हो रही थी तो थोड़ी देर के लिए घूमने चली गई थी"

"हाँ यार.. मुझे एक पार्टी को पेमेंट करना था.. और पैसे थोड़े कम पड़ रहे थे.. आज पीयूष भी छुट्टी पर है इसलिए मुझे आना पड़ा.. "

रेणुका को अपनी किस्मत पर गुस्सा आ रहा था.. पीयूष ने अगर छुट्टी न ली होती तो राजेश उसे ही पैसे लेने भेजता और वो आराम से अपनी आग बुझा पाती.. चलो.. जो हुआ सो हुआ

"तू आराम से पैसे गिन.. मैं चाय बनाकर लाती हूँ" कहते हुए रेणुका किचन में चली गई

किचन में आते ही उसने पीयूष को फोन किया.. और कहा की वो उनके घर से थोड़ा दूर चला जाए.. ताकि ऑफिस जाते वक्त राजेश की नजर न पड़े.. उसके जाने के बाद.. ग्रीन सिग्नल मिलते ही वो घर आ जाए

पर पीयूष ने ये कहते हुए इनकार कर दिया की काफी देर हो चुकी थी इसलिए वो वापिस जा रहा था.. उसे अभी ऑफिस से बाइक भी लेनी थी..

एक मस्त सेटिंग होते होते रह गया.. इस अफसोस के साथ पीयूष ऑटो में ऑफिस की ओर निकल गया.. असल में.. अकेले पड़ते ही उसे फिर से मौसम की यादों ने घेर लिया था.. और फिर उसका मूड ऑफ हो गया इसलिए उसने रेणुका को मना कर दिया था.. अपनी बेकार किस्मत को कोसते हुए वो बाइक लेकर घर पहुंचा.. घर आकर मोबाइल को चार्जिंग में रखते हुए उसने देखा की मौसम के दस मिसकॉल आ चुके थे.. अरे बाप रे.. ये रेणुका के चक्कर में फोन साइलेंट किया था तो पता ही नहीं चला.. !! मौसम क्या सोच रही होगी?? मेसेज करूँ की नहीं? उसे मेसेज करते हुए कविता ने देख लिया तो?? तभी सामने से कविता को पानी का ग्लास लेकर आता हुआ देख.. पीयूष ने मोबाइल से मौसम के सारे कॉल डिलीट कर दीये..

पानी का ग्लास पीयूष को देते हुए कविता ने कहा "मौसम का फोन था.. कह रही थी की जीजू को बहोत बार फोन लगाए पर उन्होंने रिसीव नहीं कीये.. उससे कुछ बात करनी थी.. कुछ काम था तेरा.. "

"अरे हाँ यार,.. मैं मीटिंग में बिजी था इसलिए फोन उठा नहीं पाया.. " झूठ बोल रहा था पीयूष.. किस प्रकार की मीटिंग थी वो तो सिर्फ वो जानता था या रेणुका..

तभी अनुमौसी बाहर आए "बेटा.. शीला को फोन तो कर.. पूछ उसे की कब आ रही है? वहाँ की क्या खबर है? वैशाली बेचारी उसके पति से तंग आ गई है..बात कर और बता"

"हाँ मम्मी.. कपड़े बदलकर फ्रेश हो जाऊँ.. फिर फोन करता हूँ"

कपड़े बदलकर वो फोन लेकर मौसी के रूम मे गया जहां वो बैठे बैठे भजन सुन रही थी.. पीयूष ने शीला को फोन लगाया पर उसने उठाया नहीं.. फिर उसने मदन को लगाया.. पर उसका फोन आउट ऑफ कवरेज था.. अब क्या करूँ? वैशाली को फोन लगाऊँ??

मौसी: "हाँ वैशाली को लगा.. पता तो चलें.. कुछ उल्टा सीधा तो नहीं हुआ वहाँ.. कोई फोन लग क्यों नहीं रहा?"

पीयूष ने वैशाली को फोन लगाया तो किसी पुलिस वाले ने उठाया.. बात करने के बजाए वो पुलिस वाला पीयूष को धमकाने लगा.. अब बंगाली भाषा में वो क्या पूछ रहा था, पीयूष की कुछ समझ में नहीं आ रहा था.. फिर पीयूष के कहने पर उसने हिन्दी में बात की.. सुनकर स्तब्ध हो गया पीयूष.. काफी देर तक फोन चला.. अनुमौसी और कविता भी टेंशन में आ गए.. दोनों को शक था की कहीं कुछ बड़ी गड़बड़ हुई थी वहाँ.. अनुमौसी का शक सही निकला..

"ओके ओके सर.. !!" कहते हुए पीयूष ने फोन काट दिया.. उसके चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगी..

"क्या हुआ ये तो बता?? कौन था फोन पर? तू इतना घबराया हुआ क्यों है? बता न पीयूष? कुछ बोल क्यों नहीं रहा.. वैशाली को कुछ हुआ क्या? या शीला भाभी को?" मौसी और कविता ने प्रश्नों की लाइन लगा दी

आखिर पीयूष ने कहा "मम्मी, संजयकुमार और मदन भैया का जबरदस्त झगड़ा हुआ था.. और संजय ने शीला भाभी और मदन भैया को शिकायत दर्ज कर जैल में बंद करवा दिया है.. वैशाली ने खुदकुशी करने की कोशिश की थी.. और फिलहाल वो अस्पताल में जिंदगी और मौत के बीच झूल रही है.. !!"

"अरे बाप रे.. !!" सुनकर अनुमौसी थरथर कांपने लगी.. और कविता तो वैशाली के बारे में सुन कर रोने लग गई..

"शीला का दामाद है ही एक नंबर का कमीना.. बेचारी फूल सी वैशाली का जीवन बर्बाद कर दिया उसने.. " मौसी ने कहा

"पीयूष.. मुझे वैशाली से बात करनी है" कविता ने जिद पकड़ ली..

इस गंभीर चर्चा के दौरान, मौसम का कॉल आया.. पीयूष फोन पर बात करने की स्थिति में नहीं था.. इसलिए मौसी ने फोन उठाया और थोड़ा बहोत बता कर फोन काट दिया..

कविता को विचार आया "पीयूष.. यहाँ के पुलिस स्टेशन के इंस्पेक्टर, मदन भैया के दोस्त है.. तू उनसे जाकर मिल.. वो इस बारे में जरूर कुछ मदद करेंगे" वैशाली ने जाने से पहले.. कविता को सब बातें बताई थी इसलिए कविता को इस बारे में मालूम था.. कविता ने वो सारी बात बताई और ये भी बताया की उन्होंने ही संजय को जैल में बंद किया था

"अरे पर उस इंस्पेक्टर का नंबर मैं लाऊँ कहाँ से? मुझे तो पुलिस के नाम से ही डर लगता है.. !!" पीयूष ने कहा.. उसकी बात भी सही था.. सीधा साधा आदमी पुलिस स्टेशन में जाने से पहले सौ बार सोचेगा.. निर्दोष होने के बावजूद एक विचित्र सा डर लगता है पुलिस से..

पर बात आखिर वैशाली की थी.. और शीला भाभी की भी. बड़े एहसान थे शीला के पीयूष पर.. जो सिर्फ वो दोनों ही जानते थे.. शीला भाभी और वैशाली के लिए अब साहस करना पड़ेगा.. ये सोचकर पीयूष तैयार हो गया

कविता: "तू डर मत पीयूष.. मैं भी चलूँगी तेरे साथ पुलिस स्टेशन.. अगर अकेले जाने में तुझे डर लग रहा हो तो.. कुछ भी हो जाए.. इस स्थिति में हमें शीला भाभी, मदन भैया और वैशाली की मदद तो करनी ही चाहिए.. वैशाली वहाँ मौत के सामने झुझ रही हो और हम यहाँ हाथ पर हाथ धरे बैठ कैसे सकते है.. !!" जबरदस्त हिम्मत दिखाते हुए कविता ने कहा

अनुमौसी: "कविता.. आज पीयूष के पापा लौटने वाले है तो मैं घर पर ही रहूँगी.. तुम दोनों आज शीला के घर सो जाना.. "

कविता: "ठीक है मम्मी जी.. चल पीयूष.. हम शीला भाभी के घर ढूंढते है.. हो सकता है डायरी से उस इंस्पेक्टर का नंबर मिल जाएँ.. !!"

"ठीक कह रही हो तुम.. " पीयूष ने हामी भरी और दोनों शीला के घर जा पहुंचे..

यहाँ-वहाँ ढूँढने के बाद पीयूष को टीवी के पास फोन-डायरी दिखाई दी और उसकी आँखों में चमक आ गई.. पर काफी ढूँढने के बाद भी इंस्पेक्टर का नंबर नहीं मिला..

तभी पीयूष के मोबाइल पर एक अनजान नंबर से मेसेज आया.. किसने भेजा होगा? और ये किसका नंबर है?

कागजों के बीच नंबर ढूंढ रही कविता को अपना फोन दिखाते हुए पीयूष ने कहा "कविता, ये देख.. मेरे मोबाइल पर किसी अनजान व्यक्ति ने एक नंबर भेजा है.. क्या करूँ?"

"अरे सोच मत.. और फोन लगा.. ज्यादा से ज्यादा क्या होगा.. !! रोंग नंबर कहकर फोन काट देगा.. !! तू लगा फोन" कविता ने कहा

काफी विचार करने के बाद पीयूष ने वो नंबर लगाया.. चार पाँच रिंग के बाद किसी ने फोन उठाया और कडक आवाज में कहा

"हैलो.. इंस्पेक्टर तपन देसाई स्पीकिंग.. !!"

"स..स.. सर.. मैं पीयूष बोल रहा हूँ" बोलते हुए भी पीयूष की फट रही थी

"कौन पीयूष? मैं किसी पीयूष को नहीं जानता.. टू ध पॉइंट बात करो.. क्या काम है??" एकदम खुरदरे टोन में इंस्पेक्टर ने कहा

"सर.. मैं आपके दोस्त मदन भैया का पड़ोसी हूँ"

"आपको कैसे पता की मैं मदन का दोस्त हूँ?" पुलिस वालों की फितरत होती है.. किसी बात को सीधे स्वीकार ही नहीं करते

"सर मेरी वाइफ कविता और मदन भैया के बेटी वैशाली दोनों अच्छी सहेलियाँ है.. और मुझे वैशाली के बारे में अर्जन्ट बात करनी थी.. फोन पर करू या वहाँ आकर आप से मिलूँ? दरअसल मदन भैया और शीला भाभी बहोत बड़ी मुसीबत में है.. और आप चाहें तो उनकी हेल्प कर सकते है"

"हम्ममम.. तुम वहीं रुको.. मैं मदन के घर आता हूँ.. पंद्रह मिनट में.. !!"

"ओके ओके सर.. थेंक यू सर.. " पीयूष ने राहत की सांस ली और सोफ़े पर बैठ गया

"बात हो गई कविता.. वो यहाँ आ रहे है.. तू उनके लिए चाय बना.. और हाँ.. उनके सामने कुछ भी मत बोलना.. सारी बातें मैं ही करूंगा.. कहीं कुछ उल्टा सीधा मुंह से निकल गया तो प्रॉब्लेम हो जाएगा.. पुलिस वालों से सब बातें संभल कर करनी चाहिए.. एक बात के सौ मतलब निकालते है वो लोग.. और सुन.. दुपट्टा डाल ले.. वो पुलिसवाला तेरे बबले देखने नहीं आ रहा.. समझी.. अगर उसकी नजर पड़ गई तो किसी भी गुनाह के सिलसिले में तुझे थाने ले जाएगा और पूरी रात चूसता रहेगा!!"

"हट बदमाश.. !!" अपने स्तनों पर हाथ फेर रहे पीयूष का हाथ झटकाकर कविता ने भी सुना दी "अच्छा होगा ऐसा हुआ तो.. पूरी रात तक चूस सके ऐसा मर्द तो मिल जाएगा मुझे.. फिर मेरे भी शीला भाभी जीतने बड़े हो जाएंगे.. और तुझे पड़ोस में नजर मारनी नहीं पड़ेगी" वातावरण को नॉर्मल रखने के लिए दोनों हंसी-मज़ाक कर रहे थे..

तभी डोरबेल बजने की आवाज आई और दोनों सतर्क हो गए.. कविता दरवाजा खोलने जा ही रही थी तब पीयूष ने उसे इशारे से रोकते हुए खुद ही दरवाजा खोला.. ६ फिट की हाइट वाला एक तगड़ा पुलिस वाला घर में दाखिल हुआ.. पीयूष ने हाथ मिलाना चाहा पर इंस्पेक्टर ने कहा "जो भी बात हो जल्दी बताओ.. मैं एक दूसरे केस की तहकीकात के लिए निकला हूँ.. ज्यादा वक्त नहीं है मेरे पास"

पीयूष ने सारी बात इन्स्पेक्टर को बता दी.. कविता किचन में थी इस बात का पता इन्स्पेक्टर को नहीं था.. सुनते ही इंस्पेक्टर का पारा चढ़ गया

"एक नंबर का मादरचोद है मदन का दामाद.. भेनचोद को मैंने दया खाकर छोड़ दिया वो बड़ी गलती कर दी.. उसकी तो बहन को चोदूँ.. ऐसा केस बनाऊँगा की उसकी साथ पुश्तें जैल की चक्की पिसेगी.. !!"

इंस्पेक्टर की भाषा सुनकर कविता किचन में शर्म से लाल हो गई.. ये पुलिस वाले कितनी गंदी भाषा बोलते है.. !! बिना गाली के क्या बात नहीं हो सकती?? मन ही मन पुलिसवालों के प्रति तिरस्कार के भाव से वो चाय उबालने लगी.. चाय तैयार होते ही दो कप में भरकर वो ड्रॉइंग रूम मे आई

इंस्पेक्टर कविता को देखकर ही सहम गया.. वैसे उनकी कोई गलती नहीं थी.. उन्हें कहाँ पता था की कविता अंदर थी.. !! और जो गालियां उसने दी थी वो संजय को दी थी.. इसलिए वो निश्चिंत थे..

"आई एम सॉरी मैडम.. लगता है आप इनकी वाइफ हो.. माफ करना.. बेवजह आपको मेरी गालियां सुननी पड़ी..पर क्या करें.. !! हमारा काम है ही ऐसा.. दिन रात गुनहगारों से पाला पड़ता है.. और वो सब यहीं भाषा समझते है.. इसलिए आदत हो चुकी है.. मेरी वाइफ भी अक्सर टोका करती है की घर पर मैं सभ्य भाषा में बात करूँ.. पर आदत से मजबूर हूँ.. छोड़िए वो सब.. पर आपने ये सब मुझे बताकर अच्छा किया.. अब आप चिंता मत कीजिए और घर जाइए.. बाकी सब मुझ पर छोड़ दीजिए.. मैं संभाल लूँगा"

कविता: "सर.. वैशाली मेरी खास सहेली है.. उसने खुदकुशी करने की कोशिश की है.. अभी उसकी हालत कैसी है ये जाने बगैर मुझे चैन नहीं पड़ेगा.. आप जरा पूछिए ना.. हमें तो कोई जवाब ही नहीं देगा.. !!"

"ओके.. रुकिए एक मिनट.. !!" कहते ही इन्स्पेक्टर ने किसी को फोन लगाया और सारी बात की "थोड़ी देर में सब पता चल जाएगा.. मैं आप को फोन करके बता दूंगा.. क्या नाम बताया था आपने.. मिस्टर पीयूष.. आपका नंबर तो है ही मेरे पास.. मुझे एक दूसरे जरूरी काम से जाना होगा फिलहाल" कहते हुए वो निकल गए..

पीयूष और कविता के दिल से बड़ा बोझ उतर गया.. मामला अब पुलिस के हाथ में था इसलिए उन्हें अब चिंता नहीं थी.. अपनी जिम्मेदारी निभाने का संतोष भी हुआ

पीयूष: "वैशाली को कुछ न हुआ हो तो अच्छा है.. बेचारी की ज़िंदगी हराम हो गई है"

कविता: "एक नंबर की पागल है वो.. खुदकुशी करने की क्या जरूरत थी.. !! उस भड़वे को ही खतम कर देती.. !!"

पीयूष: "कहना आसान है कविता.. पर घर से हजारों किलोमीटर दूर अकेली लड़की पर जब गुजरती है ना तब ऐसी हिम्मत नहीं होती.. "

इन्स्पेक्टर बिना चाय पियें चले गए.. इसलिए पीयूष और कविता ने मिलकर चाय खत्म की.. तभी लेंडलाइन की रिंग बजी.. उत्सुकतावश पीयूष ने फोन उठाया.. अनुमौसी का फोन था.. यहाँ का हाल जानने के लिए फोन किया था.. पीयूष ने सारी बात बताई तब मौसी के दिल को ठंडक मिली

पीयूष को एक ही विचार बार बार सता रहा था.. अगर वैशाली को कुछ हो गया.. तो मदन भैया संजय का खून कर देंगे.. और उन्हों ने ऐसा कुछ कर दिया तो शीला भाभी का जीवन नष्ट हो जाएगा.. मदन का गुस्सा बड़ा ही खराब था इस बात का पीयूष को पता था.. गुस्से में आदमी का दिमाग काम नहीं करता और वो सही और गलत की परख भूल जाता है.. और बात जब अपनी संतान की हो तो किसी भी बाप को गुस्सा आना लाज़मी था..

कविता और पीयूष एक दूसरे से लिपटकर शीला के बिस्तर पर सो गए.. आधी रात को लगभग तीन बजे पीयूष के मोबाइल की रिंग बजी.. वैशाली के बारे में कोई कॉल आया होगा सोचकर पीयूष ने फोन उठाया.. सामने से कोई अंग्रेजी में बात कर रहा था

"यस सर.. ओके सर.. आई सी.. " पीयूष का चेहरा गंभीर हो रहा था.. सामने से फोन कट हो गया.. पीयूष स्तब्ध होकर दीवार पर टंगी वैशाली की तस्वीर को देखता ही रहा.. फ़ोटो में वैशाली मुस्कुराकर पीयूष को छेड रही हो ऐसा एहसास हो रहा था पीयूष को.. आँखों में आँसू आ गए पीयूष के.. बचपन से लेकर आज तक की सारी बातें याद आ गई.. वो सारे पल जो उन्हों ने साथ बिताए थे.. उस खंडहर में रेत के ढेर पर किया हुआ संभोग भी.. हाथ जोड़कर उसने मन ही मन प्रार्थना की.. "हे भगवान.. वैशाली की रक्षा करना.. बचा लेना उसे.. !!"

कविता तो नींद में थी.. पीयूष फोन पर बात कर रहा था फिर भी वो गहरी नींद सोती रही..

पीयूष ने कविता के कंधे पर हाथ रखकर उसे जगाने की कोशिश की.. आधी नींद से जागते हुए कविता ने पूछा "क्या हुआ पीयूष?"

"कलकत्ता से किसी का फोन आया था.. वैशाली ने खुदकुशी की कोशईह नींद की गोलियां खाकर की थी.. अभी फिलहाल वो होश में नहीं है और डॉक्टर उसकी जान बचाने की कोशिश कर रहे है"

"पर पीयूष.. तेरा नंबर उनके पास कैसे आया?" कविता ने पूछा

"पता नहीं.. हो सकता है वो इंस्पेक्टर ने दिया हो.. और तो ज्यादा कुछ नहीं बताया उन्हों ने.. अब तो वो इंस्पेक्टर से पता चलेगी आगे की सब बात..!! और हाँ ये भी बताया की मदन भैया और शीला भाभी जैल से छूट गए है और संजय फरार है.. पुलिस उसे ढूंढ रही है.. "

"तो तू मदन भैया का फोन ट्राय कर.. शायद लग जाए"

"हाँ.. ये भी सही है.. " कहते हुए पीयूष ने मदन को फोन लगाया.. एक ही रिंग में मदन ने फोन उठाया

"हैलो मदन भैया.. मैं पीयूष बोल रहा हूँ.. आप कैसे है? क्या हालात हैं वहाँ? वैशाली के बारे में सुनकर हम सब चोंक गए"

मदन: "यहाँ के हालात बिल्कुल ठीक नहीं है यार.. सब लोग बकवास है हाँ.. मैं यहाँ अकेला पड़ गया हूँ पीयूष.. ये तो अच्छा हुआ की इंस्पेक्टर तपन की पहचान से हम जैल से बाहर आ पाए.. पर यहाँ के लोगों ने तेरी भाभी के साथ बहोत बुरा बर्ताव किया.. सब कुछ वहाँ आकर बताऊँगा तुझे.. अब मैं यहाँ एक पल भी रुकना नहीं चाहता.. और वैशाली को भी यहाँ रहने नहीं दूंगा.. उसकी हालत बहोत नाजुक है.. " कहते हुए मदन की आवाज भारी हो गई.. वो आगे बात न कर सका "ले शीला से बात कर.. !!" कहते हुए उसने शीला को फोन थमा दिया..

कविता ने पीयूष के हाथ से फोन छीन लिया..

शीला: "हैलो? कविता.. मेरी वैशाली.. हे भगवान.. !!" कहते हुए शीला फुटफुट कर रोने लगी.. "हम बड़ी मुसीबत में फंस गए है कविता.. भगवान जाने क्या होगा हमारा.. !!"

कविता को पता नहीं चल रहा था की कैसे बात करें.. किस तरह शीला भाभी को सांत्वना दें.. अपने से बड़ी उम्र की व्यक्ति को दिलासा देना बड़ा ही कठिन होता है..

कविता: "भाभी.. आपने वैशाली को देखा?"

शीला: "अब तक नहीं देखा.. हम जैल से अभी अभी बाहर आए.. उस कमीने ने झूठी कंप्लेन करके हमे बंद करवा दिया था.. बड़ी मुश्किल से बाहर निकले.. हमें तो जैल में पता चला की वैशाली ने ऐसा किया था.. अब अस्पताल जा रहे है.. पता नहीं जिंदा भी या नहीं.. मेरी फूल जैसी बच्ची की ज़िंदगी नरक बन गई.. ये तो अच्छा हुआ की इंस्पेक्टर ने फोन किया.. वरना पता नहीं जैल में हमारा क्या होता.. !!"

कविता: "आप चिंता मत कीजिए भाभी.. वैशाली ठीक हो जाएगी.. मैंने मन्नत मांग ली है.. मुझे विश्वास है की उसे कुछ नहीं होगा.. "

शीला: "हाँ कविता.. ईश्वर करें की ऐसा ही हो.. मैं फोन रखती हूँ अब.. !!"

कविता: "ठीक है भाभी.. और आप चिंता मत कीजिए.. इंस्पेक्टर के जरिए हमें सारे समाचार मिलते रहेंगे.. "

शीला: "हाँ कविता.. भला हो उस इंस्पेक्टर का जिसकी बदौलत हम छूट गए.. जैल में इन हरामजादों ने हमारे साथ क्या क्या किया.. वो सब वहाँ आकर बताऊँगी तुझे.. "

पीयूष को बहोत दुख हो रहा था.. सुख के समय वो हमेशा शीला भाभी के साथ थी.. अब तकलीफ के वक्त वो उनके साथ नहीं था उस बात का उसे बेहद अफसोस हो रहा था.. सीधी-साधी औरतों के लिए पुलिस स्टेशन में रहना.. और वो भी लॉकअप में.. उन पर क्या बीती होगी.. सोचकर ही पीयूष के रोंगटे खड़े हो रहे थे..

फोन रखकर कविता रोने लगी.. बड़ी ही मुश्किल से पीयूष ने उसे शांत किया.. आखिर दोनों थककर सो गए.. उन्हें सोये हुए एकाध घंटा हुआ होगा तभी डोरबेल बजी.. जागकर पीयूष ने दरवाजा खोला.. आज रसिक के बदले रूखी दूध देने आई थी..






रूखी का अद्भुत सौन्दर्य देखकर पीयूष की सारी नींद उड़ गई.. एक पल के लिए उसे लगा की वो सपना देख रहा था और उसी सपने में ये अप्सरा आ गई.. रूखी के भव्य जोबन से पीयूष की नजर ही नहीं हट रही थी.. साढ़े पाँच बजे हर मर्द नींद में होता है पर उसका हथियार जागा हुआ होता है.. पीयूष का भी यही हाल था जब वो जागा..

पीयूष की शॉर्ट्स में उसका लंड उभार बनाते हुए रूखी को छूने की कोशिश कर रहा था.. जिसे बड़ी मुश्किल से पीयूष ने संभाले रखा था.. रूखी इस बात से अनजान थी.. उसने चुपचाप दूध दिया.. पर पीयूष की नजर उसके स्तनों पर थी इस बात से रूखी बेखबर तो नहीं थी.. अपने पल्लू को ठीक करते हुए वो खड़ी हो गई.. पर पतले से पल्लू के पीछे इतने बड़े स्तन भला कैसे छुपते?? उसकी ज्यादातर गोलाइयाँ आराम से नजर आ रही थी.. छोटी से चोली में दबाए हुए उस स्तनों का ५० प्रतिशत हिस्सा तो ऊपर से नजर आ रहा था.. पीयूष ने अंदाजा लगाया.. रूखी के दोनों स्तनों के बीच की लकीर कम से कम दस इंच लंबी थी.. बाप रे.. !! पीयूष का रोम रोम उत्तेजित हो गया ये देखकर..

पीयूष की नज़रों से रूखी शरमा गई.. शीला भाभी के घर इस नए चेहरे को देखकर वो अचंभित थी.. एक बार के लिए उसने सोचा की भाभी के पट्टी होंगे जो विदेश से लौटे थे.. पर पीयूष की उम्र देखकर वो खयाल भी रिजेक्ट हो गया.. ये था कौन? शीला भाभी का बेटा? पर उन्हें तो सिर्फ एक बेटी ही है.. !! तो ये कौन होगा? जरूर कोई मेहमान होगा.. सोचते सोचते रूखी वापिस लौट रही थी..

रूखी के हर कदम के साथ लयबद्ध तरीके से मटकते कूल्हों को और लचकती कमर को.. पीछे से देखता ही रहा पीयूष.. ऐसा रूप उसने जीवन में पहले कभी देखा नहीं था.. वाह.. !! ये तो शीला भाभी से भी बढ़कर है.. इतना सौन्दर्य? इन सब बातों से अनजान रूखी लटक-मटक चलते हुए निकल गई.. उसके जाने के बाद भी पीयूष मूर्ति की तरह दरवाजे पर खड़ा रहा.. उसके पैर फर्श पर जैसे चिपक गए थे.. रूखी के रूप से प्रभावित होकर वो दूध रखने किचन में गया तब कविता जाग गई.. और वो अपने घर चली गई.. सुबह के काम निपटाने.. पीछे पीछे पीयूष भी ताला लगाकर अपने घर गया..
 
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