Adultery हवेली - Page 2 - SexBaba
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Adultery हवेली

#9



मैंने उस बुजुर्ग को देखा उम्र में कोई सत्तर बरस का रहा होगा पर जिस मजबूती से उसने उस लाठी को थाम रखा था मुझे हंसी सी आ गयी पर कंट्रोल किया और पूछा- तुम कौन हो बाबा

“मेरा नाम भूषण है औरअब मैं चोकिदारी करता हूँ हवेली के आस पास ” उसने कहा

मैं- अच्छा भूषण बाबा, एक बात बता ये सुनसान इमारत की चोकिदारी करने की क्या जरुरत आन पड़ी भला, आस पास के हालात देख कर लगता तो नहीं की बरसो से किसी ने कदम भी रखा होगा यहाँ पर.

भूषण- तुझे क्या मतलब है इस बात से, जहाँ से आया है लौट जा वर्ना ठीक नहीं होगा.

मैं- अंजाम की परवाह नहीं मुझे आगाज देख कर लगने लगा है की कुछ तो बात है

भूषण- कैसी बात

मैं- बस इतना जानना चाहता हूँ की ये हवेली किसकी है

भूषण- ठाकुर शौर्य सिंह मालिक है इसके

मैं- कहाँ मिलेंगे ठाकुर साहब

भूषण- कहीं नहीं

मैं- क्या मतलब

भूषण- सोलह साल पहले हुए एक हादसे की वजह से ठाकुर साहब कोमा में है .

मेरा दिमाग सुन्न सा हो गया ये सुन कर एक इन्सान पिछले सोलह साल से बिस्तर पर पड़ा मौत का इंतज़ार कर रहा है और फिर भी इलाके में उसका इतना रसूख है .

मैं- तो यहाँ पर अब कोई नहीं रहता

अगले ही पल मुझे मेरी मुर्खता का अहसास हो गया क्योंकि ये बात तो कोई भी जान जाता इस सुनसान हवेली को देख कर.

मैंने नोटों की गड्डी निकाल कर भूषण के हाथ में दी और बोला-रख लो बाबा इसे.

भूषण के झुर्रियो भरे चेहरे पर तनाव आ गया और बोला- पैंतालीस साल से नौकर था मैं ठाकुर साहब का चंद नोटों में इमान खरीद लेगा मेरा लड़के.

मैं- नौकर था बाबा, अब तो नहीं है न रख ले

भूषण मुझे देखता रह गया उसके कांपते हाथो के साथ उसके ईमान को भी डोलते हुए देखा मैंने.मैं इतना तो जान गया था की भूषण मेरे लिए काम का होगा.

सांझ ढलने लगी थी , एक नजर जी भर कर हवेली को देखा और मैं वापिस मुड गया . बापू ने मरते वक्त हवेली ही क्यों कहा और ठाकुर शौर्य सिंह के साथ ऐसा क्या हुआ था की वो सोलह साल से जिन्दा लाश बन कर रह गया था . सबसे महत्वपूर्ण बात की मेरा इन सब लोगो से क्या लेना देना था . खैर, अपनी तलाश के लिए मुझे इस गाँव में रुकने की कोई जगह चाहिए थी और जैसी मेरी मुलाकात जय सिंह के साथ हुई थी उसके हिसाब से कोई मुझे रुकने देगा ये मुमकिन होने ही नहीं वाला था .

मैंने गाडी अपने गाँव की तरफ घुमा ली गाँव से बाहर आया ही था की एक जीप ने मेरी गाड़ी का रास्ता रोक लिया.

“इतनी तो जुर्रत नहीं होनी चाहिए लाडले की हमारा दीदार करने आओ और बिना मिले चले जाओ ” चांदनी ने जीप से उतरते हुए कहा

मैं-- तेरे लिए ही तो इतनी दूर चला आया लाडली . वो तो तेरा भाई ने बन्दूक तान दी वर्ना उसी समय गले से लगा लेता तुझे लाडली

चांदनी- अच्छा जी इतनी हिम्मत हमारे गाँव में ही हमें गले लगा लोगे.

मैं- तू एक बार कह के तो देख तेरे गाँव में क्या क्या कर दू

वो मुस्कुरा पड़ी.

चांदनी- भैया से पंगा करने की क्या जरूरत थी

मैं- उस चुतिया ने गोली चलाई मेरे ऊपर

चांदनी- चुतिया मत बोल

मैं- अच्छा जी यार चाहे मर जाये पर भैया को चुतिया मत बोल , वैसे तू भी जानती है चुतिया तो है वो

चांदनी-अर्जुन

मैं-ठीक है,

चांदनी- यहाँ क्यों आया

मैं- तेरे लिए

चांदनी फिर मुस्कुरा पड़ी .

मैं- जबसे तुझे देखा है न अब कुछ दीखता ही नहीं

चांदनी- जानता है न मेरा भाई कौन है

मैं-तू हाथ तो थाम कर देख एक बार जान जाएगी अर्जुन कौन है

चांदनी- दिल्लगी करना चाहता है मेरे साथ

मैंने उसकी कमर में हाथ डाला और उसे अपने सीने से लगाते हुए बोला- पहली नजर में सब हार बैठा हु तुझ पर लाडली, तू एक बार हाँ तो कह कर देख इशक करना है तेरे साथ

चांदनी- अच्छा लाडले, मैंने तो सुना है इश्क की बीमारी का इलाज नहीं मिलता

मैं-किसे चाहिए ये इलाज फिर

चांदनी- नागिन हूँ मैं डस लुंगी मेरा काटा हुआ पानी भी न मांगे

मैंने उसके चेहरे को ऊपर किया और अपने होंठ उसके गुलाबी होंठो से जोड़ दिए जीवन का प्रथम चुम्बन था ये साँस टूटने तक चुसे उसके होंठ और बोला- ले चख लिया जहर तेरा, अब तू जाने और ये जान जाने.

चांदनी ने मेरे सीने में मुक्का मारा और बोली- बदमाश कहीं का.

चांदनी के साथ वक्त का कुछ भी मालूम ही नहीं हुआ अँधेरा चढ़ने लगा था तो मैंने उस से विदा ली और अपने रस्ते बढ़ गया पर किस्मत साली धोकेबाज़ निकली . गाड़ी का टायर पंक्चर हो गया. मेरे पास दूसरा टायर भी नहीं था , गाँव दूर अब क्या किया जाये मैं सोच ही रहा था ऊपर से अँधेरा चढ़ते जा रहा था की तभी , पीछे से एक आवाज आई.

“क्या हुआ बाबु कोई परेशानी है क्या ”

मैंने मुड कर देखा हाथ में लालटेन लिए................
 
#10



मैंने मुड कर देखा हाथ में लालटेन और सर पर लकडिया लिए चंदा कड़ी थी वो ही चंदा जिसे आज दोपहर में मैंने जंगल में चुदते हुए देखा था . उसकी नजरे मुझ पर थी और मेरी नजरे उसकी छातियो पर .

“क्या हुआ बाबु कोई परेशानी है क्या ” उसने पूछा

मैं- गाड़ी पंक्चर हो गयी है ऊपर से अँधेरा घिर आया है

चंदा- परेशानी की बात तो है पर इतनी भी नहीं , थोड़ी दूर पर ही एक कबाड़ी है जो ठाकुरों की गाड़ी ठीक करता है अगर वो गया नहीं होगा तो तुम्हारी मदद कर देगा . चलो मैं तुमको लेकर चलती हु

उसने अपनी लकडिया गाड़ी के पास ही रखी और हम दोनों कबाड़ी की दूकान पर जा पहुंचे पर बदकिस्मती से वो ताला लगा कर जा चूका था

मैं- किस्मत ही ख़राब है

चंदा- अब तो सुबह ही ठीक हो पायेगी गाड़ी तुम्हारी

हम दोनों वापिस से गाड़ी तक आये.

मैं- मदद के लिए शुक्रिया ,

चंदा- मदद हुई तो नहीं पर मदद कर सकती हूँ रात घिर आई है तुम चाहो तो मेरे घर रुक जाओ , सुबह गाडी ठीक करवा कर चले जाना

मैं-नहीं मेरी वजह से तुमको तकलीफ होगी , मैं यही गाड़ी में ही सो जाऊंगा

चंदा- भला मुझे क्या तकलीफ होगी मैं तो अकेली ही रहती हूँ

चंदा मुझे दिल्स्च्प सी लगी मैंने हां कर दी और उसके पीछे पीछे उसके घर आ गया. घर तो क्या था थोड़ी बड़ी सी झोपडी ही कहना ठीक था उसे, खेतो के किनारे पर रहती थी वो. उसने चारपाई बिछाई और मुझे बैठने को कहा. आँगन में ही एक टीन लगा कर उसने रसोई बनाई हुई थी अन्दर एक कमरा था बस यही था उसके पास.

चंदा-पहले कभी देखा नहीं तुमको बाबु इस गाँव में

उसने पानी का गिलास दिया मुझे

मैं- पुराणी चीजो का व्यापार है मेरा, उसी सिलसिले में इधर-उधर आना जाना होता है , इस गाँव में एक पुराणी हवेली के बारे में किसी ने बताया था तो सोचा देखता चलू पर गाँव में कोई तैयार ही नहीं था उसके बारे में बात करने को . वैसे तुम बता सकती हो क्या मुझे कुछ उसके बारे में

चंदा- नहीं मैं नहीं जानती

मैं- देखो तुम मेरी मदद कर सकती हो बदले में मैं तुम्हारी मदद करूँगा

चंदा- मुझे मदद की भला क्या जरुरत है , एक जान हूँ मैं कोई आगे न पीछे रोटी-पानी का जुगाड़ हो ही जाता है मुझ को और क्या चाहिए वैसे भी हवेली का जिक्र कोई नहीं करता

मैं- तुम कर सकती हो जिक्र

मैंने जेब से कुछ नोट निकाल कर चंदा के हाथ में रखे

चंदा- कौन हो तुम

मैं- नही जानता अभी तो नहीं जानता पर हवेली को जानना चाहता हूँ .

चंदा- इस दुनिया में अभी भी कुछ बचा है जो बिकाऊ नहीं है , पैसे से हर काम नहीं होता मुझसे जानना चाहते हो तो फिर खुद को क्यों छिपाया है , इतना तो मैं जान गयी हूँ की तुमने अपना झूठा परिचय दिया है कोई पुलिसवाले हो क्या

मैं- क्यों पुलिस वाले भी आते रहते है क्या हवेली के बारे में पूछने तुमसे.

चंदा-नहीं पुलिस की क्या औकात जो सर उठा कर देख सके बड़े ठाकुर की मिलकियत की तरफ

मैं- तो बताती क्यों नहीं मुझे हवेली के बारे में

चंदा- अब कुछ है नहीं बताने को

मैं- अब नहीं है तब तो होगा, जब वो ईमारत आबाद रही होगी. तुम हवेली की पुराणी नौकर हो तुमसे ज्यादा कौन जानेगा उसको.

“तुम्हे किसने बताया की मैं हवेली में काम करती थी ”चंदा ने अधीरता से पूछा .

मैंने उसे जवाब नहीं दिया . उसने दो पल मुझे देखा और बोली- उस मादरचोद भूषण ने कहा न तुमसे .

मैं- नहीं , दोपहर में जब तुम किसी आदमी के साथ सलवार उतारे घुटनों पर झुकी हुई थी तब मैंने तुम्हारी बाते सुन ली थी .

चंदा के हाथ से गिलास छुट कर गिर गया. अविश्वास से उसने मुझे देखा और बोली- ये बात किसी से न कहना बाबू. एक विधवा हूँ मैं गाँव में किसी को भनक भी लगी तो गजब हो जायेगा.

मैं- मुझे क्यों कहना है किसी से .तुम अपनी जिन्दगी चाहे जैसे जियो ये तुम्हारी मर्जी है . इस गाँव में किसी ने भी मुझे नहीं बताया हवेली के बारे में , मैं तुमसे भी गुजारिश ही कर सकता हूँ चंदा .

चंदा ने गहरी साँस ली और बोली- वो हवेली जिसे तुमने देखा है वो हमेशा ऐसी नहीं थी , जिन्दादिली की मिसाल थी वो . ठाकुर शौर्य सिंह ने बड़े अरमानो से बनवाया था उसे, तीन मंजिल की वो काले पत्थरों से बनी इमारत जिसकी ख़ूबसूरती के किस्से हवाए भी बताती थी . हर रात वहां पर महफ़िल लगती दूर दूर से कलाकार आते . दिन बहुत सुख से बीत रहे थे पर फिर एक रात ऐसा कुछ हुआ की हवेली के दिए बुझ गए. ठाकुर साहब के तीनो बेटे उस जश्न की रात मर गए.

मैं- कैसा जश्न था वो .

चंदा- ठाकुर के बड़े बेटे पुरुषोत्तम का जन्मदिन था .सारे गाँव को भोज दिया गया था . रात आधी बीत जाने तक नाच-गाना हो रहा था लोग मजे में ,नशे में झूम रहे थे पर सुबह अपने साथ हाहाकार लेकर आई थी . सुबह अपने अपने कमरों में ठाकुर के तीनो बेटे मरे हुए मिले.

मैं- किसने किया

चंदा- अठारह साल बीत गए , कोई नहीं जान पाया. हवेली के दिए बुझ गए, ठाकुर साहब ने कातिलो को तलाशने के लिए दिन रात एक कर दिया जिस पर भी शक हुआ अगले दिन वो गायब हो गया. बहुत बुरा दौर था वो नालियों में पानी कम और खून ज्यादा बहता था . पर फिर दो साल बाद ठाकुर साहब खुद हादसे का शिकार हो गए. आज तक कोमा में पडे है .

मैं- और बाकि बचे लोग.

चंदा- ठाकुर साहब की जायदाद पर उनके भतीजे ने कब्ज़ा कर लिया . उसका बेटा जय सिंह और बेटी चांदनी गाँव में ही नए मकान बना कर रहते है .

मैं- बस

चंदा- बस

मैं- ठाकुर परिवार की औरते कहाँ गयी तुमने उनका जिक्र क्यों नहीं किया

चंदा- बड़ी ठकुराइन सरिता देवी बेटो के गम में ऐसी खाट पकड़ी की फिर कभी उठ नहीं पायी . पुरुषोत्तम की पत्नी रुपाली ठकुराइन उनकी मौत के बाद विदेश में बस गयी , यहाँ तक की ठाकुर साहब के कोमा में जाने की खबर सुनने के बाद भी वो नहीं लौटी. बस एक बात जिसे सबने परेशां किया हुआ है की कामिनी कहाँ गयी. जिस रात ठाकुर साहब के साथ हादसा हुआ उसी रात से कामिनी गायब है कहाँ गयी किसी ने नहीं देखा. बस यही है दास्ताँ हवेली और उसमे रहने वाले लोगो की .

चंदा की बताई कहानी ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया. बापू ने मरते वक्त कहा था की हवेली. वो इस हवेली से कैसे जुड़ा था . मुझे वसीयत में वो चाबी क्यों दी गयी थी और रुपाली क्यों छोड़ गयी इतनी बड़ी जायदाद बाकि की रात तमाम सवालो को सोचते हुए कट गयी.

 
#11



सुबह मैंने गाड़ी ठीक करवाई और वापिस से घर आ गया पर इस बार मैं अकेला नही था मेरे साथ सवालों का बोझ भी आया था . मैंने निर्मला को समझाया की आगे से जमीनों का काम उसे ही देखना होगा मैं थोड़े दिन व्यस्त रहूँगा . मैंने लखन को भी चोकिदारी छोड़ने को कहा. निर्मला को खेतो पर छोड़ कर मैं आया और सारे घर की तलाशी ली पर सरपंच साहब कोई भी ऐसा सुराग नहीं छोड़ गए थे जो मेरे काम आ सके. और सबसे बड़ी उलझन वो चाबी जो मेरी जेब में पड़ी थी . मैंने गाडी शहर की तरह घुमाई और सीधा कचहरी पहुँच गया जहाँ पर एक और आश्चय मेरा इंतज़ार कर रहा था .

कचहरी में मुझे मालूम हुआ की रमेश चंद नाम का कोई भी वकील था ही नहीं. तो फिर वो कौन था जो चाबी देकर गया था . उसे हर हाल में तलाश करना ही होगा. वापिस आते समय मैंने थोड़ी जलेबिया खरीदी और अन्दर घुस गया . मैं नहा ही रहा था की निर्मला आ गयी . उसने लकडिया कोने में रखी और नलके पर आकर हाथ पाँव धोने लगी. जब वो झुकी तो उसकी गदराई छतिया देख कर मेरे कच्छे में हलचल सी मचने लगी. उसने अपनी साडी ऊपर की उफ्फ्फ उसकी गोरी पिंडलिया जिस पर एक भी बाल नही था कसम से मैंने सीने में तूफ़ान मचलते हुए महसूस किया .

“जलेबिया लाया हूँ तुम्हारे लिए ” मैने कहा

वो मुस्कुराई और चारपाई पर रखे लिफाफे को खोल कर जलेबी खाने लगी . मैंने भी तब तक तौलिया बाँध लिया

“तुम भी चख लो , जलेबियो का स्वाद तब तक ही जंचता है जब तक की वो गर्म हो . ” निर्मला ने अपने होंठो पर लगी चाशनी उंगलियों पर लपेटी और जलेबी मेरी तरफ की, कसम से उसकी अदा पर पिघल ही तो गया था मैं. जलेबी पकड़ने के बहाने मैंने चाशनी से सनी उसकी उंगलियों को छुआ और जलेबी के टुकड़े को अपने होंठो में दबा लिया. मैं उसके इतने पास आ गया था की उसकी भारी छातिया मेरे सीने में दबने लगी थी . पर वो पीछे न सरकी . मैंने अपनी ऊँगली उसके चाशनी से लिपटे लाल होंठो पर रखी और उसके होंठो को सहलाने लगा.

“सीई ” निर्मला के होंठो से एक आह निकली . तौलिये में फद्फ्दाता मेरा लंड निर्मला की चूत पर दस्तक देने लगा था निर्मला का अकड़ता बदन कांप रहा था मेरे छूने से उसके होंठ लरज रहे थे , उसके हाथ में जो लिफाफा था मैंने उसमे पड़ी जलेबियो को मसला और चाशनी को उसके होंठो पर लगा दिया. उसकी आँखे बंद होती गयी और अगले ही पल मैंने अपने होंठ उसके दहकते होंठो से मिला दिए. जीवन का पहला चुम्बन , मैंने उसकी कमर में हाथ डाल कर उसे अपने आप से जोड़ लिया और बेतहाशा चूमता चला गया उसे. होंठो से जो होंठ मिले , निर्मला ने अपने होंठ खोले और अपनी जीभ मेरे मुह में डाल दी. हाय, एक आग सी ही तो लग गयी तन में . मेरे हाथ उसकी पीठ से होते हुए उसके नितम्बो पर आ गए. पर इस से पहले की मैं उसकी गांड का जायजा ले पाता ,बाहर से आई आवाज ने हम दोनों को होश में ला दिया.

कोई गाँव वाला फरियाद लेकर आया था

मैं- बाबा अब हम सरपंच नहीं रहे , तुम्हे अजित सिंह के घर जाना चाहिए वो ही समाधान करेंगे तुम्हारा.

बाबा- बरसो से इसी चौखट ने हमारी फरियादे सुनी है बेटा,

मैं गाँव वालो की भावनाए समझता था मैंने कहा की उसकी मदद होगी. बाकि फिर लखन था तो निर्मला और मैं चाह कर भी कुछ नहीं कर पाए. अगर मैं सरपचं जी का बेटा नहीं था तो फिर क्या वजूद था मेरा और उस हवेली से क्या लेना देना था मेरा. इस घर में मैंने कभी शौर्य सिंह का नाम भी नहीं सुना था , और जब अब उससे मिलने की जरुरत थी वो बिस्तर पर कोमा में पड़ा था . अगली सुबह मैं फिर से निकल गया पर इस बार मैंने गाड़ी नहीं ली साथ . दोपहर को मैं एक बार फिर हवेली के सामने खड़ा था पर आज थोड़ी आसानी थी क्योंकि भूषण की झोपडी पर ताला लगा था मतलब वो यहाँ नहीं था .

मैंने हवेली का पीछे से जायजा लेने का सोचा , उस तरफ काफी ऊँचे पेड़ थे, मैं एक पेड़ पर चढ़ा और दिवार के अन्दर कूद गया. एक अजीब सा सन्नाटा ,बरसो से ये जगह खाली थी किसी ने संभाला नहीं था तो काफी झाडिया, घास उग आई थी . रास्ता बनाते हुए उस बड़े बरगद के पास से होते हुए मैं हवेली के पीछे वाले हिस्से में पहुँच चूका था . मेरा दिल जोरो से धडक रहा था यहाँ की हवा में कुछ तो अजीब था , सांसो पर दबाव सा पड़ रहा था . पसीने भरे हाथो से मैंने पिछले दरवाजे को धक्का दिया पर वो नहीं खुला . शीशम की लकड़ी का बना वो दरवाजा वक्त की मार सहते हुए भी वफदारी से खड़ा था . मैं अन्दर घुसने का कोई और जुगाड़ देखने लगा. मैंने देखा की रसोई की खिड़की का शीशा टुटा हुआ है मैंने उसमे हाथ दिया और चिटकनी खोल दी. पल्ले को सरकाया और अन्दर दाखिल हो गया. हर कहीं धुल मिटटी भरी हुई थी मैंने अपने साफे को मुह पर बाँधा और रसोई के खुले दरवाजे से होते हुए अन्दर की तरफ पहुँच गया.

काले संगमरमर का वो फर्श जिस पर बेशक मिटटी धुल ने अपना कब्ज़ा कर लिया था पर आज भी शान बाकी थी उसकी , सामने दीवारों पर बंदूके टंगी थी जो जालो से ढकी थी , छत पर विदेशी फानूस, , दीवारों पर आदमकद तस्वीरे जिन्हें मैं नहीं जानता था . ऐशो-आराम तो खूब रहा होगा हवेली में . उस बड़े से आँगन में कुछ नहीं था कोने में दो कमरे बने थे बस. ऊपर जाती सीढियों पर चढ़ कर मैं पहली मंजिल पर आया. यहाँ पर एक लाइन में कुल चार कमरे बने थे जिनमें से तीन पर ताले लगे थे. मैंने जेब से चाबी निकाली और बरी बारी से कोशिश की पर चाबी ने धोखा दिया.

फिर मैं उस कमरे की तरफ बढ़ा जिस पर केवल कुण्डी लगी थी .मैंने उस कमरे को खोला और जैसे ही अन्दर गया.........................
 
#१२



जैसे ही मैं अन्दर गया , मैं हैरान हो गया. हर चीज इतने सलीके से रखी गयी थी . कमरे में एक बड़ा शीशा था उसके पास ही एक अलमारी थी , एक बेड जिसकी चादरों पर सलवटे थी . पास की टेबल पर करीने से किताबे रखी हुई थी , एक फूलदान था . मैंने अलमारी खोली , उसमे साड़िया थी, गहने थे . ड्रेसिंग की दराजो में सौ सौ के नोटों की गद्दिया पड़ी थी . जरुरत की हर चीज थी इस कमरे में पर कोई तस्वीर नही थी . पैसो ने मुझे जरा भी हैरान नहीं किया था क्योंकि ठाकुर परिवार रईस था पैसो की क्या ही कद्र रही होगी उनको . मैं बिस्तर पर बैठ गया . सर तकिये पर लगाया की कुछ चुर्मुराने की आवाज से मैंने तकिया हटा कर देखा, एक कागज का टुकड़ा था जिस पर लाल धब्बे थे और कुछ लिखा था

“तुझे भुला कर जिए तो क्या जिए ”

बहुत गौर करने पर मैं समझा की ये धब्बे खून के थे हो न हो ये लाइन खून से ही लिखी गयी थी पर क्यों. क्या कलम खत्म हो गयी थी दुनिया से . पर इतना अगर लिखा गया तो यक़ीनन दीवानगी तो बहुत रही होगी. मैंने उस कागज के टुकड़े को जेब में रख लिया और हवेली से बाहर निकल गया , पहले दिन के लिए इतना ही बहुत था . मैं जंगल के किनारे पहुंचा तो देखा की भूषण की झोपडी का दरवाजा खुला था . मैंने सोचा की मिलता चलू, पर जैसे ही मैंने अन्दर देखा मेरे कदम ठिठक गए, क्योंकि झोपडी में भूषण नहीं नहीं, उसकी लाश पड़ी थी . आँखे बाहर को निकल आई थी . गला घोंट कर मारा गया था उसे. मुझे पूरा यकीन था की ये हत्या थोड़ी देर पहले ही की गयी थी क्योंकि जब मैं यहाँ से गुजरा था तो झोपडी बंद थी . पर कौन , कौन पेल गया इसको . मैंने माथे पर हाथ रखा और वहां से निकल गया. पर मेरे जेहन में एक बात और थी की क्या किसी की नजर थी मुझ पर हवेली में घुसते हुए.

कोई तो था जो इस वक्त का इंतज़ार कर रहा था वर्ना ये सब अचानक से शुरू नहीं होता. कोई तो था जो मौके की तलाश में था पर भूषण को अभी क्यों मारा गया जबकि ये काम कभी भी किया जा सकता था . इस गाँव में कुछ तो ऐसा चल रहा था जिसे जानने के लिए मुझे यहाँ समय बिताना जरुरी था और उसके लिए मुझे किसी का साथ चाहिए था . मैं सीधा चंदा की झोपडी जा पहुंचा. मैंने पाया की वो वहां नहीं थी , पर शायद ये मेरा अंदाजा था , झोपडी के पीछे से गुनगुनाने की आवाज आई तो मैं दबे पाँव उस तरफ चल दिया.

दीन दुनिया से बेखबर उस भरी दोपहर में चंदा पत्थर पर बैठी नहा रही थी , पूर्ण रूप से नग्न चंदा की चिकनी पीठ मेरी तरफ थी और मैं दिल थामे उस दिलकश नजारे को देख रहा था . एडियो को घिसने के बाद वो खड़ी हो गयी और पानी बदन पर गिराने लगी. न जाने क्यों मुझे उन पानी की बूंदों से रश्क होने लगा. जब चंदा अपने घुटनों पर लगी साबुन को रगड़ने के लिए झुकी तो उसका पूरा पिछवाडा मेरी आँखों के सामने आ गया . उफ्फ्फ हुस्न क्या होता है मैंने उस लमहे में जाना .

मध्यम आकार के तरबूजो जैसे उसके नितम्ब और उनके बीच में दबी हुई उसकी काली चूत, जिस पर एक भी बाल का रेशा नहीं था . मेरा तो कलेजा ही मुह को आ गया पर मैं उस नज़ारे को ज्यादा देर तक अपनी आँखों में पनाह नहीं दे पाया क्योंकि उसका नहाना खत्म हो गया था मैं बाहर की तरफ आकर बैठ गया. कुछ देर बाद वो अपने गीले बालो का पानी झाड़ते हुए आई.

“तुम यहाँ ” उसने मुझे देख कर कहा

मैं- तुमसे मिलने का मन हुआ तो चला आया.

चंदा- क्यों मन किया तुम्हारा भला

मैं- किसी ने भूषण का क़त्ल कर दिया है

मेरी बात सुनकर चंदा के चेहरे पर एक रंग आकर चला गया फिर वो धीमी आवाज में बोली- बढ़िया हुआ, उस नीच को तो बहुत पहले मर जाना चाहिए था .

पिछली मुलाकात में ही मैं जान गया था की चंदा कोई खास पसंद नहीं करती थी भूषण को पर आज मैं जान गया की वो नफरत करती थी उस से .

मैं- इतनी नफरत क्यों करती थी तुम उस से

चंदा-उसकी वजह से मुझे हवेली से निकाला गया था .

मैं- क्यों

चंदा- रुपाली ठकुराइन अटूट विश्वास करती थी मुझ पर , जमीं की धूल को उठा कर हवेली ले गयी वो , धीरे धीरे हम दोनों नौकरानी-मालकिन की जगह दोस्त सी हो गयी थी . ये बात उस भूषण को ना पसंद थी न जाने क्यों वो नहीं चाहता था की हवेली में कोई और भी आये. उसने ठाकुर शौर्य सिंह के कान भरने शुरू कर दिए , पर ठाकुर साहब ने उसकी कोई ना सुनी पर एक रात उन्होंने मुझे अपने कमरे में बुलाया और .........

“और शौर्य सिंह ने तुम्हे रगड़ दिया ” मैंने उसकी बात पूरी की

चंदा कुछ नहीं बोली

मैं- अगर तुम शौर्य सिंह के बिस्तर तक जा पहुंची थी तो भूषण ने तुम्हे हवेली से निकलवा दिया ये बात झूठी साबित हो जाती है चंदा

मेरी बात सुनकर चंदा अपने बाल संवारने भूल गयी और मेरी तरफ देखने लगी.

चंदा- हवस इन लोगो के खून में दौड़ती है अर्जुन . इन लोगो के लिए कोई रिश्ता नाता मायने नहीं रखता इनको अगर कुछ चाहिए तो गर्म जिस्म जिसे ये अपनी मर्जी से जहाँ चाहे रौंद सके. ये बात पुरुषोत्तम के जन्मदिन की है, ठाकुर साहब चाहते थे की जन्म दिन मनाया जाये , जश्न ऐसा हो की सालो तक याद रखा जाये और हुआ भी ऐसा ही. सब काम निपटा कर मैं सोने ही जा रही थी की तभी किसी ने मेरा मुह दबा लिया और एक कोने में खींच लिया .

“कौन हो छोड़ो मुझे ” मैंने कहा पर उसने जैसे सुना ही नहीं उसके हाथ मेरे बदन को मसलने लगे, जिस बेबाकी से मेरे बदन को मसला जा रहा था मैं जान गयी थी की कोई ठाकुर परिवार का ही है , उसने मुझे घुटनों के बल झुकाया और अपना करने लगा पर एक बार से उसका मन नहीं भरा वो मुझे पास के कमरे में ले गया और फिर से चढ़ गया . सुबह जब मेरी आँख खुली तो हवेली में चीख पुकार मची हुई थी .हवेली के दिए बुझ गए थे.

“तुम आज तक नहीं जान पाई की वो कौन था जिसने तुम्हे चोदा उस रात ” मैंने चोदा शब्द पर जान बुझ कर जोर दिया .

चंदा- कैसे जान पाती मुझे लगा की ठाकुर के लडको में से कोई होगा पर वो तो खुद ही मर गए थे, हर किसी के मन में बस यही था की किसने ये काण्ड किया और फिर कुछ सोचने का मौका ही नहीं मिला ठाकुर साहब ने खून की नदिया बहा दी, रुपाली अपने कमरे में कैद होकर रह गयी .

मैं- और कामिनी उसका क्या हुआ

चंदा- कोई नहीं जानता कोई उसके बारे में कुछ कहता है कोई कुछ . रुपाली के जाने के बाद वहां जाने की वजह भी खत्म हो गयी चांदनी के पिता ने कब्ज़ा कर लिया और हवेली को अपने हाल पर छोड़ दिया गया

मैं-बताया था तुमने. वैसे तुमने कभी मालूम नहीं किया की रुपाली ठकुराइन कहाँ रहती है लंदन में

चंदा- मैं कभी शहर तक ना गयी तुम दुसरे देश का जिक्र करते हो

मैं- ऐसा कुछ जो कभी रुपाली ने तुमसे बताया हो .

चंदा- वो बस अपने पति के कातिल को तलाश करना चाहती थी .

मैं- क्या तुम मेरे साथ हवेली चलोगी



चंदा हैरान होकर मुझी देखने लगी.
 
#13

दो सवाल मेरे मन को बेहद परेशां किये हुए थे , पहला की मेरा इस हवेली से क्या ताल्लुक है और दूसरा की कामिनी कहाँ गयी, ठाकुर परिवार की एकलौती लड़की का यूँ गायब हो जाना सामान्य तो कभी भी नहीं रहा होगा पर उस रात ऐसा क्या हुआ था की जश्न की रात को कत्ल की रात बना दी गयी. जहाँ पर ऐसा काण्ड होता है वहां पर बेपनाह नफरत होती है, पैसो के लिए तो हरगिज नहीं किया गया ये काण्ड ये तो तय था . शौर्य सिंह के परिवार की जिस्मो के प्रति भूख जग जाहिर थी तो पहला पॉइंट मैं ये ही ले सकता था की किसी सताए हुए ने मौका देख कर मामले को निपटा दिया. पर किसने ये मुझे मालूम करना था .

रात को एक बार फिर मैं चंदा से बाते कर रहा था

मैं- पुरुषोत्तम के आलावा उसके दोनों भाई कैसे थे

चंदा- तेजवीर का अपना ही जलवा था , बड़े ठाकुर से कभी नहीं बनती थी उसकी वो जायदातर बाहर ही रहता था कभी कभी ही आता था हवेली में .

मैं- और कुलदीप

चंदा- हरामी था साला. हवेली की सभी नौकरानियो पर बुरी नजर थी उसकी, अपनी माँ का बहुत मुह लगा था वो .

मैं- अक्सर सबसे छोटी औलाद को माँ बाप का ज्यादा प्यार मिलता है

चंदा- विलायत से पढ़ कर आया था वो , विलायती बोली बोलता था बिलायती कपडे पहनता था वो , ज्यादातर वो अपने कमरे में ही घुसा रहता था पर अक्सर दोपहर को वो घुमने जाता था .

मैं- कहाँ पर

चंदा- ये नहीं मालूम पर ये उसका नियम था .

चंदा ने बातो के सिलसिले को आराम दिया और झोपडी के पीछे की तरफ चली गयी . कुछ देर बाद मुझे गुनगुनाने की आवाज आई मैं समझ गया की चंदा नहा रही है, न जाने क्यों उसे नग्न देखने की इच्छा को मैं रोक नहीं पाया. दबे पाँव मैं उस तरफ गया और लट्टू की पीली रौशनी में चंदा के बदन को देखने लगा. उसके बदन की कसावट गजब की थी शायद इतनी मेहनत करने की वजह से , प्रत्येक अंग जैसे सांचे में ढला था . तने हुए उरोज, पतली सी कमर , नितम्बो के आलावा और कहीं चर्बी नहीं थी, चालीस पैंतालीस की होने के बावजूद चंदा जवानी से भरपूर औरत थी .

खाना खाते वक्त मैंने सोचा की कल राशन लाकर रख दूंगा .

“आज बिस्तर अन्दर लगायेंगे, गाँव में जंगली सुअरों ने आतंक मचाया हुआ है , कल दो गाँव वालो को सोते हुए हमला कर गए. ” उसने कहा

“मैं गीले बालो में बला की खूबसूरत लगती हो तुम ” मैंने उस से कहा

चंदा ने मुझे गौर से देखा और बोली- किसी ज़माने में कहते तो मान लेती पर अब उम्र हो गयी है

मैं- उम्र से साथ साथ और गदरा गयी हो , ये मैं नहीं वो आदमी कह रहा था तुमसे

चंदा- कुछ बाते बताने की नहीं होती अर्जुन.

मैं- समझता हूँ

प्यास के मारे मेरी नींद उचटी , पानी पीकर वापिस आया तो मैंने पाया की चंदा बिस्तर पर नहीं थी .इतनी रात को उसका यूँ गायब होना अजीब ही लगा जबकि उसकी झोपडी के आस पास और कोई घर भी नहीं था . अगर चंदा का मन चुदाई का होता तो वो घर के पीछे भी करवा सकती थी , दूर जाने की क्या जरुरत हो सकती थी और अगर दूर गयी है तो उसका क्या मकसद हो सकता है . सोचते सोचते न जाने मुझे कब नींद आ गयी.

सुबह मैं गाँव में घुमने चला गया , चाय की दूकान के पास पहुंचा ही था की मैंने जय सिंह की गाड़ी को देखा , चांदनी ने बताया था की वो शहर जायेगा. मैंने कदम चांदनी के घर की तरफ बढ़ा दिए. मुझे देख कर वो हक्की बक्की रह गयी

“यहाँ क्यों आये तुम ” उसने कहा

मैं- मैं नहीं आया ये कमबख्त दिल ले आया

उसके होंठो पर मुस्कराहट आ गयी . उसने मुझे इशारा किया और हम चलते हुए उसके कमरे में आ गये.जितना सादगी भरा ये घर बहार से दीखता था अन्दर से मालूम हो की कोई राजा ही रहता हो ऐसी आलिशानता मैंने कही देखि ही नहीं थी .

“वो आये यूँ हमारे दर पर कभी हम उनको कभी इस दर को देखते है ” उसने कहा

मैं मुस्कुरा दिया.

चांदनी- नाश्ता करते है पहले फिर बाते करेंगे.

उसके एक इशारे पर दस्तरखान लग गए. इतने पकवान मैंने ब्याह शादियों में भी न खाए थे. उसके बाद चांदनी और मैं छत की तरफ आ गये.

मैं- एक बार ठाकुर साहब का दीदार करने की इच्छा थी .

चांदनी- फिर कभी , थोड़ी देर में डॉक्टर आएगा, हफ्ते में दो दिन आता है देखने के लिए. तुम थोडा इंतज़ार करो मैं नहा लेती हूँ फिर हवेली चलेंगे.

चांदनी चलने को हुई ही थी की मैंने उसका हाथ पकड़ लिया

“क्या हुआ ” उसने कहा

मैंने उसे अपनी तरफ खींचा और उसके होंठो को चूमने लगा वो मेरी बाँहों में मचलने लगी .

मैं- थोडा मीठा तो चाहिए था न

चांदनी - बेशर्म कहीं के .

लगभग आधे घंटे बाद हम लोग हवेली के उस जर्जर दरवाजे के सामने खड़े थे, चांदनी ने ताला खोला और हम लोग अन्दर आये. सामने की तरफ से मैं हवेली को पहली बार देख रहा था . एक तरफ शायद गाडिया खड़ी होती होंगी, दूसरी तरफ एक बड़ा सा विदेशी फव्वारा था जो अब सुखा पड़ा था .झूले थे .शायद ये बगीचा रहा होगा.

“आओ भी ” चांदनी ने कहा तो हम उस बड़े से दरवाजे को खोल कर अन्दर आ गए. अजीब सी घुटन ने एक बार फिर मुझे जैसे कुछ कहना चाहा.

चांदनी- कितनी मिटटी जमा है मालूम होता तो नौकरों को ले आते.

मैं- पिछली बार कब आई थी

चांदनी- शायद आठ-नौ साल पहले

अन्दर आने के बाद जितना चांदनी जानती थी उसने मुझे बताया, उसी ने बताया की ये पुरुषोत्तम की तस्वीर है ये तेज की और ये कुलदीप की . पुरुषोत्तम तीनो भाइयो में सबसे कमजोर था , वही कुलदीप किसी अँगरेज़ जैसा था .

“रुपाली या कामिनी की तस्वीरे नहीं है ” मैंने कहा

चांदनी मुझे सीढियों से होते हुए उस ऊपर की मंजिल पर ले गयी जहाँ पर लगातार चार कमरे बने थे .उसने एक कमरे का ताला खोला और अन्दर आ गए.

“ये कामिनी का कमरा है .” उसने कहा .

उसने एक तस्वीर की धुल साफ़ की फूलो के बगीचे में एक सांवली लड़की खड़ी थी . पहली नजर में कोई ये कह ही नहीं सकता था की ये लड़की ठाकुरों की बहन है , तीनो ठाकुर जहाँ बेहद गोरे थे कामिनी सांवली थी . ये कमरा कुछ अलग सा था , दिवार पर अख़बार की कतरने लगी थी जिन पर माधुरी और श्रीदेवी की फोटो लगी थी. एक टेपरिकार्डर रखा था जिसमे सेल नहीं थे. एक फूलदान था . टेबल पर शेरो-शायरियो की खूब किताबे पड़ी थी .


चांदनी ने अलमारी खोली और .........................
 
#14



चांदनी ने अलमारी खोली और एक पिस्तौल निचे गिर गयी. मैंने उसे उठा कर देखा विलायती पिस्तौल थी .

मैं- पहले कभी देखा इसे

चांदनी- नहीं , मैंने तो अलमारी यूँ ही खोली थी .

मैंने पिस्तौल को चेक दिया, आठ में से सात गोलिया थी,एक गोली गायब थी .

मैं- ठाकुरों को कैसे मारा गया था

चांदनी- गला दबा कर.

इसका मतलब साफ़ था की ये हथियार वो नहीं था बल्कि इसका होना न होना अब बराबर ही था. कामिनी के कपडे सलीकेदार थे पर उनसे अमीरी नहीं झलकती थी क्या हवेली की एकलौती लड़की पर पैसे खर्च नहीं किये जाते थे .

“कितना सुन्दर है न ये देखो अर्जुन ” चांदनी ने एक डिब्बा खोल लिया था जिसमे मोतियों के हार थे.

मैं- तुम चाहो तो रख सकती हो तुम्हारा ही हक़ है इनपर .

चांदनी- नहीं ,

उसने डिब्बा वापिस से रखा और अलमारी बंद कर दी. जब वो अलमारी बंद कर रही थी तो थोडा सा झुकी वो और मेरी नजर उसकी गोल गांड पर पड़ी. जवानी में कदम रखे ताजा हुस्न का अपना ही जलवा होता है , ऊपर से कसी हुई तंग सलवार में उसके नितम्बो की गोलाई कोई भी देखता तो दाद जरुर देता.

“कुलदीप का कमरा खोलो ” मैंने कहा

चांदनी- अर्जुन, मेरे पास बस इसी कमरे की चाबी है .

ये अजीब बात थी

“बाकि चाबिया कहाँ है फिर ” मैने पूछा

चांदनी- जबसे देखा है हवेली के जायदातर कमरों पर ताला ही देखा है . वैसे भी पिताजी के बाद शायद ही यहाँ पर कोई आया हो. पर मैं कोशिश करुँगी कुछ मिलता है तो बताउंगी

हम लोग सबसे ऊपर की मंजिल पर गए , जहाँ पर एक कमरे का दरवाजा खुला था . ये कमरा थोडा अलग सा था ,इसकी बनावट बेहद शानदार थी लकड़ी की नक्काशी का इतना शानदार काम नहीं हो सकता था वक्त की धुल बेशक अपने पाँव जमाये हुए थी पर फिर भी तारीफ उस कारीगर की जिसने यहाँ अपने कला के जोहर बिखेरे होंगे. ऐसा शानदार पलंग जिसके पायो में सोना लगा था . पर मेरी नजर उस खिड़की पर थी जिस से बाहर का मेन गेट दीखता था .

“जय सिंह कभी हवेली की बात करता है क्या तुमसे ” मैंने कहा

चांदनी- भैया नफरत करते है हवेली से वो मानते है की पिताजी को ये हवेली ही खा गयी.

मै समझता था पिता को खोने का दुःख मैंने उसका हाथ पकड़ा और बोला- ये हवेली अगर मुझे मेरे राज बताएगी तो तुम्हे तुम्हारे पिता का राज भी बताएगी. पर तुम्हे उसके लिए प्रयास करना होगा चांदनी

वो- क्या करना होगा.

मैं- ठाकुर साहब के पास इतनी जायदाद थी , जो काफी हद तक बिक गयी थी . पर फिर भी ठाकुरों ये वर्तमान पीढ़ी यानी की तुम लोग किसी राजा महाराजा जैसा जीवन जी रहे हो पैसा , कहाँ से आता है ये पैसा.

चांदनी- हमारे कुछ होटल है शहर में और शराब की फैक्ट्री आदि है . ब्याज पर भी पैसा दिया जाता है . पिताजी के जाने के बाद जय भैया ने व्यापर को अपने दम पर बहुत आगे कर दिया है .

मैं- हवेली के दो मुख्य नौकर थे भूषण और चंदा, भूषण को हाल ही में मार दिया गया . चंदा ने हवेली छोड़ दी थी . मुझे लगता है की भूषण को मारने वाला नहीं चाहता होगा की वो कुछ भी बताये

चांदनी- पर क्यों , इतने साल बाद ही यो जबकि भूषण सबसे कमजोर शिकार था .

मैं- इतने साल से कोई आया भी तो नहीं हवेली, कोई तो है जो नहीं चाहता की ये हवेली आबाद हो , इसमें हलचल हो . कोई तो है जो इस मनहूसियत को चाहता है .

चांदनी- पर कौन

मैं- मालूम कर लूँगा.

हम दोनों ने काफी वक्त बिताया वहां पर इतना तो तय था की बरसों से कोई आया गया नहीं था वहां पर . चांदनी के जाने के बाद मैं सीधा भूषण की झोपडी में पहुंचा पर शायद मुझसे पहले कोई और भी आकर चला गया था सामान इधर -उधर पड़ा था , कोई तो था ये शक मेरा और पुख्ता हो गया था . कोई तो था जो नजर रखे हुए था . खैर,मेरा पैर एक डिबिया पर पड़ा तो मैंने उसे उठाया उसमे एक पुराणी तस्वीर थी जिसे गौर से देखने पर मैंने पाया की ये तो कामिनी की तस्वीर है ,

“भूषण का कामिनी से क्या लेना देना ” मैंने खुद से सवाल किया और उस तस्वीर को अपनी जेब में रख लिया. इस हवेली से मेरा क्या नाता है ये सोचते सोचते सर में दर्द हो गया . मैंने दूकान से राशन का सामान ख़रीदा और चंदा के घर पहुँच गया .

“इसकी क्या जरुरत थी ” उसने कहा

मैं- इतना तो फर्ज है मेरा

मैंने झोला दिया उसे, जब वो झोला पकड रही थी तो उसका आंचल सरक गया मेरी नजर उसकी छात्तियो पर पड़ी. चंदा को भी भान था पर उसने आंचल की परवाह नहीं की बल्कि पूरा समय लेकर मुझे दीदार करवाया उसके हुस्न के जलवे का . वो चाय बनाने लगी मैं पीछे की तरफ हाथ मुह धोने लगा. मैंने देखा की डोरी पर चंदा की कच्छी सूख रही थी जो चूत वाली जगह से फटी हुई थी . मैंने इधर उधर देखा और उसे हल्का सा सहलाया , कसम से गर्मी के मौसम में मैंने अपने बदन को कांपते हुए महसूस किया.

मैं- ठाकुर की जमीने देखना चाहता हूँ मैं.

चंदा- जिधर तुम्हारी नजर जाये उसी तरफ देख लो सब जमीने उनकी थी किसी ज़माने में

मैं- जानता हूँ ठाकुर साहब ने काफी जमीने बेच दी थी पर थोड़ी बहुत कुछ तो बची ही होंगी न.

चंदा- जो बचा था वो ठाकुर के भतीजे ने हथिया लिया था ठाकुर को परवाह भी नहीं थी , वैसे भी हादसे के बाद वो कर ही क्या लेता उसका होना न होना बराबर ही है . कुछ एकड़ बंजर भूमि बची है चाहो तो देख कर तसल्ली कर सकते हो .



चंदा ने मुझे बताया उस जमीनों के बारे में चाय पीकर मैं उस तरफ चल दिया . करीब आधे घंटे बाद मैं उस जगह पहुंचा तो पाया की वो जमीनों का टुकड़ा देख रेख के आभाव में बर्बाद हो चूका था , पम्प हाउस था , कुवे में पानी था पर जैसा मैंने कहा किसीको परवाह ही नहीं रही होगी. कमरे पर एक पुराने ज़माने का ताला लगा था जंग खाया हुआ . मैंने इधर उधर देखा और जेब से चाबी निकाल कर उस ताले में डाली जैसे ही चाबी को घुमाया........................
 
#१५



“खट ” की आवाज से ताला खुल गया , मैं इतना हैरान हुआ की साला ये हो क्या रहा है मुझे अमानत के रूप में इस बियाबान पंप हाउस के ताले की चाबी दी गयी थी .किस्मत गधे के लंड से लिखा जाना क्या होता है मैंने तब समझा था . धुल की वजह से खांसते हुए मैंने कमरे का दरवाजा खोला और अन्दर दाखिल हुआ. अन्दर का नजारा देख कर मुझे समझ नहीं आया की माजरा क्या है, कमरे में एक प्लास्टिक की पल्ली बिछी हुई थी, मिटटी जमा होने के बाद भी मैंने समझ लिया था की खून बिखरा था उस पर .

गाढ़ा खून जो न जाने कब बिखरा था पर आज भी निशान छोड़े हुए था , दीवारों पर भी कुछ उंगलियों के निशान थे खून से सने पर हैरानी की बात ये थी की दरवाजे या उसके आसपास खून का एक भी कतरा नहीं था .उस पल्ली के सिवाय और ज्यादा कुछ था नहीं , एक कोने में घास का गट्ठर था जो नाम मात्र का ही रह गया था . कमरे में अजीब सी बदबू थी शायद सीलन की वजह पर ये कमरा इतना महत्वपूर्ण कैसे था की इसकी चाबी मुझे दी गयी . और चाबी देने वालो को क्या वो उद्देश्य मालूम था की मुझे चाबी क्यों दी गयी .

पैरो को इधर उधर पटक रहा था की मेरे पैर में घास के तिनको के बीच कुछ अटका, मैंने उठा कर देखा एक गुलाबी रंग की ब्रा थी . ब्रा, मैं गारंटी से कह सकता था की ये ब्रा हवेली की ही किसी औरत की रही होगी. क्योंकि आमतौर पर गाँवो की औरते ब्रा का इस्तेमाल नहीं करती दूसरी बात ये बहुत महंगी रही होगी क्योंकि इस पर अंग्रेजी का मार्का था.ब्रा से मैं चुचियो के साइज का अनुमान लगाने लगा की वो कितनी बड़ी रही होंगी.

मैंने कमरे में और गहराई से निरिक्षण चालु किया मुझे एक किताब मिली जिसके पीले पड़ गए पन्ने जर्जर अवस्था में थे, कुछ पन्ने सलामत थे उन्हें देख कर समझा की वो चुदाई की किताब थी और मुझे यकीन था की वो किताब कुलदीप ठाकुर की थी क्योंकि किताब अंग्रेजी में थी , कुलदीप जरुर विलायत से ये लाया होगा. तीनो ठाकुरों का एक साथ मर जाना सामान्य तो बिलकुल नहीं था पर मारे जाने की वजह एक रही होगी. हवेली में कुछ तो ऐसा चल रहा था जो समझ से परे था. रुपाली और कामिनी दो महत्वपूर्ण कडिया गायब थी .

मैंने कमरे के दरवाजे को खुला ही छोड़ दिया , जानबूझ कर खेल के छिपे हुए खिलाडी को संदेसा देने के लिए की मेरी भी नजर है उस पर. कुलदीप बहुत चोदु टाइप का इन्सान था ये चंदा ने मुझे बताया था , और जिस तरह से उसने बात घुमाई थी मैं जानता था की चंदा को भी पेला था उसने. हो सकता था की कुलदीप घुमने के बहाने यही पर आता हो और गाँव की औरतो को चोदता हो. ज़िन्दगी ने अजीब झमेले को मेरे गले में डाल दिया था .

चंदा के पास वापिस जाने का मन नही था तो मैं अपने गान वापिस लौट आया , घर पर न लखन था न निर्मला . मैंने गेट खोला और अन्दर आ गया. मरते हुए बापू ने बस एक शब्द कहा था हवेली, मतलब बापू हवेली से जुड़ा था पर कैसे. जितना उसका रुतबा था उस हिसाब से ये तो हो नहीं सकता था की वो ठाकुर के लिए काम करता हो. कहीं वो ठाकुर के किसी धंधे में साथी तो नहीं था , वो मुझे क्यों लेकर आया.एक अनाथ को अपने घर में क्यों रखेगा जब तक की उस नन्ही जान से लगाव न हो. मात्र दया तो कारण नहीं हो सकता था .

बापू वो कड़ी था जो मेरे और हवेली के बीच था , मैंने बापू के अतीत को तलाशने की सोची. मैंने फिर से बापू के सामान की तलाशी ली , एक बहुत पुरानी डायरी में मुझे एक फ़ोन नम्बर मिला. डायरी लगभग सत्रह साल पुराणी थी . सत्रह साल पहले भला कितने लोगो के घर पर फ़ोन होंगे. दूसरी बात इस घर में तो क्या पुरे गाँव में किसी के पास भी फ़ोन नहीं था . मैंने वो नम्बर याद कर लिया. पूरी डायरी में बस एक फ़ोन नम्बर जिसे इतनी हिफाजत से संभल कर रखा गया था . कोई तो खास रहा होगा.

मैं एक एसटीडी बूथ पर गया वो नम्बर मिलाया, पर वो मिला नहीं दूसरी बात कोशिश की , तीसरी बार घंटी चली गयी . घंटी जाती रही , जाती रही और जब लगा की कोई नहीं उठाएगा ठीक उसी समय फोन उठा लिया गया .

“हेल्लो ” जो आवाज मेरे कानो में गूंजी दिल तक उतर गयी .

“हेल्लो, बोलो भी ”दूसरी तरफ से फिर आवाज आई .

मैं- चांदनी ठकुराइन

“बोल रही हु, कहिये ” उसने कहा

मैं बस फ़ोन रखने को ही था की उधर से आई आवाज ने मुझे रोक लिया

“अर्जुन ये तुम हो न ” उसका ये कहना सीधा दिल में ही तो उतर गया था .

“अर्जुन तुम ही हो न ” उसने फिर कहा

मैं- और कौन होगा मेरे सिवाय

वो- तुमको किसने दिया नम्बर मेरा और कहाँ से बोल रहे हो तुम

मैं- ढूंढने वाले खुदा को तलाश लेते है ये तो मेरी जान का नम्बर है

वो- अच्छा जी . ये भी न सोचा की फ़ोन जय भैया भी उठा सकते थे

मैं- मैं क्या डरता हूँ उससे

वो- मैंने कब कहा

मैं- याद आ रही थी तुम्हारी

वो- भैया आ गये रखती हूँ .



तुरंत ही फ़ोन कट गया . पर मेरे लिए बहुत सवाल खड़े हो गए थे चांदनी के घर का फोन नम्बर बापू की डायरी में सम्भाल कर रखा गया था . बात साफ़ थी बापू का ताल्लुक जरुर था वहां से पर कैसे वो अब मैं मालूम करके ही रहूँगा.
 
#16



कुछ देर बाद निर्मला आई तो मैं कमरे से बाहर आया, हमारी नजरे मिली और ग्लानी के मारे मेरी नजरे झुक गयी .

“कल जो किया उसके लिए मैं शर्मिंदा हूँ ” मैंने कहा

निर्मला- क्या हुआ था कल मुझे तो याद नहीं .

वो ऊपर छत की तरफ चली गयी मैं उसके पीछे गया.

“कुछ चीजो का कोई मलाल नहीं होना चाहिए ” उसने कहा

मैं- मलाल करना एक संकेत होता है वर्ना वो चीजे दोहराई भी जा सकती है .

निर्मला ने कुछ जोरो से साँस ली , लगा की ब्लाउज के बटन उस दबाव को सही ही नहीं पाएंगे

निर्मला- जीवन अस्थिर होता है , जीवन में बहुत कुछ ऐसा होता है जो बस हो जाता है हालातो पर जोर नहीं चलता. हालात रजा को रंक बना देते है . हालात जीवन को न जाने किस दिशा में मोड़ दे कौन जाने .

मुझे लगा के एक पल के लिए निर्मला कहीं खो सी गयी हो. पर तुरंत ही उसने बदली- अजित सिंह गाँव वालो के साथ ठीक नहीं कर रहा है उसने वादा किया था की पुराने कर्ज माफ़ करेगा पर वो गाँव वालो की जमीने अपने नाम कर रहा है , सुनने में आया है की गाँव में शराब की फैक्ट्री लगाएगा. ऐसा हुआ तो गाँव मुश्किल में पड़ जायेगा.

मैं- मैं बात करूँगा उस से . वैसे तुम बापू के बहुत करीब थी . तुम उनके बारे में कुछ बता सकती हो मुझे , उनके निजी जीवन के बारे में

निर्मला- तुमको ऐसा क्यों लगता है की मैं सरपंच जी को उस तरह से जानती हु.

मैं- बस लगता है .

निर्मला- सरपंच जी के अहसान रहे है मुझ पर उन्होंने मुझे ठिकाना दिया . उन्होंने काम दिया जीवन जीने की राह दिखाई. नौकर होते हुए भी बराबर का दर्जा दिया हम तो कभी भी उनके अहसान चूका ही नहीं पाएंगे.

मैं- कुछ ऐसा जो मुझे जानना चाहिए मतलब बापू के कौन दोस्त थे , किन किन लोगो के साथ उठाना बैठना था

निर्मला- बहुत लोग थे ऐसे तो

मैं- मेरी बात समझो निजी दोस्त, क्या बापू ठाकुर शौर्य सिंह के भतीजे का दोस्त था .

निर्मला- मुझे नहीं लगता ऐसा कुछ था .

मैं- बापू की मौत कोई दुर्घटना नहीं थी उनका क़त्ल हुआ था और कातिल को मैं पकड कर ही रहूँगा हर हाल में

तभी पड़ोस से कोई औरत निर्मला को बुलाने आई तो हमारी बात अधूरी रह गयी मैं सोचने लगा की फिर बापू की डायरी में वो नम्बर क्यों था . अगले दिन मैं फिर से चंदा की झोपडी में पहुँच गया . मैंने उसे झोला दिया

चंदा- क्या है ये

मैं- खोल कर देखो

जैसे ही चंदा ने झोला खोला , नए कपडे देख कर वो हैरान हो गयी.

चंदा- इसकी क्या जरुरत थी

मैं- नहीं थी फिर भी रख लो.

उसने झोला ऊपर खूँटी पर रखा और बोली- खाना खाओगे अभी बनाया ही है

मैं- भूख नहीं है अभी तो वैसे मैंने सुना है की जय सिंह ठाकुरों की बची सारी जमीन बेच रहा है

चंदा- बचा ही क्या है जो बेचेगा. मालिक के नाम जो भी जमीन थी उसे तो तुम कल देख ही आये होगे, बंजर जमीन कोई क्यों खरीदेगा. सारा माल तो जय सिंह के बाप ने हडप लिया था . ले दे कर एक हवेली ही बची है वो भी ये इसलिए नहीं बेच सकते की वो रुपाली ठकुराइन के नाम है . हादसे से कुछ दिन पहले ही वसीयत रुपाली के नाम करवा दी गयी थी .

मैं- तुम को कैसे मालूम

चंदा- मैं वहीँ पर थी , मेरे सामने ही वकील आया था

मैं- क्या नाम था उसका

चंदा- नहीं जानती . हमारी इतनी हिम्मत कहाँ थी सवाल कर सके वो तो मैं चाय लेकर गयी थी तब ठाकुर साहब और वकील की बाते सुन ली थी .

मैं- दिखने में कैसा था वो वकील

चंदा- भद्दा सा मोटा सा सर के बाल उड़े हुए .

चंदा ने जो विवरण दिया था वो रमेशा चंद से मिलता था पर कचहरी में उस नाम का कोई नहीं था . वो सकता था की उसने फर्जी नाम से मुलाकात की हो . मैंने एक बार फिर से कचहरी जाने का सोचा.

मैं- मेरे साथ हवेली चलोगी.

चंदा - कभी नहीं

मैं- क्यों

चंदा- क्योंकि हवेली मनहूस है . जो भी वहां पर जाता है लौट कर नहीं आता . जो हवेली उसमे रहने वालो का खून पि गयी वो दुसरो को कैसे बक्शेगी मैं तुमसे भी कहती हूँ अर्जुन तुम्हारा जो भी उद्देश्य है उसे छोड़ दो. हवेली किसी की नहीं हुई तुम्हे भी वहां कुछ नहीं मिलेगा .तुम अपनी पहचान तलाशने आये हो , इतनी बड़ी बात तुमने मुझको बताई. अर्जुन तुम्हारी पहचान हवेली से नहीं है उस बाप से है जिसने तुझे अपना नाम दिया.

मैं- फिर भी

चंदा- सच तुम्हारी आँखों के सामने है अर्जुन ,और वो बहुत घिनोना है . इतना घिनोना की तुम्हारी आत्मा तक पुकार उठेगी, तुम भी जानते हो तुम दो तरह से हवेली से जुड़ सकते हो या तो तुम रुपाली के बेटे हो या फिर कामिनी के और दोनों ही सुरत में तुम एक नाजायज औलाद हो. रुपाली एक विधवा थी और कामिनी बिन ब्याही .

पलक झपकते ही चंदा ने मुझे ऐसा आइना दिखा दिया था जिसमे सच को देखना आसान नहीं था .

“जीवन अस्थिर होता है , जीवन में बहुत कुछ ऐसा होता है जो बस हो जाता है हालातो पर जोर नहीं चलता. तुम चाहो तो यही पर सब कुछ भूल कर उसी जिन्दगी में लौट सकते हो जो आजतक जीते हुए आये हो पर अगर कीचड़ में उतरना ही है तो फिर क्या सुनना क्या कहना . हवेली ने किसी को सुख नहीं दिया तुम अपने हिस्से का दुःख वहां तलाश सकते हो . ” चंदा ने कहा और झोपडी के पीछे चली गयी .

एक बार फिर से मैं हवेली में मोजूद था हवाओ से, इन दीवारों से पूछने के लिए की ऐसा क्या देखा था इन्होने, ऐसा क्या हुआ था . मैंने एक ताले को तोडा और अन्दर दाखिल हुआ , ये बहुत सुन्दर कमरा था . टेबल पर रखी तस्वीर से ही मालूम हो गया था की ये कुलदीप ठाकुर का कमरा है. हर चीज इतनी नजाकत से रखी गयी थी पर सावधानी के साथ भी अलमारी में ताला था . टेबल की ड्रावर भी लॉक्ड थी .गद्दे को पलट कर देखा कुछ नोटों के सिवाय कुछ नहीं .



“चाबिया क्यों नहीं है ” मुझे कोफ़्त सी होने लगी थी . अलमारी के ऊपर कुछ डिब्बे रखे थे जूतों के मैंने उनको देखा . कुलदीप की हर चीज रईसी दिखाती थी चूँकि वो विदेश में रहता था इसलिए. एक जूते के डिब्बे में मुझे चाबी मिली. मैंने अलमारी में लगा कर देखि , किस्मत से खुल गयी.अलमारी में कपडे थे, कपूर की महक आज भी बरक़रार थी . विदेशी रुपयों के बण्डल. दुसरे खाने में तरह तरह की घडिया थी , इत्र थे . तीसरे खाने में मुझे अश्लील चित्रों भरी किताबे मिली और एक काले रंग की कच्छी जो सिल्क की थी . मैने उसे बिस्तर पर रखा और देखने लगा. कच्छी की एलास्टिक के पास अंग्रेजी में एल लिखा हुआ था . मैंने महसूस किया की इसे पहनने वाली औरत की गांड मोटी रही होगी. पम्प हाउस में मुझे ब्रांडेड ब्रा मिली थी और कुलदीप के कमरे में कच्छी और इस पुरे गाँव में दो ही औरते थी जो ब्रांडेड सामान का इस्तेमाल कर सकती थी , रुपाली या फिर कामिनी.....................
 
#17



हवेली की ख़ामोशी बता रही थी की बहुत कुछ है इसके पास सुनाने को पर क्या मैं वो सही आदमी था, शायद ये भी ऐसा ही सोच रही होगी. कुलदीप रसिया टाइप था ये तो कन्फर्म हो चूका था पर वो हवेली में किसे पेल रहा था ये जानना न जाने क्यों जरूरी सा लगा. भूसन जो जानकारी दे सकता था उसे पहले ही निपटा दिया गया था . मैंने अगले कमरे के ताले को भी तोड़ दिया.

ये कमरा सबसे अलग था, सबसे जुदा. इसे देख कर इसमें रहने वाले की सकशियत का अंदाजा लगाना मुश्किल था कमरे में बड़ी सी टेबल पर बहुत सारी शराब की बोतले सजी थी . एक भी अलमारी नहीं थी कुछ जोड़ी कपडे जो खूँटी पर ही टाँगे गए थे. ऐसा भी भला क्या नशा जिसमे ठाकुर तेज ने खुद को डुबो दिया था. मैंने कमरे को खूब छाना पर यहाँ तो कुछ भी नहीं था . सोचते सोचते मेरा दिमाग ख़राब होने लगा था , मैंने एक बोतल खोली और दो पेग लगाये, इतनी बढ़िया शराब मैंने कभी भी नहीं पी थी तो उसका असर बढ़िया से हुआ.

नींद टूटी तो मैं बहुत ही घबरा गया , चारो तरफ गहरा अंधेरा पसरा हुआ था , कुछ समय लगा खुद को ये याद दिलाने में की मैं कहाँ पर हूँ . जी बहुत घबरा गया था दिन की बात अलग थी पर बरसों से वीरान पड़ी ईमारत में रात के न जाने कितने बजे मैं अकेला था ये ख्याल ही मूत निकालने को काफी था . दिल जोरो से धड़क रहा था , ऐसा लगने लगा था की अभी कोई मुझे पकड़ लेगा.

कमरे से निकल कर मैं लोब्बी में आया सीढियों की तरफ पैर रखे ही थे की अचानक से हुई जोर की आवाज ने मेरी आत्मा तक को कांपने पर मजबूर कर दिया.

“tannnnnnnnnnnnn ” कुछ इतनी जोर से गिरा था की उसकी आवाज ने हवेली की नींव तक को हिला कर रख दिया होगा. मैं बता नहीं सकता की कैसे मैंने अपने दिल को दौरा पड़ने से रोका होगा पर साथ ही इस शोर ने मुझे ये भी बता दिया था की मैं अकेला नहीं हूँ इस हवेली में. कौन होगा इस खयाल ने ही मुझे रोमांचित कर दिया था . आँखों को मसला और अँधेरे में देखने का अभ्यस्त होते ही मैं दबे पाँव निचे की तरफ आया.

मैंने हर तरफ तलाश की पर जिसने शोर के साथ अपनी आमद मह्सुश करवाई थी वो ख़ामोशी में खो चूका था . दबे पाँव किसी का हवेली में आना वो भी इतनी रात किसलिए. बाकी की रात मुझे एक पल के लिए भी नींद नहीं आई. सुबह जैसे ही रौशनी हुई मैंने तहकीकात की , जो भी था पैसो के लिए तो बिलकुल नहीं आया था हवेली में. क्योंकि कमरों में जो भी पैसे थी उनको छुआ भी नहीं गया था . तो फिर किस चीज की तलाश थी उसे.

मुझे चांदनी से इस बारे में बात करने की जरुरत महसूस हुई और जब हम लाल मंदिर पर मिले तो इस से पहले की मैं उसे कुछ कह पाता उसने मुझे अपनी बात से उलझन में डाल दिया.

चांदनी- अर्जुन, पता नहीं ये बात कैसी है पर अजीब जरुर है पिछली कुछ रातो से लगभग आधी रात को हमारे फ़ोन पर घंटी आती है

मैं- हाँ तो फ़ोन पर घंटी ही आएगी न

चांदनी- तू समझ नहीं रहा है , अर्जुन आधी रात को कोई क्यों किसी के घर पर फोन करेगा जबकि उसे बात ही न करनी हो

मैं- मतलब

चांदनी- रिंग आती है कट जाती है , फ़ोन उठाओ तो कोई बोलता नहीं .

मै- हो सकता है की तेरे भाई को करता हो कोई फ़ोन

चांदनी- पर रात को ही क्यों

मैं- क्योंकि कुछ बाते रात को ही हो सकती है लाडली

चांदनी- मुझे नहीं लगता क्योंकि कभी कभी भैया रात को नहीं होते तब भी ऐसा होता है .

मैं- तूने गौर किया कब से हो रहा है ऐसा

चांदनी- कुछ दिनों से .

मैं- तू सुन , अबकी बार तू फ़ोन उठाने बिलकुल मत जाना तू बस देखना की फ़ोन आने के बाद क्या होता है . दूसरी बात इस गाँव के लोगो को तू ज्यादा जानती है कोशिश कर की गाँव में कुछ भी अजीब हो रहा है क्या और हो सके तो चंदा को नौकरानी रख ले तेरे पास .

चांदनी- क्यों

मैं- कर तो सही ऐसा तू खुद समझ जाएगी.

चांदनी- तुझे लगता है ऐसा करना सही होगा .

मैं- मुझ पर भरोसा कर सकती है तू वैसे तुझे बता दू लाडली की कोई तो है की जो नहीं चाहता की हवेली की ख़ामोशी टूटे.

चांदनी ने अपने मुह पर हाथ रख लिया. मैंने उसके माथे को चूमा और बोला- हम दोनों की मंजिल एक ही है और हम दोनों इस सफ़र को साथ पूरा करेंगे.

न जाने क्यों मुझे चांदनी का साथ इतना अजीज लगने लगा था . उसका होना मुझे बहुत राहत देता था . शाम को मैं चंदा की झोपडी पर पहुंचा वो मोजूद नहीं थी हाथ पाँव धोने एक बाद मैं अन्दर गया और न जाने क्यों मेरा मन हुआ की उसके सामान की तलाशी ली जाये. पलंग के निचे एक संदूक पड़ी थी जिस पर ताला नहीं था ये जानते हुए भी की वो कभी भी आ सकती थी मैंने संदूक को खोल कर देखने का निर्णय लिया



संदूक में काफी चीजे थी ,एक तस्वीर थी जिसमे चंदा एक लड़की के साथ थी , एक जवान लड़की के साथ . चांदी के चार कड़े थे, एक गले में पहनने का कुछ था . हवेली की नौकरानी थी मालिको की बक्सिश रही होगी . पर जिस चीज ने मेरा ध्यान खींचा वो मुझे हैरान कर रही थी , चुदाई की तस्वीरों वाली एक पूरी किताब जिसके पन्ने बता रहे थे की ये भी पुराणी ही है . नौकरानी के सामान में वो किताब होना सवाल बन गया था ......................
 
#18



चंदा के सामान पर नजर गडाए मैं गहरी सोच में डूबा था, वक्त के हाथो फिसली रेत में मुझे उस सुराग की तलाश थी जो हवेली की ख़ामोशी को चीखो में बदल देता. अपने वजूद की तलाश में मैं यहाँ तक आ तो गया था पर आगे बढ़ना आसान तो नहीं था . खैर, मैंने चंदा का सामान वापिस रखा और सोचने लगा की वो लड़की कौन हो सकती थी जो तस्वीर में थी , जहाँ तक मेरा अनुमान था किसी भी काण्ड के पीछे केवल तीन चीजे हो सकती थी जर, जोरू और जमीन .

हवेली के मामले में यही थ्योरी मेरी उलझन बढ़ा रही थी क्योंकि ठाकुरों के पास अथाह जमीने थी, ना ही पैसो की कोई कमी थी और चूत तो वो जिसकी चाहे मार सकते थे तो फिर आखिर ऐसा क्या हुआ था की जिसने हवेली की खुशियों को मातम में बदल दिया था , यदि ये तीन वजह नहीं थी तो फिर क्या था . पर क्या मैं गलत था मुझे चंदा ने बताया था की ठाकुर के भतीजे ने धोखे से जमीनों को हडप कर बेच दिया था ले देकर थोड़ी बहुत जमीन बची थी और फिर वो भतीजा भी गायब हो गया था . मैंने इसी कड़ी पर चलने की सोची दूसरी बात भूषण को क्यों मारा गया उसके पास ऐसा क्या था .

खैर, जब मैं गाँव वापिस आया तो एक अलग ही मुसीबत मेरा इंतज़ार कर रही थी , पता चला की अजित सिंह ने गाँव के कुछ लोगो से मारपीट की है . सरपंची का नशा सर चढ़ चूका था गाँव की बहन-बेटी संग भी बदतमीजी करने लगा था वो . हालाँकि मैं अजित सिंह पर ध्यान नहीं देना चाहता था पर हालातो से मुह भी नहीं मोड़ सकता था . मैं एक बार फिर उसके घर गया वो तो नहीं मिला पर उसका बाप जरुर था .

मैं- काका , न चाहते हुए भी मुझे आना पड़ा अजित के बहकते कदमो को रोकिये सारी बाते माफ़ हो सकती है पर अपने ही गाँव की बहन-बेटियों पर बुरी नजर है उसकी , भीखू की लड़की की चुन्नी खींची उसने भरी चौपाल पर . ठीक नहीं है ये बात , समझाओ उसे.

काका- तेरी बात सही है बेटा पर वो हमारे कहे में नहीं रहा . तुझे क्या लगता है हमें न पता ये सब बाते पर क्या करे बिगड़ी हुई औलाद की करतुते झेलना बाप के लिए कितना मुश्किल है हम ही जानते है

मैं-फिर भी कोशिश करना काका , कहीं ऐसा न हो की फिर सँभालने को कुछ बचे ही नहीं .

मैंने अपनी तरफ से इशारा तो दे दिया था पर जानता था की टकराव आज नही तो कल हो गा ही. शाम को एक बार फिर मैं अपने घर में न जाने क्या तलाश कर रहा था , ठाकुर शौर्य सिंह का नम्बर अगर बापू के पास था तो दोनों में कोई गहरी बात जुडी रही होगी इसी के इर्द-गिर्द मुझे अपनी खोज शुरू करनी थी . सोच में डूबा ही था की निर्मला आ गयी . उसके खूबसूरत चेहरे पर नजर पड़ी तो दिल ठहर सा गया .

“कब आते हो कब जाते हो कोई खबर नहीं ” उसने कहा

मैं- उलझा हूँ कुछ कामो में तुम बताओ कैसी हो

निर्मला- जैसी पहले थी वैसी ही हूँ.

मैं- लखन कहा है

निर्मला- शराबी का कहाँ ठिकाना होता है पड़ा होगा कहीं पीकर

मैं- कभी कभी सोचता हूँ लखन से ब्याह करके तुमने गलत किया ,

निर्मला- भाग्य से कहाँ कोई जीत पाया है भला. पर खुश हूँ , बेशक दारू पीता हो पर कभी तंग तो नहीं करता मुझे

मैं- सो तो है

जबसे मैंने निर्मला के होंठ चूमे थे हम दोनों से बच रहे थे एक दुसरे से सीधी नजरे मिलाने से पर मेरे दिमाग में ये बात भी थी की जब ये पहले से ही किसी और से चुद रही है तो मेरे लेने से इसको क्या फर्क पड़ जायेगा. पर शायद कुछ तो ऐसा था जो मेरे गले नहीं उतर रहा था , दरअसल बापू के साथ हुए हादसे ने मुझे हिला कर रख दिया था दूसरा हवेली के तार मुझे परेशां किये हुए थे और दूर दूर तक कोई राह दिख भी तो नहीं रही थी .

निर्मला- क्या सोचने लगे, आजकल न जाने किस चिंता में खोये रहते हो .

मैं- बापू को मारने की साजिश किसने की होगी, मुझे अजीत पर शक है

निर्मला- मुझे नहीं लगता ऐसा , मैं एक बार फिर कहूँगी की उनको ऐसा करना होता तो कब का कर चुके होते इतना इंतज़ार क्यों किया

मैं- यही पर तो अटका हूँ मैं .

निर्मला-सरपंच जी की मौत का कारण चुनाव नहीं थे

मैं- पर कौन हो सकता है , जिस आदमी का कभी कोई दुश्मन नही रहा उसके खिलाफ ऐसी साजिश कौन करेगा

निर्मला- हर किसी की अपनी कहानी होती है जिसे केवल वो जानता है

मैं- तुम्हारी भी ऐसी कोई कहानी है क्या

निर्मला- ये तो सामने वाले पर निर्भर करता है की वो किस नजरिये से देखता है . मैं तुम्हे एक बात बताती हूँ की सरपंच जी और ठाकुर शौर्य सिंह का भतीजा बहुत गहरे मित्र थे .

निर्मला की इस बात ने मुझे ज्यादा हैरान तो नहीं किया पर उत्सुकता को जरूर बढ़ा दिया.

मैं- कैसे, मुझे तो मालूम हुआ है की अजीत के परिवार से हवेली के तालुकात बहुत घनिष्ट रहे है

निर्मला- सबके अपने अपने फ़साने होते है

मैं- तुम्हारे फ़साने क्या है

निर्मला-मेरे क्या फ़साने होंगे भला

मैं- तुम रुपाली ठकुराइन को जानती हो

निर्मला- शायद हाँ शायद न



निर्मला तभी कुछ उठाने के लिए झुकी और उसके ब्लाउज से बाहर को छलकती छातियो ने मेरी नजरो को पकड़ लिया वो भी जानती थी पर उसने खास तवज्जो नहीं दी उस बात को और बोली - अपने वजूद को अगर पाना है तो वक्त के आईने की धुल साफ़ करनी होगी , हवेली से जुड़े सच हवेली में ही दफ़न है ..
 
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