Adultery प्रीत +दिल अपना प्रीत पराई 2 - Page 11 - SexBaba
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Adultery प्रीत +दिल अपना प्रीत पराई 2

#5



पर गाडी के पास कोई नहीं था , थोड़ी दूर झाड़ियो में कुछ हलचल हो रही थी मैं दबे पाँव उस तरफ बढ़ा तो मैंने देखा की चाचा किसी आदमी से बात कर रहे थे , मैं थोडा दूर था इसलिए सुन नहीं पा रहा था पर उस अजीब से कपडे पहने आदमी को चाचा शायद कुछ समझाना चाह रहेथे उनके हाथो के इशारे इस प्रकार के ही थे.

फिर चाचा ने जेब से निकाल कर उसे कुछ पैसे दिए . मेरे लिए ये थोडा अजीब था क्योंकि चाचा एक अजीब ही प्रकार का चुतिया टाइप इन्सान था जो कालेज और खुद की लाइब्रेरी के सिवाय कही नहीं आता जाता था , पर फिर उनकी बाते खतम हो गयी और चचा गाड़ी की तरफ आने लगा तो मैं खिसक गया वहां से पर दिमाग में सवाल था की क्या बात कर रहा था .

सोचते सोचते मैं खेत पर आ पहुंचा , मौसम थोडा ठंडा हो चला था मैंने चारपाई बाहर निकाली और उस पर पसर गया. आस पास गहरा सन्नाटा लिए हवा लहरा रही थी . बस मैं था और ये तमाम जहाँ की तन्हाई , मेरे दिमाग में पिताजी के कहे शब्द गूँज रहे थे , “दिल्ली या बम्बई एक जगह चुन लो जहाँ तुम्हे आगे पढने जाना है ”

ऐसा नहीं था की मुझे पढाई में दिलचस्पी नहीं रही थी बस मैं यहाँ से दूर नहीं जाना चाहता था क्योंकि मैं सोचता था की पढाई के लिए बड़े कालेज का होना जरुरी नहीं है , साधारण सरकारी कालेज की डिग्री का भी उतना ही महत्त्व होता है . पर बाप को कौन समझाए . सोचते सोचते कब अँधेरा हो गया मालूम ही नहीं हुआ. मैंने उठ कर बल्ब जलाया , मन नहाने का था तो पानी की खेली में उतर गया . ठन्डे पानी ने मेरे सुलगते विचारो को राहत दी.

गले तक पानी में डूबा मैं एक बार फिर से उस लहराते आँचल की छाँव को महसूस करने लगा. गीले बालो की उस खुशबु को मैं भूल कर भी नहीं भुला पा रहा था . मेरी आँखों के सामने बार बार वो सांवला चेहरा आकर खड़ा हो जाता था , वो मर्ग नयनी आँखे जैसे सीधा मेरे दिल में झांकती थी , वो होंठ जैसे कुछ कहना चाहते हो .

“किस ख्याल में खोये हो बरखुर दार ” चाची की आवाज ने मेरी तन्द्रा भंग की , मैं चौंक गया .

“आप यहाँ ” मैंने सवाल किया

चाची- क्यों नहीं आ सकती क्या , वैसे मेरा ही खेत है

मैं- हाँ आपका ही है मेरा वो मतलब नहीं था मैं कहना चाहता था की रात घिर आई आप यहाँ क्या कर रही है आपको तो घर होना चाहिए था न .

मेरे यहाँ होने की वजह है घी का पीपा जो मैं दोपहर को भूल गयी थी ले जाना , चली तो शाम को ही थी रस्ते में मेरी एक सहेली के यहाँ बैठ गयी तो देर हो गयी , इधर आई तो रौशनी देख कर समझी तुम यही पर हो

मैं- ठीक है बस चलते है घर थोड़ी देर में

चाची- बेशक, वैसे तुम्हे मालूम तो होगा ही

मैं- क्या हुआ

चाची- अरे वो , बिमला थी न ,हलवाई की घरवाली वो किसी के साथ भाग गयी, गाँव में बड़ा शोर हुआ पड़ा है ,

मैं- शोर किसलिए उसकी मर्जी वो भागे या न भागे

चाची- कितना भोला है तू कब समझेगा तू दुनियादारी

मैं- चाची, उसकी जिन्दगी है वो चाहे कैसे भी जिए

चाची- समाज भी कुछ होता है , समाज के नियमो से दुनिया बंधी है

मैं- कोई और बात करते है

चाची- वैसे बहुरानी बता रही थी पूरी रात चोबारे में गाने बजते है आजकल क्या बात है

चाची ने चुटकी लेते हुए कहा

मैं- गाने सुनते सुनते आँख लग गयी थी तो बजता रहा बाजा , वैसे भी आवाज बेहद धीमी थी तो किसी को परेशानी नहीं हुई

“हाय रे ये लड़का ” चाची ने अपने माथे पर हाथ मारा

चाची- तू नहा ले तब तक मैं अन्दर होकर आती हु,

चाची अन्दर की तरफ जाने को दो कदम चली ही थी की तभी उसका पैर फिसला और वो गीली जमीन पर गिर गयी .

“आह , मैं तो मरी ” चाची चिल्लाई

मैं तुरंत खेली से बाहर निकला और चाची को उठाया

चाची- आह, लगता है टखना मुड गया मेरा तो आह्ह्ह्हह्ह

मैं- रुको जरा , देखने दो .

“मुढे पर बिठा मुझे जरा ” चाची ने कराहते हुए कहा .

मैंने चाची को बिठाया और चाची के कदमो में बैठते हुए उनके पांव को देखने लगा. इसी बीच चाची का लहंगा थोडा सा ऊँचा हो गया . बल्ब की रौशनी में मेरी नजर चाची की दोनों टांगो के बीच पहुँच गयी. बेहद गोरी जांघे मांस से भरी हुई , कांपते हुए हाथो से मैंने चाची के टखने को पकड़ा और कस कर दबाया .

“आईईईइ ” चाची जोर से चिल्लाई

मैं- बस हो गया .

मैंने टखने को घुमाते हुए कहा था . दरअसल मैं मोच देख रहा था पर मेरी आँखे कुछ और देख रही थी , न जाने मुझमे इतनी हिम्मत कहा से आ गयी थी मैंने चाची के पैर को उठा कर खुद के कंधे पर रखा चाची का लहंगा उनके पेट तक उठ गया और मैं उनकी दोनों नंगी जांघो को देख रहा और उस काली जालीदार कच्छी को भी जिसने उनकी योनी को छुपाया हुआ था .

मैंने देखा चाची की आँखे बंद दी. मैंने एक बार फिर से टखने को दबाया .

“आह, बस यही है दर्द ” चाची ने कहा .

मैं- बस हो गया .

मैंने अपना दूसरा हाथ चाची की ठोस जांघ पर रखा और कस कर उस मांसल भाग को दबाया. मैंने अपने निशान चाची की जांघो पर छपते हुए देखा. मेरी धडकने ईस्ट अरह भाग रहीथी जैसे की उन्हें कोई मैडल जीतना हो. पर तभी चाची ने अपनी आँखों को खोला और उनकी नजर मेरे उत्तेजित लिंग पर पड़ी, और दूसरी नजर उनकी अपनी हालत पर पड़ी जिसमे वो निचे से लगभग नंगी थी .

“हाय दैया ” चाची ने शर्म से अपनी आँखे मूँद ली और मैं वापिस बाहर भाग गया . ऐसा लग रहा था की दिल सीना फाड़ कर बाहर गिर जायेगा. उस से भी जायदा मुझे डर था की चाची मुझ पर गुस्सा करेंगी . मैंने जल्दी से गीला कच्छा फेंका और अपने कपडे पहन लिए. बेशक मैं अभी नहाया था पर अब डर से मुझे पसीना आने लगा. कुछ देर बाद चाची ने मुझे अन्दर आने को कहा तो मैं डरते हुए अन्दर गया .

चाची- तेरे दबाने से राहत तो हुई है मुझे लगता है मोच नहीं आई

मैं- घर चल कर मालिश करवा लेना आराम होगा .

चाची- दर्द हो रहा है घर तक कैसे चल पाऊँगी

मैं- साइकिल पर बिठा ले चलूँगा , घी कोई और ले जायेगा

चाची- ठीक है

मैंने चाची को सहारा देकर बाहर तक लाया और कमरे को ताला लगाया. पर चाची को पीछे बैठने में थोड़ी परेशानी हो रही थी .

मैं- एक काम करो आगे बैठ जाओ

चाची- न कोई देखेगा तो क्या कहेगा.

मैं- चारो तरफ अँधेरा है कौन देखेगा और बस्ती से पहले उतर जाना .

कुछ सोचकर चाची ने हाँ कह दी . मैंने चाची को साइकिल के डंडे पर बिठाया इसी बहाने मेरे हाथ उनके कुलहो को छू गए . उनकी आह को मैंने सुना . पैडल मारते हुए मेरे पैर बार बार चाची के कुलहो को छू रहे थे , उनके बदन की पसीने से भरी खुसबू मुझे पागल कर रही थी एक बार फिर मैं उत्तेजित होने लगा था और इसी उत्तेजना में ........ .....



...................... .
 
#6



और इसी उत्तेजना में साइकिल का संतुलन बिगड़ गया और मैं चाची को लिए लिए ही कच्चे रस्ते पर गिर गया . बेशक रास्ता कच्चा था पर कंकड़ की रगड़ ने मेरी पिंडी को घायल कर दिया था . दूसरी तरफ चाची कराह रही थी .

“मुझे मालूम था तू यही करेगा ” चाची मुझे गालिया देते हुए कोसने लगी. बड़ी मुश्किल से मैं उठ पाया. मालूम हुआ की पेडल का नुकीला हिस्सा मांस में धंस गया था , ऊपर से चाची न जाने क्या क्या बक रही थी . पर तभी कुछ ऐसा हुआ जिसने मेरा ध्यान चाची से हटा दिया .

ऐसा लगा की मेरी आँखों में रौशनी पड़ी हो, इस रात में इस सुनसान में ऐसा होना मुमकिन नहीं था क्योंकि अक्सर इसके लिए तेज धुप और किसी प्रवार्त्तित करने वाले साधन की जरुरत होती है , पर ये मेरा वहम नहीं था ,

क्योंकि मैंने दूर वो चमकती आभा फिर देखी जिसकी चमक मेरी आँखों में पड़ी थी और न जाने मुझे क्या हुआ चाची को वहीँ पर छोड़ कर मैं उस तरफ चल दिया. जैसे मुझे अब और किसी की कोई परवाह ही नहीं थी .

“अब कहाँ जा रहा है तू ” चाची चिल्लाई पर क्या ही फर्क पड़ना था . वो चीखती रही मुझे कोसती रही पर कोई क्या ही करे जब नसीब ने एक नया रास्ता तलाश लिया हो . धीरे धीरे जैसे ये जहाँ ही पीछे छूट गया हो , मैं चलते चलते जब वहां पहुंचा तो मैंने देखा की वो एक पुराना कुवा था . जिसे मैंने शायद ही कभी पहले देखा हो .

वो लड़की हाँ वही लड़की कुवे से पानी खींच रही थी .पास ही एक लालटेन मंदी लौ में जल रही थी . और मुझे बिलकुल भी समझ नहीं आया , आप ही सोचिये गर्मियों की एक उमस भरी रात में एक बियाबान कुवे पर पानी खींचती एक लड़की को अचानक देख कर आप क्या सोचेंगे, पर शायद मैं ही वहां पर अचानक से पहुँच गया था .

“तुम यहाँ इस वक्त ” उसने पूछा मुझसे .

अब मैं क्या कहता उस से .

“आप भी तो है यहाँ है ” मैंने कहा

वो- मेरा होना न होना क्या फर्क पड़ता है

मैं- पर अब जब हम दोनों इस पल यहाँ है तो फर्क पड़ता है

“तुम्हारे पैर से तो खून बह रहा है , क्या हुआ कैसे लगी ये चोट तुम्हे ” एक ही साँस में उसने बहुत सवाल पूछ लिए.

मैं- कुछ नहीं ठीक हो जायेगा

वो- देखने दो जरा मुझे

उसने मुझे एक पत्थर पर बैठने को कहा और मेरे पैर को देखने लगी .

“कुछ गहरा चुभा है, जख्म अन्दर तक हुआ है , रुमाल है क्या तुम्हारे पास ” उसने कहा.

मैंने जेब से रुमाल उसे दिया उसने वो जख्म पर कस कर बाँधा और बोली- डॉक्टर को दिखा लेना इसे, लगता है टाँके आयेंगे.

मैं- दिखा लूँगा पर फिलहाल मैं ये जानना चाहता हूँ की इस बियाबान में इतनी रात आप क्या कर रही है , एक मटके पानी के लिए इतनी दूर आना, जबकि पानी तो रोज ही घर आता है .रात को ऐसे अकेले घूमना ठीक नहीं

वो- तुम लड़के हो तो इतनी रात को घूम सकते हो पर मैं नहीं घूम सकती क्योंकि मैं लड़की हूँ .

तुरंत ही मुझे मेरी गलती का अहसास हुआ

मैं- मेरा वो मतलब नहीं था

वो- जानती हूँ , आओ मेरे साथ .

उसने मटका उठाया और मेरे आगे चल पड़ी. उसकी पायल की आवाज अँधेरे में गूंजने लगी . जल्दी ही हम दोनों उस जगह पर खड़े थे जहाँ से न जाने मैं कितनी बार गुजरा था पर आज ये रात मुझे वो सिखाने वाली थी वो अहसास जगाने वाली थी जो आने वाले समय के मायने बदल देने वाली थी .

हम दोनों एक मूर्ति के सामने खड़े थे . लालटेन की रौशनी में मैंने देखा पत्थर पर लिखा था , “ सहीद हवालदार बलकार सिंह ”

“ये मेरा फौजी है , मेरे बाबा ” उसने गहरी सांस लेते हुए कहा .

“वो कुवा मेरे बाबा ने खोदा था , अक्सर जब भी मैं उदास होती हूँ मैं वहां से मटका भर लाती हूँ , ऐसा लगता है जैसे बाबा ने सर पर हाथ रख दिया हो बहुत छोटी थी मैं जब वो हमें छोड़ गए . बस अहसास है की उन चमकते तारो से आज भी वो मुझे देखते होंगे. ” उसकी आवाज भर्रा आई थी .

मैंने उसके हाथ को कस कर थाम लिया .मैंने देखा उसकी नाकाम कोशिश को जो वो अपने आंसू छुपाने की कर रही थी .

“बैठो मेरे पास ” मैंने उसके आंसू पोंछते हुए कहा और हम वही उस दहलीज पर बैठ गए.

“खुशकिस्मत हो आप , एक महान योद्धा की बेटी हो ” ,मैंने कहा

“बिन बाप की बेटी होना अपने आप में बदकिस्मती होता है ” उसने कहा

“आपकी इस तकलीफ को मैं कम तो नहीं कर सकता पर आपके दर्द को बाँट जरुर सकता हूँ , एक फौजी की बेटी है आप कमजोर तो हो नहीं सकती ” मैंने कहा

वो- फौजी की बेटी , शहीद की बेटी जमाना एक अरसे पहले भूल चूका है इन बातो को .

उसने फीकी मुस्कान से कहा.

मैं- ज़माने से क्या फर्क पड़ता है , आप तो नहीं भूली, वो आपके दिल में जिन्दा है और रहेंगे ,और इन दो चार मुलाकातों में मैं इतना तो जान चूका हूँ की एक दिन ऐसा भी आएगा जब ये ही जमाना कहेगा देखो ये है बलकार सिंह की बेटी .

“मैं वो ख्वाब हूँ जो किसी ने न देखा ” उसने कहा

मैं- आप वो किस्सा हो जिसे आने वाली पीढ़ी सुनेगी . मेरी ये बात याद रखना मैं नहीं जानता आपका और मेरा आज क्या रिश्ता है पर मैं आप से ये वादा करता हूँ आज के बाद आप कभी अकेली नहीं होंगी , किसी भी राह पर आप चलेंगी, किसी भी डगर पर आप लड़खड़ाई मैं कहीं भी रहू या न रहू आपको थाम लूँगा .

मैंने उसका हाथ थाम कर कहा.

लालटेन की रौशनी में उसके चेहरे पर उस लम्हे में जो मुस्कान आई थी , करोडो रूपये, हीरे जवाहरात भी उसका मोल नहीं कर सकते थे .

“रात बहुत हुई मैं आपको घर छोड़ देता हूँ ” मैंने कहा

उसने हाँ में गर्दन हिलाई और हम उसके घर की तरफ चल पड़े.

“बस यही , ” उसने गली के मुहाने पर कहा

मैं उसे छोड़कर मुड़ा ही था की पीछे से उसने कहा ,”मीता नाम है मेरा ”

“हम फिर कब मिलेंगे ” मैंने उस से पूछा

मीता- जल्दी ही




उस रात बड़ी अच्छी नींद आई मुझे पर मैं कहाँ जानता था आने वाली सुबह मेरे लिए क्या लेकर आई थी .
 
#7

“पिताजी बुला रहे है तुम्हे निचे ”भाभी ने मुझे उठाते हुए कहा .

“इतनी सुबह भला मुझसे क्या काम उनको, आप जाओ मुझे सोने दो ” मैंने प्रतिकार करते हुए कहा .

भाभी- अभी बुलाया है चलो जल्दी

न चाहते हुए भी एक हसीं नींद का साथ छोड़ कर मैं निचे आया . देखा हमेशा की तरह पिताजी अख़बार पढ़ते हुए नाश्ता कर रहे थे . उन्होंने मुझे देखा और पास बैठने को कहा.

“जैसा हमने कहा था , दाखिले के लिए फॉर्म मंगवा लिए है दिल्ली या बम्बई जहाँ तुमहरा मन करे वहां केलिए फॉर्म भर कर दे दो हम आगे भिजवा देंगे ” पिताजी ने कहा

मैं- पिताजी, मुझे नहीं जाना कहीं भी

पिताजी ने अपना चश्मा उतारा और घुर कर देखा मुझे

“तो क्या करोगे, यहाँ दिन भर आवारागर्दी करोगे, हम चाहते है की अच्छे से पढ़ लिख कर हमारे काम को आगे ले जाओ तुम, तुम्हारा भाई कितनी मेहनत करता है तुम्हे उसके कंधे से कन्धा मिला कर चलना चाहिए पर वो तो उम्मीद ही क्या करे तुमसे. ” पिताजी ने सख्त लहजे में कहा

मैं- पिताजी माफ़ी चाहूँगा , पर ना मुझे इस धंधे में कोई इंटरेस्ट है और न मुझे बाहर पढने जाना है .

“हमें न सुनने की आदत नहीं है , शाम तक इन फॉर्म पर तुम्हारे दस्तखत और मंजूरी हो जानी चाहिए ” पिताजी ने कहा

मैं- ऐसा नहीं होगा .

“सटाक ”

इस से आगे मैं कुछ नहीं कह पाया .

”गुस्ताख तेरी इतनी हिम्मत जो इनके सामने आवाज ऊँची करे ” माँ ने मेरे गाल पर थप्पड़ मारते हुए कहा . ये पहली बार हुआ था जो मेरी माँ ने मुझ पर हाथ उठाया था , सभी लोग एकदम से सकते में आ गए .

माँ- जब इन्होने कहा की तुझे बाहर जाना है तो मतलब जाना है

मेरी आँखों में आंसू आ गए , गला भर आया मैं कहना तो बहुत कुछ चाहता था पर मैंने दिल में बात दबा ली और घर से बाहर निकल आया .

घर से तो निकल आये पर जाए तो कहाँ जाये . कहने को तो सब कुछ था पर मैं जानता था जिंदगी में एक दिन ऐसा आएगा जब मुझे मेरे परिवार के बड़े नाम और मेरे जमीर में से एक को चुनना पड़ेगा. मैं चाहता ही नहीं था उस शान शोकत को , हर उस चीज़ को जो मुझे याद दिलाती थी की मेरा बाप कितना रसूखदार है . मैं बस मैं ही रहना चाहता था

अपने ख्यालो में भटकते हुए मैंने उसी आदमी को देखा जो प्रोफेसर साहब के साथ था उस दिन . अपना झोला टाँगे वो बड़ी जल्दी जल्दी कही जा रहा था , कोतुहलवश मैंने निश्चित दुरी बना कर उसका पीछा करना शुरू कर दिया . और उसकी हरकतों ने मुझे पूरा मौका दिया उसका पीछा करने का . वो ठीक उसी कुवे पर गया जहाँ कल रात मीता ने पानी का घड़ा भरा था . उसने झोले से निकाल कर एक बोतल भरी और जंगल की तरफ जाने लगा .

करीब घंटे भर तक वो आगे मैं पीछे चलता रहा और फिर मैंने वो देखा जो मुझे जरा भी अंदाजा नहीं था ये बंजारों का टोला था . वो टोले में चला गया पर मैं किनारे पर रुक गया क्योंकि बंजारे अनजान लोगो को ज्यादा पसंद नहीं करते थे .

अब मैं करता भी क्या , बस वापिस लौट ही जाना था पर कहते हैं न जब किस्मत खुद कहानी लिखती है तो अपने अंदाज में लिखती है , कच्ची सड़क पर तेजी से एक गाडी गुजरी जो सीधा टोले में गयी और ये गाड़ी किसी और की नहीं बल्कि चाचा की थी , मेरे प्रोफेसर चाचा, जो अलग ही मिजाज के थे और ये हरकते उनके मिजाज के बिलकुल माफिक नहीं थी . अब मेरी उत्सुकता और बढ़ गयी थी मैंने पक्का इरादा कर लिया की ये चल क्या रहा है,

मैं तुरंत वहां से वापिस हो लिया अब मुझे मिलना था चाची से . पर वो घर पर नहीं थी , न जाने मुझे क्या सुझा मैं उस कमरे की तरफ गया जो चाचा का पुस्तकालय थी पर अफ़सोस उस पर लॉक था .

“चाबी कहाँ होगी ” मैंने अपने आप से पूछा .

खैर मुझे चाची से मिलना था तो मैं यही बैठ गया . अचानक से ही मेरे मन में एक विचार उठा और मैं चाची के कमरे में गया . मैंने तकिये उठाकर देखे पर कुछ नहीं था . और जीवन में मैंने पहली बार ऐसी हरकत की जो किसी भी लिहाज से उचित नहीं थी . मैंने चाची की अलमारी खोली.

ऊपर से निचे तक कपडे ही कपडे भरे पड़े थे . फिर मैंने उसका ऊपर वाला हिस्सा खोला और मेरी आँखों में चमक आ गयी . वहां वो ही किताब रखी थी जो उस रात चाची देख रही थी . कांपते हाथो से मैंने उसके पन्ने पलटने शुरू किये और मेरी आँखों में अजीब सी चमक आ गयी . ढेरो रंगीन पन्ने जिसमे नंगे आदमी औरत तरह तरह के पोज में एक दुसरे संग काम क्रीडा कर रहे थे न जाने क्या सोच कर मैंने वो किताब अपनी पॉकेट में रख ली. और चाची का इंतज़ार करने लगा.

कुछ देर बाद चाची आई मैंने जो उसे देखा देखता ही रहगया . नीली साडी में क्या गजब लग रही थी वो . कसा हुआ ब्लाउज जिसमे से उठे दो पर्वत जैसे कह रहे हो आ नाप हमारी गहराई

“तू कब आया ” चाची ने कहा

मैं- थोड़ी देर हुई

चाची- अच्छा हुआ तू अपने आप आ गया सुबह से तुझे ही ढूंढ रही हूँ एक तो मुझे गिरा दिया. कितनी लगी मुझे और फिर वही छोड़ कर भाग गया तू

मैं- मैं घबरा गया था चाची .

चाची- तब नहीं घबराया जब बुलंद दरवाजा देख रहा था .

मैं क्या कहा आपने

चाची- कुछ नहीं , चाय बनाती हूँ तेरे लिए

मैं- नहीं चाय नहीं . मुझे कुछ किताबे चाहिए थी चाचा की लाइब्रेरी से

चाची- वो आये तब ले जाना , चाबी उनके पास ही रहती है उसकी .

मैं- ठीक है तो फिर चलता हु मैं .

चाची- तुझे मालूम है आज क्या हुआ

मैं- नहीं तो .

चाची- किस दुनिया में रहता है तू , गाँव के बैंक में चोरी हो गयी

मैं- गाँव के बैंक में चोरी, क्या मजाक है चाची, कौन मुर्ख करेगा ये वैसे ही गाँव के बैंक में कहाँ पैसे है , किसानो के कर्जो की फाइल के अलावा और है ही क्या

चाची- ताज्जुब की बात ये है की पैसे या कागज कुछ भी चोरी नहीं हुआ

मैं ये सुनकर हैरान हुआ .

“तो भला कैसी चोरी हुई ये . ” मैंने सवाल किया .

चाची- एक लाकर में चोरी हुई है .

.... चाची की बात ने मुझे और हैरान कर दिया .
 
#8

“जेठ जी के लाकर में चोरी हुई है ” चाची ने मुझे बताया

मैं- किसकी इतनी मजाल होगी जो ततैये के छत्ते में हाथ डालेगा, और पिताजी ने भला लाकर में क्या रखा होगा .

चाची- वो तो मैं नहीं जानती की क्या रखा होगा पर कुछ महत्वपूर्ण ही रहा होगा क्योंकि जेठ जी थोड़े से विचलित थे.

मैं- ठीक है मैं घर जा रहा हूँ चाचा आयेंगे तो आऊंगा

चाची- रुक न मेरे पास,

मैं- अभी नहीं बाद में आता हूँ .

मैंने एक नजर चाची के ब्लाउज से बाहर झांकती चुचियो पर डाली और वहां से निकल गया . घर आया तो मैंने पाया एक गहरी ख़ामोशी छाई हुई थी जैसे की बरसो से यहाँ पर कोई रहता नहीं हो मैं सीधा भाभी के पास गया .

“कहाँ थे तुम ” भाभी ने कहा

मैं- चाची के पास

भाभी- ओह , मुझे फ़िक्र हो रही थी .

मैं- मैंने सुना किसी ने पिताजी के लाकर में चोरी कर ली

भाभी- तुम्हारे भैया लगे है उसी में जल्दी ही मालूम हो जायेगा.

मैं- क्या फर्क पड़ जायेगा और पिताजी को क्या फर्क पड़ जायेगा अगर कोई उनकी दौलत से थोडा बहुत चुरा ले

भाभी- तुम्हे क्या लगता है पिताजी को पैसो की परवाह है , जबकि पैसे की चोरी हुई ही नहीं

मैं- तो क्या चुराया चोर ने

भाभी- एक मुट्ठी राख

“किस किस्म इ बकवास है ये, राख की चोरी और भला लाकर में कोई राख रखता है क्या . ” मैंने कहा

भाभी- पिताजी से ही क्यों नहीं पूछ लेते तुम फिर .

मैं- मुझे क्या लेना देना फिलहाल मुझे भूख लगी है खाना लगा दो मेरे लिए

भाभी- आज खाना नहीं बना घर में ,

मैं- बढ़िया

मैंने कहा और भाभी के कमरे से बाहर निकलने लगा .

भाभी- अब तुम कहाँ चले

मैं- कभी कभी लगता है ये मेरा घर नहीं है

मैं वहां से बाहर आ गया. शाम और धुंधली हो गयी थी . रात दस्तक देने को चोखट पर खड़ी थी . मैंने अपनी साइकिल उठाई और खेतो की तरफ निकल गया . पर मेरे नसीब में कुछ और ही लिखा था .रस्ते में मेरे दोस्त मिल गए उन्होंने बताया की आज पडोसी गाँव में जीमने का न्योता है किसी शादी में और वो वही जा रहे है , मुझे भी भूख लगी थी मैं उनके साथ हो लिया .

काफी दिनों बाद शादी की दावत में मौज उड़ाई थी तो खाना थोडा ज्यादा हो गया . वही पर दस से ऊपर का समय हो गया था जब हम वापिस चले. पर कुछ दूर चलते ही मेरी साइकिल पंक्चर हो गयी . मैंने दोस्तों को आगे बढ़ने को कहा और पैदल ही साइकिल को खींचते हुए गाँव की तरफ बढ़ने लगा. वो कहते है न की जिंदगी जब मारती है तो जोर से मारती है वहीँ कुछ अपनी हालत भी थी .

तनहा रात , गर्म चलती हवा और बेचैन दिल संभाले मैं बस चले जा रहा था , अपने गाँव की सीम में घुसते ही मैंने घर जाने के बजाय कुवे पर जाने का सोचा . पर जैसा मैंने कहा जिन्दगी .........

मैंने जो कच्चा रास्ता लिया था उसी पर कुछ आगे चलते हुए मुझे प्रोफेसर साहब की गाड़ी खड़ी दिखी. और पिछले कुछ दिनों में ऐसा लगातार हो रहा था जब चाचा और मैं एक दुसरे के आस पास ही थे . मैंने साइकिल एक ओर फेंकी और गाड़ी के पास जाकर देखा तो बस वो गाड़ी ही थी वहां पर .मैंने तुरंत चाचा की तलाश की . आगे बढ़ने पर कुछ झुरमुटो के पार मुझे आंच सी जलती दिखी . मैं दबे पाँव उधर बढ़ा तो देखा की आग के पास दो लोग बैठे थे . चाचा और वो ही आदमी

“क्या कर रहे है ये दोनों ” मैंने अपने आप से कहा क्योंकि वो कुछ कर ही नहीं रहे थे वो बस आग के पास बैठे थे. कभी वो ऊपर आसमान में देखते तो कभी आंच को .बहुत देर तक वो बस ऐसा ही करते रहे हाँ जब भी आग बुझने को होती वो और लकडिया उसमे डाल कर उसे सुलगा देते. बहुत देर तक बस ऐसा ही चलता रहा . फिर चाचा ने नोटों की गद्दी उस आदमी को दी और दोनों ने अपना अपना रास्ता पकड़ लिया. उनके जाने के बाद मैं उस आग के पास गया . मैंने भी आग और आसमान को देखा . दिल में अब बड़ी जिज्ञासा थी की आखिर चाचा कर क्या रहा है .

पर ये रात यु ही बीत जाती तो भला क्या खास होती. जब मैं कुवे पर पहुंचा तो रौशनी जल रही थी मतलब यहाँ कोई और भी था . मैंने देखा पिताजी शराब पी रहे थे , ऐसा बहुत कम होता था जब हम उन्हें शराब के नशे में देखते थे पर आज वो दिन नहीं था . मेरा यहाँ से चलना ही ठीक रहता पर तभी उन्होंने मुझे देख लिया

“इधर आओ ” उन्होंने कुछ तेज आवाज में कहा

मैं उनके पास गया .

“आपको कुछ चाहिए ” मैंने कहा

पिताजी- मुझे , मुझे क्या चाहिए कुछ भी तो नहीं

मैं- मैं बस ऐसे ही आ गया था पर अब घर जा रहा हूँ

पिताजी- तुम्हे क्या लगता है तुम्हारा बाप चुतिया है , ये जगह जिस से तुम्हे इतना लगाव है एक दौर था जब मैं भी बस यही रहता था . ये और बात है की जमाना बदल गया और हम भी . तुम, तुम्हारी बहुत बाते हमें दुखी करती है पर तुम्हारी यही खूबी तुम्हे खास बनाती है की इस जगह से तुम्हे भी लगाव है .

“”क्या ये जगह ख़ास है मैंने पूछा

“तुम सोच भी नहीं सकते उस से ज्यादा खास ” पिताजी ने शराब अपने गले से निचे करते हुए कहा .

“खैर, छोड़ो तुमने क्या फैसला किया ” उन्होंने कहा

मैं- किस बारे में

पिताजी- तुम्हरे बम्बई जाने के बारे में

मैं- मुझे मजबूर न कीजिये, आपकी इच्छा का एक बार मान रखा था आज तक उसका मोल चूका रहा हूँ, मुझे जिंदगी जीने दीजिये .

पिताजी- तुम्हारी जिंदगी के लिए ही तो मैं कह रहा हूँ बेटे यहां से दूर चले जाओ .

मैं- मेरी कोई जिंदगी नहीं है पिताजी और मुझे अब चलना चाहिए


मैं उठा और अंधेरे ने मुझे अपने आगोश में भर लिया.
 
#9

आँख खुली तो पाया की सूरज सर पर चढ़ आया है , पंखा बंद था यानि की बिजली नहीं थी , उबासी लेते हुए मैंने बिस्तर छोड़ा और छज्जे पर आया . निचे भाभी आंगन में कुछ काम कर रही थी . गोर चेहरे पर सुनहरी धुप जैसे सितम ही ढा रही थी . हमारी नजरे मिली . वो मुस्कुराई और मैं छज्जे से हट गया .

मैं निचे आया और घर से बाहर निकल ही रहा था की उन्होंने आवाज दी .

“देवर जी रुको ”

मैं- मुझे देर हो रही है

भाभी- ऐसा कोई काम नहीं तुम्हे जो देर हो

मैं- फिर भी मुझे जाना है

भाभी- नाश्ता करके जाओ. मुझे मालूम है कल से कुछ नहीं खाया तुमने .

मैं- उसकी जरुरत नहीं फिलहाल मुझे जाना है

भाभी मेरे पास आई

भाभी- कितना दूर भागोगे

मैं- क्या करू इस घर में मेरा जी नहीं लगता . मेरे लिए ये सब बेगाना है ये मेरी मज़बूरी है की बार बार मुझे यहाँ लौट आना होता है

भाभी- जानती हूँ , भला मुझसे ज्यादा कौन समझता है तुम्हे

मैं बस मुस्कुरा दिया.

भाभी ने एक आह भरी और बोली- रोटी से भला कैसा बैर तुम्हे तो पसंद है न मेरे हाथ का बना खाना , तुम हम सब से नफरत कर सकते हो पर खाने से बैर न करो

मैं- नफरत अगर कर पाता तो ये घर , घर नहीं होता . आप कहती है , आप जानती है और मुझसे ही पूछती है . मुझे मेरे हाल पर छोड़ क्यों नहीं देती आप .

भाभी- क्योंकि तुम्हे इस तरह टूटते हुए नहीं देख सकती मैं, जिंदगी बस ये ही नहीं है जो तुम देख रहे हो , जिंदगी वो है जो हम सब जी रहे है .

मैं- फ़िलहाल तो यूँ है की कुछ कर नहीं सकते.

भाभी- तुम्हारे भैया भी कल से भूखे है , तुम जानते हो जब तक उन्हें मालूम न हो की तुमने खाना खा लिया वो भी नहीं खाते

मैं- इसमें मेरा क्या दोष भला

भाभी- दोष तो उनका भी नहीं है , तो उन्हें क्यों सजा दे रहे हो तुम

मैं- मैं बस खुद को सजा दे रहा हूँ भाभी . आप सब अपनी जिन्दगी जिए मुझे मेरे हाल पर छोड़ दे.

मैंने कहा और घर से बाहर निकल गया . मैं चाची के घर गया तो प्रोफेसर साहब वही पर थे .

चाचा- अरे मेरे शेर, कितने दिन हुए मिलते ही नहीं हो तुम

मैं- बस ऐसे ही

चाचा-- तुम्हारी चाची कह रही थी तुम्हे कुछ किताबे चाहिए.

मैं- जी

चाचा- मुझे बताओ मैं निकाल देता हूँ

मैंने दो चार किताबे यु ही बता दी उन्होंने. वो अन्दर चले गए. मैंने देखा की चाची के माथे पर तनाव था .

मैं- चाची क्या हुआ

चाची- कुछ नहीं

मैं- बताओ भी

चाची के बोलने से पहले ही चाचा किताबे लेकर आ गए तो बात अधूरी रह गयी .

चाचा- भाई जी , कह रहे थे की तुम बम्बई जा रहे हो

मैं- नहीं बिलकुल नहीं , पिताजी चाहते है पर मैं नहीं जाने वाला

चाचा- पर इसमें गलत क्या है

मैं- जब अपने शहर में कालेज है तो वहां क्या जाना

चाचा- भाई जी ने कुछ सोच कर ही निर्णय लिया होगा

मैं- बाद में मिलता हूँ अभी जल्दी है मुझे .

मैं वहां से निकला और थोड़ी दूर चलते ही मुझे मीता दिखी. हमारी नजरे मिली, वो हमेशा की तरह मुस्कुराई .

मैं- कैसी हो

वो- बढ़िया, तुम बताओ

मैं- मैं भी ठीक हूँ

वो- शहर जा रही हूँ

मैं- मैं भी उधर ही जा रहा था साथ चले

उसने एक बार कुछ सोचा और बोली- हाँ , बिलकुल

मैं- दो मिनट रुको मैं गाड़ी ले आता हूँ

मीता -तुम्हे परेशानी होगी

मैं- भला मुझे क्या परेशानी हो गी

मैं दौड़कर गया , और गाड़ी ले आया . ये पहली बार था जब ऐसे कोई लड़की मेरे साथ थी . मीता ने शीसा थोडा निचे किया . ठंडी हवा ने गाड़ी में जगह बना ली.

“शुक्रिया ” उसने हौले से कहा

मैं- भला किसलिए

वो- तुम्हे मालूम है

मैं- क्या आप भी . हम दोस्त है और दोस्त एक दुसरे को शुक्रिया नहीं कहते है

मीता- सो तो है , कल मिले नहीं तुम

मैं- उलझा था कुछ काम में .

मीता- ये तो अच्छा है , जीवन में काम होना बहुत जरुरी है .

बाते करते करते हम शहर पहुच गए . उसने एक दूकान के बाहर गाड़ी रोकने को कहा .

“आओ न रुक क्यों गए ”उसने कहा

मैं- भला मेरा क्या काम यहाँ

वो- हो सकता है तुम्हारी नजरे कुछ पसंद कर ले मेरे लिए .

मीता कितनी सरल थी , न जाने कैसे वो जान लेती थी मेरे मन को मुझसे पहले .

मैं उसके साथ अन्दर गया . उसकी पसंद बिलकुल निराली थी कोई फैशन नहीं , प्योर सिम्पल पर उसकी सादगी ही उसका गहना थी . न जाने मुझे क्या सुझा उसे लेकर मैं सुनार के पास गया .

“पायल पसंद करो ” मैंने उसे कहा

वो- किसके लिए

मैं- किस्मत के लिए

उसने न जाने कितनी जोड़ी देखि और फिर एक जोड़ी पायल पसंद की

“ये वाली कैसी है देखो जरा ” उसने कहा .

तीन लडियो से बनी चांदी की पायल ,जिसमे बेहद बारीक घुंघरू जड़े थे.

“हाय रे नसीब ” मेरे होंठो से अपने आप निकल पड़ा .

“कुछ कहा तुमने ” उसने पूछा

मैं- नहीं कुछ नहीं .

“क्या कीमत है इसकी ” उसने सुनार से कहा

“”५ हजार “ सुनार से पहले मेरे होंठो से निकल गया .

मीता ने हैरानी से मेरी तरफ देखा

“बढ़िया पसंद है आपकी , ये पायल बस दो जोड़ी ही बनी थी , कारीगर ने इसके बाद कभी पायल नहीं बनाई ” सुनार ने कहा

मैं- तुम पैसे लो न यार

मैंने पैसे सुनार को दिए और पायल को जेब में रख लिया .

”खाना खाते है ” मैंने कहा और हम एक होटल में आ गए.

“मैं नौकरी करना चाहती हूँ ” मीता ने कहा

मैं- ये तो बढ़िया बात है , किस विभाग में दिलचस्पी है आपकी

मीता- तुम्हे हंसी आयेगी सुनकर , मैं रेडियो की नौकरी करना चाहती हूँ

मैं- रेडिओ मकेनिक

मीता- नहीं , वो जो रेडिओ पर बोलते है न वो .

“हम्म, और ये नौकरी कैसे मिलती है मतलब आवेदन करना पड़ता है इसके लिए ” मैंने पूछा

मीता- एक कोर्स करना पड़ता है , जल्दी ही दाखिला लें लुंगी मैं

मैं- बढ़िया है .

मीता- तुमने क्या सोचा है

मैं- रडियो सुनने का

और हम दोनों ही हंस पड़े. पूरा दिन मैं उसके साथ रहा , ये दिन कब बीत गया क्या ही मालूम चला. उसे छोड़ कर जब मैं गाड़ी खड़ी करने चाची के घर गया तो वो थोडा परेशां लग रही थी .


“मैं तेरा ही इंतज़ार कर रही थी ” चाची ने कहा .
 
#10



“क्या हुआ चाची ” मैंने कहा

चाची- मेरा कुछ सामान खो गया है

चाची ने नजरे चुराते हुए कहा और मैं समझ गया उस किताब के बारे में में ही जिक्र कर रही है वो .

“क्या चोरी हुआ ” मैंने अनजान बनते हुए कहा .

चाची मेरे पास आई, इतना पास की उसकी गर्म सांसे मेरे चेहरे से टकराने लगी,

“तुम जानते हो वो क्या है ” चाची ने कहा

मैं- जब तुम जानती हो मैं जानता हूँ तो अब क्या कहना क्या सुनना

चाची ने मेरा हाथ पकड़ा और बोली- कुछ बातो में पर्दा रहना जरुरी है ,हमारा रिश्ता जो है हमें उसकी कद्र तो करनी होगी . हँसना बोलना एक बात है पर एक लाइन है हमारे बीच .

“कोई पर्दा नहीं है हमारे बीच, मेरी चाची हो सदा इसका सम्मान है पर चाची के आलावा आप मेरी दोस्त भी हो , मेरा सुख दुःख आपसे नहीं छिपा, इस घर में मुझे मुझसे ज्यादा कोई जानता है तो वो आप हो . और मैं इस परदे को गिरा देना चाहता हूँ तमाम उन दूरियों को मैं मिटा देना चाहता हूँ जो आपके और मेरे बीच है ” मैं एक सांस में बोल गया .

मुझे लगा यही सही समय है . मैंने चाची की कमर में हाथ डाला और उसे अपनी बाँहों में भर लिया. बिना कुछ सोचे मैंने अपने होंठ चाची के होंठो पर रख दिए. अपनी आँखों को बड़ी करके चाची ने मुझे देखा .पर मैंने उन्हें चूमना जारी रखा. चाची को अपनी बाँहों में लिए उनकी पीठ को सहलाते हुए उस लम्हे में उसे चूमना अपने आप में अद्भुद था . इ बेहद जावेदा चुम्बन के बाद मैंने चाची को छोड़ा.

“आपके जवाब का मुझे इंतज़ार रहेगा ” मैंने कहा और चाची के घर से निकल गया . बिस्तर पर लेटे बहुत देर तक मैं चाची की लिपस्टिक और मक्खन से होंठो के स्वाद को महसूस करता रहा . अँधेरे कमरे में धीमी आवाज में बजते कुमार सानु के गाने . मौसम अचानक से सुहाना लगने लगा था मुझे . जब तक की किसी ने कमरे में रौशनी नहीं की .

“अंधेरो से बड़ा लगाव हो रखा है आजकल देवर जी ” भाभी ने कहा .

मैं- इसका भी अपना मोल है

भाभी- सो तो है , मैंने सोचा आज साथ खाना खाया जाये.

मैं- न जाने क्यों मुझे भूख नहीं है .

भाभी- मैं ये तो नहीं जानती की तुम्हारे मन में क्या चल रहा है पर मुझे लगता है कुछ मामलो में हम क्लियर है , क्यों है न

मैं- कोई शक

भाभी- तो फिर ये ऐसा व्यवहार क्यों . ये रुखी बाते किसलिए . तुम तो कह कर चले जाते हो . तुम्हे क्या परवाह दुसरो पर क्या गुजरती है . इस घर की रौनके तुम से है पर तुम्हे क्या मालूम हम किस वीराने को महसूस करते है . तुम्हारा ये आवारापन , ये बंजारापन . जिदंगी को एक बार इस घर के नजरिये से देखो तो सही . हम सब से तो भाग लोगे पर खुद से कैसे भाग पाओगे.

मैं- कौन कमबख्त भागता है भाभी

भाभी- तो फिर वादा करो मुझसे आज के बाद कभी खाने के लिए मना नहीं करोगे और कम से कम एक टाइम का खाना मेरे साथ ही खाओगे .

मैं- वादे टूट जाते है , मैंने देखे है कसमो को बिखरते हुए

भाभी- तो कोशिश करना . आओ खाना खाते है मुझे भूख लगी है .

अब मैं क्या कहता , मैंने बस खाना खाया और सोने की कोशिश करने लगा . पर नींद भी जैसे दुश्मन हुई पड़ी थी . मेरी यादे, चाची की बाते उअर मीता के साथ बिताया एक खुबसूरत दिन . कभी इस करवट तो कभी उस करवट चैन जब भी नहीं मिला तो मैं घर से बाहर आया. सब कुछ खामोश था . गाँव सोया हुआ था. पैदल चलते हुए मैं गाँव से बाहर की तरफ हो लिया.

कुछ दूर चला था की कानो में लहर सी घुलने लगी . इतनी रात को किसको चुल हुई होगी . एक पल मैंने सोचा की किसी ये यहाँ ब्याह होगा तो बज रहा होगा. पर ये वैसा तराना नहीं था . एक शांत धुन जो क्या मालूम किसी सारंगी की थी या किसी बांसुरी की . पर जो भी थी कमाल थी . आवाज के सहारे मैं न जाने क्यों उस तरफ चल दिया.

काफी आगे जाने के बाद मैंने देखा की आग जल रही थी और उसके पास कोई बैठी थी .उसकी पीठ मेरी तरफ थी . दबे पाँव मैं उसकी तरफ गया .

“इन रातो को चोरी छिपे न घूमना चाहिए ” उसने बिना मुझे देखे ही कहा .

मैं उसके सामने गया . आंच की लौ में मैंने देखा वो कोई तीस पैंतीस साल की औरत थी . काले स्याह कपडे पहने , गोरा रंग .ठोड़ी पर तीन काले तीन . गहरी काली आँखे . दो पल में मैंने उसका हुलिया नाप लिया .

“माफी चाहूँगा, मैं अपने खेत में जा रहा था , ये तान सुनी तो इधर आ गया ” मैंने कहा .

“आ बैठ जरा. एक से भले दो .” उसने कहा तो मैं पास में रेत पर बैठ गया .

“खेत तो तेरे दो कोस दूर है यहाँ से , पर कोई न अब आया है तो बैठ दो बात कर , वैसे भी नींद तो तेरी है न साथ आज ” उसने कहा

मैं थोडा हैरान हो गया .

“आपको कैसे पता ” मैंने पूछा

“एक बंजारन मैं एक बंजारा तेरे अन्दर . सबके मन की जाने वो मस्त कलंदर ” ऐसा कहकर उसने आसमान की तरफ ध्यान दिया .

मैं- आप कोई भविष्य देखने वाली है क्या .

वो- ना रे , मुझे भी नींद नहीं आ रही थी तो इधर चली आई. सबके अपने अपने दुःख है , तू तेरे से दुखी मैं मेरे से .

उसने आग थोड़ी और सुलगाई . मैं बस उसे देखता रहा .

मैं- कुछ दिन पहले मैंने दो लोगो को ऐसे ही बैठे देखा था आग जलाए वो आसमान में कुछ देख रहे थे .

वो- तुझे क्या दीखता है ऊपर आसमान में

मैं- मुझे मेरी तन्हाई दिखती है

वो- आग में हाथ डाल जरा

मैं- जलेगा

वो- डाल तो सही


मैंने वैसा ही किया. आग की पीली बैंगनी लपटें लपकी मेरे हाथ की तरफ पर वो आग ठंडी लगी मुझे बर्फ सी ठंडी . उसने मेरा हाथ अपने हाथ में पकड़ा और फिर झटके से छोड़ दिया.
 
#11

“क्या हुआ ” मैंने पूछा

वो- खाली है तेरा मन ये ठीक नहीं

मैं- तो क्या करे

वो- तू क्या करेगा नसीब करेगा. जिन गलियों को छोड़ आया है वो तुझे पुकारेंगी .

मैं- ऐसा नहीं होगा . वो दौर कोई और था ये दौर दूसरा है

वो- मैं मिलूंगी तुझसे फिर पूछूंगी

मैं- ठीक है मिलते है फिर

मैंने उस से कहा और उस से विदा ले ली. वो एक बार फिर अपनी सारंगी बजाने लगी.

सुबह घर गया . चाची कही दिखी नहीं मुझे . मैं आँगन में बैठा अख़बार पढ़ रहा था की माँ मेरे पास आई.

“बहुरानी कुछ दिन के लिए मायके जाएगी. तू छोड़ आना ” माँ ने कहा

मैं- ये मेरा काम नहीं है माँ. वहां से कोई आ जाये लेने या भाई छोड़ आये .

माँ- वैसे तो कहता है की माँ तेरा हर कहा मानता हु और जब कोई करने को कहूँ तो तेरे बहाने

मैं- ठीक है माँ आपका हुक्म सर माथे पर भाभी से कहना जल्दी से तैयार हो ले . पर मैं रुकुंगा नहीं वहां .

माँ- हाँ ठीक है मत रुकना .

अब क्या कहता मैं माँ से कुछ भी तो नहीं . घंटे भर बाद जब भाभी ऊपर से नीचे उतरी तो मैं बस उसे देखता ही रह गया. मेरी नजरो ने जो उस चेहरे का दीदार किया चाहते हुए भी मैं खुद को रोक न सका. एक सिम्पल सी गुलाबी साडी माथे पर एक टीका , कानो में बड़े बड़े झुमके . होंठो पर गुलाबी ही लिपस्टिक . खैर मैं भाभी को लेकर उनके मायके की तरफ चल पड़ा .

बहुत देर तक गाड़ी में हम दोनों के बीच ख़ामोशी सी रही .

“क्या बात है कुछ बोलते क्यों नहीं ” भाभी ने चुप्पी तोड़ते हुए कहा.

मैं- आप जानती थी न की मैं नहीं आना चाहता था .

भाभी- मैं चाहती थी की तुम आओ .

मैं- मेरा होना न होना क्या ही फर्क पड़ता है

भाभी- ये तुम कहते हो . तुम ये सोचते हो ?

मैं- कोई और बात करते है

भाभी- सारी बाते बस ये ही तो है .

मैं- कल किसी ने बताया मुझे की मेरा मन खाली है .

भाभी- बेवकूफ था वो जिसने ऐसा बताया .

मैं- मुझे भी ऐसा ही लगा.

भाभी ने अपना हाथ मेरे हाथ पर रखा और बोली- देवर जी , ये जो जीवन है न इसे जीना बड़ा दुश्वार होता है . हर चाह पूरी हो जाये ये सबके नसीब में तो नहीं होता न, किसी के बेहिसाब सुख मिल जाता है किसी को दुःख ये संसार का नियम है . पर इन्सान को निरंतर आगे बढ़ते रहना होता है . यही रीत है .

मैं- रीत के बाते सब करते है

भाभी- तुम किस की बात करते हो

मैं- क्या मालूम

भाभी-- एक दौर आये गा , जब जिंदगी गुलजार होगी आज रीत है पर तब प्रीत होगी . कोई ऐसी आयेगी जो हर कदम तुम्हे थाम कर चलेगी.

मैंने गाड़ी रोक दी . भाभी के गाँव की सीम आ गयी थी .

भाभी- क्या हुआ

मैं- सीम आ गयी है

भाभी- गाँव भी आएगा.

मैं- आप गाड़ी ले जाओ मैं यही से मुड जाता हूँ.

भाभी- मैं पैदल ही चली जाती हूँ कौन सा दूर है . कदमो ने खूब नापा है इन रास्तो को .

मैं- क्यों कर रही है आप ऐसा .

भाभी- मैंने सोचा था की दो दिन तुम मेरे साथ रहोगे यही . मेरे लिए रुक जाओ न , मेरे साथ रहो . तुमने कहा था मुझे

मैं- ठीक है आपकी यही चाह है तो ये ही सही ये भी ठीक है .

मैंने गाड़ी गेर में डाली और आगे बढ़ गए. गाँव शुरू होने से पहले वो बावड़ी आई . वो सरकंडे . वो टूटी सीढिया . दिल तो बहुत किया पर मैंने गाड़ी नहीं रोकी. गाँव का वो बाजार आज भी गुलजार था . वो चूडियो की दूकान वो हरी चुडिया आज भी वैसे ही टंगी थी . थोडा आगे वो बनारसी बर्फी वाले की दूकान . गलियों को पार करते हुए हम भाभी के घर की तरफ बढ़ रहे थे . दो मोड़ और पार किये और फिर हम हमारी मंजिल के सामने थे .गाड़ी से उतरे . भाभी ने मेरा हाथ पकड़ा और बोली- आओ

मैं- आप चलो , मैं सामान लेकर आता हूँ .

भाभी- कोई और ले जायेगा .

हम अन्दर आये. सबने अच्छे से स्वागत किया हमारा. चाय नाश्ता हुआ. भाभी अन्दर चली गयी मैं मेहमान खाने में ही रुक गया . मेरे दिल में न जाने क्या था मैं क्या बताऊ .

“मैं थोडा बाहर होकर आता हूँ ” मैंने कहा और मैं वहा से दूर आ गया . मैं पैदल ही निकल पड़ा. मेरे कदम जहाँ मुझे ले जा रहे थे मैं जाना नहीं चाहता पर कुछ चीजों पर आपका बस नहीं होता . मैं एक बार फिर उसी बाजार में था . अर्जुनगढ़ के बाजार में .

“बाबु ये चुडिया देखो, जय पर्दा ने यही चुडिया पहनी थी ” चूड़ी वाली ने कहा .

मुझे हंसी आ गयी .

“सबको ऐसा ही कहती हो. अब तो कुछ नया बोलो. ” मैंने कहा

वो- तुम तो ऐसा कह रहे हो जैसे पहले मेरी दुकान से चूड़ी खरीदी है .

मैं- क्या नाम है आपका गुडिया

वो- जूही .

मैं- तो जूही , आपके पास सबसे अच्छी चुडिया कौन सी है .

“अरे तुझे बोला था न घर रहना तू फिर यहाँ आ गयी , नाक में दम करके रखा है तूने तो ”

जूही- अरे बाप रे माँ आ गयी , बाबू मुझे वो डांटेंगे दर्जन भर चूड़ी ले लो न .

मैं इस से पहले जवाब देता उसकी माँ हमारे पास आ गयी . हमारी नजरे मिली और वो मुझे पहचान गयी .

”आप, आप यहाँ इतने दिनों बाद ” इसके आगे वो कुछ बोलती मैंने इशारे से उसे चुप रहने को कहा .

“बड़ी प्यारी गुडिया है जूही . ” मैंने कहा और जेब से गड्डी निकाल कर जूही के सर पर वार कर उसकी माँ को दे दी. और जाने को मुड गया .

जूही- बाबु, पैसे दिए चूड़ी लेना भूल गए.

मैं- एक दिन आऊंगा


ऐसा लगता था की जैसे बस कल की ही बात हो . आँखों के सामने जैसे सब दौड़ने लगा था . मैंने मेरी साँसों को फूलते हुए महसूस किया. मुझे शायद चक्कर सा आ गया था . मैं वहां से चला ही था मेरे कानो में शंखनाद गूँज उठा.
 
Well said Naina, thanks for elaborate things

Darasal meri kahaniya ke kacche dhage se bandhi hoti hai kisi ne dhaaga kheencha aur sab khtam, meri kahaniyo me sach hamesha aankho ke samne hota hai

Meri hamesha kosish hoti hai ki koi us dhaage ko na talash kar le, ab main kuch point clear karta hun

Meeta, bhutni nahi hai

Ye prem kahani nahi hai

Ye thriller hai

Hero last me mar jayega
 
#12

मेरे गाँव से अर्जुनगढ़ की दुरी कोई ज्यादा नहीं थी मुश्किल से दस किलोमीटर होगी, पर कच्चे रस्ते से थोडा और कम हो जाती थी .ये शंखनाद जो मेरे कानो में गूँज रहा था. ये संकेत होता था की दोपहर का प्रसाद तैयार है . अर्जुनगढ़ का प्रसिद्ध मंदिर जहा पर हर दोपहर आलू की सब्जी और पूरी मिलती थी खाने को . ये नाद जैसे मुझसे कह रहा था की बहुत देर हुई अब और नहीं , किस का है इंतज़ार तुझे उठा कदम और आ पास मेरे .

पर मैंने उस दिशा से मुह मोड़ लिया . तबियत ठीक नहीं लग रही थी , चक्कर आ रहे थे तो मैं वापिस भाभी के घर आया और सो गया . आँख खुली तो मैंने देखा कमरे में बल्ब जल रहा था . मेरी नजर सामने दिवार घड़ी पर गयी रात का डेढ़ बज रहा था . पास सोफे पर भाभी बैठी थी जिनकी निगाहे मेरे ऊपर ही थी .

“आप अभी तक जाग रही है ” मैंने कहा

भाभी- तुम ऐसे ही सो गए थे . मैंने इंतजार करने का सोचा तुम्हारे जागने का क्योंकि जागते ही तुम्हे भूख लगती है

मैं- माफ़ी चाहूँगा, यु ऐसे आपको शर्मिंदा नहीं करना चाहता था जब आप अपने घर पर है , मुझे चक्कर आ रहे थे अवसाद में आँख लग गयी .

भाभी- तुम्हारी वजह से मैं कभी शर्मिंदा नहीं हो सकती . ऐसा सोचना भी गलत है . नींद का क्या है वैसे भी मैं बस थोड़ी देर पहले ही यहाँ आई वर्ना घरवालो से गप्पे ही लड़ा रही थी .

जग से गिलास भर का मैंने थोडा पानी पिया जो सीधा कलेजे को लगा.

“आप जाओ भाभी , सुबह मिलते है ” मैंने कहा और वापिस बिस्तर पर लेट गया .भाभी जाते जाते दरवाजे पर रुकी जिस तरह से उन्होंने पलट कर मुझे देखा , एक पल वो नजर मुझे दिल में उतरती दिखी .

अगली सुबह बड़ी खुशगवार और सुहानी थी . मैं सुबह सुबह ही बाहर निकल गया , अर्जुनगढ़ में ये दूसरा दिन था मेरा. घूमते घूमते मैं एक बार फिर बाजार की तरफ आ गया था . मैं बनारसी की दुकान पर जाना चाहता था पर मेरे कदम रस्ते से ही रुक गए . मैंने ठीक उसी तरह की तान सुनी जैसा वो औरत उस रात बियाबान में इकतारा बजा रही थी . मैं उस आवाज को साफ़ साफ़ महसूस कर पा रहा था .

और चलते चलते मैं ठीक उन सीढियों के पास आकर रुक गया जो ऊपर पहाड़ की तरफ जा रही थी . बहुत दूर वो शान से लहराता केसरिया झंडा हवा में गर्व से लहरा रहा था . सीढिया चढ़ कर मैं ऊपर पहुंचा. काली चट्टान के फर्श पर पानी बिखरा हुआ था और उसी फर्श पर बड़ी शान से बैठे वो इकतारा बजा रही थी .

हमारी नजरे मिली वो मुस्काई मैं मुस्कुराया.

“क्या ये इतेफाक है जो हम यहाँ यूँ मिले ” मैंने उसके पास जाकर कहा

वो- नियति भी हो सकती है . शायद इनकी मर्जी हो इस मुलाकात के पीछे

उसने सामने उस बड़ी सी मूर्ति की तरफ इशारा किया.

वो मूर्ति अपने आप में निराली ही थी . मिटटी की बनी हुई मूर्ति . जिस पर सिंदूर चढाया हुआ था .

“दर्शन कर आओ ” उसने कहा

मैं मूर्ति के पास गया शीश नवाया. दो पल मैं उस मूर्ति के पास बैठा.

“सकून मिलता है न यहाँ ” उसने मेरे पास बैठ्ते हुए कहा .

मैं- कुछ तो बात है

वो- क्या मालूम क्या होता है सकून, कुछ परछाई है सामने , एक धुंधलापन हमेशा साथ होता है .कुछ याद है कुछ नहीं . अपने आप से झुझता रहता हूँ.

वो- समझती हूँ इस बंजारेपन को

मैं- आपने उस रात जब मेरा हाथ पकड़ा था क्या देखा था

वो- कुछ नहीं

मैं- कम से कम इसके सामने तो झूठ न बोलो

मैंने मूर्ति की तरफ इशारा करते हुए कहा .

“”मैंने ज़माने भर का दुःख देखा था . वो दुःख जो तू हर घडी देखता है , वो दुःख जो तुझे जीने नहीं देगा और मर तू पायेगा नहीं .

“क्या कह रही है आप , बकवास है ये ” मैंने कहा

“फिर मुलाकात हुई तो बात करेंगे इस बारे में ” उसने कहा और उठ खड़ी हुई .

मैं- कहाँ जा रही है आप

वो- जहाँ नसीब ले जाए .

उसके जाने के बाद मैं भी उठ खड़ा हुआ . मैंने एक नजल कलाई पर बंधी घड़ी पर डाली और भाभी के घर की तरफ चल पड़ा. मैं बाजार पहुंचा ही था की आँखों में लश्कारे की चमक आन पड़ी . मैंने देखा तो थोड़ी दूर मीता थी . हाँ ये मीता ही दुपट्टे खरीदते हुए .

“ये क्या कर रही है यहाँ ” मैंने उस की तरफ जाते हुए सोचा .

“हलके केसरी रंग में दिखाओ न कुछ ” वो दूकान वाले से जिरह कर रही थी .

“गहरा नीला अच्छा लगेगा आप पर ” मैंने कहा .

वो मेरी तरह घूमी. हमारी नजरे मिली .

वो- तुम यहाँ

मैं- आप भी तो हैं यहाँ

वो- सो तो है , ठीक है भैया, गहरा नीला दुपट्टा ही दो मुझे .

उसने पैसे चुकाए .

“तो कैसे यहाँ ” उसने कहा

मैं- अपने आस पास के गाँवो में बड़ा बाजार यही है तो बस ऐसे ही चला आया.

मीता- न जाने क्यों आजकल हम दोनों के बहाने एक से ही होते है

मैं- शायद किसी किस्म का इशारा है ये .

हम बाते कर ही रहे थे की मैंने जूही को उसकी माँ के संग आते हुए देखा .

जूही- बाबु, आज आओगे न चूड़ी लेने .

“जूही , कितनी बार कहा है तुझे ” उसकी माँ ने उसे कहा .

मैं- बिलकुल आयेंगे, आप मेमसाहब से पूछो उनको कौन से रंग की पसंद है

मीता- क्या

जूही- दीदी आओ हमारी दूकान पर पास में ही है

जूही ने मीता का हाथ पकड़ा तो मैंने नजरो से उसे हाँ कहा .

हम जूही की दूकान पर आ गए .

जूही- दीदी ये देखो , ये वाली आप को अच्छी लगेगी . नहीं आप ये वाली देखो

मीता- तुम पसंद करो मेरे लिए

उसने मुझ से कहा .

मैं- मुझे तो बस हरी कांच की चुडिया पसंद है , लखोरी कांच की चूडियो की बात ही अलग है .

मीता- तो जूही मुझे वही दिखाओ .

“माँ ये कौन सी चुडिया है ” जूही ने माँ से पूछा

“नसीबो की चूडिया है वो बेटा. मैं निकालती हूँ ” जूही की माँ ने कहा और अन्दर से वो बक्सा ले आई. गहरे हरे कांच में जड़े सितारे धुप में चमकने लगे. उसने वो चुडिया मीता के हाथ में रखी और बोली-जोड़ी बनी रहे .


मीता एक पल हैरान हुई और मुस्कुरा पड़ी. मीता को कुछ सामान और खरीदना था वो एक दूकान में रुकी थी , तभी मेरी नजर सामने किसी पर पड़ी और ............. ...........
 
#13

मैंने देखा जो आदमी चाचा के साथ रहता था वो दूर खड़ा मुझे घूर रहा था , उसकी बिल्ली जैसी आँखे मुझे ही देख रही थी . और जैसे ही हमारे आँखे आपस में मिली, हडबडाते हुए वो आगे बढ़ने लगा. सब छोड़ कर मैं उसकी दिशा में भागा . बाजार में इतनी भीड़ नहीं थी पर न जाने वो कहाँ ओझल हो गया था . मुश्किल से वो तीस मीटर दूर होगा .

“इतनी जल्दी कहाँ गया वो ” मैंने अपने आप से कहा .

उसे तलाश ही रहा था की मीता मेरी तरफ आते दिखी . मैंने खुद को सामान्य करने की कोशिश की .

“क्या हुआ ऐसे अचानक भागे क्यों तुम ” उसने कहा

मैं- कुछ नहीं बस यूँ ही

वो- चलो फिर चलते है

मैं- नहीं,आप जाओ . मैं यही रुकुंगा

मीता ने एक नजर मुझे देखा बोली- ठीक है , वैसे तुमने दाखिले का फॉर्म भर दिया क्या .

मैं- नहीं अभी नहीं

मीता- जल्दी ही भर देना. डेट जाने ही वाली है

मैं- ठीक है

उसके जाने के बाद मैं उस दाढ़ी वाले आदमी के बारे में सोचते सोचते भाभी के घर आया . वो मेरा ही इन्तजार कर रही थी .

भाभी- कहाँ थे तुम मुझे चिंता हो रही थी .

मैं- बस यही था , थोडा पानी दो मुझे

भाभी पानी का जग ले आई .

भाभी- कहीं जाना था तो मुझे बता देते हम साथ ही चल पड़ते

मैं- बस बाजार ही गया था मैं . आप सब ऐसा सोचते है की मैं छोटा बच्चा हूँ

भाभी- ऐसा नहीं है देवर जी , बस फ़िक्र है आपकी

मैं- मेरे मन में कुछ बाते है , कुछ सवाल है

भाभी- मन की बातो को छोडिये जनाब पहले आप खाना खाइए, नाश्ते से इंतज़ार करते करते दोपहर के खाने का समय हो गया , तुम्हारी पसंदीदा खैर-संगर की सब्जी बनवाई है .

मैं भाभी के साथ खाने की टेबल तक आया जैसे ही खाना परोसा गया , मेरी आँखों के सामने अँधेरा सा छा गया . चक्कर सा आने लगा. मैंने फिर से कुछ परछाई देखि. सरसों के खेत , पगडण्डी पर बैठा मैं . पायल की आवाज . पोटली में रखी रोटिया

“खैर- संगर की सब्जी , तुम्हे पसंद है न ” मैंने कानो में स्पस्ट सुनी ये आवाज पर वो चेहरा नहीं देख पाया मैं मेरी आँखे झटके से खुल गयी .

“ये क्या हो रहा है भाभी ” मैंने खुद को अस्त व्यस्त देख पूछा

भाभी---- तबियत ठीक नहीं है तुम्हारी हम अभी के अभी वापिस वापिस चल रहे है .

मैं- पर आपको तो रुकना हैं, मैं , मेरी वजह से आपको ये परेशानी नहीं होगी .

भाभी- मैंने कहा न हम अभी के अभी वापिस घर चल रहे है

भाभी का पूरा चेहरा लाल था . आँखे दहक सी रही थी . भाभी ने कुछ ही मिनटों में अपना सामान लिया और हम वहां से चल पड़े. आधे रस्ते तक गाड़ी में गहरी ख़ामोशी छाई रही .

“गाडी रोको ” भाभी ने कहा

मैंने गाड़ी रोकी. वो गाड़ी से उतर कर कच्चे रस्ते पर पैदल चल पड़ी .मैं उनके पीछे गया थोडा आगे जाने पर मैंने देखा ये पानी की बहुत पुराणी खेली थी . पर उसमे पानी था . भाभी ने अपने हाथ खेली में डाली और चेहरे पर पानी के छपके मारने लगी. शायद उनका जी घबरा रहा था गर्मी की वजह से . बहुत देर तक वो वही खेली से टेक लगाये बैठी रही .

एक तल्खी जो बेचैनी बन कर हम दोनों के बीच खड़ी थी . वापसी में पूरे रस्ते हम खामोश रहे .

चोबारे में आते ही मैंने धीमी आवाज में गाने चलाये और बिस्तर पर लेट गया . मेरी आँखों के सामने बार बार वो परछाई आ रही थी . वो आवाज मुझे जानी पहचानी लग रही थी . और इसे मैं वहम तो हरगिज नहीं कह सकता था . शाम को जब मैं निचे आ रहा था तो सीढियों पर मैं भाई से टकरा गया .

भाई- मैं तुम्हारे पास ही आ रहा था . तुमसे बात करनी थी

मैं- इस घर में और भी है आपकी बाते सुनने के लिए

भाई- तो तुम नहीं सुनोगे, तुम जानते हो तुम ये गलत कर रहे हो

मैं- सही गलत का फासला अरसे पहले मिट चूका है .

भाई- ये तुम्हारे लिए बहुत जरुरी है

मैंने कोई जवाब नहीं दिया और सीढिया उतर कर आँगन में आ गया . भाभी मुझे घुर कर देख रही थी . मैंने साइकिल उठाई और खेतो की तरफ चल पड़ा. चोपाल पर पहुँच कर मैंने देखा की भीड़ जमा है पीपल पर बने चबूतरे पर पिताजी और गाँव के कुछ मोजिज लोग बैठे थे . मैंने देखा की एक औरत को पेड़ से बाँधा हाथ . मैंने साइकिल रोकी और मामले को देखने लगा .

“गाँव वालो, ये बिमला ने गाँव का , समाज का , और अपने घरवाले का नाम बदनाम किया है .कुछ दिन पहले ये घर से अपने प्रेमी संग भाग गयी थी . अब गाँव समाज इसका फैसला करेगा. ” एक पंच ने कहा .

मैं लगातार बस बिमला को देख रहा था जिसकी हालत पतली थी , शायद उसे खूब मारा पीटा गया था . कपडे फटे थे, मिटटी में सने थे .

“मैं तो इस बदचलन को अब नहीं रखूँगा , इसने कुल पर कलंक लगाया है ” बिमला के पति ने कहा .

गाँव वाले खुसर पुसर करने लगे. पिताजी खड़े हुए और बोले- पंचायत ने फैसला किया है की बिमला को सो कोड़े मारे जाये और सर गंजा करके पुरे गाँव में घुमाया जाये , ताकि इसका हाल देखकर कोई और परम्परा, प्रतिष्ठा को तोड़ने की सोचे भी न . उसके बाद इसे गाँव निकाला जायेगा और गाँव का कोई भी इस से कोई सम्बन्ध नही रखेगा. कोई दुकानदार इसे राशन नहीं देगा. किसी के नल या कुवे से ये पानी नहीं भरेगी और जो इसकी मदद करेगा उसे भी भाई---चारे से बाहर कर दिया जायेगा. “

गाँव वाले पिताजी का जयकारा करने लगे. मुझे गुस्सा आने लगा. मैं आगे बढ़ा और चबूतरे के पास गया .

“पंचायत का फैसला गलत है , किसी भी निर्णय से पहले बिमला का पक्ष सुना जाना चाहिए ” मैंने कहा

पिताजी ने अजीब नजरो से मुझे देखा और बोले- तुम्हे घर जाना चाहिए .

“पंचो को परमेश्वर कहा जाता है , पंचायत एक तरफ़ा फैसला नहीं कर सकती , हो सकता है इसकी कोई मज़बूरी रही हो , इसके क्या हालत थे वो भी गौर किये जाये ” मैंने द्रढ़ता से अपनी बात कही .

“लड़के, ये तुम्हारा मामला नहीं है ” एक पंच ने मेरी तरफ ऊँगली करते हुए कहा

मैं- फ़िलहाल तो ये गाँव का मामला है , घर का होता तो पंचायत नहीं हो रही होती .

“तुम अभी के अभी घर जाओ , और बिमला को कोड़े मारने की कार्यवाही शुरू की जाये ” पिताजी ने गरजते हुए कहा .

एक आदमी कोड़ा लेकर उसकी तरफ बढ़ा.

“अपने कदमो को थाम ले , जब तक इसका पक्ष नहीं सुना जायेगा बिमला की तरफ किसी ने आँख भी उठाई तो ठीक नहीं होगा . ” मैंने चेतावनी देते हुए कहा .

“आपका लड़का पंचायत का अपमान कर रहा है प्रधान जी ” पंचों में से एक ने कहा .


पिताजी कुर्सी से उठे और मेरे पास आये........ .और ....... ..
 
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