Adultery हवेली - Page 3 - SexBaba
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Adultery हवेली

#१९



निर्मला की बात में दम था पर एक खामोश ईमारत जो वक्त की मार से जूझ रही थी अपनी चारदीवारी में भला ऐसा क्या छिपाए हुए थी जिसने मेरे वर्तमान को ठोकर मार दी थी , जब से मुझे अपने वजूद की तलाश के बारे में मालूम हुआ था मैं बेहद परेशान था एक ऐसी तलाश जिसका न कोई ओर था ना कोई छोर , उन किरदारों की तलाश जिन्हें मरे हुए मुद्दत हो चुकी थी.

पर मैंने भी ठानी थी की इस राज की बात चाहे कितनी भी गहराई में दबी हो उस को खोद निकालूँगा. मैंने एक सूची बनाई तमाम लोगो की जिसमे सबसे पहला नाम सोलह साल से कोमा में पड़े सक्श ठाकुर शौर्य सिंह का था . उसके तीन मर चुके बेटे, गायब बहु और बेटी. और दो नौकर जिसमे से एक अभी हाल ही में मरा और एक गाँव के बाहर तंगहाली में जी रही थी . और सबसे बड़ा सवाल की सरपंच जी का हवेली से क्या रिश्ता था , क्यों पाला उन्होंने मुझे . मैंने अपने प्राथमिक सवाल बना लिए थे बस अब इनके जवाब चाहिए थे मुझे और मैं जानता था की जवाब अगर कहीं है तो बस उसी हवेली में ही है .

एक बार फिर मैं कुवे पर बने उसी कमरे में मोजूद था ,इतना तो मैं जान गया था की यही पर ठाकुर लोग चुदाई करते थे पर किसकी हो सकता था गाँव की बहन-बेटियों की पर यहाँ बिखरे खून के सूख चुके कतरे मुझसे जैसे कह रहे थे की हमारी तरफ भी देख ले जरा. अगर किसी को यहाँ पर मारा गया था तो फिर उसके लिए ये जगह मुरीद नहीं थी , शौर्य सिंह चाहते तो किसी को दिन दिहाड़े मार सकते थे तो फिर ऐसे छुपा कर ये काम क्यों किया गया . टांड पर पड़ी ब्रांडेड ब्रा मेरी गाँव की किसी औरत की चुदाई की थ्योरी को मुह चिढ़ा रही थी , वो सच जिसे मैं मानना नहीं चाहता था वो सच ये था की यहाँ हवेली की ही कोई औरत चुदती थी .

मैं हवेली में घुसने के लिए भूषण की झोपडी के पास पहुंचा ही था की मुझे लगा अन्दर कोई है मैं दबे पाँव उस तरफ पहुंचा तो देखा की चंदा पूरी नंगी अलसाई सी पड़ी है , उसकी आँखे बंद थी, विशाल छतिया साँस लेने की वजह से ऊपर निचे हो रही थी .उसके पैर हलके से खुले और मेरी नजर उसकी गहरे झांटो से भरी चूत पर पड़ी जिस से रिस कर पानी जैसी बूंदे जांघो पर जम गयी थी . मामला साफ़ था थोड़ी देर पहले ही इसने चुदाई करवाई थी . और मैं बड़ी शिद्दत से ये जानना चाहता था की वो कौन था .

“खुले में ऐसे भोसड़ा खोल कर पड़ी रहोगी तो किसी का भी दिल करेगा न तुम्हारे ऊपर चढ़ने का ” मैंने उसकी तरफ निहारते हुए कहा .

चंदा ने झट से अपनी आँखे खोली पर वो मुझे देख कर चौंकी नहीं , उसने आराम से अपनी साडी उठाई , पहनी नहीं बस उस से बदन को ढक लिया और बोली- तुम यहाँ कैसे

मैं- यही बात मैं तुमसे पूछना चाहता हूँ .

चंदा- तुम क्या मेरे लोग हो जो तुमको बताऊ , अकेली औरत को जीने के लिए बहुत कुछ करना पड़ता है ये सब भी उनमे से एक ही है .

मैं- मानता हूँ बस उत्सुकता है

चंदा- उत्सुकता की बत्ती बनाओ और अपने पिछवाड़े में डाल लो, मेरे घर में मेरे सामान की तलाशी लेकर तुमने अपनी औकात दिखाई है . मुझसे ही पूछ लेते क्या चाह थी तुमको

मैं- गलती थी मेरी , मैं बस जानना चाहता था की कहीं तुम ही तो वो औरत नहीं थी जो खेत वाले कमरे में ठाकुरों संग चुदती थी . तुम्हारे बक्से में रखे सामान ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया .

चंदा- हवेली बर्बाद हुई तो बहुत से लोगो के हिस्से में काफी कुछ आया , किसी के हिस्से में धन आया किसी के जमीन मेरे हिस्से में वो सब सामान आया .

मैं- हवेली में उस रात हुआ क्या था ये बताती क्यों नहीं तुम और तुम किस संग सो रही हो

चंदा- उस रात मौत आई थी हवेली में और मैं जिसके साथ भी सो रही हूँ ये मेरा निजी मामला है , मैं तुमको एक सलाह देती हूँ अपनी जिन्दगी जियो हवेली की दीवारों पर सर पटकने का कोई फायदा नहीं है .

मैं- मेरी जिन्दगी हवेली से ही जुडी है अब , मैं अपने वजूद की तलाश कर रहा हूँ

मेरी बात चुन कर चंदा उठी और थोडा झुक कर उसने मिटटी उठाई अपने हथेली में , जब वो ऐसा कर रही थी तो झुकने की वजह से उसकी गांड का घेराव मेरी आँखों से होते हुए सीने में आग को सुलगा गया . मैंने अपनी पेंट में हलचल मचते हुए महसूस की , पर अगले ही पल उसने अपनी हथेली में उठाई मिटटी को फूंक मार कर उड़ा दिया और बोली- ये है तुम्हारा वजूद . तुमको क्या लगता है की तुम हवेली के वारिस हो सकते हो रुपाली या कामिनी के बेटे . पर तुम ज्यादा से ज्यादा ठाकुरों का पाप हो सकते हो जिसे न जाने किसकी चूत में छोड़ दिया गया था . तुम्हे पालने की वजह तो मैं नहीं जानती पर दुआ करुँगी की ये खुमारी जल्दी ही उतर जाए .

मैं- जिस आदमी से तुम चुदती हो वो हवेली से ही जुड़ा है न , कहीं वो चांदनी के पिता तो नहीं



चंदा- अगली बार जब मुझे उसके साथ देखे तो उसी से पूछ लेना पर तेरी बात में मुझे दम लगता है क्योंकि मैं भी इस बारे में सोचती हूँ क्योंकि अगर सरपंच जी ने तुझे पाला तो बात गहरी रही होगी पर तू समझ नहीं पाया क्योंकि तुझमे वो काबिलियत नहीं है सरपंच जी ठाकुर इन्दर सिंह भाई थे रुपाली ठकुराइन के ...........................
 
#20



चंदा की कही बात का बोझ बहुत था इतना ज्यादा की मैंने अपने घुटनों को कांपता हुआ महसूस किया. कुछ देर ख़ामोशी रही पर उस ख़ामोशी को तोडना अब जरुरी था

मैं- मैं कैसे नहीं जानता इस बात को

चंदा- क्योंकि अब कुछ बचा ही नहीं न हवेली, न रुपाली न कोई और . बस एक तुम ही हो जो पुराणी मिटटी खोद रहे हो .

मैं- जानती तो तुम बहुत कुछ हो न हवेली के बारे में पर बताओगी नहीं

चंदा- जितना जानती हूँ बताया तुमको और मैं कसम उठा सकती हूँ की मैं बिलकुल नहीं जानती की रुपाली ठकुराइन और कामिनी के साथ क्या हुआ आज वो दोनों है तो कहाँ है , बस इतना जरुर कहूँगी की तुम इस खोज में अकेले नहीं हो तुमसे पहले कोई और भी है जो उनको तलाश रहा है

मैं- कौन

चंदा- चांदनी

मैं- किसलिए

चंदा- शायद उसे भी लगता है की वो हवेली की असली वारिस है

मैं- लगने की क्या बात है , हवेली उसकी ही तो है

चंदा- यही तो बात है तुमको भी लगता है की हवेली चांदनी या उसके भाई की है पर हकीकत में हवेली की एक मात्र हक़दार, उसकी वारिस अगर कोई है तो वो है रुपाली ठकुराइन जो पिछले सोलह साल से गायब है वसीयत में उनका नाम है और वसीयत को बदलने की शक्ति रखने वाला इन्सान खुद कोमा में पड़ा है , नियति के अजीब रंग है .

मैं- देखो चंदा , न जाने क्यों मुझे लगता है की तुम इस कहानी की मजबूत कड़ी हो वो कड़ी जो इस कहानी के हर लम्हे में मोजूद थी , जिसने अपनी आँखों से इस कहानी को देखा है अगर तुम सच में मेरी मदद करोगी तो मैं तुम्हे बहुत कुछ दे सकता हूँ

चंदा- हंसी आती है तुम्हारी इस नादानी पर , न जाने तुम लोगो को क्यों लगता है की पैसे से हर चीज पाई जा सकती है . हवेली के चप्पे चप्पे से वाकिफ हूँ मैं अगर मुझे धन की चाह होती तो आज भी कहाँ कहाँ गड्डी पड़ी है मुझसे बेहतर कौन जानता है .

मैं- तो क्या चाहिए तुमको

चंदा- मैं बस जीना चाहती हूँ अपने हिस्से की शांति चाहिए मुझे

मैं- अक्सर शांति की तलाश उनको ही रहती है जिनका बहुत कुछ अशांति ने छीन लिया हो

चंदा- मेरे पास है ही क्या जो कोई छीन लेगा. ले देकर गरीब के पास इज्जत ही तो होती है जो तुम जैसे रसूखदारों के बिस्तर पर पड़ी रहती है .

मैं- कुछ घाव बहुत गहरे होते है जो आत्मा पर पड़ते है चंदा , हवेली में कुछ तो ऐसा हुआ था जिसने तुम्हारे मन में नफरत के बीज बो दिए . बेशक तुम ठाकुरों का बिस्तर गर्म कर रही थी पर हवेली के नौकरों की जेबे हमेशा भरी रहती थी . न जाने क्या रोक रहा है तुम्हे मुझे वो सब बताने को

चंदा- जिस चीज के बारे में मैं जानती ही नहीं वो कैसे बता दू तुमको .

मैं- ठाकुर इन्दर और कामिनी क्या सच में एक दुसरे से प्यार करते थे

चंदा- नहीं जानती,

मैं- हवेली की नौकरानी से ये बात छुपी भी तो नहीं रह सकती न

चंदा- मैं नहीं जानती , ठाकुर इन्दर सिंह और कामिनी दोनों स्वभाव से एक दुसरे के बहुत विपरीत थे, इन्दर का ज्यादातर समय पुरुषोत्तम के साथ शिकार खेलने में बीतता था , जबकि कामिनी ज्यादातर अपने कमरे में ही रहती थी , बहुत कम बाहर निकलती थी कभी कभी खेतो की तरफ घुमने जाती थी पर कभी कभी .

मैं- कामिनी की डायरी में शायरिया लिखी थी , मतलब साफ़ था उसके दिल में कुछ तो था किसी के लिए

चंदा- जवान लड़की थी हो सकता है . बाप भाइयो के रुतबे तले दबा उसका मन उड़ना चाहता होगा.

मैंने सर हिला कर चंदा की बात का समर्थन किया . उसने मेरे कंधे पर हाथ रखा और झोपडी से बाहर निकल गयी . मैं चाह कर भी चंदा के किरदार को समझ नही पा रहा था . दूसरी तरफ मैं सोच रहा था की ठाकुर इन्दर सिंह ने मुझे क्यों पाला , क्या मैं सच में कामिनी और उनका बेटा हो सकता हूँ . इस कहानी में भला मेरा क्या रोल था .

मैंने हवेली में जाने का विचार त्यागा और वापिस से अपने घर आ गया . मैंने एक बार फिर से सरपंच जी के सामान की तलाशी लेने का सोचा, डायरी में जो फ़ोन नम्बर था वो इसलिए था की दोनों परिवार आपस में रिश्तेदार थे. पर अगर रुपाली इस घर की बेटी थी तो फिर कमसेकम यहाँ पर उसकी कोई तो तस्वीर होनी चाहिए थी न , मैं उस चेहरे को तलाश कर रहा था जो कैसा दीखता था मैं जानता ही नहीं था .



तलाशी में मेरी नजर एक ऐसी चीज पर पड़ी जिसने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया , एक पुराणी तस्वीर के पीछे अख़बार की एक कटिंग को गोंद से चिपकाया गया था जिस पर छपी खबर की तारीख ने मेरे दिमाग में दर्द कर दिया .
 
#21



अख़बार की कटिंग को देखते हुए मैं सोचता रहा की क्यों ये खबर इतनी महत्वपूर्ण रही होगी की इसे इतना संभाल कर रखा गया हो .लाल मंदिर में चोरी के आरोप लगे थे ठाकुर पुरुषोतम और चांदनी के पिता पर . अगर ये खबर अख़बार की सुर्खियों में आई थी तो मामला गर्म रहा होगा क्योंकि ठाकुरों पर इल्जाम लगाना उस दौर में हिम्मत का काम था और जब बात इतनी आगे बढ़ी थी तो समझा जा सकता था की हालात क्या रहे होंगे. यहाँ पर मेरे लिए एक सवाल खड़ा हो गया था की पुरुषोतम जो खुद इतना अमीर था उसको चोरी की भला क्या जरुरत आन पड़ी होगी. मेरे लिए अगर कोई प्लस पॉइंट था तो बस इतना की मैं रुपाली के मायके में था . कैसी रही होगी वो जिसके आज तक चर्चे होते है , मैं सोचने लगा .पर तभी लखन के आने से मैंने अपना काम छोड़ा और उसके पास गया .

मैं- आजकल कुछ ज्यादा ही गायब रहते हो , तुम पर घर की जिम्मेदारी छोड़ी है और तुम नशे में डूबे हो .

लखन- मुझे खेतो का काम ही पसंद है , सारा दिन काम करके थक जाता हूँ थोड़ी बहुत ले ली तो क्या बात हुई

मैं- तू चाहे पूरी बोतल पी पर अपने घर पर बैठ कर , कभी ठेके पर पड़ा रहता है कभी नालियों में गिरता पड़ता है . जीवन में सुधार होगा या नहीं तुझे अपना बड़ा भाई मानता हूँ पर तू अपने न सही मेरे बारे में तो सोच ले .

लखन- जितना होता है उतना करता तो हूँ मैं

मैं- कोई परेशानी है तो बता सकता है मुझे, शराब के अलावा भी और चीजे है दुनिया में उनसे दोस्ती कर ले . वैसे लखन तू तो बरसो से इस घर का काम देख रहा है तूने कभी पुरुषोत्तम ठाकुर को यहाँ आते जाते देखा था क्या

ये सवाल मैंने पूछ तो लिया था पर अपनी मुर्खता पर खुन्नस भी आई पुरुषोतम की ससुराल थी यहाँ पर वो नहीं आएगा तो कौन आएगा.

लखन- वो बहुत कम आते थे इधर , शायद दो चार बार ही आये होंगे ब्याह के बाद पर सरपंच जी और पुरषोत्तम अक्सर शिकार के लिए जाते थे

मैं- कहाँ पर जाते थे वो लोग

लखन- पक्का तो नहीं पर शायद लाल मंदिर के पास वाले जंगल की तरफ .

पहले लाल मंदिर में हुई चोरी की खबर और अब शिकार करना वहां पर , चांदनी के भाई ने भी मुझे लाल मंदिर में रोका था क्या वो जानता था वहां के बारे में . हो न हो लाल मंदिर में कुछ न कुछ तो छिपा हुआ था . लखन को अपने हाल पर छोड़ कर मैं सीधा लाल मनदिर के लिए चल दिया रस्ते में मैंने देखा की अजित सिंह रस्ते के बीचोबीच बैठ कर शराब पी रहा था .

“ अर्जुन, बड़े दिनों बाद दिख रहा है , कहाँ गायब रहता है , सुना क्या हाल है तेरे , गुजारा तो ठीक हो रहा है न , ” उसने एक तरह से मेरा उपहास सा उड़ाया

मैं- मेरी फ़िक्र छोड़ अपना देख, सरपंची के नशे को थोडा कम कर, गाँव वाले बड़ी शिकायते कर रहे है तेरी.

अजित- गाँव वालो को अपनी जुती के निचे रखता हूँ मैं और मत भूल की अब तेरा बाप भी नहीं है तेरे सर पर

मैं- माना की वो नहीं है पर गाँव वालो के हक़ के लिए तेरे सामने मैं हमेशा खड़ा रहूँगा. खुद में सुधार कर ले वर्ना कहीं ऐसा न हो की दूसरा मौका नहीं मिले

अजित- वो भी देखेंगे अर्जुन, मैं तो खुद इंतज़ार में हूँ की कब वो मौका आये

मैं- क्या पता उपरवाला तेरी ये दुआ पूरी कर ले .

मैंने अजित को उसके हाल पर छोड़ा और लाल मंदिर के लिए चल पड़ा. पहुचंते पहुँचते अँधेरा घना हो गया था . लाल मंदिर की ईमारत अपने सूनेपन के साथ भुतहा सी लग रही थी , ऊपर से यहाँ बेतारिब फैले झाड़ झंखाड़ मैंने सोचा इनको कटवा दूंगा कभी न कभी. खैर, माता की मूर्ति को पार करते हुए मैं तालाब के पास पहुंचा तो मैंने देखा की सीढियों पर कोई बैठा है , मैंने आँखों को साफ़ किया और गौर से देखा, कोई लड़की बैठी थी . इतनी रात को अकेली लड़की सुनसान इलाके में बिना किसी की फ़िक्र के बैठी है बात अजीब ही थी .

मैं- खामोश रातो में अकेले यूँ नहीं भटकना चाहिए खासकर बियाबान में

“इस दुनिया में कौन अकेला नहीं है ,वैसे भी आबादी से ज्यादा सकून होता है इन भूली हुई जगहों पर . रही बात इन अंधेरो की तो जिनके उजाले मिट चुके हो उनको क्या फर्क पड़ता है अंधेरो से, ” उसने बिना मेरी तरफ देखे कहा .उसे जैसे फर्क ही नहीं पड़ा हो मेरे वहां होने से .

मैंने अपने कदम आगे बढ़ाये और उसके पास से गुजरते हुए कुछ सीढिया निचे उतरा और तालाब के ठन्डे पानी को हथेली में भर कर पहले तो चेहरे को भिगोया और फिर छक कर पिया.

“खारा पानी है ये मत पियो इसे ” उसने कहा

मैं- क्या खारा क्या मीठा पानी तो पानी है

उसने अपनी मश्क मेरी तरफ बढाई मैंने उसे खोला उअर होंठो से लगा लिया, इतनी शीतलता मैंने कभी महसूस नहीं की थी . पानी की वो चंद घूँट गले से सीधा रूह में ही तो उतर गयी थी .

“आभार ” मैंने कहा और उसके पास बैठ गया .

मैं- अक्सर आती हो तुम यहाँ

वो- नहीं तो

मैं कोशिश कर रहा था उस से बात करने की पर समझ नही आ रहा था की कैसे शुरुआत करू. मन उसके रूप को निहारने से थक ही नहीं रहा था , उसके खुले हुए बाल मंद मंद बहती हवा संग अटखेलिया कर रहे थे . उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं था , जितना की तालाब की लहरे शांत थी उतना ही उसका मन शांत था बस उसकी नजरे पानी को घुर रही थी .

मैं- इतनी शिदत से क्या देख रही हो तुम

वो- मैं इस जगह को आबाद करना चाहती हूँ

मैं- नेक विचार है यदि तुम चाहो तो मैं तुम्हारी मदद करना चाहूँगा इस काम में

वो- मदद एक झूठा शब्द है , सबके अपने अपने स्वार्थ है इस रात में अगर तुम यहाँ पर हो तो कोई न कोई वजह जरुर होगी , अपना घर बार छोड़ कर तुम यहाँ आये हो तो कोई बात जरुर होगी .

मैं- तुम कुछ ज्यादा ही साफ़ हो

वो- तो क्या स्वार्थ ले आया तुमको यहाँ पर

मैं- कुछ सवाल है मन में , इस जगह का क्या इतिहास है , यहाँ पर क्या हुआ था .यहाँ पर बरसो पहले एक चोरी हुई थी , मैं जानना चाहता हूँ की वो किसने की थी .

वो- अतीत के भी बड़े अजीब अफसाने है,

मैं- तुम्हारे क्या फ़साने है

वो- मेरे क्या फ़साने होंगे, मैं रात हूँ , मेरी बात थोड़ी सी है , अंधेरो में उजालो की तलाश है मुझे

मैं- रात है तो बीत जाएगी , उजाले आयेंगे माना की देर होगी पर रात बीत ही जाएगी .

उसने घूर कर मुझे देखा और उठ खड़ी हुई.......................

 
#22



मेरी नजर आसमान पर पड़ी, चाँद इतना खूबसूरत पहले कभी लगा नहीं था , पर क्या वो इस चेहरे जितना खूबसूरत था अपनी सोच में गुम मुझे मालूम ही न हुआ की कब वो सीढियों को पार कर चुकी थी .

“सुनो जरा, ” मैंने उसे आवाज दी . उसके कदम ठिठक गए . मैं दौड़ कर उसके पास गया .

मैं- इतनी रात को अकेले जाना सुरक्षित नहीं , गलत मत समझना पर तुम्हे ठीक लगे तो मैं छोड़ दू तुम्हे तुम्हारे घर तक

उसने अपने कंधे उचकाए मैं समझ नही पाया की हाँ कहा या न . बस उसे देखता ही रहा मैं .

वो- इतना तकल्लुफ क्यों भला, मेरे रस्ते मेरे कदमो को पहचानते है और फिर मैं तुमको जानती ही नहीं

मैं- कभी कभी अजनबियों पर भी भरोसा कर सकते है , माना की आज अनजाने है पर कल न रहे

वो- कल किसने देखा

मैं- इसका जवाब आज तो नहीं मेरे पास

वो- फिर सवाल क्यों

मैं कुछ नहीं कह पाया उसे , उसने भी मुड कर नहीं देखा और चली गयी . चली तो गयी थी पर लगा की मेरा कुछ ले गयी अपने साथ वो . अगली सुबह मैं एक बार फिर से हवेली में मोजूद था , आँगन के बीचोबीच खड़ा मैं सोच रहा था की क्यों ये ईमारत इतनी खास है आखिर क्यों. क्या महज मेरी दिलचस्पी ही थी या फिर कुछ तो यहाँ ऐसा हुआ था जो मेरा आज बनकर मेरे सामने खड़ा हो गया था . एक बार फिर से मैंने हवेली की तलाशी लेना शुरू किया , एक बार फिर मैं सरिता देवी के कमरे में था . जितना इस परिवार के बारे में सुना था उसके हिसाब से मेरी खोजबीन के तीन आधार थे जर जोरू और जमीन . जिसने भी ठाकुरों को मारा दिलेर रहा होगा उसके मन में नफरत खूब रही होगी . पर पेंच ये था की मैंने जितने भी लोगो से बातचीत की एक बात थी की ठाकुर गाँव वालो की मदद खुले हाथ से करते थे बेशक बदले में वो उनकी बहन बेटियों को नोच लेते थे पर गाँव वालो ने उनका मान भी खूब रखा जब तक की ठाकुर के तीनो बेटे मर न गए उसके बाद हवेली मुरझा गयी और लोगो में उसका रुतबा भी खत्म हो गया . रुपाली के बारे में गाँव के लोग बात नहीं करते थे न जाने क्यों .

सरिता देवी के कमरे को मैने गहनता से देखा , एक पूरी अलमारी महंगे गहनों से भरी थी जिनमे अब दिलचस्पी नहीं थी . सामान में साला कुछ ऐसा नहीं था की कोई तो वजह लगे . रह रह कर मुझे जो बात परेशान किये हुए थी की सरिता देवी को सीढियों से धक्का ठाकुर ने दिया था क्यों, क्या शराब के नशे में हुआ था ऐसा या फिर कोई और वजह थी . मैने चांदनी से इस बारे में बात करने का सोचा एक वो ही थी जो मेरी उलझन को सुलझा सकती थी . तभी मेरी नजर उस बात पर गयी जिसे मैंने शायद इग्नोर कर दिया था , वो एक तस्वीर थी एक पुराणी तस्वीर जिसमे मैंने सरिता देवी किसी लड़के के साथ खड़ी थी और वो जगह कोई और नहीं बल्कि लाल मंदिर थी . दिलचस्प बात ये थी की वो लड़का सरिता देवी के तीनो बेटो में से कोई नहीं था . न जाने क्यों मुझे अजीब सी उत्सुकता हो गयी मैंने वो तस्वीर जेब में डाली और हवेली से बाहर आ गया .

मैं चंदा से मिलना चाहता था क्योंकि वो ही एक कड़ी थी जो इस तस्वीर के बारे में मुझे बता सकती थी .पर इससे पहले की मैं चंदा से मिल पाता मुझे रस्ते में चांदनी मिल गयी जो गाड़ी लेकर कहीं जा रही थी .

“अर्जुन, कहाँ गुम हो मैं तुमसे मिलने ही जा रही थी ” उसने मुझे इशारा किया तो मैं गाड़ी में बैठ गया

मैं- बस उलझा हूँ अपने आप में , वैसे मैं भी तुमसे मिलना चाह रहा था .

चांदनी के चेहरे पर मुस्कराहट आ गयी

“इतनी बेताबी होती तो कभी का मिल लेते यूँ इंतज़ार न करवाते ” उसने कहा

मैं- तुमसे मिलने को तो बेताब हूँ मैं हमेशा से पर अभी मेरा कारण कुछ और है

मैंने जेब से तस्वीर निकाली और उसके हाथ में रख दी

“ये तो दादी के साथ पिताजी है चांदनी ने एक साँस में ही कहा

मैं- ओह , तुम्हारे पिता को कभी देखा नहीं न इसलिए समझ नहीं पाया पर ये जगह कौन सी है

चांदनी- लाल मंदिर के पीछे जंगल के पास कभी आम का बाग़ होता था हमारा , पिताजी को बहुत पसंद था वहां पर जाना . पर तुम्हे ये तस्वीर कहाँ से मिली

मैं- हवेली से

चांदनी- ओह , मैं भी न

मैं हलके से मुस्कुरा दिया .

मैं- तुमने कभी प्रयास नहीं किया अपने पिता को तलाशने का

चांदनी- क्या तुम्हे भी ऐसा लगता है

मैं- बस पूछ रहा हूँ

चांदनी- सबको लगता है की पिताजी ने सब हडप लिया पर जाने से पहले ताईजी खुद सौंप गयी थी उनको , उन्होंने खुद वसीयत पिताजी को दी थी

चांदनी की बात सुनकर मेरे कान खड़े हो गए क्योंकि मुझे मालूम हुआ था की शौर्य सिंह ने केवल हवेली की मालकिन बनाया था रुपाली को और ये बात सच थी तो वो कैसे जायदाद सौंप सकती थी चांदनी के पिता को

मैं- तुमने चंदा से बात की , क्या वो तैयार हुई तुम्हारे घर काम करने को

चांदनी- उस नौकरानी में इतनी दिलचस्पी क्यों है तुम्हे

मैं- पता नहीं , पर मुझे लगता है की कुछ तो झोल कर रही है वो

चांदनी- तुम कहो तो उठा लू उसे और दो थप्पड़ मार कर पता कर लू

मैं- कोशिश करके देख सकती हो , घाघ लोग कैसे होते है तुम समझ जाओगी वैसे मुझे लगता है की भूषण की मौत में उसका हाथ जरुर है

चांदनी- मैंने भी सोचा था ऐसा सबको मालूम है की चंदा और भूषण की कभी भी नहीं बनी , भूषण ने खुद दादाजी को कई बार कहा था की चंदा को हवेली से बहार निकाल दे.

मैं- पर ठाकुर ने भूषण की एक नहीं सुनी मतलब हवेली में चंदा की अहमियत भूषण से ज्यादा थी .

जब मैंने चांदनी से ये बात कही तो मुझे ख्याल आया की चंदा के पास गर्म जिस्म था परोसने को और उसके जिस्म के शोकीन हवेली में चारो तरफ थे पर एक बात और थी की चंदा के पति को पुरुषोत्तम ने फांसी दी थी . घूम फिर कर बात एक बार फिर लाल मंदिर पर आ गयी थी और अब कुछ भी करके मुझे उस चोरी की घटना का पता करना ही था ..............
 
#23



रात को एक बार फिर से मैं लाल मंदिर के प्रांगन में खड़ा हुआ था , कुछ तो बात रही होगी यहाँ पर मैंने दिन में ही सोच लिया था की सोलह सत्रह साल पहले जब ये मंदिर आबाद रहा होगा तो पुजारी भी रहा ही होगा बस उसे तलाशने की जरुरत थी . कुछ आवाजो ने मेरा ध्यान खींचा तो मैं सीढियों की तरफ गया और एक बार फिर से वो ही लड़की मुझे वहां बैठी मिली.

“क्या तुम्हे भी ये खामोशिया पसंद है जो बार बार यहाँ लौट आते हो ” उसने बिना मुझे देखे कहा न जाने कैसे उसे मेरी उपस्तिथि का भान था .

“तुम खामोशियो की बात करती हो , मेरे मन में ज्वार उठा हुआ है ” मैंने कदम आगे बढ़ा कर उसके पास बैठते हुए कहा .

“अक्सर मन के कच्चे लोग उलझ जाते है अपनी कथनी में ” उसने कहा

मैं- तुम किस्मे उलझी हो

वो- ये सामने क्या दीखता है तुमको

मैं- एक बर्बाद पानी का सोता

वो- मुझे ये रक्त दीखता है , मेरे कुल का रक्त

उसने बेशक हलके लहजे में वो बात कही थी पर उसके शब्दों का वजन बहुत जायदा था .

“”तुमने मेरा नाम पुछा था न , डेरे की वारिस हूँ मैं पद्मिनी डाकू मंगल की पोती “ उसने कहा

मैं- तो तुम भी मेरे जैसी ही हो अपने वजूद की तलाश करती हुई

पद्मिनी- मुझे रक्त की तलाश है

मैं- किसका रक्त

पद्मिनी- ये प्यास भी बड़ी अजीब होती है ये प्यास कहाँ देखती है कहाँ फर्क करती है इसे तो बस अपनी पूर्ति से मतलब होता है

मैं- पर तुम्हारी तलब की कहानी कुछ खास जरुर रही होगी . बेशक बताना न बताना तुम्हारी अपनी मर्जी है पर मैंने सुना है की मन की बात कह देने से थोडा बोझ हल्का जरुर हो जाता है

पहली बार मुझे ऐसा लगा की पद्मिनी ने मुझे जी भर कर देखा हो

“क्या तुम मान्यताओ में विश्वास करते हो ” उसने पूछा

“मेरा विस्वास मान्यताओ को तोड़ने में रहा है ” मैंने कहा

पद्मिनी- ये जो पानी का सोता है न , कहते है की ये इसे कोई पूरा नहीं कर पायेगा न जाने किसकी बद्दुआ है बहुत लोगो ने कोशिश की पर कोई भी इसे तालाब नहीं बना पाया.

मैं- तुम क्यों कोशिश नहीं करती क्या पता तुम ये अधुरा काम पूरा कर सको वैसे भी इतनी शिद्दत से तुम्हारी आँखे देखती है इस को तुम्हारा मन बहुत गहरे से जुड़ा है लगता है

पद्मिनी ने एक गहरी साँस ली और बोली- सोलह साल पहले मेरे कुल का रक्त इसी सोते के पानी में मिला दिया गया था .

मैं- मंदिर में रक्त बहाने वाला को शैतान ही रहा होगा.

पद्मिनी- रक्त , रक्त की तलब सदा ही रही है उस देवी को , उसके दर से कभी किसी को आश्रीवाद नहीं मिला. मिला बस दुःख, दुनिया अपने दुःख अपनी तकलीफ इश्वर को बताती है , कहते है की माँ का कलेजा अपनी औलादों के लिए तडपता है पर इस माँ का कलेजा भी इसकी तरह पत्थर का ही है , कभी पसीजा ही नहीं अपनी औलादों के लिए.

मैं- तेरी कहानी भी मुझ सी ही है पद्मिनी तू भी अकेली मैं भी अकेला कहने को हमारे पास सब कुछ पर देखे तो कुछ भी नहीं .

उसने कनखियों से अपनी आँखों का पानी पोंचा और जाने को उठ खड़ी हुई .

मैं- फिर मिलोगी क्या

वो- किसलिए

मैं- अच्छा लगता है तुमसे बाते करना

वो- मैं जरुरी नहीं समझती

मैं- डेरे में आऊंगा मैं फिर

उसने कोई जवाब नहीं दिया और अपने रस्ते पर बढ़ गयी . मेरी नजरे रह रह कर उस पानी के सोते की तरफ जा रही थी पास में एक कुदाली पड़ी थी पद्मिनी के शब्द मेरे कानो में गूँज रहे थे .मैंने पतलून को घुटनों तक मोड़ा और कुदाली लेकर सोते में उतर गया. बहकती रात में ठन्डे पानी ने बदन को चूम कर जो अहसास दिया लगा की रेत पर बरसो बाद कोई बूँद से गिर गयी हो . मैंने कुदाली उठाई और पानी में दे मारी कुछ देर मैं कीचड को बाहर फेंकता रहा और फेंकता रहा .

आँख खुली तो मैंने देखा आस पास लोगो का हुजूम इकठ्ठा था

मैं- क्या हुआ इतनी भीड़ क्यों है

“हमी से कारन पूछते हो बेटा ” एक बुजुर्ग ने कहा

मैं- समझा नहीं बाबा

बुजुर्ग- जरा अपने पीछे देखो तो जरा

मैंने मुड कर देखा तो मेरी आँखे फटी की फटी रह गयी पानी का सोता गायब हो चूका था और उसकी जगह तालाब हिलोरे मार रहा था .

बुजुर्ग- एक रात में तालाब खोदने वाले कौन हो तुम

मैं- मेरा नाम अर्जुन है बाबा . और मेरा नाम ही मेरी पहचान हैं मैं इस मंदिर को आबाद करने आया हूँ

मेरी बात सुन कर वहां मोजूद लोगो में खुसर पुसर शुरू हो गयी .

“ये मंदिर हमारी जमीन पर बना हुआ है , हमने तुझसे पहले भी कहा था की हमारे इलाके से निकल जा और दुबारा इस तरफ दिखना मत पर तूने चेतावनी को हलके में लिया ” जय सिंह की आवाज सुनते ही गाँव वाले तितर बितर हो गए वो अकड से चलते हुए मेरे पास आया .

मैं- मंदिर में मेरा या तेरा नहीं होता मंदिर सबका होता है और किस जमीं की बात करता है तू जय सिंह , शौर्य सिंह के बाद जमीनों का कोई असली मालिक है तो वो रुपाली ठकुराइन है , सब जानते है तेरे बाप ने धोखे से सब कुछ हथिया लिया . ये मेरी इच्छा है की मंदिर दुबारा से आबाद हो तो होगा . किसी माई के लाल में इतना दम नहीं की वो अर्जुन को रोक सके

“मंदिर का इतिहास रक्तरंजित रहा है बेटा , बरसो पहले गाँव में यहाँ इतना रक्तपात देखा था की आज तक पुश्ते कांपती है तुम ठाकुरों से दुश्मनी मत लो ” उसी बुजुर्ग ने मुझसे कहा

मैं-गाँव बसाने वाले उसे उजाड़ा नहीं करते बाबा, बरसो पहले क्या हुआ क्या नहीं उसकी क्या परवाह करनी पर आज कोई कहे की गाँव उसकी मल्कियत है तो थूकता हु मैं . लोगो पर राज नहीं किया जा सकता लोगो को साथ लेकर चला जाता है . वो दौर बीत गया बाबा जब गुलामी लोगो की तक़दीर हुआ करती थी गाँव तेरा भी उतना ही है जितना जय सिंघ का जितना किसी और का जितना हर एक गाँव वाले का .

जय सिंह- अपनी औकात से बहुत ज्यादा बोल गया तू, तुझे तेरी मौत हमारे इलाके में घसीट लायी है

मैं- इलाके कुत्तो के होते है जय सिंह क्योंकि उनको अपनी हदे मालूम होती है अर्जुन शेर है और शेरो के जंगल होते है



“ तो फिर ठीक है हम भी देखते है तेरे खून में कितनी गर्मी है जब ये धरा तेरे रक्त को पीयेगी तो सकूं बहुत मिलेगा. तूने राजाओ को चुनोती दी है तो ये गाँव भी देखेगा की हमारा जोर न पहले कभी कम था न आज कम है ” जय सिंह ने मेरे सीने पर अपनी बन्दूक लगा दी.
 
#24



“मेरे जोर की आजमाइश मत कर जय सिंह . कहीं ऐसा न हो की तुझे अफ़सोस करने में देर हो जाये ” मैंने दांत पीसते हुए कहा

जय सिंह- देर तो हो चुकी है

अगले ही पल मैंने दुनाली को ऊपर की तरफ मोड़ दिया और ठीक तभी धायं की आवाज से प्रांगन गूँज उठा, गाँव वालो में अफरा तफरी मच गयी , पर मेरे कदम नहीं डगमगाए मैंने दुनाली को छीन कर फेंक दिया और एक लात मारी जय सिंह को वो मिटटी में जाकर गिरा .

“तेरी ये मजाल कुत्ते ” जय सिंह फिर से मेरी तरफ लपका पर मैंने फिर से उसे एक लात मारी और उसका गिरेबान उठा कर खड़ा किया

“चाहूँ तो तेरी गांड में लकड़ी डाल कर तेरे मुह से बाहर निकाल दू पर मैं ये टकराव नहीं चाहता ,माना की तेरा गुरुर है तू उस खानदान का वारिस है जिसने अपने पसीने और लहू से गाँव को सींचा है पर तेरे पास मौका है महान बन जा , तेरे पुरखो ने इसको बर्बाद किया है उनके गुनाहों का प्रायश्चित कर ले ” मैंने उसके कान में कहा

“मैं भी अपने पुरखो के रस्ते पर चलूँगा मैं भी तेरे लहू से इस धरा को सींच दूंगा. ” जय सिंह ने मुझे धक्का दिया और इस से पहले की मैं उसका प्रतिकार कर पाता पीछे से किसी ने मेरे सर पर वार किया और मेरे सोचने समझने की शक्ति समाप्त हो गयी . मुझे बस इतना याद रहा की कुछ गीला गीला सा बहते हुए मेरे गालो तक आया हो .

“धाड़ ” एक और हुए वार ने मेरे पैर डगमगा दिए पर इस से पहले की घुटने टिक जाते मैंने पीछे मुड कर डबडबाई आँखों से देखा की हाथ में लाठी लिए अजित सिंह खड़ा था

“पीठ पर वार किया तूने सीने पर खायेगा ” मैने अजित सिंह की लाठी को पकड़ा और उसे धक्का दिया पर सर बुरी तरह से चकरा रहा था .

“अर्जुन तूने जय सिंह को अकेला समझने की भूल कैसे की कम से कम देख तो लेता की उसकी दोस्ती किस से है ” अजित ने मुझ पर वार किया

मैं- कुत्तो का झुण्ड चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो सपनो में भी वो शेरो का शिकार नहीं कर सकते

“तेरा ये वहम भी दूर कर देंगे हरामजादे , आज सारा गाँव देखेगा की हमारे सामने सर उठाने का अंजाम क्या होगा ” जय सिंह ने मेरे मुह पर जोरदार मुक्का मारा .

जय सिंग ने हंटर निकाल लिया और एक के बाद एक मुझ पर वार करने लगा. मेरी शर्ट के चीथड़े हवा में उड़ने लगे. मुझे थोडा समय चाहिए था दो बराबर के लडको से इस हालत में लड़ना मुझे भारी पड़ रहा था , तभी निचे जाती सीढियों से मेरा पैर टकराया और मैं लुढ़कते हुए तालाब में जा गिरा. एक पल मुझे लगा की जैसे लहरों ने मुझे जकड लिया हो मेरा गला घोंट दिया हो पर मैने महसूस किया की किसी चीज से मैं टकराया हूँ और मेरी चेतना जागृत हो गयी . लहरों को चीरते हुए मैं वापिस लौट आया . खांसते हुए मैंने अपने हाथ पत्थरों की सीढियों पर टिकाये और गहरी सांसे लेने लगा. ऊपर आते हुए मैंने एक लड़के का गमछा खींच कर अपने सर पर बाँधा

“अजित सिंह मैंने बहुत कोशिश की तुझे माफ़ करने की सरपंच जी की मौत का जो तूने उपहास उड़ाया मैं पी गया वहां भी मैं गाँव के लिया खड़ा था यहाँ भी पर आज मैं तुझसे कहता हूँ तेरे सारे अपराध आज पुरे हुए कल ही किसी ने मुझसे कहा था की ये धरा प्यासी है रक्त का आह्वान करती है ये धरा और देख आज तेरी किस्मत तुझे यहाँ ले आई ,” मैंने कहा

अजित- अभी भी गुरुर नहीं टुटा तेरा, वैसे तूने ठीक कहा आज किस्मत मुझे यहाँ ले आई बचपन से नफरत करते आया हूँ तुझसे आज ये नफरत ख़त्म हो जाएगी .

मैं- आजा फिर . मुद्दा तो बहुत छोटा था पर ये भी सही .

मैंने अजित सिंह के हाथ की उंगलियों को उमेठ दिया और उसकी चीख निकल पड़ी . जय सिंह मेरी तरफ लपका पर अब मैं सावधान था मैंने सर झुका कर उसको काँधे पर लिया और सीढियों की तरफ धकेल दिया , उसका सर सीढियों पर बने खम्बे से टकराया और वो लुढक गया . मैंने अजीत को धर लिया , जिस लाठी से उसने मुझे मारा था वो लाठी मैंने हाथ में उठा ली और अजित के हाथो पर वार किया

“कहा था न पीठ का हिसाब तेरी छाती देगी ” मैंने अजित के सीने पर लात मारी और उसे धरती पर गिरा दिया . मेरा पैर उसकी छाती पर था

मैं- देख साले तेरे गुरुर के साथ तू भी मेरे कदमो में है और मेरी भी जिद है की तेरे गुरुर के साथ साथ तुझे भी ख़ाक में मिला दू

मैंने जी भर कर लाठी के वार अजित की छाती पर करने शुरू किये अजित किसी भैंसे की तरह रंभाने लगा.

“तू भी आजा बहनचोद जय सिंह तेरी भी गांड आज तोड़ कर ही जाऊंगा ” मैं जय सिंह की तरफ लपका और उसके चूतडो पर लात मारी . फिर मैंने दुबारा से अजित को पकड लिया और उसके पैर को घसीटते हुए प्रांगन के बीचो बीच ले आया .

मैं- क्या कह रहा था तू अब बोल न साले

“कड़क ” आवाज आई और अजित की चीख इतना जोर से गूंजने लगी की वहां खड़े प्रत्येक व्यक्ति का कलेजा कांप गया . पलक झपकते ही अजित का पैर टूट गया .

मैं- न न न अभी ये मैदान मत छोड़ प्यारे, अभी तो शरूआत है जब तक तेरे प्राण न छूट जाये ये तड़प तेरी साथी बनी रहेगी .

मैंने उसके टूटे हुए घुटने पर लात मारी और उसकी चीख ने मेरी रूह को इतना सकूं दिया की क्या ही कहूँ पर बस कुछ पल के लिए क्योंकि तभी एक आवाज एक चीख मेरे कानो में टकराई



“अर्जुन , छोड़ देअजित को ” और मैं हक्का बक्का रह गया .
 
#25



“अर्जुन छोड़ दे अजित को ” चांदनी ने चीखते हुए कहा.

मैं तो बस उसे देखते ही रह गया समझ ही नही पाया की हो क्या रहा है . लम्बे लम्बे डग भरते हुए वो मेरे सामने आकर खड़ी हो गयी .

“इतनी जुर्रत करने की सोची भी कैसे तुमने ” उसने सख्त आवाज में सवाल किया

मैं- ये बात इनसे ही पूछती तो बेहतर रहता

चांदनी- मैं तुझसे पूछ रही हूँ अर्जुन

मैं- इस हरामजादे से ही पूछ लेती न

मैंने फिर से अपना पैर दे मारा अजित के टूटे घुटने पर

“अर्जुन ” चांदनी ने मुझे जोर से धक्का देकर पीछे कर दिया

मैं- इस नीच के लिए इतनी हमदर्दी क्यों चांदनी . इस दो कौड़ी के आदमी के लिए तूने मुझे धक्का दिया

चांदनी- दो कौड़ी का नहीं है ये , इनमे से एक मेरा भाई है जिसे तूने मारा है और दूसरा ..............

वो खामोश हो गयी .

मैं- दूसरा क्या

वो कुछ नहीं बोली

मैं- दूसरा क्या

चांदनी- दूसरा मेरा मंगेतर है ,

पल भर में ही उसने पैरो के निचे से जमीन छीन ली थी .

“क्या कहा तूने ” मैंने सवाल किया

चांदनी- वही जो तूने सुना , अजित सिंह मंगेतर है मेरा

मैं- बहुत बढ़िया बहुत ख़ुशी की बात है ये लाडली, तू भी क्या याद करेगी जा लेजा इनको बख्श दी इनकी जिन्दगी . रे लाडली तेरी आँखों में आंसू देकर अगर जिए तो क्या ख़ाक जिए जा खुश रह .

मैंने अपना हाथ चांदनी के सर पर रखा और मुस्कुराते हुए आगे बढ़ गया देखा ही नहीं की पीछे क्या छूट गया देखते भी कैसे पीछे टूटे सपनो का ढेर जो पड़ा था .शरीर की चोटों की किसे परवाह थी पर मन पर जो जख्म लगा था न उसका दर्द बहुत था .

“इतना बड़ा काण्ड करने की भला क्या ही जरुरत आन पड़ी थी , तुम न तो पञ्च हो न सरपंच और न ही तुम्हारा कुछ भी लेना देना है उस गाँव से , अजित ने जो किया उसकी सजा उसे जरुर मिलेगी , उसका बाप सरपंच है मैं पंचायत बुलाने वाली हूँ अजित पांव पकड़ कर माफ़ी मांगेगा ” निर्मला ने मेरी मरहम पट्टी करते हुए कहा

मैं-माफ़ी की जरूरत नहीं है मैं चाहता तो एक पल में मार देता उसको पर बात ही ऐसी थी की खुद को रोकना पड़ा

निर्मला- क्यों

मैं- बस समझ लो की किसी का कहा नहीं टाल सका मैं.

निर्मला- दुश्मनी की आग इतनी आसानी से नहीं बुझेगी अब ये , गाँव तो पहले भी दो हिस्सों में था पर जिस आग को सरपंच बुझाते बुझाते सरपंच जी खुद झुलस गए मैं नहीं चाहती तुम भी उसी आग में झुलसो. हम सब कहीं और चले जायेंगे ये सब छोड़ कर

मैं-अपनी मिटटी को छोड़ कर कहाँ जायेंगे इस गाँव में बचपन बिताया है , उस गाँव में अपने होने का कारण तलाशना है बदनसीब होते है वो लोग जिन्हें अपना घर गाँव छोड़ना पड़ता है .मैं कौन हु माँ बाप कौन थे किसे पता ले देकर ये गाँव ही तो पहचान है इसे भी छोड़ दिया तो कैसे जी पाएंगे और फिर वो दुश्मनी ही क्या जिसे निभाया न जाये. अभी तो शुरुआत हुई है आग जो सीने में लगी है चाहू तो ज़माने में लगा दू पर ये जमाना भी तो मार ही है न न .

निर्मला ने आगे कुछ नहीं कहा पर उसके माथे पर पड़े बल बता रहे थे की वो गहरी चिंता में पड़ गयी थी . रात को अचानक से आते शोर की वजह से मेरी नींद टूट गयी , बदन दर्द से झूझते हुए मैं कमरे से बाहर आया तो देखा की फोन बज रहा था , मैंने उठाया

“कौन है ” मैंने पुछा पर उधर से कोई आवाज नहीं आई .

“अरे बोलो न यार कौन है ” मैंने पुछा

“तू ठीक है न अर्जुन ” चांदनी की आवाज जैसे मेरी रूह में उतर गयी

मैं- पहले से बहुत बेहतर हु मैं पर तूने फोन क्यों किया

चांदनी- मैं नहीं करुँगी तो कौन करेगा

मैं- फ़ोन रख दे लाडली रात बहुत हुई सो जा हसीं सपने तेरा इंतज़ार कर रहे होंगे.

वो- वो सपने ही क्या जिनमे तू साथ न होगा

मैं- आज जो हुआ उसके बाद भी तू ये कहती है अरे सकूं तो तब मिलता जब तू दौड़ कर लिपट जाती भरे गाँव के सामने मुझसे . मेरे जख्मो को करार आ जाता पर तूने , तूने दिल तोड़ दिया लाडली

वो- तूने भी तो ठीक नहीं किया न अर्जुन मेरे भाई को मारा तूने

मैं- तेरा ये उलाहना सर माथे पर पर तुझे बता देना था की तेरा मंगेतर है अजित

चांदनी- मेरी सुन तो सही

मैं- फ़ोन रख दे लाडली

मैंने फ़ोन कट कर दिया और वापिस से बिस्तर पर आकर लेट गया . अगली सुबह जब मेरी आँख खुली तो मैंने देखा की बिस्तर के सामने कुर्सी पर बैठी पद्मिनी चाय की चुसकिया ले रही थी . उसे देखते ही मैं सब कुछ भूल बैठा

मैं- तुम यहाँ कैसे और मेरा पता किसने दिया तुम को

पद्मिनी- मुझे तो आना ही था इतना काण्ड कर के कोई चैन की नींद कैसे सो सकता है देखना जो था .

मैं- अब जब तुम सामने हो तो क्या ही कहे . मैं आवाज नहीं उठाता तो कोई और उठाता जुल्म सहना भी उतना ही गुनाह है जितना की जुल्म करना

पद्मिनी- तो तुमको समाज का ठेकेदार बनना है तुम भी सोहरत का झंडा उठाना चाहते हो

मैं- नहीं मैं चाहता हूँ की समाज में सब को बराबरी का हक़ मिले.समाज को कोई मैं कोई तू न रहे समाज में हम सब रहे .

पद्मिनी-इन खोखली बातो के सपनो में मत जी अर्जुन , मेरा एक सवाल है जिसका जवाब चाहिए बस

मैं- पूछ न फिर

पद्मिनी- यहाँ नहीं वहां चल जहाँ ये सवाल बना

मैं- कहाँ

पद्मिनी- उसी मंदिर जहाँ तूने काण्ड किया है

मैंने अपनी जीप ली और पद्मिनी के साथ एक बार फिर से लाल मंदिर आ गया . वो मुझे लगभग खींचते हुए सीढियों तक ले गयी और तालाब की तरफ इशारा करते हुए बोली- ये तालाब एक रात में ये तालाब तूने कैसे बना दिया .

मैं- तेरी तमन्ना थी न मैंने कर दी पूरी

पद्मिनी ने लगभग मेरा गिरेबान पकड़ लिया और गुर्राते हुए बोली- बाते नहीं अर्जुन , बता कैसे किया तूने ये

मैं- नाराज क्यों होती है बस खोदना शुरू किया और खोदता चला गया सुबह ये ऐसा था

पद्मिनी के चेहरे पर हवाइया उड़ने लगी थी .उसका मुह खुला का खुला रह गया

मैं- क्या हुआ तेरे चेहरे का रंग क्यों उड़ गया

पद्मिनी- तुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था अर्जुन नहीं करना चाहिए था

मैं- पर क्यों



पद्मिनी - क्योंकि जो भी ये तालाब खोदेगा उसकी नियति में यही मरना लिखा है ..........................
 
हम तो तरस जाते है राना जी की कब आप हमारी कहानी पर कमेंट करेंगे, एक दौर था जब आप और हम घंटों ऐसे ही किसी थ्रेड पर गहन चर्चा मे डूब जाते थे. मैंने यूँ ही तो नहीं कहा था कि मेरा लिखा भुला दिया जाएगा और हुआ भी ऐसा ही लोग ना अर्जुन को समझ पा रहे ना पद्मिनी को. हुकुम सिंह भी भटक रहे होंगे समय की धारा मे कि कब कोई उनकी कहानी सुनाएगा
 
#26



दो पल मैं पद्मिनी को देखता रहा और फिर उसका हाथ पकड़ कर बोला- बस इतनी सी बात , अब जब मुझे मालूम हो ही गया है की मुझे यही आकर मरना है तो फ़िलहाल मैं यही पर जीना चाहूँगा.

पद्मिनी कुछ कहना चाहती थी पर वो ये भी जानती थी की मैंने इस बात को विराम दे दिया है मैं चलते हुए उस खंडित प्रतिमा के सामने आया और बैठ गया . पद्मिनी ने अपनी पीठ मेरी पीठ से जोड़ी और दूसरी तरफ मुह करके बैठ गयी .

पद्मिनी- जय सिंह से सावधान रहना

मैं- हवेली का गुरुर बरसो पहले समाप्त हो चूका , झूठा भरम है जिसे मैं तोड़ दूंगा. वैसे दुश्मनी तो तेरी भी होनी चाहिए जय सिंह से

पद्मिनी- क्यों भला,

मैं- उसके खानदान ने तेरे कुल का नाश जो किया था

पद्मिनी- हाँ तो खानदान बचा ही कहा दुश्मनी निभाने को ठाकुर के तीनो बेटे मारे गए , ठाकुर कोमा में है हवेली तबाह हो गयी

मैं- बात जय सिंह की हो रही है

पद्मिनी- वो ठाकुर कहा है सब जानते है की शौर्य सिंह का और जय सिंह के बाप का छत्तीस का आंकड़ा था , शौर्य सिंह ने कोमा में जाने से पहले तक कभी जय के बाप को हवेली का दरवाजा तक नहीं देखने दिया था . ये तो बाद में उसने सब कब्ज़ा लिया . जमीने तो बहुत पहले ही बिक गयी थी ले देकर हवेली थी जिस पर जय सिंह और उसका बाप कब्ज़ा नहीं कर पाए थे .

मैं- जानता हूँ हवेली रुपाली के नाम थी , तू बता डेरे और ठाकुरों की क्या दुश्मनी थी

पद्मिनी- शौर्य सिंह का गुरुर और उसकी अयाशी, शौर्य सिंह ने गद्दारी की थी डेरे से

मैं- कैसी गद्दारी

पद्मिनी- नहीं जानती पर उसी की वजह से मंगल बाबा और ठाकुर की दुश्मनी बढ़ गयी थी

मैं- कामिनी ठकुराइन के बारे में कुछ जानती है क्या

पद्मिनी- कुछ खास नहीं बस इतना ही की ठाकुर उसको खास पसंद नहीं करता था बाद में वो विदेश चली गयी

मैं- कोई तो ऐसा होगा जो हवेली के अन्दर की बातो को जानता होगा

पद्मिन- भूषण को सब मालूम था पर वो भी मारा गया

मैं- कोई तो है जो परदे के पीछे है उसे सामने लाना होगा मैं कोशिश कर रहा हूँ पता कर सकूँ की लन्दन में रुपाली कहाँ रहती है उस से मिलना बहुत जरुरी है .

मैं- तूने ऐसा क्यों कहाँ की जो तालाब को खोदेगा उसे मरना होगा

पद्मिनी- पता नहीं ,

बहुत देर तक हम बाते करते रहे शाम होने को आई तो वो उठ खड़ी हुई उसके पीछे पीछे मैं भी आया हम लोग निचे आये .

मैं- फिर कब मिलोगी

वो - पता नहीं

मैं मुस्कुरा दिया और बोला- उलझनों को सुलझाने में मेरा साथ दोगी

पद्मिनी- पता नहीं

उसके जाने के बाद मैंने जीप चंदा के घर की तरफ मोड़ दी . जो मुझे घर के आँगन में बैठी ही मिल गयी .

मैं- कैसी हो

चंदा- मेरी छोड़ो कल बड़ा काण्ड कर दिया तुमने गाँव में तुम्हारे ही चर्चे है

मैं- ये सब तो चलता ही रहेगा अब मुझे तुमसे बहुत जरुरी बात करनी है और उम्मीद करूँगा की तुम सच बताओ मुझे तुम्हारे पति और पुरुषोत्तम की लड़ाई का क्या कारन था क्यों पुरुषोत्तम ने उसे मरवा दिया

चंदा-मेरा पति मादरचोद था अपनी गलतियों की वजह से जान गयी उसकी मैंने उसे बहुत समझाया की बड़े लोगो के पचड़े में मत पड़ पर उसकी गांड में कीड़ा था जो मरने के बाद ही शांत हुआ

मैं- क्या हुआ था .

चंदा- मेरा पति ठाकुरों की जमीनों पर खेती करता था पर ना जाने कब तेज ठाकुर से उसकी दोस्ती हो गयी . तेज को रंडियों और शराब का शौक था वो भी तेज के साथ रह कर ये सब करने लगा. वो हवेली भी जाने लगा था धीरे धीरे वो हवेली की गाड़िया चलाने लगा ठाकुर लोग क्या करते थे उसकी खबर रखने लगा. एक रात उसने बताया की उसने जमीनों पर बने पंप हाउस में किसी को चुदते हुए देखा , ये नयी बात तो थी नहीं खेतो को कोई न कोई चुदाई करते रहता था , पर खास बात जिसने मुझे चौंकाया था वो था की कमरे में चुदने वाली औरत हवेली से सम्बंधित थी .

मैं- कौन थी वो औरत

चंदा- ये राज भी मेरे पति के साथ ही चले गया .उसने एक बार नहीं कई बार हवेली की उस औरत की चुदाई देखि थी पर कभी उसका नाम नहीं बताया .

मैं- पुरुषोतम ने ये कहकर मारा था की उसने मंदिर के गहने चुराए थे

चंदा- झूठा था वो मादरचोद , सब जानते है की गहने तो बहाना थे , असली बात थी पुरुषोत्तम का अहंकार , सब जानते थे की पुरुषोत्तम नपुंशक है मेरे पति ने पुरुषोत्तम और रुपाली की बाते सुनी थी जिसमे रुपाली उसे चोद न पाने की वजह से गाली दे रही थी .

मेरे लिए ये नयी बात थी .

चंदा- मेरे पति को मरना पड़ा क्योंकि वो उस रात मंगल सिंह से मिला था और शौर्य सिंह की मंगल से दुश्मनी थी क्योंकि थोड़े दिन पहले ही ...........



चंदा ने गहरी साँस ली और अपनी बात को अधुरा छोड़ दिया
 
Predict जैसी कोई बात है ही नहीं भाई, कहानियो की बात बस इतनी ही होती है कि उनको पढ़ो और भुला दो. मैं कभी भी सस्पेंस नहीं चाहता बस पाठकों की उत्सुकता बनी रही इसलिए एक विराम दे देता हूं, लीपापोती का कोई सवाल नहीं है भाई

कहानिया हमारे मन को अधूरी चाहते ही तो होती है मैंने नायिका के किरदार मे उसको लिखा जो मुझ को सदैव प्रिय रही एक तरह की श्रद्धांजलि जैसे.
 
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