Adultery हवेली - Page 4 - SexBaba
  • From this section you can read all the hindi sex stories in hindi font. These are collected from the various sources which make your cock rock hard in the night. All are having the collections of like maa beta, devar bhabhi, indian aunty, college girl. All these are the amazing chudai stories for you guys in these forum.

    If You are unable to access the site then try to access the site via VPN Try these are vpn App Click Here

Adultery हवेली

#27



मैं- थोड़े दिन पहले ही क्या

चंदा ने इधर उधर देखा और बोली- थोड़े दिन पहले ही मंगल सिंह ने लाल मंदिर के पीछे सरिता देवी का अपहरण कर लिया था और अफवाह थी की सरिता देवी के साथ ..........

चंदा ने जानबूझ कर अपने शब्दों को अधुरा छोड़ दिया था पर उसकी बातो का मतलब मुझसे छिपा नहीं था .

मैं- इसमें तेरे पति का क्या रोल हुआ

चंदा- वो ड्राईवर था गाड़ी का पर हैरानी की बात ये थी की मेरे पति ने बार बार दुहाई दी थी की मंगल सिंह ने सरिता देवी का अपहरण जरुर किया था पर उसके साथ कुछ भी गलत नहीं किया इस बात की गवाही ठाकुर के भतीजे ने भी दी थी पर ठाकुर ने किसी की नहीं सुनी अपने गुरुर में उसने डेरे को नष्ट कर दिया ,

मैं- पर तेरे पति को फांसी पुरुषोत्तम ने दी थी

चंदा- ये बात भी उन दोनों के साथ ही चली गयी

मैं- पर तुम नहीं गयी हवेली से, जब तक की हवेली बर्बाद नहीं हो गयी तुम वहां पर जमी रही

चंदा ने उपहास उड़ाती हुई नजरो से मुझे देखा और बोली- मैं वहां जमी रही क्योंकि रुपाली ऐसा चाहती थी उसने मुझे जाने नहीं दिया .

मैं- हर बात घूम फिर कर रुपाली पर आकर क्यों थम जाती है.

चंदा- क्योंकि रुपाली ही हवेली थी और हवेली ही रुपाली थी . तुम्हे लाख लगता होगा की हवेली की बर्बादी में मेरा हाथ रहा होगा पर ऐसा नहीं है , मेरी वहां पर कोई औकात नहीं थी , एक नौकरानी की भला क्या ही हसियत होगी और ठाकुरों का कद आसमान था .जानते हो हवेली के आसपास भी कोई क्यों नहीं फटकता क्योंकि वो मनहूस है , वहां कभी कोई पनप नहीं पाया.

मैं- तुम चारो में से किसके साथ सोती थी .

मैंने चंदा से सीधा ही पूछ लिया

चंदा- चारो के साथ ,

चंदा बहुत ही घाघ औरत थी इस जवाब ने मुझे एक बार फिर से अहसास करवा दिया था . कहानी इतनी आसान नहीं थी जितना की पहली नजर में लगती थी और यही तो वो बात थी जिसने उलझाया हुआ था . सवाल ये था की शौर्य सिंह के तीन बेटे कैसे मर गए एक ही रात में. ठाकुर कोमा में गया उस पर हमला किसने किया और ठाकुर का भतीजा कहाँ गायब हो गया . मंगल सिंह और ठाकुर की दुश्मनी का क्या कारन रहा था . ठाकुर ने कौन सा वादा पूरा नहीं किया था और सबसे बड़ी बात रुपाली ठकुराइन जिसके चर्चे ही इतने शानदार थे वो खुद कैसी रही होगी.

मेरे कदम एक बार फिर हवेली जाने को मचलने लगे थे , शाम घिर रही थी मैंने चंदा के घर पानी पिया और हवेली की तरफ निकल गया पुल के पास मुझे पद्मिनी दिखी जो घुटनों तक पैर डाले किनारी पर बैठी थी . मैं दौड़ कर उसके पास गया . उसने मुझे देखा और बोली- मेरे आगे पीछे मंडराने के आलावा और कोई काम नहीं है क्या तुम्हे.

मैं- अभी मजाक की इच्छा नहीं है मुझे मालूम हुआ है की तेरे बाबा और ठाकुर ने आपस में कोई वादा किया था जो न निभाने पर उनकी दुश्मनी हो गयी थी .

पद्मिनी- मैंने ही तो बताया था तुमको ये

मैं- पर तूने ये तो नहीं बताया था की मंगल डाकू ने सरिता देवी का अपहरण किया था और उसके साथ..............

मैंने भी चंदा के जैसे बात को अधुरा छोड़ दिया .पद्मिनी कुछ नहीं बोली

मैं- पता नहीं ये बात सची है या झूठी पर एक बात समझ तेरी और मेरी मंजिल शायद एक न हो पर रास्ता जरुर एक है . हम दोनों के रस्ते हवेली तक जाते है , और फिलहाल मैं वही जा रहा हूँ तू चाहे तो मेरे साथ चल सकती है .

पद्मिनी- मैं क्यों जाऊ दुश्मनों के घर

मैं- जिनकी दुश्मनी थी वो चले गए रह गए है तो हम लोग. मैं अपने आप को खोज रहा हूँ तेरा पता नहीं पर क्या मालूम तुझे वहां वो वजह मिल जाये जिसकी वजह से तेरे कुल का नाश हुआ . कम से कम तुझे तो मालूम होना चाहिए न की आखिर क्यों इतने लोगो की जान गयी . आना है तो आजा

कह कर मैंने अपने कदम आगे बढ़ा दिए, पर दिल को ख़ुशी हुई जब मैंने अपने पीछे पद्मिनी को आते हुए देखा उसी चोर तरीके से मैं उसके साथ हवेली में दाखिल हो गया .

“अजीब सी घुटन है यहाँ ” पद्मिनी ने हौले से कहा

मैं- सोलह साल से यहाँ कोई नहीं आया .

पर जैसे पद्मिनी ने मेरी बात सुनी ही नहीं हो बस दीवारों पर बनी तस्वीरों को देख रही थी .

“एक बड़े जमींदार और डाकू का रिश्ता कैसा हो सकता है ” मैंने पद्मिनी से सवाल किया

पद्मिनी- वो रिश्ते थे ही नहीं वो बस स्वार्थ रहा होगा , रिश्तो में कभी तेरा-मेरा जैसा कुछ नहीं होता , एक डाकू और जमींदार दोनों के बीच लालच ही रहा होगा.

पद्मिनी बहुत बुद्धिमान थी ये मैं जानता था .

मैं- अगर हम उस लालच को तलाश पाए तो क्या मालूम हम दोनों को अपने अपने जवाब मिल सके.

पद्मिनी- देख अर्जुन,मैं ये नहीं कहूँगी की बाबा शरीफ थे ठाकुर ने उनके साथ गलत किया , डाकू ने भी किसी न किसी को कभी न कभी सताया होगा . जुल्म किये होंगे किसी की बद्दुआ ली होगी .

मैं- तू इस लालच को किस नजरिये से देखती है

पद्मिनी- मैं लालच को नहीं देखती मैं नफरत को देखती हूँ इतनी नफरत अर्जुन की उसकी आग में लोग एक दुसरे को मार दे. नफरत होने के लिए बेहद ठोस कारण होना चाहिए

मैं- और वो कारण क्या होगा

पद्मिनी- मुझे लगता है की तू उसी कारण को तलाशने यहाँ आया है तो बातो में समय क्यों ख़राब करता है और देख अपने आस पास ये ईमारत क्या पता तुझसे कुछ कहना चाहती हो .

मैं- यही तो समझ नही पा रहा , रूपये गहने तमाम शानोशोकत का सामान ज्यो का त्यों पड़ा है तो फिर जाने वाले क्या ले गए अपने साथ .

“जाने वाले दर्द लेकर गए अपने साथ , इतना दर्द की फिर उनको कोई चाह रही ही नहीं होगी. ” पद्मिनी ने गहरी साँस लेकर कहा.

उसकी बात सही थी जब सब खत्म हो गया तो कोई क्या ही करता इन सब का

मैंने इस बार पुरुषोत्तम के कमरे की तलाशी ठीक से लेने का सोचा क्योंकि मेरे दिमाग में चंदा की कही बाते थी अगर पुरुषोत्तम को मर्दाना समस्याए थी तो अवश्य ही रुपाली और उसके बीच दिक्कते रही होंगे पुरुषोत्तम ने एक नौकर को फांसी दी थी , वो गहरी नफरत करता होगा उस से तभी इतना बड़ा कदम उठाया पर एक नौकर जो उसकी दया पर निर्भर था पुरुषोत्तम चाहता तो उसे काम से निकाल सकता था पीट सकता था , गाँव से बहार कर सकता था पर उसे मारा मतलब साफ़ था की नफरत गहरी रही होगी पर कितनी गहरी जर जोरू और जमीं .क्या पुरुषोत्तम को मालूम हो गया था की हवेली की औरत को चुदते हुए उसका नौकर देखता था या फिर वो नौकर ही हवेली की उस औरत को चोदता था .क्या वो औरत रुपाली हो सकती थी मैं सोच में इतना डूब गया था की बहार से आती पद्मिनी की आवाज मुझे सुनाई ही नहीं दी.

“अर्जुन , जरा यहाँ आओ देखो तो सही ”

मैं- दौड़ कर पद्मिनी के पास गया उसके हाथ में कुछ था और जब वो मैंने देखा तो मेरे माथे पर बल पड़ गए.
 
#28



पद्मिनी के हाथ में एक बेहद पुराना कागज था जो शायद खत रहा होगा मैंने तो ऐसा ही माना था जिस पर लिखा था मैं शाम को हर हाल में लाल मनदिर में तुम्हारा इंतज़ार करुँगी .

“कहाँ मिला ये तुमको ” मैंने कहा

पद्मिनी- ये डायरी मुझे कमरे में लैंप के पास मिली इसी में से

डायरी को देखा मैंने ये वही डायरी थी जिसमे शायरिया लिखी हुई थी पर शायद मैं इस खत को देख नहीं पाया था .

मैं- क्या लगता है किसने लिखा होगा ये खत

पद्मिनी- ये निर्भर करता है की खत किसके लिए लिखा गया था घर से बाहर का ही कोई रहा होगा जिसके लिए लिखा गया , घर वालो को भला क्यों खत लिखेगा कोई

बात में दम था .

“पर लाल मंदिर ही क्यों, ” मैंने कहा

पद्मिनी- तुम्हे अब तक तो समझ जाना चाहिए की हवेली और मंदिर का गहरा ताल्लुक रहा है तुम्हे उस कारण की तलाश करनी चाहिए

मैं- मुझे लगता है की ये गुरुर और नफरतो की कहानी है

पद्मिनी- मुझे लगता है की ये अधूरी हसरतो की कहानी है इस ख़त को देखो , क्या मालूम हवेली में इश्क का पौधा खिला हो और रसूखदारों के घरो में अयाशी की बेले तो चढ़ती है पर मोहब्बत के पत्तो को कुचल दिया जाता है , फ़िलहाल के लिए ये मान लेते है की कामिनी किसी से प्रेम करती थी .

मैं- वो ही क्यों

पद्मिनी- क्योंकि अक्सर बगावत ऐसे ही होती है

मैं- तुम्हे बड़ा पता है तुमने भी कभी की है क्या बगावत

पद्मिनी- तुम्हारे साथ यहाँ खड़ी हूँ ये बताने के लिए काफी है

मैं- क्या हो तुम तुम्हे समझना बहुत मुश्किल है

पद्मिनी- मैं भी नहीं समझ पा रही इस बात को अर्जुन, तुम खुद को हवेली का वारिस समझते हो और मैं हवेली के कुल का नाश करना चाहती हूँ ये कैसा नाता बनाया है नियति ने और मैं हैरान हूँ अपने आप से की क्यों मैं तुम्हारे साथ हूँ

मैं- तू जाने और तेरी नियति जाने . मैं बस इतना कहूँगा की अगर तू कभी मुझे मारे तो मेरी आँखों में देखते हुए मारना. जब तू मुझे मारे तो आहिस्ता से छुरी को मेरे कलेजे में उतारना जल्दी मत करना ,तुझे देखते हुए मरेंगे तो सकून रहेगा. मैं मेरी जान अभी तेरे पास गिरवी रख दू पर मेरी एक इल्तिजा अगर तू माने तो

पद्मिनी कुछ पल मुझे देखती रही और बोली- क्या

मैं- जब तक वो दिन आयेगा तब तक तू उदास नहीं रहेगी, बड़ी बेकार लगती है तू उदास चेहरे के साथ .

पद्मिनी ने पीठ मोड़ ली “नजरे झुका के जा रही हो ” मैंने कहा

“जाना ही पड़ेगा , थोड़ी देर और रुकी न तो ........ ” पद्मिनी ने अपनी बात अधूरी छोड़ दी और जिस रस्ते से हम अन्दर आये थे उधर बढ़ गयी .मैंने रोका नहीं उसे. एक बार फिर मैं हवेली के कमरों की तलाशी लेने लगा. कुलदीप के कमरे से मुझे जो ब्रा मिली थी उसने मुझे उलझन में डाला हुआ था वो ब्रा या तो रुपाली की थी या फिर कामिनी की और यदि ऐसा था तो कुलदीप के मन में क्या खुराफात थी भाभी को उस नजर से देखा जा सकता था पर कोई अपनी ही बहन की ब्रा को अपने कमरे में क्यों रखेगा छुपा कर .

“पुरुषोत्तम नपुंशक था ” चंदा के कहे शब्द मेरे मन में गूंजने लगे, क्या रुपाली अपनी हवस मिटाने देवर के पास जाती होगी . रुपाली कौन थी वो कैसी थी वो उसे देखने की इतनी तलब हो गयी थी की लगा कहीं दीवाना न हो जाऊं मैं. ख़त लिखने वाली जाना चाहती थी लाल मंदिर और चुदाई होती थी खेत में अजीब बात थी यहाँ पर एक कहानी नहीं पूरा झमेला था . अँधेरा होने लगा था हवेली से निकल जाने के लिए मैं निकल रहा था की मेरी नजर रसोई के पास उस जगह पर पड़ी जिस पर शायद मैंने ध्यान नहीं दिया था . लोहे का छोटा दरवाजा जिस पर केवल कुण्डी थी . मैंने कुण्डी खोली निचे जाने को सीढिया थी जिन पर धुल जाले लगे थे . एक तरफ होता अँधेरा दूसरा मेरे मन की उत्सुकता मैंने उत्सुकता पर ध्यान दिया और जालो को हाथो से हटाते हुए मैं निचे उतरता गया .

कमरा न ज्यादा बड़ा था न ज्यादा छोटा , अँधेरा होने की वजह से मैं कुछ खास नहीं देख पा रहा था पर यहाँ पर सामान बहुत भरा हुआ था तभी मेरे हाथ से कुछ टकराया और कमरा रौशनी से नहा गया . अचानक हुई रौशनी से मेरी आँखे कुछ लम्हों के लिए चुंधिया गयी पर इस से ये तो मालूम हुआ की आज भी हवेली में बिजली थी और हम चुतिया इतने दिनों से बटन की तरफ देख ही ना रहे थे .

कमरे में एक बड़ी सी मेज थी , दो अलमारिया रखी थी . एक तरफ चित्रकारी का सामान पड़ा था एक तरफ बहुत से कपडे पड़े थे . हैरानी की बात ये की दोनों अलमारी खाली थी . एक तरफ कुदालिया रखी थी . हवेली में कुदाली का क्या काम सोचते हुए मैंने एक पुराने चमड़े के बैग को देखा और जब उसे खोला तो उसमे से मुझे जो चीज मिली उसने मुझे हैरान और परेशान कर दिया .

वो चीज बेशक एक कागज़ का टुकड़ा थी पर उसका मोल बहुत था वो ठाकुर शौर्य सिंह की वसीयत थी जिसमे उन्होंने हवेली को रुपाली के नाम कर दिया था पर बात सिर्फ यही तक होती तो भी कोई बात नहीं थी असली परेशानी का कारन तो वो पासपोर्ट था जिस पर रुपाली ठकुराइन का नाम लिखा था . अब पासपोर्ट यहाँ था तो इसका मतलब साफ़ था रुपाली कभी लन्दन गयी ही नहीं कहानी इतनी आसान भी नहीं थी खेल तो कभी रुका ही नहीं था ......................
 
#29



पासपोर्ट को हाथो में लिए मैं सोच में डूब चूका था , रुपाली लंदन नहीं तो फिर कहा गयी पर इस कहानी में रुपाली अकेली नही थी जिसका अता पता नहीं था, कामिनी और ठाकुर का भतीजा भी तो गायब थे, क्या ये तीनो आपस में मिले हुए थे या फिर इन तीनो की अलग ही खिचड़ी पकी हुई थी . मैंने पासपोर्ट और वसीयत को वापिस से बैग में रखा और तहखाने की अच्छे से तलाशी लेने लगा. एक एल्बम मिला मुझे जिसमे ठाकुर परिवार के सभी सदस्यों की तस्वीरे थी पर कुछ तस्वीरे गायब थी और मुझे पूरा विश्वास था की वो तस्वीरे रुपाली की ही रही होंगी क्योंकि इस हवेली में उसकी ही कोई निशानी मोजूद नहीं थी .

भूषण इस हवेली का एकलौता वफादार जिसे कोई मार जाता है वो भी ठीक तब जब वो मुझे हवेली की अंदरूनी बाते बताने को राजी हो जाता है , मतलब साफ़ था कोई मुझ पर नजर रखे हुए था कोई हर लम्हा जानता था की मैं क्या कर रहा हूँ क्या मालूम उसी कोई ने ये बैग यहाँ पहुँचाया हो ताकि मैं आसानी से ये समझ सकू की रुपाली लन्दन नहीं गयी पर वो कोई कौन था . वो जो भी था इतना तो जरुर था की वो मुझे मोहरा बना कर रुपाली तक पहुंचना चाहता हो पर किसलिए ये सवाल और मेरे लिए खड़ा हो गया था .

रात आधी से ज्यादा बीत चुकी थी जब मैं अपने घर पहुंचा तो सब कुछ अँधेरे में डूबा था , मैंने अपनी शर्ट उतार कर फेंकी और अपने ज़ख्मो को सहलाते हुए ऊपर जाने लगा तो निर्मला की आवाज ने मेरे कदमो को रोक लिया .

“अपने ही घर में अगर चोरो की तरह आना पड़े तो समझ लेना चाहिए की खुद से भागने में बड़ी तकलीफ हो रही है ”

निर्मला के पायजेब की झंकार गूंजने लगी जब तक की वो मेरे पास नहीं आ गयी इतना पास की एक बार फिर उसकी भारी छातिया मेरे सीने पर दस्तक देने लगी .

“अब ये घर, घर रहा भी तो नहीं ” मैंने कहा

“जहाँ दो लोग रहते है वो घर हो जाता है ” उसने अपने सांसे मेरे होंठो पर छोड़ते हुए कहा.

मैं- पर न जाने मेरा घर कहा है

मैं आगे जाने को बढ़ा पर वो हिली भी नहीं .

“अजित के साथ हुई मार पिटाई ने माहौल को गर्म कर दिया है आज उसका बाप आया था और कह कर गया है की दुबारा से ऐसी घटना हुई तो अंजाम बुरा होगा .” निर्मला बोली

मैं- और तुमने सुन लिया कहा क्यों नहीं की अर्जुन को अंजाम की परवाह नहीं

निर्मला- अर्जुन दुश्मनी की आग को बढ़ाना ठीक नहीं वैसे भी सरपंच जी के जाने के बाद तुम्हारी हालत पहले जैसी नहीं , और फिर गाँव वालो का क्या है जिन लोगो के लिए तुम ये दुश्मनी पाल रहे हो वो लोग मौका आने पर साथ खड़े नहीं होंगे.

मैं- कोई बात नहीं मैं तो अपने उसूलो के लिए खड़ा रहूँगा न .

निर्मला- जिदंगी की ठोकर में सबसे पहले उसूल ही बिखरते है

मैं- तुमको जायदा पता है क्या

निर्मला- हाँ

मैंने उसे रस्ते से हटाया और ऊपर जाकर सोने की कोशिश करने लगा पर नींद भी जैसे दुश्मन हुई पड़ी थी . मेरे लिए दो दो जगह की पहेलियो को सुलझाना मुश्किल हो रहा था एक तो घर की और दूसरा हवेली की पर क्या सच में ऐसा था नहीं मैं गलत सोच रहा था ये दोनों परेशानिया तो एक ही थी जब सरपंच जी रुपाली के भाई थे तो हवेली से नाता अपने आप जुड़ना था , कडिया मेरे आस पास ही तो थी बस जरुरुत थी उन्हें जोड़ने की . मैं तुरंत निचे आया निर्मला सो रही थी . उसकी पीठ मेरी तरफ थी , साडी में उसकी उभरी हुई गांड क्या क़यामत लग रही थी . मैं जानता था की जब वो किसी और से चुद सकती थी तो मुझे भी दे सकती है पर न जाने क्यों मेरी हिम्मत नहीं होती थी उसके पास जाने की .



कांपते हाथो से मैंने निर्मला के नितम्बो पर हाथ रखा और हलके से उसे सहलाया उसके बदन ने जुम्बिश ली .पल भर में ही मैंने अपने बदन में उत्तेजना की लहर महसूस की . साँस लेने से उसका सीना बार बार ऊपर निचे हो रहा था , पसीने से भीगी उसकी नाभि , लरजते होंठ इस से पहले की मैं उन्हें चूम ही लेता बाहर से किसी के जोर जोर से किवाड़ पीटने की आवाज आने लगी मैं दौड़ कर गया और जैसे ही दरवाजा खोला वो मेरी बाँहों में झूल गया .
 
#30



“अर्जुन भैया , आपके खेतो में बाजरे पर ट्रेक्टर चला दिया अजित सिंह ने मैंने कलेश को टालने की बहुत कोशिश की पर अजित के सर पर खून सवार है उसने मुझे भी बहुत मारा, मैं कुछ नहीं कर पाया भैया कुछ नहीं कर पाया ” लखन ने सुबकते हुए कहा

मैंने उसे अन्दर लिटाया और पानी पिला कर उसकी सांसो को संयत किया

“तू फ़िक्र मत कर लखन भाई, अर्जुन अभी जिन्दा है खेतो को मैने अपने पसीने से सींचा है आज अजित के खून से सींच दूंगा. फसल पर ट्रेक्टर चला कर उसने अपनी मौत को पुकारा है उसकी यही इच्छा है तो ये ही सही ” मैं दौड़ पड़ा खेतो की तरफ

जब मैं वहां पहुंचा तो देखा की कुछ फसल पर ट्रेक्टर चलाया हुआ था और कुछ धू धू कर जल रही थी .

“कहाँ छिपा है मादरचोद , तूने ये फसल बर्बाद नहीं की तूने अपनी मौत को आह्वान दिया है सामने आ मेरे अजित सिंह ” मैंने आवेश में पुकारा उसे .

“तेरा ही इंतज़ार कर रहा था मैं सरपंच के पिल्लै जो जख्म तूने मुझे दिए है सूद समेत चुकाने का समय आ गया है ” अजित ने कहा

मैं- हाँ तो साले आज तेरा पूरा हिसाब चुकता कर दूंगा

अजित - यही तो तेरी भूल है अर्जुन ,तू भावनाओ में बह जाता है देख फसल का तो बहाना था मेरा मकसद तो तुझे यहाँ बुलाना था तू जाल में फंस गया मैंने पूरी तयारी कर रखी है,

मैं- तयारी तो मेरी भी थी उस दिन चांदनी तुझे न बचाती तो उसी दिन तेरी लाश लाल मंदिर में चढ़ा देता मैं

अजित- चांदनी तो बस मेरी है अर्जुन , तू चिंता मतकर उसके साथ जब सुहागरात मनाऊंगा तो तेरे सर का तोहफा दूंगा उसे मुह दिखाई में

मैं- जुबान को लगाम दे बहन के लोडे . कहीं ऐसा न हो की जब मैं चांदनी संग फेरे लू तो उसकी मांग में तेरा लहू भर दू .

अजित मेरी तरफ लपका सीढ़ी लात मेरी छाती पर मारी. दो कदम मैं पीछे हुआ तुरंत ही उसके वार का पर्तिकार किया. मैंने अजित के हाथो को पकड़ लिया वो छुड़ाने को जोर लगाने लगा पर मेरी पकड़ मजबूत थी .

मैं- सलीके से रहता तो सब कुछ छोड़ दिया था न तेरे लिए, ये गाँव, गाँव की चोधर अपनी जमीन छोटा भाई समझ कर तेरी गुस्ताखियों पर पर्दा डाल दिया था न , दुश्मनी की आग को बुझाने के लिए मैंने हर संभव कोशिश की पर तेरी गांड में न जाने कौन से कीड़े बुलबुला रहे थे जो तेरा गुरुर टूटता ही नहीं .

“गुरुर टूटने के लिए नहीं होता अर्जुन, बरसो से ठाकुर इन्दर सिंह ने हमें दबाया जो भी हमारा था सब छीन लिया उसने ,और आज देख तुझे मार कर मैं सब कुछ वापिस ले लूँगा ” अजित ने मेरे घुटने पर अपना पैर मारा

मैं- काश तेरी ये इच्छा पूरी हो पाती

मैंने जोर का मुक्का अजित के सर पर मारा और मुझे पूरा विश्वास था की मेरे अगले मुक्के ने उसके दांतों को हिला दिया था.

“इसी जलते बाजरे में तू भी जलेगा आज. ” मैंने उसका गिरेबान पकड़ा उअर उसे जलती फसल की तरफ लेकर चल दिया, जैसे ही ट्रेक्टर के पास पहुंचे उसने मुझे धक्का दिया और लोहे की राड उठा कर मेरी पीठ पर दे मारी. मैं जमीन पर गिरा और अगले वार से पहले ही मैंने उसके वार को पकड़ लिया और उसे ट्रेक्टर के अगले हिस्से पर दे मारा. मैंने लोहे की राड उठाई और कुछ दिन पहले घायल किये उसके घुटने पर दे मारी.

मैं- उस दिन तेरा इलाज ठीक नहीं हुआ पर आज की ये रात तू कभी नहीं भूलेगा.

“अर्जुन, मत कर ऐसा अर्जुन छोड़ दे मेरे बेटे को ” मैंने देखा सरपंच और उसके घर वाले दौड़ते हुए खेत में ही आ रहे थे .

मैं- समझाया था न तुझे काका की लगाम कस कर रख अपनी औलाद की तेरे घर आया था न समझाने पर तुमने भी सोच लिया की इन्दर सिंह मर गया तो सब खत्म हो गया पर कैसे भूल गए तुम की अर्जुन आज भी है. पर जो काम बापू नहीं कर पाया वो मैं करूँगा , उस दिन मैं रोया था तुम हँसे थे आज रोने की बारी तुम्हारी है .

“मेरे बेटे को छोड़ दे अर्जुन, वो जैसा भी है जो भी है मेरा बेटा है मेरे खानदान का वारिस है वो ” सरपंच ने गुहार की

मैं- तो समझ ले की आज तेरे खानदान का चिराग बुझ गया

सरपंच- देख क्या रहे हो कुत्तो, ये मेरे बेटे को मार रहा है और तुम तमाशा देख रहे हो मारो इसको और अजित को बचाओ

सरपंच के साथी मेरी तरफ लपके और एक बार फिर से मारपीट शुरू हो गयी इन धूर्तो की फितरत जानता था मैं की ये धोखा करेंगे पर मैं आज कोई मौका नहीं देना चाहता था . जो जहाँ जैसे मिला पेलना शुरू किया रक्त की प्यासी ये रात आज रक्त से जवान हो रही थी . की तभी “धान्य ” एक आवाज गूंजी और मेरे बदन में आग सी लग गयी . इतना जोर का झटका लगा मुझे की मैं कुछ फीट पीछे जाकर गिरा . सरपंच ने गोली चलाई थी मुझ पर .

“हरामजादे , देख तू आज क्या अंजाम होगा तेरा ” सरपंच मेरे पास आया और मुझे एक लात मारी.

“अजित मेरे बेटे उठ, देख तेरा दुश्मन कदमो में पड़ा है ले ये पिस्तौल और बुझा ले अपने सीने में धडकती हुई आग को . ”

कांपते हुए हाथो से अजित ने पिस्तौल मेरी तरफ तान दी वो गोली चलाने ही वाला था की तभी एक पत्थर उड़ता हुआ आया और अजित के हाथ से पिस्तौल निचे गिर गई.

“इन हाथो को यही रोक ले सरपंच कहीं ऐसा न हो की ये हाथ तो रहे पर धड कर सर न रहे. ” निर्मला ने चीखते हुए कहा

“ओह तो तू भी आ गयी साली ,इन्दर सिंह के संरक्षण में तेरे भी बहुत पर निकल आये है एक बार इस अर्जुन का काम तमाम कर दू फिर तेरे पर काटूँगा ” सरपंच ने निर्मला से कहा

निर्मला- तो फिर देर किस बात की तू भी यही है और मैं भी तेरे लैंड में जोर है तो खोल के दिखा न मेरे घाघरे का नाडा

“”

“हरामजादी , अर्जुन की लाश पर ही पटक कर चोदुंगा तुझे “ सरपंच ने कहा और निर्मला की तरफ अपने कदम बढ़ाने लगा पर मैंने उसका पैर पकड़ लिया

“नहीं सरपंच नहीं ” अपने आप को सँभालते हुए मैंने उठने की कोशिश की

“अर्जुन की अंतिम साँस तक वो अन्याय नहीं होने देगा. ” मैंने सरपंच के अंडकोष पकड़ लिया वो जोर से चीखा अजित ने मेरी तरफ लपका वार करने को पर मैंने एक थप्पड़ मारा वो गिरा और गिरते ही उसने पिस्तौल उठा ली

“अब कहाँ जायेगा साले ” अजित ने कहा

मैं- इन गोलियों में इतना दम नहीं की अर्जुन की छाती को पार कर सके.

निर्मला अब तक हमारे नजदीक आ चुकी थी .

“पिस्तौल गिरा दे अजित ” निर्मला ने कहा

अजित- तू तो बोल ही मत साली तेरा हिसाब बाद में होगा.

अजित ने ट्रिगर दबा दिया और मैंने सरपंच के बदन को आगे करते हुए आड़ ले ली, गोलिया सरपंच के बदन में घुसती चली गयी .

“नहीं ”अजित और सरपंच दोनों की चीख एक साथ निकली .
 
#31



कटे हुए पेड़ के जैसे सरपंच का शरीर धरती पर आ गिरा. वहां मोजूद हर एक सक्श जानता था की मामला बिगड़ चुका था. मैं भी समझ तो गया था की जो हुआ वो बेहद गलत हुआ है और भविष्य में इसके परिणाम भी ठीक नहीं होंगे लड़ाई झगडा दुश्मनी अपनी जगह पर मौत किसी की भी हो ठीक नहीं होती. निर्मला ने मेरा हाथ पकड़ा और बोली- अर्जुन चलो यहाँ से .

हम घर तो आ गए थे पर रात भयावह लगने लगी थी , ऐसा नहीं था की मुझे अजित या उसके परिवार से डर था पर सरपंच की मौत का अफ़सोस भी था . बहुत देर तक मैं बैठा रहा फिर निर्मला ने चुप्पी तोड़ी.

“जो हुआ उसमे तुम्हारा दोष नहीं है ” उसने कहा

मैं- जानता हूँ

निर्मला- तो फिर ये मातम जैसा मुह क्यों बनाया है

मैं- एक आदमी की जान गयी है

निर्मला- कभी कभी जान की कोई कीमत नहीं होती ठाकुर इंद्र सिंह की भी जान गयी थी आज तक उसके कातिल को तुम नहीं पकड पाए तो उस जान की भी क्या ही कीमत बची . जो हुआ उसे भूलो और कल पर ध्यान दो .

मैं- पर मेरी समझ में ये नहीं आता की अजित ने इस दुश्मनी को इतना क्यों गले से लगाया हुआ है , जबकि परिवारों में सिवाय चुनाव के कभी कोई बहस बाजी तक भी नहीं हुई .

निर्मला- नफरतो का तंदूर वहीं पर दहकता है जहाँ सुलगते कोयलों पर पानी ना डाला गया हो.

मैं- क्या कहना चाहती हो .

निर्मला- अजित की नफरत एक तरह से सही भी हैअर्जुन

मैं- कैसे

निर्मला- ठाकुर इंद्र की वजह से अजित की माँ को अपनी जान देनी पड़ी थी

निर्मला की बात ने मुझे हैरत में डाल दिया .

मैं- क्यों किसलिए

निर्मला- बात करीब सत्रह- अठारह साल पुराणी है , तब इंद्र पुरुषोत्तम और उसके भाइयो की संगत में पड़ कर उनकी तरह ही आवारागर्दी करने लगा था , ऊपर से वो ठाकुर शौर्य सिंह का रिश्तेदार था तो इसका गलत फायदा उठाने लगा था . मद में चूर इंद्र ने एक दिन लाल मंदिर में पूजा करती अजित की माँ पर अपना ईमान डिगा दिया और वहीँ पर उसके साथ जोर जबरदस्ती करने की कोशिश की , अपनी लाज बचाने को उस बेचारी ने अपनी जान दे दी . अजित तब छोटा था पर नफरत की आग में इतना जला की आज तक जल रहा है और अब उसका बाप भी मारा गया . जिन जमीनों को बार बार वो कब्ज़ा करने की कोशिश करता है वो जमीनों को इन्दर सिंह ने ही छीनी थी उनसे.

मैं- जुबान पर लगाम रखो निर्मला, बापू के बारे में मैं ऐसा वैअसा कुछ कुछ नहीं सुनूंगा.

निर्मला- क्योंकि वो तुम्हारा बापू था , इसलिए वो सही नहीं हो जाता. अर्जुन सच की तख्ती को गले में लटका कर घूमोगे तो सच सुनने की हिम्मत भी रखनी चाहिए. आइना हमें चेहरे का वो रूप दिखता है जो हम देखना चाहते है . अपने ऊपर लेकर देखो अगर तुम अजित की जगह होते तो क्या तुम्हारे कलेजे में आग नहीं जलती.

निर्मला की बाते कडवी थी पर सच थी बेशक मैं इस सच को मानने को तैयार नहीं था और झुठला भी नहीं सकता था

निर्मला ने मेरे कंधे पर हाथ रखा और बोली- जरुरी नहीं की हमेशा हम ही सच के साथ हो कभी कभी सच चाह कर भी हमारे साथ नहीं होता, ये दुनिया वैसी नहीं जैसी उसे तुम समझते हो .

मैं- क्या उस रात लखन ने जब तुम्हे देखा था तुम्हारे साथ बापू थे

निर्मला - नहीं , पर अगर होते तो भी क्या फर्क पड़ना था .

निर्मला अपने कमरे में चली गयी . पर मुझे नींद नहीं आई. पर उस रात मैंने वो करने का निर्णय लिया जिसके लिए निर्मला कभी नहीं मानती. दोपहर को मैं चांदनी से मिला

चांदनी- अर्जुन, जो भी हुआ बहुत गलत हुआ है

मैं- जानता हूँ

चांदनी- दुश्मनी से कभी किसी का भला नहीं हुआ और अब जो आग भड़की है उसमे मुझे भी जलना पड़ेगा

मैं- ठीक समय आने पर मैं अजित से मिलूँगा जो हुआ है मैं उसे वापिस तो नहीं कर सकता पर तुम ये उस तक पहुंचा देना

मैंने एक लिफाफा चांदनी को दिया

चांदनी ने उसे खोल कर देखा और बोली- अर्जुन, ये क्या कर रहे हो तुम . जानते भी हो इसके बाद ......

“जानता हूँ ” मैंने चांदनी की बात काटी और उसके हाथ में वो लिफाफा दे दिया. वो कुछ नहीं बोली बस मेरे काँधे पर अपना सर रख दिया उसने और कस कर मेरे हाथ को थाम लिया . वहां से मैं सीधा लाल मंदिर गया जो हमेशा के जैसे उपेक्षित था . तभी मुझे कुछ खटका और मैं तुरंत सीढियों के पास गया . उस दिन जब मैं पानी में गिरा तो मेरे सर पर कुछ तो लगा था . मैंने कपडे उतारे और पानी में गोता मार दिया . दो तीन बार गोते मारे अंदाजे लगाते हुए और जब मैं गहराई में उतरा पर मैं क्या जानता था की ये गहराई मुझे न जाने क्या दिखाने वाली थी .

पानी की गहराई में मेरे सामने वो अचरज था जिसे आँखों ने देखने से मना कर दिया था .पानी का दरिया लाल हो चूका था इतना लाल की जैसे खून बह रहा हो और जैसे ही मैंने उस दमकती आभा को हाथ आगे बढ़ा कर छुआ , मुझे इतने जोर से झटका लगा की मेरे साथ साथ पानी भी जल उठा.



“जो तुम्हारा नहीं है उसे पाने की चेष्टा न करो ” पानी में होने के बावजूद भी मैंने उन शब्दों को स्पष्ट रूप से सुना. जब होश आया तो मैं सीढियों पर पड़ा था और मेरे सीने पर खुरो के निशाँ पड़े थे.
 
देखो भाई आप अभी तक इस कहानी को समझ नहीं पाए. एक चीज होती है जिसे मल्टीवर्स कहा जाता है मैं वैसा ही कुछ करने की कोशिश कर रहा हूं. ये सारी कहानिया जो मैंने लिखी दिल अपना प्रीत पराई, प्रीत गुजारिश और तेरे प्यार मे एक आगे जाकर वापस मे मिल जाएंगी. आपने अगर अभी तक पद्मिनी और अर्जुन को नहीं समझा तो ये मेरी नाकामी है जिसे मैं स्वीकार करूंगा. वैसे बता दूँ अर्जुन और पद्मिनी की सन्तान थी आयत. अब कहीं किसी मोड़ पर जस्सी मिल जाए तो मुझे दोष मत देना :D

दूसरी बात अगर मोहब्बत इतनी आसानी से मिल जाए तो क्या खाक मोहब्बत हुई
 
#32



मुझे कुछ भी समझ नहीं आ रहा था ये मंदिर इतना तो साधारण नहीं था जितना दुनिया इसे समझती थी , मेरे लिए दो दो मुसीबते थी एक यहाँ की कहानी और दूसरी हवेली की कहानी . मैं हवेली जाना चाहता था पर तबियत ख़राब लग रही थी तो मैं वापिस से घर आ गया . निर्मला से चाय का कह कर मैं एक बार फिर से ठाकुर इंद्र के कमरे में पहुंच गया .

एक बार फिर मैं छानबीन के मूड में था पर तभी मेरे मन में वो ख्याल आया जिसने मुझे दुसरे तरीके से सोचने पर मजबूर कर दिया, कोई भी आदमी अपने राज वहां कभी नहीं छिपाएगा जहाँ वो सबके सामने आने की सम्भावना हो . मैं अपने ख्यालो में खोया था की निर्मला आ गयी .

“कभी कभी तुम्हे समझना बहुत मुश्किल है अजित को सब कुछ दे दिया अपने लिए कुछ भी नहीं रखा तुमने और लिफाफा भेजा भी तो किसके हाथ ” निर्मला ने कहा

मैं- जो उसका था उसे दे दिया मेरा क्या है और फिर भला मेरी कितनी ही जरूरते है रहने को ये घर है ही मेरे पास

निर्मला- पर क्या इस कदम से ये दुश्मनी रुक जाएगी

मैं- दुश्मनी की बात नहीं, बात हक़ की है जो उसका था उसे लौटा दिया. वैसे भी मेरी प्राथमिकता अजित नहीं बल्कि वो हवेली है जिसकी दीवारों में मेरा अस्तित्व छिपा है .

निर्मला- क्या मालूम हुआ तुम्हे नया वहां पर

मैं- कुछ खास नहीं अभी तक तो पर जल्दी ही मैं पता कर लूँगा.

तभी मेरे हाथ से वो तस्वीर वाला कागज गिर गया निर्मला उसे उठाने को झुकी और एक बार फिर से उसके गदराये यौवन के मुझे दर्शन हो गए, न जाने क्यों वो इतना गहरे गले का ब्लाउज पहनती थी . निर्मला ने वो तस्वीर वाला कागज मुझे दिया और बोली- बातो के चक्कर में चाय ठंडी कर दी तुमने , दुबारा बना कर लाती हूँ

मैं- नहीं रहने दो

निर्मला- क्या तुम सच में चांदनी से प्रेम करते हो

मैं- पता नहीं वैसे भी अजित से सगाई हुई है उसकी

निर्मला- अगर वो तुमसे प्रेम करती है तो फिर अजित की क्या परवाह करनी

मैं- तुम प्रेम को समझती हो

निर्मला- देखा जाये तो प्रेम जैसा कुछ नहीं होता सब जिस्मो को पाने के चोंचले है. यहाँ हर आदमी हर दूसरी औरत को पाना चाहता है . ये ही जीवन का वो सत्य है जिसे जानते सब है मानता कोई नहीं .

मैं- ये बात असत्य है प्रेम में स्वार्थ नहीं होता

निर्मला- जब तुमने प्रेम किया ही नहीं तो कैसे कह सकते हो ये बात जबकि मैं जब चाहू अपनी बात को प्रमाणित कर सकती हूँ , तुम ही बताओ क्या तुम्हे मेरे जिस्म की चाहत नहीं

निर्मला ने अत्याप्र्त्याषित रूप से सीधे सीधे ही ऐसा प्रशन पूछ लिया था जिसका जवाब देने में मेरे पसीने छूटने लगे .

मैं- ये कैसी बात कर रही हो तुम

निर्मला- बात को बदलो मत , अगर मैं अभी तुम्हारे सामने नंगी हो जाऊ तो क्या तुम लोगे मेरी , वैसे अजीब स्तिथि होगी तुम्हारी ले ली तो तुम्हारी बात झूठी साबित हो जाएगी और ना ली तो तुम्हारी मर्दानगी बुरा मान जाएगी .

सच कहूँ तो मेरे पास निर्मला की बात का कोई जवाब नहीं था , वो मेरे पास आई और अपने होंठ मेरे होंठो से लगा बैठी .

“दिल में नेकी होना अच्छी बात है पर सांप को दूध पिलाना ये जानते हुए भी की वो तुमको ही काटेगा चुतियापा है . ” उसने कहा और मुड गयी पर आगे न बढ़ सकी मैंने उसका हाथ पकड़ लिया . हमारी नजरे मिली और एक बार फिर से हमारे होंठो एक दुसरे से जुड़ गए. निर्मला की ठोस छातिया मेरे सीने पर दबाव डालने लगी थी और जैसे ही मेरे हाथो से उसके मादक नितम्बो को सहलाया वो मुझसे दूर हो गयी .

सुबह जब मैं नहा कर आया तो आईने में खुद को देखा सीने पर वो निशाँ अभी भी देखे जा सकते थे , मैंने गाडी निकाली और लाल मंदिर की तरफ हो लिया. किस्मत से रस्ते में ही मुझे पद्मिनी मिल गयी जो अपना झोला उठा कर कहीं जा रही थी .

मैं- तुमसे मिलना बेहद जरुरी था

पद्मिनी- क्यों

मैं- क्या तुम इसके बारे में कुछ बता सकती हो

मैंने शर्ट उतार कर वो निशान उस को दिखाया .

“ये कैसे हुआ ” उसने कहा

मैं- तुम मुझे बता सकती हो ये क्या है

पद्मिनी ने मेरी छाती पर अपना हाथ फेरा और बोली- नहीं , मैं नहीं जानती

मैं- जानती नहीं हो या बताना नहीं चाहती

पद्मिनी ने घूरा मुझे और बोली- अर्जुन, मेरा साथ मत कर . हम दोनों अच्छे से जानते है की हमारे सफ़र अलग है

मैं- सफ़र अलग हुए तो क्या मंजिल तो एक ही है न . इस निशान के बारे में जानती है तो बता दे वर्ना मैं खुद मालूम कर ही लूँगा .

मैंने गाड़ी स्टार्ट की और आगे बढ़ गया , शीशे में मैंने पद्मिनी को दूसरी तरफ जाते हुए देखा . एक बार फिर मैं तालाब में गोते लगा रहा था पर इस से पहले की मेरे साथ पहले जैसी घटना होती मेरी आँखों ने वो देख लिया जो वहां पर था और दिल ने कहा की हो न हो इसका ठाकुर शौर्य सिंह और डाकू मंगल से सम्बन्ध रहा होगा. जब मैं बाहर आकर गिरा तो देखा की पद्मिनी सीढियों पर ही खड़ी थी .

मैं- मुझे मिल गयी दुश्मनी की वजह , मैं गलत नहीं हूँ तो तेरे बाबा और ठाकुर के बीच दुश्मनी तालाब में पड़े सोने की वजह से हुई थी .

पद्मिनी कुछ नहीं बोली बस आँखे फाड़े मुझे देखती रही .

“तू इस सच को नहीं झुठला सकती की हम दोनों की किस्मत कहीं न कहीं एक दुसरे से जुडी है , मान चाहे मत मान इस मंजिल को पाने के लिए हमें साथ साथ चलना होगा “ मैंने कहा

पद्मिनी- मैं तेरी दुश्मन हूँ समझता क्यों नहीं तू

मैं- तेरे दिल से कहलवा दे ये बात मान लूँगा.

मैंने आगे बढ़ कर पद्मिनी को बाँहों में भर लिया और अपने होंठ उसके लबो से जोड़ लिए.

“नफ़रत और मोहब्बत एक ही तो होते है पद्मिनी दोनों दिल से किये जाते है , तू थोड़ी नफरत कर ले मैं थोड़ी मोहब्बत कर लूँगा. ” मैंने कहा

वो- मोहब्बत और मुझसे , फिर उस से क्या कहेगा जिसके साथ जीने के सपने देखता फिर रहा है .

मेरे पास कोई जवाब नहीं था



“तेरी मेरी राहे अलग है अर्जुन, मैं डेरे की बेटी हूँ टोने और सिद्धिया मेरा कर्म है . मेरी सिर्फ एक मंजिल है ठाकुर के अंतिम वारिस को मिटा देना मैं इंतज़ार कर रही हूँ की कब ठाकुर अपनी आँखे खोले और मैं उसे मार पाऊ . ” उसने कहा और चली गयी न जाने क्यों मैं उसे रोक नहीं पाया.
 
#33



एक बार फिर से मैं हवेली में मोजूद था . कहानी किसी एक किरदार की हो तो समझने में आसानी होती है पर यहाँ कहानी परतो में थी, टुकड़े बिखरे हुए थे पर काण्ड चूँकि हवेली में हुआ था इसलिए माना जा सकता था की कडिया भी यही बिखरी हुई होंगी. मैंने इस बार तेज ठाकुर के कमरे में नजर घुमानी शुरू की , ऐसा नहीं था की मैं पहले नहीं आया था इस कमरे में पर जबसे मुझे मालूम हुआ था की चंदा का पति तेज का पिछलग्गू था तो मेरी उत्सुकता जाग उठी थी .

शराब की बोतले मैंने एक तरफ रखी . तेज की अलमारी में ज्यादा कुछ नहीं था पर क्या सच में ऐसा था , अलमारी के अंदरखाने मुझे एक छोटा सा टेप रिकार्डर मिला जिसमे एक कसेट पड़ी थी .प्ले बटन दबाया पर चला नहीं , सेल ख़तम हो चुके थे. मैंने तुरंत कदम बाहर की तरफ बढ़ाये पर तभी मेरी नजर निचले कमरे के दरवाजे पर पड़ी, मुझे यकीन था की मैंने दरवाजा बंद किया था पर अभी दरवाजा खुला हुआ था , पीछे से कोई तो जरुर आया होगा.

उत्सुकता वश मैं कमरे में पहुंचा तो देखा की कुछ सामान बिखरा सा हुआ था शायद किसी ने मेरे जाने के बाद तलाशी ली होगी पर उस धुल भरी मेज पर एक लिफाफा बड़े सलीके से रखा हुआ था . जैसे ही मैंने लिफाफे को खोला मेरे होश उड़ गए. वो महज एक कागज का टुकड़ा नहीं था बल्कि वो एक वसीयत थी जो मेरे लिए छोड़ी गयी थी.

“आज के बाद इस हवेली का एक मात्र वारिस अगर कोई होगा तो सिर्फ और सिर्फ अर्जुन सिंह होगा ” बार बार मैं ये शब्द पढ़े जा रहा था और निचे जो लिखा था उस एक शब्द ने मेरे मन में इतनी हलचल मचा दी थी की मैं बता नहीं सकता .

“रुपाली ”

जैसा की पासपोर्ट वाली घटना से मैं जान ही गया था इस वसीयत ने मुहर लगा दी थी की रुपाली कभी लन्दन गयी ही नहीं थी . तो क्या रुपाली खुद हवेली में आई थी या फिर ये कोई जाल था मेरे लिए पर अगर जाल था तो मैंने खुद इस जाल में फंसने का सोचा और सबसे पहले हवेली के बाहर लटके उस ताले को तोड़ दिया. ये जानते हुए भी की जय सिंह से पंगा होगा इस बात को लेकर पर किसे परवाह थी .

सेल खरीदने के बाद मैंने टेप को चालू किया कुछ देर घिर्र घिर्र होती रही और फिर आवाज आई

“सी आह आः आह ” मद्धम आवाजे ये किसी औरत की थी जो चुदाई के समय मस्ती में चूर थी . कुछ देर ये आवाजे आती रही और फिर बात आगे बढ़ी .

“, बार बार मेरा यूँ आना मुमकिन नहीं है ” औरत ने कहा

“क्या करू तुमसे दूर रहना भी तो मुमकिन नहीं ” ये किसी आदमी की आवाज थी

औरत- पास भी तो नहीं रह सकती किसी को भी मालूम हुआ तो आग लग जाएगी

आदमी- मुझे परवाह नहीं अगर तुम साथ देने का वादा करो तो

औरत- ये नहीं हो सकता

उसके बाद काफी देर तक कोई आवाज नहीं आई. मैं टेप को बंद करने ही वाला था की एक बार फिर से घिर्र घिर्र हुई .

“मुझसे अब और नहीं होता कभी कभी लगता है की जान दे दू ” औरत ने कहा

आदमी- जान देना किसी समस्या का हल नहीं होता

औरत-तो क्या करूँ मैं कब तक घुटती रहूँ

आदमी-मैं जल्दी ही कुछ न कुछ करूँगा

औरत- ये जगह मिलने के लिए ठीक नहीं है, मुझे लगता है की भूषण को शक हो गया है

आदमी- हम्म

उसके बाद एक बार फिर से शायद चुदाई शुरू हो गयी थी आगे कुछ खास नहीं था . मैंने कसेट को दूसरी साइड से चलाया

“तो मैं क्या करू, अगर तुम मेरी प्यास नहीं बुझा सकते तो मेरा क्या दोष है ” औरत की आवाज आई

“तड़क ” ये थप्पड़ की आवाज थी

“थप्पड़ मार कर तुम अपनी मर्दानगी साबित नहीं कर सकते ” इस बार औरत की आवाज में तल्खी थी

कुछ टूटने की आवाज आई शायद कांच का गिलास रहा होगा

“भैया, जश्न की तैयारिया हो गयी है सब आपका इंतजार कर रहे है ”

उसके बाद कोई आवाज नहीं आई. आगे की कसेट पूरी खाली थी . बहुत देर तक मैं उस कसेट को बार बार सुनता रहा समझता रहा तेज किसी की जासूसी कर रहा था और मेरा अनुमान था की तेज रुपाली की जासूसी कर रहा होगा,जिस प्रकार कर वार्तालाप था और चंदा ने कहा था की पुरुषोत्तम नपुंसक था तो हो सकता था की रुपाली का चक्कर किसी और से चल रहा हो और तेज इस बात को जान गया हो.



कुलदीप के कमरे में मुझे ब्रा मिली थी तो क्या रुपाली अपने देवर से चुदती थी . हवेली का राज हवेली में ही मिलेगा मुझे पूरा विश्वास था . खैर दिन बीत रहा था रैना आने को बेक़रार थी तो मैं गाँव की तरफ चल दिया. दिमाग में बहुत कुछ चल रहा था एक बार फिर मैं रात को बापू के सामान को चेक कर रहा था अगर वो कामिनी से प्यार करता था तो कुछ तो सबूत मिले सोचते हुए मैं सामान को इधर उधर फेंक रहा था की मुझे एक चाबी मिली और उस चाबी ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया क्योंकि ये चाबी हो न हो उसी चाबी की जुड़वाँ थी जो मुझे वकील ने दी थी . तो क्या उस वकील को बापू ने ही भेजा था सोचते हुए मेरी आँख सी लग गयी .
 
#34



रात को अचानक से जागा तो बदन पसीने से नहाया हुआ था बेशक पंखा चल रहा था बाहर आकर पानी पिया देखा की निर्मला आँगन में ही सोयी हुई पड़ी थी . एक बार फिर से मेरी नजर उसकी मादक गांड पर पड़ी और दिल में कसक सी उठ गयी मैं चाह कर भी अपनी ही नौकरानी को चोद नहीं पा रहा था

खैर, सुबह मैंने निर्मला के साथ ही नाश्ता किया वो मुझ को गाँव की बाते बता रही थी की अजित ने पुलिस में कोई शिकायत नहीं की थी अपने बाप की मौत को लेकर,

“तुमको सावधान रहना होगा वो बदला लेने की पूरी कोशिश करेगा ”

मैं- पता है मुझे देखो कितना समय टलता है वैसे मैं तुम्हे बताना चाहता हूँ की कल मेरे साथ क्या हुआ

मैंने उसे बताया की हवेली अब मेरे नाम पर है , निर्मला की आँखों में आश्चर्य था उसे यकीन नहीं हो रहा था .

निर्मला- पर आखिर वो है कहाँ

मैं- जल्दी ही तलाश कर लूँगा उसे.

निर्मला- जब ये बात जय सिंह को मालूम होगी तो कलेश बढेगा ही बढेगा , अर्जुन मुझे ऐसा लगने लगा है की तुम किसी बड़ी मुसीबत में फंसने वाले हो

मैं- मुझे भी ऐसा ही लगता है . वैसे रुपाली हवेली छोड़ने के बाद चाहती तो अपने मायके भी आ सकती थी क्या उसका दिल नहीं करता होगा यहाँ आने का

निर्मला- उसका कोई खास मोह नहीं था किसी से , क्या सरपंच जी के मरने की खबर उस तक नहीं पहुंची होगी वो अपने भाई को रोने तक नहीं आई

मैं- मैने भी सोचा था इस मुद्दे पर , और मेरी समझ से परे है की रुपाली को छिप कर रहने की क्या जरुरत है

निर्मला- मैं भी सोचती हूँ इस बारे में जबसे तुमने कहा की वो विदेश नहीं गयी तो बात उलझी उलझी सी लगती है .

मैं- मैं चाहता हूँ की तुम मेरे साथ हवेली चलो

निर्मला- मैं, मेरा वहां क्या काम

मैं- क्योंकि मैं वहां अकेला नहीं रहना चाहता

निर्मला- क्या तुम ये घर छोड़ कर जाना चाहते हो

मैं- क्या मालूम पर मैं इतना चाहता हूँ की अगली बार मैं जब वहां जाऊ तो तुम मेरे साथ चलो

मैंने उसकी चुचियो को निहारते हुए कहा

निर्मला- ठीक है अब तुम्हारा कहा टालने की मेरी हिम्मत कहाँ

मैं- मेरी गुजारिश समझो इसे

एक बार फिर से मैं टेप में रिकॉर्ड आवाजो को सुन रहा था और कई बार सुनने के बाद मैंने जाना की आवाज किसी एक औरत की नहीं थी बल्कि दो अलग अलग औरतो की थी . मेरी उत्सुकता मुझे एक बार फिर हवेली की तरफ खींच रही थी जब मैं वहां पहुंचा तो पाया की जय सिंह पहले से मोजूद था .

“तू यहाँ कैसे ” उसने सवाल किया

मैं- ये बात मैं तुझसे पूछता हूँ की मेरी मिलकियत में तूने पैर रखने की हिम्मत कैसे की

जय- क्या बकवास कर रहा है नशे में है क्या

मैं-नशा तो तेरा उतर जायेगा चूतिये जब तुझे मालूम होगा की इस हवेली का नया वारिस मैं हूँ रुपाली ठकुराइन ने इसे मेरे नाम कर दिया है .

मेरी बात सुन कर जय सिंह की आँखे और गांड एक साथ फट गयी .

“झूठ कहता है तू ” उसने कहा

मैंने जेब से वसीयत का कागज निकाला और उसके सामने कर दिया

मैं- अच्छे से पढ़ ले और फिर निकल यहाँ से

जय सिंह- मैं नहीं मानता इस कागज के टुकड़े को वैसे भी ताईजी लन्दन में है तूने फर्जी तरीके से हवेली हडपने की साजिश की है

मैं- ये कला तेरे बाप को बहुत अच्छी तरह से आती थी उसने ठाकुर की सारी जमीने ऐसे ही तो हडपी थी और फिर तेरी ताई जो लन्दन में उस से जाकर पूछ ले न वो तुझे सच बता देगी

जय- मेरे बाप का नाम इज्जत से ले

मैं- हवेली की चिंता छोड़ और अपने बाप को तलाश कर तुम लोगो को छोड़ कर न जाने कहा भाग गया वो . कहीं उसने ये तो नहीं सोचा की क्या फायदा ऐसी बावली गांड औलाद के साथ रहने का .

जय- जल्दी ही मरेगा तू

मैं- कोशिश कर के देख लेना पर फिलहाल के लिए निकल यहाँ से

तभी मेरी नजर चंदा पर पड़ी जो दूर खड़ी हमें देख रही थी . जय सिंह पैर पटकते हुए जैसे ही गया मैं चंदा के पास पहुँच गया .

मैं- क्या देख रही थी

चंदा- लकडिया लेने जा रही थी तुम लोगो को झगड़ते देखा तो रुक गयी .

मैं- सुन मुझे कुछ मजदूरो की जरुरत है हवेली की साफ़ सफाई करवानी है इन झाड़ियो को कटवाना है

चंदा अपनी आँखों को चौड़ी किये मुझे देखती रही .

मैं- सुन रही है न तू

चंदा- क्या सच में रुपाली ठकुराइन लौट आई है

मैं- हाँ कल रात वो इसी हवेली में मेरे साथ थी . और जल्दी ही यही आके रहेगी .

चंदा- मैं अभी जाती हूँ और मजदूरो का इंतजाम करवाती हूँ.

उसके जाने के बाद मैं एक बार फिर से तेज के कमरे में आ गया. मुझे कसेट को एक बार और सुनने के बाद मुझे कुछ कुछ समझ आने लगा था मैंने अपनी जेब में हाथ डाला और उंगलियों ने उस चाबी को महसूस क्या , मैं जान गया था की मेरी मंजिल कहाँ पर है . एक बार फिर से मैं खेतो में बने उस कमरे में मोजूद था और मुझे पूरा यकीं था की टेप में रिकॉर्डिंग यही पर की गयी थी . क्योंकि मैंने वहां पर दो कसेट और तलाश ली थी जो दिवार में छिपाई गयी थी .

“मुझे लगता है की कोई मुझे नहाती हुई देखता है ” औरत ने कहा

आदमी- तुम्हारा वहम होगा इतनी हिम्मत किसकी होगी

औरत- मैंने महसूस किया है

आदमी- किस पर शक है तुम्हे

औरत- समझ नहीं आता ये जगह भी सुरक्षित नहीं रही मिलने के लिए आज के बाद हम लाल मंदिर के पीछे मिला करेंगे और तुम इतनी जिद मत किया करो

आदमी- मैं क्या करू तुम हो ही ऐसी की मैं खुद को रोक नहीं पाता मेरी नजरे बस तुमको देखना चाहती है संगमरमर से भी ज्यादा खूबसूरत हो तुम दिल करता है की बस तुम्हारे अन्दर खोया रहूँ. तुम्हारा ये हुस्न, मैं कभी कभी सोचता हूँ की क्या वो तुम्हारी प्यास नहीं बुझा पाता

औरत-मुझे डर लगता है कहीं उसको पता न चल जाये वैसे भी वो तुमको पसंद नहीं करता

आदमी- तुम अगर साथ दो तो मैं उसे रस्ते से हटा दू

औरत- पागल हुए हो क्या हम दोनों की लाशे भी नहीं मिलेंगी कभी

कुछ देर ख़ामोशी छाई रही और फिर चुदाई की आवाजे आने लगी

“मेरी मज़बूरी का फायदा मत उठाओ तुम ”औरत ने कहा

आदमी- कोई मज़बूरी नहीं है तुम खुद आती हो मेरे पास क्योंकि जो सुख तुमको मेरे निचे मिलता है वो कोई और नहीं दे सकता . तुम खुद अपनी टाँगे खोलने की इच्छा रखती हो वर्ना मजाल जो तुम्हारी तरफ नजरे उठा कर भी देख सकू

औरत- फिर भी ये गलत है

आदमी- गलत तो वो भी था ,

औरत- ये आखिरी बार है इसके बाद मैं कभी नहीं आउंगी यहाँ पर



कमरे की दो चाबिया थी जिनमे से एक औरत और दूसरी आदमी के पास रही होगी पर एक चाबी बापू के पास मिली थी जिसने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया था की इन्दर सिंह क्या यहाँ पर किसी की चुदाई करता था या फिर कोई और ही खेल चल रहा था .
 
#35



ये कहानी उलझी हुई तो थी पर वैसे नहीं जैसे मैं सोच रहा था यहाँ पर दो कहानिया समान्तर चल रही थी एक कहानी घर के अन्दर और एक कहानी घर के बाहर . और जो चीज इन दोनों कहानियो को जोडती थी वो थी प्यास, एक प्यास घर की और एक बाहर की. और मुझे अब इन दोनों प्यास को बुझाना था . एक बार फिर मैं लाल मंदिर की सीढियों से होते हुए तालाब के पास जा रहा था , ये पानी इतना शांत था की मैं सोचता था इसके निचे कितनी हलचल होगी.

टखनो तक पैर डुबोये मैं रुपाली के बारे में ही सोच रहा की तभी पानी में हलचल होने लगी, जल में लहरे बढ़ने लगी जबकि हवा में कोई तेजी नहीं थी इस से पहले की मैं कुछ और सोच पाता पानी में से पद्मिनी के बेजान शरीर बाहर आकर सीढियों पर गिरा जो बुरी तरह से लहू लुहान था .

“पद्मिनी , पद्मिनी ” ठीक हो क्या तुम

मैंने उसके गाल थपथापते हुए कहा . उसने हलकी सी आँखे खोली और मेरी बाँहों में झूल गयी .मैंने उसके बदन पर मिटटी रगड़ी और उसे होश में लाने का प्रयत्न करने लगा. पर उसे होश नहीं आया. जब कुछ नहीं सूझा तो मैं अपने गाँव के दवाखाने ले आया . वहां जाकर उसकी मरहम पट्टी करवाई पर उसे होश नहीं आ रहा था . डॉक्टर भी हैरान था की चोट इतनी गहरी भी नहीं थी की होश ही न आये . खैर , इसी बीच शायद थकान की वजह से मेरी आँख लग गयी.

नींद टूटी तो रात हुई पड़ी थी. मैं उठ कर पद्मिनी के पास गया पर बिस्तर पर वो नहीं थी . मैंने तुरंत बाहर उंह रहे कम्पाउण्डर को जगाया और पद्मिनी के बारे में पुछा पर वो कुछ नहीं बता पाया. मुझे बड़ी चिंता होने लगी थी . मैंने इधर उधर तलाश की पर पद्मिनी नहीं मिली . पानी में मोजूद वो चीज साधारण तो बिलकुल नहीं थी और मैं जान गया था की पद्मिनी ने उसी को पाने की कोशिश की होगी .

एक बात और मंगल सिंह का सम्बन्ध डेरे से था और ठाकुर ने लाल मंदिर में उसके कुल को मार डाला था इस से मेरा अनुमान और गहरा हो रहा था की हो न हो ठाकुर और मंगल सिंह में इसी चीज के लिए दुश्मनी हुई हो. पर ये चमकती आभा क्या थी ये समझना जरुरी था . थकी हुई आँखे लिए मैं घर आया , पूरा घर अंधेरे में डूबा हुआ था मैंने बत्ती जलाई तो पाया की घर पर मेरे सिवा और कोई नहीं था .

एक बार फिर मैं ठाकुर इन्दर सिंह के कमरे में खड़ा ख्यालो गुम था , मेरे हाथ में वो कागज था जिस पर तस्वीर चिपकी थी . और तभी मुझे अपनी मुर्खता पर हंसी आ गयी, ये कागज का टुकड़ा ये ऐसे ही थोड़ी न तस्वीर पर चिपकाया गया था ये तो बड़ा दिलचस्प मामला था , ये खबर महज एक खबर नहीं थी बल्कि शायद वो घटना रही हो जिसकी वजह से ये कहानी बनी. चोरी की खबर , ये कोई मामूली चोरी नहीं थी . लाल मंदिर में हुई चोरी की खबर में बापू की भला क्या दिलचस्पी रही होगी. जबकि चोरी कोई करता तो डाकू मंगल सिंह करता. इन्दर सिंह और पुरुषोतम साथ रहते थे, मंगल और पुरुषोत्तम की बिलकुल नहीं बनती थी , चंदा का पति जिस से पुरुषोत्तम नफरत करता था उसे फांसी पर लटका दिया पुरुषोत्तम ने . ये सारे लोग एक दुसरे से जुड़े हुए थे चाहे लालच चूत का हो या फिर माया का .

अगर किसी तरह से ये मालूम हो जाता की कैसेट में कौन किसको चोद रहा था तो बाते आसान हो जाती, पर अगर तेज को ये सब मालूम था तो हो सकता था की चंदा के पति को भी मालूम हो . जिस तरह से रुपाली अपने पति से असंतुष्ट थी कही नौकर और तेज ने तो नहीं पेल दिया था उसे. या फिर छोटे देवर कुलदीप का बिस्तर गर्म करने लगी थी वो क्योंकि उसके कमरे से मुझे ब्रा मिली थी . कहीं ऐसा तो नहीं था की तीनो भाई ही रुपाली को रगड़ रहे हो और उसके चक्कर में ही निपट गए हो .होने को तो कुछ भी हो सकता था पर पुष्टि कैसे हो.

रात को ही मैं चंदा से मिलने के लिए चल दिया और जब मैं वहां पर पहुंचा तो अलग ही नजारा देखने को मिला चंदा की झोपडी से कोई निकल रहा था उसने अपने मुह को तौलिये से ढक रखा था मैं उसके सामने आ गया

“तौलिया हटा और अपनी पहचान बता ” मैंने उसे कहा

वो चुप खड़ा रहा .

मैं- सुना नहीं तूने क्या

आगे बढ़ कर मैंने उसके तौलिये को छुआ ही था की बला की फुर्ती दिखाते हुए उसने मुझे धक्का दिया और जब तक मैं संभला अँधेरे में वो गायब हो चूका था . कपडे झाड़ते हुए मैं झोपडी के अन्दर गया तो बिस्तर पर चंदा पूरी नंगी पड़ी थी . कोई और समय होता तो ऐसी मादकता देख कर मैं बहक जाता पर मैंने उसकी बाह पकड़ कर उसे जगाया .

“तुम यहाँ इस समय ” उसने पुछा

मैं- लाल मंदिर में किस चीज की चोरी हुई थी

चंदा- इतनी रात को ये पूछने आये हो तुम

मैं- तुम समझ नहीं रही हो चंदा

चंदा- मंदिर में बहुत से गहने और सोना था

मैं- कितना सोना होगा

चंदा- इतना की कोई सोच भी नहीं सकता

मैं- तेरे आदमी का क्या लेना देना था उस चोरी से

चंदा- कुछ भी नहीं उसको तो पता भी नहीं था वो तो बस चूत के चक्कर में ही गया

मैं- किसकी चूत

चंदा- कामिनी की चूत
 
Back
Top