Antarvasna kahani ड्रेगन हार्ट (लव, सेक्स एण्ड क्राईम) - Page 9 - SexBaba
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Antarvasna kahani ड्रेगन हार्ट (लव, सेक्स एण्ड क्राईम)

Update 071 -

मैंने जिस जगह अपनी कार खडी की थी, उससे थोडी सी दूरी पर एक ढलान बाला कच्चा रास्ता था, जिसके चारों तरफ घना जंगल और उससे आगे एक गहरी खाई थी। सुनसान इलाका और रात के अंधेरे के कारण हाईवे से कोई भी मेरी कार को नहीं देख सकता था। जिस कारण मैं बेफिक्र होकर अपने काम में बिजी हो गई। सबसे पहले मैंने अपने बडे से बैग में से एक प्लास्टिक बैग बाहर निकाला, जिसके अंंदर मैंने पहले से ही वो सामान रखा हुआ था, जिसकी जरूरत मुझे अभी पडने बाली थी। उस प्लास्टिक बैग को निकालने के बाद मैंने बिना देर किए अपने सारे कपडे और ज्वैलरी निकालनी शुरू कर दी और उन्हें संभाल कर कार में एक तरफ रखने लगी।

यहाँ तक की मैंने अपनी ईयररिंग, नोजपिन, हेयरबैंड और क्लैचर के साथ साथ अपनी ब्रा और पेंटी भी निकाल दी थी। शक्ति बीज से मिली स्पेशल पावर के कारण मुझे उस अंधेरे में भी साफ साफ दिखाई दे रहा था। ऊपर से आधे चांद की रात होने के कारण वहाँ पर्याप्त रोशनी थी। कुछ ही देर बाद मैं उस लावारिस लाश के जैसी पूरी तरह से आदमजात नंगी हो गई थी। हम दोनों में बस इतना ही अंतर था कि मैं एक जिंदा इंशान थी और वो बस एक लाश। अपने शरीर पर से सारे कपडे और ज्वैलरी निकालने के बाद मैंने उस प्लास्टिक बैग में से एक विशेष कैमिकल की छोटी सी बॉटल और कुछ कॉटन बॉलस् निकालकर उस कैमिकल को अपनी बॉडी के उन हिस्सों पर लगाने लगी, जहाँ मैंने टैटू बनवाई थे।

असल में जब मैं भोपाल से दिल्ली बापिस आ रही थी, तो मैंने अपने बॉडी पर बनवाऐ गए सभी टैटू को टैम्प्रेरी रूप से छिपाने के लिए अपनी स्किन कलर से मैच करती हुई आर्टीफीशियल स्किन की एक पतली सी लेयर लगवा ली थी। जो पूरी तरह से बाटर फ्रूफ थी और जिसे केवल इस विशेष कैमिकल की हेल्प से ही निकाला जा सकता था। असल में मैं नहीं चाहती थी कि दिल्ली में मेरे किसी भी जान पहचान बाले को यह पता चले कि मैंने अपनी बॉडी पर टैटू बनवाऐ हुए हैं। क्योंकि मेरी पहचान बदलने के बाद यदि गलती से मैं अपने किसी पुरानी जान पहचान बाले इंशान से टकरा गई तो वो मेरी बॉडी पर बने टैटू देखकर मुझे आसानी से पहचान सकता था।

कुछ ही देर में उस कैमिकल ने अपना असर दिखाना शुरू कर दिया, जिस कारण मेरी बॉडी पर लगी वह आर्टीफीशियल स्किन निकलने लगी। जब वो स्किन काफी हद तक लूज हो गई तो मैंने पूरी सावधानी से उसे निकाल दिया और उस यूज्ड आर्टीफीशियल स्किन को संभालकर एक तरफ रख दिया। अब मेरे गोरे बदन पर बने टैटू उस आधे चाँद की रात में साफ साफ दिखाई दे रहे थे। अपनी बॉडी से उस आर्टीफीसियल स्किन निकालने के बाद मैंने कार में से पानी की बॉटल निकाली और उससे अपने माँग में भरा सिंदूर साफ करने लगी। क्योंकि अब मुझे उसकी कोई जरूरत नहीं थी। बैसे भी जो इंशान खुद मेरी जान लेना चाहता हो, उसके नाम का सिंदूर भला मैं कैसे लगा सकती थी।

अपनी माँग का सिंदूर साफ करने के बाद मैंने उस प्लास्टिक बैग में से एक स्पोर्ट ब्रा-पेंटी का सेट निकालकर पहन लिया। फिलहाल मुझे उस लडकी की लाश को अपने कपडे और ज्वैलरी पहनानी थी। जिस कारण मैं अभी अपने बाकी के कपडे नहीं पहनना चाहती थी। क्योंकि इस प्रॉसेस में मेरे कपडे गंदे होने का डर था। इसलिए मैं ब्रा और पेंटी में ही उस लाश को अपने कपडे पहनाने लगी। यहाँ तक कि मैंने अपनी पुरानी ब्रा और पेंटी के साथ साथ अपनी जूतियाँ भी उसे पहना दी थी। इसके अलावा मैंने अपना मंगलसूत्र और दूसरी ज्वैलरी भी उसे पहना दी थी। ताकि एक्सीडेंट के बाद जब उस जली हुई लाश की जाँच की जाऐ, तो उस लाश पर मेरी ज्वैलरी देखकर सभी को पूरी तरह से यकीन हो जाऐ की मैं यानि निशा गुप्ता उस एक्सीडेंड में मर चुकी है।

उस लावारिस लाश को अच्छी तरह से तैयार करने के बाद मैंने उस लाश को कार की पिछली सीट से बाहर निकाला और ड्राईबिंग सीट पर बैठा दिया, साथ ही साथ मैंने बैल्ट भी बांध दिया था, ताकि लाश इधऱ उधर ना लुढके। हाँलाकि किसी भी इंशान की लाश को उठाना एक अकेले आम इंशान के बस की बात नहीं है। पर खण्डहर से जिंदा बचने के बाद और अपने गले में डले शक्ति बीज के कारण मेरी शारीरिक ताकत एक आम इंशान की तुलना में कहीं ज्यादा बड गई थी। इसलिए मुझे उस लाश को उठाकर ड्राईबिंग सीट पर बैठाने में कोई प्राब्लम नहीं हुई थी।

लाश को ड्राईविंग सीट पर अच्छी तरह से बैठाने के बाद मैंने प्लास्टिक बैग से अपने बाकी के कपडे और स्पोर्ट शूज निकालकर पहन लिए। जिसके बाद मैंने कार में रखे अपने बडे से बैग में से अपना बैकपैक बाहर निकाला। जो मैं अमन से छिपाकर अपने साथ लाई थी। उस बैगपैक में मेरी नई पहचान यानि अमृता चौहान से रिलेडेड सारे ऑरीजनल डॉक्यूमेंट, डिजीटल कैस कार्ड, डेबिड कार्ड, कुछ पैसे, मेरा नया मोबाईल फोन, नया लैपटॉप, कपडे और दूसरा जरूरी सामान रखा हुआ था। अपना बैगपैक निकालने के बाद मैं उस बडे से बैग बैग को बापिस बंद करके उसी कार के अंदर छोड दिया।

साथ ही साथ मैंने अपना पर्सनल मोबाईल फोन, हैंड बैग और दूसरा जरूरी सामान जैसे मेरी यानि निशा गुप्ता के आई.डी. कार्ड बगैरह, सब कुछ उसी कार के अंदर ही छोड दिया था। अब मेरे पास निशा से रिलेटेड कुछ भी नहीं था, जो कुछ भी था सब अमृता का था। यह सारे काम खत्म करने के बाद मैंने कार की डिग्गी में से पैट्रोल से भरे हुए दोनोें कैन निकाले और कार के अंदर पैट्रोल छिडकने लगी। ताकि उस कार के अंदर मौजूद हर चीज जलकर राख हो जाऐ। यहाँ तक की मैंने उस लाश पर भी ढेर सारा पैट्रोल डाल दिया था। ताकि उस लडकी की लाश जलकर पूरी तरह से राख हो जाऐ।

कार के अंदर पैट्रोल छिडकने के बाद मैंने अपनी आँखों में लगे लैंस भी निकाल दिये। जिस कारण मेरी आँखें जो कुछ देर पहले काली थीं, वो अब हरे रंग की दिखाई दे रहीं थी। फिलहाल मुझे इन लैंस की कोई जरूरत नहीं थी। इसलिए मैंने उन्हें तोडकर खाली प्लास्टिग बैग में डाल दिया। इसके अलावा मैंने सारा अनयूज्ड सामान जैसे लाश को ढंकने बाली चादर, मेरी आर्टीफिसियल स्किन, पैट्रोल के खाली कैन बगैरह को उस प्लास्टिक बैग के अंदर रखा और वहाँ से थोडी दूर झाडियों के पीछे लेजाकर उसमें आग लगा दी। ताकि किसी को भी मेरे जिंदा बचने का कोई सबूत ना मिले।

यह सारे काम पूरे करने के बाद मैंने अपने बैगपैक में से एक कटर निकालकर कार के ब्रेक फेल कर दिये और एक लईटर जलाकर कार की पिछली सीट पर फेंक दिया। इससे पहले कार के अंदर आग फैले मैंने अपनी कार स्टार्ट की और उस लडकी का पैर कार की रेस पर रखकर गियर डाल दिया। जैसे ही मैंने कार में गियर डाला तो कार तेजी से आगे बडने लगी, लेकिन ड्राईबर साईड का दरवाजा अब भी खुला हुआ था, इसलिए मैंने भी कार के साथ दौडते हुए जल्दी से दरवाजा बंद कर दिया और कार से तुरंत दूर हट गई। वो रास्ता एकदम सीधा और ढलान बाला था और जिसके आखिर में एक गहरी खाई थी। इसलिए वो कार तेजी से उस ढलान भरे रास्ते पर दौडते हुए सीधी खाई में जा गिरी।

कार के उस खाई में गिरते ही एक तेज आवाज सुनाई दी और फिर अचानक से एक के बाद एक दो तेज धमाके हुऐ। जिसका एक ही मतलब था कि कार के सी.एन.सी. टैंक के साथ साथ पैट्रोल टैंक भी फट गया है। वो धामाके इतने तेज थे, जिन्हें सुनकर ऐसा लगा जैसे कोई बॉम्ब फट गया हो। उन धमाकों की अवाज सुनकर तो एक पल के लिए मैं भी बुरी तरह से डर गई थी। लेकिन जैसे ही मैं होश में आई तो मैं दौडकर उस खाई की तरफ चलई गई। जहाँ मैंने देखा की कार पूरी तरह से टूट-फूट चुकी थी और कार के चारों चरफ तेजी से आग फैल चुकी थी। यह नजारा देखकर मुझे पूरा यकीन हो चुका था कि अब उस लड़की की लाश जलकर पूरी तरह से राख हो जायेगी। यहाँ तक की अब उस लाश का डी.एन.ए. मिलना भी पूरी तरह से असंभव है।

उस हादसे को देखकर अचानक से मेरी आँखों में आँशू झलक आए। क्योंकि अब मैं अपनी पुरानी जिंदगी में फिर कभी बापिस नहीं जा सकती थी। अब दुनिया की नजरों में निशा गुप्ता मर चुकी थी। मैं अभी उस कार को जलते हुए देख ही रही थी कि तभी मुझे हाईवे की तरफ से कुछ लोगों के आने की आवाज सुनाई दी। जिसे सुनकर मैंने तुरंत अपने आँशू पौंछे और वहाँ पर रखा अपना बैकपैक पीठ पर टांगकर झाडियों के पीछे छिप गई। जिसके कुछ ही देर में वहाँ पर अच्छी खासी भीड इक्ट्ठी हो गई थी। उस भीड का लाभ उठाते हुए मैंने अपने चेहरे पर मास्क लगाया और झाडियों से निकलकर भीड में शामिल हो गई।

मैं कुछ देर तक तो वहीं भीड के साथ खडे होकर उस कार को जलते हुए देखती रही, और फिर हाईबे की तरफ चल पडी। हाईवे पर पहुँचकर मैंने देखा कि वहाँ पर रोड किनारे कुछ एस.यू.वी. और कारें खडी हुईं हैं, साथ ही साथ वहाँ पर एक बस भी खडी हुई थी, जो दिल्ली की तरफ जा रही थी। शायद उस बस में से भी कुछ सबारियाँ नीचे खाई की तरफ चलीं गईं थीं और बाकी के लोग बस के बाहर हाईवे पर खडे होकर दूर से ही तमाशा देख रहे थे। तभी वहाँ खडी भीड में से किसी ने पुलिस को कॉल करके उस एक्सीडेंट के बारे में बता दिया। अब चूँकि मेरा वहाँ पर कोई काम नहीं बचा था। इसलिए मैं उस बस के अंदर जाकर बैठ गई।

कुछ देर तक चले इस तमाशे के बाद जब वहाँ खडी गाडियाँ एक एक करके अपने अपने रास्ते जाने लगीं, तो बस के पैसेंजर भी बापिस आकर अपनी अपनी सीट पर बैठ गए। सभी लोगों के बापिस आने के बाद वो बस भी फिर से दिल्ली की तरफ चल पडी। उस बस के अंदर पहले से ही कुछ सीटें खाली थीं। जिस कारण किसी को भी मुझपर शक नहीं हुआ था। आखिरकार बिना किसी प्राब्लम के रात करीब 12 बजे मैं दिल्ली जा पहूँची। जिसके बाद मैंने अपने लिए एक होटल रूम बुक किया और अपने रूम में जाकर सो गई। अगले दिन जब मेरी नींद खुली तो मैंने अपने रूम में ही काफी और नश्ता मंगवा लिया और फ्रैस होने के लिए बाथरूम में घुस गई।

जब तक मैं नहाकर तैयार हूई तब तक मेरी कॉफी और नाश्ता भी आ चुका था। इसलिए मैंने टी.बी. ऑन की और न्यूज देखते हुए नाश्ता करने लगी। कई न्यूज चैनल चेंज करने के बाद आखिरकार मुझे वो न्यूज मिल ही गई जिसकी मुझे तलाश थी। असल में मैं अपनी कार के एक्सीडेंट बाली न्यूज सर्च कर रही थी। जो इस वक्त एक लोकल न्यूज चैनल पर दिखाई जा रही थी। न्यूज चैनल में इस वक्त कार की जो हालत दिखाई दे रही थी। वो किसी जले हुऐ टीन के डिब्ले की तरह थी, जिसे देखकर साफ समझ आ रहा था कि उसके अंदर जो भी लाश थी, वो अब तक पूरी तरह से जल कर राख हो चुकी होगी।

कुछ देर बाद न्यूज पर जो फुटेज दिखाई गई उससे मेरा अंदाजा बिल्कुल सही साबित हुआ। न्यूज पर एक बुरी तरह से जली लाश दिखाई दे रही थी। जिसे लाश कहना भी गलत होगा। क्योंकि वो बस एक कंकाल था। फारेंसिक टीम को उस कंकाल में से किसी भी प्रकार का डी.एन.ए. नहीं मिला था। जिससे उस लाश की पहचान हो सके। जिस कारण अब पुलिस टीम उस कार की हेल्प से मरने बाले का पता लगाने की कोशिश कर रही थी। हाँलाकि कार की नम्बर प्लेट्स जलकर पूरी तरह से बेकार हो गईं थी। पर पुलिस टीम कार का चेचिस नम्बर पता करने में कामयाब रही थी।

इसके अलावा उस कंकाल की बॉडी पर मौजूद कुछ ज्वैलरी किस्मत से सही सलामत बच गई थी। जिससे पुलिस टीम ने अंदाजा लगाया था कि मरने बाली एक शादिशुदा औरत है। इसलिए पुलिस ने वो सारी ज्वैलरी संभालकर अपने पास रख ली थी। ताकि वो उस लाश की सिनाख्त के काम आ सकें। थोडी बहुत छानबीन और करने के बाद पुलिस टीम को कार में से कुछ अधजले डॉक्यूमेंट्स और मेरा मोबाईल फोन भी मिल गया था। साथ ही साथ पुलिस टीम को कार में से बालों का एक गुच्छा और थोडा सा सूखा हुआ खून भी मिल गया था। जो किसी तरह से जलने से बच गया था।

यह पुलिस के लिए एक बडी कामयाबी थी। क्योंकि उस बालों के गुच्छे और सुखे हुए खून से डी.एन.ए. निकालकर लाश की पहचान करना आसान था। असल में वो बाल और खून मेरा ही था, जिसे मैंने जानबूझकर उस कार में छोड दिया था। हाँलाकि मुझे उम्मीद तो नहीं थी कि वो आग में जलने से बच पाऐँगे। लेकिन अगर वो किसी तरह जलने से बच गए तो फारेंसिक टीम उनसे डी.एन.ए. निकाल कर यह कन्फर्म कर सकती थी कि वो लाश मेरी ही है। यहाँ पर किस्मत ने मेरा साथ दिया था। क्योंकि जब कार खाई में गिरी थी तो मेरा हैण्ड बैग लुडकता हुआ ठीक उस जगह आकर गिरा था, जहाँ पर मैंने अपने बालों का गुच्छा और अपना ब्लड सेंपल छोडा था।

चूँकि मेरा हैँडबैग हाईब्रिड मटेरियल से बना था। इसलिए वो उस आग में पूरी तरह से जलने से बच गया था और उसके साथ साथ मेरे बाल और मेरे ब्लड का सेंपल भी जलने से बच गया था। कुछ देर और वह न्यूज देखने के बाद मैंने टी.बी. बंद कर दी, क्योंकि मैं जान चुकी थी कि पुलिस अभी तक डैड बॉडी की पहचान नहीं कर पाई है। पर मुझे पूरा यकीन था कि वो जल्दी ही कार के मालिक का पता लगा लेगी और उसके बाद पुलिस को मेरे बारे में भी सब कुछ पता चल ही जाऐगा। लेकिन फिलहाल मेरे पास करने के लिए कुछ भी नहीं था। इसलिए मैं तैयार हुई और अपने चेहरे पर मास्क लगाकर होटल रूम से बाहर निकल गई।

कहानी जारी है......
 
Update 072 -

मेरे पास ट्रेनिंग के लिए देहरादून जाने से पहले अभी भी एक हफ्ता बचा था। इसलिए मैं इस एक हफ्ते का यूज अपना हुलिया बदलने और अपने एक्सीडेंट केस की कार्यवाही पर नजर रखने में करना चाहती थी। जिस कारण होटल से बाहर निकलकर मैंने एक कैब बुक की और पास के ही एक शॉपिंग मॉल में बने ब्यूटी पार्लर में जा पहुँची। असल में उस कार एक्सीडेंट में मरने बाली लडकी की पहचान अभी तक नहीं हुई थी। बैसे भी दिल्ली और उसके आस पास के इलाकों में इस प्रकार के एक्सीडेंट आऐ दिन होते ही रहते हैं। जिस कारण उस एक्सीडेंट की न्यूज बस एक छोटे से न्यूज चैनल पर ही दिखाई गई थी। इसलिए मुझे अपने पहचाने जाने का कोई डर नहीं था।

लेकिन फिर भी मैंने सावधानी के लिए अपने चेहरे पर मास्क लगा रखा था। सुबह का समय होने के कारण उस ब्यूटी पार्लर में अभी बिल्कुल भी भीड भाड नहीं थी। इसलिए मुझे वहाँ पर बिल्कुल भी इंताजर नहीं करना पडा था। हाँलाकि मुझे ना तो कोई मेकअप करवाना था और ना ही अपने चेहरे या बॉडी पर किसी भी प्रकार के ब्यूटी ट्रीटमेंट की कोई जरूरत थी। मैं तो उस पार्लर में बस अपना हेयरकट करवाकर अपना हुलिया चेंज करवाना चाहती थी। ताकि मेरे ड्रेसिंगसेंस और हेयरस्टाईल के कारण मैं एक 19-20 साल की लडकी की तरह दिखाई दूँ।

बैसे भी खण्डर में हुए हादसे के बाद से मेरे चेहरे में थोडा बहुत बदलाव पहले ही आ चुका था और अब मैं वाकई में पहले से कम उम्र की दिखाई देती थी। पर दिल्ली आकर मैंने अपने चेहरे पर मेकअप करके अपने आपको पहले की तरह 26-27 साल की शादीशुदा औरत की तरह दिखाने की पूरी कोशिश की थी। लेकिन अब मुझे इस प्रकार के किसी भी मेकअप की कोई जरूरत नहीं थी। मैं तो बस अपना हेयरस्टाईल और कपडों का स्टाईल चेंज करके ही पहले से काफी हद तक अलग दिख सकती थी। ऊपर से मेरी आंखों का रंग भी अब बदल चुका थ। जिस कारण मुझे आसानी से पहचाना नहीं जा सकता था।

करीब एक घंटे तक चली प्रॉसेस के बाद मेरे हेयर स्टाईलिस्ट ने मेरी कमर तक लम्बे बालों पर बुल्फ हेयरकट करके उन्हें मेरे कंधों तक छोटा कर दिया था। इस नए हेयर स्टाईल के कारण मेरी उम्र बाकई में काफी कम हो गई थी और मैं अब पहले से कहीं ज्यादा सुंदर दिखने लगी थी। अपनी इस नई हेयर स्टाई से अब मैं काफी खुश थी। अपना हेयरकट करवाने के बाद मैंने उसी मॉल में से अपने लिए कुछ कपडे खरीदे, जिनमें जींस, टॉप के अलावा नाईट बेयर, ब्रा-पेंटी, शार्टस्, कैमिशोल भी सामिल थे, इनके अलावा मैंने अपने लिए कुछ शूज, मेकअप किट और दूसका जरूरी सामान भी खरीद लिया था, जिनकी जरूरत मुझे आगे पडने बाली थी।

साथ ही साथ मैंने उन सब सामान को रखने के लिए एक बैग भी खरीद लिया था। बैसे भी मेरे पास फिलहाल बस दो जोडी कपडे और एक जोडी स्पोर्ट शूज ही थे। यह सारा सामान मैंने किसी 19-20 साल की लडकी की ज्वाईस को ध्यान में रखकर ही खऱीदा था। जो मेरी नई पहचान यानि अमृता चौहान की एज को मैच कर सकें। मुझे शॉपिंग करते करते दोपहर के करीब 3 बज चुके थे। इस बीच मैंने मॉल में ही बने एक रेश्टोरेंट में लंच भी कर लिया था। सारी शॉपिंग खत्म होने के बाद मैंने अपना बिल पे किया और होटल रूम में बापिस आ गई। फिलहाल मैं काफी थकी हुई थी, इसलिए सारा सामान एक तरफ रखने के बाद मैंने अपने लिए कॉफी आर्डर की और टी.बी. ऑन करके न्यूज देखने लगी।

कुछ देर तक अलग अलग चैनल चैंज करने के बाद मुझे अपने कार एक्सीडेंट की न्यूज मिल ही गई। जिसमें बताया जा रहा था कि पुलिस ने मरने बाली लडकी की पहचान कर ली है और बॉडी को उसके घर बालों को सौंप दिया है। ताकि उस डेड बाडी का अंतिम संस्कार किया जा सके। हाँलाकि न्यूज चैनल पर ना तो मेरी कोई तस्वीर दिखाई गई थी और ना ही अमन या फिर मेरे पापा और भाई के बारे में कुछ भी बताया गया था। इसलिए मैं चैनल चैंज करके किसी और न्यूज चैनल पर उस एक्सीडेंट की न्यूज सर्च करने लगी। इस दौरान मेरी कॉफी भी आ चुकी थी। इसलिए कॉफी पीने के बाद मैं एक बार फिर अपने होटल रूम से बाहर निकल गई।

इस बार मैं कैब बुक करके अपनी कॉलोनी के पास जा पहुँची। चूँकि मैंने अपना हुलिया पहले ही बदल लिया था और मैं इस वक्त अपने चेहरे पर मास्क लगाऐ हुए थी। जिस कारण मेरे पहचाने जाने का कोई डर नहीं था। मैं वहीं भीड में सामिल होकर सारा नजारा देखती रही। मेरे पापा और मेरा भाई दिल्ली आ चुकी थे और रो रोकर उनका बुरा हाल हो गया था। लेकिन मैं अमन को देखकर सबसे ज्यादा शॉक़्ड थी। क्योंकि वो मेरे पापा और भाई से भी ज्यादा रो रहा था और देखने बालों को ऐसा लग रहा था जैसे हम दोनों के बीच बहुत गहरा प्यार था। अमन बार बार रोते हुए बस एक ही लाईन दौहराऐ जा रहा था कि वो अब जीना नहीं चाहता।

अमन की ऐसी हालत देखकर मैं हैरान होते हुए मन ही मन यह सोच रही थी कि क्या यह वही इंशान है जिसने मुझे जान से मारने की इतनी बडी प्लानिंग की थी और जो मेरी हर सक्सेश से जलता था। मेरे परिवार बालों के अलावा मेरा पूरा ऑफिस स्टॉफ और अमन के कुछ दोस्त भी वहाँ मौजूद थे। जिनमें से दो लोगों पर मेरी विशेष नजर थी। पहली रचना जो अमन की ही तरह मगरमच्छ के आँशू टपका रही थी और दूसरा पंकज जो दुखी तो था, पर वो रचना और अमन को नफरत से घूर रहा था। कुछ देर बाद उस डेड बॉडी को अंतिम संस्कार के लिए ले जाया गया।

हाँलाकि कि डेड बॉडी पहले से ही पूरी तरह से जल चुकी थी पर मन की तसल्ली के लिए फार्मेलिटी तो करनी ही थी। इसलिए मैं चुपचाप भीड में सामिल होकर पूरे मामले को आब्जर्व करती रही। भीड में कई लोग आपस में खुसर फुसर कर रहे थे। उन लोगों की बातों को सुनकर मुझे पता चला कि पुलिस फिलहाल उस मामले को बस एक एक्सीडेंट के रूप में ही देख रही है। हाँलाकि मुझे इससे कोई प्राब्लम नहीं थी, क्योंकि मैं पहले ही अमन और रचना को पूरी तरह से निचोडकर अपना बदला ले चुकी थी, ऊपर से पंकज का रिऐक्शन देखकर मुझे इस बात का पूरा यकीन था कि आज नहीं तो कल पुलिस को इस एक्सीडेंट में किसी साजिश के बारे में पता जरूर चल जाऐगा।

पर मुझे अपने पापा और भाई की हालत को देखकर काफी दुख हो रहा था। लेकिन मन में इस बात की तसल्ली थी कि मैंने उनके फ्यूचर को सेफ कर दिया है। साथ ही साथ मेरी बजह से उस अंजान लडकी का अंतिम संस्कार भी पूरे विधि विधान से हो रहा था। जिस कारण हो सकता है कि उसकी आत्मा को भी शान्ति मिल जाऐ। कुछ देर तक वहाँ रुकने के बाद मैं अपने होटल रूम बापिस आ गई। अगले दो दिन मैंने अपने होटल रूम में ही बिताऐ थे। इस दौरान मैंने अपना खाना भी होटल रूम में ही मंगवा लिया था। आखिरकार तीसरे दिन न्यूज चैनल पर बताया गया कि पुलिस मेरे एक्सीडेंट की मर्डर के एंगल से जाँच करने की तैयारी कर रही है।

असल में किसी अनजान आदमी ने पुलिस को कॉल करके इस बारे में कुछ टिप्स दी थी। जिसके बाद ही पुलिस टीम ने नऐ शिरे से जाँच शुरू कर दी थी। इस न्यूज को देखने के बाद मुझे यकीन हो गया था कि अब अमन और रचना का खेल खत्म होने ही बाला है। इसलिए न्यूज देखने के बाद मैं तैयार होकर होटल रूम से बाहर निकल गई। सबसे पहले मैंने उस रिपोर्टर से काँटेक्ट किया जो मेरे एक्सीडेंट की न्यूज पर काम कर रहा था। मैं उससे निशा की बेस्ट फ्रेंड बनकर मिली थी और मीटिंग के दौरान मैंने अपने चेहरे पर मास्क भी लगा रखा था। थोडे से मोल-भाव के बाद वो रिपोर्टर इस केस से रिलेटेड सारी इन्फॉर्मेशन सबसे पहले मुझे देने और सेंस्टिव इन्फार्मेशन को न्यूज चैनल पर ना दिखाने के लिए मान गया था।

इसके अलावा उसने मेरा यानि निशा के साथ साथ मेरे पापा और भाई का कोई भी फोटो न्यूज में ना दिखाने का मुझसे वादा भी कर दिया था। इस डील के बदले मैंने उसे पूरे 5 लाख रूपये दिए थे और आगे भी इस तरह के केस में साथ में काम करने का मैंने उससे वादा भी किया था। वो एक छोटे से न्यूज चैनल का रिपोर्टर था, जिसकी सैलरी काफी कम थी। लेकिन जब उसे एक ही बार में इतने सारे पैसे कमाने का मौका मिला तो वो खुशी खुशी तैयार हो गया था। रिपोर्टर से डील होने के बाद अब मझे उस पूरे मामले पर खुद से नजर रखने की कोई जरूरत नहीं थी, क्योंकि यह काम अब मेरे लिए वह रिपोर्टर करने बाला था। इसके अलावा मेरा कोई फोटो न्यूज में ना दिखाने से मुझे भविष्य में पहचाने जाने का भी कोई डर नहीं था।

उस रिपोर्टर से डील फाईनल करने के बाद मैंने अपनी इंश्योरेंस कम्पनी के एक इम्प्लॉय से भी डील कर ली थी। ताकि मुझे पता चल सके कि मेरा इंश्योरेंस क्लेम मेरे पापा और भाई को मिला या नहीं। दोनों डील फाईनल करने के बाद मैंं अब दिल्ली रुककर अपना समय खराब करना नहीं चाहती थी। बैसे भी एक दो दिन में ही मुझे देहरादून जाकर ट्रेनिंग कैम्प ज्वाईन करना था। इसलिए मैं देहरादून जाने की तैयारियों में बिजी हो गई। अगले दिन मैंने आई.बी हैडक्वाटर जाकर ज्वाईंट कमिश्नर रजीव ठाकुर से मुलाकात की जो अब मेरे बॉस बन चुके थे।

उनसे मिलकर मैंने ट्रेनिंग से रिलेटेड सारी फार्मेलिटी पूरी की और सारी जरूरी इन्फार्मेशन लेने के बाद मैं उसी दिन एक अच्छी गायनोकॉलोजिस्ट से मिलने गई। जिसका अपाईंटमेंट मैंने पहले ही ले लिया था। असल में पिछले कुछ दिनों में मेरा सेक्स एडिक्शन कुछ ज्यादा ही बढ गया था। जिस कारण मुझे काफी ज्यादा टेंशन होने लगी थी। हालाँकि मुझे सेक्स करना पसंद था, लेकिन बार बार सेक्स करने का मन करना कहीं ना कहीं मुझे किसी खतरे की तरफ इशारा कर रहा था।

जब मैं गायनोकॉलोजिस्ट से मिली तो उन्होंने मेरा पूरा चेकअप करने के बाद मेरे सेक्स एडिक्शन का कारण कॉपर-टी को बताया। असल में कई औरतों को कॉपर-टी से हाईपर सेक्सुअलिटी डिसआर्डर हो जाता है। इसलिए अपने गायनोकॉलोजिस्ट की सलाह पर मैंने तुरंत अपनी कॉपर-टी को निकलवा दी थी। ताकि मैं एक नॉर्मल लाईफ जी सकूँ। हाँलाकि मैं अपनी कॉपर-टी निकलवाने के साथ साथ हाइमेनोप्लास्टी की सर्जरी भी करवाना चाहती थी, ताकि मैं अपनी नई जिंदगी में एक बार फिर से वर्जिन बन सकूं। बैसे भी सर्जरी में ज्यादा समय नहीं लगता है।

लेकिन मेरी गायनोकॉलोजिस्ट ने मुझे यह सर्जरी कुछ दिनों बाद करवाने की सलाह दी। हाँलाकि यह मेरे लिए काफी हद तक सही भी था, क्योंकि इन कुछ दिनों में मैं भी कॉपर-टी निकलने के बाद अपने सेक्स एडिक्सन का रिजल्ट देख सकती थी। अगर मेरा सेक्स एडिक्शन कॉपर-टी के स्थान पर किसी और कारण से था। तो मेरी हाइमेनोप्लास्टी सर्जरी बेकार हो जाती। इसलिए गायनोकॉलोजिस्ट की सलाह पर मैंने यह सर्जरी कुछ दिनों के लिए टाल दी थी। अपने गायनोकॉलोजिस्ट से मिलने के बाद मैं अपने होटल रूम में बापिस आ गई। जहाँ मैं अपनी ट्रेनिंग के लिए देहरादून जाने की तैयारी करने लगी। अगले दिन सुबह सुबह ही मैं होटल से चेकआऊट करके देहरादून के लिए निकल गई।

पूरे 5 घंटे बस से सफर करने के बाद मैं शाम करीब 4 बजे देहरादून देहरादून ट्रेनिंग सेंटर पहूँची। जहाँ मुझे पूरे एक साल तक ट्रेनिंग करनी थी। इस एक साल के दौरान मुझे पूरे 6 महिने तक आर्मी ट्रेनिंग करनी थी, जिसमें फिजिकल फिटनेश के अलावा सेल्फ डिफेंस और सभी प्रकार के हथियारों की ट्रेनिंग दी जाती है। सबसे जरूरी बात जो इस ट्रेनिंग में सिखाई जाती है, वो है अलग अलग कंडीशन में अपने आप को कैसे जिंदा रखा जाऐ। इन 6 महिनों की आर्मी ट्रेनिंग के बाद मुझे 6 महिने तक स्पेशल ट्रेनिंग भी करनी थी। जो एक अच्छे ऐजेंट बनने के लिए बहुत जरूरी होती हैं।

बैसे भी खण्डहर में हुए हादसे के बाद मैं इतना तो समझ ही गई थी कि मैं अभी बहुत कमजोर हूँ और अगर मुझे अपने आपको जिंदा रखना है तो मुझे हर हाल में मजबूत बनना ही होगा। इसीलिए मैं भी पूरे दिल से यह ट्रेनिंग करना चाहती थी। ट्रेनिंग सेंटर पर पहुँचकर मैं अपने ट्रेनिंग इंचार्ज से मिली और ट्रेनिंग कैंप ज्वाईन करने की फार्मेलिटी पूरी करने लगी। हाँलाकि प्रॉपर ट्रेनिंग शुरू होने में अभी 2 दिन का समय था और मेरा ट्रेनिंग बैच भी अभी तक पूरा नहीं हुआ था। असल में मेरे साथ इस ट्रेनिंग कैम्प में कुल 120 लडके लडकियाँ ट्रेनिंग करने बाले थे। जिनमें 100 लडके और 20 लडकियाँ थीं।

इस ट्रेनिंग में आर्मी के अलावा स्पेशल फोर्स के कैडेट भी सामिल थे। जो 6 महिने तक एक साथ ट्रेनिंग करने बाले थे। उसके बाद आर्मी के सभी कैडेट अपनी ज्वाईनिंग लोकेशन पर चले जाऐंगे और बचे हुए स्पेशल फोर्स के कैडेट अगले 6 महिनों तक स्पेशल ट्रेनिंग करेंगे। असल में आई.बी. में किसी भी ऐजेंट को डायरेक्ट ज्वाईन नहीं किया जाता है, बल्कि अलग अलग सिक्योरिटी फोर्सेस में से कुछ स्पेशल लोगों को सिलेक्ट करके उन्हें आई.बी. में ज्वाईन किया जाता है। अब जब मैं किसी भी सिक्योरिटी फोर्स का हिस्सा नहीं थी, इसीलिए मुझे पहले एन.एस.जी. कमाँडो के रूप में आई.बी. ज्वाईन करवाई गई थी।

इससे मुझे कोई प्राब्लम नहीं थी, क्योंकि एन.एस.जी. देश की सबसे ज्यादा सम्मानित सिक्योरिटी फोर्स में से एक है और उसका हिस्सा बनकर मैं काफी प्राऊ़ड फील कर रही थी, साथ ही साथ एन.एस.जी. कमाण्डो के रूप में के रूप में आई.बी. ज्वाईन करने पर मुझे सबसे बडा फायदा था कि अगर मैं फ्यूचर में आई.बी. ऐजेंट के रूप में काम ना करना चाहूँ, तो मैं एक नॉर्मल एन.एस.जी. कमाँडो के रूप में भी अपनी जॉब कन्टीन्यू कर सकती हूँ। हाँलाकि फिलहाल मेरा ऐसा कोई इरादा नहीं था, क्योंकि मैं किसी भी बंधन में बंधकर रहना नहीं चाहती थी। मैं तो बस अपनी नॉर्मल लाईफ जीते हुए देश और समाज के लिए कुछ अच्छा करना चाहती थी। जो एक सीक्रेट ऐजेंट के रूप में मैं आसानी से कर सकती थी।

कहानी जारी है.......
 
Update 073 -

ट्रेनिंग कैंप ज्वाईन करने की पूरी फार्मेलिटी पूरी करने के बाद मुझे एक बडे से हॉल में ले जाया गया। जिसमें करीब 10 बेड लगे हुए और जिसमें अगले 1 साल तक मैं रहने बाली थी। हर बेड के पास ही एक लोहे की अल्मारी रखी हुई थी, जिसमें हम अपना सामान रख सकते थे, इसके अलावा बेड के दूसरी तरफ अपना सामान रखने के लिए एक छोटी सी टेविल भी रखी हुई थी साथ ही साथ अपना मोबाईल फोन बगैरह चार्ज करने के लिए एक पॉवर शॉकेट भी लगा हुआ था। फिलहाल उस बडे से हॉल में मेरे अलावा कोई और नहीं था। जिस कारण मैं अपनी मर्जी का बेड सिलेक्ट कर सकती थी। इसलिए मैंने बिंडो के पास बाला एक बेड अपने लिए सिलेक्ट कर लिया।

उस बडे से हॉल के बाहर कॉमन लैट-बॉथ भी बने हुए थे। हॉलाकि यह सब बिल्कुल भी कम्फर्टेबल नहीं था, पर मुझे इससे फिलहाल कोई प्राब्लम नहीं थी। बैसे भी आर्मी ट्रेनिंग कैम्प इसी तरह के होते हैं और इसी प्रकार की कंडीशन में रहकर ही सभी लोगों को ट्रेनिंग पूरी करनी होती है। जब मैंने अपना बेड सिलेक्ट कर लिया तो बार्डन ने मुझे उस बेड के बगल में रखी अल्मारी की चाबियाँ दे दीं और अपने रिकार्ड में उस बेड की मेरे नाम पर इंट्री करने के बाद बार्डन मेरी दूसरी जरूरी डिटेल के साथ साथ मेरा बॉडी मेजरमेंट भी नोट करके वहां से चली गई।

बार्डन के जाने के बाद जब मैंने अल्मारी को खोलकर देखा तो वो पूरी तरह से खाली थी। इसलिए मैंने तुरंत अपना सारा सामान अनपैक करके अल्मारी में अच्छी तरह से सेट कर दिया और बेड पर लेटकर रेस्ट करने लगी। करीब एक घंटे बाद वार्डन फिर से मेरे पास आई, असल में इस बार वो अपने साथ ट्रेनिंक के दौरान पहने जाने बाले कपडे, शू और दूसरा जरूरी सामान अपने साथ लाई थी। सारा सामान मुझे देने के बाद उसने अपने रजिस्टर पर मेरे साईन लिए और फिर मुझे वहाँ रहने के सारे इंस्ट्रक्शन देने लगी। सारी बातें अच्छी तरह से समझाने के बाद बार्डन वहाँ से चली गई।

वार्डन के जाने के बाद मैंने अपनी ट्रेनिंग का सारा सामान अल्मारी में संभालकर रख दिया और फिर से रेस्ट करने लगी। रात करीब 9 बजे अलार्म बजने के बाद मैं कैंटीन में पहुँची जहाँ करीब 30-35 लडके खाना खा रहे थे। असल में वो सभी लडके भी यहाँ पर मेरी ही तरह ट्रेनिंग करने आऐ हुए थे। फिलहाल यहाँ पर मैं ही एक मात्र लडकी थी, जिस कारण वहाँ मौजूद सभी लडके बस मुझे ही देखे जा रहे थे। बैसे तो मुझे इतने सारे यंग लडकों का अटेंशन बहुत अच्छा लग रहा था ,पर फिलहाल मैंने उन सबको इग्नोर कर दिया और चुपचाप एक प्लेट में खाना लेने के बाद उन लडकों से थोडी दूर बैठकर खाने लगी।

हाँलाकि इस दौरान कुछ लडकों ने मुझसे बात करने की कोशिश भी की थी, पर मैंने उन्हें पूरी तरह से इग्नोर कर दिया था। अपना खाना खत्म करने के बाद मैं बापिस से अपने रूम में सोने चली गई। अगले दिन सुबह का नाश्ता करने के बाद मैं उस ट्रेनिंग कैंप को एक्सप्लोर करने लगी, पूरा ट्रेनिंग कैंप अच्छी तरह से देखने के बाद जब मैं अपने रूम में बापिस आई तो लंच टाईम हो चुका था, साथ ही साथ कुछ और लडकियाँ भी वहाँ ट्रेनिंग ज्वाईन करने आ गई थीं। इसलिए मैंने उनके साथ इंट्रोडेक्शन किया और फिर मैं उन लडकियाँ को अपने साथ कैंटीन में लंच करने ले गई। अगले दो दिनों में सभी कैडिट ट्रेनिंग कैम्प में आ चुके थे और उन्हें सारे इंस्ट्रक्शन भी अच्छी तरह से समझा दिए गए थे।

तीसरे दिन ऑफीशियली हमारी ट्रेनिंग की शुरूआत हो गई। सुबह 4 बजे अचानक तेज सायरन से सभी कैडेट जाग गए। अब हमारे पास तैयार होकर ट्रैनिंग ग्राऊंड में जाने के लिए मात्र 30 मिनट का समय था। इसलिए शायरन की आवाज सुनते ही सभी कैडेट हडबडाकर उठे और बाथरूम की तरफ भागे। 2 दिन पहले आने के कारण मैं इस सबके लिए अपने आपको मैंटली तैयार कर चुकी थी। जिस कारण शायरन की आवाज सुनते ही मैं तुरंत बाथरूम की तरफ भागी। क्योंकि अगर मैं थोडा सा लेट हो जाती तो फिर मुझे इंतजार करना पडता। हम लोग जैसे तैसे तैयार होकर ट्रेनिंग ग्राऊंड में पहुँचे, जहाँ हमें अलग अलग लाईनों में खडा करके हमारी काऊंटिंग की गई।

इस दौरान जो कैडेट लेट आऐ थे, उन्हें एक अलग लाईन में खडा किया किया गया था। काऊंटिंग पूरी होने के बाद हमारे ट्रेनर ने हमें ग्राऊंड के पाँच चक्कर लगाने का आर्डर दे दिया। उस ग्राऊंड का रेडियस करीब 2 किलोमीटर था, इस हिसाब से हमें पूरे 10 किलोमीटर दौडना था। जिस कारण ट्रेनर का आर्डर सुनते ही सभी कैडेटस् की हवा टाईट हो चुकी थी। ऊपर से जो कैडेट लेट आऐ थे, उन्हें अपने कंधों पर एक्सट्रा बेट लादकर ग्राऊंड के चक्कर लगाने की पनिशमेंट दी गई थी। जिसे सुनकर उनके चेहरे और भी बुरी तरह से लटक गए थे। लेकिन अब जो भी हो, हमें किसी भी तरह से यह टास्क तो पूरा करनी ही था। इसलिए ट्रेनर की ब्हीसल बजते ही हम लोगों ने ग्राऊंड का चक्कर लगाना शुरू कर दिया।

मेरी सुंदरता और परफेक्ट फिगर के चलते मुझे कभी भी फिजीकल फिटनेश और एक्सरसाईज की जरूरत नहीं पडी थी। जिस कारण पहला चक्कर पूरा होते होते मेरी हालत बुरी तरह से खराब हो गई थी, मेरी सांसे बहुत तेज तेज चल रहीं थी और पैर भी बुरी तरह सें काँप रहे थे, तब जाकर मुझे यह एहसास हुआ कि मै फिजीकली बिल्कुल भी फिट नहीं हूँ और मुझे अपनी ट्रेनिंग पूरी करने के लिए कुछ ज्यादा ही मेहनत करनी होगी। मैंने जैसे तैसे उस ग्राऊंड के दो चक्कर तो पूरे कर लिए थे, पर तीसरा चक्कर लगाने की मेरे अंदर अब बिल्कुल भी ताकत नहीं बची थी। इसलिए मैं कुछ देर रुककर लम्बी लम्बी सांसें लेने लगी, पर तभी अचानक से एक लेडी ट्रेनर ने मेरी गाँड पर जोर से डंडा मारते हुए कहा

लेडी ट्रेनर- अरे ओ राजकुमारी जी… यह तुम्हारा कोई गार्डन नहीं है, जहाँ तुम टहलने आई हो.. चलो जल्दी से 5 चक्कर पूरे करो, बर्ना में इस डंडे से मार मार कर तुम्हारे चूतड लाल कर दूँगी।

उस लेडी ट्रेनर ने मेरी गाँड पर बहुत जोर से डंडा मारा था, जिस कारण मेरे पूरे बदन में दर्द की एक तेज लहर दौड गई थी, तभी मेरे बगल में दौड रहे एक सरदार ने मुझपर हंसते हुए कहा

सरदार- ओऐ होऐ सोंडिओ कभी हंस भी लिया करो…. तुस्सी तो बहुत कमजोर निकले…. मैं क्या….. यह आर्मी सार्मी में काम करना तुम जैसी हसीनाओं का काम नहीं है…. तुस्सी तो अपने घऱ जाकर मेकअप सैकप करो…. वही तुम जैसी छुई मुई लडकियों पर सूट करता है जी।

उस सरदार की बात सुनकर मुझे बहुत तेज गुस्सा आ रहा था, पर मैं किसी भी तरह से अपने गुस्से को पी गई और उस सरदार की बातों को इग्नोर कर दिया। पर मेरे साथ दौड रही एक दूसरी लडकी साक्षी जो पिछले दो दिनों में मेरी अच्छी दोस्त बन गई थी और जो कुछ ज्यादा ही मूंहफट थी। वो गुस्से में उस सरदार को डाँटते हुए बोली

साक्षी- ओऐ सरदार चुपचाप अपना काम करो… हम लडकियाँ किसी भी तरह से लडकों से कम नहीं हैं।

साक्षी की बात सुनकर वो सरदार हमारा मजाक उडाता हुआ बोला

सरदार- ओऐ मैडम जी सड्डा नाम सोढी है… और रही बात लडके लडकियों की बराबरी की तो पहले अपनी दौड तो पूरी करके दिखाओ, उसके बाद ही मुझसे कुछ कहना

इतना बोलकर सोढी अपने दोस्तों के साथ तेजी से दौडता हुआ हमसे बहुत आगे निकल गया। तभी मेरे साथ दौड रही दूसरी लडकी जिसका नाम पूर्वी है। वो गुस्से में बोली

पूर्वी- बडा बदतमीज आदमी है….

पूर्वी की बात सुनकर साक्षी ने तुरंत कहा

साक्षी- हाँ यार… लगता है अब तो इसे सबक सिखाना ही पडेगा।

उन दोनों की बातें सुनकर मैंने कहा

अमृता- अरे यार रहने दो ना…. आज तो ट्रेनिंग की शुरूआत ही हुई है… हमारे पास उसे सबक सिखाने के अभी कई मौके आऐंगे। बैसे भी वो सच ही तो कह रहा था, हम लडकियाँ बाकई में इन लडकों से काफी कमजोर हैं। इसलिए पहले हमें अपने आपको पूरी तरह से फिट करना होगा। उसके बाद ही हम इन लडकों को मूँह तोड जबाब देंगे।

मेरी बात सुनकर पूर्वी बोली

पूर्वी- हाँ यार अमृता तुम सही बोल रही हो। दो चक्कर लगाते ही हमारी हालत खराब हो गई। पता नहीं हम पूरे 5 चक्कर कैसे लगाऐंगे।

इसी तरह आपस में बातें करते करते और अपने ट्रेनर के डंडे खाते हुए हम लोगों ने जैसे तैसे उस ग्राऊंड के 5 चक्कर पूरे कर ही लिए। लेकिन अब तक हमारी हालत पूरी तरीके से खराब हो चुकी थी। जॉगिंग होने के बाद ट्रेनर ने हमें नाश्ता करने के लिए 30 मिनट का रेस्ट दे दिया था और 30 मिनट पूरे होते ही एक बार फिर हमारी ट्रेनिंग शुरू हो गई। जिसमें हमें ऊँची, कूद, लम्बी कूद, रस्सी पर चढना, क्रालिंग करना सिखाया गया। इसके बाद करीब 12 बजे हमें फिर से 2 घंटे का रेस्ट दिया गया। जिसमें हमें नहाकर तैयार होने के साथ साथ अपना लंच भी करना था और लंच करने के तुरंत बाद ही एक बार फिर हमारी ट्रेनिंग शुरू हो गई थी। जिसमें हमें सेल्फ डिफेंस के अलावा कई अलग अलग प्रकार की ट्रेनिंग दी गई।

जब शाम करीब 6 बजे जब हमारी आखिरी ट्रेनिंग खत्म हुई, तो हम सभी लोग अपने रूम में आकर बिस्तर पर गिर पडे। अब हमारे अंदर अपनी उंगली हिलाने की भी ताकत नहीं बची थी। मेरे रूम में रह रहीं ज्यादातर लडकियाँ तो बिस्तर पर गिरते ही सो गईं थी। वहीं दूसरी तरफ मेरा भी बहुत बुला हाल था। लेकिन मैं यह भी अच्छी तरह से जानती थी कि अब यह सिलसिला पूरे एक साल तक चलने बाला है। इसलिए मुझे अपने आपको किसी भी तरह से इस माहौल मे ढालना ही होगा। इसलिए कुछ देर रेस्ट करने के बाद मैं नहाने चली गई। ताकि अपनी थकान मिटाने के साथ साथ मैं थोडा बहुत फ्रेस फील करूँ। हाँलाकि मैं अपने साथ साक्षी और पूर्वी को भी जबरदस्ती ले गई थी।

बैसे तो वो दोनों मेरे साथ अब कहीँ भी नहीं जाना चाहती थीं, पर मैंने किसी तरह से उन दोनों को मना ही लिया था। नहाने के बाद हम लोग पहले से काफी बेहतर महसूस कर रहे थे। लेकिन इससे पहले हम लोग एकबार फिर बिस्तर पर गिरकर सो जाऐं। मैंने पूर्वी और साक्षी के साथ साथ अपनी बाकी रूम मेट्स को कैंटीन में चलकर डिनर करने के लिए कहा। क्योंकि कल की ट्रेनिंग के लिए हमें एनर्जी की जरूरत थी। जो हमें खाना खाने के बाद ही मिल सकती थी। हाँलाकि ज्यादातर लडकियाँ बहुत ज्यादा थकी होने के कारण पहले ही सो चुकी थीं। पर जो अभी भी जाग रहीं थीं, वो जैसे तैसे मेरे साथ कैंटीन में गईं। जहाँ हमने जल्दी जल्दी खाना खाया और फिर अपने अपने बिस्तर पर जाकर गहरी नींद में चले गए।

अगले एक महिने में हम सभी लोग इस ट्रेनिंग के आदी हो चुके थे। इसलिए एक महिने बाद हमें फिजीकल ट्रेनिंग में ज्यादा प्राब्लम फेस नहीं करनी पड रही थी। इस दौरान हार्ड ट्रेनिंक करने के कारण धीरे धीरे मेरी सुपर पावर भी एक्टीबेट होकर पहले से ज्यादा बड गईं थी। जिस बजह से मैं समझ गई थी कि मैं जितनी ज्यादा हार्ड ट्रेनिंग करूँगी, उतनी ज्यादा मेरे अंदर की पावर एक्टीबेट होंगी। इस एक महिने की ट्रेनिंग में मेरा स्टेमिना सभी लडकियों को पीछे छोडते हुए लडकों के बराबर हो गया था और अब में जॉगिंग के दौरान सोढी को भी पीछे छोड देती थी। जब तक मेरी 6 महिनों की आर्मी ट्रेनिंग पूरी हुई. तब तक तो मैं उस ट्रेनिंग कैंप की बेस्ट कैडेट बन चुकी थी।

क्योंकि मेरी सुपर पावर अब पूरी तरह से एक्टीवेट हो गईं थी। जिस कारण ट्रेनिंग के दौरान मुझे लगने बाली चोंटे कुछ ही देर में भर जाती थीं और मेरे अंदर एक समान्य इंसान से कई गुना ज्यादा ताकत भी आ गई थी। साथ ही साथ मेरे दौडने और काम करने की स्पीड भी काफी ज्यादा बढ गई थी और मैं लगातार कई घंटों तक काम करने के बाद भी बिल्कुल नहीं थकती थी। इसके अलावा मेरी मैंटल पावर्स भी काफी ज्यादा बड गई थी। जिसकी बजह से मेरी सीखने के साथ साथ सोचने समझने और डिसीजन लेने की छमता भी काफी ज्यादा बड गई थी।

साथ ही साथ अब मैं ना केवल किसी इंशान के दिमाग में चल रही बातों को आसानी से समझ सकती थी। बल्कि मेरी अंधेरे में देखने, सुनने, सूँघने और लम्बे समय तक अपनी सांसों को रोकने की छमता भी अचानक से काफी ज्यादा बड गई थी। अपनी इन्हीं स्पेशल पावर्स की हेल्प से मैं लगातार अपने आप को बेस्ट बनाने में लगी हुई थी। साथ ही साथ मैं अपनी ट्रेनिंग दौरान उस रिपोर्टर की हेल्प से अपने एक्सीडेंट केस पर भी पूरी नजर बनाऐ हुए थी। इस दौरान मुझे पता चला था कि पुलिस ने जैसे जैसे मेरे एक्सीडेंट केस पर मर्डर के एंगल से अपनी जाँच आगे बडाई थी, बैसे बैसे अमन और रचना उस केस में पूरी तरह से उलझते चले गए थे।

यहाँ तक कि पुलिस उस गैराज तक भी पहूँच गई थी, जहाँ से अमन ने गाडी में कुछ चेंज करवाये थे। जब पुलिस के पास मेरे एक्सीडेंट को मर्डर साबित करने के पर्याप्त सबूत इकट्ठे हो गए तो पुलिस ने अमन और रचना को गिरफ्तार कर लिया था। थोडी सी सख्ती के साथ पूछताछ करने के बाद आखिरकार अमन और रचना ने अपना गुनाह कबूल कर लिया था। इसलिए मेरे केस की हियरिंग जल्द ही पूरी हो गई थी। जिसमें अमन और रचना को उम्र कैद की सजा हुई थी। इसके अलावा इंश्योरेंश कम्पनी के इम्पलॉय से मुझे यह भी पता चल गया था कि मेरी पॉलिसी के पैसे मेरे पापा और भाई को मिल गए हैं।

यह सब जानकर अब मैं पूरी तरह से संतुष्ट हो गई थी। इसलिए मैंने उस रिपोर्टर और इंश्योरेंश कम्पनी के इम्पलॉय से अपने सारे कान्टेक्ट भी खत्म कर दिए थे और अपना पूरा ध्यान अपनी ट्रेनिंग पर लगा दिया था। हमारी 6 महिने की आर्मी ट्रेनिंग पूरी होेने के बाद सभी कैडेट को 15 दिन की छुट्टी दी गईं थी। ताकि सभी कैडेट अपने अपने घर जाकर अपनी फैमली से मिल सकें। जिसके बाद आर्मी ज्वाईन करने बाले कैडेट अपनी जॉब लोकेशन जाने बाले थे। जबकि स्पेशल फोर्सेस के कैडेट को बापिस यहीँ पर आकर अपनी 6 महिने की स्पेशनल ट्रेनिंग पूरी करनी थी।

कहानी जारी है.......
 
Update 074 -

ट्रेनिंग के दौरान साक्षी, पूर्वी, सोढी और विक्रम मेरे काफी अच्छे दोस्त बन चुके थे। हम सभी लोगों की उम्र करीब 19-20 साल थी। हाँलाकि मेरी रियल एज अब 27 हो चुकी थी, लेकिन अपनी नई पहचान यानि अमृता चौहान की एज के हिसाब से मैं अभी भी 19 साल की थी। मुझे यह तो नहीं पता था कि मेरे अलावा उस ट्रेनिंग कैम्प में से कौन कौन आई.बी. एजेंट के रूप में सर्विस देने बाला था। लेकिन यह कंफर्म था कि हम पाँचो दोस्त एन.एस.जी. से थे। हम पाँचों दोस्तों के अलावा 25 कैडेट और हमारे साथ अगले 6 महिनों तक एन.एस.जी. कमांडो की स्पेशल ट्रेनिंग करने बाले थे।

चूँकि मेरे यानि अमृता के परिवार में अब कोई भी जिंदा नहीं था और यह बात मैंने अपने दोस्तों को पहले ही बता दी थी। इसलिए जब हमें ट्रेनिंग कैंप से 15 दिनों की छुट्टी मिली तो साक्षी और पूर्वी मुझे अपने-अपने साथ अपने अपने घर पर ले जाने की जिद्द करने लगीं। लेकिन मेरा पहले ही इंदौर जाकर अपने शॉपिंग मॉल का काम देखने का प्लान बन चुका था। इसलिए मैंने उन्हें फिर कभी उनके घर आने का बोल दिया और इंदौर के लिए निकल गई। 15 दिनों की छुट्टिओं के बाद जब सभी एन.एस.जी. कैडेट ट्रेनिंग सेंटर बापिस आऐ, तो एक बार फिर हम सभी लोग ट्रेनिंग में जुट गए।

इस बार हमें कई सारी सेल्फ डिफेंस टैक्निक और बिना हथियारों के दुश्मनों को जान से मारने की सारी टैक्निक सिखाईं गईं थीं, इसके अलावा हमें यह भी सिखाया गया था कि हमें अलग अलग कंडीशन में कैसे सर्वाईब करना है। साथ ही साथ हमें कई अलग अलग लैंग्वेज, एथीकल हैकिंग, सभी प्रकार की गाडियों को चलाने की ट्रेनिंग, हथियारों की ट्रेनिंग, अपने चेहरे पर मेकअप करके अपना हुलिया पूरी तरह से बदलने जैसी कई जरूरी ट्रेनिंग अभी दी गईं थी। इस ट्रेनिंग के दौरान हम लोगों को कई बार अलग अलग मिशन पर अपने सीनियर्स के साथ भेजा जाता था। ताकि हम लोग ट्रेनिंग के अलावा भी रियल कंडीशन में सर्वाईब करना सीख सकें।

शुरूआत में तो हमें दूर से ही अपने सीनियर्स को लाईब ऑपरेशन परफार्म करते हुए देखना पडता था। पर बाद में वो लोग हमें भी अपने ऑपरेशन में सामिल करने लगे। अपनी इस ट्रेनिंग के दौरान मैंने अपने दोस्तों के साथ करीब 10 ऑपरेशन्स में हिस्सा लिया था, पर आज तक मैंने किसी भी दुशमन पर गोली नहीं चलाई थी। पता नहीं क्यों पर जब भी मैं अपनी गन उठाकर अपने दुश्मन को टारगेट करती थी, तो मेरे हाथ पैर कांपने लगते थे। हाँलाकि ऐसा नहीं था कि मैं डरपोक या कायर हूँ। पर मेरे अंदर किसी जिंदा इंशान की जान लेने की हिम्मत नहीं थी।

भोपाल में भी जब मैंने अपने दुशमनों से बदला लिया था, तो उन्हें भी मैंने अपने हाथों से नहीं मारा था, बल्कि उनके ही एक साथी को अपने साथ मिलाकर अपने दुशमनों का सफाया किया था। मेरी इस कमी के कारण मेरे दोस्तों को छोडकर बाकी के लोग मेरा मजाक उडाते थे, हाँलाकि मेरे दोस्तों ने कई बार मुझसे इस बारे में बात की थी और मुझे समझाने की काफी कोशिश की थी, पर जब भी ऐसा मौका आता तो मेरा माईंड पूरी तरह से ब्लैंक हो जाता था और मैं फ्रिज हो जाती थी, जिस कारण मेरे दोस्तों और सीनियर्स को मुझे सुरक्षित करने के लिए अलग से मेहनत करनी पडती थी। आखिरकार जब एक ऑपरेशन के दौरान मुझे बचाते वक्त मेरा एक साथी घायल हो गया तो मेरे टीम लीडर कैप्टन विकाश ने मुझे डाँटते हुए कहा

विकाश- मिस अमृता सच सच बताईऐ… आखिर आपने स्पेशल फोर्स ज्वाईन क्यों की…

कैप्टन विकाश एक 40-45 साल के व्यक्ति थे, जो काफी सुलझे हुए और स्ट्रेट फार्वड थे। एन.एस.जी. का हर कमांडो उनकी काफी इज्जत करता है। क्योंकि उन्होंने अपनी अब तक की जिंदगी में कई बडे बडे ऑपरेशन्स को बहादुरी से अंजाम दिया था और अब तक उन्होंने 100 से ज्यादा दुशमनों की जान ली थी। जिस कारण उन्हें कई बडे बडे मैडल मिल चुके थे और अब वो जल्दी ही प्रमोट होकर मेजर बनने बाले थे। कैप्टन विकाश ने अपनी पूरी जिंदगी देश के लिए समर्पित कर दी थी, इसीलिए उन्होंने कभी शादी नहीं की थी, ताकि शादी के बाद अपने परिवार की जिम्मेदारियाँ निभाने के चक्कर में वो अपने फर्ज से पीछे ना हट जाऐं। कैप्टन विकाश की पूरी कहानी जानने और उनकी बहादुरी के किस्से सुनने के बाद से मैं भी उनकी काफी रिस्पेक्ट करने लगी थी। इसलिए जब कैप्टन विकाश ने मुझसे वो सबाल किया तो मैंने तुरंत उन्हें जबाब दिया

अमृता- अपने देश की सेवा के लिए सर

विकाश- अगर ऐसा है तो इस ट्रेनिंग के दौरान तुमने जिन 10 ऑपरेशन में हिस्सा लिया है। उनमें तुमने अब तक अपने किसी भी दुशमन पर गोली क्यों नहीं चलाई।

मैं जानती थी कि आज नहीं तो कल मेरे सीनियर्स मुझसे यह सबाल जरूर करेंगे। पर मेरे पास इस सबाल का कोई जबाब नहीं था। इसलिए मैंने खामोश रहने का फैसला किया, जब मैंने कैप्टन विकाश के सबाल का कोई जबाब नहीं दिया तो वो गुस्से में झल्लाते हुए बोले

विकाश- ओह कम ऑन मिस अमृता…. जबाब दो आखिर तुमने आज तक अपने किसी भी दुशमन पर गोली क्यों नहीं चलाई

अमृता- क्योंकि मैं किसी की जान नहीं लेना चाहती सर

विकाश- तो फिर तुम एन.एस.जी. में क्या कर रही हो…. तुम्हें घर पर रहकर चौका चूल्हा करना चाहिए था और अगर तुम्हें अपने देश और समाज के लिए कुछ करना ही है तो एन.एस.जी. की जगह किसी एन.जी.ओ. को ज्वाईन कर लो… यहाँ पर कायरों के लिए कोई जगह नहीं है।

अमृता- मैं कायर नहीं हूँ सर… मैं बस किसी की जान नहीं लेना चाहती…

विकाश- अगर तुम अपने दुशमनों की जान नहीं ले सकती हो तो तुम हमारे किसी काम की नहीं हो। हमारे दुशमन हर एक एन.एस.जी. कमांडो को किलिंग मशीन की नजर से देखते हैं और हमें उनका यह डर कायम रखना है। अपने दोस्तों को ही देखो… उन सभी का अब तक का कुल स्कोर 10 से ज्यादा हो गया है। इन्फेक्ट तुम्हारे साथ ट्रेनिंग करने बाला हर कैडेट कम से कम एक दुशमन की जान ले चुका है। पर तुम्हारा स्कोर अब तक जीरो है। मैं नहीं चाहता कि तुम्हारे कारण मेरा कोई भी कैडेट या मेरा कोई साथी अपनी जान गँवा दे। इसलिए अगर तुम अपने आप को एक किलिंग मशीन में कंवर्ट नहीं कर सकती हो, तो फिर अपनी बर्दी उतारो और घर चली जाओ।

अमृता- नहीं सर मैं घर बापिस नहीं जा सकती….

विकाश- तो फिर तुम्हें अपने दुश्मनों की जान लेना सीखना ही होगा… मैं तुम्हें बस एक आखिरी मौका दे रहा हूँ। अगर अगली बार तुमने मुझे निराश किया तो फिर तुम्हारे लिए एन.एस.जी. में कोई जगह नहीं होगी।

कैप्टन विकाश की बात सुनकर मैंने कुछ पलों के लिए अपनी आँखें बंद की और फिर मन ही मन अपने आपको तैयार करने के बाद मैंने जबाब दिया

अमृता- थैंक्यू सर… मैं आपको निराश नहीं करूँगी… मैं वादा करती हूँ कि मैं अपने आपको पूरी तरह से एक किलिंग मशीन में कंवर्ट करके रहूँगी।

मेरी बात सुनकर कैप्टन विकाश बिना कुछ कहे वहाँ से चले गए। उनके जाने के बाद मेरे दोस्त तुरंत मेरे पास आऐ और मुझे समझाते हुए बोले

साक्षी- अरे यार अमृता विकाश सर की बातों को दिल पर मत लो… हम सभी जानते हैं कि तुम कितनी काबिल हो…

पूर्वी- हाँ यार…. तुम्हें बिल्कुल भी परेशान होने की जरूरत नहीं है। अगली बार हम लोग जब भी किसी ऑपरेशन पर जाऐंगे, तो हम तुम्हारी पूरी मदद करेंगे।

सोढी- ओऐ जी मदद क्या करना… मैं तो सीधे सीधे 2-4 को टपकाकर बोल दूँगा कि उन्हें अमृता ने मारा है। उसके बाद कोई तुम्हें कुछ नहीं कह पाऐगा।

विक्रम- हाँ यार यही सही होगा….

अपने दोस्तों का अपने लिए इतना प्यार और उनकी केयरिंग देखकर मेरी आँखों भर आईं थी। पर मैं अपनी बजह से अपने किसी भी दोस्त को मुशीवत में नहीं डालना चाहती थी। इसलिए मैंने कहा

अमृत- नहीं यार यह सही नहीं होगा….. कैप्टन सर एकदम सही कह रहे थे, मुझे अपनी इस कमजोरी से लडना ही होगा…. अगर मैं अपने दुशमनों का सफाया नहीं कर सकती, तो मुझे एन.एस.जी. में रहने का कोई हक नहीं है।

पूर्वी- पर अमृता तुम अभी इस सबके लिए मैंटली प्रिपेयर नहीं हो

पूर्वी की बात सुनकर मैं झल्लाते हुए बोली

अमृता- अगर ऐसा है तो फिर मुझे अपने आपको किसी भी तरह से मैंटली प्रिपेयर करना ही होगा…. कैप्टन सर मुझे एक किलिंग मशीन के रूप में देखना चाहते हैं ना…. तो अब मैं उन्हें सच में एक किलिंग मशीन बनकर दिखाऊंगी

इतना बोलकर मैं वहाँ से चली गई। मेरे गुस्से को देखकर मेरे किसी दोस्त में मुझे रोकने की हिम्मत नहीं हुई। उस दिन के बाद से मैंने अपने आपको मैंटली तैयार करना शुरू कर दिया था। मैं घंटों मैडिटेशन करके अपने मन को पूरी तरह से शांत करने और अपने आपको नियंत्रित करने की कोशिश करने लगी। मेरे अंदर आऐ इस बदलाव से मेरे सभी दोस्त हैरान थे। पर मैंने किसी पर भी कोई ध्यान नहीं दिया। अब मुझे अपने आपको किसी भी तरह से सबके सामने प्रूफ करना ही था।

मेरे अंदर एक अलग ही जुनून सबार हो गया था। जबकि दूसरी तरफ मेरे दोस्तों ने आपस में मिलकर, अगले ऑपरेशन में मेरी मदद करने का एक प्लान पहले ही बना लिया था, जिससे मैं पूरी तरह से अंजान थी। करीब एक महीने बाद हमें एक मिशन में हिस्सा लेने के लिए म्याँमार बार्डन पर जाना पडा। वह एक बडा ऑपरेशन था, जिसमें हमें उग्रवादियों के पूरे गिरोह को तबाह करना था। असल में इंटेलिजेंश से टिप मिली थी कि कई छोटे बडे उग्रवादी संगठन भारत म्यांमार बार्डर पर इकट्ठा होकर हमारे देश में किसी बडे हमले को अंजाम देने की प्लानिंग कर रहे हैं।

इसलिए हमें हर हाल में उनके मिशन को नाकाम करना था, साथ ही साथ हमारे पास एक साथ कई उग्रवादियों को जान से मारने का सुनहरा मौका भी था। जिस कारण होम मिनस्टर के आर्डर के बाद इस ऑपरेशन को फाईनल किया गया था। इस ऑपरेशन के लिए 10 नए कमांडो और 15 सीनियर कमाँडो को मिलाकर 25 लोगों की एक टीम तैयार की गई थी। जिसे एक बार फिर कैप्टन विकाश लीड कर रहे थे। इस ऑपरेशन के लिए हमें एक दिन पहले ही स्पेशल हैलीकॉप्टर से देहरादून ट्रेनिंक कैंप से भारत म्याँमार बार्डर के पास बने आर्मी बेस पर लाया गया था। जहाँ कैप्टन विकाश ने हमें पूरे ऑपरेशन की ब्रीफिंग की।

कैप्टन विकाश मुझे एक बार फिर अपनी टीम में देखकर बिल्कुल भी खुश नहीं थे। क्योंकि उन्हें मेरी कमजोरी पहले से पता थी। इसलिए मुझे वहाँ पर देखकर उनका मूढ पहले ही खराब हो चुका था। पर ऑपरेशन के ठीक पहले वो सबके सामने मुझसे कुछ भी कहकर बाकी टीम मेंबर्स को निराश नहीं करना चाहते थे। इसलिए कैप्टन विकाश मुझे बाकी लोगों से थोडी दूर ले गऐ और मुझे वार्निंग देते हुए बोले

विकाश- देखिए मिस अमृता मैं नहीं चाहता कि आपके कारण मेरे किसी भी साथी की जान जाऐ। इसलिए हम सभी की भलाई के लिए बेहतर यही होगा कि आप अपने आपको इस ऑपरेशन से बाहर कर लें।

जब कैप्टन विकाश की बात सुनकर मैंने उन्हें कोई जबाब नहीं दिया तो वो एक बार फिर बोले

विकाश- लेकिन अगर आप इस ऑपरेशन से अपने आपको बाहार नहीं रखना चाहती हैं तो आपको मेरे सारे इंस्ट्रक्शन फॉलो करने ही होंगे। हम सभी जानते हैं कि आपके अंदर अपने दुशमनों का सामना करने की बिल्कुल भी हिम्मत नहीं है। इसलिए बेहतर यही होगा कि आप हमारी टीम के सबसे पीछे रहकर अपने आप को सुरिक्षित रखें।

कैप्टन विकाश की बात सुनकर मैंने गुस्से से उसकी आंखों में झांका और पूरे कांफिडेंस के साथ बोली

अमृता- आप पूरी तरह से निश्चिंत रहिए सर, मेरी बजह से आपके किसी भी कमाँडो की जान नहीं जाऐगी।

आज पहली बार कैप्टन विकाश ने मेरी आँखों में इतना ज्यादा कान्फिडेंश देखा था। जिस कारण उनकी मुझसे और कुछ कहने की हिम्मत ही नहीं हुई। जब काफी देर तक उन्होंने मुझसे कुछ भी नहीं कहा तो मैं बापिस अपने दोस्तों के पास आ गई और आगे के प्लान के बारे में डिस्कस करने लगी। जो एकदम सिंपिल था, असल में सभी लोगों को 5 छोटी छोटी टीमों में बाँट दिया गया था। जो अलग अलग लोकेशन से होकर जंगल के अंदर जाऐंगी और रास्ते में मिलने बाले सभी दुशमनों का सफाया करते हुए आखिर में दुशमनों के बेस कैंप के पास इकट्ठा होंगीं। जिसके बाद सभी लोग मिलकर एक साथ दुशमनों के बेस कैम्प पर हमला करेंगे।

किस्मत से मेरे साथ साथ मेरे सभी दोस्तों को एक ही टीम में रखा गया था। यानि मैं, साक्षी, पूर्वी, सोढी और विक्रम एक ही टीम में थे और हमें सबसे आखिर में सेफ रास्ते से जंगल के अंदर जाना था। पूरा प्लान अच्छी तरह से डिस्कस करने के बाद सभी टीमें एक एक करके पहले से डिसाईड किए गए रूट के हिसाब से जंगल के अंदर चली गईं थीं। सभी टीमोें के पास जंगल का एक-एक मैप और दूसरा जरूरी सामान भी था, ताकि कोई भी टीम रास्ता ना भटके। मुझे और मेरे साथियों को सबसे सेफ रास्ते से जंगल में भेजा गया था, जिस कारण आधा रास्ता तय करने तक हें किसी भी प्राब्लम का सामना नहीं करना पडा था।

हाँलाकि जंगल में कुछ दूर चलने के बाद ही मैं समझ गई थी कि मेरी बजह से कैप्टन बिकाश ने हमारी टीम को जानबूझकर इस रास्ते पर भेजा था। ताकि हमें किसी भी प्रकार की प्राब्लम का सामना ना करना पडे। बैसे तो कैप्टन विकाश ऊपर से काफी सख्त और पत्थर दिल इंशान दिखाई देते हैं, पर उनके साथ अब तक 10 अलग अलग ऑपरेशन में हिस्सा लेकर मैं यह बात तो अच्छी तरह से समझ गई थी कि वो जो कुछ भी कहते या करते हैं, वो बस अपने साथियों की भलाई के लिए ही होता है। शायद उन्हें डर रहा होगा कि खतरनाक रास्ते से जंगल के अंदर भेजने पर मेरे कारण मेरे दोस्त भी मुशीवत में पड सकते हैंं। इसलिए उन्होंने हमें इस रास्ते से जंगल के अंदर भेजा था।

कहानी जारी है........
 
Update 075 -

मुझे और मेरे दोस्तों को जंगल के अंदर भटकते हुए आधे दिन से ज्यादा बीत गया था। इस बीच हमें दुशमन तो दूर कोई छोटा मोटा जंगली जानवर भी नहीं मिला था। जिस कारण सोढी कुछ ज्यादा ही चिढा हुआ था, इसलिए वो झल्लाते हुए बोला

सोढ- ओऐ यारा क्या वकवास है….. साला यहाँ पर तो अब तक एक चूहा भी नहीं मिला शिकार करने के लिए… लगता है कैप्टन सर ने जानबूझकर हमें इस रूट से भेजा है।

सोढी की बात सुनकर विक्रांत उसे समझाते हुए बोला

विक्रांत- ओऐ सोढी इतना उताबला होना अच्छी बात नहीं है। अभी हम दुशमनों के बेस कैम्प से काफी दूर हैं। जब हम वहाँ पहुँचेंगे तो पूरी कसर निकाल लेना

सोढी- वो तो है… पर कम से कम रास्ते में थोडा बहुत स्टार्टर तो मिलना ही चाहिए था

वो दोनों अभी बातें कर ही रहे थे कि अचानक से कुछ लोग पेड से नीचे कुदे और देखते ही देखते उन लोगों ने हमें घेर लिया। वो लोग गिनती में करीब 10 थे और उन सभी के हाथों में इस वक्त ऑटोेमैटिक रायफल थी। इससे पहले हम कुछ कहते या करते उनमें से 5 आदमियों ने हमारे सिर के ऊपर अपनी गन टीका दी। तभी एक आदमी बोला

आदमी- सालों इण्डियन आर्मी की कुत्तों… चुपचाप अपनी अपनी गन नीचे रख दो, बर्ना तुम सबकी खोपडी खोल देंगे।

हम सभी लोग दुशमनों से घिर चुके थे। जिस कारण हमारे पास उनकी बात मानने के अलावा और कोई रास्ता नहीं था। इसलिए हम लोगों ने चुपचाप अपनी गन नीचे जमीन पर रख दी। तभी विक्रांत सोढी को कोसते हुए बोला

विक्रांत- ले साले खा ले स्टार्टर…. साला कब से जोर जोर से बोलकर बकवास कर रहा था…. ले अब फंसवा दिया ना।

तभी वही आदमी एक बार फिर गुस्से में बोला

आदमी- चुप…. एक दम चुप…. अब अगर किसी ने अपने मूँह से एक शब्द भी निकाला तो हमारी गोली उसकी खोपडी के आर पार होगी।

उस आदमी का बात सुनकर सोढी और विक्रांत एक दम चुप हो गए थे। मेरा दिमाग इस वक्त बहुत तेजी से चल रहा था, मुझे परा यकीन था कि ऐ लोग अब हमें जिंदा छोडने का रिस्क नहीं लेंगे। इसलिए अपनी और अपने दोस्तों की जान बचाने के लिए मैं पूरी सिचुऐशन को मन ही मन कैल्कुलेट कर रही थी। अपने सभी दुशमनों की पॉजीशन का मन ही मन एक मैप तैयार करने के बाद अचानक से मैंने अपनी कमर के पास से एक चाकू निकाला और अपनी जगह पर घूमते हुए अपने ठीक पछे खडे दो दुशमनों के गले की नश काट दी और फिर अपना चाकू सामने की तरफ फेंक दिया। जो सोढी के ठीक पीछे खडे दुशमनों के लीडर के गले में जा धंसा।

इससे पहले कोई कुछ समझ पाता या हमारे दुशमन कुछ रिऐक्ट कर पाते, मैंने सामने पडी अपनी गन पर छलाँग लगा दी और अगले ही पल हमें चारों तरफ से घेरकर खडे दुशमन किसी कटे पेड की तरह नीचे जमीन पर जा गिरे। मेरा निशाना एकदम अचूक था और मेरी गन से निकली हर गोली दुशमनों की खोपडी में छेद करते हुए आर पार हो गई थी। अगले ही पल वहाँ पर गहरा सन्नाटा पसर गया था। मेरे चारों दोस्त आँखें फाड फाड कर मुझे ही देखे जा रहे थे। सबसे बुरी हालत तो सोढी की थी। क्योंकि मेरा चाकू सोढी के कान के एकदम पास से गया था। अगर मेरा निशाना जरा भी चूक जाता तो मेरा चाकू दुशमन की जगह सोढी को अपना शिकार बना लेता। हमारे बीच छाई उस खामोशी को आखिरकार पूर्वी ने भंग करते हुए कहा

पूर्वी- अमृता……… यह सब क्या था…. मेरा मतलब है कि तुमने अकेले ही इन सबको मार दिया। पर कैसे….

पूर्वी की बात सुनकर मैंने बिना किसी एक्सप्रेसन के कहा

अमृता- मेरे पास और कोई रास्ता नहीं था। अगर मैं उन सबको नहीं मारती तो यह सब हमें मार देते।

मेरी बात सुनकर साक्षी भी अपने होश में बापिस आते हुए बोली

साक्षी- हाँ वो तो ठीक है… पर तुमने यह सब पलक झपकते ही कैसे किया… हम लोग तो तुम्हारे मूब्स भी सही से देख नहीं पाऐ, उससे पहले ही तुमने सभी दुशमनों को ठिकाने लगा दिया।

तभी विक्रांत भी हमारी बातों में सामिल होते हुए बोला

विक्रंत- लो जी… हम लोग तो प्लान बना रहे थे कि आज के ऑपरेशन में हम तुम्हारे नाम से कुछ एक्स्ट्रा दुश्मनों का शिकार करेंगे, ताकि तुम्हारी जॉब बचा सकें। पर तुमने तो यहाँ अकेले ही सारे दुशमनों का सफाया कर दिया। लगता है हमने तुम्हारी काबिलियत को अब तक ठीक से समझा ही नहीं था।

विक्रांत की बात खत्म होते ही मैंने सोढी की तरफ देखते हुए कहा

अमृता- ओऐ सरदार कभी हंस भी लिया करो…. सारे दुशमन मारे गए हैं। अब तुम्हें डरने की जरूरत नहीं है।

मेरी बात सुनकर सोढी के साथ साथ मेरी बाकी दोस्तों को हमारी ट्रेनिंग का पहला दिन याद आ गया। जिस दिन ग्राऊंड के दो चक्कर लगाने के बाद ही मेरा बुरा हाल हो गया था और तब सोढी ने मुझपर यह डायलॉग मारा था। जिसे आज मैंने सूद समेत उसे बापिस कर दिया था और जिसे सुनकर हम सभी एक साथ हंसने लगे। कुछ देर हंसी मजाक करने के बाद मेरे दोस्तों ने नीचे जमीन पर पडी अपनी अपनी गन उठाई और फिर हम सभी लोग मिलकर दुशमनों की तलासी लेने लगे। जब हमें उनके पास से कोई भी जरूरी सामान नहीं मिला तो हम लोग आगे बढने की तैयारी करने लगे। तभी सोढी दुशमनों के लीडर के गले में घंसे मेरे चाकू को निकालने लगा। तो मैं उसे रोकते हुए बोली

अमृता- रहने दो सोढी…. अब मुझे उसकी कोई जरूरत नहीं है… इसी चाकू ने अब तक मेरे हाथ बांधकर रखे हुए थे। लेकिन अब मैं आजाद हूँ।

मेरी बात सुनकर सोढी वहीं रुक गया और बोला

सोढी- मतलब

सोढी का सबाल सुनकर मैंने एक लम्बी सांस लेते हुए कहा

अमृता- बहुत लम्बी कहानी है मेरे दोस्त फिर कभी बताऊंगी

तभी साक्षी बीच में बोल पडी

साक्षी- हमें अभी भी अपने टारगेट तक पहुँचने में लम्बा रास्ता तय करना है। इसलिए अगर तुम चाहो तो उस बारे में हमें बता सकती हो।

अमृता- ठीक है… पर अभी चलो यहाँ से

इतना बोलकर मैं आगे बढ गई और मेरे पीछे मेरे दोस्त आने लगे। असल में मैंने जिस चाकू से अभी अपने दुशमनों को मारा था, वो वहीं चाकू था, जिससे भोपाल के खण्डहर में गनपत और जफर ने मेरे पूरे बदन पर अनगिनत कट लगाऐ थे। किस्मत से जिंदा बचने के बाद वो चाकू मुझे खण्डहर में मिल गया था और उसे मैंने अपने पास इस उम्मीद में संभालकर रख लिया था कि एक ना एक दिन मैं यह चाकू उन दोनों के सीने में घोंप दूंगी। पर मुझे इसका मौका ही नहीं मिला था। तब से यह चाकू मेरे पास ही था।

शायद उस खण्डहर में मैंने जो दर्द झेला था, उसके कारण ही मेरे अंदर किसी भी इंशान की जान लेने की हिम्मत नहीं बची थी। जब भी मैं अपने किसी दुशमन को जान से मारने की कोशिश करती, तो मुझे खण्डहर में मिले दर्द का एहसास होने लगता था और याद आता था कि मैं कैसे पल पल मौत का इंतजार कर रही थी, मुझे याद आता था कि कैसे मैं अपने आप को जिंदा रखने की कोशिश कर रही थी। मैं अभी इन सभी ख्यालों में खोई हुई थी कि तभी पूर्वी ने मुझे टोकते हुए कहा

पूर्वी- यार अमृता… बता ना क्या हुआ था तेरे साथ… आखिर उस चाकू की क्या कहानी है…

पूर्वी की बात सुनकर मैं अपने ख्यालों से बाहर आई और एक बार फिर गहरी सांस लेते हुए बोली

अमृता- देखो यार कहानी तो बहुत लम्बी और दर्दनाक है, इसलिए मैं तुम लोगों को शार्ट में बताने की कोशिश करती हूँ। असल में एन.एस.जी. ज्वाईन करने से पहले कुछ क्रिमनल्स ने मुझे किडनैप कर लिया था और मेरे साथ जबरदस्ती करने की कोशिश की थी। पर जब वो अपने इरादों में कामयाब नहीं हुए तो उन लोगों ने उसी चाकू से मुझे कई बार स्टेप किया था और जब उन्हें लगा कि मैं मर गई हूँ तो वो लोग वहां से भाग गए। किस्मत से मैं उस हादसे में बच गई थी। तबसे वो चाकू मेरे पास ही था। मैंने बस इस उम्मीद से उसे अपने पास रखा था कि मैं उसी चाकू को उन लोगों के सीने में घोंपकर अपना बदला लूँगी। पर मेरे कुछ करने से पहले ही वो सभी क्रिमनल्स पुलिस एनकाऊंटर में मारे गए थे और मुझे कभी भी अपना बदला लेने का मौका ही नहीं मिला। पर आज जब मुझे मौका मिला तो मैंने उस चाकू को दुशमनों के खून से रंग ही दिया।

मेरी बात सुनकर मेरे सभी दोस्त बहुत ज्यादा इमोशनल हो गए थे। क्योंकि वो मन ही मन मेरी उस स्थिती की कल्पना कर रहे थे। जिसे सोचने भर से उन्हें अपने पूरे बदन में दर्द का एहसास हो रहा था। पर मैंने उन्हें जो कुछ बताया था उससे कहीँ ज्यादा दर्द को बरदास्त किया था। कुछ देर की खामोशी के बाद आखिरकार विक्रांत ने अपने आपको सबसे पहले संभालते हुए कहा

विक्रांत- तो इसका मतलब है कि उस चाकू के तुम्हारे पास होने के कारण ही, जब भी तुम अपने दुशमनों का सामना करती थी, तो तुम्हें वह हादशा याद आ जाता था और जिसके कारण तुम आज से पहले अपने किसी दुशमन की जान नहीं ले पाई थी।

अमृता- हाँ

मेरा जबाब सुनकर पूर्वी ने कहा

पूर्वी- तो तुमने पहले ही उस चाकू को अपने से दूर क्यों नहीं कर दिया था

अमृता- मैं बस एक बार उस चाकू को अपने दुशमनों के खून से रंगना चाहती थी। ताकि मैं उस हादशे को हमेशा हमेशा के लिए भुलाकर अपनी जिंदगी में आगे बढ सकूँ।

साक्षी- अब जब तुमने उस हादशे को हमेशा के लिए भूलकर आगे बडने का फैसला कर ही लिया है, तो फिर हम लोग भी आज के बाद तुमसे उस बारे में कोई बात नहीं करेंगे।

इसी तरह आपस में बातें करते करते हम लोग उस लोकेशन पर जा पहुँचे जहाँ पर हमें अपने बाकी साथियों से मिलना था। इस बीच हमें रास्ते में कोई और दुशमन नहीं मिला था। जब हम उस लोकेशन पर पहुँचे तो देखा बाकी टीम अब तक वहाँ पर नहीं आईं हैं। शाम का समय होने और घने जंगल के कारण हमें आस पास का माहौल समझने में थोडी प्राब्लम हो रही थी। लेकिन तभी अचानक से मुझे खून की हल्की सी महक आई। इससे पहले कोई कुछ कहता मैंने अपने दोस्तों को थोडी दूर खडी झाडियों की तरफ इशारा किया, मेरा इशारा मिलते ही हम सभी लोग बिना किसी आवाज उन झाडियों की तरफ बड गऐ।

जैसे जैसे मैं झाडियों के पास जा रही थी, बैसे बैसे खून की महक तेज होती जा रही थी। जब हमने झाडियों के दूसरी तरफ जाकर देखा तो वहाँ पर एन.एस.जी. कमांडो खून से लथपथ बेहोश पडा हुआ था। लेकिन जब हमने उसका चेहरा देखा तो हम सभी लोग बुरी तरह से हैरान रह गए। क्योंकि वो कोई और नहीं बल्कि कैप्टन बिकाश थे। उनको दो गोलियाँ मारी गईं थी। एक उसने कंधे पर और एक उसके पेट पर। कैप्टन बिकाश को इस हालत में देखकर मैंने तुरंत उनकी नब्ज चैक की तो मुझे पता चला कि वो अब भी जिंदा हैं। इसलिए उन्हें होश में लाने के लिए मैंन उनके चेहरे पर थोडा सा पानी डाला। जिस कारण कुछ ही देर में उन्हें होश आ गया। उनके होश में आते ही मैंने अपने दोस्तों से सबाल किया

अमृता- मेडिकल किट किसके पास है

मेरी बात सुनकर पूर्वी ने कहा

पूर्वी- मेरे पास है… पर उसमें तो बस छोटी मोटी चोटों के इलाज के लिए आयोडीन, कॉटन और बैंडेज है।

अमृता- कोई बात नहीं….. इससे भी हमारा काम चल जाऐगा

पूर्वी- ठीक है…. मैं अभी देती हूँ

इतना बोलकर पूर्वी ने अपने बैग में से एक छोटी सी मेडिकल किट निकालकर मेरी तरफ बडा दी तभी विक्रांत मुझे टोकते हुए बोला

विक्रांत- आखिर तुम करना क्या चाहती हो अमृता

अमृता- हमें किसी भी तरह से कैप्टन सर के शरीर से गोलियाँ निकालनी होंगी। बर्ना गोलियाँ का जहर अगर उनके शरीर में फैल गया तो उन्हें बचाना मुश्किल हो जाऐगा।

विक्रांत- पर हम कोई डॉक्टर नहीं है। हमें कैप्टर सर को अपने बेस कैंप ले जाना होगा। वहीं पर इनका सही तरीके से इलाज हो सकता है।

विक्रांत की बात सुनकर मैं झुंझलाते हुए बोली

अमृता- ओह कम ऑन विक्रांत पागलों जैसी बातें मत करो। हमें अपने बेस कैंप से यहां तक आने में पूरा एक दिन लग गया है। क्या तुम्हें लगता है कि हम सही समय पर कैप्टन सर को बेस कैम्प तक ले जा पाऐंगे। हमें जो कुछ भी करना है, वो अभी करना होगा। बैसे भी ट्रेनिंग में हमें सर्वाईबल के लिए थोडी बहुत मेडिकल नॉलेज दी गई थी।

मेरी बात सुनने के बाद फिर किसी ने कुछ भी नहीं कहा। वहीँ दूसरी तरफ कैप्टन विकाश की हालत इतनी खराब थी कि वो कुछ भी कहने की कंडीशन में नहीं थे। तभी मेरी नजर कैप्टन बिकास की कमर पर लटकते हुए एक बडे सें खंजर पर पडी। मैंने तुरंत वो खंजर निकाल लिया। उस खंजर पर नजर पडते ही मेरी आंखों में चमक आ गई थी, वो एक बहुत ही शानदार खंजर था, जो बास्तव में एक दमास्कस टाईटेनियम ब्लेड था। जिसका हैडिल हाथी दांत से बना हुआ था और वह एक ड्रैगन शेप का था।

उस शानदार खंजर के बारे में एन.एस.जी. का हर कामांडो जानता था। वह कैप्टन बिकाश का सबसे फेबरेट हथियार है, जिसे वो अपने साथ हर ऑपरेशन पर ले जाते हैं। इस खंजर से कैप्टन ने कई दुशमनों को नर्क पहुँचाया था। कैप्टन बिकाश इस चाकू तो बहुत संभालकर रखते थे और अपने अलावा किसी दूसरे इंशान को उसे छूने भी नहीं देते थे। क्योंकि यह उनके माता-पिता की आखिरी निशानी थी। पर आज मैंने उस खंजर को कैप्टन की परमीशन के बिना ही अपने हाथों में थाम रखा था।

कहानी जारी है......
 
Update 076 -

कुछ पलों तक उस खंजर को चाहत भरी नजर से निहारने के बाद मैंने सोढी से कहा

अमृता- सोढी जल्दी से अपनी बिस्की की बॉटल निकालकर मुझे दो और विक्रांत तुम कैप्टन सर की शर्ट खोलो

मेरी बात सुनकर बिक्रांत बिना किसी सबाल जबाब के विकाश सर की शर्ट खोलने लगा जबकी सोढी ने तुरंत अपने बैग में से बिस्की निकाल कर मुझे दे दी। फिर मैंने अपने बैग में से एक नैपकिन निकालकर विकाश सर के मूंँह के अंदर भरते हुए कहा

अमृता- सॉरी सर मुझे आपके साथ यह सब करना पड रहा है। लेकिन अगर आपके चीखने की आवाज दुशमनों ने सुन ली तो फिर हम सब मारे जाऐंगे। लेकिन हम लोग आपको ऐसे मरने भी नहीं दे सकते।

इतना बोलने के बाद मैंने अपनी गन की मैग्जीन निकालकर विकाश सर के दांतों के बीच दबा दी। विकाश सर की हालत पहले से ही खराब थी, लेकिन उन्हें इतना होश था कि वो सही गलत के बारे में सोच सकें। इसलिए उन्होंने मेरा कोई बिरोध नहीं किया। कैप्टन विकाश का मूँह अच्छी तरह से बंद करने के बाद मैंने थोडी सी बिस्की खंजर पर डालकर उसे सैनेटाईज किया और फिर थोडी सी बिस्की विकाश सर के कंधे पर उस जगह डाली जहाँ उन्हें गोली लगी थी। जैसे ही उनके घाव पर एल्कोहल गिरा तो उसकी जलन से उनका पूरा शऱीऱ तडपने लगा। जिसे देखकर मैंने विक्रांत और सोढी से कहा।

अमृता- कैप्टन सर को पूरी ताकत से पकडो। ध्यान रखना कि वो जरा भी ना हिलें। बर्ना इस खंजर से उन्हें गहरा कट लग सकता है।

मेरी बात सुनकर विक्रांत और सोढी ने बिना कुछ कहे कैप्टन बिकाश को मजबूती से पकड लिया था। अब वो चाहकर भी हिल डुल नहीं सकते थे। इसलिए मैंने बिना देर किए अपने हाथ में पकडे खंजर को उनके कंधे में घुसा दिया और गोली को बाहर निकालने की कोशिश करने लगी। थोडी सी मेहनत के बाद आखिराक मैंने उनकी गोली बाहर निकाल ही दी। जिसके बाद मैंने थोडी सी बिस्की दोबारा से उनके घाव पर डाल दी। ताकि उनका खून निकलना बंद हो जाऐ। कंधे की गोली निकालने के बाद मैंने उसके पेटी में घुसी गोली भी बाहर निकाल दी थी।

इसके बाद मैंने उसके घाव को अच्छी तरह से साफ करके उसमें ढेर सारा आयोडीन भर दिया और फिर उनके घाव पर कॉटन लगाने के बाद बैंडेज से अच्छी तरह से बाँध दिया। बैंडेज बाँधने के बाद मैंने विकास सर के मूँह में से मैग्जीन और नैपकिन निकाल लिया और फिर बिस्की की बॉटल उन्हें थमा दी। जिसे विकाश सर ने चुपचाप मुझसे ले लिया और दो घूंट नीट बिस्की पीने के बाद वो मुझे घूरते हुए बोले

विकाश- मेरा खंजर

विकाश सर की बात सुनकर मैंने मुस्कुराते हुए उनका खंजर अच्छी तरह से साफ किया ौ उन्हें बापिस थमा दिया। 2-3 घूंट बिस्की और पीने के बाद विकाश सर ने बॉटल मुझे बापिस कर दी और आँख बंद करके रेस्ट करने लगे। तेज दर्द और थकान के कारण कुछ ही पलों में वो गहरी नींद में चले गए। विकाश सर के सोने के बाद हमने आस पास का पूरा इलाका अच्छी तरह से छान मारा। पर हमें वहाँ पर कोई भी नहीं मिला और ना ही हमारी कोई दूसरी टीम वहाँ पर आई। फिलहाल हमें इस बारे में कोई अंदाजा नहीं था कि विकाश सर के साथ आखिर क्या हुआ था। इसलिए हम लोग बापिस उस जगह पर आ गए। जहाँ विकाश सर रेस्ट कर रहे थे। करीब 2 घंटे बाद विकाश सर की आँख खुली। अब वो पहले से बेहतर महसूस कर रहे थे। इसलिए मैंने उनसे सबाल किया

अमृता- सर आपके साथ आखिर यह सब किसने किया

मेरी बात सुनकर विकास सर एक गरही सांस छोडते हुए बोले

विकाश- मुझे नहीं पता कि यह सब कैसे हुआ। पर दुशमनों को हमारे प्लान के बारे में पहले से ही सब कुछ पता था। इसलिए उन्होंने बीच रास्ते में ही अपने आदमियों को छिपा रखा था। जब हमारी टीम उनके आस पास पहुँची तो उन्होंने हमें चारों तरफ से घेर लिया और बंदूक की नोक पर हमें अपने बेस कैंप ले जाने लगे। जब हम लोग यहाँ पर पहुँचे तो मुझे पता चला कि मेरी टीम के अलावा बाकी टीमों को साथ भी यही हुआ था। इसलिए जब यहाँ आने के बाद मैंने उन्हें चकमा देकर उनसे आजाद होने की कोशिश की, तो उन लोगों ने मुझे गोली मार दीं, उन्हें लगा की मैं मर चुका हूँ, इसलिए वो लोग मुझे ऐसे ही छोडकर चले गए। उन लोगों के बाद मैं जैसे तैसे इन झाडियोंं के पीछे आकर छिप गया। पर तुम उन लोगों से कैसे बचे… क्या तुम लोगों पर कोई हमला नहीं हुआ

विकाश सर की बात सुनकर सोढी ने कहा

सोढी- हमारे साथ भी यही हुआ था सर… पर अमृता ने उन सबको जान से मार दिया

इतना बोलकर सोढी हमारे साथ घटी पूरी घटना उन्हें बताने लगा। सोढी की बात सुनकर विकाश सर हैरानी से मुझे घूरने लगे। असल में उन्हें सोढी की बात पर बिल्कुल भी यकीन नहीं हो रहा था। क्योंकि वो मुझे बस एक कायर समझते थे। हाँलाकि आज मैंने उनकी जान बचाई थी, पर इससे उनके मन में मेरे लिए राय नहीं बदली थी। सारी बात सुनने के बाद विकाश सर ने कहा

विकाश- तो फिर अब आगे क्या करना चाहते हो तुम लोग

विकाश सर की बात सुनकर विक्रांत तुरंत बोला

बिक्रांत- फिलहाल हमारी प्रायोरिटी आपको सुरक्षित बेस कैम्प पहुँचाने की है। उसके बाद हम लोग बैकअप टीम के साथ अपने साथियों को छुडाने यहाँ बापिस आऐंगे।

तभी मैं बिक्रांत को बीच में टोकते हुए बोली

अमृता- नहीं इस सब में बहुत समय निकल जाऐगा। तब तक दुशमन अपने मिशन को ्अंजाम देने के बाद हमारे साथियों को लेकर बार्डर पार कर सकते हैं और उसके बाद हमारे साथियों को छोडने के बदले पता नहीं वो हमारी गवर्मेंट के सामने कौन सी डिमाँड रख दें। हम अपने दुशमनों को कांधार विमान हाईजैक जैसा कोई दूसरी मौका नहीं दे सकते हैं। इसलिए हमें जो कुछ करना है वो अभी करना होगा। बैसे भी रात का समय है, ज्यादातर दुशमन अपने कैंप में सो रहे होंगेे। जिस कारण अचानक से उनपर हमला करके अपने साथियों को छुडाने का इससे अच्छा मौका हमें फिर कभी नहीं मिलेगा।

विक्रांत- पर अमृता दुशमनों की संख्या बहुत ज्यादा है। हम 5 लोग उनका मुकाबला नहीं कर सकते हैं।

विक्रांत की बात सुनकर मैंने कुछ देर सोचने के बाद कहा

अमृता- तो फिर ठीक है। हम एक काम करते हैं… तुम और पूर्वी विकाश सर को लेकर बेस कैम्प जाओ और वहाँ से बैकअप टीक लेकर आओ। तब तक मैं, सोढी और साक्षी यहीँ रहकर दुशमनों पर नजर रखते हैं।

मेरी बात सुनकर पूर्वी तुरंत बोली

पूर्वी- अमृता क्या तुमने मुझे और विक्रांत को बेबकूफ समझ रखा है। मैं अच्छी तरह से समझती हूँ कि तुम्हारा प्लान मुझे और विक्रांत को कैप्टन सर के साथ भेजकर खुद दुशमनों पर हमला करने का है। इसलिए चाहे जो हो जाऐ मैं तुम्हारे साथ ही रहूँगी।

तभी विक्रांत भी बोल पडा

विक्रांत- मैं भी कहीं नहीं जाने बाला…

तभी विकाश सर भी बीच में बोल पडे

विकाश- अब जब तुमने पागलपन करने का फैसला कर ही लिया है। तो मुझे भी अपने साथ ही समझो

विकाश सर की बात सुनकर साक्षी ने कहा

साक्षी- पर सर आप हमारे साथ दुशमनों के कैंप के अंदर नहीं जा सकते हैं। आपकी हालत अभी बिल्कुल भी ठीक नहीं है।

विकाश- हाँ हाँ मैं जानता हूँ। अगर मैं तुम लोगों के साथ दुशमनों के कैंप के अंदर गया तो मैं तुम लोगों को मुशीवत में डालने के अलावा कुछ भी नहीं कर पाऊंगा। इसलिए तुम लोग बस मुझे एक गन दे दो। मैं दूर से ही दुशमनों के कैंप पर नजर रखूँगा और जो भी दुशमन वहाँ से भागने की कोशिश करेगा उसे गोली मार दूँगा।

विकाश सर की बात सुनकर हम पाँचो एक दूसरे को देखने लगे। क्योंकि हमारे पास कोई भी एक्सट्रा गन नहीं थी। इसलिए जो भी विकाश सर को अपनी गन देगा, उसे बिना किसी हथियार के दुशमन के कैंप के अंदर जाना होगा। कुछ पलों तक सोचने के बाद मैंने अपनी गन विकाश सर की तरफ बडा दी। मेरी इस हरकत पर विकाश सर ने मुझसे सबाल किया

विकाश- अगर तुम अपनी गन मुझे दे दोगी… तो फिर तुम दुशमनों का सामना कैसे करोगी

विकाश- सर की बात सुनकर मैंने मुस्कुराते हुए कहा

अमृता- कोई बात नहीं है सर… मैं अपना कोई ना कोई जुगाड कर ही लूँगी। बैसे भी मुझे दुशमनों को मारने के लिए गन की जरूरत नहीं है। मेरे हाथ ही दुशमनों की जान लेने के लिए काफी है।

मेरी बात सुनकर विकाश सर ने भी मुस्कुराते हुए कहा

विकाश- अभी अभी सोढी ने बताया कि तुमने अपने चाकू से तीन दुशमनों की जान ले ली थी।

अमृता- जी सर

मेरा जबाब सुनकर विकाश सर ने अपना खंजर निकालकर मुझे देते हुए कहा

विकाश- तो फिर ठीक है इसे तुम रखो… मुझे उम्मीद है कि तुम इसे संभालकर रखोगी। और हाँ ऑपरेशन पूरा होने के बाद यह मुझे हर हाल में बापिस चाहिए।

विकाश सर की बात सुनकर मेरी आँखों में एक बार फिर चमक आ गई थी। इसलिए मैंने तुरंत उनसे वो खंजर ले लिया और अपनी कमर में बांधते हुए बोली

अमृता- आप निश्चिंत रहिए सर… यर मेरे पास पूरी तरह से सुरक्षित है

इसके बाद हम लोगों ने अपने आगे के प्लान के बारे में कुछ देर डिस्कस किया और फिर अपने साथ लाऐ खाना को खाने के बाद हम लोग दुशमनों के कैंप की तरफ बड गए। करीब आधा घंटा चलने के बाद हम अपनी मंजिल पर पहुँच ही गए। दुशमनों का कैंप ठीक हमारे सामने था। कैंप का ज्यादातर हिस्सा अंधेरे में डूबा हुआ था, लेकिन बाहर पहरा दे रहे लोगों ने कैंप के बाहर आग चला रखी थी। जिस कारण हमें कैंप का कुछ हिस्सा ही दिखाई दे रहा था। लेकिन अंधेरे में देखने की अपनी स्पेशल पावर की बदौलत मुझे दुशमनों की हर एक हरकत साफ साफ दिखाई दे रही थी।

कैंप के बाहर ही दुशमनों ने हमारे कुछ 19 साथियों को बंदी बनाया हुआ था। जिनकी हालत इस वक्त बहुत खराब थी। पूरे कैंप को अच्छी तरह से देखने के बाद मैं अपने साथियों के साथ उस तरफ बड गई जहाँ पर दुशमनों ने हमारे साथियों को बंदी बनाया हुआ था। सबसे आगे मैं चल रही थी, और मेरे पीछे साक्षी, पूर्वी, विक्रांत और सोढी अपने हाथों में गन थाम कर चल रहे थे। असल में मैं चाहती थी कि बिना गोली चलाऐ ही हम अपने साथियों को दुशमनों से छुडा लें। बर्ना गोली की आवजा सुनकर कैंप के अंदर सो रहे दुशमन भी अलर्ट हो जाऐंगे।

घना अंधेरा और काले रंग की यूनिफार्म होने के कारण दुशमनों की नजर हम पर अब तक नहीं पडी थी। अपने साथियों के पास पहुँते से पहले ही मैं अब तक 10 आदमियों को अपने खंजर का शिकार बना चुकी थी। मैंने इस बात का पूरा ध्यान रखा था कि मैं अपने खंजर के एक ही बार से उनकी गर्दन काट दूँ। ताकि उन्हें चीखने चिल्लाने का कोई मौका ही ना मिले। अपने साथियों के पास पहुँचते ही मैंने साक्षी और पूर्वी को इशारा किया। मेरा इशारा मिलते ही वो दोनों बिना किसी आवाज के हमारे साथियों को छुडाकर उस कैंप से दूर ले जाने लगीं।

जबकि मैं सोढी और विक्रांत के साथ कैंप के पीछे की तरफ चल पडी। असल में मेरा टार्गेट दुशमनोें के हथियार थे, जो उन्होंने कैंप के पीछे की तरफ एक टैंट के अंदर छिपा रखे थे। दुशमनों के हथियारों तक पहुँचने में हमें ज्यादा प्राब्लम नहीं हुई थी। जैसे ही हम उस टैंट के अंदर पहुँचे तो दुशमनों के हथियारों का जखीरा देखकर हमारी आँखें हैरानी से फटी रह गईं। वहाँ पर ढेर सारे हथियार रखे हुए थे, जिन्हें देखकर ऐसा लग रहा था जैसे दुशमन हमारी आर्मी की पूरी बटालियान से मुकाबला करने की तैयारी करके बैठा है।

तभी मेरी नजर हमारे साथियों के हथियारों और दूसरे सामानों पर पडी, जिनकी फिलहाल हमें बहुत जरूरत थी। इसलिए उस सामान को देखकर मैंने सोढी और विक्रातं को इशारा किया। मेरा इशारा समझते ही सोढी और विक्रांत ने वो सारा सामान उठाया और उस टेंट से बाहर निकालकर उस जगह की तरफ बड गए, जहाँ पर साक्षी और पूर्वी हमारे साथियों को लेकर गईं थी। सोढी और विक्रांत के जाने के बाद मैंने वहाँ रखे एक बाक्स को खोला तो उसमें ढेर सारे ग्रेनड भरे हुए थे। उसके बाद मैं एक एक करके वहाँ रखे सभी बॉक्स खोलकर देखने लगी। करीब 4-5 बाक्स चैक करने के बाद मुझे एक बॉक्स के अंदर रॉकेट लांचर और उसके ढेर सारे राकेट मिले।

जिन्हें देखकर मेरी आंखों में चमक आ गई। मैंने बिना देर किए राकेट बेल्ट को अपनी बॉडी पर बांधा और फिर राकेट लाँचर उठाकर जैसे ही उस टेंट से बाहर निकलने लगी तो मेरी नजर एक बार फिर उस बाक्स पर पडी, जिसमें हैण्ड ग्रेनड रखे हुए थे। मैंने उस वाक्स में से एक ग्रेनेड उठाकर उसकी पिन निकाली और उसे बापिस उसी बाक्स में रखकर तुरंत उस टैंट से बाहर निकल गई। मैं अभी उस टेंट से कुछ दूरी पर ही गई थी कि तभी एक तेज धमाके की आवाज सुनाई दी। जब मैंने पलटकर देखा तो हथियारों बाले टेंट के साथ साथ दुशमनों का आधे से ज्यादा कैंप उड चुका था और जो कुछ टेंट बच गए थे। उनपर मैंने अपने रॉकेट लाँचर से एक एक करके निशाना लगाना शुरू कर दिया था। इसी बीच मेरे साथियों ने भी दुशमनों को घेरकर गोलियाँ चलानी शुरू कर दी।

कहानी जारी है..........
 
दोस्तों आज मैं मेरी जंग का नया अपडेट पोस्ट करूँगा.... आज से आपको मेरी जंग के रेगुलर अपडेट मिलते रहेंगे......
 
Update 077 -

करीब 10 मिनट में ही हमारे पूरे दुशमन मरे जा चुके थे। जब मैं अपने कंधे पर राकेट लांचर रखे हुए अपनी टीम के पास बापिस आई तो विकाश सर मुझे हैरानी से घूरते हुए बोले

विकाश- मुझे नहीं पता था कि तुम इतनी बेरहम ल़डकी निकलोगी

विकाश सर की बात सुनकर मेरे चारों दोस्तों ने लगभग एक साथ विकाश सर को घूरा। उनके घूरने का तरीका ऐसा था जैसे वो सभी विकाश सर से कहना चाहते हों कि इस लडकी को इतना बेरहम बनाने में आपका ही हाथ है। आप ही तो उसे एक किलिंग मशीन बनाना चाहते थे, और अब जब वो एक किलिंग मशीन बन गई है तो आपको वो बेरहम नजर आने लगी। पर यह सब विकाश सर से कहने की हिम्मत किसी में नहीं थी। अब तक मेरे सारे रॉकेट भी खत्म हो चुके थे, इसलिए मैंने रॉकेट लाँचर को वहीं फेंक दिया और अपनी कमर पर लटक रहा खंजर निकालकर विकाश सर को देते हुए बोली

अमृता- सर यह रही आपकी अमानत

कैप्टन बिकाश ने बिना देर किए मुझसे अपना खंजर ले लिया और संभालकर अपने पास रखने के बाद उन्होंने मेरी गन मुझे बापिस कर दी। अब जब हमारे सभी साथी सुरक्षित थे और दुशमनों का भी पूरी तरह से सफाया हो चुका था। तो विकाश सर ने अपने एक सीनियर कमांडो को रेसक्यू टीम बुलाने के लिए कहा। विक्रांत और सोढी अपने साथ जो सामान लेकर आऐ थे, उसमें रेडियो सेट और सिग्नल फ्लेयर भी रखे हुए थे। इसलिए कुछ ही देर में सीनियर कमांडो ने बेस कैंप से कांटेक्ट करके रेसक्यू टीम भेजने के लिए बोल दिया था। करीब आधे घंटे बाद हम सभी लोग हैलीकॉप्टर में बैठकर अपने बेस कैंप की तरफ चल पडे। जहाँ पर कैप्टन बिकाश के साथ साथ हमारे बाकी घायल साथियों को इलाज किया गया।

चूंकि मैं और मेरे दोस्त पूरी तरह से सुरक्षित थे। इसलिए बेस कैंप पहुँचकर हमने खाना खाया और फिर सोने के लिए चले गए। अगले दिन सुबह का नाश्ता करने के बाद हमें एक स्पेशल हैलीकॉप्टर से बापिस देहरादून ट्रेनिंग कैंप पहुँचा दिया गया था। जहाँ हमें अपनी ट्रेनिंग पूरी करनी थी। ट्रेनिंग कैंप बापिस आने के बाद जब मेरे दोस्तों ने सभी लोगों के मेरे कारनामें के बारे में बताया तो सभी लोग हैरान रह गए, यहाँ तक कि हमारे ट्रेनर्स भी यह सब जानकर काफी खुश थे, क्योंकि उन्हें भी अपने सीनियर्स से मेरी अच्छी ट्रेनिंग के कारण शावासी मिल रही थी। इस एक ऑपरेशन के कारण ही सभी ट्रेनर और मेरे दूसरे साथियों का नजरिया मेरे लिए पूरी तरह से बदल गया था।

अब मेरे बाकी के साथी भी मेरी रिस्पेक्ट करने लगे थे। उस ऑपरेशन के खत्म होने के करीब एक महिने बाद कैप्टन बिकाश हमसे मिलने हमारे ट्रेनिंग कैंप आऐ। वो अब पूरी तरह से फिट दिखाई दे रहे थे। उन्होंने हमें बताया कि ट्रेनिंग पूरी होने के बाद, रिपब्लिक डे पर मुझे और मेरे साथ ऑपरेशन हमें हिस्सा लेने बाले सभी साथियों को महामहिम राष्ट्रपती द्वारा सम्मानित किया जाऐगा। कैप्टन विकाश के मूँह से इतनी अच्छी खबर सुनकर मैं और मेरे सभी साथी काफी खुश थे। सभी लोगों से मिलने के बाद कैप्टन विकाश मुझे बाकी लोगों से थोडा दूर ले गए और मुझसे सबाल किया

विकाश- तो तुम्हारे पिता का नाम राजवीर चौहान है

अमृता- जी सर

विकाश- और क्या तुम ही वो फेमस हैकर द ड्रैगन हार्ट हो

विकाश सर की बात सुनकर मैं समझ गई थी कि उन्होंने अपने सोर्स का यूज करके मेरे बारे में सब कुछ पता कर लिया है। इसलिए मैंने थोडा मुस्कुराते हुए कहा

अमृता- जी सर

मेरा जबाब सुनकर विकाश सर मुस्कुराऐ और फिर अपना पसंदीदा खंजर निकालकर मुझे देते हुए बोले

विकाश- यह ड्रेगन नाईफ ड्रेगन ङार्ट के हाथों में और भी ज्यादा खूबसूरत लगेगा।

विकाश सर की बात सुनकर मैं हैरानी से उन्हें देखते हुए बोली

अमृता- पर सर मैं इसे नहीं ले सकती… हम सभी लोग जानते हैं कि इससे आपके इमोशंस जुडे हुए हैं।

विकाश- हाँ तुम सही कह रही हो कि इससे मेरे कई सारे इमोशंस जुडे हुए हैं।…. असल में यह ड्रैगन नाईफ हमारी पुश्तैनी विरासत है। जो कई पीढियों से हमारे परिवार का हिस्सा रहा है और सही समय आने पर अगली पीढी में से किसी एक को उत्तराधिकारी चुनकर यह ड्रेगन नाईफ उसे सौंप दिया जाता है।

अमृता- जब यह ड्रैगन नाईफ आपके परिवार की विरासत है, तो फिर इसे आप मुझे कैसे दे सकते हैं।

विकाश- क्योंकि तुम भी मेरे परिवार का ही हिस्सा हो

विकाश सर की बात सुनकर मैं चौंकते हुए बोली

अमृता- मैं कुछ समझी नहीं सर…. आखिर आप कहना क्या चाहते हैं….

मेरे सबाल पर विकाश सर एक गहरी सांस लेते हुए बोले

विकाश- असल में मैं तुम्हारे पिता राजवीर चौहान का छोटा भाई और तुम्हारा चाचा हूँ।

विकाश सर की बात सुनकर अचानक से मेरे दिल धडकन तेज हो गई थी। असल में मैंने अमृता चौहान की पहचान को बस इसीलिए अपनाने का फैसला किया था। क्योंकि अमृता के परिवार का कोई सदस्य जीवित नहीं था। जिस कारण मेरा राज खुलने का भी कभी कोई डर नहीं था। पर अब जब अमृता के चाचा मेरे सामने खडे थे, तो एक पल के लिए मुझे लगा कि अब बस मेरा भांडा फूटने ही बाला है। मेरे चेहरे पर आऐ हैरानी के भाव को विकाश सर इग्नोर करते हुए बोले

विकाश- असल में राजवीर भाई की शादी के कुछ दिनों बाद ही मुझे बार्डर पर जाना पडा था। जहाँ दुश्मनों का पीछा करते समय मैं गलती से वार्डर पार कर गया और दुशमनों के हाथ लग गया था। पूरे 5 सालों तक दुशमनों की कैद में रहने के बाद आखिरकार मैं अपने साथियों के साथ किसी तरह वहाँ से भागने में कामयाब रहा और जब मैं घर बापिस गया तो पता चला कि एक एक्सीडेंट में मेरा पूरा परिवार मारा गया है। इसलिए अपने पूरे परिवार को एक साथ खोने के बाद मैं पूरी तरह से टूट गया था। इसलिए मैंने अपनी पूरी जिंदगी अपने देश को समर्पित कर दी और जिंदगी में कभी भी शादी ना करने का फैसला कर लिया था। लेकिन एक साल पहले मुझे पता चला कि उस एक्सीडेंट में मेरी माँ और मेरी भतीजी यानि तुम किसी तरह जिंदा बच गई थे और तुम दोनों उस वक्त उत्तराखण्ड में किसी छोटे से गाँव में रह रहे थे। लेकिन जब मैं तुम लोगों से मिलने वहाँ पहुँचा तो पता चला कि लैंड स्लाईड के कारण वो गाँव पूरी तरह से तबाह हो गया है और उसमें रहने बाले सभी लोग मारे गए हैं।

विकाश सर की बात सुनकर मैंने मन ही मन राहत की एक सांस ली। क्योंकि उनकी बातों से यह बात तो तय थी कि उन्होंने आज तक असली अमृता को नहीं देखा था। यानि वो अब मुझे ही अपनी भतीजी मान रहे हैं। मैं अभी यह सोच ही रही थी कि तभी विकाश सर एक बार फिर बोले

विकाश- मैं एक बार फिर अपने परिवार को खो चुका था, साथ ही साथ शादी ना करने के कारण मेरे कोई बच्चे भी नहीं है। इसलिए म्यामांर बार्डर पर ऑपरेशन के दौरान जब तुमने मेरी गोलियाँ निकालने के लिए इस ड्रेगन ब्लेड को अपने हाथों में लिया था। तो तुम्हारी आँखों की चमक देखकर मैंने उसी वक्त मन ही मन तय कर लिया था कि मैं तुम्हें ही अपना उत्तराधिकारी बनाऊँगा। हाँलाकि उस वक्त मुझे तुम्हारे बारे में बस इतना ही पता था कि तुम्हारे सभी फैमली मेंबर एक एक्सीडेंट में मारे गए हैं और अब इस दुनिया में तुम्हारा अपना कोई नहीं है। लेकिन अपना इलाज करवाने के बाद जब मैंने तुम्हारी पूरी डिटेल निकलवाई और तुमने अपने सर्विस रिकार्ड में जो डॉक्यूमेंट जमा करवाऐ हैं, उनमें तुम्हारे माता पिता और बाकी फैमिली डिटेल देखने के बाद मुझे पता चला कि तुम कोई और नहीं बल्कि मेरी अपनी भतीजी हो। बस इसीलिए मैं यह ड्रेगन ब्लेड अपनी एक मात्र उत्तराधिकारी यानि तुम्हें दे रहा हूँ।

विकाश सर की बातें सुनकर मुझे कुछ भी समझ नहीं आ रहा था कि मैं कैसे रियेक्ट करूँ। क्योंकि वो मुझे जो समझ रहे थे, मैं वो इंशान बिल्कुल भी नहीं थी। मेरा उनसे खून का कोई रिश्ता नहीं था। पर पता नहीं क्यों उनकी बातें सुनकर मुझे उनसे एक इमोशनल बॉड फील हो रहा था। हम दोनों लगभग एक ही नाव में सवार थे। उनके अपने परिवार में कोई भी नहीं था और इस वक्त मेरे परिवार में भी कोई नहीं था। हाँलाकि मेरे असली पिता और मेरा भाई अभी भी जिंदा हैं। पर मैं उन्हें अपना नहीं कह सकती थी। क्योंकि मैंने अपनी पहचान बदलकर खुद ही उनसे अपने सारे रिश्ते खत्म कर दिए थे और अब मैं जिस पहचान को जी रही थी। उसे विकाश सर अपने परिवार का हिस्सा मान रहे हैं। मैं अभी भी इन्हीं सब ख्यालों में खोई हुई थी कि तभी विकाश सर एकबार फिर बोले

विकाश- सच कहूँ तो मैं यह जानकर बहुत खुश हूँ कि तुम मेरी भतीजी हो। तुम्हारी बहादुरी और काबिलियत देखकर मेरा सीना गर्व से चौडा हो गया है मेरी बच्ची। और हाँ आज से तुम्हें अपने आपको अनाथ और बेसहारा समझने की कोई जरूरत नहीं है क्योंकि तुम्हारे अंकल यानि मैं अभी जिंदा हूँ। हाँलाकि मैं तुम्हारे माता पिता की कमी तो कभी दूर नहीं कर सकता, लेकिन वादा करता हूँ कि मैं तुम्हें हमेशा अपनी सगी बेटी से ज्यादा प्यार दूँगा।

विकाश सर यह सब कहते वक्त काफी इमोशनल हो गए थे और उनकी बातें सुनकर मेरे मन में भी इस वक्त कई अलग अलग प्रकार के इमोशंस की बाड आई हुई थी। जिस कारण मेरी आँखें भी भर आई थीं। विकाश सर ने सच कहा था कि माता पिता की जगह कोई नहीं ले सकता। पर मैं उन्हें अपना सच बताकर उनका दिल नहीं दुखाना चाहती थी। बैसे भी कैप्टन बिकाश जैसे बहादुर और देश भक्त इंशान को अपना अंकल मानने में मुझे कोई बुराई नजर नहीं आ रही थी। बल्कि उनके जैसे अच्छे इंशान को अपने अंकल के रूप में पाना तो मेरे लिए गर्व की बात थी। यही सोचकर मैंने अपने आंशू पोंछे और उनके हाथों से ड्रैगन नाईफ लेते हुए कहा

अमृता- मैं आपके इस तोहफे को हमेशा संभालकर रखूँगी अंकल

जैसे ही विकाश सर ने मेरे मूँह से अपने लिए अंकल शब्द सुना तो उन्होंने खुश होते हुए अपनी आंखों में झलक आऐ आँशुओं को पोंछा और मुझे गले से लगाते हुए कहा

विकाश- आज इतने सालों के बाद मुझे मेरा परिवार बापिस मिल गया है। इसलिए आज मैं बहुत खुश हूँ मेरी बच्ची… तुम्हारी ट्रेनिंग पूरी होने के बाद अब तुम्हें कहीं और रहने की कोई जरूरत नहीं है। अब से तुम मेरे साथ मेरे घर पर ही रहोगी।

विकाश अंकल की बात सुनकर मैंने मुस्कुराते हुए कहा

अमृता- ठीक है अंकल… लेकिन एक प्राब्लम है….

मेरी बात पूरी होने से पहले ही विकाश अंकल मुझे बीच में टोकते हुए बोले

विकाश- यही ना कि तुम्हारा अटैच्मेंट आई.बी. के लिए पहले ही हो चुका है। इसलिए तुम हमेशा मेरे साथ नहीं रह सकती हो।

अमृता- जी अंकल

विकाश- यह कोई बडी प्राब्लम नहीं है… अगर तुम कहो तो मैं तुम्हारा अटैच्मेंट आई.बी. से तुरंत हटवा सकता हूँ, लेकिन अगर तुम आई.बी. के लिए काम करना चाहती हो तो भी कोई बात नहीं है। मैं सारी जिंदगी एक सोल्जर रहा हूँ, इसलिए तुम्हारे फर्ज के बीच कभी नहीं आऊंगा। लेकिन जब भी तुम अपना मिशन पूरा करके फ्री होगी तो हमेशा याद रखना कि तुम्हारा अपना भी एक घर है। जहाँ तुम अपने दूसरे मिशन पर जाने से पहले मेरे साथ कुछ समय बिता सकती हो। तब तुम्हारे साथ रहने पर मुझे भी अपने परिवार की कमी महसूस नहीं होगी।

विकाश अंकल की बात सुनकर मुस्कुराते हुए बोली

अमृता- ठीक है अंकल…

इसके बाद हम दोनों ने कुछ देर और आपस में बातें की उसके बाद विकाश अंकल वहाँ से चले गए। विकाश अंकल के जाने के बाद मेरे चारों दोस्त मेरे पास और मुझसे सबाल करने लगे।

साक्षी- अमृता विकाश सर तुमसे अकेले में क्या बातें कर रहे थे और उन्होंने तुम्हें आखिर दिया क्या था।

साक्षी की बात सुनकर मैंने मुस्कुराते हुए ड्रेगन नाईफ उसकी तरफ बडा दिया। उस ड़्रेगन नाईफ को मेरे हाथों में देखकर पूर्वी हैरान होते हुए बोली

पूर्वी- मैं जो समझ रही हूँ, क्या यह वही है…… विकाश सर का सबसे पसंदीदा हथियार… ड्रागन ब्लेड…..

अमृता- हाँ यह वहीं है

पूर्व- पर उन्होंने यह तुम्हें क्यों दिया और वो तुम्हें हग क्यों कर रहे थे

पूर्वी का सबाल सुनकर मैंने मुस्कुराते हुए कहा

अमृता- असल में वो मेरे अंकल हैं।

मेरे शब्दों ने उनके कानों में किसी बाम्ब की तरह बिस्फोट किया था। जिस कारण वो चारों एक साथ हैरान होते हुए बोले

“ब्हॉट”

साक्षी- तो तुम हमें यह सब कब बताने बाली थी..

साक्षी का सबाल सुनकर मैंने एक गहरी सांस लेते हुए कहा

अमृता- मेरा इरादा तुम लोगों से कुछ भी छिपाने का बिल्कुल नहीं था। पर सच्चाई यही है कि मुझे भी इस बारे में आज ही पता चला है।

इतना बोलने के बाद मैंने अपने दोस्तों को वो सब बता दिया जो विकाश अंकल ने मुझसे कहा था। सारी बात सुनने के बाद साक्षी ने कहा

साक्षी- तो इसका मतलब है कि तुम कैप्टन विकाश की भतीजी हो…

साक्षी की बात सुनकर सोढी उसे बीच में टोकते हुए बोला

सोढी- कैप्टन विकाश नहीं मेजर विकाश कहो… शायद तुम्हें यह बात पता नहीं है कि उनको प्रमोट करके मेजर बना दिया गया है।

पूर्वी- तो फिर हमारी ट्रेनिंग पूरी होने के बाद पासिंग आऊट परेड में मेजर बिकाश अमृता के फैमली मेंबर के रूप में सामिल होगें।

विक्रांत- हाँ यार लगता तो ऐसा ही है…. बैसे भी हमारी ट्रेनिंग पूरी होने में अब ज्यादा समय नहीं बचा है।

पूर्वी- हाँ यार… ट्रेनिंग के बाद अगर हमें अलग अलग लोकेशन पर पोस्टिंग मिली तो मैं सच में तुम लोगों को बहुत मिस करने बाली हूँ।

साक्षी- हाँ यार मैं भी…..

सोढी- अरे बाबा परेशान होने की जरूरत नहीं है। मैंने पहले ही सब कुछ पता कर लिया है। हम सभी को एन.एस.जी. की स्पेशल टास्क फोर्स में सामिल किया गया है। जिसे कैप्टन विकाश ओह सॉरी मेजर बिकाश लीड करेंगे। इसलिए आगे भी हम सभी लोग दिल्ली में एन.एस.जी. हेडक्वाटर में एक साथ रहने बाले हैं।

सोढी की बात सुनकर पूर्वी खुश होते हुए बोली

पूर्वी- क्या तुम सच कह रहे हो

विक्रांत- हाँ… सोढी सही कह रहा है… मैंने भी इस बारे में पता किया था। लेकिन अमृता हमारी स्पेशल टॉस्क फोर्स का हिस्सा नहीं है।

विक्रांत की बात सुनकर साक्षी हैरान होते हुए बोली

साक्षी- व्हाट… तो फिर अमृता को कहाँ पोस्टिंग मिली है

विक्रांत- पता नहीं… अमृता के बारे में किसी को भी कुछ नहीं बताया गया है।

विक्रांत की बात सुनकर एक बार फिर सभी लोग मुझे देखने लगे। अपने दोस्तों की सबालियाँ नजरों को देखते हुए मैंने कहा

अमृता- तुम सब मुझे ऐसे क्यों देख रहे हो…. मुझे इसके बारे में कुछ भी नहीं पता

मेरा जबाब सुनकर वो चारों एक साथ गुस्से में बोले

“अमृता………..”

अपने दोस्तों के रिऐक्शन को देखकर मैंने हंसते हुए कहा

अमृता- ओके फाईन बताती हूँ… पहले चलो कैंटीन में चलकर कुछ खा लेते हैं, वर्ना कैंटीन बंद हो जाऐगी। वहीं पर मैं तुम्हें सब बता भी दूँगी

इतना बोलकर मैं कैंटीन की तरफ चल पडी, मेरे पीछे पीछे मेरे दोस्त भी कैंटीन में आ गए। जहाँ हमने अपने लिए खाना लिाय और फिर एक टेबील के चारों तरफ एक साथ बैठ कर खाना खाने लगे।

कहानी जारी है.........
 
Update 078 -

अभी हमने खाना शुरू ही किया था कि तभी पूर्वी ने एक बार फिर वहीं सबाल किया

पूर्वी- अब बताओ… आखिर तुम्हें कहाँ पर पोस्टिंग मिली है।

पूर्वी का सबाल सुनकर मैंने कुछ देर अपने दोस्तों को देखा और फिर मु्स्कुराते हुए बोली

अमृता- एक्चुअली बात बस इतनी सी है कि मुझे पहले ही आई.बी. में स्पेशल एजेंट के रूप में अटैच्ड कर लिया गया है। इसलिए मैं ऑफीशियली तुम्हारी स्पेशल टास्ट फोर्स का हिस्सा नहीं हूँ। पर फ्यूचर में हमारे पास ऐसे कई मौके आने बाले हैं जब हमें मिलकर एक साथ काम करना पडेगा। बैसे भी मैं तुम लोगों से मिलने दिल्ली आती जाती रहूँगी।

मेरी बात सुनकर साक्षी मुझे हल्का सा डांटते हुए बोली

साक्षी- अरे पागल… तुम आई.बी. के लिए काम करने बाली हो, यह बात तुम ऐसे कैसे हमें बता सकती हो… यह तो सीक्रेट होता है ना…

अमृता- हाँ… पर तुम लोग मेरे सबसे अच्छे दोस्त हो… तो तुमसे क्या सीक्रेट रखना… बैसे भी आज नहीं तो कल जब हम किसी ना किसी मिशन पर साथ होंगे ही, तब भी तो तुम लोगों को इस बारे में पता चल ही जाऐगा। इससे अच्छा मैंने पहले ही तुम्हें बता दिया, और फिर कौन सा हम अपने मिशन के बारे में एक दूसरे से डिस्कस कर रहे हैं।

साक्षी- हाँ यार यह भी सही है…. आई.बी. में जाने के बाद तो तुम्हारे मजे ही मजे हैं

सोढी- क्या खाक मजे हैं… अपनी पहचान बदलकर अंजान लोगों के साथ रहना और फिर बिना कुछ किए महिनों, यहाँ तक की सालों तक दूसरों पर नजर रखना… यह भी कोई जॉब है। तुम्हें नहीं लगता अमृता कि तुम्हें हमारे साथ एन.एस.जी. की स्पेशल टास्क फोर्स में होना चाहिए। इस काम में ज्यादा थ्रिल है और फिर तुम्हारे अंकल मेजर विकाश खुद हमें लीड करने बाले हैं।

अमृता- सच कहूँ तो मैंने इस बारे में अभी कुछ सोचा नहीं है… बैसे भी एन.एस.जी. ज्वाईन करने से पहले ही मुझे आई.बी. के लिए सिलेक्ट कर लिया गया था। लेकिन आई.बी. हमेशा सिक्योरिटी फोर्स से ही अपने ऐजेंट सिलेक्ट करती है। इसलिए मुझे पहले एन.एस.जी. ज्वाईन करवाई गई और उसके बाद मेरा अटैच्डमेंट आई.बी. में कर लिया गया था।

पूर्वी- पर तुम्हें आई.बी. के लिए डायरेक्ट सिलेक्ट क्यों किया गया था।

पूर्वी की बात सुनकर मैं उसे आँख मारते हुए बोली

अमृता- यह एक बहुत बडा सीक्रेट है… जो मैं तुम लोगों को नहीं बताने बाली

पूर्वी- यार अमृता बता ना….

अमृता- ओके ओके बताती हूँ…. वो दरअसल ऐसा है कि ………

इससे पहले मैं अपनी बात पूरी कर पाती हमारे साथ ट्रेनिंग करने बाला एक लडका पवन लगभग भागता हुआ हमारे पास आया और बोला

पवन- तुम लोग यहाँ पर हो और मैं तुम लोगों को पूरे ट्रेनिंग सेंटर में ढूंडता फिर रहा हूँ।

विक्रय- अरे बाबा आखिर हुआ क्या है… जो तुम इस तरह भागते हुए हमारे पास आऐ हो

पवन- वो वो असल में हमारे ट्रेनिंग सेंटर के डाटाबेस सर्वर पर साईवर अटैक हुआ है। हमारी साईबर सिक्योरिटी टीम उस अटैक को रोकने की कोशिश कर रही, और तुम लोगों को तो पता ही है कि कुछ दिनों बाद हमारी एथिकल हैकिंग की ट्रेनिंग शुरू होने बाली है।इसलिए हमारे ट्रेनर चाहते हैं कि हम सभी लोग इस प्रोसेस को लाईब देखें… ताकि हम लोग साईबर सिक्योरिटी की प्रासेस को अच्छी तरह समझ सकें।

पवन की बात सुनकर मेरे सभी दोस्त बहुत ज्यादा एक्साईटेड हो गऐ थे और वो इस बात को भूल ही गए कि कुछ देर पहले वो लोग मुझसे क्या सबाल कर रहे थे। हम लोगों का खाना लगभग खत्म हो गया था। इसलिए हम लोग तुरंत पवन के साथ सर्वर रूप की तरफ चले गए। जहाँ पर एक बडी सी कम्प्यूटर स्क्रीन लगी हुई थी और जिसपर कई सारे प्रोग्रामिंग कोड डिस्प्ले हो रहे थे। जबकि उसके ठीक सामने एन.एस.जी. के 5 कमांडो अलग अलग कम्प्यूटर पर तेजी से अपनी उंगलियाँ चलाते हुए प्रोग्रामिंग कोड टाईप कर रहे थे। सर्वेर रूम में उस वक्त पूरी तरह से खामोशी छाई हुई थी और वहाँ पर बस की-बोर्ड पंचिंग की आवज ही सुनाई दे रही थी।

हम लोगों को उन कम्प्यूटर्स से थोडी दूरी पर पहले ही रोक दिया गया था। जिस कारण हम बस उस पूरी प्रासेस को दूर से ही देख सकते थे। कम्प्यूटर ऑपरेटर के आस पास हमारे ट्रेनर और सीनियर ऑफिसर खडे होकर पूरी प्रासेस लेख रहे थे। उन सभी के चेहरे पर चिंता साफ साफ दिखाई दे रही थी। विकाश अंकल अभी भी ट्रेनिंग सेंटर में ही थे, इसलिए जब उन्हें साईबर अटैक के बारे में पता चला तो वो भी वहाँ आ गए थे। हम सभी लोग अपनी सांसे रोक कर खडे थे कि तभी अचानक से एक कम्प्यूटर ऑपरेटर की-बोर्ड पर जोर से हाथ पटकते हुए बोला

“व्हाट आ फक गाईज….”

पर अगले ही पल उसे एहसास हुआ कि उस हॉल में उसके कई सीनियर्स ऑफिसर मौजूद हैं। इसलिए वो बात को संभालते हुए पूरी रिस्पेक्ट के साथ बोला

“आई एम सॉरी सर…. वो वो हैकर्स टीम ने हमारे फायरवाल की सेकेण्ड लेयर भी ब्रेक कर दी है… अब बस हमारी कोर लेयर ही बची है। अगर हैकर्स ने उसे भी ब्रेक कर दिया तो उन्हें हमारे सर्वर पर एक्सेस मिल जाऐगा।”

उस ऑपरेटर के इतना कहते ही उस बडी सी कम्प्यूटर स्क्रीन पर भी फायरबॉल की सेकेंड लेयर ब्रेक होने का मैसेज फ्लैश होने लगा। उस ऑपरेटर की बात सुनकर सभी सीनियर्स के चेहरों पर चिंता साफ साफ दिखाई दे रही थी। इस वक्त उस हॉल का महौल काफी ज्यादा तनाव भरा हो गया था। तभी विकाश अंकल की नजर अचानक से मुझपर पडी। मुझे देखते ही उनकी सारी चिंता अचानक से दूर हो गई और वो मुस्कुराते हुए बोले

विकाश- ओह थैंक्स गॉड अमृता तुम भी यहाँ हो… कम ऑन और जल्दी से यहाँ कि सिचुऐशन संभालो……

विकाश अंकल की बात सुनकर सभी लोग हैरानी से मुझे देखने लगे, उन्हें समझ ही नहीं आ रहा था कि मेजर विकाश एक ट्रेनी कमांडो को इस क्रिटिकल कंडीशन में हेल्प करने के लिए कैसे बुला सकते हैं। अब चूँकि विकाश अंकल ने सबके सामने ही मुझे वहां आने के लिए कहा था तो हम सभी ट्रेनी ऑफिसर के सामने खडे सिक्योरिटी गार्ड ने मुझे सर्वर के पास जाने की परमीशन दे दी थी। इसलिए मैं जल्दी से उन लोगों के पास पहुँची। तभी एक सीनियर ऑफिसर मेजर कुरैशी ने विकाश अंकल से सवाल किया

कुरैशी- आर यू श्योर मेजर विकाश…. क्योंकि जहाँ तक मुझे पता है…. यह लडकी मात्र एक ट्रेनी कामांडो है…. क्या यह इस क्रिटीकल सिचुऐशन को हैंडिल कर पाऐगी

मेजर कुरैशी की बात सुनकर विकाश अंकल मुस्कुराते हुए बोले

विकाश- आपको टेंशन लेने की जरूरत नहीं है मेजर कुरैशी…. मेरा यकीन कीजिऐ शी इज दैम गुड ऑन दिस फील्ड….

विकाश अंकल की बात सुनकर वहाँ मौजूद किसी दूसरे ऑफिसर ने फिर कुछ भी नहीं कहा। लेकिन जब मैंने एक खाली पडे कम्प्यूटर सिस्टम पर अपनी हैकिंग आई.डी. से लॉगइन किया। उस हॉल में मौजूद हर एक इंशान उस बडी सी स्क्रीन को हैरानी से देखने लगा था। क्योंकि उसपर लिखा हुआ था

“बैलकम बैक ड्रैगन हार्ट”

मेरी हैकिंग आई.डी. को देखकर सभी लोग बुरी तरह से हैरान थे। जबकि मैं अपनी आई.डी. लॉगइन करने के तुरंत बाद ही अपने काम पर लग गई थी। मेरी उंगलियाँ सिस्टम पर इतनी तेजी से चल रहीं थी कि वहाँ मौजूद कोई भी इंसान मेरी उंगलियों की मूबमेंट को देख भी नहीं पा रहा था। यहाँ तक कि हमारी साईबर सिक्योरिटी टीम के मेंबर्स भी अपना काम रोककर मुझे ही देखे जा रहे थे। जिस कारण एक बार फिर उस सर्वर रूम में पिनड्राप साईलेंट छा गया था, जिसे मेरी की-बोर्ड पंचिंग की आवाज बार बार भंग कर रही थी।

जैसे जैसे मैं कोडिंग कर रही थी मेरी आंखोें की चमक बडती ही जा रही थी। उस वक्त मैं एक अलग ही इंशान बन चुकी थी। वहाँ मौजूद हर एक इंशान को मेरी आंखों की चमक और टाईपिंग स्पीड को देखकर ऐसा लग रहा था जैसे मेरा जन्म ही इसी काम के लिए हुआ है। मुझे अभी कोडिंग करते हुए बस 5 मिनट ही हुए थे कि तभी उस बडी सी स्क्रीन पर मैसेज फ्लैश हुआ

“फायरबॉल कोर लेयर अपग्रेड…”

असल में मैंने सबसे पहले अपने फायरबॉल की कोर लेयर को अपग्रेड करके और भी ज्यादा सिक्योर कर दिया था, ताकि हैकर्स टीम उसे ब्रेक ना कर पाऐ, जिसके कुछ ही देर बार मैंने फायरवॉल की बाकी की लेयर को रीस्टोर करना शुरू कर दिया था। करीब 5 मिनट बाद उस बडी सी स्क्रीन पर एक के बाद एक मैसेज फ्लैश होने लगे

“फायरबॉल सेकण्ड लेयर रीस्टोर”

“फायरबॉल फर्स्ट लेयर रीस्टोर”

“फायरबॉल अपग्रेड एण्ड सिस्टम सिक्योर्ड”

मैंने ना केवल सर्वर का फायरबॉल रीस्टोर कर दिया था। बल्कि उसे पूरी तरह से अपग्रेड करके पहले से भी ज्यादा सिक्योर कर दिया था। पर मैं अब भी लगातार कम्प्यूटर पर टाईपिंग कर रही थी। सभी लोग पूरी तरह से हैरान होकर मुझे ही देखे जा रहे थे। अचानक से उस बडी सी स्क्रीन पर एक मैसेज फ्लैस हुआ

“एनिमी सिक्योरिटी फायरवाल ब्रोकन”

इससे पहले सभी लोग इस शॉक्ड से बाहर निकल पाते, स्क्रीन पर एक के बाद एक मैसेज फ्लैस होने लगे

“एनिमी डाटा कॉपीड”

“एनिमी सिस्टम क्रैश”

“एनिमी आई.पी. एड्रेश ब्लॉक्ड”

जब मैं अपना सारा काम खत्म करने के बाद उठकर खडी हुई तो उस वक्त भी सर्वर रूम में पिनड्राप साईलेंट छाया हुआ था, वहाँ मौजूद हर एक इंशान किसी बुत की तरह हैरान होकर मुझे ही देखे जा रहा था। इसलिए मुझे वह सिचुऐशन कुछ ज्यादा ही ऑक्वर्ड लग रही थी। पर तभी अचानक से उस हॉल में तालियों की गडगडाहट गूँज उठी और विकाश अंकल एक्साईटेड होते हुए बोले

विकाश- बैलडन मई गर्ल… बैलडन…. इसे कहते हैं असली सोल्जर…. हमें केवल दुशमनों का मुकाबला ही नहीं करना है… बल्कि दुशमनों को पूरी तरह से तबाह भी करना है। ताकि वो दोवारा हमारी तरफ आँख उठाने की जुर्रत भी ना कर सकें।

जब तालियों का शोर बंद हुआ तो सभी सीनियर्स ऑफिसर ने मुझसे हाथ मिलाया और फिर मैं बापिस से अपने दोस्तों के पास जाकर खडी हो गई। तभी पूर्वी धीरे से फुसफुसाई

पूर्वी- तो इसलिए तुम्हारा आई.बी. के लिए डायरेक्ट सिलेक्शन हुआ था…. हुम्म….

इससे पहले मैं कुछ कहती, विक्रांत हैरान होते हुए बोला

विक्रांत- तो तुम हो वो ग्रेट हैकर द ड्रैगन हार्ट…. जिसने पिछले कुछ सालों से हैकिंग वर्ड में तहलका मचा रखा है……

अपने दोस्तों की बात सुनकर मैंने मुस्कुराते हुए कहा

अमृता- हाँ….

विक्रांत- तो इसका मतलब है कि तुम्हें तो हमारी तरह साईबर सिक्योरिटी और एथिकल हैकिंग की ट्रेनिंग लेने की कोई जरूरत ही नहीं है

इससे पहले मैं विक्रांत की बात का कोई जबाब देती, साक्षी बीच में बोल पडी

साक्षी- अमृता की बच्ची…….. आखिर तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई हमसे इतनी बडी बात छिपाने की

अमृता- अरे यार मैं यही तो तुम लोगों को कैंटीन में बताने बाली थी, लेकिन तभी अचानक से पवन वहाँ आ गया… और उसके बाद जो कुछ भी हुआ वो तो तुम लोगों को पता ही है…..

तभी सोढी बीच में ही बोल पडा

सोढी- ओऐ छड्डो जी इन सब बातों को….. सड्डी दोस्त सुपर गर्ल है….. इसलिए आज तो पार्टी बनती है…… और पार्टी देगा सड्डा विक्रांत

विक्रांत- मैं…. पर मैं भला पार्टी क्यों दूँगा….

सोढी- क्यों तेनू खुशी नी हुई यह जानकर कि सड्डी दोस्त द ग्रेेट ड्रैगन ङार्ट है

विक्रांत- हाँ….

सोढी- तो फिर तेरी तरफ से पार्टी पक्की….

अमृता- अरे यार विक्रांत परेशान होने की जरूरत नहीं है…. पार्टी तुम दे देना… पेमेंट मैं कर दूँगी…..

विक्रांत- तो फिर ठीक है… चलो चलते हैं… अब यहाँ हमारा कोई काम नहीं

इसी तरह हम लोग आपस में खुसर फुसर बातें करते हुए सर्वर रूम से बाहर निकल गए। करीब 2 महिने की ट्रेनिंग के बाद रिपब्लिक डे के ठीक एक हफ्ता पहले मुझे और मेरे दोस्तों को ऑफीसियली एन.एस.जी. में सामिल कर लिया गया था। जिसके बाद हमें रिपब्लिक डे परेड में हिस्सा लेने दिल्ली जाना पडा। जहाँ म्यामाँर बर्डर पर ऑपरेशन के दौरान मेरी बहादुरी को ध्यान में रखते हुए मुझे महामहिम राट्रपति द्वारा वीरता चक्र से सम्मानित किया गया, साथ ही साथ मेरे दोस्तों और उस ऑपेशन में हिस्सा लेने बाले सभी कमाण्डो को कीर्ति चक्र से सम्मानित किया गया। इसके अलावा उस ऑपेशन के दौरान मेरी बहादुरी और ट्रेनिंग के दौरान मेरे हायर ग्रेड को देखते हुए मुझे उसी वक्त प्रमोट करके कमांडो से कैप्टन बना दिया गया था।

यह शायद सिक्योरिटी फोर्स के इतिहास में पहली बार हुआ था, जब किसी नॉर्मल कमांडो को एक हप्ते के अंदर ही प्रमोट करके इतनी बडी पोस्ट दी गई थी। अब चूँकि मैं मेजर विकाश की भतीजी बन चुकी थी। इसलिए अपनी ट्रेनिंग पूरी होने के बाद मैं उनके घऱ पर ही सिफ्ट हो गई थी। जो दिल्ली की सबसे सिक्योर लोकेशन यानि डिफेंस कॉलोनी में था। अपनी ट्रेनिंग के बाद करीब 1 महिने की छुट्टियाँ मनाने के दौरान मैं कुछ दिनों के लिए इंदौर भी गई थी। ताकि मैं अपने शॉपिंग मॉल का काम देख सकूँ। चूँकि मेरे इंदौर बाले शॉपिंग मॉल से मुझे अच्छा खासा प्रॉफिट हो रहा था और कई बडे ब्रांडस् मेरे शॉपिंग मॉल से जुड चुके थे।

इसलिए अब मैं भोपाल, आगरा, दिल्ली जैसे दूसरे शहरों में भी अपने शॉपिंग मॉल का चेन बिजिनेश शुरू करने का प्लान कर रही थी। इसके लिए मैंने रघू और रवि के साथ मिलकर एक पार्टनसशिप कम्पनी शुरू की थी। चूँकि इस बिजिनेश में पूरा पैसा मैं इंबेस्ट करने बाली थी। जिस कारण उस कम्पनी में मेरा 60 परसेंट शेयर था, जबकि जबकि रवि और रघू का 20-20 परसेंट शेयर था। अपने शॉपिंग मॉल के चैन बिजिनेश के लिए मैंने अपनी 1 महिने की छुट्टी के दौरान कई बार दिल्ली से से इंदौर के लिए अपडाऊन किया था। साथ की साथ मैंने रवि और रघू के साथ कई अलग अलग शहरों में जाकर अपने शॉपिंग मॉल के लिए लोकेशन भी फाईनल कर लीं थी।

हाँलाकि पिछले एक साल में रघू और रवि को इस बात का अच्छी तरह से एहसास हो चुका था कि मैं उन दोनों को बस अपना अच्छा दोस्त मानती हूँ और उनके साथ किसी भी प्रकार के सीरियस रिलेशनशिप में बिल्कुल भी इंट्रेस्टेड नहीं हूँ। इसलिए उन दोनों ने भी मुझसे एक रिस्पेक्टफुल दूरी बना ली थी, जो मेरे लिए भी फिलहाल अच्छा ही था। अब हमारे बीच या तो दोस्तों की तरह हल्का फुल्का हंसी मजाक होता था, या फिर बिजिनेश रिलेटेड बातें ही होतीं थी।

कहानी जारी है...........
 
Update 079 -

अपने एक महिने की छुट्टी के बाद मैंने आई.बी. हैडक्वाटर ऑफीशियली ज्वान कर लिया। जहाँ मुझे पुराने मिशन की रिपोर्ट अच्छी तरह से स्टडी करने के लिए दी गईं। ताकि मैं आई.बी. के काम करने के तरीके को अच्छी तरह से समझ सकूँ। इसके अलावा मुझे कुछ सीनियर्स आई.बी. एजेंट्स के साथ छोटे मोटे मिशन पर उनके सपोर्ट के लिए भी भेजा गया था। ताकि अपने पहले मिशन पर जाने से पहले मैं पूरी तरह से कांफिडेंट हो सकूँ। हाँलाकि मेरे साथ काम करने के दौरान मेरे सीनियर्स आई.बी. एजेंट यह अच्छी तरह से समझ गए थे कि मेरे लिए यह सब काम पूरी तरह से नैचुरल है और मुझे अलग से किसी भी ट्रेनिंग की कोई आवश्यकता नहीं है। इसलिए कुछ ही दिनों की ऑनफील्ड ट्रेनिंग के बाद ज्वाईंट कमिश्नर राजीव ठाकुर ने मुझे अपने ऑफिस में बुलाया। जब मैं उनके पास पहुँची तो उन्होंने एक फाईल मेरी तरफ बडाते हुए कहा

रजीव- यह तुम्हारा पहला इंडीबीजुअल असाईंनमेंट है। आज से ही तुम इस केस पर लग जाओ

मैंने वो फाईल उनसे ले ली और उसे पलटकर देखते हुए सबाल किया

अमृता- सर एक्चुअली मेरा मिशन क्या है… क्या आप मुझे थोडा बहुत इस केस के बार में ब्रीफ करेंगे

मेरी बात सुनकर रजीव सर थोडा सीरियस होते हुए बोले

रजीब- ऑफकोर्स… एक्चुली में हमारे देश में पिछले कुछ सालों से कई विदेशी लोग टूरिस्ट बीजा और मेडिकल बीजा लेकर आऐ हैं। पर उनमें से कुछ लोग बापिस नहीं गए हैं। हमारा मानना हैं कि वो लोग हमारे देश में अपनी पहचान बदलकर रह रहे हैं और हमारे देश में कोई बडा आतंकवादी हमला करने के फिराक में है। हाँलाकि पिछले कुछ सालों में हमारे देश में होने बाले आतंवादी हमलों में पकडे गए ज्यादातर आतंकवादी हमारे देश के ही नागरिक हैं। पर जब उनसे सख्ती के साथ पूछताछ की गई तो हमें पता चला कि यह विदेशी आतंकवादी हमारे देश के युवाओं को बहकाकर अपने साथ मिला लेते हैं और फिर उन्हें अपने ही देश में आतंवादी हमला करने के लिए उक्साते हैं।

अमृता- मतलब आप स्लीपर सेल्स की बात कर रहे हैं

राजीव- हाँ मैं स्लीपर सेल्स की ही बात कर रहा हूँ।

अमृता- तो क्या मेरा मिशन इन स्लीपर सेल्स को ढूंडकर खत्म करना है

राजीव- नहीं नहीं ऐसा नहीं है। हम अपने ही देश के नागरिकों को मारना नहीं चाहते।

अमृता- तो फिर आखिर मुझे करना क्या है

राजीव- तुम्हें हमारे देश में अपनी पहचान बदलकर रह रहे आतंवादियो को ढूंडकर उनको खत्म करना है। ताकि उन लोगों ने हमारे देश में स्लीपर सेल्स का जो नेटवर्क बना रखा है, वह पूरी तरह से नष्ट हो जाऐ और जब उन स्लीपर सेल्स को कोई इंस्ट्रक्शन देने बाला ही नहीं रहेगा। तो वो आम नागरिकों की तरह ही अपनी जिंदगी जीते रहेंगे।

अमृता- पर सर जो इंशान एक बार किसी के बहकावे में आ सकता है। वो दूसरी बार भी किसी दूसरे इँशान के बहकाबे क्यों नहीं आऐगा।

राजीव- हाँ तुम्हारा कहना सही है…. इसलिए हम उन स्लीपर सेस्ल की काऊंसलिंग करेंगे और कुछ सालों तक उनपर कडी नजर भी रखी जाऐगा। ताकि वो दोवारा किसी गलत इंशान के बहकावे में ना आऐं। इसलिए जब तक बहुत जरूरी ना हो, तब तक तुम्हें किसी भी स्लीपर सेल्स की जान नहीं लेनी है।

अमृता- ठीक है सर मैं समझ गई….. तो फिर मुझे कहाँ से शुरूआत करनी है।

राजीव- पिछले कुछ दिनों में जो टेरेरिस्ट हमले हुए हैं। उनका लिंक कानपुर यूनिवर्सिटी से कहीं ना कहीं जुडा हुआ है। इसके अलावा मैंने तुम्हें जो फाईल दी है, उसमें से एक आतंकवादी फारूख उस्मान कुछ दिनों पहले कानपुर में देखा गया था। कानपुर यूनिवर्सिटी साईवर सिक्योरिटी एण्ड ए.आई. डेब्लपमेंट के लिए पूरी दुनिया में फेमस है। इसलिए वहाँ पर एक साल के डिप्लोमा कोर्स के लिए तुम्हारा एडमीशन पहले ही करवा दिया गया है। मैं चाहता हूँ कि तुम कानपुर यूनिवर्सिटी में एक स्टुडेण्ट बनकर जाओ और वहाँ पर फारूख उस्मान के लिंक के बारे में पता करो। बाकी डिटेल तुम्हें फाईल के अंदर मिल जाऐगी।

अमृता- ठीक है सर मैं समझ गई…. मैं कल ही कानपुर के लिए निकल जाती हूँ।

इतना बोलकर मैं राजीव सर के ऑफिस से बाहर निकल गई। वहाँ से मैं सीधे अपने यानि विकाश अंकल के घर पहुँची और कानपुर जाने की तैयारी करने लगी। मेरी रियल ऐज 28 साल हो चुकी है, लेकिन भोपाल में हुए हादशे के बाद मेरी बॉडी में कुछ ऐसे चेंजिस आऐ हैं, जिससे मैं किसी 19-20 साल की लडकी की तरह दिखने लगी हूँ। ऊपर से मैंने अपनी नई जिंदगी शुरू करने के लिए जिस लडकी की पहचान चुराई थी। उसकी उम्र भी अभी 20 साल ही है। जो एक कॉलेज स्टूडेंट के लिए परफेक्ट है। लेकिन मैं तो करीब 10 साल पहले ही कॉलेज ड्राप कर चुकी हूँ।

अब इतने सालों बाद एक बार फिर कॉलेज जाकर पढाई करना मुझे बडा अजीब लग रहा था। हाँलाकि पिछले 1 साल की ट्रेनिंग के दौरान साक्षी और पूर्वी के साथ रहकर मैंने 19-20 साल की लडकी की लाईफ स्टाईल को अच्छी तरह अपना लिया था। पर फिर से कॉलेज जाने के बारे में मैंने कभी नहीं सोचा था। लेकिन अब अपना मिशन पूरा करने के लिए मुझे यह सब तो करना ही था। इसलिए अपने आपको मैंटली प्रिपेयर करके मैं अगले दिन ही कानपुर के लिए निकल गई। राजीव सर ने मेरे एडमीशन और हॉस्टल की प्रासेस पहले पूरी करवा दी थी।

इसलिए कानपुर में मुझे अपने रहने का इंतजाम करने की कोई जरूरत नहीं थी। बैसे भी हॉस्टल में रहकर मैं ज्यादा से ज्यादा लोगों के कान्टेक्ट में आ सकती थी। जिससे मुझे अपना काम पूरा करने में आसानी होती। अपने हॉस्टल रूम में सेटल होने के बाद अगले दिन मैं अपनी क्लासेस लेने कॉलेज पहुँची। मैंने ब्लू कलर की जींस और ब्लैक कलर का टैंक टॉप पहना हुआ था। ऊपर से बुल्फ कट हेयर स्टाईल में मैं कुछ ज्यादा ही सेक्सी लग रही थी। इसलिए जैसे ही मैं कॉलेज कैम्पस के अंदर पहुँची सभी लडके मुझे ही देखे जा रहे थे। करीब 10 सालों बाद कॉलेज जाने की एक अलग ही फीलिंग मुझे महसूस हो रही थी।

मुझे ऐसा लग रहा था कि जैसे मैं समय में पीछे चली गई हूँ। अभी मैं यह फीलिंग इंजॉय ही कर रही थी कि तभी कुछ सीनियर्स लडके लडकियों ने मुझे घेर लिया। अपने चारों तरफ इतने सारे लडके लडकियों को देखकर मैं समझ गई थी कि वो लोग पक्का मेरी रैगिंग लेने वहाँ आऐ हैं। यह सब अगर मेरे साथ कुछ सालों पहले हुआ होता, तो पक्का मैं डर जाती। पर अपने एक्सपीरियंस और शक्ति बीज से मिली स्पेशल पावर के कारण अब मैं एक अलग ही इँशान बन गई थी। जिसके अंदर काँफिडेंस की कोई कमी नहीं थी। तभी एक लडकी ने मुझसे सबाल किया

लडकी- क्या नाम है तुम्हारा मिस छम्मक छल्लो

उस लडकी की बात सुनकर सभी लोग हंसते हुए मेरा मजाक उडाने लगे। लेकिन मैं पूरी तरह से नॉर्मल खडी रही और जब उनका हंसना बंद हुआ तो मैने जबाब दिया

अमृता- अमृता चौहान

तभी दूसरी लडकी ने सबाल किया

लडकी2- क्या तुम्हें पता नहीं है कि कॉलेज कैम्पस में इस प्रकार के कपडे पहनकर आने की परमीशन नहीं है।

मैंने एक नजर उस लडकी पर डाली जिसने एक मिनि स्कर्ट और स्लीवलैस टॉप पहना हुआ था। उसे देखकर मैंने मुस्कुराकर कहा

अमृता- एक्चुअली आज मेरा पहला दिन है… इसलिए मुझे कॉलेज के रूल्स पता नहीं है। आप ही बता दीजिए कि मुझे कैसे कपडे पहनकर आने हैं।

मेरी बात सुनकर वो लडकी चिढते हुए बोली

लडकी2- तुम्हारे मैनर्स कहाँ हैं…. अपने सीनियर्स से भला ऐसे बात करते हैं…. बैसे भी इतना तो कॉमनसेंस तुम्हारे अंदर होेना ही चाहिए कि कॉलेज में कैसे कपडे पहनकर जाने चाहिए और कैसे नहीं।

अमृता- ओह अच्छा ऐसा क्या… कहीँ आपके कहने का मतलब यह तो नहीं है कि मुझे आपकी तरह ही थोडे और शार्ट कपडे पहनकर आना चाहिए था।

मेरा जबाब सुनकर वो लडकी गुस्से में भडकते हुए बोली

लडकी2- यू रास्कल… तुम्हें अपने सीनियर्स से बात करने की बिल्कुल भी तमीज नहीं है क्या

उस लडकी की बात सुनकर मैंने भी चिढते हुए जबाब दिया

अमृता– अभी तक तो मैं तमीज से ही बात कर रही हूँ मिस सीनियर। लेकिन अगर तुम्हारी तरह बकचोदी करने पार आ गई ना, तो तुम सबको छटी का दूध याद दिला दूँगी। शराफत से अगर मेरा इंट्रो लेना है तो लो, बर्ना मुझे जाने दो…. तुम लोग मुझे कोई सीधी साधी आम लडकी समझने की गलती मत करना। मैं जैसी दिखती हूँ, बैसी बिल्कुल भी नहीं हूँ।

मेरी बात सुनकर वहां खडा हर एक इंशान सन्न रह गया था। उन्हें उम्मीद नहीं थी कि कोई नई स्टूडेंट उनसे इस प्रकार की बातें करने की हिम्मत भी कर सकती है। एक पल के लिए तो उन्हें लगा कि मुझसे पंगा लेना उनके लिए ठीक नहीं है। पर फिर उन्हें लगा कि अगर मुझे ऐसे ही जाने दिया तो उनकी बहुत ज्यादा बेइज्जती होगी। इसलिए पहली बाली लडकी ने अपने बगल में खडे एक लड़के के हाथ से बेसबॉल बैट ले लिया और फिर अपना रौब दिखाते हुए बोली

लडकी- लगता है कि तुम कुछ दिनों की मेडिकल लीव पर जाना चाहती हो

उस लडकी की बात पूरे होते ही मैंने एक झटके में उसके हाथों से वह बेसबॉल बैट छीन लिया और अगले ही पल उसके दो टुकडे करके उसके हाथो में पकडाते हुए बोली

अमृता– ऐसे खिलौने से खेलना फिलहाल मैंने बंद कर दिया है। लेकिन अगर तुम खेलना ही चाहती हो तो मैं इसके लिए भी तैयार हूँ। बोलो क्या कहती हो…..

मेरी इस हरकत से उन लडकियों के साथ खडे लडके भी मुझसे बुरी तरह डर गए थे। क्योंकि बेसबॉल बैट अच्छा खासा मजबूत होता है और एक नॉर्मल इँशान उसे इतनी आसानी से नहीं तोड सकता है। लेकिन मैंने उसे ऐसे तोड दिया था जैसे कोई पतली सी स्टिक हो। जिस कारण वहाँ मेरे चारों तरफ खडी भीड धीरे धीरे कम होने लगी और कुछ ही देर बाद वहाँ पर बस दो लडकियाँ खडी रह गई थीं। अपने सभी साथियों के वहाँ से जाते ही उन लडकियों की भी रही सही हिम्मत जबाब दे गई थी और वो भी वहाँ से ऐसे भागी जैसे दिन के उजाले में उन्होंने कोई भूत देख लिया हो।

उन सबके ऐसे भागने पर मैं मुस्कुराते हुए अपनी क्लास की तरफ आगे बड गई। जब मैं अपने क्लास रूप के पास पहुँची तो मैंने देखा कि क्लास रूम से बाहर कुछ लडकियाँ आपस में खडे होकर कुछ बातें कर रहीं हैं। तभी मेरी नजर एक लडकी पर अटक गई। इससे पहले मैं उसे लडकी को वहाँ देखकर कुछ रिऐक्ट कर पाती उस लडकी ने भी मुझे देख लिया था और अगले ही पल वो जोर से मेरा नाम चीखते हुए मेरी तरफ भागी…..

“अमृता मेरी जान…. तू यहाँ कैसे”

मैं अब भी हैरानी से उस लडकी को ही देखे जा रही थी… वो कोई और नहीं बल्कि मेरी दोस्त श्रेया थी। मैंने श्रेया से यहाँ मिलने की बिल्कुल भी उम्मीद नहीं की थी। इससे पहले मैं अपनी हैरानी पर कंट्रोल कर पाती श्रेया ने मेरे पास आकर मुझे गले लगा लिया। जिस कारण मैं तुरंत होश में आ गई और खुश होते हुए बोली

अमृता- अरे श्रेया तुम…. तुम यहाँ क्या कर रही हो…

श्रेया- यही तो मैं भी तुमसे जानना चाहती हूँ….

अमृता– मैं तो यहाँ पर साईबर सिक्योरिटी एण्ड ए.आई. डेबलप्मेंट का डिप्लोमा करने आई हूँ।

श्रेया- सेम हेयर मेरी जान

अमृता- पर भोपाल से इतनी दूर यहाँ कानपुर में….

श्रेया- अरे यार अपनी डिग्री पूरी होने के बाद मैं बहुत बोर हो रही थी। हमारे पुराने दोस्तों के साथ तो तुमने पहले ही एक पार्टनरशिप कंपनी शुरू कर ली है, इसलिए वो सभी तो अपनी पढाई बंद करके बिजिनेश में लगे हुए हैं। तो मैंने सोचा कि क्यों ना नई जगह जाकर कुछ नऐ दोस्त बनाऐ जाऐं, बस इसीलिए यहाँ पर आ गई। बैसे भी कानपुर यूनिवर्सिटी आई.टी. डिग्री के लिए वर्ड फेमस है….

अमृता– हाँ यह तो है… चलो अच्छा है…. तुम्हारे यहाँ होने से अब मैं भी अकेलापन महसूस नहीं करूँगी।

श्रेया- हाँ मैं भी… बैसे तुम कहाँ रह रही हो…

अमृता- गर्लस् हॉस्टल

श्रेया- अरे यार पापा ने पहले ही गर्लस हॉस्टल के एकदम पास में मेरे लिए एक घर रेंट पर ले लिया है। जिसमें मैं अपनी कुछ क्लासमेट्स के साथ रह रही हूँ। इसलिए अगर तुम चाहो तो मेरे साथ उस घर में सिफ्ट हो सकती हो। बैसे भी उसमें एक रूम अभी भी खाली है।

श्रेया की बात सुनकर मैंने कुछ देर सोचने के बाद कहा

अमृता- ठीक है… हमारी क्लासेस खत्म होने के बाद मैं हास्टल से अपना सामान ले लूँगी और फिर मैं तुम्हारे साथ सिफ्ट हो जाऊंगी।

मेरी बात सुनकर श्रेया ने खुश होते हुए मुझे अपने गले से लगा लिया और बोली

श्रेया- थैंक्यू मेरी जान….. हम लोग वहाँ पर खूब मजे करेंगे, आओ मैं तुम्हें अपनी फ्रेंडस् से मिलवाती हूँ।

इतना बोलकर श्रेया मुझे अपने दोस्तों के पास ले गई और फिर उनसे मेरा परिचय करवाने लगी। मेरे मिशन की शुरूआत काफी अच्छी हुई थी। क्योंकि श्रेया के पहले से ही यहाँ होने पर मुझे दोस्त बनाने में ज्यादा प्राब्लम नहीं होने बाली थी, ऊपर से हॉस्टल के पास ही अलग घर में रहने से मैं अपना काम सीक्रेट तरीके से भी कर सकती थी। बैसे भी मैं खुद भी कुछ दिनों तक हॉस्टल में रहने के बाद अलग से एक घर रेंट पर लेने की सोच रही थी। क्योंकि हॉस्टल में अच्छी खासी भीड भाड रहती है। जिस कारण मैं कोई भी काम सीक्रेट तरीके से नहीं कर सकती थी।

हॉस्टल में इंट्री तो मैंने बस इसलिए ली थी ताकि जल्द से जल्द अपने कुछ दोस्त बना सकूँ। लेकिन श्रेया के यहाँ होने से मेरा यह काम पहले ही हो गया था। इसलिए उस दिन की सारी क्लासेस अटेण्ड करने के बाद शाम को मैंने हॉस्टल रूप से अपना सामान लिया और बार्डन को रूम की चाबी बापिस करके मैं श्रेया और उसके दोस्तों के साथ उनके घर पर जा पहुँची। जो हमारे हॉस्टल से करीब 100 मीटर की दूरी पर ही था। चूँकि श्रेया ने मुझे वहां पर एक अलग रूम दिया था। जिस कारण मैं अपनी सीक्रेशी आसानी से मैनेज कर सकती थी। साथ ही साथ उस घर के टैरेस से मैं गर्लस हॉस्टल और बॉयज हॉस्टल दोनों पर आसानी से नजर भी रख सकती थी।

कहानी जारी है..........
 
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