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Update 071 -
मैंने जिस जगह अपनी कार खडी की थी, उससे थोडी सी दूरी पर एक ढलान बाला कच्चा रास्ता था, जिसके चारों तरफ घना जंगल और उससे आगे एक गहरी खाई थी। सुनसान इलाका और रात के अंधेरे के कारण हाईवे से कोई भी मेरी कार को नहीं देख सकता था। जिस कारण मैं बेफिक्र होकर अपने काम में बिजी हो गई। सबसे पहले मैंने अपने बडे से बैग में से एक प्लास्टिक बैग बाहर निकाला, जिसके अंंदर मैंने पहले से ही वो सामान रखा हुआ था, जिसकी जरूरत मुझे अभी पडने बाली थी। उस प्लास्टिक बैग को निकालने के बाद मैंने बिना देर किए अपने सारे कपडे और ज्वैलरी निकालनी शुरू कर दी और उन्हें संभाल कर कार में एक तरफ रखने लगी।
यहाँ तक की मैंने अपनी ईयररिंग, नोजपिन, हेयरबैंड और क्लैचर के साथ साथ अपनी ब्रा और पेंटी भी निकाल दी थी। शक्ति बीज से मिली स्पेशल पावर के कारण मुझे उस अंधेरे में भी साफ साफ दिखाई दे रहा था। ऊपर से आधे चांद की रात होने के कारण वहाँ पर्याप्त रोशनी थी। कुछ ही देर बाद मैं उस लावारिस लाश के जैसी पूरी तरह से आदमजात नंगी हो गई थी। हम दोनों में बस इतना ही अंतर था कि मैं एक जिंदा इंशान थी और वो बस एक लाश। अपने शरीर पर से सारे कपडे और ज्वैलरी निकालने के बाद मैंने उस प्लास्टिक बैग में से एक विशेष कैमिकल की छोटी सी बॉटल और कुछ कॉटन बॉलस् निकालकर उस कैमिकल को अपनी बॉडी के उन हिस्सों पर लगाने लगी, जहाँ मैंने टैटू बनवाई थे।
असल में जब मैं भोपाल से दिल्ली बापिस आ रही थी, तो मैंने अपने बॉडी पर बनवाऐ गए सभी टैटू को टैम्प्रेरी रूप से छिपाने के लिए अपनी स्किन कलर से मैच करती हुई आर्टीफीशियल स्किन की एक पतली सी लेयर लगवा ली थी। जो पूरी तरह से बाटर फ्रूफ थी और जिसे केवल इस विशेष कैमिकल की हेल्प से ही निकाला जा सकता था। असल में मैं नहीं चाहती थी कि दिल्ली में मेरे किसी भी जान पहचान बाले को यह पता चले कि मैंने अपनी बॉडी पर टैटू बनवाऐ हुए हैं। क्योंकि मेरी पहचान बदलने के बाद यदि गलती से मैं अपने किसी पुरानी जान पहचान बाले इंशान से टकरा गई तो वो मेरी बॉडी पर बने टैटू देखकर मुझे आसानी से पहचान सकता था।
कुछ ही देर में उस कैमिकल ने अपना असर दिखाना शुरू कर दिया, जिस कारण मेरी बॉडी पर लगी वह आर्टीफीशियल स्किन निकलने लगी। जब वो स्किन काफी हद तक लूज हो गई तो मैंने पूरी सावधानी से उसे निकाल दिया और उस यूज्ड आर्टीफीशियल स्किन को संभालकर एक तरफ रख दिया। अब मेरे गोरे बदन पर बने टैटू उस आधे चाँद की रात में साफ साफ दिखाई दे रहे थे। अपनी बॉडी से उस आर्टीफीसियल स्किन निकालने के बाद मैंने कार में से पानी की बॉटल निकाली और उससे अपने माँग में भरा सिंदूर साफ करने लगी। क्योंकि अब मुझे उसकी कोई जरूरत नहीं थी। बैसे भी जो इंशान खुद मेरी जान लेना चाहता हो, उसके नाम का सिंदूर भला मैं कैसे लगा सकती थी।
अपनी माँग का सिंदूर साफ करने के बाद मैंने उस प्लास्टिक बैग में से एक स्पोर्ट ब्रा-पेंटी का सेट निकालकर पहन लिया। फिलहाल मुझे उस लडकी की लाश को अपने कपडे और ज्वैलरी पहनानी थी। जिस कारण मैं अभी अपने बाकी के कपडे नहीं पहनना चाहती थी। क्योंकि इस प्रॉसेस में मेरे कपडे गंदे होने का डर था। इसलिए मैं ब्रा और पेंटी में ही उस लाश को अपने कपडे पहनाने लगी। यहाँ तक कि मैंने अपनी पुरानी ब्रा और पेंटी के साथ साथ अपनी जूतियाँ भी उसे पहना दी थी। इसके अलावा मैंने अपना मंगलसूत्र और दूसरी ज्वैलरी भी उसे पहना दी थी। ताकि एक्सीडेंट के बाद जब उस जली हुई लाश की जाँच की जाऐ, तो उस लाश पर मेरी ज्वैलरी देखकर सभी को पूरी तरह से यकीन हो जाऐ की मैं यानि निशा गुप्ता उस एक्सीडेंड में मर चुकी है।
उस लावारिस लाश को अच्छी तरह से तैयार करने के बाद मैंने उस लाश को कार की पिछली सीट से बाहर निकाला और ड्राईबिंग सीट पर बैठा दिया, साथ ही साथ मैंने बैल्ट भी बांध दिया था, ताकि लाश इधऱ उधर ना लुढके। हाँलाकि किसी भी इंशान की लाश को उठाना एक अकेले आम इंशान के बस की बात नहीं है। पर खण्डहर से जिंदा बचने के बाद और अपने गले में डले शक्ति बीज के कारण मेरी शारीरिक ताकत एक आम इंशान की तुलना में कहीं ज्यादा बड गई थी। इसलिए मुझे उस लाश को उठाकर ड्राईबिंग सीट पर बैठाने में कोई प्राब्लम नहीं हुई थी।
लाश को ड्राईविंग सीट पर अच्छी तरह से बैठाने के बाद मैंने प्लास्टिक बैग से अपने बाकी के कपडे और स्पोर्ट शूज निकालकर पहन लिए। जिसके बाद मैंने कार में रखे अपने बडे से बैग में से अपना बैकपैक बाहर निकाला। जो मैं अमन से छिपाकर अपने साथ लाई थी। उस बैगपैक में मेरी नई पहचान यानि अमृता चौहान से रिलेडेड सारे ऑरीजनल डॉक्यूमेंट, डिजीटल कैस कार्ड, डेबिड कार्ड, कुछ पैसे, मेरा नया मोबाईल फोन, नया लैपटॉप, कपडे और दूसरा जरूरी सामान रखा हुआ था। अपना बैगपैक निकालने के बाद मैं उस बडे से बैग बैग को बापिस बंद करके उसी कार के अंदर छोड दिया।
साथ ही साथ मैंने अपना पर्सनल मोबाईल फोन, हैंड बैग और दूसरा जरूरी सामान जैसे मेरी यानि निशा गुप्ता के आई.डी. कार्ड बगैरह, सब कुछ उसी कार के अंदर ही छोड दिया था। अब मेरे पास निशा से रिलेटेड कुछ भी नहीं था, जो कुछ भी था सब अमृता का था। यह सारे काम खत्म करने के बाद मैंने कार की डिग्गी में से पैट्रोल से भरे हुए दोनोें कैन निकाले और कार के अंदर पैट्रोल छिडकने लगी। ताकि उस कार के अंदर मौजूद हर चीज जलकर राख हो जाऐ। यहाँ तक की मैंने उस लाश पर भी ढेर सारा पैट्रोल डाल दिया था। ताकि उस लडकी की लाश जलकर पूरी तरह से राख हो जाऐ।
कार के अंदर पैट्रोल छिडकने के बाद मैंने अपनी आँखों में लगे लैंस भी निकाल दिये। जिस कारण मेरी आँखें जो कुछ देर पहले काली थीं, वो अब हरे रंग की दिखाई दे रहीं थी। फिलहाल मुझे इन लैंस की कोई जरूरत नहीं थी। इसलिए मैंने उन्हें तोडकर खाली प्लास्टिग बैग में डाल दिया। इसके अलावा मैंने सारा अनयूज्ड सामान जैसे लाश को ढंकने बाली चादर, मेरी आर्टीफिसियल स्किन, पैट्रोल के खाली कैन बगैरह को उस प्लास्टिक बैग के अंदर रखा और वहाँ से थोडी दूर झाडियों के पीछे लेजाकर उसमें आग लगा दी। ताकि किसी को भी मेरे जिंदा बचने का कोई सबूत ना मिले।
यह सारे काम पूरे करने के बाद मैंने अपने बैगपैक में से एक कटर निकालकर कार के ब्रेक फेल कर दिये और एक लईटर जलाकर कार की पिछली सीट पर फेंक दिया। इससे पहले कार के अंदर आग फैले मैंने अपनी कार स्टार्ट की और उस लडकी का पैर कार की रेस पर रखकर गियर डाल दिया। जैसे ही मैंने कार में गियर डाला तो कार तेजी से आगे बडने लगी, लेकिन ड्राईबर साईड का दरवाजा अब भी खुला हुआ था, इसलिए मैंने भी कार के साथ दौडते हुए जल्दी से दरवाजा बंद कर दिया और कार से तुरंत दूर हट गई। वो रास्ता एकदम सीधा और ढलान बाला था और जिसके आखिर में एक गहरी खाई थी। इसलिए वो कार तेजी से उस ढलान भरे रास्ते पर दौडते हुए सीधी खाई में जा गिरी।
कार के उस खाई में गिरते ही एक तेज आवाज सुनाई दी और फिर अचानक से एक के बाद एक दो तेज धमाके हुऐ। जिसका एक ही मतलब था कि कार के सी.एन.सी. टैंक के साथ साथ पैट्रोल टैंक भी फट गया है। वो धामाके इतने तेज थे, जिन्हें सुनकर ऐसा लगा जैसे कोई बॉम्ब फट गया हो। उन धमाकों की अवाज सुनकर तो एक पल के लिए मैं भी बुरी तरह से डर गई थी। लेकिन जैसे ही मैं होश में आई तो मैं दौडकर उस खाई की तरफ चलई गई। जहाँ मैंने देखा की कार पूरी तरह से टूट-फूट चुकी थी और कार के चारों चरफ तेजी से आग फैल चुकी थी। यह नजारा देखकर मुझे पूरा यकीन हो चुका था कि अब उस लड़की की लाश जलकर पूरी तरह से राख हो जायेगी। यहाँ तक की अब उस लाश का डी.एन.ए. मिलना भी पूरी तरह से असंभव है।
उस हादसे को देखकर अचानक से मेरी आँखों में आँशू झलक आए। क्योंकि अब मैं अपनी पुरानी जिंदगी में फिर कभी बापिस नहीं जा सकती थी। अब दुनिया की नजरों में निशा गुप्ता मर चुकी थी। मैं अभी उस कार को जलते हुए देख ही रही थी कि तभी मुझे हाईवे की तरफ से कुछ लोगों के आने की आवाज सुनाई दी। जिसे सुनकर मैंने तुरंत अपने आँशू पौंछे और वहाँ पर रखा अपना बैकपैक पीठ पर टांगकर झाडियों के पीछे छिप गई। जिसके कुछ ही देर में वहाँ पर अच्छी खासी भीड इक्ट्ठी हो गई थी। उस भीड का लाभ उठाते हुए मैंने अपने चेहरे पर मास्क लगाया और झाडियों से निकलकर भीड में शामिल हो गई।
मैं कुछ देर तक तो वहीं भीड के साथ खडे होकर उस कार को जलते हुए देखती रही, और फिर हाईबे की तरफ चल पडी। हाईवे पर पहुँचकर मैंने देखा कि वहाँ पर रोड किनारे कुछ एस.यू.वी. और कारें खडी हुईं हैं, साथ ही साथ वहाँ पर एक बस भी खडी हुई थी, जो दिल्ली की तरफ जा रही थी। शायद उस बस में से भी कुछ सबारियाँ नीचे खाई की तरफ चलीं गईं थीं और बाकी के लोग बस के बाहर हाईवे पर खडे होकर दूर से ही तमाशा देख रहे थे। तभी वहाँ खडी भीड में से किसी ने पुलिस को कॉल करके उस एक्सीडेंट के बारे में बता दिया। अब चूँकि मेरा वहाँ पर कोई काम नहीं बचा था। इसलिए मैं उस बस के अंदर जाकर बैठ गई।
कुछ देर तक चले इस तमाशे के बाद जब वहाँ खडी गाडियाँ एक एक करके अपने अपने रास्ते जाने लगीं, तो बस के पैसेंजर भी बापिस आकर अपनी अपनी सीट पर बैठ गए। सभी लोगों के बापिस आने के बाद वो बस भी फिर से दिल्ली की तरफ चल पडी। उस बस के अंदर पहले से ही कुछ सीटें खाली थीं। जिस कारण किसी को भी मुझपर शक नहीं हुआ था। आखिरकार बिना किसी प्राब्लम के रात करीब 12 बजे मैं दिल्ली जा पहूँची। जिसके बाद मैंने अपने लिए एक होटल रूम बुक किया और अपने रूम में जाकर सो गई। अगले दिन जब मेरी नींद खुली तो मैंने अपने रूम में ही काफी और नश्ता मंगवा लिया और फ्रैस होने के लिए बाथरूम में घुस गई।
जब तक मैं नहाकर तैयार हूई तब तक मेरी कॉफी और नाश्ता भी आ चुका था। इसलिए मैंने टी.बी. ऑन की और न्यूज देखते हुए नाश्ता करने लगी। कई न्यूज चैनल चेंज करने के बाद आखिरकार मुझे वो न्यूज मिल ही गई जिसकी मुझे तलाश थी। असल में मैं अपनी कार के एक्सीडेंट बाली न्यूज सर्च कर रही थी। जो इस वक्त एक लोकल न्यूज चैनल पर दिखाई जा रही थी। न्यूज चैनल में इस वक्त कार की जो हालत दिखाई दे रही थी। वो किसी जले हुऐ टीन के डिब्ले की तरह थी, जिसे देखकर साफ समझ आ रहा था कि उसके अंदर जो भी लाश थी, वो अब तक पूरी तरह से जल कर राख हो चुकी होगी।
कुछ देर बाद न्यूज पर जो फुटेज दिखाई गई उससे मेरा अंदाजा बिल्कुल सही साबित हुआ। न्यूज पर एक बुरी तरह से जली लाश दिखाई दे रही थी। जिसे लाश कहना भी गलत होगा। क्योंकि वो बस एक कंकाल था। फारेंसिक टीम को उस कंकाल में से किसी भी प्रकार का डी.एन.ए. नहीं मिला था। जिससे उस लाश की पहचान हो सके। जिस कारण अब पुलिस टीम उस कार की हेल्प से मरने बाले का पता लगाने की कोशिश कर रही थी। हाँलाकि कार की नम्बर प्लेट्स जलकर पूरी तरह से बेकार हो गईं थी। पर पुलिस टीम कार का चेचिस नम्बर पता करने में कामयाब रही थी।
इसके अलावा उस कंकाल की बॉडी पर मौजूद कुछ ज्वैलरी किस्मत से सही सलामत बच गई थी। जिससे पुलिस टीम ने अंदाजा लगाया था कि मरने बाली एक शादिशुदा औरत है। इसलिए पुलिस ने वो सारी ज्वैलरी संभालकर अपने पास रख ली थी। ताकि वो उस लाश की सिनाख्त के काम आ सकें। थोडी बहुत छानबीन और करने के बाद पुलिस टीम को कार में से कुछ अधजले डॉक्यूमेंट्स और मेरा मोबाईल फोन भी मिल गया था। साथ ही साथ पुलिस टीम को कार में से बालों का एक गुच्छा और थोडा सा सूखा हुआ खून भी मिल गया था। जो किसी तरह से जलने से बच गया था।
यह पुलिस के लिए एक बडी कामयाबी थी। क्योंकि उस बालों के गुच्छे और सुखे हुए खून से डी.एन.ए. निकालकर लाश की पहचान करना आसान था। असल में वो बाल और खून मेरा ही था, जिसे मैंने जानबूझकर उस कार में छोड दिया था। हाँलाकि मुझे उम्मीद तो नहीं थी कि वो आग में जलने से बच पाऐँगे। लेकिन अगर वो किसी तरह जलने से बच गए तो फारेंसिक टीम उनसे डी.एन.ए. निकाल कर यह कन्फर्म कर सकती थी कि वो लाश मेरी ही है। यहाँ पर किस्मत ने मेरा साथ दिया था। क्योंकि जब कार खाई में गिरी थी तो मेरा हैण्ड बैग लुडकता हुआ ठीक उस जगह आकर गिरा था, जहाँ पर मैंने अपने बालों का गुच्छा और अपना ब्लड सेंपल छोडा था।
चूँकि मेरा हैँडबैग हाईब्रिड मटेरियल से बना था। इसलिए वो उस आग में पूरी तरह से जलने से बच गया था और उसके साथ साथ मेरे बाल और मेरे ब्लड का सेंपल भी जलने से बच गया था। कुछ देर और वह न्यूज देखने के बाद मैंने टी.बी. बंद कर दी, क्योंकि मैं जान चुकी थी कि पुलिस अभी तक डैड बॉडी की पहचान नहीं कर पाई है। पर मुझे पूरा यकीन था कि वो जल्दी ही कार के मालिक का पता लगा लेगी और उसके बाद पुलिस को मेरे बारे में भी सब कुछ पता चल ही जाऐगा। लेकिन फिलहाल मेरे पास करने के लिए कुछ भी नहीं था। इसलिए मैं तैयार हुई और अपने चेहरे पर मास्क लगाकर होटल रूम से बाहर निकल गई।
कहानी जारी है......
मैंने जिस जगह अपनी कार खडी की थी, उससे थोडी सी दूरी पर एक ढलान बाला कच्चा रास्ता था, जिसके चारों तरफ घना जंगल और उससे आगे एक गहरी खाई थी। सुनसान इलाका और रात के अंधेरे के कारण हाईवे से कोई भी मेरी कार को नहीं देख सकता था। जिस कारण मैं बेफिक्र होकर अपने काम में बिजी हो गई। सबसे पहले मैंने अपने बडे से बैग में से एक प्लास्टिक बैग बाहर निकाला, जिसके अंंदर मैंने पहले से ही वो सामान रखा हुआ था, जिसकी जरूरत मुझे अभी पडने बाली थी। उस प्लास्टिक बैग को निकालने के बाद मैंने बिना देर किए अपने सारे कपडे और ज्वैलरी निकालनी शुरू कर दी और उन्हें संभाल कर कार में एक तरफ रखने लगी।
यहाँ तक की मैंने अपनी ईयररिंग, नोजपिन, हेयरबैंड और क्लैचर के साथ साथ अपनी ब्रा और पेंटी भी निकाल दी थी। शक्ति बीज से मिली स्पेशल पावर के कारण मुझे उस अंधेरे में भी साफ साफ दिखाई दे रहा था। ऊपर से आधे चांद की रात होने के कारण वहाँ पर्याप्त रोशनी थी। कुछ ही देर बाद मैं उस लावारिस लाश के जैसी पूरी तरह से आदमजात नंगी हो गई थी। हम दोनों में बस इतना ही अंतर था कि मैं एक जिंदा इंशान थी और वो बस एक लाश। अपने शरीर पर से सारे कपडे और ज्वैलरी निकालने के बाद मैंने उस प्लास्टिक बैग में से एक विशेष कैमिकल की छोटी सी बॉटल और कुछ कॉटन बॉलस् निकालकर उस कैमिकल को अपनी बॉडी के उन हिस्सों पर लगाने लगी, जहाँ मैंने टैटू बनवाई थे।
असल में जब मैं भोपाल से दिल्ली बापिस आ रही थी, तो मैंने अपने बॉडी पर बनवाऐ गए सभी टैटू को टैम्प्रेरी रूप से छिपाने के लिए अपनी स्किन कलर से मैच करती हुई आर्टीफीशियल स्किन की एक पतली सी लेयर लगवा ली थी। जो पूरी तरह से बाटर फ्रूफ थी और जिसे केवल इस विशेष कैमिकल की हेल्प से ही निकाला जा सकता था। असल में मैं नहीं चाहती थी कि दिल्ली में मेरे किसी भी जान पहचान बाले को यह पता चले कि मैंने अपनी बॉडी पर टैटू बनवाऐ हुए हैं। क्योंकि मेरी पहचान बदलने के बाद यदि गलती से मैं अपने किसी पुरानी जान पहचान बाले इंशान से टकरा गई तो वो मेरी बॉडी पर बने टैटू देखकर मुझे आसानी से पहचान सकता था।
कुछ ही देर में उस कैमिकल ने अपना असर दिखाना शुरू कर दिया, जिस कारण मेरी बॉडी पर लगी वह आर्टीफीशियल स्किन निकलने लगी। जब वो स्किन काफी हद तक लूज हो गई तो मैंने पूरी सावधानी से उसे निकाल दिया और उस यूज्ड आर्टीफीशियल स्किन को संभालकर एक तरफ रख दिया। अब मेरे गोरे बदन पर बने टैटू उस आधे चाँद की रात में साफ साफ दिखाई दे रहे थे। अपनी बॉडी से उस आर्टीफीसियल स्किन निकालने के बाद मैंने कार में से पानी की बॉटल निकाली और उससे अपने माँग में भरा सिंदूर साफ करने लगी। क्योंकि अब मुझे उसकी कोई जरूरत नहीं थी। बैसे भी जो इंशान खुद मेरी जान लेना चाहता हो, उसके नाम का सिंदूर भला मैं कैसे लगा सकती थी।
अपनी माँग का सिंदूर साफ करने के बाद मैंने उस प्लास्टिक बैग में से एक स्पोर्ट ब्रा-पेंटी का सेट निकालकर पहन लिया। फिलहाल मुझे उस लडकी की लाश को अपने कपडे और ज्वैलरी पहनानी थी। जिस कारण मैं अभी अपने बाकी के कपडे नहीं पहनना चाहती थी। क्योंकि इस प्रॉसेस में मेरे कपडे गंदे होने का डर था। इसलिए मैं ब्रा और पेंटी में ही उस लाश को अपने कपडे पहनाने लगी। यहाँ तक कि मैंने अपनी पुरानी ब्रा और पेंटी के साथ साथ अपनी जूतियाँ भी उसे पहना दी थी। इसके अलावा मैंने अपना मंगलसूत्र और दूसरी ज्वैलरी भी उसे पहना दी थी। ताकि एक्सीडेंट के बाद जब उस जली हुई लाश की जाँच की जाऐ, तो उस लाश पर मेरी ज्वैलरी देखकर सभी को पूरी तरह से यकीन हो जाऐ की मैं यानि निशा गुप्ता उस एक्सीडेंड में मर चुकी है।
उस लावारिस लाश को अच्छी तरह से तैयार करने के बाद मैंने उस लाश को कार की पिछली सीट से बाहर निकाला और ड्राईबिंग सीट पर बैठा दिया, साथ ही साथ मैंने बैल्ट भी बांध दिया था, ताकि लाश इधऱ उधर ना लुढके। हाँलाकि किसी भी इंशान की लाश को उठाना एक अकेले आम इंशान के बस की बात नहीं है। पर खण्डहर से जिंदा बचने के बाद और अपने गले में डले शक्ति बीज के कारण मेरी शारीरिक ताकत एक आम इंशान की तुलना में कहीं ज्यादा बड गई थी। इसलिए मुझे उस लाश को उठाकर ड्राईबिंग सीट पर बैठाने में कोई प्राब्लम नहीं हुई थी।
लाश को ड्राईविंग सीट पर अच्छी तरह से बैठाने के बाद मैंने प्लास्टिक बैग से अपने बाकी के कपडे और स्पोर्ट शूज निकालकर पहन लिए। जिसके बाद मैंने कार में रखे अपने बडे से बैग में से अपना बैकपैक बाहर निकाला। जो मैं अमन से छिपाकर अपने साथ लाई थी। उस बैगपैक में मेरी नई पहचान यानि अमृता चौहान से रिलेडेड सारे ऑरीजनल डॉक्यूमेंट, डिजीटल कैस कार्ड, डेबिड कार्ड, कुछ पैसे, मेरा नया मोबाईल फोन, नया लैपटॉप, कपडे और दूसरा जरूरी सामान रखा हुआ था। अपना बैगपैक निकालने के बाद मैं उस बडे से बैग बैग को बापिस बंद करके उसी कार के अंदर छोड दिया।
साथ ही साथ मैंने अपना पर्सनल मोबाईल फोन, हैंड बैग और दूसरा जरूरी सामान जैसे मेरी यानि निशा गुप्ता के आई.डी. कार्ड बगैरह, सब कुछ उसी कार के अंदर ही छोड दिया था। अब मेरे पास निशा से रिलेटेड कुछ भी नहीं था, जो कुछ भी था सब अमृता का था। यह सारे काम खत्म करने के बाद मैंने कार की डिग्गी में से पैट्रोल से भरे हुए दोनोें कैन निकाले और कार के अंदर पैट्रोल छिडकने लगी। ताकि उस कार के अंदर मौजूद हर चीज जलकर राख हो जाऐ। यहाँ तक की मैंने उस लाश पर भी ढेर सारा पैट्रोल डाल दिया था। ताकि उस लडकी की लाश जलकर पूरी तरह से राख हो जाऐ।
कार के अंदर पैट्रोल छिडकने के बाद मैंने अपनी आँखों में लगे लैंस भी निकाल दिये। जिस कारण मेरी आँखें जो कुछ देर पहले काली थीं, वो अब हरे रंग की दिखाई दे रहीं थी। फिलहाल मुझे इन लैंस की कोई जरूरत नहीं थी। इसलिए मैंने उन्हें तोडकर खाली प्लास्टिग बैग में डाल दिया। इसके अलावा मैंने सारा अनयूज्ड सामान जैसे लाश को ढंकने बाली चादर, मेरी आर्टीफिसियल स्किन, पैट्रोल के खाली कैन बगैरह को उस प्लास्टिक बैग के अंदर रखा और वहाँ से थोडी दूर झाडियों के पीछे लेजाकर उसमें आग लगा दी। ताकि किसी को भी मेरे जिंदा बचने का कोई सबूत ना मिले।
यह सारे काम पूरे करने के बाद मैंने अपने बैगपैक में से एक कटर निकालकर कार के ब्रेक फेल कर दिये और एक लईटर जलाकर कार की पिछली सीट पर फेंक दिया। इससे पहले कार के अंदर आग फैले मैंने अपनी कार स्टार्ट की और उस लडकी का पैर कार की रेस पर रखकर गियर डाल दिया। जैसे ही मैंने कार में गियर डाला तो कार तेजी से आगे बडने लगी, लेकिन ड्राईबर साईड का दरवाजा अब भी खुला हुआ था, इसलिए मैंने भी कार के साथ दौडते हुए जल्दी से दरवाजा बंद कर दिया और कार से तुरंत दूर हट गई। वो रास्ता एकदम सीधा और ढलान बाला था और जिसके आखिर में एक गहरी खाई थी। इसलिए वो कार तेजी से उस ढलान भरे रास्ते पर दौडते हुए सीधी खाई में जा गिरी।
कार के उस खाई में गिरते ही एक तेज आवाज सुनाई दी और फिर अचानक से एक के बाद एक दो तेज धमाके हुऐ। जिसका एक ही मतलब था कि कार के सी.एन.सी. टैंक के साथ साथ पैट्रोल टैंक भी फट गया है। वो धामाके इतने तेज थे, जिन्हें सुनकर ऐसा लगा जैसे कोई बॉम्ब फट गया हो। उन धमाकों की अवाज सुनकर तो एक पल के लिए मैं भी बुरी तरह से डर गई थी। लेकिन जैसे ही मैं होश में आई तो मैं दौडकर उस खाई की तरफ चलई गई। जहाँ मैंने देखा की कार पूरी तरह से टूट-फूट चुकी थी और कार के चारों चरफ तेजी से आग फैल चुकी थी। यह नजारा देखकर मुझे पूरा यकीन हो चुका था कि अब उस लड़की की लाश जलकर पूरी तरह से राख हो जायेगी। यहाँ तक की अब उस लाश का डी.एन.ए. मिलना भी पूरी तरह से असंभव है।
उस हादसे को देखकर अचानक से मेरी आँखों में आँशू झलक आए। क्योंकि अब मैं अपनी पुरानी जिंदगी में फिर कभी बापिस नहीं जा सकती थी। अब दुनिया की नजरों में निशा गुप्ता मर चुकी थी। मैं अभी उस कार को जलते हुए देख ही रही थी कि तभी मुझे हाईवे की तरफ से कुछ लोगों के आने की आवाज सुनाई दी। जिसे सुनकर मैंने तुरंत अपने आँशू पौंछे और वहाँ पर रखा अपना बैकपैक पीठ पर टांगकर झाडियों के पीछे छिप गई। जिसके कुछ ही देर में वहाँ पर अच्छी खासी भीड इक्ट्ठी हो गई थी। उस भीड का लाभ उठाते हुए मैंने अपने चेहरे पर मास्क लगाया और झाडियों से निकलकर भीड में शामिल हो गई।
मैं कुछ देर तक तो वहीं भीड के साथ खडे होकर उस कार को जलते हुए देखती रही, और फिर हाईबे की तरफ चल पडी। हाईवे पर पहुँचकर मैंने देखा कि वहाँ पर रोड किनारे कुछ एस.यू.वी. और कारें खडी हुईं हैं, साथ ही साथ वहाँ पर एक बस भी खडी हुई थी, जो दिल्ली की तरफ जा रही थी। शायद उस बस में से भी कुछ सबारियाँ नीचे खाई की तरफ चलीं गईं थीं और बाकी के लोग बस के बाहर हाईवे पर खडे होकर दूर से ही तमाशा देख रहे थे। तभी वहाँ खडी भीड में से किसी ने पुलिस को कॉल करके उस एक्सीडेंट के बारे में बता दिया। अब चूँकि मेरा वहाँ पर कोई काम नहीं बचा था। इसलिए मैं उस बस के अंदर जाकर बैठ गई।
कुछ देर तक चले इस तमाशे के बाद जब वहाँ खडी गाडियाँ एक एक करके अपने अपने रास्ते जाने लगीं, तो बस के पैसेंजर भी बापिस आकर अपनी अपनी सीट पर बैठ गए। सभी लोगों के बापिस आने के बाद वो बस भी फिर से दिल्ली की तरफ चल पडी। उस बस के अंदर पहले से ही कुछ सीटें खाली थीं। जिस कारण किसी को भी मुझपर शक नहीं हुआ था। आखिरकार बिना किसी प्राब्लम के रात करीब 12 बजे मैं दिल्ली जा पहूँची। जिसके बाद मैंने अपने लिए एक होटल रूम बुक किया और अपने रूम में जाकर सो गई। अगले दिन जब मेरी नींद खुली तो मैंने अपने रूम में ही काफी और नश्ता मंगवा लिया और फ्रैस होने के लिए बाथरूम में घुस गई।
जब तक मैं नहाकर तैयार हूई तब तक मेरी कॉफी और नाश्ता भी आ चुका था। इसलिए मैंने टी.बी. ऑन की और न्यूज देखते हुए नाश्ता करने लगी। कई न्यूज चैनल चेंज करने के बाद आखिरकार मुझे वो न्यूज मिल ही गई जिसकी मुझे तलाश थी। असल में मैं अपनी कार के एक्सीडेंट बाली न्यूज सर्च कर रही थी। जो इस वक्त एक लोकल न्यूज चैनल पर दिखाई जा रही थी। न्यूज चैनल में इस वक्त कार की जो हालत दिखाई दे रही थी। वो किसी जले हुऐ टीन के डिब्ले की तरह थी, जिसे देखकर साफ समझ आ रहा था कि उसके अंदर जो भी लाश थी, वो अब तक पूरी तरह से जल कर राख हो चुकी होगी।
कुछ देर बाद न्यूज पर जो फुटेज दिखाई गई उससे मेरा अंदाजा बिल्कुल सही साबित हुआ। न्यूज पर एक बुरी तरह से जली लाश दिखाई दे रही थी। जिसे लाश कहना भी गलत होगा। क्योंकि वो बस एक कंकाल था। फारेंसिक टीम को उस कंकाल में से किसी भी प्रकार का डी.एन.ए. नहीं मिला था। जिससे उस लाश की पहचान हो सके। जिस कारण अब पुलिस टीम उस कार की हेल्प से मरने बाले का पता लगाने की कोशिश कर रही थी। हाँलाकि कार की नम्बर प्लेट्स जलकर पूरी तरह से बेकार हो गईं थी। पर पुलिस टीम कार का चेचिस नम्बर पता करने में कामयाब रही थी।
इसके अलावा उस कंकाल की बॉडी पर मौजूद कुछ ज्वैलरी किस्मत से सही सलामत बच गई थी। जिससे पुलिस टीम ने अंदाजा लगाया था कि मरने बाली एक शादिशुदा औरत है। इसलिए पुलिस ने वो सारी ज्वैलरी संभालकर अपने पास रख ली थी। ताकि वो उस लाश की सिनाख्त के काम आ सकें। थोडी बहुत छानबीन और करने के बाद पुलिस टीम को कार में से कुछ अधजले डॉक्यूमेंट्स और मेरा मोबाईल फोन भी मिल गया था। साथ ही साथ पुलिस टीम को कार में से बालों का एक गुच्छा और थोडा सा सूखा हुआ खून भी मिल गया था। जो किसी तरह से जलने से बच गया था।
यह पुलिस के लिए एक बडी कामयाबी थी। क्योंकि उस बालों के गुच्छे और सुखे हुए खून से डी.एन.ए. निकालकर लाश की पहचान करना आसान था। असल में वो बाल और खून मेरा ही था, जिसे मैंने जानबूझकर उस कार में छोड दिया था। हाँलाकि मुझे उम्मीद तो नहीं थी कि वो आग में जलने से बच पाऐँगे। लेकिन अगर वो किसी तरह जलने से बच गए तो फारेंसिक टीम उनसे डी.एन.ए. निकाल कर यह कन्फर्म कर सकती थी कि वो लाश मेरी ही है। यहाँ पर किस्मत ने मेरा साथ दिया था। क्योंकि जब कार खाई में गिरी थी तो मेरा हैण्ड बैग लुडकता हुआ ठीक उस जगह आकर गिरा था, जहाँ पर मैंने अपने बालों का गुच्छा और अपना ब्लड सेंपल छोडा था।
चूँकि मेरा हैँडबैग हाईब्रिड मटेरियल से बना था। इसलिए वो उस आग में पूरी तरह से जलने से बच गया था और उसके साथ साथ मेरे बाल और मेरे ब्लड का सेंपल भी जलने से बच गया था। कुछ देर और वह न्यूज देखने के बाद मैंने टी.बी. बंद कर दी, क्योंकि मैं जान चुकी थी कि पुलिस अभी तक डैड बॉडी की पहचान नहीं कर पाई है। पर मुझे पूरा यकीन था कि वो जल्दी ही कार के मालिक का पता लगा लेगी और उसके बाद पुलिस को मेरे बारे में भी सब कुछ पता चल ही जाऐगा। लेकिन फिलहाल मेरे पास करने के लिए कुछ भी नहीं था। इसलिए मैं तैयार हुई और अपने चेहरे पर मास्क लगाकर होटल रूम से बाहर निकल गई।
कहानी जारी है......