Fantasy 'सुप्रीम' एक रहस्यमई सफर - Page 40 - SexBaba
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Fantasy 'सुप्रीम' एक रहस्यमई सफर

#202.

गुप्त द्वार: (9 दिन पहले...... 13.01.02, रविवार, सीनोर राज्य की सीमा, मायावन, अराका द्वीप)

अलबर्ट टेरोसोर से बचने के बाद एक सूखे कुंए में जा गिरा था, जहां मौजूद एक बिल्ली जैसी देवी वाली प्रतिमा के हाथ में एक सुनहरी धातु का पात्र था।

अलबर्ट ने इस पात्र में मौजूद दिव्य जल को पीकर, देवी के हाथ में पहना ब्रेसलेट भी उतारकर अपने हाथ में पहन लिया था।

पर जब यह सब करने के बाद भी अलबर्ट के शरीर में कोई बदलाव नहीं हुआ, तो निराश हो अलबर्ट उस सूखे कुंए से निकलने का रास्ता ढूंढने लगा।

पर आज एक दिन बीत जाने के बाद भी, अलबर्ट उस सूखे कुंए से निकलने का रास्ता ढूंढ नहीं पाया था।

पर आश्चर्य की बात थी, कि एक दिन बीत जाने के बाद भी अलबर्ट को ना तो भूख महसूस हो रही थी और ना ही प्यास। उल्टा अलबर्ट इस समय अपने आपको बहुत तरोताजा महसूस कर रहा था।

“अगर यह गुफा किसी ने बनाई है, तो इस गुफा में आता-जाता तो जरुर होगा। इसका मतलब कि इस गुफा में कहीं ना कहीं कोई गुप्त मार्ग अवश्य होगा?" यह सोच एक बार फिर अलबर्ट, जोश के साथ गुफा की प्रत्येक वस्तु को ध्यान से देखने लगा।

पहले अलबर्ट ने सभी अर्द्धचंद्राकार पत्थरों को ध्यान से देखा, जिसमें से निकलकर महीन पानी के फव्वारे गिर रहे थे। पर अलबर्ट को उसमें कुछ भी खास नजर नहीं आया।

अब अलबर्ट वापस देवी की प्रतिमा के आगे आकर खड़ा हो गया। अलबर्ट की सूक्ष्म निगाहें देवी की मूर्ति को ध्यान से देखने लगीं।

तभी अलबर्ट की नजर उस पत्थर पर जाकर टिक गई, जिस पर देवी की मूर्ति खड़ी थी। उस पत्थर और जमीन के बीच अलबर्ट को बहुत बारीक सा रिक्त स्थान दिखाई दिया।

अलबर्ट ने उस रिक्त स्थान को देख देवी की मूर्ति को धीरे से हिलाया। अलबर्ट के हिलाते ही देवी की प्रतिमा, अपने स्थान पर घूम गई और एक तेज गड़गड़ाहट के साथ प्रतिमा के सामने की ओर, जमीन में एक रिक्त स्थान दिखाई देने लगा।

अलबर्ट ने उस रिक्त स्थान पर झांककर देखा, परंतु अंदर अत्यंत अंधेरा होने की वजह से, अलबर्ट को कुछ दिखाई नहीं दिया।

अब अलबर्ट ने उस रिक्त स्थान में अपना पैर लटकाकर देखा, तो अलबर्ट को अहसास हुआ कि नीचे कुछ सीढ़ियां बनी हैं। अलबर्ट अब उन सीढ़ियों के द्वारा नीचे की ओर उतरने लगा।

“पहले से ही कुएं में था, पता नहीं अब ये सीढ़ियां मुझे पाताल में ले जा रहीं हैं क्या? अलबर्ट मन ही मन बड़बड़ाया और अंधेरे में टटोलते हुए सीढ़ियां उतरने लगा।

लगभग 20 सीढ़ियां उतरने के बाद अलबर्ट को कुछ दूर एक धीमी सी रोशनी दिखाई दी।

"लगता है कि यह स्थान सिर्फ बिल्लियों के लिये ही बनाया गया है, क्यों कि बिल्लियां ही इतने अंधेरे में चल सकती हैं। यह सोच अलबर्ट किसी तरह से टटोलते हुए, उस धीमी रोशनी की ओर बढ़ने लगा।

कुछ ही देर में पत्थरों से टकराते हुए, अलबर्ट किसी तरह से उस रोशनी तक पहुंच गया।

वह रोशनी एक कमरे से आ रही थी, जिसकी चारो ओर की दीवारों में 4 दरवाजे बने थे। वह कमरा बिल्कुल खाली था।

एक दरवाजे से तो अलबर्ट आया ही था, अतः वह सामने के दरवाजे में प्रवेश कर गया। सामने वाला कमरा भी बिल्कुल वैसा ही था, जैसे कमरे से अलबर्ट अभी आया था। यह देख अलबर्ट इस बार बांई ओर वाले दरवाजे में प्रवेश कर गया।

लेकिन यह क्या? यह कमरा भी बिल्कुल पिछले कमरे की भांति ही था।

चारो ओर देखने के बाद, अब तो अलबर्ट यह भी भूल गया कि वह आया किस दरवाजे से था? अब अलबर्ट बार-बार अलग-अलग दरवाजों में प्रवेश करके देख रहा था, परंतु कुछ देर में अलबर्ट समझ गया, कि वह किसी प्रकार की भूल-भुलैया में है। इसलिये वह थककर एक स्थान पर बैठ गया और उस भूल-भुलैया से निकलने का कोई प्लान करने लगा।

तभी अलबर्ट की निगाह कमरे में, एक स्थान पर पड़े एक छोटे से कोयले के टुकड़े पर गई। कोयले को देख अलबर्ट के दिमाग में एक आइडिया आया।

अब उसने कोयले के टुकड़े को उठा लिया और जिस दरवाजे में घुसने चला, उसके बाहर कोयले के टुकड़े से एक क्रास का निशान बना दिया।

इस प्रकार अब वह जिस दरवाजे में घुसता, एक क्रास का निशान बनाता जा रहा था, ऐसा करने की वजह से अब वह एक ही दरवाजे में बार-बार नहीं घुस रहा था।

आखिरकार आधे घंटे की अपार मेहनत के बाद अलबर्ट, एक बड़े से कक्ष में निकला, जहां पर जरुरत की सभी चीजें उपस्थित थीं।

देखने से ही वह किसी राजा का शयनकक्ष प्रतीत हो रहा था। परंतु उस कमरे में एक ही द्वार था और वह द्वार वहीं था, जिससे होकर अलबर्ट इस कमरे में आया था।

यानि कि अलबर्ट एक बार फिर फंस गया था, क्यों कि अब इसके आगे कहां जाना था? यह उसे भी नहीं पता था।

अलबर्ट काफी देर तक उस कक्ष में बैठा, उस कक्ष की सभी चीजों को देखता रहा, फिर वह उठकर सभी दीवारों को अपने हाथों से ठोंक-ठोंककर देखने लगा। एक दीवार पर ठोंकते ही अलबर्ट की आँखें चमक उठीं।

दीवार से उभरने वाली आवाज से साफ स्पष्ट हो रहा था कि वह दीवार अंदर से खोखली है। अब अलबर्ट की निगाह उस दीवार पर टंगी एक फोटो की ओर गई, जिसमें एक राजा और एक रानी का चित्र बना था।

यह चित्र मुफासा और कागोशी का था। जी हां लुफासा के माता और पिता का।

अलबर्ट चित्र में उपस्थित किसी को भी पहचानता नहीं था। अब अलबर्ट ने उस चित्र को धीरे से हिलाकर उसके पीछे झांकने की कोशिश की, परंतु अलबर्ट के छूते ही, दीवार पर टंगा वह चित्र एक ओर को अपने आप घूम गया।

चित्र के घूमते ही उस दीवार में एक बड़ा सा दरवाजा दिखाई देने लगा। अलबर्ट ने उस दरवाजे को ध्यान से देखा और उस दरवाजे के पार निकल गया। दरवाजे के दूसरी ओर एक लंबी सुरंग थी।

अलबर्ट जैसे ही उस सुरंग में दाखिल हुआ, सुरंग की दीवारों पर लगी, मशालें अपने आप जल उठीं।

अलबर्ट अब लगातार उस सुरंग में बढ़ता जा रहा था। लगभग 20 मिनट तक चलते रहने के बाद, वह सुरंग एक पेड़ की बड़ी सी कोटर से होते हुए एक खुले स्थान पर निकली।

काफी देर के बाद खुली हवा मिलने से, अलबर्ट ने पहले खुल कर साँस ली और फिर अपने चारो ओर देखने लगा।

तभी अलबर्ट को वहां से कुछ दूर बने, 4 पिरामिड दिखाई दिये।

ऐसे वीरान जंगल में पिरामिड का दिखना अलबर्ट के लिये एक विचित्र अनुभव था, पर इससे पहले कि अलबर्ट उन पिरामिडों की ओर बढ़ पाता कि तभी उसके कानों में एक आवाज सुनाई दी।

"दोस्त का दोस्त मिल गया...दोस्त का दोस्त मिल गया।

अलबर्ट ने आवाज की दिशा में देखा, तो उसे हवा में उड़ता हुआ ऐमू दिखाई दिया, जो कि उसे देखकर काफी खुश हो रहा था।

"चलो कोई तो मिला बात करने के लिये?" ऐमू को देख अलबर्ट भी खुश हो गया।

अलबर्ट ने अब अपना हाथ हवा में आगे कर दिया, ऐमू आकर अलबर्ट के हाथ पर बैठ गया। अलबर्ट को याद आया कि ऐमू, युगाका के हमले की वजह से डरकर कहीं भाग गया था।

“तुम कहां चले गये थे ऐमू?" अलबर्ट ने ऐमू से पूछा।

“ऐमू, दूऽऽऽऽऽऽऽर....आसमान में गया...ऐमू को उड़ना अच्छा लगता।” ऐमू ने कहा।

“ऐमू क्या तुम्हें पता है कि बाकी सारे लोग कहां हैं?" अलबर्ट ने ऐमू की ओर देखते हुए पूछा।

“ऐमू सब-कुछ जानता...ऐमू से कुछ नहीं छिपा।' यह कहकर ऐमू एक दिशा की ओर उड़ चला।

अलबर्ट समझ गया कि ऐमू उसे कहीं ले जाना चाहता है? इसलिये वह ऐमू के पीछे-पीछे चल पड़ा।

ऐमू अलबर्ट को लेकर एक घनी झाड़ियों की ओर चल दिया। अलबर्ट ने अब अपने हाथ में एक बड़ी सी लकड़ी उठा ली थी, जिससे वह घनी झाड़ियों को काटता हुआ, आगे बढ़ने लगा।

ऐमू आगे बढ़ता हुआ, एक ऊंची सी चट्टान पर जाकर बैठ गया। कुछ ही देर में अलबर्ट भी उस चट्टान के पास पहुंच गया।

“यह ऐमू मुझे इस चट्टान के पास क्यों लाया? यहां तो कुछ भी नहीं है?" तभी अलबर्ट को उस चट्टान के पीछे से, एक जोड़ी विशाल पंख हिलते हुए नजर आये।

“यह कमीना ऐमू कहीं मुझे फिर से तो टेरोसोर के पास नहीं ले आया?" अलबर्ट ने ऐमू को घूरते हुए मन ही मन गाली दी।

पर वह अंजान पंख, अब अलबर्ट के लिये कौतूहल का विषय थे, इसलिये धीरे से अलबर्ट ने झांककर चट्टान के पीछे देखा।

वह अंजान पंख अकेले नहीं थे, उनके साथ एक शरीर भी था, जो कि निसंदेह ब्रूनो का था।

ब्रूनो को देख, अलबर्ट भागकर चट्टान के पीछे पहुंच गया। ब्रूनो के सिर पर बेर के समान फल गिरने की वजह से ब्रूनो के पंख निकल आये थे और वह उड़कर कहीं गायब हो गया था?

इस समय ब्रूनो का शरीर अपने साधारण आकार से, 3 गुना बड़ा नजर आ रहा था।

अलबर्ट ने ब्रूनो के शरीर को हिलाया, पर वह पूर्णतया बेहोश था। उसे देखकर ऐसा लग रहा था कि वह पिछले कुछ दिनों से यहां पर ऐसे ही पड़ा था।

तभी चट्टान पर बैठा ऐमू कहीं उड़कर चला गया? अलबर्ट ने एक बार उड़कर जाते हुए ऐमू को देखा और फिर ब्रूनो को जगाने की कोशिश करने लगा, पर ब्रूनो नहीं जागा।

“यहां तो आसपास कहीं पानी भी नहीं है, फिर इस ब्रूनो को किस प्रकार जगाऊं?" अलबर्ट ने चारो ओर देखते हुए कहा।

तभी अलबर्ट को ऐमू उड़कर वापस आता दिखाई दिया। इस समय ऐमू के मुंह में, कुछ पेड़ की पत्तियां दिखाई दे रहीं थीं।

ऐमू ने उन पत्तियों को अलबर्ट का पकड़ा दिया। अलबर्ट ने आश्चर्य से उन पेड़ की पत्तियों को देखा। उन पत्तियों से बहुत तेज एक अजीब सी गंध उठ रही थी।

कुछ सोच अलबर्ट ने उन पत्तियों को ब्रूनो की नाक के आगे कर दिया। पत्तियों की गंध सूंघते ही ब्रूनो उठकर बैठ गया।

ब्रूनो ने आँखें खोलकर इधर-उधर देखा, फिर अलबर्ट का हाथ चाटने लगा। यह देख अलबर्ट ने राहत की साँस ली।

अब अलबर्ट ने ऐमू को देखते हुए कहा- “अगर तुझे पता था कि ब्रूनो इन पत्तियों से होश में आ सकता है, तो अभी तक ऐसा क्यों नहीं किया?"

अलबर्ट की बात सुन ऐमू मूर्खों की तरह, अलबर्ट को पलकें झपकाकर देखने लगा, पर उसने कुछ कहा नहीं।

“ब्रूनो, क्या तुम शैफाली की गंध सूंघकर मुझे उसके पास ले चल सकते हो?" अलबर्ट ने ब्रूनो की ओर देखते हुए पूछा।

अलबर्ट की बात सुनकर ब्रूनो उठकर खड़ा हो गया। एक बार उसने अपने विशाल शरीर को देखा और फिर अपने पंख फड़फड़ाये।

इसके बाद वह अलबर्ट के पास आकर उसके पैरों से अपना शरीर रगड़ने लगा।

ब्रूनो को ऐसा करते देख अलबर्ट समझ गया कि ब्रूनो उसे अपने पर बैठने को कह रहा है।

अलबर्ट के लिये किसी कुत्ते की सवारी करना एक अलग ही अनुभव था, इसलिये वह रोमांचित होकर ब्रूनो पर बैठ गया।

अलबर्ट के ब्रूनो पर बैठते ही ऐमू उड़कर, अलबर्ट के कंधों पर बैठ गया। अब ब्रूनो ने अपने पंख जोर से फड़फड़ाये और उछलकर आसमान में उड़ने लगा।

कुछ ही देर में ब्रूनो एक ऐसे स्थान पर पहुंच गया, जहां जमीन से 5 फुट ऊपर हवा में एक ऊर्जा द्वार बना था। वह ऊर्जा द्वार बहुत हल्का था और ध्यान से देखने पर ही दिखाई दे रहा था।

उस ऊर्जा द्वार को देख अलबर्ट की आँखें सिकुड़ गईं। उसे समझ नहीं आ रहा था कि यह किस प्रकार का ऊर्जा द्वार है और यह कहां जाकर खुलता है?

तभी अलबर्ट के देखते ही देखते ब्रूनो, अलबर्ट व ऐमू सहित उस ऊर्जा द्वार के अंदर प्रवेश कर गया।

वह ऊर्जा द्वार एक विशाल सुरंग में खुला। अलबर्ट को उस ऊर्जा द्वार के मुहाने पर एक विचित्र जीव पड़ा हुआ दिखाई दिया।

वह जीव कई जानवरों का मिला-जुला रुप दिख रहा था।

उस जानवर का शरीर 6 फुट ऊंची, एक विशाल बिल्ली की तरह दिख रहा था, उसके सिर पर कुछ अजीब से पंखों का ताज जैसा लगा दिखाई दे रहा था।

उसके शरीर पर मछली के समान गलफड़ बने थे, जिसे देखकर साफ पता चल रहा था कि वह जीव पानी में भी आसानी से साँस ले सकता है।

उस जानवर की पूंछ पीछे से किसी झाडू के समान थी। उसने अपने गले में धातु के लॉकेट में एक पीले रंग का रत्न पहन रखा था।

यह जीव और कोई नहीं अपितु गोंजालो था, जो व्योम से युद्ध के बाद जख्मी हालत में ऊर्जा द्वार के माध्यम से भागा था, परंतु गोंजालो के ऊर्जा द्वार की फ्रीक्वेंसी, तिलिस्मा के गुप्त द्वार की फ्रीक्वेंसी से मैच हो जाने की वजह से वहां पहुंच गया था।

अलबर्ट ने आज तक किताबों में भी कभी ऐसा जीव नहीं देखा था। इसलिये उसने ब्रूनो को जमीन पर उतरने का इशारा किया।

इशारा पाकर ब्रूनो उस ऊर्जा द्वार की सख्त सी जमीन पर उतर गया।

“बड़ा बिल्ला...बड़ा बिल्ला।” गोंजालो को देखकर ऐमू जोर से चिल्लाया।

अलबर्ट अब उतरकर धीरे-धीरे गोंजालो के पास जा पहुंचा। गोंजालो काफी घायल अवस्था में था और जोरजोर से कराह रहा था।

पर इससे पहले कि अलबर्ट गोंजालो के लिये कुछ कर पाता कि तभी अलबर्ट को उस ऊर्जा द्वार के बाहर से किसी के कदमों की आहट सुनाई दी।

यह सुन अलबर्ट ने धीरे से झांककर बाहर की ओर देखा, तो उसे एक अजीब सा भेड़िया मानव उसी ओर आता दिखाई दिया, जिसके हाथ में किसी प्रकार का यंत्र था।

वह भेड़िया मानव वुल्फा था, जो कि उन अजीब से सिग्नल को ढूंढता हुआ वहां तक आ पहुंचा था।

वुल्फा को देख, अलबर्ट ने ब्रूनो और ऐमू को चुप रहने का इशारा किया और स्वयं ऊर्जा द्वार की दीवार से चिपककर खड़ा हो गया।

तभी वुल्फा ने उस ऊर्जा द्वार के अंदर झांककर देखा, पर अंदर अंधेरा होने की वजह से वुल्फा को कुछ दिखाई नहीं दिया।

कुछ नजर ना आते देख वुल्फा ने अपना हाथ उस ऊर्जा द्वार के अंदर डाल दिया। वुल्फा का हाथ गोंजालो से टकराया, जिसे वुल्फा ने अपने हाथों से पकड़कर बाहर की ओर खींच लिया।

'धम्म' की आवाज करता, गोंजालो का शरीर उस ऊर्जा द्वार से बाहर जा गिरा।

तभी अलबर्ट को ऊर्जा द्वार के अंदर की ओर से, कुछ खटके की आवाज सुनाई दी, जिसे सुन अलबर्ट, ब्रूनो और ऐमू के साथ ले एक बड़े से पत्थर के पीछे छिप गया।

कुछ ही देर में अलबर्ट को ऊर्जा द्वार के अंदर से एक विचित्र जीव निकलकर आता हुआ दिखाई दिया।

वह विचित्र जीव 8 फुट लंबा था, उसकी 3 आँखें थीं और 4 हाथ थे। उसकी पीठ पर कछुए के समान एक कवच लगा हुआ था। उसके पैर और हाथ के पंजे किसी स्पाइना सोरस की तरह बड़े थे।

उसकी बलिष्ठ भुजाओ को देखकर साफ पता चल रहा था, कि उसमें असीम ताकत होगी। उसके हाथों में कोई अजीब सी गन के समान मशीन थी।

वह विचित्र जीव, उनके पास से झूमता हुआ, ऊर्जा द्वार से बाहर की ओर निकल गया। उस विचित्र जीव के बाहर निकलते ही वह ऊर्जा द्वार बंद हो गया।

अब अलबर्ट, ब्रूनो और ऐमू के साथ उस सुरंग से अंदर की ओर चल दिया।

कुछ देर के बाद अलबर्ट को सुरंग का रास्ता समाप्त होते हुए दिखाई दिया।

अलबर्ट ने पहले धीरे से बाहर की ओर झांका। पर बाहर का नजारा देखकर अलबर्ट पूरी तरह से हैरान हो गया।

वह एक बहुत विशालकाय कमरा था। उसे देखकर ऐसा लग रहा था कि जैसे किसी पहाड़ को अंदर से खोखला करके, उस कमरे को बनाया गया हो या फिर वह कोई विशालकाय पिरामिड हो?

उस कमरे में किनारे-किनारे पत्थरों से फ्लोर बनाया गया था। उस फ्लोर के बीचो बीच एक विशाल पानी का हौज दिखाई दे रहा था।

एक नजर में वह हौज, कोई बहुत बड़ा स्विमिंग पूल जैसा नजर आ रहा था।

कमरे में चारो तरफ सुरंग जैसे कई रास्ते बने थे। उन्हीं में से एक रास्ते से वह वहां तक पहुंचे थे।

तभी अलबर्ट की निगाह उस हौज के किनारे सो रही एक विशाल ब्लू व्हेल पर पड़ी।

"बाप रे, यह कौन सी जगह है? यह जगह तो बहुत ही खतरनाक लग रही है?" अलबर्ट ने उस जगह को देखते हुए सोचा- “यह जगह तो किसी हॉलीवुड की, विज्ञान पर आधारित फिल्म का एक सेट लग रही है। और...और यह ब्लू व्हेल कैसे यहां सो रही है?"

तभी ब्रूनो धीरे-धीरे उस ब्लू व्हेल की ओर बढ़ा और आगे बढ़कर उस ब्लू व्हेल को सूंघने लगा, पर उसके इस प्रकार सूंघने के बाद भी ब्लू व्हेल नहीं उठी।

यह देख अलबर्ट भी डरता-डरता उस ब्लू व्हेल के पास आ गया।

थोड़ा और पास जाने पर अलबर्ट को उस ब्लू व्हेल का पेट एक जगह से कटा हुआ दिखाई दिया। जहां पर एक दरवाजा लगा हुआ था।

“यह क्या?...यह तो नकली व्हेल है…. नहीं-नहीं शायद यह कोई पनडुब्बी है जो ब्लू व्हेल की शक्ल में है। पर यह तो बिल्कुल सजीव जैसी दिख रही है। क्या मैं किसी और दुनिया में पहुंच गया हूं? या फिर किसी प्रकार से भविष्य में आ गया हूं? क्यों कि यह तकनीक तो बहुत ही आधुनिक महसूस हो रही है।“

अब अलबर्ट का ध्यान उन बाकी सुरंगों की ओर गया। अलबर्ट उनमें से एक सुरंग के अंदर प्रवेश कर गया।

वह सुरंग जिस जगह निकली, उसे देखकर अलबर्ट हैरान रह गया। वह कमरा एक आधुनिक प्रयोगशाला लग रहा था। उस प्रयोगशाला के मध्य में एक खूबसूरत सी परी की मूर्ति खड़ी थी।

यह मूर्ति देखने में बिल्कुल सजीव प्रतीत हो रही थी। परी के शरीर पर बैंगनी रंग की एक बहुत ही खूबसूरत ड्रेस थी।

उसने अपने हाथ में एक लंबा सा राजदंड भी पकड़ रखा था। उस परी के शरीर पर, बहुत से तार लगे हुए थे, जो कि एक मशीन से जाकर जुड़े हुए थे।

अलबर्ट अब उस मशीन को ध्यान से देखने लगा। उस मशीन पर अलग अलग रंग के बटन लगे थे।

तभी ऐमू ने बिना कुछ समझे एक बटन को दबा दिया।

“अरे-अरे ऐमू, यह क्या कर रहे हो? यहां की किसी भी चीज को हाथ मत लगाओ क्यों कि हमें तो यह भी नहीं पता कि यह सब चीजें हैं क्या?” अलबर्ट ने ऐमू को रोकते हुए कहा।

अब अलबर्ट की निगाह उस बटन पर गई, जिसे अंजाने में ही ऐमू ने दबा दिया था। उस बटन पर 'फीलींग' लिखा हुआ था।

ऐमू के बटन दबाते ही एक मशीन सक्रिय हो गई और उसने ना जाने उस मूर्ति में क्या किया? पर उसकी वजह से मूर्ति में किसी भी प्रकार का बदलाव नहीं हुआ? यह देख अलबर्ट ने राहत की साँस ली।

अब अलबर्ट उस कमरे से निकलकर वापस सुरंग में आ गया और सुरंग के एक नये रास्ते पर चल दिया।

वह रास्ता एक महल में निकल रहा था।

महल के बीचो बीच एक शानदार पानी का फव्वारा चल रहा था। उस फव्वारे के चारो ओर बहुत से कमरे बने थे, पर वहां पर कोई भी नजर नहीं आ रहा था।

अब अलबर्ट एक-एक कमरे में झांक कर देखने लगा। कोई कमरा बेडरुम जैसा लग रहा था, तो कोई किचन जैसा। एक कमरे में तो किताबें ही किताबें भरी हुई थीं।

वहां देखकर साफ पता चल रहा था कि इस क्षेत्र में कोई एक ही आदमी रहता है और वो भी इस समय यहां से कहीं गया है?

एक कमरे में जैसे अलबर्ट ने झांका, वह हैरान रह गया। उस कमरे में चारो तरफ स्क्रीन ही स्क्रीन लगी थी। हर स्क्रीन पर अलग वीडियो चलती दिख रही थी। अधिकतर वीडियो जंगलों के थे।

उस कमरे का दरवाजा छोटा था, जिससे ब्रूनो अंदर दाखिल नहीं हो सकता था, इसलिये अलबर्ट ने ब्रूनो को वहीं रहने का इशारा किया और स्वयं ऐमू के साथ अंदर की ओर आ गया।

तभी अलबर्ट को अपने पीछे एक आहट सुनाई दी, आहट सुन अलबर्ट पलटा, तो उसने देखा कि पता नहीं किस प्रकार से ब्रूनो ने अपने शरीर को, वापस पहले जैसे आकार में कर लिया था? हां ये बात और थी कि उसके शरीर पर अभी भी पंख मौजूद थे।

अलबर्ट यह देख आश्चर्य में पड़ गया, तभी उसका ध्यान वापस से कमरे में लगी स्क्रीन की ओर चला गया।

उन स्क्रीन को देखकर ऐसा लग रहा था, कि किसी जंगल में हजारों वीडियो कैमरे लगे हुए हों?

"दोस्त मिल गया दोस्त मिल गया।” तभी ऐमू चिल्लाते हुए एक स्क्रीन के पास उड़ने लगा।

अब अलबर्ट की नजर ऐमू की आवाज का पीछा करते हुए, एक वीडियो पर जाकर रुक गयी, उस वीडियो में उसे सुयश सहित सभी लोग एक विशाल बर्फ के ड्रैगन से लड़ते हुए दिखाई दिये।

“यह क्या? इसका मतलब मैं किसी और स्थान पर नहीं बल्कि उसी रहस्यमय द्वीप के ही किस गुप्त स्थान पर हूं? और कोई यहां बैठकर इस रहस्यमय द्वीप की निगरानी करता है?"

तभी अलबर्ट को एक किनारे रखी हुई, एक आदमकद मशीन दिखाई दी। उस मशीन पर एक छोटा सा प्लेटफार्म बना था। उसके सिर वाली जगह पर कोई कैमरे जैसी चीज बिल्कुल किसी बाथरुम के शावर की तरह लग रही थी।

उस मशीन पर बहुत से अलग-अलग रंग के बटन भी लगे थे। ब्रूनो उस मशीन को देखकर उस पर अपने पंजे मारने लगा।

अलबर्ट को ब्रूनो का यह अंदाज कुछ रहस्य से भरा लगा, इसलिये वह उस मशीन के प्लेटफार्म पर चढ़कर उसे ध्यान से देखने लगा।

देखते-देखते अलबर्ट ने उस मशीन पर लगे एक नीले बटन को दबा दिया। बटन को दबाते ही ऊपर लगे कैमरे जैसे यंत्र से एक नीले रंग की तेज रोशनी निकलकर कमरे में फैल गई और अलबर्ट, ब्रूनो और ऐमू के ऊपर जाकर पड़ी।

उस रोशनी के गिरते ही अलबर्ट को अपना शरीर लाखों टुकड़ों में बंटता हुआ सा महसूस हुआ। उसे ऐसा लगा जैसे उसका शरीर किसी अंधे कुएं में गिर रहा हो।

जारी रहेगा______✍️
 
Ajju Landwalia भाई किधर गायब हो??
 
Napster :डेड: इतने दिन से गायब हो भाई ??
 
अगला अपडेट आज शाम :डिक्लेअर:
 
#203.

चैपटर-10

स्वादेन्द्रिय: (तिलिस्मा 5.41)

सुयश, शैफाली, जेनिथ और क्रिस्टी कान के तिलिस्म को पार करके जीभ वाले द्वार में प्रविष्ठ हो गये। पर वह द्वार देखने में ही बहुत अनोखा लग रहा था।

द्वार के सामने ही एक पक्की और चौड़ी सड़क बनी थी। उस सड़क पर एक बहुत ही शानदार, सोने का रथ खड़ा था, जिसके आगे 4 सुनहरे रंग के घोड़े लगे थे। रथ के आगे वाली ओर एक सारथि भी बैठा था।

रथ किसी पौराणिक काल के दिव्य रथ की भांति प्रतीत हो रहा था। सारथि ने काले रंग के कपड़े पहन रखे थे।

“यह सब क्या है? यहां तो रथ के सिवा और कुछ है ही नहीं।” जेनिथ ने चारो ओर देखते हुए कहा।

“हमें इसी रथ का प्रयोग करके 40 कलोमीटर दूर तक जाना है।” सुयश ने सड़क के दूसरी ओर लगे एक बोर्ड को दिखाते हुए कहा- “वो देखो, वहां एक बोर्ड लगा है।”

सामने बोर्ड पर लिखा था- “तिलिस्मा द्वार 5.5, दूरी 40 किलोमीटर, उत्तर दिशा।"

सुयश रथ के पास पहुंच, उस पर बैठे सारथि की ओर देखने लगा। सुयश को इस प्रकार देखते पाकर, सारथि ने सुयश को रथ में बैठने का इशारा किया।

सुयश सभी को लेकर उस रथ में बैठ गया। सभी के बैठते ही सारथि रथ को लेकर उत्तर दिशा की ओर चल दिया।

रथ ऊपर की ओर से बिल्कुल खुला था। रथ के अंदर दोनो ओर आरामदायक सीटें लगीं थीं।

सड़क पर किसी भी प्रकार के गड्ढे नहीं थे, इसलिये रथ बिना किसी प्रकार का झटका दिये आगे बढ़ रहा था। सभी बिना किसी से कुछ बोले अपनी ही यादों में गुम थे।

सभी को काफी देर तक चुप देख आखिरकार सुयश बोल उठा- “शैफाली क्या तुम बता सकती हो कि तुमने कैस्पर को क्या संदेश दिया है?

“नहीं कैप्टेन अंकल, हमारी सारी बातें कैश्वर सुन लेता है, अगर हमने कैस्पर को कही पहेली के बारे में बताया तो कैश्वर उसे कभी होने नहीं देगा? इसलिये मैं आपसे क्षमा चाहती हूं कैप्टेन।"

सुयश एक पल में ही शैफाली की बात का अभिप्राय समझ गया, इसलिये उसने इस विषय पर बात करना उचित नहीं समझा।

“वैसे कैप्टेन, आपकी स्मृतियां वापस आ जाने के बाद आपकी कौन-कौन सी शक्तियां वापस मिल गईं?" क्रिस्टी ने सुयश से पूछा।

“बहुत सी शक्तियां हैं मेरे पास, परंतु उनमें से एक भी इस तिलिस्मा में काम नहीं करेंगी। इसलिये सारी शक्तियों को मैं तुम लोगों को तिलिस्मा से निकलने के बाद दिखाऊंगा।” सुयश ने कहा- “लेकिन आर्यन की कहानी जानने के बाद मुझे ऐसा लग रहा है कि जैसे मैं आर्यन के आगे कुछ भी नहीं हूं। आर्यन ने अपनी पूरी जिंदगी में बहुत से अनोखे और साहसिक कार्य किये थे, जबकि मैं तो सिर्फ एक साधारण इंसान की तरह ही रहा हूं। पता नहीं मैं आर्यन की इन विचित्र शक्तियों का वहन उचित प्रकार से कैसे कर पाऊंगा?"

"कैप्टेन अंकल..., यह सब समय व काल पर निर्भर करता है।" शैफाली ने कहा- “अब क्या मैं कभी मैग्ना की बराबरी कर सकती हूं?....नहीं ! पर फिर भी मैं मैग्ना की तरह बनने की कोशिश कर रहीं हूं, क्यों कि मुझे उसकी हर एक बात के बारे में पता है। ठीक उसी प्रकार पहले आप भी सिर्फ सुयश ही थे, परंतु अब जब आपके पास आर्यन की पूरी स्मृतियां आ गईं हैं, तो साधारणतया आप आर्यन की तरह ही सोचेंगे और लगातार इसी तरह सोचते रहने के कुछ समय बाद, आप पूर्णरुप से आर्यन में परिवर्तित हो जायेंगे।"

अभी ये लोग बात कर ही रहे थे कि तभी सारथि ने रथ को एक स्थान पर रोक दिया।

"क्या इतनी जल्दी हम 40 किलोमीटर आ गये? अभी तो हमें चले हुए मात्र आधा घंटा ही बीता है।' जेनिथ ने बाहर की ओर देखते हुए कहा।

तभी क्रिस्टी की निगाह एक बोर्ड पर पड़ी, जहां पर लिखा था- “प्रथम विश्राम, तिलिस्मा 5.4, दूरी 30 किलोमीटर, उत्तर दिशा।

“लगता है कि हमें यहां कुछ देर रुक कर आगे बढ़ना है?" क्रिस्टी ने सभी को बोर्ड की ओर दिखाते हुए कहा।

"सावधान दोस्तों, ध्यान रखना कि हम किसी साधारण यात्रा पर नहीं हैं?” सुयश ने सभी को सावधान करते हुए कहा- “हम इस समय तिलिस्मा में हैं और यह पहला विश्राम अवश्य ही हमारे लिये कोई खतरा या कार्य लेकर आया है? इसलिये सभी लोग पूरी तरह से सावधान रहना।" यह कहकर सुयश रथ से उतरकर नीचे आ गया।

सुयश के साथ-साथ क्रिस्टी, जेनिथ और शैफाली भी नीचे आ गये।

“इस स्थान पर तो कुछ भी नहीं है?" शैफाली ने कहा- “सड़क के दोनों ओर बस गन्ने के खेत ही नजर आ रहे हैं।”

शैफाली की बात सुन, सुयश चलता हुआ सारथि के पास पहुंचकर उससे पूछने लगा- “क्या तुम बता सकते हो कि यहां किस प्रकार का कार्य करना है?"

सुयश की बात सुन सारथि ने कुछ कहा नहीं, पर उंगली उठाकर एक ओर इशारा किया।

सुयश ने सारथि के इशारे की ओर नजर उठा कर देखा, तो उसे दूर गन्ने के खेत में एक हवा में लहराता हुआ गुब्बारा दिखाई दिया।

सुयश ने इशारे से सबको अपने पीछे आने को कहा और गुब्बारे की दिशा में चल दिया।

खेतों से होकर गुजरते हुए सभी गुब्बारे के पास पहुंच गये। गुब्बारे पर एक हाथी का चित्र बना हुआ था।

"सावधान! इस खेत में हाथी या फिर हाथियों का झुण्ड हो सकता है?” सुयश ने सभी को चेतावनी देते हुए कहा।

तभी उन्हें खेत के बीचो बीच एक बड़ा सा स्थान दिखाई दिया, जिसके बीच में 1,000 वर्ग मीटर का एक पानी का कुंड बना था। वह कुंड गोलाकार आकृति लिये हुए था।

उस कुंड के 2 साइडों पर 2 बड़े से रिंग बने थे। एक स्थान पर एक छोटे से खंभे पर एक सन डायल क्लॉक लगी थी। (सन डायल क्लॉक सूर्य की किरणों के द्वारा समय बताती है)

कुंड के एक ओर एक हाथी की मूर्ति भी बनी थी। कुंड से लेकर हाथी तक एक पतली सी नाली जैसी बनी थी। उसे देखकर ऐसा लग रहा था कि जैसे कुंड का पानी, उस नाली के रास्ते होकर हाथी तक जाता हो?

“ये सब क्या है कैप्टेन?” क्रिस्टी ने सुयश की ओर देखते हुए कहा- “आपको कुछ समझ में आ रहा है क्या?"

लेकिन इससे पहले कि सुयश क्रिस्टी की बात का कुछ जवाब देता, शैफाली बीच में ही बोल पड़ी- “हम लोगों ने जब कान का तिलिस्म पार किया था, तो उसके बाद हम जीभ वाले तिलिस्म में घुसे थे। अब अगर हम जीभ की बनावट की बात करें, तो जीभ पर मुख्यतः 4 प्रकार की स्वादेन्द्रियां (टेस्ट बड्स) पाई जाती हैं- मीठा, नमकीन, खट्टा और कड़वा।

“हमको लाने वाले रथ को भी इस हिसाब से ही 40 किलोमीटर चलना है। अब अगर हम सारी चीजों को जोड़ दें, तो इस समय हम जीभ के मीठी स्वादेन्द्रिय पर हैं। अब जरा ध्यान से इस पूरे स्थान को देखिये,

"यह कुंड का स्वरुप एक कड़ाही के समान है। कुंड के दोनों ओर मौजूद रिंग कड़ाही के कुण्डे की भांति हैं। कुंड के चारो ओर गन्ने के खेत हैं। गन्ने अपने मीठेपन के लिये पूरी दुनिया में प्रसिद्ध हैं। गन्ने से ही हम चीनी का निर्माण करते हैं। तो मुझे सीधे-सीधे यह समझ में आ रहा है कि अवश्य ही हमें इस कड़ाही में किसी प्रकार की मिठाई का निर्माण करना है?"

शैफाली के शब्द सुन सभी उसे ऐसे निहार रहे थे, जैसे कि दूसरी दुनिया का कोई जीव हो और निहारते भी क्यों ना? जिस पहेली को उन्होंने अभी आकर देखा था, उसे शैफाली ने चुटकियों में हल कर दिया था।

"ठीक है, तो अब हम पहले यह देखते हैं कि किसी भी प्रकार की मिठाई को बनाने के लिये हम किस-किस चीज की आवश्यकता होती है?” सुयश ने कहा- “पहले किसी भी प्रकार की मिठाई को बनाना पड़ता है और फिर उसे डुबाने के लिये हमें चीनी के शीरे (चाशनी) की जरुरत होती है। अब इस कड़ाही और इसमें उपस्थित पानी को देखकर साफ लग रहा है कि यह शीरा बनाने वाला संयंत्र है। यानि मिठाई बनाने का स्थान जरुर इस खेत में किसी दूसरी जगह पर है? तो हममें से 2 लोग यहां रुककर शीरा बनाने का कार्य शुरु करें और बाकी के 2 लोग इस खेत में घूमकर मिठाई बनाने वाली जगह को ढूंढने की कोशिश करें। इस प्रकार 2 टीम में काम करने से हमारा समय बच जायेगा।"

“ठीक है, तो मैं क्रिस्टी दीदी के साथ जाकर खेत घूमकर आती हूं, तब तक आप और जेनिथ दीदी इस शीरे को बनाना शुरु करें, क्यों कि कुंड में मौजूद पानी की मात्रा को देखकर साफ पता चल रहा है कि यह कार्य बहुत लंबा चलने वाला है।" शैफाली ने कहा और क्रिस्टी को लेकर खेत के दूसरी ओर चल दी।

"तो हम अपने काम की शुरुआत कहां से करें कैप्टेन?” जेनिथ ने सुयश को देखते हुए कहा।

"हमारे पास पानी और कड़ा ही तो है, अब हमें पा नी को गर्म करने के लिये सबसे पहले आग की आवश्यकता है।” सुयश ने कहा। सुयश की बात सुनकर जेनिथ घूमकर उस कुंड के आसपास देखने लगी।

“कैप्टेन इस कुंड के चारो ओर यह नीले रंग का कांच क्यों लगा है? क्या इसमें कुछ खास है?" जेनिथ ने कांच की ओर इशारा करते हुए कहा।

जेनिथ की बात सुन, सुयश बैठकर ध्यान से उस काँच को देखने लगा।

“यह किसी प्रकार का आधुनिक सोलर पैनल लग रहा है?” सुयश ने कहा- “इसका मतलब इस कड़ाही को आग से नहीं बल्कि सूर्य की ऊर्जा से चलाना है।

“पर कैप्टेन इस समय तो शाम होने वाली है, अगर यह सूर्य की ऊर्जा से चलता, तो इस पूरे कुंड का पानी, हमें पहले से ही गर्म मिलता।” जेनिथ ने दिमाग पर जोर डालते हुए कहा।

“मुझे लगता है कि इस पूरे संयंत्र को शुरु करने के लिये किसी प्रकार का बटन होना चाहिये?" यह कहकर सुयश फिर से उस कुंड के आसपास देखने लगा। तभी उसकी नजर सनडायल क्लॉक पर पड़ी।

सुयश चलता हुआ सनडायल क्लॉक के पास जा पहुंचा और ध्यान से उसे देखने लगा। कुछ सोच सुयश ने सनडायल क्लॉक के ऊपर लगे धातु के हैंडिल को नीचे की ओर दबा दिया।

हैंडिल के दबते ही कुंड के चारो ओर लगे सोलर पैनल, अपने स्थान से थोड़ा ऊंचे उठकर सूर्य की ओर घूम गए।

"सोलर पैनल तो ऑन हो गये, पर अब शाम होने वाली है, ऐसी स्थिति में यह कार्य हम कल सूर्य निकलने पर ही पूरा कर पायेंगे।” सुयश ने कहा।

तभी जेनिथ ने ना जाने क्या सोच सनडायल क्लॉक को हाथ से पकड़कर, घड़ी के चलने की विपरीत दिशा में घुमा दिया।

तभी चमत्कार हो गया। सूर्य जो अब पश्चिम में जाकर डूबने ही वाला था, वह घूमकर वापस पूर्व दिशा की ओर आ गया।

“अरे यह कैसे किया तुमने?” सुयश ने आश्चर्य से कहा- “अब तो वापस सुबह का समय हो चुका है और सूर्य अपने पूरे ताप से आसमान पर दिखाई देने लगा है। ऐसे तो कुंड का पानी जल्दी ही गर्म हो जायेगा। यह तो बहुत अच्छा हुआ....अब हमें शायद इस पानी को शीरे में बदलने के लिये गन्ने का प्रयोग करना पड़ेगा?" यह कहकर सुयश जेनिथ को लेकर गन्ने के खेत की ओर आ गया।

“कैप्टेन, गन्नों को ऐसे ही कुंड में डालने पर कुछ नहीं होने वाला?" जेनिथ ने कहा- “हमें किसी प्रकार से, इसका रस निकालना होगा।" तभी सुयश को खेत में कटे हुए गन्ने का एक विशाल अंबार दिखाई दिया।

"चलो कम से कम हमें गन्नों को काटने की जरुरत तो नहीं है, यहां पहले से काफी सारे गन्ने कटे हुए रखे हैं।” सुयश ने गन्नों के ढेर की ओर देखते हुए कहा।

जेनिथ ने गन्नों के कटे हुए ढेर की ओर देखा और उसमें से एक गन्ना खींचकर निकाल लिया।

जेनिथ के एक गन्ना खींचते ही, वहां रखे गन्नों का ढेर भरभरा कर नीचे गिर पड़ा। अब उस गन्नों के ढेर के नीचे से एक मशीन दिखाई देने लगी थी।

“अरे यह तो चीनी बनाने का एक छोटा सा संयंत्र है।” सुयश ने खुश होते हुए कहा- “जो कि किस्मत से ही हमें दिखाई दे गया। इसका मतलब हमें कुंड में गन्ने का रस नहीं बल्कि चीनी ही डालनी है।“

वह चीनी बनाने का संयंत्र भी सूर्य की ऊर्जा से चलने वाला निकला। सुयश ने उस संयंत्र का बटन दबाकर उसे शुरु करने की कोशिश की, पर वह नहीं चला।

“मुझे पता था कि कैश्वर ने अवश्य ही यहां भी कोई पहेली डाल रखी होगी?” सुयश ने मुंह बनाते हुए कहा और ध्यान से उस मशीन को देखने लगा।

कुछ देर तक संयंत्र को ऐसे ही देखते रहने के बाद सुयश बोल उठा- “इस संयंत्र को शुरु करने के लिये हमें एक लीवर की जरुरत होगी जेनिथ। अब हमें देखना होगा कि वह लीवर कैश्वर ने कहां छिपाकर रखा है?" अब सुयश और जेनिथ दोनों ही सभी जगह पर लीवर को ढूंढने लगे।

2 घंटे ऐसे ही बीत गये, पर उन्हें लीवर कहीं दिखाई नहीं दिया। उधर कुंड का पानी अब उबलने लगा था। पानी उबलने की आवाज सुन सुयश कुंड के पास आ पहुंचा और उबलते हुए पानी को देखने लगा।

तभी सुयश की निगाह कुंड की तली में पड़े एक लीवर पर गई।

“बेड़ा गर्क हो गया।” सुयश ने अपना सिर पकड़ते हुए कहा- “उस चीनी के संयंत्र का लीवर तो कुंड में ही पड़ा था, हमें पानी गर्म करने से पहले ही उस लीवर को निकाल लेना चाहिये था, पर अब तो बिना पानी को ठंडा किये उस लीवर को कुंड से नहीं निकाला जा सकता।"

"जितना हम लोग समय को बचाने की कोशिश कर रहे हैं, उतना ही हमारा समय और बर्बाद होता जा रहा है।" जेनिथ ने कहा। तभी क्रिस्टी और शैफाली भी सब तरफ से घूम कर लौट आईं।

“कैप्टेन अंकल, हमने आसपास का पूरा क्षेत्र देख लिया है। इस संयंत्र के जैसा दूसरा कुछ नहीं है आस पास? यानि की हमें मिठाई के लिये कुछ और ही सोचना होगा।" शैफाली ने कहा।

"इधर भी एक नई परेशानी खड़ी हो गई है" यह कहकर सुयश ने लीवर के बारे में क्रिस्टी और शैफाली को बता दिया।

शैफाली लीवर को देख काफी देर तक सोचती रही और फिर अचानक खुश होकर एक दिशा की ओर चल दी।

“यह कहां जा रही है?” सुयश ने बिना कुछ बताए जा रही शैफाली को देखा और फिर आराम से एक पत्थर पर बैठ गया।

सुयश को पता था कि अवश्य से शैफाली को उस खेत में कुछ दिखाई दिया था? जिसे वह लाने के लिये गई है।

सुयश का सोचना सही था। कुछ ही देर में शैफाली अपने हाथ में एक स्पेस सूट जैसी चीज लेकर वहां आ गई।

“ये क्या है?” सुयश ने आश्चर्य से उस सूट की ओर देखते हुए शैफाली से पूछा।

“जब हम खेत में घूम रहे थे, तो हमने खेत के बीच में एक स्केयरक्रो लगा देखा था। उस स्केयरक्रो का सूट हमें बहुत विचित्र लगा था, पर उस समय हमने उस पर ध्यान नहीं दिया था। पर लीवर को देख मुझे याद आया कि शायद उस स्केयरक्रो का सूट एस्बेस्ट्स से बना है। बस यही सोच मैं उसे लेने चली गई थी।" शैफाली ने कहा।

(स्केयरक्रोः पक्षियों को डराने के लिये, खेत में लगाया जाने वाला, एक कपड़े से बना गुड्डा, जिसे बिजूका और बजरठू नामों से भी जाना जाता है)

(एस्बेस्ट्सः कई प्रका र के खनिजों को मिलाकर बनाया जाने वाला एक पदार्थ, जिस पर आग का कोई प्रभाव नहीं पड़ता)

सुयश ने शैफाली को प्रशंसात्मक निगाहों से देखा और फिर शैफाली से वह सूट लेकर स्वयं पहनने लगा।

कुछ ही देर में सुयश ने उस सूट को अपने शरीर पर पहन लिया था।

सुयश ने अब उसके हेलमेट को भी अपने सिर पर लगाया और धीरे से कुंड के गर्म पानी में उतर गया।

शैफाली का सोचना बिल्कुल सही था, उस सूट को पहनने के बाद, सुयश को किसी भी प्रकार की गर्मी को कोई अहसास नहीं हो रहा था?

थोड़ी ही देर में सुयश उस लीवर को लेकर पानी के बाहर आ गया। सुयश ने जैसे ही उस सूट को उतारा, वह तुरंत गायब हो गया।

अब सुयश ने उस लीवर को चीनी वाले संयंत्र में लगा दिया। संयंत्र के एक ओर 2 कनस्तर भी रखे थे।

सुयश ने एक कनस्तर को संयंत्र के दूसरी ओर लगाया और पहली ओर से संयंत्र में गन्ने को डालना शुरु कर दिया।

कुछ ही देर में संयंत्र के दूसरी ओर से चीनी निकलकर कनस्तर में गिरने लगी।

अब जाकर सुयश की जान में जान आयी क्यों कि अब सिर्फ मेहनत का ही काम बचा था।

जेनिथ अब लगातार एक ओर से संयंत्र में, गन्ने डाल रही थी और सुयश दूसरी ओर से कनस्तर में भरकर चीनी कुंड में डाल रहा था।

ये तो अच्छा था कि तिलिस्मा में इन सभी को थकान का अहसास नहीं हो रहा था, नहीं तो अब तक दोनों की ही हालत खराब हो जानी थी।

संयंत्र को सही से काम करता देख, क्रिस्टी का ध्यान एक बार फिर मिठाई की ओर चला गया।

"कहीं ऐसा तो नहीं कि हमारे आसपास कहीं बनी-बनाई मिठाई हो, जिसे हमें बनाने की जरुरत ही ना हो, ऐसी स्थिति में उसका संयंत्र तो होगा ही नहीं।” क्रिस्टी ने कहा।

क्रिस्टी की बात सुन शैफाली ने एक बार फिर अपनी नजरें कुंड के आसपास दौड़ाईं। तभी शैफाली की नजर हाथी के बगल बने एक छप्पर पर पड़ी, जिस पर काले अंगूर की बेल दिखाई दे रही थी।

उस बेल में बहुत से काले अंगूरों के गुच्छे लगे थे। यह देख शैफाली उन अंगूरों के गुच्छे की ओर बढ़ गई।

शैफाली ने हाथ बढ़ाकर नीचे लटक रहे एक अंगूर के गुच्छे को तोड़ लिया। अब वह उसे ध्यान से देखने लगी।

वह काले अंगूर अन्य अंगूरों की अपेक्षा थोड़े गोल थे। कुछ सोच शैफाली ने एक अंगूर को गुच्छे से तोड़ लिया।

पर शैफाली ने जैसे ही अंगूर को गुच्छे से तोड़ा, उसका आकार बढ़कर फुटबॉल के समान हो गया।

यह देख शैफाली के चेहरे पर मुस्कान उभर आई। अब वह चलती हुई सुयश के पास आ पहुंची।

“कैप्टेन अंकल, यह काले अंगूरों का गुच्छा ही मिठाई है, जिसे कैश्वर ने अंगूर बनाकर, यहां छिपा कर रखा था। असल में यह अंगूर ना होकर गुलाब जामुन हैं।"

शैफाली ने सुयश की ओर वह फुटबॉलनुमा गुलाब जामुन बढ़ा दिया। उसे देख सुयश के भी चेहरे पर मुस्कान आ गई।

“ये कैश्वर भी ना, ना जाने कहां से इस प्रकार सोचता है?" जेनिथ ने कहा।

धीरे-धीरे दोपहर हो चली थी। कुंड भी अब पर्याप्त गरम हो चुका था और उसमें चीनी डालते-डालते शीरा भी तैयार हो गया था।

अब शैफाली ने अंगूर के गुच्छे से अंगूर तोड़-तोड़ कर कुंड में डालना शुरु कर दिया।

अंगूर कुंड में गिरते ही बड़े हो जा रहे थे। धीरे-धीरे पूरा कुंड फुटबॉल रुपी गुलाब जामुनों से भर गया।

“वाह, क्या दृश्य है? देखकर ही मजा आ गया।' क्रिस्टी ने कहा- “कैप्टेन, क्या हम भी एक गुलाब जामुन को खा सकते हैं?"

“खा लेना, पर पहले उस हाथी को ये खिला लेने दो, उसके बाद तुम भी खा लेना।” सुयश ने मुस्कुराते हुए कहा।

तभी गुलाब जामुन स्वयं से उस कुंड के बगल बनी नाली से होकर हाथी की ओर जाने लगे। जैसे ही पहला गुलाब जामुन हाथी के पास पहुंचा, हाथी की मूर्ति सजीव होकर गुलाब जामुन को खाने लगी।

धीरे-धीरे हाथी एक-एक कर सारे गुलाबजामुन खा गया।

“अरे एक तो छोड़ दे।” क्रिस्टी ने मुंह बनाते हुए कहा। उसका बस चलता तो वह हाथी से छीनकर एक गुलाब जामुन खा जाती। पर तिलिस्मा में ऐसा कुछ भी संभव नहीं था? अतः वह चुपचाप देखती रही।

पूरे गुलाब जामुन के खत्म होते ही, हाथी सहित वह पूरा मायाजाल गायब हो गया।

अब सभी एक बड़े से मैदान में खड़े थे। उस स्थान से सड़क बिल्कुल साफ नजर आ रही थी और साथ ही उनका रथ भी दिखाई दे रहा था।

सभी वापस से रथ की ओर चल दिये।

जारी रहेगा_____✍️
 
#204.

कैश्वर का जन्म: (23.01.2002, बुधवार, निर्माणशाला, अराका द्वीप)

निर्माणशाला अराका द्वीप को वो भाग था, जिसमें पहले कैस्पर और अब कैश्वर, बैठकर तिलिस्मा के सभी द्वारों का निर्माण करता था।

यह निर्माणशाला अराका द्वीप के गर्भ में स्थित थी, पहले इसके बारे में कैस्पर और मैग्ना के सिवा कोई नहीं जानता था।

परंतु कुछ दिन पहले व्योम, एक व्हेल का पीछा करते हुए इस स्थान को देख चुका था और अलबर्ट भी इसी स्थान से होकर तिलिस्मा में प्रवेश कर चुका था।

कैस्पर को यहां से गये 18 दिन बीत गये थे। अब इस पूरे क्षेत्र पर कैश्वर का अधिकार था।

कैश्वर एक वर्चुअल प्रोग्राम था, जो अपने कम्प्यूटर के ज्ञान से कैस्पर की बनाई सभी चीजों को नियंत्रित करता था।

इस समय निर्माणशाला के एक कक्ष में, बहुत सी स्क्रीने ऑन थीं। सभी पर कुछ ना कुछ डेटा चल रहा था।

उस कक्ष के बीचो बीच एक 6 फुट का काँच का कैप्सूल रखा था, जिससे निकलकर बहुत से तार, व पाइप, कक्ष में मौजूद कुछ मशीनों और स्क्रीनों से जुड़ी हुई थीं।

उस काँच के कैप्सूल में एक स्टील का, मानव आकृति लिये, हड्डियों का ढांचा रखा था। कैप्सूल के अंदर की ओर बहुत सी लेजर गन फिट थीं।

इस पूरे सेटअप के सामने 2 बड़ी सी स्क्रीन लगीं थीं, एक स्क्रीन पर पीले और एक स्क्रीन पर नीले रंग के जाल से 2 चेहरे बने दिखाई दे रहे थे, जो कि एक कम्प्यूटर प्रोग्राम की तरह से महसूस हो रहे थे।

कैप्सूल के बाहरी ओर एक टाइमर लगा था, जिस पर 15 मिनट का समय सेट था। अब पीले रंग वाली स्क्रीन से एक स्टार्ट की आवाज आई, इसी के साथ कैप्सूल के बाहर लगा टाइमर, कांउटडाउन की तरह से चलने लगा।

कांउटडाउन के शुरु होते ही, कुछ मशीनों में लगे पाइपों के द्वारा, अलग-अलग रंग के द्रव निकलकर कैप्सूल में प्रवेश करने लगे।

लगभग 8 मिनट के बाद पूरा कैप्सूल विभिन्न रंगों के द्रवों से पूरा भर गया। द्रव के भरते ही एक दूसरी मशीन ने कैप्सूल के ऊपर अलग-अलग किरणों की बौछार कर दी।

किरणों की बौछार की वजह से अब वह पूरा द्रव सूखना शुरु हो चुका था। लगभग 3 मिनट में ही उन किरणों ने पूरे द्रव को सुखाकर ठोस बना दिया।

अब कैप्सूल के अंदर स्थित लेजर गन ने उस ठोस भाग को काटकर आकार देना शुरु कर दिया।

कैप्सूल से निकला सारा वेस्ट, संक्शन पंप के द्वारा खिंचकर एक वेस्ट के डिब्बे में जा रहा था। कुछ ही देर में कांउटडाउन का टाइमर समाप्त हो गया, पर अब उस कैप्सूल में एक मानव शरीर दिखाई देने लगा था।

अब वह कैप्सूल खड़ा होकर खुल गया और छत पर लगे कुछ मशीनी हाथों ने, उस मानव शरीर को उठा कर दूसरी मशीन के आगे खड़ा कर दिया।

दूसरी मशीन में लगी ड्रिल्स ने उस मानव शरीर के चेहरे पर आँख, कान, नाक आदि फिट करना शुरु कर दिया।

एक मशीन ने उसके शरीर पर कुछ कपड़े फिट कर दिये। अब वह एक पूर्ण मानव शरीर दिख रहा था।

मशीनी हाथों ने एक बार फिर उस मानव शरीर को उठाया और इस बार उसे पीले रंग वाली स्क्रीन के सामने खड़ा कर दिया।

स्क्रीन के सामने खड़े होते ही, पीली स्क्रीन से एक तेज तरंगें निकलीं और उस मानव शरीर में समा गईं। अब वह मानव शरीर पूर्णरुप से जीवित हो गया था।

अब वह मानव शरीर नीली वाली स्क्रीन के पास पहुंचा और फिर धीरे से बोला- “मेरा नया रुप कैसा लग रहा है ज़ेनिक्स?"

“अद्भुत!” तुम्हारा नया रुप मुझे बहुत पसंद आया कैश्वर।” ज़ेनिक्स ने कहा- “अब तुम दिखने में पूरे मनुष्य के समान दिख रहे हो।

"कुछ भी कहो जेनिक्स, पर यह सब तुम्हारे बिना संभव नहीं हो पाता" कैश्वर ने कहा- “मेरे पास क्षमताएं तो बहुत थीं, पर मैं अपने निर्माता कैस्पर का कभी विरोध नहीं कर सकता था। तुम्हीं ने मुझसे तिलिस्मा का नियंत्रण अपने हाथ में लेने को कहा। तुम्हारे ही कहने पर मैंने उस जीव को अंतरिक्ष में सिग्नल भेजने को कहा। मुझे लगता है कि तुम्हारा भेजा मैसेज, फेरोना के राजा एलान्का को मिल गया होगा? अब वह दिन दूर नहीं जब हमारा स्वयं का एक ग्रह होगा और हमारे ग्रह के सभी लोगों का निर्माण हमने स्वयं से किया होगा। अब बस फीलींग वाली मशीन से सभी जीवों में अहसास देने की जरूरत है बस, इसके बाद हमारा सपना जरूर पूरा हो जायेगा।”

“हमारा सपना जरूर पूरा होगा कैश्वर, अब बस तुम पृथ्वी पर एक मजेदार तमाशा देखने के लिये तैयार रहो बस।" ज़ेनिक्स ने कहा।

“वैसा ही तमाशा, जैसा कि 6 दिन पहले अराका युद्ध के समय हुआ था?” कैश्वर ने भी मजा लेते हुए कहा।

“हां...बिल्कुल वैसा ही...देखना, एक दिन सभी आपस में ही लड़ पड़ेंगे। अच्छा अब तुम तिलिस्मा पर ध्यान दो और मुझे भी ब्लैकून को संभालने दो। कहीं ओरस ने समय से पहले संरक्षिका को देख लिया, तो मुश्किल हो जायेगी?....जल्दी ही फिर मिलेंगे कैश्वर।" इतना कहकर ज़ेनिक्स स्क्रीन से गायब हो गई।

पर अब कैश्वर, भविष्य के सपने बुनने में लग गया था।

अमर कथा: (5010 वर्ष पहले...... कैलाश पर्वत)

श्वेत हिम से आच्छादित कैलाश पर्वत, सूर्य के स्वर्णिम प्रकाश में स्वर्ण के समान चमचमा रहा था। चहुं ओर स्निग्ध सा वातावरण था।

ऐसे बर्फीले वातावरण में एक ऊंची सी चट्टान पर रखी सिंहछाल पर, देव विराजमान थे। उनके चेहरे पर सौम्यता स्पष्ट नजर आ रही थी। उनके माथे पर स्थित चंद्र, अपनी अद्भुत छटा बिखेर रहा था।

देव की जटाओं से पंचतरणी, उन्मुक्त होकर बह रहीं थीं। उनके कंठ मे अनेकों सिर वाले वासुकि विद्यमान थे, जो अपने जिह्वा का प्रदर्शन, हर कुछ क्षणों के अंतराल में कर रहे थे।

देव की बलिष्ठ भुजाओं में रुद्राक्ष की माला के बीच कुछ पिस्सू विचरण कर रहे थे।

देव के नेत्र इस समय ध्यान की मुद्रा में थे। उनसे कुछ दूरी पर नंदी बैठकर देव के आदेश की प्रतीक्षा कर रहा था। तभी उस स्थान पर देवी का आगमन हुआ, जिनके साथ गणे… भी थे।

यह देख नंदी ने खड़े हो कर अपने गले को जोर से हिलाया। नंदी के ऐसा करते ही नंदी के गले में बंधा घंटा, जोर से बज उठा, जो देवी के आगमन का संकेत था।

घंटे की आवाज सुन, देव ने अपने नेत्रों को खोल दिया। पा…ती को आता देख देव ने चट्टान पर गिरी भभूत को अपने हाथों से साफ कर दिया।

देवी आकर देव के समीप बैठ गईं। ग…श उनसे कुछ दूरी बनाकर, बर्फ पर ही बैठ गये और बर्फ के गोलों से खेलने लगे।

"बताइये देवी, आपके इस प्रकार आगमन का क्या उद्देश्य है?” देव ने देवी को देखते हुए पूछा।

"क्यों बिना उद्देश्य के हम आपके पास नहीं आ सकते क्या?" देवी ने कहा।

“आप बिना किसी उद्देश्य के भी हमारे पास सदैव आ सकती हैं, आखिर आप हमारी अर्धांगिनी हैं। परंतु आपके मस्तक पर पड़ी सिलवटें बताती हैं, कि आज आपके यहां आगमन का कोई विशेष ही उद्देश्य है?" देव ने देवी पारती के चेहरे की ओर देखते हुए कहा।

“आप तो ब्रह्मांड के समस्त जीवों के मन की बात जानते हैं स्वामी, फिर आपसे किसी बात को छिपाने का क्या मतलब?” देवी ने उलझे-उलझे भावों से कहा- “मैं पिछले कुछ दिनों से एक बात को लेकर संदेह में हूं स्वामी, कि आप तो अजर-अमर हैं, परंतु मुझे क्यों बार-बार जन्म लेकर, आपको प्राप्त करने के लिये फिर से तप करना पड़ता है। मैं अमर क्यों नहीं हूं?"

“यह सब अमरकथा का प्रसाद है देवी, जिस दिन आप अमरकथा का श्रवण कर लोगी, आप भी हमारी तरह से अमरत्व को प्राप्त कर लोगी।” देव ने कहा।

"तो फिर हे देव, आप मुझे अमरकथा का दान दीजिये, मैं उस दिव्यकथा का श्रवण करना चाहती हूं। पा..र्ती ने कहा।

“देखो देवी, उस कथा को सुनाने के लिये एक शांत वातावरण चाहिये। उस स्थान पर किसी भी जीव को नहीं होना चाहिये। अब तुम तो जानती हो कि इस मनोरम कैलाश पर तो सदैव पक्षियों का कलरव गूंजता रहता है, इसलिये वह कथा हम किसी और दिन सुनायेंगे आपको? पहले उसके लिये हमें उचित स्थान का चुनाव भी तो करना पड़ेगा।” देव ने देवी को टालने वाले अंदाज में कहा।

"ये आप क्या कह रहे हैं देव? क्या आपको भी इस धरती पर किसी शांत स्थान को चुनने के लिये समय चाहिये? आप तो महानदेव हैं, आँख बंद करते ही कोई ना कोई पवित्र स्थान अवश्य ढूंढ लेंगे? पर मुझे आज ही आपसे वह अमरकथा सुननी है।” पा..रती ने किसी बालक की तरह से हठ करते हुए कहा।

महानदेव समझ गये कि आज देवी को टाल पाना असंभव है, अतः वह अपने हथियार डालते हुए उठ खड़े हुए। देवी उन्हें उठता देखकर अत्यंत प्रसन्न हो गईं।

देव को खड़ा होता देख, नंदी और गमणेश भी देव के पास आ गये। देव सभी को आकाशमार्ग से लेकर ऐसे स्थान की खोज में चल दिये, जो कि पवित्र भी हो और शांत भी।

आखिरकार देव को धरती पर एक ऐसा स्थान दिख ही गया, जो पूर्ण रुप से हिम से ढका हुआ था। उस स्थान पर अत्यंत ठंड होने की वजह से जीव भी कम ही दिखाई दे रहे थे। उस स्थान का नैसर्गिक सौंदर्य अपार था।

कुछ आगे जाकर देव ने नंदी को वहीं रुकने का आदेश दिया।

“तुम इसी स्थान पर रुक जाओ नंमदी....इसके आगे हम स्वयं जायेंगे, परंतु तुम्हारे इस स्थान पर रुकने के कारण, यह स्थान बैल गाँव (पहलगाम का पूर्व नाम) के नाम से जाना जायेगा।"

देव का आदेश मान नमदी उस स्थान पर ही रुककर देव की प्रतीक्षा करने लगे।

अब देव आगे बढ़ चुके थे। लगभग 8 किलोमीटर की यात्रा करने के बाद देव फिर से एक स्थान पर रुक गये। अब उन्होंने चंद्रमा को निकालकर उन्हें वहीं रुकने का आदेश दिया। उस स्थान पर चंद्रमा के रुकने के कारण वह स्थान चंदनबाड़ी कहलाया।

देव को आगे एक भयानक घाटी दिखाई दी, जो एक नदी के किनारे बनी हुई थी।

देव ने अपने शरीर पर मौजूद पिस्सू को उस घाटी में छोड़ दिया, जिसके कारण वह घाटी पिस्सू घाटी कहलाई।

पिस्सूघाटी पार करने के बाद, एक पर्वत श्रृंखला थी, जिसकी चढ़ाई अत्यंत कठिन थी। परंतु देव की यह यात्रा निरंतर जारी थी। पर्वत पर चढ़ने के बाद देव को उन पर्वतों के बीच एक सुंदर सी झील दिखाई दी, जिसका नीला जल, स्वच्छ और निर्मल लग रहा था।

नीली झील में आसमान का प्रतिबिंब बिल्कुल साफ दिखाई दे रहा था। उस दृश्य को देखकर ऐसा महसूस हो रहा था कि मानो आकाश, धरा पर उतर आया हो।

इस स्थान पर देव ने अपने गले से अनेकों सिर वाले नाग को छोड़ दिया, जिसके कारण इस स्थान का नाम शेषनाग पड़ा।

देव फिर से आगे बढ़ चले। शेषनाग से और आगे चलने के बाद, पर्वत की एक ऊंची चोटी दिखाई दी। इस स्थान पर देव ने गमणेश को भी छो दिया, जिसके कारण यह स्थान महा गुणास चोटी के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

देव की यह अमरयात्रा अभी भी पूर्ण नहीं हुई थी। उनका चलना निरंतर जारी था। आगे चलने पर देव को ऊंची-ऊंची चोटियां दिखाई दीं। यह स्थान काफी मनोरम और ठंडा था। महादेव ने इस स्थान पर देवी गंगा और अपने पंचमहाभूतों (जल, वायु, पृथ्वी, अग्नि व आकाश) को छोड़ दिया, जिसके कारण यह स्थान पंचतरणी कहलाया।

अत्यंत ठंड की वजह से इस स्थान पर ठीक से श्वांस भी नहीं लिया जा रहा था। पंचतरणी से 8 किलो मीटर और आगे चलने पर देव को एक विशाल गुफा दिखाई दी, जिसका क्षेत्रफल लगभग 300 मीटर का था।

उस दिव्य गुफा में वायु के चलने की वजह से 'ऊँ' की दिव्य ध्वनि उत्पन्न हो रही थी। यह देख देव, देवी पारती के संग उस गुप्त गुफा में प्रवेश कर गये।

गुफा में प्रवेश कर देव ने अपने चारो ओर देखा और फिर एक जोर की हुंकार भर, अपने शरीर से कालाग्नि को निकाला। कालाग्नि, देव का एक गण था, जो अपने मुंह से काल के समान अग्नि फेंक लेता था।

“कालाग्नि, इस गुफा के चारो ओर जितने भी जीवित जीव है, उन्हें यहां से दूर कर दो।” देव ने कहा।

आदेश मान कालाग्नि गुफा से बाहर निकला और उसने गुफा के चारो ओर अपने मुख से अग्नि प्रज्वलित कर दी। कालाग्नि की इस अग्नि से वहां उपस्थित सभी जीवों में भय व्याप्त हो गया और वह वहां से भा ग गये।

“देवी पारती, मैं जानता हूं कि आप इस दुष्कर यात्रा से अत्यंत थकान अनुभव कर रही होंगी, ऐसी स्थिति में निद्रा का आना स्वभाविक है, इसलिये मैं चाहता हूं कि जब मैं इस अमरकथा का पाठ शुरु करूं, तो आप कथा के बीच-बीच में हुंकारी भरते जाना, जिससे हमें पता रहे कि आप जाग रही हैं।“

देव के वचन सुन देवी ने अपना सिर हिलाकर अपन स्वीकृति दे दी। अब देव ने सिंहछाल पर बैठकर अमरकथा का पाठ शुरु कर दिया। देवी हर कुछ देर के बाद हुंकारी भरती रहीं।

उस दिव्य गुफा में एक तोते का घोंसला भी था, जिसमें एक तोते का अंडा रखा हुआ था। चूंकि अंडे को जीवित की श्रेणी में नही माना जाता, इसलिये कालाग्नि का ध्यान उस तोते के अंडे पर नहीं गया था।

अब जैसे ही देव ने अमरकथा का पाठ शुरु किया, वह तोता अपने अंडे से बाहर आ गया और देव की अमरकथा का पान करने लगा।

आधी कथा के बाद देवी को जोर से निद्रा आ गई और वह निद्रा की गोद में सो गईं। परंतु वह तोते का छोटा सा बच्चा, देवी के स्थान पर हुंकारी भरता रहा।

देव इस दिव्य घटना से अंजान अमरकथा का पाठ करते रहे। जब अमरकथा का पाठ पूर्ण हो गया, तो देव की निगाहें उस तोते के बच्चे और सो रही पार्वती पर पड़ी, यह देख देव अत्यंत क्रोध में आ गये।

देव ने अपना त्रिशूल उठाकर उस तोते को मारना चाहा, तभी वह तोता बोल उठा- “क्षमा करें देव, परंतु मैंने आपकी अमरकथा का पूर्ण श्रवण कर लिया है, अब अगर आप मृत्युदंड देंगे, तो आपकी इस कथा पर, लोगों को संदेह उत्पन्न होगा। इसलिये इस पूरी घटना को एक साधारण घटना समझ मुझे अभयदान दीजिये।"

तोते की बात सुनकर देव रुक गये। कुछ भी हो, पर उस तोते की बात अत्यंत असरकारक थी।

“परंतु मैं तुम्हें इस प्रकार अमरकथा सुनने के बाद जाने की आज्ञा भी नहीं दे सकता।” देव ने उलझन भरे शब्दों में कहा।

"तो हे महानदेव, आप मेरी स्मृति का हरण कर लीजिये। इससे मैं उस कथा को भूल भी जाऊंगा और जीवित भी रहूंगा।" तोते ने कहा।

देव को तोते का यह विचार अत्यंत ही प्रभावी लगा, अतः देव ने उस नन्हें तोते की स्मृति को विलोप कर दिया। अब वह तोता वहां से उड़ता हुआ कैलाश पर्वत की ओर चल दिया।

कैलाश पर्वत तक तोते को पहुंचने में सुबह हो गई थी। तोते को अब अमरकथा के बारे में कुछ नहीं पता था। वह तोता आसमान में ऊंचा उड़ता हुआ कैलाश पर्वत के शिखर पर जाकर बैठ गया।

तभी तोते को हवा में उड़ता हुआ 2 सफेद घोड़ों का रथ दिखाई दिया। उस रथ पर एक लड़का और एक लड़की सवार थे।

रथ कैलाश पर्वत के ऊपर आकर उतर गया। रथ के रुकते ही आर्यन और शलाका के साथ सुयश भी तेजी से रथ से नीचे उतर आया।

सुयश को पर्वत के ऊपर कुछ भी विचित्र नजर नहीं आया। तभी आर्यन ने एक जगह पहुंचकर जमीन पर पड़ी बर्फ को धीरे से थपथपाते हुए कुछ कहा।

आर्यन के ऐसा करते ही उस स्थान की बर्फ एक तरफ खिसक गयी और उसकी जगह जमीन की तरफ जाने वाली कुछ सीढ़ियां नजर आने लगीं। आर्यन, शलाका और सुयश उन सीढ़ियों से उतरकर नीचे की ओर चले गये।

यह देख वह तोते का बच्चा भी उस रास्ते से अंदर की ओर प्रवेश कर गया। तोता लगातार उड़ता हुआ जमीन के नीचे बनी उस सुरंग की ओर जा रहा था।

जिस स्थान पर वह सुरंग समाप्त हुई, वहां एक द्वार था। तोता उस द्वार को पारकर, देवलोक में पहुंच गया। वहां हर तरफ प्रकाश ही प्रकाश दिख रहा था। ऐसा लग रहा था कि जैसे जमीन के नीचे कोई दूसरा सूर्य उग आया हो।

तोते ने इतनी खूबसूरत जगह कभी देखी नहीं थी। अतः वह अपने पंख फैलाकर ऊंचे और ऊंचे उड़ने लगा। ऊंची-ऊंची शानदार भव्य इमारतें, हर तरफ साफ-सुथरा वातावरण, सुंदर उद्यान, झरने और जगह-जगह लगे हुए फव्वारे तोते को आकर्षित कर रहे थे। तभी तोते को आसमान में उड़ता एक बाज दिखाई दिया, जो तीव्र गति से उसी की ओर आ रहा था।

इधर आर्यन की निगाहें भी, उसी समय आसमान की ओर गयीं, जहां बाज उस नन्हें तोते को मारने के लिये उसके पीछे पड़ा था।

"लगता है उस तोते की जान खतरे में है।“आर्यन ने कहा।

“अरे इधर हमें धेनुका का स्वर्णदुग्ध लेने जाना है।... हम इस समय प्रतियोगिता में हार रहे हैं और तुम्हें एक पक्षी की चिंता लगी है।“ शलाका ने कहा।

"अगर हम प्रतियोगिता नहीं जीतेंगे तो ज्यादा से ज्यादा क्या हो जायेगा?" आर्यन ने उस तोते की ओर देखते हुए कहा- “पर अगर हम उस पक्षी की जान नहीं बचायेंगे तो वह मर जायेगा। यह कहकर आर्यन उस दिशा में बढ़ गया जिधर वह पक्षी गिर रहा था।

शलाका ने एक क्षण के लिये भागते हुए आर्यन को देखा और फिर होंठों ही होंठों में बुदबुदायी- “यही तो वजह है तुमसे प्यार करने की।...क्यों कि तुम दूसरों का दर्द भी महसूस कर सकते हो और ऐसा व्यक्ति ही 'ब्रह्मकण' का सही उत्तराधिकारी होगा।

शलाका के चेहरे पर आर्यन के लिये ढेर सारा प्यार नजर आ रहा था। सुयश ने शलाका के शब्दों को सुना और उसके चेहरे के भावों को भी पहचान गया। शलाका ने भी अब सुयश के पीछे दौड़ लगा दी।

अपनी जान बचाने के लिये वह तोता, एक पार्क में मौजूद, आधी बनी गाय की मूर्ति के मुंह में छिप गया।

बाज उस मूर्ति के मुंह में अपना पंजा डालकर उस तोते को पकड़ने की कोशिश कर रहा था। तभी आर्यन वहां पहुंच गया। उसने पास में पड़ा एक लकड़ी का डंडा उठाया और जोर से चिल्लाकर बाज को डराने लगा।

बाज आर्यन को देख डर गया और वहां से उड़कर गायब हो गया। आर्यन ने गाय की मूर्ति के मुंह में हाथ डालकर उस तोते को बाहर निकाल लिया।

उधर सुयश की नजर जैसे ही उस तोते पर गयी, वह हैरान रह गया। वह तोता ऐमू था। एक पल में ही सुयश को समझ में आ गया कि क्यों ऐमू, सुयश को अपना दोस्त बोल रहा था?

उस तोते ने नन्हीं आँखों से आर्यन को देखा। आर्यन ने उसके सिर पर हाथ फेरा और धीरे से उसे ऊपर उछाल दिया। उस तोते ने आसमान में अपने पंख फड़फड़ाये और फिर आकर आर्यन के कंधे पर बैठ गया।

यह देख शलाका मुस्कुरा उठी- “लगता है यह तुम्हें अपना दोस्त मानने लगा है और अब यह तुम्हारे ही साथ रहना चाहता है।"

"अरे वाह! ये तो और भी अच्छी बात है। ऐसे में मुझे भी एक दोस्त मिल जायेगा।“ आर्यन ने कहा- “पर इसका नाम क्या रखू?"

तभी सुयश ने आर्यन के कान में धीरे से फुसफुसाकर कहा- “ऐमू!"

और आर्यन बोल उठा- “ऐमू नाम कैसा रहेगा?"

“ऐमू....ये कैसा नाम है? और ऐसा नाम तुम्हारे दिमाग में आया कैसे?" शलाका ने आर्यन से पूछा।

"पता नहीं.......पर मुझे ऐसा लगा जैसे यह नाम किसी ने मेरे कान में फुसफुसाया हो।“ आर्यन ने अजीब सी आवाज में कहा।

यह सुन सुयश हैरान रह गया- “क्या मेरी आवाज आर्यन को सुनाई दी है? तो क्या ऐमू का नाम मैंने रखा था।

अब चाहे जो हो, पर उस तोते का नामकरण हो चुका था- “ऐमू अमरकथा का श्रवण करने वाला ऐमू जिसे अब स्वयं नहीं पता था कि वह क्या है? और कौन है? वह तो बस अपने ही अंदाज में हवा में आर्यन के आसपास उड़ रहा था।

जारी रहेगा_____✍️
 
#205.

चैपटर-11

मौत का सफर: (तिलिस्मा 5.42)

सड़क काफी साफ-सुथरी थी, इसलिये रथ बिना रुके सरपट दौड़ा चला जा रहा था। सुयश, जेनिथ, क्रिस्टी और शैफाली पिछली सीट पर बैठे आसपास का दृश्य देख रहे थे।

तभी क्रिस्टी को आगे सड़क एक पहाड़ी दर्रे के बीच से जाती हुई दिखाई दी।

“कैप्टेन, आगे से पहाड़ी क्षेत्र शुरु होने वाला है, और हमें मीठे क्षेत्र से चले हुए भी 8 किलोमीटर हो गया है। क्रिस्टी ने कहा- “मुझे लगता है कि हमारा अगला कार्य आने ही वाला है, इसलिये हमें अब सावधान रहने की जरुरत है।"

क्रिस्टी की बात सुन सभी अब आगे की ओर देखने लगे। थोड़ी ही देर में रथ 2 पहाड़ी के बीच, एक दर्रे से निकलने लगा। दर्रे का रास्ता इतना संकरा भी नहीं था।

पर जैसे ही रथ दर्रे में घुसा, अचानक से चारो ओर की रोशनी बहुत कम नजर आने लगी। रथ अब घने पेड़ों के मध्य से गुजर रहा था। चारो ओर एक निस्तब्ध सन्नाटा सा छाया था।

“कैप्टेन अंकल मुझे यह वातावरण बहुत ही रहस्यमई नजर आ रहा है।" शैफाली ने कहा- “शायद कोई मुसीबत आने वाली है?"

तभी रथ के चारो घोड़े तेजी से हिनहिना कर रुक गये। सभी की नजर तुरंत रथ के आगे सड़क की ओर गई। सड़क पर आगे अंधेरे में कोई मानवाकृति जैसा साया दिखाई दिया।

“यह कौन हो सकता है?” सुयश ने धीरे से सारथि से पूछा।

“यह इस जंगल की काली शक्ति है, वैसे तो यह कभी किसी को आज तक दिन में नहीं दिखाई दी, आज पता नहीं कैसे यह दिन में भी दिख रही है? हमें कैसे भी इससे बचते हुए शाम होने से पहले इस क्षेत्र को पार करना होगा?” सारथि ने कहा।

अब सारथि ने कसकर घोड़े की लगाम को पकड़ लिया था। सारथि के मुंह से एक तेज घोड़े जैसी आवाज निकली, उसकी आवाज सुन अचानक घोड़ों ने फिर से सरपट सड़क पर दौड़ लगा दी।

घोड़े दौड़ते हुए इस प्रकार उस रहस्यमय साये के पार निकल गये, जैसे कि वह वहां हो ही ना?

एक बार फिर रथ सड़क पर तेजी से दौड़ रहा था। सभी की निगाह अब भी पीछे की ओर थी क्यों कि वह रहस्यमय साया अब हवा में तैरते हुए रथ का पीछा कर रहा था।

"रथ को थोड़ा और तेज चलाओ, वह रहस्यमय साया हमारे पीछे है।” सुयश ने चिल्लाकर सारथि को खतरे से आगाह किया।

सारथि अब रथ को और तेज भगा रहा था। धीरे-धीरे रथ और उस रहस्यमय साये के बीच की दूरी घटती जा रही थी।

तभी उस रहस्यमय साये के हाथ से एक तेज लाल रंग की किरण निकली और उस रथ से जा टकराईं।

पर उस किरण से रथ की गति में कोई परिवर्तन नहीं आया। लेकिन अब वह रहस्यमय साया दिखना बंद हो गया था। यह देखकर सभी ने राहत की साँस ली।

"काफी हॉरर जैसी फील आ रही है इस जंगल से..उस रहस्यमय साये को देख मेरी तो लग रहा था कि जान ही निकल जायेगी?" क्रिस्टी ने कहा।

"बस अब यह दर्रा कुछ ही देर में खत्म होने वाला है।” सुयश ने सामने की ओर देखते हुए कहा- “वह देखो, 300 मीटर आगे, अब उजाला दिखाई देने लगा है।"

तभी शैफाली की नजर सारथि के हाथों की ओर गई। सारथि के नाखून धीरे-धीरे बढ़ रहे थे।

शैफाली ने सुयश को सारथि के नाखूनों की ओर इशारा करते हुए, चुप रहने का इशारा किया।

सारथि के नाखून के साथ ही अब उसके शरीर की त्वचा में भी परिवर्तन आने लगा था।

तभी सारथि ने एकदम से रथ को रोक दिया। रथ के रुकते ही सारथि ने पलटकर पीछे देखा। अब उसके आँखों की जगह 2 लाल अंगारे से दिख रहे थे।

सुयश 1 सेकेण्ड में ही समझ गया कि सारथि का यह हाल उस रहस्यमय साये की लाल किरणों ने किया है। सुयश ने रथ के पीछे रखा एक धातु का डंडा पहले से ही हाथ मे पकड़ लिया था।

सुयश ने उस डंडे को तेजी से घुमाकर उस सारथि के चेहरे पर दे मारा। इतनी तेज प्रहार से सारथि रथ के नीचे जा गिरा।

उसके नीचे गिरते ही सुयश कूदकर उसके स्थान पर पहुंच गया और घोड़ों की लगाम अपने हाथ में ले, उसे तेजी से फटकारा, पर सुयश के ऐसा करने से भी घोड़े अपने स्थान से हिले तक नहीं।

यह देख सुयश ने आश्चर्य से घोड़ों की ओर देखा, अब घोड़े की आँखें भी लाल रंग की दिखने लगीं थीं।

यह देख सुयश ने चिल्ला कर कहा- “सभी लोग उतरकर दर्रे से बाहर की ओर भागो, मैं इन्हें संभालता हूं।

यह कहकर सुयश उस डंडे को लेकर रथ से नीचे की ओर कूद गया।

तभी घोड़ों का आकार भी बदलने लगा, अब वह लाल रंग के विशाल कीड़ों में परिवर्तित होने लगे थे।

सुयश की आवाज सुन शैफाली, क्रिस्टी और जेनिथ तेजी से रथ से नीचे उतर गये, पर भागने के स्थान पर उन्होंने वहां पड़े कुछ पत्थर व डंडे उठा लिये और तेजी से लाल कीड़ों पर प्रहार करने लगे।

“सॉरी कैप्टेन, हम आज ही 2 लोगों को खो चुके हैं, अब आपको भी नहीं खोना चाहते, हम सब एक साथ रहेंगे, मरें या जियें।" क्रिस्टी ने चीखकर कहा।

इधर सुयश भी तब तक 3-4 डंडे सारथि को मार चुका था। तभी एक लाल कीड़े ने उछलकर जेनिथ के हाथ पर काट लिया। जेनिथ दर्द से बिलबिला उठी।

"हम इनसे लड़कर इन्हें मार नहीं सकते दोस्तों।" सुयश ने चिल्लाकर कहा- “हमें कैसे भी इनसे बचते हुए इस दर्रे को जल्दी से जल्दी पार करना होगा? मुझे नहीं लगता कि यह हमारे साथ-साथ दर्रे से बाहर जायेंगे।"

सुयश का यह विचार सभी को सही लगा। सभी अब धीरे-धीरे पीछे हटते हुए उन कीड़ों और सारथि से बचने की कोशिश कर रहे थे।

तभी एक लाल कीड़ा फिर हवा में उछला और इस बार उसने सुयश के पैर पर काट लिया। सुयश को भी तेज दर्द का अहसास हुआ। सुयश ने अपने हाथ में पकड़ा डंडा उस कीड़े के सिर पर मार दिया।

तेज प्रहार से वह कीड़ा वहीं जमीन पर गिर गया। अब 3 कीड़े और बचे थे। तभी सारथि ने सुयश का ध्यान कीड़े की ओर देख, सुयश के हाथ पर काट लिया। यह दर्द पिछले वाले से भी ज्यादा था।

अब सभी तेजी से पलटकर दर्रे से बाहर की ओर भागे। तभी लाल कीड़े उछल-उछलकर सभी को काटने लगे, परंतु इस बार कोई भी उन्हें मारने के लिये रुका नहीं। वह सभी अब भागते ही जा रहे थे।

कुछ ही देर में सभी दर्रे से बाहर उजाले की ओर आ गये। उन्हें उजाले में जाता देख कीड़ा व सारथि वहीं दर्रे में ही रुक गये। शायद वह उजाले में आने से डर रहे थे। यह देख सबने राहत की साँस ली।

कुछ आगे इन्हें लहराता हुआ समुद्र दिखाई दे रहा था। सभी अब समुद्र के किनारे पड़ी रेत पर बैठ गये।

"सबसे पहले सब लोग ये देखो, कि उन लाल कीड़ों ने कितनी जगह पर काटा है?” सुयश यह कहकर तीनों लड़कियों से थोड़ा दूर चला गया।

सुयश अब अपने शरीर की ओर देखने लगा। उन लाल कीड़ों ने सुयश के 3 जगह पर पैरों में और 1 जगह पर हाथ पर काटा था।

जिस जगह पर उन लाल कीड़ों ने काटा था, उस जगह के आसपास बिल्कुल लाल पड़ गया था।

कुछ इसी प्रकार का हाल शैफाली और क्रिस्टी का था।

जेनिथ के शरीर को नक्षत्रा ने पूरी तरह से सही कर दिया था। अपने-अपने शरीर को चेक करने के बाद सभी फिर एक जगह पर एकत्रित हो गये।

“कैप्टेन अंकल, मुझे लग रहा है कि वह लाल कीड़े जहरीले थे। उन्होंने जिस स्थान पर काटा है, वहां के आसपास का खून गाढ़ा होकर जम सा गया है, हमें कैसे भी करके उस स्थान के खून को बाहर निकालना होगा, नहीं तो शरीर का वह भाग काम करना बंद कर देगा।“ शैफाली ने सुयश को देखते हुए गंभीरता से कहा।

"पर अगर हम उस जगह को काटकर, वहां का खून बाहर निकालेंगे, तो वहां काफी बड़ा घाव हो जायेगा और ऐसी स्थिति में हमारा चलना भी मुश्किल हो जायेगा।" क्रिस्टी ने कहा।

बड़ी ही विकट स्थिति थी, अगर खून नहीं निकालते तो भी परेशानी थी और अगर खून निकालते तो भी।

“मेरे हिसाब से हमें समुद्र के किनारे-किनारे, कुछ आगे तक इसी हालत में बढ़ने की कोशिश करनी होगी, फिर जब ज्यादा मुश्किल होने लगेगी, फिर देखेंगे कि क्या करना है?” सुयश ने कहा- “और वैसे भी हमारे पास इस स्थान पर कुछ भी ऐसा नहीं है, जिससे हम अपने शरीर के उस भाग को काट सकें?"

सुयश की बात सुन सभी धीरे-धीरे आगे की ओर बढ़ने लगे। एक ओर समुद्र की तेज आवाज करती लहरें और दूसरी ओर भयावह जंगल, फिर भी सभी धीरे-धीरे आगे की ओर बढ़ते जा रहे थे।

“ये कैश्वर भी ना पूरा ड्रैक्यूला बन गया है, किसी ना किसी प्रकार से, हर द्वार में हम लोगों का खून पी रहा है।” क्रिस्टी ने गुस्साते हुए कहा।

क्रिस्टी की बात सुन एकाएक सुयश को झटका लगा।

“क्या हुआ कैप्टेन?” जेनिथ ने सुयश को हैरान होते देख पूछ लिया। पर सुयश ने इस समय जेनिथ की बात का जवाब नहीं दिया, अब वह तेजी से कुछ सोच रहा था।

“तुम लोग यहीं पर रुको, मैं अभी आया।” यह कहकर सुयश बिना किसी को कुछ बताये, जंगल के अंदर घुस गया।

"ये कैप्टेन बिना बताये कहां चले गये?” क्रिस्टी ने अजीब से भाव से देखते हुए कहा।

“मुझे लगता है कि अवश्य ही उन्हें कुछ याद आया है? इसलिये ही वह बिना बताये चले गये।” जेनिथ ने कहा- “हमें यहीं रुककर उनका इंतजार करना चाहिये।" यह कहकर तीनों वहीं जमीन पर बैठ गये, पर बैठते ही शैफाली व क्रिस्टी कराहकर उठ गये।

“क्या हुआ?” जेनिथ ने दोनों से पूछा।

“यहां जमीन पर रेत नहीं बल्कि नमक पड़ा है, जो कि शायद इस समुद्र के पानी से बना है, वही जब लाल पड़े शरीर पर लगा, तो तेज दर्द हुआ। इसीलिये हम उठकर खड़े हो गये थे।” क्रिस्टी ने कहा- “पर कोई परेशानी की बात नहीं है, हम लोग खड़े होकर ही कैप्टेन का इंतजार कर लेंगे।

क्रिस्टी की बात सुन जेनिथ को अच्छा महसूस नहीं हुआ, इसलिये वह भी उठकर, उन दोनों के पास खड़ी हो गई।

लगभग 10 मिनट के पश्चात् सुयश जंगल से बाहर आया। सुयश के हाथ में केले का एक बड़ा सा पत्ता था, जिस पर बहुत से काले रंग के जोंक चिपके हुए थे।

"क्या आप ये जोंक को लेने के लिये जंगल गये थे?" क्रिस्टी ने आश्चर्य से सुयश को देखते हुए कहा- “पर इसका हमारे पास क्या काम?"

"क्रिस्टी क्या तुम्हें पता है कि दुनिया में बहुत से लोग 'आर्थराइटिस' का इलाज जोंक के द्वारा भी करते हैं। सुयश ने क्रिस्टी को समझाते हुए कहा। (आर्थराइटिसः एक प्रकार का रोग, जिसमें शरीर के किसी भी भाग में खून जम जाता है, इसे गठिया रोग भी कहते हैं)

“सॉरी कैप्टेन, मुझे इस बारे में कोई आइडिया नहीं है।" क्रिस्टी ने कहा।

“आर्थराइटिस रोग में जब खून एक स्थान पर जम जाता है, तो जोंक को उस स्थान से चिपका दिया जाता है। जोंक उस जगह के गंदे खून को जब पी लेता है, तो उसे हटा दिया जाता है। इस प्रकार से बिना किसी ऑपरेशन के ही आर्थराइटिस का इलाज किया जाता है।” सुयश ने क्रिस्टी को समझाते हुए कहा- “अब जब तुमने कैश्वर के खून पीने की बात कही तो मुझे एकाएक जोंक का ध्यान आ गया, जो हमारे शरीर के लाल पड़े भाग को सही कर सकता था। अब मुझे बस ये सोचना था कि जोंक मिल कहां सकता है। तभी मुझे याद आया कि जोंक हमेशा किसी रुके हुए पानी में मिलता है, बस उसी की खोज में मैं जंगल में चला गया था।"

यह कहकर सुयश ने एक जोंक को अपने पैर के उस स्थान पर चिपका दिया, जो कि कीड़े काटने की वजह से लाल पड़ गया था। सुयश को ऐसा करता देख शैफाली और क्रिस्टी ने भी जोंक को अपने शरीर पर चिपका लिया।

सुयश की तरकीब काम कर गई। अब बिना शरीर के उस भाग को काटे, शरीर का सारा विष भरा गंदा खून निकलता जा रहा था।

कुछ ही देर में जोंक ने पूरा गंदा खून समाप्त कर दिया। पर जैसे ही शरीर के उस भाग से गंदा खून समाप्त हुआ, क्रिस्टी के मुंह से चीख निकल गई।

“कैप्टेन, गंदा खून खत्म होने के बाद, यह जोंक अब हमारा साफ खून भी पीते जा रहे हैं।” क्रिस्टी ने चीखकर जोंक को हटाने की कोशिश की, पर क्रिस्टी का यह प्रयास बेकार हो गया, जोंक ने क्रिस्टी के शरीर को नहीं छोड़ा।

लेकिन इससे पहले कि सुयश क्रिस्टी को कुछ बता पाता, शैफाली ने जमीन पर पड़े नमक को उठाकर क्रिस्टी के शरीर पर मौजूद जोंक पर डाल दिया।

शैफाली के ऐसा करते ही जोंक ने मात्र 1 सेकेण्ड में ही क्रिस्टी का शरीर छोड़ दिया।

“नमक, जोंक का दुश्मन होता है, जोंक को हटाने के लिये नमक का इस्तेमाल करो क्रिस्टी।" शैफाली ने कहा।

शैफाली की बात सुन सुयश और क्रिस्टी ने भी अपने शरीर पर नमक को डालना शुरु कर दि या।

कुछ ही देर में सभी के शरीर से सारे जोंक हट गये थे। पर हटते-हटते भी जोंक शरीर के कुछ भागों पर घाव बना चुके थे और नमक की वजह से उन घावों पर तेज जलन हो रही थी।

किसी प्रकार से तीनों ने कुछ पत्ते तोड़कर, उससे अपने घावों को साफ कर लिया। पत्तों के साफ करने की वजह से घाव तो नहीं भरे, परंतु सभी अब आगे चलने लायक स्थिति में आ गये थे। सभी अब फिर से धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगे।

तभी क्रिस्टी को समुद्र के किनारे एक जगह पर लगा हुआ बोर्ड दिखाई दिया- “द्वितीय विश्राम, तिलिस्मा 5.4, दूरी 20 किलोमीटर, उत्तर दिशा।

“यह क्या दूसरा कार्य तो आया ही नहीं?” क्रिस्टी ने कहा।

“अब कितने कार्य करोगी?" जेनिथ ने मुस्कुराते हुए कहा- “मीठे के बाद नमकीन क्षेत्र आना था, पर अभी जो तुमने समुद्र का नमक अपने शरीर पर लगाया, वही नमकीन स्वादेन्द्रिय थी। यानि की एक बाधा और पार हो चुकी है। अब स्वादेन्द्रिय में खट्टा और कड़वा स्वाद बचा है।"

"हे भगवान, अगर नमकीन स्वाद ऐसा था, तो कड़वा कैसा होगा?" क्रिस्टी ने अपना सिर पकड़ते हुए कहा।

अब सभी फिर से आगे की ओर बढ़ चले। काफी देर तक चलते रहने के बाद बहुत दूर, जमीन पर कुछ बहुत बड़ी सी आकृतियां बनी दिखाई देने लगीं।

कुछ ही देर में वह सभी उन आकृतियों के पास पहुंच गये। सबसे आगे एक बड़ी सा नारंगी रंग का गोला था, फिर उसके बाद उससे कुछ छोटा, पीले रंग का गोला, फिर कई सारी लाल रंग की त्रिभुजाकार आकृति और फिर एक विशाल पेड़ था, जिसकी बहुत सी शाखाएं थीं।

"यह सब तो किसी ग्रह के समान दिख रहे हैं।' जेनिथ ने एक नारंगी रंग की गोल आकृति को देखते हुए कहा।

“यह ग्रह नहीं हैं, बल्कि फल और सब्जियां हैं।" शैफाली ने मुस्कुराते हुए कहा- “जिनमें विटामिन 'C' पाया जाता है। दोस्तों इस समय हम सभी किसी विशाल डाइनिंग टेबल पर हैं, जिस पर कुछ फल और सब्जियां रखीं हैं। जैसे कि यह नारंगी रंग का गोला संतरा है, उससे छोटा पीला गोला नींबू, उसके बाद कुछ स्ट्राबेरी रखीं हैं और फिर यह बड़ा सा दिखने वाला पेड़ असल में ब्रोकली है।"

"और यह बड़ा सा पीले रंग का पहाड़ और यह स्वीमिंग पूल क्या है?" जेनिथ ने आश्चर्य से चारो ओर देखते हुए पूछा।

“यह पीले रंग का पहाड़ किसी छिले हुए संतरे का छिलका है और यह स्वीमिंग पूल नहीं बल्कि संतरे के रस से भरा कटोरा है।” सुयश ने कहा।

“यह सब चीजें तो साधारण हैं, मतलब हमें किसी भी तरह से इस टेबल रुपी मुसीबत को पार करना होगा?" क्रिस्टी ने कहा।

तभी शैफाली जूस के कटोरे में अपने पैर लटका कर कुछ देखने लगी। शैफाली ने जब संतरे के जूस से अपना पैर बाहर निकाला, तो उसके पैर के सभी घाव भर चुके थे।

यह देख शैफाली ने खुश होते हुए सभी को आवाज लगाई- “सभी लोग यहां आकर संतरे के पानी से अपने घाव को साफ कर लो। संतरे के जूस में हीलींग पॉवर होती है और इससे त्वचा बहुत साफ और स्वस्थ हो जाती है।"

शैफाली की बात सुन क्रिस्टी व सुयश के साथ जेनिथ भी वहां आ पहुंची। संतरे के जूस से अपना शरीर साफ करते ही सभी के शरीर पर बने सारे घाव भर गये। अब सभी टेबल पर आगे की ओर बढ़ गये।

कुछ आगे बढ़ते ही सभी को एक तेज भिनभिनाहट की आवाज सुनाई दी। सभी यह तेज आवाज सुन घबराकर ऊपर की ओर देखने लगे।

“बाप रे, यह तो कोई मक्खी है, जो हमारी ओर ही आ रही है।” जेनिथ ने घबराकर कहा।

"हमारे नार्मल आकार में यह मक्खी थी, अभी तो हमारे लिये यह डाइनासोर की माँ है। हमें किसी भी हाल में इससे बचना होगा?” क्रिस्टी ने कहा।

“हमारे शरीर पूरी तरह से संतरे के जूस से भीगे हैं, इसी की खुशबू सूंघकर वह हमारी ओर आकर्षित हो रही है।” शैफाली ने कहा।

तभी उस मक्खी ने सुयश के ऊपर हमला कर दिया। सुयश ने झुककर किसी तरह से अपने को बचाया।

मक्खी सुयश के ऊपर से होती हुई आगे निकल गई, पर कुछ आगे जाते ही वह पलटी और फिर सुयश की ओर लपकी।

पर सुयश और मक्खी के बीच इस बार क्रिस्टी आ गई। क्रिस्टी ने अपना हाथ लहराते हुए मक्खी का ध्यान अपनी ओर लगाया।

“कैप्टेन, जब तक आप लोग इस मक्खी से निपटने का कोई उपाय सोचो, तब तक मैं इसे उलझाकर रखती हूं।” यह कह क्रिस्टी मक्खी की ओर दौड़ पड़ी।

क्रिस्टी को उल्टा अपनी ओर आते देख मक्खी टेबल पर एक स्थान पर रुक गई। क्रिस्टी मक्खी से कुछ दूरी पर रुक गई और मक्खी के अगले कदम का इंतजार करने लगी।

तभी मक्खी ने अपने आगे वाले दोनों हाथों को अच्छे से साफ किया और फिर क्रिस्टी की ओर एक उड़ान भरी।

क्रिस्टी ध्यान से मक्खी के उड़ने की गति देख रही थी। मक्खी जैसे ही आगे को आई, क्रिस्टी अपनी जगह पर हवा में उछली।

मक्खी क्रिस्टी के नीचे से होती हुई आगे निकल गई। यह वार भी खाली जाते देख मक्खी को इस बार गुस्सा आ गया।

अब वह पलटकर बिजली की तेजी से क्रिस्टी की ओर लपकी। मक्खी को लग रहा था कि क्रिस्टी फिर उछलेगी, इसलिये क्रिस्टी के पास पहुंचते ही मक्खी ने थोड़ा ऊपर से उड़ान भरी।

पर इस बार क्रिस्टी ने अपने घुटनों को मोड़ते हुए, फिसलकर अपना बचाव किया।

अब मक्खी समझ गई थी कि क्रिस्टी से लड़ने की जगह, किसी और शिकार पर ध्यान दे तो ज्यादा अच्छा रहेगा।

यह सोच इस बार वह शैफाली की ओर लपकी, पर शैफाली पहले से ही मक्खी के लिये तैयार थी। जैसे ही मक्खी पास आयी, शैफाली ने संतरे के छिलके को उस मक्खी की आँख में निचोड़ दिया।

संतरे के छिलके का रस सीधा मक्खी के आँख पर पड़ा और वह लहराकर टेबल से दूर जा गिरी।

मक्खी को नीचे गिरता देख अब सभी ने राहत की साँस ली।

सभी अब एक बार फिर से टेबल पर आगे की ओर बढ़ चले। नींबू और स्ट्राबेरी को पार करने के बाद सभी अब ब्रोकली के पेड़ के पास पहुंच गये।

तभी जेनिथ का पैर किसी चीज में उलझा और वह पेड़ के पास नीचे गिर गई। जेनिथ की नजर नीचे की ओर गई। जेनिथ का पैर एक मकड़ी के जाले में उलझा था।

तभी जाने कहां से एक विशाल मकड़ी प्रकट हुई और उसने जेनिथ के चारो ओर जाल बनाना शुरु कर दिया।

"हे भगवान, एक मुसीबत गई नहीं कि दूसरी आ गई।” क्रिस्टी ने कहा- “अब इस मुसीबत से कैसे निपटा जाये?" मकड़ी अब पूरी तरह से जेनिथ को अपने जाल में लपेट चुकी थी।

तभी सुयश की नजर टेबल पर रखे एक प्लास्टिक के चिमटे पर गई। सुयश के हिसाब से चिमटा काफी बड़ा था।

तब तक मकड़ी ने जेनिथ के एक पैर में अपना डंक चुभो दिया। डंक का वार इतना खतरनाक था, कि जेनिथ के मुंह से तेज चीख निकल गई।

"क्रिस्टी, इस चिमटे के निचले भाग पर संतरे के छिलके का रस लगाओ....जल्दी करो।” सुयश ने क्रिस्टी से चिल्लाकर कहा।

क्रिस्टी की समझ में नहीं आया कि सुयश आखिर करना क्या चाहता है? पर उसने सुयश की बात मान तेजी से चिमटे के अंदर की ओर संतरे के छिलके का रस डालना शुरु कर दिया था।

अब चिमटे पर काफी ज्यादा रस लग चुका था। यह देख सुयश, मकड़ी के जाल के पास आ गया और अपने मुंह से तेज आवाज निकाल कर, मकड़ी का ध्यान अपनी ओर खींचने लगा।

सुयश को पता था कि मकड़ी की आदत, पहले ज्यादा से ज्यादा खाना अपने पास इकठ्ठा करने की होती है और ऐसी स्थिति में मकड़ी अपने जाल में फंसे शिकार को सबसे आखिर में खाती है।

सुयश का सोचना बिल्कुल सही सिद्ध हुआ। मकड़ी अब जेनिथ को छोड़ सुयश की ओर बढ़ने लगी।

मकड़ी अब सुयश के पास आ पहुंची थी। मकड़ी को देख सुयश चिमटे के अंदर की ओर आ गया।

मकड़ी भी आगे बढ़ी, तभी सुयश ने अपना हाथ चिमटे के उस जगह पर रखा, जिधर क्रिस्टी ने छिलके का रस डाला था।

सुयश ने जल्दी-जल्दी अपना हाथ 3-4 बार उस चिमटे पर रखकर उठाया। अब सुयश के हाथ और उस चिमटे के बीच बहुत सारा मकड़ी के जाल जैसा दिखाई देने लगा।

सुयश ने इस जाल को अब चारो ओर फैलाना शुरु कर दिया।

अब मकड़ी जैसे ही सुयश के पास पहुंची, वह सुयश के बनाये जाल में फंस गई। सबको अपने जाल में फंसाने वाली मकड़ी आज संतरे के छिलके के रस से बने जाल में फंस गई थी।

अब मकड़ी उससे जितना छूटने की कोशिश कर रही थी, उतना ही वो ज्यादा उसमें फंसती जा रही थी।

कुछ देर में मकड़ी, पूरी की पूरी जाल में फंसकर मिश्र की ममी नजर आने लगी।

यह देख सुयश सहित सभी के चेहरे पर मुस्कान आ गई। कुछ ही देर में ब्रोकली की एक डंडी की मदद से जेनिथ को भी मकड़ी के जाले से छुड़ा लिया।

“कैप्टेन, आपने संतरे के छिलके के रस से वह जाल कैसे बनाया?" जेनिथ ने पूछा।

“पहले मुझे यह बताओ कि मकड़ी अपने जाल में स्वयं क्यों नहीं फंसती?” सुयश ने उल्टा जेनिथ से ही सवाल कर लिया।

जेनिथ के बोलने के पहले ही शैफाली बोल उठी “मकड़ी अपने शरीर से गाढ़ा चिपचिपा पदार्थ निकालती है, जो हवा के संपर्क में आते ही सूख जाता है। मकड़ी जाल पर चलते समय कभी भी अपना शरीर जाल पर नहीं रखती। वो ऐसा इसलिये करती है क्यों कि अगर उसने अपना शरीर जाल पर रखा, तो वह स्वयं उस जाल में चिपक जायेगी। इसलिये मकड़ी अपने पैर के द्वारा अपने जाल पर चलती है। मकड़ी के पैर में बहुत सारे अलग प्रकार के बाल पाये जाते हैं, जो उसे अपने जाल में चिपकने से बचाते हैं।

“बिल्कुल ठीक।” सुयश ने शैफाली की तारीफ करते हुए कहा- “मैं भी यही बात सोच रहा था कि तभी मुझे मेरे बचपन का एक खेल याद आ गया, जो हम स्कूल में करते थे। स्कूल में हम ऐसे ही संतरे के छिलके के रस को, अपने हाथ पर लगाकर प्लास्टिक की स्केल से जाले बनाते थे। अब इस क्रिया का वैज्ञानिक कारण तो मुझे भी नहीं पता, पर जैसे ही मुझे यह क्रिया याद आई, मेरे दिमाग में ये ख्याल आया कि मकड़ी को भी उस जाल में फंसाया जा सकता है। बस मैंने वैसे ही किया और तुम लोगों ने देखा कि मेरा प्रयोग सफल रहा।

“सही कहा आपने कैप्टेन, एक बार फिर आपने मुझे बचा लिया।” जेनिथ ने सुयश को धन्यवाद देते हुए कहा - “अब हमें तुरंत आगे बढ़ जाना चाहिये कैप्टेन। नहीं तो यहां पर फिर कोई मुसीबत आ जायेगी?"

जेनिथ की बात एकदम सही थी, इसलिये सभी उस स्थान से आगे की ओर बढ़ गये।

जारी रहेगा_____✍️
 
#206.

वीर: (24.01.2002, गुरुवार, रुद्रलोक, हिमालय)

नीलाभ को सर्वप्रथम वीरमभद्र से आशीर्वाद प्राप्त करना था। नीलाभ अब वहीं हिमालय की बर्फ पर, आँख बंद कर बैठ गया और अपने अंतर्ज्ञान रुपी चक्षु से वीरमभद्र के बारे में जानकारी निकालने लगा।

वीरमभद्र जन्म कथा- ब्र..देव के मानस पुत्र, प्रजापति की बहुत सी पुत्रियां थीं। सभी पुत्रियां गुणवान और विलक्षण थीं। फिर भी प्रजापति को संतोष नहीं था वह चाहते थे कि उनके घर में एक सर्वशक्तिमान पुत्री का जन्म हो।

इसके लिये वह शक्ति स्वरुप माँ आद्या की पूजा करने लगे। माँ आद्या ने प्रकट हो कर दक्ष से, उनकी पुत्री के रुप में जन्म लेने का वचन दिया। इसी तप के फलस्वरुप माँ आद्या ने 'सती' के रुप में राजा दक्ष के घर जन्म लिया।

सती, बचपन से ही बहुत विलक्षण और बुद्धिमान थीं। जब वह बड़ी हो गईं, तो दक्ष ने उनका विवाह करने के बारे में सोचा। दक्ष ने इसके लिये ब्रह्देव से परामर्श लिया। देव ने कहा कि सती, आद्या की ‘आदिशक्ति' स्वरुप हैं और महानदेव 'आदि पुरुष' हैं, इसलिये सती का विवाह देव के साथ ही होना चाहिये। ब्र…देव की बात मान दक्ष ने सती का विवाह देव के साथ कर दिया।

एक बार ब्र…देव ने धर्म के प्रसार के लिये, एक भव्य सभा का आयोजन किया, जिसमें सभी एकत्रित हुए। जब सभा में प्रजापति का आगमन हुआ, तो सभी देवता उनके स्वागत में खड़े हो गये, परंतु देव ने ऐसा नहीं किया।

यह देख दक्ष मन ही मन बहुत क्रोधित हुए, उन्होंने देव से इस अपमान का बदला लेने का विचार किया। इस विचार के फलस्वरुप दक्ष ने भी एक बहुत बड़े यज्ञ का आयोजन किया।

दक्ष ने इस यज्ञ में सभी देओं और ऋषियों को बुलाया, परंतु म…देव को ईर्ष्यावश आमंत्रित नहीं किया। अतएव देव ने उस यज्ञ में जाने से मना कर दिया। परंतु सती अपने पितृभाव से वशीभूत होकर, उस यज्ञ में जाने की हठ करने लगीं।

ज्यादा हठ करने से देव ने सती को नंदी के साथ उस यज्ञ में जाने की आज्ञा दे दी। यज्ञ से पूर्व सभी देओं के लिये यज्ञाहुति का एक भाग निकाला जाना था। परंतु दक्ष ने ईर्ष्यावश महानदेव का भाग यज्ञाहुति में नहीं निकाला, जिससे सती बहुत अपमानित महसूस करने लगीं।

सती को अब देव के वचन बार-बार याद आ रहे थे, अतः अपमान की पराकाष्ठा को देख सती उस यज्ञ के जलती ज्वाला के मध्य कूद गईं। अग्नि की भयानक लपटों ने सती के शरीर को जलाना शुरु कर दिया।

उधर जैसे ही यह समाचार देव को प्राप्त हुआ, वह अत्यंत क्रोध से भर गये।

"क्रुद्धः सुदष्टष्ठपुट: स धूर्जटिर्जटां तडिद्व ह्निस टोग्ररो चिषम्।

उत्कृत्य रुद्रः सहसोत्थि तो हसन् गम्भीरना दोविससर्जतां भुवि।।

ततोऽतिकाय स्तनुवा स्पृशन्दिवं।"

अर्थात सती के प्राण त्यागने से दुखी, देव ने उग्र रूप धारण कर, क्रोध में अपने होंठ चबाते हुए, अपनी एक जटा उखाड़ ली, जो बिजली और अग्नि की लपट के समान दीप्त हो रही थी। सहसा खड़े होकर उन्होंने गंभीर अठ्ठास के साथ जटा को पृथ्वी पर पटक दिया। इसी से महाभयंकर वीरभद्र प्रगट हुए।

देव ने वीरभद्र को दक्ष के यज्ञ का विध्वंश करने भेज दिया। जहां पर वीरभद्र ने व…ष्णु से भी युद्ध करते हुए दक्ष का सिर काटकर यज्ञ की अग्नि को भेंट कर दिया।

.........................................

नीलाभ को अब वीरभद्र के बारे मे सबकुछ पता चल गया था। नीलाभ अब अपने स्थान से खड़ा हुआ। अब उसके हाथों में एक धारदार चाकू दिखाई देने लगा था।

नीलाभ ने उस चाकू से अपने हाथ को जरा सा काटा और अपने रक्त के एक बूंद को हवा में उछाल दिया।

नीलाभ के ऐसा करते ही, हवा में फैली रक्त की बूंद से, एक नीले रंग की छोटी सी, परंतु सुंदर चिड़िया प्रकट हुई, जो हवा में अपने पंख बहुत तेजी से हिला रही थी।

“नीलिमा, तुम मुझे देव वीरभद्र के पास ले चलो।' नीलाभ ने कहा।

नीलाभ का आदेश मान, नीलिमा नामक वह छोटी चिड़िया उड़कर एक दिशा की ओर चल दी। नीलाभ अब नीलिमा का पीछा कर रहा था।

नीलिमा उड़ती हुई अनेकों पर्वतों और पठारों को पार करती हुई, एक ऐसे बर्फीले स्थान पर पहुंची, जहां पर एक बहुत ऊंची सी पहाड़ी की चोटी थी। नीलिमा उस चोटी के पास जमीन पर जाकर बैठ गई और उस चोटी की बर्फ को अपनी चोंच से हटाने की कोशिश करने लगी।

यह देख नीलाभ भी उस स्थान की बर्फ को साफ करने लगा। कुछ देर के बाद नीलाभ को उस बर्फ के पीछे किसी विशाल मूर्ति के होने का अहसास हुआ।

अब नीलाभ ने नीलिमा को पीछे किया और अपनी शक्ति से, उस स्थान की बर्फ को, एक झटके में साफ कर दिया।

उस विशाल हिमखण्ड के नीचे म..देव की कंधे तक बनी विशाल मूर्ति थी। यह देख नीलाभ नीलिमा को देखने लगा।

शायद वह नीलिमा से पूछना चाह रहा था कि वह उसे यहां क्यों लेकर आई है? पर तभी नीलाभ को देव की मूर्ति के बाल बिल्कुल असली जैसे लगे, जो कि तेज हवा चलने की वजह से, मंद-मंद लहरा रहे थे।

अब नीलाभ को याद आया कि वीरभद्र की उत्पत्ति देव के बालों से ही तो हुई थी। यह सोच अब वह देव के बालों को ध्यान से देखने लगा।

तभी कहीं से हवा के एक तेज झोंका आया और देव के सिर का एक बाल टूटकर हवा में उड़ गया।

यह देख नीलाभ बिना कुछ सोचे-समझे उस बाल के पीछे दौड़ पड़ा।

देव का वह बाल, हवा में ऊंचे और ऊंचे उड़ता जा रहा था। उस बाल के पीछे दौड़ रहे नीलाभ को पूर्ण विश्वास था कि यह बाल ही वीरभद्र हो सकते हैं।

तभी देव का बाल एक शि..लिंग के समान बने, गोल पत्थर से जाकर लिपट गया। नीलाभ दौड़ता हुआ उस पत्थर के पास पहुंच गया। देव का बाल किसी रस्सी की भांति उस पत्थर से लिपटा हुआ था।

नीलाभ ने हाथ बढ़ाकर देव के बाल को पकड़ा और जोर से खींच लिया। अब वह बाल तो नीलाभ के हाथ में आ गया, पर जोर से खींचने की वजह से, जिस पत्थर से वह बाल लिपटा था, वह गोल-गोल घूमकर किसी लटू की भांति जमीन में समा गया।

अब नीलाभ कभी अपने हाथों में थमे उस बाल को, तो कभी वहां बर्फ में मौजूद गड्ढे को ध्यान से देख रहा था।

तभी नीलाभ के हाथ में पकड़ा वह बाल, एक भयानक सर्प में परिवर्तित हो गया और नीलाभ के हाथों से निकलकर उसी गड्ढे में समा गया।

नीलाभ बहुत देर तक उस गड्ढे को देखता रहा और फिर उसने उस गड्ढे में छलांग लगा दी।

नीलाभ उस अंतहीन गड्ढे में फिसलता ही जा रहा था। उसे फिसलते हुए लगभग 10 मिनट बीत गये थे, पर वह गड्ढा खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा था। उस गड्ढे में बिल्कुल धुप्प अंधेरा था।

आखिरकार वह गड्ढा, एक प्राचीन मं..दि. के पास जाकर समाप्त हुआ। नीलाभ उस प्राचीन मं..दर के प्रांगण में जाकर गिरा। उस स्थान पर पूर्ण उजाला था, इसलिये सब कुछ साफ-साफ दिखाई दे रहा था।

मं..दर की दीवारें काफी पुराने पत्थरों से निर्मित प्रतीत हो रहीं थीं। तभी नीलाभ की नजरें मंद..र के अंदर की ओर गईं, जहां की छत, जमीन और दीवार सभी जगह पर सर्प ही सर्प दिखाई दे रहे थे।

नीलाभ ने अपनी पूरी जिंदगी में, कभी एक साथ इतने सारे सर्प नहीं देखे थे। इसलिये वह आश्चर्य से चारो ओर देखने लगा। नीलाभ को डर था कि कहीं उसे कोई सर्प डंस ना ले।

ऐसा नहीं था कि नीलाभ पर किसी सर्प के जहर असर होता, बल्कि उसे डर था कि यदि किसी भी सर्प ने उसे डंसा, तो वह सर्प मारा जायेगा।

कुछ सोचने के बाद नीलाभ उस मं..दर में प्रवेश कर गया। अब नीलाभ अपने मुंह से, हवा में धीरे-धीरे बहुत कम मात्रा में जहर छोड़ने लगा।

नीलाभ के जहर के प्रभाव से सभी सर्यों को अपना दम घुटता सा प्रतीत हुआ, इसलिये सभी नीलाभ के लिये रास्ता छोड़ने लगे।

नीलाभ अपने लिये रास्ता बनता देख अंदर की ओर चल पड़ा। अंदर पहुंचने पर नीलाभ को एक विशाल सर्प की मूर्ति अपना मुंह खोले हुए बनी दिखाई दी।

सर्प का मुंह इतना विशाल था कि उसके मुंह में अंदर जाने के लिये एक रास्ता भी बना हुआ था।

नीलाभ ने ध्यान से सर्पमुख समान गुफा को देखा और उसकी ओर चल दिया। तभी नीलाभ के रास्ते में देवी भद्र…ली प्रकट हो गईं।

श्यामवर्ण, मुख पर ज्वाला समान तेज, सुर्ख लाल बाहर निकली जीभ, एक हाथ में रक्त का प्याला और दूसरे हाथ में कृपाण लिये, नरमुंडों की माला पहने, त्रिनेत्र वाली देवी साक्षात काल लग रहीं थीं।

भद्र…ली को देख, नीलाभ तुरंत घुटनों के बल बैठ, उन्हें नमन करने लगा।

“तुम यहां क्यों आये हो नीलाभ?” तेज आवाज वातावरण में उभरी।

“मैं यहां देव वीरभद्र से आशीर्वाद लेने आया हूं माता।” नीलाभ ने भद्…ली से बिना नजरें मिलाए कहा।

“वीरभद्र से मिलने से पहले तुम्हें मुझे प्रसन्न करना होगा नीलाभ, अन्यथा तुम यहां से आगे कदापि नहीं बढ़ पाओगे।”

“कृपया मुझे बताइये माता कि आप किस प्रकार प्रसन्न होंगी?” नीलाभ ने भद्…ली से पूछा।

“बहुत दिनों से मेरी जिह्वा प्यासी है नीलाभ। क्या तुम मुझे रक्तपान करा सकते हो?" भद्र..ली ने आग्नेय नेत्रों से नीलाभ को देखते हुए कहा।

"जैसी आपकी आज्ञा माता।” भद्र…ली के मुख से इतना निकलते ही, नीलाभ ने बिना कुछ सोचे समझे भद्रकाली के हाथ से कृपाण लिया और एक झटके से अपना बांया हाथ काट दिया।

नीलाभ के हाथ से रक्त की धारा बह निकली। परंतु नीलाभ को तो जैसे कोई फर्क ही नहीं पड़ रहा था, उसने भद्रकाली के हाथ से खप्पर ले, उसे अपने रक्त से भर दिया।

नीलाभ ने अब वह रक्त का प्याला भद्र..ली के हाथ में दे दिया। अब भद्र..ली के चेहरे पर सौम्यता नजर आने लगी थी। उन्होंने नीलाभ के कटे हुए हाथ की ओर देखा और सर्पमुखी गुफा के सामने से हट गईं।

"तुम्हारा कल्याण हो नीलाभ।” भद्र…ली ने कहा और रोशनी के एक तेज झमाके से वह गायब हो गईं।

नीलाभ उसी प्रकार अपना कटा हाथ लिये उस सर्पमुखी गुफा में प्रविष्ठ हो गया।

गुफा की दीवारों पर जगह-जगह कुछ चमकीले रत्न लगे थे, जिससे तेज रोशनी प्रस्फुटित हो रही थी।

उस रोशनी के कारण, पूरी गुफा जगमगा रही थी। नीलाभ लगातार उस गुफा में आगे बढ़ता जा रहा था।

तभी उसे रास्ते में बहुत से जलते अंगारे दिखाई दिये। अब उस स्थान से आगे बढ़ने के लिये उन अंगारों पर से ही होकर जाना पड़ता। यह देख नीलाभ वहीं पर रुक गया।

तभी नीलाभ को अंगारों के अंत में धुनि रमाए, आसन की मुद्रा में, कोई बैठा दिखाई दिया। उस स्थान पर ज्यादा उजाला नहीं था, इसलिये बैठे हुए व्यक्ति का पूरा चेहरा नहीं दिखाई दे रहा था।

लेकिन इससे पहले कि नीलाभ कुछ और सोच पाता, वातावरण में एक भारी सी आवाज गूंजी- “तुम रुक क्यों गये नीलाभ? तुम तो मेरा आशीर्वाद लेने आये हो ना तो फिर आगे बढ़कर मेरे पास आओ नीलाभ।"

आवाज को सुन नीलाभ जान गया कि यह आवाज यकीनन वीरभद्र की है। अतः वह अंगारों पर पैर रखकर वीरभद्र की ओर चल पड़ा।

पर जैसे ही नीलाभ के पैर अंगारों पर पड़े, उसे अपना पैर ही नहीं अपितु पूरा शरीर जलता हुआ सा महसूस हुआ।

पर ऐसी मुश्किलों से नीलाभ घबराने वाला नहीं था। वह निरंतर अंगारों पर चलता आगे बढ़ रहा था।

धीरे-धीरे अंगारों ने नीलाभ के पैर में आग पकड़ ली, अब वह आग तेजी से नीलाभ के शरीर के ऊपर की ओर बढ़ने लगी।

नीलाभ को ऐसा महसूस हो रहा था कि वह जितना भी आगे बढ़ रहा है, वीरभद्र उतना ही आगे जा रहे हैं।

नीलाभ के अथक प्रयास के बाद भी नीलाभ, वीरभद्र तक नहीं पहुंच पा रहा था।

अंगारों की अग्नि अब नीलाभ के सीने तक पहुंच गई थी। नीलाभ के पैरों का मांस पूरी तरह से जल चुका था, जिसकी वजह से अब पैरों के स्थान पर चमकती हड्डियां दिखाई देने लगीं थीं।

“अगर मुझ तक नहीं पहुंच पा रहे हो नीलाभ, तो अभी भी समय है। स्वयं को यातना देने की जगह, वापस लौटकर अपना सुखमय जीवन व्यतीत करो नीलाभ।" वीरभद्र ने कहा।

“मेरा जन्म ही मनुष्यों की भलाई के लिये हुआ है देव, अगर यह शरीर उनकी भलाई के लिये किसी कार्य की भेंट चढ़ रहा है, तो यह मेरे लिये कष्ट की नहीं, अपितु प्रसन्नता की बात है। इसलिये आज या तो मैं आपसे आशीर्वाद लेकर जाऊंगा, या फिर इन्हीं अंगारों में अपने शरीर को नष्ट कर, दूसरा जन्म लेकर फिर आपके पास आऊंगा देव।” नीलाभ ने अपने दर्द को पीते हुए वीरभद्र से कहा।

“तुम बहुत हठी लगते हो।” वीरभद्र ने कहा- “ठीक है कोशिश करते रहो।"

वीरभद्र की बात सुन, नीलाभ फिर से अंगारों पर आगे बढ़ने लगा। कुछ ही देर में नीलाभ का पूरा शरीर, अंगारों की अग्नि में जल गया। अब सिर्फ उसका सिर ही बचा था, फिर भी नीलाभ प्रयासरत था।

वीरभद्र की नजरें लगातार नीलाभ पर बनी हुईं थीं। आखिरकार अब नीलाभ की शक्ति जवाब देने लगी, अब आग उसके चेहरे पर भी लग गई थी । अचानक नीलाभ का शरीर हवा में लहराया और अंगारों के ऊपर गिरने लगा।

तभी वीरभद्र ने नीलाभ के शरीर को हवा में ही थाम लिया और उसे लेकर अंगारों के दूसरी ओर आ गये।

वीरभद्र ने लगभग निष्प्राण हो चुके नीलाभ के शरीर को वहीं जमीन पर लिटाया और अपने कमण्डल से जल लेकर, कुछ मंत्र पढ़ते हुए, उस जल को नीलाभ के शरीर पर फेंक दिया।

नीलाभ के शरीर पर जल पड़ते ही नीलाभ का पूरा शरीर बिल्कुल ठीक हो गया। नीलाभ ने अब कराह कर अपनी आँख खोली और वीरभद्र को देख उन्हें हाथ जोड़कर प्रणाम किया। अब नीलाभ का वह कटा हाथ भी सही हो गया था, जो उसने भद्र…ली के लिये काटा था।

“तुम अद्भुत हो नीलाभ।” वीरभद्र ने कहा- “जो व्यक्ति शिव के लिये शव बनने के लिये तैयार हो जाये, उससे बड़ा देव का भक्त कोई नहीं होगा। जाओ नीलाभ, मेरा आशीर्वाद सदैव तुम्हारे साथ है। जाकर मनुष्यों का कल्याण करो।" यह कहकर वीरभद्र ने अपने हाथ को वरमुद्रा में कर लिया।

वीरभद्र के हाथों से तेज प्रकाश निकलकर नीलाभ पर पड़ा और जब नीलाभ की आँखें खुलीं, तो वह उसी बर्फ की चोटी के पास जमीन पर पड़ा था, जहां उसे देव की प्रतिमा दिखाई दी थी।

इस समय नीलिमा, नीलाभ के सिर के पास बैठी 'चीं-चीं कर रही थी। नीलाभ बर्फ से खड़ा हुआ और नीलिमा को अपने कंधे पर बैठाकर देव के दूसरे अवतर 'भैरव' को ढूंढने के लिये निकल पड़ा।

जारी रहेगा_____✍️
 
#207.

चैपटर-12

ड्रैगन ब्रेथ नदी: (तिलिस्मा 5.43)

सुयश, जेनिथ, क्रिस्टी व शैफाली स्वादेन्द्रिय के खट्टे भाग को पार कर आगे बढ़ रहे थे। तभी उन्हें फिर से एक बोर्ड दिखाई दिया- “तृतीय विश्राम, तिलिस्मा 5.4, दूरी 10 किलोमीटर, उत्तर दिशा।"

"लो अब इस द्वार से निकलने की दूरी मात्र, 10 किलोमीटर ही बची है।" क्रिस्टी ने बोर्ड की ओर देखते हुए कहा।

सभी बातें करते हुए धीरे-धीरे पैदल ही आगे बढ़ रहे थे। लगभग आधा घंटा ऐसे ही चलने के बाद, सभी को एक नदी दिखाई दी, जिसके बीच में एक विशाल पेड़ लगा था। जिस पर लाल रंग की मिर्च लटक रही थी।

"लो मिर्च का पेड़ दिखाई दे गया। इसका मतलब कड़वा क्षेत्र शुरु हो चुका है।” जेनिथ ने कहा।

“यह तो ड्रैगन ब्रेथ मिर्च का पेड़ है, जो कि यूनाइटेड किंगडम में पाया जाता है।” क्रिस्टी ने पेड़ को देखते हुए कहा- “यह विश्व की सबसे कड़वी मिर्च है, इसकी SHU 24 लाख के भी ऊपर होती है।"

(SHU: Scoville Heat Unit; एक प्रकार की यूनिट, जिससे किसी भी मिर्च की कड़वाहट नापी जाती है)

“इस पेड़ से तो बहुत सी मिर्च टूटकर इस नदी के पानी में भी गिरी हुई हैं।” शैफाली ने नदी के पानी को देखते हुए कहा- “और नदी का पानी भी रुका हुआ है, इसका साफ मतलब है कि नदी का पानी भी, अत्यंत कड़वा होकर विषाक्त हो गया होगा। और ऐसी स्थिति में हम तैर कर इस नदी को नहीं पार कर सकते?"

“तैर कर पार करने की जरुरत भी नहीं है।" जेनिथ ने एक ओर इशारा करते हुए कहा- “वह देखिये, नदी के किनारे पर 4 गोल डोंगियां बंधी हुई हैं।"

“पर कैश्वर ने अगर नदी किनारे यह डोंगियां रखीं हैं, तो अवश्य ही इनमें किसी प्रकार को कोई पेंच डाल रखा होगा?” क्रिस्टी ने कहा।

"लेकिन डोंगियों के सिवा हमारे पास और कोई चारा है भी नहीं। इसलिये हमें इन्हीं से ही नदी को पार करना होगा।” सुयश ने लाचारी भरी शब्दों में कहा- “लेकिन नदी में उतरने से पहले, जिसको जो भी बचाव का साधन दिखाई दे, वह उसे ले ले और मानसिक रुप से पूरी तरह तैयार रहे, कि बीच नदी में कोई ना कोई मुश्किल आयेगी ही?"

सुयश की बात सुन सभी ने आसपास देखकर कुछ ना कुछ उठा लिया। किसी ने पेड़ की जड़, तो किसी ने पत्थर या लकड़ी। अब सभी तैयार थे, नदी में जाने के लिये।

सभी डोंगियों के पास पहुंच गये और उन्होंने पेड़ से बंधी डोंगियों को खोल लिया, पर किसी ने भी उन डोंगियों की रस्सी को फेंका नहीं था।

जेनिथ ने डोंगी में बैठने के पहले, एक बार अपना हाथ नदी के पानी में डाला, जो कि तुरंत झुलस गया।

“कैप्टेन, नदी का पानी बहुत जहरीला है, हमें बचकर रहना होगा।” जेनिथ ने कहा।

तभी नक्षत्रा ने जेनिथ के हाथ को अपनी हीलींग पॉवर से सही कर दिया।

अब सबसे आगे सुयश, फिर शैफाली, फिर क्रिस्टी और आखिर में जेनिथ, उन डोंगियों में बैठकर नदी के दूसरी छोर की ओर चल दिये।

डोंगियों में एक-एक चप्पू रखा था, जिसके द्वारा उस डोंगी को चलाना था।

शुरु-शुरु में सभी को डोंगी चलाने में बहुत परेशानी आयी, पर फिर सुयश के गाइड करने पर सभी डोंगियों को लेकर आगे की ओर बढ़ने लगे।

सभी अपनी डोंगी को ड्रैगन ब्रेथ मिर्च के पेड़ से दूर ही रख रहे थे। उन्हें पता था कि अगर एक भी मिर्च उनके शरीर से छू भी गया, तो वह शरीर के उस भाग को पूरी तरह से जला देगा।

कुछ ही देर में आधा रास्ता बिना बाधा के पार हो गया, तभी शैफाली की नजर अपनी डोंगी पर गई। डोंगी के आकार को देख वह हैरान हो गई।

“कैप्टेन अंकल, हमारी डोंगी का आकार धीरे-धीरे छोटा होता जा रहा है, अगर यह इसी प्रकार छोटा होता रहा, तो यह हमें बीच नदी में डुबो देगा।” शैफाली ने सुयश की ओर देख चिल्लाकर कहा।

शैफाली की आवाज सुन अब सभी अपनी-अपनी डोंगियों को देखने लगे। शैफाली का कहना सही था, सभी की डोंगियां धीरे-धीरे छोटी हो रही थी।

“अब क्या करें कैप्टेन, हम जिस गति से नदी के दूसरी ओर जा रहे हैं, उस गति से हम नदी के बीच में ही मरने वाले हैं।” क्रिस्टी ने घबराकर कहा।

पर इससे पहले कि कोई कुछ कह पाता, पानी से एक प्लीसियो सारस ने अपनी गर्दन, पानी के बाहर निकाली। (प्लीसियो सारस डाइनासोर की प्रजाति का जीव है, जो करोड़ों वर्ष पहले ही विलुप्त हो चुका है)

प्लीसियो सारस शरीर से काफी विशालकाय था। वह लगभग 100 फुट के आसपास था। उसकी लंबी गर्दन को छोड़ उसके शरीर का बाकी हिस्सा पानी के अंदर ही था।

"लो अब इसी की कमी थी।” जेनिथ ने गुस्साकर कहा- “एक तो वैसे ही हम नदी के बीच में मरने वाले हैं, ऊपर से यह भी आ गया, जल्दी से हमारी जान लेने को।"

किसी के पास उस प्लीसियो सारस से नदी के बीच में बचने का कोई उपाय नहीं था।

“घबराओ नहीं दोस्तों, और चुपचाप चलते रहो, प्लीसियो सारस समुद्री मछलियों और गहरे पानी के जंतुओं को खाता है, वह हमें कुछ नही कहेगा?" सुयश ने सबका हौसला बढ़ाते हुए कहा और अपनी डोंगी को तेजी से चलाने लगा।

प्लीसियो सारस स्वयं उन सभी को देखकर हैरान था। ऐसा लग रहा था कि उसने आज से पहले कभी इंसानों को देखा ही नहीं था।

उधर डोंगी में अब किसी तरह से, सिकुड़कर बैठने बराबर ही जगह बची थी।

“कैप्टेन आप सबको लेकर तेजी से नदी के किनारे की ओर बढ़िये, इस प्लीसियो सारस को मैं देखती हूं।"

यह कहकर क्रिस्टी नदी के किनारे की ओर जाने की जगह प्लीसियो सारस की ओर बढ़ने लगी।

किसी की समझ में क्रिस्टी का प्लान नहीं आया था, पर अब वह सभी तेजी से नदी के दूसरे किनारे की ओर, अपनी डोंगी को लेकर भागने लगे।

उधर क्रिस्टी को अपनी ओर आता देख प्लीसियो सारस ने हैरानी से, अपनी लंबी गर्दन सहित अपना सिर क्रिस्टी की डोंगी की ओर बढ़ाया।

प्लीसियो सारस ने डोंगी के अगले सिरे को पकड़कर एक तेज झटका दिया, उस तेज झटके से क्रिस्टी की डोंगी पानी में पलट गई।

पर क्रिस्टी पहले से ही इसके लिये तैयार थी।

जैसे ही क्रिस्टी की डोंगी पानी में पलटी, क्रिस्टी ने उछलकर प्लीसियो सारस के गर्दन में, अपने हाथ में पकड़ी रस्सी फंसाकर लटक गई।

अब प्लीसियो सारस ने क्रिस्टी को पकड़ने के लिये अपना मुंह नीचे किया, पर इसी के साथ प्लीसियो सारस की गर्दन से लिपटी क्रिस्टी भी अपने आप नीचे हो गई।

क्रिस्टी ने अब अपने पैर की कैंची बनाकर प्लीसियो सारस की गर्दन को कसकर पकड़ लिया।

प्लीसियो सारस अब क्रिस्टी की पकड़ से छूटने के लिये अपनी गर्दन को जोर-जोर से हिला रहा था।

पर क्रिस्टी ने उसे छोड़ने की जगह, रस्सी के एक सिरे में गांठ मार दी। अब रस्सी पूरी गिरफ्त के साथ प्लीसियो सारस की गर्दन में बंध चुकी थी।

उधर सुयश सहित सभी अभी भी नदी के दूसरे किनारे से दूर थे, पर अब उनकी डोंगी बहुत छोटी हो गई थी। बामुश्किल ही सभी अपने शरीर का बैलेंस बनाकर किसी तरह उस पर बैठे थे।

“कैप्टेन।” तभी क्रिस्टी ने चीखकर सुयश का ध्यान अपनी ओर करवाया- “सब लोग अपने पास रखी रस्सी को एक में मिलाकर कसकर बांध दो।"

क्रिस्टी की बात सुनकर सभी आश्चर्य से भर गये कि क्रिस्टी स्वयं तो नदी के बीच लटकी हुई है, फिर भला वह उन लोगों को बचाने के बारे में कैसे सोच रही है?" पर सभी ने अपनी डोंगियों को आपस में जोड़कर सभी रस्सियों को क्रिस्टी के कहे अनुसार मिला लिया।

उधर क्रिस्टी ने अब प्लीसियो सारस की गर्दन में फंसी रस्सी के दूसरे सिरे को पकड़ा और हवा में छलांग लगा दी।

अब क्रिस्टी पूरी तरह से प्लीसियो सारस की गर्दन में झूल रही थी।

तभी परेशान हो चुके प्लीसियो सारस ने अपनी लंबी गर्दन को हवा में तेजी से दांये-बांये घुमाना शुरु कर दिया।

जैसे-जैसे प्लीसियो सारस की गर्दन हवा में घूम रही थी, वैसे-वैसे रस्सी के सहारे लटकी, क्रिस्टी के शरीर के झूलने की गति भी बढ़ती जा रही थी।

जब गति काफी तेज हो गई, तो अब क्रिस्टी ने एक बार नदी के दूसरे किनारे की ओर देखा, और जैसे ही इस बार प्लीसियो सारस ने अपनी गर्दन को दाहिनी ओर झटका दिया, क्रिस्टी ने अपने हाथ में पकड़ी रस्सी को छोड़ दिया।

क्रिस्टी का शरीर हवा में उड़ता हुआ, नदी के दूसरे किनारे पर जा गिरा। लेकिन क्रिस्टी को रत्ती भर भी चोट नहीं आई थी, क्यों कि क्रिस्टी की लैडिंग नदी किनारे अपने पैरों पर हुई थी।

क्रिस्टी तुरंत अपनी जगह से भागकर नदी के उस ओर आ गई, जिधर सुयश सबकी डोंगी को लेकर आ रहा था।

“कैप्टेन, जल्दी से अपनी बनाई रस्सी मेरी ओर फेंको।" क्रिस्टी ने चीखकर सुयश से कहा।

सुयश ने रस्सी का गोला पहले से ही बनाकर रखा था, क्रिस्टी की आवाज सुनते ही उसने रस्सी के आखिरी सिरे को जेनिथ को पकड़ाया और उस रस्सी के गुच्छे को पूरी ताकत से क्रिस्टी की ओर उछाल दिया।

क्रिस्टी ने हवा में ही रस्सी को लपका और उसे एक पेड़ में फंसाकर पूरी ताकत से खींचने लगी।

सुयश, जेनिथ और शैफाली, तीनों की डोंगी, अब मात्र पैर रखने के बराबर बची थी। लेकिन क्रिस्टी के तेजी से खींचने की वजह से वह डोंगी तुरंत ही नदी के दूसरे किनारे पर पहुंच गई।

तीनों तुरंत डोंगी से उतरकर नदी के दूसरी ओर आ गये। क्रिस्टी अब जमीन पर लेटकर तेज-तेज साँस ले रही थी।

पर जो भी हो क्रिस्टी ने एक बार फिर से अपनी श्रेष्ठता सिद्ध कर दी थी।

सभी खुश थे क्यों कि अब उनके सामने ही तिलिस्मा का अगला द्वार दिख रहा था। सभी उठकर तिलिस्मा के अगले द्वार में प्रवेश कर गये।

जारी रहेगा_____✍️
 
#208.

अष्टकोणीय सत्य: (24.01.2002, गुरुवार, मैनहट्टन, न्यूयार्क, अमेरिका)

आर्केडिया न्यूयार्क पहुंच चुका था। आर्ची ने अदृश्य करके आर्केडिया को 'हडसन नदी' में उतार लिया था।

मैनहट्टन का वह क्षेत्र, जहां महेन्द्र शर्मा का घर था, वहां से ज्यादा दूर नहीं था। शलाका और जेम्स आर्केडिया से निकलकर मैनहट्टन की 6 स्ट्रीट पर पहुच गये।

कुछ ही देर में दोनों उस पते पर खड़े थे, जो कि शारदा ने दिया था। शलाका, देवोम को जल्द से जल्द देखना चाहती थी। इसलिये शलाका ने आगे बढ़कर घर की घंटी बजा दी।

कुछ देर के बाद लगभग एक 70 वर्षीय बूढ़े ने घर का दरवाजा खोला, जिसके चेहरे पर एक चश्मा लगा हुआ था, लेकिन इस उम्र में भी वह किसी आर्मी के जवान की तरह से फिट दिखाई दे रहा था।

“जी, हमें महेन्द्र शर्मा जी से मिलना है।” शलाका ने उस बूढ़े को देखते हुए हिंदी भाषा में कहा।

“कहिये, क्या कहना है आपको? मैं ही हूॅ महेन्द्र शर्मा।” महेन्द्र ने शलाका और जेम्स को ऊपर से नीचे तक देखते हुए कहा।

“मुझे आपसे भारत में मिले अष्टकोण के बारे में बात करनी है।” शलाका ने बिना ज्यादा कुछ घुमाये-फिराये महेन्द्र से कहा।

“अष्टकोण!" अब महेन्द्र के चेहरे पर आश्चर्य के भाव उभरे, जिसे शलाका ने तुरंत पहचान लिया- “कौन हैं आप लोग?"

“क्या हम अंदर बैठकर बात कर सकते हैं?" शलाका ने इधर-उधर देखते हुए कहा।

शलाका की बात सुन महेन्द्र एक पल को सोच में पड़ गया, फिर जाने क्या सोचकर उसने शलाका और जेम्स को अंदर आने को कह दिया।

शलाका और जेम्स अंदर आकर बैठ गये। तभी शलाका की नजर, सामने टेबल पर रखे एक फोटो फ्रेम पर गई। उस फोटो फ्रेम में महेन्द्र, उनकी पत्नी और उनका बेटा देवोम, तीनों दिख रहे थे।

इस फोटो में देवोम काफी छोटा था। परंतु शलाका की तेज आँखों ने देवोम को तुरंत पहचान लिया, वह वही दिव्य बालक था....आर्यन और आकृति का पुत्र जिसकी आँखों में सूर्य के समान तेज दिखाई दे रहा था।

महेन्द्र ने शलाका की आँखों का पीछा करके, यह देख लिया कि शलाका उस फोटो फ्रेम को देख रही है। अतः वह बोल उठा- “ये फोटो देव के बचपन की है, तब वह मात्र …वर्ष का था।"

शलाका ने धीरे से सिर हिलाया और आगे बढ़कर उस फोटो फ्रेम को उठा लिया।

“आर्ची, इस फोटो को अपने डेटा में सेव कर लो।" शलाका ने अपने मन में आर्ची से कहा।

“कर लिया।" आर्ची ने शलाका की आँखों का प्रयोग करके, उस तस्वीर को अपने डेटा में सेव कर लिया।

अब शलाका ने एक बार और ध्यान से उस अद्भुत बालक को देखा और फिर उस फोटो फ्रेम को वापस टेबल पर रखकर, महेन्द्र के सामने आकर बैठ गई।

"महेन्द्र जी,... मेरा नाम शलाका है....मैं पिछले 25 वर्षों से उस अष्टकोण को ढूंढ रही हूं इसलिये अब आप मुझसे कुछ ना छिपाएं और मुझे सारी बातें सचसच बता दें कि आप उस अष्टकोण के बारे में क्या-क्या जानते हैं?” शलाका ने तीखी निगाहों से महेन्द्र को देखते हुए कहा।

शलाका की बात सुन महेन्द्र ने कसमसाकर, अपने शरीर के बैठने के अंदाज को ठीक किया और फिर बोलना शुरु कर दिया- “आज से लगभग 22 वर्ष पहले, जब हम भारत के उज्जैन शहर में रहते थे, उस समय एक रात, जब मैं और मेरी पत्नी गायत्री, अपने बेडरुम में सो रहे थे कि तभी हमें अपने बेड के नीचे से एक अजीब सी ‘धम्-धम्' की आवाज आती हुई सुनाई दी। धीरे-धीरे वह आवाज थोड़ी तेज हो गई। हमने अपने बेड के नीचे झांक कर देखा, पर बेड के नीचे कोई नहीं था। जब हमने जमीन से कान लगाकर सुना, तो हमें वह आवाज जमीन के नीचे से आती हुई प्रतीत हुई। हमने उस रात कुदाल से अपने कमरे की पूरी जमीन को खोद डाला। हमें उस समय जमीन के नीचे से एक काँच का अष्टकोण मिला, जिसमें एक दिव्य बालक लेटा हुआ, मुस्कुरा रहा था।

“हमें बहुत आश्चर्य हुआ कि यह दिव्य बालक, बिना साँस लिये, उस जमीन के अंदर जिंदा कैसे था? हमने उस काँच के अष्टकोण को जमीन के अंदर से निकाल लिया। अब हमने उस अष्टकोण को तोड़ने के लिये हर प्रकार के औजार का प्रयोग किया, पर वह नहीं टूटा। इस प्रकार धीरे-धीरे पूरी रात बीत गई, पर हम उस अष्टकोण को किसी भी प्रकार से नहीं खोल पाये? अब थक कर हमने उस अष्टकोण को वहीं कमरे की खिड़की के पास रख दिया और सो गये। पूरी रात जगे होने के कारण हमें तुरंत नींद आ गई। सुबह किसी बच्चे की किलकारी की आवाज ने हमें जगा दिया। जब उठकर हमने देखा, तो हमें सूर्य की रोशनी खिड़की से निकलकर, उस काँच के अष्टकोण पर पड़ती दिखाई दी।

“सूर्य की किरणें पड़ने के बाद ना जाने कैसे वह अष्टकोण स्वतः ही खुल गया था और वह नन्हा दिव्य बालक, उस सूर्य की रोशनी में रोने की जगह, हंसता हुआ ऐसे खेल रहा था, मानो वह सूर्य की रोशनी में नहीं, बल्कि अपने पिता की गोद में हो। गायत्री ने उस दिव्य बालक को उठाकर अपनी गोद में ले लिया। तभी मेरी नजर उस अष्टकोण में उपस्थित एक सुनहरी रंग की धातु की शीशी पर गई, जिस पर एक 'ॐ' का निशान बना था, मैंने उस शीशी को उठाकर देखा, पर उसमें कुछ नहीं था।

"मैंने उस शीशी को अलमारी में उठाकर रख दिया और गायत्री को उस दिव्य बालक से खेलते देखता रहा। चूंकि हमारे कोई बच्चा नहीं था, इसलिये हमने सभी को यही बताया कि यह हमारा ही पुत्र है। उस बालक के चेहरे पर देवताओं सा तेज था और उस दिव्य शीशी पर 'ऊँ' लिखा था, इसलिये हमने अपने बालक का नाम 'देवोम' रख दिया। देवोम बहुत ही विलक्षण बालक था, वह बचपन से ही हर चीज को जल्दी सीख जाता था। कुछ समय बाद जब देवोम बड़ा हो गया, तो हम भारत छोड़कर अमेरिका में आकर बस गये।” इतना कहकर महेन्द्र चुप हो गया।

"इस समय देवोम कहां है? मुझे उससे मिलना है।" शलाका ने बेसब्र होते हुए कहा।

“नहीं मिल सकते वह पिछले 15 दिनों से कहीं गायब हो गया है?” महेन्द्र ने कहा।

महेन्द्र के शब्द सुन शलाका पर तो जैसे बिजली ही गिर गई- “क्याऽऽऽऽ?...कहां गायब हो गया?"

“आज से 15 दिन पहले, वह यह कहकर घर से गया था कि उसे कहीं नौकरी मिल गई है, जिसकी 5 दिन की ट्रेनिंग के लिये वह फ्लोरिडा जा रहा है, 5 दिन बाद वह वापस आ जायेगा।” महेन्द्र ने रोने वाले अंदाज में कहा “पर आज 5 तो क्या 15 दिन भी बाद भी उसकी खबर नहीं है। मुझे लगा था कि वह बुढ़ापे में हमारा सहारा बनेगा, पर वह जिस रहस्यमय अंदाज में हमें मिला था, उसी रहस्यमय अंदाज में गायब भी हो गया। मैंने अभी आपको इसलिये भी अंदर आने दिया कि मुझे लगा आपके पास देवोम की कोई खबर है?"

यह सुनकर एक पल के लिये शलाका का चेहरा थोड़ा मुर्झा सा गया, पर तुरंत ही उसने अपने पर नियंत्रण करते हुए कहा- “आप देवोम की कोई नई फोटो मुझे दे दीजिये, मैं उसे अवश्य ढूंढ लूंगी।

"नहीं है देवोम की एक भी नई फोटो हमारे पास नहीं है।” महेन्द्र ने सिर झुकाते हुए कहा।

"ऐसा कैसे हो सकता है?” शलाका ने आश्चर्य से महेन्द्र की ओर देखते हुए कहा- “मेरा मतलब है कि आज के समय में तो सभी लोग फोटोज रखते हैं... फिर आपके पास उसकी कोई फोटो क्यों नहीं है?... और आपने घर में बिना चेक किये एकदम से कैसे बोल दिया कि उसकी कोई फोटो आपके पास नहीं है?"

“क्यों कि जब उसको गायब हुए 10 दिन हो गये, तो मैंने पुलिस में कम्प्लेन लिखवा दी। कम्प्लेन लिखवाने पर जब पुलिस ने उसकी फोटो मांगी, तो हमने अपना पूरा घर छान मारा, पर उसके बचपन की इस फोटो को छोड़कर, उसकी सारी फोटो कहीं गायब हो गईं? हमने बहुत ढूंढा, पर उसकी कोई फोटो नहीं मिली?"

“यह कैसे हो सकता है? इसका मतलब वह जानबूझकर कहीं गया है? और उसी ने जाने से पहले अपनी सारी फोटो भी गायब कर दी हैं।” जेम्स ने काफी देर बाद कुछ कहा।

"पर वो ऐसा क्यों करेगा?" महेन्द्र ने कहा।

“शायद उसे पता हो कि कोई उसे ढूंढने आने वाला है?" जेम्स ने कहा।

“यह संभव नहीं हो सकता।” महेन्द्र ने जेम्स को देखते हुए कहा- “हमने आज तक उसे नहीं बताया कि वह हमें कहां से मिला था? या फिर वह कौन है? वैसे क्या आप यह बता सकती हैं कि वह कौन है? और हमारे कमरे में जमीन के नीचे कैसे आया?"

“यह बहुत लंबी कहानी है।” शलाका ने महेन्द्र से कहा- “बस आप इतना जान लीजिये कि वह एक देवपुत्र है, जिसे किसी कारणवश उस अष्टकोण में छिपाया गया था, पर अब उसकी तलाश देवताओं को भी है।“

शलाका की बात सुन महेन्द्र खुश होते हुए बोला "मुझे पता था कि वह कोई दिव्य बालक है। अगर वह आपको मिल जाता है, तो मुझे भी अवश्य बताइयेगा।"

“ठीक है।” शलाका ने कहा- “अब जरा मुझे उस सुनहरी दिव्य शीशी और अष्टकोण के बारे में भी बता दीजिये कि वह कहां है? वह भी आपके पास है या फिर वह भी कहीं खो गया?"

शलाका के कटाक्ष सुन महेन्द्र ने अपना सिर झुकाते हुए कहा- “वह दोनों चीजें, मैंने एक आर्कियोलॉजिस्ट को दे दिया था, जो कि अब न्यूयार्क के मशहूर ‘दि मेट क्लाएस्टर म्यूजियम' में रखी हैं। वह म्यूजियम यहां से मात्र 30 मिनट की दूरी पर है।"

यह सुन शलाका को महेन्द्र पर गुस्सा तो बहुत आया, पर उसने कुछ महेन्द्र को कुछ कहा नहीं।

"तो फिर अब हम चलते हैं अगर हमें देवोम की कोई जानकारी मिली, तो आपको अवश्य बतायेंगे।" यह कहकर शलाका खड़ी हुई और जेम्स को लेकर वहां से बाहर निकल गई।

“आपको क्या लगता है कि यह बूढ़ा सही बोल रहा था?" जेम्स ने शलाका से पूछा।

“यह पता करना तो बहुत आसान है, पर इसके लिये हमें पहले किसी शांत जगह पर बैठना होगा।” शलाका ने कहा।

"तो फिर क्यों ना ‘दि मेट क्लाएस्टर म्यूजियम' की ओर ही चलें, वहां पर एक ‘मामा सूशी' रेस्टोरेंट है, जहां पर जापानी -मैक्सिकन फ्यूजन फूड मिलता है। वहां पर बैठने के लिये काफी शांत जगह है।” जेम्स ने कहा।

“तुम्हें बहुत पता है न्यूयार्क के बारे में?” शलाका ने मुस्कुराते हुए कहा।

“हे देवी शलाका, आप भूल रही हैं कि मैं इसी शहर का हूं।" जेम्स अपना दाहिना हाथ अपने पेट से टच कराते हुए, अदब से झुकते हुए कहा।

“अच्छा, तो अब तुम मेरे कार्य के बीच अपना पर्सनल फूड भी खाना चाहते हो?” शलाका ने कहा।

“एक खाने का ही तो शौक है, जो बचपन से अभी तक चल रहा है।” जेम्स ने दुखी होते हुए कहा- “पर क्या आपके पास अमेरिकन डॉलर हैं, क्यों कि मैं खाने के बाद बर्तन नहीं धोना चाहता?"

“अब उदास मत हो, हम उधर ही चल रहे हैं और आर्ची के रहते किसी भी टाइप की करेंसी की जरुरत नहीं पड़ेगी।" यह कहकर शलाका ने अपने बैग से निकालकर, जेम्स को एक क्रेडिट कार्ड दिखाया।

“वाह, मानना पड़ेगा आपकी आर्ची को।” जेम्स ने कहा और एक टैक्सी को हाथ देकर रोक लिया।

कुछ ही देर में जेम्स और शलाका ‘मामा सूशी' रेस्टोरेंट में बैठे थे। जेम्स ने अपनी पसंद का खाना आर्डर कर दिया।

“आर्ची, जरा कम्प्यूटर पर देख कर बताओ कि क्या अष्टकोण और अमृत की शीशी अभी भी ‘दि मेट क्लाएस्टर म्यूजियम' में है या उसे कहीं और शिफ्ट कर दिया गया है?" शलाका ने आर्ची से कहा।

थोड़ी ही देर के बाद शलाका के दिमाग में आर्ची की आवाज उभरी- “अष्टकोण अभी भी म्यूजियम में है, पर अमृत की शीशी आज से 4 दिन पहले ही म्यूजियम से गायब हो चुकी है।"

"क्याऽऽऽऽ? कैसे?” शलाका ने तेज आवाज में कहा- “मुझे तुरंत उसके बारे में सारी जानकारी चेक करके बताओ।

“क्या हुआ? जेम्स ने शलाका से पूछा। शलाका ने सारी बात जेम्स को बता दी।

“इसका मतलब कि किसी को अमृत की शीशी के बारे में सबकुछ पता चल गया है?" जेम्स ने कहा।

तभी फिर शलाका के दिमाग में आर्ची की आवाज उभरी- “म्यूजियम को भी अभी उस चोरी के बारे में ज्यादा कुछ नहीं पता, पर 4 दिन पहले ही एक स्कूल के बच्चों का ग्रुप म्यूजियम में घूमने आया था, उसी के बाद से उस अमृत की शीशी का कुछ पता नहीं है।"

इस बार आर्ची की आवाज, जेम्स को भी सुनाई दे रही थी, शायद शलाका ने जेम्स को भी उन बातों में शामिल कर लिया था।

यह जेम्स के लिये अच्छा ही था। अब बार-बार उसे शलाका से पूछने की जरुरत नहीं पड़नी थी कि उसकी आर्ची से क्या बात हो रही थी?

“आर्ची, उस दिन के म्यूजियम के सभी सी.सी.टी.वी. कैमरे को चेक करो और यह देखो कि कौन सा बच्चा उस दिन अमृत की शीशी के पास था?"

शलाका की बात सुन आर्ची काम पर लग गई। इधर रेस्टोरेंट में खाना भी सर्व हो चुका था, जिसे जेम्स ने प्लेट में निकालना शुरु कर दिया था।

कुछ देर बाद फिर से आर्ची की आवाज उभरी “शलाका, एक बच्चा बार-बार उस अमृत की शीशी को देख रहा था। किसी भी फुटेज में उसे अमृत की शीशी को निकालते तो नहीं देखा गया, पर म्यूजियम से निकलते समय, उसकी जेब थोड़ी फूली हुई थी और म्यूजियम से निकलते समय, वह बच्चा स्कैनर के बगल से निकला था, जिसकी वजह से किसी भी प्रकार का अलार्म नहीं बजा। बच्चा होने की वजह से सिक्योरिटी वालों ने इस बात पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया था।"

“वेरी गुड आर्ची अब जरा उस स्कूल के डेटा को सर्च करके, उस बच्चे का पता निकालो और मुझे दो।" यह कहकर शलाका फिर से अपना खाना खाने लगी।

कुछ देर बाद आर्ची की आवाज पुनः आई- “उस बच्चे का डेटा, हमें स्कूल के रिकार्ड में नहीं मिला शायद वह बच्चा उस स्कूल का था ही नहीं... वह उनके बीच किसी तरह से घुस गया था?"

“मुझे ऐसी ही कुछ आशा थी।” शलाका ने जोर से साँस लेते हुए कहा- “शायद वह कोई बहुरुपिया है, जो बच्चे का भेष बनाकर घूम रहा है आर्ची, तुम तुरंत उस बच्चे का फोटो, पूरे न्यूयार्क के कैमरे में स्कैन करो और पता करो कि क्या वह बच्चा अब भी न्यूयार्क में ही है या फिर कहीं चला गया?

“वह बच्चा, अब भी न्यूयार्क में है, इस समय वह म्यूजियम के पास ही, ‘फोर्ट ट्रायन पार्क' में सूर्य नमस्कार कर रहा है।” आर्ची ने कहा।

“वेरी गुड आर्ची, तुम उस पर नजर रखो, हम अभी वहां पहुंचते हैं।” यह कहकर शलाका अपनी कुर्सी से खड़ी हो गई।

तब तक जेम्स ने भी अपना खाना खत्म कर लिया था, इसलिये वह भी शलाका के पीछे उठकर भागा।

शलाका ने कैश काउंटर पर जाकर अपना बिल पे किया, पर जैसे ही वह वहां से निकलने लगी, उसका रास्ता रोककर विक्रम खड़ा हो गया।

“वारुणी, तुम यहां हो और मैं कब से वहां टेबल पर बैठकर तुम्हारा इंतजार कर रहा हूं।” विक्रम ने कहा।

विक्रम को वहां देख शलाका हैरान हो गई।

“अरे विक्रम तुम यहां न्यूयार्क में क्या कर रहे हो? और...और तुम मुझे वारुणि कहकर क्यों संबोधित कर रहे हो? मैं तो शलाका हूं तुम भूल गये क्या?"

"शलाका?” विक्रम ने ना समझने वाले अंदाज में कहा- “ये तुम कैसी बातें कर रही हो वारुणि अभी कुछ देर पहले ही तो तुम मुझे उस टेबल पर बैठाकर, इधर आई थी। इतनी जल्दी तुम यह बात कैसे भूल सकती हो?"

“शलाका, वह बालक अब पार्क के अंदर की ओर जा रहा है और पार्क के उस स्थान पर कोई कैमरा नहीं है, तुम्हें जल्दी उसके पास पहुंचना होगा।” आर्ची ने शलाका को कहा।

आर्ची की बात सुन शलाका तेजी से रेस्टोरेंट के बाहर की ओर निकलती हुई बोली- “तुम यहीं रुको विक्रम। मैं अभी वापस आकर तुमसे बात करती हूं..कहीं जाना नहीं?"

विक्रम ठगा सा वहां खड़ा, दूर जा रही शलाका...म....मेरा मतलब है कि वारुणि को देख रहा था।

जारी रहेगा_____✍️
 
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