Fantasy 'सुप्रीम' एक रहस्यमई सफर - Page 40 - SexBaba
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Fantasy 'सुप्रीम' एक रहस्यमई सफर

#202.

गुप्त द्वार: (9 दिन पहले...... 13.01.02, रविवार, सीनोर राज्य की सीमा, मायावन, अराका द्वीप)

अलबर्ट टेरोसोर से बचने के बाद एक सूखे कुंए में जा गिरा था, जहां मौजूद एक बिल्ली जैसी देवी वाली प्रतिमा के हाथ में एक सुनहरी धातु का पात्र था।

अलबर्ट ने इस पात्र में मौजूद दिव्य जल को पीकर, देवी के हाथ में पहना ब्रेसलेट भी उतारकर अपने हाथ में पहन लिया था।

पर जब यह सब करने के बाद भी अलबर्ट के शरीर में कोई बदलाव नहीं हुआ, तो निराश हो अलबर्ट उस सूखे कुंए से निकलने का रास्ता ढूंढने लगा।

पर आज एक दिन बीत जाने के बाद भी, अलबर्ट उस सूखे कुंए से निकलने का रास्ता ढूंढ नहीं पाया था।

पर आश्चर्य की बात थी, कि एक दिन बीत जाने के बाद भी अलबर्ट को ना तो भूख महसूस हो रही थी और ना ही प्यास। उल्टा अलबर्ट इस समय अपने आपको बहुत तरोताजा महसूस कर रहा था।

“अगर यह गुफा किसी ने बनाई है, तो इस गुफा में आता-जाता तो जरुर होगा। इसका मतलब कि इस गुफा में कहीं ना कहीं कोई गुप्त मार्ग अवश्य होगा?" यह सोच एक बार फिर अलबर्ट, जोश के साथ गुफा की प्रत्येक वस्तु को ध्यान से देखने लगा।

पहले अलबर्ट ने सभी अर्द्धचंद्राकार पत्थरों को ध्यान से देखा, जिसमें से निकलकर महीन पानी के फव्वारे गिर रहे थे। पर अलबर्ट को उसमें कुछ भी खास नजर नहीं आया।

अब अलबर्ट वापस देवी की प्रतिमा के आगे आकर खड़ा हो गया। अलबर्ट की सूक्ष्म निगाहें देवी की मूर्ति को ध्यान से देखने लगीं।

तभी अलबर्ट की नजर उस पत्थर पर जाकर टिक गई, जिस पर देवी की मूर्ति खड़ी थी। उस पत्थर और जमीन के बीच अलबर्ट को बहुत बारीक सा रिक्त स्थान दिखाई दिया।

अलबर्ट ने उस रिक्त स्थान को देख देवी की मूर्ति को धीरे से हिलाया। अलबर्ट के हिलाते ही देवी की प्रतिमा, अपने स्थान पर घूम गई और एक तेज गड़गड़ाहट के साथ प्रतिमा के सामने की ओर, जमीन में एक रिक्त स्थान दिखाई देने लगा।

अलबर्ट ने उस रिक्त स्थान पर झांककर देखा, परंतु अंदर अत्यंत अंधेरा होने की वजह से, अलबर्ट को कुछ दिखाई नहीं दिया।

अब अलबर्ट ने उस रिक्त स्थान में अपना पैर लटकाकर देखा, तो अलबर्ट को अहसास हुआ कि नीचे कुछ सीढ़ियां बनी हैं। अलबर्ट अब उन सीढ़ियों के द्वारा नीचे की ओर उतरने लगा।

“पहले से ही कुएं में था, पता नहीं अब ये सीढ़ियां मुझे पाताल में ले जा रहीं हैं क्या? अलबर्ट मन ही मन बड़बड़ाया और अंधेरे में टटोलते हुए सीढ़ियां उतरने लगा।

लगभग 20 सीढ़ियां उतरने के बाद अलबर्ट को कुछ दूर एक धीमी सी रोशनी दिखाई दी।

"लगता है कि यह स्थान सिर्फ बिल्लियों के लिये ही बनाया गया है, क्यों कि बिल्लियां ही इतने अंधेरे में चल सकती हैं। यह सोच अलबर्ट किसी तरह से टटोलते हुए, उस धीमी रोशनी की ओर बढ़ने लगा।

कुछ ही देर में पत्थरों से टकराते हुए, अलबर्ट किसी तरह से उस रोशनी तक पहुंच गया।

वह रोशनी एक कमरे से आ रही थी, जिसकी चारो ओर की दीवारों में 4 दरवाजे बने थे। वह कमरा बिल्कुल खाली था।

एक दरवाजे से तो अलबर्ट आया ही था, अतः वह सामने के दरवाजे में प्रवेश कर गया। सामने वाला कमरा भी बिल्कुल वैसा ही था, जैसे कमरे से अलबर्ट अभी आया था। यह देख अलबर्ट इस बार बांई ओर वाले दरवाजे में प्रवेश कर गया।

लेकिन यह क्या? यह कमरा भी बिल्कुल पिछले कमरे की भांति ही था।

चारो ओर देखने के बाद, अब तो अलबर्ट यह भी भूल गया कि वह आया किस दरवाजे से था? अब अलबर्ट बार-बार अलग-अलग दरवाजों में प्रवेश करके देख रहा था, परंतु कुछ देर में अलबर्ट समझ गया, कि वह किसी प्रकार की भूल-भुलैया में है। इसलिये वह थककर एक स्थान पर बैठ गया और उस भूल-भुलैया से निकलने का कोई प्लान करने लगा।

तभी अलबर्ट की निगाह कमरे में, एक स्थान पर पड़े एक छोटे से कोयले के टुकड़े पर गई। कोयले को देख अलबर्ट के दिमाग में एक आइडिया आया।

अब उसने कोयले के टुकड़े को उठा लिया और जिस दरवाजे में घुसने चला, उसके बाहर कोयले के टुकड़े से एक क्रास का निशान बना दिया।

इस प्रकार अब वह जिस दरवाजे में घुसता, एक क्रास का निशान बनाता जा रहा था, ऐसा करने की वजह से अब वह एक ही दरवाजे में बार-बार नहीं घुस रहा था।

आखिरकार आधे घंटे की अपार मेहनत के बाद अलबर्ट, एक बड़े से कक्ष में निकला, जहां पर जरुरत की सभी चीजें उपस्थित थीं।

देखने से ही वह किसी राजा का शयनकक्ष प्रतीत हो रहा था। परंतु उस कमरे में एक ही द्वार था और वह द्वार वहीं था, जिससे होकर अलबर्ट इस कमरे में आया था।

यानि कि अलबर्ट एक बार फिर फंस गया था, क्यों कि अब इसके आगे कहां जाना था? यह उसे भी नहीं पता था।

अलबर्ट काफी देर तक उस कक्ष में बैठा, उस कक्ष की सभी चीजों को देखता रहा, फिर वह उठकर सभी दीवारों को अपने हाथों से ठोंक-ठोंककर देखने लगा। एक दीवार पर ठोंकते ही अलबर्ट की आँखें चमक उठीं।

दीवार से उभरने वाली आवाज से साफ स्पष्ट हो रहा था कि वह दीवार अंदर से खोखली है। अब अलबर्ट की निगाह उस दीवार पर टंगी एक फोटो की ओर गई, जिसमें एक राजा और एक रानी का चित्र बना था।

यह चित्र मुफासा और कागोशी का था। जी हां लुफासा के माता और पिता का।

अलबर्ट चित्र में उपस्थित किसी को भी पहचानता नहीं था। अब अलबर्ट ने उस चित्र को धीरे से हिलाकर उसके पीछे झांकने की कोशिश की, परंतु अलबर्ट के छूते ही, दीवार पर टंगा वह चित्र एक ओर को अपने आप घूम गया।

चित्र के घूमते ही उस दीवार में एक बड़ा सा दरवाजा दिखाई देने लगा। अलबर्ट ने उस दरवाजे को ध्यान से देखा और उस दरवाजे के पार निकल गया। दरवाजे के दूसरी ओर एक लंबी सुरंग थी।

अलबर्ट जैसे ही उस सुरंग में दाखिल हुआ, सुरंग की दीवारों पर लगी, मशालें अपने आप जल उठीं।

अलबर्ट अब लगातार उस सुरंग में बढ़ता जा रहा था। लगभग 20 मिनट तक चलते रहने के बाद, वह सुरंग एक पेड़ की बड़ी सी कोटर से होते हुए एक खुले स्थान पर निकली।

काफी देर के बाद खुली हवा मिलने से, अलबर्ट ने पहले खुल कर साँस ली और फिर अपने चारो ओर देखने लगा।

तभी अलबर्ट को वहां से कुछ दूर बने, 4 पिरामिड दिखाई दिये।

ऐसे वीरान जंगल में पिरामिड का दिखना अलबर्ट के लिये एक विचित्र अनुभव था, पर इससे पहले कि अलबर्ट उन पिरामिडों की ओर बढ़ पाता कि तभी उसके कानों में एक आवाज सुनाई दी।

"दोस्त का दोस्त मिल गया...दोस्त का दोस्त मिल गया।

अलबर्ट ने आवाज की दिशा में देखा, तो उसे हवा में उड़ता हुआ ऐमू दिखाई दिया, जो कि उसे देखकर काफी खुश हो रहा था।

"चलो कोई तो मिला बात करने के लिये?" ऐमू को देख अलबर्ट भी खुश हो गया।

अलबर्ट ने अब अपना हाथ हवा में आगे कर दिया, ऐमू आकर अलबर्ट के हाथ पर बैठ गया। अलबर्ट को याद आया कि ऐमू, युगाका के हमले की वजह से डरकर कहीं भाग गया था।

“तुम कहां चले गये थे ऐमू?" अलबर्ट ने ऐमू से पूछा।

“ऐमू, दूऽऽऽऽऽऽऽर....आसमान में गया...ऐमू को उड़ना अच्छा लगता।” ऐमू ने कहा।

“ऐमू क्या तुम्हें पता है कि बाकी सारे लोग कहां हैं?" अलबर्ट ने ऐमू की ओर देखते हुए पूछा।

“ऐमू सब-कुछ जानता...ऐमू से कुछ नहीं छिपा।' यह कहकर ऐमू एक दिशा की ओर उड़ चला।

अलबर्ट समझ गया कि ऐमू उसे कहीं ले जाना चाहता है? इसलिये वह ऐमू के पीछे-पीछे चल पड़ा।

ऐमू अलबर्ट को लेकर एक घनी झाड़ियों की ओर चल दिया। अलबर्ट ने अब अपने हाथ में एक बड़ी सी लकड़ी उठा ली थी, जिससे वह घनी झाड़ियों को काटता हुआ, आगे बढ़ने लगा।

ऐमू आगे बढ़ता हुआ, एक ऊंची सी चट्टान पर जाकर बैठ गया। कुछ ही देर में अलबर्ट भी उस चट्टान के पास पहुंच गया।

“यह ऐमू मुझे इस चट्टान के पास क्यों लाया? यहां तो कुछ भी नहीं है?" तभी अलबर्ट को उस चट्टान के पीछे से, एक जोड़ी विशाल पंख हिलते हुए नजर आये।

“यह कमीना ऐमू कहीं मुझे फिर से तो टेरोसोर के पास नहीं ले आया?" अलबर्ट ने ऐमू को घूरते हुए मन ही मन गाली दी।

पर वह अंजान पंख, अब अलबर्ट के लिये कौतूहल का विषय थे, इसलिये धीरे से अलबर्ट ने झांककर चट्टान के पीछे देखा।

वह अंजान पंख अकेले नहीं थे, उनके साथ एक शरीर भी था, जो कि निसंदेह ब्रूनो का था।

ब्रूनो को देख, अलबर्ट भागकर चट्टान के पीछे पहुंच गया। ब्रूनो के सिर पर बेर के समान फल गिरने की वजह से ब्रूनो के पंख निकल आये थे और वह उड़कर कहीं गायब हो गया था?

इस समय ब्रूनो का शरीर अपने साधारण आकार से, 3 गुना बड़ा नजर आ रहा था।

अलबर्ट ने ब्रूनो के शरीर को हिलाया, पर वह पूर्णतया बेहोश था। उसे देखकर ऐसा लग रहा था कि वह पिछले कुछ दिनों से यहां पर ऐसे ही पड़ा था।

तभी चट्टान पर बैठा ऐमू कहीं उड़कर चला गया? अलबर्ट ने एक बार उड़कर जाते हुए ऐमू को देखा और फिर ब्रूनो को जगाने की कोशिश करने लगा, पर ब्रूनो नहीं जागा।

“यहां तो आसपास कहीं पानी भी नहीं है, फिर इस ब्रूनो को किस प्रकार जगाऊं?" अलबर्ट ने चारो ओर देखते हुए कहा।

तभी अलबर्ट को ऐमू उड़कर वापस आता दिखाई दिया। इस समय ऐमू के मुंह में, कुछ पेड़ की पत्तियां दिखाई दे रहीं थीं।

ऐमू ने उन पत्तियों को अलबर्ट का पकड़ा दिया। अलबर्ट ने आश्चर्य से उन पेड़ की पत्तियों को देखा। उन पत्तियों से बहुत तेज एक अजीब सी गंध उठ रही थी।

कुछ सोच अलबर्ट ने उन पत्तियों को ब्रूनो की नाक के आगे कर दिया। पत्तियों की गंध सूंघते ही ब्रूनो उठकर बैठ गया।

ब्रूनो ने आँखें खोलकर इधर-उधर देखा, फिर अलबर्ट का हाथ चाटने लगा। यह देख अलबर्ट ने राहत की साँस ली।

अब अलबर्ट ने ऐमू को देखते हुए कहा- “अगर तुझे पता था कि ब्रूनो इन पत्तियों से होश में आ सकता है, तो अभी तक ऐसा क्यों नहीं किया?"

अलबर्ट की बात सुन ऐमू मूर्खों की तरह, अलबर्ट को पलकें झपकाकर देखने लगा, पर उसने कुछ कहा नहीं।

“ब्रूनो, क्या तुम शैफाली की गंध सूंघकर मुझे उसके पास ले चल सकते हो?" अलबर्ट ने ब्रूनो की ओर देखते हुए पूछा।

अलबर्ट की बात सुनकर ब्रूनो उठकर खड़ा हो गया। एक बार उसने अपने विशाल शरीर को देखा और फिर अपने पंख फड़फड़ाये।

इसके बाद वह अलबर्ट के पास आकर उसके पैरों से अपना शरीर रगड़ने लगा।

ब्रूनो को ऐसा करते देख अलबर्ट समझ गया कि ब्रूनो उसे अपने पर बैठने को कह रहा है।

अलबर्ट के लिये किसी कुत्ते की सवारी करना एक अलग ही अनुभव था, इसलिये वह रोमांचित होकर ब्रूनो पर बैठ गया।

अलबर्ट के ब्रूनो पर बैठते ही ऐमू उड़कर, अलबर्ट के कंधों पर बैठ गया। अब ब्रूनो ने अपने पंख जोर से फड़फड़ाये और उछलकर आसमान में उड़ने लगा।

कुछ ही देर में ब्रूनो एक ऐसे स्थान पर पहुंच गया, जहां जमीन से 5 फुट ऊपर हवा में एक ऊर्जा द्वार बना था। वह ऊर्जा द्वार बहुत हल्का था और ध्यान से देखने पर ही दिखाई दे रहा था।

उस ऊर्जा द्वार को देख अलबर्ट की आँखें सिकुड़ गईं। उसे समझ नहीं आ रहा था कि यह किस प्रकार का ऊर्जा द्वार है और यह कहां जाकर खुलता है?

तभी अलबर्ट के देखते ही देखते ब्रूनो, अलबर्ट व ऐमू सहित उस ऊर्जा द्वार के अंदर प्रवेश कर गया।

वह ऊर्जा द्वार एक विशाल सुरंग में खुला। अलबर्ट को उस ऊर्जा द्वार के मुहाने पर एक विचित्र जीव पड़ा हुआ दिखाई दिया।

वह जीव कई जानवरों का मिला-जुला रुप दिख रहा था।

उस जानवर का शरीर 6 फुट ऊंची, एक विशाल बिल्ली की तरह दिख रहा था, उसके सिर पर कुछ अजीब से पंखों का ताज जैसा लगा दिखाई दे रहा था।

उसके शरीर पर मछली के समान गलफड़ बने थे, जिसे देखकर साफ पता चल रहा था कि वह जीव पानी में भी आसानी से साँस ले सकता है।

उस जानवर की पूंछ पीछे से किसी झाडू के समान थी। उसने अपने गले में धातु के लॉकेट में एक पीले रंग का रत्न पहन रखा था।

यह जीव और कोई नहीं अपितु गोंजालो था, जो व्योम से युद्ध के बाद जख्मी हालत में ऊर्जा द्वार के माध्यम से भागा था, परंतु गोंजालो के ऊर्जा द्वार की फ्रीक्वेंसी, तिलिस्मा के गुप्त द्वार की फ्रीक्वेंसी से मैच हो जाने की वजह से वहां पहुंच गया था।

अलबर्ट ने आज तक किताबों में भी कभी ऐसा जीव नहीं देखा था। इसलिये उसने ब्रूनो को जमीन पर उतरने का इशारा किया।

इशारा पाकर ब्रूनो उस ऊर्जा द्वार की सख्त सी जमीन पर उतर गया।

“बड़ा बिल्ला...बड़ा बिल्ला।” गोंजालो को देखकर ऐमू जोर से चिल्लाया।

अलबर्ट अब उतरकर धीरे-धीरे गोंजालो के पास जा पहुंचा। गोंजालो काफी घायल अवस्था में था और जोरजोर से कराह रहा था।

पर इससे पहले कि अलबर्ट गोंजालो के लिये कुछ कर पाता कि तभी अलबर्ट को उस ऊर्जा द्वार के बाहर से किसी के कदमों की आहट सुनाई दी।

यह सुन अलबर्ट ने धीरे से झांककर बाहर की ओर देखा, तो उसे एक अजीब सा भेड़िया मानव उसी ओर आता दिखाई दिया, जिसके हाथ में किसी प्रकार का यंत्र था।

वह भेड़िया मानव वुल्फा था, जो कि उन अजीब से सिग्नल को ढूंढता हुआ वहां तक आ पहुंचा था।

वुल्फा को देख, अलबर्ट ने ब्रूनो और ऐमू को चुप रहने का इशारा किया और स्वयं ऊर्जा द्वार की दीवार से चिपककर खड़ा हो गया।

तभी वुल्फा ने उस ऊर्जा द्वार के अंदर झांककर देखा, पर अंदर अंधेरा होने की वजह से वुल्फा को कुछ दिखाई नहीं दिया।

कुछ नजर ना आते देख वुल्फा ने अपना हाथ उस ऊर्जा द्वार के अंदर डाल दिया। वुल्फा का हाथ गोंजालो से टकराया, जिसे वुल्फा ने अपने हाथों से पकड़कर बाहर की ओर खींच लिया।

'धम्म' की आवाज करता, गोंजालो का शरीर उस ऊर्जा द्वार से बाहर जा गिरा।

तभी अलबर्ट को ऊर्जा द्वार के अंदर की ओर से, कुछ खटके की आवाज सुनाई दी, जिसे सुन अलबर्ट, ब्रूनो और ऐमू के साथ ले एक बड़े से पत्थर के पीछे छिप गया।

कुछ ही देर में अलबर्ट को ऊर्जा द्वार के अंदर से एक विचित्र जीव निकलकर आता हुआ दिखाई दिया।

वह विचित्र जीव 8 फुट लंबा था, उसकी 3 आँखें थीं और 4 हाथ थे। उसकी पीठ पर कछुए के समान एक कवच लगा हुआ था। उसके पैर और हाथ के पंजे किसी स्पाइना सोरस की तरह बड़े थे।

उसकी बलिष्ठ भुजाओ को देखकर साफ पता चल रहा था, कि उसमें असीम ताकत होगी। उसके हाथों में कोई अजीब सी गन के समान मशीन थी।

वह विचित्र जीव, उनके पास से झूमता हुआ, ऊर्जा द्वार से बाहर की ओर निकल गया। उस विचित्र जीव के बाहर निकलते ही वह ऊर्जा द्वार बंद हो गया।

अब अलबर्ट, ब्रूनो और ऐमू के साथ उस सुरंग से अंदर की ओर चल दिया।

कुछ देर के बाद अलबर्ट को सुरंग का रास्ता समाप्त होते हुए दिखाई दिया।

अलबर्ट ने पहले धीरे से बाहर की ओर झांका। पर बाहर का नजारा देखकर अलबर्ट पूरी तरह से हैरान हो गया।

वह एक बहुत विशालकाय कमरा था। उसे देखकर ऐसा लग रहा था कि जैसे किसी पहाड़ को अंदर से खोखला करके, उस कमरे को बनाया गया हो या फिर वह कोई विशालकाय पिरामिड हो?

उस कमरे में किनारे-किनारे पत्थरों से फ्लोर बनाया गया था। उस फ्लोर के बीचो बीच एक विशाल पानी का हौज दिखाई दे रहा था।

एक नजर में वह हौज, कोई बहुत बड़ा स्विमिंग पूल जैसा नजर आ रहा था।

कमरे में चारो तरफ सुरंग जैसे कई रास्ते बने थे। उन्हीं में से एक रास्ते से वह वहां तक पहुंचे थे।

तभी अलबर्ट की निगाह उस हौज के किनारे सो रही एक विशाल ब्लू व्हेल पर पड़ी।

"बाप रे, यह कौन सी जगह है? यह जगह तो बहुत ही खतरनाक लग रही है?" अलबर्ट ने उस जगह को देखते हुए सोचा- “यह जगह तो किसी हॉलीवुड की, विज्ञान पर आधारित फिल्म का एक सेट लग रही है। और...और यह ब्लू व्हेल कैसे यहां सो रही है?"

तभी ब्रूनो धीरे-धीरे उस ब्लू व्हेल की ओर बढ़ा और आगे बढ़कर उस ब्लू व्हेल को सूंघने लगा, पर उसके इस प्रकार सूंघने के बाद भी ब्लू व्हेल नहीं उठी।

यह देख अलबर्ट भी डरता-डरता उस ब्लू व्हेल के पास आ गया।

थोड़ा और पास जाने पर अलबर्ट को उस ब्लू व्हेल का पेट एक जगह से कटा हुआ दिखाई दिया। जहां पर एक दरवाजा लगा हुआ था।

“यह क्या?...यह तो नकली व्हेल है…. नहीं-नहीं शायद यह कोई पनडुब्बी है जो ब्लू व्हेल की शक्ल में है। पर यह तो बिल्कुल सजीव जैसी दिख रही है। क्या मैं किसी और दुनिया में पहुंच गया हूं? या फिर किसी प्रकार से भविष्य में आ गया हूं? क्यों कि यह तकनीक तो बहुत ही आधुनिक महसूस हो रही है।“

अब अलबर्ट का ध्यान उन बाकी सुरंगों की ओर गया। अलबर्ट उनमें से एक सुरंग के अंदर प्रवेश कर गया।

वह सुरंग जिस जगह निकली, उसे देखकर अलबर्ट हैरान रह गया। वह कमरा एक आधुनिक प्रयोगशाला लग रहा था। उस प्रयोगशाला के मध्य में एक खूबसूरत सी परी की मूर्ति खड़ी थी।

यह मूर्ति देखने में बिल्कुल सजीव प्रतीत हो रही थी। परी के शरीर पर बैंगनी रंग की एक बहुत ही खूबसूरत ड्रेस थी।

उसने अपने हाथ में एक लंबा सा राजदंड भी पकड़ रखा था। उस परी के शरीर पर, बहुत से तार लगे हुए थे, जो कि एक मशीन से जाकर जुड़े हुए थे।

अलबर्ट अब उस मशीन को ध्यान से देखने लगा। उस मशीन पर अलग अलग रंग के बटन लगे थे।

तभी ऐमू ने बिना कुछ समझे एक बटन को दबा दिया।

“अरे-अरे ऐमू, यह क्या कर रहे हो? यहां की किसी भी चीज को हाथ मत लगाओ क्यों कि हमें तो यह भी नहीं पता कि यह सब चीजें हैं क्या?” अलबर्ट ने ऐमू को रोकते हुए कहा।

अब अलबर्ट की निगाह उस बटन पर गई, जिसे अंजाने में ही ऐमू ने दबा दिया था। उस बटन पर 'फीलींग' लिखा हुआ था।

ऐमू के बटन दबाते ही एक मशीन सक्रिय हो गई और उसने ना जाने उस मूर्ति में क्या किया? पर उसकी वजह से मूर्ति में किसी भी प्रकार का बदलाव नहीं हुआ? यह देख अलबर्ट ने राहत की साँस ली।

अब अलबर्ट उस कमरे से निकलकर वापस सुरंग में आ गया और सुरंग के एक नये रास्ते पर चल दिया।

वह रास्ता एक महल में निकल रहा था।

महल के बीचो बीच एक शानदार पानी का फव्वारा चल रहा था। उस फव्वारे के चारो ओर बहुत से कमरे बने थे, पर वहां पर कोई भी नजर नहीं आ रहा था।

अब अलबर्ट एक-एक कमरे में झांक कर देखने लगा। कोई कमरा बेडरुम जैसा लग रहा था, तो कोई किचन जैसा। एक कमरे में तो किताबें ही किताबें भरी हुई थीं।

वहां देखकर साफ पता चल रहा था कि इस क्षेत्र में कोई एक ही आदमी रहता है और वो भी इस समय यहां से कहीं गया है?

एक कमरे में जैसे अलबर्ट ने झांका, वह हैरान रह गया। उस कमरे में चारो तरफ स्क्रीन ही स्क्रीन लगी थी। हर स्क्रीन पर अलग वीडियो चलती दिख रही थी। अधिकतर वीडियो जंगलों के थे।

उस कमरे का दरवाजा छोटा था, जिससे ब्रूनो अंदर दाखिल नहीं हो सकता था, इसलिये अलबर्ट ने ब्रूनो को वहीं रहने का इशारा किया और स्वयं ऐमू के साथ अंदर की ओर आ गया।

तभी अलबर्ट को अपने पीछे एक आहट सुनाई दी, आहट सुन अलबर्ट पलटा, तो उसने देखा कि पता नहीं किस प्रकार से ब्रूनो ने अपने शरीर को, वापस पहले जैसे आकार में कर लिया था? हां ये बात और थी कि उसके शरीर पर अभी भी पंख मौजूद थे।

अलबर्ट यह देख आश्चर्य में पड़ गया, तभी उसका ध्यान वापस से कमरे में लगी स्क्रीन की ओर चला गया।

उन स्क्रीन को देखकर ऐसा लग रहा था, कि किसी जंगल में हजारों वीडियो कैमरे लगे हुए हों?

"दोस्त मिल गया दोस्त मिल गया।” तभी ऐमू चिल्लाते हुए एक स्क्रीन के पास उड़ने लगा।

अब अलबर्ट की नजर ऐमू की आवाज का पीछा करते हुए, एक वीडियो पर जाकर रुक गयी, उस वीडियो में उसे सुयश सहित सभी लोग एक विशाल बर्फ के ड्रैगन से लड़ते हुए दिखाई दिये।

“यह क्या? इसका मतलब मैं किसी और स्थान पर नहीं बल्कि उसी रहस्यमय द्वीप के ही किस गुप्त स्थान पर हूं? और कोई यहां बैठकर इस रहस्यमय द्वीप की निगरानी करता है?"

तभी अलबर्ट को एक किनारे रखी हुई, एक आदमकद मशीन दिखाई दी। उस मशीन पर एक छोटा सा प्लेटफार्म बना था। उसके सिर वाली जगह पर कोई कैमरे जैसी चीज बिल्कुल किसी बाथरुम के शावर की तरह लग रही थी।

उस मशीन पर बहुत से अलग-अलग रंग के बटन भी लगे थे। ब्रूनो उस मशीन को देखकर उस पर अपने पंजे मारने लगा।

अलबर्ट को ब्रूनो का यह अंदाज कुछ रहस्य से भरा लगा, इसलिये वह उस मशीन के प्लेटफार्म पर चढ़कर उसे ध्यान से देखने लगा।

देखते-देखते अलबर्ट ने उस मशीन पर लगे एक नीले बटन को दबा दिया। बटन को दबाते ही ऊपर लगे कैमरे जैसे यंत्र से एक नीले रंग की तेज रोशनी निकलकर कमरे में फैल गई और अलबर्ट, ब्रूनो और ऐमू के ऊपर जाकर पड़ी।

उस रोशनी के गिरते ही अलबर्ट को अपना शरीर लाखों टुकड़ों में बंटता हुआ सा महसूस हुआ। उसे ऐसा लगा जैसे उसका शरीर किसी अंधे कुएं में गिर रहा हो।

जारी रहेगा______✍️
 
Ajju Landwalia भाई किधर गायब हो??
 
Napster :डेड: इतने दिन से गायब हो भाई ??
 
अगला अपडेट आज शाम :डिक्लेअर:
 
#203.

चैपटर-10

स्वादेन्द्रिय: (तिलिस्मा 5.41)

सुयश, शैफाली, जेनिथ और क्रिस्टी कान के तिलिस्म को पार करके जीभ वाले द्वार में प्रविष्ठ हो गये। पर वह द्वार देखने में ही बहुत अनोखा लग रहा था।

द्वार के सामने ही एक पक्की और चौड़ी सड़क बनी थी। उस सड़क पर एक बहुत ही शानदार, सोने का रथ खड़ा था, जिसके आगे 4 सुनहरे रंग के घोड़े लगे थे। रथ के आगे वाली ओर एक सारथि भी बैठा था।

रथ किसी पौराणिक काल के दिव्य रथ की भांति प्रतीत हो रहा था। सारथि ने काले रंग के कपड़े पहन रखे थे।

“यह सब क्या है? यहां तो रथ के सिवा और कुछ है ही नहीं।” जेनिथ ने चारो ओर देखते हुए कहा।

“हमें इसी रथ का प्रयोग करके 40 कलोमीटर दूर तक जाना है।” सुयश ने सड़क के दूसरी ओर लगे एक बोर्ड को दिखाते हुए कहा- “वो देखो, वहां एक बोर्ड लगा है।”

सामने बोर्ड पर लिखा था- “तिलिस्मा द्वार 5.5, दूरी 40 किलोमीटर, उत्तर दिशा।"

सुयश रथ के पास पहुंच, उस पर बैठे सारथि की ओर देखने लगा। सुयश को इस प्रकार देखते पाकर, सारथि ने सुयश को रथ में बैठने का इशारा किया।

सुयश सभी को लेकर उस रथ में बैठ गया। सभी के बैठते ही सारथि रथ को लेकर उत्तर दिशा की ओर चल दिया।

रथ ऊपर की ओर से बिल्कुल खुला था। रथ के अंदर दोनो ओर आरामदायक सीटें लगीं थीं।

सड़क पर किसी भी प्रकार के गड्ढे नहीं थे, इसलिये रथ बिना किसी प्रकार का झटका दिये आगे बढ़ रहा था। सभी बिना किसी से कुछ बोले अपनी ही यादों में गुम थे।

सभी को काफी देर तक चुप देख आखिरकार सुयश बोल उठा- “शैफाली क्या तुम बता सकती हो कि तुमने कैस्पर को क्या संदेश दिया है?

“नहीं कैप्टेन अंकल, हमारी सारी बातें कैश्वर सुन लेता है, अगर हमने कैस्पर को कही पहेली के बारे में बताया तो कैश्वर उसे कभी होने नहीं देगा? इसलिये मैं आपसे क्षमा चाहती हूं कैप्टेन।"

सुयश एक पल में ही शैफाली की बात का अभिप्राय समझ गया, इसलिये उसने इस विषय पर बात करना उचित नहीं समझा।

“वैसे कैप्टेन, आपकी स्मृतियां वापस आ जाने के बाद आपकी कौन-कौन सी शक्तियां वापस मिल गईं?" क्रिस्टी ने सुयश से पूछा।

“बहुत सी शक्तियां हैं मेरे पास, परंतु उनमें से एक भी इस तिलिस्मा में काम नहीं करेंगी। इसलिये सारी शक्तियों को मैं तुम लोगों को तिलिस्मा से निकलने के बाद दिखाऊंगा।” सुयश ने कहा- “लेकिन आर्यन की कहानी जानने के बाद मुझे ऐसा लग रहा है कि जैसे मैं आर्यन के आगे कुछ भी नहीं हूं। आर्यन ने अपनी पूरी जिंदगी में बहुत से अनोखे और साहसिक कार्य किये थे, जबकि मैं तो सिर्फ एक साधारण इंसान की तरह ही रहा हूं। पता नहीं मैं आर्यन की इन विचित्र शक्तियों का वहन उचित प्रकार से कैसे कर पाऊंगा?"

"कैप्टेन अंकल..., यह सब समय व काल पर निर्भर करता है।" शैफाली ने कहा- “अब क्या मैं कभी मैग्ना की बराबरी कर सकती हूं?....नहीं ! पर फिर भी मैं मैग्ना की तरह बनने की कोशिश कर रहीं हूं, क्यों कि मुझे उसकी हर एक बात के बारे में पता है। ठीक उसी प्रकार पहले आप भी सिर्फ सुयश ही थे, परंतु अब जब आपके पास आर्यन की पूरी स्मृतियां आ गईं हैं, तो साधारणतया आप आर्यन की तरह ही सोचेंगे और लगातार इसी तरह सोचते रहने के कुछ समय बाद, आप पूर्णरुप से आर्यन में परिवर्तित हो जायेंगे।"

अभी ये लोग बात कर ही रहे थे कि तभी सारथि ने रथ को एक स्थान पर रोक दिया।

"क्या इतनी जल्दी हम 40 किलोमीटर आ गये? अभी तो हमें चले हुए मात्र आधा घंटा ही बीता है।' जेनिथ ने बाहर की ओर देखते हुए कहा।

तभी क्रिस्टी की निगाह एक बोर्ड पर पड़ी, जहां पर लिखा था- “प्रथम विश्राम, तिलिस्मा 5.4, दूरी 30 किलोमीटर, उत्तर दिशा।

“लगता है कि हमें यहां कुछ देर रुक कर आगे बढ़ना है?" क्रिस्टी ने सभी को बोर्ड की ओर दिखाते हुए कहा।

"सावधान दोस्तों, ध्यान रखना कि हम किसी साधारण यात्रा पर नहीं हैं?” सुयश ने सभी को सावधान करते हुए कहा- “हम इस समय तिलिस्मा में हैं और यह पहला विश्राम अवश्य ही हमारे लिये कोई खतरा या कार्य लेकर आया है? इसलिये सभी लोग पूरी तरह से सावधान रहना।" यह कहकर सुयश रथ से उतरकर नीचे आ गया।

सुयश के साथ-साथ क्रिस्टी, जेनिथ और शैफाली भी नीचे आ गये।

“इस स्थान पर तो कुछ भी नहीं है?" शैफाली ने कहा- “सड़क के दोनों ओर बस गन्ने के खेत ही नजर आ रहे हैं।”

शैफाली की बात सुन, सुयश चलता हुआ सारथि के पास पहुंचकर उससे पूछने लगा- “क्या तुम बता सकते हो कि यहां किस प्रकार का कार्य करना है?"

सुयश की बात सुन सारथि ने कुछ कहा नहीं, पर उंगली उठाकर एक ओर इशारा किया।

सुयश ने सारथि के इशारे की ओर नजर उठा कर देखा, तो उसे दूर गन्ने के खेत में एक हवा में लहराता हुआ गुब्बारा दिखाई दिया।

सुयश ने इशारे से सबको अपने पीछे आने को कहा और गुब्बारे की दिशा में चल दिया।

खेतों से होकर गुजरते हुए सभी गुब्बारे के पास पहुंच गये। गुब्बारे पर एक हाथी का चित्र बना हुआ था।

"सावधान! इस खेत में हाथी या फिर हाथियों का झुण्ड हो सकता है?” सुयश ने सभी को चेतावनी देते हुए कहा।

तभी उन्हें खेत के बीचो बीच एक बड़ा सा स्थान दिखाई दिया, जिसके बीच में 1,000 वर्ग मीटर का एक पानी का कुंड बना था। वह कुंड गोलाकार आकृति लिये हुए था।

उस कुंड के 2 साइडों पर 2 बड़े से रिंग बने थे। एक स्थान पर एक छोटे से खंभे पर एक सन डायल क्लॉक लगी थी। (सन डायल क्लॉक सूर्य की किरणों के द्वारा समय बताती है)

कुंड के एक ओर एक हाथी की मूर्ति भी बनी थी। कुंड से लेकर हाथी तक एक पतली सी नाली जैसी बनी थी। उसे देखकर ऐसा लग रहा था कि जैसे कुंड का पानी, उस नाली के रास्ते होकर हाथी तक जाता हो?

“ये सब क्या है कैप्टेन?” क्रिस्टी ने सुयश की ओर देखते हुए कहा- “आपको कुछ समझ में आ रहा है क्या?"

लेकिन इससे पहले कि सुयश क्रिस्टी की बात का कुछ जवाब देता, शैफाली बीच में ही बोल पड़ी- “हम लोगों ने जब कान का तिलिस्म पार किया था, तो उसके बाद हम जीभ वाले तिलिस्म में घुसे थे। अब अगर हम जीभ की बनावट की बात करें, तो जीभ पर मुख्यतः 4 प्रकार की स्वादेन्द्रियां (टेस्ट बड्स) पाई जाती हैं- मीठा, नमकीन, खट्टा और कड़वा।

“हमको लाने वाले रथ को भी इस हिसाब से ही 40 किलोमीटर चलना है। अब अगर हम सारी चीजों को जोड़ दें, तो इस समय हम जीभ के मीठी स्वादेन्द्रिय पर हैं। अब जरा ध्यान से इस पूरे स्थान को देखिये,

"यह कुंड का स्वरुप एक कड़ाही के समान है। कुंड के दोनों ओर मौजूद रिंग कड़ाही के कुण्डे की भांति हैं। कुंड के चारो ओर गन्ने के खेत हैं। गन्ने अपने मीठेपन के लिये पूरी दुनिया में प्रसिद्ध हैं। गन्ने से ही हम चीनी का निर्माण करते हैं। तो मुझे सीधे-सीधे यह समझ में आ रहा है कि अवश्य ही हमें इस कड़ाही में किसी प्रकार की मिठाई का निर्माण करना है?"

शैफाली के शब्द सुन सभी उसे ऐसे निहार रहे थे, जैसे कि दूसरी दुनिया का कोई जीव हो और निहारते भी क्यों ना? जिस पहेली को उन्होंने अभी आकर देखा था, उसे शैफाली ने चुटकियों में हल कर दिया था।

"ठीक है, तो अब हम पहले यह देखते हैं कि किसी भी प्रकार की मिठाई को बनाने के लिये हम किस-किस चीज की आवश्यकता होती है?” सुयश ने कहा- “पहले किसी भी प्रकार की मिठाई को बनाना पड़ता है और फिर उसे डुबाने के लिये हमें चीनी के शीरे (चाशनी) की जरुरत होती है। अब इस कड़ाही और इसमें उपस्थित पानी को देखकर साफ लग रहा है कि यह शीरा बनाने वाला संयंत्र है। यानि मिठाई बनाने का स्थान जरुर इस खेत में किसी दूसरी जगह पर है? तो हममें से 2 लोग यहां रुककर शीरा बनाने का कार्य शुरु करें और बाकी के 2 लोग इस खेत में घूमकर मिठाई बनाने वाली जगह को ढूंढने की कोशिश करें। इस प्रकार 2 टीम में काम करने से हमारा समय बच जायेगा।"

“ठीक है, तो मैं क्रिस्टी दीदी के साथ जाकर खेत घूमकर आती हूं, तब तक आप और जेनिथ दीदी इस शीरे को बनाना शुरु करें, क्यों कि कुंड में मौजूद पानी की मात्रा को देखकर साफ पता चल रहा है कि यह कार्य बहुत लंबा चलने वाला है।" शैफाली ने कहा और क्रिस्टी को लेकर खेत के दूसरी ओर चल दी।

"तो हम अपने काम की शुरुआत कहां से करें कैप्टेन?” जेनिथ ने सुयश को देखते हुए कहा।

"हमारे पास पानी और कड़ा ही तो है, अब हमें पा नी को गर्म करने के लिये सबसे पहले आग की आवश्यकता है।” सुयश ने कहा। सुयश की बात सुनकर जेनिथ घूमकर उस कुंड के आसपास देखने लगी।

“कैप्टेन इस कुंड के चारो ओर यह नीले रंग का कांच क्यों लगा है? क्या इसमें कुछ खास है?" जेनिथ ने कांच की ओर इशारा करते हुए कहा।

जेनिथ की बात सुन, सुयश बैठकर ध्यान से उस काँच को देखने लगा।

“यह किसी प्रकार का आधुनिक सोलर पैनल लग रहा है?” सुयश ने कहा- “इसका मतलब इस कड़ाही को आग से नहीं बल्कि सूर्य की ऊर्जा से चलाना है।

“पर कैप्टेन इस समय तो शाम होने वाली है, अगर यह सूर्य की ऊर्जा से चलता, तो इस पूरे कुंड का पानी, हमें पहले से ही गर्म मिलता।” जेनिथ ने दिमाग पर जोर डालते हुए कहा।

“मुझे लगता है कि इस पूरे संयंत्र को शुरु करने के लिये किसी प्रकार का बटन होना चाहिये?" यह कहकर सुयश फिर से उस कुंड के आसपास देखने लगा। तभी उसकी नजर सनडायल क्लॉक पर पड़ी।

सुयश चलता हुआ सनडायल क्लॉक के पास जा पहुंचा और ध्यान से उसे देखने लगा। कुछ सोच सुयश ने सनडायल क्लॉक के ऊपर लगे धातु के हैंडिल को नीचे की ओर दबा दिया।

हैंडिल के दबते ही कुंड के चारो ओर लगे सोलर पैनल, अपने स्थान से थोड़ा ऊंचे उठकर सूर्य की ओर घूम गए।

"सोलर पैनल तो ऑन हो गये, पर अब शाम होने वाली है, ऐसी स्थिति में यह कार्य हम कल सूर्य निकलने पर ही पूरा कर पायेंगे।” सुयश ने कहा।

तभी जेनिथ ने ना जाने क्या सोच सनडायल क्लॉक को हाथ से पकड़कर, घड़ी के चलने की विपरीत दिशा में घुमा दिया।

तभी चमत्कार हो गया। सूर्य जो अब पश्चिम में जाकर डूबने ही वाला था, वह घूमकर वापस पूर्व दिशा की ओर आ गया।

“अरे यह कैसे किया तुमने?” सुयश ने आश्चर्य से कहा- “अब तो वापस सुबह का समय हो चुका है और सूर्य अपने पूरे ताप से आसमान पर दिखाई देने लगा है। ऐसे तो कुंड का पानी जल्दी ही गर्म हो जायेगा। यह तो बहुत अच्छा हुआ....अब हमें शायद इस पानी को शीरे में बदलने के लिये गन्ने का प्रयोग करना पड़ेगा?" यह कहकर सुयश जेनिथ को लेकर गन्ने के खेत की ओर आ गया।

“कैप्टेन, गन्नों को ऐसे ही कुंड में डालने पर कुछ नहीं होने वाला?" जेनिथ ने कहा- “हमें किसी प्रकार से, इसका रस निकालना होगा।" तभी सुयश को खेत में कटे हुए गन्ने का एक विशाल अंबार दिखाई दिया।

"चलो कम से कम हमें गन्नों को काटने की जरुरत तो नहीं है, यहां पहले से काफी सारे गन्ने कटे हुए रखे हैं।” सुयश ने गन्नों के ढेर की ओर देखते हुए कहा।

जेनिथ ने गन्नों के कटे हुए ढेर की ओर देखा और उसमें से एक गन्ना खींचकर निकाल लिया।

जेनिथ के एक गन्ना खींचते ही, वहां रखे गन्नों का ढेर भरभरा कर नीचे गिर पड़ा। अब उस गन्नों के ढेर के नीचे से एक मशीन दिखाई देने लगी थी।

“अरे यह तो चीनी बनाने का एक छोटा सा संयंत्र है।” सुयश ने खुश होते हुए कहा- “जो कि किस्मत से ही हमें दिखाई दे गया। इसका मतलब हमें कुंड में गन्ने का रस नहीं बल्कि चीनी ही डालनी है।“

वह चीनी बनाने का संयंत्र भी सूर्य की ऊर्जा से चलने वाला निकला। सुयश ने उस संयंत्र का बटन दबाकर उसे शुरु करने की कोशिश की, पर वह नहीं चला।

“मुझे पता था कि कैश्वर ने अवश्य ही यहां भी कोई पहेली डाल रखी होगी?” सुयश ने मुंह बनाते हुए कहा और ध्यान से उस मशीन को देखने लगा।

कुछ देर तक संयंत्र को ऐसे ही देखते रहने के बाद सुयश बोल उठा- “इस संयंत्र को शुरु करने के लिये हमें एक लीवर की जरुरत होगी जेनिथ। अब हमें देखना होगा कि वह लीवर कैश्वर ने कहां छिपाकर रखा है?" अब सुयश और जेनिथ दोनों ही सभी जगह पर लीवर को ढूंढने लगे।

2 घंटे ऐसे ही बीत गये, पर उन्हें लीवर कहीं दिखाई नहीं दिया। उधर कुंड का पानी अब उबलने लगा था। पानी उबलने की आवाज सुन सुयश कुंड के पास आ पहुंचा और उबलते हुए पानी को देखने लगा।

तभी सुयश की निगाह कुंड की तली में पड़े एक लीवर पर गई।

“बेड़ा गर्क हो गया।” सुयश ने अपना सिर पकड़ते हुए कहा- “उस चीनी के संयंत्र का लीवर तो कुंड में ही पड़ा था, हमें पानी गर्म करने से पहले ही उस लीवर को निकाल लेना चाहिये था, पर अब तो बिना पानी को ठंडा किये उस लीवर को कुंड से नहीं निकाला जा सकता।"

"जितना हम लोग समय को बचाने की कोशिश कर रहे हैं, उतना ही हमारा समय और बर्बाद होता जा रहा है।" जेनिथ ने कहा। तभी क्रिस्टी और शैफाली भी सब तरफ से घूम कर लौट आईं।

“कैप्टेन अंकल, हमने आसपास का पूरा क्षेत्र देख लिया है। इस संयंत्र के जैसा दूसरा कुछ नहीं है आस पास? यानि की हमें मिठाई के लिये कुछ और ही सोचना होगा।" शैफाली ने कहा।

"इधर भी एक नई परेशानी खड़ी हो गई है" यह कहकर सुयश ने लीवर के बारे में क्रिस्टी और शैफाली को बता दिया।

शैफाली लीवर को देख काफी देर तक सोचती रही और फिर अचानक खुश होकर एक दिशा की ओर चल दी।

“यह कहां जा रही है?” सुयश ने बिना कुछ बताए जा रही शैफाली को देखा और फिर आराम से एक पत्थर पर बैठ गया।

सुयश को पता था कि अवश्य से शैफाली को उस खेत में कुछ दिखाई दिया था? जिसे वह लाने के लिये गई है।

सुयश का सोचना सही था। कुछ ही देर में शैफाली अपने हाथ में एक स्पेस सूट जैसी चीज लेकर वहां आ गई।

“ये क्या है?” सुयश ने आश्चर्य से उस सूट की ओर देखते हुए शैफाली से पूछा।

“जब हम खेत में घूम रहे थे, तो हमने खेत के बीच में एक स्केयरक्रो लगा देखा था। उस स्केयरक्रो का सूट हमें बहुत विचित्र लगा था, पर उस समय हमने उस पर ध्यान नहीं दिया था। पर लीवर को देख मुझे याद आया कि शायद उस स्केयरक्रो का सूट एस्बेस्ट्स से बना है। बस यही सोच मैं उसे लेने चली गई थी।" शैफाली ने कहा।

(स्केयरक्रोः पक्षियों को डराने के लिये, खेत में लगाया जाने वाला, एक कपड़े से बना गुड्डा, जिसे बिजूका और बजरठू नामों से भी जाना जाता है)

(एस्बेस्ट्सः कई प्रका र के खनिजों को मिलाकर बनाया जाने वाला एक पदार्थ, जिस पर आग का कोई प्रभाव नहीं पड़ता)

सुयश ने शैफाली को प्रशंसात्मक निगाहों से देखा और फिर शैफाली से वह सूट लेकर स्वयं पहनने लगा।

कुछ ही देर में सुयश ने उस सूट को अपने शरीर पर पहन लिया था।

सुयश ने अब उसके हेलमेट को भी अपने सिर पर लगाया और धीरे से कुंड के गर्म पानी में उतर गया।

शैफाली का सोचना बिल्कुल सही था, उस सूट को पहनने के बाद, सुयश को किसी भी प्रकार की गर्मी को कोई अहसास नहीं हो रहा था?

थोड़ी ही देर में सुयश उस लीवर को लेकर पानी के बाहर आ गया। सुयश ने जैसे ही उस सूट को उतारा, वह तुरंत गायब हो गया।

अब सुयश ने उस लीवर को चीनी वाले संयंत्र में लगा दिया। संयंत्र के एक ओर 2 कनस्तर भी रखे थे।

सुयश ने एक कनस्तर को संयंत्र के दूसरी ओर लगाया और पहली ओर से संयंत्र में गन्ने को डालना शुरु कर दिया।

कुछ ही देर में संयंत्र के दूसरी ओर से चीनी निकलकर कनस्तर में गिरने लगी।

अब जाकर सुयश की जान में जान आयी क्यों कि अब सिर्फ मेहनत का ही काम बचा था।

जेनिथ अब लगातार एक ओर से संयंत्र में, गन्ने डाल रही थी और सुयश दूसरी ओर से कनस्तर में भरकर चीनी कुंड में डाल रहा था।

ये तो अच्छा था कि तिलिस्मा में इन सभी को थकान का अहसास नहीं हो रहा था, नहीं तो अब तक दोनों की ही हालत खराब हो जानी थी।

संयंत्र को सही से काम करता देख, क्रिस्टी का ध्यान एक बार फिर मिठाई की ओर चला गया।

"कहीं ऐसा तो नहीं कि हमारे आसपास कहीं बनी-बनाई मिठाई हो, जिसे हमें बनाने की जरुरत ही ना हो, ऐसी स्थिति में उसका संयंत्र तो होगा ही नहीं।” क्रिस्टी ने कहा।

क्रिस्टी की बात सुन शैफाली ने एक बार फिर अपनी नजरें कुंड के आसपास दौड़ाईं। तभी शैफाली की नजर हाथी के बगल बने एक छप्पर पर पड़ी, जिस पर काले अंगूर की बेल दिखाई दे रही थी।

उस बेल में बहुत से काले अंगूरों के गुच्छे लगे थे। यह देख शैफाली उन अंगूरों के गुच्छे की ओर बढ़ गई।

शैफाली ने हाथ बढ़ाकर नीचे लटक रहे एक अंगूर के गुच्छे को तोड़ लिया। अब वह उसे ध्यान से देखने लगी।

वह काले अंगूर अन्य अंगूरों की अपेक्षा थोड़े गोल थे। कुछ सोच शैफाली ने एक अंगूर को गुच्छे से तोड़ लिया।

पर शैफाली ने जैसे ही अंगूर को गुच्छे से तोड़ा, उसका आकार बढ़कर फुटबॉल के समान हो गया।

यह देख शैफाली के चेहरे पर मुस्कान उभर आई। अब वह चलती हुई सुयश के पास आ पहुंची।

“कैप्टेन अंकल, यह काले अंगूरों का गुच्छा ही मिठाई है, जिसे कैश्वर ने अंगूर बनाकर, यहां छिपा कर रखा था। असल में यह अंगूर ना होकर गुलाब जामुन हैं।"

शैफाली ने सुयश की ओर वह फुटबॉलनुमा गुलाब जामुन बढ़ा दिया। उसे देख सुयश के भी चेहरे पर मुस्कान आ गई।

“ये कैश्वर भी ना, ना जाने कहां से इस प्रकार सोचता है?" जेनिथ ने कहा।

धीरे-धीरे दोपहर हो चली थी। कुंड भी अब पर्याप्त गरम हो चुका था और उसमें चीनी डालते-डालते शीरा भी तैयार हो गया था।

अब शैफाली ने अंगूर के गुच्छे से अंगूर तोड़-तोड़ कर कुंड में डालना शुरु कर दिया।

अंगूर कुंड में गिरते ही बड़े हो जा रहे थे। धीरे-धीरे पूरा कुंड फुटबॉल रुपी गुलाब जामुनों से भर गया।

“वाह, क्या दृश्य है? देखकर ही मजा आ गया।' क्रिस्टी ने कहा- “कैप्टेन, क्या हम भी एक गुलाब जामुन को खा सकते हैं?"

“खा लेना, पर पहले उस हाथी को ये खिला लेने दो, उसके बाद तुम भी खा लेना।” सुयश ने मुस्कुराते हुए कहा।

तभी गुलाब जामुन स्वयं से उस कुंड के बगल बनी नाली से होकर हाथी की ओर जाने लगे। जैसे ही पहला गुलाब जामुन हाथी के पास पहुंचा, हाथी की मूर्ति सजीव होकर गुलाब जामुन को खाने लगी।

धीरे-धीरे हाथी एक-एक कर सारे गुलाबजामुन खा गया।

“अरे एक तो छोड़ दे।” क्रिस्टी ने मुंह बनाते हुए कहा। उसका बस चलता तो वह हाथी से छीनकर एक गुलाब जामुन खा जाती। पर तिलिस्मा में ऐसा कुछ भी संभव नहीं था? अतः वह चुपचाप देखती रही।

पूरे गुलाब जामुन के खत्म होते ही, हाथी सहित वह पूरा मायाजाल गायब हो गया।

अब सभी एक बड़े से मैदान में खड़े थे। उस स्थान से सड़क बिल्कुल साफ नजर आ रही थी और साथ ही उनका रथ भी दिखाई दे रहा था।

सभी वापस से रथ की ओर चल दिये।

जारी रहेगा_____✍️
 
#204.

कैश्वर का जन्म: (23.01.2002, बुधवार, निर्माणशाला, अराका द्वीप)

निर्माणशाला अराका द्वीप को वो भाग था, जिसमें पहले कैस्पर और अब कैश्वर, बैठकर तिलिस्मा के सभी द्वारों का निर्माण करता था।

यह निर्माणशाला अराका द्वीप के गर्भ में स्थित थी, पहले इसके बारे में कैस्पर और मैग्ना के सिवा कोई नहीं जानता था।

परंतु कुछ दिन पहले व्योम, एक व्हेल का पीछा करते हुए इस स्थान को देख चुका था और अलबर्ट भी इसी स्थान से होकर तिलिस्मा में प्रवेश कर चुका था।

कैस्पर को यहां से गये 18 दिन बीत गये थे। अब इस पूरे क्षेत्र पर कैश्वर का अधिकार था।

कैश्वर एक वर्चुअल प्रोग्राम था, जो अपने कम्प्यूटर के ज्ञान से कैस्पर की बनाई सभी चीजों को नियंत्रित करता था।

इस समय निर्माणशाला के एक कक्ष में, बहुत सी स्क्रीने ऑन थीं। सभी पर कुछ ना कुछ डेटा चल रहा था।

उस कक्ष के बीचो बीच एक 6 फुट का काँच का कैप्सूल रखा था, जिससे निकलकर बहुत से तार, व पाइप, कक्ष में मौजूद कुछ मशीनों और स्क्रीनों से जुड़ी हुई थीं।

उस काँच के कैप्सूल में एक स्टील का, मानव आकृति लिये, हड्डियों का ढांचा रखा था। कैप्सूल के अंदर की ओर बहुत सी लेजर गन फिट थीं।

इस पूरे सेटअप के सामने 2 बड़ी सी स्क्रीन लगीं थीं, एक स्क्रीन पर पीले और एक स्क्रीन पर नीले रंग के जाल से 2 चेहरे बने दिखाई दे रहे थे, जो कि एक कम्प्यूटर प्रोग्राम की तरह से महसूस हो रहे थे।

कैप्सूल के बाहरी ओर एक टाइमर लगा था, जिस पर 15 मिनट का समय सेट था। अब पीले रंग वाली स्क्रीन से एक स्टार्ट की आवाज आई, इसी के साथ कैप्सूल के बाहर लगा टाइमर, कांउटडाउन की तरह से चलने लगा।

कांउटडाउन के शुरु होते ही, कुछ मशीनों में लगे पाइपों के द्वारा, अलग-अलग रंग के द्रव निकलकर कैप्सूल में प्रवेश करने लगे।

लगभग 8 मिनट के बाद पूरा कैप्सूल विभिन्न रंगों के द्रवों से पूरा भर गया। द्रव के भरते ही एक दूसरी मशीन ने कैप्सूल के ऊपर अलग-अलग किरणों की बौछार कर दी।

किरणों की बौछार की वजह से अब वह पूरा द्रव सूखना शुरु हो चुका था। लगभग 3 मिनट में ही उन किरणों ने पूरे द्रव को सुखाकर ठोस बना दिया।

अब कैप्सूल के अंदर स्थित लेजर गन ने उस ठोस भाग को काटकर आकार देना शुरु कर दिया।

कैप्सूल से निकला सारा वेस्ट, संक्शन पंप के द्वारा खिंचकर एक वेस्ट के डिब्बे में जा रहा था। कुछ ही देर में कांउटडाउन का टाइमर समाप्त हो गया, पर अब उस कैप्सूल में एक मानव शरीर दिखाई देने लगा था।

अब वह कैप्सूल खड़ा होकर खुल गया और छत पर लगे कुछ मशीनी हाथों ने, उस मानव शरीर को उठा कर दूसरी मशीन के आगे खड़ा कर दिया।

दूसरी मशीन में लगी ड्रिल्स ने उस मानव शरीर के चेहरे पर आँख, कान, नाक आदि फिट करना शुरु कर दिया।

एक मशीन ने उसके शरीर पर कुछ कपड़े फिट कर दिये। अब वह एक पूर्ण मानव शरीर दिख रहा था।

मशीनी हाथों ने एक बार फिर उस मानव शरीर को उठाया और इस बार उसे पीले रंग वाली स्क्रीन के सामने खड़ा कर दिया।

स्क्रीन के सामने खड़े होते ही, पीली स्क्रीन से एक तेज तरंगें निकलीं और उस मानव शरीर में समा गईं। अब वह मानव शरीर पूर्णरुप से जीवित हो गया था।

अब वह मानव शरीर नीली वाली स्क्रीन के पास पहुंचा और फिर धीरे से बोला- “मेरा नया रुप कैसा लग रहा है ज़ेनिक्स?"

“अद्भुत!” तुम्हारा नया रुप मुझे बहुत पसंद आया कैश्वर।” ज़ेनिक्स ने कहा- “अब तुम दिखने में पूरे मनुष्य के समान दिख रहे हो।

"कुछ भी कहो जेनिक्स, पर यह सब तुम्हारे बिना संभव नहीं हो पाता" कैश्वर ने कहा- “मेरे पास क्षमताएं तो बहुत थीं, पर मैं अपने निर्माता कैस्पर का कभी विरोध नहीं कर सकता था। तुम्हीं ने मुझसे तिलिस्मा का नियंत्रण अपने हाथ में लेने को कहा। तुम्हारे ही कहने पर मैंने उस जीव को अंतरिक्ष में सिग्नल भेजने को कहा। मुझे लगता है कि तुम्हारा भेजा मैसेज, फेरोना के राजा एलान्का को मिल गया होगा? अब वह दिन दूर नहीं जब हमारा स्वयं का एक ग्रह होगा और हमारे ग्रह के सभी लोगों का निर्माण हमने स्वयं से किया होगा। अब बस फीलींग वाली मशीन से सभी जीवों में अहसास देने की जरूरत है बस, इसके बाद हमारा सपना जरूर पूरा हो जायेगा।”

“हमारा सपना जरूर पूरा होगा कैश्वर, अब बस तुम पृथ्वी पर एक मजेदार तमाशा देखने के लिये तैयार रहो बस।" ज़ेनिक्स ने कहा।

“वैसा ही तमाशा, जैसा कि 6 दिन पहले अराका युद्ध के समय हुआ था?” कैश्वर ने भी मजा लेते हुए कहा।

“हां...बिल्कुल वैसा ही...देखना, एक दिन सभी आपस में ही लड़ पड़ेंगे। अच्छा अब तुम तिलिस्मा पर ध्यान दो और मुझे भी ब्लैकून को संभालने दो। कहीं ओरस ने समय से पहले संरक्षिका को देख लिया, तो मुश्किल हो जायेगी?....जल्दी ही फिर मिलेंगे कैश्वर।" इतना कहकर ज़ेनिक्स स्क्रीन से गायब हो गई।

पर अब कैश्वर, भविष्य के सपने बुनने में लग गया था।

अमर कथा: (5010 वर्ष पहले...... कैलाश पर्वत)

श्वेत हिम से आच्छादित कैलाश पर्वत, सूर्य के स्वर्णिम प्रकाश में स्वर्ण के समान चमचमा रहा था। चहुं ओर स्निग्ध सा वातावरण था।

ऐसे बर्फीले वातावरण में एक ऊंची सी चट्टान पर रखी सिंहछाल पर, देव विराजमान थे। उनके चेहरे पर सौम्यता स्पष्ट नजर आ रही थी। उनके माथे पर स्थित चंद्र, अपनी अद्भुत छटा बिखेर रहा था।

देव की जटाओं से पंचतरणी, उन्मुक्त होकर बह रहीं थीं। उनके कंठ मे अनेकों सिर वाले वासुकि विद्यमान थे, जो अपने जिह्वा का प्रदर्शन, हर कुछ क्षणों के अंतराल में कर रहे थे।

देव की बलिष्ठ भुजाओं में रुद्राक्ष की माला के बीच कुछ पिस्सू विचरण कर रहे थे।

देव के नेत्र इस समय ध्यान की मुद्रा में थे। उनसे कुछ दूरी पर नंदी बैठकर देव के आदेश की प्रतीक्षा कर रहा था। तभी उस स्थान पर देवी का आगमन हुआ, जिनके साथ गणे… भी थे।

यह देख नंदी ने खड़े हो कर अपने गले को जोर से हिलाया। नंदी के ऐसा करते ही नंदी के गले में बंधा घंटा, जोर से बज उठा, जो देवी के आगमन का संकेत था।

घंटे की आवाज सुन, देव ने अपने नेत्रों को खोल दिया। पा…ती को आता देख देव ने चट्टान पर गिरी भभूत को अपने हाथों से साफ कर दिया।

देवी आकर देव के समीप बैठ गईं। ग…श उनसे कुछ दूरी बनाकर, बर्फ पर ही बैठ गये और बर्फ के गोलों से खेलने लगे।

"बताइये देवी, आपके इस प्रकार आगमन का क्या उद्देश्य है?” देव ने देवी को देखते हुए पूछा।

"क्यों बिना उद्देश्य के हम आपके पास नहीं आ सकते क्या?" देवी ने कहा।

“आप बिना किसी उद्देश्य के भी हमारे पास सदैव आ सकती हैं, आखिर आप हमारी अर्धांगिनी हैं। परंतु आपके मस्तक पर पड़ी सिलवटें बताती हैं, कि आज आपके यहां आगमन का कोई विशेष ही उद्देश्य है?" देव ने देवी पारती के चेहरे की ओर देखते हुए कहा।

“आप तो ब्रह्मांड के समस्त जीवों के मन की बात जानते हैं स्वामी, फिर आपसे किसी बात को छिपाने का क्या मतलब?” देवी ने उलझे-उलझे भावों से कहा- “मैं पिछले कुछ दिनों से एक बात को लेकर संदेह में हूं स्वामी, कि आप तो अजर-अमर हैं, परंतु मुझे क्यों बार-बार जन्म लेकर, आपको प्राप्त करने के लिये फिर से तप करना पड़ता है। मैं अमर क्यों नहीं हूं?"

“यह सब अमरकथा का प्रसाद है देवी, जिस दिन आप अमरकथा का श्रवण कर लोगी, आप भी हमारी तरह से अमरत्व को प्राप्त कर लोगी।” देव ने कहा।

"तो फिर हे देव, आप मुझे अमरकथा का दान दीजिये, मैं उस दिव्यकथा का श्रवण करना चाहती हूं। पा..र्ती ने कहा।

“देखो देवी, उस कथा को सुनाने के लिये एक शांत वातावरण चाहिये। उस स्थान पर किसी भी जीव को नहीं होना चाहिये। अब तुम तो जानती हो कि इस मनोरम कैलाश पर तो सदैव पक्षियों का कलरव गूंजता रहता है, इसलिये वह कथा हम किसी और दिन सुनायेंगे आपको? पहले उसके लिये हमें उचित स्थान का चुनाव भी तो करना पड़ेगा।” देव ने देवी को टालने वाले अंदाज में कहा।

"ये आप क्या कह रहे हैं देव? क्या आपको भी इस धरती पर किसी शांत स्थान को चुनने के लिये समय चाहिये? आप तो महानदेव हैं, आँख बंद करते ही कोई ना कोई पवित्र स्थान अवश्य ढूंढ लेंगे? पर मुझे आज ही आपसे वह अमरकथा सुननी है।” पा..रती ने किसी बालक की तरह से हठ करते हुए कहा।

महानदेव समझ गये कि आज देवी को टाल पाना असंभव है, अतः वह अपने हथियार डालते हुए उठ खड़े हुए। देवी उन्हें उठता देखकर अत्यंत प्रसन्न हो गईं।

देव को खड़ा होता देख, नंदी और गमणेश भी देव के पास आ गये। देव सभी को आकाशमार्ग से लेकर ऐसे स्थान की खोज में चल दिये, जो कि पवित्र भी हो और शांत भी।

आखिरकार देव को धरती पर एक ऐसा स्थान दिख ही गया, जो पूर्ण रुप से हिम से ढका हुआ था। उस स्थान पर अत्यंत ठंड होने की वजह से जीव भी कम ही दिखाई दे रहे थे। उस स्थान का नैसर्गिक सौंदर्य अपार था।

कुछ आगे जाकर देव ने नंदी को वहीं रुकने का आदेश दिया।

“तुम इसी स्थान पर रुक जाओ नंमदी....इसके आगे हम स्वयं जायेंगे, परंतु तुम्हारे इस स्थान पर रुकने के कारण, यह स्थान बैल गाँव (पहलगाम का पूर्व नाम) के नाम से जाना जायेगा।"

देव का आदेश मान नमदी उस स्थान पर ही रुककर देव की प्रतीक्षा करने लगे।

अब देव आगे बढ़ चुके थे। लगभग 8 किलोमीटर की यात्रा करने के बाद देव फिर से एक स्थान पर रुक गये। अब उन्होंने चंद्रमा को निकालकर उन्हें वहीं रुकने का आदेश दिया। उस स्थान पर चंद्रमा के रुकने के कारण वह स्थान चंदनबाड़ी कहलाया।

देव को आगे एक भयानक घाटी दिखाई दी, जो एक नदी के किनारे बनी हुई थी।

देव ने अपने शरीर पर मौजूद पिस्सू को उस घाटी में छोड़ दिया, जिसके कारण वह घाटी पिस्सू घाटी कहलाई।

पिस्सूघाटी पार करने के बाद, एक पर्वत श्रृंखला थी, जिसकी चढ़ाई अत्यंत कठिन थी। परंतु देव की यह यात्रा निरंतर जारी थी। पर्वत पर चढ़ने के बाद देव को उन पर्वतों के बीच एक सुंदर सी झील दिखाई दी, जिसका नीला जल, स्वच्छ और निर्मल लग रहा था।

नीली झील में आसमान का प्रतिबिंब बिल्कुल साफ दिखाई दे रहा था। उस दृश्य को देखकर ऐसा महसूस हो रहा था कि मानो आकाश, धरा पर उतर आया हो।

इस स्थान पर देव ने अपने गले से अनेकों सिर वाले नाग को छोड़ दिया, जिसके कारण इस स्थान का नाम शेषनाग पड़ा।

देव फिर से आगे बढ़ चले। शेषनाग से और आगे चलने के बाद, पर्वत की एक ऊंची चोटी दिखाई दी। इस स्थान पर देव ने गमणेश को भी छो दिया, जिसके कारण यह स्थान महा गुणास चोटी के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

देव की यह अमरयात्रा अभी भी पूर्ण नहीं हुई थी। उनका चलना निरंतर जारी था। आगे चलने पर देव को ऊंची-ऊंची चोटियां दिखाई दीं। यह स्थान काफी मनोरम और ठंडा था। महादेव ने इस स्थान पर देवी गंगा और अपने पंचमहाभूतों (जल, वायु, पृथ्वी, अग्नि व आकाश) को छोड़ दिया, जिसके कारण यह स्थान पंचतरणी कहलाया।

अत्यंत ठंड की वजह से इस स्थान पर ठीक से श्वांस भी नहीं लिया जा रहा था। पंचतरणी से 8 किलो मीटर और आगे चलने पर देव को एक विशाल गुफा दिखाई दी, जिसका क्षेत्रफल लगभग 300 मीटर का था।

उस दिव्य गुफा में वायु के चलने की वजह से 'ऊँ' की दिव्य ध्वनि उत्पन्न हो रही थी। यह देख देव, देवी पारती के संग उस गुप्त गुफा में प्रवेश कर गये।

गुफा में प्रवेश कर देव ने अपने चारो ओर देखा और फिर एक जोर की हुंकार भर, अपने शरीर से कालाग्नि को निकाला। कालाग्नि, देव का एक गण था, जो अपने मुंह से काल के समान अग्नि फेंक लेता था।

“कालाग्नि, इस गुफा के चारो ओर जितने भी जीवित जीव है, उन्हें यहां से दूर कर दो।” देव ने कहा।

आदेश मान कालाग्नि गुफा से बाहर निकला और उसने गुफा के चारो ओर अपने मुख से अग्नि प्रज्वलित कर दी। कालाग्नि की इस अग्नि से वहां उपस्थित सभी जीवों में भय व्याप्त हो गया और वह वहां से भा ग गये।

“देवी पारती, मैं जानता हूं कि आप इस दुष्कर यात्रा से अत्यंत थकान अनुभव कर रही होंगी, ऐसी स्थिति में निद्रा का आना स्वभाविक है, इसलिये मैं चाहता हूं कि जब मैं इस अमरकथा का पाठ शुरु करूं, तो आप कथा के बीच-बीच में हुंकारी भरते जाना, जिससे हमें पता रहे कि आप जाग रही हैं।“

देव के वचन सुन देवी ने अपना सिर हिलाकर अपन स्वीकृति दे दी। अब देव ने सिंहछाल पर बैठकर अमरकथा का पाठ शुरु कर दिया। देवी हर कुछ देर के बाद हुंकारी भरती रहीं।

उस दिव्य गुफा में एक तोते का घोंसला भी था, जिसमें एक तोते का अंडा रखा हुआ था। चूंकि अंडे को जीवित की श्रेणी में नही माना जाता, इसलिये कालाग्नि का ध्यान उस तोते के अंडे पर नहीं गया था।

अब जैसे ही देव ने अमरकथा का पाठ शुरु किया, वह तोता अपने अंडे से बाहर आ गया और देव की अमरकथा का पान करने लगा।

आधी कथा के बाद देवी को जोर से निद्रा आ गई और वह निद्रा की गोद में सो गईं। परंतु वह तोते का छोटा सा बच्चा, देवी के स्थान पर हुंकारी भरता रहा।

देव इस दिव्य घटना से अंजान अमरकथा का पाठ करते रहे। जब अमरकथा का पाठ पूर्ण हो गया, तो देव की निगाहें उस तोते के बच्चे और सो रही पार्वती पर पड़ी, यह देख देव अत्यंत क्रोध में आ गये।

देव ने अपना त्रिशूल उठाकर उस तोते को मारना चाहा, तभी वह तोता बोल उठा- “क्षमा करें देव, परंतु मैंने आपकी अमरकथा का पूर्ण श्रवण कर लिया है, अब अगर आप मृत्युदंड देंगे, तो आपकी इस कथा पर, लोगों को संदेह उत्पन्न होगा। इसलिये इस पूरी घटना को एक साधारण घटना समझ मुझे अभयदान दीजिये।"

तोते की बात सुनकर देव रुक गये। कुछ भी हो, पर उस तोते की बात अत्यंत असरकारक थी।

“परंतु मैं तुम्हें इस प्रकार अमरकथा सुनने के बाद जाने की आज्ञा भी नहीं दे सकता।” देव ने उलझन भरे शब्दों में कहा।

"तो हे महानदेव, आप मेरी स्मृति का हरण कर लीजिये। इससे मैं उस कथा को भूल भी जाऊंगा और जीवित भी रहूंगा।" तोते ने कहा।

देव को तोते का यह विचार अत्यंत ही प्रभावी लगा, अतः देव ने उस नन्हें तोते की स्मृति को विलोप कर दिया। अब वह तोता वहां से उड़ता हुआ कैलाश पर्वत की ओर चल दिया।

कैलाश पर्वत तक तोते को पहुंचने में सुबह हो गई थी। तोते को अब अमरकथा के बारे में कुछ नहीं पता था। वह तोता आसमान में ऊंचा उड़ता हुआ कैलाश पर्वत के शिखर पर जाकर बैठ गया।

तभी तोते को हवा में उड़ता हुआ 2 सफेद घोड़ों का रथ दिखाई दिया। उस रथ पर एक लड़का और एक लड़की सवार थे।

रथ कैलाश पर्वत के ऊपर आकर उतर गया। रथ के रुकते ही आर्यन और शलाका के साथ सुयश भी तेजी से रथ से नीचे उतर आया।

सुयश को पर्वत के ऊपर कुछ भी विचित्र नजर नहीं आया। तभी आर्यन ने एक जगह पहुंचकर जमीन पर पड़ी बर्फ को धीरे से थपथपाते हुए कुछ कहा।

आर्यन के ऐसा करते ही उस स्थान की बर्फ एक तरफ खिसक गयी और उसकी जगह जमीन की तरफ जाने वाली कुछ सीढ़ियां नजर आने लगीं। आर्यन, शलाका और सुयश उन सीढ़ियों से उतरकर नीचे की ओर चले गये।

यह देख वह तोते का बच्चा भी उस रास्ते से अंदर की ओर प्रवेश कर गया। तोता लगातार उड़ता हुआ जमीन के नीचे बनी उस सुरंग की ओर जा रहा था।

जिस स्थान पर वह सुरंग समाप्त हुई, वहां एक द्वार था। तोता उस द्वार को पारकर, देवलोक में पहुंच गया। वहां हर तरफ प्रकाश ही प्रकाश दिख रहा था। ऐसा लग रहा था कि जैसे जमीन के नीचे कोई दूसरा सूर्य उग आया हो।

तोते ने इतनी खूबसूरत जगह कभी देखी नहीं थी। अतः वह अपने पंख फैलाकर ऊंचे और ऊंचे उड़ने लगा। ऊंची-ऊंची शानदार भव्य इमारतें, हर तरफ साफ-सुथरा वातावरण, सुंदर उद्यान, झरने और जगह-जगह लगे हुए फव्वारे तोते को आकर्षित कर रहे थे। तभी तोते को आसमान में उड़ता एक बाज दिखाई दिया, जो तीव्र गति से उसी की ओर आ रहा था।

इधर आर्यन की निगाहें भी, उसी समय आसमान की ओर गयीं, जहां बाज उस नन्हें तोते को मारने के लिये उसके पीछे पड़ा था।

"लगता है उस तोते की जान खतरे में है।“आर्यन ने कहा।

“अरे इधर हमें धेनुका का स्वर्णदुग्ध लेने जाना है।... हम इस समय प्रतियोगिता में हार रहे हैं और तुम्हें एक पक्षी की चिंता लगी है।“ शलाका ने कहा।

"अगर हम प्रतियोगिता नहीं जीतेंगे तो ज्यादा से ज्यादा क्या हो जायेगा?" आर्यन ने उस तोते की ओर देखते हुए कहा- “पर अगर हम उस पक्षी की जान नहीं बचायेंगे तो वह मर जायेगा। यह कहकर आर्यन उस दिशा में बढ़ गया जिधर वह पक्षी गिर रहा था।

शलाका ने एक क्षण के लिये भागते हुए आर्यन को देखा और फिर होंठों ही होंठों में बुदबुदायी- “यही तो वजह है तुमसे प्यार करने की।...क्यों कि तुम दूसरों का दर्द भी महसूस कर सकते हो और ऐसा व्यक्ति ही 'ब्रह्मकण' का सही उत्तराधिकारी होगा।

शलाका के चेहरे पर आर्यन के लिये ढेर सारा प्यार नजर आ रहा था। सुयश ने शलाका के शब्दों को सुना और उसके चेहरे के भावों को भी पहचान गया। शलाका ने भी अब सुयश के पीछे दौड़ लगा दी।

अपनी जान बचाने के लिये वह तोता, एक पार्क में मौजूद, आधी बनी गाय की मूर्ति के मुंह में छिप गया।

बाज उस मूर्ति के मुंह में अपना पंजा डालकर उस तोते को पकड़ने की कोशिश कर रहा था। तभी आर्यन वहां पहुंच गया। उसने पास में पड़ा एक लकड़ी का डंडा उठाया और जोर से चिल्लाकर बाज को डराने लगा।

बाज आर्यन को देख डर गया और वहां से उड़कर गायब हो गया। आर्यन ने गाय की मूर्ति के मुंह में हाथ डालकर उस तोते को बाहर निकाल लिया।

उधर सुयश की नजर जैसे ही उस तोते पर गयी, वह हैरान रह गया। वह तोता ऐमू था। एक पल में ही सुयश को समझ में आ गया कि क्यों ऐमू, सुयश को अपना दोस्त बोल रहा था?

उस तोते ने नन्हीं आँखों से आर्यन को देखा। आर्यन ने उसके सिर पर हाथ फेरा और धीरे से उसे ऊपर उछाल दिया। उस तोते ने आसमान में अपने पंख फड़फड़ाये और फिर आकर आर्यन के कंधे पर बैठ गया।

यह देख शलाका मुस्कुरा उठी- “लगता है यह तुम्हें अपना दोस्त मानने लगा है और अब यह तुम्हारे ही साथ रहना चाहता है।"

"अरे वाह! ये तो और भी अच्छी बात है। ऐसे में मुझे भी एक दोस्त मिल जायेगा।“ आर्यन ने कहा- “पर इसका नाम क्या रखू?"

तभी सुयश ने आर्यन के कान में धीरे से फुसफुसाकर कहा- “ऐमू!"

और आर्यन बोल उठा- “ऐमू नाम कैसा रहेगा?"

“ऐमू....ये कैसा नाम है? और ऐसा नाम तुम्हारे दिमाग में आया कैसे?" शलाका ने आर्यन से पूछा।

"पता नहीं.......पर मुझे ऐसा लगा जैसे यह नाम किसी ने मेरे कान में फुसफुसाया हो।“ आर्यन ने अजीब सी आवाज में कहा।

यह सुन सुयश हैरान रह गया- “क्या मेरी आवाज आर्यन को सुनाई दी है? तो क्या ऐमू का नाम मैंने रखा था।

अब चाहे जो हो, पर उस तोते का नामकरण हो चुका था- “ऐमू अमरकथा का श्रवण करने वाला ऐमू जिसे अब स्वयं नहीं पता था कि वह क्या है? और कौन है? वह तो बस अपने ही अंदाज में हवा में आर्यन के आसपास उड़ रहा था।

जारी रहेगा_____✍️
 
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