Fantasy 'सुप्रीम' एक रहस्यमई सफर - Page 41 - SexBaba
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Fantasy 'सुप्रीम' एक रहस्यमई सफर

#205.

चैपटर-11

मौत का सफर: (तिलिस्मा 5.42)

सड़क काफी साफ-सुथरी थी, इसलिये रथ बिना रुके सरपट दौड़ा चला जा रहा था। सुयश, जेनिथ, क्रिस्टी और शैफाली पिछली सीट पर बैठे आसपास का दृश्य देख रहे थे।

तभी क्रिस्टी को आगे सड़क एक पहाड़ी दर्रे के बीच से जाती हुई दिखाई दी।

“कैप्टेन, आगे से पहाड़ी क्षेत्र शुरु होने वाला है, और हमें मीठे क्षेत्र से चले हुए भी 8 किलोमीटर हो गया है। क्रिस्टी ने कहा- “मुझे लगता है कि हमारा अगला कार्य आने ही वाला है, इसलिये हमें अब सावधान रहने की जरुरत है।"

क्रिस्टी की बात सुन सभी अब आगे की ओर देखने लगे। थोड़ी ही देर में रथ 2 पहाड़ी के बीच, एक दर्रे से निकलने लगा। दर्रे का रास्ता इतना संकरा भी नहीं था।

पर जैसे ही रथ दर्रे में घुसा, अचानक से चारो ओर की रोशनी बहुत कम नजर आने लगी। रथ अब घने पेड़ों के मध्य से गुजर रहा था। चारो ओर एक निस्तब्ध सन्नाटा सा छाया था।

“कैप्टेन अंकल मुझे यह वातावरण बहुत ही रहस्यमई नजर आ रहा है।" शैफाली ने कहा- “शायद कोई मुसीबत आने वाली है?"

तभी रथ के चारो घोड़े तेजी से हिनहिना कर रुक गये। सभी की नजर तुरंत रथ के आगे सड़क की ओर गई। सड़क पर आगे अंधेरे में कोई मानवाकृति जैसा साया दिखाई दिया।

“यह कौन हो सकता है?” सुयश ने धीरे से सारथि से पूछा।

“यह इस जंगल की काली शक्ति है, वैसे तो यह कभी किसी को आज तक दिन में नहीं दिखाई दी, आज पता नहीं कैसे यह दिन में भी दिख रही है? हमें कैसे भी इससे बचते हुए शाम होने से पहले इस क्षेत्र को पार करना होगा?” सारथि ने कहा।

अब सारथि ने कसकर घोड़े की लगाम को पकड़ लिया था। सारथि के मुंह से एक तेज घोड़े जैसी आवाज निकली, उसकी आवाज सुन अचानक घोड़ों ने फिर से सरपट सड़क पर दौड़ लगा दी।

घोड़े दौड़ते हुए इस प्रकार उस रहस्यमय साये के पार निकल गये, जैसे कि वह वहां हो ही ना?

एक बार फिर रथ सड़क पर तेजी से दौड़ रहा था। सभी की निगाह अब भी पीछे की ओर थी क्यों कि वह रहस्यमय साया अब हवा में तैरते हुए रथ का पीछा कर रहा था।

"रथ को थोड़ा और तेज चलाओ, वह रहस्यमय साया हमारे पीछे है।” सुयश ने चिल्लाकर सारथि को खतरे से आगाह किया।

सारथि अब रथ को और तेज भगा रहा था। धीरे-धीरे रथ और उस रहस्यमय साये के बीच की दूरी घटती जा रही थी।

तभी उस रहस्यमय साये के हाथ से एक तेज लाल रंग की किरण निकली और उस रथ से जा टकराईं।

पर उस किरण से रथ की गति में कोई परिवर्तन नहीं आया। लेकिन अब वह रहस्यमय साया दिखना बंद हो गया था। यह देखकर सभी ने राहत की साँस ली।

"काफी हॉरर जैसी फील आ रही है इस जंगल से..उस रहस्यमय साये को देख मेरी तो लग रहा था कि जान ही निकल जायेगी?" क्रिस्टी ने कहा।

"बस अब यह दर्रा कुछ ही देर में खत्म होने वाला है।” सुयश ने सामने की ओर देखते हुए कहा- “वह देखो, 300 मीटर आगे, अब उजाला दिखाई देने लगा है।"

तभी शैफाली की नजर सारथि के हाथों की ओर गई। सारथि के नाखून धीरे-धीरे बढ़ रहे थे।

शैफाली ने सुयश को सारथि के नाखूनों की ओर इशारा करते हुए, चुप रहने का इशारा किया।

सारथि के नाखून के साथ ही अब उसके शरीर की त्वचा में भी परिवर्तन आने लगा था।

तभी सारथि ने एकदम से रथ को रोक दिया। रथ के रुकते ही सारथि ने पलटकर पीछे देखा। अब उसके आँखों की जगह 2 लाल अंगारे से दिख रहे थे।

सुयश 1 सेकेण्ड में ही समझ गया कि सारथि का यह हाल उस रहस्यमय साये की लाल किरणों ने किया है। सुयश ने रथ के पीछे रखा एक धातु का डंडा पहले से ही हाथ मे पकड़ लिया था।

सुयश ने उस डंडे को तेजी से घुमाकर उस सारथि के चेहरे पर दे मारा। इतनी तेज प्रहार से सारथि रथ के नीचे जा गिरा।

उसके नीचे गिरते ही सुयश कूदकर उसके स्थान पर पहुंच गया और घोड़ों की लगाम अपने हाथ में ले, उसे तेजी से फटकारा, पर सुयश के ऐसा करने से भी घोड़े अपने स्थान से हिले तक नहीं।

यह देख सुयश ने आश्चर्य से घोड़ों की ओर देखा, अब घोड़े की आँखें भी लाल रंग की दिखने लगीं थीं।

यह देख सुयश ने चिल्ला कर कहा- “सभी लोग उतरकर दर्रे से बाहर की ओर भागो, मैं इन्हें संभालता हूं।

यह कहकर सुयश उस डंडे को लेकर रथ से नीचे की ओर कूद गया।

तभी घोड़ों का आकार भी बदलने लगा, अब वह लाल रंग के विशाल कीड़ों में परिवर्तित होने लगे थे।

सुयश की आवाज सुन शैफाली, क्रिस्टी और जेनिथ तेजी से रथ से नीचे उतर गये, पर भागने के स्थान पर उन्होंने वहां पड़े कुछ पत्थर व डंडे उठा लिये और तेजी से लाल कीड़ों पर प्रहार करने लगे।

“सॉरी कैप्टेन, हम आज ही 2 लोगों को खो चुके हैं, अब आपको भी नहीं खोना चाहते, हम सब एक साथ रहेंगे, मरें या जियें।" क्रिस्टी ने चीखकर कहा।

इधर सुयश भी तब तक 3-4 डंडे सारथि को मार चुका था। तभी एक लाल कीड़े ने उछलकर जेनिथ के हाथ पर काट लिया। जेनिथ दर्द से बिलबिला उठी।

"हम इनसे लड़कर इन्हें मार नहीं सकते दोस्तों।" सुयश ने चिल्लाकर कहा- “हमें कैसे भी इनसे बचते हुए इस दर्रे को जल्दी से जल्दी पार करना होगा? मुझे नहीं लगता कि यह हमारे साथ-साथ दर्रे से बाहर जायेंगे।"

सुयश का यह विचार सभी को सही लगा। सभी अब धीरे-धीरे पीछे हटते हुए उन कीड़ों और सारथि से बचने की कोशिश कर रहे थे।

तभी एक लाल कीड़ा फिर हवा में उछला और इस बार उसने सुयश के पैर पर काट लिया। सुयश को भी तेज दर्द का अहसास हुआ। सुयश ने अपने हाथ में पकड़ा डंडा उस कीड़े के सिर पर मार दिया।

तेज प्रहार से वह कीड़ा वहीं जमीन पर गिर गया। अब 3 कीड़े और बचे थे। तभी सारथि ने सुयश का ध्यान कीड़े की ओर देख, सुयश के हाथ पर काट लिया। यह दर्द पिछले वाले से भी ज्यादा था।

अब सभी तेजी से पलटकर दर्रे से बाहर की ओर भागे। तभी लाल कीड़े उछल-उछलकर सभी को काटने लगे, परंतु इस बार कोई भी उन्हें मारने के लिये रुका नहीं। वह सभी अब भागते ही जा रहे थे।

कुछ ही देर में सभी दर्रे से बाहर उजाले की ओर आ गये। उन्हें उजाले में जाता देख कीड़ा व सारथि वहीं दर्रे में ही रुक गये। शायद वह उजाले में आने से डर रहे थे। यह देख सबने राहत की साँस ली।

कुछ आगे इन्हें लहराता हुआ समुद्र दिखाई दे रहा था। सभी अब समुद्र के किनारे पड़ी रेत पर बैठ गये।

"सबसे पहले सब लोग ये देखो, कि उन लाल कीड़ों ने कितनी जगह पर काटा है?” सुयश यह कहकर तीनों लड़कियों से थोड़ा दूर चला गया।

सुयश अब अपने शरीर की ओर देखने लगा। उन लाल कीड़ों ने सुयश के 3 जगह पर पैरों में और 1 जगह पर हाथ पर काटा था।

जिस जगह पर उन लाल कीड़ों ने काटा था, उस जगह के आसपास बिल्कुल लाल पड़ गया था।

कुछ इसी प्रकार का हाल शैफाली और क्रिस्टी का था।

जेनिथ के शरीर को नक्षत्रा ने पूरी तरह से सही कर दिया था। अपने-अपने शरीर को चेक करने के बाद सभी फिर एक जगह पर एकत्रित हो गये।

“कैप्टेन अंकल, मुझे लग रहा है कि वह लाल कीड़े जहरीले थे। उन्होंने जिस स्थान पर काटा है, वहां के आसपास का खून गाढ़ा होकर जम सा गया है, हमें कैसे भी करके उस स्थान के खून को बाहर निकालना होगा, नहीं तो शरीर का वह भाग काम करना बंद कर देगा।“ शैफाली ने सुयश को देखते हुए गंभीरता से कहा।

"पर अगर हम उस जगह को काटकर, वहां का खून बाहर निकालेंगे, तो वहां काफी बड़ा घाव हो जायेगा और ऐसी स्थिति में हमारा चलना भी मुश्किल हो जायेगा।" क्रिस्टी ने कहा।

बड़ी ही विकट स्थिति थी, अगर खून नहीं निकालते तो भी परेशानी थी और अगर खून निकालते तो भी।

“मेरे हिसाब से हमें समुद्र के किनारे-किनारे, कुछ आगे तक इसी हालत में बढ़ने की कोशिश करनी होगी, फिर जब ज्यादा मुश्किल होने लगेगी, फिर देखेंगे कि क्या करना है?” सुयश ने कहा- “और वैसे भी हमारे पास इस स्थान पर कुछ भी ऐसा नहीं है, जिससे हम अपने शरीर के उस भाग को काट सकें?"

सुयश की बात सुन सभी धीरे-धीरे आगे की ओर बढ़ने लगे। एक ओर समुद्र की तेज आवाज करती लहरें और दूसरी ओर भयावह जंगल, फिर भी सभी धीरे-धीरे आगे की ओर बढ़ते जा रहे थे।

“ये कैश्वर भी ना पूरा ड्रैक्यूला बन गया है, किसी ना किसी प्रकार से, हर द्वार में हम लोगों का खून पी रहा है।” क्रिस्टी ने गुस्साते हुए कहा।

क्रिस्टी की बात सुन एकाएक सुयश को झटका लगा।

“क्या हुआ कैप्टेन?” जेनिथ ने सुयश को हैरान होते देख पूछ लिया। पर सुयश ने इस समय जेनिथ की बात का जवाब नहीं दिया, अब वह तेजी से कुछ सोच रहा था।

“तुम लोग यहीं पर रुको, मैं अभी आया।” यह कहकर सुयश बिना किसी को कुछ बताये, जंगल के अंदर घुस गया।

"ये कैप्टेन बिना बताये कहां चले गये?” क्रिस्टी ने अजीब से भाव से देखते हुए कहा।

“मुझे लगता है कि अवश्य ही उन्हें कुछ याद आया है? इसलिये ही वह बिना बताये चले गये।” जेनिथ ने कहा- “हमें यहीं रुककर उनका इंतजार करना चाहिये।" यह कहकर तीनों वहीं जमीन पर बैठ गये, पर बैठते ही शैफाली व क्रिस्टी कराहकर उठ गये।

“क्या हुआ?” जेनिथ ने दोनों से पूछा।

“यहां जमीन पर रेत नहीं बल्कि नमक पड़ा है, जो कि शायद इस समुद्र के पानी से बना है, वही जब लाल पड़े शरीर पर लगा, तो तेज दर्द हुआ। इसीलिये हम उठकर खड़े हो गये थे।” क्रिस्टी ने कहा- “पर कोई परेशानी की बात नहीं है, हम लोग खड़े होकर ही कैप्टेन का इंतजार कर लेंगे।

क्रिस्टी की बात सुन जेनिथ को अच्छा महसूस नहीं हुआ, इसलिये वह भी उठकर, उन दोनों के पास खड़ी हो गई।

लगभग 10 मिनट के पश्चात् सुयश जंगल से बाहर आया। सुयश के हाथ में केले का एक बड़ा सा पत्ता था, जिस पर बहुत से काले रंग के जोंक चिपके हुए थे।

"क्या आप ये जोंक को लेने के लिये जंगल गये थे?" क्रिस्टी ने आश्चर्य से सुयश को देखते हुए कहा- “पर इसका हमारे पास क्या काम?"

"क्रिस्टी क्या तुम्हें पता है कि दुनिया में बहुत से लोग 'आर्थराइटिस' का इलाज जोंक के द्वारा भी करते हैं। सुयश ने क्रिस्टी को समझाते हुए कहा। (आर्थराइटिसः एक प्रकार का रोग, जिसमें शरीर के किसी भी भाग में खून जम जाता है, इसे गठिया रोग भी कहते हैं)

“सॉरी कैप्टेन, मुझे इस बारे में कोई आइडिया नहीं है।" क्रिस्टी ने कहा।

“आर्थराइटिस रोग में जब खून एक स्थान पर जम जाता है, तो जोंक को उस स्थान से चिपका दिया जाता है। जोंक उस जगह के गंदे खून को जब पी लेता है, तो उसे हटा दिया जाता है। इस प्रकार से बिना किसी ऑपरेशन के ही आर्थराइटिस का इलाज किया जाता है।” सुयश ने क्रिस्टी को समझाते हुए कहा- “अब जब तुमने कैश्वर के खून पीने की बात कही तो मुझे एकाएक जोंक का ध्यान आ गया, जो हमारे शरीर के लाल पड़े भाग को सही कर सकता था। अब मुझे बस ये सोचना था कि जोंक मिल कहां सकता है। तभी मुझे याद आया कि जोंक हमेशा किसी रुके हुए पानी में मिलता है, बस उसी की खोज में मैं जंगल में चला गया था।"

यह कहकर सुयश ने एक जोंक को अपने पैर के उस स्थान पर चिपका दिया, जो कि कीड़े काटने की वजह से लाल पड़ गया था। सुयश को ऐसा करता देख शैफाली और क्रिस्टी ने भी जोंक को अपने शरीर पर चिपका लिया।

सुयश की तरकीब काम कर गई। अब बिना शरीर के उस भाग को काटे, शरीर का सारा विष भरा गंदा खून निकलता जा रहा था।

कुछ ही देर में जोंक ने पूरा गंदा खून समाप्त कर दिया। पर जैसे ही शरीर के उस भाग से गंदा खून समाप्त हुआ, क्रिस्टी के मुंह से चीख निकल गई।

“कैप्टेन, गंदा खून खत्म होने के बाद, यह जोंक अब हमारा साफ खून भी पीते जा रहे हैं।” क्रिस्टी ने चीखकर जोंक को हटाने की कोशिश की, पर क्रिस्टी का यह प्रयास बेकार हो गया, जोंक ने क्रिस्टी के शरीर को नहीं छोड़ा।

लेकिन इससे पहले कि सुयश क्रिस्टी को कुछ बता पाता, शैफाली ने जमीन पर पड़े नमक को उठाकर क्रिस्टी के शरीर पर मौजूद जोंक पर डाल दिया।

शैफाली के ऐसा करते ही जोंक ने मात्र 1 सेकेण्ड में ही क्रिस्टी का शरीर छोड़ दिया।

“नमक, जोंक का दुश्मन होता है, जोंक को हटाने के लिये नमक का इस्तेमाल करो क्रिस्टी।" शैफाली ने कहा।

शैफाली की बात सुन सुयश और क्रिस्टी ने भी अपने शरीर पर नमक को डालना शुरु कर दि या।

कुछ ही देर में सभी के शरीर से सारे जोंक हट गये थे। पर हटते-हटते भी जोंक शरीर के कुछ भागों पर घाव बना चुके थे और नमक की वजह से उन घावों पर तेज जलन हो रही थी।

किसी प्रकार से तीनों ने कुछ पत्ते तोड़कर, उससे अपने घावों को साफ कर लिया। पत्तों के साफ करने की वजह से घाव तो नहीं भरे, परंतु सभी अब आगे चलने लायक स्थिति में आ गये थे। सभी अब फिर से धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगे।

तभी क्रिस्टी को समुद्र के किनारे एक जगह पर लगा हुआ बोर्ड दिखाई दिया- “द्वितीय विश्राम, तिलिस्मा 5.4, दूरी 20 किलोमीटर, उत्तर दिशा।

“यह क्या दूसरा कार्य तो आया ही नहीं?” क्रिस्टी ने कहा।

“अब कितने कार्य करोगी?" जेनिथ ने मुस्कुराते हुए कहा- “मीठे के बाद नमकीन क्षेत्र आना था, पर अभी जो तुमने समुद्र का नमक अपने शरीर पर लगाया, वही नमकीन स्वादेन्द्रिय थी। यानि की एक बाधा और पार हो चुकी है। अब स्वादेन्द्रिय में खट्टा और कड़वा स्वाद बचा है।"

"हे भगवान, अगर नमकीन स्वाद ऐसा था, तो कड़वा कैसा होगा?" क्रिस्टी ने अपना सिर पकड़ते हुए कहा।

अब सभी फिर से आगे की ओर बढ़ चले। काफी देर तक चलते रहने के बाद बहुत दूर, जमीन पर कुछ बहुत बड़ी सी आकृतियां बनी दिखाई देने लगीं।

कुछ ही देर में वह सभी उन आकृतियों के पास पहुंच गये। सबसे आगे एक बड़ी सा नारंगी रंग का गोला था, फिर उसके बाद उससे कुछ छोटा, पीले रंग का गोला, फिर कई सारी लाल रंग की त्रिभुजाकार आकृति और फिर एक विशाल पेड़ था, जिसकी बहुत सी शाखाएं थीं।

"यह सब तो किसी ग्रह के समान दिख रहे हैं।' जेनिथ ने एक नारंगी रंग की गोल आकृति को देखते हुए कहा।

“यह ग्रह नहीं हैं, बल्कि फल और सब्जियां हैं।" शैफाली ने मुस्कुराते हुए कहा- “जिनमें विटामिन 'C' पाया जाता है। दोस्तों इस समय हम सभी किसी विशाल डाइनिंग टेबल पर हैं, जिस पर कुछ फल और सब्जियां रखीं हैं। जैसे कि यह नारंगी रंग का गोला संतरा है, उससे छोटा पीला गोला नींबू, उसके बाद कुछ स्ट्राबेरी रखीं हैं और फिर यह बड़ा सा दिखने वाला पेड़ असल में ब्रोकली है।"

"और यह बड़ा सा पीले रंग का पहाड़ और यह स्वीमिंग पूल क्या है?" जेनिथ ने आश्चर्य से चारो ओर देखते हुए पूछा।

“यह पीले रंग का पहाड़ किसी छिले हुए संतरे का छिलका है और यह स्वीमिंग पूल नहीं बल्कि संतरे के रस से भरा कटोरा है।” सुयश ने कहा।

“यह सब चीजें तो साधारण हैं, मतलब हमें किसी भी तरह से इस टेबल रुपी मुसीबत को पार करना होगा?" क्रिस्टी ने कहा।

तभी शैफाली जूस के कटोरे में अपने पैर लटका कर कुछ देखने लगी। शैफाली ने जब संतरे के जूस से अपना पैर बाहर निकाला, तो उसके पैर के सभी घाव भर चुके थे।

यह देख शैफाली ने खुश होते हुए सभी को आवाज लगाई- “सभी लोग यहां आकर संतरे के पानी से अपने घाव को साफ कर लो। संतरे के जूस में हीलींग पॉवर होती है और इससे त्वचा बहुत साफ और स्वस्थ हो जाती है।"

शैफाली की बात सुन क्रिस्टी व सुयश के साथ जेनिथ भी वहां आ पहुंची। संतरे के जूस से अपना शरीर साफ करते ही सभी के शरीर पर बने सारे घाव भर गये। अब सभी टेबल पर आगे की ओर बढ़ गये।

कुछ आगे बढ़ते ही सभी को एक तेज भिनभिनाहट की आवाज सुनाई दी। सभी यह तेज आवाज सुन घबराकर ऊपर की ओर देखने लगे।

“बाप रे, यह तो कोई मक्खी है, जो हमारी ओर ही आ रही है।” जेनिथ ने घबराकर कहा।

"हमारे नार्मल आकार में यह मक्खी थी, अभी तो हमारे लिये यह डाइनासोर की माँ है। हमें किसी भी हाल में इससे बचना होगा?” क्रिस्टी ने कहा।

“हमारे शरीर पूरी तरह से संतरे के जूस से भीगे हैं, इसी की खुशबू सूंघकर वह हमारी ओर आकर्षित हो रही है।” शैफाली ने कहा।

तभी उस मक्खी ने सुयश के ऊपर हमला कर दिया। सुयश ने झुककर किसी तरह से अपने को बचाया।

मक्खी सुयश के ऊपर से होती हुई आगे निकल गई, पर कुछ आगे जाते ही वह पलटी और फिर सुयश की ओर लपकी।

पर सुयश और मक्खी के बीच इस बार क्रिस्टी आ गई। क्रिस्टी ने अपना हाथ लहराते हुए मक्खी का ध्यान अपनी ओर लगाया।

“कैप्टेन, जब तक आप लोग इस मक्खी से निपटने का कोई उपाय सोचो, तब तक मैं इसे उलझाकर रखती हूं।” यह कह क्रिस्टी मक्खी की ओर दौड़ पड़ी।

क्रिस्टी को उल्टा अपनी ओर आते देख मक्खी टेबल पर एक स्थान पर रुक गई। क्रिस्टी मक्खी से कुछ दूरी पर रुक गई और मक्खी के अगले कदम का इंतजार करने लगी।

तभी मक्खी ने अपने आगे वाले दोनों हाथों को अच्छे से साफ किया और फिर क्रिस्टी की ओर एक उड़ान भरी।

क्रिस्टी ध्यान से मक्खी के उड़ने की गति देख रही थी। मक्खी जैसे ही आगे को आई, क्रिस्टी अपनी जगह पर हवा में उछली।

मक्खी क्रिस्टी के नीचे से होती हुई आगे निकल गई। यह वार भी खाली जाते देख मक्खी को इस बार गुस्सा आ गया।

अब वह पलटकर बिजली की तेजी से क्रिस्टी की ओर लपकी। मक्खी को लग रहा था कि क्रिस्टी फिर उछलेगी, इसलिये क्रिस्टी के पास पहुंचते ही मक्खी ने थोड़ा ऊपर से उड़ान भरी।

पर इस बार क्रिस्टी ने अपने घुटनों को मोड़ते हुए, फिसलकर अपना बचाव किया।

अब मक्खी समझ गई थी कि क्रिस्टी से लड़ने की जगह, किसी और शिकार पर ध्यान दे तो ज्यादा अच्छा रहेगा।

यह सोच इस बार वह शैफाली की ओर लपकी, पर शैफाली पहले से ही मक्खी के लिये तैयार थी। जैसे ही मक्खी पास आयी, शैफाली ने संतरे के छिलके को उस मक्खी की आँख में निचोड़ दिया।

संतरे के छिलके का रस सीधा मक्खी के आँख पर पड़ा और वह लहराकर टेबल से दूर जा गिरी।

मक्खी को नीचे गिरता देख अब सभी ने राहत की साँस ली।

सभी अब एक बार फिर से टेबल पर आगे की ओर बढ़ चले। नींबू और स्ट्राबेरी को पार करने के बाद सभी अब ब्रोकली के पेड़ के पास पहुंच गये।

तभी जेनिथ का पैर किसी चीज में उलझा और वह पेड़ के पास नीचे गिर गई। जेनिथ की नजर नीचे की ओर गई। जेनिथ का पैर एक मकड़ी के जाले में उलझा था।

तभी जाने कहां से एक विशाल मकड़ी प्रकट हुई और उसने जेनिथ के चारो ओर जाल बनाना शुरु कर दिया।

"हे भगवान, एक मुसीबत गई नहीं कि दूसरी आ गई।” क्रिस्टी ने कहा- “अब इस मुसीबत से कैसे निपटा जाये?" मकड़ी अब पूरी तरह से जेनिथ को अपने जाल में लपेट चुकी थी।

तभी सुयश की नजर टेबल पर रखे एक प्लास्टिक के चिमटे पर गई। सुयश के हिसाब से चिमटा काफी बड़ा था।

तब तक मकड़ी ने जेनिथ के एक पैर में अपना डंक चुभो दिया। डंक का वार इतना खतरनाक था, कि जेनिथ के मुंह से तेज चीख निकल गई।

"क्रिस्टी, इस चिमटे के निचले भाग पर संतरे के छिलके का रस लगाओ....जल्दी करो।” सुयश ने क्रिस्टी से चिल्लाकर कहा।

क्रिस्टी की समझ में नहीं आया कि सुयश आखिर करना क्या चाहता है? पर उसने सुयश की बात मान तेजी से चिमटे के अंदर की ओर संतरे के छिलके का रस डालना शुरु कर दिया था।

अब चिमटे पर काफी ज्यादा रस लग चुका था। यह देख सुयश, मकड़ी के जाल के पास आ गया और अपने मुंह से तेज आवाज निकाल कर, मकड़ी का ध्यान अपनी ओर खींचने लगा।

सुयश को पता था कि मकड़ी की आदत, पहले ज्यादा से ज्यादा खाना अपने पास इकठ्ठा करने की होती है और ऐसी स्थिति में मकड़ी अपने जाल में फंसे शिकार को सबसे आखिर में खाती है।

सुयश का सोचना बिल्कुल सही सिद्ध हुआ। मकड़ी अब जेनिथ को छोड़ सुयश की ओर बढ़ने लगी।

मकड़ी अब सुयश के पास आ पहुंची थी। मकड़ी को देख सुयश चिमटे के अंदर की ओर आ गया।

मकड़ी भी आगे बढ़ी, तभी सुयश ने अपना हाथ चिमटे के उस जगह पर रखा, जिधर क्रिस्टी ने छिलके का रस डाला था।

सुयश ने जल्दी-जल्दी अपना हाथ 3-4 बार उस चिमटे पर रखकर उठाया। अब सुयश के हाथ और उस चिमटे के बीच बहुत सारा मकड़ी के जाल जैसा दिखाई देने लगा।

सुयश ने इस जाल को अब चारो ओर फैलाना शुरु कर दिया।

अब मकड़ी जैसे ही सुयश के पास पहुंची, वह सुयश के बनाये जाल में फंस गई। सबको अपने जाल में फंसाने वाली मकड़ी आज संतरे के छिलके के रस से बने जाल में फंस गई थी।

अब मकड़ी उससे जितना छूटने की कोशिश कर रही थी, उतना ही वो ज्यादा उसमें फंसती जा रही थी।

कुछ देर में मकड़ी, पूरी की पूरी जाल में फंसकर मिश्र की ममी नजर आने लगी।

यह देख सुयश सहित सभी के चेहरे पर मुस्कान आ गई। कुछ ही देर में ब्रोकली की एक डंडी की मदद से जेनिथ को भी मकड़ी के जाले से छुड़ा लिया।

“कैप्टेन, आपने संतरे के छिलके के रस से वह जाल कैसे बनाया?" जेनिथ ने पूछा।

“पहले मुझे यह बताओ कि मकड़ी अपने जाल में स्वयं क्यों नहीं फंसती?” सुयश ने उल्टा जेनिथ से ही सवाल कर लिया।

जेनिथ के बोलने के पहले ही शैफाली बोल उठी “मकड़ी अपने शरीर से गाढ़ा चिपचिपा पदार्थ निकालती है, जो हवा के संपर्क में आते ही सूख जाता है। मकड़ी जाल पर चलते समय कभी भी अपना शरीर जाल पर नहीं रखती। वो ऐसा इसलिये करती है क्यों कि अगर उसने अपना शरीर जाल पर रखा, तो वह स्वयं उस जाल में चिपक जायेगी। इसलिये मकड़ी अपने पैर के द्वारा अपने जाल पर चलती है। मकड़ी के पैर में बहुत सारे अलग प्रकार के बाल पाये जाते हैं, जो उसे अपने जाल में चिपकने से बचाते हैं।

“बिल्कुल ठीक।” सुयश ने शैफाली की तारीफ करते हुए कहा- “मैं भी यही बात सोच रहा था कि तभी मुझे मेरे बचपन का एक खेल याद आ गया, जो हम स्कूल में करते थे। स्कूल में हम ऐसे ही संतरे के छिलके के रस को, अपने हाथ पर लगाकर प्लास्टिक की स्केल से जाले बनाते थे। अब इस क्रिया का वैज्ञानिक कारण तो मुझे भी नहीं पता, पर जैसे ही मुझे यह क्रिया याद आई, मेरे दिमाग में ये ख्याल आया कि मकड़ी को भी उस जाल में फंसाया जा सकता है। बस मैंने वैसे ही किया और तुम लोगों ने देखा कि मेरा प्रयोग सफल रहा।

“सही कहा आपने कैप्टेन, एक बार फिर आपने मुझे बचा लिया।” जेनिथ ने सुयश को धन्यवाद देते हुए कहा - “अब हमें तुरंत आगे बढ़ जाना चाहिये कैप्टेन। नहीं तो यहां पर फिर कोई मुसीबत आ जायेगी?"

जेनिथ की बात एकदम सही थी, इसलिये सभी उस स्थान से आगे की ओर बढ़ गये।

जारी रहेगा_____✍️
 
#206.

वीर: (24.01.2002, गुरुवार, रुद्रलोक, हिमालय)

नीलाभ को सर्वप्रथम वीरमभद्र से आशीर्वाद प्राप्त करना था। नीलाभ अब वहीं हिमालय की बर्फ पर, आँख बंद कर बैठ गया और अपने अंतर्ज्ञान रुपी चक्षु से वीरमभद्र के बारे में जानकारी निकालने लगा।

वीरमभद्र जन्म कथा- ब्र..देव के मानस पुत्र, प्रजापति की बहुत सी पुत्रियां थीं। सभी पुत्रियां गुणवान और विलक्षण थीं। फिर भी प्रजापति को संतोष नहीं था वह चाहते थे कि उनके घर में एक सर्वशक्तिमान पुत्री का जन्म हो।

इसके लिये वह शक्ति स्वरुप माँ आद्या की पूजा करने लगे। माँ आद्या ने प्रकट हो कर दक्ष से, उनकी पुत्री के रुप में जन्म लेने का वचन दिया। इसी तप के फलस्वरुप माँ आद्या ने 'सती' के रुप में राजा दक्ष के घर जन्म लिया।

सती, बचपन से ही बहुत विलक्षण और बुद्धिमान थीं। जब वह बड़ी हो गईं, तो दक्ष ने उनका विवाह करने के बारे में सोचा। दक्ष ने इसके लिये ब्रह्देव से परामर्श लिया। देव ने कहा कि सती, आद्या की ‘आदिशक्ति' स्वरुप हैं और महानदेव 'आदि पुरुष' हैं, इसलिये सती का विवाह देव के साथ ही होना चाहिये। ब्र…देव की बात मान दक्ष ने सती का विवाह देव के साथ कर दिया।

एक बार ब्र…देव ने धर्म के प्रसार के लिये, एक भव्य सभा का आयोजन किया, जिसमें सभी एकत्रित हुए। जब सभा में प्रजापति का आगमन हुआ, तो सभी देवता उनके स्वागत में खड़े हो गये, परंतु देव ने ऐसा नहीं किया।

यह देख दक्ष मन ही मन बहुत क्रोधित हुए, उन्होंने देव से इस अपमान का बदला लेने का विचार किया। इस विचार के फलस्वरुप दक्ष ने भी एक बहुत बड़े यज्ञ का आयोजन किया।

दक्ष ने इस यज्ञ में सभी देओं और ऋषियों को बुलाया, परंतु म…देव को ईर्ष्यावश आमंत्रित नहीं किया। अतएव देव ने उस यज्ञ में जाने से मना कर दिया। परंतु सती अपने पितृभाव से वशीभूत होकर, उस यज्ञ में जाने की हठ करने लगीं।

ज्यादा हठ करने से देव ने सती को नंदी के साथ उस यज्ञ में जाने की आज्ञा दे दी। यज्ञ से पूर्व सभी देओं के लिये यज्ञाहुति का एक भाग निकाला जाना था। परंतु दक्ष ने ईर्ष्यावश महानदेव का भाग यज्ञाहुति में नहीं निकाला, जिससे सती बहुत अपमानित महसूस करने लगीं।

सती को अब देव के वचन बार-बार याद आ रहे थे, अतः अपमान की पराकाष्ठा को देख सती उस यज्ञ के जलती ज्वाला के मध्य कूद गईं। अग्नि की भयानक लपटों ने सती के शरीर को जलाना शुरु कर दिया।

उधर जैसे ही यह समाचार देव को प्राप्त हुआ, वह अत्यंत क्रोध से भर गये।

"क्रुद्धः सुदष्टष्ठपुट: स धूर्जटिर्जटां तडिद्व ह्निस टोग्ररो चिषम्।

उत्कृत्य रुद्रः सहसोत्थि तो हसन् गम्भीरना दोविससर्जतां भुवि।।

ततोऽतिकाय स्तनुवा स्पृशन्दिवं।"

अर्थात सती के प्राण त्यागने से दुखी, देव ने उग्र रूप धारण कर, क्रोध में अपने होंठ चबाते हुए, अपनी एक जटा उखाड़ ली, जो बिजली और अग्नि की लपट के समान दीप्त हो रही थी। सहसा खड़े होकर उन्होंने गंभीर अठ्ठास के साथ जटा को पृथ्वी पर पटक दिया। इसी से महाभयंकर वीरभद्र प्रगट हुए।

देव ने वीरभद्र को दक्ष के यज्ञ का विध्वंश करने भेज दिया। जहां पर वीरभद्र ने व…ष्णु से भी युद्ध करते हुए दक्ष का सिर काटकर यज्ञ की अग्नि को भेंट कर दिया।

.........................................

नीलाभ को अब वीरभद्र के बारे मे सबकुछ पता चल गया था। नीलाभ अब अपने स्थान से खड़ा हुआ। अब उसके हाथों में एक धारदार चाकू दिखाई देने लगा था।

नीलाभ ने उस चाकू से अपने हाथ को जरा सा काटा और अपने रक्त के एक बूंद को हवा में उछाल दिया।

नीलाभ के ऐसा करते ही, हवा में फैली रक्त की बूंद से, एक नीले रंग की छोटी सी, परंतु सुंदर चिड़िया प्रकट हुई, जो हवा में अपने पंख बहुत तेजी से हिला रही थी।

“नीलिमा, तुम मुझे देव वीरभद्र के पास ले चलो।' नीलाभ ने कहा।

नीलाभ का आदेश मान, नीलिमा नामक वह छोटी चिड़िया उड़कर एक दिशा की ओर चल दी। नीलाभ अब नीलिमा का पीछा कर रहा था।

नीलिमा उड़ती हुई अनेकों पर्वतों और पठारों को पार करती हुई, एक ऐसे बर्फीले स्थान पर पहुंची, जहां पर एक बहुत ऊंची सी पहाड़ी की चोटी थी। नीलिमा उस चोटी के पास जमीन पर जाकर बैठ गई और उस चोटी की बर्फ को अपनी चोंच से हटाने की कोशिश करने लगी।

यह देख नीलाभ भी उस स्थान की बर्फ को साफ करने लगा। कुछ देर के बाद नीलाभ को उस बर्फ के पीछे किसी विशाल मूर्ति के होने का अहसास हुआ।

अब नीलाभ ने नीलिमा को पीछे किया और अपनी शक्ति से, उस स्थान की बर्फ को, एक झटके में साफ कर दिया।

उस विशाल हिमखण्ड के नीचे म..देव की कंधे तक बनी विशाल मूर्ति थी। यह देख नीलाभ नीलिमा को देखने लगा।

शायद वह नीलिमा से पूछना चाह रहा था कि वह उसे यहां क्यों लेकर आई है? पर तभी नीलाभ को देव की मूर्ति के बाल बिल्कुल असली जैसे लगे, जो कि तेज हवा चलने की वजह से, मंद-मंद लहरा रहे थे।

अब नीलाभ को याद आया कि वीरभद्र की उत्पत्ति देव के बालों से ही तो हुई थी। यह सोच अब वह देव के बालों को ध्यान से देखने लगा।

तभी कहीं से हवा के एक तेज झोंका आया और देव के सिर का एक बाल टूटकर हवा में उड़ गया।

यह देख नीलाभ बिना कुछ सोचे-समझे उस बाल के पीछे दौड़ पड़ा।

देव का वह बाल, हवा में ऊंचे और ऊंचे उड़ता जा रहा था। उस बाल के पीछे दौड़ रहे नीलाभ को पूर्ण विश्वास था कि यह बाल ही वीरभद्र हो सकते हैं।

तभी देव का बाल एक शि..लिंग के समान बने, गोल पत्थर से जाकर लिपट गया। नीलाभ दौड़ता हुआ उस पत्थर के पास पहुंच गया। देव का बाल किसी रस्सी की भांति उस पत्थर से लिपटा हुआ था।

नीलाभ ने हाथ बढ़ाकर देव के बाल को पकड़ा और जोर से खींच लिया। अब वह बाल तो नीलाभ के हाथ में आ गया, पर जोर से खींचने की वजह से, जिस पत्थर से वह बाल लिपटा था, वह गोल-गोल घूमकर किसी लटू की भांति जमीन में समा गया।

अब नीलाभ कभी अपने हाथों में थमे उस बाल को, तो कभी वहां बर्फ में मौजूद गड्ढे को ध्यान से देख रहा था।

तभी नीलाभ के हाथ में पकड़ा वह बाल, एक भयानक सर्प में परिवर्तित हो गया और नीलाभ के हाथों से निकलकर उसी गड्ढे में समा गया।

नीलाभ बहुत देर तक उस गड्ढे को देखता रहा और फिर उसने उस गड्ढे में छलांग लगा दी।

नीलाभ उस अंतहीन गड्ढे में फिसलता ही जा रहा था। उसे फिसलते हुए लगभग 10 मिनट बीत गये थे, पर वह गड्ढा खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा था। उस गड्ढे में बिल्कुल धुप्प अंधेरा था।

आखिरकार वह गड्ढा, एक प्राचीन मं..दि. के पास जाकर समाप्त हुआ। नीलाभ उस प्राचीन मं..दर के प्रांगण में जाकर गिरा। उस स्थान पर पूर्ण उजाला था, इसलिये सब कुछ साफ-साफ दिखाई दे रहा था।

मं..दर की दीवारें काफी पुराने पत्थरों से निर्मित प्रतीत हो रहीं थीं। तभी नीलाभ की नजरें मंद..र के अंदर की ओर गईं, जहां की छत, जमीन और दीवार सभी जगह पर सर्प ही सर्प दिखाई दे रहे थे।

नीलाभ ने अपनी पूरी जिंदगी में, कभी एक साथ इतने सारे सर्प नहीं देखे थे। इसलिये वह आश्चर्य से चारो ओर देखने लगा। नीलाभ को डर था कि कहीं उसे कोई सर्प डंस ना ले।

ऐसा नहीं था कि नीलाभ पर किसी सर्प के जहर असर होता, बल्कि उसे डर था कि यदि किसी भी सर्प ने उसे डंसा, तो वह सर्प मारा जायेगा।

कुछ सोचने के बाद नीलाभ उस मं..दर में प्रवेश कर गया। अब नीलाभ अपने मुंह से, हवा में धीरे-धीरे बहुत कम मात्रा में जहर छोड़ने लगा।

नीलाभ के जहर के प्रभाव से सभी सर्यों को अपना दम घुटता सा प्रतीत हुआ, इसलिये सभी नीलाभ के लिये रास्ता छोड़ने लगे।

नीलाभ अपने लिये रास्ता बनता देख अंदर की ओर चल पड़ा। अंदर पहुंचने पर नीलाभ को एक विशाल सर्प की मूर्ति अपना मुंह खोले हुए बनी दिखाई दी।

सर्प का मुंह इतना विशाल था कि उसके मुंह में अंदर जाने के लिये एक रास्ता भी बना हुआ था।

नीलाभ ने ध्यान से सर्पमुख समान गुफा को देखा और उसकी ओर चल दिया। तभी नीलाभ के रास्ते में देवी भद्र…ली प्रकट हो गईं।

श्यामवर्ण, मुख पर ज्वाला समान तेज, सुर्ख लाल बाहर निकली जीभ, एक हाथ में रक्त का प्याला और दूसरे हाथ में कृपाण लिये, नरमुंडों की माला पहने, त्रिनेत्र वाली देवी साक्षात काल लग रहीं थीं।

भद्र…ली को देख, नीलाभ तुरंत घुटनों के बल बैठ, उन्हें नमन करने लगा।

“तुम यहां क्यों आये हो नीलाभ?” तेज आवाज वातावरण में उभरी।

“मैं यहां देव वीरभद्र से आशीर्वाद लेने आया हूं माता।” नीलाभ ने भद्…ली से बिना नजरें मिलाए कहा।

“वीरभद्र से मिलने से पहले तुम्हें मुझे प्रसन्न करना होगा नीलाभ, अन्यथा तुम यहां से आगे कदापि नहीं बढ़ पाओगे।”

“कृपया मुझे बताइये माता कि आप किस प्रकार प्रसन्न होंगी?” नीलाभ ने भद्…ली से पूछा।

“बहुत दिनों से मेरी जिह्वा प्यासी है नीलाभ। क्या तुम मुझे रक्तपान करा सकते हो?" भद्र..ली ने आग्नेय नेत्रों से नीलाभ को देखते हुए कहा।

"जैसी आपकी आज्ञा माता।” भद्र…ली के मुख से इतना निकलते ही, नीलाभ ने बिना कुछ सोचे समझे भद्रकाली के हाथ से कृपाण लिया और एक झटके से अपना बांया हाथ काट दिया।

नीलाभ के हाथ से रक्त की धारा बह निकली। परंतु नीलाभ को तो जैसे कोई फर्क ही नहीं पड़ रहा था, उसने भद्रकाली के हाथ से खप्पर ले, उसे अपने रक्त से भर दिया।

नीलाभ ने अब वह रक्त का प्याला भद्र..ली के हाथ में दे दिया। अब भद्र..ली के चेहरे पर सौम्यता नजर आने लगी थी। उन्होंने नीलाभ के कटे हुए हाथ की ओर देखा और सर्पमुखी गुफा के सामने से हट गईं।

"तुम्हारा कल्याण हो नीलाभ।” भद्र…ली ने कहा और रोशनी के एक तेज झमाके से वह गायब हो गईं।

नीलाभ उसी प्रकार अपना कटा हाथ लिये उस सर्पमुखी गुफा में प्रविष्ठ हो गया।

गुफा की दीवारों पर जगह-जगह कुछ चमकीले रत्न लगे थे, जिससे तेज रोशनी प्रस्फुटित हो रही थी।

उस रोशनी के कारण, पूरी गुफा जगमगा रही थी। नीलाभ लगातार उस गुफा में आगे बढ़ता जा रहा था।

तभी उसे रास्ते में बहुत से जलते अंगारे दिखाई दिये। अब उस स्थान से आगे बढ़ने के लिये उन अंगारों पर से ही होकर जाना पड़ता। यह देख नीलाभ वहीं पर रुक गया।

तभी नीलाभ को अंगारों के अंत में धुनि रमाए, आसन की मुद्रा में, कोई बैठा दिखाई दिया। उस स्थान पर ज्यादा उजाला नहीं था, इसलिये बैठे हुए व्यक्ति का पूरा चेहरा नहीं दिखाई दे रहा था।

लेकिन इससे पहले कि नीलाभ कुछ और सोच पाता, वातावरण में एक भारी सी आवाज गूंजी- “तुम रुक क्यों गये नीलाभ? तुम तो मेरा आशीर्वाद लेने आये हो ना तो फिर आगे बढ़कर मेरे पास आओ नीलाभ।"

आवाज को सुन नीलाभ जान गया कि यह आवाज यकीनन वीरभद्र की है। अतः वह अंगारों पर पैर रखकर वीरभद्र की ओर चल पड़ा।

पर जैसे ही नीलाभ के पैर अंगारों पर पड़े, उसे अपना पैर ही नहीं अपितु पूरा शरीर जलता हुआ सा महसूस हुआ।

पर ऐसी मुश्किलों से नीलाभ घबराने वाला नहीं था। वह निरंतर अंगारों पर चलता आगे बढ़ रहा था।

धीरे-धीरे अंगारों ने नीलाभ के पैर में आग पकड़ ली, अब वह आग तेजी से नीलाभ के शरीर के ऊपर की ओर बढ़ने लगी।

नीलाभ को ऐसा महसूस हो रहा था कि वह जितना भी आगे बढ़ रहा है, वीरभद्र उतना ही आगे जा रहे हैं।

नीलाभ के अथक प्रयास के बाद भी नीलाभ, वीरभद्र तक नहीं पहुंच पा रहा था।

अंगारों की अग्नि अब नीलाभ के सीने तक पहुंच गई थी। नीलाभ के पैरों का मांस पूरी तरह से जल चुका था, जिसकी वजह से अब पैरों के स्थान पर चमकती हड्डियां दिखाई देने लगीं थीं।

“अगर मुझ तक नहीं पहुंच पा रहे हो नीलाभ, तो अभी भी समय है। स्वयं को यातना देने की जगह, वापस लौटकर अपना सुखमय जीवन व्यतीत करो नीलाभ।" वीरभद्र ने कहा।

“मेरा जन्म ही मनुष्यों की भलाई के लिये हुआ है देव, अगर यह शरीर उनकी भलाई के लिये किसी कार्य की भेंट चढ़ रहा है, तो यह मेरे लिये कष्ट की नहीं, अपितु प्रसन्नता की बात है। इसलिये आज या तो मैं आपसे आशीर्वाद लेकर जाऊंगा, या फिर इन्हीं अंगारों में अपने शरीर को नष्ट कर, दूसरा जन्म लेकर फिर आपके पास आऊंगा देव।” नीलाभ ने अपने दर्द को पीते हुए वीरभद्र से कहा।

“तुम बहुत हठी लगते हो।” वीरभद्र ने कहा- “ठीक है कोशिश करते रहो।"

वीरभद्र की बात सुन, नीलाभ फिर से अंगारों पर आगे बढ़ने लगा। कुछ ही देर में नीलाभ का पूरा शरीर, अंगारों की अग्नि में जल गया। अब सिर्फ उसका सिर ही बचा था, फिर भी नीलाभ प्रयासरत था।

वीरभद्र की नजरें लगातार नीलाभ पर बनी हुईं थीं। आखिरकार अब नीलाभ की शक्ति जवाब देने लगी, अब आग उसके चेहरे पर भी लग गई थी । अचानक नीलाभ का शरीर हवा में लहराया और अंगारों के ऊपर गिरने लगा।

तभी वीरभद्र ने नीलाभ के शरीर को हवा में ही थाम लिया और उसे लेकर अंगारों के दूसरी ओर आ गये।

वीरभद्र ने लगभग निष्प्राण हो चुके नीलाभ के शरीर को वहीं जमीन पर लिटाया और अपने कमण्डल से जल लेकर, कुछ मंत्र पढ़ते हुए, उस जल को नीलाभ के शरीर पर फेंक दिया।

नीलाभ के शरीर पर जल पड़ते ही नीलाभ का पूरा शरीर बिल्कुल ठीक हो गया। नीलाभ ने अब कराह कर अपनी आँख खोली और वीरभद्र को देख उन्हें हाथ जोड़कर प्रणाम किया। अब नीलाभ का वह कटा हाथ भी सही हो गया था, जो उसने भद्र…ली के लिये काटा था।

“तुम अद्भुत हो नीलाभ।” वीरभद्र ने कहा- “जो व्यक्ति शिव के लिये शव बनने के लिये तैयार हो जाये, उससे बड़ा देव का भक्त कोई नहीं होगा। जाओ नीलाभ, मेरा आशीर्वाद सदैव तुम्हारे साथ है। जाकर मनुष्यों का कल्याण करो।" यह कहकर वीरभद्र ने अपने हाथ को वरमुद्रा में कर लिया।

वीरभद्र के हाथों से तेज प्रकाश निकलकर नीलाभ पर पड़ा और जब नीलाभ की आँखें खुलीं, तो वह उसी बर्फ की चोटी के पास जमीन पर पड़ा था, जहां उसे देव की प्रतिमा दिखाई दी थी।

इस समय नीलिमा, नीलाभ के सिर के पास बैठी 'चीं-चीं कर रही थी। नीलाभ बर्फ से खड़ा हुआ और नीलिमा को अपने कंधे पर बैठाकर देव के दूसरे अवतर 'भैरव' को ढूंढने के लिये निकल पड़ा।

जारी रहेगा_____✍️
 
#207.

चैपटर-12

ड्रैगन ब्रेथ नदी: (तिलिस्मा 5.43)

सुयश, जेनिथ, क्रिस्टी व शैफाली स्वादेन्द्रिय के खट्टे भाग को पार कर आगे बढ़ रहे थे। तभी उन्हें फिर से एक बोर्ड दिखाई दिया- “तृतीय विश्राम, तिलिस्मा 5.4, दूरी 10 किलोमीटर, उत्तर दिशा।"

"लो अब इस द्वार से निकलने की दूरी मात्र, 10 किलोमीटर ही बची है।" क्रिस्टी ने बोर्ड की ओर देखते हुए कहा।

सभी बातें करते हुए धीरे-धीरे पैदल ही आगे बढ़ रहे थे। लगभग आधा घंटा ऐसे ही चलने के बाद, सभी को एक नदी दिखाई दी, जिसके बीच में एक विशाल पेड़ लगा था। जिस पर लाल रंग की मिर्च लटक रही थी।

"लो मिर्च का पेड़ दिखाई दे गया। इसका मतलब कड़वा क्षेत्र शुरु हो चुका है।” जेनिथ ने कहा।

“यह तो ड्रैगन ब्रेथ मिर्च का पेड़ है, जो कि यूनाइटेड किंगडम में पाया जाता है।” क्रिस्टी ने पेड़ को देखते हुए कहा- “यह विश्व की सबसे कड़वी मिर्च है, इसकी SHU 24 लाख के भी ऊपर होती है।"

(SHU: Scoville Heat Unit; एक प्रकार की यूनिट, जिससे किसी भी मिर्च की कड़वाहट नापी जाती है)

“इस पेड़ से तो बहुत सी मिर्च टूटकर इस नदी के पानी में भी गिरी हुई हैं।” शैफाली ने नदी के पानी को देखते हुए कहा- “और नदी का पानी भी रुका हुआ है, इसका साफ मतलब है कि नदी का पानी भी, अत्यंत कड़वा होकर विषाक्त हो गया होगा। और ऐसी स्थिति में हम तैर कर इस नदी को नहीं पार कर सकते?"

“तैर कर पार करने की जरुरत भी नहीं है।" जेनिथ ने एक ओर इशारा करते हुए कहा- “वह देखिये, नदी के किनारे पर 4 गोल डोंगियां बंधी हुई हैं।"

“पर कैश्वर ने अगर नदी किनारे यह डोंगियां रखीं हैं, तो अवश्य ही इनमें किसी प्रकार को कोई पेंच डाल रखा होगा?” क्रिस्टी ने कहा।

"लेकिन डोंगियों के सिवा हमारे पास और कोई चारा है भी नहीं। इसलिये हमें इन्हीं से ही नदी को पार करना होगा।” सुयश ने लाचारी भरी शब्दों में कहा- “लेकिन नदी में उतरने से पहले, जिसको जो भी बचाव का साधन दिखाई दे, वह उसे ले ले और मानसिक रुप से पूरी तरह तैयार रहे, कि बीच नदी में कोई ना कोई मुश्किल आयेगी ही?"

सुयश की बात सुन सभी ने आसपास देखकर कुछ ना कुछ उठा लिया। किसी ने पेड़ की जड़, तो किसी ने पत्थर या लकड़ी। अब सभी तैयार थे, नदी में जाने के लिये।

सभी डोंगियों के पास पहुंच गये और उन्होंने पेड़ से बंधी डोंगियों को खोल लिया, पर किसी ने भी उन डोंगियों की रस्सी को फेंका नहीं था।

जेनिथ ने डोंगी में बैठने के पहले, एक बार अपना हाथ नदी के पानी में डाला, जो कि तुरंत झुलस गया।

“कैप्टेन, नदी का पानी बहुत जहरीला है, हमें बचकर रहना होगा।” जेनिथ ने कहा।

तभी नक्षत्रा ने जेनिथ के हाथ को अपनी हीलींग पॉवर से सही कर दिया।

अब सबसे आगे सुयश, फिर शैफाली, फिर क्रिस्टी और आखिर में जेनिथ, उन डोंगियों में बैठकर नदी के दूसरी छोर की ओर चल दिये।

डोंगियों में एक-एक चप्पू रखा था, जिसके द्वारा उस डोंगी को चलाना था।

शुरु-शुरु में सभी को डोंगी चलाने में बहुत परेशानी आयी, पर फिर सुयश के गाइड करने पर सभी डोंगियों को लेकर आगे की ओर बढ़ने लगे।

सभी अपनी डोंगी को ड्रैगन ब्रेथ मिर्च के पेड़ से दूर ही रख रहे थे। उन्हें पता था कि अगर एक भी मिर्च उनके शरीर से छू भी गया, तो वह शरीर के उस भाग को पूरी तरह से जला देगा।

कुछ ही देर में आधा रास्ता बिना बाधा के पार हो गया, तभी शैफाली की नजर अपनी डोंगी पर गई। डोंगी के आकार को देख वह हैरान हो गई।

“कैप्टेन अंकल, हमारी डोंगी का आकार धीरे-धीरे छोटा होता जा रहा है, अगर यह इसी प्रकार छोटा होता रहा, तो यह हमें बीच नदी में डुबो देगा।” शैफाली ने सुयश की ओर देख चिल्लाकर कहा।

शैफाली की आवाज सुन अब सभी अपनी-अपनी डोंगियों को देखने लगे। शैफाली का कहना सही था, सभी की डोंगियां धीरे-धीरे छोटी हो रही थी।

“अब क्या करें कैप्टेन, हम जिस गति से नदी के दूसरी ओर जा रहे हैं, उस गति से हम नदी के बीच में ही मरने वाले हैं।” क्रिस्टी ने घबराकर कहा।

पर इससे पहले कि कोई कुछ कह पाता, पानी से एक प्लीसियो सारस ने अपनी गर्दन, पानी के बाहर निकाली। (प्लीसियो सारस डाइनासोर की प्रजाति का जीव है, जो करोड़ों वर्ष पहले ही विलुप्त हो चुका है)

प्लीसियो सारस शरीर से काफी विशालकाय था। वह लगभग 100 फुट के आसपास था। उसकी लंबी गर्दन को छोड़ उसके शरीर का बाकी हिस्सा पानी के अंदर ही था।

"लो अब इसी की कमी थी।” जेनिथ ने गुस्साकर कहा- “एक तो वैसे ही हम नदी के बीच में मरने वाले हैं, ऊपर से यह भी आ गया, जल्दी से हमारी जान लेने को।"

किसी के पास उस प्लीसियो सारस से नदी के बीच में बचने का कोई उपाय नहीं था।

“घबराओ नहीं दोस्तों, और चुपचाप चलते रहो, प्लीसियो सारस समुद्री मछलियों और गहरे पानी के जंतुओं को खाता है, वह हमें कुछ नही कहेगा?" सुयश ने सबका हौसला बढ़ाते हुए कहा और अपनी डोंगी को तेजी से चलाने लगा।

प्लीसियो सारस स्वयं उन सभी को देखकर हैरान था। ऐसा लग रहा था कि उसने आज से पहले कभी इंसानों को देखा ही नहीं था।

उधर डोंगी में अब किसी तरह से, सिकुड़कर बैठने बराबर ही जगह बची थी।

“कैप्टेन आप सबको लेकर तेजी से नदी के किनारे की ओर बढ़िये, इस प्लीसियो सारस को मैं देखती हूं।"

यह कहकर क्रिस्टी नदी के किनारे की ओर जाने की जगह प्लीसियो सारस की ओर बढ़ने लगी।

किसी की समझ में क्रिस्टी का प्लान नहीं आया था, पर अब वह सभी तेजी से नदी के दूसरे किनारे की ओर, अपनी डोंगी को लेकर भागने लगे।

उधर क्रिस्टी को अपनी ओर आता देख प्लीसियो सारस ने हैरानी से, अपनी लंबी गर्दन सहित अपना सिर क्रिस्टी की डोंगी की ओर बढ़ाया।

प्लीसियो सारस ने डोंगी के अगले सिरे को पकड़कर एक तेज झटका दिया, उस तेज झटके से क्रिस्टी की डोंगी पानी में पलट गई।

पर क्रिस्टी पहले से ही इसके लिये तैयार थी।

जैसे ही क्रिस्टी की डोंगी पानी में पलटी, क्रिस्टी ने उछलकर प्लीसियो सारस के गर्दन में, अपने हाथ में पकड़ी रस्सी फंसाकर लटक गई।

अब प्लीसियो सारस ने क्रिस्टी को पकड़ने के लिये अपना मुंह नीचे किया, पर इसी के साथ प्लीसियो सारस की गर्दन से लिपटी क्रिस्टी भी अपने आप नीचे हो गई।

क्रिस्टी ने अब अपने पैर की कैंची बनाकर प्लीसियो सारस की गर्दन को कसकर पकड़ लिया।

प्लीसियो सारस अब क्रिस्टी की पकड़ से छूटने के लिये अपनी गर्दन को जोर-जोर से हिला रहा था।

पर क्रिस्टी ने उसे छोड़ने की जगह, रस्सी के एक सिरे में गांठ मार दी। अब रस्सी पूरी गिरफ्त के साथ प्लीसियो सारस की गर्दन में बंध चुकी थी।

उधर सुयश सहित सभी अभी भी नदी के दूसरे किनारे से दूर थे, पर अब उनकी डोंगी बहुत छोटी हो गई थी। बामुश्किल ही सभी अपने शरीर का बैलेंस बनाकर किसी तरह उस पर बैठे थे।

“कैप्टेन।” तभी क्रिस्टी ने चीखकर सुयश का ध्यान अपनी ओर करवाया- “सब लोग अपने पास रखी रस्सी को एक में मिलाकर कसकर बांध दो।"

क्रिस्टी की बात सुनकर सभी आश्चर्य से भर गये कि क्रिस्टी स्वयं तो नदी के बीच लटकी हुई है, फिर भला वह उन लोगों को बचाने के बारे में कैसे सोच रही है?" पर सभी ने अपनी डोंगियों को आपस में जोड़कर सभी रस्सियों को क्रिस्टी के कहे अनुसार मिला लिया।

उधर क्रिस्टी ने अब प्लीसियो सारस की गर्दन में फंसी रस्सी के दूसरे सिरे को पकड़ा और हवा में छलांग लगा दी।

अब क्रिस्टी पूरी तरह से प्लीसियो सारस की गर्दन में झूल रही थी।

तभी परेशान हो चुके प्लीसियो सारस ने अपनी लंबी गर्दन को हवा में तेजी से दांये-बांये घुमाना शुरु कर दिया।

जैसे-जैसे प्लीसियो सारस की गर्दन हवा में घूम रही थी, वैसे-वैसे रस्सी के सहारे लटकी, क्रिस्टी के शरीर के झूलने की गति भी बढ़ती जा रही थी।

जब गति काफी तेज हो गई, तो अब क्रिस्टी ने एक बार नदी के दूसरे किनारे की ओर देखा, और जैसे ही इस बार प्लीसियो सारस ने अपनी गर्दन को दाहिनी ओर झटका दिया, क्रिस्टी ने अपने हाथ में पकड़ी रस्सी को छोड़ दिया।

क्रिस्टी का शरीर हवा में उड़ता हुआ, नदी के दूसरे किनारे पर जा गिरा। लेकिन क्रिस्टी को रत्ती भर भी चोट नहीं आई थी, क्यों कि क्रिस्टी की लैडिंग नदी किनारे अपने पैरों पर हुई थी।

क्रिस्टी तुरंत अपनी जगह से भागकर नदी के उस ओर आ गई, जिधर सुयश सबकी डोंगी को लेकर आ रहा था।

“कैप्टेन, जल्दी से अपनी बनाई रस्सी मेरी ओर फेंको।" क्रिस्टी ने चीखकर सुयश से कहा।

सुयश ने रस्सी का गोला पहले से ही बनाकर रखा था, क्रिस्टी की आवाज सुनते ही उसने रस्सी के आखिरी सिरे को जेनिथ को पकड़ाया और उस रस्सी के गुच्छे को पूरी ताकत से क्रिस्टी की ओर उछाल दिया।

क्रिस्टी ने हवा में ही रस्सी को लपका और उसे एक पेड़ में फंसाकर पूरी ताकत से खींचने लगी।

सुयश, जेनिथ और शैफाली, तीनों की डोंगी, अब मात्र पैर रखने के बराबर बची थी। लेकिन क्रिस्टी के तेजी से खींचने की वजह से वह डोंगी तुरंत ही नदी के दूसरे किनारे पर पहुंच गई।

तीनों तुरंत डोंगी से उतरकर नदी के दूसरी ओर आ गये। क्रिस्टी अब जमीन पर लेटकर तेज-तेज साँस ले रही थी।

पर जो भी हो क्रिस्टी ने एक बार फिर से अपनी श्रेष्ठता सिद्ध कर दी थी।

सभी खुश थे क्यों कि अब उनके सामने ही तिलिस्मा का अगला द्वार दिख रहा था। सभी उठकर तिलिस्मा के अगले द्वार में प्रवेश कर गये।

जारी रहेगा_____✍️
 
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