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- Dec 5, 2013
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सोलह सिंगार,
[color=rgb(65,]चूड़ी,[/color][color=rgb(209,]महावर
[/color]
अभी रीत और गुड्डी चूड़ियां पहना रही थी हरी-हरी और लाल कंगन।
और संध्या भाभी पैर में महावर लगा रही थीं,
रीत और गुड्डी एकदम चुड़िहारिनों की तरह बैठी थी। गुड्डी ने कलाई पकड़ रखी थी और रीत चूड़ियां पहना रही थी। और जैसे चुड़िहारिने नई नवेलियों को कुँवारी लड़कियों को छेड़ती हैं वो भी बस उसी तरह वो दोनों भी। गुड्डी ने मेरी कलाई को गोल मोड़ दिया चूड़ी अन्दर करने के लिए।
रीत ने छेड़ा- "हे हमारी तुम्हारी कब?"
"अरे पकड़ा पकड़ी होय जब." गुड्डी ने जवाब दिया।
रीत ने जब चूड़ी घुसाई तो दर्द तो हुआ लेकिन रीत की बात सुनकर वो काफूर हो गया।
"अरे उह्ह. आह्ह. कब?" रीत ने पूछा।
"आधा जाय तब." गुड्डी ने जवाब दिया।
"अरे मजा आये कब? निक लागे कब?" रीत ने अपनी बड़ी-बड़ी कजरारी आँखें नचाकर पूछा।
"अरे पूरा जाय तब." गुड्डी भी अब पीछे रहने वाली नहीं थी, और एक चूड़ी अन्दर चली गई।
उसके बाद तो उन दोनों ने मिलकर एकदम कुहनी तक चूड़ियां पहना दी। और दोनों मिलकर अपने इस द्विअर्थी पहेली कम डायलाग पे हँस पड़ीं।
"सुहागरात का पता कैसे चलेगा। जानू?" गुड्डी ने मुझे चिढ़ाते हुए पूछा।
"अरे जब रात भर चूड़ियां चुरूर मुरुर करें और आधी सुबह तक चटक जायं." रीत मेरे गाल पे चुटकी काटकर बोली।
"क्यों संध्या याद है ना तुम्हारी सुहागरात में,... महावर वाली बात." चंदा भाभी ने मुश्कुराकर पूछा।
"आप भी ना भाभी। वो तो सब की सुहागरात में होता है। आप भी कहाँ की बात ले बैठीं। वो भी इन बच्चियों के सामने." रीत और गुड्डी की ओर देखकर, मेरे पैरों में महावर लगाती वो बोली।
रीत ने उन्हें ऐसे देखा जैसे कोई गलत बात उन्होंने कह दी हो।
लेकिन बोली दूबे भाभी- "हे बच्चियां किन्हें कह रही हो? जब वो घूम-घूम के चूचियां दबवाने लगें तो ये बच्चियां नहीं रह जाती और ऊपर से मेरी ननदों की झांटे बाद में आती हैं, लण्ड पहले ढूँढ़ने लगती हैं। और वैसे भी कल के पहले इन दोनों की भी चटक-चटक के फट जायेगी। हम सब की कैटगरी में आ जायेंगी." वो हड़का के बोली।
रीत और गुड्डी ने सहमति में सिर हिलाया।
रीत से संध्या भाभी अपनी सुहागरात के महावर का पूरा किस्सा सुनाया,
" मेरी ननदों ने नाउन को चढ़ा दिया था। फिर उसने ये रच-रच के महावर लगाया, खूब गाढ़ा और गीला। आगले दिन सुबह जब हम दोनों कमरे से बाहर आये तो वो सब छिपकलियां मेरी ननदें पहले से तैयार बैठी थी। नाश्ता के समय पकड़ लिया उन्होंने तुम्हारे जीजू को- "हे भैया आपके माथे पे ये लाल-लाल? ये भाभी के पैर का रंग कैसे? कहीं रात भर भाभी ने आपसे पैर तो नहीं छूलवाया? ये बहुत गलत बात है."
कोई बोली- "अरे भैया को कोई चीज चाहिए होगी इसलिए भाभी ने,... क्यों भैय्या? लेकिन भाभी ने दिया की नहीं। खूब तंग किया."
संध्या भाभी बता भी रही थी और उस दिन की याद करके मुश्कुरा भी रही थी।
गुड्डी भी बोली- "लेकिन मेरी समझ में नहीं आया की कैसे जीजू के माथे पे आपके पैरों की महावर?"
उसकी बात काटकर संध्या भाभी मुश्कुराते हुए उसके उरोजों पे एक चिकोटी काटकर बोली-
"अरी बन्नो सब समझ में आ जाएगा। जब रात भर टांगें कंधे पे रहेंगी और रगड़-रगड़कर, ये चूची पकड़कर चोदेगा ना तो सब पता चल जाएगा की महावर का रंग कैसे माथे पे लगता है?"
रीत ने पाला बदला और संध्या की ओर हो गई- "आज जा रही है ना तू कल सुबह ही हम सब फोन करके पूछेंगे तुझसे। की रात भर टांगें उठी रही की नहीं? समझ में आया की नहीं?"
सब हो-हो करके हँसने लगी लेकिन गुड्डी शर्मा गई और मैं भी।
संध्या भाभी ने महावर के रंग की कटोरी में जाने क्या और मिलाया और मुझे चिढ़ाते हुए बोलीं-
"मैं लेकिन उससे भी गाढ़ा लगा रही हूँ और चटक भी, पंद्रह दिन तक तो नहीं छूटेगा, लाख पैर पटक लेना."
महावर के साथ उन्होंने पैरों के नाखून भी रंगे और जैसे गाँव में औरतों की विदाई होने के समय महावर के साथ पैरों पे डिजाइन बनाते हैं। वैसे डिजाइन भी बना दी। वो तो मैंने बाद में देखा।
एक पैर पे डिजाइन में उन्होंने लिखा था बहन और दूसरे पे चोद।
दूबे भाभी और चंदा भाभी बड़ी देर से चुप बैठी मजे ले रही थीं, लेकिन दूबे भाभी अपने रूप में आयी, " तो कोई लौण्डेबाज इसकी गांड माएगा तो उसके माथे पे लगेगा "
और अब सब हो हो,
लेकिन मैंने फुसफुसा के भाभी से सिफारिश की, भाभी, गुड्डी के पैर में भी लगा दीजिये न "
वो महावर ख़तम करते, उसी तरह धीरे से बोलीं,
" लगाउंगी, लगाउंगी, इससे भी चटक और गाढ़ा, जब तुम इसको हरदम के लिए बिदा करा के ले जाओगे, और अगली सुबह वीडियो काल में तेरे माथे पे वही महावर देखूंगी "
फिर वो और चंदा भाभी पैरों में पायल और बिछुए पहनाने लगी वो भी खूब घुंघरू वाले। चौड़ी सी चांदी की पायल।
चंदा भाभी गुड्डी से हँसकर बोली "अब ये मत पूछना की दुल्हन को ये क्यों पहनाते हैं?" फिर कहने लगी- "इसलिए बिन्नो की जब रात भर दुल्हन की चुदाई हो तो रुनझुन, रुनझुन। ये पायल बजे और बाहर खड़ी सारी ननद भौजाइयों को ये बात मालूम चल जाय की अब नई दुल्हन चुद रही है, "
बिछुवे बहुत ही ज्यादा घुंघरू वाले थे।
[color=rgb(65,]चूड़ी,[/color][color=rgb(209,]महावर
[/color]अभी रीत और गुड्डी चूड़ियां पहना रही थी हरी-हरी और लाल कंगन।
और संध्या भाभी पैर में महावर लगा रही थीं,
रीत और गुड्डी एकदम चुड़िहारिनों की तरह बैठी थी। गुड्डी ने कलाई पकड़ रखी थी और रीत चूड़ियां पहना रही थी। और जैसे चुड़िहारिने नई नवेलियों को कुँवारी लड़कियों को छेड़ती हैं वो भी बस उसी तरह वो दोनों भी। गुड्डी ने मेरी कलाई को गोल मोड़ दिया चूड़ी अन्दर करने के लिए।
रीत ने छेड़ा- "हे हमारी तुम्हारी कब?"
"अरे पकड़ा पकड़ी होय जब." गुड्डी ने जवाब दिया।
रीत ने जब चूड़ी घुसाई तो दर्द तो हुआ लेकिन रीत की बात सुनकर वो काफूर हो गया।
"अरे उह्ह. आह्ह. कब?" रीत ने पूछा।
"आधा जाय तब." गुड्डी ने जवाब दिया।
"अरे मजा आये कब? निक लागे कब?" रीत ने अपनी बड़ी-बड़ी कजरारी आँखें नचाकर पूछा।
"अरे पूरा जाय तब." गुड्डी भी अब पीछे रहने वाली नहीं थी, और एक चूड़ी अन्दर चली गई।
उसके बाद तो उन दोनों ने मिलकर एकदम कुहनी तक चूड़ियां पहना दी। और दोनों मिलकर अपने इस द्विअर्थी पहेली कम डायलाग पे हँस पड़ीं।
"सुहागरात का पता कैसे चलेगा। जानू?" गुड्डी ने मुझे चिढ़ाते हुए पूछा।
"अरे जब रात भर चूड़ियां चुरूर मुरुर करें और आधी सुबह तक चटक जायं." रीत मेरे गाल पे चुटकी काटकर बोली।
"क्यों संध्या याद है ना तुम्हारी सुहागरात में,... महावर वाली बात." चंदा भाभी ने मुश्कुराकर पूछा।
"आप भी ना भाभी। वो तो सब की सुहागरात में होता है। आप भी कहाँ की बात ले बैठीं। वो भी इन बच्चियों के सामने." रीत और गुड्डी की ओर देखकर, मेरे पैरों में महावर लगाती वो बोली।
रीत ने उन्हें ऐसे देखा जैसे कोई गलत बात उन्होंने कह दी हो।
लेकिन बोली दूबे भाभी- "हे बच्चियां किन्हें कह रही हो? जब वो घूम-घूम के चूचियां दबवाने लगें तो ये बच्चियां नहीं रह जाती और ऊपर से मेरी ननदों की झांटे बाद में आती हैं, लण्ड पहले ढूँढ़ने लगती हैं। और वैसे भी कल के पहले इन दोनों की भी चटक-चटक के फट जायेगी। हम सब की कैटगरी में आ जायेंगी." वो हड़का के बोली।
रीत और गुड्डी ने सहमति में सिर हिलाया।
रीत से संध्या भाभी अपनी सुहागरात के महावर का पूरा किस्सा सुनाया,
" मेरी ननदों ने नाउन को चढ़ा दिया था। फिर उसने ये रच-रच के महावर लगाया, खूब गाढ़ा और गीला। आगले दिन सुबह जब हम दोनों कमरे से बाहर आये तो वो सब छिपकलियां मेरी ननदें पहले से तैयार बैठी थी। नाश्ता के समय पकड़ लिया उन्होंने तुम्हारे जीजू को- "हे भैया आपके माथे पे ये लाल-लाल? ये भाभी के पैर का रंग कैसे? कहीं रात भर भाभी ने आपसे पैर तो नहीं छूलवाया? ये बहुत गलत बात है."
कोई बोली- "अरे भैया को कोई चीज चाहिए होगी इसलिए भाभी ने,... क्यों भैय्या? लेकिन भाभी ने दिया की नहीं। खूब तंग किया."
संध्या भाभी बता भी रही थी और उस दिन की याद करके मुश्कुरा भी रही थी।
गुड्डी भी बोली- "लेकिन मेरी समझ में नहीं आया की कैसे जीजू के माथे पे आपके पैरों की महावर?"
उसकी बात काटकर संध्या भाभी मुश्कुराते हुए उसके उरोजों पे एक चिकोटी काटकर बोली-
"अरी बन्नो सब समझ में आ जाएगा। जब रात भर टांगें कंधे पे रहेंगी और रगड़-रगड़कर, ये चूची पकड़कर चोदेगा ना तो सब पता चल जाएगा की महावर का रंग कैसे माथे पे लगता है?"
रीत ने पाला बदला और संध्या की ओर हो गई- "आज जा रही है ना तू कल सुबह ही हम सब फोन करके पूछेंगे तुझसे। की रात भर टांगें उठी रही की नहीं? समझ में आया की नहीं?"
सब हो-हो करके हँसने लगी लेकिन गुड्डी शर्मा गई और मैं भी।
संध्या भाभी ने महावर के रंग की कटोरी में जाने क्या और मिलाया और मुझे चिढ़ाते हुए बोलीं-
"मैं लेकिन उससे भी गाढ़ा लगा रही हूँ और चटक भी, पंद्रह दिन तक तो नहीं छूटेगा, लाख पैर पटक लेना."
महावर के साथ उन्होंने पैरों के नाखून भी रंगे और जैसे गाँव में औरतों की विदाई होने के समय महावर के साथ पैरों पे डिजाइन बनाते हैं। वैसे डिजाइन भी बना दी। वो तो मैंने बाद में देखा।
एक पैर पे डिजाइन में उन्होंने लिखा था बहन और दूसरे पे चोद।
दूबे भाभी और चंदा भाभी बड़ी देर से चुप बैठी मजे ले रही थीं, लेकिन दूबे भाभी अपने रूप में आयी, " तो कोई लौण्डेबाज इसकी गांड माएगा तो उसके माथे पे लगेगा "
और अब सब हो हो,
लेकिन मैंने फुसफुसा के भाभी से सिफारिश की, भाभी, गुड्डी के पैर में भी लगा दीजिये न "
वो महावर ख़तम करते, उसी तरह धीरे से बोलीं,
" लगाउंगी, लगाउंगी, इससे भी चटक और गाढ़ा, जब तुम इसको हरदम के लिए बिदा करा के ले जाओगे, और अगली सुबह वीडियो काल में तेरे माथे पे वही महावर देखूंगी "
फिर वो और चंदा भाभी पैरों में पायल और बिछुए पहनाने लगी वो भी खूब घुंघरू वाले। चौड़ी सी चांदी की पायल।
चंदा भाभी गुड्डी से हँसकर बोली "अब ये मत पूछना की दुल्हन को ये क्यों पहनाते हैं?" फिर कहने लगी- "इसलिए बिन्नो की जब रात भर दुल्हन की चुदाई हो तो रुनझुन, रुनझुन। ये पायल बजे और बाहर खड़ी सारी ननद भौजाइयों को ये बात मालूम चल जाय की अब नई दुल्हन चुद रही है, "
बिछुवे बहुत ही ज्यादा घुंघरू वाले थे।








