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- Dec 5, 2013
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आदिवासियों के गाँवों में एक पागल जोगी घूमा करता था, जिसे लोग मुलक्कड़ बाबा कहते थे। यह जोगी बच्चों को खूब प्यार करता था । बच्चे भी उससे खूब घुल जाते थे । उन्हें तरह-तरह की कहानियां सुनने को मिलती थीं। जो मुलक्कड़ बाबा ही उन्हें सुनाता था । मुलक्कड़ बाबा अपनी पोटली में बच्चों के लिये कुछ-न-कुछ खाने- पीने का मसाला भर कर रखता था । आदिवासियों के प्रत्येक गांव के बच्चे उसकी प्रतीक्षा करते रहते थे, वे अपने माता-पिता से मुलक्कड़ बाबा के बारे में पूछा करते थे ।
लम्बी दाढ़ी। बड़ी-बड़ी जटाएं। गले में रुद्राक्ष की मालाएं। शरीर पर लबादा, जो गले से लेकर पैर तक ढके रहता था । मुलक्कड़ बाबा का यही हुलिया था । यह पागल जोगी कौन था ? कहाँ से आता था ? इसे कोई आदिवासी नहीं जानता था । किसी ने जानने का प्रयास भी नहीं किया था । तपोवन तो साधु और योगी पुरुषों से भरा रहता था ।
बच्चों को प्यार करने वाला मुलक्कड़ बाबा आज हाईवे पर कार दौड़ा रहा था। कार की पिछली सीट पर चन्द्र बेताल लेटा था । उसने कार के शीशों पर परदे चढ़ाये हुए थे ।
।
कार चलाते चलाते उसने सर पर पग्गड़ बाँध लिया था । नकली दाढ़ी के बाल नोच-नोच कर सड़क पर उड़ा दिए थे। अब उसके चेहरे पर छोटी अधपकी दाढ़ी थी । उसने आँखों पर काला धूप का चश्मा चढ़ा लिया था । इस प्रकार उसका हुलिया पूरी तरह बदल गया था । अब उसे पहचान पाना दुर्लभ था ।
चन्द्र बेताल सा चुका था ।
मुलक्कड़ बाबा की निगाहें खाली पड़ी सड़क पर जमी थीं। जीवन में पहली बार उसने दिल की धड़कने तेज़ कर देने वाला कार्य किया था । चार साल उसने कैसे बिताये थे, वही जानता था। एक वर्ष तक वह पागलों की तरह सड़कों पर मारा-मारा फिरता रहा । उसे पागल खाने भेज दिया गया । जहाँ एक मानसिक चिकित्सक ने उसकी दिमागी हालत दुरुस्त कर दी । वह पूर्णतया स्वस्थ तो नहीं हुआ था परन्तु पहले से उसकी हालत काफी सुधर गई थी, उसमें सोचने समझने, अच्छे-बुरे की क्षमता आ गई थी ।
अर्ध विक्षिप्त स्थिति में होने के कारण वह यदि पागलपन का अभिनय करता रहे तो उसे बड़ा अच्छा लगता था और दूसरों का मनोरंजन कर उसे अज़ीम प्रसन्नता होती थी ।
आखिर यह मुलक्कड़ बाबा था कौन ? और इसने किसी बुद्धिमान शक्तिवान शातिर की तरह जान की बाज़ी लगाकर चन्द्र बेताल को क्यों हासिल किया ? इसके पीछे किसी का क्या उद्देश्य था, यह जानने के लिये पांच वर्ष पहले की घटनाओं को जानना होगा ।
चार वर्ष पहले की बात है ।
योग विद्या से दिलचस्पी रखने वाला एक पत्रकार मठ में आकर रहने लगा था । उसका नाम था 'धनंजय' । छ: माह के भीतर ही उसे मठ की गतिविधियों पर संदेह होने लगा। उसे समाचार पत्र के सम्पादक ने यही बताया था कि यहाँ रहकर वह किसी-न-किसी रहस्य की जड़ तक पहुँचेगा इसलिये उसे यहाँ भेजा गया था । अतः उसे दोनों उद्देश्य सफल होते नज़र आये । जहाँ यह योग विद्या सीख रहा था वहाँ चौरंगी बाबा के रहस्यमय परिवेश को समझने का प्रयास भी कर रहा था । आखिर उसने रोज़मर्रा की बातों को लेकर एक लेख लिखना शुरू किया। संयोग से वह लेख महामाया योगी की निगाह में आ गया । पत्रकार ने पैतरा बदला । अब वह वहाँ जासूस की सी स्थिति में नहीं रह सकता था । उसने अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि वह योग पर कुछ रिसर्च कर रहा है और अपने समाचार पत्र के लिये किसी नई बात की तलाश में है ।
उसके बाद उसने चौरंगी बाबा और महामाया योगी से तरह-तरह के प्रश्न किये। चौरंगी बाबा को उसकी छिपी गतिविधि के कारण बेहद क्रोध आया और उन्होंने नेत्रों से चिंगारियां बरसाते हुए कहा - " तू मेरी परीक्षा ले रहा था मूर्ख । जा तेरा सर्वनाश हो चुका, तू इस संसार में खुद को अकेला पायेगा, तेरे परिवार का अनिष्ट हो चुका।"
उस वक्त चौरंगी बाबा के इस शाप का धनंजय पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। वह एक घिसा हुआ, मंझा हुआ पत्रकार था । वह जानता था चौरंगी पाखंडी है। वह क्या किसी को शाप देगा । शाप की बातें तो पीछे छूट चुकीं । परन्तु वह यह भी महसूस करता था कि वहाँ रुकना अब खतरनाक हो सकता था इसलिये वह अधूरी जानकारी के साथ अपने शहर लौट गया ।
अपने घर पहुँचते ही उसपर ब्रज जैसा पहाड़ गिर पड़ा ।
I
उसका मकान जल कर राख हो गया था और उसे केवल चार लाशें मिल पायीं । उसके परिवार में कोई भी जीवित नहीं रहा था। उसके दो लड़के, पत्नी, उसकी माँ, कुछ भी तो नहीं रहा था। ये सभी लाशें अधजली थीं और किसी को भी इस बारे में पता न था कि आग कैसे
लगी ? आग जब पूरी तरह फैल चुकी थी तब पड़ोसियों को पता चला था। किसी ने चीख-पुकार भी नहीं सुनी थी ।
धनंजय चीख मारकर बेहोश हो गया । उसकी दुनिया उजड़ चुकी थी ।
उसे चौरंगी बाबा का शाप याद आया ।
उसके पहुँचने से चौबीस घंटे पहले वह घटना घट चुकी थी । उसके आने तक चारों शव पुलिस की देख-रेख में सुरक्षित रखे गये थे। शवों के पोस्ट मार्टम की आवश्यकता नहीं समझी गई थी क्योंकि केस में किसी प्रकार की कोई उलझन नहीं थी। एक ही बात पुलिस इंस्पेक्टर के गले नहीं उतर रही थी कि इतने खुले मकान में जिसके तीन बाहरी दरवाज़े, चार खुली चौड़ी खिड़कियाँ और नीची बालकनी थी, वहाँ आग लगने के बाद कोई भी बाहर क्यों नहीं निकल पाया ? क्या चारों प्राणी बेसुध सो रहे थे ?
इंस्पेक्टर ने धनंजय से एक सवाल किया ।
"क्या चारों हॉल में सोते थे ?"
"नहीं, वहाँ कोई नहीं सोता था ।"
"फिर चारों के शव एक ही जगह यानी हॉल में क्यों पाए गये ? जिसकी एक खिड़की एक दरवाज़ा सीधा बाहर खुलता था । हैरत की बात है कि उनमें से किसी ने चीख-पुकार भी नहीं मचाई।"
इस घटना के तुरंत बाद ही धनंजय का मानसिक संतुलन बिगड़ने लगा और उसके बाद जल्द ही लोगों ने उसे पागल साबित कर दिया था । परन्तु पागलपन के दौरान भी लोगों ने उसके मुंह से चौरंगी बाबा और महामाया योगी को गलियां देते हुए सुना था। वह किसी भी आदमी को चौरंगी बाबा कहकर पत्थर फेंकने लगता था ।
इसका अर्थ था कि पागलपन के दौरान भी उसके दिमाग से इन दो व्यक्तियों की छाया नहीं उतर पायी थी और वह अपने परिवार के विनाश का कारण इन्हीं दो को समझता था ।
बाद में उसे पता भी चल गया था कि यह चौरंगी बाबा के आदेश से हुआ था । महामाया के कातिल दस्ते ने यह कार्य किया था । यह जानकारी उसे सूक्ष्म भेष में रहने के बाद प्राप्त हुई। वह मुलक्कड़ बाबा के रूप में यहाँ आया था, क्योंकि उसे पहले यह तय करना था कि वास्तव में उसके परिवार को नष्ट करने वाला कौन है ? क्योंकि उस हत्याकांड को उसने दुर्घटना कभी नहीं माना था । उसे पूरा विश्वास था कि इसके ज़िम्मेदार यही लोग हैं ।
पूरी जानकारी प्राप्त करने के बाद उसका फर्ज़ बनता था कि कातिलों को इससे भी बढ़कर सज़ा दे । वह अपनी योजना और अपने हाथों से सज़ा देना चाहता था । अपने चौदह साल और आठ साल के लड़के का सपना वह भुला नहीं पाया था । सुन्दर पत्नी भी उसके ख्वाब में आती रहती थी । उसका जीवन सिर्फ कातिलों को सज़ा देने के लिये शेष रह गया था ।
वह जल्दबाजी में कोई काम नहीं करना चाहता था । इसलिये उसने वक्त का इंतज़ार किया । इन्तज़ारी रंग लायी और अब उसे संतोष था कि वह योजना बद्ध तरीके से काम कर पायेगा ।
वह इतना शक्तिशाली नहीं था जो उन लोगों से टक्कर ले पाता । वह उनके सामने चींटी के समान था । और जिस ढंग की सज़ा उसके अर्ध-
विक्षिप्त मस्तिष्क में थी, वैसी तमन्ना तो कई जन्म लेने पर भी पूरी न होती, परन्तु इन सारी समस्याओं का हल उसे चन्द्र बेताल के भीतर
नज़र आ रहा था ।
निश्चित रूप से चन्द्र के भीतर अलौकिक शक्ति थी ।
उसने चन्द्र के बारे में खासी जानकारी प्राप्त की थी । मन्दिर के सहयोगी नौकर के अलावा मठ में उसके तीन और सहयोगी थे, जो इन दिनों धीरे-धीरे महामाया का विश्वास प्राप्त करते जा रहे थे । यह लोग वहाँ की प्रत्येक जानकारी उस तक पहुँचाते रहते थे । अतः चन्द्र बेताल क्या है और उसे चौरंगी अपने स्वार्थ को हल करने के बाद क्यों खत्म कर देना चाहता है यह बात उसके सामने खुली किताब की तरह थी ।
लम्बी दाढ़ी। बड़ी-बड़ी जटाएं। गले में रुद्राक्ष की मालाएं। शरीर पर लबादा, जो गले से लेकर पैर तक ढके रहता था । मुलक्कड़ बाबा का यही हुलिया था । यह पागल जोगी कौन था ? कहाँ से आता था ? इसे कोई आदिवासी नहीं जानता था । किसी ने जानने का प्रयास भी नहीं किया था । तपोवन तो साधु और योगी पुरुषों से भरा रहता था ।
बच्चों को प्यार करने वाला मुलक्कड़ बाबा आज हाईवे पर कार दौड़ा रहा था। कार की पिछली सीट पर चन्द्र बेताल लेटा था । उसने कार के शीशों पर परदे चढ़ाये हुए थे ।
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कार चलाते चलाते उसने सर पर पग्गड़ बाँध लिया था । नकली दाढ़ी के बाल नोच-नोच कर सड़क पर उड़ा दिए थे। अब उसके चेहरे पर छोटी अधपकी दाढ़ी थी । उसने आँखों पर काला धूप का चश्मा चढ़ा लिया था । इस प्रकार उसका हुलिया पूरी तरह बदल गया था । अब उसे पहचान पाना दुर्लभ था ।
चन्द्र बेताल सा चुका था ।
मुलक्कड़ बाबा की निगाहें खाली पड़ी सड़क पर जमी थीं। जीवन में पहली बार उसने दिल की धड़कने तेज़ कर देने वाला कार्य किया था । चार साल उसने कैसे बिताये थे, वही जानता था। एक वर्ष तक वह पागलों की तरह सड़कों पर मारा-मारा फिरता रहा । उसे पागल खाने भेज दिया गया । जहाँ एक मानसिक चिकित्सक ने उसकी दिमागी हालत दुरुस्त कर दी । वह पूर्णतया स्वस्थ तो नहीं हुआ था परन्तु पहले से उसकी हालत काफी सुधर गई थी, उसमें सोचने समझने, अच्छे-बुरे की क्षमता आ गई थी ।
अर्ध विक्षिप्त स्थिति में होने के कारण वह यदि पागलपन का अभिनय करता रहे तो उसे बड़ा अच्छा लगता था और दूसरों का मनोरंजन कर उसे अज़ीम प्रसन्नता होती थी ।
आखिर यह मुलक्कड़ बाबा था कौन ? और इसने किसी बुद्धिमान शक्तिवान शातिर की तरह जान की बाज़ी लगाकर चन्द्र बेताल को क्यों हासिल किया ? इसके पीछे किसी का क्या उद्देश्य था, यह जानने के लिये पांच वर्ष पहले की घटनाओं को जानना होगा ।
चार वर्ष पहले की बात है ।
योग विद्या से दिलचस्पी रखने वाला एक पत्रकार मठ में आकर रहने लगा था । उसका नाम था 'धनंजय' । छ: माह के भीतर ही उसे मठ की गतिविधियों पर संदेह होने लगा। उसे समाचार पत्र के सम्पादक ने यही बताया था कि यहाँ रहकर वह किसी-न-किसी रहस्य की जड़ तक पहुँचेगा इसलिये उसे यहाँ भेजा गया था । अतः उसे दोनों उद्देश्य सफल होते नज़र आये । जहाँ यह योग विद्या सीख रहा था वहाँ चौरंगी बाबा के रहस्यमय परिवेश को समझने का प्रयास भी कर रहा था । आखिर उसने रोज़मर्रा की बातों को लेकर एक लेख लिखना शुरू किया। संयोग से वह लेख महामाया योगी की निगाह में आ गया । पत्रकार ने पैतरा बदला । अब वह वहाँ जासूस की सी स्थिति में नहीं रह सकता था । उसने अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि वह योग पर कुछ रिसर्च कर रहा है और अपने समाचार पत्र के लिये किसी नई बात की तलाश में है ।
उसके बाद उसने चौरंगी बाबा और महामाया योगी से तरह-तरह के प्रश्न किये। चौरंगी बाबा को उसकी छिपी गतिविधि के कारण बेहद क्रोध आया और उन्होंने नेत्रों से चिंगारियां बरसाते हुए कहा - " तू मेरी परीक्षा ले रहा था मूर्ख । जा तेरा सर्वनाश हो चुका, तू इस संसार में खुद को अकेला पायेगा, तेरे परिवार का अनिष्ट हो चुका।"
उस वक्त चौरंगी बाबा के इस शाप का धनंजय पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। वह एक घिसा हुआ, मंझा हुआ पत्रकार था । वह जानता था चौरंगी पाखंडी है। वह क्या किसी को शाप देगा । शाप की बातें तो पीछे छूट चुकीं । परन्तु वह यह भी महसूस करता था कि वहाँ रुकना अब खतरनाक हो सकता था इसलिये वह अधूरी जानकारी के साथ अपने शहर लौट गया ।
अपने घर पहुँचते ही उसपर ब्रज जैसा पहाड़ गिर पड़ा ।
I
उसका मकान जल कर राख हो गया था और उसे केवल चार लाशें मिल पायीं । उसके परिवार में कोई भी जीवित नहीं रहा था। उसके दो लड़के, पत्नी, उसकी माँ, कुछ भी तो नहीं रहा था। ये सभी लाशें अधजली थीं और किसी को भी इस बारे में पता न था कि आग कैसे
लगी ? आग जब पूरी तरह फैल चुकी थी तब पड़ोसियों को पता चला था। किसी ने चीख-पुकार भी नहीं सुनी थी ।
धनंजय चीख मारकर बेहोश हो गया । उसकी दुनिया उजड़ चुकी थी ।
उसे चौरंगी बाबा का शाप याद आया ।
उसके पहुँचने से चौबीस घंटे पहले वह घटना घट चुकी थी । उसके आने तक चारों शव पुलिस की देख-रेख में सुरक्षित रखे गये थे। शवों के पोस्ट मार्टम की आवश्यकता नहीं समझी गई थी क्योंकि केस में किसी प्रकार की कोई उलझन नहीं थी। एक ही बात पुलिस इंस्पेक्टर के गले नहीं उतर रही थी कि इतने खुले मकान में जिसके तीन बाहरी दरवाज़े, चार खुली चौड़ी खिड़कियाँ और नीची बालकनी थी, वहाँ आग लगने के बाद कोई भी बाहर क्यों नहीं निकल पाया ? क्या चारों प्राणी बेसुध सो रहे थे ?
इंस्पेक्टर ने धनंजय से एक सवाल किया ।
"क्या चारों हॉल में सोते थे ?"
"नहीं, वहाँ कोई नहीं सोता था ।"
"फिर चारों के शव एक ही जगह यानी हॉल में क्यों पाए गये ? जिसकी एक खिड़की एक दरवाज़ा सीधा बाहर खुलता था । हैरत की बात है कि उनमें से किसी ने चीख-पुकार भी नहीं मचाई।"
इस घटना के तुरंत बाद ही धनंजय का मानसिक संतुलन बिगड़ने लगा और उसके बाद जल्द ही लोगों ने उसे पागल साबित कर दिया था । परन्तु पागलपन के दौरान भी लोगों ने उसके मुंह से चौरंगी बाबा और महामाया योगी को गलियां देते हुए सुना था। वह किसी भी आदमी को चौरंगी बाबा कहकर पत्थर फेंकने लगता था ।
इसका अर्थ था कि पागलपन के दौरान भी उसके दिमाग से इन दो व्यक्तियों की छाया नहीं उतर पायी थी और वह अपने परिवार के विनाश का कारण इन्हीं दो को समझता था ।
बाद में उसे पता भी चल गया था कि यह चौरंगी बाबा के आदेश से हुआ था । महामाया के कातिल दस्ते ने यह कार्य किया था । यह जानकारी उसे सूक्ष्म भेष में रहने के बाद प्राप्त हुई। वह मुलक्कड़ बाबा के रूप में यहाँ आया था, क्योंकि उसे पहले यह तय करना था कि वास्तव में उसके परिवार को नष्ट करने वाला कौन है ? क्योंकि उस हत्याकांड को उसने दुर्घटना कभी नहीं माना था । उसे पूरा विश्वास था कि इसके ज़िम्मेदार यही लोग हैं ।
पूरी जानकारी प्राप्त करने के बाद उसका फर्ज़ बनता था कि कातिलों को इससे भी बढ़कर सज़ा दे । वह अपनी योजना और अपने हाथों से सज़ा देना चाहता था । अपने चौदह साल और आठ साल के लड़के का सपना वह भुला नहीं पाया था । सुन्दर पत्नी भी उसके ख्वाब में आती रहती थी । उसका जीवन सिर्फ कातिलों को सज़ा देने के लिये शेष रह गया था ।
वह जल्दबाजी में कोई काम नहीं करना चाहता था । इसलिये उसने वक्त का इंतज़ार किया । इन्तज़ारी रंग लायी और अब उसे संतोष था कि वह योजना बद्ध तरीके से काम कर पायेगा ।
वह इतना शक्तिशाली नहीं था जो उन लोगों से टक्कर ले पाता । वह उनके सामने चींटी के समान था । और जिस ढंग की सज़ा उसके अर्ध-
विक्षिप्त मस्तिष्क में थी, वैसी तमन्ना तो कई जन्म लेने पर भी पूरी न होती, परन्तु इन सारी समस्याओं का हल उसे चन्द्र बेताल के भीतर
नज़र आ रहा था ।
निश्चित रूप से चन्द्र के भीतर अलौकिक शक्ति थी ।
उसने चन्द्र के बारे में खासी जानकारी प्राप्त की थी । मन्दिर के सहयोगी नौकर के अलावा मठ में उसके तीन और सहयोगी थे, जो इन दिनों धीरे-धीरे महामाया का विश्वास प्राप्त करते जा रहे थे । यह लोग वहाँ की प्रत्येक जानकारी उस तक पहुँचाते रहते थे । अतः चन्द्र बेताल क्या है और उसे चौरंगी अपने स्वार्थ को हल करने के बाद क्यों खत्म कर देना चाहता है यह बात उसके सामने खुली किताब की तरह थी ।