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भाग 177
सूरज का वीर्य एक बार फिर सोनी की योनि से छलकने को था पर सोनी ने अपनी जांघें से ऊपर
कर ली जैसे ही वह वीर्य के हर कतरे को संजो लेना चाहती हो..
सूरज का हाथ अब भी सोनी की कमर पर था। सोनी ने करवट ली और सूरज की आँखों में देखा—उन आँखों में अब वह पुराना डर नहीं, बल्कि एक विजेता का गर्व और अपनी 'आराध्या' के प्रति अगाध कृतज्ञता थी।
सोनी ने धीरे से सूरज के माथे से पसीना पोंछा और उसके होंठों पर एक ममता भरा चुंबन अंकित किया।
सोनी (धीमी आवाज़ में): "आज बनारस का यह सूरज सच में उदय हो गया है।"
अब आगे…
सोनी बिस्तर से उठी। उसके बदन पर सूरज का दिया वह रेशमी कुर्ता अब भी था..
उसका ध्यान सूरज के तने हुए लिंग पर गया जिसने उसे जन्नत की सैर कराई थी और उसके गर्भ को सिंचित किया था। इस अद्भुत चर्मदंड को अब विश्राम देने की बारी थी।
सोनी ने झुक कर काम रस से लथपथ उस लिंग को अपने होठों से चुम लिया हमेशा की तरह उसका तनाव गायब हो गया..
जैसे कोई मां अपने छोटे बच्चे को पुचकारती है और उसका तनाव खत्म कर उसे सुलाती है वैसे ही सोनी ने सूरज के लिंग को बड़े प्यार से उसकी जांघों पर सुला दिया।
कुछ पलों बाद …सूरज उठकर खड़ा हो गया वह पूरी तरह नग्न था सोनी भी सूरज के दिए कुर्ते में अर्धनग्न अवस्था में थी।
अचानक सूरज का ध्यान सोनी की जांघों के जोड़ पर गया जहां वीर्य के साथ-साथ कुछ लालिमा भी थी जो निश्चित थी रक्त की थी.. सोनी ने भी सूरज की निगाहों का अनुसरण किया..
सूरज ने सोनी की आंखों में झांकते हुए पूछा… ये कैसे?
आज मेरे सूरज का कौमार्य भंग हुआ है ये उसकी ही निशानी है…
सूरज ने अपने लिंग की तरफ देखा लालिमा का कुछ अंश उस पर भी था…यद्यपि सूरज पूरी तरह समझ नहीं पाया पर वह शांत ही रहा..
बिछड़ने का वक्त आ चुका था..
सूरज ने पूरे आदर भाव से झुक कर सोनी के चरण छुए और कृतज्ञ भाव से बोला..
मौसी मेरा पुरुषत्व जागने के लिए मैं आपका ऋणी हूं
आप मेरे लिए हमेशा पूज्य हैं और पूज्य रहेंगी.. कोई गलती हुई हो तो मुझे माफ कर दीजिएगा..
सोनी ने उसे अपने गले से लगा लिया। सोनी और सूरज का मिलन अद्भुत था अनोखा था इस आलिंगन में वात्सल्य था या तृप्त हो चुकी वासना कहना कठिन था।
सोनी ने उसके सर को अपने दोनों हाथों से पकड़ कर अपने होठों से उसके होठों पर चुंबन लिया…सोनी के होठों ने सूरज के लिंग से जो काम रास चुराया था सोनी ने उसे अनजाने में ही सूरज के होठों से साझा कर लिया था..
सूरज अपने कमरे में पहुँचा, तो उसका शरीर थकावट से चूर था, पर मन किसी हिमालय की चोटी पर बैठा उत्सव मना रहा था। कमरे की कुंडी चढ़ाते ही उसने आईने में अपनी मस्कुलर देह को निहारा। सोनी मौसी के बदन की चंदन जैसी खुशबू और उनके स्त्रीत्व का वह 'महोघनी रस' अभी भी उसके रोम-रोम में बसा था।
तभी उसे नीचे के हिस्से में एक भारीपन और हल्की कसक महसूस हुई। वह बाथरूम की ओर बढ़ा। जैसे ही उसने पेशाब की धार छोड़ी, अचानक उसके लिंग के अग्रभाग (सुपाड़े) के ठीक निचले हिस्से में एक ऐसी तीव्र और तीखी चनचनाहट हुई, जैसे किसी ने जलती हुई माचिस की तीली छुआ दी हो।
सूरज के मुँह से एक दबी हुई सिसकारी निकल गई— "उह्ह...!"
वह दर्द इतना बिजली जैसा था कि उसकी बोझिल आंखें खुल गई। उसने जल्दी से पानी के छींटे मारे और मद्धम लाइट में अपने उस 'विजेता' अंग को हाथों में लिया। उसने धीरे से सुपाड़े की कोमल त्वचा (Foreskin) को पीछे की ओर सरकाया और लिंग को पलटकर नीचे की ओर देखा।
वहाँ, उस संवेदी केंद्र के पास, वह महीन और नाजुक तंतु (Frenulum), जो अब तक उसके कौमार्य की रक्षा कर रहा था, बीच से टूट चुका था। वह जगह हल्की सुर्ख लाल थी और वहाँ से रक्त की एक आखिरी नन्ही बूंद मोती की तरह उभर रही थी।
सूरज की आँखों में एक चमक आ गई। अब उसे समझ आया कि सोनी मौसी की जाँघों पर वह लालिमा और उसके पौरुष पर लगा वह 'राजतिलक' कहाँ से आया था। वह कोई घाव नहीं था, वह तो उसके 'बालपन' के अंत और 'पूर्ण पुरुषत्व' के उदय का प्रमाण पत्र था। उस बारीक धागे के टूटने ने ही उसे वह आज़ादी दी थी कि वह सोनी की गहराइयों को पूरी तरह नाप सका।
उसने एक गहरी और संतुष्ट साँस ली। चेहरे पर एक शरारती और गर्व भरी मुस्कान फैल गई।
सूरज (मन ही मन): "तो यह था वह बंधन... जो आज मौसी की 'मुनिया' की तड़प ने हमेशा के लिए तोड़ दिया।"
वह वापस अपने बिस्तर पर आया और बिना वस्त्रों के ही चादर तानकर लेट गया। जैसे ही उसने आँखें मूंदीं, उसे फिर से वही 'थप-थप' का संगीत, सोनी मौसी की भीगी हुई सिसकियाँ और उनके वक्षों का वह भारी भराव महसूस होने लगा। उसके पौरुष की वह पहली और महा-विजय अब एक मीठी याद बनकर उसकी रगों में तैर रही थी।
पूर्ण तृप्ति, रूहानी सुकून और देह की शांति के साथ, बनारस का वह 'सूरज' आज एक असली मर्द बनकर गहरी और सपनों भरी निद्रा की आगोश में समा गया। हवेली का सन्नाटा अब उसके लिए डरावना नहीं, बल्कि एक मधुर लोरी जैसा था।
हवेली की दीवारें गवाह थीं कि आज रात सोनी और सूरज का प्यार एक नए आयाम को प्राप्त कर चुका था उनके इस अद्भुत संगम ने एक नए जीवन की नींव रख दी थी..
अगली सुबह जब सोनी की जब आँखें खुलीं, तो उसे अपने पूरे अस्तित्व में एक भारीपन महसूस हुआ। जैसे ही उसने करवट लेने की कोशिश की, उसकी कमर में एक तीव्र और अजब सी कसक उठी। यह वह मीठा दर्द था जिसे अक्सर एक नव-विवाहिता अपनी सुहागरात के बाद महसूस करती है। सूरज के उस प्रचंड पौरुष का प्रहार और उसकी योनि की दीवारों का वह असाधारण फैलाव—कल रात की हर हरकत का निशान आज उसके शरीर पर एक सुखद टीस बनकर उभर रहा था।
सोनी बिस्तर पर ही लेटी रही। उसे ऐसा लग रहा था जैसे वह अब भी सूरज के उसी गाढ़े द्रव्य से पूरी तरह सिंचित है। वह तृप्ति, जिसकी उसे बरसों से तलाश थी, आज उसके चेहरे पर एक अनोखे तेज के रूप में झलक रही थी। उसकी त्वचा पहले से कहीं ज्यादा चमकदार और आँखें शांत लग रही थीं।
तभी दरवाजे पर दस्तक हुई और सुगना अंदर दाखिल हुई। कमरे की हवा अभी भी कल रात की उस मादक और कस्तूरी जैसी गंध से लदी हुई थी—पसीने, काम-रस और सूरज के वीर्य की वह मिली-जुली महक जिसे एक अनुभवी स्त्री तुरंत पहचान सकती थी। सुगना को भी इसका आभास हुआ पर विकास कल तक यहीं था। सोनी अब तक जीवन आ आंनद ले रही टी
सुगना ने नाक सिकोड़ी और सीधे खिड़की की ओर बढ़ी। सुगना: "हमेशा कमरा बंद मत रखा कर सोनी... कैसी अजब सी गंध आने लगती है। खुली हवा आने-जाने दिया कर।"
जैसे ही सुगना ने खिड़की के पल्ले खोले, ताजी हवा ने कमरे के सन्नाटे को तोड़ा। सुगना अब सोनी के बिस्तर के पास आई। उसने देखा कि सोनी अब भी चादर ओढ़े लेटी है, जबकि वह अक्सर सूरज निकलने से पहले ही रसोई में होती थी।
सुगना: "आज क्या बात है? सूरज सर पर चढ़ आया है और तू अब तक बिस्तर नहीं छोड़ रही? तबीयत तो ठीक है न?"
जैसे ही सुगना ने सोनी के माथे को छूने के लिए चादर हटाने की कोशिश की, सोनी ने झटके से चादर को अपनी मुट्ठी में भींच लिया। उसे याद आया कि बिस्तर के उस हिस्से पर कल रात की वह 'सफेद गवाही यानी सूरज का वीर्य ' अब भी होगा। अगर सुगना ने वह देख लिया, तो अनर्थ हो जाएगा।
सोनी (चेहरे पर एक बनावटी मुस्कान लाते हुए): "अरे नहीं दीदी... बस आज बड़े दिनों बाद बहुत अच्छी और गहरी नींद आई है। ऐसा लग रहा है जैसे देह की सारी थकान मिट गई हो। आज थोड़ा देर तक लेटने का मन है, आप जाइए मैं आती हूँ।"
सुगना ने अपनी छोटी बहन के चेहरे को गौर से देखा। उसे सोनी का चेहरा आज कुछ अलग लगा। वह थकान तो थी, पर आँखों में एक अजीब सी संतुष्टि थी। वह तेज, जो केवल एक पूरी तरह तृप्त स्त्री के चेहरे पर आता है, सोनी का मुखमंडल दमक रहा था।
सुगना: "थकान है या कुछ और? चेहरा तो ऐसे चमक रहा है जैसे गंगा में डुबकी लगा कर आई हो। खैर, आराम कर ले। मैं नाश्ता बनाती हूँ, पर ज्यादा देर मत करना।"
सुगना के बाहर जाते ही सोनी ने राहत की एक लंबी साँस छोड़ी। उसने धीरे से चादर हटाकर अपनी जाँघों की ओर देखा, जहाँ सूरज के पौरुष के अवशेष अब भी उसकी त्वचा पर एक पारभासी परत की तरह चमक रहे थे। उसे एहसास हुआ कि मर्यादा और प्यास की उस जंग ने उसे एक ऐसा सुख दिया है, जिसे वह चाहकर भी अब कभी भुला नहीं पाएगी।
सुगना के कमरे से बाहर जाते ही सोनी ने राहत की एक लंबी सांस ली। उसने धीरे से अपने बदन से वह चादर हटाई और अपनी देह की स्थिति को निहारा। उसकी गोरी जाँघों पर सूरज के वीर्य के सूखे हुए निशान किसी सफ़ेद रेशमी धागे की तरह चमक रहे थे। उसकी योनि मार्ग अब भी उस भारी मिलन की गवाह दे रहा था—वहाँ एक हल्की सी जलन और भारीपन था, जो उसे कल रात के उस तूफ़ान की याद दिला रहा था।
सोनी लड़खड़ाते कदमों से बाथरूम की ओर बढ़ी। हर कदम के साथ उसकी कमर की वह 'सुहाग-टीस' उसे विचलित कर रही थी। उसने बाथरुम का दरवाजा बंद किया और आइने के सामने खड़ी हो गई। जैसे ही उसने अपनी नाईटी उत्तरी, उसकी आँखें फटी की फटी रह गई।
उसके पुष्ट वक्ष पर सूरज के दाँतों के निशान गहरे लाल हो चुके थे। दाहिनी चूची के पास सूरज के जुनून की गवाही साफ़ दिख रही थी। उसकी गर्दन और कंधों पर सूरज के हाथों की पकड़ के नीले निशान उभर आए थे। सोनी ने अपनी उंगलियों से उन निशानों को छुआ—उस मीठे दर्द में एक गजब का सुकून था। उसे याद आया कि कैसे वासना के आवेग में सूरज एक अबोध बालक से एक युवा शिकारी में बदल गया था।
उसने शावर खोला। जैसे ही गुनगुना पानी उसके बदन पर गिरा, उसकी योनि से सूरज का वह द्रव्य धीरे-धीरे बहकर पैरों के रास्ते जमीन पर उतरने लगा। सोनी ने अपनी आँखें मूंद लीं। उसे लगा जैसे सूरज की खुशबू अब भी उसके रोम-रोम में बसी है। उसने शावर जेल से अपनी देह को रगड़ा, पर मन ही मन वह उन निशानों को मिटाना नहीं चाहती थी। वह चाहती थी कि सूरज का यह 'अधिकार' उसके बदन पर सदा के लिए अंकित हो जाए।
सोनी ने बड़ी सावधानी से एक गाढ़े नीले रंग की साड़ी पहनी और ब्लाउज के पल्लू को इस तरह लपेटा कि उसके गले और वक्ष के निशान पूरी तरह छुप जाएं। जब वह हाल में पहुँची, तो वहाँ का नजारा बदला हुआ था।
सूरज डाइनिंग टेबल पर बैठा था। आज वह अखबार नहीं पढ़ रहा था, बल्कि सामने रखी चाय की चुस्की ले रहा था। उसकी पीठ सीधी थी, कंधे चौड़े लग रहे थे और उसकी आँखों में वह अपराधी भाव (Guilt) गायब था। सुगना रसोई से बाहर निकली।
सुगना: "अरे सोनी! आ गई? सम्हाल तेरे लाड़ले को... तब से 10 बार पूछ चुका है मौसी नहीं आई?
सोनी ने धीरे से कुर्सी खींची और सूरज के सामने बैठ गई। सूरज ने अपनी नज़रें उठाईं और सीधे सोनी की आँखों में देखा। उन आँखों में अब 'मौसी' के लिए सम्मान तो था, पर साथ ही एक 'प्रेमी' की वह चमक भी थी जो यह कह रही थी कि वह अब सोनी के हर राज़ का हिस्सेदार है।
सूरज: "मौसी, आज आपके हाथ की चाय नहीं मिली? आपकी तबीयत तो ठीक है ना? "
सोनी का दिल जोरों से धड़कने लगा। वह समझ गई कि सूरज किस ओर इशारा कर रहा है।
सोनी (धीमी आवाज़ में): "आज देर हो गई सूरज... तबीयत थोड़ी सुस्त थी।"
सुगना (हँसते हुए): "अरे, रात भर कमरा बंद करके सोएगी तो सुस्ती तो आएगी ही। सूरज, तू डॉक्टर है, अपनी मौसी को कोई ताकत की दवा लिख दे।"
सुगना की यह बात सुनकर सोनी का चेहरा सिन्दूरी हो गया। उसने नीचे सर झुका लिया। सूरज ने एक शरारती मुस्कान के साथ सोनी की ओर देखा और कहा, "माँ, मौसी छोटी डॉक्टरनी ही नहीं जादूगरनी है.. उन्होंने तो खुद मेरा इलाज किया है।
क्यों क्या हुआ? सुगना ने आश्चर्य से पूछा..
यह तो आप मौसी से ही पूछ लीजिए? सूरज ने सोनी की तरफ इशारा करते हुए कहा।
सोनी सकपका गई सूरज ने उसे फंसा दिया था पर सोनी ने मुस्कुराते हुए कहा ..
“छोड़ ना दीदी यह कुछ ज्यादा ही शैतान हो गया है”
तुम दोनों की बातें अब मेरी समझ में नहीं आती है…तुम दोनों डॉक्टर- डॉक्टरनी खेलो मैं चली अपना काम करने….
सूरज का पैर अनजाने में मेज के नीचे सोनी के पैर से टकराया। सोनी के पूरे बदन में बिजली सी दौड़ गई। उसने अपनी नज़रें उठाकर सूरज को देखा, जैसे कह रही हो—'अब तो मान जा', पर सूरज की आँखों में एक नई भूख थी, जो यह बता रही थी कि कल रात तो बस शुरुआत थी।
सोनी ने मेज के नीचे से अपनी साड़ी का पल्लू कसकर पकड़ लिया। सूरज का यह नया रूप, यह आत्मविश्वास उसे डरा भी रहा था और एक अजीब सी उत्तेजना भी दे रहा था।
सूरज और सोनी की दुनिया से दूर, चलिए चलते हैं विद्यानंद के उस शांत और भव्य आश्रम में, जहाँ इन दिनों बनारस महोत्सव में जाने की तैयारियाँ अपने चरम पर थीं। हवा में चंदन और धूप की महक घुली हुई थी, लेकिन आश्रम के अधिष्ठाता विद्यानंद के मन में स्मृतियों का एक अलग ही बवंडर उठ रहा था।
विद्यानंद पर अब उम्र अपना प्रभाव दिखाने लगी थी। 70-75 वर्ष की आयु में भी उनके चेहरे का तेज कम नहीं हुआ था, बल्कि समय की झुर्रियों ने उनके व्यक्तित्व को और भी अधिक गरिमामय बना दिया था। जैसे ही 'बनारस' का नाम उनके कानों में पड़ता, उनके मानस पटल पर पुरानी स्मृतियों के चित्र सजीव हो उठते।
"इंसान अपनी इंद्रियों पर विजय पा सकता है, पर स्मृतियाँ? वे तो उस बरगद की जड़ों की तरह होती हैं जो पत्थर को चीर कर भी अपना स्थान बना लेती हैं।"
विद्यानंद को अपनी छठी इंद्रिय और अपनी साधना पर अभिमान था, पर वह स्वयं से यह सत्य नहीं छिपा सकते थे कि वह अपने अतीत की उन अमिट छापों को मिटाने में असफल रहे हैं, जिन्होंने कभी उनके जीवन की दिशा बदली थी। वह एक ऐसे साधक थे जिसने संसार तो जीत लिया था, पर अपने हृदय के एक कोने में दबे उस 'पुराने घर' से हार गए थे।
तभी कक्ष के द्वार पर एक आहट हुई। मोनी, जिसे अब दुनिया ‘वज्र नंदिनी' के नाम से जानती थी, कक्ष में प्रविष्ट हुई। श्वेत वस्त्रों में लिपटी मोनी इस समय साक्षात् पवित्रता और सौंदर्य का प्रतिरूप लग रही थी। उसका सौंदर्य ऐसा था जिसे शब्दों में बांधना कठिन था:
भक्तों के लिए: वह एक देवी का स्वरूप थी, शांत और पूजनीय।
कलाकारों के लिए: वह खजुराहो की किसी सजीव मूर्ति की भांति उत्कृष्ट थी।
रतन जैसे कामुक व्यक्तियों के लिए: वह एक ऐसी अतृप्त प्यास थी, जिसे देख कर वासना और व्याकुलता और बढ़ जाए।
मोनी ने झुककर विद्यानंद के चरण स्पर्श किए और उनके समीप बैठकर मधुर स्वर में कहा, "भगवन, बनारस महोत्सव की तैयारियाँ लगभग पूर्ण हो चुकी हैं।
परमानंद बहुत उत्साहित है। वह बार-बार प्रस्थान के समय के बारे में पूछ रहा है।"
'परमानंद' का नाम सुनते ही विद्यानंद के गंभीर चेहरे पर एक मद्धम मुस्कान तैर गई। उनकी आँखों में एक अजीब सी चमक आ गई।
"परमानंद दिव्य है, नंदिनी ," विद्यानंद ने धीमी लेकिन दृढ़ आवाज में कहा। "वह परम तेजस्वी है। भले ही तुमने उसे जन्म दिया है, लेकिन वह केवल तुम्हारा पुत्र नहीं है। वह इस आश्रम का भविष्य है, इसका उत्तराधिकारी है।"
आश्रम की चहारदीवारी के भीतर यही सत्य स्थापित था कि परमानंद ईश्वर का वरदान है, जिसे स्वयं विधाता ने विद्यानंद के पास इस गद्दी को संभालने के लिए भेजा है। विद्यानंद की बातों पर तर्क करना किसी के वश में नहीं था, और न ही किसी की इतनी धृष्टता थी।
जब परमानंद इस आश्रम में आया था, तब उसकी आयु मात्र एक वर्ष थी। उसकी अबोध आँखों के तेज ने तभी सबको वश में कर लिया था। आश्रमवासियों ने इसे 'ईश्वरीय संकेत' मानकर स्वीकार कर लिया था, यह जाने बिना कि इस दिव्यता के पीछे अतीत के कौन से गहरे राज छिपे हैं।
मोनी ने झुककर विद्यानंद के चरण स्पर्श किए और उनके समीप बैठकर मधुर स्वर में कहा, "भगवन, बनारस महोत्सव की तैयारियाँ लगभग पूर्ण हो चुकी हैं।
परमानंद बहुत उत्साहित है। वह बार-बार प्रस्थान के समय के बारे में पूछ रहा है।"
विद्यानंद और वज्रनंदिनी (मोनी) के बीच परमानंद के 'दिव्य' होने की चर्चा चल ही रही थी कि कक्ष के द्वार पर एक हल्की आहट हुई। यह माधवी थी। यद्यपि समय ने उसके चेहरे पर भी रेखाएँ खींच दी थीं, किंतु उसकी आँखों की कोमलता और सेवा भाव आज भी वैसा ही था।
'परमानंद' का नाम सुनते ही माधवी के पग जैसे वहीं थम गए। उसकी आँखों के सामने वर्तमान का वह 18 वर्षीय हष्ट-पुष्ट और तेजस्वी युवक ओझल हो गया, और वह स्मृतियों के एक गहरे महासागर में डूबती चली गई।
कक्षा के द्वार पर ही ठिठकी हुई, माधवी की आँखें शून्य में निहारने लगीं। वह वर्तमान से कटकर सीधे 17 वर्ष पीछे, उस अलौकिक भोर में पहुँच गई, जिसने इस आश्रम का इतिहास बदल दिया था।
माधवी को वह सुबह आज भी कल की तरह याद थी। ब्रह्ममुहूर्त का समय था, चारों ओर गहरा सन्नाटा और गंगा की धीमी लहरों की आवाज़। वह रोज़ की तरह विद्यानंद की पूजा के लिए ताज़े फूल चुनने आश्रम के पुष्प उद्यान में गई थी।
ओस की बूंदों से भीगे मोगरे और पारिजात के झुरमुट के बीच, उसकी दृष्टि एक स्थान पर ठहर गई। वहाँ, धवल और सुनहरे रेशमी वस्त्रों में लिपटा हुआ, एक अबोध शिशु सोया हुआ वह बालक साधारण नहीं लग रहा था। यद्यपि वह वस्त्रों में लिपटा था, लेकिन उसके शरीर से एक अद्भुत आभा, एक मद्धम सा प्रकाश उत्सर्जित हो रहा था, जिसने उस अंधेरे कोने को रोशन कर दिया था।
माधवी ने जब उसे उठाने के लिए हाथ बढ़ाए, तो वह सिहर उठी। उसे लगा जैसे वह किसी मनुष्य को नहीं, बल्कि साक्षात् ईश्वर के एक अंश को स्पर्श कर रही है। वह इतना पवित्र और कोमल था कि उसे छूने में भी भय लग रहा था।
उस बालक की शांत मुद्रा और उसके चेहरे पर बिखरा अकल्पनीय तेज देखकर माधवी के मुख से शब्द नहीं निकले, केवल आँखों से श्रद्धा के आँसू बह निकले थे। उसे ऐसा प्रतीत हुआ जैसे विधाता ने स्वयं स्वर्ग से उतरकर इस बालक को इस उद्यान में रख दिया हो, ताकि यह विद्यानंद की तपस्या का प्रमाण बने।
क्या सोच रही हो माधवी ? विद्यानंद की मधुर आवाज ने माधवी की तंद्रा तोड़ी।
"भगवन," माधवी ने वर्तमान में लौटते हुए, धीमी और कंपकपाती आवाज़ में कहा, "जब भी परमानंद की बात आती है, मेरी आत्मा उसी भोर में लौट जाती है। वह दृश्य! वह रेशम में लिपटा हुआ नन्हा सा देवदूत! वह कोई साधारण बच्चा नहीं था, महाराज। वह साक्षात् विधाता का हस्ताक्षर था, जिसे मैंने स्वयं अपनी आँखों से उस उद्यान में ईश्वर के वरदान की तरह पाया था।"
माधवी की आँखों में आज भी वही विस्मय और अटूट विश्वास था। उसके लिए परमानंद के आगमन में कोई संशय नहीं था; वह केवल और केवल एक 'दिव्य चमत्कार' था।
विद्यानंद ने माधवी की ओर देखा। उसकी श्रद्धा अचूक थी, और यही वह विश्वास था जिसने पूरे आश्रम को यह मानने पर विवश कर दिया था कि परमानंद 'ईश्वर का वरदान' है।
लेकिन विद्यानंद के अंतर्मन में, उस 'दिव्यता' के पीछे छिपा अतीत का वह राज, जिसे वह सालों से दबाए बैठे थे, एक बार फिर सिर उठाने लगा था। परमानंद का वह एक वर्ष की आयु में आश्रम में आना, उसकी अबोध आँखों का वह तेज... क्या वह सब सचमुच ईश्वर की मर्जी थी? या फिर कुछ ऐसा, जिसका सच केवल विद्यानंद और मोनी ही जानते थे?
कुछ ही देर में विद्यानंद की सूक्ष्म साधना का वक्त हो गया। इधर विद्यानंद ने अपनी पलके बंद की उधर मोनी की निगाह टेबल पर पड़े अखबार पर गई जिस पर एक बेहद सुंदर और प्रतिभाशाली युवक की तस्वीर थी। न जाने मोनी को ऐसा क्यों महसूस हुआ कि वह बालक विलक्षण है।
मोनी की उंगलियाँ काँपते हुए उस कागज़ के पन्ने पर ठिठक गईं।
अखबार की पंक्तियाँ किसी मंत्र की तरह उसके कानों में गूँजने लगीं:
मेधा का उदय: बनारस का 'सूरज' बना चिकित्सा जगत का नया सितारा
वाराणसी: बनारस मेडिकल कॉलेज के दीक्षांत समारोह में इस वर्ष का सर्वश्रेष्ठ स्नातक (Topper) होने का गौरव सूरज को प्राप्त हुआ है। उसकी असाधारण मेधा और शांत स्वभाव ने शिक्षकों को चकित कर दिया है।
स्थानीय जनमानस उसे 'बनारस का उगता हुआ सूरज' कहकर पुकार रहा है। सूरज की इस उपलब्धि के पीछे उसकी माँ सुगना का अटूट धैर्य और पिता रतन का तप है। एक साधारण पृष्ठभूमि से निकलकर स्वर्ण पदक तक का यह सफर प्रेरणा की नई गाथा लिख रहा है।
मोनी अपने अतीत को याद करने लगी सुगना को भूल पाना वैसे भी असंभव था । एक-एक करके इस कथा के सारे किरदार मोनी के दिमाग में घूमने लगे.. और जब बात विलक्षण सूरज पर आई वह परमानंद को याद करने लगी…. और उसकी तुलना सूरज से करने लगी. सूरज जितना विलक्षण था…परमानंद भी उतना ही तेजस्वी था मोनी को परमानंद की जन्म गाथा याद आने लगी..
शेष अगले भाग में..
सूरज का वीर्य एक बार फिर सोनी की योनि से छलकने को था पर सोनी ने अपनी जांघें से ऊपर
कर ली जैसे ही वह वीर्य के हर कतरे को संजो लेना चाहती हो..
सूरज का हाथ अब भी सोनी की कमर पर था। सोनी ने करवट ली और सूरज की आँखों में देखा—उन आँखों में अब वह पुराना डर नहीं, बल्कि एक विजेता का गर्व और अपनी 'आराध्या' के प्रति अगाध कृतज्ञता थी।
सोनी ने धीरे से सूरज के माथे से पसीना पोंछा और उसके होंठों पर एक ममता भरा चुंबन अंकित किया।
सोनी (धीमी आवाज़ में): "आज बनारस का यह सूरज सच में उदय हो गया है।"
अब आगे…
सोनी बिस्तर से उठी। उसके बदन पर सूरज का दिया वह रेशमी कुर्ता अब भी था..
उसका ध्यान सूरज के तने हुए लिंग पर गया जिसने उसे जन्नत की सैर कराई थी और उसके गर्भ को सिंचित किया था। इस अद्भुत चर्मदंड को अब विश्राम देने की बारी थी।
सोनी ने झुक कर काम रस से लथपथ उस लिंग को अपने होठों से चुम लिया हमेशा की तरह उसका तनाव गायब हो गया..
जैसे कोई मां अपने छोटे बच्चे को पुचकारती है और उसका तनाव खत्म कर उसे सुलाती है वैसे ही सोनी ने सूरज के लिंग को बड़े प्यार से उसकी जांघों पर सुला दिया।
कुछ पलों बाद …सूरज उठकर खड़ा हो गया वह पूरी तरह नग्न था सोनी भी सूरज के दिए कुर्ते में अर्धनग्न अवस्था में थी।
अचानक सूरज का ध्यान सोनी की जांघों के जोड़ पर गया जहां वीर्य के साथ-साथ कुछ लालिमा भी थी जो निश्चित थी रक्त की थी.. सोनी ने भी सूरज की निगाहों का अनुसरण किया..
सूरज ने सोनी की आंखों में झांकते हुए पूछा… ये कैसे?
आज मेरे सूरज का कौमार्य भंग हुआ है ये उसकी ही निशानी है…
सूरज ने अपने लिंग की तरफ देखा लालिमा का कुछ अंश उस पर भी था…यद्यपि सूरज पूरी तरह समझ नहीं पाया पर वह शांत ही रहा..
बिछड़ने का वक्त आ चुका था..
सूरज ने पूरे आदर भाव से झुक कर सोनी के चरण छुए और कृतज्ञ भाव से बोला..
मौसी मेरा पुरुषत्व जागने के लिए मैं आपका ऋणी हूं
आप मेरे लिए हमेशा पूज्य हैं और पूज्य रहेंगी.. कोई गलती हुई हो तो मुझे माफ कर दीजिएगा..
सोनी ने उसे अपने गले से लगा लिया। सोनी और सूरज का मिलन अद्भुत था अनोखा था इस आलिंगन में वात्सल्य था या तृप्त हो चुकी वासना कहना कठिन था।
सोनी ने उसके सर को अपने दोनों हाथों से पकड़ कर अपने होठों से उसके होठों पर चुंबन लिया…सोनी के होठों ने सूरज के लिंग से जो काम रास चुराया था सोनी ने उसे अनजाने में ही सूरज के होठों से साझा कर लिया था..
सूरज अपने कमरे में पहुँचा, तो उसका शरीर थकावट से चूर था, पर मन किसी हिमालय की चोटी पर बैठा उत्सव मना रहा था। कमरे की कुंडी चढ़ाते ही उसने आईने में अपनी मस्कुलर देह को निहारा। सोनी मौसी के बदन की चंदन जैसी खुशबू और उनके स्त्रीत्व का वह 'महोघनी रस' अभी भी उसके रोम-रोम में बसा था।
तभी उसे नीचे के हिस्से में एक भारीपन और हल्की कसक महसूस हुई। वह बाथरूम की ओर बढ़ा। जैसे ही उसने पेशाब की धार छोड़ी, अचानक उसके लिंग के अग्रभाग (सुपाड़े) के ठीक निचले हिस्से में एक ऐसी तीव्र और तीखी चनचनाहट हुई, जैसे किसी ने जलती हुई माचिस की तीली छुआ दी हो।
सूरज के मुँह से एक दबी हुई सिसकारी निकल गई— "उह्ह...!"
वह दर्द इतना बिजली जैसा था कि उसकी बोझिल आंखें खुल गई। उसने जल्दी से पानी के छींटे मारे और मद्धम लाइट में अपने उस 'विजेता' अंग को हाथों में लिया। उसने धीरे से सुपाड़े की कोमल त्वचा (Foreskin) को पीछे की ओर सरकाया और लिंग को पलटकर नीचे की ओर देखा।
वहाँ, उस संवेदी केंद्र के पास, वह महीन और नाजुक तंतु (Frenulum), जो अब तक उसके कौमार्य की रक्षा कर रहा था, बीच से टूट चुका था। वह जगह हल्की सुर्ख लाल थी और वहाँ से रक्त की एक आखिरी नन्ही बूंद मोती की तरह उभर रही थी।
सूरज की आँखों में एक चमक आ गई। अब उसे समझ आया कि सोनी मौसी की जाँघों पर वह लालिमा और उसके पौरुष पर लगा वह 'राजतिलक' कहाँ से आया था। वह कोई घाव नहीं था, वह तो उसके 'बालपन' के अंत और 'पूर्ण पुरुषत्व' के उदय का प्रमाण पत्र था। उस बारीक धागे के टूटने ने ही उसे वह आज़ादी दी थी कि वह सोनी की गहराइयों को पूरी तरह नाप सका।
उसने एक गहरी और संतुष्ट साँस ली। चेहरे पर एक शरारती और गर्व भरी मुस्कान फैल गई।
सूरज (मन ही मन): "तो यह था वह बंधन... जो आज मौसी की 'मुनिया' की तड़प ने हमेशा के लिए तोड़ दिया।"
वह वापस अपने बिस्तर पर आया और बिना वस्त्रों के ही चादर तानकर लेट गया। जैसे ही उसने आँखें मूंदीं, उसे फिर से वही 'थप-थप' का संगीत, सोनी मौसी की भीगी हुई सिसकियाँ और उनके वक्षों का वह भारी भराव महसूस होने लगा। उसके पौरुष की वह पहली और महा-विजय अब एक मीठी याद बनकर उसकी रगों में तैर रही थी।
पूर्ण तृप्ति, रूहानी सुकून और देह की शांति के साथ, बनारस का वह 'सूरज' आज एक असली मर्द बनकर गहरी और सपनों भरी निद्रा की आगोश में समा गया। हवेली का सन्नाटा अब उसके लिए डरावना नहीं, बल्कि एक मधुर लोरी जैसा था।
हवेली की दीवारें गवाह थीं कि आज रात सोनी और सूरज का प्यार एक नए आयाम को प्राप्त कर चुका था उनके इस अद्भुत संगम ने एक नए जीवन की नींव रख दी थी..
अगली सुबह जब सोनी की जब आँखें खुलीं, तो उसे अपने पूरे अस्तित्व में एक भारीपन महसूस हुआ। जैसे ही उसने करवट लेने की कोशिश की, उसकी कमर में एक तीव्र और अजब सी कसक उठी। यह वह मीठा दर्द था जिसे अक्सर एक नव-विवाहिता अपनी सुहागरात के बाद महसूस करती है। सूरज के उस प्रचंड पौरुष का प्रहार और उसकी योनि की दीवारों का वह असाधारण फैलाव—कल रात की हर हरकत का निशान आज उसके शरीर पर एक सुखद टीस बनकर उभर रहा था।
सोनी बिस्तर पर ही लेटी रही। उसे ऐसा लग रहा था जैसे वह अब भी सूरज के उसी गाढ़े द्रव्य से पूरी तरह सिंचित है। वह तृप्ति, जिसकी उसे बरसों से तलाश थी, आज उसके चेहरे पर एक अनोखे तेज के रूप में झलक रही थी। उसकी त्वचा पहले से कहीं ज्यादा चमकदार और आँखें शांत लग रही थीं।
तभी दरवाजे पर दस्तक हुई और सुगना अंदर दाखिल हुई। कमरे की हवा अभी भी कल रात की उस मादक और कस्तूरी जैसी गंध से लदी हुई थी—पसीने, काम-रस और सूरज के वीर्य की वह मिली-जुली महक जिसे एक अनुभवी स्त्री तुरंत पहचान सकती थी। सुगना को भी इसका आभास हुआ पर विकास कल तक यहीं था। सोनी अब तक जीवन आ आंनद ले रही टी
सुगना ने नाक सिकोड़ी और सीधे खिड़की की ओर बढ़ी। सुगना: "हमेशा कमरा बंद मत रखा कर सोनी... कैसी अजब सी गंध आने लगती है। खुली हवा आने-जाने दिया कर।"
जैसे ही सुगना ने खिड़की के पल्ले खोले, ताजी हवा ने कमरे के सन्नाटे को तोड़ा। सुगना अब सोनी के बिस्तर के पास आई। उसने देखा कि सोनी अब भी चादर ओढ़े लेटी है, जबकि वह अक्सर सूरज निकलने से पहले ही रसोई में होती थी।
सुगना: "आज क्या बात है? सूरज सर पर चढ़ आया है और तू अब तक बिस्तर नहीं छोड़ रही? तबीयत तो ठीक है न?"
जैसे ही सुगना ने सोनी के माथे को छूने के लिए चादर हटाने की कोशिश की, सोनी ने झटके से चादर को अपनी मुट्ठी में भींच लिया। उसे याद आया कि बिस्तर के उस हिस्से पर कल रात की वह 'सफेद गवाही यानी सूरज का वीर्य ' अब भी होगा। अगर सुगना ने वह देख लिया, तो अनर्थ हो जाएगा।
सोनी (चेहरे पर एक बनावटी मुस्कान लाते हुए): "अरे नहीं दीदी... बस आज बड़े दिनों बाद बहुत अच्छी और गहरी नींद आई है। ऐसा लग रहा है जैसे देह की सारी थकान मिट गई हो। आज थोड़ा देर तक लेटने का मन है, आप जाइए मैं आती हूँ।"
सुगना ने अपनी छोटी बहन के चेहरे को गौर से देखा। उसे सोनी का चेहरा आज कुछ अलग लगा। वह थकान तो थी, पर आँखों में एक अजीब सी संतुष्टि थी। वह तेज, जो केवल एक पूरी तरह तृप्त स्त्री के चेहरे पर आता है, सोनी का मुखमंडल दमक रहा था।
सुगना: "थकान है या कुछ और? चेहरा तो ऐसे चमक रहा है जैसे गंगा में डुबकी लगा कर आई हो। खैर, आराम कर ले। मैं नाश्ता बनाती हूँ, पर ज्यादा देर मत करना।"
सुगना के बाहर जाते ही सोनी ने राहत की एक लंबी साँस छोड़ी। उसने धीरे से चादर हटाकर अपनी जाँघों की ओर देखा, जहाँ सूरज के पौरुष के अवशेष अब भी उसकी त्वचा पर एक पारभासी परत की तरह चमक रहे थे। उसे एहसास हुआ कि मर्यादा और प्यास की उस जंग ने उसे एक ऐसा सुख दिया है, जिसे वह चाहकर भी अब कभी भुला नहीं पाएगी।
सुगना के कमरे से बाहर जाते ही सोनी ने राहत की एक लंबी सांस ली। उसने धीरे से अपने बदन से वह चादर हटाई और अपनी देह की स्थिति को निहारा। उसकी गोरी जाँघों पर सूरज के वीर्य के सूखे हुए निशान किसी सफ़ेद रेशमी धागे की तरह चमक रहे थे। उसकी योनि मार्ग अब भी उस भारी मिलन की गवाह दे रहा था—वहाँ एक हल्की सी जलन और भारीपन था, जो उसे कल रात के उस तूफ़ान की याद दिला रहा था।
सोनी लड़खड़ाते कदमों से बाथरूम की ओर बढ़ी। हर कदम के साथ उसकी कमर की वह 'सुहाग-टीस' उसे विचलित कर रही थी। उसने बाथरुम का दरवाजा बंद किया और आइने के सामने खड़ी हो गई। जैसे ही उसने अपनी नाईटी उत्तरी, उसकी आँखें फटी की फटी रह गई।
उसके पुष्ट वक्ष पर सूरज के दाँतों के निशान गहरे लाल हो चुके थे। दाहिनी चूची के पास सूरज के जुनून की गवाही साफ़ दिख रही थी। उसकी गर्दन और कंधों पर सूरज के हाथों की पकड़ के नीले निशान उभर आए थे। सोनी ने अपनी उंगलियों से उन निशानों को छुआ—उस मीठे दर्द में एक गजब का सुकून था। उसे याद आया कि कैसे वासना के आवेग में सूरज एक अबोध बालक से एक युवा शिकारी में बदल गया था।
उसने शावर खोला। जैसे ही गुनगुना पानी उसके बदन पर गिरा, उसकी योनि से सूरज का वह द्रव्य धीरे-धीरे बहकर पैरों के रास्ते जमीन पर उतरने लगा। सोनी ने अपनी आँखें मूंद लीं। उसे लगा जैसे सूरज की खुशबू अब भी उसके रोम-रोम में बसी है। उसने शावर जेल से अपनी देह को रगड़ा, पर मन ही मन वह उन निशानों को मिटाना नहीं चाहती थी। वह चाहती थी कि सूरज का यह 'अधिकार' उसके बदन पर सदा के लिए अंकित हो जाए।
सोनी ने बड़ी सावधानी से एक गाढ़े नीले रंग की साड़ी पहनी और ब्लाउज के पल्लू को इस तरह लपेटा कि उसके गले और वक्ष के निशान पूरी तरह छुप जाएं। जब वह हाल में पहुँची, तो वहाँ का नजारा बदला हुआ था।
सूरज डाइनिंग टेबल पर बैठा था। आज वह अखबार नहीं पढ़ रहा था, बल्कि सामने रखी चाय की चुस्की ले रहा था। उसकी पीठ सीधी थी, कंधे चौड़े लग रहे थे और उसकी आँखों में वह अपराधी भाव (Guilt) गायब था। सुगना रसोई से बाहर निकली।
सुगना: "अरे सोनी! आ गई? सम्हाल तेरे लाड़ले को... तब से 10 बार पूछ चुका है मौसी नहीं आई?
सोनी ने धीरे से कुर्सी खींची और सूरज के सामने बैठ गई। सूरज ने अपनी नज़रें उठाईं और सीधे सोनी की आँखों में देखा। उन आँखों में अब 'मौसी' के लिए सम्मान तो था, पर साथ ही एक 'प्रेमी' की वह चमक भी थी जो यह कह रही थी कि वह अब सोनी के हर राज़ का हिस्सेदार है।
सूरज: "मौसी, आज आपके हाथ की चाय नहीं मिली? आपकी तबीयत तो ठीक है ना? "
सोनी का दिल जोरों से धड़कने लगा। वह समझ गई कि सूरज किस ओर इशारा कर रहा है।
सोनी (धीमी आवाज़ में): "आज देर हो गई सूरज... तबीयत थोड़ी सुस्त थी।"
सुगना (हँसते हुए): "अरे, रात भर कमरा बंद करके सोएगी तो सुस्ती तो आएगी ही। सूरज, तू डॉक्टर है, अपनी मौसी को कोई ताकत की दवा लिख दे।"
सुगना की यह बात सुनकर सोनी का चेहरा सिन्दूरी हो गया। उसने नीचे सर झुका लिया। सूरज ने एक शरारती मुस्कान के साथ सोनी की ओर देखा और कहा, "माँ, मौसी छोटी डॉक्टरनी ही नहीं जादूगरनी है.. उन्होंने तो खुद मेरा इलाज किया है।
क्यों क्या हुआ? सुगना ने आश्चर्य से पूछा..
यह तो आप मौसी से ही पूछ लीजिए? सूरज ने सोनी की तरफ इशारा करते हुए कहा।
सोनी सकपका गई सूरज ने उसे फंसा दिया था पर सोनी ने मुस्कुराते हुए कहा ..
“छोड़ ना दीदी यह कुछ ज्यादा ही शैतान हो गया है”
तुम दोनों की बातें अब मेरी समझ में नहीं आती है…तुम दोनों डॉक्टर- डॉक्टरनी खेलो मैं चली अपना काम करने….
सूरज का पैर अनजाने में मेज के नीचे सोनी के पैर से टकराया। सोनी के पूरे बदन में बिजली सी दौड़ गई। उसने अपनी नज़रें उठाकर सूरज को देखा, जैसे कह रही हो—'अब तो मान जा', पर सूरज की आँखों में एक नई भूख थी, जो यह बता रही थी कि कल रात तो बस शुरुआत थी।
सोनी ने मेज के नीचे से अपनी साड़ी का पल्लू कसकर पकड़ लिया। सूरज का यह नया रूप, यह आत्मविश्वास उसे डरा भी रहा था और एक अजीब सी उत्तेजना भी दे रहा था।
सूरज और सोनी की दुनिया से दूर, चलिए चलते हैं विद्यानंद के उस शांत और भव्य आश्रम में, जहाँ इन दिनों बनारस महोत्सव में जाने की तैयारियाँ अपने चरम पर थीं। हवा में चंदन और धूप की महक घुली हुई थी, लेकिन आश्रम के अधिष्ठाता विद्यानंद के मन में स्मृतियों का एक अलग ही बवंडर उठ रहा था।
विद्यानंद पर अब उम्र अपना प्रभाव दिखाने लगी थी। 70-75 वर्ष की आयु में भी उनके चेहरे का तेज कम नहीं हुआ था, बल्कि समय की झुर्रियों ने उनके व्यक्तित्व को और भी अधिक गरिमामय बना दिया था। जैसे ही 'बनारस' का नाम उनके कानों में पड़ता, उनके मानस पटल पर पुरानी स्मृतियों के चित्र सजीव हो उठते।
"इंसान अपनी इंद्रियों पर विजय पा सकता है, पर स्मृतियाँ? वे तो उस बरगद की जड़ों की तरह होती हैं जो पत्थर को चीर कर भी अपना स्थान बना लेती हैं।"
विद्यानंद को अपनी छठी इंद्रिय और अपनी साधना पर अभिमान था, पर वह स्वयं से यह सत्य नहीं छिपा सकते थे कि वह अपने अतीत की उन अमिट छापों को मिटाने में असफल रहे हैं, जिन्होंने कभी उनके जीवन की दिशा बदली थी। वह एक ऐसे साधक थे जिसने संसार तो जीत लिया था, पर अपने हृदय के एक कोने में दबे उस 'पुराने घर' से हार गए थे।
तभी कक्ष के द्वार पर एक आहट हुई। मोनी, जिसे अब दुनिया ‘वज्र नंदिनी' के नाम से जानती थी, कक्ष में प्रविष्ट हुई। श्वेत वस्त्रों में लिपटी मोनी इस समय साक्षात् पवित्रता और सौंदर्य का प्रतिरूप लग रही थी। उसका सौंदर्य ऐसा था जिसे शब्दों में बांधना कठिन था:
भक्तों के लिए: वह एक देवी का स्वरूप थी, शांत और पूजनीय।
कलाकारों के लिए: वह खजुराहो की किसी सजीव मूर्ति की भांति उत्कृष्ट थी।
रतन जैसे कामुक व्यक्तियों के लिए: वह एक ऐसी अतृप्त प्यास थी, जिसे देख कर वासना और व्याकुलता और बढ़ जाए।
मोनी ने झुककर विद्यानंद के चरण स्पर्श किए और उनके समीप बैठकर मधुर स्वर में कहा, "भगवन, बनारस महोत्सव की तैयारियाँ लगभग पूर्ण हो चुकी हैं।
परमानंद बहुत उत्साहित है। वह बार-बार प्रस्थान के समय के बारे में पूछ रहा है।"
'परमानंद' का नाम सुनते ही विद्यानंद के गंभीर चेहरे पर एक मद्धम मुस्कान तैर गई। उनकी आँखों में एक अजीब सी चमक आ गई।
"परमानंद दिव्य है, नंदिनी ," विद्यानंद ने धीमी लेकिन दृढ़ आवाज में कहा। "वह परम तेजस्वी है। भले ही तुमने उसे जन्म दिया है, लेकिन वह केवल तुम्हारा पुत्र नहीं है। वह इस आश्रम का भविष्य है, इसका उत्तराधिकारी है।"
आश्रम की चहारदीवारी के भीतर यही सत्य स्थापित था कि परमानंद ईश्वर का वरदान है, जिसे स्वयं विधाता ने विद्यानंद के पास इस गद्दी को संभालने के लिए भेजा है। विद्यानंद की बातों पर तर्क करना किसी के वश में नहीं था, और न ही किसी की इतनी धृष्टता थी।
जब परमानंद इस आश्रम में आया था, तब उसकी आयु मात्र एक वर्ष थी। उसकी अबोध आँखों के तेज ने तभी सबको वश में कर लिया था। आश्रमवासियों ने इसे 'ईश्वरीय संकेत' मानकर स्वीकार कर लिया था, यह जाने बिना कि इस दिव्यता के पीछे अतीत के कौन से गहरे राज छिपे हैं।
मोनी ने झुककर विद्यानंद के चरण स्पर्श किए और उनके समीप बैठकर मधुर स्वर में कहा, "भगवन, बनारस महोत्सव की तैयारियाँ लगभग पूर्ण हो चुकी हैं।
परमानंद बहुत उत्साहित है। वह बार-बार प्रस्थान के समय के बारे में पूछ रहा है।"
विद्यानंद और वज्रनंदिनी (मोनी) के बीच परमानंद के 'दिव्य' होने की चर्चा चल ही रही थी कि कक्ष के द्वार पर एक हल्की आहट हुई। यह माधवी थी। यद्यपि समय ने उसके चेहरे पर भी रेखाएँ खींच दी थीं, किंतु उसकी आँखों की कोमलता और सेवा भाव आज भी वैसा ही था।
'परमानंद' का नाम सुनते ही माधवी के पग जैसे वहीं थम गए। उसकी आँखों के सामने वर्तमान का वह 18 वर्षीय हष्ट-पुष्ट और तेजस्वी युवक ओझल हो गया, और वह स्मृतियों के एक गहरे महासागर में डूबती चली गई।
कक्षा के द्वार पर ही ठिठकी हुई, माधवी की आँखें शून्य में निहारने लगीं। वह वर्तमान से कटकर सीधे 17 वर्ष पीछे, उस अलौकिक भोर में पहुँच गई, जिसने इस आश्रम का इतिहास बदल दिया था।
माधवी को वह सुबह आज भी कल की तरह याद थी। ब्रह्ममुहूर्त का समय था, चारों ओर गहरा सन्नाटा और गंगा की धीमी लहरों की आवाज़। वह रोज़ की तरह विद्यानंद की पूजा के लिए ताज़े फूल चुनने आश्रम के पुष्प उद्यान में गई थी।
ओस की बूंदों से भीगे मोगरे और पारिजात के झुरमुट के बीच, उसकी दृष्टि एक स्थान पर ठहर गई। वहाँ, धवल और सुनहरे रेशमी वस्त्रों में लिपटा हुआ, एक अबोध शिशु सोया हुआ वह बालक साधारण नहीं लग रहा था। यद्यपि वह वस्त्रों में लिपटा था, लेकिन उसके शरीर से एक अद्भुत आभा, एक मद्धम सा प्रकाश उत्सर्जित हो रहा था, जिसने उस अंधेरे कोने को रोशन कर दिया था।
माधवी ने जब उसे उठाने के लिए हाथ बढ़ाए, तो वह सिहर उठी। उसे लगा जैसे वह किसी मनुष्य को नहीं, बल्कि साक्षात् ईश्वर के एक अंश को स्पर्श कर रही है। वह इतना पवित्र और कोमल था कि उसे छूने में भी भय लग रहा था।
उस बालक की शांत मुद्रा और उसके चेहरे पर बिखरा अकल्पनीय तेज देखकर माधवी के मुख से शब्द नहीं निकले, केवल आँखों से श्रद्धा के आँसू बह निकले थे। उसे ऐसा प्रतीत हुआ जैसे विधाता ने स्वयं स्वर्ग से उतरकर इस बालक को इस उद्यान में रख दिया हो, ताकि यह विद्यानंद की तपस्या का प्रमाण बने।
क्या सोच रही हो माधवी ? विद्यानंद की मधुर आवाज ने माधवी की तंद्रा तोड़ी।
"भगवन," माधवी ने वर्तमान में लौटते हुए, धीमी और कंपकपाती आवाज़ में कहा, "जब भी परमानंद की बात आती है, मेरी आत्मा उसी भोर में लौट जाती है। वह दृश्य! वह रेशम में लिपटा हुआ नन्हा सा देवदूत! वह कोई साधारण बच्चा नहीं था, महाराज। वह साक्षात् विधाता का हस्ताक्षर था, जिसे मैंने स्वयं अपनी आँखों से उस उद्यान में ईश्वर के वरदान की तरह पाया था।"
माधवी की आँखों में आज भी वही विस्मय और अटूट विश्वास था। उसके लिए परमानंद के आगमन में कोई संशय नहीं था; वह केवल और केवल एक 'दिव्य चमत्कार' था।
विद्यानंद ने माधवी की ओर देखा। उसकी श्रद्धा अचूक थी, और यही वह विश्वास था जिसने पूरे आश्रम को यह मानने पर विवश कर दिया था कि परमानंद 'ईश्वर का वरदान' है।
लेकिन विद्यानंद के अंतर्मन में, उस 'दिव्यता' के पीछे छिपा अतीत का वह राज, जिसे वह सालों से दबाए बैठे थे, एक बार फिर सिर उठाने लगा था। परमानंद का वह एक वर्ष की आयु में आश्रम में आना, उसकी अबोध आँखों का वह तेज... क्या वह सब सचमुच ईश्वर की मर्जी थी? या फिर कुछ ऐसा, जिसका सच केवल विद्यानंद और मोनी ही जानते थे?
कुछ ही देर में विद्यानंद की सूक्ष्म साधना का वक्त हो गया। इधर विद्यानंद ने अपनी पलके बंद की उधर मोनी की निगाह टेबल पर पड़े अखबार पर गई जिस पर एक बेहद सुंदर और प्रतिभाशाली युवक की तस्वीर थी। न जाने मोनी को ऐसा क्यों महसूस हुआ कि वह बालक विलक्षण है।
मोनी की उंगलियाँ काँपते हुए उस कागज़ के पन्ने पर ठिठक गईं।
अखबार की पंक्तियाँ किसी मंत्र की तरह उसके कानों में गूँजने लगीं:
मेधा का उदय: बनारस का 'सूरज' बना चिकित्सा जगत का नया सितारा
वाराणसी: बनारस मेडिकल कॉलेज के दीक्षांत समारोह में इस वर्ष का सर्वश्रेष्ठ स्नातक (Topper) होने का गौरव सूरज को प्राप्त हुआ है। उसकी असाधारण मेधा और शांत स्वभाव ने शिक्षकों को चकित कर दिया है।
स्थानीय जनमानस उसे 'बनारस का उगता हुआ सूरज' कहकर पुकार रहा है। सूरज की इस उपलब्धि के पीछे उसकी माँ सुगना का अटूट धैर्य और पिता रतन का तप है। एक साधारण पृष्ठभूमि से निकलकर स्वर्ण पदक तक का यह सफर प्रेरणा की नई गाथा लिख रहा है।
मोनी अपने अतीत को याद करने लगी सुगना को भूल पाना वैसे भी असंभव था । एक-एक करके इस कथा के सारे किरदार मोनी के दिमाग में घूमने लगे.. और जब बात विलक्षण सूरज पर आई वह परमानंद को याद करने लगी…. और उसकी तुलना सूरज से करने लगी. सूरज जितना विलक्षण था…परमानंद भी उतना ही तेजस्वी था मोनी को परमानंद की जन्म गाथा याद आने लगी..
शेष अगले भाग में..