Incest आह..तनी धीरे से.....दुखाता. - Page 131 - SexBaba
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Incest आह..तनी धीरे से.....दुखाता.

भाग 177

सूरज का वीर्य एक बार फिर सोनी की योनि से छलकने को था पर सोनी ने अपनी जांघें से ऊपर

कर ली जैसे ही वह वीर्य के हर कतरे को संजो लेना चाहती हो..


सूरज का हाथ अब भी सोनी की कमर पर था। सोनी ने करवट ली और सूरज की आँखों में देखा—उन आँखों में अब वह पुराना डर नहीं, बल्कि एक विजेता का गर्व और अपनी 'आराध्या' के प्रति अगाध कृतज्ञता थी।

सोनी ने धीरे से सूरज के माथे से पसीना पोंछा और उसके होंठों पर एक ममता भरा चुंबन अंकित किया।

सोनी (धीमी आवाज़ में): "आज बनारस का यह सूरज सच में उदय हो गया है।"

अब आगे…


सोनी बिस्तर से उठी। उसके बदन पर सूरज का दिया वह रेशमी कुर्ता अब भी था..

उसका ध्यान सूरज के तने हुए लिंग पर गया जिसने उसे जन्नत की सैर कराई थी और उसके गर्भ को सिंचित किया था। इस अद्भुत चर्मदंड को अब विश्राम देने की बारी थी।

सोनी ने झुक कर काम रस से लथपथ उस लिंग को अपने होठों से चुम लिया हमेशा की तरह उसका तनाव गायब हो गया..

जैसे कोई मां अपने छोटे बच्चे को पुचकारती है और उसका तनाव खत्म कर उसे सुलाती है वैसे ही सोनी ने सूरज के लिंग को बड़े प्यार से उसकी जांघों पर सुला दिया।

कुछ पलों बाद …सूरज उठकर खड़ा हो गया वह पूरी तरह नग्न था सोनी भी सूरज के दिए कुर्ते में अर्धनग्न अवस्था में थी।

अचानक सूरज का ध्यान सोनी की जांघों के जोड़ पर गया जहां वीर्य के साथ-साथ कुछ लालिमा भी थी जो निश्चित थी रक्त की थी.. सोनी ने भी सूरज की निगाहों का अनुसरण किया..

सूरज ने सोनी की आंखों में झांकते हुए पूछा… ये कैसे?

आज मेरे सूरज का कौमार्य भंग हुआ है ये उसकी ही निशानी है…

सूरज ने अपने लिंग की तरफ देखा लालिमा का कुछ अंश उस पर भी था…यद्यपि सूरज पूरी तरह समझ नहीं पाया पर वह शांत ही रहा..

बिछड़ने का वक्त आ चुका था..

सूरज ने पूरे आदर भाव से झुक कर सोनी के चरण छुए और कृतज्ञ भाव से बोला..

मौसी मेरा पुरुषत्व जागने के लिए मैं आपका ऋणी हूं

आप मेरे लिए हमेशा पूज्य हैं और पूज्य रहेंगी.. कोई गलती हुई हो तो मुझे माफ कर दीजिएगा..

सोनी ने उसे अपने गले से लगा लिया। सोनी और सूरज का मिलन अद्भुत था अनोखा था इस आलिंगन में वात्सल्य था या तृप्त हो चुकी वासना कहना कठिन था।

सोनी ने उसके सर को अपने दोनों हाथों से पकड़ कर अपने होठों से उसके होठों पर चुंबन लिया…सोनी के होठों ने सूरज के लिंग से जो काम रास चुराया था सोनी ने उसे अनजाने में ही सूरज के होठों से साझा कर लिया था..

सूरज अपने कमरे में पहुँचा, तो उसका शरीर थकावट से चूर था, पर मन किसी हिमालय की चोटी पर बैठा उत्सव मना रहा था। कमरे की कुंडी चढ़ाते ही उसने आईने में अपनी मस्कुलर देह को निहारा। सोनी मौसी के बदन की चंदन जैसी खुशबू और उनके स्त्रीत्व का वह 'महोघनी रस' अभी भी उसके रोम-रोम में बसा था।

तभी उसे नीचे के हिस्से में एक भारीपन और हल्की कसक महसूस हुई। वह बाथरूम की ओर बढ़ा। जैसे ही उसने पेशाब की धार छोड़ी, अचानक उसके लिंग के अग्रभाग (सुपाड़े) के ठीक निचले हिस्से में एक ऐसी तीव्र और तीखी चनचनाहट हुई, जैसे किसी ने जलती हुई माचिस की तीली छुआ दी हो।

सूरज के मुँह से एक दबी हुई सिसकारी निकल गई— "उह्ह...!"

वह दर्द इतना बिजली जैसा था कि उसकी बोझिल आंखें खुल गई। उसने जल्दी से पानी के छींटे मारे और मद्धम लाइट में अपने उस 'विजेता' अंग को हाथों में लिया। उसने धीरे से सुपाड़े की कोमल त्वचा (Foreskin) को पीछे की ओर सरकाया और लिंग को पलटकर नीचे की ओर देखा।

वहाँ, उस संवेदी केंद्र के पास, वह महीन और नाजुक तंतु (Frenulum), जो अब तक उसके कौमार्य की रक्षा कर रहा था, बीच से टूट चुका था। वह जगह हल्की सुर्ख लाल थी और वहाँ से रक्त की एक आखिरी नन्ही बूंद मोती की तरह उभर रही थी।

सूरज की आँखों में एक चमक आ गई। अब उसे समझ आया कि सोनी मौसी की जाँघों पर वह लालिमा और उसके पौरुष पर लगा वह 'राजतिलक' कहाँ से आया था। वह कोई घाव नहीं था, वह तो उसके 'बालपन' के अंत और 'पूर्ण पुरुषत्व' के उदय का प्रमाण पत्र था। उस बारीक धागे के टूटने ने ही उसे वह आज़ादी दी थी कि वह सोनी की गहराइयों को पूरी तरह नाप सका।

उसने एक गहरी और संतुष्ट साँस ली। चेहरे पर एक शरारती और गर्व भरी मुस्कान फैल गई।

सूरज (मन ही मन): "तो यह था वह बंधन... जो आज मौसी की 'मुनिया' की तड़प ने हमेशा के लिए तोड़ दिया।"

वह वापस अपने बिस्तर पर आया और बिना वस्त्रों के ही चादर तानकर लेट गया। जैसे ही उसने आँखें मूंदीं, उसे फिर से वही 'थप-थप' का संगीत, सोनी मौसी की भीगी हुई सिसकियाँ और उनके वक्षों का वह भारी भराव महसूस होने लगा। उसके पौरुष की वह पहली और महा-विजय अब एक मीठी याद बनकर उसकी रगों में तैर रही थी।

पूर्ण तृप्ति, रूहानी सुकून और देह की शांति के साथ, बनारस का वह 'सूरज' आज एक असली मर्द बनकर गहरी और सपनों भरी निद्रा की आगोश में समा गया। हवेली का सन्नाटा अब उसके लिए डरावना नहीं, बल्कि एक मधुर लोरी जैसा था।

हवेली की दीवारें गवाह थीं कि आज रात सोनी और सूरज का प्यार एक नए आयाम को प्राप्त कर चुका था उनके इस अद्भुत संगम ने एक नए जीवन की नींव रख दी थी..

अगली सुबह जब सोनी की जब आँखें खुलीं, तो उसे अपने पूरे अस्तित्व में एक भारीपन महसूस हुआ। जैसे ही उसने करवट लेने की कोशिश की, उसकी कमर में एक तीव्र और अजब सी कसक उठी। यह वह मीठा दर्द था जिसे अक्सर एक नव-विवाहिता अपनी सुहागरात के बाद महसूस करती है। सूरज के उस प्रचंड पौरुष का प्रहार और उसकी योनि की दीवारों का वह असाधारण फैलाव—कल रात की हर हरकत का निशान आज उसके शरीर पर एक सुखद टीस बनकर उभर रहा था।

सोनी बिस्तर पर ही लेटी रही। उसे ऐसा लग रहा था जैसे वह अब भी सूरज के उसी गाढ़े द्रव्य से पूरी तरह सिंचित है। वह तृप्ति, जिसकी उसे बरसों से तलाश थी, आज उसके चेहरे पर एक अनोखे तेज के रूप में झलक रही थी। उसकी त्वचा पहले से कहीं ज्यादा चमकदार और आँखें शांत लग रही थीं।

तभी दरवाजे पर दस्तक हुई और सुगना अंदर दाखिल हुई। कमरे की हवा अभी भी कल रात की उस मादक और कस्तूरी जैसी गंध से लदी हुई थी—पसीने, काम-रस और सूरज के वीर्य की वह मिली-जुली महक जिसे एक अनुभवी स्त्री तुरंत पहचान सकती थी। सुगना को भी इसका आभास हुआ पर विकास कल तक यहीं था। सोनी अब तक जीवन आ आंनद ले रही टी

सुगना ने नाक सिकोड़ी और सीधे खिड़की की ओर बढ़ी। सुगना: "हमेशा कमरा बंद मत रखा कर सोनी... कैसी अजब सी गंध आने लगती है। खुली हवा आने-जाने दिया कर।"

जैसे ही सुगना ने खिड़की के पल्ले खोले, ताजी हवा ने कमरे के सन्नाटे को तोड़ा। सुगना अब सोनी के बिस्तर के पास आई। उसने देखा कि सोनी अब भी चादर ओढ़े लेटी है, जबकि वह अक्सर सूरज निकलने से पहले ही रसोई में होती थी।

सुगना: "आज क्या बात है? सूरज सर पर चढ़ आया है और तू अब तक बिस्तर नहीं छोड़ रही? तबीयत तो ठीक है न?"

जैसे ही सुगना ने सोनी के माथे को छूने के लिए चादर हटाने की कोशिश की, सोनी ने झटके से चादर को अपनी मुट्ठी में भींच लिया। उसे याद आया कि बिस्तर के उस हिस्से पर कल रात की वह 'सफेद गवाही यानी सूरज का वीर्य ' अब भी होगा। अगर सुगना ने वह देख लिया, तो अनर्थ हो जाएगा।

सोनी (चेहरे पर एक बनावटी मुस्कान लाते हुए): "अरे नहीं दीदी... बस आज बड़े दिनों बाद बहुत अच्छी और गहरी नींद आई है। ऐसा लग रहा है जैसे देह की सारी थकान मिट गई हो। आज थोड़ा देर तक लेटने का मन है, आप जाइए मैं आती हूँ।"

सुगना ने अपनी छोटी बहन के चेहरे को गौर से देखा। उसे सोनी का चेहरा आज कुछ अलग लगा। वह थकान तो थी, पर आँखों में एक अजीब सी संतुष्टि थी। वह तेज, जो केवल एक पूरी तरह तृप्त स्त्री के चेहरे पर आता है, सोनी का मुखमंडल दमक रहा था।

सुगना: "थकान है या कुछ और? चेहरा तो ऐसे चमक रहा है जैसे गंगा में डुबकी लगा कर आई हो। खैर, आराम कर ले। मैं नाश्ता बनाती हूँ, पर ज्यादा देर मत करना।"

सुगना के बाहर जाते ही सोनी ने राहत की एक लंबी साँस छोड़ी। उसने धीरे से चादर हटाकर अपनी जाँघों की ओर देखा, जहाँ सूरज के पौरुष के अवशेष अब भी उसकी त्वचा पर एक पारभासी परत की तरह चमक रहे थे। उसे एहसास हुआ कि मर्यादा और प्यास की उस जंग ने उसे एक ऐसा सुख दिया है, जिसे वह चाहकर भी अब कभी भुला नहीं पाएगी।

सुगना के कमरे से बाहर जाते ही सोनी ने राहत की एक लंबी सांस ली। उसने धीरे से अपने बदन से वह चादर हटाई और अपनी देह की स्थिति को निहारा। उसकी गोरी जाँघों पर सूरज के वीर्य के सूखे हुए निशान किसी सफ़ेद रेशमी धागे की तरह चमक रहे थे। उसकी योनि मार्ग अब भी उस भारी मिलन की गवाह दे रहा था—वहाँ एक हल्की सी जलन और भारीपन था, जो उसे कल रात के उस तूफ़ान की याद दिला रहा था।

सोनी लड़खड़ाते कदमों से बाथरूम की ओर बढ़ी। हर कदम के साथ उसकी कमर की वह 'सुहाग-टीस' उसे विचलित कर रही थी। उसने बाथरुम का दरवाजा बंद किया और आइने के सामने खड़ी हो गई। जैसे ही उसने अपनी नाईटी उत्तरी, उसकी आँखें फटी की फटी रह गई।

उसके पुष्ट वक्ष पर सूरज के दाँतों के निशान गहरे लाल हो चुके थे। दाहिनी चूची के पास सूरज के जुनून की गवाही साफ़ दिख रही थी। उसकी गर्दन और कंधों पर सूरज के हाथों की पकड़ के नीले निशान उभर आए थे। सोनी ने अपनी उंगलियों से उन निशानों को छुआ—उस मीठे दर्द में एक गजब का सुकून था। उसे याद आया कि कैसे वासना के आवेग में सूरज एक अबोध बालक से एक युवा शिकारी में बदल गया था।

उसने शावर खोला। जैसे ही गुनगुना पानी उसके बदन पर गिरा, उसकी योनि से सूरज का वह द्रव्य धीरे-धीरे बहकर पैरों के रास्ते जमीन पर उतरने लगा। सोनी ने अपनी आँखें मूंद लीं। उसे लगा जैसे सूरज की खुशबू अब भी उसके रोम-रोम में बसी है। उसने शावर जेल से अपनी देह को रगड़ा, पर मन ही मन वह उन निशानों को मिटाना नहीं चाहती थी। वह चाहती थी कि सूरज का यह 'अधिकार' उसके बदन पर सदा के लिए अंकित हो जाए।

सोनी ने बड़ी सावधानी से एक गाढ़े नीले रंग की साड़ी पहनी और ब्लाउज के पल्लू को इस तरह लपेटा कि उसके गले और वक्ष के निशान पूरी तरह छुप जाएं। जब वह हाल में पहुँची, तो वहाँ का नजारा बदला हुआ था।

सूरज डाइनिंग टेबल पर बैठा था। आज वह अखबार नहीं पढ़ रहा था, बल्कि सामने रखी चाय की चुस्की ले रहा था। उसकी पीठ सीधी थी, कंधे चौड़े लग रहे थे और उसकी आँखों में वह अपराधी भाव (Guilt) गायब था। सुगना रसोई से बाहर निकली।

सुगना: "अरे सोनी! आ गई? सम्हाल तेरे लाड़ले को... तब से 10 बार पूछ चुका है मौसी नहीं आई?

सोनी ने धीरे से कुर्सी खींची और सूरज के सामने बैठ गई। सूरज ने अपनी नज़रें उठाईं और सीधे सोनी की आँखों में देखा। उन आँखों में अब 'मौसी' के लिए सम्मान तो था, पर साथ ही एक 'प्रेमी' की वह चमक भी थी जो यह कह रही थी कि वह अब सोनी के हर राज़ का हिस्सेदार है।

सूरज: "मौसी, आज आपके हाथ की चाय नहीं मिली? आपकी तबीयत तो ठीक है ना? "

सोनी का दिल जोरों से धड़कने लगा। वह समझ गई कि सूरज किस ओर इशारा कर रहा है।

सोनी (धीमी आवाज़ में): "आज देर हो गई सूरज... तबीयत थोड़ी सुस्त थी।"

सुगना (हँसते हुए): "अरे, रात भर कमरा बंद करके सोएगी तो सुस्ती तो आएगी ही। सूरज, तू डॉक्टर है, अपनी मौसी को कोई ताकत की दवा लिख दे।"

सुगना की यह बात सुनकर सोनी का चेहरा सिन्दूरी हो गया। उसने नीचे सर झुका लिया। सूरज ने एक शरारती मुस्कान के साथ सोनी की ओर देखा और कहा, "माँ, मौसी छोटी डॉक्टरनी ही नहीं जादूगरनी है.. उन्होंने तो खुद मेरा इलाज किया है।

क्यों क्या हुआ? सुगना ने आश्चर्य से पूछा..

यह तो आप मौसी से ही पूछ लीजिए? सूरज ने सोनी की तरफ इशारा करते हुए कहा।

सोनी सकपका गई सूरज ने उसे फंसा दिया था पर सोनी ने मुस्कुराते हुए कहा ..

“छोड़ ना दीदी यह कुछ ज्यादा ही शैतान हो गया है”

तुम दोनों की बातें अब मेरी समझ में नहीं आती है…तुम दोनों डॉक्टर- डॉक्टरनी खेलो मैं चली अपना काम करने….

सूरज का पैर अनजाने में मेज के नीचे सोनी के पैर से टकराया। सोनी के पूरे बदन में बिजली सी दौड़ गई। उसने अपनी नज़रें उठाकर सूरज को देखा, जैसे कह रही हो—'अब तो मान जा', पर सूरज की आँखों में एक नई भूख थी, जो यह बता रही थी कि कल रात तो बस शुरुआत थी।

सोनी ने मेज के नीचे से अपनी साड़ी का पल्लू कसकर पकड़ लिया। सूरज का यह नया रूप, यह आत्मविश्वास उसे डरा भी रहा था और एक अजीब सी उत्तेजना भी दे रहा था।

सूरज और सोनी की दुनिया से दूर, चलिए चलते हैं विद्यानंद के उस शांत और भव्य आश्रम में, जहाँ इन दिनों बनारस महोत्सव में जाने की तैयारियाँ अपने चरम पर थीं। हवा में चंदन और धूप की महक घुली हुई थी, लेकिन आश्रम के अधिष्ठाता विद्यानंद के मन में स्मृतियों का एक अलग ही बवंडर उठ रहा था।

विद्यानंद पर अब उम्र अपना प्रभाव दिखाने लगी थी। 70-75 वर्ष की आयु में भी उनके चेहरे का तेज कम नहीं हुआ था, बल्कि समय की झुर्रियों ने उनके व्यक्तित्व को और भी अधिक गरिमामय बना दिया था। जैसे ही 'बनारस' का नाम उनके कानों में पड़ता, उनके मानस पटल पर पुरानी स्मृतियों के चित्र सजीव हो उठते।

"इंसान अपनी इंद्रियों पर विजय पा सकता है, पर स्मृतियाँ? वे तो उस बरगद की जड़ों की तरह होती हैं जो पत्थर को चीर कर भी अपना स्थान बना लेती हैं।"

विद्यानंद को अपनी छठी इंद्रिय और अपनी साधना पर अभिमान था, पर वह स्वयं से यह सत्य नहीं छिपा सकते थे कि वह अपने अतीत की उन अमिट छापों को मिटाने में असफल रहे हैं, जिन्होंने कभी उनके जीवन की दिशा बदली थी। वह एक ऐसे साधक थे जिसने संसार तो जीत लिया था, पर अपने हृदय के एक कोने में दबे उस 'पुराने घर' से हार गए थे।

तभी कक्ष के द्वार पर एक आहट हुई। मोनी, जिसे अब दुनिया ‘वज्र नंदिनी' के नाम से जानती थी, कक्ष में प्रविष्ट हुई। श्वेत वस्त्रों में लिपटी मोनी इस समय साक्षात् पवित्रता और सौंदर्य का प्रतिरूप लग रही थी। उसका सौंदर्य ऐसा था जिसे शब्दों में बांधना कठिन था:

भक्तों के लिए: वह एक देवी का स्वरूप थी, शांत और पूजनीय।

कलाकारों के लिए: वह खजुराहो की किसी सजीव मूर्ति की भांति उत्कृष्ट थी।

रतन जैसे कामुक व्यक्तियों के लिए: वह एक ऐसी अतृप्त प्यास थी, जिसे देख कर वासना और व्याकुलता और बढ़ जाए।

मोनी ने झुककर विद्यानंद के चरण स्पर्श किए और उनके समीप बैठकर मधुर स्वर में कहा, "भगवन, बनारस महोत्सव की तैयारियाँ लगभग पूर्ण हो चुकी हैं।

परमानंद बहुत उत्साहित है। वह बार-बार प्रस्थान के समय के बारे में पूछ रहा है।"

'परमानंद' का नाम सुनते ही विद्यानंद के गंभीर चेहरे पर एक मद्धम मुस्कान तैर गई। उनकी आँखों में एक अजीब सी चमक आ गई।

"परमानंद दिव्य है, नंदिनी ," विद्यानंद ने धीमी लेकिन दृढ़ आवाज में कहा। "वह परम तेजस्वी है। भले ही तुमने उसे जन्म दिया है, लेकिन वह केवल तुम्हारा पुत्र नहीं है। वह इस आश्रम का भविष्य है, इसका उत्तराधिकारी है।"

आश्रम की चहारदीवारी के भीतर यही सत्य स्थापित था कि परमानंद ईश्वर का वरदान है, जिसे स्वयं विधाता ने विद्यानंद के पास इस गद्दी को संभालने के लिए भेजा है। विद्यानंद की बातों पर तर्क करना किसी के वश में नहीं था, और न ही किसी की इतनी धृष्टता थी।

जब परमानंद इस आश्रम में आया था, तब उसकी आयु मात्र एक वर्ष थी। उसकी अबोध आँखों के तेज ने तभी सबको वश में कर लिया था। आश्रमवासियों ने इसे 'ईश्वरीय संकेत' मानकर स्वीकार कर लिया था, यह जाने बिना कि इस दिव्यता के पीछे अतीत के कौन से गहरे राज छिपे हैं।

मोनी ने झुककर विद्यानंद के चरण स्पर्श किए और उनके समीप बैठकर मधुर स्वर में कहा, "भगवन, बनारस महोत्सव की तैयारियाँ लगभग पूर्ण हो चुकी हैं।

परमानंद बहुत उत्साहित है। वह बार-बार प्रस्थान के समय के बारे में पूछ रहा है।"

विद्यानंद और वज्रनंदिनी (मोनी) के बीच परमानंद के 'दिव्य' होने की चर्चा चल ही रही थी कि कक्ष के द्वार पर एक हल्की आहट हुई। यह माधवी थी। यद्यपि समय ने उसके चेहरे पर भी रेखाएँ खींच दी थीं, किंतु उसकी आँखों की कोमलता और सेवा भाव आज भी वैसा ही था।

'परमानंद' का नाम सुनते ही माधवी के पग जैसे वहीं थम गए। उसकी आँखों के सामने वर्तमान का वह 18 वर्षीय हष्ट-पुष्ट और तेजस्वी युवक ओझल हो गया, और वह स्मृतियों के एक गहरे महासागर में डूबती चली गई।

कक्षा के द्वार पर ही ठिठकी हुई, माधवी की आँखें शून्य में निहारने लगीं। वह वर्तमान से कटकर सीधे 17 वर्ष पीछे, उस अलौकिक भोर में पहुँच गई, जिसने इस आश्रम का इतिहास बदल दिया था।

माधवी को वह सुबह आज भी कल की तरह याद थी। ब्रह्ममुहूर्त का समय था, चारों ओर गहरा सन्नाटा और गंगा की धीमी लहरों की आवाज़। वह रोज़ की तरह विद्यानंद की पूजा के लिए ताज़े फूल चुनने आश्रम के पुष्प उद्यान में गई थी।

ओस की बूंदों से भीगे मोगरे और पारिजात के झुरमुट के बीच, उसकी दृष्टि एक स्थान पर ठहर गई। वहाँ, धवल और सुनहरे रेशमी वस्त्रों में लिपटा हुआ, एक अबोध शिशु सोया हुआ वह बालक साधारण नहीं लग रहा था। यद्यपि वह वस्त्रों में लिपटा था, लेकिन उसके शरीर से एक अद्भुत आभा, एक मद्धम सा प्रकाश उत्सर्जित हो रहा था, जिसने उस अंधेरे कोने को रोशन कर दिया था।

माधवी ने जब उसे उठाने के लिए हाथ बढ़ाए, तो वह सिहर उठी। उसे लगा जैसे वह किसी मनुष्य को नहीं, बल्कि साक्षात् ईश्वर के एक अंश को स्पर्श कर रही है। वह इतना पवित्र और कोमल था कि उसे छूने में भी भय लग रहा था।

उस बालक की शांत मुद्रा और उसके चेहरे पर बिखरा अकल्पनीय तेज देखकर माधवी के मुख से शब्द नहीं निकले, केवल आँखों से श्रद्धा के आँसू बह निकले थे। उसे ऐसा प्रतीत हुआ जैसे विधाता ने स्वयं स्वर्ग से उतरकर इस बालक को इस उद्यान में रख दिया हो, ताकि यह विद्यानंद की तपस्या का प्रमाण बने।

क्या सोच रही हो माधवी ? विद्यानंद की मधुर आवाज ने माधवी की तंद्रा तोड़ी।

"भगवन," माधवी ने वर्तमान में लौटते हुए, धीमी और कंपकपाती आवाज़ में कहा, "जब भी परमानंद की बात आती है, मेरी आत्मा उसी भोर में लौट जाती है। वह दृश्य! वह रेशम में लिपटा हुआ नन्हा सा देवदूत! वह कोई साधारण बच्चा नहीं था, महाराज। वह साक्षात् विधाता का हस्ताक्षर था, जिसे मैंने स्वयं अपनी आँखों से उस उद्यान में ईश्वर के वरदान की तरह पाया था।"

माधवी की आँखों में आज भी वही विस्मय और अटूट विश्वास था। उसके लिए परमानंद के आगमन में कोई संशय नहीं था; वह केवल और केवल एक 'दिव्य चमत्कार' था।

विद्यानंद ने माधवी की ओर देखा। उसकी श्रद्धा अचूक थी, और यही वह विश्वास था जिसने पूरे आश्रम को यह मानने पर विवश कर दिया था कि परमानंद 'ईश्वर का वरदान' है।

लेकिन विद्यानंद के अंतर्मन में, उस 'दिव्यता' के पीछे छिपा अतीत का वह राज, जिसे वह सालों से दबाए बैठे थे, एक बार फिर सिर उठाने लगा था। परमानंद का वह एक वर्ष की आयु में आश्रम में आना, उसकी अबोध आँखों का वह तेज... क्या वह सब सचमुच ईश्वर की मर्जी थी? या फिर कुछ ऐसा, जिसका सच केवल विद्यानंद और मोनी ही जानते थे?

कुछ ही देर में विद्यानंद की सूक्ष्म साधना का वक्त हो गया। इधर विद्यानंद ने अपनी पलके बंद की उधर मोनी की निगाह टेबल पर पड़े अखबार पर गई जिस पर एक बेहद सुंदर और प्रतिभाशाली युवक की तस्वीर थी। न जाने मोनी को ऐसा क्यों महसूस हुआ कि वह बालक विलक्षण है।

मोनी की उंगलियाँ काँपते हुए उस कागज़ के पन्ने पर ठिठक गईं।

अखबार की पंक्तियाँ किसी मंत्र की तरह उसके कानों में गूँजने लगीं:

मेधा का उदय: बनारस का 'सूरज' बना चिकित्सा जगत का नया सितारा

वाराणसी: बनारस मेडिकल कॉलेज के दीक्षांत समारोह में इस वर्ष का सर्वश्रेष्ठ स्नातक (Topper) होने का गौरव सूरज को प्राप्त हुआ है। उसकी असाधारण मेधा और शांत स्वभाव ने शिक्षकों को चकित कर दिया है।

स्थानीय जनमानस उसे 'बनारस का उगता हुआ सूरज' कहकर पुकार रहा है। सूरज की इस उपलब्धि के पीछे उसकी माँ सुगना का अटूट धैर्य और पिता रतन का तप है। एक साधारण पृष्ठभूमि से निकलकर स्वर्ण पदक तक का यह सफर प्रेरणा की नई गाथा लिख रहा है।

मोनी अपने अतीत को याद करने लगी सुगना को भूल पाना वैसे भी असंभव था । एक-एक करके इस कथा के सारे किरदार मोनी के दिमाग में घूमने लगे.. और जब बात विलक्षण सूरज पर आई वह परमानंद को याद करने लगी…. और उसकी तुलना सूरज से करने लगी. सूरज जितना विलक्षण था…परमानंद भी उतना ही तेजस्वी था मोनी को परमानंद की जन्म गाथा याद आने लगी..


शेष अगले भाग में..
 
Welcome to story..

Some updates sent..

One question...

Who is mother and father of Raja ?
 
एक आपके भी कमेंट का इंतजार रहता है जिसमें कुछ ना कुछ पढ़ने लायक मिलता है

आभार
 
Aapko saare update 90,91,101,102 bhej diya hai par aapne mere prasn ka jabbab nahi diya jo maine aapse poocha tha...
 
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आपको पसंद आया मेरी मेहनत रंग लाई जुड़े रहे
 
भाग 178

एक साधारण पृष्ठभूमि से निकलकर स्वर्ण पदक तक का यह सफर प्रेरणा की नई गाथा लिख रहा है।

मोनी अपने अतीत को याद करने लगी सुगना को भूल पाना वैसे भी असंभव था । एक-एक करके इस कथा के सारे किरदार मोनी के दिमाग में घूमने लगे.. और जब बात विलक्षण सूरज पर आई वह परमानंद को याद करने लगी…. और उसकी तुलना सूरज से करने लगी. सूरज जितना विलक्षण था…परमानंद भी उतना ही तेजस्वी था मोनी को परमानंद का जन्म का याद आने लगा….

अब आगे…..

मोनी आँखों पर पट्टी बाँधे, हृदय की बढ़ती धड़कनों के साथ उस मखमली बिस्तर पर बैठी अपने परीक्षक का इंतजार कर रही थी ( भाग 150 में इसका संदर्भ लिया जा सकता है )। सन्नाटा इतना गहरा था कि उसे अपनी ही साँसों की आवाज़ सुनाई दे रही थी। तभी उसे कमरे के भारी नक्काशीदार दरवाज़े के खुलने और बंद होने की हल्की सी आहट मिली।

धीमे और सधे हुए कदमों की चाप उसके करीब आने लगी। मोनी का पूरा शरीर अनजाने डर और उत्तेजना के मिले-जुले अहसास से सिहर उठा। वह व्यक्ति उसके बिलकुल करीब आकर खड़ा हो गया। मोनी को उसकी देह की ऊष्मा और एक जानी-पहचानी गंध का आभास हुआ, लेकिन वह कुछ बोल नहीं पा रही थी।

शून्य कक्ष की मद्धम और सुनहरी रोशनी में, मखमली बिछौने पर लेटी मोनी किसी अप्सरा की भांति प्रतीत हो रही थी, जिसे विधाता ने स्वयं फुर्सत के क्षणों में तराशा हो। इक्कीस वर्ष की वह ढलती हुई देह अपनी पूर्णता के उस शिखर पर थी, जहाँ बचपन की मासूमियत और यौवन की प्रखरता का अद्भुत संगम होता है।

मोनी का शरीर एक जीवित कविता की तरह था, जिसके हर अंग में रस और छंद भरा था। उसकी गेहुँआ रंगत ऐसी थी मानो ढलते सूरज की किरणें मलाई में घुल गई हों। आँखों पर बंधी वह काली रेशमी पट्टी उसके चेहरे के उभारों को और भी रहस्यमयी बना रही थी। उसके अधर (होंठ) कामदेव के धनुष की तरह रसीले और स्वभावतः लाल थे, जो उत्तेजना के वेग में थोड़े खुले हुए थे, मानो किसी अनकहे मंत्र का जाप कर रहे हों।

उसके उन्नत और पुष्ट वक्ष, उसकी हर गहरी साँस के साथ ऊपर-नीचे हो रहे थे, जैसे शांत समुद्र में उठती लहरें। वे दो श्वेत कमलों की भांति गौरवपूर्ण थे, जिनके अग्र भाग (निप्पल) उत्तेजना और कक्ष की शीतलता के कारण किसी कठोर मणिक की तरह तन गए थे। उनके चारों ओर की श्याम आभा (Areola) उसकी त्वचा की शुभ्रता पर एक मादक विरोधाभास पैदा कर रही थी।

उसकी कमर इतनी पतली और लचीली थी कि जैसे कोई मृणाल (कमल का नाल) हो। पेट का वह मखमली मैदान उसकी गहरी नाभि के पास जाकर एक मोहक भँवर बनाता था। नाभि के इर्द-गिर्द बिखरी पसीने की बारीक बूंदें मोतियों की माला जैसी आभा दे रही थीं।

उसकी जाँघें कदली (केले) के स्तंभों की तरह चिकनी, मांसल और सुडौल थीं। वे नीचे की ओर बढ़ते हुए टखनों के पास जाकर अत्यंत सुकुमार हो जाती थीं। जाँघों के मिलन स्थल पर प्रकृति का वह 'दिव्य और अद्भुत चीरा' अपने रेशमी आवरण के भीतर सुरक्षित था, जो आज अपनी पहली बलि के लिए आतुर और जाग्रत था।

मोनी की नग्न काया से एक सोंधी और मादक गंध फूट रही थी—यह चंदन के लेप, कस्तूरी और उसके अपने शरीर की नैसर्गिक काम-गंध का मिश्रण था। उसके खुले हुए कृष्ण-केश (काले बाल) बिस्तर पर इस तरह बिखरे थे जैसे किसी श्याम घटा ने चाँदनी को अपनी बाहों में भर लिया हो।

उसकी देह का रोम-रोम स्पंदित था। वह केवल मांस का पुंज नहीं, बल्कि वासना और उपासना के बीच झूलती एक 'जीवंत वेदी' लग रही थी। वह पूर्णतः निशब्द और निश्चल थी, पर उसकी देह का कण-कण उस परीक्षक के उस 'वज्र स्पर्श' की प्रतीक्षा में एक अनजानी अग्नि में पिघल रहा था।

अचानक, एक बेहद कोमल और रेशमी स्पर्श उसके दाहिने टखने पर महसूस हुआ। वह स्पर्श किसी उंगली का नहीं, बल्कि शायद किसी नर्म पंख या रेशम के कपड़े का था। धीरे-धीरे वह स्पर्श उसके पैरों की पिंडलियों से होता हुआ ऊपर की ओर बढ़ने लगा। मोनी ने अपनी जाँघों को और भी कस लिया, लेकिन वह अदृश्य परीक्षक रुकने वाला नहीं था।

हवा में एक हल्की सी फुसफुसाहट गूँजी, जो सीधे मोनी के कान के पास थी:

"देवी, संयम की असली परीक्षा तभी होती है जब देह समर्पण करना चाहे और आत्मा उसे रोके। देखते हैं, मेरा विश्वास जीतता है या आपका हठ।"

मोनी के शरीर में एक करंट सा दौड़ गया। यह आवाज़... यह तो खुद विद्यानंद की थी! उसे अब समझ आया कि यह 'विशेष दर्जा' और 'अंतिम परीक्षा' कितनी व्यक्तिगत होने वाली थी।

विद्यानंद की उंगलियाँ, जो अब सुगंधित तेल से सराबोर थीं, मोनी की कमर के घेरे पर रेंगने लगीं। उसने बड़ी चतुराई से मोनी के शरीर के उन हिस्सों को छूना शुरू किया जहाँ संवेदनाएँ सबसे तीव्र होती हैं। मोनी का मन कह रहा था कि वह पलंग के सिरहाने लगा लाल बटन दबा दे, लेकिन उसकी महत्वाकांक्षा ने उसके हाथ रोक रखे थे। वह हारना नहीं चाहती थी।

मोनी के गदराए बदन पर जब विद्यानंद के पौरों ने दबाव बनाया, तो उसकी बंद आँखों के पीछे रंग-बिरंगे चिनार फूटने लगे। उसकी साँसें उखड़ने लगीं और वह अनजाने में ही बिस्तर की चादर को अपनी मुट्ठियों में भींचने लगी।

विद्यानंद ने अब अपना चेहरा मोनी के चेहरे के इतना करीब कर लिया कि उसकी गर्म साँसें मोनी के होंठों को छू रही थीं। उसने मोनी के कान की लौ को धीरे से अपने होंठों के स्पर्श से सहलाया। मोनी का पूरा बदन धनुष की तरह तन गया। वह अपनी जाँघों के बीच उस 'बरमूडा ट्रायंगल' में एक अजीब सी तड़प महसूस कर रही थी, जिसे उसने 11 महीनों से दबा कर रखा था।

विद्यानंद का हाथ अब धीरे-धीरे मोनी की जाँघों के उस जोड़ की ओर बढ़ रहा था, जहाँ प्रकृति का वह 'अद्भुत चीरा' छुपा हुआ था। मोनी को लगा जैसे वह पिघल रही है। उसे अहसास हुआ कि विद्यानंद उसे संभोग के लिए नहीं, बल्कि उसके आत्म-समर्पण के लिए मजबूर कर रहे थे।

जैसे ही विद्यानंद की उंगलियों ने उस संवेदनशील स्थान को छुआ, मोनी के मुँह से एक दबी हुई आह निकली। उसका हाथ काँपते हुए उस लाल बटन की ओर बढ़ा...

विद्यानंद की उंगलियों का स्पर्श अब और भी अधिक अधिकारपूर्ण हो चला था। मोनी को महसूस हुआ कि वह व्यक्ति अब केवल स्पर्श नहीं कर रहे बल्कि अपनी ऊर्जा उसके शरीर में समाहित करने का प्रयास कर रहे है। सुगंधित तेल की वजह से उसकी त्वचा और भी अधिक संवेदनशील हो गई थी।

विद्यानंद की उंगलियां अब मोनी के उन अंगों तक पहुँच चुकी थीं जिन्हें उसने अब तक दुनिया से बचा कर रखा था। वह व्यक्ति मोनी के 'बरमूडा ट्रायंगल' के किनारों को सहलाते हुए उसके चरम को छूने की कोशिश कर रहा था। मोनी का पूरा शरीर एक अनजानी अग्नि में जलने लगा। उसकी जांघों के बीच एक अजीब सी बेचैनी और गीलापन महसूस होने लगा, जो उसके 11 महीनों के संयम को चुनौती दे रहा था।

विद्यानंद ने अब धीरे से मोनी की गर्दन पर अपने होंठों का दबाव बनाया। मोनी ने अपनी गर्दन पीछे की ओर झुका दी। उसकी आँखों पर बँधा रुमाल उसकी उत्तेजना को और बढ़ा रहा था क्योंकि वह देख नहीं पा रही थी कि अगला प्रहार कहाँ से होगा। वह व्यक्ति अब अपनी उंगलियों से मोनी के उस 'अद्भुत चीरे' के बिल्कुल मुहाने पर खेल रहा था।

मोनी का हाथ सिरहाने रखे लाल बटन के बिल्कुल करीब था। उसकी उंगलियाँ बटन को छू रही थीं, लेकिन उसका मन अब भी इस परीक्षा को जीतने के लिए आतुर था। तभी उस व्यक्ति ने अपनी उंगलियों को थोड़ा और गहराई में ले जाने की कोशिश की। मोनी के मुँह से एक सिसकारी निकली। उसे अहसास हुआ कि विद्यानंद का यह तरीका उसे संभोग के लिए उकसा रहा है।

विद्यानंद का ध्यान अब मोनी के उन्नत वक्षों की ओर मुड़ा। उनकी हथेलियाँ मोनी के सीने को बड़ी कोमलता से सहला रही थीं, जैसे किसी कीमती रत्न की तराश कर रहे हों। अगले ही पल, विद्यानंद ने अपनी गर्दन झुकाई और एक अबोध बच्चे की तरह मोनी की पुष्ट चूची को अपने होंठों के घेरे में ले लिया।

मोनी के हलक से एक तड़पती हुई सिसकारी निकली। एक तरफ विद्यानंद की उंगलियों का नीचे चलता वह जादुई कंपन और दूसरी तरफ उनके होंठों का ऊपर की ओर वह कोमल खिंचाव—मोनी को ऐसा लगा जैसे उसका अस्तित्व दो हिस्सों में बँट रहा है। उसकी साँसें तेज़ और भारी हो गई थीं। वह विद्यानंद के बालों में अपनी उंगलियाँ फँसाकर उन्हें अपनी ओर और ज़ोर से भींच रही थी, जो इस बात का प्रमाण था कि उसका हठ अब कामवासना के आगे घुटने टेक रहा है।

विद्यानंद की थ्योरी सही साबित होती दिख रही थी—निरंतर स्पर्श और चुंबन स्त्री को संभोगरत होने के लिए विवश कर ही देते हैं।

विद्यानंद की उंगलियाँ, अब मोनी की योनि के मुहाने पर एक विशेष लय में घूमने लगीं। विद्यानंद ने अपनी साधना से प्राप्त उस सूक्ष्म कंपन (Vibration) को अपनी पोरों में केंद्रित किया और उसे सीधे मोनी के भगनासे (Clitoris) पर स्पर्श कराया।

वह स्पर्श इतना विद्युतकारी था कि मोनी का पूरा शरीर धनुष की तरह बिस्तर से ऊपर उठ गया। उसके योनिकुंड से 'रज-रस' का प्रवाह फूट पड़ा, जो विद्यानंद की उंगलियों के साथ मिलकर एक चिकनी और मादक फिसलन पैदा कर रहा था। मोनी ने अपनी जाँघों को और कसने का प्रयास किया ताकि वह उस सुखद हमले को रोक सके, लेकिन उसकी देह अब उसके नियंत्रण से बाहर हो रही थी। वासना के उस तीव्र ज्वार में वह अनजाने में ही अपनी जाँघों को थोड़ा फैला देती, जिससे विद्यानंद को और भी गहरा प्रवेश मिल जाता।

इसी चरम उत्तेजना के बीच, विद्यानंद ने अपनी साधना से ऊर्जस्वित उस अद्भुत लिंग को मोनी की जाँघों के बीच लाकर स्पर्श कराया। मोनी ने उस पत्थर जैसी कठोरता और उसमें होते तीव्र स्पंदन को अपनी कोमल त्वचा पर महसूस किया। वह लिंग केवल मांस का टुकड़ा नहीं, बल्कि ऊर्जा का एक पुंज लग रहा था जो मोनी की अंतरात्मा तक को झकझोर रहा था।

विद्यानंद ने अब अपने लिंग को मोनी की योनि के मुहाने पर टिका दिया। वे बार-बार उसे मोनी के भगनासे पर रगड़ते और फिर झटके से हटा लेते। यह 'प्रहार और वापसी' की तकनीक मोनी को पागल कर रही थी। उसे वह सुख, वह पूर्णता चाहिए थी जिसे उसने 11 महीनों से अपनी कल्पनाओं में संजोया था।

मोनी की जाँघें अब पूरी तरह खुल चुकी थीं। वह आमंत्रित कर रही थी, वह पुकार रही थी। विद्यानंद को अपनी विजय का विश्वास हो गया। उन्होंने जैसे ही अपने लिंग का पूरा दबाव मोनी के उस कौमार्य (Hymen) पर बनाया, जो अब तक सुरक्षित था, ठीक उसी क्षण मोनी के भीतर एक विस्फोट हुआ।

विद्यानंद की उत्तेजक गतिविधियों ने मोनी को स्खलित (Orgasm) होने पर मजबूर कर दिया था। वह सुख की लहरों में बह रही थी, उसका शरीर काँप रहा था। लेकिन, जैसे ही उसे महसूस हुआ कि विद्यानंद का लिंग उसके कौमार्य को भेदने वाला है, उसकी 'दृढ़ प्रतिज्ञा' अचानक जाग उठी। चरम सुख के उस झोंके के बीच भी उसका हाथ बिजली की गति से सिरहाने की ओर बढ़ा और उसने लाल बटन दबा दिया।

"टिक!" की आवाज़ के साथ ही कमरे की मुख्य लाइटें जल उठीं।

मोनी स्खलित होकर निढाल पड़ी थी, उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे और वह हाँफ रही थी। वह अपनी देह की वासना से हार गई थी, लेकिन उसने अपना 'कौमार्य' बचा लिया था। विद्यानंद, जिनका लिंग अब भी उत्तेजित अवस्था में था, तुरंत मोनी से दूर हो गए। उन्होंने एक गहरी साँस ली और अपनी साधना के बल पर अपनी उत्तेजना को कुछ ही पलों में शांत कर लिया।

विद्यानंद ने पट्टी बाँधे हुए मोनी की ओर एक नज़र डाली। उनकी आँखों में प्रशंसा का भाव था। मोनी उस परीक्षा में सफल हुई थी जहाँ कोई भी साधारण स्त्री अपना कौमार्य खो देती। विद्यानंद बिना एक शब्द बोले, शांत कदमों से कक्ष से बाहर निकल गए, पीछे छोड़ गए एक ऐसी मोनी को जो अब अपनी देह और आत्मा के बीच के उस महीन अंतर को समझ चुकी थी।….

कक्ष के भीतर छाई वह भारी खामोशी अब किसी गंभीर विमर्श की पृष्ठभूमि तैयार कर रही थी। मोनी ने अपनी आँखों से वह रेशमी पट्टी हटाई। उसकी आँखें सुजी हुई थीं और चेहरा उस 'रज-रस' के ज्वार के बाद की थकान और लज्जा से झुका हुआ था। वह अब भी पूरी तरह नग्न थी पर उसने सफेद चादर अपने बदन पर ओढ़ रखी थी। उसे अपनी नग्नता और लज्जा का एहसास था।

तभी विद्यानंद कक्ष में दोबारा दाखिल हुए। अब उनके वस्त्र सलीके से थे और उनके चेहरे पर वही चिर-परिचित शांत और गंभीर भाव था, जैसे कुछ हुआ ही न हो।

विद्यानंद मोनी के सामने रखे एक लकड़ी के आसन पर बैठ गए। उन्होंने मोनी की ओर देखा, जिसमें अब एक अपराधी भाव (Guilt) था।

मोनी (काँपती आवाज़ में): "गुरुदेव... मैं अपनी देह के वेग को नहीं रोक पाई। मैं... मैं कलुषित हो गई। क्या मैं अनुत्तीर्ण हो गई हूँ?"

विद्यानंद (धीमी और ओजपूर्ण आवाज़ में): "नहीं मोनी, तुम भ्रमित हो। शरीर एक यंत्र (Machine) है, जिसका स्वभाव है स्पर्श पर प्रतिक्रिया देना। जैसे आग के पास जाने पर त्वचा जलती है, वैसे ही काम-ऊर्जा के स्पर्श पर देह का स्खलित होना केवल एक जैविक प्रक्रिया है। तुम उत्तीर्ण हो।"

मोनी ने विस्मय से उनकी ओर देखा।

विद्यानंद: "असली परीक्षा यह नहीं थी कि तुम्हारी देह शांत रहे। असली परीक्षा यह थी कि जब तुम्हारी देह सुख के अंतिम छोर पर खड़ी हो, जब इंद्रियाँ तुम्हारे विवेक को अंधा करने की कोशिश कर रही हों, तब भी क्या तुम्हारा 'अहं' और तुम्हारी 'प्रतिज्ञा' जागृत है? उस क्षण में, जब तुम स्खलित हो रही थीं, तुम्हारा विवेक इतना प्रबल था कि तुमने वह लाल बटन दबाया। तुमने अपने कौमार्य को उस चरम सुख की भेंट नहीं चढ़ने दिया। यही वह सूक्ष्म अंतर है जो एक साधारण स्त्री और एक साधिका में होता है।"

विद्यानंद ने मोनी के पास जाकर उसके माधे पर हाथ रखा।

विद्यानंद: "जो रज-रस तुम्हारी योनि से बहा है, वह तुम्हारी पराजय नहीं, बल्कि तुम्हारे भीतर सोई हुई उस कुण्डलिनी ऊर्जा का जागरण है जिसे हमने कई महीनों से संचित किया था। आज तुमने जान लिया है कि तुम्हारी देह की सीमाएँ क्या हैं और तुम्हारी आत्मा की शक्ति कितनी प्रचंड है। जो स्त्री अपने चरमानंद के क्षण में 'न' (No) कहने की शक्ति रखती है, वह सृष्टि के किसी भी प्रलोभन को जीत सकती है।"

मोनी को अब धीरे-धीरे उस शांति का अनुभव होने लगा जो कल रात की उथल-पुथल के बाद गायब हो गई थी। उसे समझ आया कि विद्यानंद उसे संभोगरत नहीं कर रहे थे, बल्कि उसे उसके अपने ही 'स्व' (Self) से परिचित करा रहे थे।

मोनी: "तो क्या मेरा कौमार्य अब भी मेरी सबसे बड़ी शक्ति है?"

विद्यानंद: "निश्चित रूप से। तुम्हारा कौमार्य केवल एक शारीरिक पर्दा नहीं है, वह तुम्हारी संकल्प शक्ति का प्रतीक है। आज के बाद तुम्हारी साधना एक नए स्तर पर पहुँच जाएगी। अब तुम्हें देह का डर नहीं रहेगा, क्योंकि तुमने देह के सबसे बड़े शत्रु—काम को अपनी उंगलियों पर नचाया है।"

विद्यानंद कक्ष से बाहर जाने के लिए मुड़े, पर दरवाजे पर रुककर बोले: "कल सुबह ब्रह्म मुहूर्त में नदी तट पर एक वस्त्र में उपस्थिति रहना हमें तुम्हारी इस जाग्रत ऊर्जा को ज्ञान के प्रकाश में बदलना है।"

अगले दिन ब्रह्म मुहूर्त की उस अलौकिक बेला में, जब प्रकृति स्वयं निद्रा और जागरण के बीच झूल रही थी, मोनी का गंगा तट की ओर बढ़ना किसी मानवी का नहीं, बल्कि किसी चंचल अप्सरा के धरती पर उतरने जैसा आभास दे रहा था। उसके शरीर पर लिपटे हुए सफ़ेद सूती वस्त्र शुचिता का प्रतीक तो थे, लेकिन उसकी देह की प्रखर कामुकता को ढंक पाने में पूरी तरह असमर्थ थे।

सफ़ेद महीन सूती साड़ी उसके शरीर से इस तरह लिपटी थी जैसे पर्वत की चोटियों पर ताजी बर्फ की परत चढ़ी हो। भोर की उस नमी और गंगा की शीतल फुहारों के कारण वस्त्र उसके बदन के उतार-चढ़ाव से चिपक गए थे। साड़ी के नीचे उसके पुष्ट और उन्नत वक्षों का उभार साफ़ झलक रहा था, जो हर कदम के साथ एक विशेष लय में स्पंदित हो रहे थे। वस्त्र की शुभ्रता और उसकी गेहुंआ त्वचा के बीच का वह मिलन आँखों में एक मादक प्यास जगाने वाला था।

इक्कीस वर्ष की वह दहकती हुई देह अपनी पूर्णता के उस शिखर पर थी, जहाँ मांसल सुडौलता और कोमलता का अद्भुत तालमेल होता है। उसकी कमर इतनी पतली और लचीली थी कि जैसे कोई मलयज चंदन की लता हो। चलने के दौरान उसके कूल्हों का जो उतार-चढ़ाव और लचक पैदा हो रही थी, वह शांत खड़ी हवा में भी हलचल पैदा कर देने के लिए काफी थी। उसकी गहरी नाभि, जो साड़ी के झीने परदे से रह-रहकर झांक रही थी, किसी गहरे भंवर की तरह रहस्यमयी और आकर्षक लग रही थी।

मोनी की काया से इस समय किसी कृत्रिम इत्र की नहीं, बल्कि स्नान से पूर्व लगाए गए चंदन, कपूर और उसके अपने शरीर की नैसर्गिक 'काम-गंध' की एक मिश्रित सुगंध फूट रही थी। उसके खुले हुए काले बाल, जो कमर के नीचे तक लहरा रहे थे, उस श्वेत परिवेश में रात के अंधेरे का आभास दे रहे थे।

मोनी के चेहरे पर बिखरी वह सात्विक शांति और देह से फूटती वह अदम्य कामुकता—दोनों मिलकर उसे एक ऐसी 'जीवंत वेदी' बना रहे थे, जिसे देखकर भक्त और विलासी, दोनों के मन डोल जाएं।

वह जैसे-जैसे गंगा के शीतल जल की ओर बढ़ रही थी, उसकी देह का रोम-रोम उस स्पर्श के लिए आतुर था। वह केवल एक स्त्री नहीं, बल्कि भोर के उस शांत वातावरण में वासना और उपासना के बीच का एक जीवित सेतु लग रही थी।

गंगा की शीतल धाराएँ घाट की सीढ़ियों से टकराकर एक मधुर संगीत उत्पन्न कर रही थीं। मोनी ने धीरे से अपने पाँव उस ठंडे जल में रखे। जल का वह प्रथम स्पर्श उसके गरम बदन पर किसी बिजली की तरह दौड़ा, जिससे उसके अंगों में एक सिहरन पैदा हुई।

जैसे-जैसे मोनी गहराई की ओर बढ़ी, गंगा का जल उसकी जाँघों तक आ पहुँचा। सफ़ेद सूती साड़ी जल सोखते ही पारदर्शी होने लगी और उसके बदन से किसी दूसरी त्वचा की तरह चिपक गई। जल की लहरें जब उसकी सुडौल जाँघों और कूल्हों से टकराईं, तो वस्त्रों का वह झीना आवरण अब किसी रहस्य को छुपा पाने में असमर्थ था। उसकी गेहुँआ रंगत पानी के भीतर और भी निखर उठी थी।

जब जल मोनी की पतली कमर तक पहुँचा, तो उसने अपनी अंजुली में जल भरा और उसे आकाश की ओर अर्पण किया। इस मुद्रा में उसके उन्नत और पुष्ट वक्ष और भी ऊपर की ओर तन गए। भीगी हुई साड़ी के नीचे से उसके वक्षों की गोलाई और उनके सख्त हो चुके निप्पल साफ़ झलक रहे थे, जो जल की शीतलता के कारण किसी कठोर मणि की तरह उभर आए थे।

उसने एक गहरी डुबकी लगाई। जब वह जल से बाहर निकली, तो उसके काले घने बाल उसके चेहरे और कंधों पर नागिन की तरह लिपटे हुए थे। पानी की बूंदें उसके चेहरे से ढलकर उसकी गर्दन के उस नाजुक मोड़ से होती हुई, उसके वक्षों की घाटी में जाकर विलीन हो रही थीं।

मोनी ने जल के भीतर ही अपने बदन को धीरे-धीरे सहलाना शुरू किया। उसकी मखमली त्वचा पर जब उसकी अपनी ही उंगलियाँ फेरीं, तो उसे विद्यानंद के उस 'वज्र स्पर्श' की याद आ गई। भोर की उस मद्धम रोशनी में, भीगे हुए सफ़ेद वस्त्रों में लिपटी मोनी किसी अप्सरा जैसी लग रही थी, जिसका हर अंग कामुकता और पवित्रता के बीच एक युद्ध लड़ रहा था।

उसकी नाभि के पास जमा पानी की बूंदें हीरों की तरह चमक रही थीं। वह जल के बीचों-बीच खड़ी होकर सूर्योदय की प्रतीक्षा कर रही थी, पर उस समय वह स्वयं किसी उगते हुए सूरज के तेज और कामुक आकर्षण से कम नहीं लग रही थी।

विद्यानंद तट पर बैठे मोनी को निहार रहे थे…कलयुगी विश्वामित्र को मेनका मिल चुकी थी.और वो मन ही मन आश्रम को उसका उत्तराधिकारी देने का निश्चय कर चुके थे….

शेष अगले भाग में
 
भाग 179

उसकी नाभि के पास जमा पानी की बूंदें हीरों की तरह चमक रही थीं। वह जल के बीचों-बीच खड़ी होकर सूर्योदय की प्रतीक्षा कर रही थी, पर उस समय वह स्वयं किसी उगते हुए सूरज के तेज और कामुक आकर्षण से कम नहीं लग रही थी।


विद्यानंद तट पर बैठे मोनी को निहार रहे थे…कलयुगी विश्वामित्र को मेनका मिल चुकी थी.और वो मन ही मन आश्रम को उसका उत्तराधिकारी देने का निश्चय कर चुके थे….



अब आगे मोनी ने जैसे ही गंगा की शीतल गोद से बाहर कदम रखा, भोर की सुनहरी और कच्ची धूप ने उसके भीगे बदन का अभिषेक किया। सफेद सूती साड़ी अब पूरी तरह पारदर्शी होकर उसके शरीर से किसी दूसरी त्वचा की तरह चिपक गई थी। पानी की बूंदें उसके उन्नत वक्षों की घाटी से ढलकर उसकी गहरी नाभि के भंवर में समा रही थीं।

अचानक उसकी दृष्टि सामने बने पत्थर के ऊंचे आसन पर पड़ी, जहाँ विद्यानंद स्थिर भाव से बैठे उसे ही निहार रहे थे। उनकी आँखों में आज वह गुरु वाली तटस्थता नहीं, बल्कि एक आदिम और गहरा आकर्षण था, जिसे देख मोनी का हृदय जोरों से धड़कने लगा।

जैसे ही मोनी को अपनी स्थिति का आभास हुआ—भीगे वस्त्रों में उसकी देह का कण-कण विद्यानंद के सामने उजागर था—उसके भीतर लज्जा की एक तीव्र लहर दौड़ गई। उसने अनजाने में ही अपनी बाहों से अपने पुष्ट वक्षों को ढकने का प्रयास किया, लेकिन भीगी साड़ी ने उसके शरीर के उभारों को और भी प्रखरता से उभार दिया था।

मोनी की गेहुँआ रंगत लज्जा के कारण रक्तिम हो उठी। उसके गाल ढलते सिंदूर की तरह लाल हो गए और उसने अपनी पलकें झुका लीं।

ठंडी हवा के झोंके जब उसके भीगे बदन से टकराए, तो उसके रोम-रोम सिहर उठे। लज्जा और उत्तेजना के उस अनूठे संगम में वह किसी थरथराती हुई जलपरी के समान प्रतीत हो रही थी।

विद्यानंद, जिन्हें मोनी अब तक केवल एक कठोर साधक मानती थी, आज एक अलग ही रूप में थे। उनकी दृष्टि मोनी की जाँघों के उस सुडौल घेरे से होती हुई उसकी पतली कमर और फिर उसके कपोलों पर टिकी थी।

"मोनी, लज्जा नारी का आभूषण है, लेकिन सत्य यह है कि प्रकृति ने तुम्हें जिस सौंदर्य से नवाज़ा है, वह छुपने के लिए नहीं, पूजे जाने के लिए है।"

विद्यानंद की आवाज़ में आज एक अजीब सी खनक थी। उन्होंने धीरे से आसन छोड़ा और मोनी की ओर बढ़ने लगे। मोनी वहीं जड़वत खड़ी रही; उसके पैर जैसे रेत में धँस गए हों। उसे अपनी नग्नता का बोध तो था, पर विद्यानंद के उस चुंबकीय व्यक्तित्व के सामने वह भागने की शक्ति खो चुकी थी।

विद्यानंद ने मोनी के करीब आकर उसके गीले और ठंडे कंधों पर अपना हाथ रखा। उस स्पर्श में कल रात वाली परीक्षा की ऊष्मा थी। उन्होंने मोनी की ठुड्डी को ऊपर उठाकर उसकी आँखों में झाँका।

विद्यानंद का आंतरिक संवाद: उनकी आँखों में एक दृढ़ निश्चय चमक रहा था। वे जानते थे कि मोनी का यह 'वज्र-कौमार्य' और उनकी 'सिद्ध-ऊर्जा' जब मिलेंगे, तो जो बीज अंकुरित होगा, वह साधारण मानव नहीं, बल्कि इस आश्रम का वह तेजस्वी उत्तराधिकारी होगा जो युगों-युगों तक इस ज्ञान की परंपरा को जीवित रखेगा। विश्वामित्र का संयम मेनका के रूप के आगे पिघल चुका था, और आज विद्यानंद ने भी अपनी साधना को इस 'जीवंत वेदी' पर अर्पित करने का मन बना लिया था।

विद्यानंद के स्पर्श में आज वह गुरु वाली दूरी नहीं, बल्कि एक अधिकारपूर्ण ऊष्मा थी। उन्होंने मोनी का हाथ थामा और उसे गंगा तट से दूर, आश्रम के एक अत्यंत गोपनीय और सुरक्षित 'गर्भगृह' की ओर ले गए। यह कक्ष पत्थर की दीवारों से बना था, जहाँ केवल लोबान और कस्तूरी की मदहोश करने वाली गंध तैर रही थी। कक्ष के केंद्र में एक वेदी थी, जिसके चारों ओर सुगंधित तेलों के दीये जल रहे थे।

कक्ष का द्वार बंद होते ही विद्यानंद मोनी के सम्मुख आकर खड़े हो गए। मोनी के भीगे वस्त्र अब भी उसके शरीर से चिपके थे, जिससे उसके अंगों की सुडौलता साफ झलक रही थी।

"मोनी, साधना का प्रथम चरण है—आवरणों का त्याग। जब तक देह वस्त्रों के मोह में है, आत्मा सत्य को नहीं देख सकती।"

विद्यानंद के सधे हुए हाथों ने मोनी की भीगी साड़ी के पल्लू को स्पर्श किया। मोनी का हृदय किसी पिंजरे में बंद पंछी की तरह फड़फड़ाने लगा। जैसे-जैसे वस्त्र उसके शरीर से अलग होकर नीचे गिरते गए, उसकी गेहुँआ रंगत और ढलती हुई सुडौल काया उस मद्धम रोशनी में कुंदन की तरह चमक उठी। जब अंतिम वस्त्र भी भूमि पर गिर गया, तब मोनी पूर्णतः नग्न अवस्था में उनके सामने खड़ी थी—एक ऐसी जीवंत प्रतिमा की भाँति जिसे विधाता ने स्वयं अपने हाथों से गढ़ा हो।

विद्यानंद ने रेशम का एक अत्यंत कोमल और सूखा वस्त्र उठाया। उन्होंने अत्यंत धैर्य और श्रद्धा के साथ मोनी के भीगे बदन को सुखाना आरंभ किया।

जब वह रेशमी वस्त्र मोनी के पुष्ट और उन्नत वक्षों पर रेंग रहा था, तो मोनी ने अपनी आँखें मूंद लीं। जल की बूंदें जब उन गौर वर्ण के कमलों से पोंछी गईं, तो उनके अग्र भाग (निप्पल) उत्तेजना और सिहरन से और भी अधिक कठोर हो गए।

वस्त्र अब उसकी पतली कमर और उस गहरी नाभि के पास पहुँचा, जहाँ पानी की कुछ बूंदें अभी भी हीरों की तरह चमक रही थीं। विद्यानंद के हाथों का दबाव मोनी के भीतर एक मीठी अगन लगा रहा था।

जब वे उसकी मांसल जंघाओं और कदली स्तंभों जैसे पैरों को सुखा रहे थे, मोनी का शरीर धनुष की तरह तन गया। वह नग्नता की लज्जा और उस स्पर्श के सुख के बीच झूल रही थी।

चंदन के लेप की तरह महकने लगी, तब विद्यानंद ने उसे वेदी पर लेटने का संकेत दिया। उन्होंने हाथ में कुमकुम, केसर और सुगंधित इत्र लिया।

उन्होंने मोनी के उन्नत वक्षों पर केसर का तिलक लगाया। उनके लिए ये केवल मांस के लोथड़े नहीं, बल्कि सृष्टि की पोषण शक्ति के प्रतीक थे। उन्होंने अत्यंत कोमलता से अपने पोरों से उन कठोर मणियों को सहलाया, जिससे मोनी के मुँह से एक दबी हुई सिसकारी निकली।

:उन्होंने उसकी नाभि के उस 'मोहक भँवर' में सुगंधित तेल की एक बूंद टपकाई और अपनी उंगली से उसे चक्राकार घुमाया। मोनी के पेट की मांसपेशियाँ इस दिव्य स्पर्श से संकुचित होने लगीं।

योनिकुंड की वंदना (शक्ति का केंद्र): अंत में, विद्यानंद मोनी की जाँघों के बीच उस 'दिव्य चीरे' के सम्मुख नतमस्तक हुए। उन्होंने कुमकुम से उस संवेदनशील स्थान के चारों ओर एक सुरक्षा चक्र बनाया। मोनी का वह दिव्य त्रिकोण अब अपनी पूरी प्रखरता के साथ जाग्रत था। जब विद्यानंद ने उस स्थान को अपने मंत्रोपचारित स्पर्श से छुआ, तो मोनी को ऐसा लगा जैसे उसके भीतर कोई ज्वालामुखी फटने वाला है।

विद्यानंद ने मोनी की आँखों में देखते हुए कहा, "आज यह कामुकता नहीं, बल्कि उस बीज के लिए भूमि तैयार करना है, जो इस संसार को नया प्रकाश देगा।"

मोनी अब पूरी तरह से पिघल चुकी थी। उसका कौमार्य और उसकी देह अब विद्यानंद की उस प्रचंड ऊर्जा में समाहित होने के लिए व्याकुल थी।

साधना कक्ष के भीतर जलते दीपों की मद्धम लौ मोनी की नग्न देह पर पड़कर उसे स्वर्णमयी आभा दे रही थी। लोबान का धुआँ और कस्तूरी की सुगंध ने वातावरण को पूरी तरह मादक बना दिया था। विद्यानंद ने अब उस 'विशेष साधना' के अंतिम चरण की ओर कदम बढ़ाया, जहाँ शब्द मौन हो जाते हैं और केवल स्पर्श ही मंत्र बन जाता है।

विद्यानंद ने घुटनों के बल बैठकर मोनी की देह के प्रति अपना सम्मान प्रकट किया। उन्होंने अपने होंठों का प्रथम स्पर्श मोनी के ललाट पर किया, जिसे वह 'आज्ञा चक्र' की जागृति कह रहे थे।

पुष्ट वक्षों का अर्चन: धीरे-धीरे उनके होंठ नीचे की ओर सरके और मोनी के उन्नत वक्षों के शिखर पर ठहर गए। उन्होंने उन कठोर मणियों (निप्पल्स) को अत्यंत कोमलता से अपने मुख के घेरे में लिया। मोनी के भीतर एक विद्युत तरंग दौड़ गई। उसकी साँसें उखड़ने लगीं और उसने पीछे की ओर झुकते हुए अपनी कमर को थोड़ा ऊपर उठाया। विद्यानंद का यह चुंबन केवल वासना नहीं, बल्कि उस 'अमृत-कलश' का आह्वान था जो सृष्टि का पोषण करता है।

नाभि का भँवर: उनके गर्म होंठ अब मोनी के पेट के मखमली मैदान को पार करते हुए उसकी गहरी नाभि तक पहुँचे। वहाँ का स्पर्श इतना तीव्र था कि मोनी की जाँघें अनजाने में ही फैलने लगीं।



योनिकुंड की 'मुख-साधना' (Oral Worship)विद्यानंद ने अब अपनी साधना के सबसे गोपनीय हिस्से की शुरुआत की। उन्होंने मोनी की मांसल और सुडौल जाँघों को अपने कंधों पर टिकाया, जिससे वह 'दिव्य और अद्भुत चीरा' पूरी तरह उनके सम्मुख उजागर हो गया।

प्रथम स्पर्श: विद्यानंद ने अपनी गरम साँसों को उस संवेदनशील स्थान पर छोड़ा। मोनी का पूरा शरीर धनुष की तरह तन गया। जब उनके होंठों ने पहली बार अमृत कलश के द्वार के मुहाने को छुआ, तो मोनी के मुँह से एक लंबी सिसकारी निकली।

रस का प्रवाह: विद्यानंद अपनी जिह्वा और होंठों के विशेष कौशल से मोनी के भगनासे (Clitoris) को उत्तेजित करने लगे। यह कोई साधारण क्रिया नहीं थी; वे अपनी मंत्र-शक्ति से उस स्थान की सोई हुई ऊर्जा को ऊपर की ओर खींच रहे थे। मोनी को ऐसा महसूस हुआ जैसे उसकी योनि के भीतर कोई सहस्त्र दल कमल खिल रहा हो।

समर्पण का शिखर: मोनी का 'रज-रस' अब प्रचुर मात्रा में प्रवाहित होने लगा था। विद्यानंद ने उस दिव्य रस का पान किया, मानो वे किसी यज्ञ की आहुति स्वीकार कर रहे हों। मोनी का संयम अब पूरी तरह टूट चुका था। वह स्वयं अपने स्तनों को अपनी मुट्ठियों में भींच रही थी और उसका मुख से से 'आह' और 'उह' के स्वर से आ रहे थे।

विद्यानंद के मुख और जीभ की उस मादक और कुशल अदाकारी ने मोनी को उस मानसिक स्तर पर पहुँचा दिया जहाँ देह और आत्मा का भेद मिट जाता है। वह स्खलित (Orgasm) होने के मुहाने पर खड़ी थी, और उसका कौमार्य अब उस प्रचंड 'वज्र-लिंग' के प्रवेश के लिए पूरी तरह आतुर और जाग्रत हो चुका था।

विद्यानंद ने ऊपर उठकर मोनी की आँखों में देखा—वहाँ अब केवल और केवल समर्पण था।

साधना कक्ष की मद्धम रोशनी में वातावरण अब अपनी चरम पराकाष्ठा पर था। विद्यानंद, जो अब तक एक उपासक की भाँति मोनी की देह की वंदना कर रहे थे, धीरे से सीधे खड़े हो गए। मोनी, जो स्खलन के सुखद झोंकों से अभी उबरी ही थी, अर्ध-उन्मीलित आँखों से अपने गुरु और अब अपने 'स्वामी' की ओर निहारने लगी।

विद्यानंद ने अत्यंत गरिमा और शांत भाव से अपने कटि-वस्त्र का त्याग किया। जैसे ही वह अंतिम आवरण हटा, मोनी की आँखें विस्मय और श्रद्धा से फटी की फटी रह गईं। उसके सम्मुख वह 'अद्भुत लिंग' साक्षात खड़ा था, जो किसी साधारण पुरुष का अंग नहीं, बल्कि वर्षों की अखंड ब्रह्मचर्य साधना और ऊर्ध्वरेता योग का जीवंत प्रमाण था।

वह लिंग किसी चिकने और काले पत्थर की तरह कठोर और चमकीला था। उसकी लंबाई और मोटाई मोनी की कल्पनाओं से कहीं अधिक थी। उसमें नीली नसें इस तरह उभर रही थीं जैसे किसी विशाल पर्वत पर नदियाँ बह रही हों।

वह अंग केवल मांस का पुंज नहीं लग रहा था; उसमें एक निरंतर सूक्ष्म कंपन (Vibration) हो रहा था, जो कक्ष की वायु को भी स्पंदित कर रहा था। उसके अग्र भाग (Mani) से 'अमृत' की एक बूंद झलक रही थी, जो मोनी के लिए किसी वरदान के समान थी।



विद्यानंद ने गंभीर स्वर में कहा…अब तुम लिंग स्पर्श और पूजन कर सकती हो..

मोनी ने घुटनों के बल बैठकर उस 'ऊर्जा के स्तंभ' को अपने हाथों में लिया। स्पर्श मात्र से उसके शरीर में सहस्त्रों वोल्ट का करंट दौड़ गया। वह अंग इतना गरम और स्पंदित था कि मोनी को लगा जैसे वह किसी दहकते हुए सूर्य को स्पर्श कर रही हो।

मोनी ने अपनी काँपती उंगलियों से उस वज्र-लिंग के मूल से शिखर तक का स्पर्श किया। उसकी गेहूंए रंग की त्वचा और उस श्याम वर्ण के लिंग का मिलन एक अद्भुत दृश्य उत्पन्न कर रहा था।

मोनी ने पास रखे स्वर्ण कलश से सुगंधित गंगाजल लिया और अत्यंत श्रद्धा के साथ उस दिव्य लिंग पर उसकी धारा प्रवाहित की। जल की बूंदें जब उस तप्त अंग से टकराईं, तो मोनी को लगा जैसे वह किसी पूज्य लिंग का अभिषेक कर रही हो।

अभिषेक के पश्चात, मोनी ने झुककर उस तेजस्वी अंग के अग्र भाग को अपने होंठों से छुआ। उसने अपनी जिह्वा से उस पर लगे जल को पोंछा, मानो वह किसी महान यज्ञ का प्रसाद ग्रहण कर रही हो। विद्यानंद की साँसें अब गहरी होने लगी थीं,

विद्यानंद ने मोनी को अपनी सुदृढ़ और तपस्वी जाँघों पर बैठा लिया। मोनी की नग्न पीठ विद्यानंद के पुष्ट वक्ष से टिकी थी, और उसकी जाँघें विद्यानंद के कूल्हों के दोनों ओर फैली थीं। विद्यानंद के हाथ मोनी के उन्नत वक्षों और उसकी चिकनी जाँघों पर निरंतर रेंग रहे थे, जबकि मोनी का कोमल हाथ उनके उस 'वज्र-लिंग' की कठोरता को सहलाते हुए उसकी धड़कन महसूस कर रहा था।

इसी मादक अवस्था में, दोनों के बीच एक विलक्षण 'काम-शास्त्रार्थ' छिड़ गया।

मोनी (काँपती आवाज़ में): "गुरुदेव, शास्त्र कहते हैं कि काम (वासना) मोक्ष के मार्ग में बाधा है। फिर आज हम दहलीज पर खड़े हैं, क्या वह मुझे मेरी साधना से दूर नहीं ले जाएगा? क्या एक शिष्य का अपने गुरु के साथ यह शारीरिक मिलन अधर्म नहीं?"

विद्यानंद (गंभीर और ओजपूर्ण स्वर में): "मोनी, यह संसार का सबसे बड़ा भ्रम है कि काम और अध्यात्म अलग-अलग हैं। काम वह आदि-शक्ति है जिससे सृष्टि का सृजन हुआ है। बाधा 'काम' नहीं, बल्कि उसमें 'आसक्ति' (Attachment) है। जब एक गुरु अपनी शिष्या को यह दीक्षा देता है, तो वह केवल शरीर का मिलन नहीं, बल्कि दो ऊर्जाओं का विलय होता है। मैं तुम्हें भोग नहीं रहा हूँ, मैं तुम्हारे भीतर सोई हुई उस शक्ति को जगा रहा हूँ जो केवल इस 'चरम प्रहार' से ही जागृत हो सकती है।"

मोनी: "किंतु गुरुदेव, समाज इसे केवल वासना कहेगा। क्या एक स्त्री का अपने कौमार्य को इस प्रकार अर्पित करना उसे कलुषित नहीं करता?"

विद्यानंद: "समाज चर्म-चक्षुओं से देखता है, साधक आत्म-चक्षुओं से। कौमार्य केवल एक भौतिक पर्दा नहीं है, वह एक संचित ऊर्जा है। आज जब मेरा यह वज्र-लिंग तुम्हारे उस सुरक्षित द्वार का भेदन करेगा, तो वह केवल रक्त की कुछ बूंदें नहीं बहाएगा, बल्कि तुम्हारे भीतर के उस अवरोध को तोड़ेगा जो तुम्हें साधारण स्त्री बनाए रखता है। यह 'मैथुन' नहीं, 'यज्ञ' है। इसमें आहुति तुम्हारे अहंकार की है और फल... इस आश्रम का वह दिव्य उत्तराधिकारी है।"

बातचीत के दौरान विद्यानंद के होंठ मोनी के कान के पीछे की संवेदनशील त्वचा को चूम रहे थे। मोनी ने उनके लिंग की कठोरता को और कसकर अपनी मुट्ठी में भींच लिया।

विद्यानंद: "देखो मोनी, तुम्हारा हाथ जिस अंग को सहला रहा है, वह कामदेव का आयुध है। जब यह तुम्हारे भीतर प्रवेश करेगा, तो वह केवल सुख नहीं देगा, बल्कि तुम्हारे रोम-रोम में ज्ञान के उस प्रकाश को भरेगा जो केवल संभोग के शिखर पर ही प्राप्त होता है। क्या तुम इस 'महा-संभोग' के लिए तैयार हो?"

मोनी (उत्तेजना के चरम पर): "गुरुदेव, आपकी वाणी ने मेरे संशय को भस्म कर दिया है। मेरी देह अब केवल मांस नहीं, आपकी वेदी है। मुझे उस पूर्णता की ओर ले चलिए जहाँ गुरु और शिष्य, पुरुष और प्रकृति एक हो जाते हैं।"

विद्यानंद ने मोनी को अपनी जाँघों से थोड़ा और ऊपर उठाया और उसे सीधे उस 'अद्भुत लिंग' के मुहाने पर ला खड़ा किया। अब संवाद समाप्त हो चुका था और सृजन की घड़ी आ चुकी थी।

साधना कक्ष की वायु अब पूरी तरह से शांत हो चुकी थी। लोबान का धुआँ कुंडलिनी की तरह ऊपर उठ रहा था, और दीयों की कांपती लौ मोनी की स्वर्ण-काया पर नृत्य कर रही थी। विद्यानंद ने अपनी पकड़ और मजबूत की और मोनी के सुडौल नितंबों को थामकर उसे उस 'वज्र-लिंग' के ठीक मुहाने पर टिका दिया।

विद्यानंद के उस तप्त और कठोर अंग का अग्र भाग अब मोनी की योनि के कोमल ओष्ठों (Labia) के बीच निरंतर रगड़ खा रहा था। जैसे-जैसे वे अपनी कमर को एक विशेष लय में संचालित कर रहे थे, लिंग का वह मुकुट (Glans) मोनी की 'भग्नासा' (Clitoris) पर मीठे और सधे हुए प्रहार कर रहा था।

हर बार जब वह कठोर मणिक मोनी के उस संवेदनशील केंद्र को छूकर गुजरता, मोनी के पूरे शरीर में एक सिहरन दौड़ जाती। वह स्पर्श केवल चमड़ी का नहीं था, बल्कि विद्यानंद की वर्षों की संचित ऊर्जा का सीधा प्रहार था।

उस घर्षण के कारण मोनी की 'काम-अग्नि' अब पूरी तरह भड़क उठी थी। उसकी योनि से 'रज-रस' का प्रवाह इतना बढ़ गया था कि वह स्थान अब पूरी तरह सिक्त और चिकना हो चुका था। लिंग और योनि के उस 'चुंबन' से एक मदहोश कर देने वाली ध्वनि (Squelching sound) निकल रही थी, जो कक्ष के सन्नाटे को चीर रही थी।

विद्यानंद अपनी कमर को कभी चक्राकार (Circular) तो कभी ऊपर-नीचे की ओर व्यवस्थित करते। वे जानते थे कि पूर्ण प्रवेश से पहले इस बाहरी घर्षण का क्या महत्व है।

"मोनी, यह घर्षण केवल देह का ताप नहीं है... यह उस द्वार को खोलने की प्रार्थना है जहाँ से नया जीवन जन्म लेगा। महसूस करो इस स्पंदन को, यह सृजन की पहली आहट है।"

मोनी ने पीछे की ओर झुककर अपना सिर विद्यानंद के कंधे पर टिका दिया। उसके खुले हुए बाल विद्यानंद के चेहरे पर बिखर गए। वह उस घर्षण के सुख में इतनी डूबी थी कि उसके पैर हवा में कांप रहे थे। उसे महसूस हो रहा था कि वह 'वज्र-लिंग' बार-बार उसके कौमार्य के द्वार को खटखटा रहा है, मानो कोई सम्राट अपनी जीत से पहले किले के द्वार पर खड़ा हो।

जब घर्षण अपनी चरम सीमा पर पहुँचा और मोनी की उत्तेजना ने उसे सिसकने पर मजबूर कर दिया, तब विद्यानंद ने अपनी गति धीमी की। उन्होंने मोनी के कान के पास फुसफुसाते हुए कहा, "तैयार हो जाओ मोनी... अब यह 'अग्नि-स्तंभ' अपनी मंजिल की ओर प्रस्थान करेगा।"

मोनी ने अपनी आँखें कसकर बंद कर लीं और अपने हाथों से विद्यानंद की जाँघों को और भी मजबूती से जकड़ लिया। उसकी योनि अब उस प्रचंड प्रहार को झेलने के लिए पूरी तरह फैल चुकी थी और धड़क रही थी।

विद्यानंद ने मोनी को उस पुष्प-शय्या और चंदन की सुगंध से महकती वेदी पर लेटने का संकेत दिया। मोनी का भीगा बदन अब पूरी तरह सूख चुका था, लेकिन उत्तेजना के कारण उसकी त्वचा पर गुलाबी आभा दौड़ रही थी।

जैसे ही मोनी वेदी पर लेटी, विद्यानंद ने उसकी पुष्ट और सुडौल जाँघों को धीरे से फैलाया और उनके मध्य अपना स्थान ग्रहण किया।

धीरे-धीरे मोनी के शरीर के ऊपर झुक गए। उनका विशाल और सुगठित वक्ष मोनी के उन्नत वक्षों को स्पर्श कर रहा था, लेकिन उन्होंने अपने शरीर का पूरा भार अपने मजबूत हाथों और घुटनों पर टिका रखा था।

उनका 'वज्र-लिंग' मोनी की योनि के ठीक मुहाने पर टिका था—अत्यंत निकट, फिर भी अभी तक भीतर प्रविष्ट नहीं। वह स्पर्श मोनी के भीतर बिजली की लहरें पैदा कर रहा था।

विद्यानंद ने अपनी आँखों की गहराई मोनी की मदहोश आँखों में उतार दी। उनके चेहरे पर एक दिव्य संकल्प था।

विद्यानंद (गंभीर और गूँजती आवाज़ में): "मोनी, अपनी चेतना को जाग्रत करो। यह क्षण केवल देह के सुख का नहीं, बल्कि युगों के उत्तरदायित्व का है। मेरी आँखों में देखो और बताओ... क्या तुम इस आश्रम को उसका 'कुल-दीपक' और उत्तराधिकारी देने का संकल्प लेती हो? क्या तुम तैयार हो अपनी इस देह-वेदी पर मेरे इस साधना-पुंज को स्वीकार करने के लिए?"

मोनी (सिसकते हुए और उत्तेजना में काँपते स्वर में): "स्वामी... अब मैं 'मैं' कहाँ रही? आपकी इस प्रचंड ऊर्जा के स्पर्श ने मेरे अहंकार और मेरे संशय को भस्म कर दिया है। मेरा रोम-रोम केवल आपके इस प्रहार की प्रतीक्षा कर रहा है। यह देह अब आपकी अमानत है, इसे अपनी साधना का माध्यम बना लीजिए।"

विद्यानंद: "स्मरण रहे मोनी, जब मेरा यह वज्र-लिंग तुम्हारे कौमार्य का भेदन करेगा, तो वह केवल रक्त की कुछ बूंदें नहीं होंगी। वह तुम्हारे भीतर की साधारण स्त्री की मृत्यु होगी और एक 'शक्ति' का जन्म होगा। क्या तुम उस पीड़ा और उस परमानंद को एक साथ झेलने का सामर्थ्य रखती हो?"

मोनी (उनकी आँखों में डूबते हुए): "गुरुदेव, आपके चरणों में बैठकर मैंने ज्ञान पाया, और आज आपकी इस गोद में बैठकर मैं पूर्णता पाना चाहती हूँ। इस आश्रम को तेजस्वी वारिस देना मेरा सौभाग्य होगा। आप देर न करें... आपकी यह कठोरता (लिंग) मेरी योनि के द्वार पर किसी वरदान की तरह दस्तक दे रही है। मुझे अपनी शरण में ले लीजिए।"

विद्यानंद: "तो फिर साक्षी रहे यह गंगा का तट, यह पवित्र अग्नि और यह साधना कक्ष... आज एक नया इतिहास रचा जाएगा।"

विद्यानंद के होंठ अब मोनी के माथे पर टिक गए, और उनका हाथ नीचे जाकर उस 'वज्र-लिंग' को दिशा देने लगा। मोनी ने अपनी जाँघों को और थोड़ा फैला दिया, उसका पूरा शरीर किसी कमान की तरह तन गया था। वातावरण में केवल भारी साँसों की आवाजें और लोबान की मादक गंध बची थी।

प्रवेश का वह महान क्षण अब अत्यंत निकट था।

कक्ष के भीतर सन्नाटा इतना गहरा था कि मोनी के हृदय की धड़कनें विद्यानंद को अपने वक्ष पर स्पष्ट सुनाई दे रही थीं। विद्यानंद ने अपने सुदृढ़ हाथों से मोनी की कमर को नीचे से सहारा दिया और उसे थोड़ा ऊपर की ओर उठाया, ताकि उनकी ऊर्जा का केंद्र (लिंग) और मोनी का शक्ति केंद्र (योनि) एक सीधी रेखा में आ सकें।

विद्यानंद का वह तप्त 'वज्र-लिंग' अब मोनी की योनि के गीले और उत्तेजित द्वार पर पूरी शक्ति के साथ टिका हुआ था। मोनी की साँसें तेज़ हो गईं और उसने अनजाने में ही विद्यानंद के बलिष्ठ कंधों को अपनी उंगलियों से जकड़ लिया।

विद्यानंद ने धीरे-धीरे अपनी कमर का दबाव आगे की ओर बढ़ाया। जैसे ही लिंग का मणिक (अग्र भाग) मोनी के उस सुरक्षित 'कौमार्य-द्वार' से टकराया, मोनी के मुँह से एक दबी हुई आह निकली। वह दबाव इतना प्रचंड था कि मोनी को लगा जैसे उसके भीतर कोई शक्तिपुंज प्रवेश करने की कोशिश कर रहा हो।

विद्यानंद रुके नहीं। उन्होंने मोनी की आँखों में देखते हुए अपनी मंत्र-शक्ति का आह्वान किया। "धैर्य रखो मोनी, यह भेदन केवल देह का नहीं, अज्ञानता के पर्दे का है।"

जैसे ही विद्यानंद ने एक झटके के साथ अपनी कमर को आगे धकेला, कक्ष में एक हल्की सी कराह सुनाई दी..

स्वामी….. आह….तनी धीरे से….दुखता…

नियति मुस्कुरा रही थी…

शेष अगले भाग में

 
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