Incest आह..तनी धीरे से.....दुखाता. - Page 132 - SexBaba
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Incest आह..तनी धीरे से.....दुखाता.

शानदार पिक्स एंड सुंदर कविता

आपके लिए...

गंगा के पावन तट पर, स्वर्णिम भोर का घेरा था,

शमी-वृक्ष की छाल सा तन, तप का अमित सवेरा था।

भीगे पट में लिपटी मोनी, कंचन-सी चमक रही,

विद्यानंद की आँखों में, आदिम एक ललक जगी।

मेनका मिली विश्वामित्र को, कलियुग का यह खेल हुआ,

आश्रम के उत्तराधिकारी हेतु, दो प्राणों का मेल हुआ।

श्वेत वस्त्र जब उतर गिरे, कुंदन-सा यौवन निखरा,

मद्धम दीयों की लौ में, केसर-कस्तूरी रस बिखरा।

विद्यानंद ने कोमलता से, भीगी देह को सुखाया,

रोम-रोम सिहर उठा, जब रेशम तन पर लहराया।

उन्नत वक्षों की घाटी में, केसर का तिलक लगाया,

नाभि के गहरे भँवर में, मादक तेल टपकाया।

वज्र-लिंग सा तप का स्तंभ, साक्षात खड़ा था सम्मुख,

मोनी ने नतमस्तक हो, पाया अद्भुत ऊर्जा-सुख।

गंगाजल से किया अभिषेक, अधरों से स्पर्श दिया,

शिष्या ने गुरु-चरणों में, सर्वस्व समर्पण किया।

"यह काम नहीं, यह यज्ञ है," गुरु की वाणी गूँजी,

"देह-वेदी पर अर्पित कर, कौमार्य की संचित पूँजी।

"सृजन-घड़ी समीप खड़ी, संशय के बादल छँट गए,

मर्यादा के सारे बंधन, आज वेग में कट गए।

पुष्प-शय्या पर लेटी मोनी, जाँघों का द्वार खुला

,तप्त अंग की रगड़ से, तन का कोना-कोना घुला।

भग्नासा पर प्रहार हुए, रति-रस का स्राव बढ़ा,

साधक अपनी मंजि़ल की, अंतिम सीढ़ी आज चढ़ा।

कमर थाम कर स्वामी ने, शक्ति-केंद्र को सीधा किया,

वज्र-कठोर प्रहार ने, कौमार्य-पटल को बींध दिया।

"स्वामी... आह...तनी धीरे से." अधरों से एक कराह उठी,

दुख और सुख के संगम में, एक नई सृष्टि की राह फूटी।

भेदन केवल देह का न था, अज्ञान का पर्दा टूटा,

सिद्ध-ऊर्जा के मिलन से, दिव्य बीज का झरना फूटा।

नियति मंद-मंद मुस्काई, इतिहास नया अब लिखा गया,

आश्रम के वारिस का पथ, अंधियारे में दिखा गया।
 
भाग 180

विद्यानंद ने धीरे-धीरे अपनी कमर का दबाव आगे की ओर बढ़ाया। जैसे ही लिंग का मणिक (अग्र भाग) मोनी के उस सुरक्षित 'कौमार्य-द्वार' से टकराया, मोनी के मुँह से एक दबी हुई आह निकली। वह दबाव इतना प्रचंड था कि मोनी को लगा जैसे उसके भीतर कोई शक्तिपुंज प्रवेश करने की कोशिश कर रहा हो।

विद्यानंद रुके नहीं। उन्होंने मोनी की आँखों में देखते हुए अपनी मंत्र-शक्ति का आह्वान किया। "धैर्य रखो मोनी, यह भेदन केवल देह का नहीं, अज्ञानता के पर्दे का है।"

जैसे ही विद्यानंद ने एक झटके के साथ अपनी कमर को आगे धकेला, कक्ष में एक हल्की सी कराह सुनाई दी..


स्वामी….. आह….तनी धीरे से….दुखता…

अब आगे…

इस अवस्था में विद्यानंद जैसे इंद्री विजेता का भी वापस लौटना संभव न था…उन्होंने अपना दबाव बढ़ाया और…

मोनी का वह 'वज्र-कौमार्य' (Hymen) उस प्रचंड प्रहार के सामने ढह गया।

मोनी की आँखों से आँसू की एक बूंद ढलक कर उसके कपोलों पर आ गिरी, लेकिन उसके अधरों पर एक अजीब सी मुस्कान थी। वह दर्द असहनीय था, पर उस दर्द के पीछे छिपा हुआ सुख और भी गहरा था।

विद्यानंद ने महसूस किया कि उस प्रचंड प्रहार के बाद मोनी का शरीर केवल पीड़ा से नहीं, बल्कि एक अनजाने संकोच से भी कांप रहा है। उन्होंने अपनी गति थाम ली और मोनी के माथे पर आए पसीने की बूंदों को अपनी उंगलियों से पोंछा।

विद्यानंद का स्वर अब पहले से कहीं अधिक कोमल और आत्मीय हो गया था। उन्होंने मोनी की आँखों में झाँकते हुए पूछा, " तुम्हारी कराह यह संकेत कर रही है कि तुम्हारी मातृभाषा भोजपुरी है। मोनी, मुझे बताओ, तुम्हारे पीछे कौन सी स्मृतियां छूट गई हैं? तुम्हारा कुल, तुम्हारा परिवार... उस मिट्टी के बारे में बताओ जहाँ से तुम इस आश्रम तक पहुँची हो।"

मोनी ने एक लंबी और थरथराती हुई सांस ली। विद्यानंद की बाहों के घेरे में खुद को सुरक्षित महसूस करते हुए वह धीरे-धीरे अपने अतीत के पन्ने खोलने लगी।

सीतापुर की स्मृतियाँ: "स्वामी, मेरा जन्म बनारस के पास सीतापुर के उस अंचल में हुआ जहाँ गंगा की लहरें खेतों को सींचती हैं। मेरे पिता आर्मी में थे, लेकिन मेरी माँ, पदमा, ने हमेशा मुझे मर्यादा और भक्ति का पाठ पढ़ाया।"

जैसे-जैसे मोनी बोलने लगी, उसकी आवाज़ में अपनी बहन के लिए ममता उभर आई। "मेरी एक बड़ी बहन है, सुगना। उसका विवाह सलेमपुर के एक प्रतिष्ठित परिवार में हुआ है। उनके ससुर, सरयू सिंह, पूरे इलाके में अपने रसूख और कड़े नियमों के लिए जाने जाते हैं।"

जब मोनी ने सलेमपुर' और 'सरयू सिंह' का नाम लिया, तो विद्यानंद के चेहरे पर एक क्षणिक कंपन हुआ। उनकी आँखों में स्मृतियों का एक तूफान उठा और शांत हो गया। उन्होंने गहरे स्वर में पूछा, "तो तुम सरयू सिंह के परिवार से संबंध रखती हो? उनकी पुत्रवधू की छोटी बहन..."

मोनी ने सिर झुका लिया। "हाँ स्वामी। मैं उनके भाई की पुत्रवधू की बहन लगती हूँ। और आज जब मैं आपकी इस 'शरण' में हूँ, तो मेरा मन अचानक उस लोक-लाज और मर्यादा की ओर चला गया।

सुगना का नाम सुनते ही विद्यानंद को पिछले बनारस महोत्सव में हुई उससे मुलाकात याद आ गई..

सुगना…..आह….उस समय की सुगना को याद करना मतलब वासना में डुबकियां लगाना…न जाने सुगना में कैसा आकर्षण था कि हर पुरुष जिसमें विधाता ने थोड़ी भी कामुकता दी थी उन्हें वो साक्षात रति दिखाई पड़ती थी….विद्यानंद को भली भांति ज्ञात था कि सरयू सिंह अविवाहित थे पर वह यह भी जानते थे कि सुगना और सरयू सिंह ने पाप किया है।

विद्यानंद के मुख से अचानक निकला.. सरयू तो मेरा छोटा भाई है..

मोनी के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा…पर अब पहचान उजागर हो चुकी थी..

मोनी ने महसूस किया कि जिस पुरुष के लिंग को अपनी योनि में अर्ध समाहित किए हुए वह वेदी पर नग्न लेटी हुई है वह पुरुष कोई और नहीं उसकी बहन सुगना के ससुर हैं मोनी शर्म से पानी पानी हो गई उसकी पलकें बंद होने लगी उसने विद्यानंद से प्रश्न किया….अपनी बहन के ससुर से संभोग क्या पाप नहीं है?

विद्यानंद जो मोनी पर पूरी तरह आसक्त हो चुके थे और आज इस मिलन को पूर्ण करना चाहते थे उन्होंने मोनी के गालों को थामकर उसे अपनी ओर उन्मुख किया। उनका स्वर अब गूँजता हुआ और ओजपूर्ण था:

"मोनी, संन्यास का अर्थ ही है—अस्तित्व की अंत। जिस क्षण मैंने भगवा धारण किया, सलेमपुर और सीतापुर के सारे भौतिक संबंध उसी गंगा में विसर्जित हो गए। आज मैं सरयू सिंह का कोई संबंधी नहीं, बल्कि उस परम ऊर्जा का वाहक हूँ जिसे तुम्हें ग्रहण करना है।"


"यह शरीर मात्र एक मिट्टी का बर्तन है। इसमें लगा 'रिश्तों का ठप्पा' केवल संसार के लिए है। साधना के इस स्तर पर तुम केवल एक 'क्षेत्र' (भूमि) हो और मैं 'बीज' "जब अग्नि में आहुति दी जाती है, तो यह नहीं देखा जाता कि लकड़ी किस पेड़ की है। आज तुम्हारा समर्पण और मेरी तपस्या ही एकमात्र सत्य है। इस आश्रम को एक तेजस्वी उत्तराधिकारी देना किसी भी सामाजिक मर्यादा से कहीं ऊँचा धर्म है।"

विद्यानंद की बातों ने मोनी के भीतर के अंतिम संशय को भी भस्म कर दिया। उसे महसूस हुआ कि विद्यानंद का वह 'वज्र-लिंग' अब उसके भीतर और भी अधिक उष्णता और अधिकार के साथ धड़क रहा है।

मोनी ने अपनी आँखें मूंद लीं और अपनी जाँघों को पूरी तरह ढीला छोड़ते हुए कहा, "स्वामी, अब न कोई कुल है, न कोई रिश्ता। मैं केवल आपकी हूँ। इस यज्ञ को पूर्ण कीजिये।"

विद्यानंद ने एक गहरी और सधी हुई सांस ली दिमाग में सुगना घूमने लगी..विद्यानंद सुगना की वासना के आगोश में आ गए। संवाद समाप्त हो चुका था । उन्होंने मोनी के नितंबों को मजबूती से ऊपर उठाया और उस 'अग्नि-स्तंभ' को पुनः उस 'योनिकुंड' की गहराई में उतारने की तैयारी की, जहाँ अब केवल वासना का राज था और सृजन का महानाद गूँजने वाला था।

मोनी की योनि की दीवारें उस 'वज्र-अंग' की मोटाई और कठोरता को सहने के लिए फैल रही थीं। रक्त की कुछ पवित्र बूंदें उस संगम स्थल से रिसकर सफेद फूल पर पर एक तिलक की भांति अंकित हो गईं—यह प्रमाण था कि 'मेनका' ने स्वयं को 'विश्वामित्र' को पूर्णतः सौंप दिया है।

विद्यानंद कुछ क्षणों के लिए स्थिर हो गए ताकि मोनी की देह उस 'विशाल अंग' को पूरी तरह स्वीकार कर सके। जब उन्होंने देखा कि मोनी की सिसकियाँ अब सुख की आहों में बदल रही हैं, तो उन्होंने अपनी गति बढ़ानी शुरू की।

अब हर प्रहार के साथ वह 'वज्र-लिंग' मोनी की गहराइयों को नाप रहा था। कक्ष में मांस से मांस के टकराने की 'चप-चप' की आवाज़ गूँजने लगी।

विद्यानंद का पसीना मोनी की छाती पर टपक रहा था, जो दो शरीरों के बीच घर्षण को और भी मादक बना रहा था। मोनी अब पूरी तरह लय में थी; वह स्वयं अपनी कमर को ऊपर उठाकर विद्यानंद के हर प्रहार का स्वागत कर रही थी।

विद्यानंद (हाँफते हुए): "महसूस करो मोनी... यह बीज... यह तपस्या... अब तुम्हारे भीतर अंकुरित होने के लिए व्याकुल है!"

मोनी का शरीर अब धनुष की तरह मुड़ चुका था, उसके पैर विद्यानंद की पीठ पर कसे हुए थे। वह उस 'चरम सुख' की ओर बढ़ रही थी जहाँ देह की सीमाएँ समाप्त हो जाती हैं और केवल आत्मा का नग्न सत्य शेष बचता है।


विद्यानंद के अंतर्मन में एक अजीब सा द्वंद्व और उत्तेजना का ज्वार उठ रहा था। मोनी द्वारा बताए गए पारिवारिक सूत्रों—सलेमपुर, सीतापुर, और सरयू सिंह के नाम ने उनके मस्तिष्क में स्मृतियों की एक बिजली सी दौड़ा दी थी।

जैसे-जैसे मोनी की सिसकारियां और देह का कंपन बढ़ता जा रहा था, विद्यानंद के भीतर एक निषिद्ध विचार बार-बार कौंध रहा था।

विद्यानंद, जो अब तक स्वयं को केवल एक 'गुरु' और 'योगी' मानकर इस क्रिया को एक 'यज्ञ' का नाम दे रहे थे, अब एक गहरी मानवीय और जटिल उत्तेजना के वशीभूत हो रहे थे।

उनके मन में यह बात पत्थर की लकीर की तरह उभर आई कि वे जिस युवती की देह का मर्दन कर रहे हैं, वह सामाजिक और पारिवारिक दृष्टि से उनके अपने कुल की पुत्रवधू के समान है। सरयू सिंह के परिवार से जुड़ाव ने मोनी को उनके लिए 'शिष्या' से कहीं अधिक 'आत्मीय' और 'मर्यादित' बना दिया था।


कहते हैं कि मर्यादा का उल्लंघन ही काम-अग्नि को सबसे अधिक प्रज्वलित करता है। विद्यानंद को इस विचार ने अंदर तक झकझोर दिया कि वे अपनी ही कुल-परंपरा की एक कली का भेदन कर रहे हैं। यह 'अधर्म' का सूक्ष्म आभास उन्हें ग्लानि देने के बजाय उनकी कामुकता को कई गुना बढ़ा रहा था।

इस विचार के आते ही विद्यानंद का वह 'वज्र-लिंग' पत्थर से भी अधिक कठोर और तप्त हो उठा। उनकी नसों में दौड़ता रक्त अब एक जंगली वेग ले चुका था।

"मोनी... तुम केवल एक शिष्या नहीं हो। तुम उस मिट्टी का अंश हो जिसे मैंने त्यागा था, और आज वही मिट्टी मेरी इस अग्नि को शांत करने आई है।"

विद्यानंद के हाथों की पकड़ मोनी की जाँघों और नितंबों पर और भी क्रूर और मजबूत हो गई। उन्होंने उसकी आँखों में देखते हुए, अपनी कमर के दबाव को और भी अनियंत्रित वेग से आगे बढ़ाया।

मोनी, जो अभी तक केवल पीड़ा और समर्पण के बीच झूल रही थी, ने विद्यानंद के शरीर में आए इस अचानक बदलाव को महसूस किया। उनकी साँसें अब किसी धौंकनी की तरह चल रही थीं और उनका हर प्रहार अब किसी 'मंत्र' की तरह नहीं, बल्कि एक 'अधिपति' के दावे की तरह था।

विद्यानंद के मन में चल रहा यह 'काम-शास्त्रार्थ' अब अपने चरम पर था:

एक ओर संन्यास का अहंकार जो हर रिश्ते को शून्य मानता था। दूसरी ओर वह आदिम पुरुष जो अपनी ही कुल-मर्यादा के 'अंग' को भोगने की उत्तेजना में पागल हो रहा था।

जैसे-जैसे वे मोनी के 'योनिकुंड' की गहराइयों को नाप रहे थे, उनके मस्तिष्क में सरयू सिंह का चेहरा और सलेमपुर की गलियां धुंधली होती जा रही थीं, और केवल मोनी की वह सिसकती हुई देह ही एकमात्र ब्रह्मांड बची थी।

विद्यानंद ने अब अपनी गति को उस स्तर पर पहुँचा दिया जहाँ शब्द, रिश्ते और मर्यादाएँ—सब उस देह-वेदी पर स्वाहा होने के लिए तैयार थे। उन्होंने मोनी के कानों में फुसफुसाते हुए उसे और भी कसकर भींच लिया, मानो वे उस 'पुत्रवधू' समान देह को अपने भीतर पूरी तरह आत्मसात कर लेना चाहते हों।

साधना कक्ष की हवा अब लोबान और कस्तूरी की सुगंध से नहीं, बल्कि दो शरीरों के मिलन से उपजी तीखी, आदिम गंध से भारी हो चुकी थी। विद्यानंद के भीतर का संयम मर्यादा के उल्लंघन की उस निषिद्ध उत्तेजना में पूरी तरह स्वाहा हो चुका था। मोनी की देह, जिसे उन्होंने 'पुत्रवधू समान' माना था, अब उनके लिए केवल एक 'योनिकुंड' नहीं, बल्कि उनकी अपनी दबी हुई, प्रचंड कामुकता को शांत करने वाली एक मादक मदिरा बन गई थी।

विद्यानंद ने मोनी के दोनों पैरों को मोड़कर उसके वक्षों तक सटा दिया, जिससे उसकी योनि का वह 'दिव्य त्रिकोण' पूरी तरह उनके सम्मुख उजागर हो गया। यह मुद्रा न केवल मिलन को गहरा कर रही थी, बल्कि मोनी की नग्नता को और भी लाचार और कामुक बना रही थी।

विद्यानंद ने अपनी कमर को एक जंगली हाथी के वेग से संचालित करना शुरू किया। उनका वह 'वज्र-लिंग' अब मोनी के भीतर किसी भाले की तरह उतर रहा था, हर बार उसकी गहराई को नापते हुए। कक्ष में मांस से मांस के टकराने की 'चप-चप' की ध्वनि अब किसी उन्मादी संगीत की तरह गूँज रही थी।


मोनी के मुख से निकलने वाली सिसकारियां अब सुख और पीड़ा के घालमेल से एक लंबी, टूटी हुई 'आह-उह' की रट बन गई थी।

विद्यानंद के मस्तिष्क में सरयू सिंह और सीतापुर का विचार उनकी उत्तेजना को कई गुना बढ़ा रहा था। उन्होंने झुककर मोनी के सूजे हुए होंठों को अपने दांतों के बीच भरा और उसे बेरहमी से चूसने लगे। मोनी ने दर्द से कसमसाते हुए अपनी कमर को और ऊपर उठाया, जिससे विद्यानंद का लिंग उसके भीतर और भी गहराई तक धँस गया।

"हाँ मोनी... महसूस करो इस अधर्म के सुख को। यह आग, जो तुम्हें और मुझे जला रही है, यही सृष्टि का आदि-सत्य है। समाज और मर्यादा केवल कमजोरों के लिए हैं, हम जैसे साधकों के लिए नहीं!"

विद्यानंद ने एक हाथ नीचे ले जाकर मोनी के भगनासे (Clitoris) को अपनी उंगलियों से निर्दयता से मसलना शुरू किया। लिंग के गहरे प्रहार और उंगलियों के उस तीखे स्पर्श ने मोनी को पागलपन की कगार पर पहुँचा दिया। उसका पूरा शरीर धनुष की तरह तन गया, उसकी आँखें चढ़ गईं और उसके हाथ विद्यानंद के कंधों को नोचने लगे।

साधना अब अपने उस बिंदु पर पहुँच चुकी थी जहाँ देह और आत्मा का भेद मिट जाता है। विद्यानंद ने महसूस किया कि मोनी की योनि की मांसपेशियाँ अब उनके लिंग को जकड़कर थरथरा रही हैं—यह संकेत था कि 'योनिकुंड' अपनी आहुति लेने के लिए तैयार है।

विद्यानंद ने अपनी कमर को एक अंतिम, प्रचंड वेग दिया। मोनी के मुँह से एक तीखी चीख निकली और उसका पूरा शरीर एक झटके के साथ ढीला पड़ गया। वह अपने सुख के शिखर से टकराकर शून्य में खो गई।

ठीक उसी क्षण, विद्यानंद के भीतर का वह संचित 'ब्रह्मचर्य' एक भीषण विस्फोट के साथ फूट पड़ा। उनका 'सिद्ध-वीर्य' मोनी की गहराइयों में किसी गरम, गाढ़े झरने की तरह प्रवाहित होने लगा। उन्होंने मोनी के ऊपर गिरते हुए उसे और भी कसकर भींच लिया, मानो वे उस निषिद्ध देह को अपने भीतर पूरी तरह आत्मसात कर लेना चाहते हों।

साधना कक्ष में अब केवल दो शरीरों के हाँफने की आवाज़ और उस गहरे, आदिम मिलन की गंध शेष थी। मर्यादा हार चुकी थी, धर्म जल चुका था, और केवल एक ही सत्य शेष था—सृजन का वह भीषण और आनंदमयी संघर्ष।

महा-स्खलन के उस भीषण वेग के बाद साधना कक्ष में एक भारी और मादक सन्नाटा पसर गया। विद्यानंद का विशाल और पसीने से तर-बतर शरीर मोनी की कोमल देह पर भार बनकर टिका था। दोनों की साँसें किसी धौंकनी की तरह चल रही थीं। मोनी की बंद आँखों के कोरों से अब भी तृप्ति के आँसू बह रहे थे, जो उसके गालों पर जमे पसीने के साथ मिल रहे थे।

विद्यानंद ने धीरे से अपना सिर ऊपर उठाया। उनकी आँखों में अब वह आदिम उन्माद शांत हो चुका था, लेकिन उसकी जगह एक गहरा, 'अधिपति' वाला भाव आ गया था। उन्होंने अपने उस 'वज्र-लिंग' को मोनी की सिक्त गहराई से अभी बाहर नहीं निकाला था; वे उस गर्म जुड़ाव को, उस 'पुत्रवधू' समान देह के भीतर अपनी विजय के प्रमाण को कुछ और क्षण महसूस करना चाहते थे।

जैसे ही विद्यानंद ने स्वयं को थोड़ा पीछे खींचा, मोनी की योनि के द्वार से उनके गाढ़े 'सिद्ध-वीर्य' और मोनी के 'रज-रस' का एक मिश्रित श्वेत प्रवाह धीरे से रिसकर वेदी के सफेद पुष्पों पर गिरने लगा। वह दृश्य किसी पवित्र यज्ञ की अंतिम आहुति के समान था।

विद्यानंद ने अपने हाथ नीचे ले जाकर मोनी की जाँघों के बीच फैले उस तरल को अपनी उंगलियों पर लिया। उन्होंने उस 'अमृत' को मोनी की नाभि और उसके उन्नत वक्षों पर एक तिलक की भांति लगाया। और बोला "मोनी... देखो, तुम्हारी कोख ने आज उस ऊर्जा को स्वीकार कर लिया है जिसे पाना हर स्त्री का सौभाग्य होता। हमने आज सलेमपुर की मर्यादा को हरा दिया पर इस आश्रम का भविष्य जीत गया।"

मोनी अभी भी उस सुखद झटके (Afterglow) से पूरी तरह उबर नहीं पाई थी। उसका शरीर अभी भी रुक-रुक कर सिहर रहा था। उसने अपनी कांपती उंगलियों से विद्यानंद की चौड़े सीने को सहला रही थी। उसकी आवाज़ अब और भी भारी और भर्राई हुई थी।

"स्वामी... मुझे लग रहा है जैसे मेरा पुराना अस्तित्व कहीं मिट गया है। आपकी उस प्रचंडता ने मुझे भीतर तक झकझोर दिया है। क्या मैं अब भी वही मोनी हूँ, या आपकी इस वेदी की कोई भस्म?"

विद्यानंद ने झुककर उसके माथे को चूमा। "तुम अब इस कुल की 'आधार-शक्ति' हो। आज से तुम्हारा शरीर केवल मांस नहीं, वह पात्र है जिसमें एक दिव्य आत्मा आकार लेगी।"

तुमने मेरे वज्र के वेग को धारण लिया इसलिए आज से तुम्हारा नाम “वज्र नंदिनी” होगा…मोनी के कानों में यह शब्द गूंजने लगे…

विद्यानंद अब धीरे से अलग हुए। जैसे ही वह 'वज्र-अंग' मोनी के भीतर से बाहर निकला, मोनी को एक अजीब सा सूनापन महसूस हुआ। कक्ष की ठंडी हवा जब उसकी आंतरिक दीवारों से टकराई, तो वह एक बार फिर सिहर उठी।

विद्यानंद ने पास रखे स्वर्ण कलश से सुगंधित जल लिया और स्वयं अपने हाथों से मोनी की देह का अभिषेक करना शुरू किया। वे जानते थे कि अब संवाद का समय समाप्त हो चुका है और अब केवल उस 'बीज' के संरक्षण का समय है जिसे उन्होंने अभी-अभी रोपा था।

दीयों की लौ अब धीमी हो रही थी, लेकिन उस कक्ष के भीतर एक नए युग की आहट सुनाई दे रही थी। मर्यादा और रिश्तों के बंधन उस बिस्तर पर बिखरे हुए उन सफेद फूलों की तरह कुचले जा चुके थे, जिनकी खुशबू अब उस निषिद्ध मिलन की गंध में विलीन हो गई थी।

स्मृतियां बुलबुले की तरह होती हैं किसी भी आहट से व्यक्ति अपनी यादों से वर्तमान में लौट आता है। मोनी भी अपने वर्तमान में लौट आई।

विद्यानंद के कक्ष में पसरा हुआ वह गहरा सन्नाटा अब धीरे-धीरे टूटने लगा था। धूपदानी से निकलता हुआ चंदन का धुआं हवा में स्थिर था, जैसे समय ठहर गया हो। तभी विद्यानंद की बंद पलकों में हल्की सी हरकत हुई और उन्होंने एक लंबी, शांत सांस लेकर अपनी आंखें खोलीं। उनकी सूक्ष्म साधना पूर्ण हो चुकी थी। उनकी दृष्टि सीधी मेज पर पड़ी, जहां मोनी (वज्रनंदिनी) अभी भी उस अखबार को थामे हुए स्मृतियों के भंवर में खोई थी।

विद्यानंद की गंभीर और भारी आवाज ने कक्ष की शांति को भंग किया।

"नंदिनी... स्मृतियों का मोह त्यागना ही परम सत्य की ओर पहला कदम है।"

मोनी जैसे किसी गहरी नींद से झटके के साथ जागी। उसने हड़बड़ाहट में अपनी उंगलियां अखबार की उस तस्वीर से हटाईं, जिस पर सूरज का चेहरा चमक रहा था। उसके चेहरे पर आए उस क्षणिक विचलित भाव को विद्यानंद की पारखी नजरों ने भांप लिया था, पर उन्होंने कुछ कहा नहीं। मोनी ने तुरंत खुद को संभाला और श्रद्धा से सिर झुका लिया।

"क्षमा करें भगवन, बस अतीत की कुछ परछाइयां वर्तमान के उजाले में बाधा बन रही थीं," मोनी ने धीमी आवाज में कहा।

अभी उनकी बात पूरी ही हुई थी कि कक्ष के भारी कपाट धीरे से खुले और परमानंद ने भीतर प्रवेश किया।

परमानंद के कदम जमीन पर पड़ते ही एक अजीब सी ऊर्जा का संचार हुआ। वह अभी-अभी अपनी दैनिक शस्त्र और योग साधना से निवृत्त होकर आया था। उसके 18 वर्षीय शरीर पर पौरुष और तपस्या का अद्भुत मेल था। कमर के नीचे बंधा हुआ श्वेत कटी-वस्त्र (धोती) और कंधे पर पड़ा हुआ अंगवस्त्र उसकी सुडौल और बलिष्ठ देह को और भी प्रभावशाली बना रहा था। उसकी चौड़ी छाती और मार्शल आर्ट्स के अभ्यास से कसी हुई जंघाएं उसकी शारीरिक सुदृढ़ता की गवाही दे रही थीं।

उसके माथे पर लगा चंदन का तिलक और उसकी तीखी, तेजस्वी आंखें किसी प्रतापी ऋषि कुमार की भांति प्रतीत हो रही थीं।

परमानंद ने झुककर विद्यानंद और फिर अपनी गुरु माता वज्रनंदिनी के चरण स्पर्श किए। उसके चेहरे पर एक अलौकिक शांति थी, पर उसकी देह से निकलने वाला तेज किसी को भी विचलित करने के लिए पर्याप्त था।

परमानंद (विनीत स्वर में): "भगवन, महोत्सव के प्रस्थान की घड़ी निकट आ रही है। मेरी जिज्ञासा और उत्साह, दोनों ही सीमा पार कर रहे हैं। क्या बनारस वास्तव में उतना ही दिव्य है जैसा मैंने सुना है?"

विद्यानंद ने परमानंद के बलिष्ठ कंधे पर हाथ रखा। उन्हें अपने इस 'उत्तराधिकारी' पर गर्व था, जिसकी रग-रग में उन्होंने स्वयं ज्ञान और शक्ति का संचार किया था।

विद्यानंद: "बनारस केवल एक नगर नहीं है पुत्र, वह सत और असत के मिलन की भूमि है। वहां तुम्हें अपनी मेधा का परिचय देना है। पर याद रहे, वहां की गलियां जितनी पावन हैं, उतनी ही मोहक भी। तुम्हें अपनी इंद्रियों पर वैसा ही नियंत्रण रखना होगा जैसा इस आश्रम की दीवारों के भीतर रहा है।"

मोनी ने मौन रहकर अपने पुत्र को निहारा। यद्यपि यह बात आश्रम में विद्यानंद और मोनी के अलावा कोई नहीं जानता था कि परमानंद उनका ही पुत्र है यहां तक कि परमानंद भी नहीं। एक ओर अखबार में छपा वह सुगना पुत्र 'सूरज' था जो विज्ञान की दुनिया का विजेता था, और दूसरी ओर उसके सामने खड़ा उसका अपना 'परमानंद', जो आध्यात्मिक जगत का उदय होता सितारा था। दोनों ही विलक्षण थे, दोनों ही अपनी-अपनी दुनिया के 'सूरज' थे।

मोनी के मन में एक ही सवाल कौंध रहा था—क्या बनारस की धरती पर इन दो सूर्यों का मिलन कोई नया इतिहास लिखेगा या किसी पुराने रहस्य की चिता जलाएगा?

विद्यानंद ने आदेशात्मक मुद्रा में कहा, "तैयारी करो नंदिनी। कल भोर की पहली किरण के साथ हमारा काफिला काशी की ओर कूच करेगा। परमानंद, तुम्हारी परीक्षा अब शुरू होने वाली है।"

परमानंद ने हाथ जोड़कर आज्ञा स्वीकार की, पर उसकी आंखों में छिपी वह नई चमक बता रही थी कि वह केवल महोत्सव के लिए नहीं, बल्कि अपनी नियति से साक्षात्कार करने के लिए व्याकुल है।

शेष अगले भाग में..
 
कृपया स्पष्ट्र करे मै आपकी बात पूरी तरह समझ नहीं पाया
 
सुगना किसी मर्यादा की वजह से नहीं अपित यू इस पाप के बोझ को अपने जेहन से नहीं उतार पा रही है की उसने अपने ही पिता के साथ संभोग किया है वह भी एक बार नहीं कई बार बारंबार शायद यही पाप ही उनके अंत का कारण भी बना।

सुगना कुटुंबी सेक्स संबंधों में विश्वास नहीं रखती शायद इसीलिए जब तक वह यह नहीं जान गई कि सोनू उसका अपना भाई नहीं है तब तक उसने सोनू से संबंध नहीं बनाए हां उसके पुरुषत्व की रक्षा करने के लिए उसने उसका हस्तमैथुन जरूर किया था।

पर देखते हैं अब सुगना जो इस समय बेहद खुश है क्योंकि उसका बेटा डॉक्टर बन चुका है और यह खुशी उसकी वासना को वापस जगा पाती है या नहीं
 
भाग 181

मोनी के मन में एक ही सवाल कौंध रहा था—क्या बनारस की धरती पर इन दो सूर्यों का मिलन कोई नया इतिहास लिखेगा या किसी पुराने रहस्य की चिता जलाएगा?



विद्यानंद ने आदेशात्मक मुद्रा में कहा, "तैयारी करो नंदिनी। कल भोर की पहली किरण के साथ हमारा काफिला काशी की ओर कूच करेगा। परमानंद, तुम्हारी परीक्षा अब शुरू होने वाली है।"



परमानंद ने हाथ जोड़कर आज्ञा स्वीकार की, पर उसकी आंखों में छिपी वह नई चमक बता रही थी कि वह केवल महोत्सव के लिए नहीं, बल्कि अपनी नियति से साक्षात्कार करने के लिए व्याकुल है।

अब आगे...


आईए अब आपको बनारस लिए चलते हैं जहां सोनी और सूरज के बीच की आग अब धधकने लगी थी।

हवेली की चहारदीवारी के भीतर अब एक ऐसा रहस्य पनप रहा था, जिसकी गंध सुगना की नाक तक तो पहुँच रही थी, पर उसकी गहराई तक उसकी कल्पना भी नहीं जा सकती थी।

अगले कुछ दिनों तक हवेली का वातावरण किसी बुझे हुए अलाव जैसा रहा—ऊपर से शांत, पर भीतर ही भीतर दहकता हुआ। सोनी और सूरज दोनों एक दूसरे के लिए तड़प रहे थे परंतु सोनी सूरज से सुरक्षित दूरी बनाए हुए थी। वह भूलकर भी उसके कमरे में नहीं जाती और अक्सर सुगना के साथ साथ ही रहती ताकि सूरज एकांत पाकर उससे वह सब बातें ना करें। परंतु सूरज हमेशा एकांत का मौका ढूंढता और सोनी के करीब आने की कोशिश करता।

दोपहर का वक्त था। सुगना मंदिर गई हुई थी। सोनी रसोई में खड़ी सब्ज़ी काट रही थी। पसीने की एक नन्ही बूँद उसकी गर्दन से फिसलकर ब्लाउज के भीतर समा रही थी। तभी उसे अपने पीछे किसी की मौजूदगी का अहसास हुआ। बिना मुड़े ही उसकी धड़कनें तेज़ हो गईं।

सूरज (सोनी के ठीक पीछे खड़े होकर, उसकी गर्दन के पास फुसफुसाते हुए): "मौसी... आज रसोई में गर्मी कुछ ज़्यादा ही है, या फिर यह आग कहीं और से लग रही है?"

सोनी ने झटके से पलकें मूँद लीं। सूरज के शरीर की गर्माहट उसे अपनी पीठ पर महसूस हो रही थी।

सोनी (काँपती आवाज़ में): "सूरज... जा यहाँ से। बदमाशी मत कर सुगना दीदी आती ही होंगी।"

सूरज (एक कदम और करीब आते हुए): बदमाशी ? जिसे आपने 'पुरुषत्व का वरदान' दिया, वह अब अपनी देवी से बदमाशी करेगा? वो तो उसके दर्शन का प्यासा है?

तो ले दर्शन कर …सोनी ने मुस्कुराते हुए कहा..

मौसी के रूप में नहीं वो तो देखता ही रहता हूं मुझे आपको उसी देवी के रूप में देखना है… जिस रूप में आपने मुझे पुरुषत्व का वरदान दिया था..सूरज ने पूरी संजीदगी से अपनी बात रख दी।

सोनी यह सोच कर शर्म से लाल हो गई कि सूरज उसे नग्न अवस्था में देखना चाह रहा है….

सूरज उस रात जो हुआ था वह एक बार की बात थी हमारे बीच यह ठीक नहीं है …सोनी ने अपनी भावनाओं पर काबू रखते हुए सूरज को समझाने की कोशिश की…

“मौसी मेरी आंखें अब भी आपके उसे दिव्य रूप को देखने के लिए तरसती हैं और उस रात जो महोघनी की गाँठ मैंने देखी थी... वह आज भी मेरे ख्वाबों में धड़क रही है।"

महोगनी की गांठ ? वो क्या है..

सोनी ने सब्जी काटते हुए ही पूछा….शायद सोनी को इस उपमा की जानकारी न थी।

सूरज ने हिम्मत जुटाई और बोला..

वो अद्भुत दहलीज जहां मेरे पुरुषत्व की परीक्षा हुई थी..

सोनी सन्न रह गई। हे भगवान तो सूरज उसकी मुनिया ( बुर) देखना चाह रहा है…

सोनी ने मुड़कर उसे डांटना चाहा, पर जैसे ही वह घूमी, वह सीधे सूरज के चौड़े सीने से जा टकराई। सूरज ने बड़ी ढिठाई से सोनी के हाथ से चाकू ले लिया और उसे स्लैब पर रख दिया। उसकी नज़रें सीधे सोनी के उस गहरे नीले ब्लाउज के उन बटनों पर थीं, जिन्हें सोनी ने आज बड़ी सावधानी से बंद किया था।

सोनी: "तू... तू बदल गया है सूरज। वह मासूमियत कहाँ गई?"

सूरज (सोनी की कमर पर हाथ रखते हुए): "वह मासूमियत उसी 'पाप' की आग में जलकर राख हो गई मौसी, जिसे आपने उस रात पवित्र बनाया था। अब यह प्यास बुझने वाली नहीं है।"

इससे पहले कि सूरज कुछ और करता, बाहर मुख्य द्वार के खुलने की आवाज़ आई। सोनी ने झटके से सूरज को पीछे धकेला और पल्लू ठीक करने लगी। सूरज एक शरारती मुस्कान के साथ रसोई से बाहर निकल गया, मानो वह कोई खेल जीत चुका हो।

सोनी की धड़कनें तेज थी सुगना ने सूरज को रसोई घर से निकलते देखा अब तक सुगना भी करीब आ चुकी थी उसने सूरज के माथे पर तिलक लगाया और सोनी से मुस्कुराते हुए बोली “इसको भी खाना बनाना सिखा दे अपनी बीवी को बना बना कर खिलाएगा…”

माहौल सामान्य हो गया पर सोनी की धड़कनें अब भी तेज थीं।

सूरज के व्यक्तित्व में आया यह बदलाव वाकई अनोखा और डराने वाला था। वह लड़का, जो बचपन में सुगना के आंचल के पीछे छिपता था और जिसकी आँखें सोनी के सामने अदब से झुक जाती थीं, अब उन आँखों में एक शिकारी की चमक थी। उसके भीतर का वह भोलापन अब चतुर चालाकी में बदल चुका था।

शाम ढलते-ढलते सूरज का यह नया रूप सोनी को और भी बेचैन करने लगा। सुगना तो घर के कामों और पूजा-पाठ में व्यस्त हो गई, लेकिन सोनी की स्थिति उस हिरणी जैसी थी जो जानती है कि झाड़ियों के पीछे कोई घात लगाकर बैठा है।

हवेली के गलियारे में मद्धम पीली रोशनी जल रही थी। सोनी अपने कमरे की ओर बढ़ रही थी कि अचानक सूरज ने उसे अपने कमरे में खींच लिया। वह चीखने ही वाली थी कि सूरज की गर्म हथेली ने उसके मुँह को दबा दिया।

सूरज: "शह्ह्ह... मौसी, चुप…।"

सोनी की आँखें गुस्से और उत्तेजना से भर गईं। उसने सूरज का हाथ झटक दिया।

सोनी: "यह क्या पागलपन है? अगर दीदी देख लेतीं तो?"

सूरज (सोनी को दीवार से सटाते हुए): "तो देख लेतीं। उन्हें भी पता चलना चाहिए कि उनकी बहन ने अपने भांजे को कैसा 'इलाज' दिया है। मौसी, वह टीस... वह जो मेरे अंगूठे के नीचे आज भी महसूस होती है, वह मुझे आपकी याद दिलाती है। मेरा वह 'रक्त-तिलक' आपकी जाँघों पर लगा था... वह दृश्य मुझे पागल कर रहा है?"

सोनी का चेहरा शर्म से लाल हो गया। वह स्वयं उस रात की यादों से बेहाल थी।

सोनी: "सूरज, उस रात की बात मत कर। तेरा आत्मविश्वास लौट आया, अब बस कर। हमें अपनी मर्यादा में रहना होगा।"

सूरज (सोनी के कान के पास अपनी ज़बान फेरते हुए): "मर्यादा की दीवारें तो उसी वक्त ढह गई थीं जब आपने मेरा वीर्य अपने भीतर संजोया था। अब तो बस समर्पण बचा है। क्या आज आप मुझे अपनी उस 'महोघनी की गाँठ' का रस चखने नहीं देंगी जिसे उस दिन आपने रोक लिया था?"

सोनी ने महसूस किया कि सूरज का हाथ अब उसकी साड़ी के नीचे, उसकी कमर की नग्न त्वचा पर रेंग रहा है। उसके स्पर्श में एक अधिकार था, एक ऐसी मर्दानगी थी जिसे उसने खुद जगाया था।

सूरज: "आपने पूछा था न 'महोगनी की गाँठ' क्या है? वह कुदरत की सबसे मज़बूत और सबसे सुंदर संरचना मेरी मौसी के पास है। आपकी वह देहलीज़... वह स्थान जहाँ मेरा बचपन खत्म हुआ और मैं 'मर्द' बना, वह मेरे लिए किसी तीर्थ से कम नहीं है। क्या आप अपने भक्त को उस तीर्थ के दर्शन फिर से नहीं कराएंगी?"

सोनी की आँखों में बेबसी के आँसू थे—वो शर्म के थे या दबी हुई चाहत के, यह वह खुद भी नहीं जानती थी।

सोनी: "सूरज, वह एक भूल थी... मैने वह सिर्फ तुझे बचाने के लिए किया था। तू इसे हवस का नाम मत दे..

सूरज . मौसी मुझे वो दहलीज चूमना है और उसका शुक्रिया अदा करना है..

सोनी को यकीन नहीं हो रहा था कि उसका भांजा सूरज उसकी बुर चूमने चाटने की बात कर रहा है…

सोनी (सिसकते हुए): "नहीं सूरज... अभी नहीं… ये ठीक नहीं है।

नियति ने सोनी के मुख से वह बात कहलवा दी जिसने सूरज को खुश कर दिया

फिर कब? सूरज ने आशा भरी नजरों से सोनी की आंखों में देखते हुए पूछा…

सूरज थोड़ा तो शर्म कर मैंने तेरी मदद की और अब तू जबरदस्ती कर रहा है…सोनी ने अपनी बेबसी दिखाते हुए कहा।

सूरज ने सोनी के दोनों गाल अपने हथेलियां के बीच लेकर अपना चेहरा ठीक उसके समक्ष कर दिया और उसकी आंखों में आंखें डालते हुए बोला” मौसी एक बार मेरी आंखों में आंखें डालकर बोलो क्या आप यह नहीं चाहती हो?”

सूरज की पकड़ ढीली पड़ते ही सोनी समझ गई कि अब वह भाग सकती है…उसे लगा सूरज इतना भी पागल नहीं है वो खुश हो गई..

सोनी ने अपने होठों पर मादक मुस्कान और चेहरे पर एक अद्भुत प्यार के साथ सूरज को धकेलते हुए कहा “ नहीं……..” सोनी ने जिस अंदाज में यह ना की थी उसे कोई भी मर्द निश्चित हां ही समझता। सूरज के चेहरे पर भी खुशी की झलक दिखाई पड़ने लगी।

सूरज (हल्का सा पीछे हटते हुए): "ठीक है, आज जाने देता हूँ। पर याद रखिएगा मौसी... जिस सूरज को आपने उगाया है, वह अब रोज़ ढलने के लिए आपकी ही गहराइयों की शरण माँगेगा।"

सोनी बाहर आई अपने कमरे के दीवार के सहारे टिककर अपनी तेज़ साँसों को काबू करने की कोशिश करने लगी। उसे समझ आ गया था कि उसने जिस शेर को जगाया है, अब वह शिकार के बिना नहीं मामेगा।

सूरज की प्यास बढ़ती जा रही थी और अंदर ही अंदर सोनी की तड़प भी..

कुछ दिन यूं ही बीत गए…सोनी और सूरज के बीच वासना की आग और धधकने लगी थी …

हवेली की उन शांत रातों में अब सन्नाटा नहीं, बल्कि एक अनकही बेचैनी गूँजती थी। सोनी, जो दिन भर मर्यादा की ओट में खुद को छिपाए रखती, रात के एकांत में अपनी ही भावनाओं के सैलाब में बहने लगती। नींद अब उसकी आँखों से कोसों दूर थी और जब आती भी, तो वह किसी राहत की तरह नहीं बल्कि एक मीठे मगर जानलेवा तूफान की तरह आती।

उन कामुक यादों ने अब सोनी के अवचेतन मन में अपना स्थायी बसेरा बना लिया था। बंद आँखों के पीछे वही धुंधली रोशनी, सूरज के शरीर की वह तपन और उस रात का वह चरम अनुभव किसी चलचित्र की तरह दोहराया जाने लगा। वह अक्सर आधी रात को अचानक चौंक कर उठ बैठती; माथे पर पसीने की बूंदें और दिल की धड़कनें इतनी तेज़ मानो सीना चीर कर बाहर निकल आएंगी। उसे महसूस होता जैसे सूरज के हाथ अब भी उसकी देह की उन अनछुए मोड़ों को टटोल रहे हैं, जिन्हें उसने बरसों से दुनिया की नज़रों से ओझल रखा था।

वह उस 'महोगनी की गाँठ' की उपमा को याद कर सिहर उठती। सूरज के शब्द उसके कानों में पिघले हुए लावे की तरह उतरते। वह न चाहते हुए भी अपनी उँगलियों से अपनी उसी देहलीज़ को छूती, जिसे सूरज ने अपना 'तीर्थ' कहा था।

जिस सूरज को उसने कल तक एक बालक समझा था, अब उसके सपनों में वह एक 'दिव्य पुरुष' बनकर उभरता। एक ऐसा पुरुष, जिसके पास अधिकार था, जो याचना नहीं करता था बल्कि अपनी प्यास के हक़ का दावा करता था। सूरज का वह नया, शिकार करने वाला रूप सोनी को डराता भी था और भीतर ही भीतर एक अज्ञात उत्तेजना से भर देता था।

सोनी के मन की व्यथा अब केवल कामुक स्मृतियों तक सीमित न थी, बल्कि एक ऐसी गहरी आशंका ने जन्म ले लिया था जो उसकी रातों की नींद और दिन का चैन छीन चुकी थी। हवेली के सन्नाटे में जब वह अकेले बैठती, तो उसका हाथ अनायास ही अपने पेट पर चला जाता।

उस रात की वह अंतिम घड़ी, जब सूरज ने अपना संपूर्ण वेग उसके भीतर उड़ेल दिया था, अब एक भयावह सच बनकर उसके सामने खड़ी था। गर्भ की वह प्यास और समाज का वह डर—सोनी इन दो पाटों के बीच पिस रही थी।

सोनी की कोख वर्षों से एक मरुस्थल की भाँति सूखी थी। मातृत्व की जिस सुखद अनुभूति के लिए वह बरसों तरसी थी, क्या विधाता ने उसे 'पाप' की कोख से उपजाने का निर्णय लिया था? उसके भीतर एक अजीब सा द्वंद्व चल रहा था:

एक ओर उसका मस्तिष्क चीख-चीख कर कह रहा था कि यह मर्यादा का उल्लंघन है। यदि वह गर्भवती हुई, तो वह सुगना दीदी को क्या मुँह दिखाएगी? समाज के तीखे बाण और कुल की मर्यादा उसे जीवित ही भस्म कर देंगे।

दूसरी ओर, उसकी अतृप्त देह और जागृत मातृत्व उसे कचोट रहा था। सूरज के उस 'वीर्य' को उसने केवल वासना नहीं, बल्कि एक 'जीवन' के अंकुर के रूप में महसूस किया था। वह उस अंश को अपने भीतर संजोना चाहती थी। उसे लगता कि यदि वह सूरज के बच्चे की माँ बनती है, तो यह उसके स्त्रीत्व की पूर्णता होगी।

सोनी आधी रात को उठकर खिड़की से बाहर ताकती और मन ही मन ईश्वर से न्याय मांगती। वह सोचती:

"हे विधाता! यदि यह पाप था, तो मेरी कोख में यह हलचल क्यों? यदि यह गलत है, तो मुझे यह सुखद एहसास क्यों हो रहा है? क्या एक प्यासी ज़मीन पर बरसी पहली बारिश कभी गलत हो सकती है?"

उसके मन में एक विचित्र सी तड़प थी—वह उस 'पाप' को पालने, उसे अपने रक्त से सींचने और दुनिया की नज़रों से छिपाकर उसे अपने सीने से लगाने के लिए व्याकुल हो रही थी। उसे लग रहा था कि सूरज ने उसे केवल 'स्त्री' नहीं बनाया, बल्कि उसे 'माँ' बनने की वह संभावना दे दी है जो उसे अब तक के जीवन में नहीं मिली थी।

हवेली की दीवारों के पीछे सोनी की तड़प अब किसी मौन विद्रोह जैसी होने लगी थी। वह खुद को आईने में देखती तो अपनी आँखों में एक अलग ही चमक पाती—एक ऐसी चमक जो वासना और समर्पण के बीच झूल रही थी। सूरज ने उसके भीतर जिस आग को जगाया था, उसकी लपटें अब सोनी को खुद के वजूद को पिघलाने लगी थी।

उसे एहसास हो गया था कि वह सूरज को समझाने की जितनी कोशिश कर रही थी, असल में वह खुद को उस आग की ओर धकेल रही थी। मर्यादा का बांध अब दरकने लगा था और सोनी जानती थी कि अगली बार जब सूरज उसे एकांत में घेरेगा, तो उसके पास कहने के लिए 'ना' शब्द शायद उसके होंठों तक पहुँचने से पहले ही दम तोड़ देगा। बनारस की वह उमस भरी रातें अब और भी भारी होने वाली थीं, क्योंकि अब सिर्फ सूरज ही प्यासा नहीं था, सोनी की रूह भी उसी आग में भस्म होने के लिए मचल उठी थी।

अब सोनी की प्रार्थनाएं बदल चुकी थीं। वह डरती भी थी और चाहती भी थी कि उसके भीतर वह बीज अंकुरित हो जाए। सूरज का वह 'दिव्य पुरुष' रूप अब उसके लिए केवल एक भांजा नहीं, बल्कि उसके अस्तित्व को पूर्ण करने वाला वह विधाता बन चुका था, जिसने उसे एक नई और खतरनाक पहचान दी थी। बनारस की गलियों में बहती गंगा की लहरों की तरह सोनी का मन भी अब उफान पर था, जहाँ किनारे टूटने को बेताब थे।

नियति का खेल भी बड़ा निराला होता है। जिसे हम मर्यादा की सबसे ऊँची दीवार समझते हैं, समय आने पर विधाता उसी दीवार को मिलन का सेतु बना देता है। सोनी के लिए सुगना ही वह ढाल थी जो उसे सूरज की बढ़ती हुई धृष्टता से बचाती थी, पर अब नियति ने स्वयं सुगना को ही इस कामुक मिलन की सूत्रधार और साक्षी बनाने का निर्णय कर लिया था।

एक दिन सोनी और सुगना को एक छठी के निमंत्रण में जाना था। बनारस की तंग गलियों से गुजरती हुई सुगना और सोनी जब पड़ोस के घर पहुँचीं, तो वहाँ 'छठी' के उत्सव की सोहर और ढोलक की थाप गूंज रही थी। आँगन में झालर की रोशनी और इत्र की खुशबू फैली थी। औरतों की टोली मंगल गीत गा रही थी, पर सबकी नज़रें इन दोनों बहनों पर ठिठक गईं। दोनों बहने सुंदरता की साक्षात प्रतिमूर्ति थी।

सुगना ने चटक लाल रंग की बनारसी साड़ी पहनी थी, जबकि सोनी गहरे नीले रंग के सिल्क में लिपटी थी, जिसमें उसकी गोरी रंगत और भी निखर रही थी। सोनी के मन में अभी भी दोपहर वाली सूरज की वह ढिठाई और उसकी गरम साँसों की छुअन ताज़ा थी।

आँगन के एक ऊँचे पीढ़े पर उस घर की सबसे बुजुर्ग और सम्मानित महिला बैठी थीं, जिन्हें सब 'बड़ी दादी' कहते थे। उनके चेहरे पर समय की लकीरें थीं, पर आँखों में गजब की चमक। वे शास्त्रों की ज्ञाता भी थीं और लोक-रीतियों की भी।

सुगना की सहेली ने बड़ी दादी से सुगना और सोनी का परिचय कराते हुए बोला..

ई बड़की दादी हई इनके आशीर्वाद से यह घर में किलकारी गुंजल…

सुगना और सोनी ने आगे बढ़कर उनके पैर छुए। दादी ने सोनी के सिर पर हाथ रखा और उसकी आँखों में झाँकते हुए मुस्कुरा दीं।

बड़ी दादी : "जुग-जुग जियऽ बिटिया! बाकिर ई का... चेहरा त गुलाब नियर खिलल बा, पर आँखिन में कवनो गहरी पियास लौकत बा?"

सुगना ने मौका पाकर धीमे से कहा, "दादी, ई हमार बहिन सोनी हई। बियाह के कई साल बीत गइल, बाकिर अबहीं ले एकरो गोद सूनी बा। कवनो जतन बताईं कि हवेली में भी कवनो ललना खेलै।"

दादी ने एक लंबी सांस ली और अपनी आवाज़ को इतना धीमा कर लिया कि सिर्फ वे दोनों ही सुन सकें।

बड़ी दादी (भोजपुरी में): "देखू सुगना, संतान त ओहिजा ठहरेला जहाँ देह अउरी मन, दुनो तृप्त होखे। तू लोग 'संतान सप्तमी' के ऊ गुप्त पूजा काहे ना करेलू? ई पूजा कवनो आम बरत-तेवहार नइखे।"

सोनी (उत्सुकता और संकोच के साथ): "दादी, ई कइसन पूजा ह? एकरा बारे में त हमनी के कबहूँ ना सुनलीं जा।"

बड़ी दादी: "सुनबे कइसे? ई त खानदानी राज ह। एम्मे मेहरारू के देह के 'वेदी' बनावल जाला। सात दिन ले जेकर गोद सूनी बा, ओकरा के ओकर बहिन तइयार करेली। अइसन तइयार, कि ओकर पुरुष ओकरा रूप के देख के सुध-बुध खो दे। बहिन के काम होला कि उ अपनी बहिन के अंग-अंग के मेहंदी हल्दी, चन्दन, केसर अउरी इतर (इत्र) से महकावे।"

सुगना: "एम्मे बहिन के का काम दादी? हम त पूजा-पाठ कर देब, बाकिर ई तैयारी..."

बड़ी दादी (हँसते हुए): "अरे पगली! ई त कामुक अनुष्ठान ह। अपनी बहिन के कान में अइसन प्रेम-रस घोले के परी, ओकरा के अइसन काम-दीक्षा देवे के परी कि ओकर रोम-रोम पियास से तड़प उठे। जब ले मेहरारू के भीतर 'काम-अग्नि' ना प्रज्वलित होई, तब ले गर्भ के द्वार ना खुली। तू ओकरा के अइसन कामुक बात और स्पर्श से जगा, कि उ अपनी मरद के सोझा साक्षात रति बन के खड़ी हो जाय। ई पूजा में, सरम के त्याग अउरी आनंद के भोग ही असली पुण्य ह।"

दादी मुस्कुराने लगी।

सोनी और सुगना ध्यान से उनकी बातें सुन रही थी।

ई पूजा कब कब करे के होई? सुगना ने प्रश्न किया

आज चतुर्थी ह पंचमी षष्ठी काकी ने अपनी उंगलियों पर गिना और बोला..सप्तमी के माने तीन दिन बाद..

छठी उत्सव की उस शोर-शराबे वाली महफिल में, जहाँ ढोलक की थाप और सोहर के सुर गूँज रहे थे, बड़ी दादी ने सुगना को अपने और करीब खींच लिया। उनकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी, जैसे वे किसी गहरे रहस्य की परतें खोल रही हों।

दादी ने सुगना के हाथ पर अपना हाथ रखते हुए बड़े ही गंभीर स्वर में कहना शुरू किया।

बड़ी दादी: "सुगना, ई बात गाँठ बाँध लऽ बिटिया... जवन हम कहत बानी, ऊ कवनो खेल नइखे। तीसरा दिन जब सप्तमी पड़ी, ओही दिन से लेके अगिला सात दिन ले सोनी के अपना मरद के साथे जांघ सटवले रखे के होई । जेतना बेरा ऊ लोग एक-दोसरा के देह में समाईं, ओतने जल्दी फल मिली।"

सोनी यह सुनकर एकदम जड़ हो गई, उसके कान गरम हो गए और नजरें शर्म से झुक गईं। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह कहाँ देखे। पर दादी रुकने वाली नहीं थीं।

बड़ी दादी (सुगना की आँखों में आँखें डाल कर): "बाकिर ओकरा पहिले... सोनी के कइसे तइयार करत बाड़ू, ई तोहार जिम्मा बा। तू जानऽ कि ओकरा मन अउरी तन के कइसे जगावे के बा। याद रखिहा, सोनी जेतना सुंदर तन से अउरी जेतना 'तइयार' मन से उहाँ पहुँची, ओतने ई पूजा के फल मिली। ओकर रोम-रोम पियास से भरल होखे के चाहीं, ओकर देह से अइसन गमक (खुशबू) आवे के चाहीं कि पुरुष देखिते बेकाबू हो जाय। तूँ ओकरा के ओही रति के रूप में ढाल दऽऔर.. हा.. इकर जोबन और मुनिया के भी सजा दीहे आखिर ओकर हीं त पूजा करी एकर मरद… सजल सुंदर मुनिया के दर्शन पाके एकर मरद पिघल जायं और अपन लावा इकरा कोख में भर देस।"

दादी ने पूजा पाठ की भी कुछ विधियां सुगना और सोनी को बताई और दोनों बहने ध्यान से उसे सुनती रहीं।

दादी का एक-एक शब्द सोनी के सीने में संवेदना पैदा कर रहा था। सोनी और सुगना दोनों कामुक थी पर दोनों ने कभी एक दूसरे के समक्ष अपनी इस विद्या के बारे में कभी ना तो जिक्र किया था और नहीं दोनों इतनी खुली हुई थी।

वह मन ही मन सोच रही थी कि सुगना दीदी जो घर में मर्यादा की प्रतिमूर्ति थी वह उसे इस कामुक अनुष्ठान के लिए किस तरह से तैयार करेंगी…

शेष अगले भाग में

 
भाग 182

दादी ने पूजा पाठ की भी कुछ विधियां सुगना और सोनी को बताई और दोनों बहने ध्यान से उसे सुनती रहीं।

दादी का एक-एक शब्द सोनी के सीने में संवेदना पैदा कर रहा था। सोनी और सुगना दोनों कामुक थी पर दोनों ने कभी एक दूसरे के समक्ष अपनी इस विद्या के बारे में कभी ना तो जिक्र किया था और नहीं दोनों इतनी खुली हुई थी।

वह मन ही मन सोच रही थी कि सुगना दीदी जो घर में मर्यादा की प्रतिमूर्ति थी वह उसे इस कामुक अनुष्ठान के लिए किस तरह से तैयार करेंगी…

आग आगे…

सोनी और सुगना जब तक कुछ और पूछती तब तक सुगना की सहेली ने उसे गीत संगीत के कार्यक्रम में बुला लिया और दोनों बहने दादी को छोड़कर अन्य महिलाओं के बीच में चली गई।

छठी का कार्यक्रम चल रहा था परंतु सोनी अपनी दुनिया में मगन थी उसे इन सब अनुष्ठानों पर ज्यादा विश्वास नहीं था पर कुछ दिनों पहले उसने जो सूरज के साथ संभोग किया था और उसके वीर्य को अपने गर्भ में धारण किया था उसे कहीं ना कहीं यह बात सोच रही थी कि यदि वह सूरज के वीर्य से गर्भवती हो गई तो?

कार्यक्रम की समाप्ति के पश्चात दोनों बहने घर की तरफ चली पर दोनों इस बारे में एक दूसरे से बातें करने में कतरा रही थी।

जैसे ही वे हवेली के मुख्य द्वार के भीतर घुसीं, ऊपर के झरोखे से सूरज उन्हें देख रहा था। उसकी आँखों में एक शिकारी वाली चमक थी, मानो उसे पता चल गया हो कि अब हवेली की दीवारें किसी बड़े कांड की गवाह बनने वाली हैं।

दादी के कहे अनुसार सोनी को सुगना ने अपने कमरे में ही साथ में सोने के लिए बुला लिया था। परंतु दादी ने जो सुगना से उम्मीद की थी वह पूरा करना बेहद कठिन था। बिस्तर पर करवटें बदल रही सुगना के दिमाग में दादी की बातें घूम रही थी दादी ने सुगना से जिस कामुकता की उम्मीद की थी वह उसे वर्षों पहले छोड़ आई थी। क्या यह उचित होगा…अब तक जिस कामुकता को उसने त्याग रखा था क्या वह उसे सामान्य रूप में अपना पाएगी…रात के पिछले पहर हवेली का सन्नाटा गहरा गया था। सुगना की बंद आंखों के पीछे स्मृतियों का एक तूफान उमड़ रहा था। अवचेतन मन हावी हो रहा था।अचानक, कमरे की हवा में वही पुरानी चिर-परिचित=सलेमपुर की गंध घुलने लगी— जो कभी सरयू सिंह की पहचान हुआ करती थी।

सुगना ने खुद को एक धुंधले गलियारे में पाया। सामने वही कद-काठी और वही रौबीली मूंछें थीं—सरयू सिंह खड़े थे। उन्हें देखते ही सुगना के भीतर का अपराधबोध ज्वालामुखी की तरह फट पड़ा।

सुगना के पैर कांपने लगे, वह घुटनों के बल बैठ गई और सिसकते हुए अपना चेहरा हाथों से ढंक लिया।

सुगना: "काहे आइल बानी रउआ? काहे हमके आपन परछाईं देखावत बानी? जेकरा के हम अपना 'सरबस' मानलीं, आपन सब कुछ न्योछावर कर देनी, ऊ हमार जनमदाता निकलल... हे भगवान! ई कवन पाप हमरा हाथे करवा देनी? हमरा कोख से जनमल सूरज... राउर अंश हवे, अउर हम... हम रउवे संतान रहनी। ई महापाप के बोझ लेके हम कइसे जियब?"

सरयू सिंह धीमे कदमों से आगे बढ़े। उनकी परछाईं सुगना पर पड़ी, पर उसमें कोई वासना नहीं, बल्कि एक असीम ठहराव था। उन्होंने झुककर सुगना के सिर पर हाथ रखा।

सरयू सिंह: "उठ सुगना... अपना नजर उठा। जे बोझ तू लादले बाडू, ऊ तोहार हइये नईखे। ओहि घरी ना त हमके पता रहे कि तू हमार धीया हऊ, अउर ना तोहके मालूम रहे कि हम तोहार बाप हई।

जवन काम अनजाने में भइल, ऊ 'पाप' ना, खाली विधाता के खेल ह।"

सरयू सिंह ने सुगना का हाथ थामकर उसे खड़ा किया। उनकी आंखों में एक पिता की करुणा झलक रही थी।

सरयू सिंह: "दुनिया अउर समाज के बनवल मर्यादा देह खातिर होला सुगना, आत्मा खातिर ना। हमनी के जवन जियनी, ऊ ओहि समय के सच रहे। अगर करम के लेख हमनी के ओहि मोड़ पर मिलवलस जहाँ हमनी अनजान रहनी, त ओकरा में तोहार का गलती? का तू अपना ओहि खुशी के, ओहि मया (प्रेम) के खाली एह खातिर 'गंदा' कह देबू काहे कि आज तोहके हमर नाम मिल गइल बा?"

सुगना: "हम अपना के कइसे माफ करीं? जबो सूरज के देखिला, हमके अपना ओहि 'अपराध' के याद आवेला।"

सरयू सिंह: "ना सुगना। सूरज तोहार अपराध ना, तोहार शक्ति हउवे। ऊ हमार अउर तोहार संगम के।निशानी हवे—एगो अइसन सच जेकरा के तू नकार ना सकबू। अब ऊ बनारस के शान ह ओकर मां अपराध में जीए ई ठीक नइखे।

अब हमार बात ध्यान से सुन... हम तोहके एह आत्मग्लानि से आजाद करे ही आइल बानी।

उन्होंने सुगना के चेहरे को अपने दोनों हाथों में थाम लिया।

सरयू सिंह: "तोहके हमसे वादा करे के परी। तू आजे, एही घरी ओहि 'अपराधबोध' के जरा के राख कर देबू। तू एगो मेहरारू हऊ, अउर मेहरारू के देह के खिलल, रहे के चाहि ठीक वैसे ही जैसे तू आइल रहलू।

हमारा देह त्यागे से पहले जैसन तू रहलु ठीक ओसही रहबु ई वादा कर।बिना कवनो डर के, बिना कवनो बोझ के... खुल के जीया। अपना देह अउर मन के पियास के स्वीकार कर, काहे कि तृप्त नारी ही सृजन (creation) कर सकेली।"

सरयू सिंह मुस्कुराए और धीरे-धीरे धुंध में ओझल होने लगे। उनकी आखिरी आवाज कमरे में गूँज रही थी..

तृप्त नारी ही सृजन (creation) कर सकेली।"

अचानक सुगना की आंखें खुल गईं। उसका पूरा बदन पसीने से तर-बतर था, पर उसके सीने पर जो भारी बोझ था, वह अब गायब हो चुका था। खिड़की से बाहर भोर की पहली किरण फूटने को बेताब थी। सुगना ने अपने बगल में सोई सोनी की ओर देखा और उसके चेहरे पर एक ऐसी रहस्यमयी और कामुक मुस्कान आई, जो बरसों बाद लौटी थी। सुगना अब 'मर्यादा की प्रतिमूर्ति' नहीं, बल्कि अपनी इच्छाओं की स्वामिनी बन चुकी थी।

बनारस की उस हवेली में अगली सुबह एक अलग ही महक लेकर आई थी। यद्यपि सोनी और सुगना के मन के किसी कोने में यह बात पत्थर की लकीर की तरह अंकित थी कि उम्र के इस पड़ाव पर सोनी के जीवन में संतान का योग शायद अब शेष नहीं, पर सुगना का ममतामयी आग्रह और सूरज के उस हालिया 'पौरुष-अभिषेक' ने सोनी के भीतर एक अनकही उम्मीद की लौ जला दी थी।

सूरज की दी हुई वह गर्म छुअन और उसके वीर्य का वह अर्पण, जो कुछ दिन पहले ही सोनी के गर्भ ने आत्मसात किया था, आज उसे इस पूजा के लिए एक नई ऊर्जा दे रहा था।

बनारस की तपिश और हवेली के भीतर सुलगते रहस्यों के बीच, सुगना और सोनी एक ऐसे पड़ाव पर खड़ी थीं, जहाँ मर्यादा और तृप्ति के बीच की लकीर धुंधली पड़ने वाली थी। बड़ी दादी की बातों ने सुगना के मन में एक अजीब सी हलचल पैदा कर दी थी। वह यह तो नहीं जानती थी कि सोनी और सूरज के बीच क्या 'आग' लग चुकी है, लेकिन उसे यह विश्वास हो गया था कि सोनी के मातृत्व का द्वार उसकी 'कामेच्छा' को जगाने से ही खुलेगा।

और आज, उसी काम-अग्नि को प्रज्वलित करने का पहला चरण था—ब्यूटी पार्लर।

सुगना, सोनी को लेकर शहर के सबसे महंगे और आलीशान 'अप्सरा ब्यूटी लाउंज' पहुँची। पार्लर के भीतर की ठंडी हवा, मद्धम संगीत और चारों तरफ फैली महँगी क्रीमों और इत्रों की भीनी-भीनी खुशबू ने बाहर की गर्मी को भुला दिया। चारों तरफ बड़े-बड़े आईने लगे थे, जिनमें रोशनी नहा रही थी।

पार्लर की मालकिन, रीता, ने सुगना का स्वागत किया। सुगना ने उसे एक तरफ ले जाकर, बड़ी दादी के निर्देशों के अनुसार, कुछ खास हिदायतें दीं। रीता मुस्कुराई और उसने सोनी को एक आलीशान कमरे में ले जाने का इशारा किया, जहाँ सिर्फ 'फुल बॉडी ट्रीटमेंट' होता था। सुगना भी उसके साथ ही अंदर गई। वह अपनी बहन के इस कायाकल्प को अपनी आँखों से देखना चाहती थी, आखिर उसकी 'तैयारी' की ज़िम्मेदारी उसी की तो थी।

सोनी को एक मुलायम, सफेद गाउन पहनने को दिया गया। जब वह उस गाउन में तैयार होकर ट्रीटमेंट टेबल पर लेटी, तो उसका गोरा रंग उस सफेद गाउन पर और भी खिल उठा। उसकी आँखों में अजीब सा संकोच और उत्साह मिला-जुला था। सुगना पास ही एक आरामदेह कुर्सी पर बैठ गई।

शुरुआत हुई 'फुल बॉडी मसाज' से। दो कुशल थेरेपिस्ट्स ने सोनी के शरीर पर लैवेंडर और जोजोबा ऑयल का मिश्रण लगाना शुरू किया। उनके हाथों के जादुई स्पर्श से सोनी की थकान उतरने लगी। सुगना एकटक अपनी बहन को देख रही थी। तेल से सनी सोनी की देह उस मद्धम रोशनी में किसी संगमरमर की मूरत जैसी चमक रही थी। सुगना ने गौर किया कि कैसे सोनी के उभार, उसकी पतली कमर और सुडौल जंघाएं उस तेल की चिकनाहट में और भी प्रलोभक लग रहे थे। सुगना के भीतर कहीं एक ठंडी आह सी उतरी। उसने अपनी देह की तुलना सोनी के इस उबलते यौवन से की, और उसके मन में एक अजीब सी 'कामुकता' ने जन्म लिया। उठी…सोनी के मादक बदन की मालिश सुगना को उकसा रही थी।

जब से सूरज डाक्टर बना था तब से सुगना के जीवन में एक सुखद बदलाव आया था। अब वह खुलकर हंसती थी मुस्कुराती थी…ऐसा लगता था जैसे वह सरयू सिंह के साथ अनजाने में किए पाप के लिए खुद को माफ कर दिया हो..

सुगना सोनी के बदन पर हो रही मालिश को देख रही थी…और उसे वो दिन याद आने लगा जब सरयू सिंह सूरज के जन्म के बाद उसके बदन पर तेल लगा रहे थे…

सुगना को वो घटनाक्रम चलचित्र की भांति अपनी आंखों के सामने दिखाई पड़ने लगा…सरयू सिंह का वह प्यार और प्यार के वह रूप सुगना मदहोश होने लगी..

(विवरण के लिए भाग 6 एवं 7 पढ़ सकते हैं))

सुगना ने अपने बदन में आज कई दिनों बाद उत्तेजना महसूस की….और उसकी जादुई बुर मुस्कुरा उठी।

सोनी के बदन की मालिश के बाद बारी आई सबसे महत्वपूर्ण चरण की—'हनी-चॉकलेट वैक्सिंग'। रीता ने खुद यह काम संभाला। गरम, महकती हुई चॉकलेट वैक्स जब सोनी की कोमल त्वचा पर लगाई गई, तो वह हलके से सिहर उठी। सुगना अपनी सांसें थामे देख रही थी। रीता ने पहले हाथों और पैरों से शुरुआत की। जैसे-जैसे वैक्स की पट्टियाँ खिंचतीं, सोनी की त्वचा एकदम मक्खन जैसी चिकनी और चमकदार होती जाती।

सुगना अपनी बाहों को निहार रही थी भगवान ने उसे इतनी खूबसूरत त्वचा दी थी जिस पर एक रोवा तक न था…(सिर्फ उस जगह को छोड़ कर जहां…सोनू और सरयूसिंह जल चढ़ाते आए थे) उसे न तो किसी वैक्सिंग की जरूरत थी न..किसी पार्लर की…

अब बारी थी 'इंटीमेट वैक्सिंग' (बिकनी वैक्स) की। सुगना की उपस्थिति से सोनी लाज से लाल हो गई और उसने सुगना की तरफ देखा। सुगना ने मुस्कुराकर उसे ढांढस बंधाया। रीता ने कुशलता से वैक्स अप्लाई किया। सोनी की जाँघों के बीच की वह कोमल, अदृश्य त्वचा जब पहली बार हवा के संपर्क में आई, तो वह काँप उठी।

सुगना ने देखा कि कैसे सोनी के शरीर का हर कोना अब निर्वस्त्र और बेपर्दा हो रहा था। रीता ने बड़ी सावधानी से उस 'निषिद्ध क्षेत्र' को भी वैक्स किया, जिसे सूरज ने 'महोघनी की गाँठ' कहा था (हालांकि सुगना इस नाम से अनजान थी, पर वह उसकी पवित्रता और महत्ता समझ रही थी)। वैक्सिंग के बाद, रीता ने उस हिस्से पर एक खास ठंडा लोशन और 'इंटिमेट डियोडरेंट' लगाया, जिसकी खुशबू बहुत ही उत्तेजक थी।

सुगना यह सब देख रही थी और उसके भीतर एक अजीब सा 'उबाल' आ रहा था। वह सोनी की उस बेदाग, रेशमी देह को देखकर खुद को भी वासना के एक अजब दौर में फंसा हुआ महसूस कर रही थी। उसे लग रहा था जैसे यह सारी तैयारी उसी के लिए हो रही हो, वह खुद को उस बिस्तर पर लेटी हुई कल्पना करने लगी।

वैक्सिंग के बाद 'मिल्क एंड हनी बाथ' हुआ। सोनी को एक बड़े से टब में बिठाया गया, जिसमें दूध, शहद और गुलाब की पंखुड़ियाँ तैर रही थीं। दादी की बात याद कर सुगना ने आग्रह कर खुद अपने हाथों से सोनी की पीठ और बाहों पर वह शाही उबटन लगाया। जब वह सोनी के भीगे शरीर को छू रही थी, तो उसे उसकी त्वचा की गर्मी और कोमलता का अहसास हुआ। उसके अपने हाथ कामवासना से कांपने लगे। उसने अपनी बहन के उन "जोबन" को करीब से देखा, जिन्हें दादी ने सजाने को कहा था। वे अब दूध और शहद के लेप में और भी पुष्ट और आमंत्रक लग रहे थे। सुगना ने चुपके से अपनी उंगलियों से उन्हें स्पर्श किया, और एक बिजली सी उसके पूरे शरीर में दौड़ गई। सोनी को सुगना का यह स्पर्श अनोखा और उत्तेजक लगा। सुगना रुकी नहीं अपितु उसने सोनी की चुचियों पर न सिर्फ उबटन लगाया बल्कि उसे धीरे घूरे मसल मसल कर सोनी की चूची को चमका दिया…यह क्रिया जितना उत्तेजक सोनी के लिए थी उतना सुगना के लिए भी।

सुगना दादी के बताएं अनुसार बड़ी बहन का किरदार छोड़ एक कामुक सहेली के नए और अनोखे रूप में थी।

सोनी आश्चर्यचकित थी पर पार्लर में होने की वजह से दोनों के बीच ज्यादा बात नहीं हो पा रही थी।

स्नान के बाद, सोनी का 'फेशियल' और 'हेयर स्पा' हुआ। उसके बालों को स्टीम दी गई और एक महँगा सीरम लगाया गया, जिससे वे रेशम की तरह लहराने लगे। चेहरे पर 'गोल्ड फेशियल' ने वह चमक ला दी, जिसके बारे में बड़ी दादी ने कहा था—"गुलाब नियर खिलल बा"।

आखिर में, रीता ने सोनी के शरीर के खास हिस्सों (गर्दन के पीछे, कलाई, कानों के पीछे, और जाँघों के बीच) पर एक अत्यंत दुर्लभ और तीखा 'अरबी इत्र' छिड़का। इस इत्र की खुशबू ऐसी थी कि वह किसी भी पुरुष के पौरुष को पल भर में जगा दे।

जब सोनी पूरी तरह तैयार होकर आईने के सामने खड़ी हुई, तो खुद सुगना भी उसे देखकर मोहित हो गई। वह कोई साधारण महिला नहीं, बल्कि साक्षात रति लग रही थी। उसका अंग-अंग महक रहा था, उसकी त्वचा रेशम से भी ज़्यादा चिकनी थी, और उसकी आँखों में एक ऐसी गहरी, तृप्त प्यास थी जो किसी को भी अपने आगोश में ले ले।

एक पल के लिए सुगना ने मन ही मन सोचा और विधाता से प्रार्थना की की हे महाप्रभु सूरज के लिए भी इतनी ही सुंदर और खूबसूरत बहु देना…

सुगना ने सोनी के सिर पर हाथ रखा। उसकी आँखों में खुशी के आँसू थे, पर उसके भीतर एक दबी हुई काम-अग्नि भी सुलग रही थी। वह अपनी बहन की इस 'कामुक देह' को देखकर गर्वित थी, पर साथ ही वह खुद भी उस अपनी जांघों के जोड़ पर आए रिस आए प्रेम रस को छूने के लिए व्याकुल हो उठी थी,

उसे नहीं पता था कि यह 'तैयारी' हवेली में कौन सा नया तूफ़ान लाने वाली है, लेकिन एक बात तय थी—बनारस की उस हवेली में अब कोई भी मर्यादा सुरक्षित नहीं रहने वाली थी।

हवेली की दहलीज पर कदम रखते ही ऐसा लगा मानो पूरे वातावरण में एक मादक सुगंध तैरने लगी हो। ढलते सूरज की किरणें जब झरोखों से छनकर सोनी के दमकते चेहरे और रेशमी बदन पर पड़ीं, तो देखने वालों की आंखें चौंधिया गईं।

पार्लर से निखरी सोनी के अंग-अंग से कामदेव की आभा झलक रही थी। उसका चेहरा 'गोल्ड फेशियल' की वजह से कुंदन की तरह चमक रहा था और इत्र की वह तीखी अरबी खुशबू पूरे दालान में फैल गई थी।

सबसे पहले कजरी और पदमा की नजर उन पर पड़ी। दोनों के हाथ जहाँ के तहाँ रुक गए। कजरी ने अपनी साड़ी का पल्लू दाँतों तले दबा लिया और विस्मय से बोली:

कजरी: "ए पदमा! तनी देख ता, हमार सोनी बिटिया एकदम नईकी दुलहिन जैसन लागत बिया कि ना? अरी सुगना, तू त एकरा के अइसन सजा देले बाड़ू जइसे अभी-अभी सात फेरे लेके कोहबर से निकलत होखे! एकर रूप त अइसन खिलल बा कि नजरिए नहीं हटत बा।"

पदमा ने भी चकित होकर सोनी के चमकते बदन को निहारा और अपनी देहाती बोली में सुर मिलाया:

पदमा: "एकदम साँच कहत बाड़ू कजरी। ई उमर में भी सोनी के बदनवा अइसन कंचन जैसन दमकत बा कि नईकी दुलहिन सब एकरा आगे फीकी पड़ जइहें। सुगना, आज शहर से कवन जादू क के अइले बाड़ू रे? ई त साक्षात अप्सरा लागत बिया!"

सुगना, जिसके भीतर खुद एक कामुक ज्वार उमड़ रहा था, बस एक रहस्यमयी मुस्कान बिखेर कर रह गई। उसे पता था कि यह चमक सिर्फ बाहरी क्रीमों की नहीं, बल्कि उस आंतरिक 'कामुक अनुष्ठान' की तैयारी है जो दादी ने सुझाई थी।

तभी घर की जवान बेटियाँ, मालती और रीमा, जो अपनी चंचलता के लिए जानी जाती थीं, दौड़ती हुई आईं। सोनी की बदली हुई काया, उसकी मक्खन जैसी चिकनी बाहें और गले के पास चमकती रेशमी त्वचा देखकर वे ठिठक गईं।

मालती ने सोनी का हाथ अपने हाथ में लिया और उसकी कोमलता महसूस कर चकित रह गई।

मालती: "मौसी ये क्या करिश्मा है? आपके हाथ तो इतने मुलायम हो गए हैं जैसे रुई का फाहा। और ये कैसी खुशबू है? मेरा तो जी कर रहा है कि आपको बस निहारती रहूँ।"

रीमा (शरारत से): "लगता है सुगना चाची ने आज मौसी पर पूरा खजाना लुटा दिया है। मौसी, सच-सच बताइए, कौन सा पार्लर गई थीं? हमें भी ऐसी ही 'सजी काया' चाहिए। क्या शहर में कोई नया नुस्खा आया है जो आप दोनों बहनें हम से छुपा रही हैं?"

सोनी, जो भीतर से सुगना के बदले हुए रूप और आने वाले अनुष्ठान की कल्पना से पहले ही पिघल रही थी, इन सवालों से और भी लजा गई। उसकी नजरें झुक गईं, जिससे उसकी पलकों का भारी काजल और भी कयामत ढाने लगा।

सुगना ने स्थिति संभालते हुए कहा, "पगली हो क्या तुम लोग? यह तो बस खानदानी उबटन और शहर की कुछ अच्छी हवा का असर है। सोनी का स्वास्थ्य थोड़ा ढीला था, तो सोचा इसे जरा ताजगी दिला लाऊँ।"

परंतु मालती और रीमा कहाँ मानने वाली थीं। वे सोनी के इर्द-गिर्द मंडराने लगीं, जैसे मधुमक्खियाँ किसी खिले हुए फूल पर मँडराती हैं। उन्हें सोनी के जीवन में आने वाले भूचाल का अंदाजा नहीं था, पर उसकी देह से फूटता आकर्षण उन्हें रस्क (ईर्ष्या) करने पर मजबूर कर रहा था।

ऊपर बालकनी में खड़ा सूरज यह सब देख रहा था। उसके कानों तक पार्लर, वैक्सिंग और निखार की बातें पहुँच रही थीं। जब उसकी नजर सोनी की उन पुष्ट जाँघों के उभार पर पड़ी जो साड़ी की हल्की सरकन से झलक रही थीं, तो उसके पौरुष ने एक करवट ली।

वह समझ गया कि उसकी मां सुगना ने सोनी को किसी विशेष अनुष्ठान के लिए तैयार किया है। पर सूरज को क्या उसे तो सोनी उसी रूप में चाहिए थी जिस रूप में उसने उसे एक नया जीवन दिया था। उसे लग रहा था जैसे जैसे विधाता ने उसकी मौसी की यह साज सज्जा उसके मिलन के लिए ही हो रही है। सच ही है सावन के अंधे को सब हर हरा ही दिखाई पड़ता है।

सूरज के ख्वाबों की 'महोघनी की गाँठ' अब पूरी तरह से खुलने और महकने के लिए तैयार थी।

रात के सन्नाटे में हवेली की दीवारें जैसे सुगना की धड़कनों के साथ ताल मिला रही थीं। सब अपने-अपने कमरों में जा चुके थे। दादी की बातें सुगना को याद आ रही थीं..सुगना ने अपनी अलमारी के सबसे सुरक्षित कोने से वह रेशमी नाइटी निकाली। यह महज एक कपड़ा नहीं, बल्कि उसके बीते हुए उन पलों की याद थी जब सोनू के प्रेम में वो पागल थी। न जाने कितनी बार वॉइस नाइटी में सोनू के पास गई थी और हर बार सोनू ने अपने हाथों से यह नाइटी उतारी थी। और अपने श्वेत धवल वीर्य से उसे पूरी तरह भिगोया था।

उसने धीरे से अपने वस्त्र त्यागे और उस पारभासी (translucent) रेशमी नाइटी को अपने बदन पर सरका लिया। जैसे ही वह आईने के सामने खड़ी हुई, खुद उसकी सांसें थम गईं।

आईने में जो मूरत दिख रही थी, वह किसी मंझी हुई अप्सरा से कम न थी। वक्त ने उसके बदन को ढालने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी; उम्र ने उसके यौवन को घटाया नहीं, बल्कि उसे और भी ठोस और रसीला बना दिया था।

नाइटी का गहरा मरून रंग उसके गोरे रंग पर बिजली की तरह कौंध रहा था। रेशम का वह बारीक कपड़ा उसके बदन से ऐसे लिपटा था, मानो पानी की कोई पतली परत हो। उसके कंधे चौड़े और बेदाग थे, जिन पर नाइटी की पतली डोरियाँ किसी गहरे राज की तरह टिकी थीं।

सुगना की छाती का उभार आज भी उतना ही गर्वित और उन्नत था। नाइटी के झीने कपड़े से उसकी देह की गोलाइयाँ साफ झलक रही थीं, जो हर सांस के साथ ऊपर-नीचे हो रही थीं। वह कसाब, वह भारीपन आज भी वैसा ही था जिसे देख किसी भी मर्द का ईमान डोल जाए।

उसकी कमर और भारी कूल्हों के बीच का ढलान किसी सधे हुए मूर्तिकार की कलाकृति जैसा था। नाइटी का घेरा जब उसकी सुडौल और लंबी जंघाओं को छूता, तो रेशम की सरसराहट उसके भीतर की सोई हुई कामुकता को जगा देती। उसके पैर एकदम चिकने और मांसल थे, जिनमें गजब की कशिश थी।

आईने में उसने अपनी आँखों को देखा—उनमें ममता के साथ-साथ आज एक प्यासी तड़प भी थी। उसके होंठ बिना किसी लाली के भी सुर्ख और गीले लग रहे थे। उसके खुले बाल पीठ पर काले नाग की तरह लहरा रहे थे, जो उसके गोरे बदन पर और भी ज्यादा प्रलोभक लग रहे थे।

सुगना ने अपनी हथेलियों से अपनी ही बाहों को सहलाया। उसे अपनी त्वचा की गर्मी महसूस हुई। उसे लगा जैसे उसका रोम-रोम फिर से जी उठा हो। वह आज भी उतनी ही अद्भुत और मादक थी, जितनी वह सालों पहले थी।

आईने में खुद को निहारते हुए उसे अहसास हुआ कि वह सिर्फ सोनी को तैयार नहीं कर रही थी, बल्कि उसके भीतर की वह 'सुगना' भी अंगड़ाई ले रही थी जो सालों से मर्यादा की चादर ओढ़े सोई हुई थी। उसकी जाँघों के बीच फिर से वही 'प्रेम रस' रिसने लगा था।

कुछ देर में सोनी भी कुछ इसी प्रकार सजी-धजी सुगना के कमरे में आ गई…

पदमा की दोनों बेटियां सुगना और सोनी एक दूसरे से सुंदरता में होड़ लगा रही थी। कहानी की वर्तमान नायिका सज धज कर संतान सप्तमी की तैयारी कर रही थी परंतु सुगना …. सुगना थी…

सोनी उसे एक टक देखते रह गई

“दीदी इतनी सुंदर लग रही हो”

सुंदर तो मेरी लाडो रानी लग रही है कितनी प्यारी है

सुगना ने सोनी की तारीफ की..और उसे आलिंगन में भर लिया…

हवेली के उस कमरे की हवा अब इतनी गाढ़ी और मादक हो चुकी थी। सुगना ने जब सोनी को अपनी बाहों में समेटा, तो वह स्पर्श किसी बड़ी बहन का रत्ती भर भी नहीं था। वह एक कामुक हमराज का घेरा था, जिसने सोनी के रोम-रोम को झंकृत कर दिया।

शेष अगले भाग में …
 
पहली बार अपने चार-पांच लाइन लिखी हैं धन्यवाद

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कुछ लिखते रहिए ताकि मुझे भी पढ़कर मजा आए
 
पढ़ते रहिए मालूम चल जाएगा

देखते रहिए जुड़े रहिए

Coming soon

लगता है सुगना का इंतजार सबको है..

आप क्या चाहते हैं?
 
भाग 183

पदमा की दोनों बेटियां सुगना और सोनी एक दूसरे से सुंदरता में होड़ लगा रही थी। कहानी की वर्तमान नायिका सज धज कर संतान सप्तमी की तैयारी कर रही थी परंतु सुगना …. सुगना थी…



सोनी उसे एक टक देखते रह गई

“दीदी इतनी सुंदर लग रही हो”

सुंदर तो मेरी लाडो रानी लग रही है कितनी प्यारी है

सुगना ने सोनी की तारीफ की..और उसे आलिंगन में भर लिया…



हवेली के उस कमरे की हवा अब इतनी गाढ़ी और मादक हो चुकी थी। सुगना ने जब सोनी को अपनी बाहों में समेटा, तो वह स्पर्श किसी बड़ी बहन का रत्ती भर भी नहीं था। वह एक कामुक हमराज का घेरा था, जिसने सोनी के रोम-रोम को झंकृत कर दिया।

अब आगे..

कुछ ही देर में दोनों बहनें अब रेशमी लिहाफ के भीतर एक-दूसरे के जिस्म की तपिश महसूस कर रही थीं। सुगना की नाइटी का झीना कपड़ा और सोनी के पार्लर से निखरे बदन की रगड़ ने एक अजीब सी सिहरन पैदा कर दी थी।

सुगना ने अपनी टांग सोनी की चिकनी जांघों के बीच फंसा दी और उसके कान के निचले हिस्से पर अपनी गर्म सांसें छोड़ते हुए फुसफुसाने लगी।

सुगना: "सोनी, याद है तुझे वो दोपहर? जब तू जवानी की दहलीज पर थी? मैंने तुझे किवाड़ की ओट से देखा था... तू अपने बिस्तर पर लेटी अपनी जांघों के बीच हाथ डालकर न जाने क्या ढूंढ रही थी। तेरी सांसें फूल रही थीं और तेरा चेहरा सुर्ख हो गया था। बता न, उस वक्त तेरी उस नन्ही सी मुनिया में कैसी हलचल मची थी?"

सोनी का पूरा बदन शर्म और उत्तेजना से दोहरा हो गया। सुगना से उसे ऐसी उम्मीद नहीं थी। उसे अंदाजा हो गया कि सुगना का यह रुप निश्चित ही दादी के नुस्खे का अनुपालन था। उसने अपनी आंखें मींच लीं, पर सुगना की उंगलियां अब उसकी कमर के नीचे सरक रही थीं।

सोनी: (कांपती आवाज में) "दीदी... आप वो सब जानती थीं? हां... मुझे याद है। पहली बार जब वहां गीलापन महसूस हुआ था, तो लगा था जैसे भीतर कोई रस की नदी बह निकली हो। मैं डर गई थी, पर वो बचैनी, वो मीठा दर्द इतना गहरा था कि मैं खुद को छूने से रोक नहीं पाती थी।"

सुगना ने सोनी को छेड़ते हुए आगे कहा और सरयू चाचा की कोठरी में तुमने और विकास ने शादी से पहले जो रंगरेलियां बनाई थी मुझे वह भी पता है।

सोनी को यकीन नहीं हो रहा था यह बात तो राज थी यह सुगना तक कैसे पहुंची…

दीदी यह आपको कैसे मालूम?

सुगना ने सोनू का नाम नहीं लिया और बात टाल दी…सोनू का ख्याल जेहन में आते ही सुगन को सोनू के साथ बिताए कामुक पल याद आने लगे..वो अपनी बुर को दहेज में देना और सोनू का उसे बार छेड़ना..आह…..

सुगना ने एक गहरी आह भरी और सोनी को अपनी छाती से और जोर से चिपका लिया। सुगना के पुष्ट और उन्नत वक्ष सोनी के सीने पर दबाव बना रहे थे।

सोनी अब पूरी तरह सुगना के वश में थी। सुगना की बातों ने उसके भीतर के सारे बांध तोड़ दिए थे।

सोनी: "दीदी, आज पार्लर में जब वो औरत मेरी जांघों के बीच वैक्स लगा रही थी, तो मुझे विकास जी की याद नहीं आ रही थी। मुझे उस गर्म छुअन में एक अजीब सी ललक महसूस हो रही थी। क्या औरतों के बीच भी आकर्षण होता है।"

सुगना ने सोनी की गर्दन पर एक छोटा सा दंश (hickey) दिया, जिससे सोनी के मुंह से एक दबी हुई सिसकारी निकल गई। सुगना अब अपनी बहन को एक कामुक सहेली की तरह तैयार कर चुकी थी। लिहाफ के भीतर दोनों के हाथ-पैर एक-दूसरे में उलझे हुए थे, मानो दो बेलें एक-दूसरे को जकड़ रही हों।

सुगना का घुटना सोने की जांघों के बीच उसकी मुनिया से छू रहा था…जाने अनजाने में सुगना अपने घुटनों को उसकी मुनिया पर धीरे-धीरे रगड़ रही थी और उसे आलिंगन में लिए हुए उत्तेजित कर रही थी।

सुगना ने महसूस किया कि उसके घुटने पर सोनी का काम रस लग चुका है ….शायद उसने दादी की नसीहत को पूरी तरह अमल में ला दिया है… सोनी अब पूरी तरह से 'पिघल' चुकी है। उसने सोनी के ललाट को चूमा और उसकी पीठ सहलाते हुए धीरे-धीरे उसे नींद की ओर ले जाने लगी। सुगना खुद भी अपनी थकान और संतुष्टि के साथ, अपनी बहन को बाहों में जकड़े हुए निद्रा के आगोश में समा गई।।

पर सोनी की आंखों से उसे रात नींद गायब थी सुगना ने उसकी मुनिया में प्यास जगा दी थी । अपने अंदर असीम कामुकता समेटे सोनी बार-बार सुगना पुत्र सूरज को याद कर रही थी पर मिलन संभव नहीं था…संतान सप्तमी का यह संभोग उत्सव उसे अपने पति विकास के साथ ही मनाना था।

अगले दिन दोपहर में बाहर सन्नाटा था. सुगना ने सोनी को मेहंदी लगाने की तैयारी की हुई थी। भीतर के उस बंद कमरे में हवा में मेहंदी की खुशबू छाई हुई थी। सोनी कमरे में आई और कुर्सी पर बैठ का अपने हांथ आगे कर दिए…

अरे मैडम जी हांथ में बाद में. पहले वहां…..सुगना की निगाहों ने सोनी की मस्त चूची को छू लिया…

सोनी (कतराते हुए): "दीदी... रहने दीजिए न। ऐसे आपके सामने... मुझे बहुत शर्म आ रही है।"

पर जब सुगना ने सोनी को अपने वस्त्र उतारने का निर्देश दिया, तो एक पल के लिए सोनी की देह काँप उठी।

सुगना (गंभीर और अधिकारपूर्ण स्वर में): "पगली, आज यह लाज का वक्त नहीं है। बड़ी दादी ने कहा है कि जब तक तेरी देह की 'वेदी' का कोना-कोना नहीं सजेगा, तब तक अनुष्ठान अधूरा रहेगा। मैं तेरी बड़ी बहन हूँ, आज मुझे अपनी सहेली समझ और इस काया को मेरे हवाले कर दे।"

सुगना ने धीरे से सोनी के हाथ से साड़ी का पल्लू छुड़ाया। कुछ ही पलों में सोनी पूरी तरह निर्वस्त्र थी। पार्लर की वैक्सिंग के बाद उसकी त्वचा दूधिया संगमरमर की तरह चमक रही थी। सुगना ने जब अपनी बहन के उस पुष्ट और खिलते हुए यौवन को इतनी करीब से देखा, तो उसकी अपनी साँसें भी भारी होने लगीं

सुगना ने एक बारीक कीप उठाई और सोनी के देह रूपी कैनवास पर 'काम-दीक्षा' के चित्र उकेरना शुरू किया।

सुगना ने सबसे पहले सोनी के पुष्ट उरोजों पर ध्यान केंद्रित किया। उसने बड़ी सावधानी से सोनी की चुचियों के चारों ओर गोल घेरे में बेल-बूटों वाली महीन नक्काशी शुरू की।

सुगना (धीमी, कांपती आवाज़ में): "देख सोनी... ये जो तेरे उरोज हैं, ये किसी पुरुष के लिए मदहोशी का प्याला हैं। इन पर यह मेहंदी जब रचेगी, तो सफ़ेद चंदन के बीच यह सुर्ख लाल रंग उसे पागल कर देगा। जब वह इन्हें अपने हाथों में भींचेगा, तो यह बेलें उसके पोरों पर छप जाएँगी।"

सुगना ने निप्पल्स के ठीक पास छोटे-छोटे बिंदुओं की एक माला बनाई। सोनी की साँसें उखड़ने लगी थीं। सुगना का स्पर्श और मेहंदी की वह ठंडी छुअन सोनी के सीने में अजीब सी हलचल पैदा कर रही थी।

इसके बाद सुगना नीचे की ओर बढ़ी। सोनी की पतली और लचकदार कमर, जो वैक्सिंग के बाद रेशम की तरह चिकनी थी, अब सुगना की कलाकारी का केंद्र थी। सुगना ने सोनी की नाभि के चारों ओर एक गहरा चक्र बनाया और वहाँ से बारीक लहरिया बेलें निकालकर कूल्हों की ढलान तक ले गई।

सुगना: "तेरी यह कमर... किसी नागिन की तरह बलखाती है। जब तू चलेगी और तेरी साड़ी के नीचे से यह मेहंदी की चमक झलकेगी, तो देखने वाले का कलेजा मुट्ठी में आ जाएगा।"

सुगना अपनी उंगलियों से उस चिकनी त्वचा को महसूस कर रही थी और उसके मन में अपनी सूनी रातों की यादें ताज़ा हो रही थीं। वह अपनी बहन की इस 'यौवन-वेदी' को सजाते हुए खुद भी एक छिपी हुई कामुकता का अनुभव कर रही थी।

अंत में बारी आई सोनी की भारी और सुडौल जाँघों की। सुगना ने जाँघों के भीतरी हिस्से पर, जहाँ की त्वचा सबसे कोमल और संवेदनशील होती है, जालीदार काम शुरू किया। उसने ठीक उस जगह के करीब—जिसे सूरज ने 'महोघनी की गाँठ' कहा था—मेहंदी से एक छोटा सा कमल का फूल बनाया।

सुगना (सोनी की आँखों में देखते हुए): "बड़ी दादी ने कहा था कि जाँघों का जोड़ ही वह जगह है जहाँ पुरुष का अहंकार घुटने टेकता है। यहाँ की महक और यह सजावट... उसे तेरी गहराई में उतरने के लिए मजबूर कर देगी। जब वह इन जाँघों के बीच अपना सिर रखेगा, तो उसे स्वर्ग का अहसास होगा।"

सुगना जब मेहंदी लगा रही थी, तो उसके हाथ थरथरा रहे थे। वह अपनी बहन के उन निजी अंगों को इतनी बारीकी से देख और छू रही थी, जैसा उसने अपनी पूरी ज़िंदगी में कभी नहीं किया था। उसकी अपनी साँसें भारी हो गई थीं और वह अनजाने में खुद को उस सुख की कल्पना में पा रही थी जो सोनी को मिलने वाला था।

उधर सोनी की बंद आँखों के सामने सूरज का वह प्यासा चेहरा था। वह सोच रही थी कि क्या होगा जब सूरज उसके इन मेहंदी से रचे अंगों को देखेगा, तो वह क्या करेगा? उसे लग रहा था जैसे सूरज के हाथ अभी से उसकी जाँघों और कमर पर रेंग रहे हैं।

मेहंदी का शृंगार पूरा हुआ। सोनी का शरीर अब किसी जीती-जागती कलाकृति जैसा लग रहा था। सुगना ने धीरे से उस पर इत्र का छिड़काव किया ताकि मेहंदी की रंगत और गहरी हो। मर्यादा की आखिरी जंजीर भी आज उस सुगंधित धुएँ में कहीं खो गई थी।

बनारस की उस महकती दोपहर में, जब सोनी मेहंदी के शृंगार से सराबोर होकर बिस्तर पर लेटी अपनी लाल होती हथेलियों और जाँघों को निहार रही थी, सुगना के मन में एक अजीब सी हड़बड़ाहट थी। बड़ी दादी की बातों के अनुसार, सप्तमी का अनुष्ठान बिना विकास के पूर्ण नहीं हो सकता था।

सुगना और विकास का रिश्ता निराला था। अपनी जवानी के दिनों में जब विकास का दोस्त सोनू लाली के साथ रंगरलियां मना रहा था उस दौरान जब-जब विकास सोनू के साथ उसके घर जाता और उसकी मुलाकात सुगना से होती वह उसकी खूबसूरती पर मोहित हो जाता पर वह जानता था कि सोनू अपनी बड़ी बहन की बहुत इज्जत करता है और उसके बारे में फालतू फालतू बातें सुनना उसे गवारा नहीं होगा।

बाद में जब सोनू और सुगना करीब आ गए तब भी विकास को तब भी इसका एहसास नहीं हुआ और वह सुगना को हमेशा सोनू की एक मर्यादित और सम्मानित बहन के रूप में देखता रहा यहां तक की सोनी से विवाह के पश्चात भी जब सुगना उसकी बड़ी साली बन चुकी थी तब भी उससे हंसी मजाक करने की उसकी हिम्मत कभी नहीं हुई..

उधर सुगना जानबूझकर विकास के साथ हंसी मजाक नहीं करती थी उसे हमेशा यह भय सताता था कि यदि सोनू और उसके बीच चल रहे संबंधों की जानकारी यदि विकास को लग गई तो अनर्थ हो जाएगा इसलिए उसने अपने व्यक्तित्व को विकास के समक्ष एक अलग रूप में ही प्रस्तुत किया था यह अलग बात है कि बीच-बीच में वह हल्की-फुल्की हंसी मजाक कर उसे ससुराल में होने का एहसास कर दिया करती थी।

सरयू सिंह की की मृत्यु के पश्चात तो सुगना का व्यक्तित्व ही बदल चुका था।

पर पिछले कुछ दिनों से सुगना बेहद प्रसन्न थी और सोनी को गर्भवती करने के लिए किया जा रहे हैं इस संतान सप्तमी के अनुष्ठान की तैयारी करते-करते वह और उन्मुक्त हो गई थी उसने तय कर लिया था कि आज मर्यादा और दूरी का तनाव कम करने का वक्त था। विकास उसका जीजा था और उससे अब वह रिश्ता निभाने का वक्त आ गया था।

उसने दबे पाँव बरामदे में जाकर सोनी के पति, विकास को फोन मिलाया।

विकास (फोन उठाते हुए): "अरे सुगना दीदी! सब खैरियत तो है? अचानक इस वक्त फोन?"

सुगना (हल्की रहस्यमयी मुस्कान के साथ): "सब खैरियत है विकास, बस तुम्हारी याद आ रही थी...

विकास …क्या हुआ दीदी

सुगना -सोनी की हालत कुछ ऐसी है कि तुम्हें यहाँ होना चाहिए।"

विकास (चिंता में): "क्या हुआ सोनी को? उसकी तबीयत तो ठीक है न?"

सुगना (हँसते हुए): "तबीयत को छोड़ो, बस यह समझ लो कि बनारस की इस हवेली में तुम्हारे लिए एक ऐसा 'सरप्राइज' तैयार है जिसकी तुमने कल्पना भी नहीं की होगी। सात दिन की छूटी लेकर बनारस आ जाओ ।

विकास की तरफ से कोई समुचित जवाब न पाकर सुगना ने फिर कहा

अगर तुम कल नहीं आए, तो समझो ज़िंदगी का एक बड़ा सुख गँवा दोगे।"

विकास - पर दीदी हुआ क्या साफ-साफ बताइए ना

सुगना -यह तुम्हारी दीदी का नहीं बड़ी साली साहिबा का हुक्म है दामाद जी कल किसी हालत में आ जरूर जाना.. वरना मलाई कोई और चाट जाएगा…

विकास सुगना की आवाज़ में छिपी उस मादकता और ज़िद को भाँप गया। सुगना ने कभी उससे इस अंदाज़ में बात नहीं की थी। विकास को पहले वाली चुलबुली सुगना याद आ गई…इसके बारे में उसने सोनी से बहुत सुन रखा था।

विकास: "दीदी, व्यवसाय में बहुत काम है, पर आपकी ज़िद और इस 'सरप्राइज' ने मेरी उत्सुकता बढ़ा दी है। ठीक है, मैं कल ट्रेन पकड़ता हूँ और रात 8 बजे तक बनारस पहुँच जाऊँगा।"

सुगना: "याद रखना विकास, रात 8 बजे सोनी तुम्हारा इंतजार करेगी। देरी मत करना, क्योंकि 'वेदी' सज चुकी है और ज्योति जलने का इंतज़ार कर रही है।"

विकास - बेदी? ज्योति? मुझे कुछ समझ नहीं आया..

सुगना ”कल आके देख लेना…” सुगना की आवाज में खनक थी जो विकास के दिमाग में चढ़ चुकी थी।

फोन रखकर सुगना के चेहरे पर एक अजीब सी संतोष की लकीर उभरी। वह कमरे के भीतर लौटी जहाँ सोनी अभी भी निर्वस्त्र अवस्था में अपनी रची हुई मेहंदी को सूखते देख रही थी।

सुगना (सोनी के पास बैठकर): "सोनी... तैयारी पूरी कर ले। कल रात 8 बजे विकास आ रहा है। उसे तुझे उस रूप में देखना है जिसे मैंने आज इतनी मेहनत से तराशा है। तेरी यह महकती 'मुनिया' और मेहंदी से रचे ये अंग उसे अपना गुलाम बना लेंगे।"

सोनी का दिल ज़ोर से धड़कने लगा। उसे खुशी तो थी कि उसका पति आ रहा है, पर उसके मन के एक कोने में अभी भी सूरज की वह गरम छुअन और उसकी वह प्यासी नज़रें बसी हुई थीं। वह सोच रही थी कि जब विकास उसे इस 'कामुक' अवतार में देखेगा, तो क्या होगा?

और उस सूरज का क्या, जो ऊपर के झरोखे से एक शिकारी की तरह इस सब पर नज़र गड़ाए बैठा था? यदि उसने उसे इस रूप में देख लिया तब?

सोनी की सांस ऊपर नीचे होने लगी..और उसकी मुनिया के ऊपर आई लार मेंहदी को भिगोने लगी..

सुगना सोनी और उसकी मुनिया को निहार रही थी…मुनिया के होठों पर आया प्रेम रस सुगना की निगाहों से छिपा न रहा…वह लार रिस कर मेहंदी पर आ रही थी..

सुगना ने अपनी तर्जनी से उसे लार को पोछने की कोशिश की। सोनी सिहर उठी। लार सुगना की उंगलियों पर लग चुकी थी परंतु चीनी की चासनी जैसे वह रजरस की बूंद सुगना की तर्जनी और सोनी की मुनिया के बीच एक धागे के रूप में दिखाई पड़ रही थी जैसे वह सुगना की उंगलियों को सोनी की मुनिया के भीतर खींचना चाह रही हो।

नियति सोनी की उत्तेजना और सुगना के प्रयासों की सराहना कर रही थी जिसने अपनी छोटी बहन की कोख भरने के लिए हर वह प्रयास किया जो वह दादी के बताए अनुसार कर सकती थी…

अगली सुबह संतान सप्तमी थी। बनारस की उस ऐतिहासिक हवेली में आज की सुबह कुछ अलग ही सुगंध लेकर आई थी। सूरज की पहली किरण के साथ ही सुगना ने अपनी कमर कस ली थी। सोनी, जो रात भर सुगना की कामुक कहानियों और अपनी ही देह की जागती हुई हलचल के कारण ठीक से सो नहीं पाई थी, आज देर से उठी।

सुगना ने उसे गुलाब जल और केसर के पानी से स्नान कराया। कल दोपहर जो मेहंदी सुगना ने सोनी के अंग-अंग पर रची थी, वह अब सूखकर गहरे कत्थई रंग में तब्दील हो चुकी थी।

सुगना ने बड़ी फुर्सत से सोनी को तैयार करना शुरू किया। उसने गहरे लाल रंग की सिल्क की बनारसी साड़ी निकाली, जिसका बॉर्डर सोने के काम से भारी था।

सुगना ने सोनी को ब्लाउज पहनाया जिसका गला काफी गहरा था। सोनी की चुचियों पर जो बारीक मेहंदी की बेलें सुगना ने बनाई थीं, वे अब उस गहरे गले के भीतर से रह-रहकर झाँक रही थीं। ऐसा लग रहा था मानो वे छिपे हुए खजाने का पता दे रही हों।

सुगना ने सोनी की माँग में गहरा सिंदूर भरा, आँखों में काजल लगाया और उसके कानों में भारी झुमके पहनाए। कमरबंद जब सोनी की उस मेहंदी रची कमर पर कसा गया, तो उसकी कामुकता देखते ही बनती थी।

जब सोनी पूरी तरह तैयार होकर आईने के सामने खड़ी हुई, तो वह किसी साधारण स्त्री जैसी नहीं, बल्कि साक्षात स्वर्ग से उतरी रति लग रही थी। सुगना ने उसे एक नव-वधू की तरह सजाकर हॉल की ओर चलने का इशारा किया।

जैसे ही सोनी ने हॉल में कदम रखा, वहाँ मौजूद सभी महिलाओं—रीमा, मालती, सुगना की माँ पद्मा और कजरी—की नजरें उस पर ठिठक गईं।

पद्मा (विस्मित होकर): "अरे! ई त साक्षात लक्ष्मी उतर अइली हवेली में। सुगना, आज का जादू कइलू अपनी बहिन पर?"

कजरी और रीमा तो जैसे अपनी पलकें झपकना ही भूल गई थीं। सोनी का वह रूप, उसकी वह मादक चाल और अंगों से उठती इत्र की वह तीखी खुशबू पूरे हॉल में छा गई थी।

तभी सूरज वहाँ पहुँचा। जैसे ही उसकी नज़र अपनी 'मौसी' पर पड़ी, उसका कलेजा हलक में आ गया। उसने देखा कि जो अंग उसने कल रसोई में करीब से देखे थे, वे आज शृंगार और मेहंदी के जाल में और भी प्रलयकारी लग रहे थे। गहरे नीले ब्लाउज के भीतर से झाँकती वह मेहंदी सूरज को पागल कर रही थी। उसे वह 'महोघनी की गाँठ' याद आने लगी, जिसकी कल्पना ने उसे रातों से सोने नहीं दे रही थी ।

सूरज (मन ही मन): "हे विधाता! इतनी खूबसूरती... इतनी मादकता? यह तो साक्षात अप्सरा है। क्या आज रात मैं इस रूप की पूजा कर पाऊँगा?"

सभी महिलाएँ 'संतान सप्तमी' के उस विशेष पूजन में लग गईं। वे मंगल गीत गा रही थीं, ढोलक की थाप गूँज रही थी, पर सूरज की निगाहें केवल सोनी पर टिकी थीं। सोनी जब झुककर थाली सजाती, तो उसकी साड़ी का पल्लू सरक जाता और उसकी गोरी पीठ पर रची मेहंदी सूरज के पौरुष को ललकारती।

सोनी को भी अहसास था कि सूरज उसे एक शिकारी की तरह देख रहा है। उसे सुगना की रात वाली बातें याद आ रही थीं कि कैसे पुरुष स्त्री के रूप को देखकर बेकाबू हो जाता है। सूरज की उन दहकती आँखों ने सोनी के भीतर की 'काम-अग्नि' को और भड़का दिया था।

पूजन के उस शोर-शराबे के बीच, सोनी और सूरज की आँखों का मिलन हुआ। उस एक पल में जैसे बिजली कौंध गई। सोनी की आँखों में एक चुनौती थी और सूरज की आँखों में एक बेबाक प्यास। हवेली की दीवारें अब उस रात की गवाह बनने को बेताब थीं, जब विकास (सोनी का पति) आने वाला था, पर सूरज अपनी प्यास बुझाने का मौका ढूँढ रहा था।

हवेली के उस उत्सवपूर्ण वातावरण में पूजा संपन्न हो चुकी थी, सबकी मन्नते अलग अलग थी….घर की बुजुर्ग महिलाएं सोनी के गर्भवती होने की कामना कर रही थी। सुगना भी यही कामना कर रही थी साथ ही साथ सूरज की खुशी की भी कामना कर रही थी बिना यह जाने की सूरज की खुशी सोनी नकी जांघों के बीच छुपी थी जिसका श्रृंगार उसने स्वयं किया था।

सोनी की मिन्नतें विधाता खुद भी नहीं समझ पा रहे थे…सूरज जैसा तेजस्वी पुत्र, भी सूरज के संसर्ग का अद्भुत कामसुख अपने पति का प्यार। सुगना का साथ न जाने क्या क्या…अपनी वासना और समर्पण के बीच सोनी की मनोदशा विधाता समझ चुके थे।

मालती और रीमा ईश्वर से अपनी मौसी जैसा गदराया बदन मांग रहीं थीं।

और सूरज की मिन्नत क्या होगी ये सम सब जानते हैं।

लेकिन सोनी के इर्द-गिर्द का घेरा अब भी कम नहीं हुआ था। सूरज की निगाहें किसी भूखे शिकारी की तरह सोनी के हर कदम का पीछा कर रही थीं। वह चाहता था कि किसी तरह एक बार सोनी उसे अकेले में मिल जाए, ताकि वह उसके उस 'सोलह श्रृंगार' को करीब से देख सके, उस नीले ब्लाउज के भीतर छिपी मेहंदी की नक्काशी को छू सके।

लेकिन सोनी आज अत्यंत सतर्क थी। उसे पता था कि सूरज की आँखों में जो वासना की ज्वाला है उसके संपर्क में आते ही उसके सब्र का बांध टूट जाएगा और…हे भगवान …नहीं ये विकास का हक है…., । इसी अंदेशे में वह साये की तरह सुगना के साथ चिपकी रही।

शाम ढलने लगी थी और हवेली की पीली रोशनी में सोनी का रूप और भी घातक लग रहा था। सूरज की बहनें, मालती और रीमा, जो अपनी मौसी के इस अचानक बदले हुए और अत्यंत कामुक रूप को देख रही थीं, उनके मन में ढेरों सवाल थे।

रीमा (सुगना के पास आकर फुसफुसाते हुए): "चाची, यह कैसा अनुष्ठान है? मौसी तो आज बिल्कुल दुल्हन जैसी लग रही हैं। और यह कैसी खुशबू है जो पूरे हॉल में महक रही है?"

मालती: "हाँ माँ, क्या यह कोई गुप्त पूजा है? हमें भी तो बताइए।"

सुगना ने एक गहरी सांस ली। वह जानती थी कि बड़ी दादी ने जो 'काम-दीक्षा' और 'देह-वेदी' की बातें बताई थीं, वे इन कुंवारी लड़कियों के कान के लिए नहीं थीं। उसने बड़ी चतुराई से अपनी बेटियों की बातों को टाल दिया।

सुगना (सख्ती से): "तुम लोग अपनी पढ़ाई और घर के कामों पर ध्यान दो। यह बड़ों की रीत है, समय आने पर सब समझ जाओगी। जाओ, जाकर रसोई में कजरी दादी की मदद करो…।"

सूरज दूर खड़ा यह सब देख रहा था। उसका धैर्य अब जवाब दे रहा था। शाम के 6 बज चुके थे। बनारस की गलियों में शंख की आवाज़ें गूँजने लगी थीं, जो संध्या आरती का संकेत थीं।

सूरज ने देखा कि सोनी जब चलती थी, तो उसकी साड़ी की सरसराहट और उसके गहनों की झंकार उसके पौरुष को ललकार रही थी। सोनी जानबूझकर सूरज से नजरें चुरा रही थी, पर उसे अपने जिस्म पर सूरज की नज़रों की तपिश महसूस हो रही थी। विकास (उसका पति) रात 8 बजे आने वाला है, लेकिन उससे पहले के यह 2 घंटे और सूरज की बेताबी…..सोनी के लिए किसी बड़ी परीक्षा से कम नहीं थे।

उधर सूरज मन ही मन सोच रहा था:

"आज मौसी ने जो जाल बुना है, उसमें वह खुद भी फंसी हैं। यह श्रृंगार, यह मेहंदी...क्या यह सब मौसा जी के लिए है? नहीं, नही….जिस अमृत कुंड को मैंने उस रात सिंचित किया था, उसका यह रूप देखने का पहला हक मेरा है।"

हवेली में सन्नाटा बढ़ने लगा था, पर सोनी के दिल की धड़कनें और सूरज की बेताबी अब एक नए टकराव की ओर बढ़ रही थी। घड़ी की टिक-टिक जैसे किसी बड़े विस्फोट की आहट दे रही थी।

घड़ी की सुइयां 7 की तरफ बढ़ रही थीं और सुगना के मन में बेचैनी बढ़ने लगी थी। सुगना चाहती थी कि विकास जब बनारस की धरती पर कदम रखे, तो सबसे पहले उसे सोनी का वह 'नया अवतार' दिखाई दे।

तभी सुगना ने एक ऐसा पासा फेंका, जिसकी कल्पना न सोनी ने की थी और न ही सूरज ने।

सुगना (सोनी से): "सोनी, जा... तू खुद अपनी गाड़ी लेकर स्टेशन चली जा। विकास जी को अच्छा लगेगा। ए

सोनी का कलेजा धक से रह गया। उसे पता था कि घर का ड्राइवर आज छुट्टी पर है। तभी सुगना की नज़र पास ही खड़े और मौक़े की तलाश में घूम रहे सूरज पर पड़ी।

सुगना: "सूरज बेटा, ड्राइवर तो है नहीं। तू अपनी मौसी को लेकर ज़रा स्टेशन चला जा। विकास जी को साथ लेकर आ जाना।"

सूरज के लिए तो जैसे विधाता ने खुद जन्नत के दरवाज़े खोल दिए थे। उसकी 'बल्ले-बल्ले' हो गई। उसके चेहरे पर एक ऐसी मुस्कान आई जिसे वह छिपाने की कोशिश कर रहा था, पर उसकी आँखों की चमक सब कह रही थी।

सूरज (उत्साह दबाते हुए): "हाँ माँ, क्यों नहीं! मैं अभी गाड़ी निकालता हूँ। मौसी को ज़रा भी तकलीफ़ नहीं होने दूँगा।"

सोनी बुरी तरह सकपका गई। उसे सूरज के साथ उस एकांत का डर सताने लगा, जिससे वह दोपहर भर बचती रही थी। उसे पता था कि सूरज की नज़रों में कितनी 'आग' है।

सोनी (घबराते हुए): "नहीं दीदी... मैं ऐसे सजी-धजी कहाँ जाऊँगी? सूरज ही जाकर उन्हें ले आएगा न। मैं घर पर रहकर इंतज़ार करूँगी।"

सुगना (ज़िद के साथ): "नहीं, तू जाएगी। तू गाड़ी से मत उतरना, बस अंदर बैठी रहना। विकास को सरप्राइज़ मिलेगा तो उसकी सारी थकान मिट जाएगी। जा, देर मत कर।"

सुगना की ज़िद के आगे सोनी की एक न चली। आखिरकार, सोनी की धड़कनें तेज हो गई। सोनी उस महँगी बनारसी साड़ी को संभालते हुए बाहर निकली। सूरज पहले ही गाड़ी की सामने वाली सीट का दरवाज़ा खोलकर एक दरबारी की तरह खड़ा था।

जैसे ही सोनी गाड़ी के भीतर बैठी, उसकी देह से उठती इत्र की खुशबू ने गाड़ी के छोटे से केबिन को एक 'कामुक चैम्बर' में बदल दिया। सूरज ने ड्राइवर की सीट संभाली..

सोनी और सूरज की जोड़ी कुछ ही देर में सुगना की नजरों से ओझल हो गई…सुगना ने अनजाने में वह कर दिया था जो शायद सोनी के गर्भवती होने के लिए बेहद जरूरी था

शेष अगले भाग में

 
शुक्रिया आपका, जो प्रेम की भाषा समझते हो,



कलाकार की कलम को इतना सम्मान देते हो।

सोनु, सुगना और लाली की यह त्रयी सजेगी अब,

शब्दों के आंगन में चाहत की बारिश होगी कब।

दृश्य की शुरुआत: ढलती शाम की रेशमी धूप, छत की मुंडेर का कोना,

बीच में सोनु खड़ा, जैसे कोई अनमोल सोना।

एक तरफ सुगना की हँसी, जैसे चाँदनी का झरना,

दूसरी तरफ लाली की आँखों का, मदहोश कर देना।

सोनु की नजरों में थी धीमी सी एक आग,

जिसे देखकर सुगना के गालों पर खिला गुलाबी फाग।

सुगना ने जब झुकाई पलकें, शर्म की आँच में जलकर,

सोनु का दिल धड़क उठा, उसकी मासूमियत पर मरकर।

तभी लाली करीब आई, अपनी कातिल अदा लिए,

जैसे जलती शमा के पास, कोई परवाना जिए।

उसने सोनु के कंधे पर, धीरे से हाथ जो रखा,

मानो हवाओं ने भी, अपना रास्ता बदल कर चखा।

मधुर केमिस्ट्री का जादू: एक ओर सुगना की सादगी, मीठी मिश्री सी घुलती,

दूजी ओर लाली की छुअन, जो प्यास जगाती चलती।

सोनु फँसा था बीच में, दो लहरों के दरमियाँ,

एक ओर सुकून का साहिल, दूजी ओर तूफानी दरियाँ।

लाली की नशीली बातों ने, माहौल को गर्म किया,

सुगना की खामोश चाहत ने, दिल को नर्म किया।

तीनों के बीच वो रिश्ता, जैसे मखमली अहसास,

जहाँ शब्दों से ज्यादा गहरी थी, सासों की प्यास।

नजदीकियाँ बढ़ीं कुछ ऐसे, कि वक्त ठहर सा गया,

प्यार का वो मीठा नशा, रग-रग में उतर सा गया।

शर्म की आँच थी मद्धम, और ख्वाहिशों का था शोर,

खींच रही थी चाहत सबको, अपनी अनजानी डोर।

मेरी कलम को मान दिया, इसके लिए धन्यवाद,

आपकी दाद रहेगी हमेशा, मुझको याद।

लिख दिया है दृश्य छोटा, आपकी पसंद के नाम,



स्वीकार करें 'लवली आनंद' का, यह प्रेम-प्रणाम!
 
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