भाग 182
दादी ने पूजा पाठ की भी कुछ विधियां सुगना और सोनी को बताई और दोनों बहने ध्यान से उसे सुनती रहीं।
दादी का एक-एक शब्द सोनी के सीने में संवेदना पैदा कर रहा था। सोनी और सुगना दोनों कामुक थी पर दोनों ने कभी एक दूसरे के समक्ष अपनी इस विद्या के बारे में कभी ना तो जिक्र किया था और नहीं दोनों इतनी खुली हुई थी।
वह मन ही मन सोच रही थी कि सुगना दीदी जो घर में मर्यादा की प्रतिमूर्ति थी वह उसे इस कामुक अनुष्ठान के लिए किस तरह से तैयार करेंगी…
आग आगे…
सोनी और सुगना जब तक कुछ और पूछती तब तक सुगना की सहेली ने उसे गीत संगीत के कार्यक्रम में बुला लिया और दोनों बहने दादी को छोड़कर अन्य महिलाओं के बीच में चली गई।
छठी का कार्यक्रम चल रहा था परंतु सोनी अपनी दुनिया में मगन थी उसे इन सब अनुष्ठानों पर ज्यादा विश्वास नहीं था पर कुछ दिनों पहले उसने जो सूरज के साथ संभोग किया था और उसके वीर्य को अपने गर्भ में धारण किया था उसे कहीं ना कहीं यह बात सोच रही थी कि यदि वह सूरज के वीर्य से गर्भवती हो गई तो?
कार्यक्रम की समाप्ति के पश्चात दोनों बहने घर की तरफ चली पर दोनों इस बारे में एक दूसरे से बातें करने में कतरा रही थी।
जैसे ही वे हवेली के मुख्य द्वार के भीतर घुसीं, ऊपर के झरोखे से सूरज उन्हें देख रहा था। उसकी आँखों में एक शिकारी वाली चमक थी, मानो उसे पता चल गया हो कि अब हवेली की दीवारें किसी बड़े कांड की गवाह बनने वाली हैं।
दादी के कहे अनुसार सोनी को सुगना ने अपने कमरे में ही साथ में सोने के लिए बुला लिया था। परंतु दादी ने जो सुगना से उम्मीद की थी वह पूरा करना बेहद कठिन था। बिस्तर पर करवटें बदल रही सुगना के दिमाग में दादी की बातें घूम रही थी दादी ने सुगना से जिस कामुकता की उम्मीद की थी वह उसे वर्षों पहले छोड़ आई थी। क्या यह उचित होगा…अब तक जिस कामुकता को उसने त्याग रखा था क्या वह उसे सामान्य रूप में अपना पाएगी…रात के पिछले पहर हवेली का सन्नाटा गहरा गया था। सुगना की बंद आंखों के पीछे स्मृतियों का एक तूफान उमड़ रहा था। अवचेतन मन हावी हो रहा था।अचानक, कमरे की हवा में वही पुरानी चिर-परिचित=सलेमपुर की गंध घुलने लगी— जो कभी सरयू सिंह की पहचान हुआ करती थी।
सुगना ने खुद को एक धुंधले गलियारे में पाया। सामने वही कद-काठी और वही रौबीली मूंछें थीं—सरयू सिंह खड़े थे। उन्हें देखते ही सुगना के भीतर का अपराधबोध ज्वालामुखी की तरह फट पड़ा।
सुगना के पैर कांपने लगे, वह घुटनों के बल बैठ गई और सिसकते हुए अपना चेहरा हाथों से ढंक लिया।
सुगना: "काहे आइल बानी रउआ? काहे हमके आपन परछाईं देखावत बानी? जेकरा के हम अपना 'सरबस' मानलीं, आपन सब कुछ न्योछावर कर देनी, ऊ हमार जनमदाता निकलल... हे भगवान! ई कवन पाप हमरा हाथे करवा देनी? हमरा कोख से जनमल सूरज... राउर अंश हवे, अउर हम... हम रउवे संतान रहनी। ई महापाप के बोझ लेके हम कइसे जियब?"
सरयू सिंह धीमे कदमों से आगे बढ़े। उनकी परछाईं सुगना पर पड़ी, पर उसमें कोई वासना नहीं, बल्कि एक असीम ठहराव था। उन्होंने झुककर सुगना के सिर पर हाथ रखा।
सरयू सिंह: "उठ सुगना... अपना नजर उठा। जे बोझ तू लादले बाडू, ऊ तोहार हइये नईखे। ओहि घरी ना त हमके पता रहे कि तू हमार धीया हऊ, अउर ना तोहके मालूम रहे कि हम तोहार बाप हई।
जवन काम अनजाने में भइल, ऊ 'पाप' ना, खाली विधाता के खेल ह।"
सरयू सिंह ने सुगना का हाथ थामकर उसे खड़ा किया। उनकी आंखों में एक पिता की करुणा झलक रही थी।
सरयू सिंह: "दुनिया अउर समाज के बनवल मर्यादा देह खातिर होला सुगना, आत्मा खातिर ना। हमनी के जवन जियनी, ऊ ओहि समय के सच रहे। अगर करम के लेख हमनी के ओहि मोड़ पर मिलवलस जहाँ हमनी अनजान रहनी, त ओकरा में तोहार का गलती? का तू अपना ओहि खुशी के, ओहि मया (प्रेम) के खाली एह खातिर 'गंदा' कह देबू काहे कि आज तोहके हमर नाम मिल गइल बा?"
सुगना: "हम अपना के कइसे माफ करीं? जबो सूरज के देखिला, हमके अपना ओहि 'अपराध' के याद आवेला।"
सरयू सिंह: "ना सुगना। सूरज तोहार अपराध ना, तोहार शक्ति हउवे। ऊ हमार अउर तोहार संगम के।निशानी हवे—एगो अइसन सच जेकरा के तू नकार ना सकबू। अब ऊ बनारस के शान ह ओकर मां अपराध में जीए ई ठीक नइखे।
अब हमार बात ध्यान से सुन... हम तोहके एह आत्मग्लानि से आजाद करे ही आइल बानी।
उन्होंने सुगना के चेहरे को अपने दोनों हाथों में थाम लिया।
सरयू सिंह: "तोहके हमसे वादा करे के परी। तू आजे, एही घरी ओहि 'अपराधबोध' के जरा के राख कर देबू। तू एगो मेहरारू हऊ, अउर मेहरारू के देह के खिलल, रहे के चाहि ठीक वैसे ही जैसे तू आइल रहलू।
हमारा देह त्यागे से पहले जैसन तू रहलु ठीक ओसही रहबु ई वादा कर।बिना कवनो डर के, बिना कवनो बोझ के... खुल के जीया। अपना देह अउर मन के पियास के स्वीकार कर, काहे कि तृप्त नारी ही सृजन (creation) कर सकेली।"
सरयू सिंह मुस्कुराए और धीरे-धीरे धुंध में ओझल होने लगे। उनकी आखिरी आवाज कमरे में गूँज रही थी..
तृप्त नारी ही सृजन (creation) कर सकेली।"
अचानक सुगना की आंखें खुल गईं। उसका पूरा बदन पसीने से तर-बतर था, पर उसके सीने पर जो भारी बोझ था, वह अब गायब हो चुका था। खिड़की से बाहर भोर की पहली किरण फूटने को बेताब थी। सुगना ने अपने बगल में सोई सोनी की ओर देखा और उसके चेहरे पर एक ऐसी रहस्यमयी और कामुक मुस्कान आई, जो बरसों बाद लौटी थी। सुगना अब 'मर्यादा की प्रतिमूर्ति' नहीं, बल्कि अपनी इच्छाओं की स्वामिनी बन चुकी थी।
बनारस की उस हवेली में अगली सुबह एक अलग ही महक लेकर आई थी। यद्यपि सोनी और सुगना के मन के किसी कोने में यह बात पत्थर की लकीर की तरह अंकित थी कि उम्र के इस पड़ाव पर सोनी के जीवन में संतान का योग शायद अब शेष नहीं, पर सुगना का ममतामयी आग्रह और सूरज के उस हालिया 'पौरुष-अभिषेक' ने सोनी के भीतर एक अनकही उम्मीद की लौ जला दी थी।
सूरज की दी हुई वह गर्म छुअन और उसके वीर्य का वह अर्पण, जो कुछ दिन पहले ही सोनी के गर्भ ने आत्मसात किया था, आज उसे इस पूजा के लिए एक नई ऊर्जा दे रहा था।
बनारस की तपिश और हवेली के भीतर सुलगते रहस्यों के बीच, सुगना और सोनी एक ऐसे पड़ाव पर खड़ी थीं, जहाँ मर्यादा और तृप्ति के बीच की लकीर धुंधली पड़ने वाली थी। बड़ी दादी की बातों ने सुगना के मन में एक अजीब सी हलचल पैदा कर दी थी। वह यह तो नहीं जानती थी कि सोनी और सूरज के बीच क्या 'आग' लग चुकी है, लेकिन उसे यह विश्वास हो गया था कि सोनी के मातृत्व का द्वार उसकी 'कामेच्छा' को जगाने से ही खुलेगा।
और आज, उसी काम-अग्नि को प्रज्वलित करने का पहला चरण था—ब्यूटी पार्लर।
सुगना, सोनी को लेकर शहर के सबसे महंगे और आलीशान 'अप्सरा ब्यूटी लाउंज' पहुँची। पार्लर के भीतर की ठंडी हवा, मद्धम संगीत और चारों तरफ फैली महँगी क्रीमों और इत्रों की भीनी-भीनी खुशबू ने बाहर की गर्मी को भुला दिया। चारों तरफ बड़े-बड़े आईने लगे थे, जिनमें रोशनी नहा रही थी।
पार्लर की मालकिन, रीता, ने सुगना का स्वागत किया। सुगना ने उसे एक तरफ ले जाकर, बड़ी दादी के निर्देशों के अनुसार, कुछ खास हिदायतें दीं। रीता मुस्कुराई और उसने सोनी को एक आलीशान कमरे में ले जाने का इशारा किया, जहाँ सिर्फ 'फुल बॉडी ट्रीटमेंट' होता था। सुगना भी उसके साथ ही अंदर गई। वह अपनी बहन के इस कायाकल्प को अपनी आँखों से देखना चाहती थी, आखिर उसकी 'तैयारी' की ज़िम्मेदारी उसी की तो थी।
सोनी को एक मुलायम, सफेद गाउन पहनने को दिया गया। जब वह उस गाउन में तैयार होकर ट्रीटमेंट टेबल पर लेटी, तो उसका गोरा रंग उस सफेद गाउन पर और भी खिल उठा। उसकी आँखों में अजीब सा संकोच और उत्साह मिला-जुला था। सुगना पास ही एक आरामदेह कुर्सी पर बैठ गई।
शुरुआत हुई 'फुल बॉडी मसाज' से। दो कुशल थेरेपिस्ट्स ने सोनी के शरीर पर लैवेंडर और जोजोबा ऑयल का मिश्रण लगाना शुरू किया। उनके हाथों के जादुई स्पर्श से सोनी की थकान उतरने लगी। सुगना एकटक अपनी बहन को देख रही थी। तेल से सनी सोनी की देह उस मद्धम रोशनी में किसी संगमरमर की मूरत जैसी चमक रही थी। सुगना ने गौर किया कि कैसे सोनी के उभार, उसकी पतली कमर और सुडौल जंघाएं उस तेल की चिकनाहट में और भी प्रलोभक लग रहे थे। सुगना के भीतर कहीं एक ठंडी आह सी उतरी। उसने अपनी देह की तुलना सोनी के इस उबलते यौवन से की, और उसके मन में एक अजीब सी 'कामुकता' ने जन्म लिया। उठी…सोनी के मादक बदन की मालिश सुगना को उकसा रही थी।
जब से सूरज डाक्टर बना था तब से सुगना के जीवन में एक सुखद बदलाव आया था। अब वह खुलकर हंसती थी मुस्कुराती थी…ऐसा लगता था जैसे वह सरयू सिंह के साथ अनजाने में किए पाप के लिए खुद को माफ कर दिया हो..
सुगना सोनी के बदन पर हो रही मालिश को देख रही थी…और उसे वो दिन याद आने लगा जब सरयू सिंह सूरज के जन्म के बाद उसके बदन पर तेल लगा रहे थे…
सुगना को वो घटनाक्रम चलचित्र की भांति अपनी आंखों के सामने दिखाई पड़ने लगा…सरयू सिंह का वह प्यार और प्यार के वह रूप सुगना मदहोश होने लगी..
(विवरण के लिए भाग 6 एवं 7 पढ़ सकते हैं))
सुगना ने अपने बदन में आज कई दिनों बाद उत्तेजना महसूस की….और उसकी जादुई बुर मुस्कुरा उठी।
सोनी के बदन की मालिश के बाद बारी आई सबसे महत्वपूर्ण चरण की—'हनी-चॉकलेट वैक्सिंग'। रीता ने खुद यह काम संभाला। गरम, महकती हुई चॉकलेट वैक्स जब सोनी की कोमल त्वचा पर लगाई गई, तो वह हलके से सिहर उठी। सुगना अपनी सांसें थामे देख रही थी। रीता ने पहले हाथों और पैरों से शुरुआत की। जैसे-जैसे वैक्स की पट्टियाँ खिंचतीं, सोनी की त्वचा एकदम मक्खन जैसी चिकनी और चमकदार होती जाती।
सुगना अपनी बाहों को निहार रही थी भगवान ने उसे इतनी खूबसूरत त्वचा दी थी जिस पर एक रोवा तक न था…(सिर्फ उस जगह को छोड़ कर जहां…सोनू और सरयूसिंह जल चढ़ाते आए थे) उसे न तो किसी वैक्सिंग की जरूरत थी न..किसी पार्लर की…
अब बारी थी 'इंटीमेट वैक्सिंग' (बिकनी वैक्स) की। सुगना की उपस्थिति से सोनी लाज से लाल हो गई और उसने सुगना की तरफ देखा। सुगना ने मुस्कुराकर उसे ढांढस बंधाया। रीता ने कुशलता से वैक्स अप्लाई किया। सोनी की जाँघों के बीच की वह कोमल, अदृश्य त्वचा जब पहली बार हवा के संपर्क में आई, तो वह काँप उठी।
सुगना ने देखा कि कैसे सोनी के शरीर का हर कोना अब निर्वस्त्र और बेपर्दा हो रहा था। रीता ने बड़ी सावधानी से उस 'निषिद्ध क्षेत्र' को भी वैक्स किया, जिसे सूरज ने 'महोघनी की गाँठ' कहा था (हालांकि सुगना इस नाम से अनजान थी, पर वह उसकी पवित्रता और महत्ता समझ रही थी)। वैक्सिंग के बाद, रीता ने उस हिस्से पर एक खास ठंडा लोशन और 'इंटिमेट डियोडरेंट' लगाया, जिसकी खुशबू बहुत ही उत्तेजक थी।
सुगना यह सब देख रही थी और उसके भीतर एक अजीब सा 'उबाल' आ रहा था। वह सोनी की उस बेदाग, रेशमी देह को देखकर खुद को भी वासना के एक अजब दौर में फंसा हुआ महसूस कर रही थी। उसे लग रहा था जैसे यह सारी तैयारी उसी के लिए हो रही हो, वह खुद को उस बिस्तर पर लेटी हुई कल्पना करने लगी।
वैक्सिंग के बाद 'मिल्क एंड हनी बाथ' हुआ। सोनी को एक बड़े से टब में बिठाया गया, जिसमें दूध, शहद और गुलाब की पंखुड़ियाँ तैर रही थीं। दादी की बात याद कर सुगना ने आग्रह कर खुद अपने हाथों से सोनी की पीठ और बाहों पर वह शाही उबटन लगाया। जब वह सोनी के भीगे शरीर को छू रही थी, तो उसे उसकी त्वचा की गर्मी और कोमलता का अहसास हुआ। उसके अपने हाथ कामवासना से कांपने लगे। उसने अपनी बहन के उन "जोबन" को करीब से देखा, जिन्हें दादी ने सजाने को कहा था। वे अब दूध और शहद के लेप में और भी पुष्ट और आमंत्रक लग रहे थे। सुगना ने चुपके से अपनी उंगलियों से उन्हें स्पर्श किया, और एक बिजली सी उसके पूरे शरीर में दौड़ गई। सोनी को सुगना का यह स्पर्श अनोखा और उत्तेजक लगा। सुगना रुकी नहीं अपितु उसने सोनी की चुचियों पर न सिर्फ उबटन लगाया बल्कि उसे धीरे घूरे मसल मसल कर सोनी की चूची को चमका दिया…यह क्रिया जितना उत्तेजक सोनी के लिए थी उतना सुगना के लिए भी।
सुगना दादी के बताएं अनुसार बड़ी बहन का किरदार छोड़ एक कामुक सहेली के नए और अनोखे रूप में थी।
सोनी आश्चर्यचकित थी पर पार्लर में होने की वजह से दोनों के बीच ज्यादा बात नहीं हो पा रही थी।
स्नान के बाद, सोनी का 'फेशियल' और 'हेयर स्पा' हुआ। उसके बालों को स्टीम दी गई और एक महँगा सीरम लगाया गया, जिससे वे रेशम की तरह लहराने लगे। चेहरे पर 'गोल्ड फेशियल' ने वह चमक ला दी, जिसके बारे में बड़ी दादी ने कहा था—"गुलाब नियर खिलल बा"।
आखिर में, रीता ने सोनी के शरीर के खास हिस्सों (गर्दन के पीछे, कलाई, कानों के पीछे, और जाँघों के बीच) पर एक अत्यंत दुर्लभ और तीखा 'अरबी इत्र' छिड़का। इस इत्र की खुशबू ऐसी थी कि वह किसी भी पुरुष के पौरुष को पल भर में जगा दे।
जब सोनी पूरी तरह तैयार होकर आईने के सामने खड़ी हुई, तो खुद सुगना भी उसे देखकर मोहित हो गई। वह कोई साधारण महिला नहीं, बल्कि साक्षात रति लग रही थी। उसका अंग-अंग महक रहा था, उसकी त्वचा रेशम से भी ज़्यादा चिकनी थी, और उसकी आँखों में एक ऐसी गहरी, तृप्त प्यास थी जो किसी को भी अपने आगोश में ले ले।
एक पल के लिए सुगना ने मन ही मन सोचा और विधाता से प्रार्थना की की हे महाप्रभु सूरज के लिए भी इतनी ही सुंदर और खूबसूरत बहु देना…
सुगना ने सोनी के सिर पर हाथ रखा। उसकी आँखों में खुशी के आँसू थे, पर उसके भीतर एक दबी हुई काम-अग्नि भी सुलग रही थी। वह अपनी बहन की इस 'कामुक देह' को देखकर गर्वित थी, पर साथ ही वह खुद भी उस अपनी जांघों के जोड़ पर आए रिस आए प्रेम रस को छूने के लिए व्याकुल हो उठी थी,
उसे नहीं पता था कि यह 'तैयारी' हवेली में कौन सा नया तूफ़ान लाने वाली है, लेकिन एक बात तय थी—बनारस की उस हवेली में अब कोई भी मर्यादा सुरक्षित नहीं रहने वाली थी।
हवेली की दहलीज पर कदम रखते ही ऐसा लगा मानो पूरे वातावरण में एक मादक सुगंध तैरने लगी हो। ढलते सूरज की किरणें जब झरोखों से छनकर सोनी के दमकते चेहरे और रेशमी बदन पर पड़ीं, तो देखने वालों की आंखें चौंधिया गईं।
पार्लर से निखरी सोनी के अंग-अंग से कामदेव की आभा झलक रही थी। उसका चेहरा 'गोल्ड फेशियल' की वजह से कुंदन की तरह चमक रहा था और इत्र की वह तीखी अरबी खुशबू पूरे दालान में फैल गई थी।
सबसे पहले कजरी और पदमा की नजर उन पर पड़ी। दोनों के हाथ जहाँ के तहाँ रुक गए। कजरी ने अपनी साड़ी का पल्लू दाँतों तले दबा लिया और विस्मय से बोली:
कजरी: "ए पदमा! तनी देख ता, हमार सोनी बिटिया एकदम नईकी दुलहिन जैसन लागत बिया कि ना? अरी सुगना, तू त एकरा के अइसन सजा देले बाड़ू जइसे अभी-अभी सात फेरे लेके कोहबर से निकलत होखे! एकर रूप त अइसन खिलल बा कि नजरिए नहीं हटत बा।"
पदमा ने भी चकित होकर सोनी के चमकते बदन को निहारा और अपनी देहाती बोली में सुर मिलाया:
पदमा: "एकदम साँच कहत बाड़ू कजरी। ई उमर में भी सोनी के बदनवा अइसन कंचन जैसन दमकत बा कि नईकी दुलहिन सब एकरा आगे फीकी पड़ जइहें। सुगना, आज शहर से कवन जादू क के अइले बाड़ू रे? ई त साक्षात अप्सरा लागत बिया!"
सुगना, जिसके भीतर खुद एक कामुक ज्वार उमड़ रहा था, बस एक रहस्यमयी मुस्कान बिखेर कर रह गई। उसे पता था कि यह चमक सिर्फ बाहरी क्रीमों की नहीं, बल्कि उस आंतरिक 'कामुक अनुष्ठान' की तैयारी है जो दादी ने सुझाई थी।
तभी घर की जवान बेटियाँ, मालती और रीमा, जो अपनी चंचलता के लिए जानी जाती थीं, दौड़ती हुई आईं। सोनी की बदली हुई काया, उसकी मक्खन जैसी चिकनी बाहें और गले के पास चमकती रेशमी त्वचा देखकर वे ठिठक गईं।
मालती ने सोनी का हाथ अपने हाथ में लिया और उसकी कोमलता महसूस कर चकित रह गई।
मालती: "मौसी ये क्या करिश्मा है? आपके हाथ तो इतने मुलायम हो गए हैं जैसे रुई का फाहा। और ये कैसी खुशबू है? मेरा तो जी कर रहा है कि आपको बस निहारती रहूँ।"
रीमा (शरारत से): "लगता है सुगना चाची ने आज मौसी पर पूरा खजाना लुटा दिया है। मौसी, सच-सच बताइए, कौन सा पार्लर गई थीं? हमें भी ऐसी ही 'सजी काया' चाहिए। क्या शहर में कोई नया नुस्खा आया है जो आप दोनों बहनें हम से छुपा रही हैं?"
सोनी, जो भीतर से सुगना के बदले हुए रूप और आने वाले अनुष्ठान की कल्पना से पहले ही पिघल रही थी, इन सवालों से और भी लजा गई। उसकी नजरें झुक गईं, जिससे उसकी पलकों का भारी काजल और भी कयामत ढाने लगा।
सुगना ने स्थिति संभालते हुए कहा, "पगली हो क्या तुम लोग? यह तो बस खानदानी उबटन और शहर की कुछ अच्छी हवा का असर है। सोनी का स्वास्थ्य थोड़ा ढीला था, तो सोचा इसे जरा ताजगी दिला लाऊँ।"
परंतु मालती और रीमा कहाँ मानने वाली थीं। वे सोनी के इर्द-गिर्द मंडराने लगीं, जैसे मधुमक्खियाँ किसी खिले हुए फूल पर मँडराती हैं। उन्हें सोनी के जीवन में आने वाले भूचाल का अंदाजा नहीं था, पर उसकी देह से फूटता आकर्षण उन्हें रस्क (ईर्ष्या) करने पर मजबूर कर रहा था।
ऊपर बालकनी में खड़ा सूरज यह सब देख रहा था। उसके कानों तक पार्लर, वैक्सिंग और निखार की बातें पहुँच रही थीं। जब उसकी नजर सोनी की उन पुष्ट जाँघों के उभार पर पड़ी जो साड़ी की हल्की सरकन से झलक रही थीं, तो उसके पौरुष ने एक करवट ली।
वह समझ गया कि उसकी मां सुगना ने सोनी को किसी विशेष अनुष्ठान के लिए तैयार किया है। पर सूरज को क्या उसे तो सोनी उसी रूप में चाहिए थी जिस रूप में उसने उसे एक नया जीवन दिया था। उसे लग रहा था जैसे जैसे विधाता ने उसकी मौसी की यह साज सज्जा उसके मिलन के लिए ही हो रही है। सच ही है सावन के अंधे को सब हर हरा ही दिखाई पड़ता है।
सूरज के ख्वाबों की 'महोघनी की गाँठ' अब पूरी तरह से खुलने और महकने के लिए तैयार थी।
रात के सन्नाटे में हवेली की दीवारें जैसे सुगना की धड़कनों के साथ ताल मिला रही थीं। सब अपने-अपने कमरों में जा चुके थे। दादी की बातें सुगना को याद आ रही थीं..सुगना ने अपनी अलमारी के सबसे सुरक्षित कोने से वह रेशमी नाइटी निकाली। यह महज एक कपड़ा नहीं, बल्कि उसके बीते हुए उन पलों की याद थी जब सोनू के प्रेम में वो पागल थी। न जाने कितनी बार वॉइस नाइटी में सोनू के पास गई थी और हर बार सोनू ने अपने हाथों से यह नाइटी उतारी थी। और अपने श्वेत धवल वीर्य से उसे पूरी तरह भिगोया था।
उसने धीरे से अपने वस्त्र त्यागे और उस पारभासी (translucent) रेशमी नाइटी को अपने बदन पर सरका लिया। जैसे ही वह आईने के सामने खड़ी हुई, खुद उसकी सांसें थम गईं।
आईने में जो मूरत दिख रही थी, वह किसी मंझी हुई अप्सरा से कम न थी। वक्त ने उसके बदन को ढालने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी; उम्र ने उसके यौवन को घटाया नहीं, बल्कि उसे और भी ठोस और रसीला बना दिया था।
नाइटी का गहरा मरून रंग उसके गोरे रंग पर बिजली की तरह कौंध रहा था। रेशम का वह बारीक कपड़ा उसके बदन से ऐसे लिपटा था, मानो पानी की कोई पतली परत हो। उसके कंधे चौड़े और बेदाग थे, जिन पर नाइटी की पतली डोरियाँ किसी गहरे राज की तरह टिकी थीं।
सुगना की छाती का उभार आज भी उतना ही गर्वित और उन्नत था। नाइटी के झीने कपड़े से उसकी देह की गोलाइयाँ साफ झलक रही थीं, जो हर सांस के साथ ऊपर-नीचे हो रही थीं। वह कसाब, वह भारीपन आज भी वैसा ही था जिसे देख किसी भी मर्द का ईमान डोल जाए।
उसकी कमर और भारी कूल्हों के बीच का ढलान किसी सधे हुए मूर्तिकार की कलाकृति जैसा था। नाइटी का घेरा जब उसकी सुडौल और लंबी जंघाओं को छूता, तो रेशम की सरसराहट उसके भीतर की सोई हुई कामुकता को जगा देती। उसके पैर एकदम चिकने और मांसल थे, जिनमें गजब की कशिश थी।
आईने में उसने अपनी आँखों को देखा—उनमें ममता के साथ-साथ आज एक प्यासी तड़प भी थी। उसके होंठ बिना किसी लाली के भी सुर्ख और गीले लग रहे थे। उसके खुले बाल पीठ पर काले नाग की तरह लहरा रहे थे, जो उसके गोरे बदन पर और भी ज्यादा प्रलोभक लग रहे थे।
सुगना ने अपनी हथेलियों से अपनी ही बाहों को सहलाया। उसे अपनी त्वचा की गर्मी महसूस हुई। उसे लगा जैसे उसका रोम-रोम फिर से जी उठा हो। वह आज भी उतनी ही अद्भुत और मादक थी, जितनी वह सालों पहले थी।
आईने में खुद को निहारते हुए उसे अहसास हुआ कि वह सिर्फ सोनी को तैयार नहीं कर रही थी, बल्कि उसके भीतर की वह 'सुगना' भी अंगड़ाई ले रही थी जो सालों से मर्यादा की चादर ओढ़े सोई हुई थी। उसकी जाँघों के बीच फिर से वही 'प्रेम रस' रिसने लगा था।
कुछ देर में सोनी भी कुछ इसी प्रकार सजी-धजी सुगना के कमरे में आ गई…
पदमा की दोनों बेटियां सुगना और सोनी एक दूसरे से सुंदरता में होड़ लगा रही थी। कहानी की वर्तमान नायिका सज धज कर संतान सप्तमी की तैयारी कर रही थी परंतु सुगना …. सुगना थी…
सोनी उसे एक टक देखते रह गई
“दीदी इतनी सुंदर लग रही हो”
सुंदर तो मेरी लाडो रानी लग रही है कितनी प्यारी है
सुगना ने सोनी की तारीफ की..और उसे आलिंगन में भर लिया…
हवेली के उस कमरे की हवा अब इतनी गाढ़ी और मादक हो चुकी थी। सुगना ने जब सोनी को अपनी बाहों में समेटा, तो वह स्पर्श किसी बड़ी बहन का रत्ती भर भी नहीं था। वह एक कामुक हमराज का घेरा था, जिसने सोनी के रोम-रोम को झंकृत कर दिया।
शेष अगले भाग में …