Incest कर्ज और फर्ज - एक कश्मकश - Page 24 - SexBaba
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Incest कर्ज और फर्ज - एक कश्मकश

मैने बिना वक्त गंवाए अपना सामान पैक किया और बाहर निकल गया. सारे परिजन बेबसी से दर्शक बने खड़े रह गए.

मै दरवाजे पर खड़ा था और रिंकी मेरी बाइक के पीछे खड़ी थी। कुछ बोलने से पहले ही हम दोनों नजदीक आकर खड़े हो गये। मैंने देखा, उसके चेहरे पर गजब की ताजगी और आत्मसंतुष्टि थी। उसके मन में दादाजी (मेरे पिता) के प्रति कोई मैल भाव नहीं था। वो खुद को भी एक बदचलन लड़की नहीं मानती थी। अपनी मम्मी के लिए भी उसके मन में कोई बैर भाव नहीं था। परिस्थितियां ही ऐसी बन गई थीं कि सब घालमेल हो गया था।

उसके भीतर एक आत्ममंथन चल रहा था कि मैने उसे टोक दिया-‘ रिंकी, क्या सोच रही हो?

‘कुछ खास नही, पापा।’ मैं सोच रही थी-‘अब मैं इस प्यार और लगाव को क्या कहूं? कैसे यह कह दूं, कि मै बदचलन हूँ या मेरे पापा चरित्रहीन हैं? मुझे एक साथ इतने सारे लोग प्यार करने वाले मिले हैं। मेरे लिए तो सभी अच्छे हैं। यह कहते हुए उसने मेरी ओर देखा तो मै उससे आंखें मिला न सका!

कुछ पल की चुप्पी के बाद वो बोली-‘पापा, तुम मम्मी के लिए या दुनिया के लिए जैसे भी हो लेकिन मेरे लिए तो सिर्फ मेरे सबसे अच्छे पापा हो और मम्मी से जो खुशी तुम्हे मिलनी चाहिए थी वो हर खुशी मै तुमको दूंगी.

‘मैं रिंकी के आशय को समझ गया था, उसका इशारा हमारे इस नाजायज रिंश्ते को जायज बना कर एक नया नाम देने की तरफ था "

मै उससे बोला.. 'मै जानता हूं रिंकी, जैसे ही कुसुम से मेरा तलाक़ होगा हम जल्द ही शादी कर अपने इस रिश्ते को एक नई शुरवात करेंगे’ यह सुनते ही उसने मुझे अपने गले से लगा लिया।

मै बिना ये सोचे समझे कि अपनी जिस पत्नी को मै तलाक़ देकर पीछा छुड़ाने की बात कर रहा हूँ वो 4-5 महीने की गर्भ से थी, और मै कुछ महीनों में पिता बनने वाला हू. रिंकी के मोहजाल में फंसा मै इस बार उसे छोड़ने अपने ससुराल नहीं गया । मै और रिंकी कहीं दूर जाकर बस गए।

दूसरी तरफ एकएक कर के सब घर वाले कुसुम को तसल्ली दे कर चले गए उसकी बहनो को छोड़ कर. बहने भी कब तक रुकती, दो तीन दिन होते होते वह भी चली गयी.

औफिस वालों का बहुत सहयोग कुसुम को मिल रहा था. उसके सीनियर विभाग से बाहर के विभागों की मीटिंग में कुसुम को वे नहीं भेजते. 6-7 महीने की गर्भास्था के दौरान औफिस और घर को संभालना कुसुम के लिए आसान नहीं था. कुसुम शारीरिक रूप से कम मानसिक रूप से ज्यादा थक गई थी. सचाई यह थी कि वह सास ससुर के साथ होने के बाबजूद नितांत अकेली थी.

ऐसा नहीं कि उस को अपने पति अरुण की कमी नहीं खलती थी. कई बार एक अजीब सा अकेलापन उस को डसने लग जाता. रात को जरा सी आहट से डर और घबराहट से आंख खुल जाती थी. थकाहारा शरीर पुरूष के स्नेहसिक्त स्पर्श और मजबूत बांहों के लिए तरस रहा था जिस के सुरक्षित घेरे में वह एक निश्चिंतताभरी नींद सो सके. रात भर बस वो यही गाना गुनगुनाती 👇

दूसरी तरफ उस दिन के बाद तो मै जैसे अपने घर को भूल ही गया. ऐसा कभी मेरे साथ भी हो सकता था ये मैने कभी सोचा नही था. वकील की सलाह मशविरा के बाद मैने कुसुम के ऊपर झूठा मुकदमा दर्ज कराया, मैने कुसुम की चरित्रहीनता का तो कुसुम ने मेरे खिलाफ सिर्फ घरेलू हिंसा, मारपीट का मामला दर्ज कराया।

आपसी सहमति से तलाक मिलने में ज्यादा समय न लगा. और 7-8 महीने के बाद ही हमें तलाक़ मिल गया इन 7-8 महीनों के बीतते बीतते कुसुम ने एक प्यारे से बेटे को जनम दिया.

वह दिन अच्छे से याद है मुझको जब कोर्ट ने हमारे तलाक पर मुहर लगाई थी. हम दोनों पति-पत्नी के हाथ में तलाक के काग़ज़ों की प्रति थी। दोनों चुप थे, दोनों शांत, दोनों निर्विकार।

यह महज़ इत्तेफाक ही था कि दोनों पक्षों के परिजन एक ही टी-स्टॉल पर बैठे थे , यह भी महज़ इत्तेफाक ही था कि हम दोनों तलाकशुदा पति-पत्नी एक ही मेज़ के आमने-सामने जा बैठे।

लकड़ी की बेंच और हम दोनों .

''कांग्रेच्यूलेशन .... आप जो चाहते थे वही हुआ ....'' कुसुम ने कहा।

''तुम्हें भी बधाई ..... तुमने भी तो तलाक दे कर जीत हासिल की ....'' मै बोला।

''तलाक क्या जीत का प्रतीक होता है????'' कुसुम ने पूछा।

''तुम बताओ?''

मेरे पूछने पर कुसुम ने जवाब नहीं दिया, वो चुपचाप बैठी रही, फिर बोली, ''तुमने मेरे खिलाफ चरित्रहीन पत्नी का मुकदमा दर्ज किया था....अच्छा हुआ.... अब तुम्हारा चरित्रहीन स्त्री से पीछा छूटा।''

''वो मेरी गलती थी, मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था'' ''मै जानता हूँ पुरुष इसी हथियार से स्त्री पर वार करता है, जो स्त्री के मन और आत्मा को लहू-लुहान कर देता है... तुम बहुत उज्ज्वल हो। मुझे तुम्हारे बारे में ऐसी गंदी बात नहीं करनी चाहिए थी। मुझे बेहद अफ़सोस है, '' मै बोला।

कुसुम चुप रही, न दुःख, न गुस्सा। उसने एक बार मुझ को देखा।

कुछ पल चुप रहने के बाद मैने गहरी साँस ली और कहा, ''तुमने भी तो मेरे खिलाफ मारपीट वाला मुकदमा दर्ज किया था।''

'' झूठा किया था''.... कुसुम बोली

कुछ देर चुप रहने के बाद फिर बोली, ''मैं अगर तुम्हारा सच कोर्ट में बताती तो अभी तुम यहा नही जेल में होते... हम दोनों को एक दूसरे से अलग होना था सो हो गये बस अब यही सच है....!

प्लास्टिक के कप में चाय आ गई।

कुसुम ने चाय उठाई, चाय ज़रा-सी छलकी। गर्म चाय उस के उंगलियों पर गिरी।

स्सी... की आवाज़ निकली।

मेरे गले में उसी क्षण 'ओह' की आवाज़ निकली। कुसुम ने मुझको देखा। मै उसी को देखे जा रहा था।

''तुम्हारा कमर दर्द कैसा है?''

''ऐसा ही है कभी वोवरॉन तो कभी काम्बीफ्लेम,'' कुसुम ने बात खत्म करनी चाही।

''तुम एक्सरसाइज भी तो नहीं करती।'' मैने कहा तो कुसुम फीकी हँसी हँस दी।

चाय की पहली चुस्की लेने के बाद मै कुछ देर सोचता रहा, फिर बोला, ''तुम्हें चार लाख रुपए देने हैं और छह हज़ार रुपए महीना भी।''

''चार लाख अगर तुम्हारे पास नहीं है तो मुझे मत देना,'' ''वो तो तुम छह हज़ार रुपए महीना मुझे देते रहना, '' बेटा बड़ा होगा ... सौ खर्च होते हैं....'' हमारे बेटे को आँचल में छिपाते हुए कुसुम ने कहा।

उसके स्वर में पुराने संबंधों की गर्द थी।

मै उसका चेहरा देखता रहा....कितनी सह्रदय और कितनी सुंदर लग रही थी सामने बैठी स्त्री जो कभी मेरी पत्नी हुआ करती थी। मैं अपनी मर्दानगी, वासना, हवस के नशे में रहा। काश, जो मैं इसके जज़्बे को समझ पाता।''

कुसुम भी मुझ को देख रही थी और सोच रही थी, ''कितना सरल स्वभाव का है यह आदमी, जो कभी मेरा पति हुआ करता था। कितना प्यार करता था मुझसे...!

दोनों चुप थे, बेहद चुप।

दुनिया भर की आवाज़ों से मुक्त हो कर, खामोश। दोनों भीगी आँखों से एक दूसरे को देखते रहे....!

''मुझे एक बात कहनी है, '' आवाज़ में झिझक थी।

''कहो, '' कुसुम ने नजल आँखों से मुझे देखा।

''डरता हूँ,'' मैने कहा।

''डरो मत। हो सकता है तुम्हारी बात मेरे मन की बात हो,'' कुसुम ने कहा।

''तुम बहुत याद आती रही,'' मै बोला।

''तुम भी,'' कुसुम ने कहा।

''मैं तुम्हें अब भी प्यार करता हूँ।''

''मैं भी.'' कुसुम ने कहा।

हम दोनों की आँखें कुछ ज़्यादा ही सजल हो गई थीं। दोनों की आवाज़ जज़्बाती और चेहरे मासूम।

''क्या हम दोनों जीवन को नया मोड़ नहीं दे सकते?'' मैने पूछा।

''कौन-सा मोड़?''

''हम फिर से साथ-साथ रहने लगें... एक साथ... पति-पत्नी ना सही तो... बहुत अच्छे दोस्त बन कर।''

''और ये......?'' दूर मोटर साइकिल के पास खड़ी रिंकी की ओर इशारा करते हुए कुसुम ने पूछा।

उस दिन रिंकी भी मौजूद थी. उस के चेहरे पर खिंची विद्रूप विजयी मुसकान कुसुम के दिल को छलनी कर रही थी....!

मेरे पास कुसुम की बात का कोई जबाब न था, मै उठा कुसुम के पास आया और अपने प्यारे से बेटे को उसकी गोदी में से उठाने की कोशिश की. कुसुम ने एकदम से मेरे बेटे को अपनी बांहों में जकड़ कर कठोर शब्दों में बोली, ‘ मेरे बेटे को छूने की भी हिम्मत मत करना.’ और तेज कदमों से उस को ले कर चली गई. मै देखता ही रह गया.

शायद कुसुम को मेरा अपनी खुद की औलाद के लिए तड़पना सुकून सा दे रहा था. मैने जो उस के साथ विश्वासघात किया था, बिना उस की किसी गलती के उस को जो वेदना दी थी, उस की यह सजा तो मुझ को मिलनी ही चाहिए थी.

जारी है..... ✍🏻
 
बहुत बहुत लाजबाब विश्लेषण मित्र.... सही कहा है आपने अरुण ही गुनेहगार उसका गुनाह ये है कि एक विधवा जिसकी जवान बेटी थी उससे शादी की, उसको अपने घर लाया, लेकिन अरुण भूल गया था जवान बच्चे कभी भी अपने सौतेले पिता को बाप नही मानते उनकी नजर सौतेला पिता वो आदमी होता है जिसे उनकी माँ ने अपनी जिस्म की प्यास बुझाने के लिए चुना है, ब्याह किया है.....! अरुण ही गुनेहगार है शायद इसलिए लोग जवान बच्चों की विधवा तलाक़ शुदा औरतों के साथ शादी नही करते, करते भी तो बच्चो को नही अपने घर नही लाते...
 
आपका सुझाव सरहानीय है, अगर कहानी को आगे लिखने का मेरे पास वक्त होता तो अवश्य लिखता। किंतु अब मे प्रोफेसनलि तौर पर अपने काम पर फोकस कर रहा हूँ ईश्वर की कृपा से एक बहुत ही बड़ा टेंडर मिला है और उसमें व्यस्तता के चलते कहानी लिखना तो छोड़ो मेरे पास आप दोस्तो के कॉमेंट, मैसेज पढ़ने का वक्त भी मुश्किल से मिल पा रहा है। यहाँ तक इस कहानी का आखिरी update भी पोस्ट कर समाप्ति की घोसणा नही लिख पा रहा हूँ। फिर भी जितना वक्त मिलता है उसमे कुछ meme वगेरा पोस्ट कर आप सभी का मनोरंजन करने का प्रयास भी फिल्हाल करता हूँ।
 
अध्याय - 27 --- " आखिर क्यों "

शायद कुसुम को मेरा अपनी खुद की औलाद के लिए तड़पना सुकून सा दे रहा था. मैने जो उस के साथ विश्वासघात किया था, बिना उस की किसी गलती के उस को जो वेदना दी थी, उस की यह सजा तो मुझ को मिलनी ही चाहिए थी.

कुसुम से तलाकनामा मिलने के कुछ दिनों बाद मैने और रिंकी ने शादी कर ली. अरुण और रिंकी कहीं दूर रहने लग गए यहा तक तो ठीक था लेकिन मेरे माता-पिता (कुसुम के सास ससुर) को जब पता चला कि अरुण और रिंकी ने शादी कर ली है, तो उन्होंने मुझसे सारे रिश्ते नाते तोड़ दिए। उन्होंने सारी संपत्ति अपनी बहू कुसुम के नाम कर दी और सख्त हिदायत दी कि कुसुम बेटा कभी भी अपने पति को माफ नहीं करना । चाहे जिंदगी में किसी भी उम्र में वह तुम्हारे पास वापस आए ।

कुसुम हमेशा सोचती क्या मैं अपने पति को खुश नहीं रख पाई या मेरा सावला रंग उसे पसंद नहीं आया? कितनी ही बातें उसके मन में चलती रहती । क्या किया जा सकता था । समाज में जो बेइज्जती हुई वह अलग अपनी ही कोख से जन्मी बेटी सौतन बन गई । यह तो समझ से परे था कहां गलती हो गई ।

कुसुम के मां बाप भी अब क्या करते , वह तो और ज्यादा शर्मिंदा थे । अपनी ही एक बेटी (नातिन) ने दूसरे बेटी के घर को तबाह कर दिया, नष्ट कर दिया । कम से कम अरुण को तो यह समझना चाहिए था कि इतना पढ़ा लिखा समझदार होने के बाबजूद ये सब किया । अब उनके भविष्य का क्या होगा? जिसके माता पिता ही ऐसे हैं उनके बच्चे कैसे होंगे? उनकी शादी कहां होगी ? किससे होगी ? काश अरुण ने कुछ सोचा होता ।

दोनों ही परिवारों ने मुझ से और रिंकी से अपने सारे रिश्ते तोड़ डाले मै और रिंकी अपनी दुनिया में मस्त हो गए लेकिन एक समय आया जब मेरा रिंकी से मन भर गया। और मुझे फिर से कुसुम से मिलने की बेचनी होने लगी।

कुसुम चाहती तो मुझ को सजा दिलवा सकती थी क्योंकि मैने उसकी बेटी के साथ जो किया था वो किसी अपराध से कम नही था । ऊपर से मै सरकारी नौकरी में था। लेकिन उसने ऐसा कुछ भी नहीं किया और यही बात मुझे बहुत खलने लगी की मैंने कुसुम के साथ कितना गंदा काम किया और कुसुम ने कुछ भी नहीं बोला।

इधर रिंकी भी बहुत अच्छा महसूस नहीं कर रही थी । उसे लगता था कि उसने गलत किया है । उसने विश्वास तोड़ा है अपने परिवार का ,अपनी मां का, अपनी मौसियो का । किस मुंह से अपने परिवार का सामना कर पाएगी । उसे भी समझ में आने लगा कि ये सब कुछ जो हुआ वो सिर्फ उसके तन की प्यास थी, ना कि मन की । क्या किया जा सकता था जो होना था, हो चुका था ।

इसी तरह 6 महीने बीत गए । 1 दिन रिंकी के पेट में जोरदार दर्द हुआ । डॉक्टर से दिखाया तो पता चला उसे कैंसर है । वह भी अंतिम स्टेज का । वह अपने घर वापस जाना चाहती थी । अपनी मम्मी के पास अपनी मम्मी की गोद में सर रखकर माफी मांगना चाहती थी । पर वह किस मुंह से जाती । वह तो खुद मम्मी बनना चाहती थी । लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था । रिंकी अब नहीं रही।

मै वापस जाना चाहता था अपने घर । अपने माता पिता के पास अपने प्यारे से बेटे के पास और अपनी पत्नी कुसुम के पास । लेकिन मुझे कोई उपाय नहीं दिख रहा था । मैने कितने ही बार अपने घर में फोन किया पर किसी ने मुझसे बात नहीं की । मै माफी मांगना चाहता था । मै वापस आना चाहता था । शायद सारे रास्ते बंद थे । मै अभी भी आस लगाए था कि मै एक दिन अपने घर वापस जरूर जाऊंगा ।

और फिर एक दिन बहुत हिम्मत कर वापस अपने घर चला गया । लेकिन मेरे माता-पिता ने मुझे माफ नहीं किया, ना ही घर में घुसने दिया । अपने छोटे से बेटे से बात करना चाहता था उसे गोद में लेकर प्यार करना चाहता था । कुसुम ने भी मुझसे मुंह फेर लिया ।मानो पूछ रही हो कि हमें किस बात की सजा तुमने दी थी ? आज जब मेरी सौतन नहीं रही तो तुम वापस आ गए और अगर वह जिंदा रहती तो.........????

समाप्त.........!

मै बड़े भाई के शब्द रूपी आशीर्वाद और स्नेह के बडौलत ही इस कहानी को समाप्ति की दिशा में ले जाने मे सफल हुआ हू, भैया के लिखे शब्द हमेशा मुझे आगे लिखने के लिए होंसला देते रहे है, लिखा हुआ को पढ़ना सहज नही होता है, जब तक लिखने वाले और पढ़ने वाले के मनोभाव समतुल्य ना हो, जरा सा भी मनोभाव मे विकार हुआ तो लिखा हुआ काला आखर भैस बराबर हो जाता है😁 संजू भईया की सबसे बड़ी खूबी यही है कि वो अंत से ही शुरु करते है, अर्थात पिछला update जहा समाप्त होता है, और नया जहा से शुरु होता है,

संजू भैया की तरह ही अन्य मै सभी पाठकों का तहे दिल से शुक्रिया अदा करता हूँ आपके सहयोग के बिना कहानी को अपनी मंजिल तक लेकर जाना नामुमकिन था, बिना पाठकों के सहयोग, अभाव में ना जाने कितने लेखक कहानियों को अधूरा छोड़ देते है....!

धन्यवाद..... 🙏🏻
 
" मर्द पर लगे दाग उसकी कमाई से धुल जाते है, मगर औरत पर लगे दाग उसके मरने के पश्चात भी जिंदा रहते है "

अंतह आपका हमेशा की तरह खूबसूरत विश्लेसन पढ़ कर दिल खुश हो गया🙏,

कहानी का अंत करना लाजमी हो गया था, जिंदगी की उलझनों मे अब इतना उलझ गया हू कि अपनी कल्पनाओ को शब्दों के माध्यम से कहानी किस्सों के रूप में लिखने का वक्त ही नही मिलता। जो भी वक्त मिलता है उसको चिट चैट थ्रेड पर खर्चा कर देता हूँ। जब उलझने सुलझ जायेगी तब फिर से आपके शब्दों के आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए कुछ किस्सों को यहाँ अवश्य लिखूँगा।

धन्यवाद बड़े भाई.... 🙏🏻
 
समय के अभाव मे बहुत सी कहानिया अपने जायज मुकाम पर नही पहुँच पाती..... अब मुझे वक्त नही मिलता है और मै आप सभी पाठको को समय पर update नही पोस्ट कर सकता था, इसलिए इस कहानी को आगे बढ़ाने के लिए जो कल्पनाएँ अपने दिल में संजो कर रखी थी उन्हे इस शब्दों के पटल पर उकेर नही सका। भविस्य मे जब भी वक्त मिलेगा तब जरूर एक बार फिर से कल्पनाओ को कहानी का रूप में लिख कर आपके समक्ष प्रस्तुत करूँगा।

धन्यवाद 🙏🏻
 
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