Incest कर्ज और फर्ज - एक कश्मकश - Page 23 - SexBaba
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Incest कर्ज और फर्ज - एक कश्मकश

कहने का मतलब जल्द ही मेरा और रिंकी का अब कभी कभार होने वाला मिलन भी पूरी तेरह बंद हो गया था. मैं जैसे खो गया था. जो लड़की मेरी भूल या गलती थी वो अब दूर चली गयी थी, और जो मेरे पास थी वो ही शायद मेरी किस्मत थी.... .. !

कुछ दिन बाद.......!

रिंकी का कॉलेज शुरू हो गया था. लेकिन न तो रिंकी क्लास में फ़र्स्ट-बेंच पर बैठी दिखायी देती थी और ना ही उसकी पढ़ाई की पर्फ़ॉर्मन्स इतनी अच्छी थी. एक दो बार जब किसी प्रोफ़ेसर ने उसे टोका भी, तो उसने अनसुना कर दिया था. कुछ दिन बाद उसने कॉलेज से बंक मारना भी शुरू कर दिया और अपने कमरे में ही ज़्यादातर वक़्त बिताने लगी.

लाख कोशिशों के बाद भी रिंकी के मन मे अपने पापा के प्रति प्रेम दिनोदिन बढ़ता ही जा रहा था। उसकी वासना ने उसके दिमाग को पूरी तरह से वश में कर लिया था।

परन्तु उसके मन मे डर था कि

"" कहीं इतने हफ़्तों में पापा सब कुछ भूल तो नही गए? कहीं वो बिल्कुल बदल तो नही गए? क्योंकि अगर वो बदल चुके हैं, और मुझे अब एक बेटी के रूप में देखते है तो मैं किस तरह उनको अपने करीब कर पाऊंगी। कहीं उन्होंने मुझे ठुकरा दिया तो, नहीं नहीं मैं बर्दास्त नही कर पाऊंगी.....मैं किसी भी हाल में अपने पापा को दोबारा पाकर रहूंगी" रिंकी यही सब सोचती रहती।

दिनों दिन रिंकी की वासना बढ़ती जा रही थी। लेकिन उसे मौका ही नही मिल पा रहा था। और ना ही इस दौरान उसकी मुझ से खुल कर बात हो पाई। उसने एक दो बार कोशिश भी की मोबाइल से बात करने की पर मोबाइल में नम्बर डायल करने के बाद भी कभी वो कॉल न कर पाती और तुरन्त काट देती।

कुछ दिनों बाद रिंकी की सबसे खास सहेली श्रुति एक दोपहर उससे मिलने घर पर आई दोनों सहेलिया कमरे में बाते कर रही थी, श्रुति आज ख़ुशियों मैं थी, उसके पापा ने उसको स्कूटी ख़रीद कर दिया था, शायद कॉलेज कि वो अकेली लड़की थी, जिसके पास स्कूटी हो गयी थी, वो बड़े गर्व से अपने पापा की बारे में बता रही थी, की उसके पापा उसको बहुत प्यार करते हैं । वो इसी खुशी में रिंकी को एक ट्रीट पर साथ लेकर जाने वाली थी।

ओहो रिंकी कितना लेट हो गया है, रेस्ट्रारेंट में नीलू, शीतल इंतजार कर रहे होंगे.... अब बाते ही करती रहेगी या फिर ड्रेस चेंज कर चलेगी भी.. श्रुति ने रिंकी से कहा।

रिंकी ने मुस्करा कर कहा- हाँ हाँ क्यों नहीं।

चूंकि उस वक्त कमरे में सिर्फ दोनों लड़किया ही थी, इसलिए रिंकी ने बिना झिझक अपनी टॉप उतार दी, फिर उसने शिमीज भी उतार दी, श्रुति की तो आह निकल गयी और श्रुति एक लड़की हो कर भी रिंकी की सुंदरता पर मुग्ध हो गई । उसकी नजरे रिंकी के बदन से चिपक कर रह गई और आँखें फाड़कर वो एक भरपूर जवान लड़की का नंगा बदन देखने लगी। रिंकी की ब्रा में क़ैद बड़ी बड़ी चूचियाँ बहुत ही मादक लग रही थीं। फिर उसने अपनी ब्रा भी खोल दी, उसकी दूध से भरी छातियाँ बहुत सुंदर लग रही थीं और उसके बड़े बड़े निपल्ज़ भी सेक्सी दिख रहे थे, फिर उसने अपनी कपबोर्ड में से पुशअप ब्रा निकाल कर अपनी चूचियों पर ब्रा का कप रखा और पीछे जाकर उसकी पट्टी लगायी , और अपनी चूचियाँ हिलाकर ऊपर नीचे करके उसको चेक करने लगी।

श्रुति का मुँह खुला रह गया रिंकी की मदमस्त चूचियाँ देखकर, वो हँसकर बोली- रिंकी डार्लिंग तेरे तो मुझसे भी बड़े बड़े हो गये, कौन है वो जादूगर???किसके हाथों के जादू का कमाल है.... श्रुति अचानक से उठ कर रिंकी के बूब्स को दबाते हुए बोली ... ।

''प प प ............. पापा.................... ''

भावनाओ में बहकर रिंकी के मुँह से पापा निकल तो गया...पर अगले ही पल वो यथार्थ के धरातल पर आ गयी...और उसने डरते-डरते श्रुति की तरफ देखा..

पर शायद उसे ठीक से समझ नही आया था....! वो मुस्कुराती हुई बोली...

'' अच्छा ....तो अपने पापा के उपर नज़र है तेरी.... तू तो बड़ी चालू निकली रिंकी....''

उसकी ये बात सुनकर रिंकी का शरीर सुन्न होता चला गया।

पर श्रुति के होंठों पर अलग ही तरह की मुस्कान आ चुकी थी अब.

जिसे देखकर रिंकी समझ नही पा रही थी की उसके दिमाग़ में आख़िर चल क्या रहा है..

पर उसके बाद जो हुआ, उसे देखकर तो रिंकी के भी होश उड़ गये..उसने तो सोचा भी नही था की इस चुहिया के दिमाग़ में इतना गंद भरा पड़ा है

रिंकी से कुछ बोलते नही बन रहा था...रंगे हाथो पकड़ी गयी थी वो .

अपनी खास सहेली के सामने ही उसके और पापा के बीच का परदा उठ गया था... अब उसे उस हद तक तो नही मालूम था पर जिस अंदाज में वो पकड़ी गयी थी.. यानी जिस अंदाज में उसने अपने पापा को पुकारा था, उसे देखकर तो कोई बेवकूफ़ भी बता देगा की रिंकी के मन में उसके पापा के लिए क्या चल रहा है.

रिंकी ने अपना चेहरा शर्म से नीचे कर लिया.

"ओहो रिंकी... प्लीज़ ऐसे एम्बेरेस मत हो... इनफेक्ट मुझे तो इस बात की खुशी है की तू अंकल को उस नज़र से देखती हो,जिस नज़र से उन्हे मैं देखकर अपने अरमानो को दबाया करती हू ..''

श्रुति के मुँह से सीधी बात सुनकर रिंकी भी चोंक गयी...पर उसने कुछ ज़्यादा रिएक्ट नही किया..आख़िर श्रुति की भी क्या ग़लती है इसमे...एक तो उसके पापा इतने चार्मिंग है,वो खुद उनसे चुदाई करती है , ऐसे में श्रुति को किसी भी बात का दोष देना सही नही था.

श्रुति ने भी अब रिंकी को कुछ महीने पहले माल की पार्किंग के बारे में उसे बता देना उचित समझा, और फिर उसने कहा

सुन रिंकी, वो मैं तुझे तेरे पापा के बारे में कुछ बताना चाहती हूं। कुछ महीने पहले माल की पार्किंग में तेरे पापा ने मुझे बॉय फ्रेंड का लंड चूसते हुए देख लिया था,

रिंकी के चेहरे की हवाइयां उड़ चुकी थी, रिंकी तो श्रुति की बात सुनकर दंग रह गयी, उसे तो अब सूझ ही नही रहा था कि वो क्या बोले। रिंकी के ऊपर तो जैसे एक के बाद एक बम फूट रहे थे, वो पूछना चाहती थी कि ये सब हुआ कैसे ??? पर उसके पूछने से पहले ही श्रुति ने उस पर एक और बम फोड़ दिया

अच्छा रिंकी, प्लीज़ अब मुझसे शर्माओ मत, हम दोनों पक्की और खास सहेलिया है तो हमे एक दूसरे से कुछ नही छुपाना चाहिए, अच्छा अब प्लीज़ बताओ ना अंकल और तेरे बीच ये सब कैसे शुरू हुआ ???

रिंकी भी अब थोड़ी नार्मल हो चुकी थी, फिर उसने श्रुति को अपने और अपने पापा के बीच हुए पूरे वाकये को शुरू से लेकर अंत तक मिर्च मसाला लगाकर सुना दिया, कैसे पहली बार दिमापुर में ये सब शुरू हुआ था, कैसे उसने नई नई चालें चल कर अपने पापा को फँसाने की कोशिस की थी। कैसे फिर वो उनसे नाराज़ हुई, कैसे धीरे धीरे वो उन्हें चाहने लगी, और कैसे उस रात वो सब कुछ हुआ।

श्रुति तो बड़ी तल्लीनता से रिंकी की कहानी सुन रही थी,

"देखो रिंकी ...

मेरा भी बॉय फ्रेंड है, हमने एक दूसरे के साथ सेक्स किया है.. लेकिन हम सेक्स सिर्फ़ मौका मिलने पर चोरी छिपे कभी कभार ही कर सकते है... हर रोज सेक्स के असली मज़े के लिए तो हमे किसी घर के मर्द की ही ज़रूरत पड़ेगी ना..और तेरे पापा के होते हुए तेरे लिए तो ये गॉड गिफ्ट (सोने पे सुहागा) हो गया है! तुम जो भी कर रही हो, सही कर रही हो, किसी प्रकार की गिल्ट और एंब्रेस् होने की जरूरत नहीं है...ठीक है ना...''

श्रुति अपने हिसाब से तर्क दे रही थी...जो अभी के लिए रिंकी को भी सही लग रहा था..!

श्रुति शायद तुम सही बोलती हो.... और रिंकी ने उसके गाल में चिकोटि काट दी। फिर वो कप बोर्ड खोल कर एक ड्रेस श्रुति को दिखाते हुए ये ड्रेस ली थी मैंने...मतलब और भी हैं, पहन के दिखाती हूँ अभी... पहले ये बताओ कैसी है?' रिंकी ने चहक कर पूछा.

मस्त है, अब जल्दी से पहनो हमें चलना चाहिए.... श्रुति ने जबाब दिया।

रिंकी ने एक काली पार्टी-ड्रेस पहन ली श्रुति उसे देख सीटी बजाते हुए बोली ओह बेबी यू आर सो सेक्सी.....! दोनों सहेलिया मस्ती के मूड में आ चुकी थी, और फिर वो दोनों ट्रीट एंजॉय करने बाहर चले गए।

"दोनों सहेलिया एक दूसरे के सीक्रेट शेयर कर बड़ी खुश थी, पर अभी दोनों ही भविष्य में आने वाले भयानक परिणाम से बेखबर थी"

ऐसे ही कुछ दिन निकल गये, अब रिंकी को कॉलेज लाइफ रास आने लगी थी। उसके नये दोस्त भी बन गए थे। दूसरी तरफ हर रात कुसुम से समागम के बाद मै अपने बिस्तर पर करवट बदलते हुए सोचता कि रिंकी की खुशी के लिए लिये ऐसा क्या करू जिससे उसे अपने पापा पर गर्व हो।

फिर करीब एक महीना बाद एक इतवार की दोपहर कुसुम फोन पर किसी से बातें कर रही थी, बातें करते हुए कुसुम का फोन कट गया। कुसुम को याद आया उसके फोन का बैलेंस खत्म हो गया था और उसे किसी को अर्जेंट काल करनी थी. मेरे अलावा घर पर कोई था नहीं, तो उस ने मेरा फोन मांगा और मुझ से कहा कि काल करने के बाद फोन मुझे लौटा देगी.

कुसुम को पता नहीं क्या सूझा कि फोन कर के जब वह फ्री हुई तो फोन की फोटो गैलरी खोल कर देखने लगी. उस में रिंकी की विविध मुद्राओं में खींची गई अनेक तसवीरें कैद थीं.

उन्हीं तसवीरों में कुछ ऐसी भी तसवीरें सामने आईं जिसे देख कर वह चौंक गई.

बाप और बेटी के फोटो ऐसी पोजीशन में खींचे गए थे जिसमे दोनों बाप बेटी लिपटे हुए थे. जब उस ने उस फोन के वीडियो देखे तो उस के पैरों तले से जमीन ही खिसक गई. वीडियो में रिंकी अपने पापा के साथ प्यार करती हुई दिख रही थी.

कुसुम ने कभी ध्यान नहीं दिया था कि उसकी कोख से जन्मी उसकी बेटी उसके ही संसार को उजाड़ रही है । वह तो नौकरी में और अपने सास-ससुर में व्यस्त रहती । एक बार कुसुम को शक भी हुआ था लेकिन यह सोच कर अपने आप को सांत्वना देने लगी थी, कि रिंकी मेरी बेटी तो अभी छोटी है और एक अच्छी मां की तरह उसने रिंकी की परवरिश की थी। यह हो ही नहीं सकता कि कोई बच्चा अपनी मां को धोखा दे । पर कुसुम गलत थी उसे पता ही नहीं था कि उसकी बेटी उसकी सौतन बनने का ख्वाब सजाये थी. यह सब देख कुसुम आगबबूला हो गई.....!

जारी है...... ✍🏻
 
यह हो ही नहीं सकता कि कोई बच्चा अपनी मां को धोखा दे । पर कुसुम गलत थी उसे पता ही नहीं था कि उसकी बेटी उसकी सौतन बनने का ख्वाब सजाये थी. यह सब देख कुसुम आगबबूला हो गई.....!

उस ने मुझ को जोर से चिल्लाकर कर अपने पास बुला कर मुझे मोबाइल में फोटो दिखाते हुए बोली...

‘‘ मेरी बेटी की जिंदगी बरबाद कर के तुम्हे गुलछर्रे नहीं उड़ाने दूंगी अरुण कुमार। मै तुम्हारी जिंदगी बरबाद कर दूंगी. तुम अभी मुझे जानते नहीं हो...???

मेरे पाप की लंका का दहन हो चुका था, और इस वक्त की परिस्थिति की नाजुकता का अंदाज़ा होने लगा. ‘पता नहीं अब क्या होगा?? यह चंद फोटो मेरी खुशहाल शादीशुदा जिंदगी पर भारी पड़ गयी…!साली ये फोटो मैने डिलीट क्यों नही की थी। यह मेरे दिमाग़ में क्यों नहीं आया.??’ मै अपनी हार पर निराशा और कुसुम के भय से भयभीत हो रहा था.... हे भगवान मेरी भी मत मारी गयी थी, जो ये फोटो मैने मोबाइल में सहेजे हुए थे। इन फोटो ने तो मुझे बर्बाद कर के ही छोड़ा।

अब गूँगे की तरह खड़े रहोगे या मुह से कुछ बकोगे भी....??? अरुण मुझे सिर्फ सच सुनना आखिर क्या है ये सब....????

कुसुम की कर्कश आवाज मेरे कानों में एक बार फिर से गूंजी।

मै बिस्तर पर बैठ गया, मेरा सिर झुका हुआ था लेकिन मैने अब तक हार नही मानी थी। और मैने सारी सच्चाई बड़े धेर्य के साथ विस्तारपूर्वक कुसुम को बताना शुरू किया।

कुसुम शायद तुम नहीं समझोगी मेरे प्यार और हवस के भेद को क्योंकि जो मेरा है, उसकी समझ भी तो मेरी है न, तुम्हारी नज़रों का, सोच का, मैं क्या कर सकता हूं भला।

मैं जब एक बेटी की तरह रिंकी को दुलारता हूं इसका मतलब ये नहीं की हवस से वसीभूत हूं मैं, इसका मतलब ये है की मुझे सच में उसे दुलारना होता है, अपनी सगी बेटी की तरह निश्चल भाव से...... मैं जब उससे लिपटता हूं दुलारते वक्त, या फिर बात करते वक्त, तो वो हवस नहीं बस एक सुकून होता है मेरे लिए, जो ये एहसास कराता है की, हां मेरी बेटी मेरे पास है पर सोच तुम्हारी, मेरे एहसासों को हवस तक ले के जा रही है।

मैं जब उसे अधिकांश वक्त चूमता हूं माथे पे, होंठो पे या गालों पे तो ये भी मेरी हवस नहीं होती पर तुम मानती हो और चाहती हो की मैं भी इसे मानू की ये मेरी हवस हैं लेकिन सच कहूं वो मेरी हवस नहीं होती वो बस अपना प्यार जाहिर करने का तरीका मात्र है,

ये सारे फोटो और वीडियो मेरी बेटी रिंकी के साथ मेरे उसी प्यार, दुलार, लाड़ की निशानी है। ठीक जिस तरह जब एक माँ अपने बेटे को खुद से लपेट कर आँचल में समेट कर आगोश में लेती है तो उस वक्त सिर्फ माँ के ह्रदय में ममता के भाव ही होते है, ठीक मेरा भी अपनी बेटी के साथ इस तरह लिपटना, उसे आलिंगन करना सिर्फ और सिर्फ बाप की बापता का ही भाव है।

चलो अपनी बेटी से प्यार के बारे में मैंने बता दिया अब मै थोड़ा हवस के बारे में बात कर लेता हू । हवस होती है जो किसी परस्त्री पर गलत तरीके से डाली गयी नजर, ना की अपनी बेटी पर डाली गयी निगाह, अगर मेरी बात तुम तक, तुम्हारे दिल दिमाग तक पहुंचे तब तुम समझोगी प्रेम की अधिकता आसक्ति की वजह होती है, और आसक्ति की अधिकता हवस को जन्म देती है, और अपनी बेटी के साथ प्यार करना हवस नहीं होती है, आसक्ति की भावना से प्रेरित परस्त्री से प्यार हवस होती है।

"मेरी नीयत में बेशक फरेब था. लेकिन मैने जो कहा, वह सोलह आने सच था."......!

मुझे नही पता उसे मेरे कहे शब्दों के मायने ठीक से समझ आये या नही। लेकिन मेरा छोड़ा गया शब्दों का तीर कहीं ना कही कुसुम के दिल दिमाग में सही निशाने पर लगा था। अब इस वक्त मुझे उसके मुख से बस अगले निकलने शब्दों का इंतजार था।

मेरी बात सुन कर कुसुम सोच में डूब गई. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि इन चंद बाप बेटी के फोटो की वजह से अनायास जो स्थिति बन गई है, उससे कैसे निपटा जाए.

कुसुम का गुस्सा भी अब शांत हो कर सुस्त पड़ गया था. कुछ देर खामोश बैठी रहने के बाद वो उठ कर दबे पाँव बेडरूम के दरवाज़े के पास गयी. वो कुछ पल खड़ी खड़ी सोचती रही और फिर वापस बिस्तर पर आ कर बैठ गयी. और रिंकी को फोन लगाने लगी।

ये देख मै डर गया ‘कहीं रिंकी ने कुसुम के सामने मुँह खोल दिया, तो मैं तो कहीं का नहीं रहूँगा…'

कुसुम ने रिंकी को फोन कर के सिर्फ उसके वापस आने का समय पूछा ??? और फोन काट दिया। काफी सोचविचार के बाद कुसुम ने मुझ को इस हिदायत के साथ साफ साफ दो टूक शब्दों में कहा कि मै कभी भी उसकी बेटी रिंकी पर बुरी नजर नहीं डालूँगा ! यह बात कुसुम ने अपने तक सीमित रखी ।

उसी रात जब कुसुम आकर मेरे बगल में लेटी तो सो मैने उसको कुछ सुख देने का सोचा, लेकिन एक दो बार जब कुसुम ने मेरे उकसावे का जवाब नहीं दिया तो मै चुपचाप लेट कर सोने लगा.

"ऐसा नहीं है कि कुसुम मुझ से प्यार नहीं करती. मगर कई बार रिश्तों में ऐसे मोड़ आते हैं,तब रिश्ते भार बन जाते हैं और मन में खालीपन घर कर जाता है. कुसुम की जिंदगी में भी कुछ ऐसा ही दौर आया था. और जिंदगी में एक नया अध्याय जुड़ने लगा था."

एक बात जो मैं आसानी से महसूस कर सकता था, वह यह कि मेरी बीवी कुसुम की खोजी निगाहें अब शायद मुझ पर ज्यादा गहरी रहने लगी थीं. मेरे अंदर चल रही भावनात्मक उथलपुथल और अनकही दास्तान का जैसे उसे एहसास हो चला था. यहां तक कि यदाकदा वह मेरे मोबाइल भी चैक करने लगी थी.

उस दिन के बाद मैंने कभी भी कुसुम से इस संदर्भ में कोई बात नहीं की. न ही कुसुम ने कुछ कहा. मगर उस की शक करने और मुझ पर नजर रखने की आदत बरकरार रही.

मेरी मम्मी भी कुसुम की उदासी का कारण नही जान पायी। जब वो कभी उससे उदासी की वजह पूछती तो कुसुम बस नौकरी और काम का बहाना बना देती. मोबाइल की फोटो वाली घटना के बाद से ही कुसुम ने मेरे साथ कभी भी शारीरिक संम्बंध नहीं बनाए थे। हालांकि पहले भी कुसुम की अन्य शहर में नौकरी के कारण हम दोनों 15 दिन में एक या दो बार ही सेक्स करते थे पर अब तो वो भी बिल्कुल बन्द हो चुका था। मै अपनी तरफ से भी कभी कोशिश करता तो भी कुसुम का ठंडा रेस्पांस देखकर मै भी ठंडा हो जाता.. उस फोटो कांड के बाद मेरा सबसे बड़ा नुकसान ये हुआ कि अब कुसुम पहले जैसी हसमुंख इंसान नही रही थी, ना जाने दिल में कौनसी चोट खाये बैठी थी...!

उधर रिंकी की जिंदगी में पापा के प्यार की बगिया बखूबी खिलने लगी थी. वो मैसेज व शायरी के साथ साथ अब रोमांटिक वीडियोज और चटपटे जोक्स भी शेयर करने लगी थी. कभी कभी मुझे चिंता होती कि मैं इन्हें देखते वक्त इतना घबराया हुआ सा क्यों रहता हूं? निश्चिंत हो कर इन का आनंद क्यों नहीं उठा पाता? जाहिर है, चोरी छिपे कुछ किया जाए तो मन में घबराहट तो होती ही है और वही मेरे साथ भी होता था. आखिर कहीं न कहीं मैं अपनी बीवी से धोखा ही तो कर रहा था. इस बात का अपराधबोध तो मुझे था ही.

अब तो समय के साथ रिंकी की हिमाकतें और भी बढ़ने लगी थीं. मैं भी बहता जा रहा था. एक अजीब सा जनून था जिंदगी में. वैसे कभी कभी मुझे ऐसा लगता जैसे यह सब बिलकुल सही नहीं. इधर कुसुम को धोखा देने का अपराधबोध तो दूसरी तरफ रिंकी का बढ़ता आकर्षण. मैं न चाहते हुए भी स्वयं को रोक नहीं पा रहा था

एक दिन रिंकी ने मुझे एक रोमांटिक सा वीडियो शेयर किया और तभी कुसुम भी बड़े गौर से मुझे देखती हुई गुजरी. मैं चुपके से अपना मोबाइल ले कर बाहर बालकनी में आ गया. वीडियो डाउनलोड कर इधर उधर देखने लगा कि कोई मुझे देख तो नहीं रहा. जब निश्चिंत हो गया कि कुसुम आसपास नहीं है, तो वीडियो का आनंद लेने लगा. उस वक्त मुझे अंदर से एक अजीब सा रोमांटिक एहसास हुआ. उस समय अपनी बेटी रिंकी को बांहों में भरने की तमन्ना भी हुई मगर तुरंत स्वयं को संयमित करता हुआ अंदर आ गया.

कुसुम की अनुभवी निगाहें मुझ पर टिकी थीं. निगाहें चुराता हुआ मैं लैपटौप खोल कर बैठ गया. मुझे स्वयं पर आश्चर्य हो रहा था कि ऐसा कैसे हो गया? मन का एक कोना एक अनजान से अपराधबोध से घिर गया. क्या मैं यह ठीक कर रहा हूं? मैंने कुसुम की तरफ देखा.

कुसुम सामने उदास सी बैठी थी, जैसे उसे मेरे मन में चल रही उथलपुथल का एहसास हो गया था. अचानक वह पास आ कर बोली, ‘‘ मैने काफी सोच विचार कर एक फैसला लिया है कि "रिंकी को अपनी नानी के घर रहना चाहिए, उसकी नानी, जूली की शादी के बाद अब बिल्कुल अकेली पड़ गयी हैं, वहा उनके साथ रहेगी थोड़ा गृहशथि के काम मे हाथ बटायेगी, उसका कॉलेज भी नानी के घर के ही पास है "

(शायद कुसुम का दिमागी तर्क था कि उसकी बेटी नानी के घर जा कर वह हर वक़्त उसके पति का सामना करने से बच सकेगी, उसे अब बाप बेटी की हँसी ठिठोली फूटी आँख नहीं सुहाती थी! कुसुम ने ये भी ठान लिया था कि अगर रिंकी ने नानी के घर जाने मे जरा सी भी आना कानी की तो वह जहर उगलने में एक पल की भी देरी नहीं करेगी)

कुसुम की उदासी व रिंकी के दूर होने का एहसास मुझे अंदर तक द्रवित कर गया. ऐसा लगा जैसे रिंकी को बरगलाने मे मेरा ही हाथ है, और मैं ही उस का दोषी हूं. अजीब सी कशमकश में घिरा मैं सो गया. सुबह उठा तो मन शांत था मेरा.

मेरी हालत थोड़ी अजीब सी थी. रिंकी की जुदाई की पीड़ा लफ़्ज़ों में भी बयान नही की जा सकती. एक तरफ तो मैं आज नौकरी पर नही जाना चाहता था क्योंकि कुसुम ने मेरे साले को रिंकी को ले जाने के लिए बुलाया था और मै उसे अपने घर में

कयि महीनों बल्कि कयि सालों तक अपने पास रखना चाहता था. मगर ऐसा संभव तो नही था.

मै उस दिन अपनी नौकरी पर चला तो गया पर अपना दिल अपना चैन सब कुछ रिंकी के पास रख गया । रिंकी का भी यही हाल था । वह भी बेचैनी का अनुभव करती रही ।

कुसुम ने भी अपना इरादा पक्का कर लिया था, उसने सोचा तो था कि अगर घर में किसी ने मुझे रिंकी को अचानक से उसकी नानी के घर भेजने का कारण पूछा तो वह सास ससुर ( मेरी मम्मी पापा) को सब सच-सच बोल देगी, लेकिन जब उसने घर पर उसके फैसले पर किसी को कोई ऐतराज ना करते हुए देखा तो उस से कुछ कहते न बना. और बात टलते-टलते टल गयी.

कुसुम को एक और बात भी खल रही थी, उसके मायके की आर्थिक हालत सही नही है, तो उसे ही रिंकी की पढाई और अन्य खर्चे के साथ-साथ मायके में माँ-बाप, भाई के खर्चा के लिए भी पैसा भेजना पड़ेगा. परंतु इस बात पर काफ़ी गहरायी से सोचने के बाद " अगर उसका पैसा ख़र्च होता भी है तो अब उसे फ़र्क़ नहीं पड़ना चाहिए, यह उसका फर्ज था बस उसकी बेटी उसके पति से दूर रहे, भले ही इसके लिए उसका ज्यादा ख़र्चा हो रहा हो."

दोपहर के खाना के बाद, रिंकी के नानी के घर जाने का समय आ गया. कुसुम ने साले की जिद करने के बाबजूद अपने आप ही उसके साथ जाना यह कह कर टाल दिया कि ऑफ़िस में पहले ही काफ़ी काम बाक़ी पड़ा है, सो वो अभी नहीं जा सकेगी. इसी तरह, कुछ अपनों का प्यार और कुछ अपने कल के बुरे अनुभवों से बाहर निकलने के सपने लिए रिंकी नानी के घर के लिए रवाना हो गयी.

उसी शाम को......! मुझे घर जाने की जल्दबाज़ी भी हो रही थी, जैसे जैसे घर नज़दीक आता जा रहा था मेरी धड़कन बढ़ती जा रही थी. मैं अपने मन को तस्सली दे रहा था कि शायद किसी वजह से कुसुम ने रिंकी को नानी के घर भेजने का फैसला बदल दिया हो....!

मै जब घर में दाखिल हुआ तो देखा रिंकी घर पर नही थी. शायद ऊपर अपने कमरे में होगी. मैं उसके कमरे की ओर चल पड़ा. मैं तेज़ तेज़ कदम उठा रहा था. मेरी उस समय एक ही ख्वाहिश थी कि जल्द से जल्द उसका खूबसूरत चेहरा देख लूँ, तभी मेरे दिल को सकुन आने वाला था. मगर कमरे मे पहुँचते ही मेरे पैर ठिठक गये. कमर बंद था. मुझे घबराहट होने लगी. मैं बैचैन मन को तस्सली देता वापस चल दिया.

मैं अपने और रिंकी के कमरे से होकर मम्मी के कमरे में गया, पर वो वहाँ नही थी. शायद वो रसोई में थी. मैं रसोई की और गया देखा मम्मी वहीं थी और एक कुर्सी पर बैठी हुई थी, कुसुम भी पास खड़ी हुयी थी मेरी ओर उसकी पीठ थी. मैने रसोई की ओर जाते हुए मम्मी को पुकारा मगर वो सिर्फ तीन शब्द ही बोली...!

"वो चली गयी....,.,......."

उन्होंने पीछे मुड़कर भी नही देखा. मैं थोड़ा हैरान था, ये मम्मी को अचानक क्या हो गया.

जारी है....... ✍🏻
 
हास्य से परिपूर्ण बहुत प्यारा मंतव्य......

" बापता " ये शब्द मैने "ता" प्रत्यय लगा कर इजाद किया है..... बाप + ता 😁😂

अरुण के मोबाइल में जयदातार रोमांटिक सेल्फी फोटो थे जो कि रिंकी के साथ दिमापुर ट्रिप पर पार्क में लिए गये थे, इसलिए फोटो से ज्यादा फर्क नहीं पड़ना था. लेकिन ये कुसुम का शक का कीडा उसे काट गया.😁

वो फिलॉसफी तो मैने आपके लिए ही लिखी थी, मगर अफसोस आप ही समझ नही पाये,

हर बार की तरह आपके शब्दों का स्नेह लाभ मिला ✍🏻

धन्यवाद
 
मैं अपने और रिंकी के कमरे से होकर मम्मी के कमरे में गया, पर वो वहाँ नही थी. शायद वो रसोई में थी. मैं रसोई की और गया देखा मम्मी वहीं थी और एक कुर्सी पर बैठी हुई थी, कुसुम भी पास खड़ी हुयी थी मेरी ओर उसकी पीठ थी. मैने रसोई की ओर जाते हुए मम्मी को पुकारा मगर वो सिर्फ तीन शब्द ही बोली...!

"वो चली गयी....,.,......."

उन्होंने पीछे मुड़कर भी नही देखा. मैं थोड़ा हैरान था, ये मम्मी को अचानक क्या हो गया.

मै अंजान बनते हुए बोला.. कौन चली गई???

तेरी लाडो रानी... मम्मी ने टोंट मारा..

लेकिन तुम्हारी लाडो रानी तो मौजूद हैं. ये क्यों रुक गयी, ये भी चली जाती ??? मैने भी जानबूजकर कुसुम की ओर व्यंग भरा कटाक्ष किया.

'तुम्हारी छाती पर मूंग दलने के लिए.'

कुसुम ने ऊंचे स्वर में एकदम से पलट कर जबाब दिया....!

अरे बस करो तुम दोनों बेबजह की जिरह ...... अरुण बेटा जाकर हाथ मुह धो मै खाना परोसती हू. मम्मी ने तुरंत मामला शांत करवा दिया.

आधी रात गुज़र चुकी थी. दीवार से टेक लगाए बेड पर बैठा मैं कमरे के गहरे अंधेरे में खुद को छुपाने की कोशिश कर रहा था. रोशनी अब आँखो को चुभती थी, उजाला उस भयानक सच्चाई की तकलीफ़ को और बढ़ा देता. अंधेरे में अपनी तन्हाई में, उस अकेलेपन में, रिंकी के साथ बिताए एक एक पल को मैं याद कर रहा था. वहीं दिल में दर्द की लहरें उठ रही थी. मुझे साँस लेने में तकलीफ़ हो रही थी. लगता था जैसे अंदर कुछ टूट रहा था. मेरी बेटी के साथ मेरे रिश्ते में कुछ भी ग़लत नही था.

अगली सुबह मै वक्त से आधे घंटे पहले नौकरी के लिए जाने वाला था कि मेरे पिताजी की पीछे से आवाज आई.

अरुण.. जरा मुझे बैंक तक छोड़ दोगे...??

मैने हाँ मे उन्हें स्वकीर्ति देदी. वो और मै एक साथ बाइक पर निकल गये. चूंकि बैंक को खुलने मे अभी काफी वक्त था तो पिताजी बोले अरुण अगर देर ना हो रही हो तो एक एक चाय पी ले.

हम दोनों बाप बेटे चाय वाले की रेहड़ी पर चाय की चुस्किया लेने लगे. चुस्किया लेते हुए अचानक पिताजी बोले.

अरुण मै तुम्हें कुछ समझाना चाहता हूँ, मानना या ना मानना तुम्हारी मर्जी तुम परिपक्व हो चुके अच्छा बुरा दोनों की समझ रखते हो.

मैंने प्रश्नवाचक नजरों से पिताजी की तरफ देखा और बोला आप जो भी कहना चाहते है, निश्चित ही मेरे अच्छे के लिए ही होगा आप खुल कर बताइये.

अरुण तेरी शादी को एक साल होने वाला है, और मेरी शादी जितनी तेरी उम्र है उससे एक साल ज्यादा पुरानी हो चुकी हैं. बेटा इस हिसाब से मै तेरा सीनियर हू. तू मुझे एक बात बता तेरी माँ कैसी माँ है...???

अच्छी.. मैने धीरे से कहा.

सिर्फ अच्छी...??? पिताजी ने फिर से जोर दिया.

बहुत अच्छी. मेरी माँ 'बहुत अच्छी माँ' है.. मैने मुस्कुरा कर कहा.

अरुण तेरी माँ ने 'अच्छी' से 'बहुत अच्छी' तक का सफर इतनी आसानी से तय नहीं किया है, बहुत बलिदान दिया है. तेरी माँ और मेरी उम्र में एक दशक (दस साल) से ज्यादा का अंतर है, और इस अंतर को सहज रूप से स्वीकार करना किसी भी स्त्री के लिए आसान नहीं होता है. बड़े उम्र के पुरुषों के साथ ब्याही गई स्त्रियों को भी अपनी उम्र से अधिक बड़ी हो जाना पड़ता है. अपनी इच्छाओं अपने सपनों और अपनी कामनाओं की छाती,पेट, कमर, सिर और पैर को रौंदकर चढ़ना पड़ता है उम्र की सीढ़ियों को. स्त्री का बडी उम्र के पुरुष की ब्याहता होना अपनी ही उम्र के भीतर रहकर उसे उम्र के कांटे को बराबर रखने के लिए दबानी पड़ती है अपनी मुस्कुराहट, आंखों की चमक और अपना अस्तित्व और देखते ही देखते वो बड़े उम्र के पुरुष से पहले ही हो जाती है बूढ़ी ...,,,!!!!

अरुण विवाह के वक्त कुंडली में मिलाये गये गुण का कितना महतव् होता है मुझे नही पता, लेकिन विवाह पश्चात पति पत्नी का समगुणी-सद्गुणी होना बहुत जरूरी होता है.

सुनीता (मेरी माँ नाम) को हमेशा यह भरम बना रहता था कि उसके पति ने यानी मैंने जवानी के दिनों में बड़े गुल खिलाये होंगे ।

एक बार यदि भरम का कीड़ा मन मे बैठ जाये तो कितनी भी खुदाई निराई गुड़ाई कर लो बाहर निकलता ही नहीं जब-तब काटता कचोटता ही रहता है , जिसकी वजह से उसे खुजली मचती रहती थी ।

उसकी एक दिक्कत यह भी थी कि मौसमानुसार यदि ज़रा छेड़छाड़ शुरू करो तो वो फ़्लैश बेक में चली जाती।

एक शाम बादल कुछ ज़्यादा ही गहरा गए थे , मैने भी ठान ली कि कीड़े को मार कर ही रहूंगा ।

जैसा कि होना था हाथ पकड़ते ही बोली , ' बताइए न कॉलेज में कोई थी क्या ?' और मैं भी बादलों की ओर मुंह उठा कर बोला , ' अरे क्या छेड़ दिया तुमने भी , बहुत कुछ हुआ उन दिनों ..! '

बस फिर क्या बगल से उठ कर सामने आ बैठी और उसका पूरा चेहरा ही मानो प्रश्रचिन्ह ही बन गया !

मैं भी इत्मीनान से शुरू हो गया ।

" सुनो , उस वक़्त एक ही बात समझ में आयी कि लड़कियां अजीब ही होती हैं इनको समझना नामुमकीन है , जितना दूर रहो उतना ही अच्छा !"

" क्या हुआ था सब सुनना है मुझे ?" तेरी माँ ने फौरन पालथी मार दर्शा दिया कि आप बोलो मैं सब सुनूँगी , मैं भी यही चाहता था और शुरू हो गया !

" अब तुम तो जानती हो कि मैं न तो गाता बजाता हूँ न स्केच बनाता हूँ न शायरी नज़्म कविता कहानी ही लिखता हूँ और न ही सुपर स्मार्ट या इंटेलिजेंट ही हूँ , यानी मुझमें कोई भी गुण न था न है और यह बात मैंने कभी किसी भी लड़की से नही छुपाई !

पहली लड़की ने मुझसे बातचीत करने की पेशकश की पर मेरी ये बातें सुनते ही बोली कि तुम में कोई भी गुण ही नही है , तुम से मुझे कोई बात नही चलानी तुम मेरे जैसे नही !

दूसरी लड़की बोली कि भाड़ में जाये सानू की फर्क पेंदा , रुपया पैसा तगड़ा कमाओ बस मेरे लिए वही बहुत है ।

तीसरी लड़की बोली तुम्हे गुण सिखाना मेरे बायें हाथ का खेल है तुम्हे मेरे जैसा बना ही लूंगी !

चौथी बोली कि तुम बेकार चक्कर मे न पड़ो , मैं जो जैसा कहूँ वही करते चलना बस !

सुनीता यह तो समझ गयी कि इन चारों संग मेरी कहानी चली नही ! पूछ ही ली कि बताइए आपने मुझसे ही शादी क्यों कि ?

मैं इतना ही बोला , " सुनीता , एक तुम ही थी जिसने मुझ से कहा कि आप जैसे हैं वैसे ही मुझे चाहिए कुछ भी बदलने की ज़रूरत नही ! मेरी सोच भी यही थी और तुम मेरे जैसी ही निकली ! "

बात सुनते ही वो सामने से उठी और झट से मेरी बगल में आ सटी ! मेरा यही एकमात्र सटने का पसंदीदा गुण उसने भी उठा लिया है और चाहिए भी क्या ?

जब मन एक हों तो गीत संगीत रंग चित्र कविताएं शेरो शायरी खुद ब खुद निकलने लगते है , हम दोनों समगुणी भी हैं और सद्गुणी भी ।

शायद तुझे पता नही है बेटा.. तेरा और बहु का रिंकी को अचानक से भेज देने के फैसले पर मै कुछ क्यो नही बोला क्योकि जब शादी के वक्त रिंकी को साथ रखने की बात चली थी, उस बात से तेरी माँ और मै कतयी सहमत नहीं थे, लेकिन तेरी और बहु की खुशी के लिए हम चुप रहे और कल जब बहु ने उसे वापस भेज दिया तब भी हम चुप रहे.

लेकिन मै अपने अनुभव से इतना समझ सकता हूँ कि बहु ने ये फैसला क्यो लिया, अरुण प्रेमिका का पत्नी हो जाना एक घटना है, और पत्नी का प्रेमिका हो जाना एक अधिद्वित्य घटना है, बहु तुझे एक प्रेमिका की तरह प्यार करती हैं. और तेरा प्यार किसी के साथ बटता हुआ नही देख सकती. चाहे उसकी खुद की सगी बेटी क्यो ना हो.

बेटा मर्द का क्या है वह तो हमेशा वही चीजों के पीछे दौड़ता है जो उसे अच्छी लगती है । तेरी हालत उस मृग की तरह है जो उस कस्तूरी की सुंगन्ध के लिए यहा वहा भटकता रहता है, जो स्वयम उसकी नाभि मे मौजूद होती हैं. तेरी प्रेमिका तेरे घर में है और तू क्यू बेवजह यहा वहा भटक रहा है. खुश नसीब है तू जो समगुणी-सद्गुणी और इतना प्यार करने वाली पत्नी मिली है....!

अभी तो वक़्त है खुद की गृहस्थी बसाने का, ध्यान दो वर्ना कुछ भी हासिल नहीं कर पाओगे ।"

मै अभी सिर झुकाए वहां बैठा था ।

"अब जाओ, इतना ही कहने को तुम्हारे साथ मे आये थे । अभी समझ आ जाए तो अच्छा है वर्ना बाद में सिवाए पछताने के कुछ कर नहीं पाओगे ।"

मै कुछ नहीं बोला बस पापा को जाते हुए देख रहा था ।

”बेटा पिता की बातों को समझ गया था ये देख कर पिता को अच्छा लगा । बेटा आगे क्या करेगा ये तो पता नहीं, लेकिन अब से अपनी पत्नी की इज़्ज़त ज़रूर करेगा ये पक्का है."

शाम को नौकरी से वापस आने के बाद मैंने घर में प्रवेश किया, कुसुम किचिन् मे मौजूद थी और मेरे माता पिता हॉल मे बैठे थे.

मैने स्टाइल में बाइक की चाबी उछाली , और कहा, "मुझे बहुत भूख लगी है। क्या पका है?

सोफे पर बैठ कर अपने जूते उतार रहा था तभी कुसुम की रोमांटिक आवाज आई।

I LOVE YOU!

मैं चौंक गया अपनी बीवी कुसुम को ध्यान से देखा। उसकी काजल भरी आँखों में प्यार था। काले बाल लहरा रहे थे। उसके गुलाबी होठों पर मुस्कान थी। शादी को एक साल होने को आया था मगर कुसुम ने कभी अपने सास ससुर के सामने इस तरह खुलेआम इतनी जोर से कभी I Love you नहीं कहा था मगर ख्याल आया के चलो बोली है तो में भी इंग्लिश में ही जवाब दे दूँ मैंने अपनी बीवी कुसुम से भी ज्यादा प्यार से, और भी रोमांटिक अंदाज में कहा ......

"I LOVE YOU TOO"

अचानक मेरी बीवी के लहजे मे से रोमांस छू हो गया और मुस्कान उसके होठों से निकल गई और आंखें सिकुड़ गईं। उसने कर्कश स्वर में कहा, "मैं कब से कह रही हूं कि अपने कानों का इलाज कराओ कभी उनमें सीटी बजती है। कभी पटाखे बजते हैं। कभी संगीत बजता है।"

वैसे Love you Too का शुक्रिया, लेकिन में ने I Love you नहीं कहा था !

आप ने पूछा, क्या पकाया है?

मैंने कहा था, आलू...!

इस बात पर सबके चेहरे पर हंसी खिल गई ।

शाम को बाकी लोगों ने भी खाना खा लिया था और अपने अपने रूम में चले गए, कुसुम ने बर्तन साफ किये और बाकी छोटा मोटा काम खत्म करके बेड रूम में आ गयी,

और मुझे देख कर वो दरवाजे पर ठिठक गई, हम दोनो की नजर मिली और उसकी आंखे भीग गई……वो हल्के पैरो से चलते हुए मेरे पास आई मैं अपनी जगह पर खड़ा उसे अपनी ओर आते देख रहा था,दोनो की नजर बस एक दूसरे की नजरो में ही खोई थी ,उसके पायल के छोटे से घुंघरू हल्के हल्के से आवाज कर रहे थे,जैसे जैसे वो मेरे पास आती वो आवाज थोड़ी और बढ़ रही थी ,

इतने दिनों तक जिस पल का इंतजार और अचानक ही जब वो सामने हो ……..दिल की धड़कने भी थोड़ी बढ़ ही जाती है ,वो आकर मेरे सामने खड़ी हो गई ,हम एक दूसरे को देखने के सिवा और कुछ भी नही कर रहे थे,उसका चहरा मेरे चहरे के पास आया और हमारे होठ मिल गए,मेरे हाथ अनायास ही उसके बालो में फसकर उसके चहरे को अपनी ओर खिंच रहे थे,और मेरी जीभ उसके होठो से अंदर किसी अस्तित्व की तलाश में जा चुके थे……..

'चुम्बन की दीर्घता संभोग की गहनता से अधिक रोमांटिक होती है। संभोग संतोष प्रदान कर सकता है किंतु आत्मतोष का साधन होंठो की गुलजार गलियां हैं।'

हम काफी देर तक युही एक दूसरे से लिपटे हुए बस एक अहसासों की दरिया में डुबकी लगा रहे थे,पूरी दुनिया जैसे खो चुकी थी और समय कि कोई सीमा नही थी ,समय मानो खो गया था…..

आज हम दोनो की पूरे एक महीने से दबी वासना बाहर निकल चुकी थी और दोनो ही जानते थे कि अगर ये वासना शांत न कि तो दोबारा कहीं कुछ गलत न हो जाये,

“ओह जान तुम तो किसी भी मर्द को अपना गुलाम ही बना दोगी..”

मेरे मुह से यही निकला जब मैंने कुसुम की योनि में अपना वीर्य उड़ेल दिया …

मैं थका हुआ उसके ऊपर पड़ा हुआ था वही वो मेरे सर को सहलाती हुई शांत पड़ी थी,जब मैंने उसकी आंखों में देखा तो वो उसकी आंखों में एक अजीब सी हलचल थी और होठो पर एक कातिल मुस्कान…

“सच में मैं किसी भी मर्द को अपना गुलाम बना सकती हु..”

कुसुम की बात से मेरे भी होठो पर एक मुस्कान खिल गई ..

“मुझे तो बना ही चुकी हो …”

वो हल्के से हँसी ..

“अच्छा,लेकिन मुझे तो लगता है की मैं आपकी गुलाम बन चुकी हु ,आपके प्यार के आगे मेरी हुस्न की क्या मजाल है,जब से हमारी शादी हुई है आपके प्यार की काशिस् ने मुझे अपना गुलाम ही बना दिया है…”

उसकी आंखों से छलकती हुई सच्चाई की बूंदों को मैंने अपने होठो में भर लिया …

“तुम्हारे हुस्न और सच्चाई ,तुम्हारी ये प्यारी सी आंखे और भरे हुए होठो से छलकते हुए रस के प्याले ,किसी भी मर्द को पागल बना देंगे….तुम जब हंसती हो तो लगता है की चांद खिल गया है,तुम्हारा रूठा हुआ चहरा भी इतना प्यारा है की दिल करता है अपना सब कुछ तुम्हारे कदमो में रख दु …”

मेरी आवाज में कुसुम के लिए बस प्यार ही प्यार था..

और उसके आंखों में आंसू ,जिसे मैं अपने होठो से हल्के हल्के से चूम रहा था,

" कुसुम सुनो,कहाँ खोई हो ?

मुझे तुमसे कुछ बात भी करनी है"

"सुनो जी मुझे भी आपसे कुछ बात करनी है"

"अच्छा पहले तुम बताओ"

"नही पहले आप कहिए, क्या कहना चाहते हो"

कुसुम हमारी शादी को कुछ हफ़्तों मे एक साल हो जायेगा. लेकिन हम एक दूसरे को कभी समझ ही नही पाए। या शायद समझने को कोशिश ही नही कर पाए। लेकिन इन पेन्तीस दिनों ने मुझे ये अहसास करवा दिया है कि तुम्हारे बिना तो मैं बिल्कुल जीरो हूँ। तुम्हारा आसपास होना ही मुझे पूर्ण कर देता है। तुम हो तो मैं हूँ, तुम नही तो मैं कुछ भी नही। अब जाके अहसास हुआ है कि इस पति पत्नी के रिश्ते की अहमियत क्या होती है। क्या तुम मुझे माफ़ कर सकोगी। शायद ये कहने में मैंने बहुत देर कर दी लेकिन सच मे कुसुम मुझे अब तुमसे प्यार हो गया है।"

“इतना ही प्यार करते हो तो उसे साफ साफ मना क्यो नही करते….”

उसकी इस बात से मैं सकपका गया,

ना जाने क्यो लेकिन उसकी ये बात मुझे अच्छी लग रही थी, ऐसी है मेरी बीवी कि उसे मेरे सिवा किसी और की (अपनी कोख से जनमी बेटी) फिक्र ही नही…!

मेरे होठो में हल्की मुस्कान तैरने लगी …

मैने कुसुम के हाथ को अपने हाथ मे ले लिया और बोला,मेरे जीवन में सिर्फ तुम ही एक लड़की हो , ट्राई सब पर किया लेकिन कभी कोई लड़की पटी ही नही....... उसने झूठे गुस्से से मुझे मारा ..

"अच्छा अब तुम बताओ तुम क्या कहना चाहती हो'

मेरी बातें सुन कर कुसुम की तो जैसे बोलती ही बन्द हो गयी थी। जिस बात को सुनने के लिए उसने इतने दिन इंतजार किया आज उसको सुनकर उसकी आँखों से गंगा यमुना बह निकली। उसने अपना सिर मेरे कंधे पर रख दिया और बहुत देर तक मेरा कंधा अपने आंसुओं से भिगोती रही।

आखिर वो भी तो यही कहना चाहती थी अपने पति प्रियतम से..!!!

वो मुझसे लिपट गई और मैं उससे,जिस्म में कोई आग तो नही थी बस अहसास था एक दूसरे के होने का अहसास...मैं उसके बालो को हल्के हल्के ही सहला रहा था वही वो आंखे बंद किये मेरे कंधे पर ही लेटी थी...हमारे रिश्ते में आगे क्या होने वाला था इस बात की गारेंटी दोनो में कोई नही दे सकता था,

जारी है..... ✍🏻
 
😁😂🤣😁🤣 एक समय में कितना हसायेंगे 😁🤣😂 हस हस कर लोट पोट हो गया😁

ना जाने कितने घरों की चार दिवारी के अंतर इस तरह के व्यभिचार पनपते है जब राजफ़ाश होता है तो इसके प्रमाण आये दिन अखबारों के पन्नो के किसी कोने में पढ़ने को मिलते है. अरुण के माता पिता भी ठीक अरुण की सास की तरह अपनी परिवार की प्रतिष्ठा को ध्यान में रख खामोश रहे. और सच पकडने की जिम्मेदारी उन्होंने कुसुम के ऊपर सौंप दी. वो जाने उसका काम 😁 और यही सही भी था.

आगे मेनका अपने रंग जरूर दिखाएगी इस बात के लिए कुसुम को तैयारी करनी होगी😁

बहुत बहुत शुक्रिया बड़े भाई हर बार की तरह बेहतरीन मंतव्य के लिए.
 
अध्याय - 26 --- " विनाश काले विपरीत बुद्धि ""

वो मुझसे लिपट गई और मैं उससे,जिस्म में कोई आग तो नही थी बस अहसास था एक दूसरे के होने का अहसास...मैं उसके बालो को हल्के हल्के ही सहला रहा था वही वो आंखे बंद किये मेरे कंधे पर ही लेटी थी...हमारे रिश्ते में आगे क्या होने वाला था इस बात की गारेंटी दोनो में कोई नही दे सकता था,

दूसरी तरफ मेरी ससुराल में अचानक से रिंकी के हमेशा के लिए वापिस आ जाने से हलचल मचनी शुरु हो गयी थी. कुसुम की मां भी सब कुछ समझ चुकी थी. उन्हे अपनी बेटी कुसुम के भाग्य पर तरस आ रहा था. बेचारी ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि उसके घर में उसके विरुद्ध क्या चल रहा था ?

घर की ऐसी बातें जब घर से बाहर निकल जाती हैं तो अन्य घरों में दुगुनी तेजी पहुँच जाती हैं. सास ने अप्रत्यक्ष रूप से अपनी दोनो बेटियों जूली और प्रीति को भी बता दिया.

हालांकि जूली भी शादी से पहले अपने जीजा यानी मुझ पर लट्टू थी, और वो ही सब करना चाहती थी जो अभी रिंकी करने पर तुली है. लेकिन शादी के बाद उसे रिश्तों की मर्यादा मे बंधना आ गया था, जबकि प्रीति ने जीजा के साथ बनाये हुए शारीरिक संबंध को एक खूबसूरत हादसा समझ कर भुला दिया था, और उसे अपने जीजा अरुण पर गर्व भी था, वो प्यार से जीजा का माथा चूमना चाहती थी क्योकि शादीशुदा साली के साथ शारीरिक संबंध बनाने के उपरांत उसके बदन पर मौजूद तिलों का राज, जीजा ने अपने तक ही सीमित रखा था.

इसलिए दोनो ने अच्छी मौसी का फर्ज निभाते हुए मेरी सास को सलाह दी कि रिंकी अब बड़ी हो गयी , और उसकी जल्द से जल्द शादी कर दो और रिंकी की शादी की बात घर में होने लगी लेकिन रिंकी हमेशा शादी को मना कर देती । मैं शादी नहीं करूंगी मौसियो से बोलती की नाना नानी को कौन देखेगा? आप दोनो तो चली गई . मैं नाना नानी दोनों को छोड़कर कहीं नहीं जाने वाली । मैं हमेशा दोनों के साथ ही रहूंगी, नाना और नानी भी दोनों मिलकर उसे समझाते कि बेटा लड़कियों की शादी जरूरी है ।हम लोग कब तक तुम्हें संभालेंगे? एक समय आएगा कि हमारा अंत हो जाएगा | फिर तुम्हारा क्या होगा? तुम किसके सहारे जियोगी ?

जूली जो की रिंकी कि मौसी होने के साथ साथ सहेली भी थी उसने भी समझाया रिंकी मेरी बात मान लो तुम्हारी सुंदरता को देखकर अच्छे-अच्छे घरों से रिश्ते आ रहे हैं । अच्छे से लड़के को पसंद कर के उस के साथ शादी कर लो । अगर तुम्हें कोई पसंद हो तो तुम बताओ । मैं उसी से तुम्हारी शादी करवा दूंगी । पर रिंकी हमेशा मना कर देती कि नहीं मुझे शादी नहीं करनी तो नहीं करनी ।

***

वक्त अपनी गति से निरंतर चल रहा था रिंकी के कॉलेज का पहला सेमेस्टर ख़त्म हो चुका था, आज रिंकी की सहेली श्रुति का जन्मदिन था.

श्रुति ने अपनी कुछ लोकल फ़्रेंड्ज़ को पार्टी के लिए बुलाया था. और पार्टी करने फ़्रेंड्ज़ के साथ सिटी मॉल चल दी. उन्होंने उस दिन काफ़ी मज़ा-मस्ती की. श्रुति की सहेलियाँ उसके लिए एक केक लेकर आयीं थी —अपना फ़ेवरेट चोक्लेट केक देख वह बहुत ख़ुश हुई. पूरा दिन इसी तरह हँसते-खेलते और खाते पीते बीत गया, कब शाम हो गयी उन्हें पता भी न चला. वे सब अब अपने-अपने घर के लिए निकलने लगीं. आख़िर में रिंकी और उसकी फ़्रेंड श्रुति ही रह गए.

‘आर यू नॉट लीविंग?’ रिंकी ने श्रुति को जाने का नाम न लेते देख पूछा. उसने सोचा था सब के चले जाने के बाद साथ साथ घर के लिए निकलेगी.

‘या या…यू गो रिंकी, आइ विल गो बाय मायसेल्फ़.’ श्रुति बोली.

‘अरे, हाउ केन आइ गो लीविंग यू हियर?’ रिंकी बोली, ‘ हम दोनों तो साथ मे चलने वाले थे…’

‘हाहाहा…आइ एम नॉट गोइंग होम सिली (बेवक़ूफ़).’ श्रुति ने खिखियाकर कहा.

‘वट डू यू मीन?’ रिंकी ने आश्चर्य से पूछा.

‘अरे यार, सोमेश आ रहा है मुझे लेने, मैंने घर पर बहाना बनाया है और बोला है कि आज तेरे पास रुकूँगी…’ श्रुति ने रिंकी को आँख मारते हुए कहा. सोमेश उसका बॉयफ़्रेंड था.

‘हैं…’ रिंकी ने बड़ी-बड़ी आँखें कर के पूछा, ‘तुम उसके साथ रहोगी रात भर?’

‘हाहाहा…हाँ भयी मेरी प्यारी 'पापा की परी'… वी विल हैव सम फ़न टुनाइट…’ श्रुति ने उसे फिर आँख मारी.

‘ ओह माई गोड…’ रिंकी से और कुछ कहते न बना.

तभी श्रुति का फ़ोन बज उठा, सोमेश बाहर आ गया था. श्रुति मुस्कुराते हुए उठ खड़ी हुयी,

‘ओके रिंकी , थैंक्स, अब तुम जा सकती हो…बहुत मज़ा आया आज…काफ़ी पैसे दिये थे मेरे मोम एंड डेड ने उड़ाने के लिए इस बार.’

‘हुह…’ पैसों का ज़िक्र सुन रिंकी ने मुँह बनाया, फिर मुस्का कर बोली, ‘ एंजॉय toinght.’ बाय

श्रुति के जाने के बाद रिंकी एक ऑटो लेकर अपने नानी के घर आ गयी. रास्ते में वह यही सोच रही थी कि श्रुति कितनी चालू निकली, अपने बॉयफ़्रेंड के साथ ‘फ़न’ करेगी मेरा बहाना लेकर. ‘चलो जो भी करे मुझे क्या करना है.’ तब तक उसका नानी का घर आ गया था.

इधर दूसरी तरफ श्रुति को सोमेश ने विश किया अच्छे भविष्य की कामना किया गले लगाया। बोला आज रात की पार्टी के लिए एक होटल में रात के लिए उसने कमरा भी वही बुक किया है, बोला कि यार तेरा बर्थडे इस बार अच्छे से मनाना चाह रहा हूँ।

श्रुति सोची कि ऐसा मौका पता नहीं कितने दिन बाद आएगा तो किसी बात के लिए मना नहीं कि वह जो जो कहते गया श्रुति हां में हां मिलाते गई।

रात को दोनों 8:00 बजे होटल पहुंचे वहां खाना खाए अपने कमरे में गए बड़ा सा केक का इंतजाम था एक बुके भी रखा हुआ था, केक काटे अपने बॉय फ्रेंड को खिलाई उसने भी खिलाया और फिर गले लगा लिया।

धीरे-धीरे करके दोनो करीब आ गये और होंठ को चूमने लगे. श्रुति की वासना भी भड़क उठी थी. और धीरे-धीरे सारे कपड़े उतार दिए पूरी तरह से नंगी हो गई, उसने तुरंत उसका लोड़ा पकड़ ली और चूसने लगी। और फिर अपना चुत चुसवाने के लिए बेड पर लेट गई श्रुति की नशीली आंखें सोमेश को इशारा दे रही थी की आ और मुझे चूस ले। वह तुरंत ही श्रुति की चुत को चूसने लगा। अब वो आह आह कर रही थी। पांच सात मिनिट की चूत चुसायी के बाद वो बोली अब बस करो देर मत करो मुझे खुश कर दो यही मेरा बर्थडे का गिफ्ट होगा।

सोमेश भी तुरंत श्रुति के दोनों पैरों को अलग अलग किया और अपना लौड़ा उसकी चूत पर लगाकर जोर से धक्का देने लगा. श्रुति मजे भी ले रही थी और उसे दर्द भी हो रहा था सोमेश धक्के पर धक्के दिए जा रहा था श्रुति की चूचियां हिल रही थी। वो बीच बीच में चूचियों को दबोच रहा था।

नीचे से श्रुति खुद धक्के दे रही थी ऊपर से वह धक्के दे रहा था. करीब दस पंद्रह मिनिट बाद दोनो झड़ गये फिर दोनों एक दूसरे के बाहों में बाहें डाल कर लेटे रहे श्रुति का बॉय फ्रेंड उसकी चूचियों को सहला रहा था। और वो बाल खोलकर बेड पर लेटी थी

कुछ देर बाद सोमेश बोला यार श्रुति एक बात बता तेरी दोस्त रिंकी का चक्कर किसके साथ चल रहा है, उसके बूब्स बड़े-बड़े दिखाई दे रहे थे, तंग कपड़े से साफ पता चल रहा था कि उसकी चूचियां कितनी बड़ी है. रिंकी तो कली से खिलता फूल बन गयी है, आज तो मै भी उस पर फिदा हो गया.....!

"सोमेश सच ही कह रहा था क्योंकि रिंकी के चूचे पूरे 34D के साइज के थे. चूतड़ भी 36 के साइज से ज्यादा ही थे. कमर 30 के साइज की. रंग गोरा और आंखें एकदम शर्मिला टैगोर की तरह. हर कोई उस पर फिदा था"

(श्रुति ने मन ही मन कहा कि अबे चूतिये रिंकीया को कली से फूल तो उसके पापा बहुत पहले ही बना चुके है, मगर तुझे नहीं पता है इस बारे में.)

अपने बॉय फ्रेंड के सवाल का जबाब देने मे तो पहले तो श्रुति ना-नुकर कर मुकरति रही, 'मुझे कुछ भी नही पता' लेकिन उसके प्रेमी के जोर देने पर उसके मुह से धीरे धीरे से सच निकलने लगा. जबकि श्रुति ने रिंकी से वादा किया था कि उसका 'पापा के साथ सेक्स वाले रिश्तों की बात' किसी को नही बताएगी लेकिन वो ठेहरी एक स्त्री (लड़की) जाति, तो कब तक किसी भी राज/बात को सीने में दबा कर रख सकती थी.

" दुनिया का सबसे बड़ा सच ये भी है कि अपने पसंदीदा मर्द की बाहों के आगोश में बिस्तर पर लड़की/औरत अपने सारे राज खोल देती है । पलंग समस्त स्त्री जाति के लिए एक बेहतरीन जगह होती है,जहा वो अपराधी भी बनती है, और सजा देने वाली भी "

श्रुति ने अपने प्रेमी को रिंकी और उसके पापा के रिश्तों की दास्ताँ विस्तार से बताने लगी...! वो भी एक वादे के साथ कि वो ये बात किसी और से नही कहेगा.... उसका प्रेमी उकसा उकसा कर और भी ज्यादा मजे लेते हुए पूछ रहा था, और वो बताती जा रही थी.

श्रुति की पूरी बात सुनकर उसका प्रेमी हस्ते हुए बोला - यह तो हर कोई करता है. आज के डिजिटल युग में अक्सर फैमिली के लोगों के बीच में यह सब होना आम बात है श्रुति तू इस छोटी सी बात को बताने में इतने भाव खा रही थी ?

श्रुति अपने बॉय फ्रेंड को अजीब सी नजरों से देख रही थी असल में उसकी भी यही सोच थी कि सेक्स में कोई रिश्ता नहीं होता है. अगर कोई रिश्ता होता है बस लंड और चूत का होता है. अपने बॉय फ्रेंड की बातों को सुन कर श्रुति के अंदर एक अलग सा रोमांच भर गया.

वही दूसरी तरफ श्रुति का प्रेमी मन ही मन रिंकी का नाम जपते हुए श्रुति के दूधों को पी रहा था और चूत को सहला ला रहा था श्रुति भी पूरी मस्ती में खोयी हुयी थी. उसके मुंह से कामुक सिसकारी निकल रही थी- उम्म्ह… अहह… हय… याह… जोर से करो … पी जाओ … मेरे दूधों को काट लो … आह्ह … बहुत मजा आ रहा है.

उसके बाद दोनो नहीं रुके और श्रुति के प्रेमी ने उसकी चूत को रात में तीन बार पूरा निचोड़ कर रख दिया.

***

दूसरी ओर उसी रात कुसुम के साथ समागम के बाद मै बेड पर लेटा हुआ था. कुसुम बाथरूम में थी. तभी मेरी नज़र अपने फ़ोन पर गयी, जिसकी नोटिफ़िकेशन लाइट जल रही थी. यह सोच कर कि देखें इतनी रात में किसने मेसेज किया हैं मैने फ़ोन उठा कर देखा. सिर्फ़ एक ही मेसेज था. वो भी मेरी लाडो रिंकी का..!

‘‘आप ने अपनी जिंदगी में मेरी जगह क्या सोची है, क्या हमारा चंद दिनों का ही साथ था या फिर सात जन्मों का?’’

मेसेज पढ़ते ही मेरा बदन शोला हो उठा था. मै कुछ समझ नहीं पा रहा था क्या करू, माथे पर पसीने की कुछ बूँदें छलक आयीं थी. तभी कुसुम बाथरूम से निकल आयी, मैने आनन-फ़ानन में फ़ोन एक तरफ़ रख दिया और सोने की एक्टिंग करने लगा. नींद मेरी आँखो से कोसों दूर थी, ख्वाहिशों की आंच मन में अजीब सी बेचैनी पैदा कर रही थी. एक बार फिर से रिंकी के प्रति मेरा रुझान बढ़ने लगा. दिलोदिमाग में बार बार उसी का खयाल उमड़ रहा था.

एक करवट लेटे मै सोचता रहा कि आखिर रिंकी के लिए क्या ऐसा करू कि वो खुश रह सकें, उसे भी उसके हिस्से की खुशिया मिल सकें । मैने अगले दिन उसके कॉलेज की छुट्टी के बाद उससे मिल कर उसे समझाने का फैसला लिया... !

मै रिंकी के कॉलेज के गेट के बाहर खड़ा था. बाहर कई सारे लड़के लड़कियां घूम रहें थे...... साथ ही साथ एक निर्भया पोलिस जीप थी जिसमे लेडी और जेंट्स पुलिस वाले बैठे थे.

दरवाजे के अंदर से रिंकी और उसकी दो और सहेली बाहर की ओर आ रही थी मुझे नाम नही पता था उस वक्त तक..... उसके साथ कॉलेज के दरवाजे की ओर आ रही थी..रिंकी सबसे साइड में थी और बीच में एक और सबसे लास्ट मे एक थी........

रिंकी जैसे ही दरवाजे के पास आई मैने अपनी बाइक निकली और फिर रिंकी को उस पर बैठने का इशारा किया...... सामने उसकी सहेलिया खड़ी थी इसलिए मुझे रिंकी से थोड़ी दूरी बनानी पड़ी...... रिंकी ने मेरे कंधे पर अपना एक हाथ रखा और मुझ को चलने का इशारा किया. उसकी सहेलियों ने उसे बाय कह कर अपने अपने रास्ते चली गई.

थोड़ी दूर जाने पर रिंकी थोड़ा आगे सरक कर मेरे और नज़दीक आ गयी......इस वक़्त उसका एक हाथ मेरी कमर पर था तो दूसरा हाथ मेरी पीठ पर.......रास्ता बहुत खराब था जिसकी वजह से मुझ को बार बार ब्रेक लेने पड़ रहे थे....हर ब्रेक पर रिंकी धीरे धीरे मेरे और करीब आती जा रही थी.......अब तक रिंकी मुझसे से पूरी तरह से सटकर बैठ चुकी थी.......अब उसके दोनो कसे हुए उरोज मेरी पीठ पर चुभ रहें थे....... मै भी उसके दोनो बूब्स को अपने पीठ पर महसूस कर परमआनंद का अनुभव कर रहा था.

मेरी हाथों की रोयें अब पूरे खड़े हो चुके थे.. मगर मैने ऐसी कहीं कोई हरकत नहीं कि जिससे उसे ये लगे की मै उसके उरोजो को अपनी पीठ पर महसूस कर रहा हू.. रिंकी और ज्यादा से सरककर मेरे और करीब आ गयी और अपने दोनो उभारों का वजन पूरा मेरी पीठ पर डाल दिया.......मैने एक बार पीछे उसकी तरफ पलट कर देखा मगर उसे कुछ नहीं कहा......और पहले की तरह बाइक चलाने लगा.......मुझे अब पूरा यकीन था कि मेरे लिंग् का खून पूरी तरह से गरम हो चुका है..आधे घंटे के बाद मेरा ससुराल आ गया..मैने थोड़ी दूर पर बाइक रोक दी.

‘‘क्या अब हमारे रिश्ते के लिए जरूरी नहीं है कि हम दोनों को एकदूसरे को मिल कर करीब से एकदूसरे का एहसास करना चाहिए.’’ रिंकी जैसे तैसे ये शब्द मुझसे कह पायी.

रिंकी की आवाज़ में कपकपाहट थी. मै उसके चेहरे पर पसीने को भी सॉफ महसूस कर रहा था. वो मुझसे बस इतना बोल कर और चुपचाप बाइक से उतर गयी..

‘‘जरूर, जब तुम कहो…’’ कहते हुए मैंने उसे पीछे से बांहों में भर लिया. उस ने मेरी तरफ चेहरा किया तो मैं यह देख कर विचलित हो उठा कि उस की आंखों से आंसू निकल रहे थे. तो वह सीने से लग गई, ‘‘आई लव यू…’’

‘‘आई नो डियर, बट क्या हुआ तुम्हें?’’

‘‘कुछ नही…’’ कह कर रिंकी मुसकराते हुए मेरे सीने से लग गई और मैंने भी पूरी मजबूती के साथ उसे बांहों में भर लिया. मैने एक बार फिर से उसके उरोजो के उभार को अपने सीने पर महसूस किया था.. यक़ीनन आज बहुत दिनों के बाद अपनी बेटी को आलिंगन करते हुए मेरा लंड खड़ा हो चुका था......

चंद सेकंड के आलिंगन के बाद ना चाहते हुए भी हम दोनों अलग अलग खड़े हो गये

और मै अपने पेंट मे खड़े लंड को अड्जस्ट करने लगा. मुझे ऐसा करते देख रिंकी अपने चेहरे पर मुसकान लाने से नहीं रोक पाई.....

और फिर हम अपने अपने घर की दिशा की तरफ चल दिये.

मैंने उसे स्वीकृति तो दे दी मगर मन में एक कसक सी उठ रही थी . शायद यह मेरी जिंदगी का सबसे बड़ी भूल साबित होने वाली थी ।

मुझ को पता था कि मै गलत कर रहा हू, रिंकी को भी पता था । लेकिन हमारा प्रेम रुकने का नाम ही नहीं ले रहा था । अगले दिन से रिंकी और मैने अपने अपने कॉलेज में जाना बंद कर दिया और धीरे धीरे हम होटल में भी मिलने लगे यह आने-जाने मिलने मिलाने का सिलसिला 15 दिन तक लगातार चलता रहा।

और एक दिन मेरी सास ने मुझे रिंकी को गली के नुक्कड़ पर छोड़ते हुए देख लिया और उनको यकीन हो गया कि बाप बेटी की रास लीला फिर से शुरु हो गयी । उन्होंने रिंकी को समझाया भी कि अपनी ही सगी माँ के घर को मत उजाड़ । डायन भी अपने घर को छोड़ देती है। तू तो डायन से भी गई गुजरी है । पर रिंकी कहां सुनने वाली थी । वह तो अपने ही विचारों में खोई रहती और वही करती जो करना चाहती। मेरी सास ने अबकी बार फिर से अपनी बेटी कुसुम को कुछ नहीं बताया कि उसका पति और बेटी क्या गुल खिला रही है । शायद बता देती तो कुछ बच जाता ।

जारी है...... ✍🏻
 
LSB (lock stock barel) ये फोरम का वो सेक्शन है जहा दिल और मन के साफ लोग जिनके अंदर छल फरेब नही है, जैसे है वो अंदर से वैसे ही बहार से है किसी प्रकार का शरीफ होने का ढोंग नही करते हुए अपनी कुछ सच्ची और कुछ फैंटेसी की बातें करते हैं.😁😂🤣

बांकी के फोरम पर अन्य longue और सेक्शन मे बेहरूपिया ज्यादा है जो adult फोरम पर आकर शराफत का चोला पहनकर भटकते रहते है😁 😂😁
 
अध्याय - 26 --- " पाप का अंत "

मेरी सास ने अबकी बार फिर से अपनी बेटी कुसुम को कुछ नहीं बताया कि उसका पति और बेटी क्या गुल खिला रही है । शायद बता देती तो कुछ बच जाता ।

एक समय था जब कुसुम मेरी जिंदगी थी और आज रिंकी के आकर्षण ने मुझे इस कदर अपनी गिरफ्त में ले लिया था. कि कब उस का मैसेज आए और मेरी धड़कनों को बहकने का मौका मिले. जरूरी तो नहीं हर चाहत का मतलब इश्क हो…! रोज मेरी सुबह की शुरुआत उस के एक प्यारे से मैसेज से होती. कभी कभी वह बहुत अजीब से मैसेज भेजती.

कभी उस ने एक खूबसूरत सी शायरी सुनाई. हसीं जज्बातों से लबरेज उसकी शायरी का जवाब मै शायरी से ही देने लगा. सालों पहले मैं शायरी लिखा करता था. रिंकी की वजह से आज फिर से मेरा यह पैशन जिंदा हो गया था. देर तक हम दोनों बातें करते रहे. ऐसा लगा जैसे मेरा मन बिलकुल हलका हो गया हो. रिंकी की बातें मेरे मन को छूने लगी थीं. वह बड़े बिंदास अंदाज में बातें करती. समय के साथ मेरी जिंदगी में रिंकी का हस्तक्षेप बढ़ता ही चला जा रहा था., इधर कुसुम अपने पत्नी धर्म का पालन करते हुए नौकरी के साथ साथ अपने सास ससुर और पति की सेवा में दिन रात एक किए हुए थी ना वो दिन देखती ना वो रात देखती ।

एक महीने बाद....... रिंकी अपने कॉलेज गयी थी श्रुति की नज़र जब उस पर पड़ी तो वो सवाल भरी नज़रो से उसे देखने लगी......!

क्या बात है रिंकी तेरे चेहरे पर निखार कुछ ज़्यादा ही बढ़ गया है......लगता है पापा की क्रीम चेहरे पर ज्यादा लगाई जा रही है.......??

श्रुति की बातों को सुनकर रिंकी का चेहरा शरम से लाल पड़ गया उसने अपना चेहरा तुरंत नीचे झुका लिया और श्रुति उसके चेहरे की ओर देखकर मुस्कुराती रही..

मैने सही कहा ना रिंकी . तू इतने दिनों से अपने प्रोफेसर पापा के साथ स्पेशल क्लास ले रही थी, वैसे इसमें छुपाने वाली कौन सी बात है.......जवान तू भी है और मैं भी......जब मैं भी अपने बॉयफ्रेंड की क्रीम मुह पर लगाती हू तब मेरे चेहरे की रोनक तेरी जैसी हो जाती हैं. इसलिए मैने अंदाज़ा लगाया कि तू भी इतने दिनों से..........??

प्लीज़ स्टॉप श्रुति. मुझे शरम आती है तुझे इन सब के अलावा और कोई बात नहीं सूझती क्या.......चल अब लेक्चर शुरू होने वाला है....श्रुति भी आगे कुछ नहीं कहती और दोनो अपने क्लास की ओर चल पड़ते है.......!

आज रिंकी अपने लेक्चर्स पर भी ध्यान दे रही थी.....कल तक उसे सारे पीरियड्स बोर करते थे मगर आज सारे लेक्चर्स उसे अच्छे लग रहें थे, दोपहर तक वक़्त बहुत जल्दी कट गया उसे भूख लगी थी तो रिंकी, श्रुति को वही बैठा छोड़ और एक और सहेली थी उसके साथ कॅंटीन की ओर निकल पड़ी........!

बाहर कई सारे लड़के रिंकी को घूर रहें थे जैसे ही वो आगे बढ़ी तभी किसी ने उसका हाथ पकड़ लिया.. उसका हाथ इस तरह पकड़ने से उसकी साँसें एक पल के लिए मानो रुक सी गयी... उसके जिस्म में इतनी भी हिम्मत नहीं थी कि पलटकर उसकी तरफ देखे की किसकी इतनी जुर्रत हुई ये हरकत करने की... कुछ सोचकर खामोश रही फिर अपनी गर्देन घूमकर उस सक्श को देखने लगी.. उसका हाथ पकड़ने वाला सक्श उसकी सहेली श्रुति का बॉय फ्रेंड सोमेश था ........ शकल से शायद रिंकी उसे अच्छे से जानती थी........वो रिंकी की तरफ देखकर मुस्कुरा रहा था......!

बहुत मुश्किल से अपने जज्बातो को संभालते हुए बोली- रिंकी बोली छोड़ो मेरा हाथ......??

वो उसे देखकर हसे जा रहा था ..... तुम श्रुति के बॉयफ्रेंड सोमेश् हो! रिंकी के इस तरह कहने पर उसने अपने हाथों पर दबाव और ज़ोरों से बढ़ा दिया...!

सही कहा तुमने मैं तेरी सहेली का बॉय फ्रेंड हूँ.......मगर क्या करूँ मैने तो उससे दोस्ती सिर्फ़ इसलिए की थी कि मैं उसके ज़रिए तुझे हासिल कर सकूँ....मगर एक तू है कि मेरी तरफ देखती भी नहीं........क्या कमी है मुझ में.....कॉलेज की कई लड़कियाँ मुझपर मरती है मगर मैं तुझ पर मरता हूँ......? लेकिन जब श्रुति ने बताया " तू अपने बाप से मरवाती (चुदवाती) है " तब मेरे सब्र की सीमा टूट गयी तब मुझे ऐसा करना पड़ा.......!

रिंकी अपनी आँखें फाडे उसके चेहरे की ओर देखती रही उसका दिमाग़ काम करना लगभग बंद कर चुका था......सारे लोग उसे ही देख रहें थे, जिस्म डर से थर थर कांप रहा था. उसके साथ आई सहेली भी अपनी आँखें फाडे उसे तो कभी सोमेश को घूर रही थी वो बेचारी क्या कहती उसने फ़ौरन अपनी नज़रें नीचे झुका ली.....!

चुप क्यों हो रिंकी कुछ तो बोलो....

जस्ट शटअप.........प्लीज़ तुम अभी यहाँ से चले जाओ......मैं तुम्हारे आगे हाथ जोड़ती हूँ......मेरा और तमाशा यहाँ मत बनाओ.

देखो रिंकी मुझे पता तुम्हे अपने पापा के 'बड़े केले' को लेने का शौक है, उनके साथ जो करना है वो बिंदास करो मुझे कोई issue नही है, लेकिन एक बार मेरे 'छोटे पप्पू' को भी मौका दो. उसने अपने पेंट की जिप की तरफ इशारा करते हुए कहा.

अभी सोमेश की बात पूरी भी नहीं हुई थी कि किसी ने उसके गाल पर एक ज़ोर का थप्पड़ मारा. जब उसकी नज़र सामने खड़ी लड़की पर पड़ी तो सोमेश के साथ साथ रिंकी की आँखें भी हैरत से फैलती चली गयी........ उसके सामने श्रुति खड़ी थी. इस वक़्त वो बहुत गुस्से में दिखाई दे रही थी शायद किसी ने उसे इस बात की खबर कर दी थी......!

श्रुति को सामने देख सोमेश चुपचाप वहा से निकल गया... श्रुति ने रिंकी की तरफ देखा उसकी आँखो मे आसु थे, श्रुति ने उससे माफी मांगते हुए उसके कंधे पर हाथ रखा ही था कि रिंकी ने उसका हाथ छिटक दिया और एक जोरदार चांटा श्रुति के गाल पर जड़ दिया. Don't say me sorry श्रुति..... कह कर रिंकी कॉलेज से सीधा घर आ गयी.

आज जो कॉलेज में हुआ वो नही होना चाहिए था, भले ही इस मामले में पूरी गलती श्रुति के प्रेमी की थी. लेकिन श्रुति ने जब रिंकी को सोर्री बोला तो रिंकी को उसे चांटा नही मारना चाइये था....?

मामला रफा-दफा हो भी जाता, लेकिन श्रुति ने इसे अपनी तौहीन समझी, उसकी अन्य सहेलियों ने मामला और पेचीदा बना दिया, न सिर्फ़ पेचीदा बल्कि संगीन, सब सहेलियों ने इसे श्रुति की नाक कटना कहा, यह भी कहा कि जल्द से जल्द श्रुति को इस थप्पड़ का बदला रिंकी से लेना चाहिए.

इधर घर आकर रिंकी ने अपने फोन मे सारे सहेलियों और दोस्तों के no ब्लॉक कर दिये. और उसने घर से निकलना पूरी तरह बंद कर दिया. मेरे मेसेज और काल के reply आना बंद हो गया. दो तीन दिन तक रिंकी के मैसेज काल के इन्तजार करने के बाद मुझे उम्मीद थी शायद मेरी माँ को रिंकी की कुछ फोन पर बातचीत होती हो. लेकिन नही, रिंकी के बारे में उन्हें कुछ भी नही पता था.

उस रात कमरे के अंधेरे में अपने बेड के कोने पर बैठा मैं पिछले दो तीन दिनो के बारे में सोच रहा था. कितना कुछ बदल गया था दो तीन दिनो मैं. बड़ी मुश्किल से इतनी मेहनत करने के बाद अच्छे दिनो के आसार बने थे, लगता था अब हम बेहतर ज़िंदगी जी सकेंगे. अपनी लाडो रिंकी संग कैसे कैसे सपने देखे थे, कैसी कैसी योजनाएँ बनाई थी, भविष्य कितना सुखद लगने लगा था. और फिर एक ही झटके में सब सपने टूट गये, सारी उम्मीदों पर पानी फिर गया, जैसे किसी ने आसमान से ज़मीन पर पटक दिया था. जिसके लिए मै सब कुछ कर रहा था वो ही खामोश हो गयी थी.

आँखे लगातार रोने और जागने से लाल हो गयी थी, दिमाग़ में तूफान चल रहा था, जिस्म थक कर चूर हो चुका था मगर नींद का कोई नामो निशान नही था. फिर मेने फैसला किया कल मै अपनी ससुराल जाकर रिंकी से फेस टू फेस बात करूँगा आखिर मुझसे इस तरह उसके रूठने की वजह क्या है ??????

******

अगले दिन सुबह नौकरी पर ना जाते हुए मै सीधा अपनी ससुराल चला गया. घर का दरवाजा अंदर से बंद था. मैने बड़े आहिस्ते से कुंडी खटखटाई.....रिंकी ने दरवाजे की दरार से ही झांक लिया था कि बाहर पापा खड़े है, अगले पल ही अपनी दोनों हथेलियों से उसने आंखें ढक ली और मन ही मन सोचने भी लगी-‘यह कैसी आग है, जो स्त्री को पुरुष-दर-पुरुष और पुरुष को स्त्री-दर-स्त्री भटकने पर मजबूर कर देती है।

यह जानने की कोशिश करते-करते पसीने से तरबतर हो गई।

उसके स्तनों से फूट आये पसीने ने उसकी समीज को भिगो दिया उसके हाथ अनायास ही जांघों पर चले गये। चड्डी भी पसीने से भीग गई थी। ऐसा लगा, उसके भीतर भी कुछ-कुछ हो रहा है। उसे अच्छे-बुरे का ज्ञान हो गया था। वो वहां से सीधे अपने कदम बढ़ाते हुए दरवाजे पर चली आई। और उसने दरवाजा खोला.

मैं इतनी देर से कुंडी बजा रहा हूं, इतनी देर लगती हैं दरवाजा खोलने मे’’

बोलते बोलते मेरी नजर जब रिंकी की समीज पर पड़ी, तो शायद उस समय वो नहा रही थी और यही वजह थी कि उस ने उस समय समीज के नीचे कुछ भी नहीं पहन रखा था. जिस्म पर चिपके हुए गीले सफेद पारदर्शी कपड़े मे उसके चूचे ने उस समय मुझको मदहोश कर दिया. मै फटी आंखों से रिंकी को देखता ही रह गया.

रिंकी ने बनावटी गुस्से से कहा, ‘‘इस तरह क्या देख रहे हो? बड़े बेशर्म हो आप.

लगता हैं मेरे यहा आने से तुम्हे खुशी नही हुयी रिंकी....??? मैने प्रशन वाचक निगाहों से उससे पूछा.

देखो पापा अभी घर में कोई नही है आप चले जाओ, किसी ने अगर आपको यहां आते देख लिया होगा, तो बेवजह हम दोनों की बदनामी होगी.

मुझे यहा आते किसी ने नही देखा, दूसरी बात मैं तुम्हें प्यार करता हूँ और तुम्हारे लिए कुछ भी कर सकता हूँ. कहते हुए मै अंदर आ गया.

उसने दरवाजा अंदर से बंद कर लिया.

मैंने मन में सोचा कि रिंकी और मैं अकेले घर पर हैं, ये मौका पर चौका वाला समय इसको सवाल जबाब में बर्बाद नही करना चाहिए.

मै उसकी ओर बढ़ा और उसने मेरा हाथ पकड़ लिया.

मुझसे फिर कहा- पापा प्लीज चले जाओ, कोई आ जायेगा...??

मै हस्ते हुये बोला- अगर जिसको आना होता तो वो जाता ही क्यों...!

उसने अपनी आंखें नीचे झुका लीं. मेरी बात सही थी. रिंकी भी मन ही मन मेरे नीचे आने को तरस रही थी.

मैने उसका हाथ फिर से पकड़ा, उसने अपना हाथ मेरी पकड़ से छुड़ाना चाहा.

लेकिन मेरे हाथों की पकड़ इतनी ज्यादा सख्त थी कि वो अपने आपको मेरी पकड़ से नहीं छुड़ा पा रही थी.

अब मैने उसे आगन में ही धक्का देकर दीवार से सटा दिया. और सामने आकर उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिए और उसके होंठों को चूसने लगा.

मेरा चूसने का तरीका इतना ज्यादा मादक था कि वो पानी पानी हो रही थी. फिर भी वो दिखाने के लिए मुझसे बोले जा रही थी- छोड़ो पापा छोड़ो …

कुछ ही पलों में उसने मेरे होंठों को काटना आरम्भ कर दिया. यहां तक कि मेरे मुँह से आ रही सिग्रेट की महक भी उसे अब अच्छी लगने लगी थी.

मै अपने काम में लगा रहा और उसने मेरे गले पर, सीने में, किस करना शुरू कर दिया. दो मिनट किस करने के बाद वह मुझसे दूर हो गयी और मैं उसकी आंखों में देखने लगा.

मैने अपनी शर्ट के बटन खोलना शुरू कर दिया. वो चुपचाप मुझे देख रही थी.

मैने अन्दर बनियान नहीं पहनी थी. जल्दी ही मैने अपनी शर्ट निकाल फेंकी. वो मेरी मर्दानगी भरे सीने को देखकर उस पर निहाल हो गई. वो मेरी आंखों में देख रही थी. मै भी उसकी आंखों में एकटक देख रहा था.

कुछ समय बाद मै उसके करीब आया और उसे अपने सीने से चिपका लिया. वो मेरी गर्दन पर फिर से किस करने लगी.

इस बार मैने अपना हाथ उसकी पीठ पर रख दिया और उसकी कमर को सहलाता हुआ उसकी बढ़ती धड़कनों को सुनने लगा.

धीरे धीरे मै अपना एक हाथ उसके बालों के जूड़े तक ले गया और उसे भी खोल दिया.

उसके बाल खुल कर बिखर चुके थे और मै उसके बालों से खेलने लगा. फिर मैने पीछे अपने हाथ ले गया और उसकी दोनों आस्तीनों से उसकी समीज को निकाल कर अलग कर दिया.

अब वो मेरे सामने ऊपर से नग्न अवस्था में थी.

उसने मुझे धक्का देकर दूर किया और अपने हाथों से अपने स्तन छुपाते हुए बेडरूम की ओर जाने लगी. मै मदमस्त सांड की तरह लार् टपकाते हुए उसका पीछा कर रहा था.

वो बेडरूम के पास जाकर रुक गई और पलट कर मेरी तरफ देखा; मुझे आंखों ही आंखों में बेडरूम में आने का न्यौता सा दे दिया.

फिर से वो आगे बढ़ने लगी. बेड के पास जाकर खड़ी हो गई.

मै उसके पीछे पीछे आ गया और पीछे से हाथ डालते हुए उसके पेट को सहलाने लगा. दूसरे हाथ को उसके सीने पर हाथ रखते हुए मम्मों को हल्का हल्का दबाने लगा.

अब मुझसे कंट्रोल नहीं हो रहा था. बेड के दूसरे तरफ लगे आईने में मैं देख रहा था. मैने आगे से उसकी सलवार के नाड़े को अन्दर हाथ डाल कर खींचा और सलवार एक ही क्षण में जमीन पर गिर गई.

मैंने उसकी तरफ घूम कर देखा. उसकी आंखों में हवस का नशा था. मुझे लग रहा था कि मै जल्दी से उसे बेड पर लेटा दु और अपना काम चालू कर दू. मेरे लिए खुद को कंट्रोल कर पाना बहुत मुश्किल हो रहा था.

हम दोनों बिस्तर पर निवर्स्त्र थे मै बैठकर उसके पूरे शरीर को देख रहा था. उसके मम्मों पर, कमर पर, चेहरे पर हाथ फेरते हुए मैने उसे मदहोश कर दिया था.

मै उसके पूरे जिस्म को चूमे जा रहा था.

चूमते हुए मै उसके मम्मों पर भी आ चुका था और मम्मों को जोर जोर से चूसने लगा.

वो मेरे सिर पर हाथ रखकर अपने मम्मों पर उसे दबाने लगी थी. इसलिए मै मम्मों को दांतों से दबाने काटने भी लगा था. उसे मीठा दर्द होने लगा था लेकिन मेरा साथ पूरी तरह से दे रही थी. और मै उसे मछली जैसे तड़पा रहा था.

कुछ देर बाद मैने उठकर उसके चेहरे पर हाथ रखा और जल्द ही उसका हाथ पकड़कर उसे डॉगी पोजिशन मे घुमा दिया.

उसके बालों को एक साथ करके पकड़ा और खींचते हुए बोला- मेरी जान, मैंने तीन दिनो से इस समय के लिए इंतजार किया है.

रिंकी की चूत तो पहले से ही गीली हो चुकी थी और फिर मुझे पता ही ना चला कब हम दोनों आपस में दो जिस्म एक जान हो गए.

बाप बेटी की वासना की आग जब शांत हुयी तो नंगे बदन एक दूसरे की बाहों के आगोश में मैने बड़े प्यार से रिंकी से कहा-‘तुम सचमुच ही मुझे बहुत ही आनंद देती हो। तेरी मम्मी तो मुझे पसन्द ही नहीं करती है। वह कहती है कि तुम तीन-तीन दिन तक दाढ़ी ही नहीं बनाते हो। तुम्हे किश कौन करेगा। तुम्हारी दाढ़ी कांटों की तरह मेरे गालों पर चुभती है।

रिंकी, दाढ़ी तो मेरी आज भी बढ़ी हुई है। क्या तुम भी मेरी दाढ़ी से परहेज करती हो?’

पापा के यह कहते ही रिंकी हंसने लगी-‘डार्लिंग यही तो, मम्मी औरत है या कोई मोम की गुड़िया…? भला पुरुष की दाढ़ी की चुभन भी कहीं स्त्री को पीड़ा पहुँचाती है! स्त्री को पीड़ा तो तब पहुंचती है, जब पुरुष बीच में ही साथ छोड़ जाता है।

पापा क्या तुम्हें नहीं पता, सैक्स में नोंच-खरोच का कितना महत्व है? दाढ़ी नोंच-खरोच का ही तो काम करती है। ईश्वर ने कुछ सोच-समझकर ही पुरुष को दाढ़ी दी है। सच तो यह है कि मैं तुम्हें तुम्हारी दाढ़ी से ही पसन्द करती हूं। यह कहते-कहते रिंकी ने मुझ को बाहों में समेट लिया और अपने चिकने और मुलायम गाल मेरे दाढ़ीदार गाल पर रखकर रगड़ने लगी।

यह मेरे लिए एक नया ही अनुभव था। मैं आश्चर्यचकित होकर सोच रहा था रिंकी मुझे यानि पापा को इसलिए पसन्द करती है, क्योंकि उसे पुरुष की दाढ़ी की चुभन अच्छी लगती है और इसकी मम्मी को मेरे चिकने गाल पसंद हैं। ये दोनों स्त्रियां ही हैं, लेकिन इन की पसन्द अलग-अलग है।

शायद यही वजह है कि स्त्री-पुरुष अपने जीवन साथी को छोड़कर कहीं बहक जाते हैं। बहक क्या जाते हैं, अपने मनपसंद किसी सुयोग्य साथी की तलाश कर लेते हैं। मैं भी तो एक मर्द ही हूं। क्या मेरी पसन्द अपने विचारों के अनुकूल स्त्री की नहीं है? क्या अपनी पसन्द की चीज को ढूंढना या पाना गलत है? नहीं, हम बाप बेटी बहके या भटके नहीं हैं, हमने तो अपनी-अपनी पसंद को हासिल किया है।

जारी है..... ✍🏻
 
क्या मेरी पसन्द अपने विचारों के अनुकूल स्त्री की नहीं है? क्या अपनी पसन्द की चीज को ढूंढना या पाना गलत है? नहीं, हम बाप बेटी बहके या भटके नहीं हैं, हमने तो अपनी-अपनी पसंद को हासिल किया है।

"कुसुम की व्यस्तता नौकरी में तरक्की होने के साथ साथ बढ़ती जा रही थी. कई बार अपने विभाग के साथ साथ दूसरे विभागों में भी जाना पड़ता था. कई बार बड़े अधिकारियों के प्रेशर को देख कर उसका मन करता नौकरी छोड़ दे. लेकिन उसकी महतावकानछा और आत्म विश्वास उस को नौकरी छोड़ने नहीं दे रहे थे. और फिर कुसुम का अपना बड़ा अफसर बनने का सपना भी उसे पूरा करना था. इसलिए अब उसकी लाइफ दिन प्रतिदिन ऑफिस की फाइलों के साथ उलझी हुई रहती थी."

इस वक्त दिन के एक बज रहे थे हम बाप बेटी एक दूसरे के आगोश में नंगे जिस्म लिपटे हुए सुकून का अनुभव कर रहे थे वही दूसरी ओर उस वक्त कुसुम ऑफिस की फाइलों के साथ उलझी हुई थी तभी अचानक से उसके मोबाइल पर अज्ञात नम्बर से एक वॉइस काल आया.

फोन करने वाली लड़की ने अपना नाम श्रुति बताया... ! कुसुम ने उसे फोन करने के विषय में पूछा, तो वह हकलाते हुए बोली, ‘आंटी, मुझे आपकी बेटी रिंकी के बारे में कुछ बताना है’

अपनी बेटी रिंकी का नाम सुनते ही’ कुसुम का मन शंका से भर गया.

‘क्या बताना है..????

यही कि रिंकी पिछले एक महीने से ज्यादा समय से कॉलेज नही आई है और आपके पति और बेटी रिंकी शायद…’ बोलते बोलते वह रुक गई.

‘बोलो,’ अपनी बढ़ती हुई धड़कनों को काबू करते हुए कुसुम बोली.

‘आंटी, प्लीज, मेरा नाम मत लीजिएगा. उन का न, चक्कर चल रहा है,’ धीरे से उस लड़की ने कहा.

‘क्या?’ कुसुम कुछ पलों के लिए स्तब्ध रह गई. सारी जगह उसे घूमती सी प्रतीत हुई, फिर संभलती हुई बोली, ‘क्या बकवास कर रही हो, ये सब तुम्हे कैसे पता...??? कोई प्रूफ या सबूत है तुम्हारे पास..???

‘आंटी,’ घबराती हुई वह बोली.

‘तुम चिंता मत करो. मैं तुम्हारा नाम नहीं लूंगी,’ कुसुम के आश्वासन पर श्रुति ने एक

वॉइस रिकॉर्डिंग ऑडियो क्लिप जिसमे रिंकी उसे अपने पापा की प्रेम कहानी नमक मिर्च लगा कर बताती थी, wahtsup पर सेंड कर दिया.

पूरी ऑडियो क्लिप सुनने के बाद चिंतित, परेशान कुसुम इधर से उधर चक्कर लगा रही थी. कुसुम को बहुत बार शक भी हुआ. लेकिन उस की स्वयं की व्यस्तता, और अपने अरुण पर अथाह विश्वास ने, उस के विचारों को झटक दिया. उसने अपने पति के कॉलेज के एक-दो कलिग से फोन कर पूछा तो उन्होंने जबाब दिया कि प्रोफेसर अरुण साहब तो कॉलेज आते ही नहीं है.

दोपहर के 2 बजे बजने वाले थे कुसुम ने ऑफिस से हाफ डे की छुट्टी लेकर आखिर, मे निर्णय लिया कि वह खुद देखने जाएगी अपने पति और बेटी की वासना का नँगा नाच... . !

भरी दोपहरी मे अकेले ऑटो में दिमाग में चल रहे तूफान के साथ, वह कब अपने माँ के घर (मायके) के पास पहुंच गई, पता ही न चला. उसके पति अरुण की बाइक सुबूत के तौर पर वहां खड़ी थी.

ऑटो वाले को पैसे देते हुए वो बार बार गुस्से से इधर उधर देख रही थी कि सामने से कुसुम को अपने माँ बाप आते हुए दिखाई दिये बाप की आँखों पर काला चश्मा लगा देख समझ आ रहा था कि वो मोतियाबिंद का ओपरेशन करा कर आ रहे हैं. जैसे ही वो नजदीक आये तो कुसुम की माँ आंखें मलती हुई उससे बोली अरे कुसुम तू बेटी आ गयी जरूर ही अपने पिताजी को देखने आई होगी...????

‘मैं, उस आदमी को देखने आई हूं जो इस समय तुम्हारे घर में मौजूद है,’ तमतमाती हुई कुसुम बोली.

‘यहां तो कोई नहीं है,’ कुसुम की माँ ढीठता से बोली.

‘यह मोटर साइकिल किसकी है?’ दरवाजे पर अपने पति अरुण की खड़ी बाइक की ओर इशारा करती कुसुम ने तल्खी से पूछा.

‘मुझे नहीं पता,’ कुसुम की माँ अभी भी अपनी ढीठता पर कायम थी.

‘और कितना झूठ बोल कर सच छिपाओगी माँ?’ कुसुम चिल्लाती हुई बोली.

गुस्से से भरी विक्षिप्त सी कुसुम तब तक घंटी बजाती रही, जब तक कि दरवाजा न खुल गया.

थोड़ी देर में एक दरवाजा खुलने की आवाज आई. बदन पर अस्तव्यस्त से सिर्फ एक मात्र कपड़े "कुर्ते" को पहने हुए रिंकी बाहर निकली. यह कैसा शोर हो रहा है?,

मम्मी, आप?’ कुसुम को देखते ही उस के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं.

नफरत की निगाहों से रिंकी को घूरती हुई कुसुम उस कमरे की ओर जाने लगी जहां से रिंकी निकली थी. घबराई सी रिंकी ने उसे रोकने की असफल कोशिश की. कुसुम ने एक ओर उसे धक्का दे कर कमरे में घुस गई. जहाँ उसका पति प्रोफेसर साहब अरुण कुमार बिस्तर पर आराम से निर्वस्त्र बेखबर सो रहे थे. चादर एक ओर सरकी हुई थी.

‘अरुण,’ पूरी ताकत से कुसुम चिल्लाई.

आंखें मलता हुआ मै उठा. कुसुम को देख कर मै निहायत ही आश्चर्य से भर गया. सकपकाते हुए अपने को ढकने की कोशिश करने लगा.

‘नंगे तो तुम हो ही चुके हो, ढकने के लिए बचा ही क्या है?’ शर्ट मेरी तरफ फेंकती हुई हिकारत से कुसुम बोली और कमरे से बाहर आ गई.

रिंकी सिटपिटाई सी खड़ी हुई थी. थोड़ी देर में मै भी कपड़े पहन कर बाहर आ गया. आंखों में क्रोध की चिंगारी समेटे कुसुम थोड़ी देर मुझे ऐसे देखती रही, जैसे क्रोध की ज्वाला में भस्म कर देगी. लेकिन वह आग उगलती, इस से पहले ही मैने लड़खड़ाते स्वर में पूछा, ‘‘ऐसे क्यो देख रही हो तुम? कभी पहले नहीं देखा क्या मुझे?’’

‘‘देख तो महीनों से रही हूं. लेकिन मन में इंसानियत का भ्रम पाले थी. तुम्हारे अंदर का हैवान आज नजर आया है. दिल चाहता है या तो खुद मर जाऊं या तुम्हें मार डालूं. मैं ने कभी सोचा तक नहीं था कि तुम इतने जाहिल और कमीने निकलोगे.’’

‘‘ऐसा क्या किया मैं ने, जो इतना गुस्सा कर रही हो?’’ मैने कहा तो कुसुम गुस्से में बोली,

‘‘किया तो तुम ने वो है, जिसे करने से पहले हैवान भी कई बार सोचता है. मेरी कोख से जन्मी बेटी रिंकी को मेरी सौत बना दिया तुम ने. बिना यह सोचे कि इस का अंजाम क्या होगा?’’

मेरे पास उसकी बात का कोई जबाब नही था. वो बात ही कुछ ऐसी थी. कुछ नहीं सूझा तो मै हथियार डालते हुए बोला, ‘‘जो हुआ, वो हो गया. मैं खुद अपनी नजरों में गिर गया हूं. तुम मेरी पत्नी हो, जो चाहे सजा दे सकती हो.’’

कुसुम गुस्से में थी. आंखें अंगारे की तरह दहक रही थीं. वह मुझ को देख कर घृणा भरे स्वर में बोली, ‘‘तुम ने मेरी बेटी के साथ जो कुछ किया है, उस के लिए अगर तुम्हें मौत की सजा भी दी जाए तो वह भी कम है.’’

‘‘मेरी मौत से अगर तुम्हे शांति मिलती है तो मुझे मौत दे दो, लेकिन सोचो मेरी मौत से तुम्हारी मांग तो उजड़ ही जाएगी, रिंकी भी अनाथ हो जाएगी.’’

मेरी नीयत में बेशक फरेब था. लेकिन मैने जो कहा, वह सोलह आने सच था.

'मेरी मौत के बाद न कुसुम की जिंदगी में कुछ बचता और न उस की बेटी रिंकी का भविष्य सुरक्षित रह पाता.' मेरी बात सुन कर कुसुम सोच में डूब गई. उस की कुछ समझ में नहीं आ रहा था!

मै पास आ कर कुसुम का हाथ पकड़ कर बाहर जाने के लिए मुड़ा. तो कुसुम ने गुस्से से अपना हाथ झटक दिया. जाते जाते अपनी मां से कुसुम बोली, ‘शर्म नहीं आती तुम्हें, क्या ये सब देखने के लिए मैने तुम्हारे भरोसे रिंकी को यहा भेजा था, तुम्हारे ही घर में, तुम्हारे बिस्तर पर, तुम्हारी आँखों के सामने, तुम्हारी नातिन (पोती) मेरे आदमी (पति) के साथ सो रही है.’

‘ हमारे बारे में क्या बक रही है, अपने आदमी (पति) से पूछ,’ बेशर्मी से कुसुम की माँ ने जवाब दिया.

‘तो… यह है तुम्हारी औकात,’ मेरे ओर देखती व्यंग्य से कुसुम कह एक झटके में बाहर निकल गई.

‘कुसुम, कुसुम’ मै बोलता ही रह गया.

वक्त की निस्तब्धता और कालिमा ऑटो में बैठी कुसुम के अंतर्मन को भेद कर उस को तारतार कर रही थी. एक आंधी सी उस के अंदर उठ रही थी. जिस में उड़ा चला जा रहा था उस का मान-सम्मान, प्रेम और विश्वास. दर्द घनीभूत हो सैलाब बन कर उस की आंखों से बह निकला.

आज अपना ही घर कितना पराया सा लग रहा था. थोड़ी देर में मै भी घर पहुंच गया. मेरी हिम्मत ही नहीं हुई कुसुम से कुछ बोलने की. मै सीधे बैडरूम में चला गया. कुसुम वहीं सोफे पर ढह गई. मस्तिष्क में उठा बवंडर रुकने का नाम ही नहीं ले रहा था. मन कर रहा था कि अभी जा कर अरुण को झकझोर कर पूछे ‘क्यों किया मेरे साथ ऐसा’. फिर सास ससुर का खयाल आते ही खामोश हो गई. आहत मन जोर से रोने भी नहीं दे रहा था. समय बहुत भारी लग रहा था. घड़ी में देखा शाम के 7 बज रहे थे.

एक मन कर रहा था कि भाग जाए यहां से. अपने पति के प्रति मन घृणा से भर गया. एक मन कर रहा था कि कभी उस की शक्ल न देखे. उसे समझ ही नहीं आ रहा था अपना दर्द किस को बताए, ससुर को… वह तो हार्ट पेशेंट है.....!

‘क्या हुआ बहू,’ असमंजस से भरी सास बोली.

‘कुछ नही,’ आंसूओं को पोंछ्ती हुई कुसुम बोली.

फिर रो क्यो रही हो...??? जो भी बात है बहू..; बताना तो पड़ेगा अपने सास ससुर को,

हां, यह सही कहा है..... मेरे पूज्य बापूजी (ससुर) ने समर्थन करते हुए कहा.

रोते रोते कुसुम ने उन्हें सारी बातें बता दीं. सास ससुर दोनों सन्न रह गए. अपने बेटे को धिक्कारते हुए और स्वयं अपने बेटे के इस कुकृत्य के लिए कुसुम से देर रात तक माफी माँगते रहे....!

दिल, दिमाग से टूटे शरीर को कब नींद ने अपनी आगोश में ले लिया, बेचारी कुसुम को पता ही न चला.

‘ बहु,’ सास अपने हाथों मे चाय की प्याली पकड़े उसे उठा रही थी. कुसुम एकदम से उठी. घड़ी सुबह के 8 बजा रही थी. समय देख कर कुसुम हड़बड़ा गई. बीते कल की बात याद कर एक बार लगा शायद कोई बुरा सपना देखा था. अगले ही पल सचाई का एहसास होते ही अपने सर को सास के काँधे में रख कर अपनी आगोश में भर कर जोरजोर से रोने लगी. हाल में बैठ कर अखबार पढ़ रहे ससुर साहब एकदम से घबरा गये. सास भी ‘कुसुम…कुसुम’ कहते रोने लगी.

काफी देर रोने के बाद जब मन हल्का हुआ तो अचानक याद आया कुसुम को कि 12 बजे औफिस में मीटिंग थी. उसने तुरंत फोन पर सूचित किया कि वह औफिस नहीं आ पाएगी. जो कुसुम घर से औफिस जाने के लिए बेचैन रहती थी, आज वही ऑफिस भी उस को काटता हुआ लग रहा था.

मन ही मन कुसुम एक घुटन सी महसूस कर रही थी, जो उस को अंदर ही अंदर से तोड़ रही थी. आखिर, उस ने अपने सास ससुर, को बुला कर अपना निर्णय सुना दिया तलाक लेने का........????

इतना आसान नहीं यह सब. कैसे रहेगी अकेले.? हम समझाएंगे अरुण को… सास ससुर ने समझाया लेकिन वो नही मानी.

आखिर में घर में एक पंचायत बुलाई गई, उसमे कुसुम के माँ बाप, दीदी जीजा, रिंकी, भाई, एवम अन्य रिश्तेदारों सब को बुलाया गया.

शाम को पंचायत के शुरु होने से पहले ही मै कुसुम से हाथ जोड़ कर माफी मांगने लगा...!

‘क्यों किया तुम ने मेरे साथ विश्वासघात?’ मेरा हाथ छिटकते हुए आक्रोशित कुसुम चीख उठी.

‘तुम तो अपने जौब में इतनी मस्त रहती थीं, मेरे लिए तुम्हारे पास समय ही नहीं था, क्यो चली गई थी पति, घर-परिवार को छोड़ दो कोड़ी की नौकरी करने दूसरे शहर’ बेशर्मी से मै भी बोला.

मेरे तर्कों से हैरान हो कुसुम बोली. काश तुम्हे ये समझ आ गया होता ‘किस के लिए गयी थी, खुद के लिए या फिर अपने परिवार के बेहतर भविष्य बनाने के लिए.

पति-परिवार का नाम ना ही लो तो अच्छा है,...., एक पत्नी होने की जिम्मेदारी तूने समझी ही कब थी कुसुम..... 'तेरा ही तो सपना है बड़ी अफसर बनने का,’

मै अपने बचाव में जितना गिरता जा रहा था, कुसुम उतना ही आहत होती जा रही थी. हम दोनों को लड़ते देख ‘अब स्थिति रिंकी के सामने बिलकुल ही स्पष्ट थी, न तो वो दोषी है और न ही पापा दोषी हैं। चरित्रहीन कोई नहीं है। एक-दूसरे के प्रति अरूचि, नापसंदगी और परिस्थितिजन्य लाचारी ने ही एक दूसरे से संबंध बनाने के लिए मजबूर किया है। जो लोग इन बातों को नहीं समझते, वे ही ऐसे संबंधों को गलत मानते हैं। '

सोचते सोचते अन्तः रिंकी के विचारों की श्रृंखला टूट गई।

और फिर रिंकी के होंठों से अनायास ही बोल फट पड़े- मै मम्मी को भी जानती हूं और पापा को भी जानती हूं। मुझे अच्छी तरह से याद है, मम्मी पहले ऐसी नहीं थी। मम्मी पापा को नजरअंदाज शुरू से ही करती आ रही है। आखिर कब तक वह अपने प्रति मम्मी की उदासीनता को ओढ़े रहते? कभी न कभी तो किसी न किसी से तो उन्हें जुड़ना ही था। मैं खुद की शुक्रगुजार हूं कि मैने पापा को समझा है और जिसने पापा की पीड़ा को और बढ़ने नहीं दिया है।

अगर पापा के जीवन में मै नहीं आई होती तो क्या पापा दिमागी रूप से पागल नहीं हो गये होते? इन अवैध संबंधों ने ही तो उन्हें यौनरोगी होने से बचाया है।’

जब प्रकृति के सारे कार्य समय से होते हैं तो फिर मनुष्य किसी का इंतजार कब तक करेगा। मै भी जवान हू, मुझे भी इंद्रिय-सुख चाहिए ही चाहिए। किसी को बदचलन या चरित्रहीन कहना जितना आसान है, उसको समझना उतना ही कठिन है।

मम्मी पापा के साथ रह भी रही है और अपने तरीके से जी भी रही है। पापा भी मम्मी के साथ रह रहे हैं और अपना जीवन भी जी रहे हैं। घाटे में कोई है तो वह मैं हूं। मुझे मम्मी-पापा की दोहरी जिन्दगी के साथ आये दिन समझौता करना पड़ता है।

मुझे डर है कहीं मैं भी दोहरी जिन्दगी जीने की आदी न बन जाऊं। मम्मी पापा का झूठा प्यार किसी दिन मेरे लिए धीमा जहर भी बन सकता है।’ रिंकी अभी और बोलती इतने में मेरे पूज्य बापूजी बोल पडे-

‘रिंकी......, तुम यहा से बाहर जाओ।

फिर तपाक से रिंकी उठी और इंसानियत, प्यार, विश्वास सब का गला घोंट कर भड़ाक से दरवाजा खोल कर घर से बाहर चली गयी.

उस के बाद तो कुछ भी सामान्य नहीं रहा. अभी पंचायत मे आये शामिल लोग और रिश्तेदार सोच ही रहे थे कि क्या फैसला करे कि.....????

‘अरुण तुम भी निकलो यहां से, मुझे तुम से अब कोई रिश्ता नहीं रखना,’ कुसुम ने भी अपना फैसला सुना दिया कुसुम पूरी तरह से अपना आपा खो चुकी थी.

‘यह मेरा भी घर है,’ मैने भी ऊंची आवाज में कहा.

‘मत भूलना मै इस घर में ब्याह कर आई हू, भाग कर नही आई हू, इसमें आधा हिस्सा मेरा भी है और मैं, चाहू तो तुम्हे अपनी बेटी के ब्लात्कार के केस में अभी जेल भिजवा सकती हू.’ क्रोध से कांपती हुई कुसुम बोली.

मैने बिना वक्त गंवाए अपना सामान पैक किया और बाहर निकल गया. सारे परिजन बेबसी से दर्शक बने खड़े रह गए.

जारी है.....??? ✍🏻
 
कुछ लड़किया (स्त्रियाँ) आदमखोर होती हैं, खा जाती हैं दूसरी औरतों का अस्तित्व, उनके सपने, सारे अपने, लबो की मुस्कराहट, जीने की इच्छा, घरों की दीवारे, इटे, पथर, और उनके पतियों की बुद्धि और रिश्तों में घोल देती हैं कड़वाहट..... रिंकी भी उन्ही आदमखोर स्त्रियों के चरित्र को दर्शा रही है...!

कुसुम जैसी तर्क वादी और स्वाभिमानी स्त्रियाँ हमेशा रिश्तों में हार जाती हैं...!

जिनके पास पास दो option होते है उन्हे किसी एक की फीलिंग्स की कद्र नही होती है😁😂

अद्भुत, अकल्पनीय शब्दों के साथ जो आपने विश्लेषण किया है मै नेत्मस्तक हो गया 🙏🏻 इससे बेहतर मै खुद भी update लिखते हुए कहानी के साथ भावनातमक रूप से नही जुड़ता हू... मै आपकी लेखनी का मुरीद तो पहले से ही हु आज कायल हो गया🙏 आपके शब्दों के जबाब मुझे लिखने के लिए शब्दों को बड़ी हस्तियों के विचारों को खोज कर लिखने पड़े हैं😂😂

बहुत खूब बड़े भाई.... ✍🏻
 
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