Incest कर्ज और फर्ज - एक कश्मकश - Page 16 - SexBaba
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Incest कर्ज और फर्ज - एक कश्मकश

दोस्त falcon में कोई नौकरी थोड़े ही कर रहा था, जो resign करूँगा..... मेरी निष्ठा संजू VR जी के लिए है, और उन्ही के निमंत्रण पर मै वहा गया था और उन्ही की आज्ञा से वापस आ गया। और अच्छा ही हुआ अपनी कहानी का plot ही पूरा दिमाग से निकल गया था, बड़ी मुश्किल से दो दिन के चिंतन के बाद उल्टा सीधा लिख लिया है, आज रात तक पोस्ट करता हूँ।
 
सास ससुर की कड़कती आवाज सुनकर दोनों माँ - बेटी जल्दी से भागकर अपने अपने कमरे में घुस गये......... सास ससुर उसी सोफे पर जाकर बैठ गये जो कुछ सेकंड पहले कुरुक्षेत्र (अखाड़े) का मैदान बना हुआ था।

अरुण की मम्मी मुझे अपने परिवार और पुरखों की इज्जत धूमिल होती नजर आ रही है, जरा गौर से सुनो अपने घर की मर्यादाओं की दीवारों के सरकने की आवाज, अगर सुन सकती हो तो सुनो। और मै कितना विवश हू जो सब कुछ जानते हुए भी कुछ कर नही सकता। " कहते है स्त्री का श्राप कभी बेकार नही जाता आदमी के अपने बुरे कर्मो का फल यही भोगना पड़ता है, ये मेरे ही कर्मो का फल है..." मैने ही फरेब की विरासत अपने परिवार में डाल दी। पापा बहुत ही गंभीर मुद्रा में दुखियाते हुए मम्मी से बात कर रहे थे।

अभी दो दिन पहले जब तुम्हारे लाडले बेटे से मैने कहा.... अपनी जवान बेटी के पहनावे पर ध्यान दो.. जवान लड़की का बच्चों सी फ़टी निक्कर पहनकर छोटी टॉप पहनकर फैशन के नाम पर घूमना हमारे परिवार की संस्कृति का अंग नहीं है। बाप बने हो तो बाप होने का फर्ज निभाओ....??? तो तुम्हारा लाडला मेरी बातों को इंग्नोर कर गया, जाते जाते बड़बदाता हुआ बोला आपने बस मुझे ही समझाने का ठेका लिया हू, अपनी बहू को कुछ भी नही बोलते, क्या रिंकी उसकी बेटी नही है...... ऊपर से उसे घर से बाहर भेजने में बड़ी खुशी हो रही थी, बड़ा फक्र कर रहे थे।

मम्मी चोंकते हुए क्या सच में अरुण ने ऐसा बोला, मै नही मानती...!

उसने सामने से तो नही बोला लेकिन उसके मन के हाव भाव से मुझे समझ आ गया था।

गलती.... गलती.... बहुत बड़ी गलती हो गयी, पापा अपना माथे पर हाथ मारते हुए बोले।

आप ऐसा क्यों कह रहे हो आपने कोनसी गलती कर दी.... ??? मम्मी पापा को समझाते हुए बोली।

एक गलती नही मैने बहुत गलतिया की है और हर बार की गलती पहले वाली गलती से बड़ी होती गयी।

पहली गलती अरुण की सगाई के वक्त तुमने ठीक कहा था कि जवान बेटी को दहेज में माँ के साथ लाना ठीक नहीं है लेकिन मैने तुम्हारी एक ना सुनी.... समाज के रिवाजो को ना मानकर आधुनिकता के चक्कर में आकर और भावनाओ में बहकर जवान लड़की को भी साथ ले आया।

बस भी करो आप और शांत हो जाओ, माँ बेटी का झगडा था और अभी मै जाकर दोनों से पूछती हूँ सुबह सुबह ये क्या नंग नाच हो रहा था... मम्मी पापा को शांत करते हुए बोली।

दूसरी तरफ अपने घर में मचे कोहराम और नंग नाच से बेखबर अपने दामाद होने का फर्ज निभाते हुए पैसों का पैकेट लेकर अपनी ससुराल में पहुँच गया। दरवाजे पर लटका ताला देखकर मैने ससुर को फोन लगाया तो उन्होंने कहा शहर के बाहरी इलाके में एक मैरिज हाल में सब घर वालों के रुकने का ठहरने का अच्छा इंतज़ाम कर रखा है और वहीं शादी के सभी रस्मो रिवाज़ होने है. बारातियों के रुकने के लिए नज़दीक के ही एक होटल में किया गया है.

खैर मैं वहा पहुँच गया मैरिज हाल एक काफी बड़े लॉन में था. उसमें दो बैंक्वेट हाल थे: एक छोटा, एक बड़ा और 16 कमरे थे. शादी के लिए बड़ा वाला बैंक्वेट तय किया गया था और भोजन बाहर लॉन में. कमरे तो परिवार वाले मेहमानों को दे दिए गए. बुड्ढे लोग, बिन ब्याहे लड़के और लड़कियों के लिए छोटे वाले बैंक्वेट में फर्श पर बिस्तर बिछा दिए गए थे. एक तरफ लड़के लोग, दूसरी तरफ लड़कियां और हा दोनों के बीच में बुज़ुर्ग लोग, ताकि कोई भी कुछ गड़बड़ न कर सके. छोटे छोटे शहरों में आज भी बड़े शहरों जैसा खुलापन नहीं होता.

मैरिज हाल में बड़ा हड़कंप मचा था. मैने सबसे पहले अपने ससुर के पैर छुये,उनको पैसों का बंडल थमाया। उन्होंने मुझे सीने से लगा लिया और साथ साथ ये भी बताया आज शाम का महिला संगीत और कल शादी का सारा कार्यक्रम यही ही आयोजित होगा।

वो मुझे अंदर लेकर गये, बहुत से रिश्तेदार आये थे. मैंने कितने बड़े बूढ़ों और बूढ़ियों के पैर छुए, उसकी गिनती ही नहीं है, सब नया जमाई करके इधर उधर मुझे मिलवाने ले जा रहे थे. मेरी सालियाँ और मेरी सास तो मुझे बहुत कम दिखीं, हां मेरा साला रिंकू दिखा जो सास को ढूंढ रहा था, बेचारा अपनी किस्मत का मारा था. हां, बाद में जब औरतों का एक झुंड सीढ़ियों से नीचे उतरता हुआ आया तो वे तीनों दिखीं.

जी हाँ वो तीनों मतलब प्रीति, जूली और मेरी सास सब इतनी सुंदर लग रही थीं. याने वे सुंदर तो थीं ही, मैंने सबकी सुंदरता इतने पास से देखी थी पर आज सिल्क की साड़ियां, गहने, मेकप इन सब के कारण वे एकदम रानियां लग रही थीं. जूली तो लग ही रही थी राजकुमारी जैसी, जब मैंने प्रीति को भली भांति देखा. कम्बख्त क्या गज़ब की क़ातिल जवानी थी. पटियाला कट सलवार और प्रिंट की शमीज़, पांव में जूतियाँ. हल्का सा मेकअप, गले में सोने की चैन, कलाइयों में गुलाबी चूड़ियां और एक एक सोने का कंगन. पैरों में चांदी की खन खन की आवाज़ करने वाली पायजेब.

दोनों में से कोई भी एक दूसरे से कम नहीं थी जूली और प्रीति दोनों बहनें बेहद सुन्दर तो थी हीं, कामुक भी बहुत थीं. एक सी कद काठी, एक सी हसीन बाहें, एक से खूबसूरत हाथ और पैर. जूली बहुत गोरी चिट्टी थी परन्तु प्रीति जैसी अँगरेज़ सरीखी गोरी नहीं. प्रीति के सामने तो वो साँवली दिख रही थी. उसके चूचे जूली के चूचों से काफी बड़े और भारी थे.

(जैसे ही प्रीति से आँखें चार हुईं, मुझे फ़ौरन अहसास हो गया कि इस क़यामत को चोदना तो पड़ेगा ही, वर्ना चैन नहीं मिलेगा. उसकी आँखों में मैंने तैरती हुई जो नंगी वासना देखी उससे यह भी पक्का हो गया कि उसको पटाने में ज़्यादा मेहनत भी नहीं करनी पड़ेगी.)

और मेरी सासूमां, उफ़्फ़ उनका क्या कहना, गहरी नीले रंग की कांजीवरम साड़ी में उनका रूप खिल आया था. "साड़ी पहनकर स्त्रियाँ तब ही अच्छी लगती है, जब तक उनकी नाभि ना दिखे...... वरना सूट सलवार ही बढ़िया है"

बेटियों (सालियों) ने शायद जिद करके उनको हल्की लिपस्टिक भी लगा दी थी, उनके होंठ गुलाब की कलियों जैसे मोहक लग रहे थे और जब मैंने उनके होंठो के चुंबनों के स्वाद के बारे में सोचा तो कुरता पहने होने के बावजूद मेरा हल्का सा तंबू दिखने लगा, बड़ी मुश्किल से मैंने लंड को शांत किया नहीं तो भरी सभा में बेइज्जती हो जाती. एक बात थी, मैं कितना भाग्यवान हूं कि ऐसी सुंदर सुंदर सालियों और सास वाली भरी हुई ससुराल मिली है, ये बात मेरे मन में उतर गयी थी. पर उस समय कोई मुझे कहता कि फटाफट चुदाई याने क्विकी के लिये तीनों में से एक चुनो, तो मुश्किल होती. शायद मैं प्रीति को चुन लेता!! क्या पता!! ह्म्म्म ह्म्म्म

इस वक्त मेरे मन में दो तरह की वासनायें उमड़ रही थीं. एक खालिस औरत मर्द सेक्स वाली ... बस पटककर चोद डालूं, मसल मसल कर उसके मुलायम गोरे बदन को चबा डालूं, जहां मन चाहे वहां मुंह लगा कर उनका रस पी जाऊं ये वासना .... दुसरी ये चाहत कि उसको बाहों में भर लूं, उसके सुंदर मुखड़े को चूम लूं, उसके गुलाबी पंखुड़ी जैसे होंठों के अमरित को चखूं ...

इनमें से कौनसी वासना जीतती ये कहना मुश्किल है. पर मेरा काम आसान करने को सासु अचानक मेरे पास आ गयी. मैं चौंका नहीं, वैसा ही मुस्कुराता हुआ खड़ा रहा. सालियाँ भी तैयार होकर आयी थी, लगता था मंडप और हल्दी, तेल वाली (रसम) की तैयारी करके आई थी.

मुझे उस पोज़ में देख कर सासु ममतामयी बोली " आप ... जमाई जी अकेले ही आये हो कुसुम और रिंकी बिटिया साथ क्यों नही आई " पता नही सास का ये वाक्य मुझे समझ नहीं आया या अजीब सा लगा, और मेरी मुह फट होने की बुरी आदत होने की वजह से अचानक निकल गया।

तो मै वापस चला जाता हूँ, मै टोन में बोला।

अरे बेटा मेरा वो मतलब नही था। सासु लाड़ से मुस्कुरा कर बोली।

मम्मी क्या मुझे अकेला नहीं आना चाहिए था, क्या कुसुम कोई यहाँ आने का एंट्री टिकट है। इस बार मै हस्ते हुए बोला।

तभी प्रीति मेरी टांग खीचते हुए बोली " हा ये सही कहा है, जीजाजी आपने कुसुम आपकी ससुराल का एंट्री टिकट ही है, जीजाजी ससुराल में भला कोई जमाई बिना अपनी लुगाई के आता है कभी...??? ह्म्म्म ह्म्म्म

ये बात है तो फिर गलती हो गयी मुझसे, मै फिर निकलता हूं यहाँ से बिना टिकट जो आ गया...... मै चिढ़ते हुए बोला।

चुप करो बदमाशी, मेरी सास ने प्रीति को बनावटी फटकार लगाई। और वो हँसने लगी। तभी मेरी मम्मी का फोन आ गया और मुझे घर जल्दी आने को कहा.....! फिर मै अपनी ससुराल का रंगीन माहौल छोड़ बेमन से घर वापस आ गया।

मै जब घर पहुँचा, घर में शांत माहौल था। पापा बाहर बरामदे में बैठे हुए नाक पर चश्मा चढाये हुए अखबार पढ़ रहे थे। मै उनको हर बार की तरह इन्गोर करते हुए घर के अंदर दाखिल होने ही वाला था कि पीछे से आवाज आई.... अरुण यहाँ आओ।

मै मन ही मन सोचा इनकी सेजवानी में क्या परेशानी हो गयी.... जी पापा बोलिये कुछ काम था क्या...???

काम तो नही बेटा लेकिन एक बात मेरी सुनते हुए अंदर जाओ... पापा अखबार लपेटते हुए बोले।

जी सुनाइये.... पापा जी

बेटा अरुण जीवन भी गिटार या वीणा जैसा वाद्य यंत्र हो, ज्यादा कसना भी गलत है और ज्यादा ढील छोड़ना भी गलत है। सँस्कार की जरूरत स्त्री व पुरुष दोनों को है, गाड़ी के दोनों पहिये में संस्कार की हवा चाहिए, एक भी पंचर हुआ तो जीवन डिस्टर्ब होगा।

पापा मै कुछ समझा नही, आप क्या कह रहे हो..??? मै उनकी गोल मटोल बातों को सुनकर बोला।

जिनकी बुद्धि कुमार्ग पर चल रही हो, उन्हे सच्ची और अच्छी बातें कम समझ आती है, बेटा तुम अंदर जाओ तुम्हारी मम्मी तुम्हे तुम्हारी भाषा में समझा देगी। पापा व्यंग भरे सुर में बोले। और फिर मै अंदर आ गया।

मम्मी किचिन में थी, मेरी आहट सुनकर वो धीरे से दबी आवाज में कुसुम और रिंकी के कमरे की तरफ हाथों से डिशूम डिशूम (लड़ाई) का इशारा करते हुए हस्ती हुयी उनके कमरे में मुझे अंदर जाने को बोली।

मै जब अंदर कमरे में गया तो कुसुम उल्टी होकर बेड पर लेटी हुयी मोबाइल में लगी हुई थी.....

मै बेड के नजदीक पहुँच कर उससे बोला और... मैडम क्या हुआ... ???

क्या होना चाहिए था, तुम क्या चाहते हो... मेरी आहट और आवाज सुनकर मोबाइल बिस्तर पर पटकते हुए कुसुम मुझसे तुनक कर बोली।

मै तुम्हारे दोनों कोमल पैरो को अपने काँधे पर रखकर, पायल की मधुर आवाज सुनना चाहता हूं। मैने बड़े रोमांटिक अंदाज़ में कहा।

ऐसा है, ज्यादा रोमांटिक होने की जरूरत नहीं है, जिस काम से गये थे वो हो गया, मेरे पापा को पैसे दे आये। कुसुम ने एक जिम्मेदार पत्नी की तरफ मुझसे पूछा।

हा, दे आया....। वैसे तुम्हारा मूड इतना उखड़ा हुआ क्यों है, कुछ हुआ माँ बेटी में.... मैने बात को घुमाते हुए किचिन में मेरी मम्मी के झगड़े के इशारे वाली बात को कुसुम से पूछा....???

मुझसे क्यो पूछ रहे हो, अपनी हितैषी बिटिया से जाकर पूछो.... बहुत जबान चलाने लगी है। (कुसुम ने पूरी बात ना बताते हुए जबाब दिया) कुसुम का मूड देखकर मै कमरे से निकलकर रिंकी के कमरे में आ गया।

और मेरी नज़र अब रिंकी के गोरी चिकनी टांगो पर थी. मुझे पता था कि बिना नहाई हुई मेरी बेटी रिंकी के बिखरे बाल और उस नाइटी में उसकी गोरी चिकनी टाँगे सभी कुछ मुझ को उकसा रहे थे. मेरा लंड जैसे खुद ब खुद ही फूलने लगा था. पर फिर भी किसी तरह खुद पे काबू कर मै उन सब भावनाओं को अनदेखा करता रहा. वो अपना चेहरा तकिये से छिपाये लेटी थी ,पता नही क्यो...???

मेरे कदमों की चाप सुनकर उसने अपने चेहरे को तकिये की आड़ में से निकाला

“मैंने जब रिंकी के चेहरे की तरफ निगाह घुमाई उसके मासूम से चहरे को देखा उसकी आंखे सच मे थोड़ी सूजी हुई थी मानो जी भर वो रोइ हो ,

आखिर मेंने पूछ लिया रिंकी क्या हुआ....? इतना सुनता ही उसके मासूम चेहरे पर एक मुस्कुराहट खिल गयी.... और वो बड़े लाड़ से बोली "करीब आकर बात करो ना, नजर कमजोर है मेरी, मुझे दूर का दिखाई नही देता"

मै बड़े अचंभे मे था क्योकि कुछ पल पहले मैने जब कुसुम से रोमांटिक अंदाज में बात की तो उसने कोई रिस्पोंस नही दिया, जबकि उसके उलट जब रिंकी मुझसे इस तरह रोमांटिक अंदाज़ में बात कर रही है तो उसके साथ मेरा यू बुत बन खड़े रहना न्यायोचित नही होगा। और अपने कदम बढ़ाते हुए उसके एकदम नजदीक बैठ गया।

और मुस्कुरा कर पूछा अब बताओ रिंकी क्या हुआ है....???

फिर उसने अपने गुलाब के पंखुड़ियों जैसे होंठों को मेरे कान के नजदीक लाकर बोली......

ग़म का फ़साना बन गया अच्छा

एक बहाना बन गया अच्छा

सरकार ने आके मेरा हाल तो पूछा

इतना सुनते ही मेरी हँसी छूट पड़ी... और मैने भी सुर में सुर में मिलाते हुए कहा

अच्छा जी.... और आगे.....

रिंकी मेरे हाथ को अपने सीने पर रखते हुए

बतायें तुम्हें क्या कहाँ दर्द है

यहाँ हाथ रखना यहाँ दर्द है

देखो बातों बातों में

दो ही मुलाकातों में

दिल ये निशाना बन गया अच्छा...

मैने रिंकी के सीने पर हाथ रखे हुए ही बोला, तुम्हारा दिल तो बड़ा मुलायम है रिंकी.....???

तभी पीछे से कुसुम की तेज गुस्से भरी आवाज आई, प्रोफेसर साहब हाथ हटाइये वहा से वो मुलायम चीज दिल नही है उसका.... ... ....!!!!!!!

जारी है..... ✍️
 
दोस्त क्या करू falcon thread par आपका मनोरंजन करता था, लेकिन वहा धारा 144 लगी है, मै अति सवंदेन शील व्यक्तियों की सूची में टॉप पर हू और जी कि अनुमति बिना मै जा नही सकता, वरना तड़ीपार घोषित कर दिया जाऊंगा। इसलिए यही कहानी में ही मजे लेकर काम चलाओ 😞
 
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शुक्रिया सर जी, हम राइटर के शब्द आपके छुद्र दिमाग में हलचल मचा रहे है, ये जानकर बहुत खुशी हुयी। आपकी दिमाग की छटपटाहट से जो सवाल आया उसके जबाब में बस इतना ही लिखना चाहता हूँ कि खुली हवा में रहने वाली स्त्रियों की चरित्रहीन होने की संभावना कम है, बंद कमरो में रहने वाली स्त्रियों के कांड घर पर ही चलते रहते है।

इसी तरह जिज्ञासा समाधान करते रहे....

धन्यवाद
 
अध्याय - 19 --- " स्त्री शृंगार ""

मैने रिंकी के सीने पर हाथ रखे हुए ही बोला, तुम्हारा दिल तो बड़ा मुलायम है रिंकी.....???

तभी पीछे से कुसुम की तेज गुस्से भरी आवाज आई, प्रोफेसर साहब हाथ हटाइये वहा से वो मुलायम चीज दिल नही है उसका.... ... ....!!!!!!!

मै... मै... मै तो बस...मै दरवाजे पर खड़ी कुसुम की आवाज सुनकर हकलाते हुए बोला..!

मै तो बस क्या... ??? तुम्हे जरा सी भी लाज शर्म तो रही नही.. सब बेंच खाई ?? कुसुम कमर में साड़ी का पल्ला घूसते हुए बोली।

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कुसुम के ये तेवर देखकर मेरी गांड फट गई, और मै कमरे से दुम दबा कर भाग खड़ा हुआ।

मेरे जाने के बाद कुसुम रिंकी से : और तुम महारानी क्या हो रहा था ये...??

मेरे पेट में दर्द हो रहा था, वो ही पापा को बता रही थी.... रिंकी सेहमते हुए बोली।

"मैने गिनती सिखाई थी जिसको, वो पहाड़ाँ पढ़ा रही है मुझे " कुसुम रिंकी को ताना देते हुए बोली।

रिंकी : मम्मी कसम से मेरे पेडू में दर्द है,

कुसुम : महीना (mc) से हो......!

रिंकी : हा, दूसरा दिन है।

कुसुम : कितनी बार बोला है हेमपुष्पा की शीशी रखी हैं उसे पी लिया कर..... लेकिन मेरी हर बात तुझे बुरी लगती है। ठीक है फिर आराम कर , ब्यूटी पालर जाना था, मै इनके साथ चली जाती हूँ। लेकिन तब तक तू तैयार हो जाना, संगीत में साथ चलना।

कुसुम रिंकी को ममतामयी डाँट के साथ समझाते हुए वापस बेडरूम में आकर कप बोर्ड (कपाट) खोलते हुए मुझसे बोली.... "सुनिये'

कान में जब ये शब्द पड़े तो ऐसा लगा जैसे मिश्री सी घुल गयी हो..... मै बेड पर उकडू बैठक में बैठा हुआ सोच में था कि अरुण बेटा आज तो कुसुम तेरी गांड फाड़ेगी... लेकिन हुआ सोच के उलट... इसके शायद दो कारण हो सकते थे एक या तो कुसुम ने मुझे रिंकी के साथ जिस तरह देखा तो उसे सिर्फ मेरी बाप की बेटी के लिए " बापता " लगी हो, दूसरा उसके पास मेरी गांड फाड़ने के लिए कोई ठोस सबूत ना हो। खैर इन सब बातों को भूल कर मै भी उससे बड़े प्यार से बोला

"सुनाइये जी"

आज शाम को महिला संगीत में जाना है...जरा मेरे साथ ब्यूटी पार्लर तक चलिए...! कुसुम बेचारी बहुत बहुत प्यार से बोली।

‘यार! एक बात बताओ यह किस पुराण या संविधान में लिखा है कि कोई महिला किसी शादी-विवाह में बिना ब्यूटी पार्लर में हाथ फिराए मुंह दिखाने लायक नहीं होती है?’ ब्यूटी पालर का नाम सुनते ही मेरे मुह से अनायास से ये बात निकल गयी।

हे प्रभू... इस आदमी से बात करना ही बेकार है, हमेशा सीधी बात का उल्टा जबाब देता है.....। इस बार कुसुम गुस्से से बोली।

मै : हस्ते हुए ऐसा क्या बुरा बोल दिया मैने जो तुम्हे प्रभु याद आ गये...???

वैसे एक बात बताओ ब्यूटी पालर के नाम तुम पतियों को इतनी चिढ़ क्यों होती हैं ....?? कुसुम मेरी ओर देखती हुयी बोली।

क्योकि हम पतियों को डर लगता है कि कहीं हमारी पत्नी कटरीना में कन्वर्ट होकर हमारी राजा मुराद वाली पर्सनाल्टी को ठुकरा कर सलमान की मुराद न जगा ले, क्यों सही कहा ना। मै मजाकिया लहजे में बोला.... ह्म्म्म ह्म्म्म

अरुण कुमार जी एक बात अच्छे से जान लीजिये आजकल के युग में ब्यूटी पार्लर और आईसीयू में आक्सीजन दोनों एक समान ही हो लिए हैं। दोनों के बिना जीना लगभग असम्भव सा है।’ कुसुम मेरी बात का जबाब देते हुए बोली।

हमारी बहस जारी थी, मैने कहा मत करो बहस मुझसे हार जाओगी, हुस्न इतनी बड़ी दलील नहीं.......... उसने हाथ एकदम बालों के पीछे किया रबर बैंड निकाला, सर नीचे को किया, और एक झटके में उठा दिया.... उसकी जुल्फे बिखर गयी, उसने मेरी आँखों में झांक कर पूछा " हा तो तुम कुछ कह रहे थे....????

मुझ जैसे घनघोर प्रकृतिवादी के लिए किसी अप्राकृतिक कार्य के लिए इतनी संजीदा धमकी असहनीय थी। स्त्री से ना कोई मोहब्बत में जीत सकता है, ना नफरत मे, ना जिद में, और ना ही बहस में.... इसलिए मैंने कुसुम की बात का जबाब ना देकर भी उसे एक जबाब दे दिया। और कमरे से निकल कर बाहर अपनी बाइक निकालने लगा।

पांच मिनिट बाद कुसुम भी बाहर आ गयी और हम पास के सीक्रेट ब्यूटी पार्लर में पहुँच गए। जैसे ही मैंने पार्लर का दरवाज़ा खोला, सब औरतो की निगाह एक साथ मेरी तरफ उठी. मुझे लगा जैसे कोई ज़रूरी मीटिंग चल रही थी और मैंने उन लोगों को डिस्टर्ब कर दिया.

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थोड़ा सहजता का भाव चेहरे पर लाने की कोशिश कर ही रहा था कि पार्लर वाली भाभी बोल पड़ी, आओ कुसुम, आओ यहाँ इस कुर्सी पर बैठ जाओ। और पार्लर वाली भाभी मुझसे बोली बस दस मिनट इंतज़ार करना पड़ेगा, तब तक भाई साहब तुम यह मैगज़ीन देखो.

कॉर्नर टेबल पर पड़ी मैगज़ीन उठाकर पास ही लगे सोफे पर मैं बैठ गया. अब बारी मेरी थी, जैसे बोर्ड मीटिंग में बॉस का इंतज़ार हो रहा हो और बॉस आते ही इशारे से कहे, यस…. प्रोसीड, वैसा ही कुछ भाव मेरे चहरे पर आया. मैंने उन सबकी तरफ एक बार देखा तो वे सब वापस अपनी बातों में लग गईं.

((इस देश में मध्यम वर्गीय पति के लिए पत्नी हमेशा ही घोषित रूप में चश्मे बद्दूर होती है। इस सफेद झूठ को बोलने के पीछे संभवत: दो कारण होते हैं या तो पति के पास सच बोलने का साहस नहीं होता है या फिर सच बोलने के बाद उसे पत्नी की ओवर हालिंग करवाने के लिए ब्यूटी पार्लर ले जाने का बजट नहीं होता है। दोनों ही परिस्थितियों में पति रुपी निरीह प्राणी के पास संतोष रुपी घुट्टी पीने के अलावा कोई और विकल्प नहीं होता है।))

दो हमउम्र औरतें सोफे पर मेरे ही बगल में बैठी थीं उनकी बातें तो मैं सुन पा रहा था लेकिन नज़रें मैगज़ीन में गड़ाए होने के कारण उनके चेहरों पर आ रहे भावों को नहीं देख पा रहा था.

– नहीं यार, अब इस उम्र में दुबला होकर करना भी क्या है? जब दुबली पतली थी तब भी पतिदेव कौन सा आगे पीछे मंडराते ही रहते थे. वो तो शाम को उनके बॉस की पार्टी में जाना है तो कह रहे थे, थोडा थोबड़ा ही ठीक ठाक करवा लो, दोस्तों की बीवियां बड़े घरों से हैं, पढ़ी लिखी हैं तो उन्हें उठने बैठने का सलीका है.

– सुना है मिसेस अग्रवाल भी आने वाली है उस पार्टी में?

– कौन, वो परकटी? जो सब मरदों से हाथ मिलकर हाय हल्लो करती है?

– हाँ, वही.

– पता नहीं आजकल की औरतों को क्या हो गया है, उनको लगने लगा है, मर्दों से हाथ मिलाकर मिलने से उनके बराबरी की हो गई हैं.

– पर सुना है बहुत बड़ी समाज सेविका है?

– घर में झांकने जाओगी तो पता चलेगा, घर को भी ऑफिस बना रखा है. ऐसी औरतें कहीं घर संभाल पाती है?

दोनों की बातें सुनकर मैं मन ही मन मुस्कुरा दिया. लगा, घर में रहने वाली औरतों की दुनिया कितनी सीमित होती है. सिर्फ घर के काम को अपना कर्तव्य समझती है और बाहर काम करने वाली औरतें उनके पैमाने पर बिलकुल फिट नहीं बैठती. सुशील गृहणी की परिभाषा से परे होती हैं, इसलिए थोड़ी सी बदनाम भी होती है. हर पड़ोसियों की नजर में वो औरत बुरी होती हैं, जो रोज उनकी नजरों के सामने से खुद कमा कर खा रही है।

फैशन मैगज़ीन देखने में मेरा मन नहीं लग रहा था तो मैंने एक बार पूरे कमरे में नज़र दौडाई. साइड वाली कुर्सियों पर बैठी तीन औरतें ज़ोर ज़ोर से हंस रही थी. उनको देखकर लगा चलो कोई तो है जो घर गृहस्थी के भार से मुक्त है और खिलखिलाना भी जानती है.

तभी उनमें से एक की आवाज़ मेरे कानों में पड़ी – अरे क्या करोगी जल्दी जाकर, ऑफिस की पार्टीज़ में फीमेल स्टाफ को बुलाना उनकी मजबूरी होती है.

इस पर दूसरी बोल पड़ी – और वैसे भी पति के साथ ऑफिस की पार्टी में जाना यानी अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारना है. घर लौट कर पच्चीसों सवाल – उसने तुमसे हाथ क्यों मिलाया, और किसी से तो नहीं मिलाया? मिस्टर वर्मा से ज़रा दूर ही रहा करो, वो आदमी मुझे ठीक नज़र नहीं आता. वैसे तुम्हारे कलीग्स है तुम जानो मैं तो सिर्फ इसलिए कहता हूँ. क्योंकि इन मर्दों की ज़ात को मैं बहुत अच्छे से जानता हूँ. मुंह पर कुछ और, दिल में कुछ और ही होता है.

– यह तो ठीक कहती हो यार पिछली बार वाली पार्टी के बाद तो मेरे घर में ऐसा हंगामा हुआ था कि नौकरी छोड़ने तक की नौबत आ गयी थी. वो तो भला हो सासुमाँ का जिन्होंने पतिदेव को समझा दिया कि गाड़ी की किश्ते चुक जाने दो उसके बाद ही बहू का काम बंद करवाना. सोच रही हूँ कि गाड़ी की किश्तें ख़त्म होने से पहले प्लाज़्मा टीवी उठा लूं तो नौकरी बची रहेगी. वरना घर में सास को कौन झेलेगा दिन भर!

– क्यूं घर में तो बड़ी मम्मीजी मम्मीजी कहती फिरती हो, मुझे तो देख देख कर जलन होती है कि वाह क्या आदर्श जोड़ी है सास बहू की.

– अरे भई, पति की नज़रों में अच्छी बीवी, अच्छी बहू और अच्छी माँ बने रहना हो तो यह सब चोंचले करने पड़ते है. तुम भी सीख लो यह सब अगले महीने तुम्हारी भी शादी होने वाली है.

इसके बाद तीनों खिलखिलाकर हंस पड़ीं.

इस बार मेरे चहरे पर मुस्कराहट नहीं थी और उनकी बातों का विश्लेषण करने का मन भी नहीं हुआ. एक अजीब सी घुटन ने पूरे कमरे को घेर लिया था. जब बेचैनी बढ़ने लगी तो मैं उठकर खिड़की के पास जा खड़ी हुआ. पार्लर दूसरी मंजिल पर था इसलिए खिड़की से आने वाली हवा थोड़ी ठंडी थी.

मैं अपनी बेचैनी को शब्दों की नाव पर बैठाकर विचारों की नदियाँ में छोड़ता, इससे पहले ही एक 20-22 साल की लड़की अन्दर आई. स्किन टाईट जींस और शॉर्ट टी-शर्ट पहने हुए थी. गॉगल्स आँखों से उतारकर सिर पर चढ़ाए हुए थे. उसके उभारो के ऊपर और ठीक उसके चूतड़ों के ऊपर एक बड़ा सा टैटू बना हुआ था। पूरी कमर पर और उस टैटू की एक पूंछ सी उस लड़की के दोनों चूतड़ों के बीच में जाकर खत्म होती थी।

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इस बार उन सारी नज़रों मे मेरी नज़र भी शामिल थी जो दरवाज़े पर आई लड़की की तरफ उठी थी. लेकिन मेरी आँखों के सामने अब तीन दृश्य थे- एक, लड़की का, दूसरा, उन दो औरतों का, जो अपनी साड़ी में से लटकती कमर और थुलथुले पेट को छुपाती हुई, लड़की के शॉर्ट टी-शर्ट से झांकती पतली कमर, उसके उभारो के ऊपर और कमर के नीचे बटर फ्लाई टैटू, को देखकर नाक भौं सिकोड़ रही थी.

और तीसरा दृश्य उन ऑफिस गोइंग औरतों का, जो एक दूसरे को कोहनी से उस लड़की को देखने का इशारा कर रही थी.

कोई चौथा दृश्य मेरे मानस पटल पर उभरता इससे पहले ही उस लड़की की आवाज़ ने पूरे कमरे को घेर लिया – आंटी आई गॉट द जॉब. ये कहते हुए उसने अपनी बाहें पार्लर वाली भाभी की कमर में डाल दी – और मज़े की बात यह है कि कल से ही ऑफिस जॉइन करना है और आज ऑफिस की पार्टी में बॉस ने मुझे इनवाइट किया है. आज ऐसा मेकओवर कर दो कि पार्टी में सबकी नज़रे सिर्फ मुझ पर हो. यू नो फर्स्ट इम्प्रैशन इज़ द लास्ट इम्प्रैशन. एक बार सबकी नज़रों में आ गयी तो 6 महीने बाद ही प्रमोशन पक्का.

पार्लर वाली भाभी ने उसे बधाई दी और मेरी तरफ सिर घुमाकर कहा, आप चाय पियोगे न, मैं अपने लिए मंगवा रही हूँ. मुझे भी एक ब्रेक चाहिए. मैंने पार्लर वाली भाभी पर एक सुकून भरी मुस्कान लिए नज़र डाली और No Thanks. – ,

कुसुम का makeover हो चुका था... जिस मकसद से मैं यहाँ आया था वो भी पूरा हो गया. अब मैं चलता हूँ. थैंक यू वैरी मच भाभी.जी।

मैने जैसे ही पार्लर का दरवाजे को हाथ लगाया तो पीछे से मुझे कुसुम की आवाज सुनाई दी.... अरे रुकिए दो मिनिट मै वाश रूम होकर आती हु।

(छोटे छोटे शहरों की छोटी छोटी कोमर्शियल् बिल्डिंग में अक्सर वाशरूम होते ही नही फिर यहाँ तो लेडी के लिए सेप्रेट वाशरूम होने की कल्पना करना भी ब्वाकूफी है।)

ब्यूटी पालर वाली भाभी ने कुसुम को छत पर मूतने जाने की ओर इशारा किया, तभी वो नवयोवना मेरे कुछ बोलने से पहले ही कुसुम से बोली... चलिए भाभी मै भी साथ चलती हू।

कुसुम और नवयोवना छत पर कुछ दरख्तों की आड़ में गईं। एक बड़ी पानी की टंकी के पीछे कुसुम बैठी तो उसके पास ही नवयोवना। पहले तो कुसुम ने आस पास अच्छी तरह से देखा कोई देख तो नहीं रहा, जब सब तरफ से आश्वस्त हो गई, तो उसने अपनी सलवार का नाड़ा खोला और सलवार उतार कर बैठ गई। बस बैठने की देर थी, 1 मिनट में ही पेट खाली (पेशाब) हो गया। क्या आनन्द आया… खुली,जगह, साफ हवा, हल्का सा सूर्य प्रकाश (धूप) और खुली छत पर दो नंगी लड़कियां।

कुसुम ने उस लड़की से पूछा- यहाँ कोई डर तो नहीं अगर कोई आ जाए, तो?

वो बोली- अरे भाभी, यहाँ कोई नहीं आता। सिर्फ बिल्डिंग की दुकान वाले, दुकानों पर काम करने वाले नौकर, और अपने जैसे काम करवाने वाले ग्राहक ही आते हैं।

वैसे तो कुसुम फ्री हो गई थी, मगर फिर भी बैठी रही, उसने उस लड़की की तरफ ध्यान दिया, तो देख कर हैरान रह गई, उस लड़की की चूत पर एक भी बाल नहीं था।

कुसुम ने उससे पूछा- क्या लगाती है, वीट या रेज़र?

वो हस्ती हुई बोली- भाभी, यहाँ तो रेज़र ही चलता है। फिर बड़ी खुश हो कर बोली- एक और चीज़ दिखाऊँ?

कुसुम ने कहा- क्या?

वो उठी और उठ कर कुसुम की तरफ पीठ करके बैठ गई।

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कुसुम उसे आँख मार कर कहा- किसको दिखाती है ये अपनी गांड पर बने टैटू को ?

वो शर्मा सी गई और हंस कर बोली- अपने बॉयफ्रेंड को।

कुसुम ने कहा- सिर्फ दिखाती भी है या कुछ और भी?

वो बोली- अरे लो भाभी, जब अगला इसे देखने तक पहुँच गया, तो क्या खाली हाथ वापिस जाएगा। कुछ न कुछ तो करके ही जाएगा! ह्म्म्म ह्म्म्म

उस लड़की ने कुसुम से पूछा- कैसा लगा टैटू भाभी?

मुझे बड़ा अच्छा लगा कि एक यंग लड़की टैटू बनवाए फिरती है, और वो भी पीछे अपनी गांड पर, और मैं गवर्मेंट जॉब वाली मॉडर्न लेडी और मेरे हाथ पर भी टैटू नहीं।

कुसुम ने उसे पूछा- कहाँ बनवाया?

वो बोली- एक बार मैं बैंक का पेपर देने दिमापुर गई थी, तभी बॉय फ्रेंड भी मेरे साथ था, सुबह पेपर दिया, दोपहर के बाद एक जगह जा कर मैं ये बनवाया।

कुसुम ने पूछा- किसी लड़की से बनवाया?

वो बोली- अरे भाभी लड़की कहाँ, ये तो सब लड़के ही बनाते हैं।

कुसुम ने फिर पूछा- और तू उसके सामने नंगी लेट गई?

वो बोली- तो क्या हुआ, बॉयफ्रेंड मेरे साथ था, उसने खास खयाल रखा कि टैटू वाला मेरे साथ कोई गलत हरकत न करे। मेरा बॉयफ्रेंड मुझे बहुत प्यार करता है, कहता है, कहीं नौकरी लग जाए, फिर हमारे घर रिश्ता ले कर आएगा।

कुसुम : पर सच कहती हूँ, तेरा टैटू देख कर मेरी गांड जल गई, नई नई लड़किया अपनी गांड पर टैटू बनवा के घूम रही है, और मैं जॉब वाली कुछ भी नहीं कर पा रही हूँ।

फिर कुसुम उठी और सलवार का नाड़ा बांध लिया, वो लड़की भी उठ खड़ी हुई, सामने ही टंकी के पास नल लगा था, वो दोनों वहाँ गई और नल से पानी लेकर अपने अपने चूतड़ और चूत धो लिए।

मगर जब चूतड़ धोने के लिए उस लड़की ने अपनी सलवार खोली तो कुसुम को दोबारा उसकी गांड पर बना टैटू दिख गया और उसकी झांट जल गई कि जो भी हो मुझे भी अपने बदन पर टैटू बनवाना है, इसने गांड पे बनवाया है, तो मैं तो हर हाल में अपने चूचे पे टैटू बनवाऊँगी।

चलो जी… मूत कर वो दोनों वापिस आ गयी।

मूत के वापस आते ही सबसे पहले जो बात कुसुम ने मेरे (अपने पति) के कान में डाली वो यही थी कि मुझे टैटू बनवाना है।

मै बोला- तो बनवा लो, किसी दिन किसी टैटू स्टूडियो में चलते हैं और बनवा लेते हैं।

कुसुम ने कहा- जी नहीं, किसी भी स्टूडियो में नहीं, कोई ऐसा स्टूडियो देखो जहां लड़की टैटू आर्टिस्ट हो, मैं किसी लड़की से ही टैटू बनवाऊँगी।

मैने आँख मार कर पूछा- कहाँ टैटू बनवाने का इरादा है?

कुसुम ने साफ कहा- यहाँ पे!

और कुर्ते के ऊपर से अपने चूचे पे अपनी उंगली लगा के दिखाई।

मै एकदम चौन्का - अरे पागल हो क्या, यहाँ टैटू बनवाना है तुम्हें?

उसने कहा- यहाँ, और सिर्फ यहीं बनवाना है। वो लड़की थी ना, उसके देखो, उसने अपनी गांड पे टैटू बनवाया है।

मै बोला - कम ऑन यार, तुम उस लड़की की उम्र देखो और तुम अपनी उम्र तो देखो...??

कुसुम ने कहा- बात वो नहीं है, पर बात यह है कि आजकल तो गाँव की मुझसे ज्यादा उम्र की लुगाईया भी गांड पे टैटू लिए घूमती है, और मैं मॉडर्न होकर शहर में रह कर भी टैटू नहीं बनवा सकती।

वो झूठ इतनी मासूमियत से बोलती है कि सच जानते हुए भी, झूठ को सच मानकर उसके झूठ पर मर जाने को जी चाहता है।खैर बड़ी मशक्कत और बहस के बाद मै मान गया। फिर मैने गूगल पर एक टैटू स्टूडियो ढूंढ निकाला।

जारी है......
 
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