Incest कर्ज और फर्ज - एक कश्मकश - Page 11 - SexBaba
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Incest कर्ज और फर्ज - एक कश्मकश

आभार.........

"" कंफ्यूज अथवा भ्रमित कहने को मात्र एक मजाकिया शब्द है, लेकिन मर्द की मति भ्रमित रहना और औरत का त्रिया चरित्र करना इंसानी फितरत है। ""सोने का हिरण"" जैसा कोई मृग नही होता है, फिर भी देवता भ्रमित हो गये।"" आपकी दो लाइन की टिप्पड़ी ने मुझे एक लेखक के तौर पर सोचने को विवश कर दिया कि...... कहानी के 100 पेज पूर्ण और 1000 से ज्यादा पृतिक्रिया के वाबजूद हीरो का अभी सिवाय अपनी वाइफ के अलावा किसी और के साथ sexual encounter पूर्ण क्यों नही हुआ....??? उसका अन्य किरदारों के साथ जिस्मानी तालुक अधूरा क्यों रह गया....?? आखिरकार वो इतना कंफ्यूज क्यों है...???

जिस नायक के किरदार को मैंने गढ़ा है वो सही शब्दों में लिखूँ तो वो confused नही है, वो सिर्फ और सिर्फ कायर/डरपोक है, कायरता वश जरा सी चूक/गलती होने पर सहम/काँप जाता है, और दिल - दिमाग में चल रही अगर - मगर के कारण अपनी सही डगर भूल जाता है। माजाकिया शब्दों में लिखूँ तो " चूत चोदने में चुदवाने वाली लड़की से ज्यादा उसकी गांड फटती है...😂😜.. "" शायद यही वजह है कहानी के 100 पेज होने पर भी अपनी वाइफ को भोगने के अलावा परसी हुयी थालियों (सालियों) का भोग नही लगा सका। ""😜

"अरुण आगाज से नही अंजाम से डरता है "

(पहली शादी की रात हीरो की पत्नी ने जो उसके साथ klpd किया। तो वो भी एक जानवर रूपी मर्द की तरह जोर जबरदस्ती कर पत्नी को काबू कर शादी शुदा जीवन का आगाज कर देता तो ये कुसुम शास्त्र शुरु ही नही होता .... लेकिन अपने डरपोक सवभाव के कारण उस रिश्ते का अंजाम बुरा सोचकर उस रिश्ते से ही किनारा कर लिया।)

सुनीता जी के साथ जितना आगाज करना था वो उसने किया और अरुण कोई टीन एज तो है नही जो उनके घर के चक्कर लगाए।😜😂

अब आते है मुख्य नायिका कुसुम जी और रिंकी पर जिसकी वजह से ये लंबा सा ज्ञान मै पेल रहा हूँ... 😜😂🙏 अरुण सर की कुसुम जी शादी होना बिल्कुल जुआँ जीतने जैसी खुशी के समान थी, उसके पास उस उम्र में उस समय ना चुनाव का अधिकार था और ना ही इंकार का। फिर भी उसके हत्थे इतनी साफ सुथरी खूबसूरत घरवाली चढ़ गयी जिसे वो अपनी इस शकल के साथ कभी नहीं पटा सकता था। कुसुम जी के साथ उसका रिश्ता मधुर है, बस अरुण को डर है कि कुसुम जी की चाहत उसे कोई ऐसे रास्ते पर ना ले जाये जहाँ से वो वापस ना आ सके। हालांकि उसके इस डर को रीडर हीरो का confusan समझ रहे है।

रिंकी बिटिया.... तो खुली किताब है, अरुण सर उसे कभी भी पढ़ सकते है, लेकिन जिस मिलन का आगाज सहज होता है, उसका अंजाम बहुत ही भयानक होता है।

"" हर कहानी खूबसूरत अंत मांगती है और खूबसूरत अंत के लिए इस कहानी के हर किरदार का मिलन नसीब से ही होगा""

धन्यवाद इसी तरह समीक्षा करते रहिये।
 
तलाक का नाम दिमाग में आते ही मेरे तन बदन में एक झुनझुनाहट सी दौड़ गयी ,नहीं मैं कुसुम से दूर नहीं रह सकता था , तो उसका ट्रान्सफर करा लू...ताकि इस संजय से छुटकारा मिल जाय , इसमें भी तो समय लगेगा , मुझे सोचने को समय चाहिए था , ताकि मैं कुछ अच्छा सा फैसला कर पाऊ।

मेरे दिल दिमाग में इतना तनाव था की मैं पागल सा हो रहा था ,तभी मेरे दिमाग में एक नाम गूंजा ,,,,,,,,,,,, ज्ञान प्रकाश मिश्रा ... जी हा मेरे कॉलेज का एक्लोता दोस्त जो पेशे से वकील था , वो लोगो की पारिवारिक परेशानियों के हल ढूंढने में माहिर था , उसकी इस समाज सेवा की आदत की वजह से मै उसे गुरु कहने लगा था। कुटुंब न्यायालय में वाद - परिवाद, धाराओ और कानून की उसे गहरी जानकारी थी , इसके साथ ही ना जाने बड़े बड़े अफसर, विधायक और मंत्री के साथ उसकी जान पहचान थी। क्या उसे सब बताना ठीक रहेगा ?????

मेरे दिमाग में एक ही बात आई ,साला दोस्त भी है और वकील भी कही कमीनापण ना कर दे ,लेकिन मैंने उसका सीधा साधा और सबकी मदद करने और सबके दुःख में साथ देने वाला रूप भी देखा था मैंने हिम्मत की और फैसला किया की मैं उसे सब कुछ बताऊंगा और उसे काल किया ...

"क्या गुरु कैसे हो ,"

"आप कौन बोल रहे है "

"अबे मैं अरुण , "

"अबे साले तू जिंदा है , मैने सोचा था उस एक जवान बेटी की विधवा माँ के साथ शादी करने के बाद तू तो धर्मात्मा बन कर तूने संयास ले लिया होगा........ह्म्म्म ह्म्म्म

वैसे इतने दिनों बाद कॉल क्यों किया ,शादी के बाद तो भूल ही गया दोस्त को ...और बता भाभी कैसी है ,"मैं थोडा उदास सा हो गया ,

"ठीक है ,"

" तेरी ठीक है.... ठीक जैसी लग नही रही है साले "

" हा गुरु बात कुछ खास है ,क्या तू मुझे मिल सकता है ,यार थोड़ी परेशानी में चल रहा हु "

"क्यों क्या हुआ "

"फोन में नहीं आकर मिलता हु ,तू मुझे अपने वकालत कार्यालय का पता msg कर दे मैं कॉलेज के बाद शाम को मिलता हु "

"हा हा बिलकुल कभी भी आजा "

"अच्छा चल यार रखता हु ,बाय "

"ओके दोस्त बाय "..............

मेरे पापा रोज की तरह सुबह सुबह की waalk पर गये हुए थे। मानसिक तनाव दूर करने के लिए मैंने आज पापा की अलमारी से एक सिग्रेट ले ली। मैने सिगरेट जलाई और 2 कप चाय तैयार की। चाय बना कर मैने रिंकी को आवाज़ लगाई और बालकॉनी में जाकर चाय के साथ सिगरेट का आनंद लेने लगा।

चाय खत्म कर वापस लौटा तो रिंकी अब तक भी नहीं उठी थी। मैने रिंकी के कमरे का दरवाजा बजाया और रिंकी को उठने को बोल कर नहाने चला गया।

इधर रिंकी उठी उस पर सुबह सुबह जो कांड हुआ था उस की खुमारी अब भी थी। अपने पापा के बारे में सोच कर मुस्कुराई और फिर खराब हो चुकी जमीन पर पड़ी पैंटी को देखा. सबसे पहले उसने कपड़े बदले।

‘आज पापा के लिए कुछ सेक्सी पहनूँगी!’ सोच कर कपड़े चुने और पहन कर बाहर आई चाय पी और नाश्ता बनाने लगी।

कुछ ही देर में, मै नहाकर सिर्फ तौलिये में अपने रूम से निकला। गीले चड्डी बनियान हाथ मे थे जिन्हें बालकनी में सूखने डालने जा रहा था।

किचन में नाश्ता बना रही रिंकी पर जैसे ही मेरी नज़र पड़ी, मै ठिठक सा गया। रिंकी ने सफेद रंग की पारदर्शी ड्रेस पहनी थी जिसमें उसके चूचे साफ साफ नजर आ रहे थे।

50 प्रतिशत नंगी बेटी को देख कर सुबह का पूरा वाकिया मेरे जेहन में दौड़ गया। मै चुपचाप बालकनी में गया और कपड़े फैला कर वापस लौटा तो रिंकी की नज़र मुझ पर पड़ी।

“पापा, गुड मॉर्निंग!” चहकते हुए रिंकी मेरी तरफ बढ़ गयी। अपनी तरफ बढ़ती रिंकी मुझ को स्लो मोशन में दिख रही थी।

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जब रिंकी बिल्कुल करीब आ गयी तब मुझ को होश आया। “गुड़…गुड़ मॉर्निंग बेटा!” कहकर मैने रिंकी की तरफ हाथ फैलाये और सुबह की किस के लिए थोड़ा झुक गया।

रिंकी ने भी रोज़ की तरह अपने प्यारे पापा के गले मे बांहें डाली और पंजों पर उठ कर होंठों से होंठ मिला दिए। रोज़ाना का गाल पर किस का नियम था … लेकिन आज नियम टूट कर होंठों के किस का बन चुका था। आज रिंकी रोज़ की तरह आधे सेकंड में अलग नहीं हुई।

न ही मैने खुद को पीछे खींचा।

सुबह की यादों से निकलने की कोशिश करते करते मेरे हाथ जब रिंकी की कमर पर पड़े तो मै जैसे सब कुछ भूल ही गया। मै मूर्ति की तरह जम गया था।

उधर रिंकी अपने प्यारे पापा को आराम पहुंचाने के लिए ज्यादा करीब आ रही थी। उसने पापा के बालों में उंगलिया कसीं और अपने होंठ खोल दिये। रिंकी के होंठ खुलते ही मेरे होंठ भी अपने आप खुल गए।

यह गुड़ मॉर्निंग किस अपनी हदें पार कर चुकी थी।

अनजाने में ही मेरा लंड उठने लगा था। बेटी बाप के होंठ चूस रही थी। जल्दी ही मेरा लंड पूरे शवाब पर खड़ा था और रिंकी के पेट पर ठोकरें मार रहा था।

पापा का लौड़ा पेट पर महसूस करते ही बिटिया ने अपनी जीभ पापा के मुँह में सरकाई और आगे बढ़ कर अपने चूचे बाप की छाती से सटा दिए।

रिंकी के जीभ सरेंडर करते ही मैने उसे अपने कब्जे में लिया और पूरी तन्मयता से चूसने लगा। मेरी जीभ भी अब अपनी बेटी के पूरे दांत गिन रही थी।

जोश इतना बढ़ चुका था कि मैने रिंकी की कमर पर हाथ फिराते हुए उसके जिस्म को कस के अपने से चिपका लिया।

पेड़ू पर पापा के फौलादी लंड का दबाव महसूस करते हुए रिंकी उचकने लगी।

वो लंड का दबाव अपनी चूत पर महसूस करना चाहती थी।

बाप के गले से लटक के खुद को ऊपर खींचने की कोशिश करती रिंकी मेरे पैरों पर चढ़ गई और जितना हो सका लंड के करीब चूत लगाकर कमर हिलाने लगी।

मैने हाथ बढ़ा कर अपनी बेटी के चूतड़ों पर रखे और उस को गोद में उठा लिया। अब रिंकी मेरे लेवल पर थी।

पूरे जोश में पापा के होंठ चूसती हुई बेटी ने पैर पापा की कमर पर लपेट लिए और लंड पे चूत टिका कर कमर चलाने लगी।

मैने भी रिंकी के दोनों चूतड़ हथेलियों में भरे और उन्हें भींचते हुए अपनी बेटी के होंठ चूसते रहा। रिंकी की लय में लय मिला कर मैने भी कमर हिलाना चालू कर दिया था।

बाप बेटी आनंद की लहरों में ऐसा खोये कि उन्हें पता ही नहीं चला कि कब बाप की तौलिया खुल कर गिर गयी। बिटिया नंगे बाप से किसी बेल की भांति लिपटी थी।

बाप के नंगे चूतड़ों पर बेटी एड़ियों का फंदा बना कर खुद को लन्ड पर संभाले हुए थी।

हम दोनों की कमर का कोई हिस्सा नहीं बचा था जो एक दूसरे ने न सहलाया हो।

आंखें बंद कर के एक दूसरे के होंठो में ऐसे खोये थे दोनों जैसे चाहते हो समय यहीं रुक जाए।

“टिंग टिंग” दरवाजे की घंटी से हम बाप बेटी की काम तपस्या भंग हुई। हमें अपनी अपनी अवस्था का अहसास हुआ।

मैने झट से रिंकी को नीचे उतारा। ज़मीन पर पैर पड़ते ही रिंकी चार कदम पीछे हट गई।

हम बाप बेटी दोनों ही समझ नहीं पा रहे थे आखिर हमारे साथ ये हुआ क्या? रिंकी ज़मीन में नज़रें गड़ाए खड़ी थी, पापा की तरफ देखने की हिम्मत नहीं थी।

मै भी अपनी बेटी से नज़र मिलने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था। ‘ बहनचोद … ये क्या हो गया! अभी तो सब ठीक था, अचानक ये क्या हुआ? अब क्या बोलूं … क्या कहूँ? क्या करूँ?’

रिंकी की नज़र पापा की तौलिया पर पड़ी जो नीचे ज़मीन पर पड़ी थी। उसने कुछ ऊपर नज़र उठायी तो पाया कि पापा बिल्कुल नंगे खड़े है। उनका 8 इंच का लन्ड एकदम कड़क उसकी की तरफ मुह कर सावधान मुद्रा में सलामी दे रहा था।

मैने रिंकी की नज़रों का पीछा किया तो उछल पड़ा, झटपट तौलिया उठाया और अपने कमरे की तरफ भाग गया। 15-20 मिनट कोई हिम्मत नहीं जुटा पाया उस के सामने जाने की।

रिंकी ने तुरंत जाकर घर का दरवाजा खोला, अपने दादाजी को गुड मॉर्निंग बोल कर वापस किचिन में नाश्ता बनाने चली गई।

रिंकी के सेक्सी कपड़ो को देख कर उसके दादाजी से रहा नही गया और....उसके पास किचिन में जाकर बोले बेटा रिंकी ये कैसे बेहूदा कपड़े पहने हुए हैं, जाओ पहले ये कपड़े बदल कर कोई बदन ढके ऐसे पूरे कपड़े पहनकर आओ..... फिर आकर नाश्ता बनाना।

लेकिन दादाजी इन कपड़ो में क्या खराबी है, ये ही तो आजकल का style है, सब लड़किया ऐसे ही कपड़े तो पहनती है, वैसे भी मै घर में ही हू, इन कपड़ो में घर से बाहर तो नही जा रही ना। रिंकी अपने दादाजी से कुतर्क करते हुए बोली.....

रिंकी बेटा सभी लड़कियों के ऐसे छोटे कपड़ो से दिक्कत उन्हे होती है, जो उन लड़कियों को अपना मानते है, वरना दुनिया की हसरत तो लड़कियों को बिना कपड़ो के देखने की है। तुम मुझसे ज्यादा बहस मत करो....? मै तुम्हारे बाप का बाप हू.... तुम मेरी पोती हो, मैने जो कहा वो करो...... जाओ ड्रेस बदल कर आओ।

मै भी आनन फानन में नाश्ता कर जल्दी से अपने कॉलेज के लिए निकल गया... वैसे तो मैं सुबह घर से निकलते ही सारी बातें भूल जाता हूँ पर उस समय ऐसा नहीं हुआ … रिंकी के उन्नत उरोज … उनके बीच की मादक दरार … उसके भरे-भरे नितंब … उसके रसीले और तराशे हुये होंठ … उसकी कमनीय आँखे (जो तकरीबन सभी ईस्ट इंडियन लड़कियों की होती हैं) … मेरे जेहन में घूम रहे थे।

कॉलेज में आज सुबह से मेरा प्रोजेक्ट गाइड वाले काम में मन नहीं लग रहा था .. मैं रह-रह के अपनी घड़ी की तरफ़ देख रहा था। दोपहर में जब मैं लंच के बाद आकर कंप्यूटर लैब में बैठा तो मेरे सामने लगे पारदर्शी काँच में तीन लड़कियों की लैब में अंदर आती हुयी धुधली आक्रति नजर आ रही थी.......... परंतु तब तक भी मैंने यह नहीं सोचा था कि ये वही लड़कियाँ होंगी जिन्हें मैने कल कैन्टीन में देखा था।

वो इतना ज़्यादा सज सँवरकर, कमनीय बन के और हाई-हील के सैंडिल पहन के आईं थी ताकि उनके नितंब और उभरे हुए दिखें … शायद उन्हें यह एहसास हो गया था कि मैं उनके पुष्ट नितंबों को निहार रहा था.. क्योंकि उनका प्रोजेक्ट गाइड यानि मैं, एक जवान लड़का था।

बहरहाल वो तीनों मेरे पास आईं, हैण्ड-शेक किया, अपने लो कट टी-शर्ट्स में से अपना यौवन दिखा-दिखा कर अपना इन्ट्रोडक्शन दिया, कुछ प्रोजेक्ट की बातें की, कुछ मुझे पटाने के लिये अदायें फेकीं (ताकि उनका प्रोजेक्ट ज़ल्दी और आसानी से हो जाये) और “थैन्क् यू सर” बोल के … अपने सुगठित, उन्नत … गोल-गोल … लुभावने … पिछवाड़े मटकाते हुये कुर्सियों पर बैठ गईं।

पहली बार … जी हाँ पहली बार मुझे अपनी कॉलेज की छात्राओ ने इतना हिला कर रख दिया था।

"मर्द की कोई पसन्दीदा लड़की नही होती, वो सब लड़कियों को पसंद करता है.." तीनों एक से बढ़कर एक लग रही थीं पर मेरी नज़र तो उस बड़े उरोजों वाली … ‘शशि’ पर थी, जो उन तीनों में सबसे खूबसूरत भी थी। बहरहाल मैं यह दिखा रहा था कि मैं बहुत नॉर्मल हूँ और तीनों को बराबर ट्रीट कर रहा हूँ। मैं उनको कम्प्यूटर पर कोड लिखने को कहता और पीछे बैठकर उनके सुडौल अंगों को देखता। उफ़ क्या ग़ज़ब का सम्मोहन था … जो मुझे उन अंगो को छूकर देखने को उत्तेजित करता था।

जब वो मेरे बगल में बैठती और मैं की-बोर्ड में टाइप करता था तो कोहनी से जानबूझकर उनके उभारों को छूकर ’सॉरी’ बोल देता था … वो भी ’इट्स ओके’ कह देती थीं और उन्हें लगता था कि सर कितने शरीफ़ हैं। और आपको बता दूँ कि अच्छी और कुँवारी लड़कियाँ शरीफ़ और लल्लू से दिखने वाले लड़के पसंद करती हैं जिन्हें वो आसानी से अपने काबू में कर सकें।

पर उनको पता नहीं था कि मैं कितना बड़ा ठरकी हू। पर समस्या यह थी कि तीनों अच्छी दोस्त थीं और उनमें से किसी एक को अलग करके कुछ करना मुश्किल काम था। आखिर एक आइडिया मेरे खुरापाती दिमाग में आ ही गया। मैंने यह दिखाना शुरू किया कि मुझे स्मिता और नेहा में ज़्यादा रुचि है … उनसे हँस-हँस के बातें करता … कभी कंधे पे हाथ रख देता … कुछ पूछती तो काफ़ी देर तक समझाता … उनके बहुत करीब रहता और ऐसी हरकतें करता कि शशि को जलन हो गई।

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कुछ देर ये रूटीन दोहराता रहा … और शशि का रुपगौरव और आत्मसम्मान कुचला जाता रहा। आखिर मेरी स्कीम ने काम किया … उस शाम सेशन खत्म होने से पहले शशि ने मुझसे पूछा,”सर ! आप मुझे मेरे घर छोड़ देंगे क्या?”

मैंने कहा,”व्हाइ नॉट !”

मैंने उसको अपनी डिस्कवर् बाइक में लिफ़्ट दिया। रास्ते भर वो अपने बड़े-बड़े चूचे से मेरी पीठ खुजाती (छुलाती) रही। मेरे अंगों में सिहरन सी दौड़ जाती और मेरे लंड में इतनी ज़्यादा कठोरता आ जाती जिसको पैंट में सम्हालना मुश्किल हो जाता।

अब धीरे धीरे उसकी हरकतें बढ़ने लगीं … पहले बाइक में मेरे कमर को पकड़कर बैठी थी, लेकिन उसने अब उसने मेरी जांघो पर हाथ रख दिया … तभी अचानक से स्पीड ब्रेकर में उसका हाथ जांघ से फ़िसलकर मेरे पूरी तरह खड़े लंड पे पहुंच गया जिसको उसने, धोखे से या जानबूझकर पता नहीं, पर जोर से पकड़ लिया। बाद में उसने सॉरी बोला और मैंने कहा- कोई बात नहीं ! बात आई गई हो गई।

मै उसके बताये हुए पते पर पहुँच गया, उसके घर के दीवाल पर लगे बोर्ड पर जब मेरी नजर गयी तो मै आश्चर्य चकित हो गया.... " ज्ञान प्रकाश मिश्रा जी" वकालत कार्यालय... इन शब्दों को पढ़कर मैंने शशि से पूछा तुम ज्ञान प्रकाश मिश्रा की कौन लगती...??? वो बोली मेरे भैया है...!! सर आप जानते हो उनको...???

मैंने कहा हाँ.... वो मेरा अजीज दोस्त है, लेकिन घर में आना जाना कभी नही हुआ, इसलिए तुमसे पूछा....??

"मै मन ही मन सोचने लगा साले अरुण अजीज दोस्त की बहन भी बहन जैसी होती है, लेकिन अभी कॉलेज और बाइक पर जो हुआ उससे ऐसा लगता है कि तेरी किस्मत मे रिश्तों को कलंकित करने और माँ, बहन, बेटी को भोगने की जैसी नियति ही बन गयी है "

सर आप खड़े खड़े क्या सोच रहे हो...??? अंदर आइये ना भैया भी ऑफिस में ही है, उनसे भी मुलाकात हो जायेगी... शशि मुस्कुराते हुए बोली....! वैसे भी मुझे "ज्ञान प्रकाश" से अपनी पत्नी कुसुम के बदले रैविया, और ट्रांस्फर के बारे में ज्ञान चर्चा करनी थी इसलिए मै शशि के साथ अंदर आ गया।

शशि मुझे मेरे वकील दोस्त के ऑफिस के दरवाजे पर छोड़ कर घर के अंदर चली गई...मै अपने वकील दोस्त गुरु के ऑफिस में पंहुचा वहा कोई भी दिखाई नहीं दे रहा था , मैं केबिन के अंदर झाका गुरु मुझे अपने कुर्सी पर बैठा कुछ पढ़ता हुआ दिखाई दिया , मुझे देखते ही वो खड़ा हुआ और मेरे पास आकर मेरे गले से लग गया , मैं भी बड़ी ही आत्मीयता से उससे मिला , हम बैठे इधर उधर की बाते होने लगी फिर मैंने मुद्दे की बात करने की सोची मैंने गंभीरता से उसे सभी मामला बताया और वो बड़ी ही गंभीरता से उसे सुनने लगा,...मुझे आश्चर्य हुआ की उसे मेरी बातो से ज्यादा आश्चर्य नहीं हुआ वो बड़े ही आराम से मेरी बात सुन रहा था जैसे मैं उसका दोस्त नहीं कोई क्लाईंट हु...

"हम्म्म्म तो ऐसी बात है ,कोई बात नहीं भाई ,मैंने जब पहली बार तेरी शादी में कुसुम को देखा था तभी मुझे लगा की कुछ तो गड़बड़ है पर क्या है ये मुझे अब समझ आ रहा है ,"

मैं उसे आँखे फाडे देखने लगा ,क्या गड़बड़ है ..........?? ?

"पूरी बात तो मैं उससे मिल कर ही बता पाउँगा पर अभी जितना तुमने मुझे बताया , मुझे वो एक छिनार टाइप औरत लग रही है ,"

उस की बात सुनकर मेरा माथा घूम गया , "छिनार" मेरी बीवी .......????

"भाई तू क्या बोल रहा है , वो बहुत अच्छे और गरीब घर की बेटी है, पढ़ी लिखी भी है, जिम्मेदारियों और कठिनाइयों से भरा हुआ उसका जीवन रहा है यार ,,,,

"मैं लगभग रुवासु हो चूका था , ऐसा लग रहा था जैसे अभी जोर जोर से रो पडूंगा ""

पर मैंने अपने को सम्हाला , मुझे देखकर वो हसने लगा , मुझे लगा की वो साला मेरा मजाक उड़ा रहा है ?????

"नाम मेरा गुरु है लेकिन साले तेरी बीबी तो मुझसे बड़ी गुरु घंटाल है , हा हा हा

"उस के ये वचन मेरे दिल को झल्ली झल्ली और छलनी छलनी कर रहे थे ,मैं उसे मारना चाहता था ,मेरा ही दोस्त ,इतना बड़ा वकील होकर भी वो ऐसी बाते कर सकता है मुझे यकीं नहीं आ रहा था , मुझे अपने पर ही गुस्सा आया की मैं यहाँ क्यों आ गया , मैं वहा से उठकर जाने लगा , उसने मुझे रोका भी नहीं , मैं और भी गुस्से में आ चूका था।

मै अपनी बाइक पर बैठ कर गुस्से से बाइक की किक लगाने लगा, लेकिन वो भी मादरचोद स्टार्ट नही हो रही थी........ तभी उसने ने मेरी बाइक की चाबी बाइक में से खीच ली , मैं उसे ऐसा करते देखकर और भी गुस्से में आ चूका था,............

"चल तुझे कुछ और भी बताना है " गुरु के चहरे पर अब भी एक मुस्कुराहट थी ,मैंने अपना हाथ छुड़ाया ,

"मुझे कुछ नहीं जानना "

"सोच ले ,अबे चल सॉरी अब तो आजा ,यु ऑफिस के सामने क्यों तमाशा कर रहा है ,ये हम दोस्तों की आपस की बात है ,चल ना यार ,"

मैं सच मे कोई भी तमाशा नहीं करना चाहता था , मैं चुपचाप अंदर चला गया , फिर उसी केबिन में

"क्या हुआ ,जल्दी बता "

"भाई मुझे माफ़ कर दे की मैंने ये सब किया , पर ये जरुरी था , तेरे प्रश्न का उत्तर है ये , कि कुसुम क्यों छिनार हो गयी ,और क्यों कोई औरत इस तरह छिनार बन जाती है....???, कोई तीसरा अचानक से बीच में नही आता दोस्त.... वो पहले से ही होता है, बस तुम जैसे चूतिया उसे पहचान नही पाते हो। ह्म्म्म ह्म्म्म

"मुझे उसकी बाते कुछ भी समझ नहीं आ रही थी ,मैंने उसे बड़े ही आश्चर्य से देखा ,वो मुझे आराम से रहने और बैठने को कहा ,

"देख तुझे रोना आया पर तू मेरे सामने नहीं रो पाया ठीक ,"

"हा तो उससे क्या "

"बताता हु ,फिर तुझे मुझ पर गुस्सा आया पर तूने गुस्सा दबा लिया , और वो गुस्सा किस पर निकला तेरे बाइक की मासूम किक पर , है ना "

"हा तो "

मैं उसकी बातो को समझने का प्रयास कर रहा था ,

"तूने मुझ पर गुस्सा नहीं करके और अपने रोने और गुस्से को दबाकर गलती कर दी , दबा हुआ गुस्सा बाइक पर फूटा वहा नहीं फूटता तो कही और ही फूटता शायद और भी ज्यादा बढ़कर "

"तू कहना क्या चाह रहा है "

उसने ने एक गहरी साँस भरी।

थोड़ी देर चुप्पी छाई रही जिससे मुझे कुछ कुछ चीजे समझ आने लगी थी , उसने फिर से बोलना शुरू किया

" कुसुम के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ होगा ,वो बहुत ही अच्छे, गरीब और कुलीन घर की लड़की है ,और कम उम्र में शादी के एक महीने के बाद विधवा हो जाने पर उसे अपनी सेक्स की भावना को दबाना पड़ा होगा ।

इसमें कोई भी दो राय तो नहीं है , पर जब उसे मौका मिला होगा , तो उसने इसे या तो खुलकर एन्जॉय किया होगा , या फिर ग्लानी के भाव से भर गयी होगी , यार ये ग्लानी बहुत ही ख़राब चीज है जो इन्सान के भावनाओ को कुरूप कर देती है ,कुरूप होना कितना शांतिपूर्ण होता है, कोई भी मैसेज नही करता, कोई भी प्यार नही करता, कोई भी परवाह नहीं करता कि आप जिंदा हो या मर गये.... कोई भी घूरता नही, कुरूप भावनाओ से ग्रसित बस अकेले में ही खुश रहता है।

शायद उसके साथ भी ऐसा ही हुआ होगा........ अगर ऐसा हुआ होगा तो जो वो आज कर रही है वो, वो नहीं कर सकती थी इसके लिए उसने जरुर अपने आगनबॉडी केंद्र में किसी छिनार टाइप औरत से सलाह ली होगी जिसने उसे समझाया होगा की ग्लानी से बचो और जिंदगी में एन्जॉय करो ....

हो सकता है ऐसा कुछ भी नहीं हुआ हो और वो एक छिनार बीबी नहीं हो तो ,,,,,,,,???

हा ये भी हो सकता है तो बस एक ही चीज हुई होगी और वो ये है की वो जब सरकारी नौकरी करने के लिए दिमापुर गयी तो उसने पहली बार आजादी देखी, और उसे ये सब करने में मजा आने लगा वो अपनी जिंदगी खुलकर जीने लगी ,और अब भी वो ये सब बस मजे के लिए करती होगी ,"

मुझे ऐसे तो सब कुछ समझ आ रहा था पर ........

"यार लेकिन क्या सच मे वो मुझसे प्यार करती है या सिर्फ दिखावा "मेरी आँखे फिर से गीली हो गयी........ .. ???

"इतना तो पक्का है मेरे दोस्त की वो तुझसे बहुत ही ज्यादा प्यार करती है ,"

"तो भाई ये सब ,............अब मैं क्या करू "

गुरु भी थोड़ी देर तक चुप रहता है ....

"कुछ भी मत कर ,अभी तो उसे दिमापुर में ही रहने दे और उसका ट्रांसफर करा लेने से मामला नहीं बदलेगा बस शर्मा जी, संजय और अन्य कलिग की जगह कोई और आ जायेगा , अभी कम से कम कुसुम तेरी बातों, तेरे हाथो में और तेरे कंट्रोल मे तो है , इसी वजह से तो उसने अपनी फेस बुक, व्हाट्स अप, ईमेल और अन्य सोशल मीडिया अकाउंट का पासवर्ड तुझे बताया है।

और कोसिस यही करना की कभी भी कुसुम या किसी भी और को ये ना पता चले की तू ये सब जानता है , अगर कुसुम या किसी को भी ये पता चला कि तू उसकी निगरानी कर रहा है, और कुसुम ने तेरा साथ नही दिया तो तेरे लिए उसकी इज्जत जाती रहेगी फिर वो कभी भी तुझे और तू कभी भी उसे वो प्यार नहीं दे पाओगे जो वो अभी तुझसे करती है ....."

मैं जोरो से रोने लगा गुरु आकर मेरे कंधे पर अपना हाथ रखता है,

"तू फिकर मत कर मेरे दोस्त सब ठीक हो जाएगा ,मैं खुद दिमापुर जाकर उसके बारे में पता करूँगा "

"लेकिन यार तब तक मैं क्या करू ,कब तक उसे दिमापुर में रखूँगा और कब तक मैं उसे बचा पाउँगा वो फिर ,,,,,,,,और मैं कैसे ये सब सहूंगा "

साले कमीने गुरु के चहरे पर एक रहस्यमयी मुस्कान आ गयी जिसे देख मुझे फिर से गुस्सा आ गया , वो इसे समझ गया और

"भाई मेरे मुस्कान पर गुस्सा मत हो शांति से अपने घर जाओ।

मै रास्ते भर सोचता रहा कि मुझे और कुसुम हम दोनों के हिस्से में वफा के नाम पर शादी के सिर्फ सात फेरे आये है।

जारी है.....
 
बहुत बहुत आभार शुक्रिया.....

अरुण सर और कुसुम जी दोनो की कुंडली एक जैसी ही है, दोनों की जिंदगी में अपनी अपनी पहली शादी के बाद एंजॉय के नाम पर सूखा घोसित था। लेकिन जब से दूसरी शादी की है तब से दोनों ही जहाँ कदम रख रहे है दोनों के ही चाहने वाले बरस रहे है 😜

वकील साहब की आखिरी बात मै खुद कुसुम से मिलता हू, देखना ये है कि वो कही अपना झंडा ना फहराने लग जाए 😂😜

एक अच्छे review के लिए शुक्रिया इसी तरह साथ देती रहे।

Dhanyavaad.
 
दोस्त ये अकेले अरुण और कुसुम कि कहानी नही है, ये हर उस शक्स की कहानी है जो बुढापे के अकेलेपन से बचने के लिए जवानी के आखिरी dor मे शादी करने की सोचता है और ये नही देखता कि वो जिस महिला से शादी कर रहा है उसके भी नये जवान होते बच्चे है, फिर उन्ही बच्चो के चक्कर में अपनी खुशनुमा जिंदगी झंड कर लेता है।

Dhanyavaad साथ देते रहिये
 
आप सही कह रहे है, वैसे भी मानसिक रूप से मतिभ्रम की बीमारी से झुज रहा है, शायद जिसकी वजह उसके ज्ञान प्रकाश मिश्रा जैसे दोस्त की संगत है, हमारे प्रिय संजू सर जी भी confuse हो गए "" मिश्रा जी अधिवक्ता है या फिर अधिक वक्ता हैं 😂🤣

अरुण साहब उन चतुर व्यक्तियों में से है जो पर स्त्री गमन जैसे गलत काम करने के बाद, गलत की परिभाषा अपने अनुरूप किये गए गलत को गलत की श्रेणि से बाहर खीचने की कोशिस में लगे रहते है।

कहते है हर लड़के की शादी के बाद जिंदगी बदल जाती है, अरुण साहब की जिंदगी ही रंगीन हो गयी.... आप की बात से मै पूर्ण रूप से सहमत हु लेकिन बेचारे जिस लड़की महिला पर हाथ साफ करने की कोशिश में लग जाते है वो किसी ना किसी रिश्ते से इनकी रिश्तेदार बन जाती है।

बहुत बहुत शुक्रिया आप इसी तरह उत्साह बढ़ाते रहे।

धन्यवाद
 
मै रास्ते भर सोचता रहा कि मुझे और कुसुम हम दोनों के हिस्से में वफा के नाम पर शादी के सिर्फ सात फेरे आये है।

मेरे सवालो का जवाब तो सिर्फ कुसुम ही दे सकती थी..... मैं मिश्रा के पास गया तो था शांति के लिए और ले आया कई सवाल, हा जैसे मुझे किसी तांत्रिक बाबा से गुरु मन्त्र मिल गया था,आँखे बंद करो और देखो की क्या हो रहा है,अपने अंदर झाको वही हर सवाल का जवाब है.. मैंने तय किया कि मोबाइल व्हाट्स अप में बस देखूंगा जो चल रहा है, कुसुम को इसका आभास भी नहीं होने दूंगा।

खुद से सवाल जबाब करते हुए मै अपने घर पहुँच गया। बाइक साइड स्टैंड पर खड़ी कर घर में घुसने वाला ही था कि घर के अंदर से बाहर निकलते हुए पापा ने मुझसे पूछा.... अरुण बेटा आज इतनी देर कैसे लगा दी वापिस आने में....????

पापा मै अपने पुराने दोस्त ज्ञान प्रकाश के घर गया था.... बहुत दिनों से वो मिलने को बुला रहा था... मैने हँस कर पापा को जबाब दिया।

बेटा शादीशुदा आदमी का अर्थ है, कि अपनी आजादी को आधा और जिम्मेदारियों को दुगुना करना। बिना मेहनत के एक पली हुयी जवान बेटी के बाप बन कर तुम क्या सोच रहे हो.... तुम एक पूर्ण पिता का दर्जा पा चुके हो....??? तुम्हे अपनी बेटी के बदलते रंग ढंग नही दिख रहे है...??? तुम्हारी बेटी किस तरह के कपड़े पहनकर घर बाजार में आती जाती है... अगर उसे ठीक से सभाल नही पा रहे हो तो उसके हाथ पीले कर उसको विदा कर दो। इसलिए अगर दोस्ती यारी से फुर्सत मिल जाये तो अपने पिता होने के साथ साथ अपनी बेटी की जिम्मेदारियों पर ध्यान दें.... पापा मुझे ताना देकर बोले।

ऐसा क्या हो गया पापा....??? जो पापा इस तरह मुझे बेटी की जिम्मेदारियों पर ध्यान देने की बातें कर रहे है। मेरी कुसुम शास्त्र में डूबी हुई तंद्रा टूटी और मै वर्तमान के वास्तविक रूप में वापस आया.... कही सुबह सुबह जो मेरे और रिंकी के बीच बाप बेटी के रिश्ते की मर्यादा टूटने की कगार पर आ पहुची थी... उसका पता पापा को तो नही चल गया....????

नही नही उन्हें पता नही चला होगा.... लेकिन कब तक उनसे छिपा रहेगा, और जिस दिन उन्हे पता चलेगा तो फिर क्या होगा....???? नही अब मै ऐसा कोई काम नही करूँगा जिससे मुझे अपने पापा से नजरे मिलाने में भी शर्म आये.... कितना गर्व है उन्हे मुझ पर....!

मै ये सोचता हुआ घर के अंदर दाखिल हो गया। रिंकी बिटिया किचिन में खाना बना रही थी। मैंने ठान लिया कि अब जितना हो सके मै अपनी बेटी से दूरी बना कर रखूँगा। मै आज शाम खाना खाने भी नही गया।

'इंसान सोच कुछ भी ले, लेकिन होना वही है जो उसकी तकदीर में लिखा होता है।' रात के साढ़े नौ बज गये, उधर रिंकी ने एक थाली में खाना लिया और पापा के कमरे की तरफ चल दी। कमरे का दरवाजा खटखटाने के बाद वह अंदर आई तो देखा पापा की आँखे बंद थी।

खाने की थाली मेज पर रख रिंकी मेरे बगल में बैठी और पूछा- क्या हुआ पापा, आप बिना खाना खाये सो क्यों रहे हैं?

“मुझे माफ़ कर दो बेटा, आई एम सॉरी!” कहते हुए मेरी आवाज रुवासी हो गयी और आँखों में आँसू भर आये।

अपने बाप को इस तरह रोता देख रिंकी का दिल टूट गया। उसने मुझे गले लगाते हुए कहा- रोइये मत पापा, आपकी अकेले की गलती नहीं है। मेरी भी उतनी ही गलती है। सुबह सुबह जो हुआ वो अपराध नही था, आपके होंठो पर मेरे होंठ कोई अपवाद नही था। जबसे छुआ है आपके होंठो ने मेरे होंठो को तब से मेरे होंठो पर कोई स्वाद नही था।

अपनी साँसे संभालते हुए मै बोला- तुम मेरी बेटी हो, नादान हो, मासूम हो, छोटी हो, मुझे तो कंट्रोल करना चाहिए था। सब मेरी गलती है।

“नहीं पापा, मैं छोटी नहीं हूँ। 18 वसंत पार कर चुकी हूँ और सब समझती हूँ।” बाप को समझाते हुए बेटी बोली- मैं जानती हूँ कि मम्मी के यु आपको अकेला छोड़ कर नौकरी कर लेने के डिसीजन के बाद आप कितने अकेले हो गए हो, आप मम्मी को बहुत याद करते हो न! मैं ये भी जानती हूँ कि मैं दिखने में बिल्कुल मम्मी जैसी हू और आपको मम्मी की याद दिलाती हूँ। इसीलिए ये सब हुआ। इसमें किसी की कोई गलती नहीं है। गलती हमारे तन्हाई से झूझते वक़्त की है बस!

रिंकी के मुँह से ऐसी बातें सुन के मुझ को थोड़ा सब्र हुआ।

मेरे आंसू पोंछते हुए रिंकी उठी और बेड पर चढ़कर मेरी गोद में बैठ गयी। दोनों पैर मेरे दोनों तरफ निकाल कर मेरे तरफ मुँह कर के उसने मुझे अपने सीने से लगा लिया और बोली- आप रोया मत करो पापा, मैं आपको रोते हुए नहीं देख सकती। मम्मी के जाने के बाद आपने मेरा जैसा ख्याल रख रहे है। अब मैं भी आपका ख्याल रखूंगी। आपने मेरे लिए पापा की कमी पूरी की। अब मैं आपकी मम्मी की ..............…”

इतना कह कर रिंकी के शब्द थम गए।

मै भी पीछे हट कर रिंकी के मुँह की तरह देखने लगा।

“ये क्या कह रही हो बेटा, ये सही नहीं है।” तुम अपनी मम्मी की जगह नहीं ले सकती... मै उम्र में तुमसे बड़ा हू....!

“सही तो इस तरह घुट घुट के जीना भी नहीं है पापा!” रही बात उम्र में बड़े होने की तो आप ज्यादा प्यार कर लेना... मेरी उम्र कम है तो मै कम प्यार कर लूंगी। एक मासूम सी मुस्कुराहट देती हुई वो बोली।

“अरे … किसी को पता चला तो ज़माना क्या कहेगा?”

“आप अपने और मम्मी के बीच की बातें किसी को बताते हो ?”

“नहीं बेटा, क्यों?”

“जब आप नहीं बताओगे, मैं नहीं बताऊंगी तो ज़माने को क्या पता चलेगा पापा?”

मैंने रिंकी का चेहरा अपने हाथों में थाम लिया और कहा- सच में इतना प्यार करती है तू अपने पापा से?

“जितना मम्मी आपसे करती है उतना ही और वैसा ही!”

यह सुन कर मेरे चेहरे पर मुस्कान आ गयी और मैंने आगे बढ़ कर अपनी बेटी का माथा चूम लिया- "लेकिन मैं तुझे तेरी मम्मी के हिस्से का प्यार नही कर पाऊंगा बेटा"। हाँ ये भी सच है तू अपनी मम्मी से ज्यादा खूबसूरत और समझदार है बेटा!

"ओह!" वो थोड़ी निराश लगी, कम से कम मुझे तो ऐसा ही जान पड़ा. कहने के लिए और कुछ नही था, मगर वो अभी जाना नही चाहती थी. वो बेड के किनारे पर रखी कुर्सी पर बैठ गयी और टेबल पर से एक मॅगज़ीन उठाकर उसके पन्ने पलटने लगी. मैं रिंकी के प्यार से परोस कर लाई हुई खाने की थाली उठा कर हाथो में संभालने लगा, और वो चुपचाप मॅगज़ीन में खोई रही.

भले ही हम दोनों रिश्ते में एक दूसरे के बाप बेटी लगते थे लेकिन हम दोनों थे तो विपरीत सेक्स वाले. विपरीत सेक्स में आकर्षण हो जाना तो आम सी बात है. मगर यहां पर देखने वाली बात ये भी थी कि प्यार को अक्सर अंधा कहा जाता है. प्यार को दिखाई नहीं देता कि कौन सी राह ठीक है और कौन सी नहीं.

जिस तरह से एक साथ में आग और तेल साथ सुरक्षित नहीं रह सकते, इन दोनों के साथ रहने से दुर्घटना होने का खतरा हमेशा बना रहता है. मेरे और रिंकी के साथ भी ऐसा ही हो रहा था. दोनों के दिलों में एक दूसरे के लिए मोहब्बत की चिंगारी सुलग चुकी थी. दोनों के दिल में प्यार के दीये जल उठे थे.

इसी दौरान एक ऐसी घटना घट गयी कि बाकी जो थोड़ी बहुत कसर रह गयी थी हम दोनों के रिश्ते में वो भी फिर पूरी हो गयी.

मै अपनी बेटी के प्यार से सजा कर लाई गई खाने की थाली को मेज से उठा कर जमीन पर रख खा रहा था . रिंकी कुर्सी के ऊपर बैठी थी और मै नीचे बैठा हुआ था. उस वक्त रिंकी मैगजीन देखने में बिजी थी. इसी बेखयाली में उसकी स्कर्ट उठ गयी.

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उस लम्हा इत्तेफाक भी ऐसा था कि उसी वक्त मेरी नजर रिंकी की जांघों के बीच में ऊपर की ओर चली गयी. मेरी नजर सीधी अपनी बेटी की छोटी सी और प्यारी सी सफेद पैंटी में उभरी हुई चूत पर चली गयी.

ये देख कर मेरा दिल धक्क से रह गया. वाह … क्या खूबसूरत नजारा था मेरी आंखों के सामने. उसकी पैंटी में धुंधली सी चमक रही चूत के ऊपर मुलायम से झांट भी आ गये थे. उसकी चूत की अगल बगल में उसकी रेशमी झांटों ने अपना डेरा जमाया हुआ था.

रिंकी की चूत की दोनों फांकें आपस में चिपकी हुई थी. उसकी चूत की दोनों फांकें बिल्कुल ही बेदाग थीं. ये देख कर मेरे के दिल में तूफान सा उठने लगा. मै बहुत ज्यादा एक्साइटेड हो गया था. अब मै जान बूझ कर खाना खाने में ज्यादा से ज्यादा समय लगाने की कोशिश कर रहा था.

ज्यादा समय लेने का यही कारण था कि मै रिंकी के जनकलोक (धुधली सी चूत) का दर्शन इसी तरह से करता रहु. मुझको अपनी आंखों पर यकीन नहीं हो रहा था कि मेरी बेटी की जवानी से यौवन की खुशबू अब आसपास में फैलने लगी है. उसी यौवन का एक फूल, उसकी धुधली सी चूत, के दर्शन करके मैं अचम्भे में था.

मेरा 7 इंच लम्बा लंड मेरी बरमूडा में उछल-फांद कर रहा था. मेरा लंड पूरी तरह से अकड़ कर तन गया था. कुदरत ने भी ये दोनों चीज बहुत ही कमाल बनाई हैं. लंड और चूत ये दो ऐसे अंग हैं जो एक दूसरे की झलक पल भर भी पा लें तो तुरंत मचलने लगते हैं.

तभी रिंकी बोली- पापा सेव भाजी शायद अच्छी नही बनी इसलिए आप बेमन से जबरदस्ती धीरे धीरे खाना खा रहे है.....

इतना कह कर रिंकी ने अपनी स्कर्ट को नीचे करके अपने पैरों को मोड़ लिया. आज की इस घटना ने आग में घी का काम किया.

मै भी एक मर्द था. इस छोटी सी घटना ने मेरी सोच को एक दोराहे पर लाकर खड़ा कर दिया था. मुझको असमंजस और दुविधा ने ऐसा जकड़ लिया था कि मुझको कोई रास्ता दिखाई ही नहीं दे रहा था. समझ नहीं आ रहा था कि मै आखिर करू तो क्या करू.

कुछ देर बाद मैने उसे मॅगज़ीन वापस रखते सुना. "ठीक है, मैं चलती हूँ" वो खड़ी होकर बोली.

मैने अपनी नजरे उसके चेहरे की ओर घुमा ली और कहा, "मेरा खाना लगभग ख़तम हो चुका है बेटी, अगर तुम चाहो तो थोड़ी देर हम मोबाइल में फिल्म देख सकते हैं"

"नही, नही. पापा आप आराम करो" उसने जबाब दिया और मेरी तरफ आई. अब यह हिस्सा कुछ अर्थ लिए हुए था.

शायद मेरा ये कहना कि "मै उसकी मम्मी (कुसुम) के हिस्से का उससे प्यार नही कर पाऊंगा" ये जबाब पाकर वो थोड़ा निराश हो गयी थी, मगर जब वो मुझसे विदा लेने के समय चुंबन लेने आई तो मैने उसके हाव भाव में एक निस्चय देखा और इस बार मेरे मन में कोई संदेह नही था जैसे ज़ुबानी विदा की जगह वो चुंबन लेकर कोई बात जताना चाहती थी.

अंत मैं वो बोली, "मुझे सोना चाहिए पापा ! रात बहुत हो गयी है"

" ओके" मैने जबाब दिया और अपने सूखे होंठो पर जल्दी से जीभ फेरी. वो मेरी ओर नही देख रही थी जब मैने अपने होंठो पर जीभ फेरी. मैने फिर से चार पाँच वार ऐसे ही किया ताकि होंठ अच्छे से गीले हो जाएँ. मैं होंठो से लार नही टपकाना चाहता था मगर उन्हे इतना गीला कर लेना चाहता था कि वो उस गीलेपन को, मेरे रस को महसूस कर सके. उसके बाद मैने खुद को उसकी प्रतिक्रिया के लिए तैयार कर लिया.

मेरा दिल बड़े ज़ोरों से धड़कने लगा जब वो मेरे बेड की ओर आई. मैं थोड़ा सा आगे जो झुक गया ताकि उसको मेरे होंठों तक पहुँचने में आसानी हो सके. मैं खुद को संयत करने के लिए मुख से साँस लेने लगा जिसके फलसरूप मेरे होंठ कुछ सूख गये. मैने जल्दी जल्दी जीभ निकाल होंठो पर फेरी ताक़ि उन्हे फिर से गीला कर सकूँ बिल्कुल उसके चुंबन से पहले, मुझे नही मालूम उसने मुझे ऐसा करते देख लिया था या नही.

जब बेटी के होंठ मेरे होंठो से छुए तो मेरी आँख बंद हो गयी. मेरा चेहरा आवेश में जलते हुए लाल हो गया था. मुझे अपनी साँस रोकनी पड़ी, क्योंकि मैं नही चाहता था कि मेरी भारी हो चुकी साँस उसके चेहरे पर इतने ज़ोर से टकराए.

होंठो के गीले होने से चुंबन की सनसनाहट बढ़ गयी थी. यह वो रोज रात वाला आम सा, लगभग ना मालूम चलने वाला होंठो का स्पर्श नही था. आज मैं हमारे होंठो के स्पर्श को भली भाँति महसूस कर सकता था, और मुझे यकीन था उसने भी इसे महसूस किया था.

वो धीरे से 'गुडनाइट' फुसफुसाई और अपने रूम में जाने के लिए मूड गयी. उसकी ओर से कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया नज़र नही आई थी हालाँकि मुझे यकीन था वो अपने होंठो पर मेरा मुखरस लेकर गयी थी. कुछ भी ऐसा असाधारण नही था जिस पर मैं उंगली रख सकता. ऐसा लगता था जैसे हमारा वो चुंबन उसके लिए बाकी दिनो जैसा ही आम चुंबन था. कुछ भी फरक नही था. मैं उसे अलग बनाना चाहता था, और उम्मीद लगाए बैठा था कि उसका ध्यान उस अंतर की ओर जाएगा मगर नही ऐसा कुछ भी नही हुआ. अब निराश होने की बारी मेरी थी. जितना मैं पहले आवेशित था अब उतना ही हताश हो गया था.

मैने किसी सकरात्मक या नकारात्मक प्रतिक्रिया की आशा की थी. अपने बेड पे लेटा हुआ मैं उस रात बहुत थका हुआ, जज़्बाती तौर पर निराश और हताश था. मैं किसी नकारात्मक प्रतिक्रिया को आसानी से स्वीकार कर लेता मगर कोई भी प्रतिक्रिया ना मिलने की स्थिति के लिए मैं बिल्कुल भी तैयार नही था. उस रात जब मैं नींद के लिए बेड पर करवटें बदल रहा था, तो मेरा ध्यान अपने लंड पर गया जो मेरे जोश से थोड़ा अकड़ा हुया था इसके बावजूद कि बाद में मुझे निराशा हाथ लगी थी.

कहते है जब ब्याह हो जाता है तो पोर्न देखने की आदत खुद ब खुद छूट जाती है, यही हाल मेरा था। करवटे बदलते हुए जब मै थक गया और रिंकी के इस व्यवहार से निराश होकर मैंने अपनी बीबी कुसुम की ओर ध्यान दिया। मैंने अपने मोबाइल में उसका व्हाट्स अप खोल कर अपनी पत्नी कुसुम के मोबाइल मैसेज देखने लगा.... देखा तो कुछ msg आये थे .मैंने उसे खोला तो ये शर्मा जी के msg थे…

“ कुसुम जी आज आओ ना मेरे साथ लंच करने ”

“ कुसुम जी जवाब क्यो नही दे रही हो”

“क्या हुआ गुस्सा हो क्या”

“क्या हुआ”

“अगर मुझसे कुछ गलती हुई है तो मुझे माफ़ कर दो”

इतने msg तो कुसुम ने पढ़ लिए थे ,पर कोई भी रिप्लाई नही था, लेकिन एक और नंबर से कुछ msg आये थे नाम था

संजय…

ये साला अब भी लगा हुआ है लाइन में , अगर मैं उसे खोलता तो कुसुम को पता चल जाता इसलिए मैंने उसे नही छेड़ा बस जो आखिरी msg था वो दिखा रहा था,

कॉल मी डियर….

चलो एक बार कुसुम के पढ़ने के बाद मैं पढ़ लूंगा…..

”मेरे माथे पर पसीना था… मन ही मन कुसुम को कुछ कोसता उससे पहले ही कुसुम का वीडियो काल आ गया।

हैलो -- वीडियो काल पर मैं उदासीन ही रहा, लेकीन कुसुम से मेरे चहरे के भाव न छुप पाए,

'क्या हुआ जान ? ??

कुछ नहीं. .... मैंने आराम से जवाब दिया

कुछ खोये से लग रहे हो सब ठीक तो है ना उसने अपने आधे चेहरे पर छाई हुई बालो की छटा को समेटते हुए और अपनी लटो से खेलते हुए पूछ लिया......????

हा सब ठीक ही तो है, मैं एक शून्य में देखता हुआ जवाब दिया,

नहीं मैं आपको खूब समझती हु, आप कुछ तो छुपा रहे हो मुझसे, बताओ ना, 'उसने जोर दिया और अपने होंठो पर लगी डार्क सुर्ख लाल लिपिस्टिक दिखाते हुए अपना फ्लाइंग किस (उड़ता चुम्मन) छोड़ दिया,

तुम तो मुझे समझती हो पर क्या मैं तुम्हे समझता हु, 'मेरे मन का द्वन्द सामने आ रहा था, मैंने मन ही मन एक फैसला कर लिया,

अच्छा बताओ तुम रात में किस किस के साथ चैट करती हो, कल रात को तुम तीन बजे तक online थी....???? तो हमको 11 बजे गुड नाईट काहे बोला..????

'जैसा मैंने सोचा था उसके विपरीत वो चोंकी नहीं वो हसने लगी जैसे मैंने कोई मजाक कर दिया हो,

क्या तुम भी, कुछ भी, बोलते हो online थी, रात 12 बजे तक अपनी सासु से बातें कर रही थी, जानते हो वो बहुत अकेली और दुखी रहती है, और मुझे भी तो आपके बिना नींद नहीं आती, न रात में जल्दी, इसलिए घंटे दो घंटे ऑफिस के कुछ दोस्तों से गपशप कर रही थी।

कुसुम के बोलने का अंदाज ही ऐसा था की मेरे चहरे में एक मुस्कान उभर आयी, मुझे भी इस चीज का अहसास था की मेरा शक हमारे बीच के संबंधों पर भी असर डाल रहा है और मैं ऐसा होने नही देना चाहता था…

“अच्छा बताओ कौन से दोस्त है... क्या मै उनके बारे में जान सकता हूँ …”

“छोड़ो आप थके हुए लग रहे हो ,..”

“अरे बता भी दो ..”

“जब मूड अच्छा होगा तो बताऊंगी, वैसे भी मेरी किसी भी बात का कोई असर होना ही नही तो क्या फ़ायदा..”

“अरे यार तुम भी ..”

वो हँसी ........ और अपना मोबाइल चूमते हुयी बोली, “ मेरे सारे सोशल मीडिया के id पासवर्ड तो आप जानते ही हो ना , अब खुद ही पता कर लेना ..”

'मैं बिलकुल स्तब्ध था की ये औरत इतनी चालाक और शातिर कैसे हो सकती है की चहरे पे जरा भी शिकन नहीं आया.........मैं गुस्से में मानो फुट पड़ा,

रात के 2-3 बजे तुम गैर मर्दो से बातें करती हो, मेरे बिना नींद नहीं आती इसका क्या मतलब है, अगर किसी को ये बात पता चली तो जानती हो लोग क्या सोचेंगे, पागल हो तुम, इतना समझ नहीं है तुममे, और दिन भर तो ऑफिस में उनके साथ रहती हो न फिर तुम्हे रात में भी उनसे हमदर्दी जतानी है...'

मैंने कभी कुसुम से इतने ऊचे आवाज में बात नही की थी, मेरा चहरा तप रहा था, और कुसुम की आँखे भी पनिया गयी, आज पहली बार मुझे उसके चहरे में आसू देख दुख भी हो रहा था, कुसुम ने अपने भरे नयन से मुझे देखा, भगवान इतना प्यारा भी किसी को न बनाये, डबडबाई आँखों पर से कुछ बूंद चहरे पर गिरे थे, अनायाश ही वो हुआ जिसका मुझे डर था मेरी आंखों में भी थोड़ा पानी आया मुझे खुद में आश्चर्य था। कि मैं ये क्यो कर रहा हु, लेकिन मैंने अपने आप को सख्त बनाये रखा, केवल बाहर से.. कुसुम को इतना तो समझ आ गया था की मैं उससे ज्यादा देर तक गुस्सा नहीं रह पाउँगा, वो सिसकिया लेती हुई और वो मेरी आंखों को ध्यान से देखने लगी ,

मैं कभी ऐसा फिर नहीं करुँगी जान माफ़ कर दो अब कभी रात में किसी से कोई भी बात नही करूँगी। 'मेरे दिल में एक उमंग जगी थी... , मै... मै हो गयी थी। आपसे शादी से पहले जैसी मै कुसुम थी... जानते हो मैं कभी इतनी खुस नही थी जितना की अपने मुझे शादी के बाद बना दिया, मैं एक स्वकच्छन्द हँसी हँसने वाली जिसमे कोई राग द्वेष नही बिल्कुल निर्मल और अंतर्मुखी लड़की थी जिसे अपने इतनी आजादी दी की मैं अपने आप को एक्सप्लोर कर सकू,आप ने मुझे इतना बदला है, आपने ही सिखाया की शादीशुदा लड़की ऑफिस में wifi की तरह होती है, सिग्नल सबको मिलते है लेकिन हाथ में किसी के नही आती....... ! !

कितने अजीब चीज है ना की जो ताकत मेरे पास हमेशा से थी उसे मैं ही नही जानती थी ,अपने ही बतलाया की मैं कितनी सुंदर हु , और चाहूं तो क्या कर सकती हु, मैं अपने ऑफिस में बस एक क्लर्क हू लेकिन ऑफिस में आज बॉस से लेकर चपरासी तक मेरे इशारे पर नाचने से नही हिचकिचाते... आपने मुझे वो आजादी दी है जिसकी कल्पना हर लड़की अपने पति से करती है,और सबसे बड़ी बात इतना प्यार दिया है,आई लव यू जान, मैं आपके बिना अधूरी ही रहूंगी,और आपके सिवा किसी पर दिल आ जाए ये हो नही सकता,और बात जिस्मानी रिस्तो की है तो आज तक आपके सिवा किसी की नही हो पाई और ना ही हो सकती हू ,

लेकीन मैंने एक गलती कर दी मैं कभी ऐसा फिर नहीं करुँगी जान माफ़ कर दो अब कभी रात में किसी से कोई भी बात नही करूँगी।

तो कसम खाओ मेरी.......!

'हा मैं कसम खाती हु,'

ये मेरी बहुत बड़ी गलती बनने वाली थी जिसका मुझे उस वक्त अंदाजा भी नहीं था,

मैंने प्यार से उसकी पनियाई आँखों में देखा मानो सब ठीक हो गया हो पर मैं भूल गया था की कुछ ठीक नहीं हुआ है, मैं अपनी मोबाइल की स्क्रीन पर उसकी पनियाई आँखों में देखते हुए अपनी प्यार की दुनिया में खो गया...पर........ "ये सोचना गलत है कि तुम पर नजर नहीं, मसरूफ मै बहुत हूं मगर बेखबर नहीं. ..?????

जारी है.......
 
बहुत बहुत शुक्रिया..... ठेहरे हुए पानी में कंकड़ ना मार, मन में हलचल सी मच जायेगी.....

कहानी का tahraav जल्द ही रफ्तार पकड़ने वाला है, अरुण जी के रिंश्तो के ताने बाने उलझ नही सुलझ रहे है, बेटी के मन की बात सामने आ गयी, बीबी की मन की बात भी खुल गई जैसा उसने कहा था कि "" मै... मै बन गयी थी....! " Bahut hee जल्द और भी राजफ़ाश हो जायेंगे। आप इसी तरह साथ देते रहिये।

धन्यवाद
 
बहुत बहुत आभार शुक्रिया

अरुण का बार बार निर्णय बदलने की वजह रिंकी के मुह से कहा गया शब्द " पापा " है, वो रिंकी को देख कर exited होता है और दिल ही दिल उसे सिर्फ हसी लड़की के रूप में भी पसंद भी करता है, और उसे प्यार भी करना चाहता है लेकिन " पापा " शब्द कान में पड़ते ही अरुण को ये सब पाप लगने लगता है। रिंकी और अरुण के मिलन का एक ही हल है कि वो खामोश रह कर ही अपने पापा का प्यार पा सकती है।

आज के दौर में अधिकांश शादीशुदा कपल के बीच झगड़ो की वजह मोबाइल फोन में लगाए गये लॉक या पासवर्ड है, चूंकि अरुण और कुसुम दोनों ही दूसरी शादी में है, और mature है तो इस झगड़े की वजह को पहले से खतम करने की नियत से पासवर्ड share किये थे।

हालांकि अरुण को अभी तक कुसुम जी के चैट मैसेज में कोई aapatijanak मैसेज नही मिला है, लेकिन रात भर दूसरे मर्दो से बात करना वाकई बर्दाश्त के बाहर है। लेकिन वो भी मजबूर है क्या करे दूसरी शादी में है, तलाक़ लेता है तो उस पर ही लांचन लगेगा कि उसमे ही खोट है। दो बार तलाक़ का दर्द बहुत जानलेवा होता है ... समाज के ताने दोस्त यारों के गंदे कॉमेंट अरुण को सब से अलग कर अकेला कर देंगे सिवाय घुट घुट कर जीना ही उसकी नियति बन जायेगी वो रोज मरने की दुआ मांगेगा लेकिन मौत नही आयेगी और अरुण खुद भी लंगोट का ढीला है।

उसके पापा ने जो update के शुरु में कहा था उस पर अरुण की तरह आपने पाठिका महोदया जी.. ध्यान नही दिया.... वो बातों ही बातों में बहुत बड़ी बात कह गये थे कि जवान pali हुई लड़की के बिना मेहनत के बाप बनने से पिता का फर्ज पूरा नही होता। ये बात का सार अगले update में आपको पढ़ने को मिलेगा।

इसी तरह साथ निभाते हुए शब्दों से आशीर्वाद देते रहिये.....

धन्यवाद
 
आपके इन शब्दों को पढ़कर मुझे मानो ऐसा लग रहा है, जैसे साक्षात कहानी का अरुण मेरे सामने खड़े होकर ये कह रहा है..... वाकई एक अनुभवी रीडर के शब्दों से मुझ जैसे नये लेखक को बहुत कुछ सीखने को मिल रहा है, कमाल की डाइलोग डिलिवरी लिखी है आपने.... मुझे अब समझ आ गया है बहुत कुछ सीखना बांकी है...... 🙏✍️👌

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नही जी लेखक के तौर पर कहानी के पात्रों को बराबर जगह दी गई है, किसी भी पात्र का कोई महिमा मंडन जबरदस्ती नहीं किया जायेगा..... जिसका जैसा रोल है उसी तरह ही आगे लिखने का प्रयास कर रहा हूँ..... Infact लेखक तो आप जैसे सभी रीडर का शुक्र गुजार है जो अपने शब्द रूपी आशीर्वाद से आगे और भी बेहतर लिखने के लिए प्रेरित कर रहे है।

बहुत बहुत आभार धन्यवाद शुक्रिया 🙏
 
"" घनश्याम तेरी मुरली पागल कर देती है, घनश्याम तेरी मुरली घायल कर देती है "" इस भजन में जिस भक्ति में भक्त झूम कर नाच रहा है, वही हु ब हू मेरी मनोशथिति हो रही है, आपके शब्दों को पढ़कर 😍 मै खुशी से झूम रहा हूँ, नाच रहा हूँ..... और गा रहा हूँ....

संजू भैया की प्रति... क्रिया पागल कर देती है,

संजू भैया की प्रति... क्रिया घायल कर देती है,

संजू भैया की प्रति... क्रिया कायल कर देती है,

इसी तरह अपने नौ सिखिया लेखक को ख़ुशी में नचाते रहिये.....

धन्यवाद
 
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