अंकित स्कूल के लिए जा चुका था,,,, लेकिन अपने पीछे अपनी मां को पूरी तरह से मदहोश कर चुका था अंकित नहीं जानता था कि उसने कौन सा केला खाया है उसे तो एहसास तक नहीं था कि उसे केले को उसकी मां ने किस उपयोग में लिया था वह पूरी तरह से अनजान था,,,,, वह तो उस केले को सामान्य केला समझ कर ही जल्दी-जल्दी छीलकर खा गया था,,,। लेकिन वह केला सामान्य बिल्कुल भी नहीं था,, क्योंकि उसके लिए नहीं एक बेहद खूबसूरत औरत की गुलाबी छेद की गुलाबी सुरंग के अंदरूनी भाग तक चक्कर लगा लिया था और एक खूबसूरत औरत के गुलाबी छेद की परिक्रमा कर लेने के बाद वह केला बिल्कुल असामान्य हो चुका था खास करके ऐसे लड़कों के लिए जो जवानी की दहलीज पर अभी-अभी कदम रखे हैं।
अगर कोई ऐसा व्यक्ति उसकेले के बारे में जनता की उसकेले को सुगंध जैसी खूबसूरत औरत अपनी बुर में डालकर अपनी जवानी की प्यास बुझाई है तो शायद उसके लिए को लेकर पहले उसके छिलके को छिलका नहीं बल्कि सुगंधा की खूबसूरत बुर के मदन रस का स्वाद लेने के लिए,,, केले को पूरी तरह से जीभ से चाटता उसके मदन रस का खारा सवाद लेता,,, और जी भर कर उसका स्वाद लेता उसके बाद कहीं जाकर उसकेले को खाता,,,, और शायद इस बात को अगर अंकित जानता तो वह भी यही करता लेकिन वह जानता नहीं था इसलिए बेझिझक उस केले को छीलकर खा गया था,,, हालांकि उस केले को खाते हुए सुगंधा ने देख ली थी लेकिन जब उसकी नजर पड़ी तब तक उसका बेटा आधे से ज्यादा केला खा चुका था,, उसे रोकने का बिल्कुल भी फायदा नहीं था और क्या कह कर रुकते की यह केला मत था लेकिन क्यों मत खा यह बता सकने कि उसमें बिल्कुल भी हिम्मत नहीं थी,,,।
अंकित के स्कूल जाते ही,,, सुगंधा सोच में पड़ गई थी क्योंकि वह कभी सोचा नहीं थी कि अपनी ही बुरे में डाला हुआ केला वह अपने बेटे को खिला देगी,,, लेकिन वह जानबूझकर तो मिला ही नहीं थी उसका बेटा खुद ही अपने हाथ से लेकर खा गया था लेकिन फिर भी इस बात का अफसोस सुगंधा को हो रहा था,, लेकिन इस बात को लेकर उसके बदन में अजीब सी हलचल भी थी,,,। वह मदहोश हो रही थी,, क्योंकि उसके लिए भी यह पल बेहद अद्भुत और अतुलनीय था क्योंकि इस बारे में उसने कभी सोची भी नहीं थी,,, वह इस बात को सोच सोच कर हैरान थी कि वह केला पूरी तरह से उसकी बुर की गहराई नाप चुका था पूरी तरह से उसके मदन रस में डूबा हुआ था,,,, सुगंधा उसे केले को फेंक देना चाहती थी लेकिन उसे टेबल पर रखकर भूल गई थी उसे नहीं मालूम था कि उसका बेटा उसके कमरे में आ जाएगा और उसके लिए को खा जाएगा वरना वह सुबह ही उसे कूड़ेदान में फेंक देती,,,,।
सुगंधा इस बारे में सोच रही थी तभी उसे कह रहा है कि उसका बेटा इस बात को बोला था कि केला बहुत चिपचिपा है,, केले को धोई नहीं हो क्या,,,, इस बारे में सोचकर उसकी सांसे ऊपर नीचे होने लगी क्योंकि वह जिसके लिए कोई चिपचिपा बोल रहा था उसकी चिपचिपाहट उसके मदन रस की वजह से थी,,, वह हैरान इस बात से थी कि उसका बेटा उसकी बुर से निकले हुए मदन रस को अपने हाथों से स्पर्श किया था भले ही अनजाने मे हीं,,, यह सोचकर उसके बदन में सिहरन सी दौड़ने लगी,,,, उसकी दोनों टांगों के बीच कंपन महसूस होने लगा लेकिन उसका भी स्कूल जाने का समय हो चुका था इसलिए वह भी जल्दी-जल्दी तैयार होकर स्कूल चली गई,,,।
स्कूल में रिसेश के समय सुगंध और नूपुर लंच बॉक्स खोलकर खाना खा रहे थे,,,, पहले की अपेक्षा नूपुर के चेहरे पर प्रसन्नता के भाव कुछ ज्यादा ही नजर आ रहे थे वह तरो ताजा और खीली हुई नजर आ रही थी,,, उसके चेहरे की ताजगी के कारण को सुगंधा अच्छी तरह से जानती थी,,,, दोनों के बीच खाना खाते समय सामान्य रूप से चुपकी छाई हुई थी,, लेकिन इस चुपकी को तोड़ते हुए नूपुर बोली,,,।
अंकित बडा ही प्यारा बच्चा है,, तुम्हें मालूम है वह मेरे घर आया था,,,।
हां मुझे बता रहा था राहुल के साथ क्रिकेट खेलने गया था,,,।
हां सही कह रही हो बहुत ही जल्दी दोनों के बीच गहरी दोस्ती हो गई दोनों ऐसे साथ-साथ बातें कर रहे थे ऐसा लग रहा था कि जैसे दोनों के बीच पहले से ही गहरी दोस्ती हो,,,।
मुझे भी अच्छा लगा नूपुर कि मेरा बेटा तुम्हारे बेटे के साथ दोस्ती कर रहा है उसकी संगत में रहेगा तो कुछ अच्छा ही सीखेगा,,,,(सुगंधा जानबूझकर उसकी संगत में अच्छा सीखने वाली बात कर रही थी क्योंकि सुगंधा अच्छी तरह से जानती अच्छी नूपुर और उसके बेटे के बीच किस तरह था रिश्ता बना हुआ है और सुगंधा भी यही चाहती थी कि जिस तरह से नूपुर और उसके बेटे के बीच रिश्ता बना हुआ है इस तरह का रिश्ता उसके और उसके बेटे के बीच भी बन जाए। ,)
हां जरूर क्यों नहीं मेरा बेटा भी बहुत समझदार है,,, वक्त से पहले ही समझदारी और जिम्मेदारी के चलते बड़ा हो गया है,,,,।
(नूपुर की बात सुनकर सुगंध अपने मन में ही बोली राहुल बड़ा नहीं हुआ है बल्कि उसका लंड बड़ा हो गया है,,, तभी तो तेरी प्यास बुझा रहा है,,, इस बात को सुगंधा नूपुर से खुले शब्दों में बोल देना चाहती थी लेकिन ऐसा कहने की उसकी हिम्मत नहीं हुई लेकिन उसकी बात सुनकर खाना खाते हुए बोली।)
अक्सर घर का बड़ा लड़का जिम्मेदार हो ही जाता है अपने परिवार की हालत को देखकर,,, तुम्हारी परेशानियों को देखकर राहुल सही समय पर बड़ा हो गया,,,,।
(सुगंधा की बात सुनकर नूपुर प्रसन्न हो रही थी लेकिन वह समझ नहीं पा रही थी की सुगंधा दूसरे शब्दों में उससे बात कर रही थी,,,,, अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए सुगंधा बोली,,,)
पता नहीं कब अंकीत बड़ा होगा,,,,
हो जाएगा,,, सुगंधा,,, बच्चे संगत में ही सीखते हैं,,,
यह तो तुम सच कह रही हो नुपुर इसीलिए तो मैंने अंकीत को तुम्हारे बेटे के साथ दोस्ती बढ़ाने के लिए बोली हुं,,,,।
वह भी सब सीख जाएगा समझदार है तुम्हारा बेटा,,,,(पानी पीते हुए नूपुर बोली,,,, थोड़ी ही देर में दोनों खाना खाकर लंच बॉक्स रख लिए,,,,, नूपुर आगे आगे चल रही थी सुगंध पीछे-पीछे आगे चल रही नूपुर की मटकती हुई गांड देखकर सुगंधा अपने मन में सोचने लगी,,, वाकई में नूपुर पूरी तरह से चोदने लायक है,,,
बड़ी-बड़ी गांड बड़ी-बड़ी चूची एक मर्द को और क्या चाहिए यही देखकर या यह कह लो यह सब दिखाकर नूपुर अपने बेटे को पूरी तरह से अपनी जवानी के जाल में फंसा ली और फिर उसके साथ जवानी का सुख भोग रही है,,, लेकिन यह सब तो उसके पास भी है उससे बेहतर है फिर भी अंकित अभी तक राहुल नहीं बन पाया यह ऐसा भी हो सकता है कि खुद वही अभी तक नूपुर नहीं बन पाई,,,,,,,, उसके मन में तो आ रहा था कि इसी समय वह नूपुर से पूछ ले कि वह कैसे अपने बेटे को चोदने के लिए मनाई ताकि वह भी अपने बेटे को इस तरकीब से बना सके,,, लेकिन ऐसा पूछने की उसमें बिल्कुल भी हिम्मत नहीं थी,,,,।)
दूसरी तरफ कॉलेज से छूटने के बाद,,, तृप्ति संदीप के साथ चहल कदमी करते हुए चल रही थी,,, अभी कल ही वह संदीप के साथ चुंबन का अद्भुत रोमांच का अनुभव कर चुकी थी,,,,, इसलिए संदीप से आंख मिलाने में उसे शर्म महसूस हो रही थी,,, लेकिन संदीप मन ही मन बहुत खुश हो रहा था क्योंकि उसकी हरकत का तृप्ति ने बिल्कुल भी विरोध नहीं की थी बल्कि आनंद ने रही थी अपनी मंजिल तक पहुंचने की यह उसकी पहली सीढ़ी थी और उसकी मंजिल थी तृप्ति की दोनों टांगों के बीच पहुंचना,,, और कल हुई हरकत को देखकर वह समझ गया था कि बहुत ही जल्द तुम्हें तृप्ति की दोनों टांगों के बीच पहुंच जाएगा,,, दोनों टहलते टहलते बगीचे के पास आ गए तो संदीप बोला,,,।
चलो बगीचे में चलते हैं,,,
नहीं नहीं बगीचे में मैं नहीं जाऊंगी,,,
क्यों क्या हुआ कल तो तुम खुद बगीचे में लेकर गई थी,,,
हमें जानती हूं कल मैं तुम्हें खुद बगीचे में लेकर गई थी लेकिन देखे थे ना क्या हुआ था वह आवारा लड़के किस तरह से बातें कर रहे थे,,,
किस तरह से बातें कर रहे थे हम लोग तो उनके वहां आने से पहले ही उठकर जाने लगे थे,,,
हां तो जाते हुए ही उनमें से एक लड़का क्या बोला था कुछ याद है,,,(तृप्ति संदीप को याद दिलाते हुए बोल रही थी)
कहां,,, मुझे तो नहीं आते कि उनमें से किसी ने कुछ कहा था,,,
अरे पागल हो गए हो क्या उनमें से एक लड़के ने क्या बोला था नहीं मालूम,,,
तृप्ति सच में मुझे नहीं मालूम तुम ही बता दो,,,
नहीं मैं नहीं बता सकती मुझे शर्म आती है,,,,(शरमाते हुए तृप्ति बोली)
इसमें शर्माने जैसी कौन सी बात है अब मुझसे कैसी शर्म,,,
फिर भी,,, मुझे तो सोच कर ही शर्म आ रही है,,,(तृप्ति के चेहरे पर शर्म की लालिमा साफ नजर आ रही थी लेकिन वह कल वाली बात को बताना चाहती थी,,, लेकिन शर्म के मारे उसका बुरा हाल था,,,)
तब जाने दो नहीं बताना है तो चलो आगे चलते हैं,,,,।
(संदीप बहुत चला था वह जानता था कि कल उन आवारा लड़कों में किसी एक ने गंदे शब्दों का प्रयोग किया था और वह जानता था कि वह लड़के ने क्या-क्या बोला था लेकिन वह जानबूझकर अनजान बन रहा था और तृप्ति के मुंह से सुनना चाहता था,,, इसलिए वह चला कि दिखाकर आगे बढ़ने के लिए बोल रहा था,,, संदीप की बात सुनकर तृप्ति बोली,,,)
तुम तो सच में बहुत भुलक्कड़ हो,,,।
तृप्ति में माफी चाहता हूं मैं सच में भूल गया लेकिन तुम हो की बता भी नहीं रही हो,,,
बताना तो चाहती हूं लेकिन शर्म के मारे मेरा बुरा हाल है,,,।
क्या तृप्ति कल के बाद से तुम अभी भी मुझसे शर्म कर रही हो,,, कल याद है ना कितना गरमा-गरम चुम्मा लिया था तुम्हारा,,,।
(इस बात से तृप्ति एकदम से शर्मा गई,,,,,,, धीरे-धीरे बाद दोनों बड़े से पेड़ के नीचे पहुंच गए थे जहां पर कोई नहीं था इधर-उधर देखने के बाद तृप्ति बोली,,,)
कल उसे आवारा लड़कों में एक नहीं क्या कहा था,,,
अरे वही तो मैं भी पूछ रहा हूं,,,,
कैसे कहूं,,, अच्छा कह देती हूं,,,, जब हम वहां से उठकर जाने लगे तभी उनमें से एक लड़का बोला लगता है ,,चुद,,,,,चुद,,,,चुदवाने आई थी,,,(एकदम से हकलाहट और घबराहट भरे स्वर में बोली,,, पहली बार इस तरह के शब्द बोलकर उसके बदन में सिहरन सी दौड़ने लगी थी,,, और वह शर्म के मारे अपनी नजरों को नीचे झुका ली थी तृप्ति के मुंह से चुदवाने वाले शब्द सुनकर संदीप का लंड हरकत में आ गया था,,,।)
अच्छा यह बात तो इसमें गलत ही किया था आज नहीं तो कल हम दोनों जाने ही वाले हैं,,,।
(संदीप की आवाज सुनकर तृप्ति एकदम से गुस्से में उसे आंख दिखाने लगी तो घबराने का नाटक करते हुए संदीप बोला)
सॉरी मैं तो मजाक कर रहा था,,, चलो कहीं घूमने चलते हैं,,,(संदीप एकदम से बात बदलते हुए बोला)
कहां चले,,,, अभी तो मेरे पास समय नहीं है घर जाना है,,,,
अरे आज की बात नहीं कर रहा हूं तीन दिन बाद अपने मैडम का जन्मदिन है और उन्होंने हम सबको बुलाया ही है।
लेकिन मेरी मम्मी नहीं जाने देगी,,,
अरे उन्हें समझा देना ना,,,, कह देना मैडम का जन्मदिन है सबको बुलाई है उनकी क्लास के जितने बच्चे हैं सबको,,,
ठीक है,,, लेकिन चलेंगे कैसे,,,?
मैं हूं ना तुम बिल्कुल भी फिकर मत करना,,,
ठीक है,,,,(और इतना कहने के साथ ही दोनों मुस्कुराते हुए अपने-अपने रास्ते चल दिए)