Incest मेरी बीवियां, परिवार..…और बहुत लोग… - Page 7 - SexBaba
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Incest मेरी बीवियां, परिवार..…और बहुत लोग…

33rd Update (सेक्सी मालिश और प्यार सास बहु के बीच)



दीपू: मत पुछा.. बहुत मजा आया. अब दीपू को भी अच्छा लगने लगता है और उसका मन भी अब हल्का हो जाता है जो इतने दिनों से भारी था. अब वो अपने पुराने रूप में आ गया था... और वो सोचता है की वो कल ही निशा से बात करेगा और सब कुछ ठीक कर देगा…. अब उसके मन में कोई उलझन या दुविधा नहीं थी….



अब आगे..



अगली सुबह दीपू उठता है तो देखता है की दिव्या पूरी नंगी उसे पकड़ कर मस्त गहरी नींद में सो रही है. उसको देख कर दीपू को बड़ा प्यार आता है और फिर प्यार से उसका माथा चूम कर बाथरूम चला जाता है. आज उसका मन बहुत हल्का और अच्छा लग रहा था क्यूंकि पिछली रात दिव्या ने उसको चूस चूस कर हल्का कर दिया था. नाहा धो कर फ्रेश होने के बाद वो निशा के कमरे में जाता है तो देखता है की निशा भी गहरी नींद में है. उसे रात भी ठीक से नींद नहीं आयी थी तो वो काफी देर बाद रात में सोई थी. वो निशा को उस हालत में देख कर कमरे से बाहर आ जाता है और किचन में जाता है जहाँ वसु सब के लिए चाय बना रही थी.

वो वसु के पीछे जाकर उसे पीछे से अपनी बाहों में लेता है और कहता है चाय से पहले उसे थोड़ा मीठा चाहिए. वसु उसकी बात का मतलब समझ जाती है और पीछे मुड़ते हुए उसको देख कर कहती है... आज मेरा बेटा मुझे पुराने रूप में दिख रहा है और दीपू को बाहों में लेकर रोती है. दीपू भी बात को समझते हुए वसु को जोर से पकड़ कर उसे दिलासा देता है और कहता है की वो सब ठीक कर देगा. वसु को इस हालत में देख कर उसने जो बात १ Min पहले कहा था.... वो भूल जाता है और उसके आंसूं पोछता है. वसु भी फिर अपने आंसूं पॉच कर कहती है... क्यों मीठा नहीं चाहिए क्या?

दीपू मना कर देता है क्यूंकि इस हालत को अच्छे से समझता है. इतने में वहां कविता भी आ जाती है और वो भी वसु को गले लग कर रोती है. दीपू दोनों को अपनी बाहों में लेता है और उसकी आँखों में भी आंसू आ जाते है. फिर थोड़ी देर बाद वसु अपने आप को संभालती है क्यूंकि वो अब इस घर की सबसे बड़ी थी और उसे ही अब घर को संभालना था. फिर सब चाय पी कर बातें करते है.

थोड़ी देर बाद दीपू फिर से निशा के कमरे में जाता है तो वो तभी फ्रेश होकर बाथरूम से बाहर आती है और दीपू को देख कर वो दौड़ कर उसके गले लग जाती है और ज़ोर ज़ोर से रोने लगती है. आज काफी दिनों बाद दोनों मिले थे और निशा अपने आप को रोक नहीं पाती और दीपू की बाहों में रोती रहती है.

दीपू: चुप हो जा निशा.... मुझे पता है हो हुआ वो अच्छा नहीं हुआ. लेकिन अब हम कुछ नहीं कर सकते.

निशा की रोने की आवाज़ सुन कर बाकी लोग भी कमरे में आ जाते है और दोनों को देख कर उनकी आँखें भी भर आती है.

निशा: ये सब कैसे हुआ भाई? मैंने कभी नहीं सोचा था की ऐसा कुछ होगा. इस दुनिया में मैं सिर्फ २ लोगों से ही प्यार करती हूँ और भगवान् ने मुझसे एक को छीन लिया है और रोते रहती है.

दीपू: चुप हो जा. मैं हूँ ना.... सब ठीक कर दूंगा. अगर तू ही ऐसे रहेगी तो आंटी और माँ कैसे ठीक से रह पाएगी.

अब आंटी को तुझे ही संभालना है. दिनेश तेरा पति था तो वो आंटी का बेटा भी था. सोच उनके ऊपर क्या गुज़र रही होगी. इन सब बातों में वहां का वातावरण और भी दुःखमयी हो जाता है.

दीपू फिर निशा को अलग कर के उसे बिस्तर पे बिठा देता है. निशा अपनी आँखें साफ़ करते हुए दीपू से पूछती है की सब कैसे हुए. दीपू को लगता है की उसे सब बता देना चाहिए और उस एक्सीडेंट के बारे में थोड़ा उसे और सब को बता देता है.

दीपू की बातें सुनकर किसी को कुछ कहने की हिम्मत नहीं होती. फिर दीपू ही बात शुरू करता है.

दीपू: सुन निशा जैसे माँ ने बताया है अब आंटी भी रोज़ ऑफिस आएगी और मेरा साथ देगी. दिनेश भी यही चाहता था की हम अपने कंपनी को और आगे बढाए जो मैं उसे पूरा करने वाला हूँ. हो सके तो तुम भी कभी कभी आ जाना. तेरे लिए भी अच्छा रहेगा. और दीपू ये बात बोलते हुए वो ऋतू की तरफ देखता है. वो कुछ नहीं कहती तो वसु उसकी तरफ से हाँ कह देती है.

फिर निशा भी अपने आप को संभालती है और क्या करना है उसके बारे में सोचती रहती है. उस दिन और कुछ नहीं होता और सब अपने काम में बिजी हो जाते है.

दो दिन बाद ऋतू वसु से कहती है

ऋतू: वसु अब हम अपने घर चले जाएंगे. यहाँ अब बहुत दिन से रह रहे है. जैसे दीपू ने कहा अब जो हो गया उसे तो बदला नहीं जा सकता लेकिन ज़िन्दगी भी रुक नहीं सकती.

ऋतू के इस बात पे वसु कुछ नहीं कह पाती और कहती है की १- २ दिन और रुक जाए उनके घर. लेकिन ऋतू कहती है की २ दिन बाद तो जाना ही होगा तो आज ही क्यों नहीं. ऋतू फिर निशा को भी बता देती है तो वो भी तैयार हो जाती है. वसु दीपू को भी ये बात बताती है तो १- २ घंटे बाद सब लोग उनको छोडने उनके घर जाते है. ऋतू के घर के अंदर जाते है ऋतू और निशा को दिनेश की फिर याद आती है क्यूंकि आज वो अपने घर काफी दिनों बाद आये थे) तो फिर से उनकी आँखें नम हो जाती है. इस बार कविता ऋतू को संभालती है तो दिव्या निशा को. फिर एक घंटे बाद दीपू और बाकी लोग वहां से निकल जाते है और रह जाते है ऋतू और निशा अपने घर में....

कुछ दिन ऐसे ही बीत जाते है और अब धीरे धीरे सब नार्मल होने लगता है. जहाँ दीपू वसु और बाकी लोग भी थोड़ा सामान्य हो जाते है वहीँ ऋतू और निशा अभी भी दिनेश की याद में ही रहते है. उनके जाने के बाद ऋतू निशा से कहती है की वो भी उसके साथ ही सो जाए लेकिन निशा थोड़ा शर्माती है और कहती है की कुछ दिन उसे समय दे. जब वो भी थोड़ा नार्मल हो जायेगी तो वो खुद उनके कमरे में सोने आएगी. दोनों ऋतू और निशा अपने अपने कमरे में रोज़ रात को सोते है लेकिन एक दुसरे के जाने बिना दोनों अपनी गर्मी में तड़पते रहते है. जहाँ निशा दिनेश को याद करके अपनी चूत मसलते हुए अपनी गर्मी निकालने की कोशिश करती है वहीँ ऋतू भी अपनी बरसों से दबी हुई प्यास को रोक नहीं पाती और वो भी अपनी चूत मसलते हुए सोचती है की काश वो अभी इस वक़्त एक मर्द की बाहों में हो...

वहीँ दीपू के घर में भी अब नार्मल हो जाता है और दीपू भी अब रोज़ रात को मजे करता है और लेता भी है. वसु कविता और दिव्या भी अब रोज़ उसके लंड पे झूलते रहते है लेकिन रह जाती है तो मीना और एक तरह से लता भी. उसे (मीना ) भी अब यहाँ आये हुए काफी दिन हो गए थे लेकिन यहाँ के हालत ही ऐसे थे की उसके मन में भी सेक्स की भावना नहीं आयी थी. लेकिन जब ऋतू और निशा वापस चले गए और सब नार्मल हो गया और घर के बाकी लोग भी मजे कर रहे है तो अब फिर से मीना के मन में भी अब वो भावनाएं जागने लगी थी लेकिन वो अपनी माँ कविता से कहने से शर्माती थी भले ही सब को पता था की मीना वहां क्यों है. पिछले दिनों में घर का माहौल ही ऐसा था की किसी की उस पर ज़्यादा नज़र भी नहीं गयी थी और ये नार्मल से बात थी जिसे मीना भी समझती थी.

वही हाल लता का भी था. वो तो पिछली बार दिव्या और दीपू को देखी थी मजे करते हुए. और अब तो रोज़ उनको सुबह देख कर थोड़ी सी जलन भी होती थी उसको क्यूंकि दीपू की तीनो पत्नियों के चेहरे पर एक अलग ही चमक नज़र आती थी क्यूंकि दीपू तो उन्हें बहुत खुश रखता था. लता ने सोचा की एक बार वो इस बारे में वसु से बात करेगी...

एक दिन रात को निशा को प्यास लगती है तो वो देखती है की उसके कमरे में उस दिन पानी नहीं रखा था तो वो पानी पीने किचन में जाती है. पानी पीकर जब वो अपने कमरे में जा रही थी तो वो ऋतू के कमरे में जाकर उनको एक बार देख कर अपने कमरे में वापिस जाने की सोचती है और यही सोच के साथ वो ऋतू के कमरे की तरफ चली जाती है. ऋतू को इस बात का कभी एसएस नहीं था की निशा उसके कमरे के तरफ कभी आएगी.... इसीलिए उसने कमरे का दरवाज़ा सिर्फ बंद किया था लेकिन अंदर से उसने कुंडली नहीं लगाई थी.

निशा जब वो दरवाज़े के पास आकर उसको थोड़ा खोलने की कोशिश करती है तो दरवाज़ा खुल जाता है और अंदर नाईट लैंप की रौशनी में कमरे में थोड़ी रौशनी थी और निशा अंदर का नज़ारा देख कर मन में सोचती है “हम दोनों की हालत एक जैसे ही है... दोनों एक ही कश्ती में सवार कर रहे है....” क्यूंकि ऋतू अपनी आँखें बंद किये हुए अपनी Nighty को कमर तक उठाये अपनी पैंटी के ऊपर से अपनी चूत मसल रही थी और बड़बड़ाये जा रही थी.

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निशा वो नज़ारा देख कर चुपके से बहार आकर दरवाज़ा बंद कर देती है लेकिन वो नज़ारा देख कर वो भी बहक जाती है और बगल में कड़ी होकर वो भी अपनी चूत मसलते रहती है. थोड़ी देर में जब उसको थोड़ा होश आता है तो वो अपने आप को ठीक कर के मन में ही हस्ती है लेकिन फिर उसे एक बात का ख्याल आता है की वो तो दिनेश की बारे में सोच कर गरमा जाती है और अपनी चूत मसलते रहती है.... लेकिन माजी का क्या... किसके बारे में वो सोच रही है....

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कुछ दिन बाद जैसे दीपू ने कहा था ऋतू भी अब ऑफिस जाना शुरू कर दिया था. ऋतू को ऑफिस में देख कर दीपू को भी बहुत अच्छा लगा. क्यूंकि ऋतू काफी दिनों बाद ऑफिस आयी थी तो दीपू उसे अपने ऑफिस में जो कुछ भी हुआ था (जो दिनेश और दीपू ने इन पिछले महीनो में काम किया था) वो ऋतू को बताता है.

ऋतू: बहुत अच्छा दीपू. तुम दोनों ने बहुत अच्छा काम किया है.

दीपू: हाँ आंटी... जैसा मैंने और दिनेश ने सोचा था वैसे ही और आगे काम होगा और अपना बिज़नेस बढ़ेगा. ऋतू ये बात सुनकर खुश हो जाती है और अपना काम करने लगती है.



कुछ दिन बाद:



कुछ दिन बाद निशा अपने घर को सफाई के चलते झाड़ू पोछा करती है और किचन में अपना काम करती रहती है.

उस वक़्त ऋतू ऑफिस से हर आती है और निशा को बुलाती है... निशा बेटी...वो इतना ही बोल पाती है की उसके पैर फिसल जाते है और ज़मीन पे धड़ाम से गिर जाती है. वो इसलिए की ज़मीन अभी भी थोड़ी गीली थी निशा के पोछने से जिसका ऋतू को पता नहीं था. ज़ोर की आवाज़ की वजह से निशा दौड़ते हुए बाहर आती है तो उसे थोड़ी घबराहट होती है क्यूंकि ऋतू नीचे फर्श पे पड़ी हुई थी और उसे बहुत तकलीफ हो रही थी.

निशा: माँ क्या हुआ? मुझे पता नहीं था की आप आ रही हो... अभी मैंने घर पोछा था और फर्श थोड़ी गीली थी. ऋतू को अब भी थोड़ा दर्द हो रहा था तो निशा आकर उसे उठाती है और सोफे पे बिठा देती है. ऋतू के गिरने से उसकी कमर और पेट की जगह पर दर्द हो रहा था.

ऋतू अपने आप को संभालती है और फिर निशा उसे पानी देती है. ऋतू को थोड़ा आराम मिलता पर ज़्यादा नहीं. वो थोड़ी मुश्किल में रहती है लेकिन निशा को बताती नहीं. फिर निशा अपना काम करती है और रात को दोनों खाना खाने के बाद दोनों अपने कमरे में सोने चले जाते है. (क्यूंकि ऋतू ने निशा को नहीं बताया था निशा को पता नहीं लगा की ऋतू को अब भी कमर और पेट में दर्द कम नहीं हुआ है). जब ऋतू को दर्द कम नहीं होता तो वो निशा को अपने कमरे में बुलाती है. निशा भी थोड़ी परेशानी में आकर पूछती है की क्या हुआ है?

ऋतू: बेटा मैंने तुम्हे बताया नहीं लेकिन मुझे कमर और पेट में अब भी दर्द कर रहा है शाम को गिरने से.

निशा: माँ आपने पहले क्यों नहीं बताया? हम डॉक्टर के पास हो आते.

ऋतू: मुझे लगा था की दर्द कम हो जाएगा. इसीलिए तुम्हे बताया नहीं और डॉक्टर के पास नहीं गए. बेटा थोड़ा Jhandu बाम लगा दे... शायद थोड़ा आराम मिल जाए.

निशा: क्यों नहीं माँ... अगर आप पहले बता देते तो मैं आपको पहले ही बाम लगा देती.

निशा फिर थोड़ी मुश्किल से अपना हाथ निशा की कमर और पेट पे ले जाकर बाम लगाती है. कुछ देर उसे ठीक लगता है लेकिन फिर से ऋतू को थोड़ा दर्द महसूस होता है और वो निशा से कहती है की एक और बार फिर से बाम लगा दे.

निशा: माँ जी आप बुरा ना माने तो फिर से बाम लगाने से अच्छा है की मैं आपकी कमर को एक बार मालिश कर दूँ. मालिश करने से आपको थोड़ा आराम भी मिल जाएगा और आज रात मैं आपके पास ही सोती हूँ.

ऋतू को समझ नहीं आता की वो निशा को क्या जवाब दे. निशा नहीं मानती और कहती है की वो ऋतू की कमर की मालिश करेगी.

ऋतू: वो तो ठीक है बेटा लेकिन मालिश कैसे करोगी?

निशा: आप अपना मैक्सी उतार दे... मैं थोड़ा तेल हलकी सी गरम करके लाती हूँ और फिर तेल से अच्छी मालिश करती हूँ.. ऋतू मना करती है लेकिन निशा मानती नहीं तो आखिर में ऋतू कहती है: बेटा वो तो ठीक है लेकिन मैंने मैक्सी के अंदर कुछ नहीं पहना है.

निशा: धीरे से उसके कान में: तो क्या हुआ माँ जी... आपके पास जो है... ऐसा बोल कर निशा रुक जाती है.

ऋतू: लेकिन बेटा मुझे थोड़ी शर्म आती है.

निशा: मैं समझ सकती हूँ माँ जी. लेकिन अब इस घर में हु दोनों के सिवा और कोई नहीं है तो फिर आपको मुझसे क्या शर्माना? अगर आपको फिर भी शर्म आती है तो मैं आपको एक टॉवल दे देती हूँ. आप उसे ओढ़ लीजिये.

तब तक मैं तेल भी ले आती हूँ और निशा किचन में चली जाती है तेल लाने के लिए. उसके जाते ही ऋतू भी अपनी मैक्सी उतार देती है और वो आगे जाकर अपने आपको आईने में एक बार देख कर हस देती है की उस बदन इस उम्र में भी एकदम गदराया हुआ है. काले लम्बे बाल जो उसकी कमर तक आते थे.. उसकी चूचियां अभी भी एकदम ठोस थी और उनमें अभी भी कोई लचक नहीं थी. उसका पेट एकदम सपाट था जिसमें कोई चर्बी नहीं थी. एकदम गहरी और कामुक नाभि और उसकी टांगों के बीच एकदम पतली से लकीर के माफिक एकदम बंद चूत जो बहुत दिनों से चुदी या खुली नहीं थी.

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वो फिर एक बार पीछे मुड कर देखती है तो पाती है की उसकी गांड भी एकदम मस्त उठी हुई है. फिर वो हस्ते हुए बिस्तर पे लेट जाती है और अपना टॉवल कमर पे धक् लेती है. वो ऊपर से नंगी ही थी लेकिन अपनी गांड और पैरों को टॉवल से ओढ़ ली थी. वो अभी भी थोड़ी असहामन्जस में थी लेकिन उसका दर्द बी ही कम नहीं हुआ था तो वो वैसे ही लेट कर निशा का इंतज़ार करती है.

निशा फिर थोड़ी देर बाद एक कटोरे में तेल लेकर आती है लेकिन वो कमरे में आने से पहले वो भी अपने कपडे बदल लेती है और वो भी एक मैक्सी पहन कर आती है और वो भी ऋतू की तरह अंदर और कुछ नहीं पहना था.



तेल मालिश



कमरे में आते ही निशा ऋतू को देखती है तो उसके चेहरे पे हलकी सी हसी आ जाती है.

ऋतू: आ गयी बेटा?

निशा: हाँ माँ तेल लेकर आयी हूँ. आपकी अच्छे से मालिश कर दूँगी तो आपका दर्द भी दूर हो जाएगा.

ऋतू: मैं भी यही चाहती हूँ बेटा की ये दर्द जल्दी चला जाए. मुझे सोने में भी मुश्किल हो रही है.

निशा: आप चिंता मत करिये. आपको जल्दी ही आराम मिलेगा. निशा फिर ऋतू के पीछे आती है और अपने दोनों पैर अलग कर के ऋतू के जाँघों के बीच आकर थोड़ा तेल को अपने हाथ में मलती है और थोड़ा तेल को ऋतू के कमर पे डालती है.

निशा: यहीं ना माँ?

ऋतू: हाँ बीटा... वहां से थोड़ा नीचे तक.

निशा: ठीक है.

और निशा धीरे धीरे ऋतू की कमर पे हाथ फेरते हुए मलती है. जब निशा ऐसा कर रही थी तो ऋतू को बड़ा सुकून मिल रहा था और वो अपने मुँह से हलकी सी सिसकारी भी लेती है.

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निशा धीरे धीरे मालिश करती रहती है और इसमें ऋतू को भी अब थोड़ा आराम मिल रहा था. निशा अपने हाथ को और थोड़ा नीचे ले जाती है मालिश करते वक़्त तो उसे टॉवल बीच में आ जाता है और ठीक से वो ऋतू की कमर को मल नहीं पाती.

निशा कुछ सोचती है और कहती है: माँ थोड़ा नीचे मालिश करना है तो ये टॉवल बीच में आ रहा है. इसे निकाल दूँ क्या?

ऋतू को जब ये मालिश थोड़ा अच्छा लग रहा था तो वो निशा की बात सुनकर अपना सर उठा कर कहती है.

ऋतू: बेटा अगर तू इसे निकल देगी तो कैसे... इतना बोल कर रुक जाती है जैसे कहना चाहती हो की वो पूरी नंगी हो जायेगी.

लेकिन ऋतू को थोड़ा डर था की अगर निशा उसे पूरी नंगी कर देगी तो उसे उसकी चूत भी दिख जायेगी जो की निशा की मालिश की वजह से वो भी थोड़ी उत्तेजित हो गयी थी और अनजाने में ही उसकी चूत ने थोड़ा पानी बहाना शुरू कर दिया था. बात ये तो ही बहुत सालों बाद किसीने ऋतू को इस तरह छुआ था और वो भी थोड़ी कामुक तरीके से.

निशा समझ जाती है और झुक कर उसके कान में कहती है: यहाँ हम दोनों के अलावा और कोई नहीं है. मैं तो आपकी बेटी की तरह ही हूँ. मुझसे क्या शर्माना. और वैसे भी जब मैं आपकी कमर मालिश कर रही हूँ तो इसी तरह से आपके पैर भी मालिश कर देती हूँ. ऋतू इस बात से कुछ नहीं कह पाती और हाँ कह देती है क्यूंकि वो भी थोड़ी थकी हुई थी और पैरों की मालिश की बात सुनकर वो हाँ कह देती है.

ऋतू के हाँ कहने के साथ ही निशा उसका टॉवल निकल कर वो ऋतू को पूरा नंगा कर देती है और उसकी उठी हुई गांड को देख कर मन में सोचती है: क्या मस्त गांड है...वो फिर से तेल लेकर इस बार और अच्छे से मालिश करती है और वो अब कमर से लेकर गांड से होते हुए पैरों की भी मालिश करने लगती है. ऋतू को पहले थोड़ा अलग लगा लेकिन अब उसे भी अब मजा आने लगा क्यूंकि उसे भी अब बहुत सुकून मिल रहा था.

निशा ऐसे ही मालिश करते हुए उसकी जाँघों को भी मालिश करती है और ऐसा करने के साथ ही उसका हाथ उसके चूत के बहुत करीब पहुँच जाता है.

उसका हाथ वहां आते ही ऋतू भी एक सिसकारी लेती है और भले ही वो हलकी थी लेकिन कमरे के सुनसान माहौल में वो आवाज़ निशा को भी सुनाई देती है.

निशा: कैसे लग रहा है माँ?

ऋतू: बहुत अच्छा लग रहा है बेटा. मुझे नहीं पता था की तू इतनी अच्छी मालिश भी करती है. इस बात पे निशा कुछ नहीं कहती और निशा मालिश करते हुए वो ऋतू की गांड को भी अच्छे से मालिश करती है.

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वहां करते वक़्त उसे वहां का भूरा सिकुड़ा हुआ छेड़ दीखता है जो थोड़ा बंद और खुल रहा था जो इस बात का प्रमाण था की ऋतू को भी अपनी गांड पे मालिश अच्छी लग रही है और साथ ही ऋतू भी धीमी गति से आंहें भर रही थी.

जब वो ऋतू की जाँघों पे अपना हाथ रख कर मालिश करती है तो उसके हाथ में कुछ चिपचिपा लगता है. ये और कुछ नहीं बल्कि ऋतू की चूत का पानी था जिसे निशा बहुत अच्छे से पहचान गयी क्यूंकि वो भी ऐसे पानी से बहुत वाकिफ थी लेकिन कुछ नहीं बोली. वो फिर से इस बार ऋतू का पूरा पीछे का बदन को अच्छे से मालिश करती है... कन्धों से लेकर पैर तक. जब वो कन्धों और गले के पीछे मालिश करती है तो ऋतू कहती है... तूने तो सच में मुझे बहुत आराम दिया है बेटी. ऐसे ही मालिश थोड़ी और कर दो. मुझे भी बड़ा सुकून मिलेगा.

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निशा: आप चिंता मत कीजिये माँ... आज के बाद आप मुझे रोज़ मालिश करने को बोलोगी और हस देती है. इस बात पे ऋतू भी हस देती है.

10 -15 Min तक ऐसे ही मालिश करती है और इस बीच निशा भी अपनी मैक्सी उतार देती है और वो भी नंगी ही ऋतू की मालिश करती है. क्यूंकि ऋतू का चेहरा दूसरी तरफ था वो देख नहीं पाती की निशा भी पूरी नंगी हो गयी है.

निशा: माँ जी अब पलट जाईये. आपके पेट पे भी अच्छे से मालिश कर देती हूँ. आपको और अच्छा लगेगा.

ऋतू ये बात सुनकर कहती है... इसकी ज़रुरत नहीं है बेटा. कमर तक ही ठीक है.

निशा: ऐसे कैसे माँ जी? मुझे पता है जब आप गिरी थी तो आपको कमर और पेट में दर्द हो रहा था. मैं आपकी पेट भी मालिश कर देती हूँ तो आपको अच्छा लगेगा. ऋतू कुछ नहीं कह पाती तो निशा उसके बदन से उठ कर थोड़ा अलग हो जाती है जिससे ऋतू को पलटने में आसानी हो जाती है.

जब वो पलट कर निशा को देखती है तो उसे बहुत आश्चर्य होता है की निशा भी उसकी तरह नंगी है.

ऋतू: बेटा तुमने कपडे क्यों निकल दिए?

निशा: अगर मैं कपड़ों में रह कर मालिश करती तो मेरे कपडे भी तेल की वजह से खराब हो जाते. आप चिंता मत करिये. आपका दर्द अब जल्दी ही निकल जाएगा.

ऋतू फिर निशा के सामने पलट कर पीठ के बल लेट गयी तो उसकी आँखों में एकदम शर्म थी जिसकी वजह से वो अपनी आँखें नीचे कर लेती है क्यूंकि दोनों को पता था की ऋतू की मस्त ठोस चूचियां उसके उत्तेजित होने से एकदम तन गए है और उसके गहरे भूरे रंग के चूचक बेहद कड़क और लुभावने लग रहे थे जैसे कह रहे हो को कोई इसको मुँह में लेकर अच्छे से चूसो और काटो..

निशा ये बात समझ जाती है लेकिन कुछ नहीं करती. निशा फिर तेल लेकर उसकी मस्त गहरी नाभी पे डालती है मालिश करने के लिए और जैसे ही निशा ऐसे करती है ऋतू अपने आप को रोक नहीं पाती और ज़ोर से सिसकी लेती है.

निशा: अनजान बनते हुए भले ही उसको पता था... क्या हुआ माँ?

ऋतू: कुछ नहीं बेटा... और शर्म से चुप हो जाती है.

निशा फिर ऋतू के पेट और नाभि को अच्छे से मालिश करते हुए ऊपर आती है उसकी चूची की तरफ. ऋतू निशा की तरफ देखती है तो निशा अपना हाथ उसके चूची के ऊपर से ले जाकर गले और कंधे और गले पे मालिश करती है जिसकी उम्मीद ऋतू को नहीं थी. ऋतू को लगा था की निशा उसकी चूचियां मालिश करेगी. निशा के ऐसे मालिश करने से अब ऋतू को भी बहुत अच्छा लग रहा था.

वहां पे अच्छे से मालिश करने के बाद निशा फिर से अपने हाथ में तेल दाल कर इस बार उसकी चुहियों की तरफ बढ़ती है तो ऋतू को पता चल जाता है तो वो अपने हाथ को निशा के हाथ पे रख कर मना करने की कोशिश करती है लेकिन वो भी धीरे से. जैसे वो एक दिखावा हो. निशा समझ जाती है और वो ऋतू का हाथ हटा कर अपने हाथ को ऊपर लेकर उसकी चूची पे तेल डाल के अच्छे से मसलती है. अब ऋतू से भी रहा नहीं जाता तो वो अपने हाथ को निशा के हाथ के ऊपर रख कर खुद ही ज़ोर से उसकी चूची दबा देती है.



मालिश बदल गया प्यार में…



ऋतू: हाँ बेटा अच्छे से मसलो. बहुत सालों बाद किसीने इसे छुआ है. निशा एक हाथ से उसकी एक चूची को दबाती और मसलती है तो वो अपने दुसरे हाथ को नीचे ले जा कर उसकी चूत को छूती है जो रस से बह रहा था और वो रस निशा के उँगलियों पे लग जाता है.

निशा वो उंगलियां निकाल कर ऋतू की आँखों में देखते हुए वो उंगलियां देखती है जो पूरी गीली थी और उसे अपने मुँह में लेकर चाट लेती है. ऋतू की आँखें तो शर्म से एकदम लाल हो जाती है और अपनी आँखें बड़ी करती हुई वो निशा को देखती रहती है.

ऋतू थोड़ा शर्माते हुए: तू क्या कर रही है?

निशा: वही जो दिनेश हमेशा मेरे साथ करता है और हस देती है ….लेकिन इसमें शर्माने की कोई बात नहीं हैं.

निशा ऋतू की तरफ देखती है तो ऋतू की आंखों में थोड़ी बेबसी और वासना भी नज़र आती है जैसे कह रही हो की वो भी बहुत प्यार के लिए तरस रही है.

निशा झुक कर अपने होंठ ऋतू के होंठों से मिलाती है तो ऋतू को थोड़ी शर्म आती है और होंठ बंद ही रखती है.

निशा: लगता है बहुत सालों से आपने किसी को चूमा नहीं है.

ऋतू अपनी आँखें अभी भी बंद करते हुए... कौन होगा जिसे मैं चूमू... दिनेश के पिता तो बहुत सालों पहले मुझे छोड़ के चले गए थे.

निशा: आपकी बात भी सही है. मैं आपको बताती हूँ की कैसे चूमते है. आप अपनी आँखें खोले और अब हम दोनों के बीच में कोई शर्म नहीं रेहनी चाहिए. हम दोनों एक ही कश्ती में सवार कर रहे है. आप भी जानती है की हम दोनों बहुत प्यासी है ख़ास कर के जब से दिनेश चला गया है.

निशा ऐसे बोलते हुए फिर से वो ऋतू को चूमती है तो इस बार ऋतू उसका साथ देती है और दोनों पहले धीरे धीरे लेकिन 1 Min के अंदर ही दोनों एक प्रगढ़ चुम्बन में जुड़ जाते है और दोनों अपनी जुबां एक दुसरे के मुँह में डाल कर अपना रस आदान प्रदान करते है.

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निशा ऋतू को चूमते हुए अपने हाथ से इस बार उसकी चूचियों को ज़ोर से दबाती है तो ऋतू के मुँह से सिसकारी निकलती है लेकिन वो निशा के मुँह में ही दब जाती है.

5 Min के गहरे चुम्बन के बाद दोनों अपनी सांसें संभालते हुए अलग होते है तो इस बार निशा ऋतू की आँखों में एक नया ख़ुशी का अहसास देखती है.

ऋतू: बहुत सालों बाद किसीने मुझे इतने अच्छे से चूमा हैं बेटा.

निशा: ये तो कुछ भी नहीं है माजी. आज आपको और मज़ा दूँगी. आपक देखते रहो.

ऋतू को इस बात का पता चल जाता है और आँखों से जैसे पूछती है की आगे और क्या हो सकता है. अब दोनों के चेहरे एक दुसरे के बहुत पास थे और निशा ऋतू से कहती है...

निशा: एक राज़ की बात बताओं.

ऋतू: क्या?

निशा: आपको दीपू के बारे में क्या पता है?

ऋतू: इसमें क्या है. वो बहुत होनहार लड़का है और अपनी बीवियों को बहुत खुश रखता है.

निशा: आपकी बात तो सही है लेकिन उसने किस से शादी की है?

ऋतू: वो तो तुम्हारी मम्मी और मौसी से शादी की है. तो इसमें राज़ की क्या बात है?

निशा: राज़ ये है की जब मैं और दिनेश हनीमून पे गए थे तो उसने मुझे बताया था की उसने आपको बहुत तड़पते हुए देखा है.... ख़ास कर के प्यार और जिस्म के प्यार की तड़प.

ऋतू निशा की ये बात सुनकर कुछ नहीं कहती.

निशा: और दिनेश भी दीपू की तरह आपसे शादी करना चाहता था और वो मुझसे ये बात बतायी और मुझसे मेरी तरफ से जैसे परमिशन मांग रहा था की वो आपसे शादी करेगा और हम दोनों एक दुसरे की सौतन बन जाएंगे.

ऋतू जब निशा के मुँह से ये बात सुनती है तो एकदम आश्चर्य से निशा की तरफ अपना मुँह खोले देखती रहती है.

निशा: हाँ माँ मैं सच कह रही हूँ. बस आपकी बदकिस्मती हैं की वो ये काम नहीं कर सका और हमें छोड़ के चला गया.

निशा के ऐसे बोलने से ऋतू की आँखों में आंसू आ जाते है और कहती है... क्या वो सच में मुझसे इतना प्यार करता था की वो मुझसे शादी करना चाहता था?

निशा: हाँ माँ. लेकिन आप चिंता मत करो. मैं हूँ ना... मैं उसकी कमी तो हर तरह से पूरी नहीं कर सकती लेकिन मैं भी आपको उतना ही प्यार दूँगी जो आप बरसों से छा रही थी और ऐसा बोलते हुए वो फिर से ऋतू को चूमने लगती है.

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इस बार ऋतू पूरे जोश के साथ निशा को चूमती है और एक तरह से उसके होंठ काट लेती है. इसमें दोनों को मज़ा आता है और २ min बाद निशा कहती है: जैसा बेटा वैसे माँ.

ऋतू: मतलब:

निशा: मतलब ये की दिनेश भी मुझे पूरी जोश और शिद्दत के साथ मुझे चूमता था और कभी कभी जैसे अभी आपने किया मेरे होंठ भी काट देता था... और ऐसा बोलते हुए निशा हस देती है.

निशा फिर ऋतू की गर्दन चूमते हुए नीचे आती और एक हाथ से उसकी मदमस्त चूची दबाते हुए दुसरे दुसरे को मुँह में लेकर चूसती रहती है. उसके बड़े बड़े चूचियों के ऊपर गहरे भूरे रंग के चूचक बेहद कड़क और लुभावने लग रहे थे। निशा ने उसकी एक चूची को पकड़ के जोर से दबाया. निशा उसके चुच्ची को दबाके जीभ से चूचकों के साथ खिलवाड़ करने लगा। ऋतू चूचक के साथ छेड़छाड़ होते ही मस्त होने लगी। उसके मुंह से सिसकारी फूट पड़ी। ऋतू के मुंह से सिर्फ उफ़्फ़फ़फ़, आहहहहह... की आवाज़ें निकलने लगी… ऋतू ने निशा का सर पकड़ लिया और उसके मुंह में चूचक घुसेड़ने लगी क्यूंकि निशा की इस हरकत से ऋतू भी अब बहुत गरम हो गयी थी और उसकी उत्तेजना धीरे धीरे उसके सर पे सवार हो रही थी . निशा ऋतू के चूचियों को मुंह में भरकर चूसे जा रही था जिसमें दोनों को बहुत मजा आ रहा था.

निशा बारी बारी से दोनों चूकियों का मर्दन कर रही थी और ऋतू की सिसकारियां पूरे कमरे में गूँज रही थी. ५ min बाद जब निशा ने ऋतू की तरफ देखा तो उसके चेहरे पे हसी आ गयी क्यूंकि इस वक़्त ऋतू सच में बहुत कामुक और आकर्षक लग रही थी.

निशा के चूची मर्दन से ना जाने कितनी बार ऋतू ने अपना पानी छोड़ दिया था और अब तक तो निशा नीचे भी नहीं गयी थी. निशा फिर थोड़ी देर बाद उसके पेट और नाभि को चूमते हुए नीचे जाकर उसकी मस्त जाँघों को चूमती है. ऋतू की तो एक तरह से हालत उत्तेजना के मारे एकदम बत्तर हो गयी थी. आखिर में ऋतू से भी रहा नहीं जाता और बोल ही देती है. निशा क्यों तड़पा रही हो मुझे? कुछ करो ना..

निशा ऋतू को छेड़ते हुए... क्या करून माँ?

ऋतू: तू इतनी भी सयानी नहीं है. तुझे पता है क्या करना है.

निशा एकदम भोली बनते हुए कहती है मुझे पता नहीं क्या करना है. आप मुझे बताये ना क्या करना है. मुझे आपके मुँह से सुन्ना है.

ऋतू: तू नहीं मानेगी... तो सुन... तूने मेरी जिस्म में जो आग भरी है उसे बुझा दे और ऐसा कहते हुए ऋतू थोड़ा उठते हुए निशा का सर पकड़ कर अपनी चूत पे दबा देती है.

निशा को भी लगता है की उसे ऋतू को और तड़पाना नहीं चाहिए और वो भी बड़ी शिद्दत से ऋतू की चूत को ऊपर से नीचे तक चाटने लगती है और अपनी एक ऊँगली को उसकी चूत में डालने की कोशिश करती है लेकिन वो उसमें सफल नहीं हो पाती क्यूंकि ऋतू की चूत कहा जाए तो बहुत सालों से बंद थी और अब तो वो जैसे एक कुंवारी बन गयी थी.

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निशा फिर ऋतू की चूत के दाने को छेड़ती है तो ऋतू से रहा नहीं जाता और ज़ोर से उफ़्फ़फ़फ़ आहहहहह... की आवाज़ें निकालते हुए निशा का सर अपनी चूत पे और ज़ोर से दबा देती है.

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ऋतू से भी अब रहा नहीं जाता और वो अपना पानी निकल देती है जिसे निशा बड़े चाव से पी जाती है और ऋतू की तरफ देख कर कहती है... आपका पानी तो बहुत स्वादिष्ट है. ऋतू झड़ कर ज़ोर ज़ोर से आंहें भर्ती रहती है क्यूंकि कई सालों बाद उसे किसीने झडाया था.

वो अलग बात है की कभी कभी वो अपने आपको अपने उँगलियों से ही संतुष्ट करती रहती थी लेकिन वो संतुष्टि की ख़ुशी अभी किसी और ने दिया था... और वो कोई और नहीं उसकी खुद की बहु थी.

ऋतू जब अपने आपको संभालती रहती है तो निशा उसके ऊपर आकर उसकी आँखों में देखते हुए फिर से उसके होंठों पे चूमती है तो इस बार ऋतू बड़े प्यार से निशा के होंठ चूमती है जैसे वो उसका धन्यवाद कर रही हो.

निशा: माँ जी आपका पानी तो बड़ा मस्त है. आप मेरा पानी नहीं चखना चाहोगे? निशा के इस बात पे ऋतू हस देती है और फिर से उसे चूमते हुए उसे पलटा कर अब वो निशा के ऊपर आ जाती है.

पिछले आधे घंटे से हो रहे काम में निशा की हालत भी बुरी थी. उसकी चूचियां भी एकदम तन गयी थी और उसके चूचक भी पूरे खड़े हो गए थे. ऋतू भी उसकी एक चूची को मुँह में लेकर मस्त चूसती रहती है और कहती है... तेरी चूची भी बहुत अच्छी है निशा. काश अगर दिनेश होता तो जल्दी ही इसमें दूध भी आ जाता. इस बात पे निशा की आँखों में आंसूं आ जाते है लेकिन कहती है... ये तो किस्मत की बात है माँ और फिर निशा भी ऋतू की तरह अपना हाथ उसके सर पे रख कर उसे अपनी चूचियों पे दबा देती है. शायद ये ऋतू का पहली बार था की उसने किसी औरत की चूची को चूसा है लेकिन वो भी काफी अनुभवी थी और ऐसा नहीं लग रहा था की वो पहली बार ही किसीकी चूची चूस रही हो. निशा को भी अब इसमें मजा आ रहा था और वो भी सिसकारियां लेने लगती है.

ऋतू भी अपना अनुभव दिखाते हुए कभी कभी वो निशा की चूची को काट भी लेती है ख़ास कर के उसके उठे हुए चूचक को. निशा ने पहले कभी ऐसा महसूस नहीं किया था और वो तो जैसे सातवें आसमान में पहुँच गयी थी.

ऋतू फिर नीचे जाती है और इस बार वो उसकी नाभि को चूमती है और उसकी जुबां से उसको छेड़ती है. ऐसा करने से निशा एकदम मचल जाती है और अपना हाथ ऋतू के सर के ऊपर रख कर ज़ोर से उसकी नाभि पे दबा देती है. उसके नाभि को छेड़ने से ही निशा फिर से एक और बार झड़ जाती है और बिस्तर को एक तरह से गीला कर देती है.

निशा: माँ तुमने ये सब कहाँ से सीखा है? आप तो मुझे जन्नत पे पहुंचा रही हो.

ऋतू: क्यों तू अकेली ही है क्या जो मुझे मज़ा दे सकती है और ऐसा बोल कर वो हस देती है. थोड़ी देर बाद जब वो और नीचे उसकी टांगों के बीच आती है तो वहां का नज़ारा देख कर ऋतू के मुँह में भी पानी आ जाता है. निशा अपनी दोनों टांगें उठा कर ऋतू को उसकी फूली हुई और रस से भीगी हुई चूत का दर्शन कराती है और साथ में उसकी मस्त उठी हुई चूचियां भी ऋतू को नज़र आती है. उसकी चूत एकदम गुलाबी और रस से भरी हुई थी और अभी भी कुछ बूँदें उसकी चूत से गिर कर उसकी गांड पे गिर रही थी.

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ऋतू भी उस नज़ारे को देख कर रह नहीं पाती और उसकी गुलाबी चूत पे टूट पड़ती है और अपनी जुबां पूरी अंदर डाल कर उसकी चूत को अपने मुँह से चोदते रहती है. निशा तो जैसे जन्नत पे पहुँच गयी थी और ना जाने क्या बड़बड़ा रही थी. ऋतू उसकी चूत को अच्छे से चाट कर अपनी २ उंगलियां उसमें घुसा देती है और क्यूंकि निशा की चूत कुछ दिन पहले ही दिनेश ने खोला था... तो आराम से ऋतू की उंगलियां उसमें घुस जाती है और फिर लगातार अपने मुँह और उँगलियों से उसकी चूत पे दोहरा हुम्ला करती है.

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निशा: हाँ माँ..... ऐसे ही मेरी चूत को खा जाओ.... मुझे भी बहुत दिनों से इसने परेशान कर रखा था..... हाँ... ऐसे ही... उफ्फ उफ़्फ़्फ़ करते हुए निशा ऋतू के सर को अपनी चूत पे दबाती रहती है. आखिर में निशा सेह नहीं पाती और जल्दी ही वो अपनी चरम सुख पे पहुँच जाती है और अपना पानी छोड़ देती है जिसे ऋतू पूरा निगल लेती है.

अब निशा को भी थोड़ी राहत मिलती है अपना चरम सुख पा कर और फिर ऋतू उसके ऊपर आकर उसको चूमती है और खुद का रस उसे पिलाती है.

ऋतू: क्यों कैसे लगा तुम्हारा रस?

निशा इस बात से शर्मा जाती है और कुछ नहीं कहती. दोनों फिर एक दुसरे की बाहों में लेटे रहते है.

ऋतू: मैंने सोचा नहीं था की तुम्हारी मालिश इतनी अच्छी होगी.

निशा हस हुए: मैं तो पूछना ही भूल गयी. अब तो आपकी कमर और पेट का दर्द कम हो गया है ना?

ऋतू: हाँ बेटी वो दर्द तो कम हो गया है और उसको देखते हुए कहती है... एक दर्द कम कर दिया है और दूसरा दर्द और बढ़ा दिया है और उसके होंठ को प्यार से चूम लेती है.

निशा: आपका वो दूसरा दर्द तो कभी भी कम हो सकता है मा जी.. और हस देती है.

ऋतू: वैसे बेटा अभी मेरा मन नहीं भरा है. बहुत सालों बाद तुमने मुझे ये फिर से एहसास दिलाया है की मेरी भी कुछ ज़रूरतें है जो मैं अब तक अपने से ही सिम्मट के राखी हुई थी.

निशा: मैं जानती हूँ माँ... क्या पता आगे हम दोनों की ज़िन्दगी में क्या लिखा है. वैसे मेरा भी मन नहीं भरा है. क्यों ना हम एक दुसरे को ही फिर से जन्नत की सैर कराये.

ऋतू: मतलब?

निशा: मतलब ये की मैं आपको खुश करून और आप मुझे... दोनों एक साथ.

ऋतू: वो कैसे?

निशा: वो ऐसे... और ऐसे बोल कर निशा ऋतू को सुलाती है और निशा उसके ऊपर आ जाती है ऋतू निशा की मखमली रस बहाती चूत को अपने सामने फिर से देख कर रह नहीं पाती और उसकी चूत को चूसने और चाटने लग जाती है. निशा भी वैसे ही करती है और दोनों ६९ पोजीशन में आ जाते है. फिर और क्या था...

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दोनों एक दुसरे की चूत पे टूट पड़ते है और अगले १० Min तक ना जाने दोनों एक दुसरे का पनाइ निकाल देते है. आखिर में दोनों थक कर एक दुसरे की बाहों में फिर से आ जाते है.

ऋतू: मैंने ये कभी नहीं सोचा था की तुम मुझे इतनी ख़ुशी दोगी. और हाँ अगर दिनेश मुझसे शादी करने की बात करता तो शायद उसके बारे में सोचती और शायद हाँ भी कर देती. जैसे तुमने कहा जब से दीपू ने वसु से शादी किया है मैंने देखा है की वसु भी बहुत खुश रहती है और उसके चेहरे पे एक चमक सी आ गयी है. और हस्ते हुए हम दोनों एक दुसरे की सौतन बन जाते.

निशा: माँ आप ठीक कह रही हो. जितने दिन मैं घर में थी शादी के बाद एक भी दिन ऐसा नहीं गया जब मैं रात को अपने आप को ऊँगली करती थी उनकी आवाज़ सुन कर... ये सोच कर की दिनेश भी मुझे भी उतना ही प्यार करेगा जितना दीपू माँ से करता है. हम दोनों एक दुसरे की सौतन ना बने लेकिन प्यार तो कर सकते है ना... और इस बार निशा ऋतू के होंठ चूम लेती है और इस बार दोनों बड़ी कामुकता के साथ एक दुसरे की जुबां चूसने लगते है...

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और हाँ... अब से मैं रोज़ इस बिस्तर पे आपके साथ ही सो जाऊँगी...;ऋतू: प्यार से उसको देख कर... मेरी बच्ची...

Note: apologies for the delay...काम से बहुत Busy था. This is my longest update till date (6500+ words). लिखने में बहुत मेहनत और सोच लगी. आशा है आप भी इस अपडेट को उतना ही प्यार, Likes और कमैंट्स देंगे. धन्यवाद. On a lighter note..hope the comment would not be "looking for next update"... ;)
 
34th Update (जन्मदिन का तोहफा) (माँ - बेटा स्पेशल) (Mega Update)



और हाँ... अब से मैं रोज़ इस बिस्तर पे आपके साथ ही सो जाऊँगी...;ऋतू: प्यार से उसको देख कर... मेरी बच्ची...



अब आगे..



दो दिन बाद जब ऋतू ऑफिस जाती है तो दीपू देखता है की उसका चेहरा उस दिन बहुत खिला हुआ था और आज वो थोड़ी सज के आयी थी जिसमें एक तरह से वो सेक्सी भी लग रही थी. वो ऋतू को देख कर कहता है...

दीपू: आज आपको इस तरह देख कर अच्छा लग रहा है.

ऋतू: किस तरह.

दीपू: आज आपके चेहरा थोड़ा खिला हुआ लग रहा है. ऋतू ये बात सुनकर थोड़ा शर्मा जाती है और कहती है... ये सब तेरी बेहन की वजह से है. उसने ही मुझे अच्छे से “समझाया” है की जो हुआ उसे बदल तो नहीं सकते लेकिन हमें अपना जीवन भी जीना है. वो इतना बोल कर थोड़ा उदास हो जाती है तो दीपू पहचान जाता है और वो जाकर ऋतू को प्यार से गले लगा लेता है और कहता है की निशा ने जो कहा है ठीक है. और फिर दीपू उसे अपनी बाहों में थोड़ा ज़ोर के भींच लेता है और ऐसे ही उसे सांत्वना देता है.

फिर दीपू उसे अपने से अलग करता है और फिर अपनी जगह जाकर काम करने लगता है. ऋतू दीपू को देखती रहती है और उसे निशा की बात याद आती है की क्या पता उनके जीवन में और कोई आ सकता है क्या.

ऋतू दीपू को देखती रहती है और सोचती है “क्या ये लड़का हमारी जीवन में आ सकता है क्या”. लेकिन कुछ देर बाद वो सोचती है की वो गलत सोच रही है और उस ख्याल को अपने मन से निकाल लेती है. वो बात अभी उसके मन से निकल जाता है लेकिन कहीं उसके दिमाग में एक छोटी से जगह ले लिया था.

फिर वो दोनों अपने काम में लग जाते है. दीपू जब शाम को घर जाता है तो देखता है की मीना एक सेक्सी पोज़ में खड़ी हो कर जैसा उसका इंतज़ार कर रही हो. वो मीना को देख कर कुछ नहीं कहता लेकिन फिर उसे याद आता है की अभी मीना वहां उनके घर क्यों है....

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और ऐसे ही सोचते हुए वो वोफे पे बैठा है तो लता उसके लिए चाय लेकर आती है. लता को देख कर दीपू अपनी आँखें थोड़ी बड़ी करता है और ना चाहते हुए भी उसका लंड उसके Pant में खड़ा हो जाता है... क्यूंकि उस वक़्त लता एक मैक्सी पहने हुई आयी थी जिसमें से उसकी ठोस चूचियां दिख रही थी और वो थोड़ी झुक कर जब दीपू को चाय देती है तो जैसे उसकी चूचियां उसकी मैक्सी से बहार आने को तड़प रहे थे.

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दीपू: बुआ क्या बात है आज आपने चाय लायी है? माँ नहीं है क्या?

लता: क्यों माँ ही लाएगी तो तू चाय पीयेगा क्या? बुआ के हाथ से चाय नहीं लेगा क्या?

दीपू: ऐसी बात नहीं है बुआ. मैं तो ऐसे ही पूछ रहा था. वो लता के हाथ से चाय लेकर चाय पीने लगता है तो उसे भी थोड़ा लता के साथ मजे लेने का मन करता है.

दीपू: चाप पीते वक़्त लता को देख कर “आज तो चाय कुछ ज़्यादा ही मीठी लग रही है”. लता ये बात सुनकर हस देती है और वो भी उसी अंदाज़ में कहती है: तुझे रोज़ ऐसी मीठी चाय चाहिए तो बोल रोज़ मैं तुझे देती हूँ और उसके बगल में बैठ जाती है.

लता: वैसे दीपू तू तो मुझसे ठीक से बात भी नहीं करता. क्यों मेरा यहाँ रहना तुझे अच्छा नहीं लगता क्या?

दीपू: नहीं बुआ ऐसी कोई बात नहीं है. आप यहाँ हमारे साथ रहो तो हमें भी अच्छा लगता है. जहाँ तक बात करने की बात है... आप तो देख ही रही हो... अभी अभी उस सदमे से सब थोड़ा बाहर आ रहे है. ऐसे में ज़्यादा बात कहाँ हो सकती है?

लता: हां बेटा तू ठीक ही कह रहा है.

दीपू: वैसे माँ मौसी और बाकी सब कहाँ गए है?

लता: वो बाजार गए है घर का सामान लाने के लिए. जल्दी ही आ जाएंगे.

कुछ देर बाद तीनो बाजार से घर आते है और वसु दीपू को देख कर... तू कब आया?

दीपू: अभी १० Min ही पहले आया था.

फिर वसु और दिव्या किचन में सामान रकने चले जाते है. थोड़ी देर बाद दीपू किचन में जाता है तो वसु कुछ काम कर रही थी. दीपू वसु के पीछे जाता है तो उसका तना हुआ लंड वसु की गांड पे रगड़ता है जिसे वसु भी महसूस करती है. दीपू वसु की चूची को दबाते हुए पहले उसके गले को चूमता है और फिर कान में कहता है....

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क्या बात है? आज बुआ और मीना तो कहर ढा रहे है जैसे तुम अभी केहर ढा रही हो.. वसु पलट कर दीपू को देखते हुए... प्यार से हस्ते हुए दीपू के कान में कहती है... लगता है तेरी बुआ तुझपे लाइन मार रही है.

दीपू: मैं समझा नहीं.

वसु: मैं तुम्हे रात में बताती हूँ. अभी छोड़ मुझे... बहुत काम है.

फिर दीपू वसु को छोड़ कर बहार हॉल में आ जाता है तो दिव्या और कविता भी जैसे उसको रिझाने में लगे हुए थे. दीपू मन में सोचता है: चलो ठीक है. अब सब धीरे धीरे घर का माहौल ठीक हो रहा है जो की अच्छा भी है. वैसे ही आज सुबह आंटी को भी देखा था. वो भी बहुत गज़ब की लग रही थी आज... ऐसे ही सोचते हुए वो अपने कमरे में चला जाता है.

रात को सब खाना खा कर अपने कमरे में जाते है तो आज कविता भी दीपू के साथ उसके कमरे में आती है जो की बहुत दिनों के बाद था... क्यूंकि जब से मीना वहां आयी थी कविता रोज़ उसके साथ ही रहती थी.

दीपू कविता को कमरे में देख कर उसको दीवार से सत्ता के उसके होंठ चूमता है तो कविता भी उसका पूरा साथ देती है.

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दोनों एक दुसरे को अच्छे से निचोड़ते और रस पीते है और दीपू कविता को चूमते हुए उसकी चूची और गांड भी दबा देता है तो कविता सिसकी लेते हुए कहती है.. बहुत दिनों से मैं भी तड़प रही हूँ दीपू. जब से मीना यहाँ आयी है मैं तेरे पास नहीं आ सकी. मैं तेरे पास आना चाहती हूँ लेकिन उसको अकेले छोड़ के नहीं आ सकती. कविता दीपू को चूमने में इतनी व्यस्त थी की उसको पता भी नहीं चलता की दीपू ने उसके कपडे निकल दिए है और उसे पूरा नंगा कर दिया है.

कविता को जब ये एहसास होता है तो कहती है: तुमने तो मुझे पूरा नंगा कर दिया है लेकिन खुद कपडे पहने हो.

दीपू: मैंने तुम्हे मना किया है क्या? कविता फिर दीपू को चूमते हुए उसके कपडे भी निकल देती है और उसे भी नंगा कर देती है.

दीपू भी फिर थोड़े मजे लेते हुए कहता है: मेरे पास क्यों आना चाहती हो? तुम्हारी बेटी तो तुम्हारे पास ही है ना...

कविता भी हस्ते हुए: क्यों मैं अपने पती के पास नहीं आ सकती क्या?

दीपू: हाँ क्यों नहीं ज़रूर आ सकती हो... लेकिन क्यों?

कविता: बड़ा शैतान बन रहा है ना.... तू सुन... मैं भी तेरा लंड मेरी चूत में लेने के लिए तड़प रही हूँ. अभी खुश?

दीपू: फिर से उसको चूमते हुए... मैं तो तुम्हारी गांड का चहेता हूँ.. इतनी मस्त गांड लेकर घूमती हो.

कविता: तो गांड भी मार लेना. मना किसने किया है. सुहागरात में मेरी गांड मारने के बाद मुझे भी अभी गांड में लेने में मजा आता है .

इतने में वहां वसु भी आ जाती है तो दोनों को देख कर.. लगता है बहुत दिनों के बाद मिया बीवी मिल रहे है. लगे रहो.. और उनके सामने से जाने लगती है तो कविता वसु को पकड़ कर उसकी ओर खींचते हुए... तू कहाँ जा रही है.. आज बहुत दिनों बाद मिया बीवी मिल रहे है लेकिन सौतन भी तो नहीं मिले ना बहुत दिनों से... और ऐसा कहते हुए कविता अपने होंठ वसु के होंठ से जुड़ा देती है और दोनों भी एक मस्त लम्बे गहरे और गीले चुम्बन में जुड़ जाते है. वसु को भी पता नहीं चलता की कब उसके कपडे भी उसके बदन से अलग हो गए है. अब कमरे में तीनो नंगे थे जिसमें एक मस्त खड़ा हुआ लंड और दो रस बहाती हुई चूते.

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3-4 min के गहरे चुम्बन के बाद दोनों अलग होते है तो दोनों एक दुसरे को देख कर हस देते है और वसु कहती है: तू सही कह रही हो कविता. मुझे भी ये अहसास बहुत दिनों बाद मिला है.

दीपू उन दोनों को देख कर: ये तो बहुत नाइंसाफी है. तुम दोनों तो मजे ले रहे हो और देखो मेरी हालत और अपने खड़े लंड पे इशारा करता है. ये शाम से ही ऐसा खड़ा है जब से बुआ को देखा है. इसका कुछ करो ना... उसका खड़ा लंड देख कर दोनों भी उसके पास आते है और दोनों मिल कर उसके होंठ पे टूट पड़ते है. तीनो में फिर से एक मस्त गहरा चुम्बन चलता है और दीपू भी अपने हाथ से दोनों की गांड भी दबा देता है.

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दोनों फिर अलग होते है और एक दुसरे को देख कर दोनों एक साथ घुटने पे बैठ कर दीपू का लंड निकल कर दोनों खूब मस्त से दीपू का लंड चूसते है. इसमें दीपू को भी मजा आ रहा था. वो अपने लंड से वसु का मुँह चोदता है तो वहीँ कविता की उसकी गोटियों से खेलते रहती है.

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दीपू तो अपना पूरा ८. ५ इन लंड वसु के गले तक उतार देता है जिसे वसु भी बड़े मजे से चूसने और चाटने लगती है. थोड़ी देर बाद दीपू फिर कविता का मुँह चोदने लगता है और कविता भी अपने थूक और मुँह से दीपू का लंड को पूरा गीला कर देती है.

ऐसा सिलसिला करीब १०- १५ Min तक चलता है जहाँ दोनों बीवी बारी बारी से दीपू के लंड को शेयर करते है. दीपू तो जैसे जन्नत पे पहुँच गया था. आखिर में उससे भी रहा नहीं जाता और गुर्राते हुए कहता है की वो झड़ने वाला है तो वसु और कविता दीपू को देख कर कहते है की हमारे मुँह में ही अपना रस पीला दो.. बहुत दिनों से हमने भी तुम्हारा रस चका नहीं है.

दीपू से भी रहा नहीं जाता और ऐसे ही ३- ४ और धक्के मार कर आखिर में अपना पानी छोड़ देता है जिसे दोनों बड़े चाव से अपने मुँह में ले लेती है. दीपू तो जैसे रुकने का नाम ही नहीं ले रहा था.. करीब १-२ Min तक वो झड़ते रहता है तो उसका पानी दोनों की चूचियों पे भी गिर जाता है. आखिर में उसका मुरझाया हुआ लंड अपने मुँह से अलग कर के वसु और कविता फिर से चुम्बन में जुड़ जाते है और दीपू का पानी फिर से एक दुसरे की जुबां से चूसते हुए चक लेते है. कुछ बूँदें उनकी चूचियों पे भी गिरता है तो दोनों बारी बारी से एक दुसरे की चूचियां भी साफ़ कर लेती है.

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तीनो थोड़ा थक जाते है तो बिस्तर पे जाकर लेट जाते है तो दोनों वसु और कविता दीपू के कंधे पे अपना सर रख कर तीनो एक दुसरे को देखते है.

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कविता: एक बात कहूँ.

वसु: बोल.

कविता: हम सब को पता है की मीना यहाँ बहुत दिनों से है और क्यों है. वो मुझसे कह रही थी की वो अपने घर भी वापस जाना चाहती है और उसे घर की याद भी बहुत आ रही है और मनोज की चिंता भी हो रही है.

वसु: मैं समझ सकती हूँ कविता.

कविता दीपू की तरफ देख कर... जैसे पूछ रही हो की तुम क्या कहना चाहते हो...

दीपू: तुम ठीक कह रही हो. एक काम करो. मैं जानता हूँ की ये सब उसके साथ पहली बार होगा तो बहुत शर्माएगी. तो तुम ही उसे तैयार करो और हाँ तुमने भी उसके साथ ही रहना है. समझी?

कविता: मतलब?

वसु: अरे पगली इसका मतलब है की तुम, मीना और ये... एक साथ.. समझी?

कविता: ना बाबा ना... मुझे बहुत शर्म आएगी...वो भी मेरी बेटी के साथ... ना बाबा ना...

दीपू: अब तुम ही अपने पती के सामने ऐसे शरमाओगी तो फिर मीना का क्या होगा? सोचा हैं तुमने? वो तो तुमसे भी ज़्यादा शर्माएगी. इसीलिए कह रहा था की तुम ही उसे तैयार करो. कविता ना ना करती है और कहती है तुम दोनों के साथ रहना और बेटी के साथ रहने में बहुत फरक है .लेकिन वसु भी उसे समझाती है की दीपू जो कह रहा है वो सही है. और मीना की बात भी सही है की मनोज गांव में अकेला है तो उसकी भी देखभाल करना ज़रूरी है. आखिर में कविता मान जाती है.

दीपू: माँ तुम मुझे बुआ के बारे में अभी बताने वाली थी. क्या बात है?

वसु: तो तुझे याद है वो बात.

कविता: कौनसी बात?

इस बार वसु आगे आकर दीपू के सामने ही कविता का सर पकड़ कर उसको चूमते हुए कहती है... लगता है कि एक और चिड़िया इसकी दीवानी हो गयी है.

दीपू और कविता एक साथ: समझे नहीं.

वसु: दीपू याद है पिछले हफ्ते जब तुम्हारी तबियत खराब हो गयी थी और हम डॉक्टर के पास गए थे और उस दिन रात को जब दिव्या तुम्हे हल्का कर रही थी.

दीपू: हाँ याद है.

कविता: उसे समझ नहीं आता तो पूछती है ये हल्का का क्या मतलब है?

वसु: पगली दिव्या इसके लंड को अच्छे से चूस कर इसका पानी गिरा रही थी क्यूंकि उस दिन डॉक्टर ने ऐसा कहने को कहा था.

दीपू: हाँ याद है लेकिन इसका बुआ से क्या लेना है?

वसु: बात ये है की जब तुम दोनों कमरे में थे तो लता तुम दोनों को बहार खिड़की के पास खड़े होकर तुम दोनों के जलवे देख रही थी और अपनी चूत को मसलते हुए अपने आप को शांत कर रही थी. मैंने उसे ये करते हुए देखा और पुछा तो उसने मुझे अंदर का नज़ारा दिखाया जहाँ तुम दोनों बहुत मजे कर रहे थे. मुझसे भी रहा नहीं गया वो scene देख कर तो मैं भी थोड़ा आगे बढ़ गयी.

तुम तो जानते हो की लता का तलाक क्यों हुआ है. वो भी हमारी तरह एकदम चुड़क्कड़ औरत है और उसने भी लंड लेकर बहुत दिन या कहूँ साल हो गए है और वो भी लंड के लिए तड़प रही है. तो इसीलिए आज तुम्हे रिझाने के लिए ऐसे सेक्सी कपडे पहन कर तुम्हारे पास आयी थी. अब समझे की एक और चिड़िया क्यों फस रही है?

कविता: अब समझी. दीपू को देख कर... लगता है तुम्हे और तुम्हारे लंड को बहुत आराम करने की ज़रुरत है और ऐसा कहते हुए दोनों वसु और कविता हस देते है.

दीपू: कविता आज तुम यहीं सो जाओ और फिर तीनो सो जाते है.



जन्मदिन



कुछ दिन बाद वसु का जन्मदिन था. ये बात सब को पता था. तो सुबह सुबह सब लोग उसे उसकी जन्मदिन की बधाई देते है लेकिन तब तक दीपू उठा हुआ नहीं था तो वसु को थोड़ी जलन होती है की सबने तो उसे बधाई दी है लेकिन उसका बेटा और साथ में पती भी घोड़े बेच कर सो रहा है.

सब लोग कहते है की उसकी जन्मदिन कैसे मनाया जाए तो वसु कुछ नहीं कहती और वो एक तरह से दीपू का इंतज़ार करती है.

जब काफी देर तक दीपू नहीं आता तो वो थोड़े गुस्से से उसके कमरे में जाती है लेकिन उसे दीपू बिस्तर पे नहीं दीखता. वो पलट कर जाने लगती है तो दीपू पीछे से उसको पकड़ते हुए अपनी तरफ घुमा कर उसके होंठों को चूमते हुए दीपू वसु को जन्मदिन की बधाई देता है. चुम्बन उसका एकदम गीला और रस से भरा हुआ था और जैसे दोनों एक दुसरे की जुबां को खा लेना चाहते हो.

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वसु थोड़ी झूटी नाराज़गी दिखाते हुए कहती है: मैं तो तुम्हारा सुबह से इंतज़ार कर रही थी और सोची थी की तुम ही सबसे पहले मुझे विश करोगे. लेकिन तुमने सबसे आखरी में विश किया है और प्यार से उसके सीने में मुक्का मारती है.

दीपू: मैं जानता हूँ जान लेकिन सच बताना सिर्फ मैंने ही तुम्हे ऐसा विश किया है ना और ऐसा कहते हुए फिर से अपने होंठ वसु के होंठों से जोड़ देता है तो इस बार वसु भी पूरे प्यार से उसका साथ देते हुए दोनों चूमते है और एक दुसरे की जुबां को लड़ाते है.

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२ Min तक उनका मस्त गहरा किस चलता है. फिर दोनों अलग होते है तो जैसे उनकी सांसें बंद हो गयी थी.

दीपू: बोलो मैंने सही कहा ना?

वसु: एकदम सही. ऐसे बधाई किसीने मुझे नहीं दिया है.

दीपू: अच्छा जान तुम्हे तो पता है ना की मुझे आज तुमसे क्या चाहिए तुम्हारे जन्मदिन पे जो तुमने बहुत पहले भी वादा किया था. वसु को इस बारे में पता था लेकिन जैसे उसे मालूम नहीं वैसे रियेक्ट करती है.

वसु: मुझे तो कुछ भी याद नहीं है जानू. तुम किस बारे में बात कर रहे हो. लेकिन दीपू उसकी आँखों में देखता है तो समझ जाता है तो दीपू फिर से उसे अपने सीने से लगा लेता है और अपना हाथ पीछे ले जाकर उसकी गांड को मसलते हुए उसकी साडी के ऊपर से ही उसकी गांड के छेद को टटोलते हुए उसके कान में कहता है: मुझे तुम्हारा ये तोहफा चाहिए.

वसु: ना बाबा मैंने कभी वहां लिया नहीं है तो ये तोहफा भूल ही जाओ.

दीपू: ऐसे कैसे? तुम मुझे एक तोहफा दो. मैं तुम्हे भी एक तोहफा दूंगा.

वसु दीपू की तरफ देख कर: तुम कौनसा तोहफा देने वाले हो?

दीपू वसु के कान में कहता है: तोहफा ये है की, और ऐसा कहते हुए दीपू वसु के पेट के ऊपर हाथ रख कर... जल्दी ही तुम्हारा पेट फुला दूंगा और तुम्हे फिर से माँ बना दूंगा और तुम मुझे भी एक बाप बना दोगी. बोलो कैसा रहेगा मेरा तोहफा जो की हम दोनों के लिए रहेगा?

वसु दीपू की बात सुनकर एकदम शर्मा जाती है और उसके सीने में फिर से हल्का सा मुक्का मारते हुए फिर से प्यार से उसके होंठ को चूम के वहां से भाग जाती है.

फिर देर सुबह दीपू के कहने पे कविता दोनों ऋतू और निशा को भी शाम को घर पे खाने के लिए बुलाती है. वो वजह पूछते है तो कविता उन्हें बताती है की वसु का जन्मदिन है तो सब मिलकर उसे मनाएंगे. जब शाम होती है तो वसु भी तैयार होने चले जाती है और उसी समय ऋतू और निशा भी वहां आ जाते है. दीपू एक केक लाता है और सब वसु की आने की राह देखते है. थोड़ी देर बाद जब वसु कमरे से बहार आती है तो सब लोग उसे देख कर एकदम दंग रह जाते है क्यूंकि वो बहुत सुन्दर दिख रही थी जब वो सज कर आयी थी. वसु को देखते ही दीपू का लंड उसके Pant में तन जाता है और ऐसा ही कुछ हाल बाकियों का भी होता है (याने बाकी भी उसे देख कर उत्तेजित हो जाते है). वो ऐसे सज के आयी थी जैसे आज उसकी शादी हो जबकि आज उसका जन्मदिन था.

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वसु ऋतू और निशा को देख कर बहुत खुश हो जाती है और दोनों को गले से लगा लेती है. दोनों भी फिर वसु को उसकी जन्मदिन की बधाई देते है और फिर वसु दीपू के लाये हुए केक को काट कर उसका जन्मदिन मनाते है.

फिर सब लोग अच्छा स्पेशल खाना खाते है जो आज कविता और दिव्या ने बनाया था वसु के जन्मदिन की ख़ुशी में.

खाना खाने के बाद ऋतू और निशा अपने घर जाने की बात करते है तो दीपू वसु और बाकी सब भी उन्हें उस दिन रुकने को कहते है लेकिन ऋतू नहीं मानती तो दीपू उन्हें उनके घर छोड़ने के लिए उन साथ चला जाता है.

खाना खाने के बाद सब साफ़ सफाई कर के दिव्या और कविता किचन में जाकर वसु को बुलाते है. वसु जब वहां आती है तो दोनों दिव्या और कविता एक दुसरे को देखते है और वसु को गले लगा लेते है और पहले दिव्या फिर बाद में कविता वसु के होंठ चूम कर कहते है: जन्मदिन की बधाई हो.

तुम तो आज बहुत सुन्दर और सेक्सी लग रही हो इन कपड़ों में. तुम्हे देख कर तो हमारी चूत भी गीली हो गयी है. पता नहीं दीपू का क्या हाल होगा.

दिव्या एक केक का टुकड़ा अपने मुँह में लेकर उसे वसु को खिलाती है तो वसु समझ जाती है और वो भी दिव्या के मुँह से वो केक का टुकड़ा ले लेती है और दोनों एक मस्त गहरे चुम्बन में जुड़ जाते है. २ Min बाद...

दिव्या: तुझे याद है दीपू के जन्मदिन पे उसने ऐसे ही हमें केक खिलाया था. वसु दिव्या की आँखों में देख कर हाँ कहती है तो कविता भी दिव्या की तरह एक केक का टुकड़ा अपने मुँह में ले लेती है और वसु को खिलाती है और वो दोनों भी केक को खाते हुए एक दुसरे के होंठों का रस चूस लेते है.

दिव्या: ऋतू और निशा के होते हुए हम तुम्हें ऐसा केक नहीं खिला सकते थे... इसीलिए तुम्हे यहाँ बुलाया है.

दिव्या: वैसे तुम लोगों ने महसूस किया है क्या.... हम तीनो की चूचियों का साइज और आकर भी थोड़ा बढ़ गया है.

कविता: हाँ मैंने भी महसूस किया है. वो फिर वसु की चूचियों को दबाते हुए... बढ़ेंगे क्यों नहीं... हमारा पती तो रोज़ इन्हे चूस चूस कर और दबा दबा कर हमें बेचैन करता है तो ये तो बढ़ने ही थे.

दिव्या कविता से धीरे से... हमारी तो सिर्फ चूचियां ही बढ़ी है और उसकी गांड पे अपना पंजा रख कर... तेरी तो गांड भी उभर आयी है.

कविता ये सुनके शर्मा जाती है और कहती है... हाँ उभर ही आएंगे ना... जब से उसने हमारी सुहागरात में मेरी गांड मारी है तब से तो वो उसका दीवाना हो गया है.

ऐसे ही थोड़ी मस्ती करने के बाद तीनो हॉल में आ जाते है तो लता उनको देख कर पूछती है की आपस में क्या मस्ती हो रही है? वसु कुछ बहाना बना देती है और वो सब दीपू का इंतज़ार करते है और थोड़ी देर बाद दीपू भी ऋतू और निशा को उनके घर छोड़ कर वापस आ जाता है.



तोहफा



दीपू के आने के बाद दिव्या कहती है की रात बहुत हो गयी है... सोने का टाइम आ गया है और वो दीपू की तरफ देख कर आँख मार देती है जैसे कहना छा रही हो की वसु के साथ वो भी मजे करे. लेकिन दीपू के मन में तो कुछ और ही ख्याल था. वो कमरे में जाता है और वहां से कविता को बुलाता है. जब कविता अंदर आती है तो...

दीपू: आज सिर्फ मैं और माँ ही साथ सोयेंगे. आज तुम मीना के साथ और दिव्या और बुआ सो जाओ या फिर सब एक साथ सो जाओ. आज माँ का जन्मदिन है तो वो मेरे साथ ही गुजारेगी.

कविता: ऐसे क्यों कहते हो. वो भी तो हमारी ही है. हमें भी उसके साथ सोने दो ना.

दीपू: आज के लिए मेरी बात मान लो. कल से मैं किसीको मना नहीं करूंगा और सब एक साथ सो जाएंगे. और हाँ हमारे कमरे से बाहर जाने के बाद एक तेल की शीशी यहाँ रख देना ताकि किसीको पता ना चले.

कविता ये बात सुनकर एकदम हैरान हो जाती है और दीपू की बात समझने की कोशिश करती है तो दीपू कविता को अपनी बाहों में लेकर: हाँ तुम जो सोच रही हो आज वही होगा. माँ ने भी कहा था की जन्मदिन तक सबर करे.

कविता: याने तुम आज रात को...

दीपू: हाँ जान आज रात को माँ की गांड का उद्धघाटन करना है जैसे मैंने हमारी सुहागरात में तुम्हारा किया था और ऐसा बोलते हुए दीपू कविता की गांड दबा देता है और अपनी ऊँगली से उसकी साडी के ऊपर से उसकी गांड में ऊँगली करता है.

कविता सिसकी लेती है और कहती है: मैं भी साथ रहती हूँ ना वसु के साथ. आज तुम दोनों की गांड मार लेना.

दीपू: तुम्हारी बात भी सही है लेकिन आज माँ का जन्मदिन है तो अकेले ही... चिंता मत करो... तुम्हारी ये ख्वाइश भी जल्दी पूरी करूंगा और सिर्फ वसु के साथ नहीं.

कविता: मतलब?

दीपू: कविता के होंठ चूमते हुए... मतलब ये की जब तुम और मीना एक साथ रहोगे तब... और हस देता है.

कविता: ना बाबा ना... मैं मीना के सामने अपनी गांड नहीं मरवाऊँगी.

दीपू: चलो देखते है. अभी कमरा खाली करो और वसु को बोलो की जल्दी वो तैयार होकर यहाँ आये और फिर दोनों कमरे से निकल जाते है.

कविता फिर किचन में जाती है और चुपके से एक तेल की शीशी दीपू के कमरे में रख देती है और फिर वापस किचन में आकर वसु को बुलाती है.

वसु: क्यों बुलाया है?

कविता: कल तुम सुबह आराम से जागना. चाय मैं या और कोई बना देंगे और तुझे कमरे में लाकर दे देंगे.

वसु: ऐसा क्यों भला? मैं देर सुबह तक क्यों सोती रहूंगी?

कविता: अरे मेरी बन्नो और वसु को अपनी बाहों में लेकर उसके होंठ चूमते हुए... आज तुम्हारा जन्मदिन है ना... तो दीपू तुम्हे तोहफा जो दे रहा है.

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कविता के बात सुनकर वसु उसकी तरफ आँखें फाड़ते हुए देखती है तो कविता एक हाथ से उसकी चूची दबाती है तो दुसरे हाथ से उसकी गांड को सहलाते हुए... हाँ दीपू ने मुझे बताया है. आज तुम भी पूरी औरत बन जाओगी और जब दीपू को मोटा और लम्बा डंडा जब तुम्हारी गांड में जाएगा तो तुम्हे थोड़ी तकलीफ होगी लेकिन बाद में तुम्हे बहुत मजा आएगा और उसके लंड पे उछलते रहोगी. समझी मेरी बन्नो.

वसु इस बात पे शर्मा जाती है तो कविता कहती है: चल तैयार होकर कमरे में जा. तेरा पती तेरा इंतज़ार कर रहा है और फिर से कविता वसु को चूम कर दोनों बहार आ जाते है और कविता सब को कहती है की आज सिर्फ दीपू और वसु ही एक साथ सोयेंगे और कोई नहीं. कोई और कुछ नहीं कहता तो सब लोग अपने कमरे में सोने चले जाते है और वसु अच्छे से तैयार हो कर दीपू के कमरे में जाती है जहाँ वो पहले से ही उसका इंतज़ार कर रहा था.



कमरे में:



कमरे में जब वसु आती है तो दीपू उसे देखता ही रह जाता है क्यूंकि वसु बहुत सेक्सी तरीके से उसके लिए सज कर आयी थी. उसकी साडी ट्रांसपेरेंट थी जिसमे से उसका पूरा बदन एक रौशनी की तरह चमक रहा था और उसके मस्त ठोस चूचियां आधे से ज़्यादा बहार थे जैसे बाहर आने के लिए तड़प रहे हो. और उसनी अपनी साडी नाभि से ३ इंच नीचे बंधा था... या फिर ये कहे की अपनी चूत के जस्ट ऊपर बाँधा था.

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वसु भी कविता की बात सुनकर वो भी बहुत उत्तेजित थी और दीपू को देखते ही उस पर टूट पड़ती है और सीधा उसके होंठों पे कब्ज़ा कर लेती है जिसका दीपू को ऐतराज़ नहीं था और वो भी वसु की जीभ को पूरा चूसते रहता है. वसु भी दीपू की जीभ को अपने मुँह में लेकर दोनों एक दुसरे का रस पीते रहते है. ये किस बहुत देर तक चलता और जब दोनों अलग होते है तो उनकी सांसें उखड़ती रहती है.

दीपू: ये तो मेरे लिए भी नया है. इतना ज़बरदस्त किस तो मैंने भी आज तक तुमको नहीं किया था.

वसु: अब चुप कर और आज मुझे ठंडा करो. आज मैं बहुत गरम हूँ और अपनी पूरी गर्मी आज तुम मुझ पे उतार दो और ऐसा कहते हुए वसु फिर से दीपू के होंठ पे टूट पड़ती है और फिर से उन दोनों के बीच उनकी जुबां की लड़ाई शुरू हो जाती है.

जब दोनों चूम रहे होते है तो दीपू वसु की ब्लाउज निकल फेकता है और देखता है की उसने ब्रा नहीं पहना था. ५ Min के गहरे चुम्बन के बाद दोनों अलग होते है और दोनों के मुँह से लार टपकती रहती है. वसु उत्तेजना में दीपू का सर पकड़ कर अपनी ठोस चूचियों पे दबा देती है और दीपू भी अब पीछे नहीं रहने वाला था. वो भी वसु की चूचियों पे टूट पड़ता है और अपनी जुबां से चूसते छाते हुए वसु को भी मजा देता है.

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पहले एक फिर बाद में दुसरे के साथ भी यही करता है और दीपू के चूसने और चाटने से ही वसु अभी पहली बार झड़ जाती है और उसकी जांघें भी गीली हो जाती है क्यूंकि पानी चूत से निकल कर उसकी जांघें गीली कर देती है.

दीपू फिर वसु को सुला देता है और उसकी गहरी नाभि को चूमता और चाटता है तो जैसे वसु जन्नत पे पहुँच जाती है और दीपू का सर उसकी नाभि पे दबा देती है. दीपू नाभि को चूमते हुए उसकी साडी को निकल देता और पेटीकोट का नाडा खोलता है तो वसु भी उसकी मदत करते हुए अपनी गांड उठा देती है और वसु उसकी पेटीकोट भी निकल फेंकता है और उसे पूरा नंगा कर देता है और वो नाभि को चूमते हुए नीचे आता है और उसकी रस से भरी हुई एकदम फूली हुई गुलाबी चूत देखता है तो देखते ही रह जाता है.

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दीपू: लगता है पूरी तैयारी कर के आयी हो.

वसु: हां मुझे भी पता है की तुम मेरी पैंटी वैसे ही निकालने वाले हो तो पेहेनना का क्या फायदा? और वैसे भी पहनती तो वो भी भीग जाती और उसे फिर से धोना पड़ता और हस देती है. देखो तुमने मुझे कितना उत्तेजित कर दिया है.

दीपू: हाँ दिख तो रहा है की तुम्हारी चूत एकदम रस बहा रही है.

वसु: फिर देखते ही रहोगे क्या और ऐसा बोल कर वसु दीपू का सर पकड़ का अपनी रस बहाती चूत पे धस देती है और दीपू भी बड़े चाव से वसु की चूत चाटने लग जाता है ऊपर से नीचे तक और फिर उसकी गांड को भी चाटता है तो वसु एकदम सीहक जाती है और दीपू का सर और ज़ोर से दबा देती है.

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5-10 min तक दीपू उसकी चूत चाटता है और अपनी दो उंगलियां भी उसकी चूत में दाल कर अंदर बाहर करते हुए उसको दुगना मज़ा देता है.... अपनी जुबां से और अपनी उँगलियों से भी. आखिर में वसु से रहा नहीं जाता तो फिर से एक और बार झड़ जाती है और दीपू उसका पानी शरबत जैसे समझ कर पूरा पी जाता है और उसके ऊपर आकर उसको चूमते हुए... कैसे लगा मेरी जान?

वसु: बहुत मजा आया.. तुमने तो मुझे पूरा थका ही दिया है.

दीपू: अभी कहाँ... अभी तो रात शुरू ही हुई है और ऐसा कहते हुए दीपू बिस्तर पे सो जाता है और वसु को खींचते हुए अपने मुँह पे बिठा लेता है और वसु भी अपनी चूत को उसके मुँह पे रगड़ते हुए मजे लेती है तो दीपू अपनी एक ऊँगली उसकी गांड में डालने की कोशिश करता है तो उसकी गांड जो कुंवारी थी तो बहुत टाइट थी और उसकी ऊँगली भी अंदर नहीं जा पाती.

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दीपू वैसे ही वसु को अपने मुँह पे बिठाते हुए उसे फिर से जन्नत की सैर कराता है और आखिर में वसु फिर से हार जाती है और अपना पानी बहाते हुए वो बगल में गिर कर ज़ोर ज़ोर से आंहें भरते हुए दीपू को देखती है जो अपनी जुबां से उसकी पानी चाट रहा था.

वसु दीपू की तरफ देखती हैं और उसे प्यार से चूमते हुए वो भी नीचे जाती है और उसके खड़े लंड को पकड़ कर... वसु: लगता है ये महाराज तो आज कुछ ज़्यादा ही जोश में है. (दीपू कब का नंगा हो गया था वसु की तरह). दीपू: हाँ होगा ही ना... जिस तरह से तुम उत्तेजित थी... वही मेरा महाराज भी उत्तेजित था. अब बातें काम और काम ज़्यादा और मुझे भी जन्नत की सैर कराओ... और ऐसा कहते हुए दीपू वसु के सर को पकड़ कर अपने लंड भी झुकाता है तो ये तो वसु के लिए निमंत्रण ही था. वो भी बड़े मजे से दीपू के लंड को चूमते और चाटते हुए उसका पूरा लंड मुँह में ले लेती है. वसु भी आज पूरे जोश में थी और अपने थूक और लार से दीपू का पूरा लंड एकदम गीला कर देती है. दीपू भी उसके मुँह लो लगता चोदते रहता है और ५- १० मं के बाद जब दीपू को लगता है की अगर वसु रुकी नहीं तो वो झड़ जाएगा तो दीपू अपना लंड वसु के मुँह से निकलता है. वसु का तो ऐसे हाल था जैसे कोई बच्चे से एक चॉकलेट किसीने छीन लिया हो.

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दीपू फिर वसु को सुला कर उसके पेअर को अपने कंधे पे रखते हुए बिना उसे बताये पूरा एक बार में ही अपना लंड उसकी पूरी गीली हुई चूत में उतार देता है. वसु को बड़ा सुकून मिलता क्यूंकि आज कई दिनों बाद वो दोनों अकेले थे और काफी दिनों बाद दीपू ने उसे चोदा था.

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वसु: आह दीपू.... कितना अच्छा लग रहा है. बहुत दिनों बाद तुमने एक बार में ही अपना लंड मेरी चूत में पूरा एक साथ ही घुसा दिया है. उसके चेहरे के एक्सप्रेशंस बता रहे थे की उसे भी बहुत अच्छा लग रहा था बहुत दिनों के बाद इस चुदाई में.

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देपु: जान मुझे भी बहुत अच्छा लगा और ऐसा कहते हुए दीपू भी अब पूरे जोश में वसु को चोदने लगता है और उसका लंड भी किसी पिस्टन की तरह वसु के गीली चूत में अंदर बाहर होते रहता है.

कहने की बात नहीं है की पूरे कमरे में दोनों की सिसकारियां और आहात से पूरा कमरा गूँज रहा था. हो भी सकता है की उनकी आवाज़ें घर के बाकी लोगों को भी सुनाई दे लेकिन आज वो दोनों बिना किसी के डरे पूरे मजे ले रहे थे और एक दुसरे को दे भी रहे थे.

10 – 15 Min की ऐसी धुआंदार चुदाई के बाद जब दोनों थोड़ा थक जाते है तो अब दीपू बिस्तर पे सो जाता है और वसु उसके लंड पे बैठ कर ऊपर नीचे कूदतते रहती है. दीपू भी उसकी उछलती चूचियों को पकड़ कर वो भी मस्ती में दाना दान वसु को पेलते रहता है.

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आखिर में दोनों थक जाते है तो दीपू फिर से वसु को पलटा कर पेलते हुए आखिर में ज़ोर से गुर्राते हुए अपना पूरा माल वसु की चूत में ही छोड़ देता है और उसके पूरे बच्चेदानी में अपना पानी छोड़ देता है जिसका अहसास वसु को भी होता है. लेकिन आज इस दुमदार चुदाई से वसु बहुत खुश थी और सच में आज उसका जन्मदिन बहुत “अच्छे से मना था”.

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दोनों थके हारे वसु दीपू के कंधे पे सर रख कर: आज तो तुमने मुझे बहुत अच्छा तोहफा दिया है. तुमने तो अपना पूरा गाढ़ा माल मेरा अंदर ही डाला है जो मैंने भी महसूस किया है. लगता है आज इस रात हम दोनों को तोहफा मिलेगा और शर्म से अपना चेहरे झुका लेती है.

दीपू: वसु की ओर देख कर: अरे डार्लिंग अभी तक तो तुम्हे तोहफा दिया ही नहीं है. ये तो एक ट्रेलर था. पिक्चर तो अभी पूरी बाकी है और ऐसा कहते हुए दीपू वसु को अपनी गोद में उठा लेता है और वो बाथरूम की तरफ जाता है. वसु एकदम चक्र जाती है दीपू के ऐसा करने से लेकिन उसे भी अच्छा लगता ही उसका पती उसका कितना ख्याल रख रहा है. दोनों फिर बाथरूम में जाकर दोनों एक दुसरे को साफ़ करते है.

दोनों फिर बाहर आकर एक दुसरे की बाहों में रहते हुए बातें करते है.

वसु: मुझे बहुत अच्छा लगा जब तुमने मुझे अपनी गोद में लेकर बाथरूम गए थे.

दीपू: मुझे पता है... आज की दुमदार चुदाई से तुम एकदम थक गयी होगी और शायद तुम्हे चलने में भी तकलीफ होती. चलो कोई नहीं.. तुम्हे अच्छा लगा तो ठीक बात है. अब तुम्हारे तोहफे का समय आ गया है. वसु को पता था इसका मतलब लेकिन वो दीपू को मनाने की कोशिश करती है की वो ना करे. लेकिन दीपू कहाँ मानने वाला था.

दीपू: किसी और दिन होता तो शायद मैं मान जाता. लेकिन आज तुम्हारा जन्मदिन है और तुमने वादा भी किया था. चिंता मत करो... मैं एकदम आराम से करूंगा... और देखो तुम्हारी सौतन भी तुम्हारा कितना ख्याल रखती है. वो तुम्हारे लिए एक तेल की शीशी भी लायी है ताकि तुम्हे तकलीफ ना हो.

वसु दीपू की ये बात सुनकर एकदम शर्मा जाती है और आखिर में वो भी मान जाती है.

दीपू: चलो तुम घोड़ी बन जाओ तो वसु भी एक आज्ञाकारी बीवी की तरह घोड़ी बन जाती है और अपनी गांड थोड़ा उठा देती है. दीपू के मुँह में उसकी उठी हुई गांड देख कर पानी आ जाता है और उसकी गांड की पाटों को अलग करते हुए थोड़ा फैला कर उसकी गांड को चाटने लगता है.

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वसु को पहले थोड़ी दिक्कत और जलन लगती है लेकिन कुछ देर बाद उसे भी मजा आने लगता है. दीपू भी थोड़ी थूक और तेल से वसु की गांड को गीला करता है और चाटते हुए अपनी एक ऊँगली बड़ी मुश्किल से अंदर डालता है. पहले तो थोड़ी मुश्किल से उसकी ऊँगली अंदर जाती है लेकिन थूक और तेल की चिकनाहट से आखिर में पूरा अंदर चला जाता है और कुछ देर पहले जैसे उसकी चूत के साथ किया था... दीपू वही उसकी गांड के साथ भी करता है... याने अपनी जुबां और ऊँगली से उसकी गांड को चाटने और चोदने लगता है. उसके इस दोहरे हमले से वसु फिर से एक और बार झड़ जाती है जिससे उसे बहुत सुकून मिलता है. कुछ देर बाद दीपू भी वसु से अपना लंड चुसवाते है और जब दीपू का लंड भी पूरा तन जाता है तो वो वसु को सुला कर उसके पेअर को अपने कंधे प्रे रख लेता है और वसु की तरफ देखता है.

वसु आखिर में हां कह देती है और आने वाले हमले की राह देखती है. दीपू अपना लंड उसकी गांड में डालने की कोशिश करता है तो फिसल जाता है और चूत से टकरा जाता है. वसु एक सिसकारी लेती है. दीपू फिर बगल में रखे तेल से अपने लंड को पूरा गीला करता है और वैसे ही तेल वसु की गांड के छेद पे भी दाल कर उसे भी गीला कर देता है.

दीपू फिर से कोशिश करता है और फिर फक की हलकी आवाज़ के साथ उसका सुपाड़ा अंदर चला जाता है.

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वसु को बहुत दर्द होता है जैसे किसीने उसकी गांड में एक रोड दाल दिया हो. वसु ज़ोर से चिल्लाती है और उसकी आँखों से आंसूं बहने लगते है. दीपू को पता था की पहली बार ये होना ही है तो वो झुक कर उसके आंस्सों पीते हुए उसके होंठ को चूमता है. बस जानू थोड़ा सेहन कर लो... आगे बहुत मजा आने वाला है और फिर वो उसकी चूची को पीने लगता है. वसु को थोड़ी राहत मिलती जो सिर्फ १ मं तक ही रहता है. वसु की चूची पीने के बाद दीपू फिर से वसु के होंठों को ज़ोर से चूमता है और उसी वक़्त दीपू पूरी दम से एक और झटका मारता है और इस बार उसका आधे से ज़्यादा लंड वसु की गांड में चला जाता है. अगर दीपू उसका मुँह बंद नहीं करता तो शायद बगल के कमरे में सोये लोग दौड़ कर यहां आ जाते. वसु का दम घुटने लगता है क्यूंकि दीपू ने उसका मुँह अपने मुँह में रख लिया था. वो अपने हाथ दीपू की पीठ पे रख कर अपने नाखून से दीपू की पीठ को रगड़ देती है और उसपर खरोच भी आ जाते है. लेकिन दीपू उसकी परवाह नहीं करता है ऐसे ही वसु को देखते हुए आखिर में एक और झटका मारता है और उसका पूरा लंड वसु की गांड के जड़ तक समा जाता है. वसु काहाल बहुत बुरा हो गया था और दीपू वैसे ही अपना लंड वसु की गांड में रखते हुए ३- ४ Min तक ऐसे ही रहता है.

5 Min बाद जब वसु अपनी आँखें खोलती है तो वो रो रही थी. दीपू बड़े प्यार से उसके आंसूं पोछते हुए कहता है... जानू जो दर्द तुम्हे होना था वो हो गया. अभी कुछ देर में तुम्हे मजा भी आने वा है. वसु कुछ नहीं कहती और दीपू को देखती रहती है. इस वक़्त दोनों कुछ नहीं करते और एक दुसरे को ही देखते रहते है.

कुछ देर बाद जब वसु को थोड़ी राहत मिलती है तो वो दीपू को अपने आँखों से इशारा करती है तो दीपू हस देता है और फिर अपने लंड को थोड़ा बाहर निकल कर फिर से अंदर डालता है और फिर धीरे धीरे उसकी गांड की कुटाई करने में लग जाता है. पहले तो वसु को थोड़ी जलन होती है और दर्द भरी आवाज़ निकालती रहती है लेकिन कुछ देर बाद वो आवाज़ सिसकारी में बदल जाती है और अब वसु को भी इस गांड चुदाई में मजा आने लगता है.

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वसु: जानू ऐसे ही गांड मारो. अब मजा आ रहा है. पहले दर्द देते हो फिर मजा भी देते हो.

दीपू: मैंने कहा था ना... दर्द के बाद मजा... और वैसे भी दर्द में भी मजा है.

वसु दीपू की ये बात सुन कर उसके कंधे पे मुक्का मारती है और वो भी अपनी गांड चुदाई का मजा लेने लगती है.

थोड़ी देर बाद दीपू वसु को घोड़ी बना देता है और फिर पीछे से उसकी गांड मारने लगता है.

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इसमें दोनों को बहुत मजा आ रहा था. वसु तो इतने मजे में थी की उसको पता भी नहीं चलता कितनी बार वो झड़ चुकी है इस रात... पहले चूत की कुटाई और अब गांड की कुटाई में. दीपू वसु की गांड मारते हुए आगे झुक कर उसकी झूलती हुई चूचियों को पकड़ कर उसे मसलने लगता है और इस दोहरे हमले में वसु को भी बहुत मजा आता है.

१० मं तक ऐसे ही चोदने के बाद दीपू बिस्तर पे लेट जाता है और वसु अपनी गांड उसके लंड पे रख कर उछलने लगती है.

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अब उसका गांड भी काफी हद तक खुल गया था और अब लंड बड़े आसानी से उसकी गांड में अंदर बाहर हो रहा था. अब पूरे कमरे में फच फच की आवाज़ों से कमरा गूँज रहा था और ये आवाज़ दोनों के लिए एक तरह से निमंत्रण था. दीपू भी बड़ी शिद्दत से वसु की गांड मार रहा था और वसु भी ऐसे ही उत्तेजित होकर अपनी गांड मरवा रही थी. ये सिलसिला काफी देर तक चलता रहा और आखिर में दीपू से भी रहा नहीं जाता वो आखरी में ३- ४ ज़ोरदार झटके मारते हुए वसु की गांड में ही झड़ जाता है. जब से वो दोनों बाथरूम से आये थे... अब तक एक घंटे से ज़्यादा हो गया था. अभी आधी रात हो गयी थी और दोनों भी बहुत थक चुके थे. आखिर में वसु भी दीपू के बगल में लुढ़क कर गिर जाती है और फिर थोड़ी देर बाद दीपू के कंधे पर अपना सर रख कर अपनी सांसें दुरुस्त करती रहती है. थोड़ी देर बाद...

वसु दीपू से: तुमने आज मेरी ज़िन्दगी का सबसे अच्छा तोहफा दिया है. मैंने अपनी जन्मदिन इतना अच्छा कभी नहीं बिताया है.



दीपू भी प्यार से वसु का माथा चूमते हुए... मेरे लिए भी आज का दिन स्पेशल था. चलो अब सो जाते है... वर्ण सुबह उठने में देरी होगी. वसु: देरी तुम्हे होगी... मुझे नहीं. दीपू: मतलब? वसु: बुद्धू देरी तुम्हे ऑफिस में जाने के लिए होगी. मैं तो घोड़े बेच कर सोने वाली हूँ. दोनों इस बात पे हस देते है और एक दुसरे की बाहों में सो जाते है.

Note: This time also, took a lot of effort to write this mega update (7000+ words). Hope aap भी इस अपडेट को उतना ही प्यार देंगे जितना मुझे मेहनत लगा लिखने में. Look forward to the likes, comments and support. Thank you.
 
अपडेट लिख रहा हूँ. अगर आज हो गया तो पोस्ट कर दूंगा... नहीं तो कल.. साथ बने रहिये
 
35th Update (रात के मजे जारी है) (Mega Update)

दीपू भी प्यार से वसु का माथा चूमते हुए... मेरे लिए भी आज का दिन स्पेशल था. चलो अब सो जाते है... वर्ण सुबह उठने में देरी होगी. वसु: देरी तुम्हे होगी... मुझे नहीं. दीपू: मतलब? वसु: बुद्धू देरी तुम्हे ऑफिस में जाने के लिए होगी. मैं तो घोड़े बेच कर सोने वाली हूँ. दोनों इस बात पे हस देते है और एक दुसरे की बाहों में सो जाते है.

अब आगे..

अगली सुबह:


अगली सुबह दीपू उठता है तो देखता है की वसु घोड़े बेच के सो रही है. उसे देख कर दीपू को हसी आती है और वो प्यार से उसका माथा चूम कर फ्रेश होने बाथरूम जाता है.

फ्रेश हो कर वो किचन में जाता है तो कविता वहां पर चाय बना रही होती है. वो जाकर कविता को पीछे से पकड़ कर उसके कान को चूमते हुए उसकी चूची दबाता है.

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कविता: आह...आह सुबह सुबह फिर से चालु हो गए. रात को मजा नहीं आया क्या?

दीपू: रात की बात अलग है और सुबह की. वैसे भी तुममे में और वसु में फरक भी है ना.

कविता: तुम तो बड़े ज़ालिम निकले.

दीपू: क्यों क्या हुआ?

कविता: होना क्या है... रात को तुम दोनों मजे कर रहे थे और हम को अकेले छोड़ दिया. ठीक से सो भी नहीं पाए.

दीपू: क्यों? सोये क्यों नहीं?

कविता: सोते कैसे? रात भर तो इतनी आवाज़ें आ रही थी तुम्हारे कमरे से. वैसे मेरी बन्नो अब कैसी है?

दीपू: तुम ही जाकर देख लो ना तुम्हारी बन्नो कैसे है और उसे पलट कर... तुम तुम्हारी बन्नो को देख लेना लेकिन पहले मेरा मुँह तो मीठा कर दो और ऐसा कहते हुए वो कविता को चूमता है तो कविता भी सुबह सुबह पूरी उसका साथ देती है और दोनों २ - ३ min तक एक दुसरे को चूस चूस कर रस पीते है.

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२ Min बाद कविता: अब मुझे जाने दो और दीपू को धक्का देते हुए उसे अलग करती है. उसे चाय देकर वो कमरे में जाती है वसु को देखने के लिए.

कविता फिर चाय लेकर वसु के कमरे में जाती है तो देखती है की वो मस्त सो रही है. उसको देख कर हस्ते हुए वो वसु को उठाती है.

कविता: उठ जा मेरी बन्नो. और कितना सोयेगी देख सुबह हो गयी है और दीपू को भी ऑफिस जाना है.

वसु अंगड़ाई लेते हुए: सोने दे ना. मुझे बहुत नींद आ रही है.

कविता: वो तो बड़ा ज़ालिम निकला. लगता है तुझे सोने नहीं दिया.

वसु: हाँ रे... पूरी रात पेलता रहा और सोने नहीं दिया. १- २ घंटे पहले ही सोई हूँ. इसीलिए तो कह रही हूँ सोने दे कर के.

कविता: अभी नहीं. पहले उठ कर फ्रेश हो जा. दोपहर को सो जाना. कोई तुझे रोकेगा नहीं. वैसे तू पलट और देकने दे तेरी क्या हालत हैं. ऐसा कहते हुए कविता वसु को पेट के बल सुला कर उसकी कमर से चादर निकल कर उसकी गांड देखती है. उसमें से अभी भी थोड़ा पानी आ रहा था और उसकी गांड काफी खुली हुई और सूझ गयी थी.

कविता उसको देख कर: क्या बात है बन्नो लगता है रात को तुझे मस्त तरीके से चोदा है. अभी भी तेरी गांड से पानी निकल रहा है और ऐसा कहते हुए कविता उसकी गांड की तरफ झुक कर उसकी गांड को चाटती है और उसमें से निकला पानी को चाट कर कहती है... पानी अभी भी सूखा नहीं है.

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और वैसे भी लगता है की उसने तेरी गांड पूरी खोल दी है. मेरी २ उंगलियां भी आराम से जा रही है और ऐसा कहते हुए कविता वसु की गांड में २ उंगलियां दाल कर अंदर बाहर करने लगती है.

वसु: मत करना नहीं तो मैं फिर से बहक जाऊँगी.

कविता: मुझे पता है. एक बार जब गांड में लेना शुरू करोगी तो वहीँ लेने की इच्छा होगी.

वसु: हाँ सही कहा. पहले तो बहुत दर्द हुआ लेकिन फिर बाद में बहुत मजा आया. अब अपनी उंगलियां निकाल वर्ना...

कविता: वर्ना क्या?

वसु कुछ बोलने को होती इतने में वहां दिव्या भी आ जाती है.

दिव्या: मैं तो तुम दोनों को किचन में ढूढ़ रही थी लेकिन तुम दोनों तो सुबह सुबह ही मेरे आने से पहले ही शुरू हो गए?

कविता: देख ना वसु की क्या हालत हो गयी है और ऐसा कहते हुए कविता वसु की गांड को थोड़ा फैला देती है और दिव्या को दिखाती है और उसकी गांड खुल जाती है और अंदर का लाल छेद सब दीखता है.

दिव्या उसे देख कर अपना मुँह खोले कहती है... बाप रे... लगता है ये दोनों रात में बहुत मजे किये और मुझे भी पता नहीं था की दीपू दीदी की गांड का उद्धघाटन करेगा.

कविता: इसीलिए तो कल दीपू ने रात में कहा था की वो वसु के साथ अकेला सोयेगा और देख अभी भी इसकी गांड से पानी निकल रहा है और मैंने चख भी लिया है.

दिव्या कविता के पास आकर: मुझे भी चकना है और कविता को पकड़ कर उसके होंठ चूसने लगती है जिसमें कविता भी उसका साथ देती है और दीपू का पानी एक दुसरे से शेयर करते है.

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वसु दोनों को देख कर मुस्कुराती है लेकिन कुछ नहीं कहती.

इतने में दीपू कमरे में आता है और तीनो को देख कर हस्ते हुए कहता है: मैं नहाने जा रहा हूँ. कोई आएगा क्या मेरे साथ? तीनो एक साथ: ना बाबा... तुम अकेले ही नहा लो. हमें पता है अगर हम तुम्हारे साथ आएंगे तो तुम फिर से शुरू हो जाओगे. दीपू कुछ नहीं कहता और हस्ते हुए बाथरूम में चला जाता है नहाने.

थोड़ी देर बाद जब दीपू नहा कर बाहर आता है तो तीनो ऐसे ही मस्ती करते रहते है.

दीपू: अरे यार देखो मेरी पीठ में कुछ हुआ हस क्या? जलन हो रही हैऔर मेरा हाथ वहां नहीं पहुँच रहा हैऔर दीपू पीछे मुड कर अपने पीठ उन्हें दिखाता है.

दीपू के पीठ पे बहुत खरोंचे दिख रही थी और ऐसा लगता हैजैसे किसी ने उसकी पीठ पर नाखून से खरोंचा है. तीनो उसकी पीठ देख कर उसके पास जाते है और पूछते है की ये कैसा हुआ? पहले तो कभी ऐसा नहीं हुआ था. फिर दीपू को रात की याद आती है और वसु को देखते हुए कहता है... ये तो वसु ही बता सकती है.

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जब दीपू ये बात बोलता हस तो वसु दीपू को देखती रहती है और फिर उसे भी रात का ख्याल आता हस जब उसने उत्तेजना में दीपू की पीठ पर अपने नाखून गाढ़े थे. वसु को जब याद आता हस तो उसकी आँखों से आंसू आ जाते हस और दीपू से कहती हस की ये मेरी गलती है और रोने लगती है. दीपू उसे अपनी बाहों में लेकर चुप कराता हस और कहता हस की इसमें रोने की क्या बात है?

वसु: मुझे दुःख होगा ना की तुम्हारी पीठ पे मेरी नाखून के निशाँ है.

दीपू: अरे ये तेरी नाखून के निशाँ नहीं बल्कि हमारे प्यार की निशानी है. देखो तुम्हारे बदन पे भी ऐसे निशाँ है और दिव्या और कविता को वसु का गाला दिखाता है जहाँ पर उनके प्यार की निशानी थी.

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दीपू को थोड़ी मस्ती सूझती हस तो वो वसु के बदन से चादर हटा कर दिव्या और कविता से कहता है: देखो हमारे प्यार की निशानी इसकी चूची पे भी है. आगे से तुम लोगों को भी ऐसे ही निशानी दिखेगी अपने बदन पर और दोनों को आँख मार देता है.

वसु ये बात सुनकर एकदम शर्मा जाती हस और अपने हाथ से अपनी चूचियों को ढकने की कोशिश करती है.

दीपू: अब क्या शर्माना?

वसु दीपू को देखती रहती है तो दिव्या और कविता दोनों हस देते है और फिर झुक कर दोनों वसु की चूची पे टूट पड़ते है और दोनों एक एक को लेकर चूसना शुरू कर देते है.

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दीपू: चलो मैं ऑफिस के लिए निकल जाता हूँ. तुम सब आराम करो. आज रात को तुम्हे (दिव्या और कविता) को जागना है. जाते वक़्त वो तीनो के होंठ पे गहरा चुम्बन देता है जिसमें तीनो उसका साथ देती है और फिर वो अपने ऑफिस के लिए निकल जाता है और दिव्या उसे छोड़ने बाहर चले जाती है.. फिर वसु भी बाथरूम में चली जाती है और नहा धो कर फ्रेश हो कर चाय पीती है.

कविता: सुनो वसु मैं सोने जा रही हूँ. मुझे दो घंटे बाद उठा देना.

वसु: मैं रात भर जागी रही तो समझ आता है लेकिन अभी तुझे क्यों नींद आ रही है?

कविता: इसीलिए बन्नो की हमें भी रात भर नींद नहीं आयी. चल मुझे सोने दे.

वसु: ऐसे कैसे सोने दूँगी तुझे और वो कविता को बिस्तर पे फेक देती है और उसके ऊपर छड़ कर उसकी आँखों में देखते हुए उसकी चूची को दबाते हुए: बोल ना रात को नींद क्यों नहीं आयी तुझे?

कविता इस बात से शर्मा जाती है और वसु को पकड़ के उसके होंठ चूमते हुए धीरे से उसके कान में कहती है: लगता है मैंने मीना को भी एक तरह से समझा दिया है की दीपू उससे “मिलने” जल्दी ही आने वाला है.

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वसु: ये तो बड़ी अच्छी बात है. अगर मीना भी माँ बन जाए तो मैं भी दादी बन जाऊँगी. वैसे बताना रात को तूने क्या किया की मीना समझ गयी है.

कविता: तो फिर सुन...


पिछली रात कविता के कमरे में:

पिछली रात को जब दीपू और वसु अपने प्यार के रंग में रंग रहे थे वहीँ कविता और मीना को उनकी आवाज़ें और सिसकियाँ सुनाई दे रही थी.

दोनों कविता और मीना को नींद नहीं आ रही थी और सोते वक़्त दोनों की पीठ एक दुसरे की तरफ थी. उनकी आवाज़ सुनकर दोनों उत्तेजित हो चुके थे और एक दुसरे के बिना जाने अपनी चूत मसल रही थी. लेकिन वो अपनी उत्तेजना को कितनी देर तक रोक पाते एक दुसरे के जाने बिना. कविता का हाथ पूरी उसके चूत के पानी से भीग गया था क्यूंकि वो इतनी उत्तेजित हो गयी थी. ऐसा नहीं था की पहले आवाज़ नहीं आती थी लेकिन आज आवाज़ें कुछ ज़्यादा ही आ रही थी (क्यूंकि उनको पता नहीं था की दीपू आज वसु की गांड मार रहा है.) और यही हाल मीना का भी था.

कविता को नींद नहीं आती तो वो पलट कर मीना की तरफ देखती है तो वही हाल मीना का भी था. आखिर में दोनों एक दुसरे को देखते है और मीना कहती है

मीना: आज ये आवाज़ें बहुत ज़ोर से आ रही है. क्या दीपू... ऐसा बोल कर मीना रुक जाती है तो कविता मीना की आँखों में देख कर कहती है: हाँ बेटी जो तू सोच रही है वो सही है. दीपू लम्बे रेस का घोडा है और वो जल्दी थकता नहीं है बल्कि हमें थका देता है. तेरा तो पता नहीं लेकिन मैं बहुत उत्तेजित हो चुकी हूँ और मेरी चूत एकदम गीली हो गयी है.

मीना कविता को देखते हुए: माँ आप ये कैसी गन्दी बात कर रही हो और अपनी आँखें झुका लेती है.

कविता: बेटी इसमें क्या गन्दी बात है? जो है वो है और मैं झूट नहीं बोल रही हूँ. कविता को लगता है की मीना शर्मा रही है और उसका शर्माना दूर करना पड़ेगा तो वो मीना का हाथ पकड़ कर अपनी चूत पे रख देती है.

मीना को लगा नहीं था की उसकी माँ कभी ऐसा कर सकती है तो मीना झट से अपना हाथ छुड़ा लेती है.

मीना: आप क्या कर रही हो?

कविता फिर मीना के ऊपर आ जाती है और उसकी आँखों में देखते हुए कहती है.... क्यों मनोज ने कभी ऐसा नहीं किया क्या?

मीना थोड़ा शर्माते हुए: कभी नहीं.

कविता: एक बात कहूँ... बिस्तर पे तू जितनी शर्माएगी तो उतना ही पछ्तायेगी. तुझे कभी मजा नहीं आएगा. पहले में भी तेरी ही तरह थी. बहुत शर्माती थी और जिसे तो गन्दी बात कहती हो मैं भी कभी नहीं कहती थी. लेकिन दीपू, वसु और दिव्या ने कमरे में मुझे पूरा बेशरम बना दिया और तब से मुझे भी रोज़ मजे मिलते है और मैं भी खूब मजे देती हूँ.

कविता मीना के होंठ चूमती है तो फिर से मीना चौक जाती है क्यूंकि अब तक किसी औरत/लड़की ने मीना को ऐसा चूमा नहीं था. मीना शर्म से अपने होंठ बंद ही रखती है जिसे कविता समझ जाती है.

कविता: अपनी जुबां खोलना. मीना कविता की आँखों में देख कर मना करती है तो कविता हस्ते हुए अपना एक हाथ उसकी चूची पे रख कर ज़ोर से दबा देती है तो मीना की सिसकारी निकल जाती है तो उसी वक़्त कविता फिर से मीना को चूमती है और इस बार अपनी जीभ उसके मुँह में घुसा देती है मीना के होंठ और जुबां चूसने लगती है.

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यह १- २ Min चलता है. मीना को पहले थोड़ा अजीब लगता है लेकिन अब उसे भी थोड़ा मजा आने लगता है.

कविता उसको चूमते हुए अब उसकी दोनों चूचियां दबाते रहती है तो मीना भी बहकने लगती है. मीना सिसकारियां लेते हुए कहती है की उसे भी अब अच्छा लग रहा है और उसे कुछ हो रहा है.

कविता ये बात सुनकर हस देती है और उसके गले को चूमते हुए उसकी चूची पे आ जाती है और उसके कपडे निकालते हुए उसकी एक चूची को मुँह में लेकर चूसने लगती है. मीना से भी अब रहा नहीं जाता और वो कविता का सर अपनी चूची पे दबा देती है. कविता को अब लगता है की मीना भी खुल रही है. वो एक चूची को मुँह में लेकर चूसती है तो दोस्सरे को ज़ोर से दबाती है.

अब मीना भी रंग में आने लगती है. १० Min तक मीना की चूचियों को चाटने और चूसने के बाद कविता फिर से मीना के ऊपर आकर फिर से उसको चूमती है तो इस बार मीना पूरे जोश में कविता को चूमती है और दोनों एक दुसरे का रस पीते है. कुछ देर बाद दोनों अलग होते है तो हफ्ते रहते है.

मीना:आज तक मेरे साथ ऐसा कभी नहीं हुआ है माँ... और फिर थोड़ा शर्माते हुए... अच्छा भी लगा.

कविता: ये हुई ना बात मेरी बेटी. बिस्तर पे तू जितना खुलेगी उतना ही तुझे मजा आएगा.

मीना: लेकिन मनोज तो कभी ऐसा नहीं करता.

कविता: इसीलिए तो इतना शर्माती है. मीना भी अब थोड़ा खुलने लगती है तो कहती है: वैसे आप तो बहुत अच्छे से चूमती हो. मैंने आज तक किसीको ऐसा नहीं चूमा.

कविता: मतलब?

मीना शर्माते हुए: जब आपने अपनी जुबां मेरे मुँह में डाल कर... ऐसा बोलते हुए मीना रुक जाती है तो कविता कहती है: बेटी अभी तो तुझे बहुत कुछ जानना है. वैसे में भी तेरी तरह ही थी. मुझे भी पहले ठीक से चूमना नहीं आता था... लेकिन मेरा पति और दो सौतन है ना... मेरा सब शर्म दूर कर दिया और अब तो दोनों होंठ को बहुत अच्छे से चूमती हूँ.

मीना थोड़ा आश्चर्य से कविता को देख कर: दोनों होंठ?

कविता मीना के कान में कहती है... हाँ... दोनों होंठ... एक ऊपर के और एक नीचे के... और ऐसा कहते हुए कविता मीना की चूत पे अपना हाथ रख कर ज़ोर से दबा देती है और कहती है... ये है दूसरी होंठ... कविता के ऐसे करने से मीना भी बेहक जाती है और फिर से कविता का सर पकड़ कर उसके होंठ पे टूट पड़ती हैं जैसे उसकी जुबां को खा जायेगी.

थोड़ी देर बाद... मीना: माँ अभी भी उस कमरे से बहुत आवाज़ आ रही है.

कविता: मैंने कहा था ना... दीपू बहुत लम्बी रेस का घोडा है. और वैसे भी आज वसु का जन्मदिन है तो उसकी हालत तो बुरी होनी ही है.

कविता फिर मीना को चूमते हुए नीचे की तरफ जाती है और पहले चूचियां, गहरी नाभि और मीना की जांघ को अच्छे से चूमती और चाटती है. इतना करते है मीना झड़ जाती है और आज काफी दिनों बाद उसका पानी निकला था... क्यूंकि इतने दिनों के बाद उसे ऐसा मजा मिल रहा था. कविता चूमते और चाटते हुए जब वो मीना की चूत के पास आती है तो देखती है की वहां पर थोड़े बाल है.

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कविता मीना की तरफ देख कर: ये क्या... इतने सारे बाल बढ़ा रखे है तुमने? साफ़ क्यों नहीं करती? अगर ऐसा ही रहा तो इन्फेक्शन भी हो जाएगा. और वैसे एक बात बताओं..दीपू को एकदम साफ़ और चिकना चाहिए.

उसने हम सब को पहले ही कह दिया था इस बारे में. तो तू भी अब से एकदम चिकनी और साफ़ रखना.

मीना उसकी बात सुनकर हाँ में सर हिलाती है तो फिर कविता उसकी चूत चाटने लगती है और अपनी जुबां निकल कर ऊपर से नीचे तक चूत चाटने लग जाती है.

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मीना तो जैसे आसमान में पहुँच गयी थी क्यूंकि उसे आज तक इतना मजा कभी नहीं मिला था.. एक और बात थी की आज तक वो किसी औरत के साथ बिस्तर पे नहीं थी... और आज वो इस बिस्तर पे किसी और के साथ नहीं बल्कि उसकी माँ के साथ ही बिस्तर पे मजे ले रही थी.

कविता उसकी चूत को चूमते हुए एक ऊँगली उसकी चूत में डालते हुए अंदर बाहर करती है तो ये दोहरा झटका मीना सेहन नहीं कर पाती और कविता का सर पकड़ कर उसकी चूत पे दबा देती है और ज़ोर ज़ोर से सिसकारियां लेने लगती है.

लेकिन ये आवाज़ दुसरे कमरे की आवाज़ों से कम ही था.

कविता भी अपनी जुबां को उसकी लाल गुलाबी रस से भरी चूत में अंदर तक ठेल देती है और बड़ी शिद्दत से उसकी चूत को चूसने लगती है. ७- ८ Min में ही मीना फिर से झड़ कर जैसे जमीन पे आ जाती है और हफ्ते रहती है.

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कविता अपना सर उठा कर मीना को देखती है और उसके चेहरे पे संतुष्टि के भाव देख कर उसे भी बड़ा सुकून मिलता है और ऊपर आकर मीना को देखते हुए फिर से अपने होंठ उसके होंठ से जोड़ देती है और दोनों फिर से एक गहरी लम्बी चुम्बन का मजा लेते है. मीना को इस बात का पता नहीं था की इस चुम्बन में वो खुद अपना रस चख रही थी.

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कविता मीना को देख कर: कैसा लगा?

मीना: बहुत अच्छा लगा. मुझे पता नहीं था की एक औरत को चूमने में इतना मजा आता है.

कविता: मेरी लाडो मेरा पूछने का मतलब था की तेरा रस कैसे लगा तुझे?

मीना: मैं समझी नहीं.

कविता: जब ५ Min पहले जब हम दोनों एक दुसरे का रस चूस रहे थे तो तुमने अपनी चूत का रस चखा है. जब मैं तुम्हारी चूत चूस रही थी तो तुमने अपना पानी गिरा दिया था जो मैंने बड़े चाव से चक लिया था और वही तुमने चखा था मेरी जुबां से.

मीना कविता की बात सुनकर एकदम शर्मा जाती है और कुछ नहीं कहती.

कविता: चिंता मत कर... अभी तुझे बहुत कुछ सीखना है. चल जैसे मैंने तुझे संतुष्ट किया है तू भी मुझे कर. मेरी चूत भी बहुत गीली हो गयी है.

मीना फिर से कविता को चूमते हुए उसके चूची को पकड़ कर कहती है: ये इतने बड़े कैसे हो गए है? मेरे तो काफी छोटे है.

कविता जान बूझ कर: क्या बड़े हो गए है?

मीना थोड़ा हिचखिचाती है लेकिन आखिर कह ही देती है: ये तुम्हारी चूचियां.

कविता: मैंने कहा था ना... बिस्तर पे एकदम बेशरम बन जा और अपने बदन के अंगों को जैसे देसी भाषा में बोलते है वैसे ही बोलै कर. तुझे भी बहुत मजा आएगा.

मीना: मैं समझ गयी माँ... तो बोलो ये चूचियां तो मेरे हाथ में भी सही से नहीं आ रहे है. काफी बड़े हो गए है. मेरे कब इतने बड़े होंगे?

कविता: जब से शादी हुई है तब से एक भी दिन ऐसा नहीं रहा जब दीपू या वसु या दिव्या ने इसे चूसा और दबाया ना हो. वो तीनो तो रोज़ इससे बहुत खेलते है और इसे चूस चूस कर ही मेरा पानी निकाल देते है. और हाँ जब तक तू यहाँ है और जिस दिन तू दीपू के पास जायेगी तो तब से रोज़ ये दबाएगा और जल्दी ही मेरी तरह ही तेरे भी बड़े हो जाएंगे और मीना को आँख मार देती है.

अब तेरी बारी है तो तू भी ज़रा अच्छे से चूस दे. कविता की ये बात सुनकर मीना भी अच्छे से चूसती और चाटती रहती है और वो तो उसके निप्पल को भी काटती है जिसमें कविता को भी बहुत मजा आता. फिर वो भी अपनी माँ की तरह उसके बदन से खेलते हुए नीचे जाती है और उसकी गोल और गहरी नाभि को जैसे एकदम खा जाती है. इससे तो कविता को तारे नज़र आते है. वो मीना का सर अपनी नाभि पे ज़ोर से दबा देती है और आज पहली बार (और ना जाने कितनी बार) झड़ जाती है और अपना पानी छोड़ देती है. कविता को बड़ा सुकून मिलता है झड़ने से और मीना जब उसकी चूत पे आकर देखती है तो एकदम गुलाबी रस से पूरा भरा हुआ था. जैसे वो एक तरह से मीना को दावत दे रहा था की आ जाओ और मुझे अच्छे से चूस लो.

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अब मीना भी पीछे नहीं हटने वाली थी और वो भी पूरे जोश और ख़ुशी से कविता की चूत को चूसने और काटने लग जाती है. वो भी उसकी माँ की तरह २ उंगलियां उसकी चूत में डालती है जो आसानी से चले जाते है.

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कविता तो जैसे जन्नत पे पहुँच गयी थी और वो अपना हाथ मीना के सर के ऊपर रख कर उसे अपनी चूत पे दबा देती है और उत्तेजना में बड़बड़ाती रहती है. उसे भी पता नहीं चलता की वो क्या बक रही है क्यूंकि वो भी उतनी ही उत्तेजना में थी.

मीना भी खूब कविता की चूत चूसती है

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और ८- १० Min के बाद जब कविता से रहा नहीं जाता तो ज़ोर से सिसकारी लेते हुए झड़ जाती है और अपना पूरा पानी गिरा देती है. मीना बी उसका पूरा पानी पी जाती है. पहले तो उसे थोड़ा अजीब लगा लेकिन बाद में उसे तो जैसे उसका पानी शहद जैसे लगा जिसे वो पूरा निगल गयी. मीना जब कविता को देखती है तो थकी हुई अपनी आँखें बंद कर के ज़ोर ज़ोर से सांसें ले रही थी.

मीना फिर ऊपर आकर कविता की तरह उसको चूमती है और कविता भी मीना के मुँह से अपना रस चख लेती है.

मीना: माँ कैसे लगा?

कविता: पूछ मत बेटी... तूने तो मुझे जन्नत तक ले गयी थी. ऐसा लगा ही नहीं की तू ये सब पहली बार कर रही है.

मीना: हाँ ये सब मेरे लिए पहली बार ही था लेकिन शायद मैंने वैसे ही किया जैसे आप ने किया था.

कविता फिर मीना को अपनी बाहों में ले कर कहती है: तू शायद सोच रही होगी तो मैंने तेरे साथ ऐसा क्यों किया. बात ये है की जब तू दीपू के साथ बिस्तर पे रहेगी तो तुझे कोई गिल्ट नहीं होना चाहिए की तू ये सब जबरदस्ती के लिए कर रही है. मैं सिर्फ इतना ही कहूँगी की तू पूरे मन से उसके पास जा और फिर जब तू माँ बन जायेगी तो तेरी ख़ुशी दुगनी हो जायेगी. मैं फिर से एक बार और कहूँगी की तू एक बार मनोज से बात कर ले और तुम दोनों को इसमें कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए आगे जा कर.

और हाँ एक बाद याद रखना. जब भी तुझे बच्चा होगा वो तेरा और मनोज का ही होगा (दुनिया की नज़रों में)भले ही तुम दीपू के साथ हम बिस्तर होगी. तुम दोनों मिलकर उसे अपना नाम देना. समझ गयी. यही हम सब भी चाहते है.

मीना: आप ठीक कह रही हो माँ. मैं तो पूरे दिल से उसके पास जाऊँगी लेकिन जैसे आपने कहा मैं एक बार फिर से मनोज से बात कर लेती हूँ.

कविता फिर मीना को देख कर प्यार से उसका माथा चूम लेती है और कहती है अब सो जाए?

मीना: नहीं माँ इतनी जल्दी नहीं. देखो अभी भी उसके कमरे से आवाज़ आ रही है. मैं तो ये सोच कर ही परेशान हूँ की मैं उसका लंड झेल पाऊँगी की नहीं.

कविता: चिंता मत कर. मैं उससे कहूँगी की आराम से करे. वो मेरी बात मान लेगा. एक और बात. दीपू ने मुझसे कहा है की जब तू उसके पास जायेगी तो मैं भी तेरे साथ रहूँ. वो नहीं चाहता की तू कोई गिल्ट फील करे.

मीना: हाँ ये सही रहेगा. जब आप मेरे साथ रहोगे तो मुझे भी कोई दिक्कत नहीं होगी.

कविता: चल हम दोनों एक दुसरे को मजे देते है.

मीना: वो कैसे?

कविता: हम दोनों एक दुसरे को एक बार फिर से चूस कर झाड़ा देते है तो दोनों को मजा आएगा.

मीना: कैसे?

कविता फिर बिस्तर पे सो जाती है और मीना की चूत को अपने मुँह में ले लेती है और उसी तरह से उसे भी सुला कर उसका मुँह अपनी चूत पे रख देती है. याने दोनों ६९ पोजीशन पे आ जाते है

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और फिर दोनों एक दुसरे की चूत में ऊँगली करते हुए चाटने और चूसने लगते है. ये मीना के लिए नया था क्यूंकि उसने इस पोजीशन में कभी भी नहीं किया था. उसे भी मजा आने लगा और देखते ही देखते दोनों एक दुसरे को संतुष्ट कर देते है और फिर से एक दुसरे का पानी निकल कर पी जाते है. इसमें दोनों को संतुष्टि मिलती है और आखिर में कविता मीना को अपनी बाहों में लेकर सो जाती है क्यूंकि दोनों भी बहुत थके हुए थे.


<Back to Present>

वसु: कविता की पिछली रात की बात सुनकर वसु कहती है: वाह तूने तो बहुत अच्छा किया .

वसु : मुझे ख़ुशी है की शायद मीना मान गयी है. मुझे उम्मीद है की तू जल्दी ही नानी बन जायेगी.

कविता: और तू दादी... दोनों हस देते है और दोनों फिर से एक दुसरे को गहरा चुम्बन देते है और सो जाते है.

दोपहर को जब दोनों सो कर उठते है तो वसु थोड़ा लंगड़ाते हुए चल रही थी क्यूंकि उसे अभी भी बहुत दर्द हो रहा था. लता उसको हॉल में ऐसे आता देख कर हस देती है और कहती है कल तुम्हारा जन्मदिन शायद “बहुत अच्छे” से मनाया गया है. वसु ये बात सुनकर एकदम शर्मा जाती है और झूठे गुस्से से लता को डाटती है.

लता: मैं तो मजाक कर रही थी. तू आराम कर. हम संभाल लेंगे.

वसु: वैसे दिव्या कहाँ है? वो दिख नहीं रही है.

लता: वो भी तेरे सामान घोड़े बेच कर सो रही है.

वसु: क्यों उसे क्या हुआ है?

लता: पता नहीं. वो भी तुम्हारी तरह ही सो रही है.

वसु:ठीक है मैं देख कर आती हूँ.


दिव्या के कमरे में:

वसु जब दिव्या के कमरे में जाती है तो देखती है की वो भी गहरी नींद में सो रही है. वसु उसे देख कर उसे उठाती है तो दिव्या भी अंगड़ाई लेते हुए उठ जाती है और वसु से कहती है: जन्मदिन तो तुम्हारा था. तुम्हारी क्या हालत है मुझे ठीक से पता नहीं लेकिन मेरी तो हालत एकदम बुरी है. बदन भी दुःख रहा है. सोने दो ना.

वसु: चल बकवास मत कर. दोपहर हो गयी है. और कितना सोयेगी. उठ जा. वैसे तेरे बदन क्यों दर्द कर रहा है?

दिव्या: जाओ पहले दरवाज़ा बंद कर दो. वसु दरवाज़ा बंद कर देती है तो दिव्या कहती है... ये बुआ भी ना... लगता है बहुत चुड़क्कड़ है.

वसु: क्यों क्या हुआ?

दिव्या: होना क्या है... कल रात को तुम्हारे कमरे से आवाज़ें आ रही थी और हम दोनों को नींद नहीं आयी तो बुआ तो मेरे ऊपर ही आ गयी और पूरा बदन निचोड़ दिया. मेरे होंठ, चूची, जांग, चूत और गांड... किसी को नहीं छोड़ा और खूब चूस चूस कर पता नहीं कितनी बार मुझे झडा दिया.

वैसे मैं भी पीछे नहीं थी. मैंने भी उसको पूरा निचोड़ दिया और उसे भी उतना ही मजा दिया.

वसु: उसको देख कर लगता तो नहीं है की इतना कुछ हुआ होगा.

दिव्या: वो मेरे से थोड़ी देर पहली ही जाग गयी होगी और देखना खाना खाने के बाद फिर से सो जायेगी.

वसु इस बात पे हस देती है और फिर प्यार से दिव्या के होंठ से अपने होंठ मिला देती है और दोनों भी एक मस्त चुम्बन में जुड़ जाते है.

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वसु: एक बात बताओं...

दिव्या: क्या?

वसु: तुम्हारे जैसे हाल कविता और मीना का भी है. वसु जब ये बात कहती है तो दिव्या अपना मुँह खोले आश्चर्य से वसु को देखती रहती है.

वसु: हाँ सही कह रही हूँ. सुबह जब मैं फ्रेश हो कर आयी थी तो कविता ने मुझे उनकी रात की बात बतायी... एक और बात... लगता है मीना भी अब दीपू के लिए तैयार हो रही है. दिव्या ये बात सुनकर खुश हो जाती है.

दिव्या: वैसे अब तुम्हारा दर्द कम हुआ के नहीं? मुझे पता है जब वो गांड मारता है तो बदन को पूरा तोड़ देता है.

वसु: हाँ ये एहसास मुझे भी कल हुआ है. लेकिन अब मैं थोड़ा ठीक हूँ.

दिव्या: चिंता मत करो... जल्दी ही तुम्हे भी इसकी आदत पड़ जायेगी और दोनों हसने लगते है.

दिव्या: वैसे लगता है जन्मदिन तुम्हारा हुआ... और बदन सब का टूटा.... इस बात पे दोनों हस्ते है और फिर वसु दरवाज़ा निकाल कर दोनों बाहर आ जाते है....


Note: दिव्याऔर लता का रात का Scene नहीं लिखा है क्यूंकि वो बोरिंग हो जाता. बस ये imagine कर लो की जैसे कविता और मीना ने रात बितायी थी वैसे ही इन दोनों की रात भी बीती. :)

मैं काफी Busy रहता हूँ अपने काम पर... और शायद उपदटेस थोड़े Delay हो रहे है ..लेकिन मेरे पिछले ३- ४ उपदटेस Mega Updates रहे है और उनको लिखने में बहुत टाइम लगता है... सोचना भी बहुत पड़ता है और कौनसा फोटो कहाँ ऐड करना है ये भी बहुत मुश्किल काम है. इसीलिए मैं आशा करता हूँ की इस अपडेट में Minimum ३५- ४० लाइक्स और कमैंट्स आएंगे. जब तक नहीं आते मैं नेक्स्ट अपडेट लिखना स्टार्ट नहीं करूंगा. मैं ये कोई गुस्से या नाराज़गी से नहीं कह रहा हूँ...लेकिन जब मैं इतना मेहनत करता हूँ एक अपडेट पोस्ट करने के लिए तू मुझे भी उतना ही Motivation मिलना चाहिए otherwise लिखने का कोई फायदा नहीं रहेगा. I hope you all agree and understand. Thank you.
 
36th Update (घर में खुशियों का आगमन)



दिव्या: वैसे लगता है जन्मदिन तुम्हारा हुआ... और बदन सब का टूटा.... इस बात पे दोनों हस्ते है और फिर वसु दरवाज़ा निकाल कर दोनों बाहर आ जाते है....



अब आगे..

अगली सुबह:



सब लोग अपना काम करते हस और चाय पीते हुए बातें करते रहते है. वसु अभी भी थोड़ा लंगड़ा कर चल रही थी जिसे देख कर सब अपनी हसीं दबा देते हस लेकिन वसु उनके चेहरे को देख कर समझ जाती है और थोड़े गुस्से नज़र से दीपू की तरफ देखती है. दीपू भी उसको देख कर आँख मार देता है.

थोड़ी देर बाद जब वसु किचन में जाती हस तो वहां से वो दीपू को बुलाती है. दीपू जब वसु के पास किचन में जाता हस तो

वसु: तुम कितने बेशरम हो गए हो. मुझसे ठीक से चला नहीं जा रहा हस और तुम आँख मार रहे हो.

दीपू: वसु को अपनी बाँहों में लेकर... इसमें शर्म कैसा? मैं तो अपनी बीवी को आँख मार रहा हूँ और तुम्हे भी याद होगा जब दिव्या और कविता का भी ऐसा हाल था जब... इतना बोल कर दीपू रुक जाता हस तो वसु उसे झूठे गुस्से से देखती हस और हस देती है.

दीपू दरवाज़े पे देखते है की कोई नहीं है तो उसका सर पकड़ कर अपने होंठ उसके होंठ से जोड़ देता है जिसमें वसु भी उसका पूरा साथ देती है और दोनों ३- ४ Min तक एक दुसरे का रस चूस लेते है.

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दोनों किस करते वक़्त दीपू वसु की गांड दबा देता है लेकिन वसु की हलकी चीख दीपू के होंठों पे डाब जाती है. ४ Min बाद जब दोनों अलग होते है तो वसु दीपू के सीने मैं हल्का मुक्का मारती है और उसे दूर कर देती है.

दीपू: चल जल्दी ठीक हो जाओ. अब तो रोज़ तुम्हारी गांड मारूंगा. उसके पास आकर उसके कान में: बोलो मेरा लंड लोगी ना अपने गांड में.

वसु: चुप कर. तुझे हर बार यही बात सूझती है क्या? बाहर निकल और ऑफिस के लिए तैयार हो जा. और उसे बाहर धकेल देती है. जब वो निकल जाता है तो वसु के चेहरे पे हसी आ जाती है और मन में सोचती है... कल सच में गांड मरवाने में बड़ा मजा आया... जितना दर्द देते है उतना ही मजा भी देता है……

और जैसे दीपू ने कहा था.... उस रात वो दिव्या की जम के बजाता है आगे और पीछे से और उसे भी पूरा खुश कर देता है. दिव्या का भी वो वसु जैसा हाल कर देता है. कविता बच जाती है क्यूंकि वो उस रात मीना के साथ सोई हुई थी.



कुछ दिनों बाद:



कुछ दिनों बाद सुबह सब अपने काम में लगे रहते है. दीपू भी अपने ऑफिस चला गया था. घर में सब लोग बैठ कर ऐसे ही बात कर रहे थे. वसु को थोड़ा चक्कर आता है और और उसका सर थोड़ा भारी लग रहा था.

वसु: मुझे थोड़ा चक्कर आ रहा है और ऐसे बोलते हुए उसके पेट में थोड़ा गड़बड़ होता है और वो भाग कर बाथरूम में चली जाती है जहाँ उसे उल्टियां होने लगती है. वसु के हालत देख कर कविता और दिव्या भी उसके पीछे भागते है लेकिन वसु बाथरूम में जा कर दरवाज़ा अंदर से बंद कर लेती है.

कविता: क्या हुआ? तुमने दरवाज़ा क्यों बंद कर दिया?

थोड़ी देर बाद वसु अपने आप को थोड़ा ठीक करते हुए बाथरूम का दरवाज़ा खोलती है और कहती है... सर थोड़ा चकरा रहा था और थोड़ी उल्टियां भी हुई है.

कविता ये बात सुन कर: क्या बात है क्यूंकि उसे शायद पता चल गया था की वसु को चक्कर क्यों आ रहा है.

कविता उसे अपनी बाहों में लेकर कान में कहती है: बन्नो बधाई हो. लगता है तू माँ बनने वाली है.

दिव्या को कुछ पता नहीं चलता तो वो उन दोनों को ऐसे देख कर पूछती है की वसु को क्या हुआ है?

कविता: अरे बुद्धू तू जल्दी से मौसी बनने वाली है या फिर छोटी माँ. दिव्या ये बात सुनकर एकदम खुश हो जाती है और वसु को गले लगा लेती है.

वसु: मुझे पता नहीं की तुम जो कह रही हो वो सही है या नहीं.

कविता: क्यों जब दीपू और निशा पैदा हुए थे तो तुझे उल्टियां नहीं आयी थी क्या? और ऐसा बोल कर कविता हस देती है और कहती है चल तुझे डॉक्टर के पास लेकर जाते है.

बाहर आने से पहले कविता दोनों से कहती है की फिलहाल ये बात मीना और लता को ना बताएं. जब कन्फर्म हो जाएगा तभी उन्हें बताएँगे और उन्हें थोड़ा सरप्राइज भी देंगे. इस बात पे दोनों मान जाते है और अपने आप को ठीक करके बाथरूम से बाहर आ जाते है.

लता: क्या हुआ वसु को?

कविता: कुछ नहीं दीदी... इसका सर थोड़ा भारी लग रहा है. एक बार डॉक्टर को दिखा कर ले आते है.

लता: हाँ ठीक रहेगा.

दिव्या: मैं एक बार दीपू को फ़ोन कर के उसे भी हॉस्पिटल आने को कहती हूँ.

लता: हाँ उसे भी पता चलना चाहिए ना की उसकी बीवी की हालत ठीक नहीं है और ऐसा कहते हुए सब हस देते है.

दिव्या दीपू को फ़ोन करती है. ठीक उसी वक़्त दीपू किसीसे मिलने बाहर गया था और जल्दबाज़ी में अपना फ़ोन नहीं ले जाता. जब दिव्या फ़ोन करती है तो ऋतू उसका फ़ोन receive करती है.

दिव्या: दीपू?

ऋतू: मैं ऋतू बोल रही हूँ. दीपू थोड़ा बाहर गया है. बोलो क्या काम है.

दिव्या: कुछ नहीं माँ जी… लगता है दीदी वसु की थोड़ी तबियत खराब हो गयी है. हम उसे डॉक्टर के पास ले जा रहे है. अगर दीपू होता तो उसे भी वहाँ आने को कहते.

ऋतू थोड़ा घबराते हुए: सब ठीक तो है ना दिव्या. अचानक वसु की तबियत को क्या हुआ है?

दिव्या: पता नहीं माँ जी. डॉक्टर के पास जाएंगे तो पता चलेगा.

ऋतू: मैं भी आऊं क्या?

दिव्या: नहीं माँ जी ज़रुरत नहीं है. हाँ हो सके तो शाम को एक बार आ जाना. सब से मुलाकात भी हो जायेगी और तब तक हम दीदी को डॉक्टर के पास भी दिखा लाएंगे.

ऋतू: हाँ ये ठीक कहा तुमने. हम शाम को आ जाएंगे.

दिव्या: ठीक है मा जी और दीपू को भी बता दीजिये.

ऋतू: तू चिंता मत कर. जैसे ही वो यहां आएगा मैं उसे बता दूँगी. वो जल्दी ही वहाँ पहुँच जाएगा और फिर फ़ोन रख कर देती है.



हॉस्पिटल में:



कविता और दिव्या फिर वसु को डॉक्टर के पास लय जाते है. डॉक्टर उसे चेक करती है और दोनों को देख कर कहती है... इनके पति कहाँ है?

कविता: जी वो अपने काम पे गए है.

डॉक्टर: आप दोनों कौन हो?

दिव्या: हम इसकी बहने है. वैसे दीदी की हालत कैसी है? वो ठीक तो हो जायेगी ना?

डॉक्टर: चिंता करने की कोई बात नहीं है. बस खुश खबर ही है की आपकी दीदी पेट से है और वो जल्दी ही माँ बनने वाली है. डॉक्टर की बात सुनकर जहाँ कविता और दिव्या खुश हो जाती है वहीँ वसु शर्मा कर अपने सर नीचे कर लेती है.

डॉक्टर: इसीलिए मैंने इनके पति के बारे में पुछा था.

कविता: जी ये बात हम उनको बता देंगे.

डॉक्टर: ठीक है लेकिन अब इनका ज़्यादा ख्याल रखना. कोई भारी चीज़ उन्हें उठाने मत देना और अब इनको आराम की बहुत ज़रुरत है और जहाँ तक हो सके इसको खुश रखना. ये जितना खुश रहेगी बच्चा भी उतना ही अच्छा और तंदुरुस्त होगा. और समय समय पे दवायें लेते रहना.

कविता: जी समझ गए. और फिर तीनो हॉस्पिटल से घर के लिए निकल जाते है.

कार में जब तीनो बैठे होते है तो कविता और दिव्या दोनों वसु को बहुत बधाई देते है और प्यार से उसके पेट पे हाथ रख कर कविता धीरे से उसके कान में कहती है: बधाई हो बन्नो. तू फिर से माँ बनने वाली है. वसु थोड़ा शर्मा जाती है और उसी लय में कहती है धीरे से... चिंता मत कर... तू भी मेरी तरह ही जल्दी से पेट से हो जायेगी. जिस तरह दीपू अपना माल तेरे अंदर ही छोड़ता है मुझे पता है तेरा भी ऐसे ही हालत जल्दी ही हो जायेगी और ऐसे ही बातें करते हुए वो घर आ जाते है.

तब तक दीपू भी घर आ जाता है. ऑफिस में जब वो अपने सीट पे आया था तो ऋतू ने उसे बताया था की वसु की हालत ठीक नहीं है. वो वसु को फ़ोन करता है तो उसका फ़ोन स्विच ऑफ होता है तो वो लता को फ़ोन करता है और वो कहती है की वो तीनो हॉस्पिटल गए है और वो जल्दी ही घर आ जाए.



घर पे:



घर में सब लोग उनके आने का इंतज़ार कर रहे होते है. दीपू से रहा नहीं जाता और वो टहलते हुए फिर से फ़ोन करता है तो इस बार कविता फ़ोन receive कर के कहती है की वो सब घर आ रहे है.

दीपू: माँ को क्या हुआ है? तो ठीक तो है ना?

कविता: हम जल्दी ही घर आ रहे है और तुम्हे सब बता देंगे. अगर उतनी ही चिंता थी तो तू हॉस्पिटल क्यों नहीं आया?

दीपू: मुझे काम में थोड़ा देर हो गया इसीलिए नहीं आ पाया.

कविता: ठीक है इंतज़ार कर.... हम जल्दी ही घर आ रहे है.

थोड़ी देर बाद वसु कविता और दिव्या घर आ जाते है तो बाकी तीनो भी उनका ही इंतज़ार करते रहते है. उनको देख कर दीपू दौड़ कर वसु को पकड़ कर उससे पूछता है की उसे क्या हुआ है और वो अब कैसी है? वसु कुछ नहीं कहती और शर्म से अपनी आँखें नीचे कर लेती है.

दिव्या: अब इतनी जल्दी क्या है? हम घर आ गए है ना... हमें पहले पानी तो पीने दो. फिर मीना जा कर सब के लिए पानी लाती है और सब बैठ कर उनके बोलने का इंतज़ार करते है की आखिर बात क्या है और वसु की हालत क्यों बिगड़ी है.

कविता और दिव्या उन दोनों को देख कर मन में ही हस्ती रहती है.

आखिर में दीपू से रहा नहीं जाता तो वो कहता है: तुम लोग सब चुप क्यों हो? कोई बताएगा की आखिर बात क्या है.

कविता फिर दीपू की तरफ देख कर थोड़े गुस्से (दिखावा) से कहती है... तूने क्या किया है. वसु की ज़रा भी फ़िक्र नहीं है. दीपू को लगता है की सच में वसु को कोई बिमारी है और उसे चिंता सताने लगती है.

दीपू: मैंने क्या किया है?

कविता को लगता है की अब उसे और परेशान करना अच्छा नहीं है तो वो हस्ते हुए कहती है.... अरे पगले तेरी बीवी को कुछ नहीं हुआ है. दीपू को अब भी समझ नहीं आता तो पूछता है की फिर वो सब डॉक्टर के पास क्यों गए?

कविता फिर उठ कर दीपू के पास जाती है और उसके कान को पकड़ कर... बुद्धू तू बाप बनने वाला है.

कविता जब ये बात बताती है तो शॉक से पहले दीपू को कुछ समझ नहीं आता. २ Min बाद जब ये बात उसके दिमाग में जाती है तो ख़ुशी से कविता को पकड़ कर उसे गले लगाता है और फिर वसु की तरफ देखता है जो अपने सर नीचे करे हुए हस्ती रहती है.

लता और मीना भी ये बात सुनकर एकदम खुश हो जाते है तो दीपू वसु के पास आकर उसके चेहरे के ऊपर कर के उसकी आँखों में देखते हुए पूछता है तो वसु शर्म से हाँ कह कर अपनी आँखें नीचे कर लेती है. दीपू तो ख़ुशी से पागल हो जाता है और वो वसु को अपनी बाहों में लेकर ज़ोर से उसे गले लगा लेता है. इतने में लता और मीना भी उसके पास आकर वसु को प्यार से दुलारते है और उसे बधाई देते है.

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लता दीपू से: तू तो बड़ा तेज़ निकला रे और हस देती है.

अब घर में थोड़ा ख़ुशी का माहौल था तो इतने में दिव्या मिठाई लाती है और पहले दीपू को और फिर बाद में वसु को भी मिठाई पकड़ाती है. दोनों एक दुसरे को देख कर मिठाई आपस में बाटते है और एक दुसरे को खिलाते है. दीपू फिर सभी को अपने हाथ से मिठाई खिलाता है और सब ख़ुशी से मिठाई खाते है.

दोपहर को सब ख़ुशी से खाना खा कर आराम करने चले जाते है.

दीपू वसु को अपनी बाहों में लेकर ऐसे ही बातें करता रहता है तो इतने में वहां दोनों कविता और दिव्या भी आ जाते है.

दोनों वसु को देख कर कहते है: हमें बहुत ख़ुशी है की तुम माँ बनने वाली हो लेकिन थोड़ी जलन भी हो रही है. वसु उनकी बात समझ जाती है और दीपू की और देख कर कहती है... तुम क्या कहते हो?

दीपू हस्ते हुए क्यूंकि (उसे भी पता चल गया था की उन दोनों ने वो बात क्यों की)...मैं क्या कहूँ? अगर तुम सब एक साथ पेट से हो गए तो फिर तुम्हारे छोटे दीपू का ख्याल कौर रखेगा और हस देता है.

वसु: बात तो तुम्हारी सही है लेकिन उनकी बात भी सही है. कविता भी बिस्तर पे आकर दीपू के दुसरे कंधे पे अपना सर रख कर... मुझे भी जल्दी से माँ बना दोनों ना.... देखो मेरी उम्र भी वसु जितनी ही है. अगर और देरी हुई तो फिर मुझे भी कठिनाई हो सकती है और बड़े आस से दीपू की तरफ देखती है.

दिव्या भी झूटी गुस्से से कहती है... अगर तू भी पेट से हो गयी तो मैं क्यों पीछे रहूँ. जानू मेरे बारे में भी सोचो ना... कविता से: अगर तुम भी पेट से हो गयी तो फिर ये तो मुझे रोज़ सोने भी नहीं देगा और मेरी बजाते रहेगा. मैं उसे इतना ना झेल पाऊँगी.

दीपू: तुम दोनों की बात भी सही है.

दीपू कविता को देखते हुए: अगर तुम और मीना एक साथ पेट से हो गयी तो फिर मीना को एक भाई/ बेहन मिल जाएगी और तुम भी नानी बन जाओगी. क्या कहती हो?

कविता ये बात सुनकर एकदम शर्मा जाती है तो वसु उठकर कविता के पास आती है और उसको देखते हुए अपने होंठ उसके होंठ से जोड़ देती है और उसको चूमते हुए कहती है...

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दीपू की बात एकदम सही है. कविता शर्मा जाती है और कहती है की वो एक बार मीना से भी बात कर लेगी.

फिर ऐसे ही मस्ती की बातें करते हुए सब सो जाते है.



शाम को:



ऋतू और निशा भी उनके घर आते है और वसु के बारे में पूछते है तो फिर कविता दोनों को भी खुश खबर देती है तो दोनों भी बहुत खुश हो जाते है.

निशा वसु को कमरे में ले जाती है और निशा वसु को अपने गले लगा कर कहती है... माँ तुमने इतने दिनों बाद एक अच्छी खबर सुनाई है. मैं बहुत खुश हूँ और उसको देखते हुए उसकी आँखों से आंसूं निकल आते है.

वसु समझ जाती है और उसको अपने बाहों में लेकर कहती है: मैं समझ सकती हूँ बेटा तू क्यों रो रही है. अगर सब ठीक होता तो ऐसा खबर तुम मुझे देती और मैं नानी बन जाती लेकिन ऊपर वाले की बात को कोई नहीं टाल सकता.

निशा: नहीं माँ ये तो ख़ुशी के आंसूं है.

वसु: मैं तेरी माँ हूँ... मुझे सब पता है तू चाहे कितना भी झूट बोल दे.

निशा अब कुछ नहीं कह पाती और अपनी आँखें साफ़ कर के दोनों बाहर आते है.

ऋतू भी वसु को देख कर एकदम खुश हो जाती है और वो भी उसको थोड़ा अलग ले जाकर कहती है: तुमने तो बहुत अच्छी खबर दी हो वसु.

वसु ऋतू को अपने बाहों में लेकर उसका धन्यवाद करती है और जब देखती है की वो दोनों ही अकेले है तो उसके होंठ को प्यार से चूम कर कहती है... सच में...मैंने कभी नहीं सोचा था की इस उम्र में मैं फिर से पेट से हो जाऊंगी.

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ऋतू: अभी तेरी उम्र ही क्या है? तू तो अभी भी जवान और गदरायी लग रही हो. और दीपू तो एक हट्टा कट्टा नौजवान लड़का है. ये तो होना ही था और मैं भी बहुत खुश हूँ और फिर उसके चेहरे पर भी उदासी छा जाती है.

वसु ऋतू को गले लग कर... चिंता मत करो.. मुझे तुम्हारे और दिनेश के बारे में भी पता चला था की वो भी तुमसे शादी करना चाहता था जैसे दीपू ने मुझसे किया. लेकिन क्या पता भगवान् ने तुम्हारे और निशा के लिए कुछ सोचा होगा.

वैसे तुम भी तो अपने उम्र से बहुत काम ही लगती हो और तुम भी तो एकदम सेक्सी लग रही हो. अगर तुम चाहो तो लड़कों की लाइन लग जायेगी... बस तुम्हारी हाँ की देरी है. बोलो क्या कहती हो?

ऋतू: नहीं रे.... अभी मैं ऐसा कुछ नहीं सोच रही हूँ. मुझे तो निशा को लेकर बहुत चिंता हो जाती है. वो तो अभी भी जवान है और इतनी काम उम्र में ही वो विधवा हो गयी है.

वसु: मैं समझ सकती हूँ. हमें भी उसकी बहुत चिंता लगी रहती है. देखते है अगर मैं कुछ कर सकती हूँ तो....

और फिर दोनों बाहर आ जाते है और सब से मिल कर बातें करने लग जाते है. फिर सब लोग मिल कर ख़ुशी ख़ुशी से खाना खाते है और दोनों अपने घर चले जाते है भले ही दीपू और बाकी लोग उनको उस रात रुकने के लिए कहते है. लेकिन ऋतू नहीं मानती और दोनों ऋतू और निशा अपने घर चले जाते है.



मीना और मनोज की बातें:



अब लोग वसु का अच्छे से ध्यान रखते है और उसे कुछ कान नहीं करने देते. घर में सब काम कविता और दिव्या ही करते है. जब सब अपने काम में लगे रहते है तो मीना मनोज को फ़ोन करती है.

मीना मनोज से: कैसे हो तुम?

मनोज: मैं ठीक हो. क्या बात है बहुत दिनों बाद फ़ोन कर रही हो.

मीना: तुम्हे तो पता है ना.... अभी अभी ही यहाँ पर हालत थोड़ा ठीक हो रहा है. कल ही निशा और उसकी सास आये थे घर पे. उनको देख कर मुझे भी थोड़ा बुरा लगा.

मनोज: हम्म.... तुम्हारी बात भी सही है. बोलो और क्या बात है?

मीना: मैं जिसके लिए यहां इतनी देर से हूँ तुम्हे कोई आपत्ति तो नहीं है ना? कहीं ऐसा ना हो की जब मैं माँ बन जाऊं तो तुम्हे बुरा ना लगे. अगर भगवान् की मर्ज़ी है तो हम दोनों बिना माँ बाप बने ही अपनी ज़िन्दगी गुज़ार सकते है. मुझे उसके कोई प्रॉब्लम नहीं है.

मनोज: हाँ तुम सही कह रही हो. शायद मुझ में ही कमी है. लेकिन अगर तुम माँ बन गयी तो मुझे कोई प्रॉब्लम नहीं रहेगा... अभी भी और आगे जाकर भी.

मीना: ठीक है. एक और बात... मुझे माँ ने बताया है की जब बच्चा होगा तो वो हमारा ही होगा. हम ही उसे अपना नाम देंगे और दीपू और बाकी दीदी भी इस बात के लिए मान गए है.

मनोज: ये तो बहुत अच्छी बात है. ठीक है हो सके तो जल्दी आ जाना. मेरा यहां अकेले रहना भी मुश्किल हो रहा है.

मीना: हाँ जल्दी आने की कोशिश करती हूँ और फिर वो फ़ोन कट कर देती है.

उस रात जब मीना और कविता साथ में होते है सोने के लिए तो मीना कहती है...

मीना: देखो ना माँ... वसु दीदी भी पेट से हो गयी है. मैंने मनोज से इस बारे में बात की है जो हमने कुछ दिन पहले बात की थी.. उन्होंने भी कहा है की उन्हें कोई प्रॉब्लम नहीं है... ना अब या फिर आगे जा कर भी.

कविता: ये तो बहुत अच्छी बात है बेटा. मैं जल्दी ही वसु और दीपू से इस बारे में बात करती हूँ.

मीना: ठीक है माँ.. मुझे भी बता देना.

कविता: ठीक है उनसे बात करके ज़रूर बता दूँगी.

मीना: वैसे एक और बात है माँ.

कविता: क्या?

मीना: कल से मेरे “अच्छे दिन” शुरू होने वाले है...

कविता मीना की तरफ देख कर समझ जाती है और प्यार से उसका माथा चूम कर कहती है... आशा करो की जल्दी ही तू भी मुझे खुश खबर दे….

वहीँ रात को ऋतू और निशा दोनों एक दुसरे की बाहों में रह कर बाते करते है.

निशा: देखो ना माँ वसु माँ फिर से पेट से हो गयी है. पता नहीं मुझे कभी ऐसा ख़ुशी मिलेगा के नहीं.

ऋतू: मैं जानती हूँ बेटा. तू तो अभी भी जवान है. बोल तेरे लिए कोई लड़का देखूं क्या?

निशा: नहीं माँ... मैंने अपनी ज़िन्दगी में सिर्फ दो लोगों से प्यार किया है. निशा की बात सुनकर ऋतू निशा की तरफ देखती है तो निशा कहती है... हाँ मैं सही कह रही हूँ. एक दिनेश और...

ऋतू: और दूसरा कौन है? कोई और है क्या जिसके बारे में मुझे पता नहीं है... निशा ऋतू की तरफ देख कर... दूसरा और कोई नहीं... मेरा भाई दीपू...

ऋतू निशा की बात सुनकर आश्चर्य से उसे देखती है और फिर हस देती है...

निशा: आप क्यों हस रही हो माँ?

ऋतू: कुछ नहीं बेटा..मैंने इसके बारे में कभी सोचा नहीं था......

निशा: क्या सोचा नहीं था?

ऋतू: यही की तू भी दीपू से प्यार करती है.

निशा: “भी” का क्या मतलब है?

ऋतू: कुछ नहीं बेटा...

और फिर ऋतू निशा को देख कर प्यार से उसके होंठों को चूमती है जिसमें निशा भी उसका साथ देती है. ऋतू निशा की जुबां को अपने मुँह में लेती है और निशा भी पूरी शिद्दत से अपनी जुबां ऋतू के मुँह में देती है और दोनों एक दुसरे का रस पीते है और दोनों एक दुसरे को फिर से “शांत” करके सो जाते है….





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20 Lacs / 2 Mil views for my story...

Friends, Much Thanks for your love and support to my story. Truly appreciate your support and comments.

My only regret is that i am unable to post my updates "quickly" as much as you want it...due to conditions that are out of my control (like too much work pressure, health, etc)..which I hope you all understand.

But one thing is certain...
ye story पूरा Complete होगा और इसे मैं अधूरा नहीं छोडूंगा जैसे काफी स्टोरीज इस फोरम पे अधूरी है.

Btw, will post the next update max by Sunday...one day extra to look for pictures for my update... :)

Much Thanks once again!!
 
37th Update (मीना और कविता की जुगलबंदी) (Mega Update)



और फिर ऋतू निशा को देख कर प्यार से उसके होंठों को चूमती है जिसमें निशा भी उसका साथ देती है. ऋतू निशा की जुबां को अपने मुँह में लेती है और निशा भी पूरी शिद्दत से अपनी जुबां ऋतू के मुँह में देती है और दोनों एक दुसरे का रस पीते है और दोनों एक दुसरे को फिर से “शांत” करके सो जाते है….

अब आगे..



अगली सुबह:



अगली सुबह फिर सब लोग अपना काम करने में व्यस्त हो जाते है. घर की औरतें घर के काम में बिजी रहती है तो वहीँ दीपू भी अपने ऑफिस चला जाता है. अब उनका बिज़नेस भी थोड़ा बढ़ रहा था और उसी में उसका वक़्त भी निकल रहा था. जहाँ वो दिन में अपने काम में बिजी रहता है वहीँ रात को घर में अपनी बीवियों की मस्त चुदाई करता है जिसमें सब बहुत खुश भी थे. अब तो उनकी खुशियों में और भी चार चाँद लग गए थे जब से पता चला था की वसु प्रेग्नेंट है. वसु अब थोड़ा घर में आराम ही करती थी और घर के सब काम कविता और दिव्या ही देखती थी और कभी कभी लता भी अपना हाथ बटाती थी कुछ कामों में.



दो दिन बाद:



कविता वसु को कमरे में बुला कर: वसु सुनो एक बात करनी थी तुमसे.

वसु: हाँ बोलो सब ठीक तो है ना?

कविता: हां कोई प्रॉब्लम नहीं है. कल रात मीना कह रही थी की मनोज अब घर में अकेला है और वो उसे बुला रहा है. और वैसे भी अगले हफ्ते उनकी शादी की सालगिराह है तो मीना मनोज के पास जाना चाहती है.

वसु: अरे मैं तो ये बात भूल ही गयी थी की अगले हफ्ते उनकी सालगिराह है. अच्छा किया जो तुमने मुझे याद दिला दिया. तो क्या मीना जाना चाहती है?

कविता: हाँ तुमने सही कहा. और एक और बात.

वसु: क्या?

कविता: उसको अपने पास खींच कर उसके कान में.... अभी उसके “अच्छे दिन” चल रहे है और वो चाहती है की वो जाने से पहले.... इतना बोल कर कविता चुप हो जाती है तो वसु समझ जाती है और कहती है... अब से मीना जब तक यहां रहेगी, और वो तो अगले हफ्ते जाने वाली है, तब तक दीपू मीना के साथ ही सोयेगा. ठीक है और उसे आँख मार देती है.

कविता: सिर्फ मीना नहीं मैं भी उसके साथ ही सोऊँगी.

वसु: तू क्यों? उन दोनों को अलग मजे करने देना...

कविता: तुम्हारी बात तो सही है लेकिन मीना बहुत शर्मा रही है और वो अकेले दीपू के साथ नहीं सो सकती.

वसु: हम्म.... मैं समझ सकती हूँ. तो ठीक है तू भी उसके साथ सो जा और मजे कर और वसु भी कविता को अपनी बाहों में लेकर प्यार से उसके होंठों को चूमते हुए... क्या पता तुम दोनों एक साथ खुश खबर दे दे और ऐसा कहते हुए उसकी गांड दबा देती है.

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कविता: मैं भी यही चाहती हूँ की मैं भी जल्दी माँ बन जाऊं. मेरी भी उम्र हो रही है और तुमसे सिर्फ कुछ महीने ही छोटी हूँ. अगर मैं भी माँ बन गयी तो मुझे भी बहुत ख़ुशी होगी. कविता जब ये बात कहती है तो वसु फिर से उसकी गांड दबा देती है और कहती है की वो बात सही कर रही है.

कविता: आह थोड़ा आराम से दबाना. अभी भी थोड़ा दर्द है वहां पे. तुझे तो पता है वो तो अब तो मेरी गांड के पीछे ही पड़ा रहता है.

वसु: क्यों तुझे मजा नहीं आता क्या?

कविता: मजा तो आता है लेकिन साला दर्द भी उतना ही देता है.

वैसे तू तो बच गयी. तू तो सिर्फ एक बार ही गांड मरवा चुकी है लेकिन तू प्रेग्नेंट हो गयी तो बच गयी... नहीं वो वो भी तेरी रोज़ गांड मारता और ऐसा कहते हुए कविता भी वसु के होंठ चूम लेती है और फिर दोनों अलग होकर अपना काम करते है.

कविता फिर समय देख कर मीना को भी बता देती है की दीपू उनके साथ ही सोयेगा. मीना ये बात सुनकर एकदम शर्मा जाती है लेकिन कुछ नहीं कहती.

कविता: सुन बेटा जैसे मैंने तुझे पहले बताया था शायद आज तू थोड़ा शर्माएगी क्यूंकि आज पहली बार है तो आज मैं भी तेरे साथ आऊँगी. लेकिन सिर्फ आज के लिए. बाकी दे दिन तू अकेली ही उसके साथ सोना जब तक तू यहां है. ठीक है?

मीना: ठीक है माँ जैसे आप कहोगे.

कविता: और सुन जैसे मैंने तुझे बताया था जब हम कमरे में एक साथ होंगे तो अपना शर्म दूर करना. जितना तू शर्माएगी उतना ही तुझे ग्लानि होगी. लेकिन जब तू थोड़ा खुल जायेगी तो तुझे भी बहुत मजा आएगा. मुझे पता है तो एक “नेक” काम करने के लिए उसके साथ सोने को तैयार हो गयी है. मैं ये बात अच्छी तरह से जानती हूँ. लेकिन फिर भी मैं चाहती हूँ की तू अपने मैं में कोई गिल्ट फीलिंग मत रखना और जब तक तू यहाँ है मजे कर. ऐसे मौके तुझे ज़िन्दगी भर याद रहेंगे.

मीना: ठीक है माँ.

मीना: आप सही कह रहे हो. मैं अगर दीपू के साथ सोऊँगी तो इसमें मेरा भी कुछ फायदा है. ये बात मैंने मनोज से भी कर ली है.

कविता: ठीक है बेटा फिर आज रात को हम दोनों उसके साथ ही सोयेंगे. ठीक है?

मीना: ठीक है.



रात को:



रात को खाना खाने के बाद दीपू थोड़ी देर टीवी देखता है और फिर कमरे में जाता है जहाँ वसु सोने की तैयारी कर रही थी. दीपू कमरे में जाता है और वसु को अपनी बाहों में भर लेता है.

दीपू को वहां देख कर वसु कहती है: आज तुम यहाँ नहीं बल्कि कविता के कमरे में सोने जाओ. काफी दिनों से तूने उसकी तरफ ज़्यादा ध्यान नहीं दिया. तू हमेशा मुझ पर ही चड़ा रहता है और देख लिया ना नतीजा और ऐसा कहते हुए वसु दीपू का हाथ अपने पेट पे रखती है.

दीपू: क्यों इस नतीजे से तुम खुश नहीं हो क्या?

वसु: मैं तो बहुत खुश हूँ बेटा. तुमने मुझे फिर से मुझे वो ख़ुशी दी है जो हर एक सुहागन चाहती है और यही ख़ुशी तुम्हारी तीसरी बीवी भी चाहती है तो अब जाओ उनके कमरे में. आज से तुम वहीँ सोओगे...समझे और दीपू के होंटो को चूमती है तो दीपू भी कहाँ पीछे रहने वाला था. वो भी वसु को चूमता है और २ Min ही वो एक प्रगाढ़ चुम्बन में जुड़ जाते है और दोनों एक दुसरे की जीभ और रस को अच्छी तरह से पीते है

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और फिर २ Min बाद वसु दीपू को अलग करती है और कहती है: अब बहुत हो गया. और ज़्यादा देर हम चूमते रहे तो मैं फिर से बहक जाऊँगी. जाओ और अपना प्यार अपनी तीसरी बीवी को दिखाओ और दीपू को धक्का देकर उसे कविता के कमरे में भेज देती है.

जब दीपू कविता के कमरे में जाता हस तो वहां कोई नहीं रहता लेकिन कमरे को थोड़ा अच्छे से सजा हुआ था... जैसे आज किसीका सुहागरात हो. दीपू उस सजे हुए कमरे को देख कर आश्चर्य हो जाता है लेकिन जब वहां कोई नहीं था तो वो कमरे में बिस्तर पे बैठ कर अपना मोबाइल देखते रहता है.

थोड़ी देर बाद कविता और मीना एकदम सजकर कमरे में दाखिल होता हस तो दीपू उन्हें देखता रह जाता है. उसने कभी नहीं सोचा था की कविता और मीना उसे ऐसे रूप पे नज़र आएंगे. उनको देख कर तो जैसे दीपू की लार टपक जाती है और खुले मुँह से उन्हें देखते रह जाता है क्यूंकि दोनों के कपडे ऐसे थे जो ज़्यादा दिखा रहे थे और बहुत कम छुपा रहे थे. दोनों अपने जलवे मस्त दिखा रहे थे. ब्लाउज से झलकती चूचियां जैसे वो ब्लाउज को फाड़ कर बाहर आ जाए, साडी नाभि ने नीचे बाँधा हुआ जिसे उन दोनों को और भी कामुक बना रहा था

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कविता: अंदर आकर: मेरे प्यारे पतिदेव अपना मुँह बंद कर लो वरना मक्खी घुस जायेगी मुँह में और हस देती है. वहीँ मीना भी थोड़ा शर्माते हुए अंदर आती है लेकिन अपनी नज़रें नीचे कर लेती है और कुछ नहीं कहती. दोनों उसके पास आते है और दीपू कविता को पकड़ने की कोशिश करता है तो कविता मना कर देती है और कहती है: अभी कुछ नहीं. थोड़ी देर वहां कुर्सी पे बैठो. दीपू कुछ बोलने को होता है तो कविता उसे फिर से रोक देती है और कुर्सी में बैठने को कहती है.

दीपू ना चाहते हुए भी बगल में रखे कुर्सी पे बैठ जाता है तो दोनों कविता और मीना बिस्तर पे छड़ कर दीपू की तरफ देखते हुए गले मिलते है और फिर एक दुसरे को देखते हुए अपने होंठ मिला लेते है और दोनों कविता और मीना एक दुसरे के होंठों को पूरे जी जान से रस निचोड़ने लग जाते है.

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उनके गहरे चुम्बन को देख कर दीपू का लंड एकदम तन जाता है और उसके पैंट में तम्बू बन जाता है जिसे कविता देख लेती है जब दोनों चुम्बन से अलग होते है तो.

कविता और मीना फिर से चुम्बन में जुड़ जाते है और मीना को पता भी नहीं चलता कब कविता उसके बदन से कपडे निकाल देती है और वो सिर्फ एक छोटी ब्रा और पैंटी में रह जाती है. मीना भी कविता के कपडे निकालते रहती है तो दीपू से रहा नहीं जाता और वो कुर्सी से उठ कर उनके पास आता है और अपने घुटनों पे बैठ कर मीना की गहरी नाभि को चूमता है. (दीपू को भी पता था की वो दोनों आज उससे चुदने के लिए मस्त मूड में है). मीना सिसकारी लेती है तो वो कविता के होंठ चूम लेती है और उसकी जुबां अपने मुँह में लेकर चूसने लगती है .

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२ Min बाद दीपू वही काम कविता के साथ करता है और कविता की गहरी नाभि को चूमता रहता है. मीना कविता के पीछे आकर उसको चूमते हुए दोनों एक दुसरे का रस पीते रहते है है.

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इन सब में तीनो को बहुत मजा आ रहा था और उन्हें पता था की रात तो अभी बाकी है और बहुत कुछ होने वाला है उस रात.

देखते देखते मीना कविता को ऊपर से नंगी कर देती है और पीछे से मीना उसकी चूचियों को दबाती रहती है और दीपू उसकी नाभि को चूमता रहता है.

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कविता इस दुगनी हमले को झेल नहीं पाती और पहली बार ही झड़ जाती है.

कविता: तुम दोनों तो लगता है आज मुझे छोड़ोगे नहीं.

दीपू: छोड़ना भी नहीं चाहते है तुम्हे. ऐसे ही छेड़खानी करते हुए तीनो फिर से बिस्तर पे आ जाते है जहाँ कविता के दोनों बगल में दीपू और मीना सो जाते है और कविता दीपू के होंठों को चूसने लगती है तो वहीँ वहीँ दीपू और मीना उसके ठोस चूचियों और पेट को सहलाते रहते है.

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दीपू फिर मीने के होंठ को भी चूम लेता है तू मीना जो कुछ देर पहले जब कमरे में शर्मा रही थी अब पूरी तरह से खुल कर दीपू को अपने होंठों का जाम पीला रही थी और साथ में दीपू के होंठों को भी चूस रही थी.

ये सिलसिला काफी देर तक चलता है और उस रात काफी दिनों के बाद मीना भी झड़ गयी थी. वो काफी दिनों से ऐसी ख़ुशी से दूर ही रही थी क्यूंकि मनोज उसे वो शारीरिक सुख देने में थोड़ा वंचित था. मीना के चेहरे पे एक तरह से ख़ुशी झलक रही थी जिसे कविता ने भी देख लिया था और वो मन ही मन खुश भी हो रही थी.

जब तीनो एक दुसरे को चूस और चूम रहे थे तीनो के कपडे भी उनके बदन से निकल गयी जिसका किसीने ज़्यादा ध्यान नहीं दिया. थोड़ी देर बाद दीपू को एहसास हुआ था की उसका लंड पूरा टाइट और खड़ा हो गया है और उसे थोड़ी राहत की ज़रुरत भी थी.

दीपू फिर खड़ा होकर अपना लंड मीना को दिखाता है जैसे वो मीना को सलाम दे रहा है तो मीना उसे देख कर अपना मुँह खोले उसे देखती रहती है क्यूंकि उसने अपने ज़िन्दगी में इतना बड़ा और मोटा लंड नहीं देखा था.

मीना कविता को देख कर अपनी आँखें बड़ी करती हुई: ये क्या है माँ? मैंने तो आज तक इतना बड़ा और लम्बा लंड कभी नहीं देखा.

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कविता हस कर: ये वही अस्त्र है बेटा जो हर औरत अपने मर्द में चाहती है और यही है जो हम तीनो सौतनों को बहुत खुश करता और रखता है और हमें रात भर ठीक से सोने भी नहीं देता है. दीपू दिल का जितना अच्छा है उतना ही ये भी अच्छा है.

दीपू थोड़ा खासते हुए: तुम लोग बस बातें ही करते रहोगे क्या? मेरे छोटू को भी खुश करो... तभी तो ये तुम्हे भी उतना ही मजा देगा.

कविता और मीना दोनों एक दुसरे की तरफ देखते है और फिर दोनों ही उसके लंड पे टूट पड़ते है और दोनों बारी बारी से उसका लंड चूसते रहते है. दीपू का लंड मीना के लिए इतना बड़ा था की वो उसे पूरा अपने मुँह में नहीं ले पा रही थी. कविता देखती है और फिर अपने थूक से उसे पूरा गीला और चिकना करके मीना के मुँह में उसे डाल कर मीना के मुँह को आगे पीछे करती है जैसे की दीपू उसके मुँह को चोद रहा हो.

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इसमें दीपू को भी बहुत मजा आ रहा था और वो भी अब मीना के मुँह को चोद रहा था. अब मीना भी बड़े मजे से दीपू के पूरे लंड को अपने मुँह में लेने की कोशिश कर रही थी.

उसको देख कर कविता से भी रहा नहीं जाता और वो भी मीना का साथ देते हुए दीपू का लंड चूसती है और अब दोनों ही बारी बारी से दीपू का लंड चूसते हुए उसे मजा देते है. दीपू को तो लगता है जैसे वो जन्नत में पहुँच गया है और फिर दोनों का सर पकड़ कर दोनों की मुँह को चोदते रहता है.

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दीपू कविता को देख कर: जान मेरे पास आओ ना. कविता उसको देख कर हस्ते हुए दीपू के पास आती है तो दीपू उसकी दोनों टांगों को अलग करते हुए अपने मुँह पे बिठा लेता है. जहाँ मीना उसके लंड पे भिड़ी थी वहीँ दीपू भी कविता की चूत को चूसे और चूमे जा रहा था.

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वो कविता की चूत को चूसते हुए अपने एक ऊँगली उसकी गांड में दाल देता है तो कबिता ज़ोर से आह आह करते हुए सिसकी लेती है. कविता की सिसकी से मीना का ध्यान उसकी तरफ जाता है तो मीना को एक और झटका लगता है जब वो देखती है की दीपू अपनी एक ऊँगली उसकी गांड में दाल कर अंदर बाहर कर रहा था और वहीँ उसकी चूत भी चूस रहा था.

मीना को झटका इसलिए लगा क्यूंकि उसने कभी नहीं सोचा था की दीपू उसकी माँ की गांड के साथ ऐसा कर रहा है. उन दोनों को देख कर मीना भी एकदम उत्तेजित हो जाती है और फिर से दीपू को लंड को चूसती है और फिर से एक और बार दोनों कविता और मीना झड़ जाते है. जहाँ मीना के निकले पानी से उसकी जांघ भीग जाती है वहीँ दीपू भी कविता के पानी को अपने मुँह में लेकर पूरा पी जाता है. इस कार्य में काफी वक़्त बिता लेते है तीनो और आखिर में कविता और मीना हाँफते हुए दीपू से अलग हो कर बिस्तर पे गिर जाते है.

दीपू फिर मीना को सुलाकर उसके टांगों के बीच आ जाता है और देखता है की उसकी चूत एकदम गीली और थोड़ी फूली हुई है. उसको देख कर दीपू के मुँह में पानी आ जाता है और बिना देरी किया वो उसकी चूत पे टूट पड़ता है और अपनी जुबां से उसकी चूत चूमते चाटते हुए उसके चूत के दाने को भी चाट लेता है जिससे मीना की जैसे जान निकल जाती है.

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वो अब ज़ोर ज़ोर से सिस्क्यान लेते हुए अपनी गांड उठा कर अपनी चूत को दीपू के मुँह में दाल देती है और उसके सर को पकड़ कर उसकी चूत पे दबा देती है. अब कमरे में थोड़ी ज़ोर से आवाज़ें आ रही थी तो कविता सरक कर अपनी चूत उसके मुँह पे रख कर उसके चाटने के कहती है जिससे उसकी आवाज़ें कविता की चूत पे ही दब जाती है.

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मीना की उत्तेजना इतनी बड़ जाती है की वो भी पूरे जोश में कविता की चूत को चूसती है और एक बार तो उसकी चूत को काट भी लेती है. कविता भी बहुत गरमा जाती है और वो मीना की चूचियों को पकड़ कर ज़ोर से मरोड़ देती है. अब उस कमरे में चूसने और चूमने का घमासान शुरू हो चूका था और तभी बंद होता है जब मीना और कविता फिर से एक और बार अपना पानी निकाल लेते है जिसे दीपू और मीना पी जाते है.

जब दोनों कविता और मीना अपने आप को संभाल कर हाँफते हुए एक दुसरे को देखते रहते है तो दीपू कविता के ऊपर आकर उसके होंठ चूमते हुए कहता है... मीना का स्वाद तो बहुत अच्छा है. मीना को ये बात समझ नहीं आती तो वो कविता की तरफ सवालिया नज़र से देखती है तो कविता हस कर कहती है... जब माँ का स्वाद अच्छा है तो बेटी का भी अच्छा होगा ना.

दीपू ये बात सुनकर हस देता है और फिर से कविता को चूमते हुए नीचे सरक कर कविता की टांगें पकड़ कर उसे अपनी और खींचते हुए कहता है... जानू अब तुम्हारी बारी है.

कविता थोड़ा हफ्ते हुए: थोड़ा रुक जाओ ना... हम दोनों का पूरा पानी निकल गया है और थक भी गए है.

दीपू: तो तुम्हे और थोड़ा थकाता हूँ.

कविता: जानू मान जाओ ना..

दीपू: जब तुम दोनों ने मुझे जन्नत की सैर कराई है तो तुम्हे भी तो कराना है ना और कविता की बात को ना मानते हुए उसके पैरों को अपने कंधे पे रखते हुए उसकी लाल और गीली हुई चूत पे फिर से टूट पड़ता है और इस बार तो कविता की गांड से लेकर चूत तक चूसने लग जाता है. कविता का तो हाल बहुत बुरा हो गया था और अपने मुट्ठी को चादर से पकड़ लेती है और वो भी ज़ोर ज़ोर से आह आह करते हुए सिसकारी लेती है.

मीना को उसे देख कर थोड़े दया आती है और फिर उसे पास जाकर उसके होंठों को चूमते हुए उसकी मस्त ठोस चूची को दबाने लगती है और वहीँ दीपू भी अपने काम में लगा रहता है और वो कविता की गांड पे ज़्यादा ध्यान देते हुए उसकी गांड को चूसते हुए अपनी २ उंगलियां उसकी गांड में दाल कर उँगलियों से चोदने लगता है. कविता इन तीन हमलो को झेल नहीं पाती और २ Min के अंदर ही उसकी चूत से फवारा फिर से निकल जाता है जिसे दीपू बड़े चाव से अपने गले में भर लेता है.

कविता फिर दीपू को थोड़े गुस्से से देखती है तो दीपू हस्ते हुए उसके ऊपर आकर उसके होंठ चूमता है और फिर अगले मिनट वो मीना के होंठ भी चूमता है और अपनी जुबां मीना के मुँह में दाल कर दोनों एक दुसरे को आदान प्रदान करते है.

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दीपू मीना से: तुम्हारी मम्मी का स्वाद कैसे लगा? मीना इस बात से बहुत शर्मा जाती है लेकिन कुछ नहीं कहती. दीपू: चलो अब तक तो तुम्हे आधी जन्नत की सैर कराया है. अब पूरी सैर कराता हूँ और ऐसा बोलकर वो मीना को सुलाकर उसकी टांगों के बीच आ जाता है.

मीना के रस से भीगे हुए चूत को अपने खड़े लंड से रगड़ता रहता है और मीना को थोड़ा डर भी लगने लगता है की वो इतना बड़ा लंड कैसे ले पाएगी.

मीना: थोड़ा आराम से डालना. बहुत दिन हो गए है ना.

दीपू: छेड़खानी के साथ... क्या बहुत दिन हो गए है?

इतने में कविता हस देती है और मीना को कहती है... दीपू ऐसे ही बेशरम है... जब तक तुम पूरा खुल नहीं जाओगी वो तुम्हे ऐसे ही तड़पाएगा.

मीना: मैं समझी नहीं.

कविता: बेटी इसका कहने का मतलब है की तुम अपनी शर्म छोड दो और बोलो की बहुत दिनों से क्या नहीं हुआ है. मीना ये बात सुनकर बहुत शर्मा जाती है और दीपू की आँखों में देखते हुए कहती है... बहुत दिनों से तुम्हारे मामा ने मुझे चोदा नहीं है. इसीलिए मेरी चूत बहुत टाइट है और आराम से डालना.

दीपू फिर से हस्ते हुए: क्या डालूं और कहाँ डालूं.

मीना: तो तुम मानोगे नहीं.

दीपू: अगर तुम शर्म से ये सब करोगी तो तुम्हे मजा नहीं आएगा और तुम्हे वो सुख नहीं मिलेगा जो मामा ने तुम्हे बहुत दिनों से दिया नहीं है. तो बोलो क्या डालूं और कहाँ डालूं.

मीना: अपना ये मोटा लंड मेरी चूत में धीरे से डालो और मुझे चोदो. अब ठीक है?

दीपू भी हस्ते हुए... ये हुई ना बात और कविता को इशारा करता है की एक बार उसके लंड को अच्छे से चूस कर और खड़ा कर दे. कविता भी फिर दीपू के लंड को अच्छे से एक और बार चूस कर दीपू से कहती है... अब अपने लंड का कमाल दिखाओ और मीना को वो सुख दो जो तुम हम सब को रोज़ देते हो.

दीपू फिर झुक कर मीना को चूमते हुए उसका ध्यान बताता है और अपने लंड को उसकी गीली और टाइट चूत में धक्का मारता है तो आधा लंड उकसी चूत में चला जाता है.

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जब लंड पूरा मीना की चूत में चला जाता है तो उसके चेहरे के एक्सप्रेशंस बता रहे थे की उसे ऐसा सुख बहुत दिनों बाद मिला है लेकिन ये भी सही था की दीपू का वो झटका मीना सेहन नहीं कर पायी और मीना की तो जैसे जान ही निकल गयी थी. उसकी आँखों से आंसू आने लगते है और वो छटपटाते रहती है बिस्तर में. उसकी हालत को देख कर कविता को भी दया आती है और उसके बालों में हाथ घुमा कर: बेटा हो गया है. जो दर्द होना था हो गया है.

मीना: नहीं माँ बहुत दर्द कर रहा है. पता नहीं मैं पूरा ले पाऊँगी की नहीं.

दीपू: चिंता मत करो. दुनिया में ऐसी कोई चूत नहीं है जो लंड को ना ले सके और ऐसा कहते हुए फिर से एक और ज़बरदस्त झटका मारता है जिससे दीपू का पूरा ८. ५ इन लंड पूरा मीना की चूत की जड़ में समा जाता है.

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मीना का बहुत बुरा हाल था और वो बिस्तर पे छटपटाते रहती है. कविता उसके होंठ को चूमते हुए उसे दुलारती है और कहती है... चुप हो जा बेटी...

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दीपू भी वैसे ही अपना लंड उसकी चूत में रखे हुए उसे गाल को चूमते हुए झुक कर उसकी चूची को चूमता है और दूसरी चूची को दबाता रहता है. थोड़ी देर बाद जब मीना को थोड़ी राहत मिलती है तो वो दीपू को देखते हुए आँखों से इशारा करती है की वो अब ठीक है. दीपू फिर उसे देखते हुए अपने लंड को बाहर निकल कर फिर से अब धीरे से अंदर डालते हुए उसे चोदने लगता है. ऐसे ही चोदते हुए दीपू और कविता दोनों उसके उभारों को मसलते और चूमते रहते है.

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अब मीना को भी इस चुदाई मैं मजा आने लगता है और दीपू के इशारे पर कविता फिर से अपनी गांड उठाते हुए मीना के सर पे बैठ जाती है. अब मीना कविता की चूत को चूसती रहती है तो वहीँ दीपू के झटके भी स्पीड पकड़ने लगते है और दीपू भी अब दनादन मीना को पेलते रहता है.

थोड़ी देर बाद दीपू मीना को घोड़ी बनने को कहता है और फिर वो अब पीछे से मीना को पेलने लगता है और अपना पूरा लंड उसकी चूत में उतारते हुए काम में लग जाता है.

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इस पोजीशन में मीना को भी बहुत मजा आ रहा था और दीपू मीना की सुकड़ी हुई छोटी से गांड के छेद को देख कर एक पल के लिए उसका मन डोल जाता है की वो अपना लंड उसकी गांड में डाल दे. लेकिन उसे पता था की मीना बहुत दिनों बाद चुद रही है तो उसे बहुत तकलीफ होगी और वो ये ख्याल अपने मन से निकालते हुए उसे घोड़ी के पोजीशन में ही चोदते रहता है. कविता भी मीना के सामने अपनी टांगें खोल कर उसको जैसे दावत देती है तो मीना भी बड़े चाव से कविता की चूत चूसने लग जाती है और कविता भी मीना का सर अपनी चूत में दबा देती है. अब कमरे में धुंआदार चुदाई का माहौल बन गया था जहां सब को मजा आ रहा था.

इतने में ना जाने कितनी बार दोनों मीना और कविता झड़ जाते है उन्हें पता ही नहीं चलता. १०- १५ मं की धुंआदार चुदाई के बाद दीपू को लगता है की वो झड़ जाएगा लेकिन वो कविता को ठोकने से पहले झड़ना नहीं चाहता था. अब मीना भी बहुत थक गयी थी और दीपू से कहती है की वो बहुत थक गयी है.

दीपू: इतनी जल्दी थक गयी हो? अभी तो रात बाकी है.

मीना: तुम तो ऐसे कह रहे हो की तुम थके नहीं हो.

दीपू: नहीं मैं तो थका नहीं हूँ. देखना चाहती हो... और ऐसा बोल कर अपना लंड मीना की चूत से निकाल कर वो कविता को इशारा करता है तो मीना भी थोड़ी हाँफते हुए बगल में लुढ़क जाती है और अपनी साँसों को संभालते रहती है.

दीपू कविता से: जानू तुम भी घोड़ी बन जाओ आज तो तुम्हारी गांड मारने का बहुत मन कर रहा है.

कविता: मैंने तुम्हे कभी मन किया है क्या और ऐसा कहते हुए कविता दीपू के सामने घोड़ी बन जाती है और दीपू अपने गीलू लंड पे गीला मीना की चूत के पानी से थूक लगा कर अपने लंड को कविता की गांड पे रखते हुए एक ज़ोरदार शॉट मारता है और उसका पूरा का पूरा लंड कविता की गांड की जड़ में घुस जाता है.

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भले ही कविता की गांड खुल चुकी थी लेकिन उसने सोचा नहीं था की दीपू एक ही बार में अपना बड़ा लंड उसकी गांड में पेल देगा. उसे बड़ा दर्द होता है और वो ज़ोर की चिल्लाती है. कविता की गांड की चुदाई देख कर मीना का मुँह पूरा खुला का खुला रह कर बड़े आश्चर्य से उन्हें देखती रहती है और मन में सोचती है की उसकी माँ ने इतना बड़ा लंड कैसे एक ही झटके में ले लिया है. दीपू को भी लगता है की उसका झटका बड़ा तेज़ है तो वो आगे झुक कर कविता की पीठ को चूमते हुए अपने हाथ से उसकी बड़ी झूलती हुई चूचियों को पकड़ कर दबाते हुए कहता है... जानू क्या करून तुम्हारी मस्त गांड को देख कर रहा नहीं गया और एक ही बार में पूरा पेल दिया. कविता भी थोड़ी रूठी हुई आवाज़ में कहती है... तुम तो बड़े ज़ालिम निकले. एक बार भी नहीं सोचा की मेरी गांड की क्या हालत होगी.

दीपू: चुप हो जाओ और अब मजे लो और ऐसा कहते हुए दीपू अब धीरे धीरे कविता की गांड मारने लगता है और जब कविता को थोड़ा सुकून मिलता है तो वो भी अपनी गांड चुदाई की मजे लेती रहती है. उन दोनों को देख कर बगल में सोई हुई मीना भी गरम होने लगती है और अपनी गीली चूत मसलते रहती है.

थोड़ी देर बाद ऐसे ही कविता की गांड मारने के बाद बगल में लेट जाता है और कविता को उसके ऊपर आने को कहता है. कविता भी अब मजे में उठ कर दीपू के लंड पे बैठ कर उसके लंड को अपनी गांड में पूरा अंदर ले लेती है और फिर उसके लंड पे उछलते रहती है.

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दीपू भी मजे से उसकी गांड मारते हुए पीछे से उसकी चूचियों को पकड़ कर दबाते रहता है.

दीपू काफी देर से दोनों को पेल रहा था.... पहले मीना और अब कविता. उसको लगता है की वो भी झड़ने वाला है और कविता को पेलते हुए कहता है की वो भी झड़ने वाला है तो कविता उसकी तरफ देख कर कहती है... तुम मीना के अंदर ही अपना पानी निकाल को और ऐसा कहते हुए कविता दीपू को धकेल देती है और मीना के पास भेज देती है दीपू को. मीना भी उन दोनों की चुदाई देख कर बहुत गरम हो गयी थी और अपनी टांगें फैला कर दीपू को उसके पास बुलाती है तो दीपू भी तुरंत उसके पास जाकर अब बिना कोई रेहम किये हुए एक ही बार में अपना लंड मीना की चूत में पूरा पेल देता है. उसे पता था की वो अब ज़्यादा देर नहीं रह पायेगा और ५- ६ ज़बरदस्त शॉट्स के बाद अपना पूरा गाढ़ा और गरम वीर्य मीना के अंदर ही डाल देता है.

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मीना को भी लगता है की उसका बड़ा लंड उसके बच्चेदानी को छु रहा है और उसका पानी भी वहीँ गिर रहा है. ये बात सोच कर मीना को भी बड़ी ख़ुशी होती है और जब दीपू अपना पूरा पानी मीना के अंदर झड़ कर अलग हो जाता है तो कविता भी देख लेती है और मन में सोचती है की जिस काम के लिए मीना दीपू के नीचे आयी थी शायद वो जल्दी ही सच हो जाए. सब लोग थके हुए थोड़ा आराम करते है और दीपू और कविता बाथरूम में जाकर फ्रेश हो कर आते है. जब मीना बाथरूम जाने को होती है तो कविता उसे रोक देती है और धीरे से उसके कान में कहती है की तू अब जाकर बाथरूम में साफ़ मत कर. दीपू का पानी अपने चूत में ही समा ले और उसे बाहर गिरने मत देना. मीना कविता की बात सुनकर एकदम शर्मा जाती है और हस्ते हुए उसकी बात मान लेती है और वहीँ बिस्तर पे पढ़े रहती है.

थोड़ी देर बाद जब सब थोड़ा आराम करते है जहाँ दोनों कविता और मीना दीपू की बाहों में लेटे हुए थे तो दीपू पूछता है.

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दीपू: क्यों मजा आया के नहीं?

कविता: तुमने तो मुझे चलने के लायक भी नहीं छोड़ा. देखा जब मैं बाथरूम जा रही थी तो लंगड़ा कर चल रही थी. दीपू: इसमें क्या है? सब को तो पता ही है की तुम्हारी चाल बिगड़ने वाली है और कविता को आँख मार कर हस देता है. कविता भी झूटी गुस्से से दीपू के कंधे हे मुक्का मारती है और हस देती है.

दीपू मीना को देख कर: तुम्हे कैसे लगा? मीना एकदम शर्मा जाती है लेकिन कुछ नहीं कहती. उसको देख कर कविता दीपू से कहती है: चुप हो जाओ तुम. उसे क्यों परेशान कर रहे हो? फिर ऐसे ही तीनो मस्ती में बातें करते हुए दोनों नंगी ही दीपू के दोनों कन्धों पे सर रख कर आराम करते है.

मीना: सच कहूँ तो बहुत दिनों बाद मुझे बहुत मजा आया. आज पता चला की बिस्तर पे अगर औरत अपनी शर्म छोड़ दे और खुल के बातें कर और दीपू की तरफ देख कर और तुम जैसा कोई साथी हो तो बहुत मजा आता है और इस बार बिना कोई शर्म किये दीपू के होंठों को चूम लेती है. कविता ये देख कर बहुत खुश हो जाती है और वो भी अपने होंठ दोनों के होंठों से मिला देती है और तीनो एक गहरे चुम्बन में पढ़ कर अलग हो जाते है.

कविता: अब तो मुझे नींद आ रही है. सो जाते है.

दीपू: ऐसे कैसे जान? तुमने कैसे सोच लिया है की मैं तुमने इतनी जल्दी सोने दूंगा. दीपू की ये बात सुनकर दोनों मीना और कविता एक दुसरे को देखते है. पहले थोड़ा आश्चर्य से फिर हस देते है.

इस प्रकार दीपू उन दोनों को रात में २ बार और मस्त पेलता है और आखिर में करीब ३- ४ चार बजे सो जाते है.

सुबह जब दिव्या उनके कमरे में आकर देखती है की तीनो नंगे एक दुसरे की बाहों में सोये है तो वो हस्ते हुए वहां से निकल जाती है.

ऐसे ही जब तक मीना रहती है दीपू उसे रोज़ रात को पेलता है (अकेले में). कविता की हालत बहुत खराब हो गयी थी और वो अगले २- ३ दिन तक घर में लंगड़ा कर ही चलती रहती है जिसे देख कर दोनों वसु और दिव्या अपनी हसी नहीं रोक पते.

कविता वसु को देख कर: हस लो... तुम्हे क्या? अब तो तुम पेट से हो गयी हो तो तुम्हे तो आराम मिलेगा और दीपू तुम्हारा गुस्सा सब मेरे पे निकाल दिया. उसने तो २ घंटे से ज़्यादा मेरी गांड मारी तभी तो मेरी ये हालत है की मैं ठीक से चल भी नहीं पा रही हूँ .

इस बात पे दिव्या हस्ती है तो कविता कहती है: ज़्यादा हसो मत. मैं दीपू से कह दूँगी और जब वो तुम्हारी गांड मारेगा तो फिर ऐसे ही हसना. मैं तो लंगड़ा कर चल रही हूँ. तू तो अपनी बिस्तर से उठ भी नहीं पाएगी.

दिव्या भी कविता को छेड़ते हुए: हाय मेरे भी ऐसे दिन आ जाए तो कितना मजा आएगा.

कविता भी उसको अपनी बाहों में लेकर उसके होंठ चूमते हुए...

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चिंता मत कर.. और उसकी गांड दबाते हुए...तेरी ख्वाइश भी जल्दी पूरी होगी. मैं दीपू से कह दूँगी और देखना तू जो छा रही है ना... दीपू को वैसे ही करने को कहती हूँ और फिर तीनो एक दूसे को पकड़ कर चूमते है और कहते है की हम कितने खुश है की हमें दीपू जैसा पति मिला है जो हम सब को इतना खुश रखता है.



अगले हफ्ते:

अगले हफ्ते मीना कहती है की उसे अपने घर जाना है क्यूंकि वो यहाँ इस घर में बहुत दिनों से है और वहां उसके घर में मनोज भी अकेला ही है. वैसे भी हमारी सालगिराह जल्दी ही आने वाली है और मनोज चाहते है की उस दिन मैं उनके साथ ही रहूँ. वसु भी इस बात को मान जाती है और दीपू को कहती है की वो मीना को अपने घर छोड़ आये. कविता कहती है की वो भी उनके साथ जाना चाहती है तो वसु इस बात के लिए भी मान जाती है क्यूंकि वसु को पता था की मीना उसकी बेटी है तो उसके साथ जाना एकदम स्वाभाविक ही है और फिर तीनो मीना के घर की तरफ निकल जाते है.
 
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