- Joined
- Dec 5, 2013
- Messages
- 139,766
40th Update (लता की कामुकता)
दीपू: तो मैं क्या करूँ?
वसु: करना क्या है? जैसे तेरा मन करे वो कर... तू जो भी निर्णय लेगा उसमें मेरी सहमती होगी. तू उसकी चिंता मत कर.
अब आगे..
दिन ऐसे ही गुज़रते रहते है जहां ऑफिस में दीपू अपने काम से busy था तो वहीँ घर में भी अपनी २ बीवियां की खूब बजाता था. वसु का पेट अब थोड़ा फूलने लगा था और उसे आराम ही करने दिया करते थे. दिव्या और कविता ही दीपू का ख्याल रखती थी जैसे एक दिन रात को दीपू किचन में पानी पीने जाता है तो वहां दिव्या अपनी गांड मटकाते हुए दीपू के पास आती है. वो एकदम नंगी ही थी बस एक छोटी पैंटी पहने हुई थी.
दीपू उसको देख कर कहता है: क्यों जानू कमरे में मेरा इंतज़ार करती. मैं वहीँ आ रहा था.
दिव्या: रह नहीं गया जानू इसीलिए यहाँ आ गयी और ऐसा कहते हुए वो दीपू को चूम लेती है जिसमें दीपू भी उसका पूरा साथ देता है. दोनों एक गहरी चुम्बन में जुड़ जाते है.
थोड़ी देर बाद दीपू कहता है...जानू चलो कमरे में. अब तो मुझसे भी रहा नहीं जा रहा है और फिर उसे कमरे में ले जाता है जहाँ पर उसकी खूब बजाता है और दिव्या को पूरा थका देता है.
बात एक और थी की घर में सब को एक तरह से पता चल ही गया था की लता की हालत भी बुरी है और वो भी चुदाई के लिए बहुत तरस रही है क्यूंकि हर रात वो उनकी सिसकारियां सुनकर अपनी चूत ही मसलते रहती थी. उसकी हालत को देख कर वसु को भी थोड़ा दया आती थी क्यूंकि उसे भी पता था की औरत जब तन की आग में झूल रही है तो कैसा महसूस होता है.
एक दिन वसु दीपू से इस बारे में बात करती है तो दीपू कहता है की वो अपने तरफ से कोई कोशिश नहीं करेगा. अगर बुआ खुद उसके पास आये तो वो भी उसका साथ देगा. तभी जाकर बात कुछ आगे बढ़ सकती है.
ऋतू के घर में:
वहीँ दूसरी ओर ऋतू के घर में भी हालत कुछ ऐसे ही थे. जब से ऋतू ने दीपू का खड़ा लण्ड देखा था तब से वो एक तरह से बेचैन भी हो गयी थी. वो काफी बार सोचती है की निशा को बता दे लेकिन वो बात बताने से घबरा रही थी की आखिर निशा क्या सोचेगी उसके बारे में.
एक दिन रात को जब दोनों अपने आप को शांत कर के एक दुसरे की बाहों में सोये हुए थे तो निशा कहती है: क्या बात है माँ.... कुछ दिनों से देख रही हूँ की आपकी आग तो बहुत भड़क रही है. पहले तो ऐसा नहीं था. मैं कितना भी चूस लो आपको.... फिर भी आप काफी गीली रहती हो. क्या बात है? किसीको देख लिया है क्या? और ऐसा कहते हुए वो ऋतू की तरफ देख कर हस देती है.
ऋतू को अब लगता है की उसे निशा को बता देना चाहिए और क्या पता वो ही कुछ समाधान निकाल दे उसकी उत्तेजना के बारे में...
ऋतू कुछ सोचते हुए कहती है: क्या बताओं बेटी...पता नहीं तू मेरे बारे में क्या सोचेगी....
निशा ऋतू की तरफ आश्चर्य से देखते हुए कहती है... क्या बात है और मैं क्या सोचूंगी...
ऋतू: बात ये है बेटी की कुछ दिन पहले ऑफिस में कुछ काम के लिए मैं दीपू के कमरे में गयी थी तो वो फ़ोन पे बात कर रहा था शायद तुम्हारी माँ से.
निशा: तो इसमें बात क्या है?
ऋतू: बात ये ही बेटी की जब मैं उसके कमरे में गयी तो दीपू बहुत उत्तेजित और उत्साह लग रहा था और जब मेरी नज़र थोड़ी नीचे गयी तो देखा की उसका लण्ड उसके पैंट में पूरा तना हुआ है. इतना बड़ा लण्ड मैंने आज तक नहीं देखा और वो तो एक हथोड़े के माफ़िक़ लम्बा भी नज़र आ रहा था. जब से मैंने वो नज़ारा देखा है तब से मुझे भी चैन नहीं मिल रहा है.
निशा जब ये बात सुनती है तो तो आश्चर्य से अपना मुँह खोले हुए ऋतू को देखती रहती है और ऋतू भी शर्म से अपना सर घुमा लेती है.
निशा ऋतू के चेहरे को अपनी तरफ कर के: अब मुझे समझ में आया की आप इतनी उत्तेजित क्यों रह रही हो और आप हमेशा आपकी चूत से पानी क्यों निकल रहा है.
ऋतू इस बात पे कुछ नहीं कहती तो निशा कहती है... इसमें मेरा सोचना क्या है? बस यही की हम दोनों एक ही नाव पे सवार है... जितनी आग में मैं जल रही हूँ उतनी ही आग में आप भी जल रहे हो. फरक इतना है की आप काफी सालों से ऐसे हो और मुझे जब लगा की घर में खुशियां आएगी तो मेरा भी आप जैसे ही हाल हो गया है और उसकी आँखों से आंसू आ जाते है.
ऋतू निशा को देख कर वो भी रो देती है और कहती है.... कुछ नहीं बेटा..क्या पता ऊपर वाले ने हमारे लिए कुछ अच्छा सोच रखा होगा और ऐसा कहते हुए वो निशा को चूम लेती है तो निशा भी उसका पूरा साथ देते हुए दोनों एक दुसरे का रस चूस लेते है. अब ऋतू का मन हल्का हो गया था.
निशा: एक बात कहूँ अगर आप बुरा ना माने तो.
ऋतू: अब बुरा क्या मानना है जब इतना कुछ हो गया है तो.
निशा: अगर आपको दीपू पसंद है तो...और इतना बोलते हुए निशा रुक जाती है जिसका मतलब दोनों समझ जाते है.
ऋतू निशा की ओर सवालिया नज़र से देखती है तो निशा हाँ में सर हिलाती है और कहती है: हम दोनों की हालत एक जैसी ही है. जितनी आग आप ने अपने अंदर छुपा राखी है शायद उतनी ही आग मेरे अंदर भी जल रही है. और जैसे में पिछले कुछ दिनों से देख रही हूँ की आप अपनी ये आग ज़बरदस्ती अपने अंदर रखे हुए है... अगर वो नहीं निकला तो आप ऐसे ही तड़पते रहोगे और ऐसा कहते हुए निशा ऋतू को अपने गले लगा लेती है.
ऋतू: तेरी बात तो सही है लेकिन पता नहीं दीपू या तुम्हारी मम्मी क्या सोचेगी और फिर दुनिया वाले क्या कहेंगे? और वैसे भी मेरी उम्र भी तुम्हारी माँ के उम्र के बराबर है.
निशा: दुनिया वालो की तो आप बात ही मत करो. रही बात आपकी उम्र की तो आपको तो पता ही है की अब दीपू ने आपकी उम्र के बराबर माँ से शादी भी कर लिया है और अब वो प्रेग्नेंट भी है. तो आप उम्र की बात ही ना करो. मैं भी एक बार माँ से बात करती हूँ. देखते है माँ क्या बोलती है. इस बात पे ऋतू कुछ नहीं कहती और फिर दोनों एक दुसरे की बाहों में सो जाते है.
दीपू के घर:
२ दिन बाद दीपू के घर में रात को सब खाना खा रहे होते है तो दीपू कविता को इशारा करता की वो उसके साथ सोने वाला है. कविता भी इशारे में हाँ कर देती है जो की दिव्या दोनों को देख लेती है और मन में सोचती है की आज कविता के बदन की टूटने की बारी है. खाना खा कर सब सोने की तैयारी करते है तो दीपू दिव्या से कहता है की वो वसु के साथ सोये. अगर उसे रात को कुछ ज़रुरत पड़ेगी तो वो उसकी मदत कर सकती है. दिव्या कुछ नहीं कहती और वो वसु को लेकर कमरे में सोने चली जाती है. वो वसु को कमरे में सुलाकर कहती है की वो २ Min में आएगी और दिव्या बाहर आकर दीपू को एक कोने में ले जाकर कहती है...
दिव्या: मैंने देखा है की तुम कविता को इशारा कर रहे थे. आज उसका पूरा बदन तोड़ देना और कल वो चलने के लायक नहीं रहे और ऐसा कहते हुए वो दीपू को आँख मार देती है.
दीपू: तुम तो मेरी एकदम समझदार बीवी निकली हो जा और वो दिव्या को चूम लेता है.
दिव्या: अब और ज़्यादा नहीं और ऐसा कहते हुए वो दीपू को धक्का देकर अलग करती है और वसु के कमरे में गांड मटकाते हुए चली जाती है.
दीपू उसकी मटकती गांड को देख कर मन में सोचता है... क्या जानलेवा गांड है इसकी....
दीपू भी फिर कविता को लेकर दुसरे कमरे में चला जाता है और शायद दरवाज़ा बंद करना भूल जाता है. कमरे में जाते ही दोनों शुरू हो जाते है और दीपू कविता को लण्ड चूसने को कहता है तो कविता भी जैसे उसी का इंतज़ार कर रही थी और वो अपने घुटनों पे आकर दीपू का लण्ड बड़े जोश से चूसती रहती है.
ठीक उसी वक़्त लता भी किचन में पानी पीने आती है और पानी पीकर जब वो अपने कमरे में जा रही थी तो वो दीपू और कविता को देख लेती है जहां कविता दीपू को खुश करने में लगी हुई थी. दीपू का बड़ा लण्ड देख कर लता की आँखें बड़ी हो जाती है और वो सोचती है की कितना बड़ा लण्ड है उसका और उसको याद करते हुए अपनी चूत मसलते रहती है.
अंदर की वो दृश्य को देख कर उसकी उत्तेजना और भी बढ़ती जा रही थी. लता को तो एक बार लगा था की वो भी कमरे के अंदर चली जाए लेकिन उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी कमरे के अंदर जाने की और बाहर ही खड़े होकर अपनी चूत मसलते रहती है.
तभी लता को अपनी कमर पर हाथ का स्पर्श महसूस हुआ लता ने तुरंत चौंक कर देखा तो दिव्या थी जो उसे देखते हुए मुस्कुरा रही थी. हुआ यूं था की भले ही दिव्या वसु के साथ थी लेकिन उसे नींद नहीं आ रही थी (वसु गेहरी नींद में चली गयी थी)और सोची थी की एक बार वो भी दीपू के पास जा कर थोड़ा मजे ले ले.
लता तो दिव्या को देख कर उसके होश उड़ गए थे. उसे क्या कहना है समझ में नहीं आ रहा था क्यूंकि उसने सोचा नहीं था की दिव्या उसे रंगे हाथ इस हालत में उसे पकड़ लेगी. वो कुछ कहने वाली थी कि दिव्या ने उसे मुंह पर उंगली रख चुप रहने का इशारा किया.
दिव्या ने लता को थोड़ा एक तरफ किया और खुद कमरे के अंदर का नज़ारा देखा तो उसको हसी आ गयी, लेकिन उसकी चूत में भी नमी आने लगी। दिव्या ने कुछ पल देखा और फिर उसके चेहरे पर एक शरारती मुस्कान आ गई, उसने तुरंत चेहरा हटाया और लता को देखा. लता उसे ही देख रही थी, दोनों के बीच जैसे आँखो में ही सब बातें हो गईं और इस बार दिव्या ने पहल करते हुए आक्रामकता दिखाते हुए लता को दीवार की ओर ढकेल दिया और उसके होंठों पर टूट पड़ी।
लता को तो कुछ समझ नहीं आ रहा था की क्या हो रहा है. लता जब अपने होंठ बंद ही रखी थी तो दिव्या अलग हो कर कहती है... मुझे पता है बुआ की आप भी बहुत प्यासी हो और हम सब को देख कर आप भी अपनी आग में जल रही हो. हम सब को इस बारे में पता है. लता ये बात सुनकर थोड़ा शर्मा जाती है तो दिव्या कहती है: इसमें शर्माने की क्या बात है? हमें तो अब भी आश्चर्य है की आप अब तक अपने आप को संभाल कर राखी हो. और वैसे भी एक बात बताऊँ?
लता: क्या?
दिव्या: यही की दीपू को भी ये बात पता है की आप बहुत प्यासी हो लेकिन हमारा पति थोड़ा संस्कारी है. वो आपके पास नहीं आएगा. आपको ही उसके पास जाना है और लता की साडी के अंदर हाथ दाल कर उसकी चूत को सहलाते हुए कहती है...आप ना भी बोलो तो आपकी चूत बता रही है की आप भी अंदर जाना चाहती हो और फिर ऐसा कहते हुए दिव्या फिर से लता के होंठों पे टूट पड़ती है.
लता भी तुरंत इस बार उसका साथ देने लगी, दोनों पागलों की तरह एक दूसरे के होंठों को चूस रही थीं और अंदर दीपू और कविता अपने उत्तेजना में लगे थे.
लता और दिव्या बाहर एक दूसरे को चूसते हुए अपनी उत्तेजना को संभालने की कोशिश कर रहीं थी और तब तक चूसती रहीं जब तक दोनों के लिए सांस लेना तक मुश्किल नहीं हो गया.. फिर जाकर दोनों के होंठ अलग हुए.
अंदर अब दीपू कविता को बिस्तर पे सुला कर उसकी चूत पे टूट पड़ता है और अपनी जुबां से उसकी चूत को चूसते हुए अपना एक ऊँगली उसकी गांड में भी दाल देता है. कविता भी उत्तेजना में आकर दीपू का सर अपनी चूत पे दबा देती है और वो ज़ोर ज़ोर से आंहें भर्ती रहती है...
कविता: तुम जितनी बार भी मेरी चूत चूसते हो तो ऐसा लगता है की पहली बार तुम मेरी चूत चूस रहे हो. तुम तो मेरी चूत चूस कर ही मुझे झडा देते हो और इस बार भी कोई अलग नहीं है और ऐसा लगता है जैसे तुम्हारी जुबां और मेरी चूत के बीच एक चुम्बक और लोहे का रिश्ता है. मेरी चूत देखते ही तुम्हारा मुँह उस पर लगा देते हो... लेकिन एक बात कहूँ तो मुझे भी बहुत अच्छा लगता है और ऐसे ही मेरी चूत चूसते रहो और ऐसा कहते हुए कविता फिर से झड़ जाती है और उसका पानी दीपू बड़े चाव से पी जाता है.
दीपू: जानू मेरा भी कुछ ऐसे ही हाल है... जितनी बार भी तुम मुझे अपनी चूत का पानी पिलाती हो उतना ही मुझे पीने का मन करता है.
अंदर की तरह कमरे के बाहर भी उत्तेजना अभी भी चरम पर थी दिव्या ने लता के पल्लू को नीचे सरका दिया था. लता का नंगा पेट और ब्लाउज़ में बंद उसकी मोटी मोटी चूचियां उसके सामने थीं. दिव्या लता के आगे बैठी थी और उसके मांसल कामुक पेट को चाट और चूम रही थी, लता भी दिव्या के चूमने चाटने से मचल रही थी आहें भर रही थी
लता की साँसें भारी हो चुकी थीं। दिव्या उसके पेट को चूमते-चाटते हुए नीचे झुकी हुई थी और लता की आँखें आधी बंद हो गई थीं। उसकी मोटी चूचियाँ ब्लाउज़ में तनी हुई थीं और पेट पर दिव्या की गर्म साँसें पड़ रही थीं।
“ओह्ह्ह्ह अह्ह्ह्ह सीईईईईई... दिव्या...” लता की आवाज़ काँप रही थी और धीरे धीरे सिसकारियां ले रही थी “अह्ह्ह्ह बहुत अच्छा कर रही है तू अह्ह्ह्ह... थोड़ी नीचे जा और चाट जा मेरी चूत को ..
दिव्या लता की बात का इंकार करते हुए उसकी जीभ को लता की गहरी नाभि के चारों ओर घूम रही थी — धीरे-धीरे, स्वाद लेते हुए। उसने नाभि में जीभ घुसा दी, फिर बाहर निकाली और पेट की नरम मांसलता को चूमने लगी। लता की उत्तेजना अब चरम पर थी।
थोड़ी देर बाद लता की बात मानते हुए उसके पेट को चूमते हुए थोड़ा नीचे जाती है तो देखती है की उसकी चूत की जगह उसकी साडी थोड़ी भीगी हुई है जो बता रहा था की लता की चूत अपना रस छोड़ रही है.
दिव्या: क्या बात है बुआ... आपकी चूत तो बहुत पानी छोड़ रही है.
लता: हाँ क्यों नहीं... अंदर का दृश्य ही ऐसा है... ऐसे दृश्य तो मैं रोज़ देखती हूँ तुम सब की... तो मेरी चूत तो गीली होगी ही ना. इस बात पे दिव्या हस देती है और फिर बड़े प्यार से लता की चूत को साडी के ऊपर से ही चूसने लग जाती है.
लता: ऐसे ही चाट मेरी चूत को... बहुत दिनों से परेशान कर रखी है इसने. आह्ह...
अंदर कविता भी ऐसे ही सिसकियाँ ले रही थी जहाँ दीपू उसकी चूत और गांड को चाट रहा था. अब दोनों जगह माहौल बहुत गरम हो चूका था... जहाँ दीपू अपनी बीवी को खुश कर रहा था तो वहीँ दिव्या भी अपनी बुआ को खुश कर रही थी.
कविता: हाँ जानू ऐसे ही... तुम जितनी भी मेरी चूत और गांड चाटते हो मेरा मन नहीं भरता है... अह्ह्ह.. आह्ह्ह.. ओहहह ओहहह.”
दिव्या फिर साडी को ऊपर कर के अपनी जीभ को लता की चूत में डालते हुए कहती है… सोचा नहीं था की आपका पानी इतना मीठा और थोड़ा खट्टा भी रहेगा. दीपू को पीने में मजा आएगा. दिव्या जब ये बात कहती है तो लता एकदम आश्चर्य से दिव्या की तरफ देखती है जैसे पूछना छा रही हो की क्या बात कर रही हो..
लता: क्या बोल रही है तू?
दिव्या: देखते जाओ आगे क्या होता है और फिर से दिव्या लता की चूत को चाटने लगती है और इस बार अपनी २ उंगलियां उसकी रस से बहती चूत में दाल देती है जो की बड़ी मुश्किल से अपनी उंगलियां अंदर दाल पाती है. लता की तो जैसे सांस ही रुक गयी थी. बहुत दिनों बात किसीने उसकी चूत से खेला और खोला था... उसकी चूत तो जैसे एकदम बंद ही हो गयी थी.
दिव्या: क्या बात है बुआ आपकी चूत तो बहुत टाइट है... मेरी उंगलियां को बड़ी मुश्किल से अंदर दाल पायी.
लता: जब इतने दिनों से ये चूत से बंद थी और सिर्फ अपनी उँगलियों से काम चला रही थी तो टाइट तो होगी ही ना... लता भी अब आहें भरने लगती है… अह्ह्ह्ह... आह्ह...
लता की आँखें और भी ज्यादा मुंद गईं। उसके चेहरे पर एक अजीब-सी सुकून दिख रहा था — शर्म, उत्तेजना और एक अंधेरी इच्छा का मिश्रण।
“अह्ह्ह्ह... कितना मजा आ रहा है दिव्या... मैं भी इसी ख़ुशी के लिए तरस रही थी.
दिव्या: ये ख़ुशी तो कुछ नहीं है बुआ... अलसी ख़ुशी तो अंदर कविता ले रही है... देखो.. और फिर दोनों अंदर देखते है जहाँ अब दीपू कविता की टांगों को अपने कन्धों पर रख कर ज़ोरदार कविता की चुदाई कर रहा था. कविता तो जैसे आसमान में पहुँच गयी थी.
दिव्या: अंदर जो देख रही हो बुआ... उसे असली ख़ुशी कहते है. आपको भी लेना है ऐसी ख़ुशी? लता इस बात पे कुछ नहीं कहती. दिव्या फिर लता का सर पकड़ कर उसके होंठ पे टूट पड़ती है और दोनों में एक ज़ोरदार और गहरा चुम्बन होता है.
दिव्या भी अब अंदर का नज़ारा देख कर बहुत बेहक गयी थी और वो भी अब रुकने वाली नहीं थी।
उसने लता की मोटी-मोटी चूचियों को जोर से मसलना शुरू कर दिया — ब्लाउज़ के ऊपर से ही। चूचियाँ बहुत टाइट थी । वो उन्हें दबाती, मसलती, और फिर अंगूठे से निप्पलों को दबाती। लता के मुँह से आहें निकल रही थीं।
“आह्ह्ह... दिव्या... आह्ह्ह...”
दिव्या के हाथ अब लता के ब्लाउज़ के बटनों पर आ गए और एक-एक करके बटन खोलने लगी।
और देखते ही देखते उसने लता का पूरा ब्लाउज खोल दिया और ऊपर से उसे नंगा कर दिया.
लता ने खुद ही ब्लाउज़ को अपनी बाजुओं से निकाल कर नीचे गिरा दिया।
लता की मोटी-मोटी चूचियाँ — भारी, गोल, निप्पल खड़े हो चुके — दिव्या के सामने थे। पेट नंगा, नाभि गहरी, और नीचे साड़ी अभी भी कमर पर बँधी हुई।
दिव्या ने लता को देखा — पूरी तरह नंगी ऊपर से — और फिर से उसके होंठों पर टूट पड़ी।
इस बार चुम्बन और भी आक्रामक था।
दोनों के होंठों की कुश्ती कुछ देर चली। दिव्या और लता एक-दूसरे के होंठों को चूस रही थीं, जीभें आपस में लिपट रही थीं, साँसें एक-दूसरे के मुँह में घुल रही थीं। चुम्बन गहरा और गीला था — होंठों से निकलती चूसने की आवाज़ें अब धीरे धीरे वहां भी हलकी गूँज रही थी । दिव्या के हाथ लता की नंगी कमर को कसकर पकड़े हुए थे और लता के हाथ दिव्या की पीठ पर घूम रहे थे। दोनों के बदन गर्म हो चुके थे.
कुछ देर बाद अब बारी थोड़ी पलट गयी थी. लता ने दिव्या की मोटी मोटी चूचियों पर हमला बोला.
उसने दिव्या की एक भारी चूची को दोनों हाथों से पकड़ लिया — उसकी चूची मोटी तो थी (और ये सब दीपू के कारनामे का नतीजा था) लेकिन एकदम ठोस और तनी हुई थी और उसमें कोई ढीलापन नहीं था. वो उसे जोर-जोर से मसलने लगी, उंगलियाँ उसकी नरम मांसलता में धँसती जा रही थीं। निप्पल खड़ा हो चुका था और लता ने उसे अंगूठे और तर्जनी के बीच दबाकर घुमाना शुरू कर दिया। दिव्या के मुँह से एक गहरी आह निकली।
लता ने दिव्या की दूसरी चूची को भी हाथ में लिया और एक-एक करके मसलते हुए दोनों को बारी-बारी से चूसना शुरू कर दिया। पहले बाईं चूची को मुँह में भर लिया जो एकदम गर्म और नरम थे. वो जोर से चूस रही थी, जीभ से निप्पल को घुमाती हुई, कभी हल्के से दाँतों से दबाती हुई। फिर दूसरी चूची पर चली गई। एक को मसलती, दूसरी को चूसती, और फिर बदल कर दूसरी को मसलने लगती।
दिव्या का बदन काँप रहा था। उसके मुँह से लगातार आहें निकल रही थीं।
“अह्ह्ह्ह अह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्ह बुआ जी... अह्ह्ह्ह ऐसे ही चूस ले मेरा सारा दूध अह्ह्ह्ह... कुतिया... काट मत...” दिव्या की आवाज़ काँप रही थी.. लेकिन उसमें एक गहरी इच्छा थी। (लता और दिव्या इतनी जोश और गरम हो चुकी थी की उसे इस बात का एहसास भी नहीं हुआ की उत्तेजना में उसने कुतिया कहा था.)
लता ने दिव्या की बातें सुनकर और भी जोश में आ गई। अब दोनों की चूत में गर्मी और बढ़ गई। दिव्या की “कुतिया” वाली बात ने उसे और उत्तेजित कर दिया। वो बिना रुके दिव्या की चूचियों को मसल रही थी — जोर-जोर से दबाती, मसलती, और फिर मुँह से चूसती। एक चूची को पूरी तरह मुँह में लेकर चूसती, जीभ से निप्पल को चाटती, और दूसरी को हाथों से मसलती। फिर बदल कर दूसरी चूची पर हमला बोल देती। दिव्या की चूचियाँ अब लाल हो चुकी थीं, निप्पल चूसने से और भी खड़े और नुकीले हो गए थे ।
ऐसा ही कुछ दृश्य अंदर कमरे में भी था. अब कविता दीपू के लण्ड पे सवारी कर रही थी. दीपू बिस्तर पे लेता हुआ था और कविता उसके लण्ड पे बैठ कर उछल उछल कर चुद रही थी.
बाहर लता ने भी दिव्या का ब्लाउज़ उतार दिया था। अब दोनों ही ऊपर से बिल्कुल नंगी थीं। दिव्या की मस्त चूचियाँ हवा में झूल रही थीं और लता के हाथ उन पर घूम रहे थे। लेकिन दोनों के होंठ फिर से एक-दूसरे में समाए हुए थे — और भी गहरा, और भी गीला चुम्बन चला दोनों का । दोनों अपने हाथ को एक दुसरे की चूचियों और गांड पे घुमा रहे थे।
दोनों की जीभ एक दुसरे के साथ गुथम घुता हो रहे थे... मतलब दोनों एक दुसरे का रस चूस और चाट रहे थे. दोनों की साँसें भारी थीं और चुम्बन की गीली आवाज़ें अब और भी तेज़ हो चुकी थीं।
दोनों एक-दूसरे को ऐसे चूम रही थीं जैसे बरसों पुरानी प्रेमिकाएँ हों — गहरा, धीमा और भूखा चुम्बन। उनके होंठ आपस में दब रहे थे, जीभें धीरे-धीरे लिपट रही थीं और चूसने की गीली आवाज़ें कमरे के बाहर हल्की-हल्की गूँज रही थीं। साँसें एक-दूसरे के मुँह में घुल रही थीं और दोनों के बदन गर्मी से चिपक चुके थे।
लता भी खुलकर आनंद ले रही थी क्यूंकि बहुत दिनों के बाद उसे ये एहसास और ख़ुशी मिल रही थी. दिव्या ने लता के होंठों को छोड़ा। दोनों की साँसें भारी थीं। दिव्या ने लता को धीरे से पलटा दिया — अब लता की पीठ उसकी ओर थी।
दिव्या ने उसके बदन को साड़ी के ऊपर से ही मसलना शुरू कर दिया। उसके हाथ लता की पीठ से शुरू होकर कमर तक फिसलते गए. फिर ऊपर आकर कंधों को दबाने लगे। लता आहें भरने लगी — हल्की, काँपती हुई आहें।
“आह्ह्ह... दिव्या …आआआआ”
दिव्या ने लता का सर अपनी ओर घुमा दिया और फिर उसकी चूची को मसलते हुए फिर से उसके होंठों पे टूट पड़ी. अब लता पे दोहरा हमला हो रहा था... होंठों पे और चूचियों पे. लता ये दोहरा हमला झेल नहीं पायी और दिव्या के इस हरकत से ही उसका पानी निकल गया जो की जांघ से बेह रहा था.
दिव्या फिर भी लगी रही और लता की मोटी मोटी चूचियों पे हमला बोल दिया और जोर-जोर से दबाती, मसलती, और उँगलियों से निप्पलों को महसूस करती.
लता दिव्या की बाहों में पूरी तरह पिघल रही थी। उसका बदन ढीला पड़ चुका था, सिर थोड़ा पीछे झुका हुआ, और आँखें आधी बंद। हर मसलने पर उसके मुँह से हल्की-हल्की आहें निकल रही थीं।
“आह तेरी ये चूचियां अह्ह्ह्ह बुआ जी...” “जी करता है इन्हें पूरा निचोड़ लूं...”
लता अब गहरी सांसें लेते हुए और उत्तेजित होते हुए:“आह्ह्ह्ह... ओह्ह्ह... निचोड़ लो न आह्ह... किसने रोका है...”
दिव्या ने और जोर से मसलना शुरू कर दिया। उसके हाथ अब और आक्रामक हो चुके थे।
“आह निचोडूंगी... पूरा निचोड़ लूंगी... आज आपकी पूरी कसर और आग पूरी तरह से मैं अपनी ओर से निकाल दूँगी..”. और बाकी का काम दीपू करेगा और ऐसा कहते हुए दिव्या उसके चूचियों को और ज़ोर से दबाती और मसलती रहती है”
लता का बदन और भी ज्यादा काँप उठा। उसकी चूत में गर्मी और बढ़ गई।
“अह्ह्ह्ह हां सीईईई दिव्या... मेरे बदन से खेलो... मसलो मुझे...”
अब लता अपने आप को दिव्या को समर्पण कर चुकी थी क्यूंकि उसकी आग इतनी भड़क चुकी थी.
अंदर का हाल भी कुछ ऐसा ही था. दीपू अब कविता को घोड़ी बना कर उसके बाल पकड़ कर पीछे से उसे चोद रहा था और कविता पूरी ज़ोर से सिसकारियां लेते हुए मजे ले रही थी.
दीपू भी काफी देर से कविता को चोद रहा था और अब उससे भी रहा नहीं जाता और फिर ज़ोर से घुर्राते हुए वो दिव्या की चूत में ही अपना पूरा पानी गिरा देता है.
क्यूंकि दीपू के घुर्राने से लता और दिव्या अपना काम रोक कर कमरे में देखते है और वो दोनों दीपू का झड़ना देख लेते है . उसको देख कर दिव्या लता के कान में कहती है: देख रही हो बुआ... दीपू का माल... कितना गाढा है और कितना पानी छोड़ रहा है. बोलो अपनी उसका पानी लेना चाहोगी?
लता तो अब और भी उत्तेजित हो गयी थी.
“अह्ह्ह दिव्या... ओह्ह्ह... इतना पानी निकाला है उसने... मैंने कभी सोचा नहीं था... अब मुझे भी पता चल की वसु इतनी जल्दी पेट से कैसे हो गयी. उसका गाढा पानी जिस किसीकी चूत में जाएगा वो तो गाभिन हो ही जायेगी..”
लता ने दिव्या की बाहों में मचलते हुए कहा।
अब लता ने भी दिव्या को पूरा नंगा कर दिया और उसकी चूचियों को मसल और काट खा रही थी.
लता : तूने भी तो दीपू का रस चखा है ना.. तूने भी तो उसका पानी अपनी चूत में लिया है ना... तू अब तक गाभिन क्यों नहीं हुई? लता की बात सुनकर अब दिव्या भी काफी उत्तेजित हो गयी थी.
दिव्या: चिंता मत करो बुआ जी... वो दिन भी ज़्यादा दूर नहीं जब मेरे पेट में भी हम दोनों का बच्चा पलेगा और ऐसा कहते हुए लता को अपने सीने से लगा कर एक चूची उसके मुँह में ठूस देती है.
लता ने दिव्या के नंगे बदन को और भी जोर से मसलना शुरू कर दिया। उसके हाथ दिव्या की कमर से नीचे फिसलते हुए मोटे चूतड़ों तक पहुँच चुके थे। वो उन्हें दबाती, मसलती, और उँगलियों से गोलाई को महसूस करती हुई पूछी : तूने कभी गांड मरवाई है दीपू से?
लता की ये बात सुनकर ही दिव्या अपनी परम सुख में पहुँच गयी और वो भी अपना पानी छोड़ दिया. दिव्या लता की तरफ देख कर उसका हाथ ले जाकर अपनी चूत पे रख दिया. दिव्या का गीला और पानी छोड़ता हुआ चूत को महसूस कर के ही लता को पता चल गया था की दीपू ने दिव्या की गांड भी मारी है.
दिव्या: लगता है आपकी गांड को भी दीपू के लण्ड की ज़रुरत है. दिव्या की ये बात सुनते ही लता के बदन में एक ज़लज़ला पैदा हो गया और उसकी आँखों में एक तरफ से चमक आ गयी..
दिव्या: मेरी चूत तो एकदम गीली हो रही है यही सोचके की दीपू का लण्ड जब आपकी की गांड की सैर करेगा तो आपकी क्या हालत होगी? जब उसने पहली बार मेरी गांड मारी थी... उसने तो मेरे होश ही उदा दिए थे. तब से हर रोज़ जब भी दीपू मुझे चोदता है तो मेरी गांड ज़रूर मारता है.
दिव्या की ये बात सुनते ही लता की आँखों के सामने तुरंत वो दृश्य घूम गया जो अभी कुछ देर पहले दिव्या ने बताया था... की दीपू का लण्ड लता की गांड में गया तो वो क्या करने वाली है.
लता दीपू के लण्ड को याद करते हुए गहरी आह भर रही थी। आँखों में उत्तेजना और इच्छा साफ़ नज़र आ रही थी.
अब दोनों इतनी कामुक बातें और अंदर का नज़ारा देख कर इतने बेहक गए थे की उन्हें पता भी नहीं चला जब वो दोनों नंगी हो गयी और एक दुसरे की बदन को सेहला रहे थे उत्तेजित हुए..
दिव्या जब अपना हाथ लता की चूत पे रखती है तो वो पाती है की लता की चूत भी उसकी चूत की तरह एकदम बेह रही है और एकदम गीली हो गयी है.
दिव्या: बुआ जी, आपकी चूत तो सच में सुलग रही है...
लता ने दिव्या की बाहों में और भी ज्यादा पिघलते हुए जवाब दिया: हां दिव्या मेरी चूत प्यासी है अहहुह्ह.. जब से तूने बताया है और मैंने भी दीपू का लण्ड देखा है मुझे नहीं लगता की मैं अब रह पाऊँगी.
लता: दिव्या जो आग इतने दिनों तक मेरे अंदर मैंने छुपा रखी थी लगता नहीं अब मैं और छुपा पाऊँगी. अगर दीपू का लण्ड नहीं लिया तो.... लता इतना ही बोलती है की दिव्या उसका मुँह बंद कर देती है और कहती है.... चिंता मत करो... जल्दी ही वो काम भी पूरा हो जाएगा.
लता की इतना ही कहना था की दिव्या झटके से कमरे के अंदर आ जाती है और वो भी पूरी नंगी. लता को कुछ समझ नहीं आता की दिव्या क्या कर रही है. दिव्या को ऐसा नंगा देख कर दोनों दीपू और कविता भी दांग रेह जाते है और उन्हें भी कुछ समझ नहीं आता की क्या हो रहा है और दिव्या ऐसे नंगी अंदर क्यों आयी है.
दिव्या: क्यों पति जी कविता को ठोक कर आराम कर रहे हो और जैसे लगता है की तुम मुझे भूल ही गए हो.
दीपू: अरे तुम्हे आज माँ के पास सोने को कहा था ना... सोचा आज अपनी इस बीवी को प्यार करूंगा और कल तुम्हे. तुम्हे तो पता है की अब माँ के साथ कोई होना चाहिए ना.
दिव्या: तुम्हारी बात भी सही है पति जी.... लेकिन लगता है आज तुम्हारी किस्मत बड़ी अच्छी है. आज तो आपको एक बम्पर ऑफर है.
दीपू को कुछ समझ नहीं आता तो वो और कविता दोनों एक दुसरे को देखते है और सवालिया नज़र से दिव्या को देखते है.
तब तक दिव्या कमरे से बाहर जाती है और और एक Min बाद लता जैसे कमरे में गिर जाती है. दिव्या कमरे से बाहर जाकर लता को अंदर जाने को केहती है तो लता मना कर देती है.
दिव्या हस देती है और केहती है... लगता है आप ऐसे नहीं मानोगे और वो लता को कमरे के अंदर धक्का दे देती है. लता अपने आप को संभालते हुए जब वो खड़ी हो जाती है तो तब तक देर हो गयी थी. वो दीपू के कमरे के अंदर आ गयी थी और वो भी दिव्या की तरह एकदम नंगी ही थी दोनों दीपू और कविता के सामने.
लता को ऐसे उनके सामने देख कर दोनों दीपू और कविता की आँखें फटी की फटी रह गईं।
उन्हें समझ नहीं आ रहा था की क्या हो रहा है.
दिव्या फिर पीछे से आती है और केहती है: मैंने कहा था ना पति जी... आज यह है तुम्हारा बम्पर ऑफर. तुम्हे तो पता है इस घर में तीन नहीं बल्कि चार औरतें है. तुम तो तीनो को बहुत खुश रखते हो और कविता की तरफ देख कर... जैसे कुछ देर पहले तुमने मेरी सौतन को खुश किया था.
लेकिन शायद चौथी के बारे में भूल ही गए.
दीपू: क्या कह रही हो तुम? ठीक तो हो ना?
दिव्या: मुझे पता है दीपू... तुम्हारी गलती नहीं है... इसीलिए तो हम सब तुमसे इतना प्यार करते है. तुम्हे भी पता है की लता भी तुम्हारे प्यार के लिए तड़प रही है लेकिन कभी भी तुमने उनकी ओर गलत नज़र से नहीं देखा.
दिव्या कविता की तरफ देख कर: क्या केहती हो कविता?
कविता: सब को देख कर... प्यार से दीपू को चूमते हुए... दिव्या तू सही कह रही हो. हम सब को इस बात का पता है. लता ये सब सुनकर सब को देख रही थी लेकिन कुछ नहीं कहती.
दिव्या: तो आज रात आप खूब मस्ती करो. मैं चलती हूँ. अगर वसु उठ गयी और मुझे वहां नहीं पाया तो घबरा जायेगी.
हाँ एक और बात.... तुम्हे शायद पता ना हो.... लेकिन बुआ जी की चूत एकदम गीली और रस छोड़ रही है. तुम्हारा डंडा इसके बिल में आसानी से चला जाएगा. ऐसा बोल कर उसे आँख मार देती है और दिव्या कमरे से चली जाती है लेकिन जाने से पहले कमरे का दरवाज़ा बंद कर देती है. अब कमरे में सिर्फ तीनो ही रह गए थे. भले ही तीनो नंगे थे... दीपू और कविता ने अपने आपको चादर से ढका हुआ था तो वहीँ लता उन दोनों के सामने एकदम नंगी खड़ी थी.
दीपू फिर खड़ा हो कर लता की तरफ आता है और उसकी आँखों में देखते हुए पूछता है... दिव्या जो केह रही थी... क्या वो सच है? लता थोड़ा शर्माते हुए हाँ में सर हिला देती है तो दीपू उसके चेहरे को पकड़ कर अपने होंठ उसके होंठों से मिला देता है. लता को तो जैसे इसका ही इंतज़ार था. काफी देर से वो भी उत्तेजित थी जो कमरे के बाहर उसके और दिव्या के बीच जो कुछ हुआ था. लता भी दीपू के होंठों को चूसने लगती है और दोनों एक प्रगढ़ और गहरी चुम्बन में जुड़ जाते है जो काफी देर तक चलता रहा.
उन दोनों को देख कर कविता भी गरमा जाती है और वो भी उठकर उन दोनों के पास आती है. अब लता भी कविता को देख कर अपनी शर्म दूर कर देती है और वो भी थोड़ा खुल जाती है. जब कविता उसके पास आती है तो वो दीपू को छोड़ कर वो कविता के होंठों को अपने होंठों से जोड़ देती है और दोनों फिर से एक गहरे चुम्बन में जुड़ जाते है और उसे चूमते हुए उसके हाथ को कविता की कमर पे घुमाते रहती है.
उन दोनों को देख कर दीपू बिस्तर पे बैठ कर अपने लण्ड को हिलाते रहता है और देखते ही देखते उसका लण्ड भी अपनी पूरी औकात में आ जाता है. उन दोनों को चूमते चाटते देख कर दीपू कहता है: इस कमरे में मैं भी हूँ. कविता उसको झूटी गुस्से से देख कर केहती है... कुछ देर पहले तो तुमने मेरी जम के मारी है. फिर से तैयार हो गए? पहले मुझे बुआ जी के साथ प्यार करने दो.
दीपू: यहां आकर मेरे लण्ड से भी प्यार कर सकते हो ना.
दोनों फिर एक दुसरे को देखते है और हस्ते हुए दीपू के पास आते है. कविता ने पहले ही दीपू का लण्ड चूसा था तो वो लता को इशारा करता है तो लता भी समझ जाती है और घुटनों पे बैठ के दीपू के लण्ड को देखती है जो की पूरा खड़ा था और वो जैसे लता को सलामी दे रहा था.
दीपू के खड़े लण्ड को देख कर लता से भी रहा नहीं जाता और उसके लण्ड को पकड़ कर पूरे चाव से चूसने लगती है.
लता काफी देर तक दीपू का लण्ड चूसती है और थोड़ी देर बाद केहती है की उसके घुटने दुःख रहे है तो दीपू को दया आती है और दोनों को बिस्तर पे ले जाता है और इस बार दोनों दीपू के लण्ड को बारी बारी से चूमते चूसते और चाटते है.
जहाँ कविता दीपू का लण्ड चूसती है तो लता भी दीपू की गोटियों को चूसते रहती है. दीपू के तो मजे ही मजे थे. वो तो जैसे जन्नत पे पहुँच गया था.
काफी देर तक जब दोनों दीपू के लण्ड को चूसते रहते है तो दीपू को लगता है की अगर वो उन्हें नहीं रोका तो वो झड़ जाएगा. और उसे पता था की इस बार वो झड़ गया तो फिर उसे भी थोड़ी मुश्किल होगी उसके लण्ड को फिर से खड़े करने में भले ही २ कामुक महिलाएं उसके साथ है.
थोड़ी देर बाद दीपू कहता है: तुम दोनों ने मुझे जन्नत की सैर कराई है. अब मेरी बारी है की तुम दोनों को भी ऐसा मजा दूँ. ऐसा कहते हुए दीपू लता को सुला देता है और उसकी चूत को चूसने लग जाता है. काफी सालों बाद किसी पुरुष ने लता की चूत को चूसा था और वो कोई नहीं वो उसका भांजा ही था जो उसे चूस कर मजा दे रहा था. कविता भी दीपू के सर को पकड़ कर उसकी चूत पे ठूस रही थी. अब कमरे में ज़ोर ज़ोर से सिसकियों की आवाज़ गूँज रही थी. आह... अह्ह्ह... अहह... दीपू... ऐसे ही चूस... बहुत अच्छा लग रहा है.
दीपू लता की चूत को चूस रहा था तो वहीँ कविता भी फिर से गरम हो जाती है और इस बार वो झुक कर लता को चूमती है. लता के तो जैसे मजे ही मजे थे.
दीपू के चूसने से ही लता झड़ जाती है और ज़ोर ज़ोर से सांसें लेने लगती है. वो अपने आप को दुरुस्त कर के कविता को चूमने लगती है. थोड़ी देर बाद...
लता: दीपू अब मुझे और मत तड़पा.... मैं इस पल के लिए बहुत दिनों से तरस रही थी... अब और रहा नहीं जाता. अपने लण्ड से अब मुझे भी आबाद कर के.
लता के मुँह से ये बात सुनकर दीपू को हसी आ जाती है और फिर अपने लण्ड में थोड़ा थूक लगा कर लता की चूत पे रगड़ता है. लता इस रगड़ से सेहर जाती है और केहती है.... थोड़ा धीरे से डालना दीपू. बहुत दिनों बाद चुद रही हूँ.
दीपू: चिंता मत करो बुआ. मैं आराम से ही करूंगा और वो कविता को इशारा करता है तो कविता दीपू का इशारा समझ कर लता के चेहरे पे बैठ जाती है और अपनी रस से बहती चूत को लता के मुँह पे रख देती है.
लता को इस बात का पता नहीं था अब उसपे केहर धा ने वाला है क्यूंकि जब लता कविता की चूत चूस रही थी तो दीपू अपने लण्ड को लता की चूत पे रख कर एक ज़ोरदार धक्का मारता है. धक्का इतना ज़बरदस्त था की पहली बार में ही उसका पूरा लण्ड लता की चूत की जड़ तक पहुँच जाता है. लता की तो जैसे आँखें बाहर आ जाती है. कविता उसके मुँह पे बैठी थी इसीलिए उसकी चीक कविता की चूत पे ही दब जाती है वरना शायद वो इतना ज़ोर से चिल्लाती की वो आवाज़ बगल वाले घर में भी सुनाई देता.
दीपू को भी लगता है की शायद उसने बाहर ज़ोर से उसे ठोका है. वो झुक कर लता की चूचियों को चूसते है और वहीँ कविता भी उसके सर पे हाथ रख कर उसे थोड़ा सहारा देती है. दीपू भी थोड़ी देर ऐसे ही अपने लण्ड को उसकी चूत पे रख कर थोड़ा वक़्त गुज़ारता है और कुछ नहीं करता. जब लता को थोड़ी राहत मिलती है तो फिर से वो कविता की चूत को चूसने लगती है. ये एक तरफ से उसका इशारा था की वो अब थोड़ी ठीक है. दीपू भी समझ जाता है और अपने लण्ड को बाहर निकल कर अब धीरे धीरे उसे पेलने लगता है.
अब लता को भी मजा आने लगता है. अब कविता भी उसके ऊपर से उठ जाती है और लता के ऊपर सो जाती है. अब लता और कविता दोनों ६९ पोजीशन में थे और दोनों एक दुसरे की चूत को चाट रहे थे और दीपू लता को पेले जा रहा था.
लता भी बेहकते हुई चिल्लाते रहती है अब... “अह्ह्ह्हः अह्ह्ह्ह सीईईईईई ओह्ह्ह्ह अह्ह्ह्ह लल्ला अह्ह ओह्ह्ह मार डाला अह्ह्ह्ह आराम से ओह्ह्ह अह्ह्ह्ह मैं आने वाली हूं अह्ह्ह्ह ओह्ह्ह!”
काफी देर तक लता को पेलने के बाद लता केहती है... मुझे ही पलोगे क्या? कविता तू क्यों नहीं चुदती?
कविता: नहीं बुआ जी.... आज रात आपकी बारी है.. आप ही मजे करो. आपके आने से पहले तो मेरा नंबर लग ही गया था और शायद ये बात आपको भी पता है.
फिर दीपू बिस्तर पे सो जाता है और लता उसके खड़े लण्ड को पकड़ कर अपनी चूत पे घुसा देती है और एक तरह से उसपे बैठ जाती है.
दीपू भी उसकी कमर को पकड़ कर अपने लण्ड को उसकी चूत में घुसाते हुए उसकी चुदाई करते रहता है और लता भी उसके लण्ड पे झूलते रहती है. अब कमरे में माहौल बहुत गरम हो गया था. जब दीपू लता को चोद रहा था तो वहीँ कविता बगल में बैठ कर अपनी चूत को मसलते रहती है. थोड़ी देर बाद अब दीपू से भी रहा नहीं जाता तो वो भी कहता है की उसका भी होने वाला है.
लता: २ Min रुको मेरा भी होने वाला है... लेकिन एक Min के अंदर ही लता भी अपना पानी छोड़ देती है. आखिर में दीपू से भी रहा नहीं जाता और वो भी झड़ने के करीब आ जाता है. जब वो बोलता है तो लता भी उसके लण्ड से उठ जाती है और दोनों कविता और लता उसके लण्ड को चूसती है. दीपू भी गुर्राते हुए अपना पानी दोनों के ऊपर गिरा देता है तो दोनों भी उसका पूरा पानी पी जाते है.
दीपू भी अब बहुत थक गया था और वो भी हफ्ते हुए बिस्तर पे गिर जाता है और दोनों लता और कविता दोनों उसके बगल में अपना सर रख कर सो जाते है. लता दोनों की तरफ देख कर ख़ुशी से केहती है.... अब मुझे समझ में आया तुम सब इतने खुश कैसे रहते हो. वो दीपू की तरफ देख कर केहती है... जब इतना समझदार पति और इतनी प्यारी पत्नियां हो तो घर में खुशियां ही रहेगी... दीपू ये बार सुनकर हस देता है और मन में सोचता है की वो सच में बहुत किस्मतवाला है.... और फिर तीनो थोड़ी देर बाद सो जाते है...
Note: अपडेट की देरी के लिए माफ़ी. लेकिन वक़्त की कमी, काम और स्वास्थय के कारण उपदटेस में देरी हो जाती है. इसीलिए हर अपडेट मैं लम्बा ही लिखने की कोशिश करता हूँ जो की एक तरह से देरी के लिए भरपाई हो
दीपू: तो मैं क्या करूँ?
वसु: करना क्या है? जैसे तेरा मन करे वो कर... तू जो भी निर्णय लेगा उसमें मेरी सहमती होगी. तू उसकी चिंता मत कर.
अब आगे..
दिन ऐसे ही गुज़रते रहते है जहां ऑफिस में दीपू अपने काम से busy था तो वहीँ घर में भी अपनी २ बीवियां की खूब बजाता था. वसु का पेट अब थोड़ा फूलने लगा था और उसे आराम ही करने दिया करते थे. दिव्या और कविता ही दीपू का ख्याल रखती थी जैसे एक दिन रात को दीपू किचन में पानी पीने जाता है तो वहां दिव्या अपनी गांड मटकाते हुए दीपू के पास आती है. वो एकदम नंगी ही थी बस एक छोटी पैंटी पहने हुई थी.
दीपू उसको देख कर कहता है: क्यों जानू कमरे में मेरा इंतज़ार करती. मैं वहीँ आ रहा था.
दिव्या: रह नहीं गया जानू इसीलिए यहाँ आ गयी और ऐसा कहते हुए वो दीपू को चूम लेती है जिसमें दीपू भी उसका पूरा साथ देता है. दोनों एक गहरी चुम्बन में जुड़ जाते है.
थोड़ी देर बाद दीपू कहता है...जानू चलो कमरे में. अब तो मुझसे भी रहा नहीं जा रहा है और फिर उसे कमरे में ले जाता है जहाँ पर उसकी खूब बजाता है और दिव्या को पूरा थका देता है.
बात एक और थी की घर में सब को एक तरह से पता चल ही गया था की लता की हालत भी बुरी है और वो भी चुदाई के लिए बहुत तरस रही है क्यूंकि हर रात वो उनकी सिसकारियां सुनकर अपनी चूत ही मसलते रहती थी. उसकी हालत को देख कर वसु को भी थोड़ा दया आती थी क्यूंकि उसे भी पता था की औरत जब तन की आग में झूल रही है तो कैसा महसूस होता है.
एक दिन वसु दीपू से इस बारे में बात करती है तो दीपू कहता है की वो अपने तरफ से कोई कोशिश नहीं करेगा. अगर बुआ खुद उसके पास आये तो वो भी उसका साथ देगा. तभी जाकर बात कुछ आगे बढ़ सकती है.
ऋतू के घर में:
वहीँ दूसरी ओर ऋतू के घर में भी हालत कुछ ऐसे ही थे. जब से ऋतू ने दीपू का खड़ा लण्ड देखा था तब से वो एक तरह से बेचैन भी हो गयी थी. वो काफी बार सोचती है की निशा को बता दे लेकिन वो बात बताने से घबरा रही थी की आखिर निशा क्या सोचेगी उसके बारे में.
एक दिन रात को जब दोनों अपने आप को शांत कर के एक दुसरे की बाहों में सोये हुए थे तो निशा कहती है: क्या बात है माँ.... कुछ दिनों से देख रही हूँ की आपकी आग तो बहुत भड़क रही है. पहले तो ऐसा नहीं था. मैं कितना भी चूस लो आपको.... फिर भी आप काफी गीली रहती हो. क्या बात है? किसीको देख लिया है क्या? और ऐसा कहते हुए वो ऋतू की तरफ देख कर हस देती है.
ऋतू को अब लगता है की उसे निशा को बता देना चाहिए और क्या पता वो ही कुछ समाधान निकाल दे उसकी उत्तेजना के बारे में...
ऋतू कुछ सोचते हुए कहती है: क्या बताओं बेटी...पता नहीं तू मेरे बारे में क्या सोचेगी....
निशा ऋतू की तरफ आश्चर्य से देखते हुए कहती है... क्या बात है और मैं क्या सोचूंगी...
ऋतू: बात ये है बेटी की कुछ दिन पहले ऑफिस में कुछ काम के लिए मैं दीपू के कमरे में गयी थी तो वो फ़ोन पे बात कर रहा था शायद तुम्हारी माँ से.
निशा: तो इसमें बात क्या है?
ऋतू: बात ये ही बेटी की जब मैं उसके कमरे में गयी तो दीपू बहुत उत्तेजित और उत्साह लग रहा था और जब मेरी नज़र थोड़ी नीचे गयी तो देखा की उसका लण्ड उसके पैंट में पूरा तना हुआ है. इतना बड़ा लण्ड मैंने आज तक नहीं देखा और वो तो एक हथोड़े के माफ़िक़ लम्बा भी नज़र आ रहा था. जब से मैंने वो नज़ारा देखा है तब से मुझे भी चैन नहीं मिल रहा है.
निशा जब ये बात सुनती है तो तो आश्चर्य से अपना मुँह खोले हुए ऋतू को देखती रहती है और ऋतू भी शर्म से अपना सर घुमा लेती है.
निशा ऋतू के चेहरे को अपनी तरफ कर के: अब मुझे समझ में आया की आप इतनी उत्तेजित क्यों रह रही हो और आप हमेशा आपकी चूत से पानी क्यों निकल रहा है.
ऋतू इस बात पे कुछ नहीं कहती तो निशा कहती है... इसमें मेरा सोचना क्या है? बस यही की हम दोनों एक ही नाव पे सवार है... जितनी आग में मैं जल रही हूँ उतनी ही आग में आप भी जल रहे हो. फरक इतना है की आप काफी सालों से ऐसे हो और मुझे जब लगा की घर में खुशियां आएगी तो मेरा भी आप जैसे ही हाल हो गया है और उसकी आँखों से आंसू आ जाते है.
ऋतू निशा को देख कर वो भी रो देती है और कहती है.... कुछ नहीं बेटा..क्या पता ऊपर वाले ने हमारे लिए कुछ अच्छा सोच रखा होगा और ऐसा कहते हुए वो निशा को चूम लेती है तो निशा भी उसका पूरा साथ देते हुए दोनों एक दुसरे का रस चूस लेते है. अब ऋतू का मन हल्का हो गया था.
निशा: एक बात कहूँ अगर आप बुरा ना माने तो.
ऋतू: अब बुरा क्या मानना है जब इतना कुछ हो गया है तो.
निशा: अगर आपको दीपू पसंद है तो...और इतना बोलते हुए निशा रुक जाती है जिसका मतलब दोनों समझ जाते है.
ऋतू निशा की ओर सवालिया नज़र से देखती है तो निशा हाँ में सर हिलाती है और कहती है: हम दोनों की हालत एक जैसी ही है. जितनी आग आप ने अपने अंदर छुपा राखी है शायद उतनी ही आग मेरे अंदर भी जल रही है. और जैसे में पिछले कुछ दिनों से देख रही हूँ की आप अपनी ये आग ज़बरदस्ती अपने अंदर रखे हुए है... अगर वो नहीं निकला तो आप ऐसे ही तड़पते रहोगे और ऐसा कहते हुए निशा ऋतू को अपने गले लगा लेती है.
ऋतू: तेरी बात तो सही है लेकिन पता नहीं दीपू या तुम्हारी मम्मी क्या सोचेगी और फिर दुनिया वाले क्या कहेंगे? और वैसे भी मेरी उम्र भी तुम्हारी माँ के उम्र के बराबर है.
निशा: दुनिया वालो की तो आप बात ही मत करो. रही बात आपकी उम्र की तो आपको तो पता ही है की अब दीपू ने आपकी उम्र के बराबर माँ से शादी भी कर लिया है और अब वो प्रेग्नेंट भी है. तो आप उम्र की बात ही ना करो. मैं भी एक बार माँ से बात करती हूँ. देखते है माँ क्या बोलती है. इस बात पे ऋतू कुछ नहीं कहती और फिर दोनों एक दुसरे की बाहों में सो जाते है.
दीपू के घर:
२ दिन बाद दीपू के घर में रात को सब खाना खा रहे होते है तो दीपू कविता को इशारा करता की वो उसके साथ सोने वाला है. कविता भी इशारे में हाँ कर देती है जो की दिव्या दोनों को देख लेती है और मन में सोचती है की आज कविता के बदन की टूटने की बारी है. खाना खा कर सब सोने की तैयारी करते है तो दीपू दिव्या से कहता है की वो वसु के साथ सोये. अगर उसे रात को कुछ ज़रुरत पड़ेगी तो वो उसकी मदत कर सकती है. दिव्या कुछ नहीं कहती और वो वसु को लेकर कमरे में सोने चली जाती है. वो वसु को कमरे में सुलाकर कहती है की वो २ Min में आएगी और दिव्या बाहर आकर दीपू को एक कोने में ले जाकर कहती है...
दिव्या: मैंने देखा है की तुम कविता को इशारा कर रहे थे. आज उसका पूरा बदन तोड़ देना और कल वो चलने के लायक नहीं रहे और ऐसा कहते हुए वो दीपू को आँख मार देती है.
दीपू: तुम तो मेरी एकदम समझदार बीवी निकली हो जा और वो दिव्या को चूम लेता है.
दिव्या: अब और ज़्यादा नहीं और ऐसा कहते हुए वो दीपू को धक्का देकर अलग करती है और वसु के कमरे में गांड मटकाते हुए चली जाती है.
दीपू उसकी मटकती गांड को देख कर मन में सोचता है... क्या जानलेवा गांड है इसकी....
दीपू भी फिर कविता को लेकर दुसरे कमरे में चला जाता है और शायद दरवाज़ा बंद करना भूल जाता है. कमरे में जाते ही दोनों शुरू हो जाते है और दीपू कविता को लण्ड चूसने को कहता है तो कविता भी जैसे उसी का इंतज़ार कर रही थी और वो अपने घुटनों पे आकर दीपू का लण्ड बड़े जोश से चूसती रहती है.
ठीक उसी वक़्त लता भी किचन में पानी पीने आती है और पानी पीकर जब वो अपने कमरे में जा रही थी तो वो दीपू और कविता को देख लेती है जहां कविता दीपू को खुश करने में लगी हुई थी. दीपू का बड़ा लण्ड देख कर लता की आँखें बड़ी हो जाती है और वो सोचती है की कितना बड़ा लण्ड है उसका और उसको याद करते हुए अपनी चूत मसलते रहती है.
अंदर की वो दृश्य को देख कर उसकी उत्तेजना और भी बढ़ती जा रही थी. लता को तो एक बार लगा था की वो भी कमरे के अंदर चली जाए लेकिन उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी कमरे के अंदर जाने की और बाहर ही खड़े होकर अपनी चूत मसलते रहती है.
तभी लता को अपनी कमर पर हाथ का स्पर्श महसूस हुआ लता ने तुरंत चौंक कर देखा तो दिव्या थी जो उसे देखते हुए मुस्कुरा रही थी. हुआ यूं था की भले ही दिव्या वसु के साथ थी लेकिन उसे नींद नहीं आ रही थी (वसु गेहरी नींद में चली गयी थी)और सोची थी की एक बार वो भी दीपू के पास जा कर थोड़ा मजे ले ले.
लता तो दिव्या को देख कर उसके होश उड़ गए थे. उसे क्या कहना है समझ में नहीं आ रहा था क्यूंकि उसने सोचा नहीं था की दिव्या उसे रंगे हाथ इस हालत में उसे पकड़ लेगी. वो कुछ कहने वाली थी कि दिव्या ने उसे मुंह पर उंगली रख चुप रहने का इशारा किया.
दिव्या ने लता को थोड़ा एक तरफ किया और खुद कमरे के अंदर का नज़ारा देखा तो उसको हसी आ गयी, लेकिन उसकी चूत में भी नमी आने लगी। दिव्या ने कुछ पल देखा और फिर उसके चेहरे पर एक शरारती मुस्कान आ गई, उसने तुरंत चेहरा हटाया और लता को देखा. लता उसे ही देख रही थी, दोनों के बीच जैसे आँखो में ही सब बातें हो गईं और इस बार दिव्या ने पहल करते हुए आक्रामकता दिखाते हुए लता को दीवार की ओर ढकेल दिया और उसके होंठों पर टूट पड़ी।
लता को तो कुछ समझ नहीं आ रहा था की क्या हो रहा है. लता जब अपने होंठ बंद ही रखी थी तो दिव्या अलग हो कर कहती है... मुझे पता है बुआ की आप भी बहुत प्यासी हो और हम सब को देख कर आप भी अपनी आग में जल रही हो. हम सब को इस बारे में पता है. लता ये बात सुनकर थोड़ा शर्मा जाती है तो दिव्या कहती है: इसमें शर्माने की क्या बात है? हमें तो अब भी आश्चर्य है की आप अब तक अपने आप को संभाल कर राखी हो. और वैसे भी एक बात बताऊँ?
लता: क्या?
दिव्या: यही की दीपू को भी ये बात पता है की आप बहुत प्यासी हो लेकिन हमारा पति थोड़ा संस्कारी है. वो आपके पास नहीं आएगा. आपको ही उसके पास जाना है और लता की साडी के अंदर हाथ दाल कर उसकी चूत को सहलाते हुए कहती है...आप ना भी बोलो तो आपकी चूत बता रही है की आप भी अंदर जाना चाहती हो और फिर ऐसा कहते हुए दिव्या फिर से लता के होंठों पे टूट पड़ती है.
लता भी तुरंत इस बार उसका साथ देने लगी, दोनों पागलों की तरह एक दूसरे के होंठों को चूस रही थीं और अंदर दीपू और कविता अपने उत्तेजना में लगे थे.
लता और दिव्या बाहर एक दूसरे को चूसते हुए अपनी उत्तेजना को संभालने की कोशिश कर रहीं थी और तब तक चूसती रहीं जब तक दोनों के लिए सांस लेना तक मुश्किल नहीं हो गया.. फिर जाकर दोनों के होंठ अलग हुए.
अंदर अब दीपू कविता को बिस्तर पे सुला कर उसकी चूत पे टूट पड़ता है और अपनी जुबां से उसकी चूत को चूसते हुए अपना एक ऊँगली उसकी गांड में भी दाल देता है. कविता भी उत्तेजना में आकर दीपू का सर अपनी चूत पे दबा देती है और वो ज़ोर ज़ोर से आंहें भर्ती रहती है...
कविता: तुम जितनी बार भी मेरी चूत चूसते हो तो ऐसा लगता है की पहली बार तुम मेरी चूत चूस रहे हो. तुम तो मेरी चूत चूस कर ही मुझे झडा देते हो और इस बार भी कोई अलग नहीं है और ऐसा लगता है जैसे तुम्हारी जुबां और मेरी चूत के बीच एक चुम्बक और लोहे का रिश्ता है. मेरी चूत देखते ही तुम्हारा मुँह उस पर लगा देते हो... लेकिन एक बात कहूँ तो मुझे भी बहुत अच्छा लगता है और ऐसे ही मेरी चूत चूसते रहो और ऐसा कहते हुए कविता फिर से झड़ जाती है और उसका पानी दीपू बड़े चाव से पी जाता है.
दीपू: जानू मेरा भी कुछ ऐसे ही हाल है... जितनी बार भी तुम मुझे अपनी चूत का पानी पिलाती हो उतना ही मुझे पीने का मन करता है.
अंदर की तरह कमरे के बाहर भी उत्तेजना अभी भी चरम पर थी दिव्या ने लता के पल्लू को नीचे सरका दिया था. लता का नंगा पेट और ब्लाउज़ में बंद उसकी मोटी मोटी चूचियां उसके सामने थीं. दिव्या लता के आगे बैठी थी और उसके मांसल कामुक पेट को चाट और चूम रही थी, लता भी दिव्या के चूमने चाटने से मचल रही थी आहें भर रही थी
लता की साँसें भारी हो चुकी थीं। दिव्या उसके पेट को चूमते-चाटते हुए नीचे झुकी हुई थी और लता की आँखें आधी बंद हो गई थीं। उसकी मोटी चूचियाँ ब्लाउज़ में तनी हुई थीं और पेट पर दिव्या की गर्म साँसें पड़ रही थीं।
“ओह्ह्ह्ह अह्ह्ह्ह सीईईईईई... दिव्या...” लता की आवाज़ काँप रही थी और धीरे धीरे सिसकारियां ले रही थी “अह्ह्ह्ह बहुत अच्छा कर रही है तू अह्ह्ह्ह... थोड़ी नीचे जा और चाट जा मेरी चूत को ..
दिव्या लता की बात का इंकार करते हुए उसकी जीभ को लता की गहरी नाभि के चारों ओर घूम रही थी — धीरे-धीरे, स्वाद लेते हुए। उसने नाभि में जीभ घुसा दी, फिर बाहर निकाली और पेट की नरम मांसलता को चूमने लगी। लता की उत्तेजना अब चरम पर थी।
थोड़ी देर बाद लता की बात मानते हुए उसके पेट को चूमते हुए थोड़ा नीचे जाती है तो देखती है की उसकी चूत की जगह उसकी साडी थोड़ी भीगी हुई है जो बता रहा था की लता की चूत अपना रस छोड़ रही है.
दिव्या: क्या बात है बुआ... आपकी चूत तो बहुत पानी छोड़ रही है.
लता: हाँ क्यों नहीं... अंदर का दृश्य ही ऐसा है... ऐसे दृश्य तो मैं रोज़ देखती हूँ तुम सब की... तो मेरी चूत तो गीली होगी ही ना. इस बात पे दिव्या हस देती है और फिर बड़े प्यार से लता की चूत को साडी के ऊपर से ही चूसने लग जाती है.
लता: ऐसे ही चाट मेरी चूत को... बहुत दिनों से परेशान कर रखी है इसने. आह्ह...
अंदर कविता भी ऐसे ही सिसकियाँ ले रही थी जहाँ दीपू उसकी चूत और गांड को चाट रहा था. अब दोनों जगह माहौल बहुत गरम हो चूका था... जहाँ दीपू अपनी बीवी को खुश कर रहा था तो वहीँ दिव्या भी अपनी बुआ को खुश कर रही थी.
कविता: हाँ जानू ऐसे ही... तुम जितनी भी मेरी चूत और गांड चाटते हो मेरा मन नहीं भरता है... अह्ह्ह.. आह्ह्ह.. ओहहह ओहहह.”
दिव्या फिर साडी को ऊपर कर के अपनी जीभ को लता की चूत में डालते हुए कहती है… सोचा नहीं था की आपका पानी इतना मीठा और थोड़ा खट्टा भी रहेगा. दीपू को पीने में मजा आएगा. दिव्या जब ये बात कहती है तो लता एकदम आश्चर्य से दिव्या की तरफ देखती है जैसे पूछना छा रही हो की क्या बात कर रही हो..
लता: क्या बोल रही है तू?
दिव्या: देखते जाओ आगे क्या होता है और फिर से दिव्या लता की चूत को चाटने लगती है और इस बार अपनी २ उंगलियां उसकी रस से बहती चूत में दाल देती है जो की बड़ी मुश्किल से अपनी उंगलियां अंदर दाल पाती है. लता की तो जैसे सांस ही रुक गयी थी. बहुत दिनों बात किसीने उसकी चूत से खेला और खोला था... उसकी चूत तो जैसे एकदम बंद ही हो गयी थी.
दिव्या: क्या बात है बुआ आपकी चूत तो बहुत टाइट है... मेरी उंगलियां को बड़ी मुश्किल से अंदर दाल पायी.
लता: जब इतने दिनों से ये चूत से बंद थी और सिर्फ अपनी उँगलियों से काम चला रही थी तो टाइट तो होगी ही ना... लता भी अब आहें भरने लगती है… अह्ह्ह्ह... आह्ह...
लता की आँखें और भी ज्यादा मुंद गईं। उसके चेहरे पर एक अजीब-सी सुकून दिख रहा था — शर्म, उत्तेजना और एक अंधेरी इच्छा का मिश्रण।
“अह्ह्ह्ह... कितना मजा आ रहा है दिव्या... मैं भी इसी ख़ुशी के लिए तरस रही थी.
दिव्या: ये ख़ुशी तो कुछ नहीं है बुआ... अलसी ख़ुशी तो अंदर कविता ले रही है... देखो.. और फिर दोनों अंदर देखते है जहाँ अब दीपू कविता की टांगों को अपने कन्धों पर रख कर ज़ोरदार कविता की चुदाई कर रहा था. कविता तो जैसे आसमान में पहुँच गयी थी.
दिव्या: अंदर जो देख रही हो बुआ... उसे असली ख़ुशी कहते है. आपको भी लेना है ऐसी ख़ुशी? लता इस बात पे कुछ नहीं कहती. दिव्या फिर लता का सर पकड़ कर उसके होंठ पे टूट पड़ती है और दोनों में एक ज़ोरदार और गहरा चुम्बन होता है.
दिव्या भी अब अंदर का नज़ारा देख कर बहुत बेहक गयी थी और वो भी अब रुकने वाली नहीं थी।
उसने लता की मोटी-मोटी चूचियों को जोर से मसलना शुरू कर दिया — ब्लाउज़ के ऊपर से ही। चूचियाँ बहुत टाइट थी । वो उन्हें दबाती, मसलती, और फिर अंगूठे से निप्पलों को दबाती। लता के मुँह से आहें निकल रही थीं।
“आह्ह्ह... दिव्या... आह्ह्ह...”
दिव्या के हाथ अब लता के ब्लाउज़ के बटनों पर आ गए और एक-एक करके बटन खोलने लगी।
और देखते ही देखते उसने लता का पूरा ब्लाउज खोल दिया और ऊपर से उसे नंगा कर दिया.
लता ने खुद ही ब्लाउज़ को अपनी बाजुओं से निकाल कर नीचे गिरा दिया।
लता की मोटी-मोटी चूचियाँ — भारी, गोल, निप्पल खड़े हो चुके — दिव्या के सामने थे। पेट नंगा, नाभि गहरी, और नीचे साड़ी अभी भी कमर पर बँधी हुई।
दिव्या ने लता को देखा — पूरी तरह नंगी ऊपर से — और फिर से उसके होंठों पर टूट पड़ी।
इस बार चुम्बन और भी आक्रामक था।
दोनों के होंठों की कुश्ती कुछ देर चली। दिव्या और लता एक-दूसरे के होंठों को चूस रही थीं, जीभें आपस में लिपट रही थीं, साँसें एक-दूसरे के मुँह में घुल रही थीं। चुम्बन गहरा और गीला था — होंठों से निकलती चूसने की आवाज़ें अब धीरे धीरे वहां भी हलकी गूँज रही थी । दिव्या के हाथ लता की नंगी कमर को कसकर पकड़े हुए थे और लता के हाथ दिव्या की पीठ पर घूम रहे थे। दोनों के बदन गर्म हो चुके थे.
कुछ देर बाद अब बारी थोड़ी पलट गयी थी. लता ने दिव्या की मोटी मोटी चूचियों पर हमला बोला.
उसने दिव्या की एक भारी चूची को दोनों हाथों से पकड़ लिया — उसकी चूची मोटी तो थी (और ये सब दीपू के कारनामे का नतीजा था) लेकिन एकदम ठोस और तनी हुई थी और उसमें कोई ढीलापन नहीं था. वो उसे जोर-जोर से मसलने लगी, उंगलियाँ उसकी नरम मांसलता में धँसती जा रही थीं। निप्पल खड़ा हो चुका था और लता ने उसे अंगूठे और तर्जनी के बीच दबाकर घुमाना शुरू कर दिया। दिव्या के मुँह से एक गहरी आह निकली।
लता ने दिव्या की दूसरी चूची को भी हाथ में लिया और एक-एक करके मसलते हुए दोनों को बारी-बारी से चूसना शुरू कर दिया। पहले बाईं चूची को मुँह में भर लिया जो एकदम गर्म और नरम थे. वो जोर से चूस रही थी, जीभ से निप्पल को घुमाती हुई, कभी हल्के से दाँतों से दबाती हुई। फिर दूसरी चूची पर चली गई। एक को मसलती, दूसरी को चूसती, और फिर बदल कर दूसरी को मसलने लगती।
दिव्या का बदन काँप रहा था। उसके मुँह से लगातार आहें निकल रही थीं।
“अह्ह्ह्ह अह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्ह बुआ जी... अह्ह्ह्ह ऐसे ही चूस ले मेरा सारा दूध अह्ह्ह्ह... कुतिया... काट मत...” दिव्या की आवाज़ काँप रही थी.. लेकिन उसमें एक गहरी इच्छा थी। (लता और दिव्या इतनी जोश और गरम हो चुकी थी की उसे इस बात का एहसास भी नहीं हुआ की उत्तेजना में उसने कुतिया कहा था.)
लता ने दिव्या की बातें सुनकर और भी जोश में आ गई। अब दोनों की चूत में गर्मी और बढ़ गई। दिव्या की “कुतिया” वाली बात ने उसे और उत्तेजित कर दिया। वो बिना रुके दिव्या की चूचियों को मसल रही थी — जोर-जोर से दबाती, मसलती, और फिर मुँह से चूसती। एक चूची को पूरी तरह मुँह में लेकर चूसती, जीभ से निप्पल को चाटती, और दूसरी को हाथों से मसलती। फिर बदल कर दूसरी चूची पर हमला बोल देती। दिव्या की चूचियाँ अब लाल हो चुकी थीं, निप्पल चूसने से और भी खड़े और नुकीले हो गए थे ।
ऐसा ही कुछ दृश्य अंदर कमरे में भी था. अब कविता दीपू के लण्ड पे सवारी कर रही थी. दीपू बिस्तर पे लेता हुआ था और कविता उसके लण्ड पे बैठ कर उछल उछल कर चुद रही थी.
बाहर लता ने भी दिव्या का ब्लाउज़ उतार दिया था। अब दोनों ही ऊपर से बिल्कुल नंगी थीं। दिव्या की मस्त चूचियाँ हवा में झूल रही थीं और लता के हाथ उन पर घूम रहे थे। लेकिन दोनों के होंठ फिर से एक-दूसरे में समाए हुए थे — और भी गहरा, और भी गीला चुम्बन चला दोनों का । दोनों अपने हाथ को एक दुसरे की चूचियों और गांड पे घुमा रहे थे।
दोनों की जीभ एक दुसरे के साथ गुथम घुता हो रहे थे... मतलब दोनों एक दुसरे का रस चूस और चाट रहे थे. दोनों की साँसें भारी थीं और चुम्बन की गीली आवाज़ें अब और भी तेज़ हो चुकी थीं।
दोनों एक-दूसरे को ऐसे चूम रही थीं जैसे बरसों पुरानी प्रेमिकाएँ हों — गहरा, धीमा और भूखा चुम्बन। उनके होंठ आपस में दब रहे थे, जीभें धीरे-धीरे लिपट रही थीं और चूसने की गीली आवाज़ें कमरे के बाहर हल्की-हल्की गूँज रही थीं। साँसें एक-दूसरे के मुँह में घुल रही थीं और दोनों के बदन गर्मी से चिपक चुके थे।
लता भी खुलकर आनंद ले रही थी क्यूंकि बहुत दिनों के बाद उसे ये एहसास और ख़ुशी मिल रही थी. दिव्या ने लता के होंठों को छोड़ा। दोनों की साँसें भारी थीं। दिव्या ने लता को धीरे से पलटा दिया — अब लता की पीठ उसकी ओर थी।
दिव्या ने उसके बदन को साड़ी के ऊपर से ही मसलना शुरू कर दिया। उसके हाथ लता की पीठ से शुरू होकर कमर तक फिसलते गए. फिर ऊपर आकर कंधों को दबाने लगे। लता आहें भरने लगी — हल्की, काँपती हुई आहें।
“आह्ह्ह... दिव्या …आआआआ”
दिव्या ने लता का सर अपनी ओर घुमा दिया और फिर उसकी चूची को मसलते हुए फिर से उसके होंठों पे टूट पड़ी. अब लता पे दोहरा हमला हो रहा था... होंठों पे और चूचियों पे. लता ये दोहरा हमला झेल नहीं पायी और दिव्या के इस हरकत से ही उसका पानी निकल गया जो की जांघ से बेह रहा था.
दिव्या फिर भी लगी रही और लता की मोटी मोटी चूचियों पे हमला बोल दिया और जोर-जोर से दबाती, मसलती, और उँगलियों से निप्पलों को महसूस करती.
लता दिव्या की बाहों में पूरी तरह पिघल रही थी। उसका बदन ढीला पड़ चुका था, सिर थोड़ा पीछे झुका हुआ, और आँखें आधी बंद। हर मसलने पर उसके मुँह से हल्की-हल्की आहें निकल रही थीं।
“आह तेरी ये चूचियां अह्ह्ह्ह बुआ जी...” “जी करता है इन्हें पूरा निचोड़ लूं...”
लता अब गहरी सांसें लेते हुए और उत्तेजित होते हुए:“आह्ह्ह्ह... ओह्ह्ह... निचोड़ लो न आह्ह... किसने रोका है...”
दिव्या ने और जोर से मसलना शुरू कर दिया। उसके हाथ अब और आक्रामक हो चुके थे।
“आह निचोडूंगी... पूरा निचोड़ लूंगी... आज आपकी पूरी कसर और आग पूरी तरह से मैं अपनी ओर से निकाल दूँगी..”. और बाकी का काम दीपू करेगा और ऐसा कहते हुए दिव्या उसके चूचियों को और ज़ोर से दबाती और मसलती रहती है”
लता का बदन और भी ज्यादा काँप उठा। उसकी चूत में गर्मी और बढ़ गई।
“अह्ह्ह्ह हां सीईईई दिव्या... मेरे बदन से खेलो... मसलो मुझे...”
अब लता अपने आप को दिव्या को समर्पण कर चुकी थी क्यूंकि उसकी आग इतनी भड़क चुकी थी.
अंदर का हाल भी कुछ ऐसा ही था. दीपू अब कविता को घोड़ी बना कर उसके बाल पकड़ कर पीछे से उसे चोद रहा था और कविता पूरी ज़ोर से सिसकारियां लेते हुए मजे ले रही थी.
दीपू भी काफी देर से कविता को चोद रहा था और अब उससे भी रहा नहीं जाता और फिर ज़ोर से घुर्राते हुए वो दिव्या की चूत में ही अपना पूरा पानी गिरा देता है.
क्यूंकि दीपू के घुर्राने से लता और दिव्या अपना काम रोक कर कमरे में देखते है और वो दोनों दीपू का झड़ना देख लेते है . उसको देख कर दिव्या लता के कान में कहती है: देख रही हो बुआ... दीपू का माल... कितना गाढा है और कितना पानी छोड़ रहा है. बोलो अपनी उसका पानी लेना चाहोगी?
लता तो अब और भी उत्तेजित हो गयी थी.
“अह्ह्ह दिव्या... ओह्ह्ह... इतना पानी निकाला है उसने... मैंने कभी सोचा नहीं था... अब मुझे भी पता चल की वसु इतनी जल्दी पेट से कैसे हो गयी. उसका गाढा पानी जिस किसीकी चूत में जाएगा वो तो गाभिन हो ही जायेगी..”
लता ने दिव्या की बाहों में मचलते हुए कहा।
अब लता ने भी दिव्या को पूरा नंगा कर दिया और उसकी चूचियों को मसल और काट खा रही थी.
लता : तूने भी तो दीपू का रस चखा है ना.. तूने भी तो उसका पानी अपनी चूत में लिया है ना... तू अब तक गाभिन क्यों नहीं हुई? लता की बात सुनकर अब दिव्या भी काफी उत्तेजित हो गयी थी.
दिव्या: चिंता मत करो बुआ जी... वो दिन भी ज़्यादा दूर नहीं जब मेरे पेट में भी हम दोनों का बच्चा पलेगा और ऐसा कहते हुए लता को अपने सीने से लगा कर एक चूची उसके मुँह में ठूस देती है.
लता ने दिव्या के नंगे बदन को और भी जोर से मसलना शुरू कर दिया। उसके हाथ दिव्या की कमर से नीचे फिसलते हुए मोटे चूतड़ों तक पहुँच चुके थे। वो उन्हें दबाती, मसलती, और उँगलियों से गोलाई को महसूस करती हुई पूछी : तूने कभी गांड मरवाई है दीपू से?
लता की ये बात सुनकर ही दिव्या अपनी परम सुख में पहुँच गयी और वो भी अपना पानी छोड़ दिया. दिव्या लता की तरफ देख कर उसका हाथ ले जाकर अपनी चूत पे रख दिया. दिव्या का गीला और पानी छोड़ता हुआ चूत को महसूस कर के ही लता को पता चल गया था की दीपू ने दिव्या की गांड भी मारी है.
दिव्या: लगता है आपकी गांड को भी दीपू के लण्ड की ज़रुरत है. दिव्या की ये बात सुनते ही लता के बदन में एक ज़लज़ला पैदा हो गया और उसकी आँखों में एक तरफ से चमक आ गयी..
दिव्या: मेरी चूत तो एकदम गीली हो रही है यही सोचके की दीपू का लण्ड जब आपकी की गांड की सैर करेगा तो आपकी क्या हालत होगी? जब उसने पहली बार मेरी गांड मारी थी... उसने तो मेरे होश ही उदा दिए थे. तब से हर रोज़ जब भी दीपू मुझे चोदता है तो मेरी गांड ज़रूर मारता है.
दिव्या की ये बात सुनते ही लता की आँखों के सामने तुरंत वो दृश्य घूम गया जो अभी कुछ देर पहले दिव्या ने बताया था... की दीपू का लण्ड लता की गांड में गया तो वो क्या करने वाली है.
लता दीपू के लण्ड को याद करते हुए गहरी आह भर रही थी। आँखों में उत्तेजना और इच्छा साफ़ नज़र आ रही थी.
अब दोनों इतनी कामुक बातें और अंदर का नज़ारा देख कर इतने बेहक गए थे की उन्हें पता भी नहीं चला जब वो दोनों नंगी हो गयी और एक दुसरे की बदन को सेहला रहे थे उत्तेजित हुए..
दिव्या जब अपना हाथ लता की चूत पे रखती है तो वो पाती है की लता की चूत भी उसकी चूत की तरह एकदम बेह रही है और एकदम गीली हो गयी है.
दिव्या: बुआ जी, आपकी चूत तो सच में सुलग रही है...
लता ने दिव्या की बाहों में और भी ज्यादा पिघलते हुए जवाब दिया: हां दिव्या मेरी चूत प्यासी है अहहुह्ह.. जब से तूने बताया है और मैंने भी दीपू का लण्ड देखा है मुझे नहीं लगता की मैं अब रह पाऊँगी.
लता: दिव्या जो आग इतने दिनों तक मेरे अंदर मैंने छुपा रखी थी लगता नहीं अब मैं और छुपा पाऊँगी. अगर दीपू का लण्ड नहीं लिया तो.... लता इतना ही बोलती है की दिव्या उसका मुँह बंद कर देती है और कहती है.... चिंता मत करो... जल्दी ही वो काम भी पूरा हो जाएगा.
लता की इतना ही कहना था की दिव्या झटके से कमरे के अंदर आ जाती है और वो भी पूरी नंगी. लता को कुछ समझ नहीं आता की दिव्या क्या कर रही है. दिव्या को ऐसा नंगा देख कर दोनों दीपू और कविता भी दांग रेह जाते है और उन्हें भी कुछ समझ नहीं आता की क्या हो रहा है और दिव्या ऐसे नंगी अंदर क्यों आयी है.
दिव्या: क्यों पति जी कविता को ठोक कर आराम कर रहे हो और जैसे लगता है की तुम मुझे भूल ही गए हो.
दीपू: अरे तुम्हे आज माँ के पास सोने को कहा था ना... सोचा आज अपनी इस बीवी को प्यार करूंगा और कल तुम्हे. तुम्हे तो पता है की अब माँ के साथ कोई होना चाहिए ना.
दिव्या: तुम्हारी बात भी सही है पति जी.... लेकिन लगता है आज तुम्हारी किस्मत बड़ी अच्छी है. आज तो आपको एक बम्पर ऑफर है.
दीपू को कुछ समझ नहीं आता तो वो और कविता दोनों एक दुसरे को देखते है और सवालिया नज़र से दिव्या को देखते है.
तब तक दिव्या कमरे से बाहर जाती है और और एक Min बाद लता जैसे कमरे में गिर जाती है. दिव्या कमरे से बाहर जाकर लता को अंदर जाने को केहती है तो लता मना कर देती है.
दिव्या हस देती है और केहती है... लगता है आप ऐसे नहीं मानोगे और वो लता को कमरे के अंदर धक्का दे देती है. लता अपने आप को संभालते हुए जब वो खड़ी हो जाती है तो तब तक देर हो गयी थी. वो दीपू के कमरे के अंदर आ गयी थी और वो भी दिव्या की तरह एकदम नंगी ही थी दोनों दीपू और कविता के सामने.
लता को ऐसे उनके सामने देख कर दोनों दीपू और कविता की आँखें फटी की फटी रह गईं।
उन्हें समझ नहीं आ रहा था की क्या हो रहा है.
दिव्या फिर पीछे से आती है और केहती है: मैंने कहा था ना पति जी... आज यह है तुम्हारा बम्पर ऑफर. तुम्हे तो पता है इस घर में तीन नहीं बल्कि चार औरतें है. तुम तो तीनो को बहुत खुश रखते हो और कविता की तरफ देख कर... जैसे कुछ देर पहले तुमने मेरी सौतन को खुश किया था.
लेकिन शायद चौथी के बारे में भूल ही गए.
दीपू: क्या कह रही हो तुम? ठीक तो हो ना?
दिव्या: मुझे पता है दीपू... तुम्हारी गलती नहीं है... इसीलिए तो हम सब तुमसे इतना प्यार करते है. तुम्हे भी पता है की लता भी तुम्हारे प्यार के लिए तड़प रही है लेकिन कभी भी तुमने उनकी ओर गलत नज़र से नहीं देखा.
दिव्या कविता की तरफ देख कर: क्या केहती हो कविता?
कविता: सब को देख कर... प्यार से दीपू को चूमते हुए... दिव्या तू सही कह रही हो. हम सब को इस बात का पता है. लता ये सब सुनकर सब को देख रही थी लेकिन कुछ नहीं कहती.
दिव्या: तो आज रात आप खूब मस्ती करो. मैं चलती हूँ. अगर वसु उठ गयी और मुझे वहां नहीं पाया तो घबरा जायेगी.
हाँ एक और बात.... तुम्हे शायद पता ना हो.... लेकिन बुआ जी की चूत एकदम गीली और रस छोड़ रही है. तुम्हारा डंडा इसके बिल में आसानी से चला जाएगा. ऐसा बोल कर उसे आँख मार देती है और दिव्या कमरे से चली जाती है लेकिन जाने से पहले कमरे का दरवाज़ा बंद कर देती है. अब कमरे में सिर्फ तीनो ही रह गए थे. भले ही तीनो नंगे थे... दीपू और कविता ने अपने आपको चादर से ढका हुआ था तो वहीँ लता उन दोनों के सामने एकदम नंगी खड़ी थी.
दीपू फिर खड़ा हो कर लता की तरफ आता है और उसकी आँखों में देखते हुए पूछता है... दिव्या जो केह रही थी... क्या वो सच है? लता थोड़ा शर्माते हुए हाँ में सर हिला देती है तो दीपू उसके चेहरे को पकड़ कर अपने होंठ उसके होंठों से मिला देता है. लता को तो जैसे इसका ही इंतज़ार था. काफी देर से वो भी उत्तेजित थी जो कमरे के बाहर उसके और दिव्या के बीच जो कुछ हुआ था. लता भी दीपू के होंठों को चूसने लगती है और दोनों एक प्रगढ़ और गहरी चुम्बन में जुड़ जाते है जो काफी देर तक चलता रहा.
उन दोनों को देख कर कविता भी गरमा जाती है और वो भी उठकर उन दोनों के पास आती है. अब लता भी कविता को देख कर अपनी शर्म दूर कर देती है और वो भी थोड़ा खुल जाती है. जब कविता उसके पास आती है तो वो दीपू को छोड़ कर वो कविता के होंठों को अपने होंठों से जोड़ देती है और दोनों फिर से एक गहरे चुम्बन में जुड़ जाते है और उसे चूमते हुए उसके हाथ को कविता की कमर पे घुमाते रहती है.
उन दोनों को देख कर दीपू बिस्तर पे बैठ कर अपने लण्ड को हिलाते रहता है और देखते ही देखते उसका लण्ड भी अपनी पूरी औकात में आ जाता है. उन दोनों को चूमते चाटते देख कर दीपू कहता है: इस कमरे में मैं भी हूँ. कविता उसको झूटी गुस्से से देख कर केहती है... कुछ देर पहले तो तुमने मेरी जम के मारी है. फिर से तैयार हो गए? पहले मुझे बुआ जी के साथ प्यार करने दो.
दीपू: यहां आकर मेरे लण्ड से भी प्यार कर सकते हो ना.
दोनों फिर एक दुसरे को देखते है और हस्ते हुए दीपू के पास आते है. कविता ने पहले ही दीपू का लण्ड चूसा था तो वो लता को इशारा करता है तो लता भी समझ जाती है और घुटनों पे बैठ के दीपू के लण्ड को देखती है जो की पूरा खड़ा था और वो जैसे लता को सलामी दे रहा था.
दीपू के खड़े लण्ड को देख कर लता से भी रहा नहीं जाता और उसके लण्ड को पकड़ कर पूरे चाव से चूसने लगती है.
लता काफी देर तक दीपू का लण्ड चूसती है और थोड़ी देर बाद केहती है की उसके घुटने दुःख रहे है तो दीपू को दया आती है और दोनों को बिस्तर पे ले जाता है और इस बार दोनों दीपू के लण्ड को बारी बारी से चूमते चूसते और चाटते है.
जहाँ कविता दीपू का लण्ड चूसती है तो लता भी दीपू की गोटियों को चूसते रहती है. दीपू के तो मजे ही मजे थे. वो तो जैसे जन्नत पे पहुँच गया था.
काफी देर तक जब दोनों दीपू के लण्ड को चूसते रहते है तो दीपू को लगता है की अगर वो उन्हें नहीं रोका तो वो झड़ जाएगा. और उसे पता था की इस बार वो झड़ गया तो फिर उसे भी थोड़ी मुश्किल होगी उसके लण्ड को फिर से खड़े करने में भले ही २ कामुक महिलाएं उसके साथ है.
थोड़ी देर बाद दीपू कहता है: तुम दोनों ने मुझे जन्नत की सैर कराई है. अब मेरी बारी है की तुम दोनों को भी ऐसा मजा दूँ. ऐसा कहते हुए दीपू लता को सुला देता है और उसकी चूत को चूसने लग जाता है. काफी सालों बाद किसी पुरुष ने लता की चूत को चूसा था और वो कोई नहीं वो उसका भांजा ही था जो उसे चूस कर मजा दे रहा था. कविता भी दीपू के सर को पकड़ कर उसकी चूत पे ठूस रही थी. अब कमरे में ज़ोर ज़ोर से सिसकियों की आवाज़ गूँज रही थी. आह... अह्ह्ह... अहह... दीपू... ऐसे ही चूस... बहुत अच्छा लग रहा है.
दीपू लता की चूत को चूस रहा था तो वहीँ कविता भी फिर से गरम हो जाती है और इस बार वो झुक कर लता को चूमती है. लता के तो जैसे मजे ही मजे थे.
दीपू के चूसने से ही लता झड़ जाती है और ज़ोर ज़ोर से सांसें लेने लगती है. वो अपने आप को दुरुस्त कर के कविता को चूमने लगती है. थोड़ी देर बाद...
लता: दीपू अब मुझे और मत तड़पा.... मैं इस पल के लिए बहुत दिनों से तरस रही थी... अब और रहा नहीं जाता. अपने लण्ड से अब मुझे भी आबाद कर के.
लता के मुँह से ये बात सुनकर दीपू को हसी आ जाती है और फिर अपने लण्ड में थोड़ा थूक लगा कर लता की चूत पे रगड़ता है. लता इस रगड़ से सेहर जाती है और केहती है.... थोड़ा धीरे से डालना दीपू. बहुत दिनों बाद चुद रही हूँ.
दीपू: चिंता मत करो बुआ. मैं आराम से ही करूंगा और वो कविता को इशारा करता है तो कविता दीपू का इशारा समझ कर लता के चेहरे पे बैठ जाती है और अपनी रस से बहती चूत को लता के मुँह पे रख देती है.
लता को इस बात का पता नहीं था अब उसपे केहर धा ने वाला है क्यूंकि जब लता कविता की चूत चूस रही थी तो दीपू अपने लण्ड को लता की चूत पे रख कर एक ज़ोरदार धक्का मारता है. धक्का इतना ज़बरदस्त था की पहली बार में ही उसका पूरा लण्ड लता की चूत की जड़ तक पहुँच जाता है. लता की तो जैसे आँखें बाहर आ जाती है. कविता उसके मुँह पे बैठी थी इसीलिए उसकी चीक कविता की चूत पे ही दब जाती है वरना शायद वो इतना ज़ोर से चिल्लाती की वो आवाज़ बगल वाले घर में भी सुनाई देता.
दीपू को भी लगता है की शायद उसने बाहर ज़ोर से उसे ठोका है. वो झुक कर लता की चूचियों को चूसते है और वहीँ कविता भी उसके सर पे हाथ रख कर उसे थोड़ा सहारा देती है. दीपू भी थोड़ी देर ऐसे ही अपने लण्ड को उसकी चूत पे रख कर थोड़ा वक़्त गुज़ारता है और कुछ नहीं करता. जब लता को थोड़ी राहत मिलती है तो फिर से वो कविता की चूत को चूसने लगती है. ये एक तरफ से उसका इशारा था की वो अब थोड़ी ठीक है. दीपू भी समझ जाता है और अपने लण्ड को बाहर निकल कर अब धीरे धीरे उसे पेलने लगता है.
अब लता को भी मजा आने लगता है. अब कविता भी उसके ऊपर से उठ जाती है और लता के ऊपर सो जाती है. अब लता और कविता दोनों ६९ पोजीशन में थे और दोनों एक दुसरे की चूत को चाट रहे थे और दीपू लता को पेले जा रहा था.
लता भी बेहकते हुई चिल्लाते रहती है अब... “अह्ह्ह्हः अह्ह्ह्ह सीईईईईई ओह्ह्ह्ह अह्ह्ह्ह लल्ला अह्ह ओह्ह्ह मार डाला अह्ह्ह्ह आराम से ओह्ह्ह अह्ह्ह्ह मैं आने वाली हूं अह्ह्ह्ह ओह्ह्ह!”
काफी देर तक लता को पेलने के बाद लता केहती है... मुझे ही पलोगे क्या? कविता तू क्यों नहीं चुदती?
कविता: नहीं बुआ जी.... आज रात आपकी बारी है.. आप ही मजे करो. आपके आने से पहले तो मेरा नंबर लग ही गया था और शायद ये बात आपको भी पता है.
फिर दीपू बिस्तर पे सो जाता है और लता उसके खड़े लण्ड को पकड़ कर अपनी चूत पे घुसा देती है और एक तरह से उसपे बैठ जाती है.
दीपू भी उसकी कमर को पकड़ कर अपने लण्ड को उसकी चूत में घुसाते हुए उसकी चुदाई करते रहता है और लता भी उसके लण्ड पे झूलते रहती है. अब कमरे में माहौल बहुत गरम हो गया था. जब दीपू लता को चोद रहा था तो वहीँ कविता बगल में बैठ कर अपनी चूत को मसलते रहती है. थोड़ी देर बाद अब दीपू से भी रहा नहीं जाता तो वो भी कहता है की उसका भी होने वाला है.
लता: २ Min रुको मेरा भी होने वाला है... लेकिन एक Min के अंदर ही लता भी अपना पानी छोड़ देती है. आखिर में दीपू से भी रहा नहीं जाता और वो भी झड़ने के करीब आ जाता है. जब वो बोलता है तो लता भी उसके लण्ड से उठ जाती है और दोनों कविता और लता उसके लण्ड को चूसती है. दीपू भी गुर्राते हुए अपना पानी दोनों के ऊपर गिरा देता है तो दोनों भी उसका पूरा पानी पी जाते है.
दीपू भी अब बहुत थक गया था और वो भी हफ्ते हुए बिस्तर पे गिर जाता है और दोनों लता और कविता दोनों उसके बगल में अपना सर रख कर सो जाते है. लता दोनों की तरफ देख कर ख़ुशी से केहती है.... अब मुझे समझ में आया तुम सब इतने खुश कैसे रहते हो. वो दीपू की तरफ देख कर केहती है... जब इतना समझदार पति और इतनी प्यारी पत्नियां हो तो घर में खुशियां ही रहेगी... दीपू ये बार सुनकर हस देता है और मन में सोचता है की वो सच में बहुत किस्मतवाला है.... और फिर तीनो थोड़ी देर बाद सो जाते है...
Note: अपडेट की देरी के लिए माफ़ी. लेकिन वक़्त की कमी, काम और स्वास्थय के कारण उपदटेस में देरी हो जाती है. इसीलिए हर अपडेट मैं लम्बा ही लिखने की कोशिश करता हूँ जो की एक तरह से देरी के लिए भरपाई हो